MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 17 भारत में उद्योगों की स्थिति

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 17 भारत में उद्योगों की स्थिति

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 पाठान्त अभ्यास

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
लघु औद्योगिक इकाइयों की अधिकतम विनियोग सीमा है
(i) 1 करोड़ रुपये
(ii) 5 करोड़ रुपये
(iii) 3 करोड़ रुपये
(iv) 7 करोड़ रुपये।
उत्तर:
(ii) 5 करोड़ रुपये

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प्रश्न 2.
विश्व में कुल जूट उत्पादन का भारत में पैदा होता है
(i) 25 प्रतिशत
(ii) 10 प्रतिशत
(iii) 50 प्रतिशत
(iv) 35 प्रतिशत।
उत्तर:
(iii) 50 प्रतिशत

प्रश्न 3.
इनमें से किसका सम्बन्ध सूचना प्रौद्योगिकी से है?
(i) मोटर कार
(ii) सुन्दर कपड़े
(iii) कम्प्यू टर
(iv) सोना चाँदी।
उत्तर:
(iii) कम्प्यू टर

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में काँच निर्मित वस्तुओं का निर्यात किन देशों में किया जाता है?
उत्तर:
भारत में निर्मित काँच से बनी वस्तुओं का निर्यात पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान, कुवैत, ईरान, इराक, सऊदी अरब, म्यांमार व मलेशिया आदि देशों में किया जाता है।

प्रश्न 2.
भारत में असली रेशम उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र कौन से हैं?
उत्तर:

  1. कश्मीर घाटी
  2. पूर्वी कर्नाटक व तमिलनाडु के पठारी व पहाड़ी क्षेत्र
  3. पश्चिमी बंगाल का हुगली क्षेत्र
  4. असम का पर्वतीय भू-भाग।

प्रश्न 3.
भारत में उत्पादित लाख के.प्रमुख ग्राहक देश कौन से हैं?
उत्तर:
भारत की लाख के प्रमुख ग्राहक चीन, अमेरिका, रूस और ब्रिटेन हैं। इसके अलावा जर्मनी, ब्राजील, इटली, फ्रांस तथा जापान हैं।

प्रश्न 4.
कृषि आधारित उद्योग कौन से हैं? (2008, 13)
उत्तर:
वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, कागज उद्योग, पटसन उद्योग, वनस्पति उद्योग कृषि पर आधारित उद्योग हैं।

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प्रश्न 5.
देश में स्थापित सीमेण्ट कारखानों की उत्पादन क्षमता कितनी है?
उत्तर:
वर्तमान में देश में 190 बड़े सीमेण्ट कारखाने हैं जिनकी उत्पादन क्षमता 324.5 मिलियन टन है। इसके अलावा देश में 360 लघु सीमेण्ट कारखाने हैं जिनकी उत्पादन क्षमता 11.10 मिलियन टन है।

प्रश्न 6.
भारत में रेशम उत्पादन की दृष्टि से कौन से राज्य महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
भारत में असली रेशम उत्पादन के चार प्रमुख क्षेत्र हैं-

  1. कश्मीर घाटी
  2. पूर्वी कर्नाटक व तमिलनाडु के पठारी व पहाड़ी क्षेत्र
  3. पश्चिमी बंगाल का हुगली क्षेत्र
  4. असम का पर्वतीय भू-भाग।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में विभिन्न उद्योगों को किन-किन आधारों पर वर्गीकृत किया गया है? समझाइए।
उत्तर:
उद्योगों को हम उनके स्वामित्व, उपयोगिता, आकार, माल की प्रकृति एवं कच्चे माल की उपलब्धता के आधार पर विभिन्न भागों में बाँट सकते हैं। जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट से स्पष्ट है –
उद्योगों का वर्गीकरण
MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 17 भारत में उद्योगों की स्थिति - 1
प्रश्न 2.
भारत के प्रमुख कुटीर उद्योगों की स्थिति का विवरण दीजिए। (2009, 14)
उत्तर:
भारत के प्रमुख कुटीर उद्योग
रेशम उद्योग :
रेशम एक कृषि आधारित उद्योग है और भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह एक उपयुक्त उद्योग है। यह गाँव एवं श्रम आधारित उद्योग है, जो न्यूनतम निवेश पर अधिकतम लाभ की वापसी देता है। विश्व में भारत दूसरा बड़ा रेशम उत्पादक है और विश्व के कुल कच्चे रेशम उत्पादन का 18 प्रतिशत पूरा करता है। इस उद्योग में 78.50 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है, जिसमें अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। इस उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए सन् 1949 में केन्द्रीय रेशम बोर्ड की स्थापना की गई।

लाख उद्योग :
भारत लाख का प्रमुख उत्पादक राष्ट्र है। सन् 1950 से पहले केवल भारत में ही लाख साफ की जाती थी, परन्तु अब थाईलैण्ड में भी यह काम होता है। इसका भारत के लाख उद्योग पर प्रभाव पड़ा है। पहले विश्व की 85 प्रतिशत लाख भारत में तैयार होती थी, जो वर्तमान में घटकर 50 प्रतिशत रह गई है। भारत में लाख का सबसे अधिक उत्पादन छोटा नागपुर पठार में होता है। यहाँ देश का 50 प्रतिशत उत्पादन होता है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, उड़ीसा, गुजरात व उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला लाख के प्रमुख उत्पादक केन्द्र हैं। इस उद्योग से लगभग 10,000 लोगों को रोजगार प्राप्त है।

काँच उद्योग :
कुटीर उद्योग के रूप में यह उद्योग प्रमुख रूप से फिरोजाबाद व बेलगाँव में केन्द्रित हैं। फिरोजाबाद में काँच के 225 से भी अधिक छोटे-बड़े कारखाने हैं काँच की विभिन्न प्रकार की चूड़ियाँ बनाई जाती हैं। एटा, शिकोहाबाद, फतेहाबाद व हाथरस में भी यह उद्योग कुटीर उद्योग के रूप में संचालित हैं।

प्रश्न 3.
भारत में चर्म उद्योग में किन वस्तुओं का निर्माण होता है?
उत्तर:
यह एक पारम्परिक उद्योग है। चमड़े से कई प्रकार की वस्तुएँ; जैसे-कोट, जर्सी, पर्स, बटुए, थैले, खेल का सामान, खिलौने, कनटोपं, बेल्ट, दस्ताने, जूते व चप्पल आदि बनाये जाते हैं। देश में चमड़े की वस्तुओं का सर्वाधिक उत्पादन तमिलनाडु, कोलकाता, कानपुर, मुम्बई, औरंगाबाद, कोल्हापुर, देवास, जालंधर और आगरा में होता है। चमड़े की वस्तुओं के उत्पादन का 75 प्रतिशत भाग लघु और कुटीर उद्योगों द्वारा उत्पादित किया जाता है।

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प्रश्न 4.
भारत में कागज उद्योग की स्थिति समझाइए।
उत्तर:
कागज उद्योग-भारत में कुटीर उद्योग के अन्तर्गत कागज-निर्माण का इतिहास पुराना है। भारत में आधुनिक ढंग की पहली कागज मिल बालीगंज (कोलकाता) में 1870 में स्थापित की गयी। देश में पहला अखबारी कागज उद्योग मध्य प्रदेश के नेपानगर में 1947 में स्थापित किया गया था। कागज बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में लकड़ी की लुग्दी, घास, बाँस, कपड़े व चिथड़े, जूट आदि का प्रयोग होता है। भारत के कागज उद्योग को विश्व के 20 बड़े कागज उद्योगों में से गिना जाता है। यहाँ 16,000 करोड़ रुपये का उत्पादन होता है, प्रत्यक्ष रूप से 3 लाख और परोक्ष रूप से 10 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। भारत में प्रति व्यक्ति कागज की खपत सिर्फ 7-2 किलोग्राम है जोकि विश्व औसत (50 किग्रा) से बहुत कम है।

भारत में कागज के प्रमुख उत्पादक राज्य आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा केरल हैं।

प्रश्न 5.
भारत में काँच उद्योग पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
काँच उद्योग-काँच उद्योग भारत का प्राचीन उद्योग है, किन्तु भारत में विकसित काँच उद्योग की शुरूआत द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् ही सम्भव हो सकी। वर्तमान में इस उद्योग में आधुनिक एवं नवीनतम तकनीकों से काँच का उत्पादन किया जा रहा है। देश में इस समय काँच के 56 बड़े कारखानों में से 15 ऐसे आधुनिक कारखाने हैं, जो उत्तम किस्म के काँच के सामान का निर्माण पूर्णतः मशीनों द्वारा करते हैं।

आधुनिक उद्योग के रूप में यह उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिमी बंगाल, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु व ओडिशा में केन्द्रित हैं। देश में काँच बनाने के सबसे अधिक कारखाने पश्चिम बंगाल में हैं। कुटीर उद्योग के रूप में यह उद्योग प्रमुख रूप से फिरोजाबाद व बेलगाँव में केन्द्रित है।

प्रश्न 6.
सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग भारत का सबसे तेज बढ़ता हुआ उद्योग है। समझाइए। (2008, 09, 13, 14)
उत्तर:
सूचना एवं प्रौद्योगिकी उद्योग :
सूचना एवं प्रौद्योगिकी उद्योग से आशय उस उद्योग से है, जिसमें कम्प्यूटर और उसके सहायक उपकरणों की सहायता से ज्ञान का प्रसार किया जाता है। इसके अन्तर्गत कम्प्यूटर, संचार, प्रौद्योगिकी और सम्बन्धित सॉफ्टवेयर को शामिल किया जाता है। इसके अन्तर्गत उस सम्पूर्ण व्यवस्था को शामिल किया जाता है, जिसके द्वारा संचार माध्यम और उपकरणों की सहायता से सूचना पहुँचाई जाती है। यह ज्ञान आधारित उद्योग है। वर्ष 2000-01 में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 33,138 करोड़ रुपये था जो 2008-09 में बढ़कर 2,35,300 करोड़ रुपये पहुँच गया। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में उद्योग का योगदान वर्ष 1999-2000 में 1.2 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2013 में 8 प्रतिशत हो गया है। इससे ज्ञात होता है कि यह उद्योग भारत का सबसे तेज गति से बढ़ता हुआ उद्योग है।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में वृहद् उद्योगों की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में वृहद् उद्योग
सूती वस्त्र उद्योग :
भारत में सूती वस्त्रों की अत्यन्त पुरानी परम्परा है। देश की प्रथम सूती कपड़ा मिल सन् 1818 में कोलकाता में स्थापित की गई थी। देश की सूती कपड़ा मिलें मुख्य रूप से महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात में हैं। यह उद्योग भारत का सबसे बड़ा एवं व्यापक उद्योग है। देश के औद्योगिक उत्पादन में इसका योगदान 14 प्रतिशत है, जबकि देश के कुल निर्यात आय में इसका हिस्सा 19 प्रतिशत है। आयात में इसका हिस्सा 3 प्रतिशत है। यह उद्योग लगभग 9 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान कर रहा है। इस उद्योग में लगभग 5,000 करोड़ रुपये की पूँजी लगी है। सरकार ने कपड़ा आदेश (विकास एवं विनिमय)1993 के माध्यम से कपड़ा उद्योग को लाइसेन्स मुक्त कर दिया।

लोहा तथा इस्पात उद्योग :
लोहा-इस्पात उद्योग देश का एक आधारभूत उद्योग है। विनियोग की दृष्टि से यह संगठित क्षेत्र के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशालतम उद्योगों में से एक है।

भारत में यह उद्योग अति प्राचीन है लेकिन आधुनिक तरीके से लोहे का उत्पादन 1875 में आरम्भ हुआ, जब बंगाल आयरन वर्क्स कम्पनी ने कुल्टी (पश्चिम बंगाल) में अपने संयन्त्र की स्थापना की। परन्तु बड़े पैमाने पर उत्पादन 1907 में जमशेदपुर में टाटा आयरन इण्डस्ट्रीज कम्पनी (टिस्को) की स्थापना के साथ आरम्भ हुआ। भारत में कुल 10 कारखाने हैं जिसमें से 9 सार्वजनिक क्षेत्र में एवं केवल एक निजी क्षेत्र (टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर, पश्चिमी बंगाल) में है। सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला, बोकारो, विशाखापट्टनम् एवं सलेम में है।

इस समय देश में 196 लघु इस्पात संयन्त्र हैं। इनमें से 179 इकाइयाँ चालू हैं तथा शेष बन्द हैं। वर्तमान में इस उद्योग में 90,000 करोड़ रुपये की पूँजी लगी है तथा इसमें 5 लाख लोगों को रोजगार प्राप्त है।

जूट उद्योग :
वर्ष 1859 में कलकत्ता के निकट पहली जूट मिल स्थापित हुई थी। इस उद्योग में करीब – 4 लाख श्रमिकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार मिला हुआ है। भारत की 90% जूट मिलें पश्चिम बंगाल में कोलकाता के समीप हुगली नदी के किनारे स्थित हैं। इस राज्य की जलवायु तथा उपजाऊ भूमि जूट-उत्पादन के अनुकूल है। देश में 83 पटसन मिलें हैं जिनमें से 6 कपड़ा मन्त्रालय के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम राष्ट्रीय पटसन उत्पाद निगम की हैं। पटसन उत्पादनों का वार्षिक निर्यात 1400-1500 करोड़ रुपये के बीच है। घरेलू खपत और निर्यात का अनुपात 80 : 20 हैं।

चीनी उद्योग :
चीनी उद्योग के विकास का प्रारम्भ 1903 से होता है और 1931 में भारत में चीनी बनाने के 29 कारखाने स्थापित हो गये थे 1950-51 में इनकी संख्या बढ़कर 139 हो गयी थी 1995 में भारत में 435 कारखाने थे जिनकी स्थापना मुख्यतः गन्ना उत्पादक क्षेत्रों या उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में ही की गयी थी। चूंकि गन्ना शीघ्र ही सूख जाता है, इसलिए इसको शीघ्रता से कारखानों तक पहुंचाने एक अनिवार्यता होती है।

सीमेण्ट उद्योग :
भारत में संगठित रूप से समुद्री सीपियों से सीमेण्ट तैयार करने का प्रथम कारखाना सन् 1904 में मद्रास में स्थापित किया गया था, लेकिन वह असफल हो गया। इसके पश्चात् 1913 में टाटा एण्ड सन्स कम्पनी के निर्देशन में पोरबन्दर (गुजरात) में इण्डियन सीमेण्ट कम्पनी लिमिटेड की स्थापना की गयी जिसकी सफलता से प्रेरित होकर सन् 1914 तक देश में 5 सीमेण्ट कारखाने स्थापित किये गये, जिनका कुल उत्पादन 76 हजार टन वार्षिक था।

वर्तमान स्थिति-वर्तमान में 190 बड़े सीमेण्ट संयन्त्र हैं, जिनकी संस्थापित क्षमता करीब 324.5 मिलियन टन है। इसके अलावा देश में करीब 360 लघु सीमेण्ट संयन्त्र भी हैं जिनकी अनुमानित क्षमता 11-10 मिलियन टन है। वर्तमान समय में सीमेण्ट उद्योग में 800 करोड़ रुपये से भी अधिक पूँजी विनियोजित है तथा तीन लाख लोगों को रोजगार प्राप्त है। मार्च 1989 से सीमेण्ट उद्योग को मूल्य तथा विक्रय से नियन्त्रण मुक्त करने और उदार नीतियाँ अपनाये जाने के कारण इसमें उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ तकनीक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

सूचना एवं प्रौद्योगिकी उद्योग :
सूचना एवं प्रौद्योगिकी उद्योग से आशय उस उद्योग से है, जिसमें कम्प्यूटर और उसके सहायक उपकरणों की सहायता से ज्ञान का प्रसार किया जाता है। इसके अन्तर्गत कम्प्यूटर, संचार, प्रौद्योगिकी और सम्बन्धित सॉफ्टवेयर को शामिल किया जाता है। इसके अन्तर्गत उस सम्पूर्ण व्यवस्था को शामिल किया जाता है, जिसके द्वारा संचार माध्यम और उपकरणों की सहायता से सूचना पहुँचाई जाती है। यह ज्ञान आधारित उद्योग है। वर्ष 2000-01 में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 33,138 करोड़ रुपये था जो 2008-09 में बढ़कर 2,35,300 करोड़ रुपये पहुँच गया। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में उद्योग का योगदान वर्ष 1999-2000 में 1.2 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2013 में 8 प्रतिशत हो गया है। इससे ज्ञात होता है कि यह उद्योग भारत का सबसे तेज गति से बढ़ता हुआ उद्योग है।

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प्रश्न 2.
लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा क्या-क्या प्रयास किये गये हैं? लिखिए। (2008)
उत्तर:
लघु उद्योगों के विकास के लिए किये गये सरकारी प्रयास
(1) निगमों एवं मण्डलों की स्थापना केन्द्रीय सरकार ने विभिन्न निगमों एवं मण्डलों की स्थापना की है। इनसे कुटीर व लघु उद्योगों के विकास को बहुत प्रोत्साहन मिला है। इनमें –

  • अखिल भारतीय कुटीर उद्योग मण्डल, 1948
  • केन्द्रीय सिल्क बोर्ड 1950
  • अखिल भारतीय हस्तकला बोर्ड 1952
  • अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड, 1952
  • अखिल भारतीय खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड, 1953
  • लघु उद्योग मण्डल, 1954
  • नारियल-जूट मण्डल, 1954
  • राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम, 1955, तथा
  • भारतीय दस्तकारी विकास निगम, 1958 आदि प्रमुख हैं। ये अखिल भारतीय संस्थाएँ अपने-अपने क्षेत्रों में उद्योगों के विकास हेतु राज्य सरकारों एवं उद्योग संगठनों के सहयोग से तकनीकी शिक्षा, विपणन सुविधाओं तथा वस्तुओं के प्रमापीकरण की व्यवस्था कर रही है।

(2) वित्तीय सहायता :
लघु कुटीर उद्योगों को पूँजी तथा अन्य आर्थिक सहायता प्रदान करने के क्षेत्र में भी सरकार ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार द्वारा जिन साधनों से लघु एवं कुटीर उद्योगों को वित्तीय सहायता प्रदान कराई गई है, वे निम्न हैं –

  • स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा ऋण योजना चालू करना।
  • रिजर्व बैंक द्वारा गारण्टी की योजना चालू करना।
  • राज्य वित्त निगमों द्वारा ऋण प्रदान करना।
  • राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम द्वारा किराया क्रय पद्धति के आधार पर यन्त्रों के खरीदने की सुविधाएँ प्रदान किया जाना।
  • सहकारी बैंकों और अनुसूचित बैंकों द्वारा ऋण की सहायता प्रदान करना।
  • राज्य सरकारों द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान करना।

(3) व्यापक सहायता कार्यक्रम :
भारत सरकार ने छोटे उद्यमियों की सहायतार्थ हेतु एक व्यापक सहायता कार्यक्रम बनाया है। लघु उद्योग विकास संगठन (SIDO) के अन्तर्गत लघु उद्योग सेवा संस्थान, शाखा संस्थान एवं विस्तार केन्द्र हैं, जिनके द्वारा आर्थिक, तकनीकी व प्रबन्धकीय सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। राज्यों के उद्योग निदेशालय भूमि या फैक्ट्री शेड आबंटित करते हैं तथा इनके लिए कच्चा माल तथा पूँजी उपलब्ध कराने में सहायता देते हैं।

(4) सरकार द्वारा क्रय में प्राथमिकता :
सरकार ने स्वयं भी लघु उद्योगों से अधिक मात्रा में वस्तुएँ क्रय करके उनके विकास में सहायता दी है। सरकार कुछ वस्तुओं का क्रय पूर्ण रूप से लघु उद्योगों से करती है।

(5) दुर्लभ कच्चे माल का आबंटन :
सरकार दुर्लभ देशी तथा विदेशी कच्चे माल के आबंटन में लघु उद्योगों के हितों का विशेष ध्यान रखती है और उन्हें प्राथमिकता देती है। 1991 की नई आयात नीति में सरकार द्वारा लघु इकाइयों को आयात लाइसेंस देने में अधिक उदारता बरती गई थी। अब इन्हें 5 लाख रुपये तक के आयात के लाइसेंस स्वतन्त्र विदेशी मुद्रा से प्राप्त हो सकेंगे।

(6) सम्मिलित उत्पादन कार्यक्रम :
सरकार ने बड़े तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए एक सम्मिलित उत्पादन कार्यक्रम की योजना बनाई है। इस योजना के अनुसार लघु उद्योगों का उत्पादन क्षेत्र सीमित रखा गया है। बड़े उद्योगों की उत्पादन क्षमता में विस्तार पर रोक लगाने की व्यवस्था है। बड़े उद्योगों पर उत्पादन कर लगाया जाता है जबकि, लघु व कुटीर उद्योगों के उत्पादन को कर-मुक्त रखा गया है। बड़े उद्योगों से प्राप्त उत्पादन कर को लघु व कुटीर उद्योगों के विकास पर खर्च किया जाता है तथा अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण में आदान-प्रदान का समन्वय स्थापित किया जाता है।

(7) विपणन सम्बन्धी सुविधाएँ :
केन्द्र सरकार ने एक केन्द्रीय कुटीर उद्योग एम्पोरियम की स्थापना की है जो देश-विदेश में कुटीर उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं के विक्रय की व्यवस्था करता है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, असम, जम्मू कश्मीर तथा तमिलनाडु आदि राज्यों में भी कुटीर उद्योग एम्पोरियम स्थापित किये गये हैं। औद्योगिक सहकारी संस्थाओं द्वारा निर्यात एवं थोक बाजार में इसकी विक्रय व्यवस्था करने के लिए सन् 1966 में औद्योगिक सहकारी संस्थाओं का महासंघ स्थापित किया गया था।

(8) तकनीकी सहायता :
लघु उद्योगों को तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए केन्द्रीय सरकार ने केन्द्रीय लघु उद्योग संगठन के अधीन एक औद्योगिक विस्तार सेवा प्रारम्भ की है। इस योजना के अन्तर्गत 28 लघु उद्योगशालाएँ, 31 प्रादेशिक सेवाशालाएँ और 37 प्रसार उत्पादन प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये गये हैं। लघु उद्योगों को तकनीकी परामर्श देने के लिए विदेशी विशेषज्ञ बुलाये जाते हैं तथा फोर्ड फाउण्डेशन ऑफ इण्डिया की सहायता से भारतीय विशेषज्ञ प्रशिक्षण के लिए विदेश भेजे जाते हैं।

(9) औद्योगिक बस्तियों का निर्माण :
लघु उद्योगों के विकास हेतु देश के विभिन्न भागों में औद्योगिक बस्तियाँ स्थापित की गयी हैं। इसके लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों को ऋण दिया जाता है। इनका प्रमुख उद्देश्य उद्योगों को शहरी क्षेत्रों से हटाकर उचित स्थान पर ले जाना है।

(10) जिला उद्योग केन्द्र :
इन केन्द्रों की स्थापना मई, 1978 में प्रारम्भ की गयी। इनकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण तथा अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैले छोटे और अत्यन्त छोटे ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए जिला स्तर पर एक केन्द्र स्थापना करना है। इसका एक अन्य उद्देश्य पूँजी निवेश के दौरान तथा पूँजी निवेश के पश्चात् जहाँ तक सम्भव हो सभी अनिवार्य सेवाएँ और सहयोग जिला स्तर पर भी उपलब्ध कराना है। इस कार्यक्रम में ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में ऐसे उद्योगों की स्थापना पर अधिक जोर दिया जाता है जिनसे इन इलाकों में रोजगार के ज्यादा अवसर उपलब्ध कराये जा सकें।

प्रश्न 3.
लघु एवं कुटीर उद्योगों का महत्त्व लिखिए। (2009)
अथवा
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों का महत्त्व लिखिए। (2017)
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर एवं लघु उद्योगों का महत्त्व :
महात्मा गाँधी के अनुसार, “भारत का कल्याण उसके कुटीर उद्योगों में निहित है।” भारतीय योजना आयोग के अनुसार, “लघु एवं कुटीर उद्योग हमारी अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग हैं जिनकी कभी उपेक्षा नहीं की जा सकती।” भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट किया जा सकता है-

  • रोजगार का सृजन :
    इन उद्योगों का सबसे महत्त्वपूर्ण लाभ यह है कि इनसे रोजगार के अधिक अवसर विकसित होते हैं, क्योंकि इन उद्योगों में प्रायः श्रम प्रधान तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इन उद्योगों में कम पूँजी लगाकर अधिक लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं।
  • कलात्मक वस्तुओं का निर्माण :
    कुटीर उद्योगों में अधिकांश कार्य हाथों द्वारा किया जाता है जो कलात्मक वस्तुओं को सम्भव बनाते हैं; जैसे-ऊनी, रेशमी वस्त्रों पर कढ़ाई, कालीन व गलीचों का निर्माण, हाथी दाँत का सामान आदि ऐसे कुटीर उद्योग हैं जिनसे काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है। इस प्रकार का उत्पादन वृहत् उद्योगों में सम्भव नहीं है।
  • शीघ्र उत्पादक उद्योग :
    लघु एवं कुटीर उद्योग शीघ्र उत्पादक उद्योग होते हैं आशय यह है कि इन उद्योगों में विनियोग करने और उत्पादन आरम्भ होने में अधिक समयान्तर नहीं होता।
  • आयातों में कमी :
    लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास प्रायः श्रम प्रधान तकनीक के आधार पर किया जाता है। इस कारण इन उद्योगों के विकास के लिए आयातों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है और राष्ट्र के मूल्यवान विदेशी विनिमय-भण्डारों की बचत होती है।
  • उद्योगों का विकेन्द्रीकरण :
    इन उद्योगों से देश में उद्योगों के विकेन्द्रीकरण में सहायता मिलती है। बड़े उद्योग कुछ विशेष कारणों से एक ही स्थान पर केन्द्रित हो जाते हैं, लेकिन लघु एवं कुटीर उद्योगों को गाँवों और छोटे कस्बों में भी स्थापित किया जा सकता है।
  • कम पूँजी व अधिक श्रम की स्थिति में उपयुक्त :
    भारत में पूँजी का अभाव है जबकि श्रम शक्ति का बाहुल्य है। चूँकि कुटीर उद्योग में कम पूँजी से ही काम चल जाता है और अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध हो जाता है, इसलिए भारत में कुटीर उद्योगों का विकास किया जाए तो स्त्री-श्रम का भी उपयोग हो सकेगा तथा देश की सम्पत्ति में भी वृद्धि होगी।
  • कृषकों के खाली समय का सदुपयोग :
    देश में कृषि द्वारा केवल विशेष मौसम के लिए रोजगार मिल पाता है। वर्ष में 3-4 महीने तक कृषक लोग बेकार बैठे रहते हैं। यदि कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास हो जाए तो इससे न केवल कृषकों के खाली समय का सदुपयोग होगा वरन् उनकी आय में वृद्धि होगी।।
  • सरल कार्य-प्रणाली :
    कुटीर उद्योगों की स्थापना तथा कार्य-प्रणाली बहुत ही सरल होती है। इनके लिए उच्च कोटि के तकनीकी विशेषज्ञों, प्रबन्धकों, विशाल भवन, विशेष प्रशिक्षण तथा विस्तृत हिसाब-किताब की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  • बड़े पैमाने के उद्योगों के पूरक :
    लघु एवं कुटीर उद्योग बड़े पैमाने के उद्योगों को कच्ची सामग्री एवं अर्द्ध-निर्मित माल उपलब्ध कराते हैं। इस प्रकार इन उद्योगों का विकास बड़े पैमाने के उद्योगों के विकास .. के लिए भी आवश्यक है।
  • निर्यात व्यापार में महत्त्व :
    विगत वर्षों में हथकरघा वस्त्र, हाथी दाँत की वस्तुएँ, ताँबे व पीतल की कलात्मक बर्तन, दरियाँ, कालीन तथा गलीचे, चमड़े के जूते, सिलाई की मशीनें, बिजली के पंखे, साइकिलें आदि कुटीर व लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित माल के निर्यात में काफी वृद्धि हुई है। वर्ष 2005-06 में इन उद्योगों का निर्यात में योगदान 1,50,242 करोड़ रुपये रहा है।
  • आर्थिक विकास में योगदान :
    लघु उद्यम क्षेत्र का देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। औद्योगिक उत्पादन में 39 प्रतिशत से अधिक और राष्ट्रीय निर्यात से 33 प्रतिशत से अधिक योगदान करके इस क्षेत्र ने राष्ट्र के आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भागीदारी निभाई है। अनुमान है कि इस क्षेत्र में 3 करोड़ 10 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

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प्रश्न 4.
टिप्पणी लिखिए

  1. चमड़ा उद्योग
  2. लोहा इस्पात उद्योग(2009)
  3. सूती वस्त्र उद्योग, (2008, 09)
  4. सूचना एवं प्रौद्योगिकी।

उत्तर:
1. चमड़ा उद्योग :
यह एक पारम्परिक उद्योग है। चमड़े से कई प्रकार की वस्तुएँ; जैसे-कोट, जर्सी, पर्स, बटुए, थैले, खेल का सामान, खिलौने, कनटोपं, बेल्ट, दस्ताने, जूते व चप्पल आदि बनाये जाते हैं। देश में चमड़े की वस्तुओं का सर्वाधिक उत्पादन तमिलनाडु, कोलकाता, कानपुर, मुम्बई, औरंगाबाद, कोल्हापुर, देवास, जालंधर और आगरा में होता है। चमड़े की वस्तुओं के उत्पादन का 75 प्रतिशत भाग लघु और कुटीर उद्योगों द्वारा उत्पादित किया जाता है।

2. लोहा तथा इस्पात उद्योग एवं :
लोहा-इस्पात उद्योग देश का एक आधारभूत उद्योग है। विनियोग की दृष्टि से यह संगठित क्षेत्र के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशालतम उद्योगों में से एक है।
भारत में यह उद्योग अति प्राचीन है लेकिन आधुनिक तरीके से लोहे का उत्पादन 1875 में आरम्भ हुआ, जब बंगाल आयरन वर्क्स कम्पनी ने कुल्टी (पश्चिम बंगाल) में अपने संयन्त्र की स्थापना की। परन्तु बड़े पैमाने पर उत्पादन 1907 में जमशेदपुर में टाटा आयरन इण्डस्ट्रीज कम्पनी (टिस्को) की स्थापना के साथ आरम्भ हुआ। भारत में कुल 10 कारखाने हैं जिसमें से 9 सार्वजनिक क्षेत्र में एवं केवल एक निजी क्षेत्र (टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर, पश्चिमी बंगाल) में है। सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला, बोकारो, विशाखापट्टनम् एवं सलेम में है।

इस समय देश में 196 लघु इस्पात संयन्त्र हैं। इनमें से 179 इकाइयाँ चालू हैं तथा शेष बन्द हैं। वर्तमान में इस उद्योग में 90,000 करोड़ रुपये की पूँजी लगी है तथा इसमें 5 लाख लोगों को रोजगार प्राप्त है।

3. सूती वस्त्र उद्योग :
भारत में सूती वस्त्रों की अत्यन्त पुरानी परम्परा है। देश की प्रथम सूती कपड़ा मिल सन् 1818 में कोलकाता में स्थापित की गई थी। देश की सूती कपड़ा मिलें मुख्य रूप से महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात में हैं। यह उद्योग भारत का सबसे बड़ा एवं व्यापक उद्योग है। देश के औद्योगिक उत्पादन में इसका योगदान 14 प्रतिशत है, जबकि देश के कुल निर्यात आय में इसका हिस्सा 19 प्रतिशत है। आयात में इसका हिस्सा 3 प्रतिशत है। यह उद्योग लगभग 9 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान कर रहा है। इस उद्योग में लगभग 5,000 करोड़ रुपये की पूँजी लगी है। सरकार ने कपड़ा आदेश (विकास एवं विनिमय)1993 के माध्यम से कपड़ा उद्योग को लाइसेन्स मुक्त कर दिया।

4. सूचना एवं प्रौद्योगिकी :
सूचना एवं प्रौद्योगिकी उद्योग से आशय उस उद्योग से है, जिसमें कम्प्यूटर और उसके सहायक उपकरणों की सहायता से ज्ञान का प्रसार किया जाता है। इसके अन्तर्गत कम्प्यूटर, संचार, प्रौद्योगिकी और सम्बन्धित सॉफ्टवेयर को शामिल किया जाता है। इसके अन्तर्गत उस सम्पूर्ण व्यवस्था को शामिल किया जाता है, जिसके द्वारा संचार माध्यम और उपकरणों की सहायता से सूचना पहुँचाई जाती है। यह ज्ञान आधारित उद्योग है। वर्ष 2000-01 में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 33,138 करोड़ रुपये था जो 2008-09 में बढ़कर 2,35,300 करोड़ रुपये पहुँच गया। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में उद्योग का योगदान वर्ष 1999-2000 में 1.2 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2013 में 8 प्रतिशत हो गया है। इससे ज्ञात होता है कि यह उद्योग भारत का सबसे तेज गति से बढ़ता हुआ उद्योग है।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अति लघु उद्योग इकाइयों की अधिकतम विनियोग सीमा है
(i) 5 लाख रुपये
(ii) 15 लाख रुपये
(iii) 20 लाख रुपये
(iv) 25 लाख रुपये
उत्तर:
(iv) 25 लाख रुपये

प्रश्न 2.
वर्तमान में चीनी उत्पादन में भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
(i) पहला
(ii) दूसरा
(iii) तीसरा
(iv) चौथा।
उत्तर:
(ii) दूसरा

प्रश्न 3.
विश्व में सीमेण्ट उत्पादन में भारत का कौन-सा स्थान है?
(i) तीसरा
(ii) चौथा
(iii) पाँचवाँ
(iv) छठा।
उत्तर:
(iii) पाँचवाँ

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रिक्त स्थान की पूर्ति

  1. कुटीर उद्योग सिर्फ …………. में चलाये जाते हैं।
  2. ………. उद्योग भारत का सबसे प्राचीन और प्रमुख उद्योग है।
  3. जूट के उत्पादन में भारत का विश्व में ………… स्थान है।
  4. भारत की लगभग …………. प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या कृषि पर निर्भर है।
  5. वर्तमान में लघु उद्योगों की वस्तुओं का देश के कुल निर्यात में ……… प्रतिशत हिस्सा है।

उत्तर:

  1. ग्रामों
  2. सूती वस्त्र
  3. पहला
  4. 58.4
  5. 35

सत्य/असत्य

प्रश्न 1.
देश की प्रथम सूती कपड़ा मिल सन् 1818 में कोलकाता में स्थापित की गई थी। (2014)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 2.
जिन औद्योगिक इकाइयों में 50 लाख रुपये तक की पूँजी लगी हो उन्हें अति उद्योग की श्रेणी में रखा जाता है।
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 3.
नेशनल न्यूज प्रिण्ट एण्ड पेपर मिल लिमिटेड नेपानगर (म. प्र.) में है।
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 4.
भारत में लाख का सबसे अधिक उत्पादन छोटा नागपुर पठार में होता है।
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 5.
अनुमान है कि विश्व के चमड़े की कुल आपूर्ति का 20 प्रतिशत चमड़ा भारत में तैयार होता है।
उत्तर:
असत्य

सही.जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 17 भारत में उद्योगों की स्थिति - 2
उत्तर:

  1. →(घ)
  2. →(ग)
  3. →(क)
  4. →(ङ)
  5. →(ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
लोहा इस्पात उद्योग को किस वर्ष में लाइसेंस मुक्त कर दिया?
उत्तर:
1991 में

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प्रश्न 2.
चीनी उत्पादन में किन दो राज्यों का महत्त्वपूर्ण स्थान है?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र

प्रश्न 3.
हथकरघा, खादी उद्योग तथा रेशम उद्योग को किस उद्योग की श्रेणी में रखा गया है?
उत्तर:
ग्राम उद्योग

प्रश्न 4.
देश में काँच बनाने के कारखाने किस राज्य में हैं?
उत्तर:
पश्चिम बंगाल

प्रश्न 5.
भारत में लाख का उत्पादन सबसे अधिक कहाँ होता है?
उत्तर:
छोटा नागपुर का पठार।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उद्योगों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
किसी देश के आर्थिक विकास में उद्योगों की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। उद्योग देश के तीव्र आर्थिक विकास में सहायक होते हैं। उद्योगों के विकास के बिना कोई राष्ट्र समृद्ध नहीं हो सकता है।

प्रश्न 2.
वृहत् उद्योग किसे कहते हैं?
अथवा
बडे पैमाने के उद्योग से क्या आशय है?
उत्तर:
जिन उद्योगों में कारखाना अधिनियम लागू होता है अर्थात् जहाँ अधिक संख्या में श्रमिक कार्य करते हैं व अधिक मात्रा में पूँजी लगी होती है वे उद्योग वृहत् (या बड़े) उद्योग कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
मध्यम उद्योगों से क्या आशय है?
उत्तर:
जिन औद्योगिक इकाइयों में प्लाण्ट एवं मशीनरी में पाँच से दस करोड़ रुपये तक की पूँजी लगी होती है, वे औद्योगिक इकाइयाँ मध्यम उद्योगों की श्रेणी में आती हैं। सेवा क्षेत्र वाली इकाइयों के लिए यह सीमा 5 करोड़ रुपये तक रखी गयी है। उदाहरणार्थ-चमड़ा उद्योग, रेशम उद्योग।

प्रश्न 4.
लघु उद्योग किसे कहते हैं?
उत्तर:
वर्तमान में वे सभी औद्योगिक इकाइयाँ लघु उद्योग के अन्तर्गत आती हैं जिनकी अचल सम्पत्ति, संयन्त्र एवं मशीनरी में सीमित तथा सरकार द्वारा स्वीकृत से अधिक पूँजी न लगी हो, साथ ही जिनमें कारखाना अधिनियम लागू नहीं होता।

प्रश्न 5.
कुटीर उद्योगों से क्या आशय है?
उत्तर:
कुटीर उद्योग से आशय ऐसे उद्योगों से है जो पूर्णतया या मुख्यतया परिवार के सदस्यों की सहायता से पूर्णकालिक या अंशकालिक व्यवसाय के रूप में चलाये जाते हैं। ये प्रायः ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थापित होते हैं तथा अंशकालीन रोजगार प्रदान करते हैं।

प्रश्न 6.
ग्राम उद्योग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ये उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित किये जाते हैं। ग्रामीण उद्योग दो श्रेणियों में विभाजित किये जा सकते हैं-एक वे हैं जो किसानों द्वारा सहायक धन्धे के रूप में चलाये जाते हैं; जैसे-मुर्गी पालन, करघों पर बुनाई, गाय-भैंस पालन, टोकरियाँ बनाना, रेशम के कीड़े पालना, मधुमक्खियाँ पालना आदि। दूसरे वे हैं जो ग्रामीण कौशल से सम्बन्धित होते हैं; जैसे-मिट्टी के बर्तन बनाना, चमड़े के जूते बनाना, हथकरघा पर कपड़े बुनना आदि।

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प्रश्न 7.
देश की प्रथम सूती कपड़ा मिल कब और कहाँ स्थापित की गयी थी?
उत्तर:
देश की प्रथम सूती कपड़ा मिल 1818 में कोलकाता में स्थापित की गई थी।

प्रश्न 8.
सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित भारत के चार लौह-इस्पात केन्द्र कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:

  1. भिलाई (मध्य प्रदेश)
  2. दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल)
  3. राउरकेला (उड़ीसा)
  4. बोकारो (बिहार)।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उद्योग से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उद्योगों से आशय-जब किसी एक जैसी वस्तु या सेवा का उत्पादन अनेक फर्मों के द्वारा किया जाता है तब ये सभी फर्म मिलकर उद्योग कहलाते हैं; जैसे-लोहा-इस्पात उद्योग के अन्तर्गत दुर्गापुर, राउरकेला, बोकारो तथा टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी सभी शामिल हैं।

‘उद्योग’ की परिधि में वे समस्त उपक्रम आते हैं जिनमें नियोजकों एवं नियोजितों के सहयोग से मानवीय आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं की सन्तुष्टि के लिए एक व्यवस्थित गतिविधि के रूप में वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन का कार्य सम्पन्न किया जाता है।

प्रश्न 2.
भारत में चीनी उद्योग का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चीनी उद्योग-भारत विश्व में गन्ने का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। चीनी के उत्पादन में भी भारत का दूसरा स्थान है। 30 जून, 2016 तक देश में 719 चीनी कारखाने स्थापित हो चुके थे, जबकि वर्ष 1950-51 में इनकी संख्या मात्र 138 थी। स्थापित चीनी मिलों में 326 सहकारी क्षेत्र के अन्तर्गत हैं। चीनी उत्पादन जो 1950-51 में 11.3 लाख टन था, वर्ष 2016-17 में 225-21 लाख टन पहुँच गया। यह मौसमी उद्योग है, अत: इसके लिए सहकारी क्षेत्र उपयुक्त है। देश में चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 17 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उद्योग से क्या आशय है? देश के आर्थिक विकास में उद्योगों की भूमिका क्या है?
उत्तर:
उद्योगों से आशय :
उद्योगों से आशय-जब किसी एक जैसी वस्तु या सेवा का उत्पादन अनेक फर्मों के द्वारा किया जाता है तब ये सभी फर्म मिलकर उद्योग कहलाते हैं; जैसे-लोहा-इस्पात उद्योग के अन्तर्गत दुर्गापुर, राउरकेला, बोकारो तथा टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी सभी शामिल हैं।

‘उद्योग’ की परिधि में वे समस्त उपक्रम आते हैं जिनमें नियोजकों एवं नियोजितों के सहयोग से मानवीय आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं की सन्तुष्टि के लिए एक व्यवस्थित गतिविधि के रूप में वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन का कार्य सम्पन्न किया जाता है।

आर्थिक विकास में उद्योगों की भूमिका :
किसी देश के आर्थिक विकास में उद्योगों की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। उद्योग देश के तीव्र आर्थिक विकास में सहायक होते हैं। बी.एच.येमे के अनुसार, “औद्योगीकरण व्यापक रूप में आर्थिक विकास तथा रहन-सहन की कुंजी माना जाता है। निर्माणी उद्योगों के रूप में, प्रचलित विचारधारा के अनुसार औद्योगीकरण को आर्थिक अस्थिरता एवं निर्धनता को दूर करने की संजीवनी माना गया है।” प्रो. बाइस ने कहा है, “विकास के किसी भी सुदृढ़ कार्यक्रम में औद्योगिक विकास को आवश्यक और अन्तिम रूप से एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है।” अर्थात् उद्योगों के विकास के बिना कोई देश समृद्ध नहीं हो सकता।

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MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि

MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि

MP Board Class 9th Science Chapter 12 पाठ के अन्तर्गत के प्रश्नोत्तर

प्रश्न श्रृंखला-1 # पृष्ठ संख्या 182

प्रश्न 1.
किसी माध्यम में ध्वनि द्वारा उत्पन्न विक्षोभ आपके कानों तक कैसे पहुँचता है?
उत्तर:
ध्वनि द्वारा उत्पन्न विक्षोभ माध्यम (वायु) के सम्पीडनों एवं विरलनों के द्वारा हमारे कानों तक पहुँचता है।

प्रश्न श्रृंखला-2 # पृष्ठ संख्या 182

प्रश्न 1.
आपके विद्यालय की घण्टी, ध्वनि कैसे उत्पन्न करती है?
उत्तर:
जब हम विद्यालय की घण्टी पर हथौड़े से चोट मारते हैं तो वह कम्पन करने लगता है जिससे विक्षोभ उत्पन्न होता है। इस प्रकार ध्वनि उत्पन्न होती है।

प्रश्न 2.
ध्वनि तरंगों को यान्त्रिक तरंगें क्यों कहते हैं?
उत्तर:
ध्वनि तरंगों को यान्त्रिक तरंगें कहते हैं क्योंकि इसके संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
मान लीजिए आप अपने मित्र के साथ चन्द्रमा पर गए हुए हैं? क्या आप अपने मित्र द्वारा उत्पन्न ध्वनि को सुन पायेंगे?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न श्रृंखला-3 # पृष्ठ संख्या 186

प्रश्न 1.
तरंग का कौन-सा गुण निम्नलिखित को निर्धारित करता है?
1. प्रबलता
2. तारत्व
उत्तर:

  1. आयाम
  2. आवृत्ति।

प्रश्न 2.
अनुमान लगाइए कि निम्न में से किस ध्वनि का तारत्व अधिक है?
(a) गिटार
(b) कार का हॉर्न।
उत्तर:
(a) गिटार का।

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प्रश्न श्रृंखला-4 # पृष्ठ संख्या 186

प्रश्न 1.
किसी ध्वनि तरंग की तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति, आवर्तकाल तथा आयाम से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तरंगदैर्घ्य:
“दो क्रमागत सम्पीडनों अथवा दो क्रमागत विरलनों के मध्य की दूरी तरंग की तरंगदैर्घ्य कहलाती है।” इसे लैम्डा (λ) से निरूपित करते हैं।

आवृत्ति:
“प्रति एकांक समय में पूर्ण किए गए दोलनों (अर्थात् गुजरने वाले संपीडनों तथा विरलनों) की संख्या को तरंग की आवृत्ति कहते हैं।” इसे न्यू (ν) से प्रदर्शित करते हैं।”

आवर्तकाल:
“दो क्रमागत संपीडनों या दो क्रमागत विरलनों को किसी निश्चित बिन्दु से गुजरने में लगे समय को तरंग का आवर्तकाल कहते हैं।” इसे T से प्रदर्शित करते हैं।

आयाम:
“किसी माध्यम में मूल स्थिति के दोनों ओर अधिकतम विक्षोभ को तरंग का आयाम कहते हैं।” इसे a से प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 2.
किसी ध्वनि तरंग की तरंगदैर्घ्य तथा आवृत्ति उसके वेग से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर:
ध्वनि तरंग का वेग (v) = तरंग की आवृत्ति (ν) x तरंगदैर्घ्य (λ)।

प्रश्न 3.
किसी दिए हुए माध्यम में एक ध्वनि तरंग की आवृत्ति 220 Hz तथा वेग 440 ms-1 है। इस तरंग की तरंगदैर्घ्य का परिकलन कीजिए।
हल:
∵ ज्ञात है:
आवृत्ति ν = 220
वेग v = 440 m s-1
ज्ञात करना है:
तरंगदैर्घ्य λ = ?
v = νλ
⇒ 440 = 220 λ
λ = \(\frac{440}{220}\) = 2 m
अतः अभीष्ट तरंगदैर्घ्य = 2 m.

प्रश्न 4.
किसी ध्वनि स्त्रोत से 450 m दूरी पर बैठा हुआ कोई मनुष्य 500 Hz की ध्वनि सुनता है। स्रोत से मनुष्य के पास तक पहुँचने वाले दो क्रमागत संपीडनों में कितना समय अन्तराल होगा?
उत्तर:
मान लीजिए दो क्रमागत संपीडनों के मध्य समय अन्तराल (आवर्तकाल) = T
ध्वनि की आवृत्ति ν = 500 (दिया है)
अब T = \(\frac{1}{ν}\) = \(\frac{1}{500}\) = 0.002 s
अत: अभीष्ट समय 0.002 s लगेगा।

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प्रश्न शृंखला-5 # पृष्ठ संख्या 187

प्रश्न 1.
ध्वनि की प्रबलता तथा तीव्रता में अन्तर बताइए।
उत्तर:
प्रबलता ध्वनि के लिए कानों की संवेदनशीलता की माप है, जबकि तीव्रता एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा है। दो ध्वनियों की समान तीव्रता होते हुए भी उनकी प्रबलता अलग-अलग हो सकती है।

प्रश्न शृंखला-6 # पृष्ठ संख्या 188

प्रश्न 1.
वायु, जल या लोहे में से किस माध्यम में ध्वनि सबसे तेज चलती है?
उत्तर:
लोहे में।

प्रश्न श्रृंखला-7 # पृष्ठ संख्या 189

प्रश्न 1.
कोई प्रतिध्वनि 3 s पश्चात् सुनाई देती है। यदि ध्वनि की चाल 342 m s-1 हो तो स्रोत तथा परावर्तन पृष्ठ के बीच कितनी दूरी होगी?
हल:
ज्ञात है:
ध्वनि की चाल v = 342 m s-1
समय-अन्तराल t = 3 s
माना स्रोत एवं परावर्तक तल के बीच की ध्वनि = x m
तो ध्वनि द्वारा चली गई कुल दूरी s = 2x
तो 2x = चली दूरी (S) = वेग (v) x समय अन्तराल (t)
⇒ 2x = 342 x 3 = 1026
⇒ x = 1026/2 = 513 m
अत: अभीष्ट दूरी = 513 m.

प्रश्न श्रृंखला-8 # पृष्ठ संख्या 190

प्रश्न 1.
कंसर्ट हॉल की छतें वक्राकार क्यों होती है?
उत्तर:
कंसर्ट हॉल की छतें वक्राकार बनाई जाती हैं जिससे कि परावर्तन के पश्चात् ध्वनि हॉल के सभी भागों में पहुँच जाय।

प्रश्न श्रृंखला-9 # पृष्ठ संख्या 191

प्रश्न 1.
सामान्य मनुष्य के कानों के लिए श्रव्यता परिसर (सीमा) क्या है?
उत्तर:
20 Hz से लेकर 20 हजार Hz तक।

प्रश्न 2.
निम्न से सम्बन्धित आवृत्तियों का परिसर क्या है?
1. अवश्रव्य ध्वनि
2. पराश्रव्य ध्वनि।
उत्तर:

  1. 20 Hz से कम
  2. 20 हजार Hz से अधिक।

प्रश्न श्रृंखला-10 # पृष्ठ संख्या 193

प्रश्न 1.
एक पनडुब्बी सोनार स्पन्द उत्सर्जित करती है, जो पानी के अन्दर एक खड़ी चट्टान से टकराकर 1.02 5 के पश्चात् वापस लौटता है। यदि खारे पानी में ध्वनि की चाल 1531 m s-1 हो, तो चट्टान की दूरी ज्ञात कीजिए।
हल:
ज्ञात है:
ध्वनि की चाल y = 1531 m s-1
एवं समय अन्तराल t = 1.02 s
माना चट्टान की दूरी = x m
तो चली गई कुल दूरी = 2x m
दूरी 2x = वेग (v) x समय अन्तराल (t)
⇒ 2x = 1531 x 1.02
⇒ \(x=\frac{1531 \times 1 \cdot 02}{2}\)
⇒ 780.81 m
अतः चट्टान की अभीष्ट दूरी = 780.81 m.

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MP Board Class 9th Science Chapter 12 पाठान्त अभ्यास के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ध्वनि क्या है? यह कैसे उत्पन्न होती है?
उत्तर:
ध्वनि:
“ऊर्जा का एक रूप जो हमारे कानों में श्रवण का संवेदन उत्पन्न करती है, ध्वनि कहलाती है।” ध्वनि स्रोत के कम्पन करने से उत्पन्न होती है।

प्रश्न 2.
एक चित्र की सहायता से वर्णन कीजिए कि ध्वनि के स्रोत के निकट वायु में सम्पीडन एवं विरलन कैसे उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
जब कोई ध्वनि स्रोत कम्पन करता है तो वह अपने सामने की वायु को धक्का देकर सम्पीडित करती है और एक उच्च दाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है। इस क्षेत्र को सम्पीडन (C) कहते हैं। यह सम्पीडन कम्पमान वस्तु से आगे की ओर गति करता है। जब स्रोत पीछे की ओर कम्पन करता है तो एक निम्न दाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है जिसे विरलन (R) कहते हैं। इस प्रकार स्रोत के निकट वायु में सम्पीडन एवं विरलन उत्पन्न होते हैं।
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 1

प्रश्न 3.
किस प्रयोग से यह दर्शाया जा सकता है कि ध्वनि संचरण के लिए एक द्रव्यात्मक माध्यम की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
“ध्वनि संचरण के लिए द्रव्यात्मक माध्यम की आवश्यकता होती है” दर्शाने हेतु प्रयोग:
प्रयोग:
एक बेलजार लेकर चित्रानुसार उसका सम्पर्क निर्वात पम्प से कर देते हैं तथा कॉर्क की सहायता से उसमें एक विद्युत घण्टी लटका देते हैं।
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 2
जब हम घण्टी का स्विच दबाते हैं तो घण्टे के बजने की स्पष्ट आवाज सुनाई देती है। अब पम्प द्वारा धीरे-धीरे वायु निकालते हैं तो देखते हैं कि स्विच दबाने पर आवाज धीमी होती जाती है और जब बेलजार में पूर्ण निर्वात हो जाता है तब घण्टी की आवाज सुनाई देना बन्द हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
ध्वनि तरंगों की प्रकृति अनुदैर्घ्य क्यों होती है?
उत्तर:
ध्वनि तरंगों का संचरण सम्पीडनों एवं विरलनों के माध्यम से होता है तथा संचरण माध्यम में दाब तथा घनत्व में परिवर्तन होता है और ये अनुदैर्घ्य तरंगों के अभिलक्षण (प्रगुण) हैं। इसलिए ध्वनि तरंगों की प्रकृति अनुदैर्घ्य होती है।

प्रश्न 5.
ध्वनि का कौन-सा अभिलक्षण किसी अन्य अंधेरे कमरे में बैठे आपके मित्र की आवाज पहचानने में आपकी सहायता करता है?
उत्तर:
ध्वनि की गुणता वह अभिलक्षण है जो मित्र की आवाज को पहचानने में हमारी मदद करता है।

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प्रश्न 6.
तड़ित की चमक तथा गर्जन साथ-साथ उत्पन्न होते हैं लेकिन चमक दिखाई देने के कुछ सेकण्ड पश्चात् गर्जन सुनाई देती है। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर:
चमक (प्रकाश) का वेग गर्जन (ध्वनि) के वेग से पर्याप्त मात्रा में अधिक होता है। इसलिए चमक (प्रकाश) हम तक पहले पहुँच जाती है तथा गर्जन (ध्वनि) को पहुँचने में कुछ समय अधिक लग जाता है।

प्रश्न 7.
किसी व्यक्ति का औसत श्रव्य परिसर 20 Hz से 20 kHz है। इन दो आवृत्तियों के लिए ध्वनि तरंगों की तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। वायु में ध्वनि का वेग 344 m s-1 लीजिए।
हल:
ज्ञात है:
निम्न परिसर की आवृत्ति ν(l) 20 Hz
उच्च परिसर की आवृत्ति νu = 20 kHz
ध्वनि का वेग v = 344 m s-1
हम जानते हैं कि
v = νλ
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 3
अतः अभीष्ट तरंगदैर्घ्य क्रमशः 17.2 m एवं 17.2 x 10-3m है।

प्रश्न 8.
दो बालक किसी ऐलुमिनियम पाइप के दो सिरों पर हैं। एक बालक पाइप के एक सिरे पर पत्थर से आघात करता है। दूसरे सिरे पर स्थित बालक तक वायु तथा ऐलुमिनियम से होकर जाने वाली ध्वनि तरंगों द्वारा लिए गए समय का अनुपात ज्ञात कीजिए।
हल:
ऐलुमिनियम में ध्वनि का वेग v(Al) = 6420 m s-1 एवं
वायु में ध्वनि का वेग v(a) = 346 m s-1
मान लीजिए कि ऐलुमिनियम के पाइप की लम्बाई x m है तथा ध्वनि द्वारा वायु एवं ऐलुमिनियम में लिया गया समय क्रमशः t(a) एवं t(Al) है तो
दूरी x = वेग x समय = v x t
v(a) x t(a) = v(Al) x t(Al)
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 4
अतः लिए गए समयों में अभीष्ट अनुपात 18.55 : 1 है।

प्रश्न 9.
किसी ध्वनि स्रोत की आवृत्ति 100 Hz है। एक मिनट में यह कितनी बार कम्पन करेगा?
हल:
कम्पनों की कुल संख्या = आवृत्ति x समय (सेकण्ड में)
= 100 x 60 = 6000 कम्पन
अतः अभीष्ट कम्पनों की संख्या = 6000.

प्रश्न 10.
क्या ध्वनि परावर्तन के उन्हीं नियमों का पालन करती है जिनका पालन प्रकाश की तरंगें करती हैं? इन नियमों को बताइए।
उत्तर:
हाँ, ध्वनि तरंगें भी परावर्तन के उन्हीं नियमों का पालन करती हैं जिनका पालन प्रकाश की तरंगें करती हैं।
परावर्तन के नियम:

  1. आपतन कोण = परावर्तन कोण
  2. आपाती किरण, परावर्तित किरण एवं अभिलम्ब तीनों एक ही तल में होते हैं।

प्रश्न 11.
ध्वनि का एक स्रोत किसी परावर्तक पृष्ठ के सामने रखने पर उसके द्वारा प्रदत्त ध्वनि तरंग की प्रति ध्वनि सुनाई देती है। यदि स्रोत तथा परावर्तक पृष्ठ की दूरी पर स्थिर रहे तो किस दिन प्रतिध्वनि अधिक शीघ्र सुनाई देगी –
1. जिस दिन ताप अधिक हो,
2. जिस दिन ताप कम हो।
उत्तर:
1. जिस दिन ताप अधिक हो।

प्रश्न 12.
ध्वनि तरंगों के परावर्तन के दो व्यावहारिक उपयोग लिखिए।
उत्तर:
ध्वनि तरंगों के परावर्तन के व्यावहारिक उपयोग –

  1. मेगाफोन, लाउडस्पीकर आदि द्वारा ध्वनि विस्तारण में।
  2. स्टेथोस्कोप द्वारा हृदय की धड़कनों को डॉक्टर के कानों तक पहुँचाने में।

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प्रश्न 13.
500 मीटर ऊँची किसी मीनार की चोटी से एक पत्थर मीनार के आधार पर स्थित एक पानी के तालाब में गिराया जाता है। पानी में उसके गिरने की ध्वनि चोटी पर कब सुनाई देगी? (g = 10 m s-1 तथा ध्वनि की चाल = 340 m s-1)
हल:
ज्ञात है:
मीनार की ऊँचाई h = 500 m
पत्थर का प्रारम्भिक वेग u = 0 m s-1
गुरुत्वीय त्वरण g = 10 m s-2
ध्वनि की चाल v = 340 m s-1
पत्थर को जल तक पहुँचने में लगा समय = t1 है तो पत्थर के मुक्त पतन में,
h = ut1 + 2gt12
500 = 0 (t1) + \(\frac{1}{2}\) x 10 x t12
⇒ t12 = 100 ⇒ t1 = \(\sqrt{100}\) = 10 s
माना ध्वनि को चोटी तक पहुँचने में लगा समय t2 है तो
दूरी = वेग x समय
500 = 340 x t2
⇒ t2 = 500/340 = 1.47 s
कुल समय t = t1 + t2 = 10 s + 1-47 s = 11.47 s
अत: अभीष्ट ध्वनि 11.47 5 बाद सुनाई देगी।

प्रश्न 14.
एक ध्वनि तरंग 339 m s-1 की चाल से चलती है। यदि इसकी तरंगदैर्घ्य 1.5 cm हो, तो तरंग की आवृत्ति कितनी होगी? क्या यह श्रव्य होगी?
हल:
ज्ञात है:
ध्वनि की चाल v = 339 m s-1
तरंगदैर्घ्य λ = 1.5 cm
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 5
अतः तरंग की अभीष्ट आवृत्ति = 22,600 Hz होगी तथा यह श्रव्य नहीं पराश्रव्य होगी।

प्रश्न 15.
अनुरणन क्या है ? इसे कैसे कम किया जा सकता है? (2018)
उत्तर:
अनुरणन:
“किसी बड़े हॉल की दीवारों से ध्वनि के बार-बार परावर्तन के कारण ध्वनि काफी समय तक बनी रहती है। इस प्रकार क्रमिक परावर्तनों के फलस्वरूप सुनी गयी ध्वनि अर्थात् ध्वनि, निर्बन्ध अनुरणन कहलाता है।”

अनुरणन को कम करने के उपाय:
इसे कम करने के लिए हॉल की दीवारों एवं छतों पर ध्वनि अवशोषक लगाये जाते हैं।

प्रश्न 16.
ध्वनि की प्रबलता से क्या अभिप्राय है? यह किन कारकों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
ध्वनि की प्रबलता:
“अधिक ऊर्जा युक्त ध्वनि तरंगें अधिक दूरी तक जाती हैं। ध्वनि के इस गुण को ध्वनि की प्रबलता कहते हैं।” ध्वनि की प्रबलता इसके आयाम पर निर्भर करती है।

प्रश्न 17.
चमगादड़ अपना शिकार पकड़ने के लिए पराध्वनि का उपयोग कैसे करते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चमगादड़ द्वारा अन्धकार में अपना शिकार ढूँढ़ने की युक्ति:
चमगादड़ अन्धकार में अपना शिकार ढूँढ़ने के लिए सोनार युक्ति का उपयोग करते हैं। वे उड़ते समय पराध्वनि तरंगें उत्सर्जित करते हैं जो उच्च आवृत्ति के कारण अवरोधों एवं कीटों से परावर्तित होकर चमगादड़ के कानों तक पहुँचती हैं जिनका चमगादड़ संसूचन करते हैं। इन परावर्तित स्पन्दों की प्रकृति से चमगादड़ को पता चल जाता है कि उसका शिकार कहाँ है तथा किस प्रकार का है।

प्रश्न 18.
वस्तुओं को साफ करने के लिए पराध्वनि का उपयोग कैसे करते हैं?
उत्तर:
वस्तुओं को साफ करने के लिए पराध्वनि का उपयोग:
पराध्वनि प्रायः उन भागों को साफ करने में उपयोग में लाई जाती है जिन तक पहुँचना बहुत कठिन होता है। जिन वस्तुओं की सफाई करनी होती है उन्हें साफ करने वाले विलयन में रखकर उसमें पराध्वनि प्रेषित की जाती है। उच्च आवृत्ति के विक्षोभ के कारण चिकनाई, धूल कण एवं गन्दगी के कण अलग होकर विलयन में आ जाते हैं और इस प्रकार वस्तु पूर्णतया साफ हो जाती है। इस विधि का उपयोग प्रायः विषम आकार के पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक अवयव आदि को साफ करने में किया जाता है।

प्रश्न 19.
सोनार की कार्यविधि तथा उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सोनार की कार्यविधि:
सोनार में एक प्रेषित्र एवं एक संसूचक लगा होता है। जहाज पर लगे प्रेषित्रों द्वारा नियमित समय अन्तरालों पर पराश्रव्य ध्वनि के शक्तिशाली स्पन्दों अर्थात् सिग्नलों को लक्ष्य तक भेजा जाता है। ये तरंगें जल में गति करती हैं तथा लक्ष्य से टकराने के बाद परावर्तित होकर संसूचक द्वारा ग्रहण कर ली जाती हैं। संसूचक पराध्वनि को विद्युत संकेतों में बदल देता है जिनकी व्याख्या कर ली जाती है। जल में ध्वनि की चाल तथा पराध्वनि के प्रेषण एवं अधिग्रहण के समय को ज्ञात करके लक्ष्य की दूरी की गणना कर ली जाती है।

सोनार के उपयोग:
सोनार के निम्नांकित प्रमुख उपयोग हैं –

  1. चमगादड़ द्वारा अन्धकार में अपना शिकार ढूँढ़ने में।
  2. चमगादड़ का रात्रि में उड़ते समय अवरोधों से टकराने से बचाव करने में।
  3. पॉरपॉइस मछलियों द्वारा अंधेरे में अपने भोजन की खोज करने में।
  4. समुद्र में डूबे हुए जहाज एवं पनडुब्बियों का पता लगाने में तथा समुद्र की गहराई ज्ञात करने में।
  5. समुद्र के अन्दर स्थित चट्टानों, घाटियाँ, हिम शैलों एवं अन्य अवरोधों की स्थिति पता करने में।

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प्रश्न 20.
एक पनडुब्बी पर लगी सोनार युक्ति, संकेत भेजती है और उनकी प्रतिध्वनि 5 s पश्चात् ग्रहण करती है। यदि पनडुब्बी से वस्तु की दूरी 3625 m हो तो ध्वनि की चाल की गणना कीजिए।
हल:
ज्ञात है:
पनडुब्बी से वस्तु की दूरी d=3625 m
प्रतिध्वनि में लगा समय t=5 s
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 6
अतः ध्वनि की अभीष्ट चाल = 1450 m s-1.

प्रश्न 21.
किसी धातु के ब्लॉक में दोषों का पता लगाने के लिए पराध्वनि का उपयोग कैसे किया जाता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धातु के ब्लॉक में दोषों का पता लगाने में पराध्वनि का उपयोग-पराध्वनि तरंगों को धातु ब्लॉक से प्रेषित किया जाता है और प्रेषित तरंगों का पता लगाने के लिए संसूचकों का उपयोग किया जाता है। दोष होने पर पराध्वनि परावर्तित होकर दोष की उपस्थिति को दर्शाती है।

प्रश्न 22.
मनुष्य का कान किस प्रकार कार्य करता है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
निर्देश:
परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 3 देखिए।

MP Board Class 9th Science Chapter 12 परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

MP Board Class 9th Science Chapter 12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वर एक ऐसी ध्वनि है –
(a) जिसमें कई आवृत्तियाँ होती हैं
(b) जिसमें केवल दो आवृत्तियाँ होती हैं
(c) जिसमें एकल आवृत्ति होती है
(d) जिसको सुनना सदैव दुखद होता है
उत्तर:
(c) जिसमें एकल आवृत्ति होती है

प्रश्न 2.
यान्त्रिक पियानो की किसी कुंजी को पहले धीरे से और फिर जोर से दबाया गया। दूसरी बार उत्पन्न ध्वनि –
(a) पहली ध्वनि से प्रबल होगी लेकिन इसका तारत्व भिन्न नहीं होगा
(b) पहली ध्वनि से प्रबल होगी और इसका तारत्व भी अपेक्षाकृत उच्च होगा
(c) पहली ध्वनि से प्रबल होगी परन्तु इसका तारत्व अपेक्षाकृत निम्न होगा
(d) प्रबलता और तारत्व दोनों ही प्रभावित नहीं होंगे
उत्तर:
(a) पहली ध्वनि से प्रबल होगी लेकिन इसका तारत्व भिन्न नहीं होगा

प्रश्न 3.
सोनार (SONAR) में हम उपयोग करते हैं –
(a) पराश्रव्य तरंगें
(b) अवश्रव्य तरंगें
(c) रेडियो तरंगें
(d) श्रव्य तरंगें
उत्तर:
(a) पराश्रव्य तरंगें

प्रश्न 4.
ध्वनि वायु में गमन करती है यदि –
(a) माध्यम के कण एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन कर रहे हों
(b) वायुमण्डल में आर्द्रता न हो
(c) विक्षोभ गमन करे
(d) कण एवं विक्षोभ दोनों ही एक स्थान से दूसरे स्थान को गमन करें
उत्तर:
(c) विक्षोभ गमन करे

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प्रश्न 5.
किसी क्षीण ध्वनि को प्रबल ध्वनि में परिवर्तित करने के लिए किसमें वृद्धि करनी होगी?
(a) आवृत्ति
(b) आयाम
(c) वेग
(d) तरंगदैर्घ्य
उत्तर:
(b) आयाम

प्रश्न 6.
दर्शाए गए वक्र में आधी तरंगदैर्घ्य है –
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 7
(a) AB
(b) BD
(c) DE
(d)AE
उत्तर:
(b) BD

प्रश्न 7.
भूकम्प मुख्य प्रघाती तरंगों से पहले किस प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करते हैं?
(a) पराश्रव्य तरंगें
(b) अवश्रव्य तरंगें
(c) श्रव्य ध्वनि
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) अवश्रव्य तरंगें

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन अवश्रव्य ध्वनि सुन सकता है?
(a) कुत्ता
(b) चमगादड़
(c) राइनोसेरस (गैंडा)
(d) मनुष्य
उत्तर:
(c) राइनोसेरस (गैंडा)

प्रश्न 9.
किसी संगीत समारोह में वृंद वाद्य बजाने से पूर्व कोई सितार वादक तनाव को समायोजित करते हुए डोरी को उचित प्रकार से झंकृत करने का प्रयास करता है। ऐसा करके वह क्या समायोजित करता है?
(a) केवल ध्वनि की तीव्रता
(b) केवल ध्वनि का आयाम
(c) सितार की डोरी की आवृत्ति को अन्य वाद्य यन्त्रों की आवृत्ति के साथ
(d) ध्वनि की प्रबलता
उत्तर:
(c) सितार की डोरी की आवृत्ति को अन्य वाद्य यन्त्रों की आवृत्ति के साथ

प्रश्न 10.
v, ν एवं 2 में सम्बन्ध है –
(a) v = νλ
(b) ν = vλ
(c) λ = vλ
(d) v νλ = 1
उत्तर:
(a) v = νλ

प्रश्न 11.
चमगादड़ द्वारा उत्सर्जित तरंग होती है – (2018, 19)
(a) अवश्रव्य
(b) श्रव्य
(c) पराध्वनि
(d) प्रतिध्वनि
उत्तर:
(c) पराध्वनि

प्रश्न 12.
सोनार तकनीक में किस प्रकार की ध्वनि तरंगों को प्रयोग में लाया जाता है?
(a) श्रव्य
(b) अवश्रव्य
(c) पराश्रव्य
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) पराश्रव्य

प्रश्न 13.
पराश्रव्य तरंगों की आवृत्ति होती है –
(a) 20 Hz से कम
(b) 20 से 20,000 Hz के बीच
(c) 20,000 Hz से अधिक
(d) शून्य
उत्तर:
(c) 20,000 Hz से अधिक

प्रश्न 14.
ध्वनि तरंगें होती हैं – (2018, 19)
(a) चुम्बकीय तरंगें
(b) विद्युत तरंगें
(c) विद्युत चुम्बकीय तरंगें
(d) यान्त्रिक तरंगें
उत्तर:
(d) यान्त्रिक तरंगें

प्रश्न 15.
अधिकतम सहनीय ध्वनि है –
(a) 0 db
(b) 10 db
(c) 60 db
(d) 120 db
उत्तर:
(d) 120 db

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प्रश्न 16.
ध्वनि का वेग सबसे अधिक होता है – (2019)
(a) ठोस में
(b) द्रव में
(c) गैस में
(d) इन सभी में
उत्तर:
(a) ठोस में

रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. ध्वनि तरंगें ……………. तरंगें होती हैं।
2. एक दोलन में लिया गया समय …………….. कहलाता है।
3. एक सेकण्ड में पूर्ण दोलनों की संख्या ……………. कहलाती है।
4. ……………. तरंगें श्रृंग एवं गर्त के द्वारा आगे बढ़ती हैं।
5. …………….. तरंगें सम्पीडन एवं विरलन के द्वारा आगे बढ़ती हैं।
6. प्रतिध्वनि, अवरोधक पृष्ठों से ध्वनि के …………… के कारण होती है।
7. ध्वनि मापन की …………… इकाई है। (2019)
8. श्रव्य तरंगों की परास …………….. होती है। (2019)
उत्तर:

  1. यान्त्रिक
  2. दोलन काल
  3. आवृत्ति
  4. अनुप्रस्थ
  5. अनुदैर्घ्य
  6. परावर्तन
  7. डेसीबल
  8. 20 Hz से 20,000 Hz.

सही जोड़ी बनाना
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 8
उत्तर:

  1. → (iii)
  2. → (vi)
  3. → (v)
  4. → (i)
  5. → (ii)
  6. → (iv).

सत्य/असत्य कथन

1. पराश्रव्य तरंगों को कुत्ते सुन लेते हैं।
2. चमगादड़ अवश्रव्य तरंगें उत्पन्न करती है तथा सुनती है।
3. यान्त्रिक तरंगों के संचरण के लिए माध्यम आवश्यक है।
4. वायु में अनुप्रस्थ एवं अनुदैर्घ्य दोनों प्रकार की तरंगें संचरित होती हैं।
5. किसी द्रव्यात्मक माध्यम में उत्पन्न विक्षोभ को तरंग कहते हैं।
6. अनुप्रस्थ व अनुदैर्घ्य तरंगों को प्रगामी तरंग कहते हैं।
उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. सत्य।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
ध्वनि तरंगें किस प्रकार की तरंगें होती हैं?
उत्तर:
अनुदैर्घ्य यान्त्रिक तरंगें।

प्रश्न 2.
ठोस, द्रव एवं गैस किसमें ध्वनि वेग सर्वाधिक होता है?
उत्तर:
ठोस में।

प्रश्न 3.
आवर्तकाल (T) एवं आवृत्ति (ν) में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर:
Tν = 1.

प्रश्न 4.
तरंग वेग (v), आवृत्ति (ν) एवं तरंगदैर्घ्य (λ) में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर:
v = νλ.

प्रश्न 5.
तरंग वेग (v), आवर्तकाल (T) एवं तरंगदैर्घ्य (λ) में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर:
vT = 2.

प्रश्न 6.
प्रतिध्वनि के लिए ध्वनि उत्पादक एवं परावर्तक तल के बीच न्यूनतम कितनी दूरी होगी?
उत्तर:
17.2 m.

प्रश्न 7.
अवश्रव्य तरंगों को सुनने वाले जन्तु का नाम लिखिए।
उत्तर:
गेंडा।

प्रश्न 8.
पराश्रव्य (पराध्वनि) को सुनने वाले जन्तु का नाम लिखिए।
उत्तर:
चमगादड़ अथवा कुत्ता।

प्रश्न 9.
श्रव्य तरंगों की परास लिखिए।
उत्तर:
20 Hz से 20 हजार Hz।

प्रश्न 10.
अवश्रव्य तरंगों की परास लिखिए।
उत्तर:
20 Hz से कम।

प्रश्न 11.
पराश्रव्य तरंगों की परास लिखिए।
उत्तर:
20 हजार Hz से अधिक।

प्रश्न 12.
SONAR का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
Sound Navigation And Ranging.

प्रश्न 13.
SONAR में किस प्रकार की तरंगें प्रयोग की जाती हैं?
उत्तर:
पराश्रव्य (पराध्वनिक)।

प्रश्न 14.
कौन-सी तरंगें दाब तरंगें कहलाती हैं?
उत्तर:
ध्वनि तरंगें।

प्रश्न 15.
निर्वात में ध्वनि की चाल कितनी होती है?
उत्तर:
शून्य (0)।

प्रश्न 16.
यदि किसी झील की तली में कोई विस्फोट हो तो जल में किस प्रकार की प्रघात तरंगें उत्पन्न होंगी?
उत्तर:
अनुदैर्घ्य तरंगें।

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MP Board Class 9th Science Chapter 12 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यान्त्रिक तरंगें किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
यान्त्रिक तरंगें:
“जो तरंगें किसी द्रव्यात्मक माध्यम में उसके कणों के दोलन करने के कारण उत्पन्न होती हैं, वे यान्त्रिक तरंगें कहलाती हैं।

प्रश्न 2.
अनुदैर्घ्य तरंगें किसे कहते हैं?
उत्तर:
अनुदैर्घ्य तरंगें:
“वे तरंगें जिनमें माध्यम के कणों के दोलन की दिशा एवं तरंगों के संचरण की दिशा एक ही होती है, अनुदैर्घ्य तरंगें कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
अनुप्रस्थ तरंगें किसे कहते हैं?
उत्तर:
अनुप्रस्थ तरंगें:
“वे तरंगें जिनमें माध्यम के कणों के दोलन की दिशा तरंग संचरण की दिशा के लम्बवत् होती है, अनुप्रस्थ तरंगें कहलाती हैं।”

प्रश्न 4.
पराश्रव्य ध्वनि या पराध्वनि क्या है?
उत्तर:
पराश्रव्य ध्वनि या पराध्वनि:
“जिन ध्वनियों की आवृत्ति 20 हजार Hz से अधिक होती है, वे पराश्रव्य ध्वनि या पराध्वनि कहलाती हैं।”

प्रश्न 5.
अवश्रव्य ध्वनि क्या है?
उत्तर:
अवश्रव्य ध्वनि:
वह ध्वनि जिसकी आवृत्ति परिसर 20 Hz से कम होती है, अवश्रव्य ध्वनि कहलाती है।”

प्रश्न 6.
श्रव्य ध्वनि किसे कहते हैं?
उत्तर:
श्रव्य ध्वनि:
“वह ध्वनि जिसको सुनने के लिए हमारे कान संवेदनशील होते हैं तथा जिनकी आवृत्ति परिसर 20 Hz से 20 हजार Hz होती है, श्रव्य ध्वनि कहलाती है।”

प्रश्न 7.
ध्वनि के परावर्तन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ध्वनि का परावर्तन:
“जब कोई ध्वनि तरंग एक माध्यम में संचरण करते हुए किसी पृष्ठ से टकराकर उसी माध्यम में वापस लौट आती है तो इस घटना को ध्वनि का परावर्तन कहते हैं।”

प्रश्न 8.
प्रतिध्वनि किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रतिध्वनि:
“ध्वनि के परावर्तन के कारण ध्वनि के बार-बार सुनाई देने की घटना प्रतिध्वनि ‘कहलाती है।”

प्रश्न 9.
पराध्वनिक से क्या समझते हो?
उत्तर:
पराध्वनिक:
“जब कोई पिण्ड ध्वनि की चाल से अधिक चाल से चलता है तो उस पिण्ड को पराध्वनिक कहते हैं।”

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प्रश्न 10.
ध्वनि बूम से क्या तात्पर्य है? (2019)
उत्तर:
ध्वनि बूम:
“जब कोई पिण्ड पराध्वनिक चाल से चलता है तो प्रघाती तरंगें उत्पन्न होती हैं। इन तरंगों के कारण वायुदाब में अत्यधिक परिवर्तन के कारण एक प्रकार का विस्फोट या कड़क ध्वनि उत्पन्न होती है, जिसे ध्वनि बूम कहते हैं।”

प्रश्न 11.
ध्वनि बूम के क्या परिणाम हैं? (2019)
उत्तर:
ध्वनि बूम के परिणाम:
ध्वनि बूम के कारण आस-पास रखी काँच की वस्तुएँ एवं खिड़कियों के शीशे टूट जाते हैं।

प्रश्न 12.
सोनार (SONAR) क्या है?
उत्तर:
“एक ऐसी औद्योगिक युक्ति जिसमें ध्वनि की पराश्रव्य तरंगों का उपयोग करके जल में स्थित पिण्डों की दूरी, दिशा तथा स्थिति का पता लगाया जाता है, सोनार कहलाती है।”

प्रश्न 13.
ध्वनि को दाब तरंगें क्यों कहते हैं?
उत्तर:
ध्वनि के संचरण से माध्यम में दाब विभिन्नता उत्पन्न हो जाती है इसलिए ध्वनि को दाब तरंगें कहते हैं।

प्रश्न 14.
संलग्न ग्राफ चित्र में 1500 m s-1 वेग से गतिमान किसी विक्षोभ का विस्थापन-समय सम्बन्ध दर्शाया गया है। इस विक्षोभ की तरंगदैर्घ्य परिकलित कीजिए।
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 9
हल:
ग्राफ से,
दिया है:
आवर्तकाल T = 2 x 10-6 s
ध्वनि का वेग v = 1500 m s-1
हम जानते हैं कि
तरंगदैर्घ्य (λ) = वेग (v) x आवर्तकाल (T)
= 1500 x 2 x 10-6 = 3 x 10-3 m
अतः अभीष्ट तरंगदैर्घ्य = 3 x 10-3 m.

प्रश्न 15.
संलग्न चित्र में दर्शाए गए दो ग्राफों (a) अथवा (b) में निरूपित मानव ध्वनियों में से कौन-सी ध्वनि पुरुष की हो सकती है? अपने उत्तर का कारण दीजिए।
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 10
हल:
ग्राफ से प्रकट हो रहा है कि ग्राफ a का आवर्तकाल b से अधिक है। अत: a की आवृत्ति b से कम है। इसलिए ग्राफ a की ध्वनि पुरुष की है। क्योंकि पुरुष के स्वर का तारत्व (आवृत्ति) स्त्रियों के स्वर के तारत्व (आवृत्ति) से कम होता है।

प्रश्न 16.
हम भिनभिनाती मधुमक्खी की ध्वनि सुन लेते हैं, जबकि हमें लोलक के दोलन की ध्वनि सुनाई नहीं देती। क्यों?
उत्तर:
भिनभिनाती मधुमक्खियाँ अपने पंखों को फड़फड़ाकर जो ध्वनि उत्पन्न करती है वह श्रव्य ध्वनि की परिसर में होती हैं। इसलिए हम उसे सुन लेते हैं जबकि लोलक के दोलन की आवृत्ति अवश्रव्य ध्वनि की परिसर में आती है अर्थात् उसकी आवृत्ति 20 Hz से कम होती है इसलिए हमें सुनाई नहीं देती।

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प्रश्न 17.
किसी तड़ित झंझा द्वारा उत्पन्न ध्वनि तड़ित दिखाई देने के 10 s बाद सुनाई देती है। गर्जन मेघ की सन्निकट दूरी परिकलित कीजिए। दिया है-ध्वनि की चाल = 340 m s-1
हल:
ज्ञात है:
ध्वनि की चाल v =340 m s-1
समय अन्तराल t = 10 s
गर्जन मेघ की दूरी
S = ध्वनि की चाल v x समय t
= दूरी S = 340 m s-1 x 10 s
= 3400 m = 3.4 km
अत: गर्जन मेघ की सन्निकट अभीष्ट दूरी = 3400 m अर्थात् 3.4 km.

प्रश्न 18.
संलग्न चित्र में कान द्वारा घड़ी की टिक-टिक की प्रबलतम ध्वनि सुनने के लिए कोण r ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 11
हल:
परावर्तन के नियम से
कोण r = कोण i
⇒ ∠r = 90° – 50° (चित्रानुसार)
= 40°
अतः r का अभीष्ट मान = 40°.

प्रश्न 19.
अच्छे सम्मेलन कक्षों अथवा कंसर्ट हॉलों की छत तथा मंच के पीछे की दीवारें वक्राकार क्यों बनाई जाती हैं?
उत्तर:
अच्छे सम्मेलन कक्षों अथवा कंसर्ट हॉलों की छत तथा मंच के पीछे की दीवारें वक्राकार इसलिए बनाई जाती हैं ताकि इनसे परावर्तन के पश्चात् ध्वनि हॉल में बैठे सभी दर्शकों तक सुस्पष्ट रूप से पहुँच सके।

MP Board Class 9th Science Chapter 12 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी तरंग की गुणधर्म लिखिए।
उत्तर:
किसी तरंग के गुणधर्म-किसी तरंग के गुणधर्म निम्न हैं –

  1. तरंग, कम्पन करते स्रोत द्वारा आवर्ती (Periodic) विक्षोभ के कारण होता है।
  2. तरंग के कारण ऊर्जा का स्थानान्तरण होता है, न कि पदार्थ का।
  3. तरंग के माध्यम के कण संचरित नहीं होते, वे अपनी मूल स्थिति में ही कम्पन करते हैं एवं अपने आस-पास के कणों में ऊर्जा का स्थानान्तरण करते हैं।
  4. तरंग की गति माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करती है, तरंग स्रोत की गति या कम्पन पर नहीं।
  5. यदि तरंग स्रोत के चारों तरफ का माध्यम एकसमान (समांगी) है तो तरंग गति भी सभी दिशाओं में समान रहती है।

प्रश्न 2.
अनुप्रस्थ तरंग को रेखाचित्र बनाकर समझाइए।
उत्तर:
अनुप्रस्थ तरंगें:
“वे तरंगें जिनमें माध्यम के कणों की गति की दिशा तरंग संचरण की दिशा के लम्बवत् होती है, अनुप्रस्थ तरंगें कहलाती हैं।” ये तरंगें श्रृंग और गर्त के रूप में संचरण करती हैं।

किसी रस्सी का एक सिरा किसी जगह बाँध कर उसके दूसरे सिरे को हाथ से ऊपर नीचे हिलाने पर रस्सी में अनुप्रस्थ तरंगें उत्पन्न होती हैं।
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 12

प्रश्न 3.
अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य तरंगों में अन्तर लिखिए। (2019)
उत्तर:
अनुप्रस्थ एवं अनुदैर्घ्य तरंगों में अन्तर:
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 13

प्रश्न 4.
ध्वनि के परावर्तन के व्यावहारिक उपयोग लिखिए। (2019)
उत्तर:
ध्वनि के परावर्तन के व्यावहारिक उपयोग-ध्वनि के परावर्तन के प्रमुख व्यावहारिक उपयोग अग्रलिखित हैं –

  1. मेगाफोन, लाउडस्पीकर, हॉर्न, तुरही तथा शहनाई जैसे वाद्ययन्त्रों द्वारा ध्वनि विस्तार में।
  2. स्टेथोस्कोप द्वारा हृदय की धड़कनों को डॉक्टर के कानों तक पहुँचाने में।
  3. बड़े हॉलों एवं सभाकक्षों में वक्राकार छठों द्वारा ध्वनि को परावर्तित करके कक्षों के प्रत्येक हिस्से में ध्वनि को प्रेषित करने में।
  4. कर्ण, तुरही जैसी श्रवण सहाय युक्तियों के कार्य करने में।

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प्रश्न 5.
ध्वनि का वेग या चाल v, आवृत्ति ν एवं तरंगदैर्घ्य 2 में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
∵ 1 कम्पन में तरंग चली दूरी = λ
ν कम्पन में तरंग द्वारा चली दूरी = νλ
चूँकि ν आवृत्ति है अत: यह 1 सेकण्ड में कम्पनी की संख्या है।
इसलिए 1 सेकण्ड में तरंग द्वारा चली गई दूरी = νλ
चूँकि 1 सेकण्ड में चली गई दूरी को वेग कहते हैं।
अतः v = νλ

प्रश्न 6.
यदि ध्वनि का वायु में वेग 340 m s-1 हो, तो
(a) 256 Hz आवृत्ति के लिए तरंगदैर्घ्य तथा
(b) 0.85 m तरंगदैर्घ्य के लिए आवृत्ति परिकलित कीजिए।
हल:
ज्ञात है:
ध्वनि का वेग = 340 m s-1
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 14
अत: अभीष्ट आवृत्ति = 400 Hz.

प्रश्न 7.
12 m x 12 m साइज के किसी पार्क के मध्य में कोई लड़की बैठी है। इस पार्क के दाहिनी ओर लगा हुआ भवन है तथा पार्क के बाँई ओर एक सड़क है। सड़क पर पटाखा फटने की ध्वनि होती है। क्या लड़की इस ध्वनि की प्रतिध्वनि सुन सकती है? अपना उत्तर स्पष्ट कीजिए।
हल:
भवन से टकराकर लड़की तक पहुँचने के लिए ध्वनि द्वारा चली कुल अतिरिक्त दूरी = 6 m + 6 m = 12 m.
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 15
चूँकि प्रतिध्वनि सुनने के लिए आवश्यक है कि मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के मध्य आवश्यक समय अन्तराल = 0.1 s हो। इसलिए प्रतिध्वनि निर्मित होने के लिए परावर्तित ध्वनि तरंग द्वारा चली गई आवश्यक न्यूनतम दूरी –
= ध्वनि वेग x समय अन्तराल
= 344 x 0.1 = 34.4 मीटर
इस प्रकरण में परावर्तित ध्वनि तरंग द्वारा चली गई कुल दूरी 12 मीटर है जो आवश्यक दूरी से बहुत कम है। अतः प्रतिध्वनि सुनाई नहीं देगी।

प्रश्न 8.
ध्वनि द्वारा उत्पन्न विक्षोभ के लिए दूरी के सन्दर्भ में दाब या घनत्व के परिवर्तनों को दर्शाने के लिए कोई वक्र खींचिए। इस वक्र पर संपीडन एवं विरलन की स्थितियाँ दर्शाइए। इस वक्र का उपयोग करके तरंगदैर्घ्य एवं आवर्तकाल की परिभाषा दीजिए।
हल:
दूरी के सन्दर्भ में दाब या घनत्व परिवर्तन दर्शाने के लिए ग्राफ:
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 16
तरंगदैर्घ्य:
“दो क्रमागत सम्पीडनों अथवा दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी तरंगदैर्घ्य होती है।”

आवर्तकाल:
“दो क्रमागत सम्पीडनों अथवा दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी को तय करने में लगने वाला समय आवर्तकाल होता है।

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MP Board Class 9th Science Chapter 12 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ध्वनि संचरण की सचित्र व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ध्वनि के संचरण की व्याख्या-ध्वनि के संचरण के लिए वायु अच्छा माध्यम है। जब कोई कम्पायमान वस्तु आगे की ओर कम्पन करती है तो वह अपने सामने की वायु को संपीडित करती है और इस
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 17
प्रकार एक उच्च वायुदाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है। इस क्षेत्र को सम्पीडन (Compression) कहते हैं। यह सम्पीडन कम्पायमान वस्तु के आगे की ओर गति करता है। जब कम्पायमान वस्तु पीछे की ओर कम्पन करती है तो आगे की ओर एक निम्न दाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है जिसे विरलन (Rarefaction) कहते हैं। ये संपीडन और विरलन ही तरंग बनाते हैं जो वायु (माध्यम) से होकर हमारे कानों तक पहुँचते हैं। इस प्रकार संचरण से माध्यम में दाब विभिन्नता उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 2.
पराध्वनि (पराश्रव्य ध्वनि) के कोई चार अनुप्रयोग लिखिए। (2018, 19)
उत्तर:
पराध्वनि (पराश्रव्य ध्वनि) के अनुप्रयोग-पराध्वनि (पराश्रव्य ध्वनि) के प्रमुख अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं –

  1. विषम आकार के पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक अवयव आदि की सफाई करने में इनका उपयोग किया जाता है।
  2. चमगादड़ इनका उपयोग रात्रि विचरण में अपने को अवरोधों से टकराने से बचाने में करता है।
  3. अन्धकार में चमगादड़ एवं पॉरपॉइस मछलियाँ अपना भोजन या शिकार की खोज करने में इन ध्वनियों का उपयोग करती है।
  4. इन ध्वनियों का उपयोग समुद्र में डूब जहाजों, चट्टानों, पनडुब्बियों का पता लगाने में किया जाता है।
  5. समुद्र की गहराई ज्ञात करने में इनका उपयोग होता है।
  6. इन तरंगों का उपयोग हृदय रोगी की जाँच के लिए इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी नामक तकनीक में किया जाता है।
  7. अल्ट्रासोनोग्राफी का उपयोग यकृत, पित्ताशय, गुर्दे, गर्भाशय आदि की जाँच में तथा गर्भकाल में भ्रूण की जाँच करने में किया जाता है।
  8. चिमनियों की सफाई करने में इनका उपयोग होता है।
  9. जासूसी के कार्यों में इनका उपयोग गुप्त संकेत भेजने में किया जाता है।
  10. भवनों, पुलों, बाँधों, मशीनों, वैज्ञानिक उपकरणों के दोषों का पता लगाने में इनका उपयोग किया जाता है।
  11. बहुमूल्य धातुओं, रत्नों, जवाहरातों के दोषों का पता लगाने में इनका उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 3.
मानव कर्ण की संरचना एवं क्रियाविधि का सचित्र वर्णन कीजिए। (2019)
उत्तर:
मानव कर्ण की संरचना एवं क्रियाविधि-मानव कर्ण (कान) श्रवणेन्द्रिय है। इसको प्रमुखतः निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जाता है –

1. बाहरी कर्ण (External Ear):
बाहरी कर्ण को कर्ण पल्लव या पिन्ना (Ear Flap) कहते हैं जो परिवेश से ध्वनि को एकत्रित करने का कार्य करता है। एकत्रित ध्वनि श्रवण नलिका (Auditory Canal or Ear Canal) से होती हुई कर्ण पट्ट से टकराती है जिससे कर्णपट्ट (Diaphragm) कम्पन करने लगता है।
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 18
2. मध्य कर्ण (Mid Ear):
मध्य कर्ण में तीन अस्थियाँ होती हैं जिन्हें मेलियस (Malleus), इन्कस (Incus) एवं स्टैप्स (Stapes) कहते हैं। ये अस्थियाँ ध्वनि कम्पनों को कई गुना बढ़ा देती है। मध्य कर्ण इन तरंगों को आन्तरिक कर्ण तक पहुँचा देता है।

3. आन्तरिक कर्ण (Internal Ear):
आन्तरिक कर्ण में कर्णावर्त (Cochlea) द्वारा दाब परिवर्तनों को विद्युत संकेतों से परिवर्तित कर दिया जाता है। ये संकेत श्रवण तन्त्रिकाओं (Auditory nerves) द्वारा मस्तिष्क को प्रेषित कर दिये जाते हैं। इस प्रकार मस्तिष्क के द्वारा ध्वनि का अनुभव होता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रकरणों को दो पृथक् आरेखों द्वारा ग्राफीय रूप में निरूपित कीजिए –
1. दो ध्वनि तरंगें जिनके आयाम समान परन्तु आवृत्तियाँ भिन्न हों।
2. दो ध्वनि तरंगें जिनकी आवृत्तियाँ समान परन्तु आयाम भिन्न हों।
3. दो ध्वनि तरंगें जिनके आयाम एवं तरंगदैर्घ्य दोनों भिन्न हों।
हल:
1. समान आयाम तथा भिन्न आवृत्ति:
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 19
2. समान आवृत्ति तथा भिन्न आयाम:
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 20
3. भिन्न आयाम एवं भिन्न तरंगदैर्घ्य (आवृत्ति):
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 12 ध्वनि image 20

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 21 सूक्तयः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 21 सूक्तयः (स्फुट)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 21 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) सत्य क्षमाभ्यां कस्य सिद्भिः? (सत्य के क्षमाभ्यास से किसकी सिद्धि होती है?)
उत्तर:
सकलार्थः। (सभी प्रकार की)

(ख) मे मनः कीदृशः अस्तु? (मेरः मन किस तरह का हो?)
उत्तर:
शिव संकल्पमस्तु। (शिव संकल्प वाला हो)।।

(ग) कर्मसु कौशलम् किम्? (कर्म में कुशलता किससे आती है?)
उत्तर:
योगः। (योग से)

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(घ) प्रमाद कस्मात् न कर्त्तव्यः? (किसमें प्रमाद नहीं करना चाहिए?)
उत्तर:
स्वाध्याय। (स्वाध्याय में)

(ङ) कः रक्षितः रक्षति? (किसकी रक्षा ही रक्षा है?)
उत्तर:
धर्मा। (धर्म की)

प्रश्न 2.
एक वाक्येन उत्तर लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) सर्वारम्भः कः? (सबसे पहले क्या आरम्र होता है?)
उत्तर:
सर्वारम्भा मन्त्रमूलाः। (सबसे पहले मूल मंत्र आरंभ होता है।)

(ख) नरः कथं सुखी भवति? (व्यक्ति सुखी कैसे होता है?)
उत्तर:
नरः आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्। (जो व्यक्ति भोजन और शिष्टाचार में लज्जा को त्यागने वाला है, वही सुखी रहता है)

(ग) सकलं कदा नष्टं भवति? (सम्पूर्ण कब नष्ट हो जाता है?)
उत्तर:
यदि आचरणं मलिनं भ्रष्टम् तदा सकलं नष्टं भवति। (यदि आचरण सन्तोषप्रद नहीं है तो सम्पूर्ण नष्ट हो जाता है।)

प्रश्न 3.
उचितमेलनं कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 21 सूक्तय img-1

प्रश्न 4.
रेखांवित शब्दार आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) धर्मो रक्षितः रक्षति
प्रश्न : धर्मों कः रक्षति?

(ख) भ्रष्टाचारण सर्वं नष्टंपति।
प्रश्न : केन आचरेण सर्वं नष्टं भवति?

(ग) द्यिा मुक्तिप्रदा अस्ति।
प्रश्न : विद्या का अस्ति?

प्रश्न 5.
रक्तस्थानानि पूरयत
(श) सा विद्या या विमुक्तये।
(ष) स्वाध्याय न प्रमदितव्यम्।
(स) आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।।
(ह) सत्यश्रमाभ्याम् सकलार्थ सिद्धिः।

प्रश्न 6.
सन्धि विच्छेदं कुरुत-
तन्न – तत्+न।
धर्मोरक्षति – धर्मः+रक्षति।
स्वाध्यायान्मा – स्वाध्याय+अयान्मा।

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प्रश्न 7.
कोष्ठकात् शब्द चित्वा सूक्तिं रचयत
धर्मो, योगः, यत्र, सकलम्
यथा-
धर्मो – धर्मो रक्षति रक्षितः।
योगः – योगः कर्मसु कौशलम्।
यत्र – यत्र नारयस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता।
सकलम् – सत्यश्रमाभ्याम् सकलार्थ सिद्धिः।

प्रश्न 8.
सूक्त्या पूर्ति करोतु-(सूक्ति द्वारा)
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 21 सूक्तय img-2

प्रश्न 9.
संस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत
यत्र, तत्र, हि, च, या
यत्र – यत्र धूम्रः तत्र अग्नि।
तत्र – तत्र खगाः सन्ति।
हि – मानो हि महताम धनम।
च – अन्नं, जलं च सुभाषितम् पृथ्वियां श्रेष्ठः रत्नाः सन्ति।
या – सा विद्या या विमुक्तये।

प्रश्न 10.
समानार्थक शब्दं लिखत
लज्जा – व्रीड़ा
ल कष्टं – दुःखं
स्वाध्याय – अध्ययनम्।

प्रश्न 11.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
(क) योगस्याशयः स्पष्टं करोतु?
उत्तर:
कर्मस्य कौशलम्।।

(ख) कुत्र कुत्र प्रमादः न कर्त्तव्यम्?
उत्तर:
देव पितृकार्याभ्यां।

(ग) धर्मः कथं रक्षति?
उत्तर:
सर्व प्रकारेण, धर्म क्षेत्रे, कर्म क्षेत्रे धर्मः रक्षति।

(घ) कीदृशी विद्या मुक्तिं ददाति?
उत्तर:
तपः शालिनी विद्या मुक्तिं ददाति।

(ङ) भ्रष्टाचारेण किं किं भवति?
उत्तर:
भ्रष्टाचारेण सर्वं नष्टं भवति।

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सूक्तयः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

सुंदर उक्ति अर्थात् कथन ही सूक्ति कहलाता है। अनुभव पूर्ण हितकारक वचन ही सूक्ति कहलाता है। सूक्ति मानव स्वभाव को शोध कर सन्मार्ग पर अग्रसर करती है और श्रेष्ठ आचार-व्यवहार का उपदेश देती है। अतः शिक्षण में भी सूक्तियों का विशेष महत्त्व है। प्रस्तुत पाठ में विभिन्न ग्रन्थों से सूक्तियों का संकलन कर यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

शब्दार्थ :
सत्यश्रमाभ्याम्-सत्य और श्रम द्वारा-through truth and labour; विमुक्तये-मुक्ति के लिए-for finished for the freedom; प्रमदितव्यम्-प्रमाद करना चाहिए-intoxication self; रमन्ते-निवास करते हैं-lives; सर्वारम्भाः-सभी कार्यों का आरम्भ-start of all work; अन्तःकरणम्-मन बुद्धि आदि-mind, wisdom; भव-होओ (हे)-happen; देवपितृकार्याभ्यां-देव और पितृ कार्यों में-God and sons work; प्रमदः-आलस्य-Ideal;,laziness; त्यक्त लज्जः-जिसने लज्जा को त्याग दिया हो-wicked; वस्तुषु-वस्तुओं में-In things;सुखी भवेत्-सुखी होता है-Happy;शक्यं-शक्ति-power.

सूक्तयः पाठ का हिन्दी अर्थ

1. मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।
मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।

2. सत्यश्रमाभ्याम् सकलार्थः सिद्धिः।
सत्य एवं परिश्रम से सकलार्थ (सभी कार्यों की) सिद्धि होर्तः है।

3. सा विद्या या विमुक्तये।
विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे।

4. ये.गः कर्मसु कौशलम्।
योग से कर्म करने की कुशलता आती है।

5. स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
स्वाध्याय में प्रमाद न करें।

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6. देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
देव और पितृकार्य में भी आलस्य न करें।

7. धर्मो रक्षति रक्षितः।
धर्म की रक्षा से ही स्व रक्षा होती है।

8. मन्त्रमूलाः सर्वारम्भाः।
सभी कार्यों का मूल मंत्र प्रारंभ करना है।

9. आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।
भोजन और शिष्टाचार में लज्जा का त्याग करने वाला ही सुखी रहता है।

10. सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः।
संदेह होने पर अंतःकरण की वृत्ति ही प्रमाण होती है।

11. सकलं कष्टं निखिलं नष्टं यदि आचरणं मलिनं भ्रष्टम्।
यदि आचरण दूषित हो तो वह समस्त कष्टों को देने वाला है एवं सम्पूर्ण को नष्ट करके वाला होता है।

12. उपायेन हि यच्छक्यं तन्न शक्यं पराक्रमः।
उपाय से ही यथा शक्ति पराक्रम प्राप्त होता है।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 20 वेधशाला (पत्रम्)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 20 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) उज्जयिनी कस्याः विद्यायाः प्रमुखं केन्द्रमस्ति? (उज्जैन किस विद्या का प्रमुख केन्द्र था?)
उत्तर:
ज्योतिषादयः। (ज्योतिष विद्या का)।

(ख) वेधशाला कस्याः नद्याः तटे स्थिता अस्ति? (यंत्रशाला किस नदी के तट के किनारे स्थित है?)
उत्तर:
क्षिप्रा। (क्षिप्रा।)

(ग) उज्जयिनीतः का रेखा निर्गता? (उज्जैन से होकर कौन-सी रेखा गुजरती है?)
उत्तर:
भूमध्य रेखा। (भूमध्य रेखा)।

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(घ) कस्य प्रयत्नेन वेधशालायाः जीर्णोद्धारो जातः? (किसके प्रयत्न से यंत्रशाला का जीर्णोद्धार हुआ?)
उत्तर:
पं. सूर्यनारायण व्यासस्य। (पं. सूर्यनारायण व्यास के)

(ङ) वेधशालायां कास्य विज्ञानस्य बोधं भवति? (यंत्रशाला से कौन-से विज्ञान का बोध होता है?)
उत्तर:
ज्योतिष। (ज्योतिष का)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) केन यन्त्रेण दिगंशः ज्ञायते? (किस यंत्र के द्वारा दिशाओं की गणना की जाती है?)
उत्तर:
दिगंशयन्त्रेण दिगंशः ज्ञायते। (दिशासूचक यंत्र के द्वारा दिशाओं की गणना की जाती है।)

(ख) वेधशालानिर्माणं कदा केन च कारितम्? (यंत्रशाला का निर्माण कब और किसके द्वारा किया गया?)
उत्तर:
वेधशालानिर्माणं अष्टादशशताब्दयां राजा जयसिंहेन च कारितम्। (वेधशाला का निर्माण 18वीं सताब्दी में राजा जयसिंह के द्वारा किया गया।)

(ग) सम्राट् यन्त्रेण कः लभ्यते? (सम्राट यंत्र से क्या जानकारी मिलती है?)
उत्तर:
सम्राट्यन्त्रेण सूर्योदयात् सूर्यास्तं यावत् स्पष्ट समयो लभ्यते। (सम्राट यंत्र के द्वारा सूर्योदय और सूर्यास्त के स्पष्ट समय की जानकारी मिलती है।)

(घ) नाडिवलययन्त्रेण कः ज्ञायते? (नाडिवलय यंत्र से क्या ज्ञान प्राप्त होता है?)
उत्तर:
नाडिवलंययन्त्रेण ग्रहनक्षत्राणां दक्षिणायन विज्ञातं। (नाडिवलय यंत्र के द्वारा ग्रह-नक्षत्रों का तथा दिशाओं का ज्ञान होता है।)

(ङ) पलभायन्त्रेण कस्य ज्ञानं भवति? (पलभा यंत्र द्वारा किसका ज्ञान होता है?)
उत्तर:
पलभायंत्रेण छायायामपि समयस्य ज्ञानं भवति। (पलभा यंत्र के द्वारा छाया से भी समय का ज्ञान होता है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) उज्जयिन्यां वेधशाला कुत्र स्थितास्ति? (उज्जैन की यंत्रशाला कहाँ पर स्थित है?)
उत्तर:
एषा वेधशाला उज्जयिन्याः दक्षिणभागे क्षिप्रायाः दक्षिण तटे स्थितास्ति। (यह वेधशाला उज्जैन के दक्षिण में क्षिप्रा नदी के दक्षिण तट में स्थित है।)

(ख) जयसिंहेन किमर्थं वेधशालानिर्माणं कारितम्? (जयसिंह ने किसलिए यंत्रशाला का निर्माण कराया?)
उत्तर:
जयसिंहेन ज्योतिषानुरागवशात् वेधशाला निर्माणं कारितम्। (जयसिंह ने ज्योतिष के वशीभूत होकर यंत्रशाला का निर्माण करवाया।)

(ग) उज्जयिन्यां कानि-कानि स्थलानि दर्शनीयानि सन्ति? (उज्जैन में कौन-कौन से स्थान देखने योग्य हैं?)
उत्तर:
उज्जयिन्यां महाकालेश्वर मन्दिरम् महर्षेः सान्दीपनेः आश्रमम्, गढ़कालिका मन्दिरम् आदयः स्थलानिदर्शनीयानि सन्ति।
(उज्जैन में महाकालेश्वर का मन्दिर, महर्षि सांदिपनि का आश्रम गढ़कालिका मन्दिर आदि स्थान देखने योग्य हैं।)

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(घ) दिगंशयन्त्रेण दक्षिणोत्तरभित्तियन्त्रेण च कस्य बोधः भवति? (दिक्यंत्र और दक्षिणोत्तर दीवाल यंत्र के द्वारा किसका ज्ञान होता है?)
उत्तर:
दिगंशयन्त्रेण दक्षिणोत्तर भित्तियन्त्रेण च नक्षत्राणाञ्चापि दिगंशोच ग्रहनक्षत्राणां मध्याह्नवृत्ता गमनसमये नतोन्नतांशयोः बोधः भवति। (दिक यंत्र और दक्षिणोत्तर दीवाल यंत्र के द्वारा नक्षत्रों के दिशाओं का, ग्रहों का तथा समयादि का ज्ञान होता है।)

(ङ) उज्जयिन्याः प्राचीननामानि लिखित्वा प्राचीनवैभवमपि वर्णयत? (उज्जैन का प्राचीन नाम लिखकर प्राचीनकालीन वैभव को भी वर्णित करें?)
उत्तर:
उज्जयिन्याः प्राचीननामानि अवन्तिका आसीत् च सर्वत्र पुरातात्त्विकं वैभवं, ज्योतिष-गणित आदयः आसीत्। (उज्जैन का प्राचीन नाम अवन्तिका था जहाँ पुरातात्त्विक वैभव के साथ-साथ ज्योतिष एवं गणित का अध्ययन केन्द्र था।)

प्रश्न 4.
रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) राजा जयसिंहेन वेधशालानिर्माणं कारितम्।
(ख) आङ्ग्लभाषायां वेधशालां अब्जर्वेटरी इति वदन्ति।
(ग) एषा अवन्तिका नाम्नापि शास्त्रेषु वर्णिता अस्ति।
(घ) भूमध्य रेखा इतः एव निर्गता।
(ङ) एतद् ज्योतिष ज्ञानं विज्ञानस्य उत्तमम् उदाहरणम् अस्ति।

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
उदाहरणम् –
वेधशाला क्षिप्रायाः उत्तरतटे स्थिता अस्ति। – न
उज्जयिनी ज्योतिषविद्याया प्रमुख केन्द्रमस्ति। – आम्
(क) वेधशालायाः निर्माणम् अष्टादशशताब्याम् अभवत्।
(ख) जयसिंहेन वेधशालायाः जीर्णोद्धारं कारितम्।
(ग) पलभायन्त्रेण रात्रौ समयस्य ज्ञानं भवति।
(घ) उज्जयिनी विशाला इति नाम्नापि शास्त्रेषु वर्णिता।
(ङ) उज्जयिनीतः कर्करेखा निर्गता।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) न
(घ) न
(ङ) न

प्रश्न 6.
सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
(क) पुरीयम् – पुर+इयम् = स्वरसन्धिः।
(ख) सर्वेऽपि – सर्व+अपि = पूर्व रूप स्वर सन्धिः।
(ग) कुशलताञ्च – कुशलता+च = व्यंजन संन्धिः।
(घ) दृष्टव्येति – दृष्टव्य+इति = स्वर सन्धिः।
(ङ) कालेऽपि – काल:+अपि = पूर्व रूप स्वर सन्धिः।

प्रश्न 7.
उदाहरणानुसारं शब्दानां धातुं प्रत्ययं च पृथक कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला img-1

प्रश्न 8.
अव्ययैः वाक्यनिर्माणं कुरुत-
यथा :
जनाः वेधशालां यन्त्रभवनम् अपि वदन्ति।
(क) सर्वत्र – सर्वत्र शिक्षकाः सन्ति।
(ख) सम्यक् – सः सम्यक् पठितुम् भोपाल नगरम् आगच्छत्।
(ग) अधुना – अधुना उज्जैनयाम् वेधशाला पुरातात्त्विक धरोहरः अस्ति।
(घ) यावत् – यावत् सः अगमिष्यसि तावत् अहम् पठिष्यामि।
(ङ) यदा – यदा पं. सूर्यनारायण व्यासेन वेधशाला जीर्णोद्धारं कारितवान्।

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प्रश्न 9.
उदाहरणनुसारं शब्दानां विभक्तिं वचनं च लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला img-2

प्रश्न 10.
यथायोग्यं योजयत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 20 वेधशाला img-3

वेधशाला पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

पत्रलेखन भाषण कला के समान एक लेखक कला है। लिखिन रूप में कहा गया अंश थोड़े में लिखते हैं। सरल, सुंदर विन्यास में संक्षिप्त किन्तु सम्पूर्ण लेख लेखन के महत्त्व को बताते हैं। व्यक्ति विशेष के अनुसार भूमिका, उपसंहार, पत्रलेखन की विशेषता होती है। प्रस्तुत पाठ में पत्र के माध्यम से उज्जैन की वेधशाला की विशेषता बताई गई है

वेधशाला पाठ का हिन्दी अर्थ

1.

शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयः
शामगढ़नगरम् (मध्यप्रदेशः)

प्रियमित्र! तपन!
नमस्ते
अहमत्र कुशली, भवतः कुशलताञ्च कामये। मम अध्ययनं सम्यक् प्रचलति। मम विद्यालयस्य त्रैमासिकी परीक्षायाः परिणामः आगतः। मम परिणामः उत्तमः।

विगतसप्ताहे विद्यालयस्यैका शैक्षणिकयात्रांप्रवृत्ता। अहम् संस्कृतशिक्षकस्य निर्देशने छात्रैः सह उज्जयिनी गतवान्। उज्जयिनी भारतस्य अत्यंतं प्राचीनतम् इतिहासधर्म-दर्शन-कला-साहित्य-योग-ज्यौतिषादीनां च केन्द्रमासीत्। एषा अवन्तिका, विशाला नाम्नापि शास्त्रेषु वर्णिता अस्ति। अत्र सर्वत्र पुरातात्विकं वैभवं दृष्ट्वा मनसि आनन्दो जायते। भगवतःमहाकालस्य पुरीयं देशे श्रद्धायाः केन्द्रमस्ति। अत्र भव्यं महाकालेश्वरमन्दिरम्, हरसिद्धिमंदिरम्, गोपालमन्दिरम्, महर्षेः सान्दीपनेः आश्रमम्, गढ़कालिकामन्दिरम् कालभैरवमंदिर अन्यानि चापि सिद्धवट-अङ्कपात-मङ्गलनाथ-कालियादाहंभवनमित्यादि दिव्यस्थानानि अस्माभिः अवलोकितानि। किन्तु वेधशालां दृष्ट्वा वयं सर्वेऽपि आश्चर्यचकिताः सजाताः।

शब्दार्थ :
अहमत्र-मैं यहां हूं-I am hear; कामये-काम-disire/wish; अगतः-आया-come; विगतसप्ताहे-पिछले सप्ताह-last weak; प्रवृत्ता-प्रवृत्त-to go ahead; संस्कृत शिक्षकस्य-संस्कृत शिक्षक-Sanskrit teacher; वापि-और भी-and also; अस्माभिः-हमारे-our; सजाताः-हुए-happend; ज्यौति-ज्यौति-astrology.
हिन्दी अर्थ :

शासकीय उच्चतर माध्यमिक
विद्यालय, शामगढ़नगर (म. प्र.)

प्रिय मित्र तपन!
नमस्ते!
मैं यहाँ कुशलपूर्वक हूँ तथा आपकी कुशलता की कामना करता हूँ। मेरा अध्ययन ठीक से चल रहा है। मेरे विद्यालय की त्रैमासिक परीक्षा का परिणाम आ गया है। मेरा परिणाम उत्तम है।

पिछले सप्ताह विद्यालय की ओर से एक शैक्षणिक यात्रा सम्पन्न हुई। मैं भी संस्कृत के आचार्य महोदय व छात्रों के साथ उज्जैन गया। उज्जयिनी भारत के अत्यन्त प्राचीन इतिहास, धर्म, दर्शन, कला, साहित्य योग और ज्योतिष आदि का केन्द्र था। शास्त्रों में इस नगर को अवन्तिका के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ सर्वत्र पुरातात्त्विक सम्पन्नता को देखकर मन में आनन्द की लहरें हिलारें लेने लगती हैं। यहाँ का प्राचीन कालेश्वर मन्दिर, हरसिद्ध मंदिर, गोपाल मंदिर, महर्षि संदीपन आश्रम, गढ़ कालिका मन्दिर, काल भैरव मंदिर आदि अनेक दर्शनीय स्थल हैं। इसके अतिरिक्त अन्य और भी दर्शकीय स्थल है जैसे-सिद्धवट, अंक पात, मंगलनाथ, कालिया दाह भवन आदि । किन्तु वेधशाला को देखकर हम सभी आश्चर्य चकित हो गए।

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2. मित्र! आङ्ग्लभाषायां वेधशालाम् “ऑब्जर्वेटरी” इति वदन्ति । जनाः वेधशालां “यन्त्रभवनम्” अपि वदन्ति । एषा वेधशाला उज्जयिन्याः दक्षिणभागे क्षिप्रायाः दक्षिणतटे उन्नत-भू-भागे स्थिता अस्ति। प्राचीनकालत् एव उज्जयिनी ज्यौतिषविद्यायाः प्रमुखं केन्द्रम् । भूमध्यरेखा इतः एव निर्गता। इदं स्थानं गणितस्यापि आधारस्थलम् अस्ति। अष्टादशशताब्यां राज्ञा जयसिहेन ज्यौतिषानुरागवशात् वेधशालानिर्माणं कारितम् । ग्रहाणां प्रत्यक्षवेधनाय जयसिंहः उज्जयिन्या, काश्या, देहल्या, जयपुरे च वेधशालाना निर्माणं कृतवान्। सः वेधज्यौतिषमधिकृत्य एक ग्रन्थम् अपि रचितवान् इति श्रूयते। तेन अत्र एकम् उपनगरम् अपि निर्मितम् अधुना अपि जयसिंहपुरा इति नाम्ना तद् विख्यातमेव।

इयं वेधशाला जीर्णशीर्णा आसीत् परं 1961 तमे खीष्टाब्देः पं. सूर्यनारायणव्यासस्य प्रयत्नेन वेधशालायाः जीर्णोद्धारो जातः। अत्र विद्यते सम्राट्यन्त्रम् एतेन सूर्योदयात् सूर्यास्तं यावत् स्पष्टसमयो लभ्यते। अत्र स्थितेन दिगंशयन्त्रेण ग्रहाणां नक्षत्राणाञ्चापि दिगशो ज्ञायते। “नाडिवलययन्त्रेण” ग्रहनक्षत्राणां दक्षिणायन विज्ञातं भवति।

शब्दार्थ :
अब्जर्वेटरी-अब्जर्वेटरी-observatary; वदन्ति-कहते हैं-say; एषा-यह-this; निर्गता-जाती है-goes; इदं-यह-this; ज्यौतिषानुरागवशात्-ज्योतिष के अनुराग से-fond of astrology, astronomer; कारितम्-कराया-done; वेधज्योतिष्मधिकृत्य-यंत्र ज्योतिष पर आधारित-instrument lasred on astrology; श्रूयते-सुना जाता है-is listen; रचिवान्-रचा-create; एकम्-एक-one; निर्मितम्-जाता है-goes; अधुना-आज-today; विख्यातमेव-प्रसिद्ध-famous; प्रयत्नेन-प्रयत्न से-for try; जीर्णोद्धार-जीर्णोद्धार-repair; विद्यते-विद्यमान-wish man; यावत-जब तक-till that; लभ्यते-प्राप्त होता है-receives; ग्रहाणां-नक्षत्रों का-planets; ज्ञायते-ज्ञाता होता है-happens; ग्रह नक्षत्राणां-ग्रह नक्षत्रों का-planets.

हिन्दी अर्थ :
मित्र! आंग्ल भाषा में वेध शाला को ‘आब्जर्वेटरी’ कहते हैं। लोग वेधशाला को ‘यंत्र शाला’ भी या ‘यंत्र भवन’ भी कहते हैं। यह ‘यंत्र भवन’ उज्जैन के दक्षिणी भाग में शिप्रा के दक्षिण तट पर स्थित ऊँचे भू-भाग पर स्थापित की गई है। उज्जैन प्राचीन काल से ही ज्योतिष विद्या का केन्द्र रहा है। यहाँ से कर्क रेखा भी गुजरती है इसलिए यह स्थान गणित का भी प्रमुख आधार स्थल रहा है। अठारहवीं शताब्दी में राजा जयसिंह ज्योतिष प्रेम के वशीभूत एक यंत्र भवन का निर्माण कराया गया। ग्रहों के सम्यक् ज्ञान के लिए राजा जयसिंह ने उज्जैन, काशी, दिल्ली और जयपुर नगर में वेधशालाओं का निर्माण करया। ऐसा प्रचलित है कि उन्होंने वेध, ज्योतिष के आधार पर एक उपनगर भी बसाया जो आज भी जयसिंह पुरा के नाम से जाना जाता है।

यह यंत्र भवन जीर्ण हो गया था किन्तु सन् 1961 में पं. सूर्यनारायण व्यास के प्रयत्न से वेधशाला का जीर्णोद्धार का कार्य पूर्ण हुआ। इस वेधशाला में स्थापित यंत्र से सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त वेला तक समय स्पष्ट दिखाई देता है। यहाँ की स्थिति से दिशा सूचक यंत्र द्वारा ग्रह और नक्षत्र आदि की गणना ज्ञात होती है। नाडि वलय यंत्र द्वारा ग्रह-नक्षत्रों के दक्षिणायन होने का विशेष ज्ञान होता है।

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3. “दक्षिणोत्तरभित्तियन्त्रेण” ग्रहनक्षत्राणां मध्याहूनवृत्तागमनसमये नतोन्नतांशयोः परिज्ञानं सञ्ज्ञायते। “पलभायन्त्रेण” छायायामपि समयस्य सम्यक ज्ञानं भवति।

वस्तुतः वेशधालां वीक्ष्य मनसि गौरवमनुभवामि यत् प्राचीनकालेऽपि अस्माकं पूर्वजनां गणितस्य, ग्रहनक्षत्राणाञ्च ज्ञानम् अद्भुतं वैज्ञानिकञ्चासीत्।

इदानीं पत्रं समापयामि। यदा अवसरः लभ्यते तदा एकवारं ज्ञानविज्ञानस्य पुरीयम् उज्जयिनी अवश्यमेव दृष्टव्येति।
शम्।

भवतः कुशलापेक्षी
राजेशः

शब्दार्थ :
मध्याहनवृत्तागमनसमये-दोपहरी के समय-In the time of afternoon; छायायामपि-छाया भी-sadow also; वैज्ञानिकञ्चासीत्-वैज्ञानिक थे-was scientist; इदानीं-इस समय-this time; पुरीयम्-प्राचीन (नगर में)-old, ancient; परिज्ञान-विशेष ज्ञान-special knowledge; ज्ञानविज्ञानस्य-ज्ञान-विज्ञान के-knowledge of science.

हिन्दी अर्थ :
“दक्षिण-उत्तर दीवार के यंत्र के द्वारा ग्रह-नक्षत्रों के दोपहर के आगमन के समय विभिन्न भू-भाग का ज्ञान प्राप्त होता है। पलभ यन्त्र द्वारा छाया से भी सम्यक् ज्ञान प्राप्त होता है।
वस्तुतः वेधशाला को देखकर मैं गौरव की अनुभूति कर रहा हूँ कि प्राचीनकाल में भी हमारे पूर्वजों को गणित और ग्रह-नक्षत्रों का ज्ञान अद्भुत और वैज्ञानिक था।

अब इस समय पत्र समाप्त कर रहा हूँ। जब भी समय मिले, एक बार इस ज्ञान-विज्ञान के नगर उज्जैन को अवश्य देखना।

आपका कुशलापेक्षी
राजेश

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 19 उपायैः सर्वं शक्यम्

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 19 उपायैः सर्वं शक्यम् (कथा)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 19 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) हस्ती कुन निपतितः? (हाथी कहाँ गिर गया?)
उत्तर:
पङ्के। (कीचड़ में)

(ख) प्रथमं कं विन्देत्? (पहले किसकी वंदना करनी चाहिए?)
उत्तर:
राजानम्। (राजा की)

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(ग) हस्तेः नाम किमासीत्? (हाथी का क्या नाम था?)
उत्तर:
कर्पूरतिलकः। (कर्पूर तिलक था।)

(घ) राजा विना किं न युक्तम्? (राजा के बिना क्या उपयुक्त नहीं है?)
उत्तर:
अवस्थातुं।अवस्थातुं। (आवास करना।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) वृद्धशृगालेन किं प्रतिज्ञातम्? (बूढ़े सियार ने क्या प्रतिज्ञा की?)
उत्तर:
वृद्ध शृगालेन प्रतिज्ञातम्-यथा बुद्धिप्रभावस्य हस्ति मरणं साधयितव्यम्। (बूढ़े सियार ने प्रतिज्ञा किया कि-मेरी बुद्धि के प्रभाव से हाथी का मरण संभव है।)

(ख) शृगालेन रिहस्य किमुक्तम्? (शृगाल ने हँसकर क्या बोला?)
उत्तर:
शृगालेन विहस्त उक्तम्-देव! मम पुच्छकावलम्बनं कृत्वा उत्तिष्ठ। (शृगाल हँसकर बोला कि-हे देव! मेरी पूँछ पकड़कर के उठो।)

(ग) केन ना आस्थातुं न युक्तम्? (किसके विना निवास करना उपयुक्त नहीं है:)
उत्तर:
राजा विना अवस्थातुं न युक्तम्। (राजा के बिना निवास करना उपयुक्त नहीं है।)

(घ) शृगालैः कः भक्षितः? (शृगालों ने किसका भोजन किया?)
उत्तर:
शृगालैः हस्ती भक्षितः। (शृंगालों ने हाथी का भोजन किया।)

(ङ) कर्पूतिलकः केन लोभेन धावति? (कर्पूरतिलक किरा लोभ से दौड़ता है?)
उत्तर:
कर्पूरलिलकः राज्यं लोभेन धावति। (कर्पूरतिलक राज्य के लोभ से दौड़ता है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) भुवि कीदृशः स्वामी युज्यते? (पृथ्वी में किस तरह (गुण वाले) राजा की स्थापना की जाती है?)
उत्तर:
भुवि अतिशुद्धः, प्रतापवानः, धार्मिकः, नीति कुशलः कुलाभिजना स स्वामी युज्यते। (पृथ्वी में अतिशुद्ध, कुलीन, प्रतापवान, धार्मिक और नीतिकुशल स्वामी की नियुक्ति की जाती है।)

(ख) पङ्केनिमग्नः हस्ती शृगालेन किमुक्तम्? (कीचड़ में गिरा हुआ हाथी सियार से क्या बोला?)
उत्तर:
पङ्के निमग्नः हस्ती शृगालेन उक्तम्-सखे शृगाल! किमधुना विधेयम्? पड़े निपतितोऽहं म्रिये। परावृत्य पश्य। (कीचड़ में गिरा हुआ हाधी सियार से बोला कि-मित्र सियार! अब क्या होगा? मैं कीचड़ में गिर गया हूँ और मरने वाला हूँ। लौटकर देखो।)

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प्रश्न 4.
उचितैः शब्दैः रिस्त स्थानानि पूरयत-
(पशुभिर्मिलित्वा, त्रिये, प्रथम, लोकेऽस्मिन्, यच्छक्य)
(क) पते निपतितोऽहं म्रिये।
(ख) सर्वैः वनवासिभिः पशुभिर्मिलित्वा भवत्सकाशं प्रस्थापितः
(ग) राजन्यसति लोकेऽस्मिन् कुतो भार्या कुतो धनम्।
(घ) उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः।
(ङ) राजानं प्रथमा विन्देत्।

प्रश्न 5.
उचितमेलनं कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 19 उपायैः सर्वं शक्यम् img-1

प्रश्न 6.
निम्नलिखितशब्दानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
उदारहणं यथा :
शृगालैभक्षितः- शृगालः+भक्षितः। = विसर्गसन्धिः।।
(क) चोक्तम् – च+उक्तं = गुणस्वर संधिः।
(ख) ततस्तेन – ततः+तेन = विसर्गः।
(ग) सर्वैर्वनवासिभिः – सर्वैः+वनवासिभि = विसर्ग सन्धिः।
(घ) तत्रैकेन – तत्र+एकेन = वृद्धिस्वर सन्धिः।
(ङ) ततोऽसौ – ततः+असो = पूर्वरूप सन्धिः
(च) यद्ययम् – यदि +अयम् = यण सन्धिः

प्रश्न 7.
क्रियापदानां धातुं लकारं वचनं पुरुषं च लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 19 उपायैः सर्वं शक्यम् img-2

प्रश्न 8.
अधोलिखितशब्दानां विभक्ति वचनञ्च लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 19 उपायैः सर्वं शक्यम् img-3

प्रश्न 9.
अधोलिखितैः अव्ययैः वाक्यनिर्माणं करुत-
(क) विना – रामेण विना दशरथः न जिवेत्।
(ख) कुतः – भवान् कुतः निवससि!
(ग) इति – अयं वंश नाम्ना गौतम इति ख्यात् आसीत्।
(घ) न – अहं दुग्धं पिवामि चायं न पिवामि।
(ङ) ततः – कर्पूरतिलकोः महापङ्के निमग्नतः।

प्रश्न 10.
अधोलिखितशब्दानां धातुं प्रत्ययञ्च पृथक् कुरुत
(क) भक्षितः -भक्ष् + क्तः।
(ख) कृतः – कृ + क्तः।
(ग) कृत्वा – कृ + क्त्वा।
(घ) प्रणम्य – प्र + नम् + ल्यप्।
(ङ) गत्वा – गम् + क्त्वा।

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उपायैः सर्वं शक्यम् पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

संस्कृत साहित्य में कथा साहित्य का विपुल भंडार है। उसमें पंचतंत्र, कथा सरित् सागर बेताल पंचविंशितिः, विक्रमादित्य कथा; वृहत्कथा मञ्जरी, हितोपदेश इत्यादि प्रसिद्ध कथा ग्रन्थ हैं। उसमें पंचतंत्र की नीति कथाएं पशु-पक्षियों के माध्यम से प्रस्तुत की गई हैं। प्रस्तुत पाठ में कहानी के पात्र हाथी, सियार हैं जो-उपायों के द्वारा सब संभव है-नीति को मनुष्य के लिए सूचित करते हैं।

उपायैः सर्वं शक्यम् पाठ का हिन्दी अर्थ

अस्ति ब्रह्मारण्ये कर्पूरतिलको नाम हस्ती। तमवलोक्य सर्वे शृगालश्चिन्तयन्ति स्म’यद्ययं केनाप्युपायेन म्रियतेतदा अस्माकम् एतद्देहेन मासचतुष्टयस्य भोजनं भविष्यति’। तत्रैकेन वृद्धशृगालेन प्रतिज्ञातम्-‘मया बुद्धिप्रभावादस्य मरणं साधयितव्यम्।’ अनन्तरं स वञ्चकः कर्पूरतिलकसमीपं गत्वा साष्टाङ्गपातं प्रणम्य उवाच-‘देव! दृष्टिप्रसादं कुरु।’ हस्ती ब्रूते-‘कस्त्वम्, कुतः समायातः?’ सोऽवदत्-‘जम्बुकोऽहम्। सर्वैर्वनवासिभिः पशुभिर्मिलित्वा भवत्सकाशं प्रस्थापितः।’ यद्विना राज्ञा अवस्थातुं न युक्तम्, तदात्राटवीराज्येऽभिषेक्तुं भवान् सर्वस्वामिगुणोपेतो निरूपितः।

यतः :
यः कुलाभिजनाचारैरतिशुद्धः प्रतापवान्।
धार्मिको नीतिकुशलः स स्वामी युज्यते भुवि॥

अपरञ्च पश्य :
राजानं प्रथमं विन्देततो भायां ततो धनम्।
राजन्यसति लोकऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनम्॥

शब्दार्थ :
अस्ति-है-is; कर्पूरतिलको-कर्पूरतिलक नाम का -Namely Karpoor Tilak; तमवलोक्य-उसे देखकर-seeing him; सद्ययं-आज मैं-today I; तत्रकेन-इनमें से एक-one among them; साधयितव्यम्-साधना चाहिए-should meditate; वञ्चकः-धूर्त/कपटी-wicked; सोऽवदत्-वह बोला-he spoke; दृष्टिप्रसादं-दृष्टि की कृपा-blessing; नीतिकुशलः-नीति में कुशल-skill in policy, good moral; युज्यते-जोड़ता है-joins कृतः -किया-did; लोकस्मिन-इस संसार में-in this world.

हिन्दी अर्थ :
ब्रह्मारण्य में कर्पूरतिलक नामक हाथी रहता था। उसे देख सभी सियारों ने विचार किया कि यदि यह किसी प्रकार मर जाए तो इसके शरीर की चार महीने की खाद्य सामग्री हो जाएगी। तब एक वृद्ध सियार ने कहा-मैं अपनी बुद्धि चातुर्य से इस हाथी को मार सकता हूँ। तब वह सियारकर्पूर तिलक (हाथी) के पास पहुँच उसे साष्टांग प्रणाम करके बोला-हे भगवान्! मुझ पर दया करो। हाथी बोला-तुम कोन हो? कहाँ से आए हो? तब वह (बूढ़ा) सियार बोला-मैं सियार हूं। वन के सभी पशु-पक्षियों ने मिलकर मुझे आपके पास भेजा है। कारण कि बिना राजा के कहीं पर भी रहना ठीक नहीं है और इस जंगल के राज्य में आपसे अच्छा अभिषेक करने योग्य दूसरा कोई नहीं है। आप में राजा के गुण विद्यमान हैं।

जैसे-इस पृथ्वी पर वही राजा हो सकता है जो कुलीन हो, आचार-विचार से शुद्ध हो, प्रतापी हो, धार्मिक हो साथ ही नीति कुशल भी हो।

और भी-सर्वप्रथम राजा को प्राप्त करना चाहिए, उसके बाद पत्नी और धन को प्राप्त करना चाहिए। यदि राजा ही प्राप्त नहीं हुआ तो कहाँ पत्नी और कहाँ धन प्राप्त हो सकता है।

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2. तद्यथा लग्नवेला न विचलति तथा कृत्वा सत्वरमागम्यतां देवेन। इत्युक्त्वोत्थाय चलितः। ततोऽसौ राज्यलोभाकृष्टः कर्पूरतिलकः शृगालवर्त्मना धावन्महापङ्के निमग्नः। ततस्तेन हस्तिनोक्तम्-‘सखे शृगाल! किाधुना विधेयम्? पङ्के निपतितोऽहं म्रिये। परावृत्य पश्य।’ शृगालेन विहस्योक्तम्-‘देव! मम पुच्छकावलम्बनं कृत्वा उत्तिष्ठ। यन्मद्विधस्य वचसि त्वया प्रत्ययः कृतस्तदनुभूयताम् अशरणं दुःखम्।’

तथा चोक्तम् :
यदाऽसत्सङ्गरहितो भविष्यसि भविष्यसि।
यदाऽसज्जनगोष्ठीषु पतिष्यसि पतिष्यसि॥

ततो महापङ्के हस्ती शृगालैर्भक्षितः। अतोऽहम् ब्रवीसि-
उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः।
शृगालेन हतो हस्ती गच्छता पङ्कवर्मना॥

शब्दार्थ :
प्रणम्य-प्रणाम करके-saluting; प्रतिज्ञातम्-प्रतिज्ञा की-promised; वञ्चकः-धृत/कपटी-wicked person; प्रस्थापित-भेजा गया-send; अटवी-जङ्गल-forest, jungal; युज्यते-उचित होता है।-Satisfied; भुवि-पृथ्वी पर-on earth; विन्देत्-प्राप्त करें-receive; महापङ्के-दलदल में-in mud; निपतितः-गिरा हुआ-fallen; परावृत्य-लौटकर-returning; विहस्य-हँसकर-laughing.

हिन्दी अर्थ :
इसलिए अभिषेक का शुभ मुहूर्त न निकल जाए, ऐसा विचार कर शीघ्रता से आप मेरे साथ चलें। ऐसा कह वह जल्दी से उठा और चल दिया। यह सुन राज्य के लोभ से आकर्षित हो कर्पूरतिलक सियार के पीछे-पीछे चला और दौड़ते हुए भयंकर कीचड़ के दल-दल में फँसकर डूबने लगा, तब उसने सियार से कहा-मित्र सियार! अब क्या करना चाहिए! मैं कीचड़ में फँस मरने वाला हूँ, लौट कर देखो। सियार ने हँसते हुए कहा-हे देव! मेरी पूँछ का सहारा लेकर तुम बाहर आ जाओ। मुझ जैसे के वचन पर तुमने भरोसा किया तो उसका परिणाम दुख ही है। उसे भोगो।

वैसे कहा भी है-जब कोई सत्संगै से रहित हाकर दुर्जनों की संगति में जाएगा। तो उसका पतन ही होगा, उसफा पतन ही होगा।

तब दलदल में फँसे हाथी को सियारों ने खा लिया। इसलिए मैं कहता हूँ-उपाय से जो सम्भव है, वह पराक्रम से नहीं हो सकता। जैसे कि शृगाल द्वारा दलदल भाग पर ले जाने के कारण हाथी मारा गया।

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MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Additional Questions

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Additional Questions

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 अतिरिक्त परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दर्शाइए कि बिन्दु A(1, 2), B(-1,-16) और C(0, – 7) रैखिक समीकरण y = 9x – 7 के आलेख पर स्थित है। (2019)
हल:
बिन्दु A(1, 2) के निर्देशांकों का मान समीकरण में रखने पर,
∴ 9x – 7 = 9 x 1 – 7 = 9 – 7 = 2 = y.
⇒ दायाँ पक्ष = बायाँ पक्ष
बिन्दु B(-1, – 16) के निर्देशांकों का मान समीकरण में रखने पर,
∴ 9x – 7 = 9x (-1) – 7 = – 9 – 7 = – 16 = y
⇒ दायाँ पक्ष = बायाँ पक्ष
बिन्दु C(0, – 7) के निर्देशांकों का मान समीकरण में रखने पर,
∴ 9x – 7 = 9 (0) – 7 = 0 – 7 = – 7 =y
⇒ दायाँ पक्ष = बायाँ पक्ष अतः दिए हुए बिन्दु A, B एवं C समीकरण y = 9x – 7 के आलेख पर स्थित हैं।

प्रश्न 2.
रैखिक समीकरण 3x + 4y = 6 का आलेख खींचिए। यह आलेख X-अक्ष और Y-अक्ष को किन बिन्दुओं पर काटता हैं? (2019)
हल:
समीकरण 3x + 4y = 6 (दिया है)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 4
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 4a
अतः संलग्न चित्र 4.18 अभीष्ट आलेख है तथा यह आलेख -अक्ष को बिन्दु (2, 0) पर एवं Y-अक्ष को बिन्दु (0, 1\(\frac { 1 }{ 2 }\)) पर काटता है।
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प्रश्न 3.
वह रैखिक समीकरण जो फॉरेनहाइट (F) को सेल्सियस (C) में बदलती है, सम्बन्ध c = \(\frac { 5F – 160 }{ 9 }\) से दी जाती है।
(i) यदि तापमान 86°F है, तो सेल्सियस में तापमान क्या है ?
(ii) यदि तापमान 35°C है, तो फॉरेनहाइट में तापमान क्या है ?
(iii) यदि तापमान 0°C है तो फॉरेनहाइट में तापमान क्या है तथा यदि तापमान 0°F है, तो सेल्सियस में तापमान क्या है ?
(iv) तापमान का वह कौन-सा संख्यात्मक मान है जो दोनों पैमानों (मात्रको) में एक ही है ?
हल:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 5

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उस सरल रेखा से निरूपित समीकरण का आलेख खींचिए जो X-अक्ष के समानान्तर है और उसके नीचे 3 मात्रक की दूरी पर है।
उत्तर:
अभीष्ट चित्र संलग्न है।
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 6

प्रश्न 2.
उस रैखिक समीकरण का आलेख खींचिए जिसके हल उन बिन्दुओं से निरूपित हैं जिनके निर्देशांकों का योग 10 इकाई है।
हल:
प्रश्नानुसार, अभीष्ट समीकरण होगा : x + y = 10
यदि x = 0 तो 0 + y = 10 ⇒ y = 10
यदि x = 5 तो 5 + y = 10 ⇒ y = 10 – 5 = 5
यदि x = 10 तो 10 + y = 10 ⇒ y = 10 – 10 = 0
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 7
अतः उपर्युक्त चित्र अभीष्ट आलेख है।

प्रश्न 3.
समीकरण y = 2x + 1 का आलेख खींचिए। (2019)
हल:
निर्देशः उपर्युक्त प्रश्न के समीकरण की तरह हल कीजिए।

प्रश्न 4.
रैखिक समीकरण x + 2y = 8 का वह हल ज्ञात कीजिए जो निम्नलिखित पर एक बिन्दु निरूपित करता है:
(i) X-अक्ष
(ii) Y-अक्ष।
हल:
(i) चूँकि X-अक्ष पर बिन्दु की कोटि y = 0. इसलिए x + 2 x 0 = 8 ⇒ x + 0 = 8
⇒ x = 8
अतः समीकरण का अभीष्ट हल : x = 8, y = 0.

(ii) चूँकि Y-अक्ष पर बिन्दु की भुंज x = 0. इसलिए
0 + 2y = 8 ⇒ 2y = 8 ⇒ y = 8/2 = 4
अतः समीकरण का अभीष्ट हल : x = 0, y = 4.

प्रश्न 5.
मान लीजिए.y, x के अनुक्रमानुपाती है। यदि x = 4 होने पर y = 12 हो, तो एक रैखिक समीकरण लिखिए। जब x = 6, तोy का क्या मान है ?
हल:
चूँकि y α x
⇒ y = Cx
जब x = 4 होने पर y = 12 हो, तो
12 = C x 4
⇒ C = 12/4 = 3 C का मान समीकरण y = Cx में रखने पर,
y = 3x अतः अभीष्ट समीकरण : y = 3x.
अब x = 6 का मान समीकरण y = 3x में रखने पर,
y = 3 x 6 = 18
अतः एका अभीष्ट मान = 18.
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MP Board Class 9th Maths Chapter 4 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य लिखिए। अपने उत्तरों का औचित्य दीजिए।
(i) बिन्दु (0, 3) रैखिक समीकरण 3x + 4y = 12 के आलेख पर स्थित है।
(ii) रैखिक समीकरण x + 2y = 7 के आलेख बिन्दु (0, 7) से होकर जाता है।
(iii) सारणी :
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 8
से प्राप्त बिन्दुओं के निर्देशांक समीकरण x – y + 2 = 0 के कुछ हलों को निरूपित करते हैं।
(iv)दो चरों वाली रैखिक समीकरण के आलेख का प्रत्येक बिन्दु उस समीकरण का एक हल निरूपित नहीं करता है।
(v) दो चरों वाली रैखिक समीकरण के आलेख का एक सरल रेखा में होना आवश्यक नहीं है।
उत्तर:
(i) कथन सत्य है, क्योंकि बिन्दु के निर्देशांक समीकरण को सन्तुष्ट करते हैं।
(ii) कथन असत्य है, क्योंकि बिन्दु के निर्देशांक समीकरण को सन्तुष्ट नहीं करते हैं।
(iii) कथन सत्य है, क्योंकि बिन्दु (3, -5) के निर्देशांक समीकरण को सन्तुष्ट नहीं करते हैं।
(iv) कथन असत्य है, क्योंकि दो चरों वाली रैखिक समीकरण का प्रत्येक बिन्दु उस समीकरण का एक हल निरूपित करता है।
(v) कथन असत्य है, क्योंकि दो चरों वाली रैखिक समीकरण का आलेख सदैव एक सरल रेखा होती है।

प्रश्न 2.
वह रैखिक समीकरण लिखिए जिसकी कोटि उसके भुज से तीन गुनी है। (2019)
उत्तर:
y = 3x.

MP Board Class 9th Maths Chapter 4 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रैखिक समीकरण 2x – 5y = 7 :
(a) का एक अद्वितीय हल है
(b) के दो हल हैं
(c) के अपरिमित रूप से अनेक हल हैं
(d) का कोई हल नहीं है।
उत्तर:
(c) के अपरिमित रूप से अनेक हल हैं

प्रश्न 2.
यदि (2,0) रैखिक समीकरण 2x + 3y = k का हल है, तो k का मान है :
(a) 4
(b) 6
(c) 5
(d) 2.
उत्तर:
(a) 4

प्रश्न 3.
रैखिक समीकरण 2x + 3y = 6 का आलेख -अक्ष को निम्नलिखित में से किस बिन्दु पर काटता
(a) (2, 0)
(b) (0, 3)
(c) (3, 0)
(d) (0, 2).
उत्तर:
(d) (0, 2).

प्रश्न 4.
X-अक्ष पर स्थित किसी बिन्दु का रूप होता है :
(a) (x, y)
(b) (0, y)
(c) (x, 0)
d) (x, 4).
उत्तर:
(c) (x, 0)
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प्रश्न 5.
रेखा y = x पर स्थित किसी बिन्दु का रूप होता है :
(a) (a, a)
(b) (0, a)
(c) (a, 0)
(d) (a, – a).
उत्तर:
(a) (a, a)

प्रश्न 6.
X-अक्ष की समीकरण का रूप है :
(a) x = 0
(b) y = 0
(c) x + y = 0
(d) x = y
उत्तर:
(b) y = 0

प्रश्न 7.
दो चरों वाला रैखिक समीकरण है : (2019)
(a) ax2 + bx + c = 0
(b) ax + b = 0
(c) ax3 + bx2 + c = 0
(d) ax + by + c = 0.
उत्तर:
(d) ax + by + c = 0.

प्रश्न 8.
x = 5, y = 2 निम्नलिखित रैखिक समीकरण का हल है:
(a) x + 2y = 7
(b) 5x + 2y = 7
(c) x + y = 7
(d) 5x + y = 7.
उत्तर:
(c) x + y = 7

प्रश्न 9.
रैखिक समीकरण 2x + 3y = 6 का आलेख एक रेखा है जो X-अक्ष को निम्नलिखित बिन्दु पर मिलती है:
(a) (0, 2)
(b) (2, 0)
(c) (3, 0)
(d) (0, 3).
उत्तर:
(c) (3, 0)
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प्रश्न 10.
(a, a) रूप का बिन्दु सदैव स्थित होता है :
(a) X-अक्ष पर
(b) Y-अक्ष पर
(c) रेखा y = x पर
(d) रेखा x + y = 0 पर।
उत्तर:
(c) रेखा y = x पर

प्रश्न 11.
(a,-a) रूप का बिन्दु सदैव रेखा पर स्थित होता है :
(a) x = a
(b) y = -a.
(c)y = x
(d) x + y = 0.
उत्तर:
(d) x + y = 0.

प्रश्न 12.
दो संख्याओं का योग 25 व अन्तर 5 है, तो वे संख्याएँ होंगी : (2018)
(a) 15, 10
(b) 20, 5
(c) 13, 12
(d) 30, 5
उत्तर:
(a) 15, 10

रिक्त स्थानों की पूर्ति
1. एक ऐसा समीकरण जिसका आलेख एक सरल रेखा होता है, …… समीकरण कहलाता है।
2. रैखिक समीकरण ax + by + c = 0 का आलेख एक ……..रेखा है।
3. x और y का मान युग्म (x, y) जो दिए हुए समीकरण ax + by + c = 0 को सन्तुष्ट करता है, उक्त समीकरण का ………. कहलाता है।
4. जब किसी समीकरण निकाय का कोई भी हल नहीं होता, तब निकाय ……….. निकाय कहलाता है।
5. जब किसी समीकरण निकाय का कोई हल होता है, तब निकाय …………. निकाय कहलाता है।
6. दो चरों वाले एक घात समीकरण का ग्राफ ………… को प्रदर्शित करता है। (2018)
7. यदि एक समीकरण x + 2y = 5 में x = 1 है, तब y का मान ……….. है। (2019)
उत्तर:
1. रैखिक,
2. सरल,
3. हल,
4. असंगत,
5. संगत,
6. सरल रेखा,
7. 2 (दो)।

जोड़ी मिलान
स्तम्भ ‘A’                                      स्तम्भ ‘B’
1. रेखाएँ सम्पाती हों                  (a) y का मान शून्य
2. रेखाएँ प्रतिच्छेदी हों               (b) x का मान शून्य
3. रेखाएँ समानान्तर हों             (c) अनन्ततः अनेक हल
4. रेखा X-अक्ष को काटे            (d) अद्वितीय हल
5. रेखा Y-अक्ष को काटे             (e) कोई हल नहीं
उत्तर:
1. → (c),
2. → (d),
3. → e),
4. → (a),
5. → (b)
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सत्य/असत्य कथन
1. समीकरण x + 2y = 5 में यदि x = 1 तो y = 2 होगा।
2. रैखिक समीकरण का आलेख एक वृत्त होता है।
3. दो चरों वाले एकघातीय समीकरण रैखिक समीकरण कहलाते हैं।
4. X-अक्ष का समीकरण x = 0 होता है। (2019)
5. Y-अक्ष, के समानान्तर रेखा का समीकरण x = + a होता है।
6. समीकरण x +2y = 3 का एक हल (1, 1) है। (2019)
7. बिन्दु (0, 5) समीकरण y = 5x + 5 का हल है। (2019)
8. मूल-बिन्दु से गुजरने वाली रेखा का आलेख y = kx रूप द्वारा प्रदर्शित होता है। (2019)
9. रैखिक समीकरण 2x -3y = 0 में चर 2 एवं – 3 है। (2019)
उत्तर:
1. सत्य,
2. असत्य,
3. सत्य,
4. असत्य,
5. सत्य,
6. सत्य,
7. सत्य,
8. सत्य,
9. असत्य।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. जब किसी समीकरण निकाय के अनन्ततः अनेक हल हों तो उसका आलेख कैसा होगा?
2. जब किसी समीकरण निकाय का अद्वितीय हल हो, तो उसका आलेख कैसा होगा?
3. जब किसी समीकरण निकाय का कोई हल न हो, तो उसका आलेख कैसा होगा?
4. यदि \(\frac { { a }_{ 1 } }{ { a }_{ 2 } } \neq \frac { { b }_{ 1 } }{ { b }_{ 2 } }\), तो निकाय का हल क्या होगा?
5. यदि \(\frac { { a }_{ 1 } }{ { a }_{ 2 } } =\frac { { b }_{ 1 } }{ { b }_{ 2 } }\neq \frac { { c }_{ 1 } }{ { c }_{ 2 } }\) तो निकाय का हल क्या होगा?
6. यदि \(\frac { { a }_{ 1 } }{ { a }_{ 2 } } =\frac { { b }_{ 1 } }{ { b }_{ 2 } }= \frac { { c }_{ 1 } }{ { c }_{ 2 } }\), तो निकाय का हल क्या होगा?
7. रैखिक समीकरण में चर राशि की उच्चतम घात होती है। (2018)
8. दो.चरों वाला एक रैखिक समीकरण लिखिए। (2019)
9. यदि x = 2, y = 1 समीकरण 2x + 3y =k का हल है, तब k का मान क्या होगा? (2019)
उत्तर:
1. सम्पाती रेखाएँ,
2. प्रतिच्छेदी रेखाएँ,
3. समानान्तर रेखाएँ,
4. अद्वितीय हल,
5. कोई हल नहीं,
6. अनन्ततः अनेक हल,
7. एक,
8. ax + by + c = 0,
9. 7 (सात)।

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MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 14 नागरिकों के संवैधानिक अधिकार एवं कर्त्तव्य

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 14 नागरिकों के संवैधानिक अधिकार एवं कर्त्तव्य

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 पाठान्त अभ्यास

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
44वें संशोधन के द्वारा किस मौलिक अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से हटा दिया गया है?
(i) सम्पत्ति का अधिकार
(ii) स्वतन्त्रता का अधिकार
(iii) समानता का अधिकार,
(iv) संस्कृति एवं शिक्षा का अधिकार।
उत्तर:
(i) सम्पत्ति का अधिकार

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प्रश्न 2.
इनमें से कौन-सा कार्य बाल श्रम की श्रेणी में आता है?
(i) 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से होटलों में, निर्माण कार्य में या खदानों में कार्य कराना
(ii) 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों का घूमना और शिक्षा प्राप्त करना
(iii) 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के खेल के कार्य
(iv) 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों का शारीरिक व्यायाम करना।
उत्तर:
(i) 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से होटलों में, निर्माण कार्य में या खदानों में कार्य कराना

प्रश्न 3.
इनमें से कौन-सा अधिकार स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार से सम्बन्धित नहीं है?
(i) भाषण की स्वतन्त्रता
(ii) उपाधियों का अन्त
(iii) निवास की स्वतन्त्रता
(iv) भ्रमण की स्वतन्त्रता।
उत्तर:
(ii) उपाधियों का अन्त

प्रश्न 4.
किस लेख द्वारा उच्चतम या उच्च न्यायालय किसी भी अभिलेख को अपने अधीनस्थ न्यायालय से अपने पास मँगा सकता है?
(i) बन्दी प्रत्यक्षीकरण
(ii) उत्प्रेषण
(iii) अधिकार पृच्छा
(iv) परमादेश।
उत्तर:
(ii) उत्प्रेषण

प्रश्न 5.
6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार किस मौलिक अधिकार के अन्तर्गत आता है?
(i) समानता का अधिकर
(ii) संस्कृति व शिक्षा का अधिकार
(iii) स्वतन्त्रता का अधिकार
(iv) संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
उत्तर:
(ii) संस्कृति व शिक्षा का अधिकार

प्रश्न 6.
मौलिक अधिकारों का संरक्षण निम्नलिखित में से कौन करता है? (2009)
(i) संसद
(ii) विधान सभाएँ
(iii) सर्वोच्च न्यायालय
(iv) भारत सरकार।
उत्तर:
(iii) सर्वोच्च न्यायालय

प्रश्न 7.
सूचना समय पर न मिलने पर सबसे पहले अपील की जाती है
(i) विभाग प्रमुख
(ii) लोक सूचना अधिकारी
(iii) सूचना आयोग
(iv) मुख्यमंत्री।
उत्तर:
(iii) सूचना आयोग

प्रश्न 8.
राज्य के नीति निदेशक तत्व निम्न में से क्या हैं?
(i) कानून द्वारा बन्धनकारी है
(ii) न्याय योग्य हैं
(iii) राज्य के लिए रचनात्मक निर्देश है
(iv) न्यायपालिका के आदेश हैं।
उत्तर:
(iii) राज्य के लिए रचनात्मक निर्देश है

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रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. मौलिक अधिकारों के पीछे …………. की शक्ति होती है।
  2. सूचना का अधिकार बढ़ते ………… को रोकने का सशक्त अस्त्र है। (2017)
  3. संविधान के अनुच्छेद …….. के द्वारा प्रत्येक नागरिक को विधि के समक्ष समानता और संरक्षण प्राप्त है।
  4. संविधान में अस्पृश्यता …………. अपराध है।
  5. संविधान के 44वें संविधान द्वारा …………. के मौलिक अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया मया है।

उत्तर:

  1. कानून
  2. भ्रष्टाचार
  3. 14
  4. दण्डनीय
  5. सम्पत्ति के अधिकार।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कानून के समक्ष समानता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता और संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। संविधान की दृष्टि में कानून सर्वोपरि है। कानून से ऊपर कोई व्यक्ति नहीं है। एक-सा अपराध करने वाले समान दण्ड के भागीदार होंगे।

प्रश्न 2.
मौलिक अधिकार के प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हमें संविधान द्वारा 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं –

  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार
  5. संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों के अधिकार।

प्रश्न 3.
संवैधानिक में अस्पृश्यता का अन्त करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 17 द्वारा नागरिकों में सामाजिक समानता लाने के लिए अस्पृश्यता के आचरण का निषेध किया गया है। नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 द्वारा राज्य अथवा नागरिकों द्वारा अस्पृश्यता का व्यवहार अपराध माना जाएगा, जिसके लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी है।

प्रश्न 4.
सूचना का अधिकार किसे प्राप्त है?
उत्तर:
देश के प्रत्येक नागरिक को सूचना का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 5.
सूचना के अधिकार किन सिद्धान्तों पर आधारित हैं?
उत्तर:
यह प्रमुख रूप से तीन सिद्धान्तों पर आधारित हैं-

  1. जवाबदेही का सिद्धान्त.
  2. सहभागिता का सिद्धान्त तथा
  3. पारदर्शिता का सिद्धान्त।

प्रश्न 6.
नीति निदेशक तत्व किसके लिए निर्देश हैं?
उत्तर:
नीति निदेशक तत्व संविधान निर्माताओं द्वारा केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकारों की नीतियों के निर्धारण के लिए दिये गये दिशा निर्देश हैं।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य के नीति निदेशक तत्व और मौलिक अधिकारों में क्या अन्तर है? स्पष्ट कीजिए। (2008, 09, 10, 18)
उत्तर:
नीति निदेशक तत्व और मौलिक अधिकारों में अन्तर-नीति निदेशक तत्व और मौलिक अधिकारों में महत्त्वपूर्ण अन्तर निम्नलिखित हैं –

  1. मूल अधिकारों को न्यायालय का संरक्षण प्राप्त है। इसके विपरीत राज्य के नीति-निदेशक तत्वों को न्यायालय का संरक्षण प्राप्त नहीं है।
  2. “मौलिक अधिकार राज्य के लिए कुछ निषेध आज्ञाएँ हैं। इनके द्वारा राज्य को यह आदेश दिया जाता है कि राज्य को क्या नहीं करना चाहिए? इसके विपरीत नीति के निदेशक सिद्धान्तों के द्वारा राज्य को ये निर्देश दिये जाते हैं कि उसे क्या करना चाहिए।”
  3. मौलिक अधिकार नागरिकों की वैधानिक माँग है, किन्तु नीति निदेशक सिद्धान्त नागरिकों की वैधानिक माँग नहीं है।
  4.  नीति-निदेशक सिद्धान्त एक प्रकार के आश्वासन है, जिनका पालन करने में सरकार किसी भी स्थिति में असमर्थ हो सकती है। इसके विपरीत मौलिक अधिकारों की उपेक्षा कोई भी सरकार नहीं कर सकती।
  5. मौलिक अधिकारों को कुछ परिस्थितियों में मर्यादित, सीमित, निलम्बित या स्थगित किया जा सकता है, परन्तु नीति-निदेशक तत्वों के साथ ऐसी बात नहीं है।
  6. 1976 तक नीति-निदेशक तत्वों की स्थिति मूल अधिकारों से गौण थी, लेकिन 42वें संविधान के संशोधन द्वारा यह स्थिति बदल गयी है। अब नीति-निदेशक तत्वों को मूल अधिकारों से उच्च स्थान प्राप्त है। इस संशोधन में यह व्यवस्था है कि यदि संसद के किसी कानून से नीति-निदेशक तत्व का पालन होता है, लेकिन उससे मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है तो कानून को न्यायालय अवैध घोषित नहीं कर सकता है।
  7. मौलिक अधिकारों का विषय व्यक्ति (Individual) है, जबकि नीति-निदेशक तत्वों का विषय राज्य (State) है।

प्रश्न 2.
मौलिक अधिकारों को न्यायिक संरक्षण किस प्रकार प्राप्त है? समझाइए।
अथवा
संवैधानिक उपचारों के अधिकार से आपका क्या तात्पर्य है? (2010)
उत्तर:
संवैधानिक उपचारों का अधिकार-संविधान द्वारा नागरिकों को जो मूल अधिकार प्रदान किये गये हैं, उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। यदि केन्द्र सरकार, राज्य सरकार या किसी अन्य द्वारा नागरिकों के उपर्युक्त मूल अधिकारों में बाधा पहुँचाई जाती है तो नागरिक उच्च या उच्चतम न्यायालय से अपने अधिकारों की सुरक्षा की माँग कर सकते हैं। मूल अधिकारों की रक्षा के लिए ये न्यायालय निम्न प्रकार के आदेश जारी करते हैं –

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण आदेश
  2. परमादेश
  3. प्रतिशोध लेख
  4. उत्प्रेषण लेख
  5. अधिकार पृच्छा।

आपातकाल में नागरिकों के कुछ अधिकारों तथा संवैधानिक उपचारों के अधिकार को निलम्बित किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
“मौलिक अधिकार और मौलिक कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।” उक्त कथन को समझाइए।
उत्तर:
मौलिक अधिकार और मौलिक कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हम अधिकारों की प्राप्ति कर्तव्यों की पूर्ति के बिना नहीं कर सकते हैं। यदि नागरिक अपने मौलिक कर्त्तव्यों को पूरा करेंगे तो उन्हें अपने मौलिक अधिकारों की प्राप्ति सरलता से हो जाएगी। अगर देश के नागरिक मौलिक कर्त्तव्यों का पालन नहीं करते हैं तो देश में अव्यवस्था होगी और अशान्ति का वातावरण उत्पन्न होगा। मौलिक कर्त्तव्यों की पूर्ति स्वस्थ सामाजिक वातावरण का निर्माण करती है। हमारे देश के संविधान में मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्यों के मध्य कोई कानूनी सम्बन्ध निश्चित नहीं किया गया है। इनकी अवहेलना करने पर किसी भी प्रकार के दण्ड की व्यवस्था नहीं की गयी है। परन्तु हमारा राष्ट्र के प्रति यह दायित्व बनता है कि हम उचित प्रकार से इन कर्त्तव्यों का पालन करें। मौलिक कर्त्तव्य देश की सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय सम्पत्ति, व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रगति, देश की सुरक्षा व्यवस्था आदि को सुदृढ़ बनाने, पर्यावरण संरक्षित रखने, राष्ट्रीय आदर्शों का आदर करने की प्रेरणाएँ हैं।

प्रश्न 4.
किस प्रकार की सूचना देने के लिए सरकार बाध्य नहीं है? कोई चार छूट बताइए।
उत्तर:
कुछ सूचनाएँ या जानिकारियाँ ऐसी भी होती हैं, जो आम जनता तक नहीं पहुँचाई जा सकती हैं। उनके स्पष्ट किये जाने से देश की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और आर्थिक तथा वैज्ञानिक हित को हानि पहुँचती है। अतः कुछ सूचनाओं को न देने की छूट दी गई है। निम्नलिखित सूचना देने के लिए सरकार बाध्य नहीं है –

  1. जिस सूचना में भारत की संप्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित और विदेश से सम्बन्ध की अवमानना होती हो।
  2. जिसको प्रकट करने के लिए किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकरण द्वारा मना किया गया है, जिससे न्यायालय की अवमानना होती हो।
  3. सूचना, जिसके प्रकट करने से किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को भय हो।
  4. मन्त्रिमंडल के कागज-पत्र इसमें सम्मिलित हैं-मंत्रिपरिषद् सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार-विमर्श के अभिलेख।

प्रश्न 5.
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा देने हेतु नीति निदेशक तत्वों में क्या निर्देश हैं? लिखिए।
उत्तर:
भारत के संविधान में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करके सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान करना, नीति निदेशक तत्वों का प्रमुख कार्य है। नीति निदेशक तत्व भारत में सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति को साकार करने का सपना है। अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा देने के लिए नीति निदेशक तत्वों में निम्नलिखित निर्देश दिये गये हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा बनाये रखने का प्रयास करना।
  2. राज्यों के मध्य न्याय संगत एवं सम्मानपूर्वक सम्बन्धों की स्थापना करने का प्रयास करना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय कानून एवं संधियों का आदर करना।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को मध्यस्थता द्वारा शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने का प्रयास करना।

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प्रश्न 6.
स्वतन्त्रता के अधिकार से हमें कौन-कौन सी स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हुई हैं? (2009)
अथवा
स्वतन्त्रता के अधिकारों के अन्तर्गत नागरिकों को कौन-सी स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हैं? (2012, 15, 17)
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद-10 द्वारा नागरिकों को स्वतन्त्रता का अधिकार दिया गया है। इससे उन्हें विचारों की अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। यह उसके शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इनके अभाव में व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कर सकता है। स्वतन्त्रता के अधिकार में हमें निम्नलिखित स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हैं –

  1. भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता।
  2. अस्त्र-शस्त्र के बिना शान्तिपूर्ण ढंग से एकत्रित होने की स्वतन्त्रता।
  3. समुदाय या संघ बनाने की स्वतन्त्रता।
  4. पूरे भारत में कहीं भी भ्रमण करने की स्वतन्त्रता।
  5. भारत के किसी भी कोने में निवास करने की स्वतन्त्रता।
  6. अपनी इच्छा के अनुकूल रोजगार या व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकारों से आशय व उसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। (2008, 09, 14, 16)
उत्तर:
मौलिक अधिकार का अर्थ-मौलिक अधिकार वे अधिकार हैं, जिन्हें देश के सर्वोच्च कानून में स्थान दिया गया है तथा जिनकी पवित्रता तथा उलंघनीयता को विधायिका तथा कार्यपालिका स्वीकार करते हैं, अर्थात् जिसका उल्लंघन कार्यपालिका तथा विधायिका भी नहीं कर सकती। यदि वे कोई ऐसा कार्य करें, जिनसे संविधान का उल्लंघन होता है तो न्यायपालिका उनके ऐसे कार्यों को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। –

मौलिक अधिकारों का महत्त्व
(1) व्यक्ति के विकास में सहायक :
मौलिक अधिकार उन परिस्थितियों को उपलब्ध कराते हैं, जिनके आधार पर व्यक्ति अपनी मानसिक, शारीरिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में उन्नति कर सकता है। मूल अधिकार व्यक्ति को उन क्षेत्रों में सुरक्षा और स्वतन्त्रता भी प्रदान करते हैं। इस प्रकार मौलिक अधिकार नागरिकों के व्यक्तित्व के विकास में सहायक हैं। :

(2) प्रजातन्त्र की सफलता के आधार :
हमारे देश में प्रजातन्त्रीय शासन-प्रणाली को अपनाया गया है। ‘स्वतन्त्रता’ और ‘समानता’ प्रजातन्त्र के मूल आधार हैं। बिना इसके प्रजातन्त्र की सफलता की आशा नहीं की जा सकती। भारतीय संविधान में ‘स्वतन्त्रता’ और ‘समानता’ दोनों को अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक नागरिक को शासन की आलोचना करने का अधिकार है। निर्वाचन में खड़े होने, प्रचार करने, मत देने आदि के सभी को समान अधिकार हैं। इस प्रकार मूल अधिकार सफल लोकतन्त्र के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं।

(3) एक दल की तानाशाही पर रोक :
प्रजातन्त्र में ‘बहुमत की तानाशाही’ का सदैव भय बना रहता है। अतः मूल अधिकार अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करते हैं। इस प्रकार मौलिक अधिकार किसी एक दल की तानाशाही पर अंकुश लगाने में सहायक हैं।

(4) न्यायप्रालिका की सर्वोच्चता :
मौलिक अधिकारों को न्यायपालिका का संरक्षण प्राप्त है इसलिए कार्यपालिका और व्यवस्थापिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।

(5) देश की सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप :
मौलिक अधिकार हमारे देश की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक आदि परिस्थितियों के अनुरूप हैं। इसलिए जीविकोपार्जन का अधिकार, शिक्षा पाने का अधिकार आदि उनमें सम्मिलित किये गये हैं।

(6) अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग के उत्थान में सहायक :
मौलिक अधिकार अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग के हितों की रक्षा करते हैं।

(7) व्यक्ति और राज्य के मध्य सामंजस्य :
श्री एम. बी. पायली के अनुसार, “मूल अधिकार एक ही समय पर शासकीय शक्ति से व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं एवं शासकीय शक्ति द्वारा व्यक्ति स्वातन्त्र्य को सीमित करते हैं। इस प्रकार मौलिक अधिकार व्यक्ति और राज्य के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता के अधिकारों के अन्तर्गत नागरिकों को कौन-सी स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हैं? (2009, 13)
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद-10 द्वारा नागरिकों को स्वतन्त्रता का अधिकार दिया गया है। इस अधिकार के अन्तर्गत नागरिकों को निम्नलिखित स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हैं –
(1) विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता :
भारत में प्रत्येक नागरिक को अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने तथा भाषण देने की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। परन्तु साथ ही इस अधिकार पर कुछ प्रतिबन्ध भी लगाये गये हैं, ताकि कोई नागरिक उनका दुरुपयोग न कर सके।

(2) अस्त्र-शस्त्र रहित शान्तिपूर्ण ढंग से सभा तथा सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता :
प्रत्येक भारतीय नागरिक को बिना अस्त्र-शस्त्र के शान्तिपूर्ण ढंग से सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता है। परन्तु देश की एकता और उसकी प्रभुता के हित में राज्य इन पर प्रतिबन्ध भी लगा सकता है।

(3) समुदाय और संघ निर्माण की स्वतन्त्रता :
भारतीय नागरिकों को अपनी सांस्कृतिक व बौद्धिक . आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संस्थाएँ तथा संघ निर्माण करने का अधिकार है।

(4) भ्रमण की स्वतन्त्रता :
भारत के सभी नागरिक बिना किसी प्रतिबन्ध या अधिकार-पत्र के भारत की सीमाओं के अन्दर कहीं भी भ्रमण कर सकते हैं।

(5) व्यवसाय की स्वतन्त्रता :
संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी इच्छानुसार व्यवसाय चुनने तथा उसे करने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। परन्तु वृत्ति, उपजीविका व्यापार करने की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। कारण यह है कि राज्य को स्वयं या किसी निगम के द्वारा किसी व्यापार, उद्योग या सेवा का स्वामित्व ग्रहण करने का पूरा अधिकार है। इन उद्योगों से सरकार जनता को पृथक् रख सकती है। इसके अतिरिक्त किसी व्यवसाय को ग्रहण करने के लिए व्यावसायिक योग्यता की भी शर्त लगा सकती है, जैसे-वकालत पेशा ग्रहण करने के लिए एल. एल. बी. की परीक्षा एवं प्रशिक्षण होना अनिवार्य है।

(6) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता :
बिना कारण बताये गिरफ्तारी एवं नजरबन्दी के विरुद्ध व्यवस्था के अन्तर्गत यदि किसी भी व्यक्ति को बन्दी बनाया जाता है तो उसे मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना चौबीस घण्टे से अधिक समय तक बन्दी बनाकर नहीं रखा जा सकता है। साथ ही अभियुक्त को वकील आदि से परामर्श करने एवं पैरवी आदि कराने की भी पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त है। जिन लोगों को नजरबन्द किया जाता है उन्हें भी साधारण अवस्था में तीन महीने से अधिक समय के लिए नजरबन्द नहीं किया जा सकता है। परन्तु ‘नजरबन्दी परामर्शदात्री समिति’ जब अधिक समय के लिए नजरबन्दी की सलाह देती है तो यह अवधि बढ़ाई जा सकती है। फिर भी संसद को अधिकार रहता है कि वह निर्णय ले कि किसी व्यक्ति को अधिक से अधिक कितने समय तक नजरबन्द रखा जा सकता है।

(7) आवास की स्वतन्त्रता :
भारत के प्रत्येक नागरिक को किसी भी स्थान पर स्थायी तथा अस्थायी निवास करने की स्वतन्त्रता है। पश्चिमी बंगाल का निवासी उत्तर प्रदेश में निवास कर सकता है और उत्तर प्रदेश का निवासी पश्चिमी बंगाल में। स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकारों पर कुछ प्रतिबन्ध भी लगाये गये हैं। नागरिक जनता को भड़काने वाले भाषण नहीं दे सकते। इसी प्रकार अनैतिक तथा अपराधी समुदायों के गठन की स्वतन्त्रता नहीं है। साम्प्रदायिकता फैलाने वाले समुदाय भी नहीं बनाये जा सकते। “आन्तरिक सुरक्षा अधिनियम” (MISA) द्वारा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर भी अंकुश लगाया जा सकता है। परन्तु यह प्रतिबन्ध विशेष परिस्थितियों में ही लगाया जाता है; सामान्य परिस्थितियों में नहीं।

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प्रश्न 3.
संवैधानिक उपचारों के अधिकार के अन्तर्गत कौन से प्रमुख लेख (रिट् न्यायालय जारी करते हैं?
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद-32 से 35 तक मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए संविधान में प्रबन्ध किये गये हैं। इन अधिकारों के अन्तर्गत न्यायालय निम्नलिखित पाँच प्रकार के लेख (रिट) जारी करते हैं

(1) बन्दी प्रत्यक्षीकरण आदेश :
यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आदेश है। इस आदेश द्वारा बन्दी व्यक्तियों को तुरन्त ही न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत करने तथा बन्दी बनाये जाने के कारण बताने का आदेश दिया जाता है। न्यायालय के विचार में यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से बन्दी बनाया गया है, तो वह उसे मुक्त करने का आदेश देता है।

(2) परमादेश :
इस आदेश को उस समय जारी किया जाता है जब किसी संस्था या पदाधिकारी अपने कर्तव्यों का उचित ढंग से पालन नहीं करते जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का हनन होता है। न्यायालय इस आदेश द्वारा संस्था या पदाधिकारी को अपने कर्तव्य पालन का आदेश दे सकता है।

(3) प्रतिषेध :
इसके द्वारा उच्च या सर्वोच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों को किसी कार्य को न करने का आदेश दे सकता है। जो विषय किसी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के बाहर के होते हैं, उनकी सुनवाई उस न्यायालय में न हो, उस उद्देश्य से ये लेख जारी किये जाते हैं।

(4) उत्प्रेषण :
इसके द्वारा कोई न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय को आदेश देकर सभी प्रकार के अभिलेख (रिकॉर्ड) अपने पास मँगवा सकता है।

(5) अधिकार पृच्छा :
जब किसी व्यक्ति को कानून की दृष्टि से कोई कार्य करने का अधिकार नहीं है और वह व्यक्ति उस कार्य को करता है, तब यह लेख जारी किया जाता है। उदाहरणार्थ-यदि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त किया जाता है, जिसके लिए वह कानून की दृष्टि में योग्य नहीं है, तो न्यायालय उस लेख द्वारा उसकी नियुक्ति पर तब तक के लिये रोक लगा सकता है जब तक कि उसका निर्णय न हो जाए। ये सभी लेख मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध जारी किये जाते हैं।

प्रश्न 4.
सूचना के अधिकार के कोई दो सैद्धान्तिक आधारों का वर्णन कीजिए, साथ ही लिखिए कि यदि सूचना समय पर न मिले तो क्या करना चाहिए?
उत्तर:
सूचना के अधिकार का सैद्धान्तिक आधार यह अधिकार एक महत्त्वपूर्ण अधिकार है, क्योंकि यह प्रमुख रूप से तीन सिद्धान्तों पर आधारित है।
(1) जवाबदेही का सिद्धान्त :
हमारे शासन का स्वरूप लोकतान्त्रिक है। इससे सरकारें लोकहित के लिए उत्तरदायी ढंग से कार्य करती हैं। मात्र किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष द्वारा लाभ के लिए कार्य नहीं किया जाना चाहिए। अतः सरकार तथा इससे सम्बन्धित समस्त संगठनों एवं लोक प्राधिकरणों को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया गया है। जनता को इनके कार्यों की जानकारी देना आवश्यक है।

(2) सहभागिता का सिद्धान्त :
एक प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में सरकारों द्वारा अधिकांश कार्य जनता के लिए और जनता के सहयोग से किया जाता है। योजना निर्माण की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी होना आवश्यक है, जिससे लोगों द्वारा समय रहते जनता के हित में योजनाओं में वांछित परिवर्तन एवं संशोधन किया जा सके।

(3) पारदर्शिता का सिद्धान्त :
तीसरा आधार है-पारदर्शिता का सिद्धान्त। सार्वजनिक धन एवं समय के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, गबन आदि को रोकने के लिए सरकारी काम-काज में पारदर्शिता होना आवश्यक है। इससे भ्रष्ट लोगों पर अंकुश लगाया जा सकता है और ईमानदार लोग निर्भय एवं निष्पक्ष होकर कार्य कर सकेंगे।

लोक सूचना अधिकारी द्वारा सूचना आधी, पूर्णतः सही न दिये जाने पर आवेदक 30 दिनों के भीतर प्रथम अपीलीय अधिकारी को अपील कर सकता है। अपीलीय अधिकारी को, अपील प्राप्त होने के सामान्यतः 30 दिन एवं अधिकतम 45 दिन के भीतर कार्यवाही अपेक्षित है। साथ ही इस कार्यवाही की सूचना आवेदक को भी दी जानी चाहिए, जिस पर 30 दिनों के भीतर कार्यवाही कर आवेदक को सूचित किया जाता है। यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी 30 दिन के भीतर की गई प्रथम अपील पर कार्यवाही की सूचना आवेदक को नहीं देता है तो आवेदक 90 दिनों के अन्दर द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग में कर सकता है या सूचना आयोग को पूर्ण विवरण सहित शिकायत कर सकता है।

प्रश्न 5.
सूचना के अधिकार का महत्व स्पष्ट करते हुए सूचना आयोग के गठन के बारे में लिखिए।
अथवा
सूचना के अधिकार का महत्त्व वर्णित कीजिए। (2017)
उत्तर:
सूचना के अधिकार का महत्त्व सूचना के अधिकार का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट है –
(1) मौलिक अधिकारों को प्रभावशाली बनाना :
मौलिक अधिकारों में सूचना का अधिकार भी निहित है। यह भाषण एवं अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार की रक्षा करता है। सूचना एवं जानकारी के अभाव में किसी भी व्यक्ति को सार्थक ढंग से अपनी राय अभिव्यक्त करना सम्भव नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान A-21 के अन्तर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार से भी जोड़ा है। जानने के अधिकार के बिना जीने का अधिकार अधूरा रह जाता है।

(2) शासन को पारदर्शी बनाना :
इस अधिनियम का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है शासन में पारदर्शिता लाना। जनता के प्रतिनिधि अपने अधिकारों का उपयोग उचित ढंग से कर रहे हैं या नहीं, पैसों का उपयोग सही ढंग से हो रहा है या नहीं, इन तथ्यों की जानकारी जनता को होनी चाहिए। इससे सार्वजनिक धन के माध्यम से जन-कल्याण का उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है। सूचना के अधिकार से पारदर्शिता होगी और सार्वजनिक धन को सावधानी से प्रयोग करने का दबाव बनेगा।

(3) शासन में जनता की सहभागिता बढ़ाना :
भारतीय संविधान सहभागी लोकतन्त्र के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके लिए जनता द्वारा चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधि का चयन किया जाता है, परन्तु पिछले काफी समय से नागरिकों की निष्क्रियता एक प्रमुख कारण रहा है। अतः शासन व्यवस्था में जनता की सहभागिता बढ़ाने में यह अधिकार एक प्रभावी अस्त्र है।

(4) भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण :
सूचना का अधिकार बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने का एक सशक्त अस्त्र है। पारदर्शिता एवं जवाबदेही के सिद्धान्त पर आधारित होने के कारण भ्रष्ट आचरण करने वाला व्यक्ति तुरन्त पहचान लिया जाएगा एवं उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकेगी। इसी भय के कारण उत्तरदायी लोग अनुचित कार्यों से दूर होंगे और सुशासन की परिकल्पना को भी साकार किया जा सकता है।

(5) योजनाओं को सफल बनाना :
योजनाओं को सफल बनाने में भी सूचना के अधिकार की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। शासकीय योजनाओं की सफलता मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करती है-एक योजना का क्रियान्वयन सही ढंग से निर्धारित समयावधि में पूर्ण हो जाए एवं दूसरा योजना का लाभ वास्तविक लाभार्थी तक पहुँचाया जा सके। इन दोनों ही उद्देश्यों की पूर्ति में सूचना का अधिकार एक कारगर अस्त्र है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि सूचना का अधिकार एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अधिकार है।

सूचना आयोग का गठन :
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्रीय सूचना आयोग तथा प्रदेश स्तर पर राज्य सूचना आयोग गठन का प्रावधान है। राज्य सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त के अतिरिक्त अधिक-से-अधिक.9 राज्य सहायक सूचना आयुक्त नियुक्त करने का प्रावधान है। राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक समिति की सिफारिश पर की जाती है, जिसके अध्यक्ष मुख्यमन्त्री होते हैं। इस समिति में विधानसभा में विपक्ष के नेता और मुख्यमन्त्री द्वारा नामित एक मंत्री भी होते हैं। मुख्य सूचना आयुक्त व राज्य सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।

प्रश्न 6.
मौलिक कर्त्तव्य किसे कहते हैं? संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्यों का वर्णन कीजिए। (2008, 13, 15)
अथवा
संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्यों का वर्णन कीजिए। (2018)
उत्तर:
साधारण शब्दों में किसी काम को करने के दायित्व को कर्त्तव्य कहते हैं। मौलिक कर्त्तव्य ऐसे बुनियादी कर्तव्यों को कहते हैं जो व्यक्ति को अपनी उन्नति व विकास के लिए तथा समाज व देश की प्रगति के लिए अवश्य ही करने चाहिए।

जब भारत के संविधान का निर्माण हुआ था तब उसमें सिर्फ मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया था। इसमें कर्त्तव्यों की कोई व्याख्या नहीं की गई थी, जबकि अधिकार और कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए अनुच्छेद-51 (क) में निम्नलिखित मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है –

  1. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं और राष्ट्रगान का आदर करें।
  2. स्वतन्त्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखें और उनका पालन करें। .
  3. भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण बनाये रखें।
  4. देश की रक्षा करें और आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
  5. भारत के सभी लोगों में समरसता और सम्मान, भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभावों से दूर हो। ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध हैं।
  6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्त्व समझें और उसका परिरक्षण करें।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखें।
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
  9. सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
  10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करें, जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नयी ऊँचाइयों को छू सके।
  11. यदि माता-पिता या संरक्षक हैं, तो छ: वर्ष और चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने बालक या प्रतिपाल्य को यथास्थिति शिक्षा के अवसर प्रदान करें।

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प्रश्न 7.
नीति निदेशक तत्वों के प्रकार स्पष्ट करते हुए उनका वर्णन करें। (2016)
अथवा
गाँधीजी के विचारों के अनुकूल निदेशक तत्व कौन-से हैं? (2009)
अथवा
नीति निदेशक तत्वों के उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उनका वर्णन कीजिए। (2009)
अथवा
राज्य के नीति निदेशक तत्वों के प्रकार का वर्णन कीजिए। (2008)
उत्तर:
नीति निदेशक तत्व भारत में सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति को साकार करने का सपना है। इनको निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. कल्याणकारी व्यवस्था।
  2. गाँधीजी के विचारों के अनुकूल निदेशक तत्व।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा।

1. कल्याणकारी व्यवस्था :

  • देश के संसाधनों का प्रयोग लोक कल्याण के लिए किया जाए।
  • महिला और पुरुषों को समान जीविका के साधन उपलब्ध कराना।
  • धन और उत्पादन के साधन मात्र कुछ व्यक्तियों के हाथों में केन्द्रित न हो, उनका उपयोग व्यापक जनहित के लिए हो।
  • महिलाओं और पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाए।
  • बच्चे और नवयुवकों की आर्थिक एवं नैतिक पतन से रक्षा हो।
  • सभी को रोजगार और शिक्षा प्राप्त हो, बेरोजगारी व असमर्थता में राज्य द्वारा सहायता मिले।
  • सभी व्यक्तियों को गरिमामयी जीवन स्तर, पर्याप्त अवकाश एवं सामाजिक व सांस्कृतिक सुविधाएँ प्राप्त हों। सभी के भोजन एवं स्वास्थ्य के स्तर में सुधार हो।
  • बच्चों के लिए अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा का प्रबन्ध हो।’

2. गाँधीजी के विचारों के अनुकूल निदेशक तत्व –

  • कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना।
  • ग्राम पंचायतों का गठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाई बनाना।
  • पिछड़ी एवं अनुसूचित जाति तथा जनजातियों की शिक्षा एवं आर्थिक हितों का सवंर्धन करना तथा उन्हें शोषण से बचाने हेतु प्रयास करना।
  • नशीली वस्तुओं के प्रयोग पर पाबन्दी लगाना।
  • कृषि और पशुपालन को वैज्ञानिक ढंग से करवाने का प्रबन्ध करना।
  • पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु प्रयास करना व वन्य जीवों की रक्षा करना।
  • दुधारू व बोझ ढोने वाले पशुओं की रक्षा व उनकी नस्ल को सुधारने के उपाय करना।
  • सारे देश में दीवानी और फौजदारी कानून बनाना।
  • राष्ट्रीय व ऐतिहासिक महत्त्व के स्थानों की सुरक्षा करना।
  • लोक सेवा में कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को पृथक् करने का प्रयास करना।

3. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा-

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  2. राज्यों के मध्य न्यायसंगत एवं सम्मानपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना करने का प्रयास करना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय कानून एवं सन्धियों का आदर करना।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को मध्यस्थता द्वारा शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने का प्रयास करना।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान कितने भागों में विभाजित है?
(i) 22 भागों
(ii) 20 भागों
(iii) 11 भागों
(iv) 25 भागों।
उत्तर:
(i) 22 भागों

प्रश्न 2.
इसमें से कौन सा मौलिक अधिकार नहीं है?
(i) काम करने एवं आराम करने का अधिकार
(ii) स्वतन्त्रता का अधिकार
(iii) समानता का अधिकार
(iv) शोषण के विरुद्ध अधिकार।
उत्तर:
(i) काम करने एवं आराम करने का अधिकार

प्रश्न 3.
संविधान ने नागरिक को कितने मूलाधिकार प्रदान किये हैं?
(i) 10
(ii) 8
(iii) 6
(iv) 71
उत्तर:
(iii) 6

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प्रश्न 4.
संविधान के अनुच्छेद 22 में व्यक्ति को कौन सा अधिकार प्रदान किया गया है?
(i) जीवन व व्यक्तिगत स्वतन्त्रता
(ii) गिरफ्तारी निवारण सम्बन्धी अधिकार
(iii) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(iv) निवास व भ्रमण का अधिकार।
उत्तर:
(ii) गिरफ्तारी निवारण सम्बन्धी अधिकार

प्रश्न 5.
संवैधानिक उपचारों हेतु न्यायालय द्वारा कितने प्रकार के लेख (रिट) जारी किये गये हैं?
(i) चार प्रकार के
(ii) तीन प्रकार के
(iii) छ: प्रकार के
(iv) पाँच प्रकार के।
उत्तर:
(iv) पाँच प्रकार के।

रिक्त स्थान की पूर्ति

  1. भारतीय संविधान कुल ……. भागों में विभाजित है। (2010)
  2. संविधान में अस्पृश्यता का किसी भी रूप में व्यवहार ………… है।
  3. मौलिक अधिकारों का संरक्षण ………… करता है। (2008,09)
  4. हमें भारतीय संविधान द्वारा ………… मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। (2011, 13)
  5. सूचना का अधिकार देश के प्रत्येक …………. को प्राप्त है। (2013)
  6. मौलिक अधिकार …………. के लिए हैं। (2014)

उत्तर:

  1. 22
  2. दण्डनीय अपराध
  3. सर्वोच्च न्यायालय
  4. 6
  5. नागरिक
  6. नागरिकों।

सत्य/असत्य

प्रश्न 1.
संविधान ने नागरिकों को 8 मौलिक अधिकार प्रदान किये हैं। (2009)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 2.
संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को विधि के समक्ष समानता और संरक्षण प्राप्त है। (2014)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 3.
20 वर्ष की आयु तक विद्यालय शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य बनाना है। (2012)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 4.
राज्य के नीति-निदेशक तत्व राज्य के लिए रचनात्मक निर्देश हैं। (2009)
उत्तर:
सत्य

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प्रश्न 5.
मौलिक कर्तव्यों का पालन प्रत्येक राज्य के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। (2009)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 6.
मूल अधिकारों को न्यायालय का संरक्षण प्राप्त है। (2015)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 7.
भारत के संविधान में अस्पृश्यता का किसी भी रूप में व्यवहार दण्डनीय अपराध है। (2016)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 8.
संस्कृति और शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार है। (2016)
उत्तर:
सत्य

सही जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 14 नागरिकों के संवैधानिक अधिकार एवं कर्त्तव्य - 1
उत्तर:

  1. →(ङ)
  2. →(घ)
  3. →(ख)
  4. → (क)
  5. → (ग)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकारों का संरक्षण कौन करता है? (2008)
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय

प्रश्न 2.
14 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों से श्रम कहलाता है। (2012, 15)
उत्तर:
बाल अपराध

प्रश्न 3.
देश का सर्वोच्च कानून जिसमें किसी देश की राजनीति और समाज को चलाने वाले मौलिक कानून हों। (2011)
उत्तर:
संविधान

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प्रश्न 4.
भाषण की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता। (2012)
उत्तर:
स्वतन्त्रता का अधिकार

प्रश्न 5.
देश की सर्वोच्च विधायी संस्था द्वारा उस देश के संविधान में किया जाने वाला बदलाव।। (2010)
उत्तर:
संविधान संशोधन।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकार किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह अधिकार जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास एवं गरिमा के लिए आवश्यक हैं, जिन्हें देश के संविधान में अंकित किया गया है और सर्वोच्च न्यायालय जिनकी सुरक्षा करता है, मौलिक अधिकार कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान कितने भागों में विभाजित है?
उत्तर:
भारतीय संविधान कुल 22 भागों में विभाजित है। इसके तीसरे भाग में मूल अधिकार हैं, चौथे भाग में नीति निदेशक तत्व हैं और बाद में जोड़े गये भाग चार (क) में मूल कर्त्तव्य हैं। ये सब एक ही व्यवस्था के अंग हैं।

प्रश्न 3.
बालश्रम (14 वर्ष के कम आयु वाले बच्चों से श्रम) के सम्बन्ध में कौन-सा कानून बनाया गया है?
उत्तर:
बालश्रम के सम्बन्ध में अनुच्छेद-23 एवं 24 में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों एवं अन्य खतरनाक स्थानों पर नियुक्ति आदि पर रोक लगायी गयी है। इस सम्बन्ध में ‘शोषण के विरुद्ध अधिकार’ कानून बनाया गया है।

प्रश्न 4.
संवैधानिक उपचारों हेतु न्यायालय ने कितने प्रकार के लेख (रिट) जारी किये हैं ?
उत्तर:
संवैधानिक उपचारों हेतु न्यायालय ने पाँच प्रकार की रिट जारी की हैं। जो निम्न हैं –

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण
  2. प्रतिषेध
  3. परमादेश
  4. उत्प्रेषण
  5. अधिकार पृच्छा।

प्रश्न 5.
हमें कर्त्तव्य का पालन क्यों करना चाहिए?
उत्तर:
भारतीय नागरिक होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम संविधान का पालन करें, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करें अर्थात् देश की एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए हमें कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“संविधान में अस्पृश्यता का किसी भी रूप में व्यवहार दण्डनीय अपराध है।” स्पष्ट कीजिए। (2008)
अथवा
भारतीय संविधान में अस्पृश्यता का अन्त करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है ? (2011)
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद-17 द्वारा नागरिकों में सामाजिक समानता लाने के लिए अस्पृश्यता अर्थात् छुआछूत के व्यवहार का निषेध किया गया है। नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 द्वारा राज्य अथवा नागरिकों द्वारा किसी भी रूप में अस्पृश्यता का व्यवहार अपराध माना जाएगा। जो नागरिक छुआछूत को मानेगा तथा इसे बढ़ावा देगा, वह दण्ड का भागी होगा। इस अधिकार के द्वारा अछूतों के साथ किये गये अन्याय का निराकरण होता है। संविधान में यह भी स्पष्ट लिखा हुआ है कि राज्य, जाति, वंश, धर्म, लिंग तथा जन्म-स्थान के नाम पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। अतः किसी भी व्यक्ति को दुकानों, सार्वजनिक जलपान-गृहों, कुओं, तालाबों, नदी के घाटों, सड़कों, पार्कों तथा ऐसे सार्वजनिक प्रयोग के स्थानों में नहीं रोका जा सकता है जिनको बनाये रखने का व्यय या तो पूर्णतः या आंशिक रूप से राज्य के द्वारा होता है। किसी को भी जाति या अन्य किसी आधार पर अपमानित नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
समानता के अधिकार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समानता का अधिकार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह लोकतन्त्र की आधारशिला है। इस अधिकार के अन्तर्गत नागरिकों को निम्न प्रकार की समानताएँ प्रदान की गई हैं –

  1. कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं।
  2. धर्म, वंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ राज्य किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा।
  3. राज्य के अधीन नौकरियों और पदों के सम्बन्ध में नियुक्ति के समान अवसर प्राप्त होंगे।
  4. अस्पृश्यता के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  5. सेना तथा शिक्षा सम्बन्धी उपाधियों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की उपाधियों का अन्त।

प्रश्न 3.
जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के संरक्षण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के संरक्षण के सन्दर्भ में अनुच्छेद-21 के अनुसार किसी भी नागरिक को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त, उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन और प्राणों की रक्षा के साथ समाज में मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीवित रहने का अधिकार है। इसके अन्तर्गत सम्मानजनक आजीविका के अवसर और बंधुआ मजदूरी से भी मुक्ति शामिल है। परन्तु नागरिक संविधान द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त स्वतन्त्रता का उपभोग नहीं कर सकता है।

प्रश्न 4.
गिरफ्तारी निवारण सम्बन्धी अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद-22 के अन्तर्गत देश के नागरिक को गिरफ्तारी निवारण सम्बन्धी कुछ अधिकार प्रदान किये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. देश के किसी भी नागरिक को उसके अपराध के विषय में बताए बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।
  2. प्रत्येक आरोपी को अपने बचाव के लिए वकील से सलाह-मशविरा करने से वंचित नहीं किया जा सकता है।
  3. न्यायालय की आज्ञा के बिना किसी भी आरोपी को 24 घण्टों से ज्यादा समय तक बन्दी बनाकर नहीं रखा जा सकता है अर्थात् 24 घण्टे के भीतर आरोपी को निकटतम न्यायालय के सामने प्रस्तुत करना आवश्यक है।

प्रश्न 5.
‘शोषण के विरुद्ध अधिकार’ से नागरिकों को कौन-कौन से अधिकार प्राप्त हुए हैं?
अथवा
नागरिकों को शोषण के विरुद्ध क्या अधिकार प्राप्त हैं? (2009)
उत्तर:
शोषण के विरुद्ध अधिकारों का वर्णन अनुच्छेद-23 एवं 24 में है। इन अधिकारों के द्वारा श्रमिकों, अल्पसंख्यकों तथा स्त्रियों को अन्याय व शोषण से मुक्ति दिलाने की चेष्टा की गयी है। ये निम्नलिखित हैं –

  1. बेगार व बलपूर्वक श्रम कराने का अन्त-संविधान की धारा-23 के अनुसार मनुष्यों से बेगार या बलपूर्वक कराया गया श्रम, कानून के विरुद्ध माना जाएगा।
  2. मनुष्य के क्रय-विक्रय का अन्त-संविधान के द्वारा मानव के क्रय-विक्रय को अवैध घोषित कर दिया गया है।
  3. अल्प आयु के बालकों से श्रम लेने पर रोक-14 वर्ष तक की आयु के बालकों को किसी कारखाने या खान में काम पर नहीं रखा जाएगा।
  4. स्त्रियों की सुरक्षा-संविधान में स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अवसर देने की व्यवस्था की गयी है। स्त्रियों से किसी प्रकार का कठोर कार्य नहीं लिया जाएगा।

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प्रश्न 6.
धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार को स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर:
अनुच्छेद-25 से 28 के अन्तर्गत इस अधिकार की व्याख्या की गई है। भारत को धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है जिसका अर्थ है कि राज्य किसी भी धर्म से सम्बन्धित नहीं रहेगा और न ही किसी धर्म विशेष का पोषण करेगा। भारतीय नागरिकों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है, जिसके अन्तर्गत –

  1. नागरिक अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को अपना सकते हैं।
  2. प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का शान्तिपूर्वक प्रचार करने का अधिकार है।
  3. नागरिक धार्मिक संस्थाओं की व्यवस्था कर सकते हैं।
  4. अपनी धार्मिक संस्थाओं का प्रबन्ध करने तथा इनके सम्बन्ध में सम्पत्ति प्राप्त करने और व्यय करने की स्वतन्त्रता प्रत्येक नागरिक को है।
  5. राज्य द्वारा संचालित तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी।

प्रश्न 7.
संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संविधान की 29वीं एवं 30वीं धाराओं में नागरिकों के संस्कृति व शिक्षा सम्बन्धी अधिकारों का उल्लेख किया गया है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. भाषा, लिपि व संस्कृति की सुरक्षा-प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भाषा, लिपि एवं विशिष्ट संस्कृति की रक्षा व प्रचार-प्रसार करने का अधिकार है।
  2. सहायता अनुदान में निष्पक्षता-सरकार समस्त विद्यालयों को चाहे वे अल्पसंख्यकों के हों या बहुसंख्यकों के, सभी को समान अनुदान देगी।
  3. शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश की समानता-जाति, भाषा व धर्म के आधार पर किसी भी नागरिक को सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता।
  4. शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार-संविधान के अनुच्छेद-30 के अनुसार समस्त अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षण संस्थाओं को स्थापित करने का अधिकार है।

प्रश्न 8.
राज्य के नीति निदेशक तत्वों से क्या तात्पर्य है? इनके क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
भारत के संविधान में कल्याणकारी राज्य की स्थापना कर सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान करने के लिए नीति निदेशक सिद्धान्तों को शामिल किया गया है। नीति निदेशक तत्व संविधान निर्माताओं द्वारा केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों को नीतियों के निर्धारण के लिए दिए गए दिशा निर्देश हैं। ये निर्देश शासन प्रशासन के समस्त अधिकारियों के लिए मार्गदर्शक सिद्धान्त भी हैं। यह अपेक्षा की जाती है कि इनके अनुसार ही सभी कार्य सम्पन्न हों, परन्तु ऐसा न होने पर नागरिक इसकी अपील न्यायालय में नहीं कर सकता है। जबकि मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। नीति निदेशक तत्व राज्य के कर्त्तव्य हैं। ये भारतीय संविधान की विशेषता है।

नीति निदेशक तत्वों के उद्देश्य :
नीति निदेशक तत्व भारत में सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति को साकार करने का सपना है। इनका उद्देश्य आम आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना और समाज के ढाँचे को परिवर्तित कर भारतीय जनता को सही अर्थों में समान एवं स्वतन्त्र बनाना है। इन तत्वों का उद्देश्य भारत को :

  1. कल्याणकारी राज्य में बदलना
  2. गाँधीजी के विचारों के अनुकूल बनाना तथा
  3. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के पोषक राज्य के रूप में विकसित करना है।

प्रश्न 9.
सूचना के अधिकार से सम्बन्धित सूचनाएँ हम किन स्रोतों से प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर:
सूचनाएँ दो प्रकार से प्राप्त की जा सकती हैं –

  1. प्रकाशित सूचनाओं द्वारा :
    विभाग और शासकीय निकाय समय-समय पर स्वयं से सम्बन्धित जानकारियाँ प्रकाशित करते हैं, अतः सूचनाएँ उनसे मिल जाती हैं।
  2. आवेदन-पत्र प्रस्तुत करके :
    इस प्रकार सूचना प्राप्त करने के लिए आवेदक को सादे कागज पर अपना नाम, पता दर्शाते हुए विभाग, शासकीय निकाय के सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना होता है। आवश्यक दस्तावेजों की छाया प्रतियाँ भी माँगी जा सकती हैं। इस हेतु कुछ शुल्क का प्रावधान भी है।

प्रश्न 10.
सूचना के अधिकार के अन्तर्गत हम सरकारी कार्यालय से जानकारी कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर:
सूचना के अधिकार के तहत किसी भी सरकारी कार्यालय से जानकारी निम्नलिखित रूपों में प्राप्त की जा सकती है –

  1. दस्तावेज की फोटोकॉपी
  2. दस्तावेज एवं आँकड़ों की सी. डी. फ्लॉपी, वीडियो कैसेट की प्रति
  3. प्रकाशन जो सम्बन्धित विभाग द्वारा प्रकाशित किए गए हों
  4. दस्तावेजों का अवलोकन अर्थात् दस्तावेजों को उन्हीं के कार्यालय में पढ़ा जा सकता है।

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प्रश्न 11.
सूचना के अधिकार के तहत सूचना नहीं देने वाले अधिकारियों को किन स्थितियों में और क्या दण्ड दिया जा सकता है?
उत्तर:
सूचना न देने पर दण्ड-सूचना नहीं देने वाले अधिकारियों को निम्नलिखित स्थितियों में सजा दी जा सकती है –

  1. लोक सूचना अधिकारी या सहायक लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदन लेने से मना करना।
  2. निर्धारित समय में जानकारी नहीं देना।
  3. जानबूझ कर गलत, अधूरी व गुमराह करने वाली जानकारी देना।
  4. माँगी गई सूचना को नष्ट करना।

उपर्युक्त स्थितियों में सूचना आयोग ऐसे लोक सूचना अधिकारियों पर 250 रुपये प्रतिदिन से लेकर अधिकतम 25,000 रुपए तक अर्थदण्ड आरोपित करने का आदेश दे सकता है। इसी प्रकार, लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने हेतु विभाग प्रमुख को आयोग अनुशंसा भी कर सकता है।

प्रश्न 12.
राज्य सूचना आयोग के कार्य व अधिकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
राज्य सूचना आयोग के कार्य व अधिकार राज्य सूचना आयोग के निम्नलिखित कार्य व अधिकार है –

  1. राज्य सूचना आयोग का कार्य सूचना के अधिकार को लागू करवाना है। आयोग लोगों से सूचना प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों को दूर करता है और इससे सम्बन्धित शिकायतों/अपीलों की सुनवाई करता है।
  2. आयोग सूचना के अधिकार से सम्बन्धित किसी भी प्रकरण की जाँच के आदेश दे सकता है।
  3. आयोग के पास सिविल कोर्ट से सम्बन्धित समस्त अधिकार हैं। इसके अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को सम्मन जारी करना, सुनवाई के दौरान उसकी हाजिरी (उपस्थिति) सुनिश्चित करना तथा साक्ष्य प्रस्तुत करने के आदेश देने जैसे अधिकार प्रमुख हैं।

प्रश्न 13.
सूचना के अधिकार के अन्तर्गत हम किस प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर:
सूचना के अधिकार के अन्तर्गत हम निम्न प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं –

  1. सरकार व सरकार के किसी भी विभाग से सम्बन्धित सूचना।
  2. सरकारी ठेकों का भुगतान, अनुमानित खर्च, निर्माण कार्यों के माप आदि की फोटो प्रतियाँ।।
  3. सड़क, नाली व भवन निर्माण में प्रयुक्त सामग्री के नमूने।
  4. निर्माणाधीन या पूर्ण विकास कार्यों का अवलोकन।
  5. सरकारी दस्तावेजों, जैसे-ड्राइंग, रिकॉर्ड पुस्तिका व रजिस्टरों आदि का अवलोकन।’
  6. यदि कोई शिकायत की गई है या कोई आवेदन दिया गया है तो उस पर प्रगति की जानकारी।
  7. सरकारी परियोजनाओं की जानकारी जिनका क्रियान्वयन कोई भी सरकारी विभाग या स्वयंसेवी संस्था कर रही हो।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 14 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान ने नागरिकों को कौन-कौन से मौलिक अधिकार प्रदान किये हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
संविधान में कितने मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है? ‘समानता के अधिकार’ की व्याख्या कीजिए। (2009)
अथवा
मौलिक अधिकार किसे कहते हैं ? भारतीय संविधान द्वारा हमें कितने मौलिक अधिकार प्राप्त हैं? (2011, 12)
उत्तर:
1948 में संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा मानव अधिकारों का घोषणा-पत्र जारी किया गया था। भारतीय संविधान में नागरिकों को जो मौलिक अधिकार प्रदान किये गये हैं, वे इसी घोषणा-पत्र पर आधारित हैं। ये अधिकार अग्रवत् हैं –

  • समानता का अधिकार :
    इस अधिकार के द्वारा प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता है तथा भेदभाव, अस्पृश्यता और उपाधियों का अन्त कर दिया गया है। सरकारी नौकरियों में बिना धर्म, जाति, लिंग आदि का भेदभाव किये समानता है।
  • स्वतन्त्रता का अधिकार :
    स्वतन्त्रता के अधिकार के अन्तर्गत नागरिकों को भाषण देने तथा विचार प्रकट करने, शान्तिपूर्ण सभा करने, संघ बनाने, देश में किसी भी स्थान पर घूमने-फिरने की, देश के किसी भी भाग में व्यवसाय की तथा देश में कहीं भी रहने की स्वतन्त्रता आदि प्राप्त है।
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार :
    प्रत्येक नागरिक को शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार है। इस अधिकार के अनुसार मानव के क्रय-विक्रय, किसी से बेगार लेने तथा 14 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को कारखानों, खानों या किसी खतरनाक धन्धे में लगाने पर रोक लगा दी गयी है।
  • धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार :
    भारत एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है, अतः प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म का अनुसरण करने का अधिकार है। प्रत्येक धर्म के अनुयायियों को अपनी धार्मिक संस्थाएँ स्थापित करने तथा उनका प्रबन्ध करने का अधिकार है।
  • सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार :
    इस अधिकार के अन्तर्गत भारत के नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति को सुरक्षित रखने तथा उसका विकास करने का अधिकार है।
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार :
    इस अधिकार के अनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार दिया गया है कि यदि उपरिवर्णित पाँच अधिकारों में से किसी भी अधिकार पर आक्षेप किया जाए या उससे छीना जाए, चाहे वह सरकार की ओर से ही क्यों न हो, तो वह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय से न्याय की माँग कर सकता है।

प्रश्न 2.
सूचना के अधिकार से क्या समझते हैं? सूचना अधिकार अधिनियम सम्बन्धी विशेष तथ्यों को स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
सूचना का अधिकार-भारतीय संसद में मई 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम के द्वारा देश के लोगों को किसी भी सरकारी कार्यालय से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है। देश में विगत् कई वर्षों से विकास में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के कई प्रयास किए जाते रहे हैं। पंचायत राज की स्थापना और सार्वजनिक सेवाओं की निगरानी में स्थानीय समुदाय की भागीदारी इसका प्रमुख आयाम है। सार्वजनिक सेवाओं, सुविधाओं और योजनाओं, नियम-कायदों के बारे में जानकारी न होने से लोग विकास के कार्यों में भलीभाँति भागीदारी नहीं कर पाते हैं। लेकिन अब सूचना के अधिकार द्वारा विकास योजनाओं और सार्वजनिक कार्यों में पारदर्शिता लाई जा सकती है। शासन में निर्णय लेने की प्रक्रिया में पक्षपात की सम्भावना एवं भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

सूचना अधिकार अधिनियम सम्बन्धी तथ्य :
इस अधिनियम के विशेष तथ्य निम्नलिखित हैं –
(1) सूचना के अधिकार किसे प्राप्त हैं :
सूचना का अधिकार देश के प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है। कोई भी नागरिक लोक निकाय से उससे सम्बन्धित जानकारी प्राप्त कर सकता है। इसके अतिरिक्त सभी लोक निकाय अपने दैनिक कार्य-कलापों के सम्बन्ध में आवश्यक सूचनाओं को सूचना-पट पर लोगों की जानकारी के लिए प्रदर्शित करते हैं।

(2) लोक निकाय से आशय :
ऐसे समस्त प्राधिकरण अथवा संस्थाएँ जिनकी स्थापना संसद या विधान मण्डल द्वारा पारित किये गये कानून (अधिनियम) के अन्तर्गत की गई हो, वे लोक निकाय की श्रेणी में सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त वे परिषद् भी इसमें सम्मिलित की गई हैं जो स्वशासी या गैर-सरकारी हैं, किन्तु जिन्हें या तो सरकारी अनुदान मिलता है या जिनका नियन्त्रण केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। इस प्रकार, लोक निकाय से आशय सरकारी, संवैधानिक संस्थाएँ एवं विभागों से है।

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MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 13 निर्वाचन

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 13 निर्वाचन

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 पाठान्त अभ्यास

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
निम्न में से किसे मताधिकार प्रदान किया जा सकता है?
(i) अवयस्क पुरुष तथा महिलाओं को
(i) केवल पुरुषों को,
(iii) वयस्क पुरुष तथा महिलाओं को
(iv) केवल महिलाओं को।
उत्तर:
(iii) वयस्क पुरुष तथा महिलाओं को

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प्रश्न 2.
किसे वोट देने का अधिकार नहीं है? (2016, 18)
(i) पागल या मानसिक विकलांगों को
(ii) नाबालिगों को
(iii) न्यायालय द्वारा दिवालिया घोषित
(iv) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(iv) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 3.
भारत में निम्नलिखित में से किसके बाद चुनाव प्रक्रिया शुरू मानी जाती है?
(i) प्रत्याशी के नामांकन पत्र जमा करने के बाद
(ii) चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद
(iii) प्रचार कार्य प्रारम्भ होने के बाद
(iv) चुनाव सभा होने से।
उत्तर:
(ii) चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. हमारे देश के सभी स्त्री-पुरुष जिनकी उम्र …………. वर्ष है, वोट डालने के अधिकारी हैं। (2018)
  2. कई दल मिलकर जब सरकार बनाते हैं, तब वह …………. सरकार कहलाती है। (2017)
  3. राजनीतिक दलों को मान्यता देने के लिए ………… आयोग बनाया गया है।
  4. देश के प्रत्येक वयस्क महिला-पुरुष को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार ……….. मताधिकार कहलाता है।

उत्तर:

  1. 18 वर्ष
  2. साझा
  3. निर्वाचन
  4. सार्वभौमिक वयस्क।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीतिक दल किसे कहते हैं ? लिखिए।
उत्तर:
राजनीतिक दल उन नागरिकों के संगठित समूह का नाम है जो एक ही राजनीतिक सिद्धान्तों को मानते और एक राजनीतिक इकाई के रूप में काम करते और सरकार पर अपना अधिकार जमाने का प्रयत्न करते हैं।

प्रश्न 2.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को कौन नियुक्त करता है? (2008, 15, 17)
उत्तर:
निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

प्रश्न 3.
भारत के निर्वाचन आयोग का कार्यालय कहाँ स्थित है?
उत्तर:
भारत के निर्वाचन आयोग का कार्यालय नई दिल्ली में है।

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प्रश्न 4.
साझा सरकार किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी एक दल का बहुमत न आने पर जब कई दल मिलकर सरकार बनाते हैं, तब वह सरकार साझा सरकार कहलाती है। इसे गठबन्धन सरकार भी कहते हैं।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीतिक दलों की विशेषताएँ बताइए। (2014)
अथवा
राजनीतिक दल किसे कहते हैं? उसकी चार विशेषताएँ बताइए। (2008)
उत्तर:
राजनीतिक दल उन नागरिकों के संगठित समूह का नाम है जो एक ही राजनीतिक सिद्धान्तों को मानते और एक राजनीतिक इकाई के रूप में काम करते और सरकार पर अपना अधिकार जमाने का प्रयत्न करते हैं।

राजनीतिक दलों की विशेषताएँ –

  1. अपने विचारों के समर्थन में निरन्तर जनमत बनाना।
  2. एक विधान द्वारा संगठित और संचालित होना।
  3. निर्वाचन आयोग में पंजीकृत होना।
  4. पहचान हेतु एक चुनाव चिह्न होना।
  5. प्रमुख उद्देश्य निर्वाचन में विजय प्राप्त कर सत्ता प्राप्त करना।
  6. शासक दल पर निगाह रखते हुए जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध जनमत तैयार करना।

प्रश्न 2.
मध्यावधि निर्वाचन किसे कहते हैं? (2016)
उत्तर:
मध्यावधि निर्वाचन-यदि लोकसभा अथवा राज्य विधानसभा को उसके कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग कर दिया जाता है तो होने वाले चुनाव मध्यावधि चुनाव कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
निर्वाचन आयोग के कार्य लिखिए। (2008, 09, 10, 14, 16, 18)
अथवा
चुनाव आयोग के कार्यों को लिखिए। (2012)
उत्तर:
निर्वाचन आयोग के कार्य-निर्वाचन आयोग या चुनाव आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  • चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन :
    चुनाव आयोग का महत्त्वपूर्ण कार्य चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ निश्चित करना है। प्रत्येक 10 वर्ष बाद जनगणना के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ निश्चित की जाती हैं।
  • मतदाता सूची तैयार करना :
    चुनाव आयोग चुनाव से पूर्व चुनाव क्षेत्र के आधार पर मतदाता सूची तैयार करवाता है, जिसके लिए यथासम्भव उन सभी वयस्क नागरिकों को मतदाता सूची में अंकित करने का प्रयास किया जाता है जो मतदाता बनने की योग्यता रखते हैं।
  • चुनाव-चिह्न देना :
    निर्वाचन आयोग ही सभी राजनीतिक दलों को उनके चुनाव चिह्न प्रदान करता है या उनके द्वारा सुझाव प्रदान करता है या उनके द्वारा सुझाये गये चुनाव-चिह्नों पर स्वीकृति देता है। जो प्रत्याशी किसी राजनीतिक दल की टिकट से नहीं बल्कि स्वतन्त्र रूप से चुनाव लड़ते हैं, तो उनके चुनाव-चिह्न निर्वाचन आयोग द्वारा ही निश्चित किये जाते हैं।
  • राजनीतिक दलों को मान्यता देना :
    राजनीतिक दलों को मान्यता निर्वाचन आयोग ही देता है। प्रत्येक चुनाव के बाद मतों के निश्चित प्रतिशत के आधार पर राष्ट्रीय दलों व क्षेत्रीय दलों को मान्यता देने का कार्य निर्वाचन आयोग करता है।
  • निष्पक्ष चुनाव करवाना :
    निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र चुनाव कराना चुनाव आयोग का एक प्रमुख कार्य है। चुनाव का समय, तिथि, मोहर लगाना, मतपत्रों पर चिह्न, गणना, परिणाम घोषित करना आदि के निर्देश आयोग ही देता है।

प्रश्न 4.
निर्वाचक नामावली क्या है? इसका उपयोग बताइए। (2009)
उत्तर:
चुनाव आयोग का एक महत्त्वपूर्ण कार्य निर्वाचक नामावली तैयार कराना है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रत्येक निर्वाचन से पूर्व वह मतदान केन्द्र के अनुसार मत देने के योग्य नागरिकों की सूची तैयार करवाता है। इसे निर्वाचन नामावली कहते हैं। नवीन सूची में 18 वर्ष के नागरिकों के नाम जोड़े जाते हैं और मृत्यु या अन्य कारण से अन्यत्र स्थानों पर चले गये नागरिकों के नाम हटाये जाते हैं। निर्वाचक नामावली को मतदाता सूची के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 5.
विपक्षी दल की भूमिका का वर्णन कीजिए। (2008, 09, 13)
अथवा
भारतीय राजनीति में विपक्षी दलों की भूमिका बताइए। (2008)
उत्तर:
विपक्षी दल की भूमिका-लोकतन्त्र के सफलतापूर्वक संचालन और सत्तारूढ़ पार्टी पर अंकुश रखने के लिए विपक्षी दल का अत्यधिक महत्त्व है। हमारे देश में प्रजातन्त्र है और उसमें सरकार के प्रत्येक कार्य, उसकी प्रत्येक नीति की समालोचना किया जाना अनिवार्य है। यह कार्य विपक्षी दल ही कर सकते हैं। सरकार को तानाशाह बनने से रोकना और नागरिकों के अधिकारों का हनन न होने देना, यह सभी कार्य विपक्ष करता है विपक्ष की उपस्थिति से सरकार जनता के प्रति अधिक सजगता से अपने दायित्वों का निर्वहन करती है। विधायिका में कोई भी कानून पारित होने से पूर्व उस पर विचार-विमर्श और चर्चा होती है।

विपक्ष के सहयोग से कानून के दोषों को दूर किया जा सकता है। विधान मण्डल और संसद की बैठकों के समय विपक्ष की भूमिका और बढ़ जाती है। विपक्ष सदन में प्रश्न पूछकर, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव लाकर सरकार पर दबाव बनाता है। इस प्रकार विपक्ष जनता के सामने अपनी योग्यता को स्थापित करता है, विपक्ष सरकार की त्रुटियों को जनता के सामने लाता है, सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचना करके सरकार को भूल सुधार के लिए बाध्य किया जाता है। विपक्ष द्वारा अपने दायित्व का सही प्रकार से पालन करने से सरकार प्रभावित होती है।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मताधिकार किसे कहते हैं? मताधिकार के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नागरिकों का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मताधिकार कहलाता है। यह अधिकार महत्त्वपूर्ण राजनीतिक अधिकार है।

मताधिकार के सिद्धान्त
प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाओं के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि मताधिकार का आधार क्या हो? क्या यह अधिकार राज्य के सभी नागरिकों को दिया जाए या कुछ चुने हुए व्यक्तियों को? इस सन्दर्भ में मताधिकार के प्रमुख सिद्धान्त अग्र प्रकार हैं –

  • जनजातीय सिद्धान्त :
    इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य के प्रत्येक नागरिक को मताधिकार प्राप्त होना चाहिए। क्योंकि यह कोई विशेष अधिकार या सुविधा नहीं है वरन् यह प्रत्येक नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाला स्वाभाविक एवं महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यह अवधारणा प्राचीन यूनान, रोम तथा अन्य छोटे राष्ट्रों की सभाओं में प्रचलित था, जहाँ हाथ उठाकर मतदान किया जाता था। आधुनिक युग में मताधिकार के लिए नागरिकता की अनिवार्यता सम्भवतः इसी का प्रारूप है।
  • नैतिक सिद्धान्त :
    यह सिद्धान्त इस अवधारणा पर आधारित है कि मानव के व्यक्तित्व के विकास के लिए यह अनिवार्य है कि उसे मताधिकार के माध्यम से यह निश्चित करने का अधिकार हो कि उनका शासन कौन करे। मताधिकार व्यक्ति में संवेदनशीलता को जन्म देता है तथा उसे सरकारी नीतियों तथा कार्यक्रमों के प्रति सजग बनाता है।
  • वैधानिक अधिकार :
    मताधिकार एक प्राकृतिक अधिकार नहीं वरन् राजनीतिक अधिकार है। यह निर्धारण करना राज्य का कार्य है कि किसे मताधिकार मिलना चाहिए। प्रत्येक शासन अपनी परिस्थितियों और सामाजिक स्थिति के आधार पर इसका निर्धारण करता है।
  • प्राकृतिक सिद्धान्त :
    17वीं तथा 18वीं शताब्दी में यह सिद्धान्त विशेष लोकप्रिय हुआ। इस सिद्धान्त के अनुसार सरकार मानव निर्मित संयन्त्र है। इसका आधार जनता की सहमति है। अर्थात् शासक को चुनने का अधिकार जनता का प्राकृतिक अधिकार है।
  • सर्वव्यापी वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त :
    यह सिद्धान्त लोकतान्त्रिक राज्यों में सर्वाधिक प्रचलित सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य के प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार होता है। 17वीं तथा 18वीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों और जनसम्प्रभुता के वातावरण में सर्वव्यापक मताधिकार की माँग ने जोर पकड़ा। इसमें वयस्कता का अधिकार सम्मिलित किया गया।
  • भारीकृत मताधिकार का सिद्धान्त :
    इस सिद्धान्त के अनुसार मतों को गिना नहीं जाता है वरन् उनका भार दिया जाता है। भार का आशय यहाँ महत्त्व से है अर्थात् सरकार के चयन में किसी प्रकार की विशिष्टता जैसे शिक्षा, धन या सम्पत्ति से विभूषित व्यक्ति के मत का भार एक आम आदमी से अधिक होना चाहिए।
  • बहुल मताधिकार का सिद्धान्त :
    मताधिकार के इस सिद्धान्त की मूल अवधारणा में यह आग्रह है कि व्यक्तियों के मतों की संख्या कुछ आधारों पर कम या अधिक होनी चाहिए। आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में ‘एक व्यक्ति एक मत’ का सिद्धान्त सर्व स्वीकृत है, परन्तु विगत वर्षों में बहुल मताधिकार की व्यवस्था भी अनेक राज्यों में प्रचलित रही है।

प्रश्न 2.
निर्वाचन से क्या आशय है? निर्वाचन आयोग के कार्यों को लिखिए।
उत्तर:
निर्वाचन एक महत्वपूर्ण कार्य है। यह एक निर्धारित विधि से होता है। देश में होने वाले सामान्य निर्वाचन, मध्यावधि निर्वाचन या उपचुनाव या निर्वाचन, सभी में समान प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया के प्रमुख बिन्दु हैं-

  1. मतदाता सूची तैयार करना
  2. चुनाव की घोषणा
  3. निर्वाचन हेतु नामांकन
  4. चुनाव चिह्न
  5. चुनाव अभियान
  6. मतदान
  7. मतगणना।

निर्वाचन आयोग के कार्य :
निर्वाचन आयोग के कार्य-निर्वाचन आयोग या चुनाव आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं’

  • चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन :
    चुनाव आयोग का महत्त्वपूर्ण कार्य चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ निश्चित करना है। प्रत्येक 10 वर्ष बाद जनगणना के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ निश्चित की जाती हैं।
  • मतदाता सूची तैयार करना :
    चुनाव आयोग चुनाव से पूर्व चुनाव क्षेत्र के आधार पर मतदाता सूची तैयार करवाता है, जिसके लिए यथासम्भव उन सभी वयस्क नागरिकों को मतदाता सूची में अंकित करने का प्रयास किया जाता है जो मतदाता बनने की योग्यता रखते हैं।
  • चुनाव-चिह्न देना :
    निर्वाचन आयोग ही सभी राजनीतिक दलों को उनके चुनाव चिह्न प्रदान करता है या उनके द्वारा सुझाव प्रदान करता है या उनके द्वारा सुझाये गये चुनाव-चिह्नों पर स्वीकृति देता है। जो प्रत्याशी किसी राजनीतिक दल की टिकट से नहीं बल्कि स्वतन्त्र रूप से चुनाव लड़ते हैं, तो उनके चुनाव-चिह्न निर्वाचन आयोग द्वारा ही निश्चित किये जाते हैं।
  • राजनीतिक दलों को मान्यता देना :
    राजनीतिक दलों को मान्यता निर्वाचन आयोग ही देता है। प्रत्येक चुनाव के बाद मतों के निश्चित प्रतिशत के आधार पर राष्ट्रीय दलों व क्षेत्रीय दलों को मान्यता देने का कार्य निर्वाचन आयोग करता है।
  • निष्पक्ष चुनाव करवाना :
    निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र चुनाव कराना चुनाव आयोग का एक प्रमुख कार्य है। चुनाव का समय, तिथि, मोहर लगाना, मतपत्रों पर चिह्न, गणना, परिणाम घोषित करना आदि के निर्देश आयोग ही देता है।

प्रश्न 3.
राजनीतिक दलों की संख्या के आधार पर राजनीतिक दलों के प्रकार लिखिए।(2013)
उत्तर:
दलीय व्यवस्था के प्रकार-किसी राष्ट्र में राजनीतिक दलों की संख्या के आधार पर दल व्यवस्था को तीन वर्गों में बाँटा जाता है –

  • एकल दल (एक दलीय) प्रणाली :
    एक दलीय पद्धति या व्यवस्था उसे कहते हैं जिसमें केवल एक राजनीतिक दल होता है और वही समस्त राजनीतिक गतिविधियों का संचालन करता है, जैसे-जनवादी चीन में एक दलीय प्रणाली है, वहाँ केवल साम्यवादी दल को ही मान्यता है। अन्य राजनैतिक विचार रखने वालों पर पाबन्दी है।
  • द्वि-दलीय प्रणाली :
    इस प्रणाली में केवल दो दल या दो प्रमुख दल होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में द्वि-दलीय प्रणाली प्रचलित है। इस राष्ट्र के दो प्रमुख दल हैं-डेमोक्रेटिक दल तथा रिपब्लिकन दल। इस प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन की शासन व्यवस्था में द्वि-दलीय प्रणाली प्रचलित है।
  • बहुदलीय प्रणाली :
    बहुदलीय प्रणाली में अनेक राजनीतिक दल होते हैं, किन्तु सभी दलों की स्थिति समान नहीं होती। हमारे देश में बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली है। निर्वाचन में किसी एक दल का बहुमत में आना आवश्यक नहीं है।

जब किसी एक दल का बहुमत नहीं आता है, तो देश या प्रान्त में साझा सरकार बनाई जाती है। साझा या गठबन्धन सरकार में दो या अधिक दल शामिल होते हैं।

बहुदलीय प्रणाली का सबसे बड़ा दोष दल-बदल है। चुनावों के समय अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती हैं। इस प्रणाली में राजनीतिक दलों की नीतियों में स्पष्ट अन्तर करना कठिन हो जाता है। बहुदलीय प्रणाली में व्यक्तिनिष्ठ दलों की संख्या बढ़ जाती है। आये दिन उनका विघटन और पतन होता रहता है।

प्रश्न 4.
दल व्यवस्था क्या है? उसका महत्त्व बताइए।
अथवा
राजनैतिक दल व्यवस्था क्या है? उसका महत्त्व बताइए। (2009)
उत्तर:
संसदीय लोकतन्त्र के लिए विभिन्न राजनीतिक दल आवश्यक हैं। राजनीतिक दल नागरिकों के संगठित समूह हैं, जो एक-सी विचारधारा रखते हैं। ये अपनी नीतियों और कार्यक्रमों के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। राजनीतिक दल एक शक्ति के रूप में कार्य करते हैं और सदैव शक्ति प्राप्त करने और उसे बनाये रखने का प्रयास करते रहते हैं।

दलीय व्यवस्था का महत्त्व :
दलीय व्यवस्था लोकतान्त्रिक शासन को सम्भव बनाती है। आधुनिक युग में शासन कार्य राजनीतिक दलों के सहयोग से होता है। यह शासन के नीति निर्धारण में सहयोग करते हैं और इनके सहयोग से नीतियों में परिवर्तन आसान होता है। दल-व्यवस्था के प्रभाव से सरकार जनोन्मुखी होती है व लोकहित में कार्य करती है। राजनैतिक दल शासन के निरंकुशता पर नियन्त्रण करते हैं। इनके माध्यम से जनता की आशाएँ और अपेक्षाएँ सरकार तक पहुँचती हैं। यह जनता को राजनीतिक प्रशिक्षण देते हैं। इनके . . माध्यम से जनता को शासन में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। राजनीतिक दल नागरिक स्वतन्त्रताओं के रक्षक होते हैं। इनके द्वारा राष्ट्र की एकता स्थापित होती है। लॉर्ड ब्राइस का मत है कि, “दल राष्ट्र के मस्तिष्क को उसी प्रकार क्रियाशील रखते हैं, जैसे कि लहरों की हलचल से समुद्र की खाड़ी का जल स्वच्छ रहता है।”

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प्रश्न 5.
भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया व भारतीय चुनाव प्रणाली के प्रमुख दोषों का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया को लिखिए। (2008, 09)
अथवा
भारतीय चुनाव प्रणाली के कोई चार दोष लिखिए। (2017, 18)
उत्तर:
भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया-निर्वाचन एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। यह एक निर्धारित विधि से होता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) मतदाता सूची तैयारी करना :
निर्वाचन का यह पहला चरण है। जिला निर्वाचन कार्यालय द्वारा निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार प्रत्येक निर्वाचन से पूर्व मतदाता सूची को तैयार करता है। कोई भी भारतीय नागरिक जिसकी आयु 18 वर्ष है इसमें अपना नाम सम्मिलित करवा सकता है। मतदाता पहचान पत्र भी जिला निर्वाचन कार्यालय द्वारा बनवाये जाते हैं। मतदाता पहचान पत्र के अभाव में नागरिक को अपनी पहचान के लिए अन्य कागजात लाने होते हैं।

(2) चुनाव की घोषणा :
प्रत्येक निर्वाचन प्रक्रिया का प्रारम्भ अधिसूचना जारी होने से होता है। लोकसभा के सामान्य अथवा मध्यावधि या उपचुनाव की अधिसूचना राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। विधान सभाओं के लिए अधिसूचना राज्यपाल द्वारा की जाती है। अधिसूचना का प्रकाशन चुनाव आयोग से विचार-विमर्श के बाद राजपत्र में किया जाता है।

अधिसूचना जारी होने के पश्चात् निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाता है। इसके साथ ही राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता लागू हो जाती है।

(3) नामांकन पत्र :
चुनाव सूचना जारी होने के बाद चुनाव आयोग चुनावों की तिथि घोषित करता है जिसके अन्तर्गत एक निश्चित तिथि एक प्रत्याशी अपना नामांकन पत्र भरते हैं। नामांकन पत्र मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित व अनुमोदित होना चाहिए तथा प्रत्याशी का नाम मतदाता सूची में अवश्य होना चाहिए। नामांकन पत्र के साथ प्रत्याशी एक निश्चित धनराशि जमानत के रूप में जमा करवाता है। नामांकन पत्र भरे जाने की तिथि के बाद एक निश्चित तिथि में सभी नामांकन पत्रों की जाँच की जाती है और जिन प्रत्याशियों के नामांकन पत्र सही पाये जाते हैं उन्हें प्रत्याशी घोषित कर दिया जाता है। इसके पश्चात् एक निश्चित तिथि तक प्रत्याशी अपना नाम वापस ले सकते हैं।

(4) चुनाव-चिह्न-चुनाव :
चिह्न ऐसे चिह्नों को कहते हैं जिन्हें कोई राजनीतिक दल या उम्मीदवार चुनाव के समय अपने चिह्न के रूप में प्रयोग करता है। चिह्न की पहचान से ही मतदाता अपना मत सही उम्मीदवार को दे सकता है।

(5) चुनाव अभियान :
चुनाव अभियान समस्त चुनावी प्रक्रिया का सबसे निर्णायक भाग है। वैसे ही आज के विज्ञापन के युग में चुनाव प्रचार का अत्यधिक महत्त्व है। चुनाव प्रचार के लिए चुनाव घोषणा-पत्र के साथ-साथ आम सभाएँ भी आयोजित की जाती हैं। चुनाव प्रचार की दृष्टि से आकर्षक नारे गढ़े व प्रचारित किये जाते हैं। नारे छपे पोस्टर जगह-जगह दीवारों पर चिपकाये जाते हैं। परम्परागत तरीकों से रिक्शा व लाउडस्पीकर का भी चुनाव प्रचार में भरपूर प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक दल को दूरदर्शन व आकाशवाणी द्वारा अपना प्रचार-प्रसार करने का एक निश्चित समय दिया जाता है।

(6) मतदान-निश्चित तिथि पर मतदाता चुनाव बूथ पर जाकर मत डालते हैं। मतदान के लिए सार्वजनिक छुट्टी रहती है व एक निश्चित समय तक ही मतदाता अपना वोट डाल सकते हैं। मतदान अधिकारी व विभिन्न प्रत्याशियों के प्रतिनिधियों द्वारा यह पहचान किये जाने के पश्चात् कि मतदाता सही है, कोई धोखा नहीं है, उस मतदाता को मतपत्र दे दिया जाता है जो बूथ में जाकर गुप्त रूप से अपना मत डालता है। मत-पत्र दिये जाने के पूर्व चुनाव अधिकारी एक अमिट स्याही का निशान मतदाता की उँगली पर लगाता है, ताकि वह मतदाता दुबारा गलत ढंग से मत न डाल सके।

(7) मतगणना व परिणाम :
मतदान पूरा हो जाने के बाद चुनाव अधिकारी प्रत्याशियों के प्रतिनिधियों के सामने मतपेटियों को सीलबन्द कर देते हैं। प्रत्येक मतदान केन्द्र से मतपेटियाँ एक स्थान पर एकत्र कर ली जाती हैं जहाँ एक निश्चित तिथि पर प्रत्याशी व उनके प्रतिनिधियों के समक्ष मतपेटियों को खोला जाता है। उनके ही सामने मतों की गिनती चुनाव कर्मचारी करते हैं। सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है।

भारतीय चुनाव प्रणाली के दोष :
भारतीय चुनाव प्रणाली के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं –
(1) मतदान में पूर्ण भागीदारी का अभाव :
सार्वभौम वयस्क मताधिकार प्रणाली का उद्देश्य सभी नागरिकों को शासन में अप्रत्यक्ष भागीदार बनाना है। बड़े क्षेत्रों में लोकसभा तथा राज्य विधानसभा चुनावों में एक बड़ी संख्या में मतदाता अपना वोट डालने नहीं जाते हैं। इस कारण मतदाताओं के बहुमत से निर्वाचित उम्मीदवार जनता का प्रतिनिधि नहीं होता है। अतः यह अपेक्षित है कि, सभी नागरिकों को मतदान में भाग लेना चाहिए।

(2) बाहुबल का प्रभाव :
कई बार कुछ प्रत्याशी हर तरीके से चुनाव में विजय हासिल करना चाहते हैं और वे चुनाव में अपराधियों की सहायता भी लेते हैं। हिंसा और शक्ति का प्रयोग कर लोगों को डरा-धमका कर वोट देने से रोकना, मतदान केन्द्र पर कब्जा करना, अवैध मत डलवाने का प्रयास करते हैं।

(3) सरकारी साधनों का दुरुपयोग :
चुनाव होने से पहले कुछ शासक दल. जनता को आकर्षित करने वाले वायदे करने लगते हैं, शासकीय कर्मचारियों/अधिकारियों की अपने हितों के अनुकूल पदस्थापना करते हैं तथा शासकीय धन और वाहनों व अन्य साधनों का दुरुपयोग करते हैं। इससे चुनावों की निष्पक्षता प्रभावित होती है।

(4) फर्जी मतदान :
यह भी हमारी चुनाव प्रणाली की बड़ी समस्या है। कुछ व्यक्ति दूसरे के नाम पर वोट डालने चले जाते हैं। एक से अधिक स्थान पर मतदाता सूची में नाम लिखना, नाम न होते हुए भी वोट देने जाना आदि फर्जी मतदान है।

(5) चुनाव में धन का प्रयोग :
चुनाव में बढ़ता खर्च एक बड़ी समस्या है। प्रत्येक चुनाव में व्यय की सीमा निर्धारित है, परन्तु चुनाव में भाग लेने वाले अनेक प्रत्याशी बहुत अधिक धन व्यय करते हैं। धन व बल के अभाव में कई बार कुछ अच्छे और ईमानदार व्यक्ति चुनाव लड़ने में असमर्थ होते हैं। चुनाव में धन का दुरुपयोग व्यक्ति की अनैतिक भूमिका को दर्शाता है, जो चुनाव व्यवस्था में सुधार की दृष्टि से गम्भीर समस्या है।

(6) निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या :
निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या कभी-कभी बहुत अधिक होती है इससे चुनाव प्रबन्ध में कठिनाई आती है। अधिक प्रत्याशियों के कारण मतदाता भी भ्रमित होता है।

(7) अन्य दोष :
वोट देने के लिए नागरिकों का मतदाता सूची में नाम होना आवश्यक है। प्रायः यह देखने में आता है कि अनेक लोगों के नाम मतदाता सूची से छूट जाते हैं। दूसरी ओर जिनकी मृत्यु हो गयी है या वे दूसरे स्थान पर चले गये हैं, तब भी उनके नाम मतदाता सूची में होते हैं। एक मतदान केन्द्र पर मतदाताओं की संख्या अधिक होने से भी कठिनाई आती है। एक प्रत्याशी कई बार दो या अधिक जगह पर चुनाव में खड़ा हो जाता है। दोनों स्थानों पर जीत होने की स्थिति में उसको एक स्थान को त्यागपत्र देना पड़ता है। जिसके कारण पुनः उपचुनाव होते हैं। इसमें शासकीय और प्रत्याशी के धन का अपव्यय होता है। ये सभी हमारी चुनाव प्रणाली के दोष हैं।

प्रश्न 6.
राजनीतिक दलों के कार्य और महत्त्व बताइए।
अथवा
राजनीतिक दलों के कार्य बताइए। (2008, 12)
अथवा
‘राजनीतिक दलों के कोई चार महत्त्व लिखिए। (2017)
उत्तर:
राजनीतिक दलों के कार्य-राजनीतिक दल अनेक कार्य करते हैं। इनमें प्रमुख कार्य निम्नलिखित :

  • जनमत तैयार करना :
    राजनीतिक दल देश की समस्याओं को स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखकर जनमत तैयार करते हैं। वे पत्र-पत्रिकाओं तथा सभाओं में इन समस्याओं को सरल ढंग से जनता के सामने रखते हैं और फिर इस लोकमत को तथा जनता की कठिनाइयों को संसद में रखते हैं।
  • मध्यस्थता :
    राजनीतिक दल जनता और सरकार के बीच मध्यस्थता का कार्य करते हैं। सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों को जनता के सामने तथा जनता की इच्छाओं को सरकार के सामने रखते हैं।
  • आलोचना :
    प्रजातन्त्रीय शासन में बहुमत प्राप्त दल अपनी सरकार बनाता है और अल्पमत दल विरोधी दल का कार्य करता है। विरोधी दलों की आलोचना के भय से सत्तारूढ़ दल गलत कार्य व नीतियाँ नहीं अपनाता।
  • राजनीतिक शिक्षा :
    राजनीतिक दल साधारण नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा देने का कार्य भी करते हैं। चुनाव के दिनों में राजनीतिक दल प्रेस, रेडियो, टी. वी. व सभाओं के माध्यम से अपनी नीतियों व जनता के अधिकारों का वर्णन करते हैं। इससे नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती हैं।
  • शासन पर अधिकार करना :
    राजनीतिक दलों का अन्तिम उद्देश्य शासन पर अधिकार करना होता है। वे प्रचार साधनों के द्वारा जनमत को अपने पक्ष में करते हैं और सत्ता पर अधिकार करने का प्रयास करते हैं।

राजनीतिक दलों का महत्त्व :
राजनैतिक दल आधुनिक लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली की देन है। आधुनिक राजनैतिक जीवन में इनका निम्नलिखित महत्त्व है –

  • लोकमत के निर्माण में सहायक :
    राजनीतिक दल जनता को सार्वजनिक समस्याओं से परिचित कराते हैं तथा उनकी अच्छाइयों और बुराइयों की जानकारी देते हैं। इनसे जनता सार्वजनिक समस्याओं पर अपना मत बनाती है और इस प्रकार लोकमत का निर्माण होता है।
  • जनता में जागृति उत्पन्न करने में सहायक :
    राजनीतिक दलों के माध्यम से जनता को देश की आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक समस्याओं का ज्ञान होता है।
  • संसदीय सरकार के लिए अनिवार्य :
    संसदीय शासन-व्यवस्था में सरकार का निर्माण दलों के आधार पर होता है। संसद के निम्न सदन में जिस दल का बहुमत होता है, वह सरकार बनाता है।
  • लोकतन्त्र के लिए अनिवार्य :
    लोकतन्त्रात्मक प्रशासन में राजनीतिक दल अनिवार्य होता है। उनके बिना निर्वाचन की व्यवस्था करना कठिन है। दलों से ही सरकार बनती है और वही उस पर नियन्त्रण रखते हैं। उनके माध्यम से सरकार व जनता के बीच सम्पर्क स्थापित होता है और जनता की कठिनाइयों से सरकार अवगत होती है।
  • मतदान में सहायक :
    राजनीतिक दलों के सहयोग से नागरिकों को निर्वाचन के समय यह निर्णय लेने में कठिनाई नहीं होती कि उन्हें अपना मत किस उम्मीदवार को देना है। वह जिस दल के कार्यक्रम व नीति को पसन्द करता है, उसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कर देता है।
  • सरकार की निरंकुशता पर रोक :
    प्रजातन्त्र में बहुमत प्राप्त दलों की सरकार बनती है, इसलिए उसके निरंकुश बन जाने की सम्भावना रहती है। विरोधी दल उसकी स्वेच्छाचारिता पर रोक लगाकर उस पर नियन्त्रण रखते हैं।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मतदज समाप्त होने के कितने घण्टे पूर्व चुनाव प्रचार बन्द कर दिया जाता है?
(i) 24 घण्टे
(ii) 36 घण्ट
(iii) 48 घण्टे
(iv) 72 घण्टे।
उत्तर:
(iii) 48 घण्टे

प्रश्न 2.
निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है?
(2009)
(i) 3 वर्ष
(ii) 4 वर्ष
(iii) 5 वर्ष
(iv) 6 वर्ष।
उत्तर:
(iv) 6 वर्ष।

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रिक्त स्थान पूर्ति

  1. नागरिकों का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार ……….. कहलाता है। (2008, 09, 14, 15)
  2. भारत के निर्वाचन आयोग का कार्यालय …………. में है। (2010)
  3. नागरिकों द्वारा अपने देश के प्रतिनिधि निर्वाचित करने की प्रक्रिया ………… कहलाती है।
  4. जन-जन की शासन में सहभागिता ही लोकतन्त्र की …………है।
  5. निर्वाचन आयुक्तों की नियक्ति …………. करता है। (2008)

उत्तर:

  1. मताधिकार
  2. नई दिल्ली
  3. निर्वाचन
  4. प्राण शक्ति
  5. राष्ट्रपति।

सत्य/असत्य

प्रश्न 1.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमन्त्री करता है। (2008, 09)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 2.
निर्वाचन आयोग में 750 से अधिक दल पंजीकृत हैं। (2008)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 3.
आम चुनाव की तिथियाँ चुनाव आयोग निर्धारित करता है। (2009)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 4.
बहुमत प्राप्त न करने वाले दल विपक्षी दल कहलाते हैं। (2013)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 5.
भारत के निर्वाचन आयोग का कार्यालय मुम्बई में है। (2009)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 6.
प्रत्येक व्यक्ति के मत को समान महत्त्व मिलता है। (2014)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 7.
हमारे देश में वे सभी स्त्री-पुरुष जिनकी उम्र 18 वर्ष है वोट डालने के अधिकारी है। (2016)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 8.
राजनीतिक दलों को मान्यता देने के लिए चुनाव आयोग बनाया गया है। (2018)
उत्तर:
सत्य

सही जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 13 निर्वाचन - 1

उत्तर:

  1. → (ङ)
  2. → (ग)
  3. → (ख)
  4. → (क)
  5. → (घ)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
बहुमत प्राप्त न करने वाले राजनैतिक दल? (2011)
उत्तर:
विपक्षी दल

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प्रश्न 2.
निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है? (2009)
उत्तर:
6 वर्ष

प्रश्न 3.
नागरिकों द्वारा अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने की प्रक्रिया कहलाती हैं। (2009)
अथवा
लोकतांत्रिक देशों में जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया को कहते हैं। (2016)
उत्तर:
निर्वाचन

प्रश्न 4.
हमारे देश में वोट डालने की निम्नतम आयु कितनी है?
उत्तर:
18 वर्ष

प्रश्न 5.
अपने निर्धारित समय पर होने वाला निर्वाचन। (2009)
उत्तर:
सामान्य निर्वाचन अथवा आम चुनाव

प्रश्न 6.
चुनाव के समय पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा माने जाने वाले कायदे-कानून और दिशा-निर्देश (2010)
उत्तर:
आचार संहिता

प्रश्न 7.
नागरिकों का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार क्या कहलाता है? (2013)
उत्तर:
मताधिकार।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्वाचन से क्या आशय है? लिखिए।
उत्तर:
लोकतान्त्रिक राष्ट्रों में जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया को निर्वाचन कहा जाता है।

प्रश्न 2.
मताधिकार किसे कहते हैं?
उत्तर:
नागरिकों का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार, मताधिकार कहलाता है।

प्रश्न 3.
किन व्यक्तियों को मताधिकार से वंचित रखा जाता है?
उत्तर:
मानसिक रूप से विकलांग या पागल या ऐसे व्यक्ति जो न्यायालय द्वारा दिवालिया घोषित हैं या ऐसे व्यक्ति जो भारत देश के नागरिक नहीं हैं, मत देने के अधिकारी नहीं होते।

प्रश्न 4.
भारत के राजनीतिक दल कितने भागों में विभक्त हैं? उनके नाम लिखिए।
अथवा
भारत के सर्वाधिक सदस्य संख्या वाले चार राजनीतिक दलों के नाम लिखिए।
उत्तर:
भारत के राजनीतिक दल दो भागों में विभक्त हैं। इनमें कुछ राष्ट्रीय दल और शेष क्षेत्रीय दल हैं।
भारत के सर्वाधिक सदस्य संख्या वाले राजनीतिक दल हैं –

  1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  2. भारतीय जनता पार्टी
  3. समाजवादी पार्टी तथा
  4. भारतीय साम्यवादी दल।

प्रश्न 5.
‘आम चुनाव’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
आम चुनाव का आशय-हमारे देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किये जाते हैं। इन चुनावों को आम चुनाव कहते हैं।

प्रश्न 6.
आम चुनाव की अधिघोषणा किसके द्वारा की जाती है?
उत्तर:
लोकसभा व राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति तथा विधानसभाओं के लिए राज्यपाल मतदाताओं को चुनाव के बारे में सूचना देते हैं। इस अधिसूचना का प्रकाशन चुनाव आयोग से विचार-विमर्श करने के बाद सरकारी गजट में होता है।

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प्रश्न 7.
‘नामांकन-पत्र’ से क्या आशय है? समझाइए।
उत्तर:
चुनाव से पहले उम्मीदवारों द्वारा नामांकन पत्र दाखिल किये जाते हैं। कोई भी व्यक्ति जिसका नाम मतदाताओं की सूची में है और जो निश्चित योग्यताएँ रखता हो, चुनाव में खड़ा हो सकता है।

प्रश्न 8.
चुनाव में राजनीतिक दलों को चुनाव चिह्न क्यों आबंटित किये जाते हैं?
उत्तर:
चुनावों में अनेक राजनीतिक दल तथा निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं। उनकी पहचान के लिए तथा मतदान की सुविधा के लिए प्रत्येक प्रत्याशी तथा राजनीतिक दल को चुनाव आयोग चिह्न देता है।

प्रश्न 9.
निर्वाचन आयोग में कितने सदस्य होते हैं?
उत्तर:
निर्वाचन आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो चुनाव आयुक्त होते हैं। इन दोनों चुनाव आयुक्तों को भी मुख्य चुनाव आयुक्त के समान अधिकार प्राप्त हैं।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्वाचन से आप क्या समझते हैं? हमारे देश में इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
हमारे देश में कौन-सी शासन प्रणाली है? इस प्रणाली में निर्वाचन की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
निर्वाचन से आशय एवं आवश्यकता-भारत में संसदीय शासन प्रणाली है। इस शासन प्रणाली में देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों से सरकार बनाई जाती है। निर्वाचन के द्वारा नागरिकों की शासन में भागीदारी होती है। नागरिकों द्वारा अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने की प्रक्रिया निर्वाचन कहलाती है। निर्वाचन के द्वारा एक निश्चित समय के लिए जन-प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है। हमारे राष्ट्र के नागरिक निर्वाचन में भाग लेकर अपने राजनीतिक अधिकार का प्रयोग करते हैं। भारत एक विशाल और बहुभाषी राष्ट्र है। हमारे यहाँ सभी नागरिकों को समान रूप से प्रतिनिधियों के चुनाव में भाग लेने का अधिकार है। मताधिकार की यह प्रणाली सार्वजनिक वयस्क मताधिकार प्रणाली कहलाती है। भारत में मतदान की गोपनीय प्रणाली को अपनाया गया है। भारत में स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव सम्पन्न कराने के लिए, निर्वाचन आयोग का गठन किया गया है।

प्रश्न 2.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से क्या आशय है? (2009, 15)
उत्तर:
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार-नागरिकों का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मताधिकार कहलाता है। यह अधिकार महत्त्वपूर्ण राजनीतिक अधिकार है। भारत के प्रत्येक वयस्क महिला व पुरुष को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहलाता है। इस प्रणाली में एक निर्धारित आयु पूरा करने के उपरान्त देश के सभी पात्र नागरिकों को वोट देने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। हमारे देश में वे सभी स्त्री-पुरुष जिनकी आयु 18 वर्ष है, वोट डालने के अधिकारी हैं।

प्रश्न 3.
मताधिकार की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मताधिकार की विशेषताएँ :
मताधिकार की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

  1. देश के सभी नागरिकों की शासन में हिस्सेदारी होती है।
  2. प्रत्येक नागरिक के मत को समान महत्त्व मिलता है।
  3. जन प्रतिनिधियों का शान्तिपूर्वक परिवर्तन सम्भव है।
  4. नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है।
  5. नागरिकों में आत्म-सम्मान की भावना उत्पन्न होती है।
  6. यह प्रणाली समानता के सिद्धान्त के अनुकूल है।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय राजनीतिक दल किसे कहते हैं? लिखिए। (2011)
उत्तर:
राष्ट्रीय राजनीतिक दल वे हैं जिनका प्रभाव सम्पूर्ण देश में होता है। इसका आशय यह नहीं है कि उनकी लोकप्रियता सभी राज्यों में एक जैसी है। उनका प्रभाव और इनकी शक्ति विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल की मान्यता प्राप्त होने के लिए निम्न शर्त में से कोई एक का होना अनिवार्य है-जो दल एक या एक से अधिक राज्यों में लोकसभा या विधानसभा के चुनावों में डाले गये मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे अथवा यदि कोई दल लोकसभा के सदस्यों का कम से कम 2 प्रतिशत स्थान प्राप्त करे और यह स्थान न्यूनतम तीन राज्यों में होना चाहिए।

प्रश्न 5.
राजनीतिक दल के चार कार्य लिखिए।
उत्तर:

  1. ये देश के हित में अनुकूल जनमत बनाते हैं।
  2. निर्वाचन में विजय प्राप्त करना और सरकार बनानो इनका प्रमुख कार्य है।
  3. ये सरकार और जनता के मध्य सेतु का कार्य करते हैं।
  4. शासक दल की निरंकुशता पर नियन्त्रण लगाने का प्रयास करते हैं।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 13 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सर्वव्यापी वयस्क मताधिकार सिद्धान्त के गुण-दोष बताइए।
‘उत्तर:
गुण :

  1. चूँकि प्रजातन्त्र का आशय प्रत्येक व्यक्ति की शासन में सहभागिता है, तो यह वांछनीय है कि मताधिकार सर्वव्यापक हो। जन-जन की शासन में सहभागिता ही प्रजातन्त्र की प्राणशक्ति है।
  2. जिसका सम्बन्ध सबसे हो, ऐसे व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बनाने में सबका हाथ होना चाहिए।
  3. मताधिकार समानता के सिद्धान्त के अनुरूप है, जो प्रजातन्त्र का मूलरूप है।
  4. जब तक मताधिकार सर्वव्यापी नहीं होगा तब तक यह आशा नहीं की जा सकती कि शासन का उद्देश्य सार्वजनिक हितों की प्राप्ति है।

दोष :

  1. यह कहा जाता है कि जनता के बड़े भाग को मताधिकार प्राप्त नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है।
  2. मैकाले व हेनरीसेन जैसे विचारकों का कथन है कि इसमें निरक्षर और नासमझ लोगों को भी मताधिकार प्राप्त हो जाता है।

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MP Board Class 7th Maths Solutions Chapter 1 पूर्णांक Ex 1.4

MP Board Class 7th Maths Solutions Chapter 1 पूर्णांक Ex 1.4

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से प्रत्येक का मान ज्ञात कीजिए
(a) (-30) ÷ 10
(b) 50 ÷ (-5)
(c) (-36) ÷ (-9)
(d) (-49) ÷ 49
(e) 13 ÷ [(-2)+1]
(f) 0 ÷ (-12)
(g) (-31) ÷ [(-30) + (-1)]
(h) [(-36) ÷ 12] ÷ 3 (i) [(-6)+5] ÷ [(-2) +1]
हल:
MP Board Class 7th Maths Solutions Chapter 1 पूर्णांक Ex 1. 4

प्रश्न 2.
a, b और c के निम्नलिखित मानों में से प्रत्येक के लिए a ÷ (b + c) ≠ (a ÷ b) + (a ÷ c) को सत्यापित कीजिए :
(a) a = 12, b = -4, c = 2.
(b) a = -10, b = 1, c = 1.
हल:
(a) यहाँ a = 12, b = – 4, c = 2
L.H.S = a ÷ (b + c) = 12 ÷ [(-4) + 2]
= 12 ÷ (-2)= – 6
R.H.S. = a ÷ b + a ÷ c = 12 + (-4) + 12 ÷ 2
= (-3) + 6 = 3
∵ -6 ≠ 3
अतएव, a ÷ (b + c) ≠ (a ÷ b) + (a ÷ c)

(b) यहाँ a = -10, b = 1, c = 1
L.H.S. = a ÷ (b + c) = (- 10) ÷ (1 + 1)
= – 10 ÷ 2 = -5
R.H.S. = (a ÷ b) + (a ÷ c)
= [(-10) ÷ 1] + [(-10) ÷ 1]
= (-10) + (-10) = (-20)
∵ -5 ≠ – 20
∴ L.H.S. ≠ R.H.S.
अतएव, a ÷ (b + c) ≠ (a ÷ b) + (a ÷ c)

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प्रश्न 3.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
हल:
(a) 369 ÷ 1 = 369 [∵ a ÷ 1 = a]
(b) (-75) ÷ 75 = -1 [∵ (-a) ÷ a = – 1]
(c) (-206) ÷ (-206) = 1 [∵ (-a) ÷ (-a) = 1]
(d) – 87 ÷ (-1)= 87 [∵ (-a) ÷(-1) = a]
(e) (-87) ÷ 1 =-87 [∵ (-a) ÷ 1 = -a]
(f) (-48) ÷ 48 = – 1
(g) 20 ÷ (-10) = – 2
(h) (-12) ÷ 4 = -3

प्रश्न 4.
पाँच ऐसे पूर्णांक युग्म (a, b) लिखिए ताकि a ÷ b = – 3 हो। ऐसा एक युग्म (6, – 2) है। क्योंकि 6 ÷ (-2) = – 3 है।
हल:
(i) ∵ [(-3) ÷ 1] = -3 ÷ 1 = -3
a ÷ b = – 3 से तुलना करने पर, a = -3, b = 1
अतः अभीष्ट पूर्णांक युग्म = (-3, 1)

(ii) ∵ 9 ÷ (-3) = -3
a ÷ b = – 3 से तुलना करने पर, a = 9, b = – 3
अतः अभीष्ट पूर्णांक युग्म = (9, -3)

(iii) ∵ (-15) ÷ 5 = – 3
a ÷ b = -3 से तुलना करने पर, a = – 15, b = 5
अत: अभीष्ट पूर्णांक युग्म = (-15, 5)

(iv) ∵ 12 ÷ (-4) = -3
a ÷ b = – 3 से तुलना करने पर, a = 12, b = -4
अतः अभीष्ट पूर्णांक युग्म = (12, -4)

(v) ∵ (-21) ÷ 7 = -3
a ÷ b = – 3 से तुलना करने पर, a = – 21, b = 7
अत: अभीष्ट पूर्णांक युग्म = (-21, 7)

प्रश्न 5.
दोपहर 12 बजे तापमान शून्य से 10°C ऊपर था। यदि यह आधी रात तक 2°C प्रति घण्टे की दर से कम होता है, तो किस समय तापमान शून्य से 8°C नीचे होगा? आधी रात को तापमान क्या होगा?
हल:
दोपहर 12 बजे तापमान = 10°C
तापमान कम होने की दर = -2°C प्रति घण्टा
दोपहर 12 बजे से आधी रात तक का समय = 12
घण्टे 12 घण्टे में तापमान में परिवर्तन = 12 x (-2) °C
= – 24°C
अतः आधी रात को तापमान = + 10°C + (-24°C)
= -14°C
अब 10°C और -8°C के मध्य तापमान का अन्तर = 10°C – (-8°C) = 18°C
∴ तापमान 0°C से 8°C नीचे तक जाने में लगा समय
= कुल कमी/1 घण्टे में तापमान में अन्तर = 18/2 = 9 घण्टे
उत्तर अतः 18°C तापमान में अन्तर दोपहर 12 बजे से 9 घण्टे में होगा।
अतः दोपहर 12 बजे के बाद 9 घण्टे = रात्रि 9 बजे
अतएव, 9 बजे रात्रि को तापमान शून्य से 8°C नीचे होगा।

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प्रश्न 6.
एक कक्षा टेस्ट में प्रत्येक सही उत्तर के लिए (+ 3) अंक दिए जाते हैं और प्रत्येक गलत उत्तर के लिए (-2) अंक दिए जाते हैं। और किसी प्रश्न को हल करने का प्रयत्न नहीं करने पर कोई अंक नहीं दिया जाता है।
(i) राधिका ने 20 अंक प्राप्त किए। यदि उसके 12 उत्तर सही पाए जाते हैं, तो उसने कितने प्रश्नों का उत्तर गलत दिया है ?
(ii) मोहिनी टेस्ट में (-5) अंक प्राप्त करती है, जबकि उसके 7 उत्तर सही पाए जाते हैं। उसने कितने प्रश्नों का उत्तर गलत दिया है ?
हल:
प्रत्येक सही उत्तर के लिए अंक = +3
प्रत्येक गलत उत्तर के लिए अंक = – 2
(i) राधिका द्वारा प्राप्त कुल अंक = 20
सही उत्तर के लिए प्राप्त अंक = 12 x 3 = 36
∴ गलत उत्तर के लिए प्राप्त अंक = 20 – 36 = – 16
∴ गलत उत्तरों की संख्या = (-16) ÷ (-2)
अतः राधिका ने 8 प्रश्नों के उत्तर गलत दिए।

(ii) मोहिनी द्वारा प्राप्त अंक = -5
7 सही उत्तरों के लिए प्राप्त अंक = 7 x 3 = 21
∴ गलत उत्तरों के लिए प्राप्त अंक =-5-21 = -26
∴ गलत उत्तरों की संख्या = (-26) (-2) = 13
अतः मोहिनी ने 13 प्रश्नों का उत्तर गलत दिया है।

प्रश्न 7.
एक उत्थापक किसी खान कूपक में 6 m प्रति मिनट की दर से नीचे जाता है। यदि नीचे जाना भूमि तल से 10 मीटर ऊपर से शुरू होता है, तो – 350 m पहुँचने में कितना समय लगेगा?
हल:
उत्थापक की वर्तमान स्थिति भूमि तल से 10 मीटर ऊपर है।
MP Board Class 7th Maths Solutions Chapter 1 पूर्णांक Ex 1. 4
अतः उत्थापक को नीचे पहुँचने में 60 मिनट (या एक घण्टा) लगेंगे।

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MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 12 प्रजातन्त्र

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 12 प्रजातन्त्र

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 पाठान्त अभ्यास

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता लोकतन्त्र की नहीं है?
(i) निर्वाचित प्रतिनिधियों की सरकार
(ii) अधिकारों का सम्मान
(iii) शक्तियों का एक व्यक्ति में केन्द्रीयकरण
(iv) स्वतन्त्रता और निष्पक्ष चुनाव।
उत्तर:
(iii) शक्तियों का एक व्यक्ति में केन्द्रीयकरण

प्रश्न 2.
कौन-सी अवधारणा प्रजातन्त्र की है?
(2016)
(i) स्वतन्त्रता
(ii) शोषण
(iii) असमानता
(iv) व्यक्तिवादिता।
उत्तर:
(i) स्वतन्त्रता

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन-सा प्रजातन्त्र का दोष नहीं है?
(i) सार्वजनिक धन व समय का अपव्यय
(i) धनिकों का वर्चस्व
(iii) दलीय गुटबन्दी
(iv) लोक कल्याण।
उत्तर:
(iv) लोक कल्याण।

प्रश्न 4.
प्रजातन्त्र, जनता का जनता के लिये जनता द्वारा संचालित शासन है
(2008, 14, 15)
(i) मैकियावली
(ii) रूसो
(iii) लिंकन
(iv) हाट्स।
उत्तर:
(iii) लिंकन

रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए

  1. अरस्तु ने प्रजातन्त्र को ………… का शासन कहा है। (2009, 10, 18)
  2. साम्यवाद के प्रवर्तक ………… और ………… थे।
  3. सफल प्रजातन्त्र के लिए संविधान का …………. होना आवश्यक है।
  4. निर्बल प्रजातन्त्र ………….. और …………. के समय प्रभावहीन सिद्ध होता है।

उत्तर:

  1. ‘बहुतों का शासन’
  2. कार्ल मार्क्स और लेनिन
  3. लिखित
  4. युद्ध और संकट।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तर वैदिक काल में प्रजातान्त्रिक सन्दर्भ में उसका उल्लेख पाया जाता है?
उत्तर :
उत्तर वैदिककाल में शासन का गणतान्त्रिक रूप एवं स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ विद्यमान थीं। ऋग्वेद में सभा और समिति का उल्लेख मिलता है।

प्रश्न 2.
प्राचीन भारत में शासन की मूल इकाई के रूप में किस प्रकार की व्यवस्था थी?
उत्तर:
प्राचीन भारत में भारतीय समाज कृषि प्रधान था जिसकी मूल इकाई स्वशासित एवं स्वतन्त्र ग्राम थे।

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त किस अधिकार पर बल देता है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त राजनीतिक एवं नागरिक समानताओं की अपेक्षा आर्थिक समानता पर अधिक बल देता है।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रजातन्त्र का अर्थ समझाते हुए कोई दो परिभाषा लिखिए। (2009, 13, 15)
उत्तर:
प्रजातन्त्र का अर्थ-प्रजातन्त्र का अर्थ एक ऐसी शासन व्यवस्था से है जिसमें जनहित सर्वोपरि है। प्रजातन्त्र का अर्थ केवल एक शासन प्रणाली तक सीमित नहीं है। यह राज्य व समाज का रूप भी है। अर्थात् इसमें राज्य, समाज व शासन तीनों का समावेश होता है। राज्य के रूप में प्रजातन्त्र, जनता को शासन करने, उस पर नियन्त्रण करने एवं उसे हटाने की शक्ति है। समाज के रूप में प्रजातन्त्र इस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था है जिसमें समानता का विचार और व्यवहार सर्वोपरि हो। व्यक्तित्व की गरिमा का समान मूल्य हो एवं विकास के समान अवसर सभी को प्राप्त हों। यह सम्पूर्ण जीवन का एक मार्ग है। यह मूल्यों की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति साध्य है और व्यक्तित्व का विकास इसका उद्देश्य है। यह स्वतन्त्रता एवं समरसता की पूर्व कल्पना पर आधारित है।

परिभाषाएँ :
अरस्तू ने प्रजातन्त्र को बहुतों का शासन’ कहा है। डायसी के अनुसार, “प्रजातन्त्र शासन .. का वह रूप है जिसमें शासन व्यवस्था की शक्ति सम्पूर्ण राष्ट्र में विस्तृत हो।”

प्रश्न 2.
अप्रत्यक्ष अथवा प्रतिनिधि प्रजातन्त्र से आप क्या समझते हैं? (2009, 16)
उत्तर:
अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र :
जब जनता निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि निर्माण तथा शासन के कार्यों पर नियन्त्रण रखने का कार्य करती है तो उसे अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कहते हैं। वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र ही प्रचलित है। इसमें जनता निश्चित अवधि के लिए अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो व्यवस्थापिका का गठन करते हैं और कानूनों का निर्माण करते हैं। अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति, निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम होती है।

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र में राजनीतिक शिक्षण कैसे होता है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र राजनीतिक शिक्षण का श्रेष्ठ साधन है। मताधिकार और राजनीतिक पद प्राप्त करने की स्वतन्त्रता के कारण जनता स्वाभाविक रूप से राजनीतिक क्षेत्र में रुचि लेने लगती है। भाषण अभिव्यक्ति एवं संचार माध्यमों के उपयोग की स्वतन्त्रता, जनता में विचारों के आदान-प्रदान करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है। उनमें उत्तरदायित्व तथा आत्म-निर्भरता की भावना का विकास होता है। सभी राजनीतिक दल निरन्तर प्रचार द्वारा जनता को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करते हैं। अतः प्रजातन्त्र में नागरिकों को प्रशासनिक, राजनीतिक व सामाजिक सभी प्रकार का शिक्षण प्राप्त होता है।

प्रश्न 4.
प्रजातन्त्र के लिये संविधान क्यों आवश्यक है? इस पर टिप्पणी लिखिए। (2009, 10, 16)
उत्तर:
शासन संगठन के मूलभूत सिद्धान्त तथा प्रक्रिया निश्चित होना प्रजातन्त्र का महत्त्वपूर्ण लक्षण है, जिसमें कोई भी सत्तारूढ़ दल अपने बहुमत के आधार पर इसे जैसा चाहे वैसा परिभाषित या परिवर्तित न कर सके। शासन के अंगों का गठन, शासन की शक्तियाँ एवं कार्य, प्रक्रिया आदि संविधान में स्पष्ट हों, इसलिए लिखित संविधान का होना अनिवार्य माना गया है। प्रजातन्त्र नागरिकों की समानता एवं स्वतन्त्रता पर आधारित है। वास्तव में संविधान प्रजातन्त्र का प्राण होता है। बिना संविधान के कोई भी प्रजातन्त्र सफल नहीं हो सकता। इस प्रकार प्रजातन्त्र के लिए संविधान परम आवश्यक है।

प्रश्न 5.
वर्तमान में भारतीय प्रजातन्त्र किन-किन चुनौतियों से गुजर रहा है? लिखिए।
उत्तर:
भारत में प्रजातन्त्र के समक्ष चुनौतियाँ-भारत में प्रजातन्त्र के समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी हैं। भारतीय प्रजातन्त्र आज निरक्षरता, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, पृथक्तावाद, साम्प्रदायिकता, राजनीतिक हिंसा, सामाजिक-आर्थिक असमानता, धन व बाहुबल के वर्चस्व, भ्रष्टाचार और वोट बैंक की राजनीति की समस्याओं से प्रभावित हो रहा है।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रजातन्त्र से क्या आशय है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए। (2008, 09)
अथवा
प्रजातन्त्र की कोई पाँच विशेषताएँ बताइए और किसी एक विशेषता के बारे में वर्णन कीजिए। (2010)
अथवा
प्रजातन्त्र का क्या अर्थ है? प्रजातन्त्र की प्रमुख दो परिभाषाएँ लिखिए। (2008)
अथवा
प्रजातन्त्र की चार विशेषताएँ लिखिए। (2017, 18)
उत्तर:
प्रजातन्त्र का आशय-प्रजातन्त्र को अंग्रेजी भाषा में डेमोक्रेसी (Democracy) कहते हैं। प्रजातन्त्र का अंग्रेजी पर्याय डेमोक्रेसी दो यूनानी शब्दों से मिलकर बना है-‘डेमो’ (Demo) यानी ‘जनता’ तथा ‘क्रेटिया’ (Kratia) अर्थ है-शक्ति। इस प्रकार डेमोक्रेसी या प्रजातन्त्र का अर्थ हुआ जनता की शक्ति’ । अन्य शब्दों में कहा जाए तो ऐसी शासन प्रणाली जिसमें सर्वोच्च सत्ता जनता के पास रहती है और उसका उपयोग वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में करती है। इसे लोकतन्त्र या जनतन्त्र भी कहा जाता है।

परिभाषाएँ :
प्रजातन्त्र का अर्थ-प्रजातन्त्र का अर्थ एक ऐसी शासन व्यवस्था से है जिसमें जनहित सर्वोपरि है। प्रजातन्त्र का अर्थ केवल एक शासन प्रणाली तक सीमित नहीं है। यह राज्य व समाज का रूप भी है। अर्थात् इसमें राज्य, समाज व शासन तीनों का समावेश होता है। राज्य के रूप में प्रजातन्त्र, जनता को शासन करने, उस पर नियन्त्रण करने एवं उसे हटाने की शक्ति है। समाज के रूप में प्रजातन्त्र इस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था है जिसमें समानता का विचार और व्यवहार सर्वोपरि हो। व्यक्तित्व की गरिमा का समान मूल्य हो एवं विकास के समान अवसर सभी को प्राप्त हों। यह सम्पूर्ण जीवन का एक मार्ग है। यह मूल्यों की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति साध्य है और व्यक्तित्व का विकास इसका उद्देश्य है। यह स्वतन्त्रता एवं समरसता की पूर्व कल्पना पर आधारित है।

आशय यह है कि प्रजातन्त्रात्मक शासन व्यवस्था लोक कल्याणकारी राज्य से सम्बन्धित है। इसमें व्यक्ति की महत्ता और उसकी स्वतन्त्रता पर बल दिया गया है तथा सम्प्रभुता जनता में निहित होना माना गया है।

प्रजातन्त्र की विशेषताएँ :
प्रजातन्त्र एकमात्र ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें सभी को अपने सर्वांगीण विकास के लिए बिना किसी भेदभाव के समान अवसर प्राप्त होते हैं प्रजातान्त्रिक व्यवस्था नागरिकों की गरिमा तथा समानता, स्वतन्त्रता, मातृत्व और न्याय के सिद्धान्तों पर आधारित है। प्रजातन्त्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • जनता प्रभुसत्ता की स्वामी :
    प्रजातन्त्र में सत्ता का अन्तिम स्रोत राज्य की सम्पूर्ण जनता होती है।
  • शासन का संचालन जन प्रतिनिधियों द्वारा :
    प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था में शासन का संचालन जनता के प्रतिनिधि करते हैं।
  • राजनीतिक दलों के गठन की व्यवस्था :
    प्रजातन्त्र में राजनीतिक दलों का गठन अनिवार्य रूप से किया जाता है। दो या अधिक राजनीतिक दल होते हैं। जिस दल को सर्वाधिक बहुमत प्राप्त होता है, वही शासन का संचालन करता है।
  • चुनावों की व्यवस्था :
    प्रजातन्त्र में संविधान द्वारा निर्धारित तिथि पर चुनाव होते हैं। चुनाव का आधार वयस्क मताधिकार होता है।
  • नागरिकों को अधिकार व स्वतन्त्रताएँ प्रदान करना :
    नागरिक अपने मतों का उचित ढंग से प्रयोग कर सकें तथा अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकें। इसके लिए उन्हें यथा सम्भव अधिकार व स्वतन्त्रताएँ प्रदान की जाती हैं।
  • शासन जनता के प्रति उत्तरदायी :
    प्रजातन्त्रीय शासन जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। जनहित की अवहेलना करने पर उसे पदच्युत किया जा सकता है।
  • लोक या जन कल्याणकारी राज्य का आदर्श :
    प्रजातन्त्र का प्रमुख आदर्श जनहित होता है। अत: इस शासन व्यवस्था में यथासम्भव लोक कल्याणकारी कार्यों को महत्त्व दिया जाता है।
  • स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायपालिका :
    संविधान की समस्त व्यवस्थाएँ व्यवहार में लागू की जा सकें, इसलिए प्रजातन्त्र में स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायपालिका का होना एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण लक्षण है।

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
अथवा
प्रजातन्त्र के कोई चार गुण लिखिए। (2017)
अथवा
प्रजातन्त्र के दो-दो गुण-दोषों का वर्णन कीजिए। (2008, 14, 18)
अथवा
प्रजातन्त्र के दोषों का वर्णन कीजिए। (2008, 09)
उत्तर :
प्रजातन्त्र के गुण-प्रजातन्त्र के निम्नलिखित गुण हैं –

1. जन-कल्याण की भावना :
प्रजातन्त्र की सबसे बड़ी अच्छाई यह है कि इसमें शासक गण जन-कल्याण के प्रति विशेष रूप से सजग तथा क्रियाशील रहते हैं। प्रजातन्त्र में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही शासन करते हैं। अतः वे जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। ऐसी दशा में उनके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे जनता के हित में ही शासन करें।

2. व्यक्तित्व के विकास के अवसर :
प्रजातन्त्र शासन में नागरिकों के प्रतिनिधि ही शासन में भाग लेते हैं। अतः इस प्रकार की प्रणाली में प्रत्येक नागरिक को अपने व्यक्तित्व के विकास के समान अवसर प्राप्त होते हैं।

3. देश-भक्ति की भावना का विकास :
प्रजातन्त्र में नागरिकों के हृदय में राज्य के प्रति निष्ठा तथा भक्ति की भावना उत्पन्न होती है। नागरिक यह अनुभव करते हैं कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि ही शासन का संचालन कर रहे हैं और वे जो कुछ भी करेंगे वह उनके हित में ही होगा। अतः प्रजातन्त्र में प्रत्येक नागरिक के हृदय में अपने देश के प्रति अगाध प्रेम होता है। मिल के अनुसार “प्रजातन्त्र लोगों में देश-भक्ति की भावना का विकास करता है, क्योंकि नागरिक यह अनुभव करते हैं कि सरकार उन्हीं की बनाई हुई है और अधिकारी उनके स्वामी न होकर, सेवक हैं।”

4. नैतिकता तथा उत्तरदायित्व की भावनाओं का विकास :
प्रजातन्त्रात्मक शासन-प्रणाली नागरिकों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास करती है। इस सम्बन्ध में मिल का कहना है कि “सत्यता, नैतिकता, साहस, आत्मविश्वास तथा उद्योगशीलता आदि गुणों का किसी अन्य शासन-प्रणाली की अपेक्षा लोकतन्त्र में अधिक विकास होता है।

5. क्रान्ति से सुरक्षा :
प्रजातन्त्र में नागरिकों की इच्छा के अनुसार ही शासन होता है। नागरिक जानते हैं कि वे इच्छानुसार अपने मत द्वारा अत्याचारी शासकों को अपदस्थ कर सकते हैं। अतः सरकार बदलने के लिए क्रान्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती।

6. सार्वजनिक शिक्षण :
प्रजातन्त्रात्मक शासन में समस्त व्यक्तियों को सार्वजनिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता है। वे मतदान द्वारा तथा चुनाव में खड़े होकर राजनीति की शिक्षा प्राप्त करते हैं। उनमें उत्तरदायित्व तथा आत्मनिर्भरता की भावना का विकास होता है। बर्क के शब्दों में “सभी शासन शिक्षा के साधन होते हैं और सबसे अच्छी शिक्षा स्वशिक्षा है। इस प्रकार सबसे अच्छा शासन स्वशासन है, जिसे लोकतन्त्र कहते हैं।

7. स्वतन्त्रता व समानता की प्राप्ति :
प्रजातन्त्र का मूल आधार स्वतन्त्रता और समानता है। इस कारण प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेद-भाव के समान रूप से राजनीतिक अधिकार प्रदान किये जाते हैं। जाति, धर्म, नस्ल, रंग, सम्पत्ति आदि के आधार पर उनमें भेद-भाव नहीं किया जाता। यही ऐसा शासन है जिसमें सभी को अपना विकास करने के समान अवसर प्राप्त होते हैं।

प्रजातन्त्र के दोष :
प्रजातन्त्र के प्रमुख दोष निम्न प्रकार हैं –

  • योग्यता और गुण की अपेक्षा बहुमत का महत्त्व :
    प्रजातन्त्रात्मक शासन में योग्यता और गुण के स्थान पर संख्या और बहुमत को अधिक महत्त्व दिया जाता है। प्रत्येक बात का निर्णय बहुमत के आधार पर होता है, चाहे वह गलत ही क्यों न हो।
  • दल प्रणाली और गुटबन्दी के प्रभाव :
    प्रजातन्त्र शासन में दल प्रणाली और गुटबन्दी के दोष उत्पन्न हो जाते हैं। विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव जीतने के प्रयास में जनता को भ्रामक प्रचार द्वारा गुमराह करने का प्रयास करते हैं। एक दल दूसरे दल की कटु आलोचना करता है। योग्य व्यक्ति दलबन्दी से दूर भागते हैं तथा अयोग्य व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त कर लेते हैं।
  • अनुत्तरदायी शासन :
    इसे (प्रजातन्त्र को) जनता का शासन कहा जाता है क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से उसे जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं होता। प्रजातन्त्र में केवल चुने हुए प्रतिनिधि जो शासन के स्वामी हो जाते हैं, मन्त्रिमण्डल आदि के चुनाव के पश्चात् सर्वसाधारण की आवश्यकताओं, हितों तथा उनकी कठिनाइयों के प्रति तनिक भी चिन्ता नहीं करते। इस प्रकार प्रजातन्त्र अनुत्तरदायी शसान है।
  • समय की बर्बादी-प्रजातन्त्रात्मक शासन :
    प्रणाली में अनावश्यक रूप से समय का अपव्यय होता है। चुनाव तथा नीति निर्धारण आदि में ही काफी समय बर्बाद हो जाता है। किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पूर्व वाद-विवाद में भी समय व्यर्थ ही नष्ट होता है तथा निर्णय लेने में देर लगती है।
  • धन का अत्यधिक अपव्यय :
    इस प्रणाली में व्यवस्थापिका सभाओं के सदस्यों तथा मन्त्रिमण्डलं आदि पर पर्याप्त धन व्यय किया जाता है। चुनाव के समय भी पैसा आवश्यक रूप से खर्च होता है। व्यर्थ में कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ जाती है।
  • पूँजीपतियों का शासन :
    प्रजातन्त्र में शासन तथा सरकार पूँजीपतियों के हाथ की कठपुतली बन जाती है। धनवान व्यक्ति दलों को चन्दा देते हैं तथा पैसे की सहायता देकर अपने उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा करके उन्हें विजयी बनाते हैं। पूँजीपतियों द्वारा खड़े किये गये उम्मीदवार चुने जाने के पश्चात् उनके ही हित-साधन में जुट जाते हैं तथा जनसाधारण की उपेक्षा करते हैं। इस प्रकार प्रजातन्त्र में पूँजीवाद का पोषण ‘ होता है और जनसाधारण की उपेक्षा होती है।
  • युद्ध और संकट के समय दुर्बल :
    प्रजातन्त्रात्मक सरकार युद्ध और संकट के समय प्रायः दुर्बल सिद्ध होती है। युद्ध के समय शीघ्र निर्णय लेने की आवश्यकता होती है, परन्तु इस प्रणाली की गति अत्यन्त मन्द होती है। इसीलिए शीघ्र निर्णय नहीं हो पाते।
  • पक्षपात और भ्रष्टाचार का बोलबाला :
    इस शासन-प्रणाली में शासन भ्रष्ट और शिथिल हो जाता है। जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि जनसाधारण के हितों की उपेक्षा कर भाई-भतीजे तथा सगे-सम्बन्धियों के हितों का ही ध्यान रखते हैं। इससे भाई-भतीजेवाद और भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र के आधारभूत सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। (2009, 14)
उत्तर:
प्रजातन्त्र के आधारभूत सिद्धान्त-प्रजातन्त्र के प्रमुख सिद्धान्त निम्न प्रकार हैं –
(1) प्रजातन्त्र का अभिजनवादी सिद्धान्त :
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्रतिपादित यह सिद्धान्त मानव की प्राकृतिक असमानता के सिद्धान्त पर जोर देते हुए यह मानता है कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में शासक और शासित दो वर्ग होते है। शासक वर्ग हमेशा अल्पसंख्यक होते हुए भी सत्ता के केन्द्र में विशिष्ट वर्ग होता है। शासन की शक्ति इसी विशिष्ट वर्ग के हाथ में केन्द्रित होती है। सामान्यत: व्यक्ति यह सोचते हैं कि वे राजनीतिक प्रक्रिया में भाग ले रहे हैं, लेकिन वास्तव में उनका प्रभाव चुनाव तक सीमित होता है। अभिजन का आधार है-श्रेष्ठता के आधार पर चयन। प्रकृति, विचार, आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक पृष्ठभूमि आदि किसी भी आधार पर इनकी श्रेष्ठता निर्भर हो सकती है, जो इन्हें आम लोगों से अलग बनाती है।

अभिजन भी स्वयं को आम लोगों से भिन्न एवं श्रेष्ठ समझते हैं, परन्तु जनसाधारण के साथ इनकी क्रिया-प्रतिक्रिया होती रहती है। इस प्रकार जन सम्प्रभुता का समन्वय हो जाता है। समाज की धन सम्पदा एवं नीति निर्धारण में अभिजन की प्रभावशाली भूमिका होती है, परन्तु प्रजातन्त्र में इस वर्ग में प्रवेश के सभी को समान अवसर प्राप्त होते हैं। दूसरी ओर नियमित एवं खुली निर्वाचन प्रक्रिया अभिजन को जनहित में कार्य करने हेतु बाध्य करती है।

(2) बहुलवादी सिद्धान्त :
यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि प्रजातन्त्र में व्यक्ति को अपने विभिन्न हितों की पूर्ति के लिये समूह में संगठित होने की स्वतन्त्रता है। ये समूह अपने-अपने क्षेत्र में स्वायत्त भी होते हैं और अपनी हितपूर्ति के लिये शासन पर दबाव भी डालते हैं। इस प्रकार सभी समूहों को अपनी हितपूर्ति की सीमा तक सत्ता में भागीदारी मिलती है। अतः सत्ता का विकेन्द्रीकरण इस सिद्धान्त की मूल धारणा है। अर्थात् राज्य ही सर्वोच्च सत्ता का अधिकारी नहीं अपितु प्रजातन्त्र में समाज के सभी समूहों की राजनीतिक शक्ति एवं शासन की सत्ता में भागीदारी होती है।

(3) प्रजातन्त्र का उदारवादी या शास्त्रीय सिद्धान्त :
इस सिद्धान्त में व्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं समाज की सर्वोपरिता पर बल दिया गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार शासन का आधार जनता की सहमति है, लेकिन सरकार यदि जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है, तो जनता निर्वाचन के माध्यम से सरकार को हटा सकती है। जनहित साधना उसका उद्देश्य है।

(4) मार्क्सवादी सिद्धान्त :
साम्यवाद की विचारधारा के आधुनिक प्रवर्त्तक कार्ल मार्क्स व लेनिन के विचारों पर आधारित प्रजातन्त्र का एक नवीन सिद्धान्त 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सामने आया। इस सिद्धान्त के अनुसार उदारवादी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में वास्तविक प्रजातन्त्र सम्भव नहीं है, क्योंकि इसमें शासन पर एक छोटे साधन सम्पन्न वर्ग का नियन्त्रण हो जाता है, जबकि प्रजातन्त्र जन कल्याण व उनकी समानता पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार वास्तविक प्रजातन्त्र के लिये एक वर्ग विहीन तथा राज्यविहीन समाज की स्थापना होनी चाहिए। प्रजातन्त्र का यह सिद्धान्त राजनीतिक एवं नागरिक समानताओं की अपेक्षा आर्थिक समानता पर अधिक जोर देता है। इसकी मान्यता है कि यदि व्यक्ति के पास रोटी, कपड़ा, मकान नहीं है तो उसके पास मतदान या निर्वाचित होने का अधिकार कोई अर्थ नहीं रखता है। मार्क्सवाद वास्तविक प्रजातन्त्र की स्थापना हेतु निम्नलिखित सुझाव देता है –

  1. सम्पत्ति का समान वितरण तथा सभी की मूलभूत आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति होना।
  2. उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व देना।
  3. सभी के आर्थिक हित समान होने से इनके प्रतिनिधित्व के लिए एक दल-साम्यवाद दल के हाथ में शासन संचालन की सम्पूर्ण शक्ति देना।

प्रश्न 4.
भारत में प्रजातन्त्र के महत्त्व तथा स्वरूप का वर्णन कीजिए। (2009)
उत्तर:
प्रजातन्त्र का महत्त्व :
अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र-जब जनता निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि निर्माण तथा शासन के कार्यों पर नियन्त्रण रखने का कार्य करती है तो उसे अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कहते हैं। वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र ही प्रचलित है। इसमें जनता निश्चित अवधि के लिए अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो व्यवस्थापिका का गठन करते हैं और कानूनों का निर्माण करते हैं। अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति, निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम होती है।

भारत में प्रजातन्त्र का स्वरूप :
भारत के लिए प्रजातन्त्र व प्रजातान्त्रिक संस्थाओं के विचार नवीन नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि लगभग 3000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के वैदिक काल में भारत की जनता के मध्य प्रतिनिधिक विचार-विमर्श की परम्परा थी। उत्तर वैदिककाल में शासन का गणतान्त्रिक रूप एवं स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ मौजूद थीं। ऋग्वेद व अथर्ववेद में सभा और समिति का वर्णन मिलता है। महाभारत के युद्ध के बाद बड़े साम्राज्य लुप्त होने लगे और कई गणतान्त्रिक राज्यों का उदय हुआ। महाजनपद काल में सोलह महाजनपद जन्मे जिनमें काशी, कोशल, मगध, कुरु, अंग, अवंति, गन्धार, वैशाली, मत्स्य इत्यादि शामिल थे।

इनमें से कुछ महाजनपदों में राजतन्त्र व अन्य में गणतन्त्र थे। महावीर और गौतम बुद्ध दोनों ही गणतन्त्र से आये थे। बौद्ध भिक्षुओं के कई नियम आधुनिक संसदीय शासन प्रणाली के नियमों से मिलते हैं। उदाहरण के लिए बैठक व्यवस्था, विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण, गणपूर्ति (कोरम) हिप, वोटों की गिनती, रोक प्रस्ताव, न्याय सम्बन्धी विचार आदि। बज्जि संघ में तो सभी लोग एक साथ एकत्रित होकर अपनी-अपनी सभाएँ करते थे। यह प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का स्वरूप था। यह संघ छ: गणराज्यों से मिलकर बना था। मौर्यकालीन भारत में ग्रामों और नगरों में स्वशासन की व्यापक व्यवस्था थी। भारत कृषि प्रधान था जिसकी मूल इकाई स्वशासित एवं स्वतन्त्र ग्राम थे। राजनीतिक संरचना इन ग्राम समुदायों की इकाईयों पर आधारित थी। चुनी हुई पंचायत गाँव का शासन चलाती थी। गाँव के मध्य में पंचायत हुआ करती थी, जहाँ बुजुर्ग परस्पर मिला करते थे। प्रत्येक वर्ष गाँव में पंचायत का चुनाव हुआ करता था। इन पंचायतों को न्याय करने का अधिकार प्राप्त था।

पंचायत ही भूमि का बँटवारा करती थी और कर एकत्रित करके गाँव की ओर से सरकार को भी देती थी। पंचायत के चुने हुए सदस्यों से कुछ समितियों का निर्माण किया जाता था और प्रत्येक समिति एक वर्ष के लिए बनाई जाती थी। यदि कोई सदस्य विपरीत व्यवहार करे तो उसे हटाया जा सकता था। यदि कोई सदस्य जन कोष का उचित लेखा-जोखा पेश न करे तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता था। केन्द्रीय स्तर पर राजा शासक था। यदि राजा दुर्व्यवहार करे तो उसे हटाने का प्रजा को भी अधिकार था। राजा को सलाह देने के लिए राज्य परिषद हुआ करती थी। राजा प्रजा की इच्छा के अनुसार कार्य करता था और राजा के सलाहकार (मन्त्री) स्थानीय स्तर के पंचों का सम्मान करते थे। अर्थात् प्राचीन समय में राजा के शासन का आशय प्रजा की सेवा करना था।

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प्रश्न 5.
प्रजातन्त्र की अवधारणा क्या है? वर्तमान भारतीय प्रजातन्त्र के स्वरूप का वर्णन कीजिए। (2008)
अथवा
वर्तमान भारतीय प्रजातन्त्र के स्वरूप का वर्णन कीजिए। (2013)
उत्तर:
प्रजातन्त्र की अवधारणा-राजनीतिक विकास में जो विभिन्न प्रकार की शासन व्यवस्थाएँ रहीं उनमें प्रजातन्त्र संसार की प्रमुख शासन प्रणाली मानी जाती है। इसकी प्रमुख अवधारणा यह है कि राज्य की सम्पूर्ण शक्ति की स्वामी जनता है, कोई व्यक्ति, समूह या कोई वंश नहीं। अतः जनता की सहभागिता प्रजातन्त्र का मूल आधार है। जिन निर्णयों या कार्यों का प्रभाव सभी पर पड़ता है, उन निर्णयों में सभी की भूमिका होनी चाहिए।

प्रजातन्त्र के प्रारम्भिक काल में सीमित जनसंख्या एवं सीमित क्षेत्रफल वाले छोटे राज्य होने से सारी जनता शासन संचालन सम्बन्धी निर्णयों में सहभागी होती थी। अतः सीमित क्षेत्रफल एवं सीमित जनसंख्या वाले छोटे-छोटे राज्यों में इसका व्यवहार होने लगा। यूनान के नगर राज्यों में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की शुरूआत मानी जाती है। वर्तमान राज्यों में उनके विस्तार एवं जनसंख्या की दृष्टि से बड़े होने से जनता द्वारा प्रत्यक्ष शासन सम्भव नहीं था। अत: जनता अप्रत्यक्ष रूप से अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन की शक्ति का उपयोग करती है। अतः वर्तमान में प्रजातन्त्र अप्रत्यक्ष रूप से जन प्रतिनिधियों के माध्यम से संचालित प्रजातन्त्र कहलाता है।

वर्तमान भारतीय प्रजातन्त्र-स्वतन्त्रता प्राप्त होने के कुछ समय पूर्व ही भारत में एक संविधान सभा की स्थापना की गयी थी, जिसने 26 नवम्बर, 1949 को संविधान निर्माण का कार्य पूर्ण किया और 26 जनवरी, 1950 से यह संविधान लागू किया गया। संविधान के द्वारा भारत में एक प्रजातन्त्रात्मक गणराज्य की स्थापना की गयी है और प्रजातन्त्र के आधारभूत सिद्धान्त ‘वयस्क मताधिकार’ को स्वीकार किया गया है। संविधान के द्वारा एक धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना की गयी और नागरिकों को शासन के हस्तक्षेप से स्वतन्त्र रूप में मौलिक अधिकार प्रदान किये गये हैं। व्यवहार में भी भारतीय नागरिक इन स्वतन्त्रताओं का पूर्ण उपभोग कर रहे हैं। इस प्रकार यह कहा जाता है कि भारतीय संविधान आदर्श रूप में एक लोकतन्त्रात्मक संविधान है।

आज तक सम्पन्न हुए विभिन्न लोकसभा और विधान सभा चुनावों में भारतीय नागरिकों के द्वारा सक्रिय सहभागिता एवं परिपक्वता का परिचय दिया है। आपातकाल के अपवाद को छोड़कर समय से एवं निष्पक्ष चुनावों का होना, भारतीय प्रजातन्त्र की निरन्तरता का सूचक है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न होने वाले पंचायतों एवं नगरीय क्षेत्रों में नगरीय निकायों के चुनाव भी भारतीय प्रजातन्त्र की व्यापकता का प्रमाण है।

भारतीय जनता लोकतन्त्रीय व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध है और भविष्य में किसी भी शासक वर्ग के द्वारा लोकतन्त्र की अवहेलना का दुस्साहस नहीं किया जा सकेगा। लेकिन लोकतन्त्रीय शासन के ढाँचे को बनाये रखना ही पर्याप्त नहीं है; लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि लोकतन्त्र के लक्ष्य को प्राप्त किया जाए और वह लक्ष्य है-सामाजिक एवं आर्थिक न्याय। हम इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाये हैं और दुःखद तथ्य यह है कि हम इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भी आगे नहीं बढ़ रहे हैं। भारत और भारतीय मनोभूमि में लोकतन्त्र गहरा बैठ गया है और यही भविष्य में इसकी सफलता का सबसे बड़ा आधार है।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की शुरूआत मानी जाती है (2008)
(i) ब्रिटिश के नगर राज्यों से
(ii) यूनान के नगर राज्यों से
(iii) फ्रांस के नगर राज्यों से
(iv) जर्मनी के राज्यों से।
उत्तर:
(ii) यूनान के नगर राज्यों से

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र को ‘बहुतों का शासन’ कहा है (2008)
(i) डायसी,
(ii) अब्राहम लिंकन
(iii) अरस्तू
(iv) लेनिन।
उत्तर:
(iii) अरस्तू

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र का अभिजनवादी सिद्धान्त किस शताब्दी के प्रारम्भ में प्रतिपादित हुआ?
(i) 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में
(ii) 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में
(iii) 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में
(iv) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(iii) 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में

प्रश्न 4.
प्रजातन्त्र का शास्त्रीय सिद्धान्त
(i) बहुलवादी सिद्धान्त भी कहलाता है
(ii) प्रजातन्त्र का विशिष्ट वर्गीय सिद्धान्त भी कहलाता है
(iii) उदारवादी सिद्धान्त भी कहलाता है
(iv) अभिजनवादी सिद्धान्त भी कहलाता है।
उत्तर:
(iii) उदारवादी सिद्धान्त भी कहलाता है

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प्रश्न 5.
प्रथम महायुद्ध के पश्चात् 1990 तक साम्यवाद की विचारधारा का प्रयोग हुआ
(i) स्विट्जरलैण्ड में
(ii) ब्रिटेन में
(iii) सोवियत संघ में
(iv) फ्रांस में।
उत्तर:
(iii) सोवियत संघ में

प्रश्न 6.
भारत में आपातकाल लागू हुआ
(i) 1970-1972
(ii) 1972-1974
(iii) 1975-1977
(iv) 1978-1980
उत्तर:
(iii) 1975-1977

रिक्त स्थान पूर्ति

  1. ………. जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा संचालित शासन है। (2017)
  2. निश्चित भू-भाग, जनसंख्या, सरकार और सम्प्रभुता से निर्मित समूह ………… कहलाता है। (2011)
  3. वर्तमान में भारत विश्व का सबसे बड़ा ……….. देश है। (2012)
  4. स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त भारतीय संविधान ………. में लागू हुआ। (2009)

उत्तर:

  1. प्रजातन्त्र
  2. राज्य
  3. प्रजातांत्रिक
  4. 26 जनवरी, 1950।

सत्य/असत्य

प्रश्न 1.
शोषण की अवधारणा प्रजातन्त्र की है। (2017)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 2.
वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र ही प्रचलित है।
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र में स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव होना चाहिए। (2015)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 4.
प्रजातन्त्र में उत्तरदायी शासन व्यवस्था नहीं होती। (2009)
उत्तर:
असत्य

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प्रश्न 5.
डायसी ने प्रजातन्त्र को ‘बहुतों का शासन’ कहा है। (2014)
उत्तर:
असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 12 प्रजातन्त्र - 1

उत्तर:

  1. → (घ)
  2. → (ग)
  3. → (ख)
  4. → (ङ)
  5. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
राज्य की. सर्वोच्च सत्ता। (2016)
उत्तर:
सम्प्रभुता

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त किस अधिकार पर बल देता है?
उत्तर:
आर्थिक समानता

प्रश्न 3.
‘प्रजातन्त्र, जनता का, जनता के लिये, जनता द्वारा संचालित शासन है’ यह कथन किसका है? (2009)
उत्तर:
अब्राहम लिंकन का

प्रश्न 4.
स्विट्जरलैण्ड के राजनैतिक प्रशासनिक प्रान्त/इकाई। (2016)
उत्तर:
कैण्टन

प्रश्न 5.
कौन-सी अवधारणा प्रजातन्त्र की है? (2013)
उत्तर:
स्वतन्त्रता।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रजातन्त्र आरम्भिक काल में किन निर्णयों में सहभागी होती थी ?
उत्तर:
प्रजातन्त्र के आरम्भिक काल में सीमित जनसंख्या एवं सीमित क्षेत्रफल वाले छोटे राज्य होने से सारी जनता शासन संचालन सम्बन्धी निर्णयों में सहभागी होती थी।

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प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रजातन्त्र एक ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें शासन की शक्ति जनता के पास होती है और शासन . संचालन जनता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से करती है।

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र के बहुलवादी सिद्धान्त की मूल धारणा क्या है?
उत्तर:
सत्ता का विकेन्द्रीकरण इस सिद्धान्त की मूल धारणा है।

प्रश्न 4.
प्रजातन्त्र के मार्क्सवादी सिद्धान्त के अनुसार किस प्रकार के समाज की स्थापना होनी चाहिए?
उत्तर:
प्रजातन्त्र के मार्क्सवादी सिद्धान्त के अनुसार सच्चे प्रजातन्त्र के लिये एक वर्ग विहीन तथा राज्य विहीन समाज की स्थापना होनी चाहिए।

प्रश्न 5.
प्रजातन्त्र के प्रमुख प्रकार लिखिए।
उत्तर:
साधारणतः प्रजातन्त्र दो प्रकार का होता है-प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र और अप्रत्यक्ष या प्रतिनिधि मूलक प्रजातन्त्र।

प्रश्न 6.
प्रजातन्त्र की रक्षा के लिए किस प्रकार का संविधान होना आवश्यक है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र की रक्षा के लिए लिखित संविधान का होना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
भारतीय प्रजातन्त्र की आंशिक पूर्वपीठिका किसे कहा गया?
उत्तर:
ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम एवं भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा बनाये गये कानून, वर्तमान भारतीय प्रजातन्त्र की आंशिक पूर्वपीठिका कही जा सकती है।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र :
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में राज्य की प्रभुता सम्पन्न जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन के कार्यों में भाग लेती है, नीति निर्धारित करती है, कानून बनाती है और प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त कर उन पर नियन्त्रण रखती है।

प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कम जनसंख्या वाले एवं छोटे आकार वाले राज्यों में ही सम्भव है। वर्तमान में बड़े आकार वाले राष्ट्रों में जहाँ नागरिकों की संख्या करोड़ों में होती है, प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र सम्भव नहीं है। वर्तमान में स्विट्जरलैण्ड के कुछ कैंटनों एवं भारत में पंचायत राज व्यवस्था के अन्तर्गत ग्रामसभाओं में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की व्यवस्था है।

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र का महत्त्व स्पष्ट कीजिए। (2008, 09, 11)
उत्तर:
प्रजातन्त्र का महत्त्व :
प्रजातन्त्र स्वतन्त्रता, समानता, सहभागिता और भाई-चारे की भावना पर आधारित शासन व्यवस्था है। इसे हम एक सामाजिक व्यवस्था भी कह सकते हैं। इसके अन्तर्गत मानव का सम्पूर्ण जीवन इस लोकतन्त्रीय मान्यता पर आधारित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को समाज में समान महत्त्व एवं व्यक्तित्व की गरिमा प्राप्त है। व्यक्ति के महत्त्व की यह स्थिति यदि जीवन के केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही हो, तो प्रजातन्त्र अधूरा रहता है। प्रजातन्त्र की पूर्णता के लिए यह अनिवार्य है कि जीवन के राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक तीनों ही क्षेत्रों में सभी व्यक्तियों को अपने विकास के समान अवसर प्राप्त हों।

मानव जीवन के राजनीतिक क्षेत्र में प्रजातन्त्र से आशय ऐसी राजनीतिक व्यवस्था से है जिसमें निर्णय लेने की शक्ति किसी एक व्यक्ति में न होकर जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों में निहित होती है। सामाजिक क्षेत्र में प्रजातन्त्र से आशय इस प्रकार के समाज से है, जिसमें जाति, धर्म, रंग, लिंग, नस्ल, मूलवंश व सम्पत्ति के आधार पर भेद-भाव न हो।

आर्थिक क्षेत्र में प्रजातन्त्र से आशय इस प्रकार की व्यवस्था से है जिसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका चुनने या व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता प्राप्त हो। अर्थात् व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा रोजगार आदि की सुविधाएँ प्रजातन्त्र के आधार हैं। अतः प्रजातन्त्र न केवल शासन का एक विशेष प्रकार है बल्कि यह जीवन के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण है।

प्रश्न 3.
“स्वतन्त्रता प्रजातंत्र की आत्मा है।” कथन की पुष्टि कीजिए। (2015)
उत्तर:
प्रजातंत्र में नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए अनेक प्रकार की स्वतन्त्रताएँ प्राप्त होती हैं। राजनैतिक स्वतन्त्रता के अतिरिक्त नागरिकों को अनेक प्रकार की धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रताओं के अधिकार भी प्राप्त होते हैं। प्रजातंत्र में नागरिकों को मत देने, निर्वाचित होने, सार्वजनिक पद ग्रहण करने, भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सूचना प्राप्त करने का अधिकार सम्मेलन सभा करने, समूह बनाने, व्यापार व्यवसाय करने आदि की स्वतन्त्रताएँ प्राप्त होती हैं। नागरिक यदि शासन की नीतियों से असहमत हों, तो संयमित विरोध की स्वतन्त्रता भी उन्हें प्राप्त है। स्वतन्त्रता प्रजातंत्र की आत्मा है। बिना स्वतन्त्रता प्रजातंत्र सम्भव नहीं है।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 12 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रजातन्त्र के प्रकारों का वर्णन कीजिए।(2011)
अथवा
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में अन्तर लिखिए। (2012)
उत्तर:
साधारणतः प्रजातन्त्र दो प्रकार का होता है –
(1) प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र :
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में राज्य की प्रभुता सम्पन्न जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन के कार्यों में भाग लेती है, नीति निर्धारित करती है, कानून बनाती है और प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त कर उन पर नियन्त्रण रखती है।

प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कम जनसंख्या वाले एवं छोटे आकार वाले राज्यों में ही सम्भव है। वर्तमान में बड़े आकार वाले राष्ट्रों में जहाँ नागरिकों की संख्या करोड़ों में होती है, प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र सम्भव नहीं है। वर्तमान में स्विट्जरलैण्ड के कुछ कैंटनों एवं भारत में पंचायत राज व्यवस्था के अन्तर्गत ग्रामसभाओं में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की व्यवस्था है।

(2) अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र :
जब जनता निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि निर्माण तथा शासन के कार्यों पर नियन्त्रण रखने का कार्य करती है तो उसे अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कहते हैं। वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र ही प्रचलित है। इसमें जनता निश्चित अवधि के लिए अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो व्यवस्थापिका का गठन करते हैं और कानूनों का निर्माण करते हैं। अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति, निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम होती है।

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