MP Board Class 9th Special Hindi पत्र-लेखन

MP Board Class 9th Special Hindi पत्र-लेखन

प्रश्न 1.
अपने भाई के शुभ-विवाह में सम्मिलित होने हेतु अपने प्रधानाचार्य को अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र लिखिए।
उत्तर-
अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र
सेवा में,
प्रधानाचार्य महोदय
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
सतना (म. प्र.)

मान्यवर,
सविनय निवेदन है कि मेरे बड़े भाई का शुभ विवाह 21 नवम्बर, 20…..को होना निश्चित हुआ है। बरात रीवा शहर की सिविल लाइन्स स्थित मान्धाता धर्मशाला के लिए दिनांक 21 नवम्बर, 20……….को ही प्रातः 6 बजे बस द्वारा प्रस्थान करेगी। मैं स्वयं बरात में सम्मिलित होऊँगा। अत: मुझे तीन दिन (दिनांक 20 नवम्बर, 20……..से दिनांक 22 नवम्बर, 20……) का अवकाश प्रदान करने की कृपा करें।

सधन्यवाद
दिनांकः 19 नवम्बर, 20……

आपका आज्ञाकारी शिष्य
महेन्द्र प्रताप सिंह
कक्षा 9 अ

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प्रश्न 2.
तुम्हारे पिताजी एक साधारण शासकीय सेवा में हैं। आपके भाई-बहन भी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इस तरह शिक्षा के भार को सहन करना उनके लिए कठिन है। अतः
अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य महोदय के लिए प्रार्थना-पत्र लिखकर शुल्क मुक्ति के लिए निवेदन कीजिए।
उत्तर-
शुल्क मुक्ति के लिए प्रार्थना-पत्र
सेवा में,
श्रीमान् प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
सागर (म.प्र)

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय में कक्षा 9 अ का विद्यार्थी हूँ। मेरे पिताजी राजकीय सेवा में हैं। वे हम सभी घर के सदस्यों का पालन-पोषण बड़ी कठिनाई से कर पाते हैं।

मेरा पिछला पढ़ाई का रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है। इस कारण मुझे पिछले वर्षों में भी शुल्क में मुक्ति मिलती रही है। आपसे प्रार्थना है कि मुझे इस वर्ष भी शुल्क में मुक्ति देकर मुझ पर बड़ी कृपा करेंगे। मैं आपसे वायदा करता हूँ कि इस वर्ष भी कक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने का प्रयास करूंगा।

अन्त में, मुझे पूर्ण विश्वास है कि मुझे फीस में पूरी-पूरी . छूट देकर बड़ी कृपा करेंगे। मैं आजीवन आपका ऋणी रहूँगा।

दिनांक: 19.7.20…….

आपका आज्ञाकारी शिष्य
मोहन चन्द्र
कक्षा 9 अ

प्रश्न 3.
परीक्षा की तैयारी का उल्लेख करते हुए रुपये मँगवाने के लिए अपने पिताजी को एक पत्र लिखिए।
उत्तर-
पिताजी को पत्र
कक्ष सं. 105. गाँधी आश्रम हॉस्टल,
बन्नी पार्क, इन्दौर (म. प्र)
दिनांक 15.11.20……

पूज्य पिताजी,

सादर चरण स्पर्श!
आपका पत्र मिला। पत्र पढ़कर प्रसन्नता हुई। मैं आजकल ‘अपनी अर्द्ध वार्षिक परीक्षाओं की तैयारी में लगा हुआ हूँ। प्रतिदिन छ: या सात घण्टे तक पढ़ाई में लगा रहता हूँ। मैं अभी तक लगभग सभी विषयों का अध्ययन कर चुका हूँ। पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दे रहा हूँ। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि पिछली कक्षाओं की तरह इस कक्षा में भी सर्वोच्च अंक प्राप्त कर सकूँगा। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि मैं आपके सम्मान में चार चाँद ही लगाऊँगा। मुझे कुछ धन की आवश्यकता है, कृपया पाँच सौ रुपये मनीऑर्डर से भेज दीजिए जिससे मैं अपनी अंग्रेजी और गणित की पुस्तकों को खरीद लाऊँ और अपनी पढ़ाई बहुत अच्छी तरह कर सकूँ। आदरणीया माताजी को मेरा चरण स्पर्श कहियेगा।

दिनांक: 17.11.20……

आपका प्रिय पुत्र
आनन्द प्रताप सिंह

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प्रश्न 4.
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए अपने मित्र को एक बधाई पत्र लिखिए।
उत्तर-
मित्र को बधाई पत्र
प्रिय मित्र पल्लव,

सप्रेम हृदय स्पर्श।
आज प्रातकालः ‘दैनिक जागरण’ समाचार-पत्र में तुम्हारा अनुक्रमांक देखा तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। तुम प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए हो। मैं स्वयं को अति भाग्यशाली समझता हूँ कि मैंने तुम जैसे योग्य, चतुर, बुद्धिमान मित्र को प्राप्त किया है। इस सन्दर्भ में मैं तुम्हें अपनी हार्दिक बधाइयाँ देता हूँ और आशा करता हूँ कि तुम अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करोगे और अपने जीवन में सफलताओं के शिखर को प्राप्त करोगे। अपने माता-पिता को मेरी ओर से चरण स्पर्श कहना।

तुम्हारा मित्र
कपिल

प्रश्न 5.
अपने छोटे भाई की कुशल क्षेम जानने के लिए पत्र लिखिए।
उत्तर-
भाई को पत्र
प्रिय आशीष,

शुभाशीर्वाद।
कल तुम्हारा भेजा हुआ पत्र मिला तथा सबकी कुशल क्षेम जानकर हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हुआ। तुम्हें यह समाचार देते हुए प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि मैंने तुम्हारे लिए कहानी तथा चुटकुलों की कुछ पुस्तकें खरीद ली हैं। अब आऊँगा तो सबके लिए कुछ मिष्ठान तथा नमकीन भी लाऊँगा। गुंजन के लिए एक अच्छी-सी साड़ी भी लेकर आऊँगा। यहाँ तुम्हारे भतीजे तथा भाभी पूरी तरह स्वस्थ एवं सानन्द हैं। वे सब तुम्हारे पत्र को बार-बार पढ़कर सुखानुभूति करते हैं। मैं 28 मई को प्रात:काल वाली ट्रेन से आऊँगा।

माताजी एवं पिताजी को सादर प्रणाम तथा छोटों को प्यार। शेष सब ठीक है।

शुभेच्छु
अक्षय कुलश्रेष्ठ

प्रश्न 6.
बुक बैंक से पुस्तकें देने के विषय में अपने प्रधानाचार्य महोदय को आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
बुक बैंक से पुस्तकें देने के
विषय में आवेदन-पत्र

प्रधानाध्यापक महोदय,
विद्यालय-सरस्वती नगर

विषय-बुक-बैंक से पुस्तक देने हेतु

मान्यवर,
विनम्र निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय का कक्षा 9 ‘ब’ का छात्र हैं। निर्धन होने के कारण मैं अपने पाठ्यक्रम में निर्धारित समस्त पुस्तकों को खरीदने में पूरी तरह असमर्थ हूँ। मेरे पिता की मासिक आय बहुत कम है।

इस हेतु आपसे विनम्र निवेदन है कि बुक-बैंक से वांछित पुस्तकें दिलवाने का आदेश पारित करें। जब मेरी वार्षिक परीक्षा सम्पन्न हो जायेगी तभी समस्त पुस्तकों को समय पर वापस कर दूंगा।

आपकी इस महती अनुकम्पा के लिए मैं आजन्म आपका ऋणी रहूँगा।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
निशान्त शर्मा

प्रश्न 7.
तुम्हारे पिताजी या अभिभावक का स्थानान्तरण हो जाने के कारण विद्यालय छोड़ने का प्रमाण-पत्र (टी.सी) प्राप्त करने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
प्रधानाचार्य को विद्यालय छोड़ने
का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु आवेदन-पत्र

सेवा में,
प्रधानाध्यापक महोदय,
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
ग्वालियर।

महोदय,
सेवा में विनम्र प्रार्थना है कि मैं आपके विद्यालय में कक्षा 9 वीं का संस्थागत छात्र हूँ। मेरे अभिभावक का स्थानान्तरण हो गया है। इस हेतु मैं आपके विद्यालय में आगे अपना अध्ययन करने में असमर्थ हूँ। अत: मुझे विद्यालय त्यागने का प्रमाण-पत्र देने हेतु आदेश करें। मैंने अपना समस्त शुल्क तथा पुस्तकालय की ली हुई पुस्तकें भी लौटा दी हैं। मेरे पास विद्यालय का कुछ भी देने को शेष नहीं है। आशा है कि आप सहयोग देकर अनुगृहीत करेंगे।

दिनांक: 20.7.20…..

आपका आज्ञाकारी शिष्य
अक्षय
कक्षा IX-स

प्रश्न 8.
अपने निवास के आस-पास नालियों की सफाई कराने हेतु तथा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव कराने हेतु सुझाव देते हुए अपने नगर निगम के सक्षम अधिकारी को एक आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
नगर निगम के सक्षम अधिकारी को नालियों की सफाई कराने हेतु तथा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव कराने के लिए आवेदन-पत्र

सेवा में,
श्रीमान् आयुक्त महोदय,
नगर-निगम, भोपाल (म.प्र)

महोदय,
मैं आपका ध्यान नगर की नेहरू नगर कॉलोनी की स्वच्छता के सम्बन्ध में आकर्षित करना चाहता हूँ। इस कॉलोनी में पिछले दो-तीन माह से नियमित सफाई नहीं की जा रही है। इस कारण नालियाँ सिल्ट तथा गन्दगी से भरी पड़ी हैं। इससे मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है। साथ ही महामारी फैलने का भी भय पैदा हो गया है।

अतः आपसे साग्रह निवेदन है कि आप अपने अधीनस्थ सफाईकर्मियों को कॉलोनी में नालियों की सफाई करने और कीटनाशक औषधियों के छिड़काव के लिए अपने निर्देश देने की कृपा करें। इससे कॉलोनी का पर्यावरण स्वच्छ बना रहेगा।

भवदीय
मोहन स्वरूप 97,
नेहरू नगर कॉलोनी,
भोपाल (म. प्र)

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प्रश्न 9.
अपने क्षेत्र में पेड़-पौधों के अनियमित कटाव को रोकने के लिए जिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए।
उत्तर-
पेड़-पौधों के अनियमित कटाव को रोकने हेतु जिलाधिकारी को एक पत्र

प्रतिष्ठा में,
जिलाधिकारी महोदय,
इन्दौर (म. प्र.)

मान्यवर,
पिछले सप्ताह से सड़क चौड़ी करने के नाम से हमारे क्षेत्र के असंख्य पेड़-पौधों को बड़ी बेरहमी से काटा जा रहा है। इन पेड़-पौधों को नियमित रूप से काटा जाय तो कोई खास हानि हमारे पर्यावरण के लिए भी नहीं होगी। इस बेतरतीव कटाई से तो हरियाली भी मिट रही है, साथ ही प्रदूषण का प्रभाव भी बढ़ रहा है। पेड़-पौधों की अनियमित कटाई करना न केवल धर्म विरुद्ध कार्य है, वरन् कानून के खिलाफ आचरण भी है।

अतः आपसे निवेदन है कि उक्त कार्यवाही को तत्काल रोककर क्षेत्रीय पर्यावरण की सुरक्षा की दिशा में प्रभावकारी पहल करने की कृपा कीजिए।

दिनांक: 31.9.20…..

भवदीय
राकेश रमण ठाकुर
नेहरू रोड (पश्चिम),
इन्दौर (म. प्र.)

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 1 Matter in Our Surroundings

MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 1 Matter in Our Surroundings

Matter in Our Surroundings Intext Questions

Matter in Our Surroundings Intext Questions Page No. 3

Question 1.
Which of the following are matter? Chair air, love, smell, hate, almonds, thought, cold, cold – drink smell of perfume.
Answer:
Chair, air, almonds and cold – drink.

Question 2.
Give reasons for the following observation: The smell of hot sizzling food reaches you several metres away, but to get the smell from cold food you have to go close.
Answer:
The particles of hot food have more kinetic energy due to higher temperature, so their rate of diffusion is more and they move several meters away as compared to the particles of cold food.

Question 3.
A diver is able to cut through water in a swimming pool. Which property of matter does this observation show?
Answer:
This shows that the particles of matter have space between them and a weak force of attraction between them.

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Question 4.
What are the characteristics of the particles of matter?
Answer:
Following are the characteristics of the particles of matter:

  1. Particles of matter are very small.
  2. Particles of matter have space between them.
  3. Particles of matter are continuously moving.
  4. Particles of matter attract each other.

Matter in Our Surroundings Intext Questions Page No. 6

Question 1.
The mass per unit volume of a substance is called density, (density = mass / volume). Arrange the following in order of increasing density: air, exhaust from chimneys, honey, water, chalk, cotton and iron.
Answer:
The order of increasing densities:
air < exhaust from chimneys < cotton < water < honey < chalk < iron.

Question 2.
(a) Tabulate the differences in the characteristics of states of matter.
(b) Comment upon the following: Rigidity, Compressibility, Fluidity, Filling a gas container, Shape, Kinetic energy and Density.
Answer:
(a)
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 1 Matter in Our Surroundings 1

(b)
(i) Rigidity: It is the tendency of matter to retain or maintain its shape when an outside force is applied.

  • Solids are rigid in matter

(ii) Compressibility: It is the property of matter due to which it can be compressed to lower volume.

  • Solids have minimum compressibility, but gases have maximum.

(iii) Fluidity: It is the tendency of a matter or particles of a matter to flow.

  • Liquid and gases have fluidity so they are fluids.

(iv) Filling a gas container: Gas particles fill the container completely due to negligible intermolecular force and maximum space between particles.

(v) Shape: It is the property of a matter which indicates its boundaries.

  • Solid have fixed shape but liquids and gases have no fixed shape.

(vi) Kinetic energy: The energy of matter or particles of matter due to their motion is called kinetic energy.

  • Particles of gases have highest kinetic energy and liquids have less kinetic energy than gases but more than solids.

(vii) Density: It is mass per unit volume.

  • Solids have highest density, liquids have low density than solids but greater than gases.

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Question 3.
Give reasons:
(a) A gas fills completely the vessel in which it is kept.
(b) A gas exerts pressure on the walls of the container.
(c) A wooden table should be called a solid.
(d) We can easily move our hand in air but to do the same through a solid block of wood, we need a karate expert.
Answer:
(a) The molecules of gas have very less force of attraction and possess high kinetic energy due to which they move in all directions and fill the vessel completely.

(b) The particles of gas move freely and randomly in all directions. So, they collide with each other and also with the walls of the container due to which they exert a Pressure on its walls.

(c) A wooden table has a fixed shape, fixed volume. It is rigid and cannot be compressed. So it should be called a solid.

(d) The particles of Air have very less force of attraction between them, so we can easily move our hand, but particles of wood have strong force of attraction, so we have to apply a greater amount of force to break it and pass through solid wood.

Question 4.
Liquids generally have lower density as compared to solids. But you must have observed that ice floats on water. Find out why.
Answer:
We know that ice is solid and water is liquid but the structure of ice is cage like due to which the molecules of water are not closely packed and have vacant space between them due to which ice has low density than water and floats over it.

Matter in Our Surroundings Intext Questions Page No. 9

Question 1.
Convert the following temperature to celsius scale:
(a) 300 K
(b) 573 K
Answer:
(a) 300 K = (300 – 273)°C = 27°C.
(b) 573 K = (573 – 273)°C = 300°C.

Question 2.
What is the physical state of water at:
(a) 250°C
(b) 100°C?
Answer:
(a) Gaseous state.
(b) Liquid and gaseous both.

Question 3.
For any substance, why does the temperature remain constant during the change of state?
Answer:
During the change of state of any substance, the temperature remains constant because the heat supplied to the substance is used in overcoming the force of attraction between the particles and change its state. This hidden heat is called latent heat.

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Question 4.
Suggest a method to liquefy atmospheric gases.
Answer:
The atmospheric gases can be liquefied by cooling and applying pressure on them in a closed chamber or cylinder.

Matter in Our Surroundings Intext Questions Page No. 10

Question 1.
Why does a desert cooler cool better on a hot dry day?
Answer:
On a hot dry day, the rate of evaporation is high because of low humidity. So, water sprinkling on the pads of cooler gets evaporated from outside which results in making its walls cool and then we receive cool air.

Question 2.
How does the water kept in an earthen pot (matka) become cool during summer?
Answer:
The earthen pot has a lot of pores on its surface. So, water comes out and gets evaporated from these pores and cools the water inside the pot.

Question 3.
Why does our palm feel cold when we put some acetone or petrol or perfume on it?
Answer:
When we put acetone, petrol or perfume on our palm, then these liquids absorb energy from our palm and get evaporated which cause cooling effect on our palm.

Question 4.
Why are we able to sip hot tea or milk faster from a saucer rather than a cup?
Answer:
Saucer has a large surface area than a cup. So the rate of evaporation is more in saucer than cup which causes faster cooling of the hot tea. Hence, we can sip hot tea from a saucer faster than cup.

Question 5.
What type of clothes should we wear in summer?
Answer:
Light coloured cotton clothes should be worn in summer because light colour reflects heat and cotton absorbs sweat quickly and evaporates it easily which makes our body feel cool and dry.

Matter in Our Surroundings NCERT Textbook Exercises

Question 1.
Convert the following temperatures to the Celsius scale.
(a) 293 K
(b) 470 K.
Answer:
(a) 293 K into°C
⇒ 993 – 273 = 20°C

(b) 470 K into°C
⇒ 470 – 273 = 197°C

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Question 2.
Convert the following temperatures to the Kelvin scale.
(a) 25°C
(b) 373°C
Answer:
(a) 25°C = 25 + 273 = 298 K
(b) 373°C = 373 + 273 = 646 K.

Question 3.
Give reason for the following observations.
(a) Naphthalene balls disappear with time without leaving any solid.
(b) We can get the smell of perfume sitting several metres away.
Answer:
(a) Naphthalene balls disappear with time without leaving any solid, because naphthalene balls sublime and directly change into vapour state without leaving any solid.

(b) We can get the smell of perfume sitting several metres away because perfume contains volatile solvent i.e., gaseous particles, which have high speed and large space between them and diffuse faster and can reach people sitting several metres away.

Question 4.
Arrange the following substances in increasing order of forces of attraction between the particles – water, sugar, oxygen.
Answer:
Oxygen → water → sugar.

Question 5.
What is the physical state of water at:
(a) 25°C
(b) 0°C
(c) 100°C?
Answer:
(a) 25°C is liquid.
(b) 0°C is solid or liquid.
(c) 100°C is liquid and gas.

Question 6.
Give two reasons to justify:
(a) water at room temperature is a liquid.
(b) an iron almirah is a solid at room temperature.
Answer:
(a) Water at room temperature is a liquid because its freezing point is 0°C and boiling point is 100°C.
(b) An iron almirah is a solid at room temperature because melting point of iron is higher than the room temperature.

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Question 7.
Why is ice at 273 K more effective in cooling than water at the same temperature?
Answer:
Ice at 273 K will absorb heat energy or latent heat from the medium to overcome the heat of fusion to become water. Hence, the cooling effect of ice is more than the water at same temperature because water does not absorb this extra heat from the medium.

Question 8.
What produces more severe burns, boiling water or steam?
Answer:
Steam at 100°C will produce more severe burns as extra heat is hidden in it called latent heat. Whereas, the boiling water does not have this hidden heat.

Question 9.
Name A, B, C, D, E and F in the following diagram showing change in its state
MP Board Class 9th Science Solutions Chapter 1 Matter in Our Surroundings 2
Answer:
A → Liquefication / melting / fusion
B → Vaporisation / evaporation
C → Condensation
D → Solidification
E → Sublimation
F → Sublimation

Matter in Our Surroundings Additional Questions

Matter in Our Surroundings Multiple Choice Questions

Question 1.
Which of the following substances is solid?
(a) Plasma
(b) BEC
(c) Wood
(d) Mercury
Answer:
(c) Wood

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Question 2.
Fusion is the phenomenon of changing of state of __________ .
(a) Liquid to gas
(b) Solid to liquid
(c) Solid to gas
(d) Gas to plasma.
Answer:
(b) Solid to liquid

Question 3.
Diffusion is not possible in the case of __________ .
(a) Liquid into Solid
(b) Gas into liquid
(c) Gas into Gas
(d) Solid into Solid.
Answer:
(d) Solid into Solid.

Question 4.
Compressibility is highest in __________ .
(a) Liquid
(b) Solid
(c) Gas
(d) Plasma.
Answer:
(c) Gas

Question 5.
We can smell odour of deodrant several metres away due to __________ .
(a) Diffusion
(b) Evaporation
(c) Fusion
(e) None.
Answer:
(a) Diffusion

Question 6.
Which of the following do not exhibit sublimation?
(a) Water
(b) Camphor
(c) Naphthalene
(d) Dry ice.
Answer:
(a) Water

Question 7.
Ice floats on water because of __________ .
(a) Higher density than water
(b) Equal density than water
(c) Lower density than water
(d) None of these.
Answer:
(c) Lower density than water

Question 8.
As the pressure of air increases then boiling point of liquid __________ .
(a) Increases
(b) Decreases
(c) Remains same
(d) None of these.
Answer:
(a) Increases

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Question 9.
The atmospheric pressure equals to __________ .
(a) 1.01325 × 108 Pa
(b) 101.3 25 × 104 Pa
(c) 1.01325 × 105 Pa
(d) 1.01325 × 102 Pa.
Answer:
(c) 1.01325 × 105 Pa

Question 10.
Cooking at high altitudes is difficult because __________ .
(a) Boiling point decreases
(b) Boiling point increases
(c) Freezing point reduced
(d) None of the above.
Answer:
(a) Boiling point decreases

Question 11.
Density of water is highest at __________ .
(a) 3°C
(b) 5°C
(c) 4°C
(d) 6°C.
Answer:
(a) 3°C

Question 12.
Dry ice is __________ .
(a) Solid carbon monoxide (CO)
(b) Solid Nitrogen dioxide (NO2)
(c) Solid carbon dioxide (CO2)
(d) Solid Ammonia (NH3).
Answer:
(c) Solid carbon dioxide (CO2)

Question 13.
The amount of heat required to change the state of 1 kg of substance is called __________ .
(a) Calorific heat
(b) Latent heat
(c) Thermal heat
(d) Conversion heat.
Answer:
(b) Latent heat

Question 14.
Evaporation takes place at __________ .
(a) Boiling point
(b) Melting point
(c) Freezing point
(d) At all temperatures.
Answer:
(d) At all temperatures.

Question 15.
Evaporation generally takes place at __________ .
(a) Below boiling point
(b) Above boiling point
(c) At boiling point
(d) None.
Answer:
(a) Below boiling point

Question 16.
Evaporation causes __________ .
(a) Heating effect
(b) Boiling effect
(c) Cooling effect
(d) Absorbing effect.
Answer:
(c) Cooling effect

Question 17.
Latent heat of vaporisation of water is __________ .
(a) 2.25 × 106 J/kg
(b) 3.34 × 106 J/kg
(c) 22.5 × 106 J/kg
(d) 33.4 × 105 J/kg.
Answer:
(a) 2.25 × 106 J/kg

Question 18.
Which factor does not affect the rate of evaporation?
(a) Humidity
(b) Colour
(c) Wind Speed
(d) Surface area.
Answer:
(b) Colour

Question 19.
The rate of evaporation is minimum in __________ .
(a) Dry day
(b) Humid day
(c) Hot day
(d) Stormy day.
Answer:
(b) Humid day

Question 20.
Which of the following processes consumes heat?
(i) Melting
(ii) Freezing
(iii) Vaparisation
(iv) Condensation.

(a) (i) and (ii)
(b) (ii) and (iii)
(c) (i) and (iii)
(d) (ii) and (iv).
Answer:
(c) (i) and (iii)

Matter in Our Surroundings Very Short Answer Type Questions

Question 1.
Define Matter.
Answer:
Matter is defined as something which occupies space and has mass.

Question 2.
What is the melting point of ice?
Answer:
0°C or 273 K.

Question 3.
Name the phenomenon by which two substances intermix with each other.
Answer:
Diffusion.

Question 4.
Name the physical State of matter which can be highly compressed.
Answer:
Gaseous state.

Question 5.
Name the tiny particles of which matter is made up of.
Answer:
Atoms.

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Question 6.
Name the process of conversion of solid state into gaseous state directly.
Answer:
Sublimation.

Question 7.
Name the Indian scientist who calculated the fifth state of matter.
Answer:
Satyendra Nath Bose.

Question 8.
Name all the states of matter.
Answer:
Solid, liquid, gas, plasma, BEC (Bose Einstein Condensate).

Question 9.
What is Chemical name of dry ice?
Answer:
Solid Carbon Dioxide.

Question 10.
What is the main effect produced by evaporation?
Answer:
Cooling effect.

Matter in Our Surroundings Short Answer Type Questions

Question 1.
Define diffusion? On which features does it depend?
Answer:
It is the mixing of particles of different matters. It depends on the state, temperature and kinetic energy of particles.

Question 2.
Define:
(a) Latent heat of fusion
(b) Latent heat of vaporisation.
Answer:
(a) Latent heat of fusion is the amount of heat energy required to convert 1 kg of a solid into liquid at its melting point.

(b) Latent heat of vaporisation is the amount of heat energy required to convert 1 kg of liquid into gas at its boiling point.

Question 3.
Explain the following terms:
(a) Sublimation
(b) Evaporation.
Answer:
(a) Sublimation: The phenomenon of change of state directly from solid to gas or vapours or vice-versa without changing into liquid state.
Examples:
Dry ice, camphor.

(b) Evaporation: The process of changing matter from liquid state into the vapour state at any temperature below its boiling point.
Examples:
Drying of clothes, volatile liquids like petrol, kerosene.

Question 4.
What are the different factors on which evaporation of liquids depend?
Answer:
The factors on which evaporation depends are:
(a) Temperature
(b) Surface area
(c) Humidity
(d) Wind speed

Question 5.
Write four substances which show sublimation.
Answer:
(a) Camphor
(b) Naphthalene balls
(c) Dry ice
(d) Ammonium chloride

Question 6.
Why the temperature of ice remains constant when it starts melting?
Answer:
When the ice melts, then it absorbs the latent heat of fusion which changes its states. And, that heat is consumed in changing the state, keeping the temperature constant.

Question 7.
How can we liquefy gas? How is it useful to us?
Answer:
Gases can be liquefied by cooling them and by applying pressure into a closed chamber like cylinder. This property of compressibility is useful for us and we use it through different ways e.g., LPG (Liquefied Petroleum Gas), CNG (Compressed Natural Gas) and Liquefied O2 in welding.

Question 8.
Differentiate between:
(a) Freezing and Melting.
(b) Evaporation and Boiling.
Answer:
(a) Freezing and Melting:

(a) FreezingMelting
1. It is the conversion from liquid state into solid state1. It is the conversion from solid to liquid state.
2. Heat is released.2. Heat is absorbed.

(b) Evaporation and Boiling:

(b) EvaporationBoiling
1. It takes place on the surface of liquid.1. It happens to all liquids.
2. It takes place at all temperatures.2. It happens at a particular temperature.
3. It is slow.3. It is fast.
4. It causes cooling.4. It does not cause cooling.

Question 9.
Why solid carbon dioxide is called dry ice?
Answer:
It is because carbon dioxide is pressurised in the form of solid state which looks cool like ice. But when it is heated, it directly get converted into carbon dioxide gas.

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Question 10.
Change the following temperatures accordingly.
(a) -173°C
(b) 250 K
(c) 2°C
(d) 0°K
Answer:
(a) We know that,
Temperature on kelvin = Temperature on Celsius + 273
So, -173°C = (-173 + 273) K = 100 K

(b) 250 K = (250 – 273)°C = -23°C

(c) 2°C = (2 + 273) K = 275 K

(d) 0°K = (0 – 273)°C = -273°C.

Question 11.
Give one example of each: Melting, Vaporisation, Condensation, Sublimation, Evaporation.
Answer:
Melting: Ice to water
Vaporisation: Water to steam
Condensation: LPG
Sublimation: Naphthalene balls, solid iodine
Evaporation: Volatile liquids like petrol.

Matter in Our Surroundings Long Answer Type Questions

Question 1.
Give reasons:
(а) The smell of hot tasty cooked food reaches us from far.
(b) The smell of perfume reaches us several metres away.
(c) The fragrance of an incense stick spreads in entire hall quickly.
(d) Steam is more severe than boiling water.
(e) We see water droplets collected on outer surface of steel glass containing cold water.
(f) We feel lot of perspiration on a humid day.
(g) Evaporation causes cooling.
(h) It is advised to use pressure cooker at high altitudes.
(i) We should wear light colour cotton clothes in summer.
(j) A gas fills the container completely.
(k) Clothes take more time to dry in a humid day.
(l) Kerosene oil is kept in a cool place.
Answer:
(a) The particles of hot tasty food have high kinetic energy due to raised temperature. So, they can easily diffuse and move to long distances.

(b) The particles of perfume are in vapour form. So, they possess high kinetic energy and move randomly and finally reach us several metres away.

(c) The particles of an incense stick are in gaseous state. So, they have high kinetic energy and diffuse quickly into atmosphere and cover the room.

(d) Steam has the heat in the form of latent heat as compared to boiling water. So, it is more severe.

(e) The water vapours present in the atmosphere get condensed when it comes in contact with the chilled container and get deposited in the form of liquid droplets.

(f) The rate of evaporation decreases on humid day as there are sufficient water vapours present in the atmosphere. So, our sweat does not get dried and we perspire a lot.

(g) During the evaporation, the particles on the surface of the fluid take energy and heat from the surface get vaporised which create cooling effect.

(h) It is advised to use pressure cooker at high altitudes because the atmospheric pressure is low and water boils quickly. So, to increase the pressure and to cook the food properly, pressure cooker is required.

(i) Light colour cotton clothes are good reflectors of heat as well as good absorbers of sweat. When sweating occurs, the cotton absorbs it quickly and evaporates it faster.

(j) The particles of gas have very less intermolecular force of attraction and have large intermolecular space. So, they possess high kinetic energy and expand quickly resulting in filling the container completely.

(k) The rate of evaporation is minimum on a humid day. So, cloth takes more time to get dried.

(l) Kerosene a volatile substance and it evaporates quickly and also there is a risk of breaking of bottle due to the pressure created by its particles. So, it is stored in a closed container and kept in a cool place.

Question 2.
(a) What is evaporation? On what factors does it depend?
(b) How is it useful to us?
Answer:
(a) Evaporation:
The phenomenon of changing of a matter from liquid state into the vapour state or gaseous state at any temperature below its boiling point is known as evaporation. The rate of evaporation depends on the following factors:

  1. Surface area: If the surface area of the liquid increases, then evaporation becomes faster.
  2. Temperature: When the temperature of the liquid increases then the kinetic energy of the particles increases which causes faster evaporation.
  3. Wind speed: When the speed of wind increases, it covers the vacant space in the atmosphere created by moving wind, the evaporation gets faster. Also, we have seen that clothes dry faster in a windy day than a normal day.
  4. Humidity: If the humidity is least then rate of evaporation is faster but when humidity is high, then Atmosphere can’t hold much water vapours which causes slow rate of evaporation.

(b) Uses of evaporation:

  1. Drying of clothes.
  2. Separation of different mixtures like water and salt.
  3. Desert coolers etc.

Question 3.
Give one example of each:
(a) Water vapours present in the atmosphere.
(b) Diffusion of a gas into liquid.
(c) Diffusion of a liquid into liquid.
(d) Diffusion of a gas into gas.
(e) Two sublime substances.
Answer:
(a) Presence of water droplets is seen on the outer surface of steel container containing cold water.
(b) Presence of dissolved oxygen in marine water which is used up by aquatic organisms.
(c) Mixing of ink and water.
(d) Burning of incense stick.
(e) Ammonium chloride, Naphthalene balls.

Question 4.
(a) What is matter? What characteristics does a matter possess?
(b) Explain all the five states of matter.
Answer:
(a) Matter: Matter is anything which occupies space and has mass.
(b) Matter has five states:

  1. Solid: It is the state of matter which has a fixed shape, volume, high density, incompressible and cannot flow.
  2. Liquid: It is the state of matter which possesses indefinite shape, definite volume, low compressibility and can flow easily.
  3. Gas: It is the state of matter which possesses indefinite shape, indefinite volume, high compressibility and can flow easily.
  4. Plasma: This state of matter consists of free electrons . and ions in the form of ionised gases.
  5. BEC (Bose – Einstein Condensate): This state of matter is achieved by cooling gas of extremely to low density of about one – hundredth thousand the density of a normal air to super low temperature.

Matter in Our Surroundings Higher Order Thinking Skills (HOTS)

Question 1.
Osmosis is a special kind of diffusion, Comment
Answer:
In diffusion, molecules of a substance move from higher concentration to lower concentration. But, during Osmosis, the water or solvent molecules move from their higher concentration to the place of their lower concentration. Therefore, Osmosis is a special kind of diffusion.

Question 2.
Why does honey diffuse in water at a slower rate than ink?
Answer:
Honey diffuse at a slower rate than ink since the density of honey is greater than that of water.

Matter in Our Surroundings Value Based Questions

Question 1.
Gaurav is preparing for his cricket match in summer camp. He took full sleeves black colour silk shirt for the match. But his mother advised him to wear white half sleeve cotton shirt
(a) Why did mother advise him to wear white cotton shirt?
(b) What type of clothes we should wear in summer?
(c) What values of mother are reflected here?
Answer:
(a) Mother advised him to wear white cotton shirt because white is a good reflector of heat and cotton is a good absorber of sweat and helps in quick evaporation, which will make Gaurav feel cool during the match.

(b) Light coloured cotton clothes should be worn in summer.

(c) Mother showed her values of caring and insightful.

Question 2.
Aakansha parked her scooty in a parking of her society. In the evening, she saw her scooty tyre was burst. Then, she immediately went to mechanic to repair the puncture and advised the mechanic not to inflate the tyres fully.
(а) Why did the scooty punctured?
(b) Why she advised mechanic not to inflate the tyres fully?
(c) What values of Aakansha is reflected here?
Answer:
(a) The scooty got punctured due to bursting of tyre because the particles of air expanded and gained kinetic energy due to heat and pressurised the walls of tyre resulting in bursting.

(b) She advised mechanic not to inflate the tyres fully as the summer days were hot which caused the expansion of inflated air and create excessive pressure in the tyres.

(c) Aakansha showed her values of intelligence and awareness.

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Question 3.
Ansh had a “Pooja” in his house. His mother told him to bring camphor required for “Pooja” from the market. On the “Pooja” day when he opened up the packet, he got surprised to see it empty. Then, Ansh got alert and brought a new packet.
(a) Why did the packet got empty?
(b) Name the property of matter mentioned here.
(c) Why did Ansh keep new camphor packet in a closed container?
(d) What values of Ansh are mentioned here?
Answer:
(a) Packet got emptied due to the evaporation of camphor due to its sublime nature.
(b) The property of sublimation is shown here.
(c) To prevent sublimation of camphor.
(d) Ansh shows the values of curiosity, wisdom and duty.

Question 4.
Sanjana went to a farm house with her family to spend her summer vacations. But the farm house faced the frequent problem of power cut. So, the refrigerator was not chilling the water bottles. Then, she brought two earthen pots for making drinking water, cool.
(a) How did the earthern pot, cool the water in it?
(b) Name the phenomenon involved in it
(c) Mention the values of Sanjana depicted here.
Answer:
(a) Earthen pots have small pores through which water gets evaporated making the water cool inside the pot.
(b) The process of evaporation is involved in it.
(c) Sanjana showed her intelligent, caring and responsible behaviour.

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 गुणवन्ती

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 गुणवन्ती (संकलित)

गुणवन्ती अभ्यास-प्रश्न

गुणवन्ती लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मोहन का बचपन किस प्रकार बीता?
उत्तर
मोहन के बचपन में ही उसके माता-पिता का निधन हो गया। उसका पालन-पोषण उसकी सौतेली बहन ने किया फिर भी वह उसके प्रति ठीक व्यवहार नहीं करती थी। इस तरह से उसका बचपन बड़ी ही कठिनाइयों में बीता।

प्रश्न 2.
राजकुमारी की शादी के लिए राजा क्यों चिन्तित था?
उत्तर
राजकुमारी की शादी के लिए राजा चिन्तित था। यह इसलिए कि उसकी सुन्दर और गुणवन्ती बेटी को कोई भी व्यक्ति पसन्द नहीं आता था। वह अपने से अधिक सुन्दर और गुणवान व्यक्ति से शादी करना चाहती थी।

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प्रश्न 3.
विवाह के पश्चात् राजकुमारी ने क्या संकल्प किया?
उत्तर
विवाह के पश्चात् राजकुमारी ने संकल्प किया कि वह अपनी मेहनत, लगन, साहस और धैर्य के सहारे इन परिस्थितियों का सामना करेगी।

प्रश्न 4.
राजकुमारी को पुरस्कार क्यों मिला?
उत्तर
राजकुमारी को पुरस्कार मिला। यह इसलिए कि उसकी गुड़िया की सभी ने बहुत प्रशंसा की।

गुणवन्ती दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर.

प्रश्न 1.
राजा को नाई की चालाकी का कब पता चला?
उत्तर
गुड़ियों की प्रदर्शनी में राजकुमारी को प्रथम पुरस्कार देने के लिए जब राजा ने उसे बुलाया तब राजकुमारी ने राजा से कहा कि आपने एक धोखेबाज नाई के चक्कर में फंसकर एक अनपढ़ और बेकार आदमी से मेरी शादी कर दी। इससे राजा को नाई की धोखेबाजी का पता चल गया।

प्रश्न 2.
गुणवन्ती के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
गुणवन्ती का चरित्र बड़ा ही उज्ज्वल और निश्छल है। वह एक स्वाभिमानी है। उसमें दृढ़-संकल्प और कुछ कर गुजरने की अटूट भावना है। फलस्वरूप वह अपने सामने आई हुई कठिनाइयों और विपत्तियों से हताश व निराश नहीं होती है। इस प्रकार वह अपनी हिम्मत व बुद्धि से सफलता को चूम लेती है।

प्रश्न 3.
अपना संकल्प पूरा करने के लिए राजकुमारी ने क्या-क्या कार्य किए?
उत्तर
राजकुमारी ने अपना संकल्प पूरा करने के कई कार्य किए। उसने अपनी सुन्दर रेशमी साड़ी फाड़कर सुई और धागे की सहायता से सुन्दर-सुन्दर गुड़ियाँ बनाई। फिर उन्हें बाजार में अपने पति से बेचवाया। अपनी सुन्दरता के कारण वे सभी गुड़ियाँ देखते-ही-देखते बिक गईं। उसे अच्छे पैसे मिल गए। उन पैसों से उसने अपनी बुद्धि-प्रतिभा से रंग, लकड़ी और कुछ सामान मँगवाकर एक सुंदर घोड़ा बनाया। उन घोड़ों के भी अच्छे दाम मिल गए। इस तरह से उसका कारोबार चल निकला। अब उसकी आमदनी इतनी बढ़ गई कि उसने राजा से भी बड़ा महल और सुख-सुविधाएँ जुटा लीं। इस प्रकार से उस राजकुमारी ने अपना संकल्प पूरा कर लिया।

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प्रश्न 4.
इस कहानी से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर
इस कहानी से हमें बहुत वही प्रेरणा मिलती है। वह प्रेरणा यह है कि हमें अपने जीवन में आनेवाली विपत्तियों और कठिनाइयों पर हताश, निराश और बुजदिल नहीं होना चाहिए। उसे हिम्मत, परिश्रम और विवेक से आगे बढ़ना चाहिए। इससे वह अवश्य अपने जीवन में सफलता प्राप्त करके सुखी और सम्पन्न होकर आनन्दमय जीवन बिता सकता है।

प्रश्न 5.
‘गुणवन्ती’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘गुणवन्ती’ कहानी एक सार्थक शीर्षक की कहानी है। इस कहानी में एक राजकुमारी के महान और प्रेरणादायक गुणों का उल्लेख हुआ है। घोर विपत्ति और अचानक कुसमय होने के बावजूद वह अपने गुणों को त्यागती नहीं अपितु उनके ही सहारे वह मॅझधार में पड़ी हुई गृहस्थी को पार लगा लेती है। इसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि ‘गुणवंती’ शीर्षक सार्थक है।

गुणवन्ती भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए
घर, घोड़ा, अंधेरा, राजा, धन।
उत्तर
शब्द – पर्यायवाची शब्द
घर – आवास, गृह
घोड़ा – अश्व, हय
अँधेरा – अंधकार, तम
राजा – नृप, नरेश
धन – द्रव्य, सम्पत्ति।

प्रश्न 2.
दिए गए शब्दों में से प्रत्यय छाँटकर लिखिए
हिनहिनाहट-हिनहिन+आहट
अनपढ़, बचपन, दुकानदार, परिस्थितिवश।
उत्तर
शब्द
अनपढ़ = अन-पढ़
दुकानदार = दुकान-दार
बचपन = बच-पन
परिस्थितिवश = परिस्थिति-वश।

प्रश्न 3.
नीचे लिखे उपसर्गों का उपयुक्त प्रयोग करते हुए शब्द बनाइए
बे, कु, सद्, सु, नि, सद्।
सहारा – ……………….
पोषण – ……………….
व्यवस्थित – ………………
डर – ……………
लोक – …………….
व्यवहार – ……………
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 20 गुणवन्ती img 1

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प्रश्न 4.
रेखांकित शब्दों के लिंग बदलकर रिक्त स्थान भरिए
1. मोहन ने सोचा नाई से शादी की बात करूँ परन्तु……ने मना कर दिया।
2. साधारण पुरुष का यह काम नहीं था न ही किसी…..का।
3. सभी पुरुष विद्वान थे और स्त्रियाँ…..थीं।
4. दिए गए शब्द युग्मों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
पालन-पोषण, काम-धंधा, धन-दौलत, सुख-सुविधा।
उत्तर
1. मोहन ने सोचा नाई से शादी की बात करूँ, परन्तु नाईन ने मना कर दिया।
2. साधारण पुरुष का यह काम नहीं था, न ही किसी स्त्री का।
3. सभी पुरुष विद्वान और स्त्रियाँ विदुषी थीं।
4. शब्द-युग्मों का वाक्य-प्रयोग
(i) पालन – पोषण
पालन – उसने उसका पालन किया है।
पोषण – पौधों के लिए पोषण तत्त्व आवश्यक है।
(ii) काम – धंधा
काम – वह दुकान पर काम करता है।
धंधा – मोहन कबाड़ी का धंधा करता है।
(iii)धन – दौलत
धन – मेरे पास पुस्तक ही धन है।
दौलत – आजकल दौलत के स्वामी पूजे जाते हैं।
(iv) सुख – सुविधा
सुख – भिखारी को भीख माँगने से ही सुख मिलता है।
सुविधा – अमीरों को सभी सुविधाएं प्राप्त होती हैं

गुणवन्ती योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
विद्यार्थी बची हुई, व्यर्थ अथवा पुरानी सामग्री से छोटे-छोटे खिलौने या काम आने वाली चीजें बनाएँ और कक्षा में प्रदर्शनी लगाएँ।
प्रश्न 2.
गुणवन्ती कहानी की तरह अपनी कल्पनाओं से दिए गए बिन्दुओं की मदद से कहानी बनाइए
एक राजकुमारी थी। वह बहुत सुन्दर……..थी। एक दिन बाग में……..और उसके सफेद घोड़े पर सवार युवक……. । वह उस समय खतरे में थी क्योंकि…..। तभी मदद …… । राजकुमारी वापस…………. । राजा ने……विवाह कर दिया और वे दोनों खुशी खुशी रहने लगे।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

गुणवन्ती परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मोहन का पालन-पोषण किसने किया?
उत्तर
मोहन का पालन-पोषण उसकी सौतेली बहन ने किया।

प्रश्न 2.
सौतेली बहन का व्यवहार मोहन के प्रति कैसा था?
उत्तर
सौतेली बहन का व्यवहार मोहन के प्रति अच्छा नहीं था।

प्रश्न 3.
मोहन की शादी क्यों नहीं हो पा रही थी?
उत्तर
मोहन की शादी निम्नलिखित कारणों से नहीं हो पा रही थी

  1. वह अनपढ़ और गंवार था।
  2. वह कामचोर था।
  3. वह बहुत गरीब था
  4. वह अनाथ था।
  5. वह बेसहारा था।

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प्रश्न 4.
गाँव का नाई कैसा था?
उत्तर
गाँव का नाई पूरी तरह से धूर्त और चालाक था। उसने अपनी इसी धूर्तता और चालाकी से कई गरीबों, बेसहारों और अपंगों की शादियां करवा दी थीं।

प्रश्न 5.
झोपड़ी को देखकर राजकुमारी ने क्या सोचा?
उत्तर
झोपड़ी को देखकर राजकुमारी बहुत दुखी हुई। उसने समझ लिया कि उसके साथ धोखा हुआ है।

प्रश्न 6.
राजकुमारी को पुरस्कार किसने दिया?
उत्तर
राजकुमारी को पुरस्कार उसके पिता राजा ने ही दिया।

प्रश्न 7.
राजा ने अपनी बेटी से क्या कहा? ।
उत्तर
राजा ने अपनी बेटी का हौसला बढ़ाते हए कहा-“बेटी! हमें तम पर गर्व है। तुम्हारी सफलता उन सभी के लिए प्रेरणादायक हो सकती है जो बाधाओं और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं।”

प्रश्न 8.
शादी के लिए राजा की बेटी की क्या शर्त थी?
उत्तर
शादी के लिए राजा की बेटी की यही शर्त थी कि वह अपने से अधिक सुन्दर और गुणवान व्यक्ति से ही शादी करेगी।

प्रश्न 9.
राजा की बेटी की डोली कहाँ रुकी?
उत्तर
राजा की बेटी की डोली एक टूटी हुई झोपड़ी के सामने रुकी।

गुणवन्ती दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मोहन अपनी शादी करवाने की प्रार्थना करने के लिए किसके पास गया?
उत्तर
मोहन अपनी शादी करवाने की प्रार्थना करने के लिए अपने ही गांव के एक नाई के पास गया। यह इसलिए कि उस नाई ने कितनी ही शादियाँ गरीब-से-गरीब लड़के-लड़कियों की करवाई थी। इस विश्वास और आशा से वह उस नाई के पास गया कि उसकी भी शादी वह अवश्य करवा देगा।

प्रश्न 2.
नाई ने मोहन को क्या सिखाया?
उत्तर-नाई ने मोहन को यही सिखाया कि, तुम्हारी शादी एक राजा की बेटी से करवा दूंगा। तुम इसे मजाक मत समझो। मैं तुमसे जैसा कहता हूं, तुम वैसा ही करना। तुम धोबी के यहाँ से अच्छी पोशाक माँगकर पहन लो। कहीं से सफेद अरबी घोड़ा ले आओ। पन्द्रह-बीस गीदड़ों को इक्ठे कर लो। इसके बाद की बातें मैं देख लूँगा।

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प्रश्न 3.
नाई ने राजा से जाकर क्या कहा?
उत्तर
नाई ने राजा के पास जाकर कान में कहा कि आपको जिस प्रकार के वर की तलाश थी उस तरह का वर मिल गया है। वह किसी देश का राजा है। उसके पास धन-दौलत सब कुछ है। उसे दान-दहेज कुछ नहीं चाहिए। इन सबके बावजूद उसकी एक शर्त है कि अंधेरा होने पर लड़की को डोली में बैठाकर शहर के बाहर बरगद के पेड़ के पास पहुँचा दिया जाए। लड़की के साथ और कोई न आए। लड़की वहीं से ससुराल चली जाएगी।

प्रश्न 4.
राजा की बेटी ने झोपड़ी के अन्दर क्या देखा?
उत्तर
राजा की बेटी ने झोपड़ी के अन्दर जो कुछ देखा वह सब उसकी कल्पना के विपरीत था। उसने झोपड़ी के अन्दर देखा कि एक मिट्टी का मटका तथा कुछ टूटे हुए बर्तन हैं।

गुणवन्ती कहानी का सारांश

प्रश्न
‘गुणवंती’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
गुणवंती’ कहानी एक प्रेरक कहानी है। इस कहानी से कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न हारने की शिक्षा मिलती थी। इस कहानी का सारांश इस प्रकार है | एक गाँव में मोहन नामक एक अनाथ बालक का पालन-पोषण उसकी सौतेली बहन ने किया था। बड़ा होने पर मोहन अपनी शादी तो करना चाहता था लेकिन कोई उसे अपनी लड़की देने के लिए तैयार नहीं होता था। एक दिन उसने अपने.. गाँव के नाई से अपनी शादी कहीं करवा देने की मिन्नत की। नाई ने उसकी शादी राजकुमारी से करवाने की बात उससे कही तो उसने इसे मजाक समझा, फिर बाद में इसे सत्य मान लिया। नाई ने कहा कि इसके लिए तुम्हें एक काम करना होगा। वह यह कि तुम धोबी के यहाँ से अच्छी पोशाक माँगकर पहन लो। कहीं से सफेद अरबी घोड़ा ले आओ।

पन्द्रह-बीस गीदड़ इकट्ठे कर लो। बाकी सब मैं देख लूंगा। मोहन ने जब यह सब कुछ कर लिया, तब नाई ने उसे शहर के बाहर एक बरगद के पेड़ के नीचे रुकने के लिए कहा। फिर वह दौड़ते हुए राजा के कान में कहा-आपकी पसन्द का वर मिल गया है। इस राजकुमार के पास सब कुछ है। इसलिए उसे दहेज नहीं चाहिए। उसकी शर्त है कि अँधेरा होने पर लड़की को डोली में बैठाकर शहर के बाहर बरगद के पेड़ के पास पहुंचा दिया जाए। लड़की अकेली ही ससुराल जाएगी। यह इसलिए कि अगर राजकुमार यहाँ आएँगे तो लोगबाग यही समझेंगे कि कोई आप पर हमला करने आ रहा है। राजा ने नाई के इस सुझाव को मानकर नाई के कथनानुसार राजा ने अपनी बेटी को डोली में भेजकर महल के ऊपर चढ़कर राजा ने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे वह राजकुमार घोड़े पर चढ़ा है। गीदड़ों के शोर और घोड़ो की हिनहिनाहट से उसे लगा कि उसकी सेना में हलचल है। राजा ने चैन की सांस ली।

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मोहन की झोपड़ी में पहुंचने पर गुणवंती का विवाह जब हो गया तो उसे पता चला कि उसके साथ धोखा हुआ है। फिर भी उसने हिम्मत और साहस से काम लिया। उसने अपने पति को काम करने के लिए कहा तो उसने अपनी अयोग्यता बताई। एक दिन उसने अपनी रेशमी साड़ी से कई गुड़ियां बनाकर अपने पति को बाजार में बेचने के लिए भेजा। लोगों ने उन्हें बहुत सराहा। वे सभी अच्छे पैसे में बिक गईं। बाद में गुणवन्ती ने मोर और घोड़े बनाकर भेजे। वे सभी अच्छे दाम में बिक गए। इस तरह गुणवन्ती ने खिलौने का एक बहुत बड़ा कारखाना खोल लिया। उसकी आमदनी से अपने पिता से अच्छा महल बना लिया।

कुछ समय पहले शहर में लगी हुई प्रदर्शनी में गुणवन्ती की गुड़िया को सर्वश्रेष्ठ इनाम घोषित किया गया। राजा ने वह इनाम अपने हाथों से दिया। इनाम लेते समय राजा और गुणवन्ती ने एक-दूसरे को पहचान लिया। उसने राजा से कहा कि आपने धोखेबाज नाई के कहने पर मेरा विवाह एक गंवार, बेकार और अयोग्य व्यक्ति से कर दिया फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने तो अपनी हिम्मत और मेहनत से दुनिया की सारी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। इसे सुनकर राजा ने लज्जित होकर कहा कि बेटी हमें तुम पर गर्व है। तुम्हारी सफलता उन सभी के लिए प्रेरणादायक हो सकती है जो बाधाओं और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं।

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1. ‘दीपावली’ अथवा ‘किसी त्यौहार का वर्णन’

प्रस्तावना-भारतीय त्यौहार समाज के लिए सामूहिक उत्सव हैं, इन त्यौहारों पर जनसामान्य अपनी आन्तरिक और बाह्य भावनाओं को अपनी किसी भी कार्य-शैली के माध्यम से प्रकट करता है। इसका कारण है कि मनुष्य इन उत्सवों के मनाने के लिए विविध आयोजनों की रूपरेखा तैयार करता है।

भारत में वर्ष के प्रत्येक महीने त्यौहार मनाये जाते दिखते हैं। अतः भारत में वर्ष के प्रत्येक दिन उत्सव व त्यौहार आदि का आयोजन होता ही रहता है। इस आधार पर भारत को त्यौहारों और पर्वो का देश कहा जाता है। दीपावली हिन्दुओं का सबसे प्रमुख त्यौहार है।

तैयारियाँ-दीपावली आने से 10-15 दिन पहले से ही इसकी तैयारी करना प्रारम्भ कर दी जाती है। घरों और दुकानों की सफाई की जाती है। उनमें चित्र टाँग दिए जाते हैं। इन चित्रों से वे सजे हुए अच्छे लगते हैं। चारों ओर चाहे शहर हो या गाँव अथवा छोटा शहर, सभी सजे हुए इस तरह प्रतीत होते हैं जैसे मानो वे लक्ष्मीजी के आने की प्रतीक्षा कर रहे हों। यह दीपावली त्यौहार शरद ऋतु के प्रारम्भ में आता है। उस समय न अधिक गर्मी होती है और न अधिक ठण्ड। मौसम सुहावना होता है। इस समय धीरे-धीरे शीतल और सुगन्ध युक्त हवा बहती रहती है। प्रकृति खुशनुमा होती है। पशु-पक्षी, लता-वृक्ष, स्त्री-पुरुष सभी आनन्दमय होते हैं। प्रकृति भी इस त्यौहार को मनाने के लिए तत्पर प्रतीत होती है।

दीपावली कैसे मनाई जाती है ?-दीपावली का पर्व हिन्दू कार्तिक महीने की अमावस्या को पड़ता है। वैसे यह त्यौहार कार्तिक महीने की कृष्णपक्षीय तेरस (धन तेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (दौज) तक लगातार पाँच दिन तक बड़ी धूमधाम और सज-धज के साथ मनाया जाता है। धन तेरस का दिन भगवान धन्वन्तरि का जन्मदिन माना जाता है। अतः वैद्य लोग इस दिन उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। लोग इस दिन बर्तनों की खरीददारी करना शुभ मानते हैं। अतः इस दिन बाजारों में बड़ी-बड़ी दुकानें बर्तनों से भरी हुई और सजावट की हुई आकर्षक लगती हैं। इसके दूसरे दिन चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) होती है। इसे छोटी दीपावली कहते हैं। लोग प्रातः तेल-मालिश कर नहाते हैं और समझा जाता है कि इस तरह के स्नान करने से उनके शारीरिक रोग व पाप दूर हो जाते हैं। सायंकाल घर की प्रमुख नाली के पास दीपक जलाया जाता है।

इसके बाद बड़ी दीपावली आती है। अमावस्या का दिन दीपावली का मुख्य दिन होता है। दिन में पकवान बनते हैं। घरों में प्रायः रसगुल्ले बनाने का रिवाज अधिक है। बच्चे नये स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। वे अति प्रसन्न दिखते हैं। विभिन्न पकवान और मिठाइयाँ खाकर वे चारों ओर धमा-चौकड़ी भरते नजर आते हैं। सर्वत्र खुशी का वातावरण होता है। रात्रि का आगमन होता है। निर्दिष्ट बेला में लक्ष्मी जी का पूजन होता है। घर, दुकान, कारखानों पर पूजा विद्वान पण्डित कराते हैं। उन्हें विविध उपहार व मिठाइयाँ दी जाती हैं। व्यापारी लोग अपने खाते और बहीखाते बदलते हैं। पूजा में प्रमुख रूप से ताजे फूल, रोली, चन्दन, धूपबत्ती व खील रखी जाती हैं। लोग व बालक पटाखे चलाते हैं। दीपक जलाये जाते हैं, चारों ओर उजाला होता है।

दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपदा (पड़वा) होती है। इस दिन गोवर्धन पूजा का उत्सव हुआ करता है। दूध, खील और पकवानों से गोवर्धन की पूजा की जाती है। गोबर का गोवर्धन बनाया जाता है। सायंकाल को घर के सभी सदस्य एकत्र होकर पूजा करते हैं। पाँचवें दिन भैया दौज होती है। बहन अपने भाइयों का टीका करती हैं। उन्हें मिठाई, वस्त्र आदि देती हैं और उनके स्वस्थ रहने तथा दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इस दौज को भाई-बहन (यम-द्वितीयां पर) यमुना में साथ-साथ स्नान करके दीर्घ आयु प्राप्त करने का वरदान पाते हैं।

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दीपावली का महत्त्व-दीपावली हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। इस पर्व पर सभी प्रतिष्ठानों आदि की मरम्मत आदि करा दी जाती है। सफाई की जाती है। रंगाई और पुताई से दुकान और घर सुन्दर लगते हैं। मक्खी-मच्छर मर जाते हैं। लोगों में विशेष उत्साह होता है। क्योंकि उनकी खरीफ की फसल पक जाती है और रबी की फसल बोये जाने की तैयारी की जाती है। लोग परस्पर मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं। सभी में सद्भाव और सहानुभूति की जागृति होती है।

उपसंहार-इस उत्सव पर लोग जुआ आदि खेलकर इसकी पवित्रता को दाग लगा देते हैं। इन गन्दी आदतों से मुक्ति पाने के लिए सभी समाज के लोगों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

2. भारत की राष्ट्रीय एकता

प्रस्तावना-वही राष्ट्र सुख, वैभव एवं प्रगति की मंजिल. को प्राप्त कर सकता है जहाँ समस्त नागरिक बन्धुत्व, स्नेह, सद्भावना तथा एकता के सूत्र में आबद्ध हो। यदि नागरिकों के मनमानस में एकता एवं अपनेपन की भावना नहीं होगी तो वह राष्ट्र पतन के गर्त में चला जाएगा।

राष्ट्र के अंग-राष्ट्र के तीन अंग होते हैं। प्रथम वहाँ के निवासी, द्वितीय संस्कृति, तृतीय सभ्यता। ये तीनों चीजें ही एक राष्ट्र का निर्माण करती हैं तथा उन्हें एकता के सूत्र में पिरोती हैं। सभ्यता यदि शरीर है तो राष्ट्र उसका प्राण है। इसीलिए राष्ट्ररूपी शरीर के लिए संस्कृतिरूपी प्राण को बनाए रखना अत्यावश्यक है।

एकता की अनिवार्यता-आज समस्त विश्व में आतंकवाद अपना सिर उठा रहा है। निरीह लोगों की हत्या करके ये आतंकवादी अपने कुत्सित एवं घृणित इरादों को भी अंजाम दे रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हुआ वह इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। अतः आज के युग में राष्ट्रीय एकता परमावश्यक है।

भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की एजेन्सियाँ लगातार हमला कर रही हैं। असंख्य क्षेत्रीय लोग मारे जा चुके हैं। वहाँ से पलायन कर चुके हैं। इससे भारतीय नागरिक भारतीय संघ से अलग होने की विचारधारा बना रहे हैं। हमारी फौज अवश्य इस दिशा में सही निर्णय लेती है। परन्तु राजनैतिक दबाव उसे उचित कार्यवाही नहीं करने देता।

स्वार्थ लोलप राजनीति-ये स्वार्थी राजनीतिज्ञ, राष्ट्र के समक्ष अवसर मिलते ही गम्भीर संकट खड़ा कर देते हैं। इन्हें नैतिकता तथा राजनीतिक स्तर का तनिक भी ध्यान नहीं रहता।

एकता के मार्ग में अवरोध-एकता के मार्ग में कुछ तत्व आज भी अवरोध बने हुए हैं। अंग्रेजों ने इस देश की धरती पर ऐसे विषैले बीजों को बो दिया है जो आज भी पनप रहे हैं। आज अनेक विघटनकारी शक्तियाँ हमारे देश का नाश करने पर तुली हुई हैं। अगर राष्ट्र के कर्णधार देश या राष्ट्र की एकता को स्थिर रखने का प्रयास करते हैं तो वे इसमें सफल नहीं हो पाते।

भारत की भूमि पर ही भारत के खिलाफ प्रपंच रचकर यहाँ की अखण्डता को खण्डित करना चाहते हैं। उल्फा संगठन, दक्षिण भारत तथा कश्मीर के आतंकी संगठन सभी देश को खण्डित करना चाहते हैं। भाषायी आधार भी उन्हें भड़काने का काम करता है।

सम्पूर्ण वर्गों का योगदान-राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को सुरक्षित रखने के लिए सभी वर्गों का योगदान अपेक्षित है।

विद्यार्थी, राजनीतिक, मजदूर, धर्म सुधारक एवं वैज्ञानिक सभी को किसी-न-किसी रूप में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में सहयोग देना चाहिए। सभी वर्गों में एक-दूसरे के धर्म के प्रति सम्मान होना चाहिए। आर्थिक स्वतन्त्रता भी परमावश्यक है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है “जब जेब में पैसा है तथा पेट में रोटी है, तो हर एक शबनम मोती है।”

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उपसंहार-आज साम्प्रदायिकता का जहरीला नाग मानवता को डसने के लिए अपना फन फैला रहा है, सबसे प्रथम उसका फन कुचलना होगा। देश के कर्णधारों को सत्ता लोलुप एवं स्वार्थ की भावना से ऊपर उठकर राष्ट्र का हित चिन्तन करना होगा तभी राष्ट्र में एकता के स्वर गुंजित होंगे तथा निम्न राग दोहराना होगा-“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।”

3. भारत की बढ़ती जनसंख्या

प्रस्तावना-विश्व के विभिन्न देश अपनी-अपनी समस्याओं से ग्रसित हैं। उसी तरह भारतीय गणराज्य भी सबसे . अधिक समस्याओं से घिरा हुआ राष्ट्र है। जिनमें सर्वोपरि है-भारत की बढ़ती जनसंख्या। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ ही अन्य अनेक समस्याएँ स्वतः ही उत्पन्न होती रहती हैं जिससे देश की तरक्की के विषय में जारी की गई योजनाएँ, प्रभावित हो जाती हैं। भारत में जनसंख्या की वृद्धि एक गम्भीर समस्या है, लेकिन इसे लेकर यहाँ के नागरिक उसके प्रति बिल्कुल भी गम्भीर नहीं हैं।

जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ-जनसंख्या वृद्धि एक ऐसी समस्या है, जो अन्य अनेक समस्याओं को जन्म देती है। उन समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या है-बढ़ते लोगों को रोटी देने की, उनके लिए वस्त्र आदि की व्यवस्था करने की तथा उन्हें आवास प्रदान करने की। इनकी समस्याओं के साथ ही, उनको उचित शिक्षा देने, उन्हें रोजगार देने, उन लोगों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के सुलझाने की स्वच्छ पानी देने, स्वच्छ वातावरण प्रदान करने सम्बन्धी विभिन्न समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।

अभाव की स्थिति-देश ने आजादी प्राप्त की। इसके साथ ही विकास योजनाएँ प्रारम्भ हुईं। कृषि, उद्योग एवं व्यवसाय के क्षेत्र में विकास की दिशा पकड़ी गई। लगभग सभी क्षेत्रों में विकास तीव्र गति से बढ़ने लगा। खेतों, कारखानों में उत्पादन शुरू हुआ। नई तकनीक अपनाई गई। कृषि आधारित उद्योग पनपने लगे। विकास तो अपनी तीव्र गति से होने लगा परन्तु बढ़ती जनसंख्या ने उसकी गति को बहुत ही प्रभावित कर दिया।

विकास के कार्यों के लिए राष्ट्र हित में कर्ज लिया जाने लगा। देश जिस गति से आगे बढ़ता, उतनी गति विकास के क्षेत्र में नहीं पकड़ सका। इस जनसंख्या वृद्धि ने सभी क्षेत्र के विकास सम्बन्धी कार्यों को ठप्प कर दिया।

जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव-जनसंख्या की बढ़ोत्तरी ने अपना प्रभाव सभी क्षेत्रों में दिखाया। शिक्षा का क्षेत्र भी प्रभावित हुआ, यातायात व्यवस्था-रेल परिवहन, सड़क परिवहन आदि का विकास रुक गया। भोजन, पानी, आवास व वस्त्र आदि की समस्या से ग्रसित भारतीय समाज फिर से अभावग्रस्त होने लगा। परन्तु भारतीय सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, कल-कारखानों और व्यवसाय के क्षेत्र में तीव्र विकास करना शुरू किया। बढ़ती जनसंख्या को रोजगार देने की दिशा में प्रभावकारी कदम उठाया। परन्तु इन सभी समस्याओं के समाधान के साथ-ही-साथ अन्य अनेक समस्याओं, जैसे-भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य समस्याओं और प्रदूषण समस्याओं ने देश को बुरी तरह जकड़ा हुआ है। साथ ही बेरोजगार लोगों की फौज प्रतिवर्ष बढ़ जाती है। उस दिशा में तो विकास दर गिरती लग रही है। इस तरह इस जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने अनेक ऐसी समस्याओं को जन्म दे दिया है जिनका समाधान शायद निकट भविष्य में होता दिखाई नहीं पड़ता।

जनसंख्या वृद्धि की समस्या का समाधान-राष्ट्रीय समस्या बनी जनसंख्या वृद्धि एक विकराल रूप धारण करती जा रही है। इसके हल के लिए किए गए उपाय भी कम और प्रभावहीन होते नजर आ रहे हैं। लोगों में इस समस्या के निराकरण के लिए जागृति की जा रही है। उन्हें बताया जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण करें। नियोजित परिवार ही सुखी हो सकता है। तरक्की कर सकता है, समृद्धि प्राप्त कर सकता है। सरकार की ओर से और व्यक्तिगत रूप से विविध संस्थानों द्वारा लोगों को इस समस्या के समाधान के उपाय बताए गए हैं। लोगों को उत्साहित किया जा रहा है कि वे शिक्षित बनें, अपनी सन्तान को, बालिकाओं और बालकों को शिक्षा ग्रहण करायें जिससे वे राष्ट्र हित की सोच सकें तथा स्वयं को राष्ट्र कल्याण के मार्ग से जोड़कर कार्य करें।

उपसंहार-देशवासियों को राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए निरन्तर कार्य करना चाहिए। उन्हें जन-जागृति पैदा करके अपने कर्त्तव्य का और उत्तरदायित्व का पालन करना चाहिए।

4. विज्ञान के चमत्कार

प्रस्तावना-आज विज्ञान का युग है। विज्ञान ने विश्व में सभी क्षेत्रों में अपनी विजय पताका फहरा रखी है। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज के युग को यदि हम वैज्ञानिक युग का नाम दे दें। प्राचीन और आधुनिक काल में पूर्णतः विपरीतता आ गयी है। रहन-सहन, वस्त्र पहनावा, यातायात तथा जीवन प्रणाली पूर्णतः परिवर्तित हो गई है। उसमें नवीनता का समावेश हो चुका है। आज की दुनियाँ प्रतिक्षण बदलती दिखती है। परिवर्तन ही विकास है।

आवागमन के साधन-आज आवागमन के साधन भी विज्ञान की कृपा से सर्वसुलभ हो गये हैं। रेल, मोटर, साइकिल, स्कूटर, जलयान तथा वायुयान इस क्षेत्र में अभूतपूर्व चुनौती दे रहे हैं। राष्ट्रीय पर्यों एवं शोक के अवसर पर समस्त राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्षों का एक मंच पर उपस्थित होना इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है।

बिजली वरदान स्वरूप-बिजली प्रतिपल एक दासी की भाँति सेवा में जुटी रहती है। कारखाने, रेडियो, टेलीविजन बिजली की सहायता से चलते हैं। बिजली से चलने वाले पंखे दुपहरी में निरन्तर चलकर मानव को परम शान्ति प्रदान कर रहे हैं।

कृषि में योगदान-कृषि के लिए नये यन्त्र विज्ञान ने आविष्कृत किये हैं। विज्ञान द्वारा उपलब्ध रासायनिक खाद्य उत्पादन क्षमता में एवं रासायनिक दवाइयाँ फसल को नष्ट होने से रोक रही हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान-एक्स-रे शरीर का आन्तरिक फोटो लेकर अनेक बीमारियों का पता लगा रहा है। कैंसर तथा एड्स जैसे रोगों पर निरन्तर शोध जारी है। परमाणु शक्ति भी विज्ञान की ही देन है।

श्रम की बचत-विज्ञान के द्वारा आविष्कृत मशीनों के माध्यम से पूरे दिन का कार्य मनुष्य कुछ ही घंटों में समाप्त कर लेता है। बचे हुए समय को मनुष्य मनोरंजन या स्वाध्याय में व्यतीत करता है।

अन्तरिक्ष के क्षेत्र में योगदान-अन्तरिक्ष के क्षेत्र में भी आज मनु पुत्र अपने कदम बढ़ा चुका है। जो चन्दा मामा कभी बालकों के लिए अगम बना हुआ था, आज वैज्ञानिक उसके तल पर पहुँचने में सक्षम हुए हैं।

विज्ञान से हानि-हर अच्छाई के पीछे बुराई छिपी है। जहाँ विज्ञान ने मनुष्य को अनेक सुख-सुविधाएँ प्रदत्त की हैं, वहाँ अशान्ति तथा दुःख का भी सृजन किया है।

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अगर हम सावधानीपूर्वक विचार करें तो विदित होता है कि इसमें विज्ञान का इतना दोष नहीं है जितनी कि मानव की कुत्सित प्रवृत्तियाँ दोषी हैं।

उपसंहार-विज्ञान स्वयं में अच्छा-बुरा नहीं है। यह मानव के प्रयोग पर निर्भर है। आज विज्ञान के गलत प्रयोग के फलस्वरूप ही दुनिया में विनाशकारी दृश्य नजर आ रहा है। अतः आज हमें विज्ञान को मानव के कल्याण के निमित्त प्रयोग करके सुख एवं समृद्धि का साधन बनाना है। इसी में सबका हित सन्निहित है।

5. भ्रष्टाचार-समस्या और समाधान

प्रस्तावना-भ्रष्टाचार का शब्दिक अर्थ होता है-आचरण (व्यवहार या चरित्र) से गिरा हुआ। इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति नैतिक रूप से पतित व्यवहार करता है वह अनैतिक और भ्रष्ट आचरण वाला हुआ करता है। जब कोई व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था में न्याय के पक्ष से गिरकर समाज के मान्य नियमों का पालन न करते हुए अपने गलत निर्णय लेता है और व्यवहार में गिरा हुआ हो जाता है, तो वह भ्रष्टाचारी कहा जाता है। वह इस तरह के व्यवहार को अपनी स्वार्थपरता के कारण किया करता है। अनुचित रूप से स्वयं लाभ प्राप्त करता है।

आचरण भी भ्रष्टता, रिश्वत लेकर, कालाबाजारी करके, भाई-भतीजावाद फैलाकर जातीय आधार पर उल्लू सीधा करना, किसी वस्तु पर जान-बूझकर अधिक लाभ कमाने की दृष्टि से मूल्य वृद्धि कर देना, रुपये-पैसे लेकर कार्य करना, अपने तुच्छ लाभ के लिए दूसरों को बड़ी हानि पहुँचा देना आदि सभी आचरण भ्रष्ट (पतित) कहे जाते हैं।

आजकल देश व सम्पूर्ण समाज भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ चुका है। भारतीय संस्कृति, राजनीति, समाज, धर्म, व्यापार, उद्योग, कला एवं शासन-प्रशासन पूर्णतः भ्रष्ट हो चुका है। इस भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना तो असम्भव ही लगता है।

भ्रष्टाचार के कारण-

  1. किसी क्षेत्र में अभाव के कारण उत्पन्न असन्तोष किसी को व्यावहारिक रूप से भ्रष्ट और पतित बना देता है। अपनी इस विवशता के कारण वह भ्रष्टाचारी हो जाता है।
  2. स्वार्थ के वशीभूत होकर सम्मान प्राप्त न होने से आर्थिक, सामाजिक पद-प्रतिष्ठा में कमी के कारण भ्रष्टाचार पनपने लगता है।
  3. भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण भाई-भतीजावाद, जाति-वर्ग एवं साम्प्रदायिकता, भाषावाद आदि के कारण उचित न्याय नहीं कर पाते और भ्रष्ट बन जाते हैं।

भ्रष्टाचार से प्रभावित क्षेत्र-भ्रष्टाचार का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। जीवन का प्रत्येक भाग भ्रष्टाचार से प्रभावित है। किसी भी क्षेत्र का विधायक या सांसद हो, वह अपने निजी जीवन में किसी भी तरह प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक रूप से भ्रष्ट पाया जाता है, तो यह उसकी महान् गलती है। हमारे ऊपर बैठी ईश्वरीय सत्ता के प्रति विश्वास और श्रद्धा समाप्त हो जाती है। इस भ्रष्टाचार ने सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों को इतना प्रदूषित कर दिया है कि वहाँ साँस लेना भी दूभर हो गया है।

भ्रष्टाचार के दुष्परिणाम-भ्रष्टाचार के दुष्परिणाम यह हुए हैं कि ईमानदारी और सत्यता पूर्णतः विलुप्त हो चुकी है। बेईमानी और कपट का प्रसार होता जा रहा है। भ्रष्टाचार को मिटाना बड़ी चुनौती हो चुकी है। नकली माल बेचना, खरीदना, वस्तुओं में मिलावट करना, धर्म के नाम पर अधर्म का आचरण करना, रिश्वतखोर अपराधी को रिश्वत के ही बल पर छुड़ा लेना, कालाबाजारी करना आदि भ्रष्टाचार के ही दुष्परिणाम हैं। – भ्रष्टाचार को रोकने के उपाय-भ्रष्टाचार संक्रामक रोग की तरह सब ओर फैलता जा रहा है। अतः समाज में व्याप्त इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार की दशा ऐसी है कि भ्रष्ट व्यक्ति रिश्वत देकर (भ्रष्टाचार के द्वारा) ही मुक्त हो जाता है। उसे राजदण्ड का कोई भय नहीं है। उसके जीवन में शिष्ट आचरण की महत्ता बिल्कुल भी नहीं है। भ्रष्टाचारी को कठोर दण्ड से ही सुधारा जा सकता है। कितने ही ऊँचे प्रतिष्ठित पद पर आसीन भ्रष्ट व्यक्ति को कठोरतम दण्ड देकर ही दण्डित किया जाय। भ्रष्टाचारी को दण्डित किये बिना स्थिति में सुधार नहीं आ सकता। भ्रष्टाचारी को किसी भी सामाजिक उत्सव में उपेक्षित किया जाना बहुत ही आवश्यक है।

उपसंहार-भ्रष्टाचारी लोग समाज और राष्ट्र को बहुत बड़ी हानि पहुँचा रहे हैं हमारे राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लग चुका है। इसे मिटाने की दिशा में राजनैतिक लोगों और समाज के प्रबुद्ध लोगों को आगे आना होगा और स्वयं को सर्वप्रथम न्यायवादी और शिष्टाचारी सिद्ध करना होगा।

6. वृक्षारोपण

प्रस्तावना-भारत प्रकृति का पालना है। यहाँ की धरती पर चहुँओर हरियाली दृष्टिगोचर होती है। कहीं-कहीं वनों में मयूर नृत्य करते हुए नजर आते हैं तो कहीं कोयल की मधुर कूक सुनायी देती है। यह हरियाली, सुषमा वृक्षों के कारण अस्तित्व में है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही वृक्षों को अति महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वृक्षों की छाया में बैठकर ही ऋषि-मुनियों ने ज्ञान को अर्जित किया था। प्राणिमात्र के पालन-पोषण के उपयोगी तत्वों के स्रोत वन ही थे। अतः इनके आरोपण और संरक्षण की अति आवश्यकता है।

वृक्षों पर कुठाराघात-आज का मानव पूरी तरह भौतिकवादी बन गया है। लोभ के वशीभूत होकर उद्योगों के नाम पर विशाल पैमाने पर वृक्षों का विनाश कर रहा है। वृक्षों को पूर्ण वयस्क होने में वर्षों लग जाते हैं लेकिन उन्हें कटने में कुछ ही समय लगता है। प्रकृति से दूर होने के कारण आज मनुपुत्र अनेक रोगों का शिकार हो रहा है।

वृक्षों की उपयोगिता-वृक्ष मानव के लिए बहुत ही उपयोगी हैं। वनों से जीवनदायिनी औषधि प्राप्त होती है। भवनों . को बनाने के लिए दियासलाई तथा कागज बनाने में भी वनों की लकड़ी आवश्यक है। इन वृक्षों से फल-फूल, वनस्पति, औषधि, जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं। धरती पर प्राण वायु संचरित होती है। वनों से पहाड़ों का कटाव रुकता है। नदियों को उचित बहाव मिलता है। इमारती लकड़ी, आश्रय आदि सभी मिलते हैं।

वृक्ष विषाक्त गैस कार्बन डाइ-ऑक्साइड का शोषण करके मानव को बीमारियों से बचाते हैं। नदियों के किनारे लगे वृक्ष . भूमि के कटाव को रोकते हैं। वृक्ष लगाना एक तरह से परोपकार की कोटि में आता है। ये हमें प्राण वायु देते हैं।

सरकार का प्रयास-हमारी राष्ट्रीय सरकार ने आज वनों की सुरक्षा तथा वृक्षों को बढ़ाने का संकल्प लिया है। प्रत्येक वर्ष वन महोत्सव सप्ताह सम्पन्न किया जाता है। यदि कोई स्वार्थी व्यक्ति इन वृक्षों को काटता है तो कानून की दृष्टि से वह अपराध का भागी होता है।

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उपसंहार-हम सबको वृक्षों के पल्लवन एवं विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देना चाहिए। वृक्ष लगाने के लिए लोगों के मनमानस में नयी उमंग जगानी चाहिए। वृक्षों के विकास में ही राष्ट्र की प्रगति सन्निहित है।

7. विद्यार्थी जीवन

प्रस्तावना-जीवन में प्रतिपल ही सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है। विद्यार्जन के लिए उम्र का बन्धन बाधा नहीं पहुँचाता है। परन्तु विद्यार्थी जीवन वह काल है जिसमें विद्यार्थी विद्यालय में रहकर विद्यार्जन करता है। इस विद्यार्जन की प्रक्रिया में एक क्रम होता है। जितनी अवधि तक विद्यार्थी विद्यार्जन करता है, उसका वह जीवन विद्यार्थी जीवन कहलाता है।

विद्यार्थी जीवन का महत्त्व-विद्यार्थी जीवन जिन्दगी का स्वर्णिम काल होता है। इसी जीवन में विद्यार्थी अपने भविष्य के जीवन की आधारशिला रखता है। यहीं से सुन्दर और दृढ़ जीवन की पड़ी आधारशिला (नीव) पर उस विद्यार्थी के भविष्य का भवन खड़ा हो पाता है जो बहुत ही आकर्षक होगा।

विद्यार्थी जीवन में ही एक छात्र अपने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक गुणों को विकास की एक दिशा प्रदान करता है। इन गुणों के विकसित होने पर ही वह विद्यार्थी एक ठोस व्यक्तित्व का धनी होता है।

विद्यार्थी के लक्षण-विद्यार्थी का जीवन किसी तपस्वी के जीवन से कम कठोर नहीं होता। माँ सरस्वती की कृपा प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। विद्या कभी भी आराम से, सुख से प्राप्त नहीं हो सकती। जीवन में संयम और नियमों के अनुसार चलना पड़ता है। विद्यार्थी के पाँच लक्षणों को निम्न प्रकार बताया गया है..

“काकचेष्टा, बकोध्यानम्, श्वाननिद्रातथैवच।
गृहत्यागी, अल्पाहारी, विद्यार्थी पंच लक्षणम्॥

उपर्युक्त पद्यांश में बताए गए लक्षणों वाला विद्यार्थी अपने जीवन में सदैव सफल होता है। यह जीवन साधना और सदाचार का है।

आधुनिक विद्यार्थी जीवन-आज हमारे देश की समाज व्यवस्था लड़खड़ा रही है। विद्यार्थी ने अपने जीवन की गरिमा को भुला दिया है। विद्यार्थी के लिए स्कूल मौज-मस्ती का स्थल रह गया है। वह अब विद्यादेवी की आराधना का मन्दिर नहीं . रह गया है। वह तो उसके लिए मनोरंजन तथा समय काटने का स्थल भर रह गया है। विद्यार्थी में उद्दण्डता और असत्यता घर बनाए बैठी है। परिश्रम करने से अब वह पीछे हट रहा है। उसका लक्ष्य प्राप्त करना, केवल धोखा और चालपट्टी रह गया है। वह अनुशासनहीन होकर ही अपना कल्याण करना चाहता है। उसने विनय, सदाचार और संयम को पूर्णतः भुला दिया है। विद्यार्थी ने स्वयं को कलंकित बना लिया है। . अनुशासनहीनता को दूर किया जा सकता हैअनुशासनहीनता को दूर करने के लिए विद्यार्थी को अपने अंग्रेजों के अनुशासित जीवन से सीख प्राप्त करें। विद्यालयों के वातावरण को सही कर देना चाहिए। अध्यापकों को विशेष रूप से विद्यार्थियों की प्रत्येक प्रक्रिया पर सख्त नजर रखनी होगी। उनके प्रति अपने आचरण का भी प्रभाव छोड़ना पड़ेगा।

उपसंहार–आज के विद्यार्थी कल के राष्ट्र के कर्णधार हैं। अतः इन्हें अपने अन्दर ऊँचे वैज्ञानिक के, ऊँचे विचारक के, ऊँचे चिन्तनकर्ता के महान गणों को अपने में विकसित करते हुए अपने अभिलाषित लक्ष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए। ज्ञान पिपासा, श्रम, विनय, संयम, आज्ञाकारिता, सेवा, सहयोग, सह-अस्तित्व के गुणों को अपने अन्दर विकसित कर लेना चाहिए। एक आदर्श नागरिक बन कर विद्यार्थी राष्ट्र की सेवा करते हुए राष्ट्र धर्म का पालन कर सकने में समर्थ होते हैं।

8. अनुशासन का महत्त्व
अथवा
विद्यार्थी और अनुशासन

प्रस्तावना-विद्यार्थी किसी राष्ट्र विशेष का अक्षय कोष होते हैं। जो आज का विद्यार्थी है वह कल देश के भविष्य का कर्णधार बन सकता है। देश की प्रगति उन्ही के कन्धों पर अवलम्बित है। विद्यार्थी जीवन में बालक में अच्छे भाव, विचार, संस्कार एवं मानवीय भावनाएँ पल्लवित एवं विकसित होती हैं। विद्यार्थी जीवन में अर्जित ज्ञान जीवन पथ का सम्बल बनता है।

अनुशासन का महत्त्व-अनुशासन के नियमों का बीजारोपण बाल्यकाल से होना चाहिए क्योंकि विद्यार्थी जीवन में जो संस्कार पड़ जाते हैं, वे स्थायी होते हैं। प्रकृति भी अनुशासन में बँधकर संचालित हो रही है। जिस भाँति रात-दिने तथा ऋतु परिवर्तित होती रहती हैं, उसी प्रकार नियमबद्ध जीवन में भी परिवर्तन का चक्र निरन्तर रहता है। _ अनुशासन की जड़ें-शिक्षा संस्कारयुक्त होनी चाहिए। अनुशासन स्वेच्छा से होना चाहिए, यह हमें संयमी बनाता है। छात्रों के लिए अनुशासन वायु तथा जल की भाँति आवश्यक है। छात्र जीवन जितना सदाचार, अनुशासित तथा सुन्दर होगा उतना ही शेष जीवन भी सुखी तथा सम्पन्न होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

विद्यार्थी से आशाएँ-आज का विद्यार्थी ही कल देश का कर्णधार बनेगा। वही राष्ट्र का भाग्य विधाता बनेगा। आज भारत माता की लौह-श्रृंखलाएँ छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं, अत: छात्रों को जागरूक होकर अनुशासित होकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए।

छात्रों में अनुशासनहीनता तथा उसका निवारण-छात्रों द्वारा निरन्तर तोड़-फोड़, हड़तालें तथा सरकारी सम्पत्ति के विनाश के समाचार हर रोज समाचार-पत्रों में आते रहते हैं। परिवार का वातावरण भी पूर्णतः अनुशासित नहीं है। विद्यालय आज घिनौनी राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं। इस समस्या से निपटने के लिए विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा गोष्ठियों का आयोजन होना चाहिए। छात्रों के समक्ष उनके भविष्य निर्माण के लिए भी एक सुनियोजित योजना का प्रारूप होना चाहिए जिससे वे चिन्तारहित होकर जीवनयापन कर सकें।

अनुशासन की जरूरत-अनुशासन से ‘छात्रों में अपने उत्तरदायित्व को निभाने का गुण स्वयं उभर कर आता है। अपनी उन्नति के लिए अनुशासन और आज्ञापालन नितान्त आवश्यक है। अनुशासन से योग्य नागरिक बनकर देश की अच्छी तरह सेवा कर सकते हैं। अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह भी उचित रूप से करते हैं। ऐसे विद्यार्थी कर्त्तव्यपरायण होकर राष्ट्र रूपी भवन की गहरी नींव डालते हैं। अनुशासनं से स्वर्ग धरती पर उतर सकता है।

उपसंहार-जीवन को सुखमय एवं प्रगतिशील बनाने का – साधन अनुशासनमय जीवन ठहराया गया है। अनुशासित इन्सान ही उत्तरदायित्व का सफल निर्वाह कर सकता है, जो मानव अनुशासन को अपने जीवन का अंग बना लेते हैं, वे स्वयं तो सुखी रहते ही हैं, समाज को भी सुखमय एवं शान्तमय बनाते हैं। उद्देश्य भी उन्हें आसानी से प्राप्त हो जाता है। अतः क्या ही अच्छा हो कि हम अनुशासन का पालन करके राष्ट्र के गौरव में चार चाँद लगा सकें।

9. खेलों का महत्त्व

प्रस्तावना-जीवन में वही मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन कर सकता है, जो स्वस्थ एवं सबल हो। किसी विद्वान ने उचित ही कहा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। शरीर को स्वस्थ एवं निरोग बनाने के लिए सम्यक् खान-पान के साथ ही नियमित रूप से व्यायाम करना भी परमावश्यक है। खेलों के माध्यम से शरीर स्वस्थ रहता है। साथ-साथ भरपूर मनोरंजन भी होता है।

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मन मस्तिष्क एवं खेल-मानव के मन तथा मस्तिष्क से खेल का घनिष्ठ सम्बन्ध है। खिलाड़ी अपनी रुचि के अनुसार खेल का चयन करता है।

आज का जीवन संघर्षमय है। मनुष्य दिनभर रोजी-रोटी की समस्या को हल करने में लगा रहता है। दिनभर की मानसिक थकान को मिटाने के लिए मानव खेल के मैदान में उतरता है। इससे उसे असीम उल्लास एवं ताजगी का अनुभव होता है। – खेलों के प्रकार-प्रमुख रूप से दो प्रकार के खेल खेलने का प्रचलन है। एक वे जो घर के अन्दर खेले जाते हैं। दूसरे प्रकार के खेल मैदानों में खेले जाते हैं। घर के अन्दर खेलने वाले खेल लूडो, टेनिस, शतरंज, कैरम आदि हैं। मैदानों में खेले जाने वाले खेलों के अन्तर्गत हॉकी, क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी तथा बास्केटबॉल इत्यादि हैं।

खेलों का महत्त्व-खेल मनोरंजन का सबसे उत्तम साधन है। इससे मानव की थकान दूर होती है। समय का सदुपयोग होता है। सामाजिक भावना का भी खेल के मैदान में पल्लवन होता है। इससे जीवन में निखार तथा प्रेम का अभ्युदय होता है।

खेल हमें अनुशासन एवं समय का पाठ पढ़ाते हैं। जीवन में संघर्षों से जूझने की शक्ति आती है। साहस, धीरता, गम्भीरता तथा उदारता के भाव भी जाग्रत होते हैं।

उपसंहार-भली प्रकार चिन्तन एवं मनन करने से यह तथ्य उजागर होता है कि खेलों का जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। खेल यथार्थ में शिक्षा एवं जीवन का एक भाग है। खेलों से खेल भावना के साथ ही भाईचारे की भावना का भी विकास होता है। श्रम के प्रति निष्ठा खेलों से उत्पन्न होती है। हार को प्रसन्नतापूर्वक सहन करने की क्षमता का विकास होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमें राजनैतिक दाँव-पेंच में न उलझकर खेलों को प्रोत्साहन देना चाहिए। छात्रों में खेल के मैदान में खेल की भावना विकसित होती है। उसके सहारे प्रगति की मंजिल पर निरन्तर अग्रसर होते जाते हैं।

10. पुस्तकालय के लाभ

प्रस्तावना-मनुष्य के मनमानस में जिज्ञासा की भावना प्रतिपल जाग्रत होती रहती है। उसकी यह आकांक्षा रहती है कि सीमित समय में अधिक-से-अधिक जानकारी हासिल कर सके। लेकिन प्रत्येक मनुष्य की अपनी सीमाएँ होती हैं। प्रायः प्रत्येक मनुष्य में इतनी क्षमता नहीं होती कि मनवांछित पुस्तकें क्रय करके उनका अध्ययन कर सके। पुस्तकालय मानव की इसी इच्छा की पूर्ति करता है।

पुस्तकालय का अर्थ-पुस्तकालय का अर्थ है-‘पुस्तकों का घर’, जिस जगह अनेक प्रकार की पुस्तकों को संग्रह होता है, उसे पुस्तकालय कहा जाता है। पुस्तकालयों में मानव मन में उमड़ती-घुमड़ती शंकाओं का निराकरण करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। – पुस्तकालयों के प्रकार-जिन्हें पुस्तकों से लगाव होता है वे अपने घर में निजी पुस्तकालय बना लेते हैं। विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में भी पुस्तकालय होते हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय भी होते हैं जिनमें अधिक-से-अधिक लोग ज्ञान अर्जन कर सकते हैं। सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाएँ ऐसे पुस्तकालयों का संचालन करती हैं। आज पुस्तकों की माँग के फलस्वरूप चलते-फिरते पुस्तकालय भी अवलोकनीय इसके अतिरिक्त वाचनालयों में दैनिक, साप्ताहिक-मासिक पत्रिकाएँ भी सुगमता से पढ़ने को उपलब्ध हो जाती हैं।

पुस्तकालयों से लाभ-पुस्तकालय ज्ञान-विज्ञान, साहित्य एवं संस्कृति का अक्षय कोष होते हैं। प्राचीन ग्रन्थ भी यहाँ उपलब्ध होते हैं। आविष्कार करने वाले यहाँ हर विषय की जिज्ञासा शान्त करते हैं।

पुस्तकालयों में पाठक विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन करके मनोरंजन के साथ-साथ अपने ज्ञान का विकास भी करता है। पुस्तकालय के अमूल्य ग्रन्थों से हमें धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों की प्रेरणा मिलती है।

विख्यात पुस्तकालय-पुस्तकालय प्रत्येक समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होते हैं। नालन्दा तथा तक्षशिला में भारत के गौरव पुस्तकालय थे। आज भी कोलकाता, दिल्ली, वाराणसी तथा पटना में बहुत से प्रसिद्ध पुस्तकालय हैं।

उपसंहार-पुस्तकालय ज्ञान का ऐसा पवित्र एवं स्वच्छ सरोवर हैं जिसमें स्नान करके मन एवं मस्तिष्क को एक नयी ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम पुस्तकालयों का क्षमता के अनुसार प्रयोग करने का अधिक-से-अधिक प्रयत्न करें। पुस्तकालय के अपने कुछ निर्धारित नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मानव का दायित्व है। आज हमें देश की धरती पर एक ऐसे पुस्तकालय की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला एवं संगीत सभी विषयों की पुस्तकें आसानी से उपलब्ध हो सकें। उन्नत पुस्तकालय देश के भावी कर्णधारों के लिए एक अमूल्य धरोहर है जो उनके जीवन के लिए प्रगति का एक सबल माध्यम है।

11. कम्प्यूटर

प्रस्तावना-विज्ञान ने आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपना जबरदस्त प्रभाव छोड़ा है। उसकी सहायता से मनुष्य ने जीवन में काम आने वाली अनेक उपयोगी वस्तुओं और मशीनों का आविष्कार किया है। इन मशीनों ने मनुष्य की व्यस्तता प्रधान जीवन-शैली को सुखकर बनाया है। सुविधाएँ दे दी गई हैं। कम्प्यूटर की सहायता से मनुष्य ने अपने लिए श्रम, समय और शक्ति की बचत कर डाली है। मानव अपनी बची हुई शक्ति, श्रम . और समय को अन्य किसी काम में लगाकर अपने लिए उपयोगी बना लेता है और उसका सीधा लाभ प्राप्त करता है। .. .

विज्ञान की महत्वपूर्ण देन-‘कम्प्यूटर विज्ञान का अनौखा उपहार है। इसकी सहायता से सही और सरल तरीके से नाप-तौल कर सकते हैं। उसके आँकड़े भी आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। कम्प्यूटर की सहायता से हमें तत्काल ही स्थितियों का ज्ञान हो जाता है। इस मशीन से एक ही बार में अन्य कई काम किये जा सकते हैं।

क्या है कम्प्यूटर ?-कम्प्यूटर यान्त्रिक मस्तिष्कों का समन्वयात्मक एवं गुणात्मक योग है जिससे हमें त्रुटिहीन जानकारी बहुत कम समय में प्राप्त हो जाती है। इससे प्राप्त गणनाएँ शुद्ध, उपयोगी तथा त्वरित हुआ करती हैं।

इसके सारे कार्य संकेतों पर अवलम्बित होते हैं। ये संकेत गणितीय भाषा में होते हैं। बड़े-बड़े रिकॉर्डों को कम्प्यूटर की स्मृति-भण्डार में संचित किया जाता है। इच्छानुसार इन्हें उपयोग के लिए प्राप्त कर सकते हैं।

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कम्प्यूटर के उपयोग-कम्प्यूटर का उपयोग सुरक्षा, उद्योग, व्यापार, उत्पादन, वितरण, परिवहन आदि सभी कामों में किया जाता है। व्यापक रूप से कम्प्यूटर का उपयोग प्रकाशन में किया जा रहा है। साथ ही, इसका उपयोग बैंकिंग में काफी हो रहा है। इसके अलावा मेडिकल के क्षेत्र में कम्प्यूटर का उपयोग हो रहा है।

उपसंहार-कम्प्यूटर से सहायता प्राप्त करने के लिए इसकी सारी जानकारी रखना अनिवार्य है। अनुभव से अपना कार्य क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।

12. गणतन्त्र दिवस
अथवा
राष्ट्रीय पर्व

प्रस्तावना-भारत त्यौहारों का देश है। इसकी धरती पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक त्यौहार सम्पन्न किये जाते हैं। परन्तु ये त्यौहार किसी धर्म सम्प्रदाय अथवा ज़ाति से जुड़े रहते हैं। लेकिन जो पर्व समस्त देश में एक साथ मनाया जाता है उसे राष्ट्रीय पर्व की संज्ञा से विभूषित किया जाता है। इसी श्रृंखला में 26 जनवरी हमारा राष्ट्रीय पर्व है। हर वर्ष 26 जनवरी को विशेष उल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन हमारे देश को पूर्ण गणतन्त्र घोषित किया गया था।

गणतन्त्र दिवस का इतिहास-यद्यपि सन् 1857 में स्वतन्त्रता की चिंगारी भड़की थी, परन्तु पारिवारिक फूट का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने इन आन्दोलनों को कुचल दिया। परन्तु तिलक, गाँधी, सुभाष तथा नेहरू ने देश को आजाद कराने का प्रण लिया। राजनीतिक क्षितिज पर 1947 को भारत को आजादी मिली। 26 जनवरी, सन् 1950 से हमारा संविधान लागू हुआ

और यह दिन हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। अंग्रेजों के गवर्नर जनरल की जगह भारत का शासन राष्ट्रपति के हाथों में आया। इस भाँति 26 जनवरी की महिमा सर्वत्र व्याप्त है।

26 जनवरी के कार्यक्रम-26 जनवरी को सभी जगह ध्वजारोहण किया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। प्रभात फेरियाँ निकाली जाती हैं। दिल्ली में सैनिकों की परेड भी उत्साहवर्द्धक होती है। आकाशवाणी से राष्ट्रपति तथा प्रधानमन्त्री के भाषण प्रसारित होते हैं। रात्रि में भी दिन जैसा प्रकाश होता है।

26 जनवरी का गौरव-यह दिन हमें देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की याद दिलाता है। दिल्ली में आयोजित विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम देश के उत्थान के परिचायक हैं।

स्वतन्त्र भारत के नागरिकों का दायित्व-स्वतन्त्र भारत ने अपनी, आजादी और इसकी अखण्डता की सुरक्षा के लिए अति महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हमारी सीमाओं की सुरक्षा, आन्तरिक शान्ति व्यवस्था में सैनिक बल और अर्द्ध-सैनिक बल अपना उत्तरदायित्व निभाते हुए पूर्ण सहयोग कर रहे हैं। साथ ही सम्पूर्ण जनता उनकी अभिवृद्धि और खुशहाली के लिए सहयोग

के साथ प्रार्थना भी करती है। – यद्यपि देश में आतंकवादी एजेन्सियाँ मिलकर अपना कार्य कर रही हैं, परन्तु हमारे सैनिक व सुरक्षा बल उस आतंकवाद को समूल नष्ट करने के लिए तत्पर हैं, सक्षम हैं।

गणतन्त्र का पर्व हम सभी भारतवासियों का आह्वान करता है कि अभी वास्तविक रूप से गणतन्त्र की स्थापना में कुछ कमी है। वह कमी है सभी को सामाजिक व्यवस्था में समानता के अधिकार की। आर्थिक शैक्षिक विपन्न व्यक्ति भारत गणराज्य की ओर एकटक बेबसी की दृष्टि से देखने को मजबूर है।

उपसंहार-हमारे देश में स्वतन्त्रता देवी का आगमन कठोर साधना एवं बलिदान के फलस्वरूप हुआ है। अत: देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि इसे अक्षुण्ण बनाने में सहयोग दें। तभी इस पावन पर्व को सम्पन्न करना सार्थक होगा।

13. पर्यावरण और प्रदूषण

प्रस्तावना-आज पर्यावरण प्रदूषण विश्व के समक्ष एक विकराल समस्या की तरह उपस्थित है। पर्यावरण प्रदूषण ने मानव के जीवन को नरकतुल्य बना दिया है। आज विश्व में कोई भी देश ऐसा शेष नहीं है जो इस समस्या से ग्रस्त न हो। विश्व के वैज्ञानिक एवं मनीषी लोग इस समस्या के निवारण के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। साधन तलाश कर रहे हैं।

प्रदूषण का आशय-जल, वायु, पृथ्वी के रासायनिक, जैविक, भौतिक गुणों में घटित होने वाला अवांछनीय परिवर्तन प्रदूषण की श्रेणी में आता है। वर्तमान में विश्व नवीन युग में पदार्पण कर रहा है। लेकिन खेद का विषय है कि आज विषाक्त वातावरण उसके जीवन में जहर घोल रहा है।

प्रदूषण के कारण-प्रदूषण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण जनसंख्या वृद्धि है। बढ़े हुए कल-कारखाने भी पर्यावरण प्रदूषण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, पानी का शुद्ध न होना, ध्वनि प्रदूषण में आविष्कृत वाहन ये सभी पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। गन्दगी फैलने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो रहे हैं। पर्यावरण को प्रदूषित करने का महत्त्वपूर्ण कारण है-

  • निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या।
  • वनों और वृक्षों का अनियोजित ढंग से काटा जाना।
  • शहरों के कूड़े-करकट का सुनियोजित निस्तारण न किया जाना।
  • जल निकासी और उसके प्रवाह का अनुचित प्रबन्ध।

पर्यावरण प्रदूषण के निराकरण के उपाय-वृक्षारोपण, ध्वनि नियन्त्रण यन्त्रों का प्रयोग, परमाणु विस्फोटों पर रोक, कल-कारखानों में फिल्टर का प्रयोग, नुकसानदायक, रासायनिक तत्वों को नष्ट करना, नदियों में प्रवाहित गन्दगी पर रोक, इन सभी के द्वारा हम प्रदूषण को पूर्णरूप से तो नष्ट नहीं कर सकते लेकिन उसे कुछ मात्रा में कम तो कर ही सकते हैं। प्रदूषण को रोकने वाले तत्वों में प्रधान तत्व हैं-वृक्षों का आरोपण, उनकी सुरक्षा और देखभाल का उचित प्रबन्ध। प्राचीन वनों को सुरक्षित रखा जाए। नवीन वनों का प्रबन्ध किया जाए। वृक्ष लगाये जाएँ। वृक्षों की सिंचाई व्यवस्था ठीक की जाए।

उपसंहार-पर्यावरण प्रदूषण के निवारण हेतु विश्व के समस्त देश निरन्तर प्रयासरत हैं। आशा है निकट भविष्य में मनु पुत्र को इस समस्या से कुछ हद तक निजात अवश्य प्राप्त होगी। क्योंकि बीमारी का तो इलाज है लेकिन प्रदूषण द्वारा उत्पन्न रोग असाध्य है।

14. परोपकार

प्रस्तावना-संसार के अनेक जीवों में मनुष्य समझदार और बुद्धिमान प्राणी है। वह स्वयं अकेला और अपने तक ही सीमित रहकर जीवित नहीं रह सकता। मनुष्य अपनी सामाजिकता के गुण के कारण परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सभी प्राणियों से जुड़ा हुआ है। यही जुड़ाव उसे दूसरों की भलाई करने के लिए प्रेरित करता है।

परोपकार का अर्थ-‘परोपकार’ शब्द ‘पर + उपकार’ के मेल से बना है। ‘पर’ का तात्पर्य दूसरों का होता है तथा उपकार’ का अर्थ भलाई से होता है। अर्थात् दूसरों की भलाई करना ही परोपकार है। हम अपने सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में इसी परोपकार की भावना से सक्रियता और प्रेरणा प्राप्त करते हैं। परोपकार में दया, करुणा, सहयोग आदि भाव आते हैं। ये सात्विक भाव होते हैं।

परोपकार की आवश्यकता-इस विश्व में तरह-तरह के जीवों को तरह-तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं, उन्हें कष्टदायी रोग पीड़ा पहुँचाते हैं। अतः हमें उनके प्रति दयालुता और करुणा प्रदर्शित करते हुए परोपकार करना चाहिए।

यह प्रकृति भी परोपकारी शिक्षा देती है। नदी पानी बहाकर लाती है, उस पानी का उपयोग, प्राणियों के लिए पीने के काम आता है। फसलों की सिंचाई के काम आता है। पेड़ हमें फल देते हैं। उनके फूल व पत्तियाँ भी हमें शुद्ध वायु, पर्यावरण की शुद्धता देकर लाभ प्राप्त कराती है। वर्षाऊ बादल झुककर नीचे आ जाते हैं और समय पर वर्षा कर देते हैं। इस तरह प्रकृति के विभिन्न उपादान-चन्द्रमा (शीतल चाँदनी देता है), सूरज (प्रकाश देता है) आदि प्रत्येक पहलू हमारे लिए लाभ देता है, साथ ही हमें परोपकार की शिक्षा भी देता है।

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उपसंहार-‘परोपकार’ करना महाविभूतियों की विशेषता है। वे सदैव परोपकार का कार्य स्वयं ही खुश हुआ करते हैं।

15. समाचार-पत्र का महत्त्व

प्रस्तावना-आज समाचार-पत्र जनजीवन का अभिन्न अंग बन गया है। प्रात:काल उठते ही हर व्यक्ति चाय ग्रहण करने के साथ ही अखबार को पढ़कर अपना मनोरंजन कर लेता है। परिवार के सभी सदस्य अखबार पढ़ने एवं समाचार जानने के लिए लालायित हो उठते हैं। समाचार देश-विदेश की खबरों को जानने का सर्वसुलभ साधन है।

इतिहास-समाचार-पत्र का प्रचलन इटली के वेनिस नगर में तेरहवीं शताब्दी में हुआ। जैसे-जैसे मुद्रण कला का विकास हुआ, समाचार-पत्रों का भी उसी गति से प्रचार एवं प्रसार हुआ।

विभिन्न व्यक्तियों को लाभ-बेरोजगार युवक रोजगार के विषय में, खिलाड़ी खेल के विषय में, नेता राजनीतिक हलचल के विषय में, व्यापारी वस्तु के भावों के विषय में सूचना समाचार-पत्रों के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं।

समाचार-पत्रों का महत्त्व-आज विश्व की परिस्थिति निरन्तर जटिल होती चली जा रही है। जीवन संघर्षमय हो गया है, राजनीतिक गतिविधियाँ निरन्तर अपना रंग दिखा रही हैं, ऐसे में समाचार-पत्रों के माध्यम से इनके विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इनके अभाव में ज्ञान का क्षेत्र अधूरा प्रतीत होता सम्पादक का दायित्व-सम्पादकीय टिप्पणी पढ़कर ही किसी समाचार-पत्र का स्तर निर्धारित होता है। इसमें राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को उजागर किया जाता है।

अखबार प्रकाशन के आज के साधन-आज हैण्ड कम्पोजिंग के स्थान पर कम्प्यूटर काम में लाया जाता है। इससे समाचार-पत्रों का प्रकाशन सुलभ एवं सस्ता हो गया है। ज्ञान के प्रचारक एवं प्रमुख वाहक-समाचार-पत्र पाठकों के ज्ञान का विस्तार करता है। देश के कर्णधारों के आदर्शों से प्रभावित होकर जन-सामान्य उनका अनुगमन करके अपने जीवन को सफल बनाते हैं।

स्वतन्त्रता से पूर्व समाचार-पत्रों का दायित्व-सम्पादकों ने अंग्रेजों के शोषण तथा अत्याचार को देश के समक्ष अखबारों के माध्यम से निडरता से उजागर किया। ऐसा करने से उन्हें कठिनाईयों का सामना करना पड़ा लेकिन वे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए।

युद्ध एवं विपत्ति में समाचार-पत्रों का दायित्व-प्राकृतिक प्रकोपों की सूचना जन-सामान्य तक समाचार-पत्रों के माध्यम से पहुँचती है। इसको पढ़कर समाज सेवी संस्थाएँ उन स्थानों तक यथासम्भव सहायता पहुँचाती हैं।

हानियाँ-कल्पित तथा झूठे समाचार-पत्र जन-सामान्य को भुलावे में डाल देते हैं। यदा-कदा इनके फलस्वरूप साम्प्रदायिक दंगों का जन्म होता है। जनता का सम्बन्ध-समाचार-पत्रों के माध्यम से सरकार जनता की भावनाओं से अवगत होती है।

उपसंहार-समाचार-पत्र राष्ट्र विशेष की अमूल्य सम्पत्ति होते हैं, इनकी तनिक-सी लापरवाही से राष्ट्र की विशेष हानि हो सकती है। अतः समाचार-पत्रों को अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिपल सजग रहना चाहिए। ये राष्ट्र विशेष के जीवन्त प्रहरी हैं। इनके प्रभाव से राष्ट्र अवनति के गर्त में जा सकता है। अतः इनका प्रतिपल जागरूक रहना अत्यावश्यक है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 धनुष की प्रत्यंचा

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 19 धनुष की प्रत्यंचा (डॉ. देवेन्द्र दीपक)

धनुष की प्रत्यंचा अभ्यास-प्रश्न

धनुष की प्रत्यंचा लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तूफानों से खेलने का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
तूफानों से खेलने का आशय है-निडर होकर बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए जीवन-पथ पर आगे बढ़ते जाना।

प्रश्न 2.
कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी के लिए किस प्रकार सेतु बन सकता है?
उत्तर
कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी के लिए उसके हौसला को बढ़ाकर सेतु बन सकता है।

प्रश्न 3.
प्रत्यंचा को शक्ति के साथ खींचने से कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रत्यंचा को शक्ति के साथ खींचने से कवि का आशय है-वह जितनी अधिक शक्ति से खींची जाएगी, वह उतनी ही तेजी से और शक्ति से लक्ष्य को भेदने तक तीर को फेंकती है। दूसरे शब्दों में, पूरी शक्ति और युक्ति से ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

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प्रश्न 4.
शिष्य की प्रसन्नता और दुख का गुरु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
शिष्य की प्रसन्नता और दुख का गुरु पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। शिष्य को प्रसन्न देखकर गुरु प्रसन्न होता है और शिष्य को दुखी देखकर गुरु दुखी हो जाता है।

प्रश्न 5.
गुरु ने शिष्य को अंशज और बंशज क्यों कहा है?
उत्तर
गुरु ने शिष्य को अंशज और वंशज कहा है। यह इसलिए कि उसकी विशेषताएँ उसमें मिलती-जुलती हैं।

प्रश्न 6.
कवि का मन खुशी से कब झूमने लगता है?
उत्तर
कविका मन तब खुशी से झूमने लगता है, जब शिष्य अपने गुरु के पास अपने मौलिक भावों से स्वाभिमानपूर्वक जीवन-अर्थ का नयापन लेकर आता है।

धनुष की प्रत्यंचा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘शूल के बीच ही फूल खिलता है’ इसका आशय प्रस्तुत कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शूल के बीच ही फूल खिलता है।’ इस तथ्य की सत्यता यह है कि गुरु की डाँट-फटकार और कड़े अनुशासन में रहने वाला शिष्य बहुत योग्य और महान बनता है। उसमें ऐसे-एसे गुणों की पैठ हो जाती है कि वह अपने जीवन में आने वाली बाधाओं को झुकाकर आगे बढ़ जाता है। इससे सफलता उसे चूम लेती है।

प्रश्न 2.
‘मीन को बेंधने’ में कौन-सी पौराणिक अन्तर्कया निहित है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
मीन को बेंधने में महाभारत की पौराणिक अन्तर्कथा निहित है। इसमें वह कथा निहित है, जो द्रोपदी स्वयंवर की है। उस स्वयंवर में अर्जुन नीचे रखे हुए जल में देखकर ऊपर रखी हुई और नाचती हुई मछली की आँख में तीर से निशाना लगाया था। शर्त के अनुसार द्रोपदी के साथ उनका विवाह हुआ था।

प्रश्न 3.
“में नींव बन नीचे रहूँगा।” इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मैं नींव बन नीचे रहूँगा’। इस पंक्ति का गहरा और बड़ा अर्थ। इसमें गुरु का अपने शिष्य के प्रति आत्मीय त्याग के भाव भरे हुए हैं। गुरु सदा ही अपने शिष्य के सख और उसके विकास के लिए अपना योगदान देने से पीछे नहीं हटता है। उसका तो एकमात्र यही उद्देश्य होता है कि उसका शिष्य महान बने। वह अपने शिष्य की उन्नति और उसकी अच्छाई के लिए यह सब कुछ करने-सहने के लिए तैयार रहता है। यहाँ उसके जीवन-भवन की नींव बनने के लिए सहर्ष तैयार रहता है।

प्रश्न 4.
कवि शिष्य को कहाँ उतरने की सलाह देता है? इस कविता के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कवि शिष्य को जीवन-संग्राम में उतरने की सलाह देता है। वह उसे अपने गुरु से आशीर्वाद लेकर आँधी-तूफान आदि से टकराने-खेलने की सलाह देता है। वह उसे सभी प्रकार की बाधाओं को अपनी छाती पर झेलने की भी सलाह-उत्साह देता है।

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प्रश्न 5.
‘अज्ञान की मीन को तुम बेंध डालो’
सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।’
इन पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ आज के हताश और भटके हुए विद्यार्थियों को प्रेरित करने के संदर्भ में हैं। द्रोपदी स्वयंवर के प्रसंग के द्वारा इन विद्यार्थियों को अपनी हताशा को त्याग कर सफलता प्राप्त करने की सीख दी गई है। इससे सफलता निश्चय ही कदम चूम लेगी। इसकी संभावना ही निश्चयात्मकता भी है। लेकिन यह तभी संभव है जब आज का यह हताश-निराश विद्यार्थी वर्ग अर्जुन की तरह पुरुषार्थी और कर्मठ हो।

प्रश्न 6.
में साधना हूँ…केतु बन जाना।’ इन पंक्तियों का भावार्य संदर्भ-प्रसंग सहित लिखिए।
उत्तर
तुम सदैव अपने प्रगति-पथ पर बढ़ते चलो, मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहूँगा। इसके लिए मैं साधना बनकर तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम सफलता बनकर आगे बढ़ते जाना। इसी प्रकार मैं तुम्हारे आँख बनकर रहूँगा, तो तुम ज्योति रूप में बढ़ते चले जाना। इसी प्रकार में तुम्हारे विजय के स्तंभ के रूप में मौजूद रहँगा, तो तुम विजय की पताका बनकर फहराते चलते चले जाना। तुम्हें आज इन बातों को बड़ी गंभीरतापूर्वक अमल करना नहीं भूलना है यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारा मानस पिता हूँ। इसे समझकर तुम आज मेरी इन बातों को हृदय से स्वीकार करके मेरी महिमा को बनाए रखना। तुमसे मेरी यही उम्मीद भी है कि तुम मेरा महत्त्व घटाओगे नहीं अपितु बढ़ाते ही जाओगे।

प्रश्न 7.
आज का विद्यार्थी उदास और अनिश्चय की स्थिति में क्यों है? प्रस्तुत कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आज का विद्यार्थी उदास और अनिश्चय की स्थिति में है। यह इसलिए कि वह अज्ञानमय कुआँ में डूब रहा है। उसे बाहर निकालने वाला कोई योग्य अध्यापक नहीं दिखाई दे रहा है। यह निराधार होकर इधर-उधर भटक रहा है। अगर उसे आत्मीय और सहदय प्राप्त हो जाए तो उसकी उदासी और निराशा देखते-देखते दूर हो जाएगी। फिर वह सफलता के शिखर पर चढ़ता ही जाएगा।

प्रश्न 8.
‘शिष्य के लिए गुरु की महिमा’ विषय पर अपना बिचार लिखिए।
उत्तर
‘शिष्य के लिए गुरु की महिमा’ निस्संदेह है। गुरु के बिना शिष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। गुरु के बिना शिष्य अज्ञानमय अंधकार में डूबा रहता है। वह
उसकी ज्ञानमयी किरणों के बिना बाहर निकल पाने में असमर्थ रहता है। जैसे गुरु की ज्ञानमयी किरणें शिष्य पर पड़ने लगती हैं; वैसे ही शिष्य का अज्ञानान्धकार दूर हो जाता है। फिर वह हर प्रकार से सक्षम और योग्य बनकर जीवन के विकास पथ पर बढ़ने लगता है।

प्रश्न 9.
छात्र की योग्यता के विकास की यात्रा में शिक्षक की क्या भूमिका होती है?
उत्तर
छात्र की योग्यता के विकास की यात्रा में शिक्षक की भूमिका बहुत बड़ी होती है। शिक्षक छात्र के अज्ञान को दूर करके, उसे सर्व समर्थ बनाने की शिक्षा देता है। एक योग्य शिक्षक की यह योग्यता होती है कि वह अपने युग और युग की आवश्यकता का सच्चा पारखी होता है। उसका आंकलन वह अपने छात्र में करता है। उसे युग की कसौटी पर खरा उतरने के उपयुक्त और अनुकूल शिक्षा देता है। इस तरह से एक योग्य शिक्षक अपने छात्र की योग्यता का विकास कर बहुत बड़ी भूमिका को निभाता है।

धनुष की प्रत्यंचा भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
कंठ-कंठ के शब्द पुनरुक्त शब्द हैं। इस प्रकार के अन्य शब्द पाठ में से छाँटकर लिखिए।
प्रश्न 2.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों के तत्सम शब्द रूप लिखिए।
भौंह, जोत, मछली, फूल, नैन।

प्रश्न 3
‘अंधकार’ में कार तवा ‘कटोरता’ में ता प्रत्यय जुड़े हैं इसी प्रकार ‘कार’
तथा ‘ता’ जोड़कर 5-5 नए शब्द बनाइए।
उत्तर
1. कभी-कभी, तनी-तनी, जब-जब, तब-तब, गड़ी-गड़ी।

2. तुभव शब्द तत्सम शब्द ।
भाह – भौं
जोत – ज्योति
मछली – मत्स्य
पुष्प – पेश
नैन – नेत्र

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3. ‘कार’ और ‘ता’ प्रत्यय से जुड़े 5-5 नए शब्द
(क) ‘कार’ प्रत्यय से जुड़े शब्दशब्द
प्रत्यय
रचना – रचनाकार
दर – दरकार
बद – बदकार
अदा – अदाकार
पेशकार – फल

(ख) ‘ता’ प्रत्यय से जुड़े नए
शब्द – प्रत्यय
अधीर – अधीरता
कोमल – कोमलता
मधुर – मधुरता
मूर्ख – मूर्खता
शिष्ट . शिष्टता।

धनुष की प्रत्यंचा योग्यता-विस्तार

1. शिक्षक की गरिमा से संबंधित अन्य कोई प्रसंग या कविता खोजकर लिखिए।
2: आप शिक्षक बनकर कौन-कौन से कार्य करना चाहेंगे लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

धनुष की प्रत्यंचा परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उदास और मलिन चेहरा होने का क्या कारण है?
उत्तर
उदास और मलिन चेहरा होने का कारण है-अज्ञानमय अंधकार में पूरी तरह से डूब जाना।

प्रश्न 2.
सेतु-निर्माण का क्या उद्देश्य है?
उत्तर
सेतु-निर्माण का उद्देश्य बहुत बड़ा है। इस पर निडर और निश्चित होकर ही अंधकार को पार कर ज्योति का द्वार खोला जा सकता है।

प्रश्न 3.
कवि ने कटोरता की विवशता की क्या विशेषता बतलायी है?
उत्तर
कवि ने कठोरता की विवशता की यह विशेषता बतलायी है कि कठोरता सीपी है, जिसमें मोती पलती-बढ़ती है।

प्रश्न 4.
झिड़कियाँ और तनी-तनी भृकुटियों के प्रतीक को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
झिड़कियाँ और तनी-तनी भृकुटियाँ शूलस्वरूप रक्षा-परिधि की प्रतीक हैं। इनके ही बीच में आशा रूपी फूल खिलते हैं।

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प्रश्न 5.
कवि ने अध्यापक द्वारा अपने छात्र को जीवन-संग्राम में उतरकर विजयी होने की किन-किन विशेषताओं से उसके हौसले को बढ़ाया है?
उत्तर
कवि ने अध्यापक द्वारा अपने छात्र को जीवन-संग्राम में उतरकर विजय होने की अनेक विशेषताओं से उसके हौसले को बढ़ाया है। वे विशेषताएँ हैं-उसकी आत्मा के अंशज, वंशज, उसकी अर्जन, उसकी कविता और उसका सर्जन।

प्रश्न 6.
अध्यापक ने अपने छात्र से किस तरह अपनी अंतिम अभिलाषा व्यक्त किया है?
उत्तर
अध्यापक ने अपने छात्र से मानस पिता के रूप में अपनी अंतिम अभिलाषा ‘मेरी लाज रख लेना’ व्यक्त किया है।

प्रश्न 7.
‘प्रत्यंचा’ और ‘तीर’ किसके प्रतीक हैं?
उत्तर
‘प्रत्यंचा’ शिक्षक के शिक्षण और ‘तीर’ ‘ज्ञान और लगन’ के प्रतीक हैं।

धनुष की प्रत्यंचा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“यह दुनिया एक अंधा कुआँ है? लो, में रज्जु बन लटका हूँ।” उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
यह दुनिया एक अंधा कुआँ है,
लो, मैं रज्जु बन लटका हूँ।”
उपर्युक्त पंक्तियों के द्वारा यह भाव व्यक्त करने का प्रयास किया गया है कि आज के छात्र का भविष्य अंधकारमय हो गया है। उसे चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण है कि उसमें अज्ञानता, अयोग्यता और अक्षमता है। उसे इन सबसे मुक्त कर उसमें ज्ञान, योग्यता और क्षमता लाने वाला कोई नहीं दिखाई देता है। उसे इस प्रकार अज्ञानमय अंधकार में पड़े हुए देखकर उसे प्रबोध देकर उसे योग्य और सक्षम उसका अध्यापक ही उसके लिए रस्सी का काम कर सकता है। उसके सहारे ही वह इस अंधकार से निकलकर अपने भविष्य को चमका सकता है।

प्रश्न 2.
मीन को बेंधने की पौराणिक कथा का उल्लेख जिन पंक्तियों में हुआ है उन्हें लिखिए।
उत्तर
मीन को बेंधने की पौराणिक कथा का उल्लेख निम्नलिखित पंक्तियों में हुआ है-.मैं धनुष की प्रत्यंचा हूँ अपनी पूरी शक्ति से खींचो, रखना विश्वास नहीं टूट्रॅगा, नहीं टूटूंगा चलाओ ज्ञान के तुम तीर, अज्ञान की मीन को बेंध डालो सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।

प्रश्न 3.
वर्तमान में प्रस्तुत कविता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ द्वारा विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ वर्तमान युग में बहुत अधिक प्रासंगिक है। यह इसलिए कि आज अध्यापक और छात्र के संबंध परस्पर बिगड़ चुके हैं। दोनों अपनी-अपनी गरिमा से गिर चुके हैं। इसलिए दोनों के संबंध पुनः मधुर और सरस होकर गरिमा-मंडित हों, यह आज के युग की बहुत बड़ी आवश्यकता है। यह तभी संभव है, जब आज का अध्यापक अपने अध्यापन के द्वारा अपने छात्र को सही दिशा-निर्देश दें। यह इसलिए कि आज का छात्र अंधकार से ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित करने, व्यक्तित्व को मोती-सा कांतिवान बनाने, सुजनशील होकर राष्ट्रीय भाव जगाने और उदात्त चरित्र के निर्माण के लिए अपने शिक्षक के प्रेरणा पुंज से ही आलोकित हो सकता है।

प्रश्न 4.
‘नींव बने रहने का भाव किन पंक्तियों में है? चुनकर लिखिए।
उत्तर
‘नींव बने रहने का भाव निम्नलिखित पंक्तियों में है
मैं नोंव बन नीचे रहूँगा ।
लेकिन तुम सीढ़ियाँ चढ़ना
हर दिवस बढ़ना हर रात बढ़ना
आसमान छूना।
तुम रुकोगे
तो नींव में गड़ी-गड़ी
मेरी अस्थियों में दर्द होगा।

प्रश्न 5.
‘धनुष की प्रत्यंचा’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
चूँकि आज छात्र अपने कर्त्तव्य से विमुख हो रहे हैं। उनमें कर्त्तव्यहीनता का तनिक बोध नहीं हो रहा है। इससे शिक्षा-जगत में एक बहुत बड़ी विडम्बना आ गई है। इसे आज एक योग्य और महान अपने दायित्व की दृष्टि से समझ सकता है। इस दृष्टि से हिन्दी के जाने-माने कवि एवं मनीषी डॉ. देवेन्द्र दीपक की ‘धनुष की प्रत्यंचा’ हिन्दी की उन विरल कविताओं में शीर्षस्थ कविता है जिसमें एक शिक्षक अपने पक्ष के औदात्य को गंभीरता से प्रस्तुत करता है। इस कविता में इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया कि लक्ष्य का भेद धनुष की प्रत्यंचा के ऊपर निर्भर करता है। वह जितनी अधिक शक्ति से खींची जाती है वह उतनी ही तीव्रता और शक्ति के लक्ष्य भेदन तक तीर को प्रक्षेपित करती है। ठीक इसी प्रकार शिक्षक का शिक्षण उसके छात्र के लिए प्रत्यंचा के समान है। इस प्रत्यंचा को जितनी अपनी जिज्ञासा और लगन की शक्ति से शिक्षक से सीखने का प्रयास करेगा, वह उतना ही अधिक, ज्ञान के तीर से अपने जीवन की बाधाओं को बेध सकेगा।

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प्रश्न 6.
इस कविता में शिक्षक ने अपने विद्यार्थी के लिए जिन-जिन रूपों को प्रस्तुत किया है, उन पंक्तियों को लिखिए
उत्तर
इस कविता में शिक्षक ने अपने विद्यार्थियों के लिए जिन-जन रूपों को प्रस्तुत किया है, वे विद्यार्थी पाठ में देखें।

धनुष की प्रत्यंचा कवि-परिचय

प्रश्न
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के . महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-डॉ. देवेन्द्र दीपक की हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकारों में गणना की जाती है। मध्य-प्रदेश के चर्चित कवियों और सम्पूर्ण हिन्दी-जगत के प्रतिष्ठित कवियों के साथ आपका नाम लिया जाता है। शिक्षा समाप्त कर आपने मध्य-प्रदेश के विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में समय-समय पर स्थानान्तरण के फलस्वरूप अस्थायी रूप में अध्यापन कार्य करते रहे। इसके साथ-साथ आप पत्रकारिता से भी जुड़े।

पत्रकारिता में महारत हासिल करने के उद्देश्य से अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य करते रहे। यही नहीं, आपने, कई छोटी-बड़ी स्तर की पत्रिकाओं और चर्चित पत्रों के संपादन कुशलतापूर्वक किया। बचपन से ही डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का झुकाव हिन्दी काव्य की ओर रहा। फलस्वरूप आपकी काव्य-रचनाएँ अधिक प्रकाश में आयी. हैं। इसके साथ-ही-साथ आपकी कविताओं के अनुवाद भी कई भारतीय भाषाओं में हुए हैं। काव्य-रचना के साथ ही सम्पादन कार्य भी आप करते रहे। इस प्रकार साहित्य और पत्रकारिता इन दोनों क्षेत्र में आप योगदान देने में सक्रिय रहे।

रचनाएँ-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ की निम्नलिखित रचनाएँ हैं

काव्य-संग्रह-‘सूरज बनती किरण’, ‘बन्द कमरा’, ‘खुली कविताएँ’, ‘भूगोल राजा का, खगोल राजा का’, ‘कुण्डली चक्र पर मेरी वार्ता’, ‘मास्टर धरमदास’, ‘हम बौने नहीं दबाव’ आदि।

संपादन-‘छन्द प्रणाम’, “सार्थक एक’ आदि। संप्रति-‘साक्षात्कार’ के संपादक

महत्त्व-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ का असाधारण साहित्यिक महत्त्व है। आपने हिन्दी काव्य-क्षेत्र में आशातीत योगदान दिया है। फलस्वरूप आपकी कविताओं के अनुवाद, संस्कृत, मराठी, सिंधी, पंजाबी, अंग्रेजी, तमिल आदि भारतीय भाषाओं में हुए हैं। आपकी कविताएँ शिक्षित और सांस्कृतिक वर्ग के लिए अधिक उपयोगी और सार्थक सिद्ध हुई हैं। आगामी साहित्यिक पीढ़ी के लिए आप प्रेरणा-स्रोत बने रहेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

धनुष की प्रत्यंचा कविता का सारांश

प्रश्न
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ द्वारा विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’-विरचित प्रस्तुत कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ न केवल आधुनिक कविता है, अपितु प्रासंगिक भी है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है
शिक्षक अपने छात्र को प्रेरित करते हुए कह रहा कि वह क्यों इस तरह होकर अपना मलिन चेहरा लिए अंधकार में डूबकर उदास खड़ा है। वह तो उसके लिए सेतु के रूप में बनकर सामने आया है। अब वह उस पर चढ़कर निडरतापूर्वक ज्योति के द्वार को खोलने के लिए इस अंधकार के उस पार उतर जाए। इसलिए लो, अपना हाथ बढ़ाओ।

शिक्षक का कहना है कि मैं तुम्हें कुंजी-अपनी सहेजी हई पूँजी के रूप में दे रहा हूँ। मेरी कठोरता पर तुम गुस्सा करते हो, लेकिन यह मेरी मजबूरी है। मैं इसे सीपी समझकर सहता हूँ और तुम्हें तो केवल मोती-सा पालना है। यह मैं अच्छी तरह से जानता और अनुभव करता हूँ कि मेरी फटकार तुम्हें शूल के समान चुभ गई है। यह मेरी रक्षा-परिधि थी, जिसमें तुम्हें फूल बनकर खिल जाना था। तुम्हारी मौलिकता और स्वाभिमान मुझे बड़ा ही अनमोल बना देते। इसलिए अब मैं तुमसे यह कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारे लिए नींव के रूप में बना रहूँगा और तुम उस नींव की सीढ़ियों पर एक-एक कदम बढ़ाते जाना। अगर तुम रुकोगे तो नींव में गड़ी हुई मेरी हड्डियों में दर्द होने लगेगा। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम फूल-सा खिलो और अपनी महक को चारों ओर फैलाओ। यह मेरी बहुत बड़ी खुशी होगी। ऐसा इसलिए कि मैंने इसी खुशी के लिए सावन-सा तुम्हारे उदास मन रूपी मरुस्थल में बरसा था।

शिक्षक अपने छात्र को प्रबोध देते हुए कह रहा है-तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि संसार एक अंधकारमय कुआँ है। मैं उसके ऊपर एक रस्सी बनकर लटक रहा हूँ। तुम निश्चित होकर अपने पात्र को भरकर अपने फूलों की बगिया को सींच डालो। मेरी आत्मा के तुम वंशज-अंशज हो। मेरी अर्जन, कविता आदि सब कुछ तुम्हीं हो। रक्षा-कवच की तरह मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। इसे लेकर तुम आँधी-तूफानों का सामना करो। तुम्हारे शत्रुओं के लिए तुम्हें मैं वज्र के समान और तुम्हारे ओठों पर फूल की तरह खिलने के लिए बनकर तैयार हो गया हूँ। इस तरह मैं तुम्हारे लिए धनुष की प्रत्यंचा हूँ।

उसे तुम अपनी पूरी शक्ति से इस विश्वास से खींचो कि यह नहीं टूटेगा। इस पर तुम अपने ज्ञान के तीर चलाते हुए अज्ञान रूपी मछली को बेंध डालो। अपनी सफलता को वैसे ही प्राप्त कर लो जैसे अर्जुन ने स्वयंवर में द्रोपदी को प्राप्त किया था। तुम्हें प्रसन्न देखकर मैं प्रसन्न होता हूँ और दुखी देखकर दुख में डूब जाता हूँ। इसलिए मैं कह रहा हूँ-मैं साधना हूँ तो तुम सिद्धि बन जाना। मैं आँख हूँ तो तुम दृष्टि बन जाना। मैं विजय स्तम्भ हूँ तो तुम विजय का पताका बन जाना। इस प्रकार अपनी हथेली पर विजय प्राप्त करके आज मेरी लाज रख लेना। यह अब तुम्हारे मानस. पिता का वचन है।

धनुष की प्रत्यंचा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. इधर क्यों खड़े हो उदास
क्यों महिलन हो गया चेहरा
अंधकार में,
भटकन में,
डूबे हो कंठ-कंठ।
लो, मैं तुम्हारे हेतु सेतु बना हूँ।
इस सेतु पर पाँव रखकर
निर्भीक और निर्द्वन्द्व होकर
उतर जाना तुम पार
क्योंकि तुम्हें खोलना है
ज्योति का वह द्वार।

शब्दार्थ-मलिन-उदास, मुरझा गया। कंठ-कंठ-पूरी तरह । हेतु-लिए। सेतु-पुल । पाँव-पैर। निर्भीक-निडर। ज्योति-प्रकाश।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी सामान्य’ में संकलित तथा डॉ. देवेन्द्र दीपक-विरचित कविता ‘धनुष की प्रत्यंचा’ शीर्षक से है। इसमें कवि ने एक सुयोग्य शिक्षक द्वारा आज के अंधकार में डूबे छात्र को ज्ञान की ज्योति जलाकर चरित्र-निर्माण करने के लिए किस प्रकार प्रेरित किया गया है, यह चित्रित करने का प्रयास किया है। इस विषय में कवि का यह कहना है कि

व्याख्या-शिक्षक अपने छात्र को प्रेरित करते हुए कह रहा है-तुम इस तरह क्यों मुरझाए और निराश होकर खड़े हुए दिखाई दे रहे हो। तुम्हारा चेहरा उदास और मलिन होकर दिखाई दे रहा है, तुम्हें देखने से ऐसा लगता है कि तुम अंधकार में काफी भटकने के बाद पूरी तरह से डूब चुके हो। फलस्वरूप तुम्हें कहीं से कोई सहारा और आशा की एक किरण नहीं दिखाई दे रही है, लेकिन ऐसी बात नहीं है। अब मैं तुम्हारे लिए पुल बनकर तुम्हारे सामने आया हूँ। अब तुम किसी प्रकार से डरो नहीं और उदास-निराश भी न होवो! इस पुल पर आकर तुम अब खड़े हो जाओ। इससे तुम किसी प्रकार के भय और रुकावट के इस अंधकार से उस पार उतर जाओगे, जहाँ से तुम्हें प्रकाश के किरण द्वार को सबके लिए खोल देना है।

विशेष-

  1. भाषा सरल और सपाट है।
  2. कथन में ओज और प्रभाव है।
  3. ‘कंठ-कंठ’ में पुररुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. मुक्तक छंद है।
  5. यह अंश प्रेरणादायक रूप में है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना विशिष्ट भावों को व्यक्त करने वाले शब्दों से युक्त है। मुक्तक छंद की स्वच्छन्दता को उपदेशात्मक शैली के द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास है। इसे आकर्षक बनाने के लिए लक्षणा शब्द-शक्ति और पुररुक्ति प्रकाश एवं रूपक अलंकार के मिले-जुले प्रयोग सटीक और उपयुक्त रूप में हैं। वीर रस के प्रवाह से प्रतीकात्मक योजना सुन्दर बन गयी है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना सहज और बोधगम्य है। भावों की प्रस्तुति स्वाभाविक है। आत्मीयता, संवेदनशीलता और उदारता जैसी भावगत विशेषताओं को एक साथ लाकर उन्हें हृदय-स्पर्शी बनाने का प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। कथन की यथार्थता को विश्वसनीयता के द्वारा सामने लाने की युक्ति बड़ी ही उपयुक्त सिद्ध हुई है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उदास खड़े होने से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में किस ओर संकेत है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) उदास खड़े रहने से कवि का अभिप्राय है-हर प्रकार की आशा-विश्वास को तिलांजलि देना। दूसरे शब्दों में हार जाना-थक जाना।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में आज के शिक्षक और छात्र की ओर संकेत है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव यह है कि आज का छात्र अज्ञानग्रस्त है। उसे कोई योग्य शिक्षक ही अपेक्षित ज्ञान के द्वारा सुयोग्य बना सकता है।

2. और लो, बढ़ाओ हाथ
तुम्हें देता हूँ कुंजी जिसे
पूंजी समझ मैंने सहेजा है!
मेरी कठोरता पर
कभी-कभी तुम गुसियाते हो,
मन-ही-मन कुछ कह-सुन जाते हो
लेकिन मैं कठोर हूँ
यह मेरी एक विवशता है
मेरी कठोरता
सीपी की कठोरता है
जो कुछ भी सहना है
मुझको ही सहना है
तुम्हें तो बस मोती सा पलना है।

शब्दार्थ-सहेजा-सँभाला। गुसियाते-गुस्सा करते अर्थात् क्रोध करते। विवशता-मजबूरी। पलना-बढ़ना। बस-केवल ।

प्रसंग-पूर्ववत् ! इसमें कवि ने शिक्षक द्वारा अपने असहाय छात्र को साहस देने का उल्लेख किया है। शिक्षक अपने छात्र को उत्साहित करते हुए कह रहा है

व्याख्या-तुम मेरी ओर आओ! मैं तुम्हें अज्ञानमय अंधकार से बाहर निकालने के लिए तुम्हारे पास खड़ा हूँ। अब तुम अपने हाथ मेरी ओर बढ़ाओ। मैंने बहुत समय से अपने अनुभव की जो पूंजी सँभालकर रखी है, उसे तुम्हें अंधकार के बंद कमरे से बाहर निकल आने के लिए कुंजी के रूप में दे रहा हूँ। उसे लेकर अब बंद अंधेरे कमरे को खोलकर बाहर आ जाओ। मैंने तुम्हें पहले कई कठोरतामयी हिदायतें दी थीं, उनका तुमने अमल करने के बजाय मुझ पर गुस्सा ही किया। यही नहीं तुमने मन-ही-मन मेरा विरोध किया। उसके लिए कुछ भुनभुनाया और बुदबुदाया भी। फिर भी मैं तुम्हें अपनी कठोर हिदायतें देता रहा। यह इसलिए कि यह मेरी आदत है। यह भी कि मेरी लाचारी है। मेरी कठोर हिदायतें क्या हैं? इस पर तनिक विचार करोगे तो यह जरूर समझ जाओगे कि मेरी कठोर हिदायतें सीपी की तरह कठोर हैं, जिसके अंदर मोती पलती-बढ़ती रहती है। इस प्रकार मैं सीपी की कठोरता को सहना और उसे बरकरार रखना मेरी लाचारी है। मेरी तो यही कोशिश रही है कि तुम मेरी कठोरता की सीपी के अंदर मोती की तरह पलते-बढ़ते रहो।

विशेष-

  1. योग्य अध्यापक के उच्च और उदार दृष्टिकोण का उल्लेख है।
  2. सत्यता में कठोरता होती है, जो पूरी तरह से कल्याणकारी सिद्ध होती है, इसे बतलाने का प्रयास किया गया है।
  3. कभी-कभी में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तो ‘मोती-सा’ में उपमा अलंकार है।
  4. शैली उपदेशात्मक है।
  5. मुक्तक छंद है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश मुक्तक छन्द में पिरोकर वीर रस में प्रवाहित है, जिसे पुनरुक्ति प्रकाश (कभी-कभी) और उपमा अलंकार (मोती-पलना है) से प्रभा मंडित किया गया है। ‘विवशता-कठोरता, गुसियाते हो-सुन जाते हो और सहना है-पलना है शब्दों की तुकान्लता बड़ा आकर्षक और लयात्मक है। इससे इस पद्यांश की प्रभावमयता और निरख रही है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा बड़ी स्पष्ट और निश्छल है। उनमें बिना लागलपेट की सच्ची विशेषता है, तो अपनापन और उदारता की सरसता भी है। कल्याण को प्रदान करने वाली कठोरता की स्पष्टोक्ति को सहजतापूर्वक अपनाने के लिए सीपी के अंदर पलने वाली मोती की तरह बतलाने की शैली मन को छू लेती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुंजी से तात्पर्य क्या है?
(ii) कठोरता को विवशता क्यों कहा गया है?
(iii) ‘मुझको ही सहना है’ का क्या भाव है?
उत्तर
(i) कुंजी से तात्पर्य है लम्बा अनुभव। ऐसे अनुभव जो किसी प्रकार के संकट से मुक्ति दिला सके।
(ii) कठोरता को विवशता कहा गया है। यह इसलिए कि कल्याणकारी स्वरूप कठोरता से होने वाले कल्याण के लिए कठोरता को नहीं त्यागते हैं। उसके लिए वे विवश हो जाते हैं।
(iii) ‘मुझको ही सहना है’ का भाव है-उदारशील व्यक्ति सभी प्रकार के कष्टों-बाधाओं को सहकर परोपकार करते चलते हैं। दूसरों के कष्टों-अभावों को सहना वे अपनी मजबूरी मान लेते हैं।

3. मैं जानता हूँ, अनुमानता हूँ
मेरी उक्तियाँ झिडकियाँ
तनी-तनी भृकुटियाँ
कभी-कभी तुम्हें शूल-सी लगी हैं।
मुझे शूल तो
बनना ही था,
क्योंकि मेरी रक्षा-परिधि में
तुम्हें फूल बन
खिलना ही था।

शब्दार्थ-उक्तियाँ-कहावतें। अनुमानता-अनुमान करता हूँ। झिड़कियाँ-फटकार। भृकुटियाँ-आँखें दिखाना, क्रोध करना।शूल-काँटा, भाला। रक्षा परिधि-रक्षा की सीमा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक योगय शिक्षक के अपने छात्र के प्रति आत्मकथन की स्पष्टता का उल्लेख किया है। शिक्षक का अपने छात्र के प्रति स्पष्ट रूप से कहना है

व्याख्या-मैं यह भलीभाँति जानता हूँ। यही नहीं, मैं यह अनुमान भी करता हूँ कि मैं जब कभी तुम्हें फटकारता और डाँटता हूँ। इसी प्रकार मैं जब कभी तुम्हें अपनी आँखें दिखाता हूँ तो तुम्हें उनसे बड़ी पीड़ा होती है। वे तुम्हें कभी-कभी शूल की तरह चुभो गयी होंगी, तो इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन यह सब कुछ मैंने मजबूरी में किया है। मुझे तुम्हारे लिए शूल बनना भी मेरी एक ऐसी ही मजबूरी थी। यह मेरी रक्षा-परिधि थी। इसी में तुम्हें एक आकर्षित और सुगन्धित फूल खिलाना था।

विशेष-

  1. भाषा में ओज और प्रवाह है।
  2. तुकांत शब्दावली है।
  3. शैली उपेदशात्मक है।
  4. वीर रस का संचार है।
  5. ‘तनी-तनी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’
(ii) उपर्युक्त पद्यांश वीर रस से प्रवाहित और मुक्तक छंद से परिपुष्ट है। इसे तुकान्त शब्दावली की लयात्मकता और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (कभी-कभी) व उपमा अलंकार (शूल-सी लगी है) से चमत्कृत किया गया है। प्रतीकात्मक शैली के प्रयोग के यह पद्यांश रोचक बन गया है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना स्पष्ट कथन पर आधारित है। उमसें सहजता, स्वाभाविकता और स्पष्टता की बहती हुई त्रिवेणी से अभिप्राय है ऊँचे तरंगे उठ रही हैं। इस प्रकार इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य मन को बार-बार छू रहा है, जो कवि की अद्भुत सफलता को प्रकट कर उसकी सार्थकता को सिद्ध कर रहा है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) झिड़कियाँ और फिर तनी-तनी भृकुटियाँ के प्रयोग की क्या विशेषता है?
(ii) ‘रक्षा-परिधि’ से क्या तात्पर्य है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) झिड़कियाँ और फिर तनी-तनी भृकुटियाँ के प्रयोग की बड़ी विशेषता है। झिड़कियाँ अर्थात् फटकार का जब-जब कोई खास असर न होने पर तनी-तनी भृकुटियों के द्वारा असर डालने का विशेष प्रयास किया जाता है।
(ii) ‘रक्षा-परिधि’ से तात्पर्य है-कल्याणकारी योजना या सोच-विचार।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-कल्याणार्थ कठोरता मूलतः फलदायिनी होती है।

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4. जब-जब तुम
मौलिकता की साँस हिय में भरकर
उठाकर शीश आते,
किन्तु छंद के नये अर्थ बतलाते
तब-तब मैं खुशी से
गोल हो जाता
अपने में बड़ा
अनमोल हो जाता।

शब्दार्थ-हिय-हृदय। शीश-सिर। गोल-गद्गद् । अनमोल-अमूल्य।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि एक महान अध्यापक के अपने छात्र के प्रति व्यक्त किए भावों का उल्लेख किया है। अध्यापक अपने छात्र का हौसला बुलंद करते हुए कह रहा है

व्याख्या-मैं जब कभी तुम्हारी मौलिकता को देखता हूँ, तो प्रसन्न हो उठता हूँ। उस समय मुझे और अधिक प्रसन्नता होती थी, जब तुम अपने मौलिक विचार को हृदय से तौलकर मेरे सामने स्वाभिमानपूर्वक सिर उठाकर रखते थे। उससे भी मुझे बढ़कर प्रसन्नता तब होती थी, जब तुम छंदमय अपने भावों को मेरे सामने रखकर उसके अभिप्राय को स्पष्ट करते थे। उस समय की मेरी खुशी सभी खुशियों से ऊपर होती थी। इस प्रकार मैं बाग-बाग होकर अपने आप में बड़प्पन और अनमोल होने का अनुभव करने लगता था।

विशेष-

  1. भाषा सुस्पष्ट है।
  2. शैली प्रतीकात्मक है।
  3. मुक्तक छंद है।
  4. ‘जब-जब’ और ‘तब-तब’ मैं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. यह अंश उत्साहवर्द्धक है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा-सरल और सहज शब्दों की है। शैली-विधान लाक्षणिक है। लक्षणा शब्द-शक्ति से भावों के अर्थ को खोलने का प्रयास किया गया है। अलंकार-योजना की सटीकता और उपयुक्तता से यह आकर्षक बन गया है। मुक्तक छंद को वीर रस से गतिशील बनाने की सफलता सहज रूप में मान्य है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य तेज और ओज रूप में है। मौलिकता की नवीनता और अनूठापन इसकी एक खास विशेषता दिखाई दे रही है। चूँकि भाव असाधारण और प्रभावशाली हैं, इसलिए वे अपनी इस रोचकता में सुन्दरता की झलक स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत कर रहे हैं।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(क) ‘मौलिकता की साँस हिय में भरकर’ से क्या अभिप्राय है?
(ख) ‘उठाकर शीश आते’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘खुशी से गोल हो जाता’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(क) ‘मौलिकता की साँस हिय में भरकर’ से अभिप्राय है–उन्मुक्त भावों के साथ प्रस्तुत होना।
(ख) ‘उठाकर शीश आते’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है-स्वाभिमानपूर्वक
अपने आपको प्रस्तुत करने का साहस करना।
(ग) ‘खुशी से गोल हो जाता’ का अर्थ है-फूले न समाना। दूसरे शब्दों में दूसरों की उन्नति देखकर अपने-आपको भूल जाना।

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5. मैं नींव बन नीचे रहूँगा
लेकिन तुम सीढ़ियाँ चढ़ना
हर दिवस बढ़ना हर रात बढ़ना आसमान छूना।
तुम रुकोगे तो नींव में गड़ी-गड़ी
मेरी अस्थियों में दर्द होगा।

शब्दार्थ-नींव-बुनियाद। दिवस-दिन। अस्थियाँ-हड्डियाँ। दर्द-कष्ट, पीड़ा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने महान अध्यापक की उदारता-त्यागशीलता को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। महान् अध्यापक अपने छात्र को उन्नति के शिखर पर चढ़ाने के लिए उत्साहित करते हुए कह रहा है

व्याख्या-मैं तुम्हारी हरेक प्रकार की उन्नति के लिए बुनियाद बनने के लिए तैयार हूँ। मेरी इस बुनियाद पर तुम अपनी उन्नति की एक-से-एक बढ़कर सीढ़ियों पर लगातार चढ़ते जाना। इससे मुझे अपार प्रसन्नता और सुख की अनुभूति होगी। इसके लिए मेरी यही तुमसे हार्दिक इच्छा व्यक्त कर रहा हूँ कि तुम हरेक दिन और रात बिना किसी रोक-टोक के उन्नति के शिखर पर चढ़कर आसमान को छूते चलो। किसी भी अवस्था में न रुको और न पीछे हटो। अगर तुम किसी प्रकार से रुक जाओगे या पीछे हटने लगोगे तो मुझे भारी दुख होगा। मेरी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। फलस्वरूप उस बुनियाद में पड़ी और गड़ी हुईं मेरी हड्डियाँ में बहुत बड़ी पीड़ा होने लगेगी। शायद ऐसी पीड़ा होगी, जिससे वे छटपटाने लगेंगी।

विशेष-

  1. मुक्तक छन्द है।
  2. ‘आसमान छूना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।
  3. ‘गड़ी-गड़ी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. भावात्मक शैली है।
  5. वीर रस और करुण रस का मिश्रित प्रवाह है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।

(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य सरस और आत्मीय भावों पर आधारित है। ‘नींव बनना, आसमान छूना’ जैसे मुहावरों और तत्सम तद्भव शब्द के मेलजोल क्रो-पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से चमत्कृत-मंडित किया गया है। प्रतीकात्मक शैली और मुक्तक छंद के प्रयोग से यह पद्यांश और रोचक हो गया है। . (iii) उपर्युक्त पद्यांश में अध्यापक की उदारता, सहनशीलता, आत्मीयता, सरसता और त्यागशीलता जैसे अत्युच्च भावों की प्रस्तुति अपने आप में अनूठी हे। छात्र को उन्नति के शिखर पर चढ़ते जाते हुए देखने की तमन्ना और उसके रुक जाने से दुखी होने की भावना एक सुयोग्य अध्यापक में ही संभव है। इसे दर्शाने में कवि का प्रयास सचमुच में सराहनीय है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘नींव बनने से क्या अभिप्राय है?
(ii) ‘नींच में गडी-गड़ी अस्थियों’ का मुख्यार्थ बताइए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) ‘नींव बनने’ से अभिप्राय है-परोपकारार्थ त्याग-समर्पण कर देना।
(ii) ‘नींव में गड़ी-गड़ी अस्थियों’ का मुख्यार्थ-परोपकारार्थ अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने का एकमात्र जीवन लक्ष्य प्रस्तुत करना।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-आधुनिक स्वार्थवाद के घोर अंधकार से बाहर निकालकर एक सुयोग्य अध्यापक का अपने छात्र के भविष्य को चमकाने की प्रेरणा देना।

6. तुम खिलो, महको
गंधदान का यज्ञ रचाओ इसीलिए,
तुम्हारी स्वच्छंदता को छंदा था मैंने।
तुम मरुस्थल थे।
मैं तुम्हारे हित बरसा बन सावन
आज तुम कितने भावन!

शब्दार्थ-खिलो-फूल जाओ, विकसित हो जाओ। महको-सुगंध फैलाओ। गंधदान-सुगंध को प्रदान करना। छंदा था-छंदबद्ध किया था। हित के लिए (भलाई के लिए)। भावन-मन को भाने (अच्छे लगने) वाले।

प्रसंग-पूर्ववत्। इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने छात्र को परोपकारी होने का सदुपदेश देने का उल्लेख किया है। अध्यापक का अपने छात्र को परोपकार करने की सीख देते हुए यह कहना है

व्याख्या-तुम अपने जीवन-पथ पर लगातार बढ़ते अपने सद्गुणों को बिखेरते चलो। उनसे लोगों को आकर्षित और मोहित करते हुए आगे बढ़ते चलो। संभव हो
सके तो अपने उज्ज्वल गुणों से लोगों को यथाशक्ति सुख-सुविधाएँ पहुँचाते चलो। . तुम्हारे प्रति इस प्रकार आशावान होकर मैंने तुम्हारे स्वतंत्र विकास के लिए अनेक भावों को संजोया था। मैंने इसीलिए तुम्हारी जिज्ञासारूपी मरुस्थल के लिए अपने . सद्भावों और सशिक्षाओं रूपी सावन की बरसात की थी। उससे तुम कितने खिल उठे हो, यह मैं अनुभव कर रहा हूँ।

विशेष-

  1. अध्यापक की सद्भावना का छात्र पर पड़े हुए प्रभावों का उल्लेख है।
  2. शैली उपदेशमयी है।
  3. ‘तुम मरुस्थल थे’ में रूप अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।
  5. मुक्तक छन्द है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।

(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप सरल किन्तु प्रेरक भाषा-शैली से तैयार है उपदेशात्मक शैली और वीर रस से संचारित मुक्तक छंद की धारा भावों को तेजी से बढ़ा रही है। बिम्ब और प्रतीक अभिधा शक्ति के द्वारा प्रस्तुत रूपक अलंकार के चमत्कार से इस पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य चमक उठा है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य बड़ा ही सहज, सरल और सपाट है। भावों में जहाँ आत्मीयता है, वहीं उनसे रोचकता और सरसता भी है। कुल मिलाकर उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य मनमोहक और हृदयस्पर्शी है।।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘गंधदान का यज्ञ कराओ’ कहने का क्या तात्पर्य है?
(ii) ‘तुम मरुस्थल थे
मैं तुम्हारे हित बरसा बन सावन।’
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
(iii) ‘आज तुम कितने भावन’ का भावार्थ लिखिए।
उत्तर
(i) “गंधदान का यज्ञ कराओ’ कहने का तात्पर्य है-अपने दिव्य और उच्च गुणों के द्वारा परोपकार की सरस धारा निरन्तर प्रवाहित करते रहना।
(ii) ‘तुम मरुस्थल थे,
तुम्हारे हित बरसा
बन सावन।
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव यह है कि दीन-दुखी हृदय को सही रूप में पहचान कर उनके दुखों और अभावों को अपनी शक्ति सम्पन्नता से दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए। उनकी संतुष्टि से सुख-आनंद का वातावरण तैयार होता है।
(iii) ‘आज तुम कितने भावन’ का भावार्थ है-दुःखी और संतप्त हृदय में जब सुख-आनंद का प्रवाह होने लगता है, तब एक अपूर्व सौन्दर्य का वातावरण फैलकर मन को मोह लेता है।

7. यह दुनिया एक अंधा कुआँ है
लो, मैं रज्जु बन लटका हूँ
निश्चित होकर तुम अपने-अपने
पात्र भर लो अपनी फुल-बगिया का
सिंचन कर लो।

शब्दार्थ-रज्जू-रस्सी। पात्र-बर्तन, घड़ा। बगिया-बाग। सिंचन-सिंचाई।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने अज्ञानी और भटके हुए छात्र के प्रति कथन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है
व्याख्या-यह सारा संसार एक अंधकारमय कुआँ है। उसमें तुम पड़े हुए छटपटा रहे हो। अब तुम्हें इसमें और पड़े रहकर छटपटाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा इससे बाहर निकलने का समय आ गया है। इसके लिए रस्सी के समान इसमें लटक रहा हूँ। अब तुम बिल्कुल ही निडर हो जाओ। फिर अपनी आवश्यकतानुसार इसमें से अपने घड़े में पानी भर लो। इस तरह अब तुम अपनी स्वतंत्रता रूपी फूलों के बाग की सिंचाई करके अपने जीवन को धन्य कर लो।

विशेष-

  1. भाषा सरल और सुबोध है।
  2. दुनिया को एक अंध कुआँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए इसमें रूपक अलंकार है।
  3. तुकान्त शब्दावली है।
  4. लय और संगीत की ध्वनि आकर्षक रूप में है।
  5. मुक्तक छंद है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ ।
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप आकर्षक और मोहक है। दुनिया को अंधा कुआँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है फिर उससे ज्ञान की रस्सी से अपेक्षित जल प्राप्त करके अपने मन रूपी बागों में इच्छामयी फूलों को खिलाने की रूपक-योजना निश्चय ही ऊँची है और सराहनीय भी है।।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-विधान अद्भुत और प्रेरक रूप में है। तुकान्त शब्दावली असंस्कृत भावयोजना से यह पद्यांश सुन्दर और भाववर्द्धक बन गया है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘अंध कुआँ’ से क्या तात्पर्य है?
(ii) ‘रज्जु बनना’ किसका प्रतीक है?
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) ‘अंध कुआँ’ से तात्पर्य है-‘गहरा और अत्यधिक स्वार्थ’।
(ii) ‘रज्जु बनना’ सहायक होने का प्रतीक है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-योग्य और समर्थ व्यक्ति ही मुसीबतों से निकालकर सुखमय जीवन प्रदान करता है।

8.मेरी आत्मा के अंशज हो तुम,
मेरी आत्मा के वंशज हो तुम,
मेरी अर्जन हो तुम,
मेरी कविता हो तुम
मेरा सर्जन हो तुम,
रक्षा, कवच की भांति,
मेरा आशीष तुम्हारे साथ।
जाओ, जाकर आँधी से टकराओ,
तूफानों से खेलो,
सबको अपनी छाती पर झेलो
जिनकी पसलियों में
मैं वज्र बनकर मिल गया हूँ,
अधरों पर तुम्हारे
फूल बनकर खिल गया हूँ।

शब्दार्थ-अंशज-अंश से उत्पन्न। वंशज-वंश से जन्म लेने वाले । अर्जन-प्राप्ति । सर्जन-निर्माण। आशीष-आशीर्वाद। अधरों-ओठों।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान अध्यापक के द्वारा अपने छात्र का हौसला बढ़ाने के लिए उसे सब कुछ अपना मानने का उल्लेख किया। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मेरी आत्मा के अंश से ही तुम उत्पन्न हो और मेरे ही वंश में जन्म लेने वाले हो; अर्थात् तुममें मेरे गुण-संस्कार वर्तमान हैं। उन्हें केवल तुम्हें प्रकट कर देना है। इस प्रकार तुम मेरे अर्जन हो, सर्जन हो। यही तुम मेरी कविता हो और इस प्रकार के मौलिक व्यक्तित्व के निर्माण स्वरूप हो। यही कारण है कि मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ एक रक्षा-कवच की तरह मौजूद है। इसलिए अब मैं तुम्हें यही आदेश दे रहा हूँ कि तुम इन सब बातों को अपने हृदय की गहराइयों में उतार लो। फिर अपने सामने वाली हर एक प्रकार की कठिनाइयों रूपी आँधियों से टकरा जाओ। उन्हें तुम समाप्त कर दो। सामने वाले एक-से-एक जानलेवा संकट रूपी तूफानों को तुम खेल-ही-खेल मसल डालो। इस प्रकार तुम उन सबको अपनी अपार शक्ति से झेलते हुए आगे बढ़ते जाओ, जिनकी पसलियों में बज्र बनकर समा गया हूँ। इस प्रकार तुम्हारे अंदर शक्ति का संचार करके मैं तुम्हारे ओठों पर फूल की तरह सुन्दरता बिखेर रहा हूँ।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली असाधारण है।
  2. लक्षणा शब्द-शक्ति है।
  3. ‘मेरी’ और ‘तुम’ शब्दों की पुनरावृत्ति होने से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।
  5. लय-संगीत की सुन्दर योजना है।
  6. प्रतीकात्मक और उपदेशात्मक शैली है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से अलंकृत-मंडित है। वीर रस के संचार और मुक्तक छंद के द्वारा उसे मुक्त रूप से प्रस्तुत करने का कवि-प्रयास आकर्षक है। भाषा की शब्दावली को तुकान्त रूप देकर लक्षणा शब्द-शक्ति से मजबूत और प्रभावशाली बनाने की शैली भी मन को अपनी ओर खींच लेती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सहज रूप में प्रवाहित होकर विशेष अर्थ को प्रकट कर रही है। सम्पूर्ण पद्यांश आत्मीय भावों पर आधारित होकर कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरक स्वरूप बन गया है। ‘जाओ, जाकर आँधी से टकराओ, तूफानों से खेलो’ और सबको अपनी छाती पर झेलो जैसें भाव साधारण रूप में होकर असाधारण अर्थ को व्यक्त कर रहे हैं।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
(ii) ‘मेरा-मेरी’ के साथ ‘तुम’ की पुनरावृत्ति से कौन-से भाव व्यक्त हो रहे हैं?
(iii) ‘फूल बनकर खिल गया हूँ’ का तात्पर्य क्या है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-आत्मीय भावों के द्वारा सोए हुए पुरुषार्थ को जगाना।
(ii) ‘मेरा-मेरी’ के साथ ‘तुम’ की पुनरावृत्ति से आत्मीय भाव व्यक्त हो रहे हैं।
(iii) ‘फूल बनकर खिल गया हूँ’ का तात्पर्य है-अत्यधिक प्रसन्नता से झूम उठना ।

9. मैं धनुष की प्रत्यंचा हूँ
अपनी पूरी शक्ति से खींचो,
रखना विश्वास नहीं टूटूंगा,
नहीं टूटूंगा चलाओ ज्ञान के तुम तीर
अज्ञान की मीन को बेध डालो
सफलता की द्रोपदी का स्वयंवर रचेगा।

शब्दार्थ-धनुष-धनुष की डोरी। मीन-मछली।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक सुयोग्य अध्यापक का अपने छात्र के प्रति आत्मीयतापूर्ण कथन को प्रस्तुत किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मैं तुम्हारे लिए धनुष की प्रत्यंचा हूँ। अर्थात तुम मेरा आधार (सहयोग) लेकर अपने कर्मक्षेत्र में आगे बढ़ो। अपनी पूरी शक्ति से बढ़ो। इसके लिए तुम मेरी प्रत्यंचा (मेरा सहयोग) जितना चाहो, प्राप्त कर सकते हो। ऐसा करते समय तुम पूरी तरह से इस बात के लिए विश्वस्त रहना कि यह मेरी प्रत्यंचा (अर्थात् मेरी सहयोग शक्ति नहीं टूटेगी। इस पर तुम निश्चिंत होकर अपने ज्ञान-शक्ति की तीर चलाते चलो। इससे अज्ञानमयी मछली का बेधन कर अर्जुन की तरह सफलतापूर्वक द्रोपदी को स्वयंवर में वरण कर लोगे।

विशेष-

  1. भाषा में ओज, प्रभाव और आकर्षण है।
  2. शैली उपदेशात्मक है।
  3. प्रतीक शब्दावली है।
  4. मुक्तक छंद है।
  5. पौराणिक कथा को प्रेरक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना में रूपक अलंकार की प्रधानता है। पौराणिक कथा-प्रसंग को सजीवता प्रदान करने के लिए कवि ने लक्षणा शब्द-शक्ति के बल-प्रयोग से कथन को आकर्षक बना दिया है। वीर रस की तीव्रता से भाव-अभिप्राय तुरन्त स्पष्ट हो रहे हैं। इस प्रकार यह पद्यांश अपने काव्य-सौन्दर्य से हृदय को छू लेता है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान प्रतीकात्मक है। महाभारत पुराण की घटना पर आधारित प्रस्तुत कथन स्वाभाविक रूप से आकर्षक है। इससे प्रस्तुत हुई भावधारा और अधिक तेज हो गयी है। इस कथन का प्रभाव इस दृष्टि से और अधिक बड़ा हो गया है कि इसमें कल्पना की उड़ान नहीं है, यथार्थ का ही सपाट धरातल है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का प्रतिपाद्य लिखिए।
(ii) ‘धनुष की प्रत्यंचा’ रूपक को स्पष्ट कीजिए।
(iii) द्रोपदी के स्वयंवर के प्रतीक को लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा सहयोग प्रदान करने की निरंतरता और उसके प्रति महत्त्वाकांक्षा का उद्घाटन किया गया है। प्रेरणा जगाने के मूल भाव के द्वारा इसे प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘धनुष की प्रत्यंचा’ रूपकार्थ प्रस्तुत है, जिसका मूल और सांकेतिक दोनों ही अर्थ है-पूर्ण रूप से सहयोग प्रदान करना। धनुष की प्रत्यंचा से बाण को छोड़कर लक्ष्य साधने का प्रयास सफलता को प्रदान करता है। सहयोग से भी लक्ष्य की प्राप्ति आसान हो जाती है।
(iii) द्रोपदी का स्वयंवर प्रतियोगिता और सर्वाधिक एवं सर्बोच्च पुरुषार्थ प्रदर्शित करने का प्रतीक है।

10. तुम्हें खुश देख लेता हूँ
मेरा मन झूम उठता है।
तुम्हें गमगीन जब देखू
मेरा मन सूख जाता है।

शब्दार्थ-गमगीन-उदास। सूख जाता है-दुखी हो जाता है।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक उदार और सुयोग्य अध्यापक के अपने छात्र के प्रति व्यक्त की गई अत्यधिक आत्मीयता का उल्लेख किया है। इस विषय में अध्यापक का कहना है

व्याख्या-मेरी भावना तुमसे अटूट रूप से जुड़ी हुई है। इसलिए मैं तुम्हारे हर सुख-दुख में हरदम जुड़ा हुआ हूँ। यही कारण है कि जब मैं तुम्हें सुखी और आनंदित देखता हूँ, तब मैं गद्गद् हो उठता हूँ। इसके विपरीत जब मैं तुम्हें उदास और चिन्तित देखता हूँ, तब मैं दुखी होने लगता हूँ। कहने का भाव यह कि तुम खुश हो तो मैं खुश हूँ और तुम दुखी तो मैं भी दुखी।

विशेष-

  1. सम्पूर्ण कथन सुस्पष्ट है।
  2. शैली आत्मीय है।
  3. उर्द शब्दों की प्रधानता है।
  4. ‘मेरा मन’ में अनुप्रास अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’ ।
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’ ।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य-विधान बिल्कुल सरल और सामान्य है। उर्दू शब्दों के द्वारा अनुप्रास अलंकार के चमत्कार को तुकान्त शब्द-योजना से प्रभावशाली बनाने का प्रयास उल्लेखनीय है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भावधारा सरल तो है, लेकिन सपाट है। बिना किसी लाग-लपेट के कथन को प्रस्तुत करने का ढंग अनोखा है। इससे कथ्य का तथ्य बड़ी आसानी से स्पष्ट हो रहा है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव लिखिए।
(ii) ‘झूम उठना’ और ‘सूख जाना’ किस प्रकार के शब्द-प्रयोग हैं? स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में आत्मीयता पूर्ण भावों का उल्लेख हुआ है, जो परस्पर कटुता और दूरी को समाप्त कर निकटता और अभेद को उत्पन्न करने के लिए अपेक्षित हैं।
(ii) ‘झूम उठना’ और ‘सूख जाना’ परस्पर विपरीतार्थ शब्द-प्रयोग हैं। खुशी के साथ गम के प्रतीक ये शब्द हमारे जीवन की सच्चाई को व्यक्त करते हैं।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश से हमें परस्पर मेल-मिलाप की शिक्षा मिलती है। परस्पर सहयोग और सहानुभूति रखना ही जीवन की महानता है, यह भी शिक्षा मिलती है।

11. मैं साधना हूँ
तुम सिद्धि बन जाना,
मैं नयन हूँ
तुम दृष्टि बन जाना,
विजय का स्तम्भ हूँ मैं
तुम विजय का केतु बन जाना,
हथेली पर तुम विजय कर
‘आज’ रख लेना,
मानस पिता हूँ मेरी
लाज रख लेना।
मेरी लाज रख लेना।

शब्दार्थ-साधना-तपस्या। सिद्धि-फल । नयन-आँख । स्तंभ-खंभा। केतु-पताका, झंडा। मानस-मन से उत्पन्न।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने एक महान, सुयोग्य और उदार शिक्षक का अपने छात्र के प्रति दी गई प्रेरणादायक बातों का उल्लेख किया है। अध्यापक का अपने छात्र से कहना है

व्याख्या-तुम सदैव अपने प्रगति-पथ पर बढ़ते चलो, मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहूँगा। इसके लिए मैं साधना बनकर तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम सफलता बनकर आगे बढ़ते जाना। इसी प्रकार मैं तुम्हारे आँख बनकर रहूँगा, तो तुम ज्योति रूप में बढ़ते चले जाना। इसी प्रकार में तुम्हारे विजय के स्तंभ के रूप में मौजूद रहँगा, तो तुम विजय की पताका बनकर फहराते चलते चले जाना। तुम्हें आज इन बातों को बड़ी गंभीरतापूर्वक अमल करना नहीं भूलना है यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुम्हारा मानस पिता हूँ। इसे समझकर तुम आज मेरी इन बातों को हृदय से स्वीकार करके मेरी महिमा को बनाए रखना। तुमसे मेरी यही उम्मीद भी है कि तुम मेरा महत्त्व घटाओगे नहीं अपितु बढ़ाते ही जाओगे।

विशेष-

  1. मुक्तक छंद है।
  2. वीर रस का प्रवाह है।
  3. ‘विजय की स्तंभ होना’ और ‘लाज रख लेना’ मुहावरों के साथ प्रयोग है।
  4. शैली आत्मीय और भावपूर्ण है।
  5. भाषा के शब्द अत्यन्त सरल हैं।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-डॉ. देवेन्द्र ‘दीपक’
कविता-‘धनुष की प्रत्यंचा’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना सरल और नपे-तुले शब्दों पर आधारित है। परस्पर अर्थों की समानता की शब्द-योजना से भावों की स्पष्टता दिखाई दे रही है। मुक्तक छन्द के इस प्रवाह में लय-संगीत की मधुरता बहुत मोहक है। बिम्बों-प्रतीकों की प्रस्तुति प्रशंसनीय है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान सहज और अपेक्षित रूप में है। पथ-प्रदर्शक की प्रेरणा और उसकी अपेक्षाएँ मर्यादित और सीमाबद्ध हैं। इसके माध्यम से उपदेशात्मक लक्ष्य को रखने का कवि-प्रयास निश्चय ही काबिलेतारीफ है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त. पद्यांश का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में किन भावों को महत्त्व दिया गया है और क्यों?
(iii) ‘लाज रखने का मुख्यार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश के द्वारा अध्यापक की सद्भावनाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया है। इसे अत्यधिक उपयोगी और अपेक्षित रूप में भी लाने का एक प्रयास प्रस्तुत हुआ है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में आत्मीयतापूर्ण भावों को महत्त्व दिया गया है। यह इसलिए यह आज समाज में नहीं है। इसके बिना समाज का रूप बिगड़ रहा है। इसलिए उसकी आज सख्त जरूरत है।
(iii) ‘लाज रखने’ का मुख्यार्थ मर्यादा-महत्त्व को बचा लेना। आज अध्यापक की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। उसे उसका अपना ही कोई छात्र बचा सकता है।

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MP Board Class 9th Special Hindi प्रायोजना कार्य

MP Board Class 9th Special Hindi प्रायोजना कार्य (योग्यता विस्तार)

प्रश्न 1.
अपने प्रदेश की किन्हीं दो बोलियों के नाम लिखिए।
उत्तर-
निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी।

प्रश्न 2.
बघेली भाषा की कोई एक पहेली लिखिए।
उत्तर-
“दिन के भरी रात में चुंछ’। अरगनी (रस्सी) (दिन के समय अरगनी पर वस्त्र (कपड़े) लटका दिये जाते हैं तथा रात्रि बेला में उन्हें ओढ़ने तथा बिछाने के लिए उठा लिया जाता है।)

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प्रश्न 3.
छत्तीसगढ़ी भाषा की कोई एक पहेली लिखिए।
उत्तर-
छोटा-सा काला घर घूमत रहेत इधर-उधर। (छाता) (मेरे पास छोटे आकार वाला, काले वर्ण (रंग) का घर है, जो यत्र-तत्र घूमता रहता है।)

प्रश्न 4.
अपने क्षेत्र के किसी लोकगीत की चार पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर-
बदरिया रानी बरसो बिरन के देस।
कॉनों से आई कारी बदरिया, काँनों बरस गये मेह॥
अग्गम दिसा से आई बदरिया, पश्चिम बरस गये मेह।
बदरिया रानी बरसो बिरन के देस।।

प्रश्न 5.
दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले किन्हीं दो धार्मिक धारावाहिकों के नाम लिखिए।
उत्तर-

  • जय बजरंगबली,
  • महादेव।

प्रश्न 6.
दूरदर्शन पर प्रसारित किन्हीं दो सामाजिक धारावाहिकों के नाम लिखिए।
उत्तर-

  • ये रिश्ता क्या कहलाता है,
  • बालिका वधू।

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प्रश्न 7.
हिन्दी के चार समाचार-पत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर-
अमर उजाला, दैनिक भास्कर, जनसत्ता, नवभारत। प्रश्न 8. लोक कथा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। उत्तर —(1) मनोरंजन का सुलभ साधन। (2) भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की मनोरम झाँकी।

प्रश्न 9.
हिन्दी की चार बाल-पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर-
चम्पक, चन्दा मामा, बाल भारती, पराग।

प्रश्न 10.
रीवा जिले से प्रकाशित किन्हीं दो समाचार-पत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर-

  • जागरण,
  • आलोक।

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 18 डॉ. जगदीशचन्द्र बसु

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 18 डॉ. जगदीशचन्द्र बसु (संकलित)

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु अभ्यास-प्रश्न

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
डॉ. बसु ने अपने माता-पिता से कौन-कौन से गुण ग्रहण किये?
उत्तर
डॉ. बसु ने अपने पिता से साहस, दृढ़-संकल्प तथा सहानुभूति के गुण ग्रहण किये। इसी प्रकार उन्होंने अपनी माता से भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम के गुणों को ग्रहण किया।

प्रश्न 2.
डॉ. बसु सफलता की कुंजी किसे मानते थे और क्यों?
उत्तर
डॉ. बसु सफलता की कुंजी धैर्य, साहस और लगन के साथ काम करने को मानते थे। यह इसलिए कि उनका जीवन विज्ञान ही था। ज्ञान प्राप्त करने की उनमें इतनी तीव्र इच्छा थी कि इसके लिए हर प्रकार के कष्टों का सामना करने के लिए तैयार थे। इस प्रकार वे यह भलीभाँति जानते थे कि धैर्य, साहस और लगन के बिना कोई भी काम सफल नहीं हो सकता है।

प्रश्न 3.
डॉ. बसु ने बनस्पति विज्ञान को जानने के लिए जिन यंत्रों का आविष्कार किया, उनके नाम और प्रयोग लिखिए।
उत्तर
डॉ. बसु ने वनस्पति विज्ञान को जानने के लिए कई यंत्रों के आविष्कार किए। कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकार्ड आदि यंत्रों के आविष्कार करके संसार में अपनी धूम मचा दी। कास्कोग्राफ पौधों की वृद्धि नापने का यंत्र था तो रेजोनेंट रिकार्डर से यह ज्ञात हो जाता था कि चोट लगने पर और मरते समय पौधे भी काँपने लगते हैं।

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प्रश्न 4.
डॉ. बसु को ‘पूर्व का जादूगर’ किसने कहा और क्यों कहा?
उत्तर
डॉ. बसु ने पौधों के कष्ट और उनकी मृत्यु के दृश्य परदे पर दिखाए। उन्होंने जीवित पौधों में विद्युत की एक हल्की-सी लहर दौड़ाई। परदे पर पौधों का काँपना और तड़पना साफ-साफ दिखाई देने लगा। धीरे-धीरे पौधा निर्जीव हो गया। यह देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गए। उनकी आश्चर्यजनक खोजें, आविष्कारों तथा प्रयोगों को देखकर यूरोप के लोग उन्हें ‘पूर्व का जादूगर’ कहने लगे।

प्रश्न 5.
डॉ. बसु के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
डॉ. बसु का व्यक्तित्व मूल रूप से वैज्ञानिक था। विज्ञान ही उनका जीवन था। ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे सभी प्रकार के कष्टों को झेलने के लिए तैयार थे। उन्होंने अपने अपार धैर्य, साहस और लगन से ऐसे-ऐसे आविष्कार किए, जिन्हें देखकर सारा संसार दंग रह गया। यों तो डॉ. बसु महान वैज्ञानिक थे, फिर भी उनमें देश-प्रेम की भावना कम नहीं थी। यही कारण है कि उन्होंने जर्मन वैज्ञानिकों के द्वारा एक पूरा विश्वविद्यालय सौंपने के प्रस्ताव को ठुकाराते हुए कहा था- “मेरा कार्य क्षेत्र भारत ही रहेगा और मैं देश के उसी महाविद्यालय में काम करता रहूँगा, जिसमें मैंने उस समय काम करना शुरू किया था, जब मुझे कोई जानता नहीं था।”

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
देश की गुलामी का हमें क्या मूल्य चुकाना पड़ा? पठित पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने दूसरा जो अनुसंधान किया था, वह अपने आप में नहीं अपितु सारे संसार में पहला था। वह अनुसंधान था-बेतार के तार का। इटली के डॉक्टर मार्कोनी और एक अमरीकन भी इस संबंध में खोज करने में लगे हुए थे। 1895 में जगदीशचन्द्र बसु ने बंगाल के गवर्नर के सामने इसका सफल प्रदर्शन किया। उन्होंने बिना तार के ही दूर पर पड़े बोझ को हिला दिया था और घंटी को बजाकर दिखाया था। लेकिन बेतार के तार के आविष्कार का श्रेय जगदीशचन्द्र बसु को न मिलकर इटली के प्रोफेसर मार्कोनी को मिला। देश की गुलामी का हमें यह मूल्य चुकाना पड़ा। बाद में मार्कोनी ने यही आविष्कार करके इसे अपने नाम रजिस्टर्ड करा लिया।

प्रश्न 2.
डॉ. बसु भारत को ही अपना कार्य क्षेत्र क्यों बनाना चाहते थे? समझाइये।
उत्तर
डॉ. बसु भारत को ही अपना कार्य क्षेत्र बनाना चाहते थे। इसके निम्नलिखित कारण थे

  1. उनमें अपार देश-भक्ति की भावना भरी हुई थी।
  2. वे किसी के पिछलग्गू न होकर पूरी तरह स्वतंत्र विचारधारा के थे।
  3. उनके मन में अपने हरेक नए अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को बढ़ाने की प्रबल इच्छा थी।

प्रश्न 3.
‘बसु विज्ञान-मंदिर’ की स्थापना का क्या उद्देश्य था?
उत्तर
‘बसु विज्ञान-मंदिर’ की स्थापना के निम्नलिखित उद्देश्य थे

  1. डॉ. दसु अपने नए अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को बढ़ाने की प्रबल अभिलाषा तो करते थे। इसके लिए प्रयोगशाला की आवश्यकता था। उनके कॉलेज में अनुसंधानों के लिए उचित प्रबंधन था। इसलिए उन्होंने अपने घर पर ही एक निजी प्रयोगशाला बनाई।
  2. डॉ. बसु सच्चे अर्थों में एक सफल तथ्यान्वेषक थे। उन्होंने देश में विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञान-मंदिर नामक संस्था की स्थापना की।
  3. इस संस्था के द्वारा वैज्ञानिक विद्यार्थियों को शोध संबंधी सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का भी एक महान उद्देश्य था।

प्रश्न 4.
किस घटना से बसु के स्वाभिमानी होने का पता चलता है? उल्लेख कीजिए।
उत्तर
बसु को कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में और अध्यापकों से बहुत कम वेतन दिया गया। उससे उनके स्वाभिमान को बहुत भारी ठेस पहुँची। फलस्वरूप उन्होंने उस कॉलेज के प्रबन्धकों से स्पष्ट रूप से कहा कि या तो मुझे पूरा वेतन दिया जाए या मैंने बिना वेतन के ही काम करूँगा। तीन वर्ष तक वे बिना वेतन के कार्य करते रहे। पैसे की तंगी के कारण उनका जीवन काफी कठिनाई से बीत रहा था, पर वे झुकना नहीं जानते थे। अंत में कॉलेज के अधिकारियों को ही झुकना पड़ा। अंग्रेज अध्यापकों जितना वेतन उन्हें मिलने लगा।

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प्रश्न 5.
डॉ. बसु की वैज्ञानिक उपलब्धि पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर
डॉ. बसु हमारे देश के एक ऐसे महावैज्ञानिक के रूप में लोकप्रसिद्ध हैं, जिन्होंने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करके संसार को चकित कर दिया। उनका सारा जीवन विज्ञान ही था। ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उनमें इतनी तेज थी कि वे इसके लिए हर प्रकार की कठिनाइयों का सामना करने से पीछे नहीं हटते थे। धैर्य, साहस और लगन के साथ काम करना ही उनकी सफलता की कुंजी थी। डॉ. बसु के व्यक्तित्व की एक यह बड़ी विशेषता थी कि वे लकीर के फकीर नहीं थे।

वे स्वतंत्र विचारधारा के थे। उनमें आत्मनिर्भरता परी तरह से थी। अपनी इसी विशेषता के कारण उन्होंने अपने ही घर अपनी एक निजी प्रयोगशाला बनाई। उसका नाम उन्होंने रखा-‘बसु विज्ञान-मंदिर’ । उसका उद्देश्य था-अपने नए अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को तेजी से बढ़ाना। इसके साथ-ही-साथ वैज्ञानिक विद्यार्थियों के लिए शोध-संबंधी सभी आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराना।

इसके पीछे उनका यह भी उद्देश्य था कि भारत का नाम संसार में ऊँचा रहे। यही कारण है कि जब जर्मन वैज्ञानिक उनकी खोजों से प्रभावित होकर उन्हें एक पूरा विश्वविद्यालय सौंपने के लिए तैयार हो गए, तब उन्होंने उसे अस्वीकार अपने देश के उसी महाविद्यालय में काम करते रहने के अपने दृढ़ संकल्प को दोहराया। इससे उनकी अपार और अटूट देश-भक्ति की भावना प्रकट होती है। वास्तव में वे एक महान देश-भक्त थे। अपनी इस भावना को उन्होंने अपने अभिन्न मित्र रवीन्द्र नाथ टैगोर से एक पत्र के माध्यम से प्रकट किया-“यदि मुझे सौ बार भी जन्म लेना पड़े तो मैं हर बार अपनी मातृभूमि के रूप में हिन्दुस्तान का ही चयन करूँगा।”

डॉ. बसु ने पेड़-पौधों में भी जीवन है, इसे सिद्ध करने के लिए कई यंत्र बनाए। उनमें कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकॉर्डर आदि अधिक चर्चित हैं। ‘कास्कोग्राफ’ पौधों की वृद्धि नापने का यंत्र था, तो रेजोनेंट रिकॉर्डर से यह ज्ञात हो जाता था कि चोट लगने पर और मरते समय पौधे भी काँपने लगते हैं। डॉ. बसु आजीवन अपने विज्ञान साधना में लगे रहे। एक-से-एक बढ़कर उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान किये। उसमें उन्हें सफलता मिलती रही। उनकी इस प्रकार की मौलिकता और विविधता आज भी बेमिसाल मानी जाती है। फलस्वरूप उमकी खोजों से आने वाली वैज्ञानिक पीढ़ी को प्रेरणा मिलती रहेगी।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

(क) शीर्षकों के आधार पर एक-एक अनुच्छेद लिखकर डॉ. जगदीशचन्द्र बसु की जीवनी लिखिए बचपन, शिक्षा, कार्यक्षेत्र, सम्मान।
(ख) डॉ. बसु ने इसके बारे में क्या-क्या पता लगाया? बेतार का तार, धातु, पेड़-पौधे।
(ग) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए रुचि, ज्ञान, सफलता, इच्छा, आवश्यक, परतन्त्र, निर्जीव, उदय।
उत्तर
(क) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु की जीवनी
1. बचपन-डॉ. जगदीशचन्द्र बसु का जन्म 30 नवंबर 1858 को बंगला देश के ढाका जिले के मेमनसिंह नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री भगवान चन्द्र बसु था। वे बड़े विचारक थे। डॉ. बसु ने अपने पिता श्री से विचारशीलता, साहस, दृढ़ संकल्प तथा सहानुभूति और माता से भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम के गुणों को ग्रहण कर अपने भविष्य का निर्माण करने लगे।

2. शिक्षा-बालक जगदीश ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव की पाठशाला में प्राप्त की थी। पाठशाला में किसान और मछुआरों के बेटे उनके साथी थे। किसान के लड़के, खेतीबाडी और पौधों के बारे में बातें करते थे। इससे बचपन में ही जगदीशचन्द्र की रुचि पेड़-पौधों में हो गई। गाँव में उन्हें पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों के सम्पर्क में रहने का अवसर मिला। बालक जगदीश इन वस्तुओं को ध्यान से देखते और इनके विषय में अनेक बातें सोचते। इनकी इसी प्रवृत्ति ने आगे चलकर इन्हें एक महान वैज्ञानिक बना दिया। तेरह वर्ष की आयु में वे कलकत्ता के संत जेवियर्स का कॉलेज में भर्ती हुए। वहाँ की शिक्षा समाप्त करके वे इंग्लैंड चले गए, वहाँ से उन्होंने विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौट आए।

3. कार्यक्षेत्र-डॉ. बसु का कार्यक्षेत्र भारत ही रहा। वे कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रोफेसर रहे। अध्यापन के साथ उन्होंने ‘बसु विज्ञान-मंदिर’ नामक शोध संस्थान की स्थापना की। उन्होंने अपनी निजी प्रयोगशाला के द्वारा बेतार के तार, कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकॉर्डर जैसे अनेक अद्भुत यंत्रों का आविष्कार किया।

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4.सम्मान-डॉ. बसु को उनकी वैज्ञानिक खोजों के लिए अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया। विद्युत के विषय में उनके गवेषणापूर्ण लेखों के लिए लंदन की रायल सोसायटी ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की। डॉ. बसु ने अपने अनुसंधान का कार्य का पहला प्रतिवेदन रॉयल सोसायटी को भेजा। लंदन विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया। उनके आश्चर्यजनक खोजों, आविष्कारों और प्रयोगों को देखकर यूरोप के लोगों ने उन्हें ‘पूर्व का जादूगर’ कहा। 1911 में सरकार ने उनको सी. आई. ई., 1916 में अमेरिका से लौटने पर सी. एस. आई और 1917 में ‘सर’ की उपाधि से विभूषित किया।

(ख)
1. बेतार का तार-उन्होंने बिना तार के ही दूर पर पड़े बोझ को हिला दिया था और घण्टी बजाकर दिखाया था।
2. पात-उन्होंने धातु से कई यंत्र बनाए; जे-कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकॉर्डर आदि
3. पेड़-पौधे-पेड़-पौधों में भी हमारे तरह की जीवन है। उनमें हमारे जैसी अनुभव शक्ति है।

(ग) शब्द
विलोम शब्द
रुचि – अरुचि
ज्ञान – अज्ञान
इच्छा – अनिच्छा
सफलता – विफलता
आवश्यक – अनावश्यक
परतंत्र – स्वतंत्र
निर्जीव – संजीव
उदय – अस्त।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु योग्यता-विस्तार

(क) अपने बाग-बगीचे या आस-पास लगे पेड़-पौधों का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन कर यह जानिये कि उनमें भी जीवन होता है। एक पौधा लागकर उसे बड़ा कीजिए।
(ख) महान वैज्ञानिक एवं उनके कार्य-चार्ट तैयार कर कक्षा में लगाइये।
(ग) भारतीय संस्कृति में किन-किन पेड़-पौधों की पूजा की जाती है? उनकी जानकारी एकत्र कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक अध्यापिका की सहायता से हल करें।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

1.लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपनी माँ की किन बात सुनकर बालक बसु पेड़-पौधों के बारे में सोचने लगे?
उत्तर
‘बेटा पौधे सो गए हैं। उन्हें मत जगाओ, गेंद सवेरे निकाल लेना।” अपनी माँ की इन बातों को सुनकर बालक बसु पेड़-पौधों के बारे में सोचने लगे।

प्रश्न 2.
बसु ने निजी प्रयोगशाला क्यों बनाई?
उत्तर
बसु अपने नये अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को बढ़ाने के लिए मचल उठे थे। कलकत्ता से प्रेसीडेन्सी कॉलेज जहाँ पर वे प्रोफेसर थे, वहाँ की प्रयोगशाला में अनुसंधानों के लिए उचित प्रबंध नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने घर पर ही एक निजी प्रयोगशाला बनाई।

प्रश्न 3.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने वैज्ञानिक मंच पर अपने प्रसंगों द्वारा क्या प्रमाणित कर दिया?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने वैज्ञानिक मंच पर अपने प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। उन्हें भी हम प्राणियों जैसी सर्दी-गर्मी और भूख-प्यास आदि लगती है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं। वे भी आराम करते हैं और अंत में हमारी ही तरह मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 4.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु संसार के पहले वैज्ञानिक क्यों थे?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु संसार के पहले वैज्ञानिक थे। यह इसलिए कि उन्होंने ही संसार को सबसे पहले यह बतलाया कि पेड़-पौधों और धातओं में भी संवेदना होती है। उनके इस सिद्धान्त से वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में चिंतन के एक नये अध्याय की शुरुआत हुई।

प्रश्न 5.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पौधों के कष्ट और उनकी मृत्यु के दृश्य परदे पर किस प्रकार दिखाए?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पौधों के कष्ट और उनकी मृत्यु के दृश्य परदे पर दिखाए। इसके लिए उन्होंने स्वयं के द्वारा बनाए गए यंत्र ‘रेजोनेंट रिकॉर्डर से जीवित पौधों में विद्युत की एक हल्की-सी लहर दौड़ाई। परदे पर पौधों का काँपना और तड़पना साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा। धीरे-धीरे पौधा निर्जीव हो गया। इसे देखकर लोग हैरान हो गए।

प्रश्न 6.
डॉ. बसु ने अपने अभिन्न मित्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर को क्या लिखा था?
उत्तर
डॉ. बसु ने अपने अभिन्न मित्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक पत्र में लिखा था-“यदि मुझे सौ बार भी जन्म लेना पड़े, तो मैं हर बार अपनी मातृभूमि के रूप में हिन्दुस्तान का ही चयन करूँगा।”

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपनी माँ की बात सुनकर बालक बसु क्या सोचने लगे?
उत्तर
अपनी माँ की बात सुनकर बालक बसु सोचने लगे कि अगर पौधे हमारी तरह सोते-जागते हैं तो उनमें भी हमारी तरह प्राण होते होंगे। पौधों को पानी देते समय वह सोचता-क्या पौधे पानी और भोजन पाकर प्रसन्न होते हैं? क्या आकाश में उमड़ते बादलों को देखकर उनका मन भी आनन्द से नाच उठता है? फूलों को तोड़ लेने पर या आँधी से डालियों के टूटने पर पेड़-पौधों को भी कष्ट होता होगा?

प्रश्न 2.
लेखक के रूप में डॉ. बसु को विश्वस्तर पर बड़ी ख्याति कैसे मिली?
उत्तर
डॉ. जगदीश चन्द्र बसु ने 1895 में कई गवेषणापूर्ण लेख लिखे। इनमें से विद्युत संबंधी दो लेख इंग्लैण्ड के एक वैज्ञानिक पत्र में प्रकाशित हुए। इन लेखों के प्रकाशित होने से उन्हें बड़ी ख्याति मिली। लन्दन की रायल सोसायटी के मुखपत्र में अपने लेख के छपने का गौरव प्राप्त करने वाले यह प्रथम भारतीय थे। विद्युत के संबंध में लिखा गया यह लेख इतना अधिक सराहा गया कि उन्हें उसके विषय में विशेष अनुसंधान करने के लिए सोसायटी की ओर से विशेष छात्रवृत्ति दी गई। दो वर्ष पश्चात् बंगाल सरकार की ओर अनुसंधान कार्य के लिए विशेष सहायता प्रदान की गई।

प्रश्न 3.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु में देश-प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। सोदाहरण लिखिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पेड़-पौधों के विषय में एक-से-एक बढ़कर अद्भुत खोज और प्रयोग किए। उससे सारा संसार चकित हो गया। उनकी खोजों और प्रयोगों ने जर्मन वैज्ञानिकों को भी बहुत प्रभावित किया। उनकी खोजों और प्रयोगों से इतने अधिक प्रभावित हुए कि वे डॉ. बसु को एक विश्वविद्यालय सौंपने को तैयार हो गए। लेकिन डॉ. बसु ने उनके इस प्रस्ताव को अपने देश-प्रेम की भावना से अस्वीकार’ करते हए कहा, “मेरा कार्यक्षेत्र भारत ही रहेगा और में देश के उसी महाविद्यालय में काम करता रहूँगा, जिसमें मैं उस समय काम करना शुरू किया था, जब मुझे कोई जानता नहीं था।” यह था डॉ. बसु का देश-प्रेम।

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प्रश्न 4.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के जन्मदिन पर महात्मा गाँधी ने उन्हें क्या शुभकामना दी थी?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के जन्मदिन के सुअवसर पर महात्मा गांधी ने उन्हें वर्धा से 5 दिसंबर 1928 को एक पत्र में लिखा था-‘मैं यहाँ कूपमण्डूक की तरह रहता हूँ। मुझे मालूम नहीं होता कि इस कुएँ की दीवारों के बाहर क्या हो रहा है? मुझे कल ही आपके जन्म दिन मनाए जाने का समाचार प्राप्त हुआ। यद्यपि में देरी से लिख रहा हूँ। फिर भी आपको जो अनेक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ प्राप्त हो रही हैं, उनमें मेरी शुभकामना और बधाई सम्मिलित कर लें। भगवान आपको चिरायु करे, जिससे कि आपके निरन्तर बढ़ने वाले महान गौरव एवं यश में सारा भारत भागीदार बन सके।”

प्रश्न 5.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के संपूर्ण व्यक्तित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु हमारे देश के महान वैज्ञानिक थे। उन्होंने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनेक अभूतपूर्व खोज और प्रयोग करके सारे संसार को आश्चर्य में डाल दिया। उससे उन्हें देश और विदेश में एक-से-एक बढ़कर सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए। उनमें विज्ञान के प्रति अटूट लगाव था तो देश-प्रेम के प्रति अपार त्याग-समर्पण के भाव भरे हुए थे। यही कारण है कि उन्होंने जर्मन के विश्वविद्यालय का उत्तरदायित्व सँभालने का आग्रह ठुकरा कर भारत में ही रहकर कार्य करने का फैसला लिया था। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि विज्ञान ही डॉ. जगदीशचन्द्र बसु का जीवन था। धैर्य, साहस और लगन के साथ काम करना ही उनकी सफलता की कुंजी थी।

प्रश्न 6.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु पर आधारित ‘वैज्ञानिक निबंध’ के मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु हमारे देश के एक ऐसे महान वैज्ञानिक थे, जिनकी महानता का लोहा संसार के सभी वैज्ञानिक मानते हैं। अद्भुत, बेजोड़ और असाधारण व्यक्तित्व के धनी महान वैज्ञानिक डॉ. जगदीशचन्द्र बसु की वैज्ञानिक खोजों पर आधारित यह लेख वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नई पीढ़ी के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है। इसमें यह बतलाने का प्रयास किया गया है कि बालक जगदीश की बाल-सुलभ बुद्धि में जिज्ञासा और खोज की प्रवृत्ति ने उन्हें विश्व का श्रेष्ठ वैज्ञानिक बना दिया। बचपन में अपनी माँ के द्वारा संध्या-समय गेंद खेलने से पेड़-पौधों के जागने की बात ने उन्हें ऐसा प्रभावित किया कि उन्होंने अपने पूरे शिक्षाकाल में अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अनेक प्रकार से चिंतन-मनन किए। फिर एक-से-एक बढ़कर वैज्ञानिक खोज और प्रयोग किए। उनकी खोजों और प्रयोगों में बेतार का तार तथा पेड़-पौधों में संवेदनशीलता प्रमुख है।

प्रश्न
डॉ. जगदीश चन्द्र बसु का संक्षिप्त परिचय देते हुए उनके महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. जगदीश चन्द्र बसु भारत के पहले और आधुनिक वैज्ञानिक रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने विज्ञान को अपने एक स्वस्थ दृष्टिकोण से देखा, उसे गहराई से समझा और उपयोगिता की दृष्टि से प्रस्तुत किया। इससे वे विश्व के महान वैज्ञानिकों में प्रतिष्ठित हो गए। उनकी इस महानता को सभी ने एकमत से स्वीकार किया। उनकी इस महानता के विषय में यह कहा जाता है कि वे अपने विद्यार्थी जीवन में जिज्ञासु प्रकृति के थे। खासतौर से वे अपनी माँ से प्रकृति के विषय में अधिकांश रूप में पेड़-पौधों के विषय में बहुत-सी बातों की जानकारी हासिल करते थे। इस तरह उनके अंदर प्रकृति-प्रेम मुख्य रूप से वनस्पति जगत के प्रति जिज्ञास प्रवृत्ति के कारण गहरा लगाव हो गया था।

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डॉ. जगदीशचन्द्र के व्यक्तित्व का दूसरा महान पक्ष यह है कि उनमें अपार देश-प्रेम की भावना भरी हुई थी। इसी भावना के कारण ही उन्होंने जर्मन के विश्वविद्यालय का उत्तरदायित्व संभालने का आग्रह ठुकराकर भारत में ही रहकर कार्य करने का फैसला किया था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि डॉ. जगदीशचन्द्र बसु हमारे देश के एक ऐसे महावैज्ञानिक हैं, जिनका जीवन एक अद्भुत मिसाल है। उनकी सर्वोच्च विशेषता यही थी कि उनमें अपार धैर्य, साहस और लगन थी। यही उनके जीवन की सफलता की कुंजी थी।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु निबंध का सारांश

प्रश्न.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु पर आधारित वैज्ञानिक निबंध का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बस पर आधारित वैज्ञानिक निबंध एक तथ्यपूर्ण निबंध है। इस निबंध में हमारे देश के महावैज्ञानिक डॉ. जगदीशचन्द्र बसु से संबंधित अनेक अप्रकाशित तथ्यों की जानकारी दी गई है, जिससे हमारी जिज्ञासा में तेजी आ जाती है। इस निबंध का सारांश इस प्रकार है

संध्या-समय एक बालक अपने बगीचे की लताओं में अटकी हुई गेंद लकड़ी से गिरा रहा था तो उसकी माँ ने कहा कि इस समय पौधे सो गए हैं। गेंद सेवेरे निकाल लेना। इसे सुनकर बालक के मन में तरह-तरह की जिज्ञासा होने लगी- ‘क्या पौंधों में हमारी तरह प्राण-जीवन होता है? क्या पानी-भोजन पाकर और बादलों को देखकर आनंदित होते हैं और उन्हें नुकसान पहुँचाने पर दुखी होते हैं। बड़ा होने पर उस बालक ने यह खोज की कि पौधों में भी हमारे जैसे जीवन की कई बातें मिलती हैं। इससे संसार हैरान हो गया। उस बालक का नाम था-जगदीशचन्द्र बसु।

जगदीशचन्द्र बसु का जन्म 30 नवम्बर 1858 को बंगाल प्रान्त (इस समय बंगला देश) के ढाका जिलान्तर्गत मेमन सिंह नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता विचारशील उच्च पदाधिकारी थे और माता भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट भाव प्रधान। बालक वसु ने अपने माता-पिता से इन गुणों को ग्रहण कर शिक्षा अध्ययन प्राप्त करने लगे। उनके प्रारंभिक सहपाठी किसानों और मछुआरों के लड़के थे। किसानों के लड़कों से उन्होंने पेड़-पौधों की ऐसी-ऐसी अपनी आरंभिक शिक्षा समाप्त कर तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने कलकत्ता के संत जेवियर्स कॉलेज में अपनी पढ़ाई समाप्त की। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड में जाकर महान वैज्ञानिकों के सम्पर्क में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। स्वेदश आकर उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रोफेसर के पद अध्यापन आरंभ कर दिया। उनकी योग्यता और स्वाभिमान के कारण उन्हें अच्छा वेतन मिलने लगा था।

1895 में खोजपूर्ण लिखे लेख इंग्लैंड के वैज्ञानिक पत्र में प्रकाशित हुए तो उन्हें बड़ी ख्याति मिली। वे इस दृष्टि से पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। विद्युत.संबंधी उनके उस लेख से प्रभावित होकर लन्दन की रायल सोसायटी ने उन्हें उस विषय में विशेष खोज करने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की। दो वर्ष के बाद बंगाल सरकार ने भी उन्हें इस दिशा में खोज करने के लिए विशेष सहायता राशि प्रदान की। उन्होंने अपनी मौलिक प्रतिभा को साकार करने के लिए. एक प्रयोगशाला बनाई। वह उनके मित्रों के सहयोग से ही चल पायी थी। उनके अनुसंधान कार्य के प्रतिवेदन को स्वीकार करके लंदन विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डॉक्टर ऑफ साइन्स’ की उपाधि से सम्मानित , किया। डॉ. बसु का दूसरा अनुसंधान था-बेतार के तार, जिसे उन्होंने 1895 में बंगाल के गवर्नर के सामने सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया। चूंकि उस समय हमारा देश गुलाम था। इसलिए इटली के डॉक्टर मार्कोनी ने इस आविष्कार को अपने नाम से रजिस्टर्ड करा लिया। फलस्वरूप इसका श्रेय डॉ. बसु को नहीं मिला।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पेड़-पौधों के विषय में सबसे पहले बड़ी अद्भुत खोज की। उन्होंने वेदों-उपनिषदों के उस कथन को सत्य कर दिखाया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं और जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उनकी इस खोज से वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में चिंतन का एक नया अध्याय शुरू किया। उनके शोध-ग्रंथ ‘रिस्पांस इन दि लिविंग एंड नान-लिविंग’ ने सारे संसार में हलचल पैदा कर दिया। डॉ. बसु ने मैग्नेटिक कास्कोग्राफ’ के द्वारा यह सफलतापूर्वक प्रदर्शित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। इस दिशा में उनके द्वारा बनाए

यंत्रों में कास्कोग्राफ, रेजानेंट, रिकार्ड आदि अधिक चर्चित हैं। कास्कोग्राफ से पौधों . की वृद्धि और रेजोनेंट से उनके घायल होने या मरते समय के कंपन को देखा जा सकता है। इसे देखकर लोग हैरान हो गए। उनके इस प्रकार के चमत्कारी खोजों, आविष्कारों और प्रयोगों के कारण यूरोपियों ने उन्हें ‘पूर्व का जादूगर’ कहा है। उनकी ख्याति सारे संसार में फैल गई। लंदन की रायल सोसायटी ने उन्हें कई बार अपनी महत्त्वपूर्ण खोजों को प्रदर्शित करने और व्याख्यान देने के लिए बुलाया। 1906 में उनका ‘वृक्षों में जीव है’, नामक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। 1911 में भारत सरकार ने

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उनको सी.आई.ई., 1916 में सी.एस.आई. और 1917 में ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया। वे 1915 में प्रेसीडेन्सी कॉलेज से सेवा-निवृत्त हए तो अपनी 59वीं वर्षगाँठ पर अपने ‘वसु विज्ञान मंदिर की स्थापना की। 1928 में जब उनका 70वां शुभ जन्म-दिन बड़े उल्लास के साथ मनाया गया तो उन्हें देश-विदेश से शुभकामनाएँ भेंट की गयीं। वर्धा से 5 दिसंबर 1928 को महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखकर उनके दीर्घायु की मंगलकामना व्यक्त की थी। डॉ. वसु ने आजीवन विज्ञान-साधना की। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दौर में भी कई सफल वैज्ञानिक अनुसंधान किए। उनके द्वारा स्थापित ‘विज्ञान मंदिर’, एक ऐसा शोध संस्थान है, जिसमें वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों के लिए शोध-संबंधी सभी सुविधाएँ मौजूद हैं।

डॉ. बसु का निधन 23 नवबर 1937 को हुआ। वे वास्तव में वनस्पति विज्ञान के चमकते-दमकते नक्षत्र थे। उनमें अपार धैर्य, दृढ़ संकल्प, दयालुता विलक्षणता स्वाभिमान और देश-प्रेम भरा हुआ था। इन गुणों के कारण वे सदैव याद किए जाते रहेंगे।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. कहते हैं कि कण-कण में भगवान मौजूद है। हमारे वेदों और उपनिषदों में भी यही कहा गया है। यहाँ जड़ और चेतन के बीच कोई भेदभाव नहीं बताया गया है। पर लोग धीरे-धीरे इसे भूलते चले गए। जड़ को अचेतन माना जाने लगा। जगदीशचन्द्र बसु ने इस विस्मृत ज्ञान को एक बार पुनः वैज्ञानिक मंच पर उठाया और अपने प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। उन्हें भी हम प्राणियों जैसी सर्दी-गर्मी व भूख-प्यास आदि लगती है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख की अनुभूति रखते हैं। वे भी आराम करते हैं और अंत में मनुष्यवत् ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

शब्दार्च-कण-कण-एक-एक रूप। विस्मृत-लुप्त, गायब । अनुभूति-अनुभव, ज्ञान, समझ। मनुष्यवत्-मनुष्य की तरह।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक वासंती’ हिन्दी सामान्य में संकलित महान वैज्ञानिक डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के जीवन पर आधारित है ‘वैज्ञानिक निबंध’ नामक शीर्षक से है। इसमें डॉ. जगदीशचन्द्र बसु द्वारा पेड़-पौधों में जीवन को प्रमाणित किए जाने के विषय में प्रकाश डाला गया है। इस विषय में लेखक का कहना है कि

व्याख्या-हमारे धर्म-ग्रन्थों में यह कहा गया है कि सृष्टि के हर छोटे-बड़े रूप में ईश्वर की सत्ता और प्रभाव दिखाई देता है। खासतौर से हमारे चारो वेदों-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ईश्वर की सत्ता और उसकी उपस्थिति सृष्टि के हरेक रूप में बतलायी गयी है। इसी प्रकार के प्रमाण हमारे सभी पुराणों, उपनिषदों ‘ और ऋचाओं-स्मृतियों में बार-बार प्रस्तुत हुए हैं। इस प्रकार हमारे सभी धर्म-ग्रन्थ सृष्टि के जड़ और चेतन में ईश्वर की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। ऐसा करते हुए ने किसी का किसी के प्रति कोई अंतरभाव या भेदभाव नहीं प्रकट करते हैं। लेकिन यह बड़े ही अफसोस की बात कही जा सकती है कि आज के लोगबाग इतने आधुनिक मन-मस्तिष्क के हो गए हैं कि वे इसे लगभग भूल ही चुके हैं। उनके मन-मस्तिष्क की यही उपज है कि जड़ और अचेतन है।

लेखक का पुनः कहना है कि जब लोगों ने जड़ को अचेतन समझना शुरू कर दिया, तो डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने लोगों की इस भूल-भटकन को एक बार फिर से अपनी वैज्ञानिक सोच-समझ के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उन्होंने इसके लिए कई तरह के प्रयोग भी किए। उन प्रयोगों से यह साबित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी हमारी ही तरह का जीवन है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं। उन्हें भी सर्दी-गर्मी सताती है। उन्हें भी समय-समय पर भूख, प्यास और नींद लगती है। वे भी थकते हैं और आराम करते हैं। इस प्रकार हमारे जैसे जीवन जीते हुए अंत में मौत की गोद में चले जाते हैं।

विशेष-

  1. भाषा वैज्ञानिक शब्दों की है।
  2. शैली प्रामाणिक है।
  3. सम्पूर्ण कथन सत्य पर आधारित है।
  4. यह अंश ज्ञानवर्द्धक और भाववर्द्धक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर :

प्रश्न
(i). हमारे वेदों-उपनिषदों की क्या मान्यता है।
(ii) आज के लोगों की क्या मान्यता है?
(iii) डॉ. बसु ने वैज्ञानिक मंच पर क्या उठाया?
उत्तर
(i) हमारे वेदों-उपनिषदों की यह मान्यता है कि सृष्टि के एक-एक तत्त्व (रूप) में ईश्वर की सत्ता मौजूद है। इसलिए जड़ और चेतन में कोई अंतर नहीं है।
(ii) आज के लोगों की यह मान्यता है कि जड़ और चेतन में अंतर है। जड़ ही अचेतन है।
(iii) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने जड़ और चेतन क्या है? दोनों एक ही हैं या दोनों अलग-अलग हैं। इस तरह जड़-चेतन में भेद है या नहीं, इस प्रकार के तथ्य का गंभीरतापूर्वक अध्ययन-मनन किया। फिर इसे वैज्ञानिक मंच पर रखा।

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2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने क्या प्रमाणित कर दिया?
(ii) पेड़-पौधों और हमारे में मुख्य अंतर क्या है?
(iii) उपर्युक्त गद्यांश का प्रतिपाय क्या है?
उत्तर
(i) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने अपने बार-बार के प्रयोगों से यह प्रमाणित कर दिया कि हमारी तरह ही पेड़-पौधों में जीवन है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं। उन्हें सर्दी-गर्मी और भूख सताती है। घायल होने पर वे भी दुख-दर्द से परेशान हो उठते हैं। इस प्रकार वे हमारी तरह जीवन-मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
(ii) पेड़-पौधों और हमारे में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। उनमें और हमारे में मुख्य अंतर यह है कि हम अपने दुखों और अभावों-कठिनाइयों को बड़ी गहराई से समझते हैं। अपने शक्ति-क्षमता से उन्हें दूर कर ही लेते हैं। पेड़-पौधे ऐसा नहीं कर पाते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति-क्षमता हमारी तुलना में बिल्कुल ही नहीं के बराबर होती है।
(iii) उपर्युक्त गद्यांश का प्रतिपाद्य है-पेड़-पौधों के विषय में अद्भुत और ज्ञानवर्द्धक जानकारी प्रस्तुत करना।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 17 मृत्तिका

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 17 मृत्तिका (नरेश मेहता)

मृत्तिका अभ्यास-प्रश्न

मृत्तिका लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी के मातृरूपा होने का क्या आशय है?
उत्तर
मिट्टी के मातृरूपा होने का आशय है-हर प्रकार से ऐसी सम्पन्नता जो भरण-पोषण कर जीवन-शक्ति प्रदान कर सके।

प्रश्न 2.
जब मनुष्य का अहंकार समाप्त हो जाता है, तब मिट्टी उसके लिए क्या बन जाती है?
उत्तर
जब मनुष्य का अहंकार समाप्त हो जाता है, तब मिट्टी उसके लिए पूज्य बन जाती है।

प्रश्न 3.
मिट्टी के किस रूप को प्रिया कहा गया है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी के कुंभ और कलश रूप को प्रिया कहा गया है। यह इसलिए कि इसे लेकर किसी की प्रिया जल भरने जाती है। वह उस जल को अपने प्रिय को पिला उसकी प्रिया होने के धर्म को निभाती है।

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प्रश्न 4.
में तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर
‘में तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी ने ऐसा कहा है। यह इसलिए कि उसे अपना कोई विशेष और चमत्कारी संस्कार नहीं प्राप्त होता है।

प्रश्न 5.
मिट्टी किस प्रकार चिन्मयी शक्ति बन जाती है?
उत्तर
मिट्टी को मनुष्य जब अपने पुरुषार्थ से पराजित होकर अपनेपन की भावना से पुकारता है, तब वह चिन्मयी शक्ति बन जाती है।

मृत्तिका दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी किन कष्टों को सहकर हमें धन-धान्य से पूर्ण करती है?
उत्तर
मिट्टी मनुष्य के पैरों से रौंद दिए जाने और हल के फाल से विदीर्ण किए जाने जैसे बहुत ही असहनीय कष्टों को सहकर हमें धन-धान्य से पूर्ण करती है।

प्रश्न 2.
इस कविता में मिट्टी के किन-किन स्वरूपों का उल्लेख किया गया
उत्तर
इस कविता में मिट्टी के विविध स्वरूपों का उल्लेख किया गया है।
माता, कुंभ, कलश, खिलौना, प्रजा, चिन्मयी शक्ति, आराध्या, प्रतिमा आदि मिट्टी के अलग-अलग स्वरूपों को इस कविता में चित्रित किया गया है।

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प्रश्न 3.
पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व क्यों कहा गया है?
उत्तर
पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व कहा गया है। यह इसलिए कि इससे ही किसी साधारण वस्तु को उसको महान और उपयोगी स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में पुरुष द्वारा असंभव को संभव किया जा सकता है और मिट्टी जैसे साधारण-सी वस्तु को देवत्व का दर्जा दिया जा सकता है।

प्रश्न 4.
‘मृत्तिका’ कविता के माध्यम से कवि ने क्या संदेश दिया है?
उत्तर
‘मृत्तिका’ कविता के माध्यम से कवि ने हमें यह संदेश दिया है कि हमें किसी भी साधारण-सी-साधारण चीज को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए। मिट्टी जैसी साधारण-सी वस्तु को मनुष्य अपने पुरुषार्थ के द्वारा उसे न केवल विविध स्वरूप प्रदान करता है अपितु अधिक उपयोगी और पूज्य स्वरूप में भी ढाल देता है। इसलिए हमें अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनी पूरी शक्ति, बुद्धि और विश्वास को लगा देना चाहिए। इससे कोई भी लक्ष्य दूर नहीं रह जाएगा। वह आसानी से हासिल हो ही जाएगा।

प्रश्न 5.
मृत्तिका के माता, प्रिया और प्रजा रूपों में से आपको सबसे अच्छा रूप कौन-सा लगता है और क्यों?
उत्तर
मृत्तिका के माता, प्रिया और प्रजा रूपों में हमें सबसे अच्छा रूप माता का लगता है। यह इसलिए कि माता से ही हमारा इस संसार में आना संभव हुआ। इससे हमारे जीवन की आरंभिक आवश्यकताएँ पूरी हुई, जिनके बलबूते पर हमने न केवल अपना विकास-विस्तार किया, अपितु दूसरों के विकास-विस्तार में सहायता की। अगर माता किसी को न प्राप्त हो, तो उसका कब अस्तित्व नहीं हो सकता है।

प्रश्न 6.
पुरुषार्थ पराजित स्वत्व से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पुरुषार्थ पराजित स्वत्व से आशय है-अहंकार के अपनापन का विसर्जन। जब पुरुषार्थ अहंकार के अपनापन का विसर्जन हो जाता है, तब दूसरों का महत्त्व और उपयोगिता का पता चलने लगता है। यह किसो के लिए आवश्यक है और कल्याणकारक भी।

मृत्तिका भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखत शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
अंतरंग, पराजित, स्वत्व, देवत्व, विश्वास।
उत्तर
शब्द – विलोम
अंतरंग – बहिरंग
पराजित – अपराजित
देवत्व – राक्षसत्व
विश्वास – अविश्वास।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
1. जिसकी रुचि साहित्य में हो।
2. जो सब कुछ जानता हो।
3. जो किए हुए उपकारों को मानता है।
4. जो किए उपकारों को नहीं मानता है।
5. जो देखा नहीं जा सकता है।
उत्तर
वाक्यांश के लिए एक शब्द
बाक्यांश – एक शब्द
1. जिसकी रुचि साहित्य में हो। – साहित्यिक
2. जो सब कुछ जानता हो। – सर्वज्ञ
3. जो किए हुए उपकारों को मानता है। – कृतज्ञ
4. जो किए हुए उपकारों नहीं मानता है। – कृतघ्न
5. जो देखा नहीं जा सकता है। – अदृश्य।

प्रश्न 3.
“अपने ग्राम देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ।” काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त काव्य-पंक्ति का काव्य-सौन्दर्य ओजस्वी भावों से पष्ट है। मिट्टी को वाणी प्रदान करने से मानवीकरण अलंकार की चमक से कथन को प्रभावशाली ढंग में प्रस्तुत करने का कवि प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। .

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प्रश्न 4.
(क) में तो मात्र मृत्तिका हूँ
जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो तव में
धनधान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ।

1. उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ मुक्त छंद हैं लय मात्रा से विहीन हैं इन्हें अतुकान्त पद भी कहा जाता है।
क. काव्य में मृत्तिका (मिट्टी) ने मानव को सम्बोधित करते हुए अपने विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। अतः सम्बोधन शैली द्रष्टव्य है।
ख. कविता में माँ के रूप में त्याग, प्रेमिका के रूप में शांति-तृप्ति, प्रजा के रूप में मनचाहा व्यवहार, प्रतिमा के रूप में आराधना बताई गयी है इस प्रकार भाषा के साधारण अर्व के साथ गहन (द्वितीय) अर्व भी हो तो लाक्षणिकता कहलाती है। कविता से लाक्षणिक शब्दों से युक्त पंक्तियाँ छाँटकर लिखिए।
उत्तर
कविता से लाक्षणिक शब्दों से युक्त पंक्तियाँ
1. जब तुम
मुझे पैरों से रौंदते हो
तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो,
तब में
धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ!

2. कुंभ और कलश बनकर
जल लाती तुम्हारी अंतरंग प्रिया हो जाती हूँ।

3. जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने रूप पर
आकर्षित होकर मचलने लगते हो
तब मैं
तुम्हारे शिशु-हाथों में पहुँच प्रजारूपा हा जाती हूँ।

4. पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्थ, पराजित स्वत्व से मुझे पुकारते हो
तब मैं
अपने ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मय शक्ति हो जाती हूँ।

5. प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ।

मृत्तिका योग्यता-विस्तार

(क) मृत्तिका कविता की तरह पवन और जल विषय पर अपनी कल्पना से कविता बनाइए और कक्षा में सुनाइए।
(ख) कवि शिवमंगल सिंह सुमन की कविता ‘मिट्टी की महिमा’ पढ़कर मिट्टी की सृजन-शक्ति और महिमा को जानिए।
(ग) मानव का पुरुषार्थ ही उसे देवत्व प्रदान करता है इस विषय पर कक्षा में अपने विचार लिखिए।
(घ) ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ ये पाँचों तत्त्व प्रकृति द्वारा प्रदत्त हैं। इनका महत्त्व प्रतिपादित करते हुए अपने शब्दों में आलेख लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मृत्तिका परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी के ऐसा कहने से उसका कौन-से भाव व्यक्त हो रहे हैं?
उत्तर
‘मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ मिट्टी के ऐसा कहने से उसका सरल, सामान्य और निराभिमान के भाव व्यक्त हो रहे हैं।

प्रश्न 2.
स्वयं को मातृरूपा कहकर मिट्टी ने माता की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर
स्वयं को मातृरूपा कहकर मिट्टी ने माता की कई विशेषताओं की ओर संकेत किया है। उसके अनुसार अपनी संतान की रक्षा और उसके सुख के लिए माता अनेक प्रकार के कष्टों को सहती है। यहाँ तक कि वह अपने प्राणों को संकट में डालने से भी पीछे नहीं हटती है।

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प्रश्न 3.
मिट्टी का सबसे लोकप्रिय रूप कौन-सा होता है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी का सबसे लोकप्रिय रूप उससे बने हुए खिलौने होते हैं। यह इसलिए कि उसे बनाकर मनुष्य उसे मेले में बेचने के लिए ले जाता है, तब देखने वाले उस पर लट्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
शिशु-हायों में पहुँचकर मिट्टी प्रजारूपा क्यों हो जाती है?
उत्तर
शिशु-हाथों में पहुँचकर मिट्टी प्रजारूपा हो जाती है। यह इसलिए कि शिशु-हाथ अपनी इच्छानुसार उसका उपयोग करते हैं।

प्रश्न 5.
सबसे बड़ा देवत्व क्या है?
उत्तर
सबसे बड़ा देवत्व यही है कि मनुष्य पुरुषार्थ करता है। मिट्टी उसके पुरुषार्थ से एक-से-एक महान और उपयोगी स्वरूप को प्राप्त करती है।

मृत्तिका दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी को अत्यधिक आकर्षक स्वरूप कौन और कैसे प्रदान करता है?
उत्तर
मिट्टी को अत्यधिक आकर्षक स्वरूप कुम्हार प्रदान करता है। वह मिट्टी को भिगो-भिगो कर उसे फूलने देता है। उसके बाद वह उसे अपने पैरों से रौंदता है फिर वह अपने हाथों से मल-मलकर मुलायम करके रख देता है। उसे मनमाने रूप देने के लिए चाक पर रखकर घुमाने लगता है। ऐसा करते हुए वह उसे अपने हाथों से सहला-सहला कर मनमाने रूप में ढालकर चाक पर से उतारकर रख देता है। सूख जाने पर वह विभिन्न प्रकार के रंगों से रंगकर उसे सुन्दर और मोहक बना देता है।

प्रश्न 2.
मिट्टी का कौन-सा रूप हमारे लिए अधिक उपयोगी है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी का उत्पादक स्वरूप हमारे लिए अधिक उपयोगी है। यह इसलिए कि इससे हमारा जीवन संभव होता है। हमारा अस्तित्व बना रहता है। अगर मिट्टी हमें एक माँ की तरह अन्न-धन प्रदान न करे तो हम जीवित नहीं रह सकेंगे। हमारा अस्तित्व नहीं रह सकेगा। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यों तो मिट्टी के सभी रूप-प्रतिरूप हमारे लिए उपयोगी और आवश्यक हैं, लेकिन उसका उत्पादक स्वरूप सबसे अधिक उपयोगी और आवश्यक है।

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प्रश्न 3.
कविता में मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख किया गया है, क्यों?
उत्तर
कविता में मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख किया गया है। यह इसलिए मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों से अधिकांश लोग अनजान होते हैं। वे मिट्टी को सामान्य रूप में ही देखते-समझते हैं। कवि ने उनके इस भ्रम को तोड़ने के लिए ही मिट्टी के एक-से-एक बढ़कर आकर्षक और उपयोगी स्वरूपों को बहलाने का प्रयास किया है।

प्रश्न 4.
‘मृत्तिका’ कविता का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मृत्तिका’ कविता कविवर नरेश मेहता की एक ज्ञानवर्द्धक और रोचक कविता है। कविवर नरेश मेहता अपनी इस कविता में अपनी कल्पना को एक ओर रख करके केवल अपनी अनुभूति को ही स्थान दिया है। उन्होंने इस कविता के द्वारा मिट्टी के प्रति हमारे सोए हुए ज्ञान को जगाने का प्रयास किया है। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि मृत्तिका कविता में कवि ने मिट्टी के विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। माटी को मातृत्व स्वरूपा, प्रिया स्वरूपा और शिशु-भाव से जोड़कर उसे प्रजारूपा दर्शाया है। इन तीनों रूपों का सार्थक समन्वय ही देवत्व को प्रकट करता है।

मृत्तिका किवि-परिचय

प्रश्न
श्री नरेश मेहता का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-कविवर नरेश मेहता का नयी कविताधारा के कवियों में विशिष्ट स्थान है। उनकी कविताओं में उनके असाधारण और बहमुखी प्रतिभा की झलक साफ-साफ दिखाई देती है। चूंकि उनका रचनात्मक व्यक्ति बड़ा ही अद्भुत है तो उनकी रचनाएँ उनकी इस विशेषता को तुरन्त प्रकट कर देती हैं।
रचनाएँ-कविवर नरेश मेहता की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. वन पारखी सुनीं
  2. बोलने को चीड़ को
  3. संशय की एक रात
  4. समय देवता आदि नरेश मेहता जी के काव्य-संग्रह हैं।

साहित्यिक महत्त्व-कविवर नरेश जी का साहित्यिक महत्त्व नयी कविता के उल्लेखनीय कवियों में से एक है। मध्य-प्रदेश के साहित्यकारों में तो आपका अग्रणीय स्थान है। आपकी कविताओं की यह सर्वमान्य विशेषता है कि उनमें कल्पना की नहीं, अपितु अनुभूति की ही प्रधानता है। आपकी साहित्यिक सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपसे वर्तमान साहित्य और साहित्यकारों को अनेक अपेक्षाएँ हैं।

मृत्तिका कविता का सारांश

प्रश्न 1.
कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ एक ज्ञानवर्द्धक कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है मिट्टी मनुष्य को संबोधित करती हुई कह रही है-हे मनुष्य! मैं तो केवल मिट्टी हूँ। जब तुम अपने पैरों से मुझे रौंदते हो और हल के फाल से विदीर्ण करते हो, तब मैं धन-धान्य बनकर तुम्हारे लिए माँ के रूप में बन जाती हूँ। जब तुम मुझे अपने हाथों से स्पर्श करते हो और मुझे चाक पर रखकर घुमाने लगते हो, तब मैं घड़ा बनकर जल लाने वाली तुम्हारी प्रिया का रूप धारण कर लेती हूँ। जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने के रूप पर गद्गद् होकर मचलने लगते हो, तब मैं तुम्हारे बच्चों के हाथों में पहुँचकर प्रजा का रूप धारण कर लेती हूँ। जब तुम अपनी शक्ति-क्षमता को भूलकर मुझे बुलाते हो, तब मैं अपनी ग्रामीण शक्ति से चिन्मयी शक्ति को शरण कर लेती हूँ। उस समय मेरी मूर्ति तुम्हारी आराध्या हो जाती है। इसलिए हे पुरुषार्थी मनुष्य! तुम यह विश्वास कर लो कि यही मेरा मिट्टी स्वरूप देवत्व है।

मृत्तिका संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ
जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो
तवा हल के फाल से विदीर्ण करते हो
तब मैं धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूं।
जब तुम मुझे हाथों से स्पर्श करते हो
तथा चाक पर चढ़ाकर घुमाने लगते हो।

शब्दार्थ-मात्र-केवल। मृत्तिका-मिट्टी। रौंदते-कुचलते। विदीर्ण-फाड़ना। धन-धान्य-अन्न-धन। मातृरूपा-माता का रूप।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती, हिन्दी सामान्य’ में संकलित व कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ से है। इसमें कविवर नरेश मेहता ने मिट्टी मनुष्य के प्रति क्या कह रही है, इसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कवि का कहना है कि

व्याख्या-हे मनुष्य! तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि जब तक मैं तुम्हारे सम्पर्क-स्पर्श में नहीं रहती है, तब तक मैं अपने साधारण रूप में ही रहती हैं। लेकिन जैसे ही मैं तुम्हारा सम्पर्क-स्पर्श प्राप्त करती हूँ, वैसे ही मैं कई रूपों को धारण कर लेती हूँ। उदाहरणस्वरूप जब तुम मुझे अपने पैरों से खूब मलते-कुचलते हो अर्थात् . रगड़ते हो। फिर हल के फाल से चीरते-फाड़ते हो, तब मैं वह साधारण मिट्टी नहीं रह पाती हूँ। दूसरे शब्दों में मैं अपने साधारण रूप को उतारकर असाधारण रूप को धारण कर लेती हूँ। मेरा यह असाधारण रूप धन-धान्य से भरा-पूरा होता है। वह मेरा भरा-पूरा रूप माता का होता है। इसी प्रकार जब तुम अपने हाथों से मुझे सहलाकर छूते हो, और फिर मुझे चाक पर चढ़ाकर नचाने लगते हो, तब मेरा रूप कुछ और ही हो जाता है।

विशेष-

  1. मिट्टी का आत्मकथन सत्यता और वास्तविकता पर आधारित है।
  2. भाषा की शब्दावली उच्चस्तरीय तत्सम शब्दों की है।
  3. शैली आत्मकथात्मक है।
  4. ‘मैं मात्र-मृत्तिका’ और ‘धन-धान्य’ में अनुप्रास अलंकार है।
  5. यह अंश रोचक और सरस है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-नरेश मेहता कविता-‘मृत्तिका’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना मुक्तछंद से तैयार है। इसमें तत्सम शब्द
(मात्र, मृत्तिका, विदीर्ण, मातृरूपा और स्पश) अधिक हैं: तो पैर, हाथ आदि तद्भव शब्द भी हैं। आत्मकथात्मक शैली में प्रस्तुत इस पद का काव्य-सौन्दर्य इससे निखरकर सामने आया है। कथन की सत्यता अद्भुत और चौंकाने वाली है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना.बड़ी लाक्षणिक और रोचक है। इस विशेषता को प्रस्तुत करने के लिए कवि ने मिट्टी के आत्मकथन की सत्यता को सामने रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। मिट्टी को विविध रूप देता हुआ मनुष्य मिट्टी की इस विशेषता को जान नहीं पाता है, इस तथ्य की विचित्रता को सरल भावों-कथनों से इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य और ही बढ़ गया है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) मिट्टी ने क्यों कहा है-“मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ।”
(ii) मिट्टी के मातृरूपा स्वरूप की क्या विशेषता है?
(iii) उपर्युक्त पयांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) मिट्टी ने कहा है-“मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ।” यह इसलिए कि मिट्टी मनुष्य के सम्पर्क-स्पर्श में जब तक नहीं आती है, तब तक उसका स्वरूप बिल्कुल साधारण और सामान्य ही बना रहता है।
(ii) मिट्टी के मातरूपा स्वरूप की बड़ी ही अद्भत विशेषता है। इस स्वरूप को प्राप्त हुई मिट्टी सचमुच में माता की ही तरह होती है। वह भी अपने पुत्र मनुष्य का भरण-पोषण अनेक प्रकार के धन-धान्य के द्वारा करती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-मिट्टी की अनोखी और उपयोगी विशेषताओं को प्रस्तुत करना। इसके द्वारा कवि ने मिट्टी में किस प्रकार से ऐसे गुण छिपे हुए हैं, इसे सुस्पष्ट करना चाहा है।

2. तब में
कुंभ और कलश बनकर
जल लाती तुम्हारी अंतरंग प्रिया हो जाती हूँ।
जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने रूप पर
आकर्षित होकर मचलने लगते हो

तब मैं
तुम्हारे शिशु-हावों में पहुँच प्रजारूपा हो जाती हूँ।
पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्व-पराजित स्वत्व से मुझे पुकारते हो।

शब्दार्थ-कुंभ-घड़ा। अंतरंग-घनिष्ठ, अभिन्न। प्रिया-धर्मपत्नी। आकर्षित-लट्ट। शिशु-बालक। पुरुषार्थ-वीरता। पराजित-हार। स्वत्व-अपनापन।

प्रसंग-पूर्ववत । इसमें कवि ने मनुष्य के संपर्क-स्पर्श में आने पर मिट्टी के बदलते हुए स्वरूप को चित्रित करने का प्रयास किया है। इस विषय में कवि का कहना है कि मिट्टी मनुष्य से कह रही है

व्याख्या-हे मनुष्य! जब मैं तुम्हारे स्पर्श से चाक पर चढ़कर घूमने (चक्कर काटने लगती हूँ’ तब मैं एक नये और आकर्षक रूप को धारण कर लेती हैं। मह मेरा नया और आकर्षक स्वरूप कुंभ (घड़ा) और कलश का होता है। इस नये और आकर्षक स्वरूप की यह विशेषता होती है कि वह तुम्हारी अंतरंग प्रिया को प्रभावित किए बिना नहीं रहता है। दूसरे शब्दों में यह कि उस मेरे नये और आकर्षक स्वरूप कुंभ (घड़ा) और कलश को तुम्हारी अंतरंग प्रिया बड़े प्रेम से उठाकर तुम्हारे लिए उसमें जल लाती हूँ। इससे मुझे तुम्हारी अंतरंग प्रिया होने का गौरव प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार जब मैं तुम्हारे द्वारा चाक पर चढ़कर चक्कर काटने लगती हूँ, तब मुझे तुम एक और ही नया और अधिक स्वरूप दे देते हो। वह मेरा नया और अधिक स्वरूप खिलौने का होता है। फलस्वरूप उसे देखकर तुम खुशी से नाच उठते हो। फिर उसे मेले में ले जाकर तुम और अधिक खुशी से झूमने लगते हो। वहाँ जाकर जब मैं तुम्हारे बच्चों के हाथों में पहुँचती हूँ, तब मेरा रूप एक बार फिर बदल जाता है। वह बदला हुआ मेरा नया रूप प्रजा का रूप होता है। इतना होने पर जब कभी तुम अपने पुरुषार्थ के अहं का परित्याग कर अपनापन के भावों से मुझे जानने-समझने और पुकारने लगते हो, तब मैं उस समय कुछ और ही हो जाती हूँ।

विशेष-

  1. मिट्टी के बदलते स्वरूप पर प्रकश डाला गया है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. मुक्तक छंद है।
  4. मुझे मेले में मेरे, रूप पर, पहँच प्रजारूपा और पुरुषार्थ पराजित पराजित, में अनुप्रास अलंकार है।
  5. यह अंश भाव-वर्द्धक है।

1. पयांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
उपर्युक्त पयांश के कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-श्री नरेश मेहता कविता-‘मृत्तिका’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-विधान आकर्षक है। इसके लिए कवि ने रस, छंद, अलंकार और प्रतीक-बिम्ब का चुन-चुन कर प्रयोग किया है। अनुप्रास अलंकार (मुझे मेले में मेरे, रूप पर, पहुँच प्रजा रूप और पुरुषार्थ-पराजित) की झड़ी लगा दी है। मुक्तक छंद से मिट्टी की मुक्त अभिव्यक्ति साकार होकर मन को छू लेती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान सरल भावों का है। मिट्टी का कथन बड़ा ही स्वाभाविक और उपयुक्त है। मनुष्य का मिट्टी के बदलते स्वरूप से अज्ञान रहने की सच्चाई खोलने का प्रयास सचमुच में प्रशंसनीय है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुंभ और कलश से मिट्टी का कौन-सा स्वरूप प्रकट होता है?
(ii) मनुष्य मिट्टी के किस रूप को देखकर मचलने लगता है और क्यों?
(iii) मिट्टी के प्रजारूप से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) कुंभ और कलश से मिट्टी का नया और अत्यधिक आकर्षक रूप प्रकट होता है। वह आकर्षक रूप मनुष्य के प्रिया-स्वरूप का होता है, जो उसके लिए सुख और अधिक मोहक कहा जाता है।
(ii) मनुष्य मिट्टी के खिलौने रूप को देखकर मचलने लगता है। यह इसलिए कि उसमें बहुत बड़ा आकर्षण होता है। उससे उसके बच्चे जब फूले नहीं समाते हैं,
तो उसको अपनी मेहनत का बड़ा ही सुखद और अद्भुत अनुभव होने लगता है।
(iii) मिट्टी के प्रजारूप से तात्पर्य है-प्रजा का स्वरूप। जिस प्रकार प्रजा अपने स्वामी के प्रति कृतज्ञ होकर उसकी इच्छानुसार उसकी सेवा में लगी रहती है, उसी प्रकार मिट्टी भी मनुष्य द्वारा खिलाने-रूप में ढालने पर उसके और उसके बच्चों को खुश करने की सेवा में लग जाती है।

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3. तब मैं
अपने ग्राम्य देवत्य के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ
प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ
विश्वास करो
यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि
तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो
और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।

शब्दाभग्राम-देवत्व-गाँव के देवता । चिन्मयी शक्ति-चेतना युक्त शक्ति । प्रतिमा-मूर्ति। आराध्या-आराधना के योग्य, पूज्य। देवत्व-देवता होने का महत्त्व।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने मिट्टी का मनुष्य के प्रति अपने विविध स्वरूप में ढलने का कथन हैं इस विषय में कवि का कहना है कि मिट्टी मनुष्य को ज्ञानमयी बातों को बतला रही है। उसका कहना है

व्याख्या-हे मनुष्य! जब तुम अपने पुरुषार्थ से हार-थककर मुझे अपनेपन की ‘ भावना से पुकारते हो, तब मैं अपने गाँव के देवत्व (देवता होने के महत्त्व) की भावना के फलस्वरूप चेतनामुक्त शक्ति-सम्पन्न हो जाती हूँ। इसकी छवि और सुन्दरता को मैं अपनी अलग-अलग बनी हुई मूर्तियों में धारण करके तुम्हारे लिए पूज्य बन जाती हूँ। इसलिए मैं तुमसे यही कहना चाहती हूँ कि तुम मुझ पर विश्वास करो। इससे ही तुम्हें पूरी तरह से यह यकीन हो जाएगा कि सबसे बड़ा देवत्व है कि तुम असाधारण पुरुषार्थ करते हो और में तुम्हारे इस असाधारण पुरुषार्थ के फलस्वरूप ही अनेक रूपों-प्रतिरूपों में बदलती हुई महत्त्व प्राप्त करती हूँ।

विशेष-

  1. भाषा प्रभावशाली है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. शैली आत्मकथात्मक है।
  4. मुक्त क छंद है।
  5. मिट्टी को मनुष्य की वाणी दी जाने के कारण मानवीकरण अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-नरेश मेहता कविता-मत्तिका।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-स्वरूप प्रभावशाली रूप में है। मिट्टी का मानवीकरण करके इसे और आकर्षक बनाने का जो प्रयास किया गया है, वह निश्चय ही
और सटीक है। मिट्टी के कथन को प्रभावशाली बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से चित्रित करने का ढंग भी कम अनोखा नहीं है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-स्वरूप सहज और रोचक है। सम्पूर्ण कथन सच्चा होने पर भी चौंकाने वाला है। यही नहीं यह ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ अधिक ध्यान दिलाने वाला है। मिट्टी की सहजता में उसकी छिपी हुई विशेषता को प्रकाशित करने का कवि-प्रयास को दाद दी जा सकती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) मिट्टी की चिन्मयी शक्ति से क्या अभिप्राय है?
(ii) मिट्टी कब पूज्य बन जाती है? ।
(iii) मनुष्य और मिट्टी की क्या सच्चाई है?
उत्तर
(i) मिट्टी की चिन्मयी शक्ति से अभिप्राय है-मिट्टी के चेतनायुक्त शक्ति। मिट्टी मनुष्य के तरह-तरह के परिश्रम से तरह-तरह के सजीव और आकर्षक रूपों में दिखाई देती है।
(ii) मिट्टी, मनुष्य के परिश्रम और अद्भुत बुद्धि-कला से विभिन्न आकर्षक और देव-देवी की प्रतिमा में बदल जाती है। उससे वह मनुष्य के लिए पूज्य बन जाती है।
(iii) मनुष्य और मिट्टी की सच्चाई बड़ी ही सुस्पष्ट है। मनुष्य पुरुषार्थ (मेहनत) करता है। उसके पुरुषार्थ मेहनत के कारण मिट्टी एक से एक बढ़कर आकर्षक महान रूपों को धारण करती है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 समर्पण

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 समर्पण (सुरेशचन्द्र शुक्ल)

समर्पण अभ्यास-प्रश्न

समर्पण लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मनुष्य कब देवतुल्य बन जाता है?
उत्तर
अपने उच्च और महान गुणों से मनुष्य देवतुल्य बन जाता है।

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने अकबर को संधि-पत्र क्यों भेजा था?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने अकबर को संघि-पत्र भेजा था। यह इसलिए कि उनमें अकबर का सामना करने की शक्ति नहीं रह गई थी।

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प्रश्न 3.
अकबर ने महाराणा प्रताप का संधि-पत्र क्यों अस्वीकार कर दिया?
उत्तर
अकबर ने महाराणा प्रताप का संधि-पत्र अस्वीकार कर दिया। यह इसलिए कि अकबर को वह संधि-पत्र जाली लगा। उसने राजकवि पृथ्वीराज को उसकी सत्यता का पता लगाने की आज्ञा दे दी।

प्रश्न 4.
भामाशाह के चरित्र में निहित राष्ट्रीय भावना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भामाशाह का पूरा चरित्र राष्ट्रीय भावनाओं से भरा हुआ था। उसमें अपार देशभक्ति की भावना थी। वह देश का सच्चा सेवक था। इसलिए वह मेवाड़ पर आए । हुए संकट को नहीं देख सकता था। इसके लिए महाराणा प्रतापं को धन की वह थेली भेंट की जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह साल तक चल सकता था। यही नहीं उसने फिर से तलवार ग्रहण करके प्रतिज्ञा की वह तन-मन और धन से मेवाड़ की रक्षा में आजीवन अपना योगदान देता रहेगा

समर्पण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप की स्तुति किन शब्दों में की?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप की स्तुति निम्नलिखित शब्दों में की आज भारत के अनेक राजाओं ने अकबर के आगे सिर झुका दिया है-सिर ही नहीं, रोटी और बेटी का संबंध भी जोड़ा है। अब आप ही भारत माँ के मस्तक की बिंदी की तरह बचे हैं। आपका सिर झुकाना भारत माँ का सिर झुकाना होगा। संसार में पार्थिव रूप से कोई अमर नहीं है प्रताप! यदि आपने अपने शीर्य को सँभाला तो आपकी यशगाथा युगों-युगों चलेगी।

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने के लिए क्या प्रतिज्ञा की?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने के लिए निम्नलिखित प्रतिज्ञा की जब तक मेवाड़ को स्वतंत्र न करा लूँगा, तब तक दाढ़ी और बाल न बनवाऊँगा। और न पलंग पर सोऊँगा, न स्वर्ण-पात्रों में भोजन करूँगा। (भूमि की ओर संकेत कर) यह भूमि ही मेरी शैया होगी और (मिट्टी को हाथ में उठाकर) इस मिट्टी के बने बर्तन ही मेरे पात्र होंगे। जब तक इस शरीर में प्राण रहेंगे, यह सिर अकबर के आगे नत न होगा।

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प्रश्न 3.
‘समर्पण’ एकांकी का नायक आप किसे मानते हैं? उसके चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
‘समर्पण’ एकांकी का नायक हम महाराणा प्रताप को मानते हैं। उनके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
1. पारिवारिक उत्तरदायित्व का निर्वाह-महाराणा प्रताप में पारिवारिक संबंधों को निभाने की अहम् विशेषता है। यद्यपि वे अपने मेवाड़ की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए तत्पर हैं। इससे पहले वे अपने परिवार के सदस्यों, पत्नी, बेटा और बेटी को सुखी और स्वतंत्र देखना चाहते हैं। यही कारण है कि वे उनके सुख के लिए ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए संधि-पत्र भेज देते हैं।

2. समय का सच्चा पारखी-महाराणा प्रताप के चरित्र की दूसरी विशेषता है-समय का सच्चा पारखी। सचमुच में महाराणा प्रताप समय के सच्चे पारखी हैं। हर प्रकार से अकबर से लोहा लेकर जब वे बार-बार हार जाते हैं तो उन्हें यही समझ में आता है कि समय उनके विपरीत है। अब तो अपने बच्चों और पत्नी का और दुख उनसे नहीं देखा जाता। इस प्रकार वे अपने बुरे समय की परख करके ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने को ही उचित समझते हैं।

3. कृतज्ञता-महाराणा प्रताप के चरित्र की तीसरी विशेषता है-कृतज्ञता। वे अकबर के राजकवि पृथ्वीराज के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं कि उन्होंने उनकी वीरता और महानता को उनके शत्रु अकबर के सामने खुलकर प्रकट की है। इसी प्रकार वे अपनी घोर विपत्ति के समय अपने मंत्री और दीवान भामाशाह द्वारा दी गई सहायता राशि को पाकर उसकी बार-बार प्रशंसा कर अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

4. महान देश-भक्त-महाराणा प्रताप महान देश-भक्त हैं। वे मेवाड़ को स्वतंत्र करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।

प्रश्न 4.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) ‘दुख में जो विचलित हो जाते हैं वे वीर नहीं कहलाते।’
(ख) परिस्थितियाँ मनुष्य को विवश कर देती हैं, मनुष्य चाहे तो परिस्थितियों को विवश कर सकता है। जो परिस्थितियों को मोड़कर आगे बढ़ते हैं उन्हीं की यशगाथा अमर रहती है।
उत्तर
(क) उपर्युक्त वाक्य का आशय यह है कि सच्चे वीर परुष किसी भी दशा में अपनी वीरता प्रकट करते ही रहे हैं। उन्हें कठिन-से-कठिन परिस्थितियाँ न तो झुका सकती हैं और न उन्हें बदल सकती हैं। कहने का भाव यह कि वीर पुरुष की वीरता सभी प्रकार की बाधाओं को पार कर आगे निकल जाती है।
(ख) उपर्युक्त वाक्यों का आशय यह है कि साधारण खासतौर से कायर मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है; लेकिन वीर पुरुष इसके ठीक विपरीत होते हैं। वे परिस्थितियों के न तो दास होते हैं और न उनसे वे विवश ही होते हैं। वे तो परिस्थितियों को अपना दास बना लेते हैं। उन्हें वे विवश कर देते हैं। ऐसे वीर पुरुष का यशगान संसार युगों-युगों तक करता रहता है।

प्रश्न 5.
भारत-माता को महाराणा प्रताप से क्या अपेक्षाएँ वी?
उत्तर
भारत-माता को महाराणा प्रताप से अनेक अपेक्षाएं थीं। उसे उनसे यह अपेक्षा वे अकबर के जनाने के कैद अबलाओं की पुकार सुनेंगे। फिर उन्हें आजाद करेंगे। यही नहीं वे भारत के उन राजाओं को स्वतंत्र करेंगे, जो अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके हैं।

समर्पण भाषा-अध्ययन

(क) वर्तनी सुधारिए
कीर्ती, करुड़, स्विकार, गृहण, आहूति, कालीख, शक्तीयाँ, प्रतीज्ञा।
उत्तर
(क) अशुद्ध वर्तनी शुद्ध वर्तनी
कीर्ती – कीर्ति
करुड़ – करुण
स्विकार – स्वीकार
गृहण – ग्रहण
आहूति – आहुति
कालीख – कालिख
शक्तीयाँ – शक्तियाँ
प्रतीज्ञा – प्रतिज्ञा।

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(ख) दिये गये वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए
(i) जिसे क्षमा न किया जा सके।
(ii) जो कुछ न करता हो।
(iii) जिसमें दया न हो।
(iv) जहाँ पहुँचना कठिन हो।
(v) उपकार को मानने वाला।
उत्तर
वाक्यांशों के लिए एक
शब्द वाक्यांश – एक शब्द
(i) जिसे क्षमा न किया जा सके। – अक्षम्य
(ii) जो कुछ न करता हो। – निठल्ला, निकम्मा
(ii) जिसमें दया न हो। – निर्दयी
(iv) जहाँ पहुँचना कठिन हो। – दुर्गम
(v) उपकार को मानने वाला। – कृतज्ञ।

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(घ) अपने मित्र को पत्र लिखिए जिसमें अपने प्रदेश की संपन्नता और संस्कृति के बारे में बताया गया हो।
उत्तर

मित्र के नाम पत्र

26 बंगलो रोड़
दिल्ली-110007
23-10-2008

प्रिय मित्र रवि,
सप्रेम नमस्ते!

तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। पत्र में तुमने मेरे प्रदेश (दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी) की संपन्नता और संस्कृति के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की है, इससे मुझे और प्रसन्नता हुई। मित्र! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मेरा प्रदेश दिल्ली है। इसे देश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह इसलिए कि यह देश के अन्य महानगरों से बहुत अधिक सम्पन्न है। यहाँ सब कुछ है। मुख्य रूप से ऐतिहासिक महानगर होने के साथ-साथ यह आधुनिक महानगर है। लाल किला, जामा मस्जिद, कुतुब मीनार, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन आदि से इसकी ऐतिहासिक संपन्नता है, तो अनेक विश्वविद्यालयों, शिक्षा-विज्ञान के संस्थानों, बाजारों, पर्यटन स्थलों, धार्मिक स्थलों, यातायात की सभी प्रकार की सुविधाओं को यहाँ देखा जा सकता है और उनसे आनंद प्राप्त किया जा सकता है। परस्पर मेल-मिलाप की संस्कृति यहाँ के किसी कोने में देखी जा सकती है। अलग-अलग भाषाओं, बोलियों, तिथि-त्यौहारों, उत्सवों, खान-पान, पहनावे आदि की संस्कृति की सम्पन्नता यहाँ जितनी अधिक और जिस रूप में है, उतनी और कहीं नहीं है। यही मेरे प्रदेश दिल्ली का कमाल है। इसे देखकर किसी ने कहा है

‘दिल्ली है दिलवालों की, बाम्बे पैसेवालों की!’
माँ को चरण-स्पर्श रवि

तुम्हारा अभिन्न
दयाल

रवि
17-ए कमच्छा
वाराणसी

समर्पण योग्यता-विस्तार

(1) भारत भूमि सदा से वीरों और महापुरुषों की भूमि रही है। हमारे स्वर्णिम इतिहास में जिन-जिन महापुरुर्षों और वीर-वीरांगनाओं का योगदान रहा है उनके चित्र और जानकारी एकत्रित कीजिए।
(2) आज हम पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर रहे हैं। हमें अपने जीवन-मूल्यों का महत्त्व समझना है। इस विषय पर कक्षा में अपने साथियों से चर्चा कीजिए।
(3) आप पाश्चात्य संस्कृति के किन बिन्दुओं से असहमत हैं अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर
उपयुक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

समर्पण परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अकबर के दरबार में महाराणा प्रताप की कौन-सी बात चल रही थी?
उत्तर
अकबर के दरबार में महाराणा प्रताप की वीरता की बात चल रही थी। अकबर कह रहा था-“मैंने प्रताप-सा वीर, अपने जीवन में नहीं देखा। भारत के बड़े-बड़े राजाओं ने मेरी अधीनता स्वीकार कर ली, पर प्रताप ने मेरे सामने सिर नहीं झुकाया। उसकी वीरता सराहनीय है।

प्रश्न 2.
राजकवि ने अकबर से संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने का क्या कारण कहा?
उत्तर
राजकवि ने अकबर से कहा कि जहाँपनाह सिसौदिया कुल के मेवाड़ राजाओं ने मेवाड़ की रक्षा अपने प्राणों को देकर की है, उसे महाराणा प्रताप इस तरह नहीं खो देगा। इसलिए इस संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने की उसे आज्ञा दी जाए।

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प्रश्न 3.
लक्ष्मी ने वीरों की क्या विशेषता बतलायी है?
उत्तर
लक्ष्मी ने वीरों की यह विशेषता बतलायी है-‘वीर सुख-दुख दोनों में कर्त्तव्य का ध्यान रखते हैं। दुख में जो विचलित हो जाते हैं, वे वीर नहीं कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
कौन मनुष्य नहीं देवता होते हैं? उत्तर-जो परिस्थितियों को मोड़कर आगे बढ़ते हैं, वे मनुष्य नहीं देवता होते हैं। प्रश्न 5. भामाशाह ने महाराणा प्रताप को क्या सहयोग दिया?
उत्तर
भामाशाह ने महाराणा प्रताप को धन की एक थैली दी, जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह वर्ष तक चल सकता था।

समर्पण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अकबर को संघि-पत्र भेजने पर अमर सिंह ने विरोध किया तो महाराणा प्रताप ने उससे क्या कहा?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने अमर सिंह को समझाते हुए कहा “बेटा समय सब कुछ करा लेता है। तुम देख रहे हो, किस प्रकार हम सब वन में मारे-मारे फिर रहे हैं। तुम्हारी माँ, जो महलों में आराम से रहती थी, भीलनियों के साथ, इस जलजलाती धूप में, हम सबके लिए फल ढूँढ़ रही है, और दिनों का फेर कि सुबह से शाम तक कभी-कभी एक भी फल नहीं मिलता।”

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने राजकवि पृथ्वीराज से अपनी विवशता किन शब्दों में व्यक्त किया?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने राजकवि पृथ्वीराज से अपनी विवशता निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया मोह में नहीं डूब रहा हूँ कवि। यदि मेरे पास साधन होते तो अकबर को दिखा देता कि प्रताप सिंह ने कितनी शक्ति है। असहाय होने के बाद भी, चार वर्ष से कोशिश कर रहा हूँ, पर कोई सहारा नहीं मिला। सब तरफ से निराश होकर मैंने संधि-पत्र लिखा था।

प्रश्न 3.
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप को किस प्रकार उत्साहित किया?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने राणा प्रताप को इस प्रकार उत्साहित करते हुए कहा साहस से काम लो प्रताप! देखो, बाप्पा रावल और हंसपाल ने शक्ति न होते हुए भी, जीते-जी मेवाड़ की रक्षा की। अपने पितामह को देखो, शरीर में अस्सी घाव होने पर भी पानीपत के मैदान में बहादुरी से लड़े। झालामाना पर दृष्टि डालो, जिसने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। आज आपके संधि-पत्र को देखकर इन वीरों का हृदय स्वर्ग में रहा रहा होगा।

प्रश्न 4.
राजकवि पृथ्वीराज से महाराणा प्रताप ने क्या अपनी व्यथा प्रकट की?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप ने अपनी निम्नलिखित व्यथा प्रकट की “कवि! तुमने मेरी स्थिति न सोची होगी। बच्चों की करुण-पुकार तुम्हें न सुनाई पड़ी होगी, नहीं तो तुम्हारा हदय भर आता, और तुम ऐसा न करते। मैंने अपने सुख के लिए संधि पत्र नहीं लिखा। पर इन सबके (रजनी की ओर संकेत कर) कष्ट मुझसे नहीं देखे गए। जब बच्चे रोटी के एक-एक टुकड़े को रोते हैं, तो मेरा धैर्य पिघलकर पानी-पानी हो जाता है। अब मैं और अधिक नहीं रह सकता कवि! तुमने ऐसा क्यों किया?

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प्रश्न 5.
‘समर्पण’ एकांकी का प्रतिपाय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
‘समर्पण’ एकांकी महान एकांकीकार डॉ. सुरेश शुक्ल-लिखित ऐतिहासिक एकांकी है। इसमें मुगल शासक अकबर और मेवाड़ केसरी महाराणा के बीच होने वाली संधि को आधार बनाकर महाराणा प्रताप और उनके परिवार की सहनशीलता, देशभक्ति और वीरता से संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। ये सभी तथ्य न केवल चौकाने वाले हैं, अपितु देश-भक्ति के सोए हुए भावों को जगाने वाले भी हैं। इस प्रकार एकांकीकार ने इस एकांकी के माध्यम से हमें यह संदेश देना चाहा है कि हम कितनी ही कठिन, दुखद और अपार परिस्थितियों में क्यों न घिरे रहें, हमें अपनी मातृभूमि के दुख और दुर्दशा को नहीं भूलना चाहिए। उसे हर प्रकार से सुखमय और संपन्न बनाने के लिए हमें अपने तन-मन, धन सब कुछ न्यौछावर कर देना चाहिए।

समर्पण लेखक का परिचय

प्रश्न
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल का आधुनिक हिंदी एकांकीकारों में प्रमुख स्थान है। ऐतिहासिक एकांकी रचना के क्षेत्र में आप अधिक उल्लेखनीय हैं।

जीवन परिचय-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल हिंदी के एक ऐसे महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं, जिन्होंने हिंदी गद्य-विधा के लिए अपना अद्भुत योगदान दिया है। खासतौर से आपने ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित एकांकी रचना के लिए विशेष प्रयास किया है। इस तरह से आपका दृष्टिकोण पूरी तरह से स्वस्थ और नया है। इस तरह आपने आधुनिक हिंदी एकांकी-नाटकों को एक ऐसी नई दिशा दी है, जिनमें मुख्य रूप से मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना के स्वर सुनाई देते हैं।

रचनाएँ-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल के अब तक सोलह पूर्णाकार नाटक और चार एकांकी संग्रह, प्रकाशित हो चुके हैं; जो इस प्रकार हैं! ‘प्रत्यावर्तन’, ‘स्वप्न का सत्य’, ‘टूटते हए’ और ‘मेरे श्रेष्ठ रंग’

महत्त्व-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल हिन्दी के जाने-माने सशक्त एकांकीकार हैं। उनका इस दृष्टि से दिया गया योगदान सर्वथा अपेक्षित रहा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि उनकी रचनाएँ नयी पीढ़ी को मार्गदर्शन प्रदान करती रहेंगी।

समर्पण एकांकी का सारांश

प्रश्न
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल लिखित एकांकी ‘समर्पण’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल लिखित एकांकी ‘समर्पण’ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित एक प्रेरक और भाववर्द्धक एकांकी है। इस एकांकी का सारांश इस प्रकार है

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भीषण गर्मी से पूरा पर्वत-प्रदेश लू की चपेट में है। चारों फैले हुए सन्नाटे में महाराणा प्रताप एक वृक्ष की छाया में बैठे हुए हैं। उनकी दाढ़ी और बाल बढ़े हुए हैं। वे धोती-कुर्ता पहने हुए तलवार लटका रहे हैं। उनका बेटा-बेटी के भी पैर नंगे हैं। तीनों ही खिन्न हैं। बेटी रजनी को भूख से सिसकती देखकर महाप्रताप उसे सहलाते हुए कहते हैं कि वह रोये नहीं। कुंजर अकबर को संधि-पत्र देकर आ रहा होगा। इसे सुनकर पुत्र अमर सिंह चकित होकर प्रश्न करता है कि क्या वे सब अकबर का गुलाम बनकर रहेंगे? अगर ऐसा है तो उसे यह मंजूर नहीं है। महाप्रताप उसे समझाते हैं कि उसकी माँ किस तरह भीलनियों के साथ वन-वन फल ढूँढ़ती हुई परेशान हो जाती है। फिर भी कभी-कभी उसे एक भी फल नहीं मिलता है।

अमर सिंह महाप्रताप को उनकी वीरता की याद दिलाता है तो महाप्रताप अकबर की अधीनता को स्वीकारने की अपनी मजबूरी बतलाते हैं। उसी समय वहाँ पर कुंजर आता है। उसने महाप्रताप को बतलाया कि उनकी प्रशंसा अकबर कर रहा था तो मानसिंह ने विरोध किया। दूसरे राजपूत अर्थात् पृथ्वीराज कवि ने उसे समझाते हुए उनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर अकबर ने जैसे संधि-पत्र को स्वीकार किया, वैसे ही पृथ्वीराज कवि ने कहा कि संधि-पत्र महाप्रताप का न होकर किसी षड्यंत्रकारी का है; क्योंकि वह महाराणा प्रताप को भलीभाँति जानता है कि वे किसी दशा में अधीनता नहीं स्वीकार करेंगे। जब मैंने (कुंजर ने कहा कि मैं महाप्रताप का सेवक हूँ। उन्होंने ही यह संधि-पत्र मुझसे भेजवाया है। इस पर राजकवि पृथ्वीराज ने संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने की आज्ञा अकबर से माँग ली। उसे देखकर मानसिंह राजकवि पर आरोप लगाया कि वे महाप्रताप का पक्ष ले रहे हैं। कुंजर ने कहा कि राजकवि आ रहे होंगे।

महाप्रताप को उनकी धर्मपत्नी महारानी लक्ष्मी ने समझाया कि वीर पुरुष दुख’ में भी अटल रहते हैं। उनसे ही भारत माँ को आशा है। एक पुत्री के आँसू से भारत के आँसू बढ़कर हैं। मैं अपनी पुत्री को भोजन दूंगी लेकिन मुझे अकबर की अधीनता मंजूर नहीं है। उसी समय राजकवि पृथ्वीराज का प्रवेश होता है।राजकवि ने महाप्रताप को समझाया कि वे भारत के मुकट हैं। संधि-पत्र तो उनकी वीरता को कलंकित कर रही है।

परिस्थितियाँ मनुष्य को विवश नहीं करती हैं, अपितु मनुष्य चाहे तो परिस्थितियों को विवश कर सकता है। परिस्थितियों को मोड़ने वाले ही अमर वीर पुरुष होते हैं। इसलिए वे मोह में न पड़े। इस अपने कर्तव्य को निभाने की आवश्यकता है। उन्हें अपने अमर वीरों की वीरतापूर्ण त्याग को याद करके साहस धारण करना चाहिए कि वीर पुरुष भटक सकते हैं, लेकिन अपयश नहीं ले सकते हैं। सभी भील उनकी सहायता अपने प्राणों की परवाह किए बिना करेंगे। उसी समय भामाशाह आकर महाप्रताप को पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह साल तक चलाने का धन भेंट करता है। महाप्रताप उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। भामाशाह ने कहा कि वह आजीवन मेवाड़ के राणा के साथ है। उससे उत्साहित होकर महाप्रताप प्रतिज्ञा करते हैं कि वे जब तक मेवाड़ को स्वतंत्र न करा लेंगे, तब तक दाढ़ी-बाल नहीं कटवायेंगे। मिट्टी के बर्तन में खायेंगे और जमीन पर सोयेंगे। सभी एक साथ बोलते हैं “हिन्दूपति महाप्रताप की जय”।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 15 वरदान मागूँगा नहीं

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 15 वरदान मागूँगा नहीं (शिवमंगल सिंह सुमन)

वरदान मागूँगा नहीं अभ्यास-प्रश्न

वरदान मागूँगा नहीं लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि किसी की दया का पात्र क्यों नहीं बनना चाहता है?
उत्तर
कवि किसी की दया का पात्र नहीं बनना चाहता है। यह इसलिए कि ‘वह आत्म-निर्भर है।

प्रश्न 2.
कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ वरदान क्यों नहीं माँगना चाहते हैं?
उत्तर
कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ वरदान नहीं माँगना चाहते हैं। यह इसलिए कि वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं। उन्हें अपने आत्मबल पर पूरा भरोसा है।

प्रश्न 3.
किस मार्ग से कवि कभी न हटने का संकल्प लेता है और क्यों?
उत्तर
कवि संघर्ष-पथ से कभी न हटने का संकल्प लेता है। यह इसलिए कि यही उसे स्वीकार है।

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प्रश्न 4.
अभिशाप मिलने के बाद भी कवि किस मार्ग से विचलित नहीं होगा?
उत्तर
अभिशाप मिलने के बाद भी कवि कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होगा?

वरदान मागूँगा नहीं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवन की प्रत्येक स्थिति में कवि ने क्या सन्देश दिया है?
उत्तर
जीवन की प्रत्येक स्थिति में कवि ने यह सन्देश दिया है कि यह जीवन महासंग्राम है। इसमें हुई हार एक विराम है। तिल-तिल मिटते हुए किसी की दया पर निर्भर न होकर अपने ऊपर ही निर्भर रहना चाहिए। जीवन-संघर्ष के दौरान सुख-सुविधाओं को भूल जाना चाहिए। संघर्ष-पथ पर जो कुछ मिले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। कोई क्या कहता है, यह ध्यान नहीं देना चाहिए और अपने कर्तव्य-पथ पर बढ़ते ही जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
कवि अपने हृदय की वेदना को क्यों नहीं छोड़ना चाहता है?
उत्तर
कवि अपने हृदय की वेदना को नहीं छोड़ना चाहता है। यह इसलिए कि वह उससे ही संघर्ष-पथ पर आगे बढ़ रहा है। उसके बिना उसके संघर्ष का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा। यही कारण है कि वह उसे यों ही त्यागना नहीं चाहता है।

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प्रश्न 3.
जीवन को महासंग्रम कहने के पीछे कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जीवन को महासंग्राम कहने के पीछे कवि का बहत बड़ा आशय है। वह यह कि जीवन में एक-से-एक बढ़कर कठिनाइयाँ आती ही रहती हैं। महासंग्राम में भी एक-से-एक विकट और बढ़कर योद्धा सामने आते रहते हैं। जीवन में वही सफल होता है, जो सामने आने वाली हर कठिनाई का न केवल सामना करता है, अपितु उसे दूर करके आगे बढ़ जाता है। महा संग्राम में भी वही विजयी होता है, जो सामने आने वाले हर योद्धा का न केवल सामना करता है, अपितु उसे परास्त कर आगे निकल जाता है।

प्रश्न 4.
‘तिल-तिल मिटने’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर
‘तिल-तिल मिटने’ से कवि का अभिप्राय है-निरन्तर अपनी पूरी शक्ति के साथ जीवन-संघर्ष करते रहना चाहिए। ऐसा करते हुए किसी की दया और सहायता पर निर्भर न होकर अपने ऊपर ही निर्भर रहना चाहिए। इस तरह अपने आत्मबल के साथ जीवन की हर कठिनाई का हल करते रहना चाहिए।

प्रश्न 5.
‘वरदान माँगूगा नहीं’ पाठ से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर
श्री शिव मंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता वरदान माँगूगा नहीं। एक न केवल प्रेरणादायक कविता है, अपितु शिक्षाप्रद भी है। इस कविता के माध्यम से कवि ने हमें यह शिक्षा देने का प्रयास किया है कि स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीना चाहिए। चूँकि जीवन महायुद्ध के समान है इसलिए उसमें विजयी होने के लिए हममें आत्मनिर्भरता और आत्मबल पूरी तरह से होना चाहिए। किसी की दया-सहायता की अपेक्षा-आशा न करके अपने-आप पर पूरा भरोसा रखते हुए हरेक परिस्थिति का डटकर सामना करते रहना चाहिए।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए।

क. यह हार एक विराम है
जीवन महा संग्राम है ।
तिल-तिल मिलूंगा, पर दया की भीख मैं
लूँगा नहीं, वरदान माँगूंगा नहीं

ख. क्या हार में
क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत में
संघर्ष पद पर जो मिले
यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूंगा नहीं।
उत्तर
(क) यह जीवन महायुद्ध है, अर्थात् यह जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। इसमें हार जाना एक बड़ी रुकावट है। अर्थात संघर्ष करते हुए हिम्मत छोड़ देना बहुत बड़ी हानि है। इसलिए मैं इस जीवन रूपी महायुद्ध में भले ही एक-एक करके मिट जाऊँगा, लेकिन किसी के सामने अपना हाथ फैलाकर दया अर्थात् सहायता की कोई भीख नहीं माँगूंगा। यह मेरा दृढ़ सकंल्प है कि मैं किसी से कछ भी नहीं प्राप्त करने की भावना से यह जीवन का महायुद्ध लगा।

(ख) जीवन रूपी महायुद्ध में भाग लेना ही वह अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य समझता और मानता है। उसमें होने वाली हार या जीत को नहीं। दूसरे शब्दों में वह जीवन-रूपी महायुद्ध में होने वाली हार या जीत उसकी वीरता को प्रभावित नहीं कर सकती है। इस प्रकार वह जीवन रूपी महायुद्ध के और किसी परिणाम या प्रभाव से कुछ भयभीत नहीं है। वह तो उसे ही सब कुछ सही, अच्छा मानता और समझता
है जो उसे अपने संघर्ष के रास्ते पर बढ़ते हुए प्राप्त हो जाता है। इसलिए वह किसी पर निर्भर होकर अपने जीवन-पथ पर बढ़ना नहीं चाहता है, अपितु अपने आत्मबल से दृढ़ संकल्पों से आगे बढ़ना चाहता है।

वरदान मागूँगा नहीं भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
तिल-तिल कर मिटना अर्वत थोड़ा-थोड़ा करके नष्ट होना। यह एक मुहावरा है पाँच मुहावरे खोजें और वाक्य में प्रयोग करें।
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 15 वरदान मागूँगा नहीं img 1

प्रश्न 2.
संघर्ष-पथ तथा कर्त्तव्य-पच में योजक चिह (-) का प्रयोग हुआ है ऐसे अन्य शब्द भी लिखिये।
उत्तर
महा-संग्राम, तिल-तिल

प्रश्न 3.
तिल-तिल तथा स्मृति-सुखद में अनुप्रास अलंकार है, ऐसे अन्य शब्द भी खोजें।
उत्तर
महा-संग्राम, दया की भीख, तिल-तिल, संघर्ष-पथ और कर्तव्य-पथ ।

वरदान मागूँगा नहीं योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. सुमन जी अपने गीतों के लिए भी साहित्य जगत में चर्चित रहे हैं। पुस्तकालय की सहायता से उनके गीतों को संकलित करें।
प्रश्न 2. मध्यप्रदेश के ऐसे कवियों की सूची तैयार कीजिए जिन्होंने जीवन में स्वाभिमान एवं संघर्ष के साथ जीवन को जीने की प्रेरणा दी।
प्रश्न 3. डॉ. शिवमंगल सिंह सुमनजी के जीवन पर आधारित घटनाओं पर जानकारी एकत्रित कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

वरदान मागूँगा नहीं परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘हार’ को कवि ने विराम क्यों कहा है?
उत्तर
‘हार’ को कवि ने विराम कहा है। यह इसलिए कि हार से जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त करने में रुकावट और कठिनाई आ जाती है।

प्रश्न 2.
कवि क्या नहीं चाहता है?
उत्तर
कवि स्मृति-सुखद प्रहरों के लिए संसार की सम्पत्ति नहीं चाहता है।

प्रश्न 3.
‘यह भी सही, वह भी सही’ कहने से कवि का किस ओर संकेत है?
उत्तर
‘यह भी सही वह भी सही’ कहने से कवि का सुख-दुख की ओर संकेत है।

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प्रश्न 4.
कर्त्तव्य-पथ पर डटे रहने के लिए कवि को क्या-क्या स्वीकार है?
उत्तर
कर्त्तव्य-पथ पर डटे रहने के लिए कवि को किसी के द्वारा दिये जाने वाले कष्ट, अभिशाप और सब कुछ स्वीकार है।

प्रश्न 5.
कवि किस-किस पथ पर चलकर जीवन का महासंग्राम जीतना चाहता है?
उत्तर
कवि संघर्ष-पथ और कर्तव्य-पथ पर चलकर जीवन का महासंग्राम जीतना चाहता है।

वरदान मागूँगा नहीं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ कविता में किन-किन भावों को व्यक्त किया है?
उत्तर
कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने ‘वरदान माँगँगा नहीं’ कविता में अपने जीवन-संघर्ष पर चलने के लिए अनेक प्रकार के भावों को व्यक्त किया है। उनके द्वारा व्यक्त भाव उनके स्वाभिमान को प्रमाणित करते हैं। वे दृढ़ निश्चय, आत्मनिर्भर, आत्मबल, आत्मत्याग, व्यर्थ की बातों को भूलकर आत्मनिष्ठा, निश्चिन्त और अटूट विश्वास जैसे भावों को व्यक्त किए हैं।

प्रश्न 2.
कवि किससे थोड़ा भी भयभीत नहीं है और क्यों?
उत्तर
कवि जीवन के महासंग्राम में मिलने वाली हार से तनिक भी भयभीत नहीं है। इसके दो कारण हैं-पहला यह कि उसे यह अच्छी तरह ज्ञात है कि जीवन के महासंग्राम में भी और महासंग्रामों की तरह जीत मिल सकती है, तो हार भी। जब हार निश्चित नहीं है, तो फिर भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। दूसरा यह कि वह जीवन के महासंग्राम में अपनी भागीदारी अपना कर्तव्य समझकर करने जा रहा है। इससे वह अपने कर्तव्य-पथ पर बढ़ना ही अपना एकमात्र लक्ष्य समझ रहा है न कि उसके अच्छे-बुरे परिणामों को। इस दृष्टि से भी भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 3.
‘वरदान माँगूंगा नहीं’ कविता का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
वरदान मॉगूंगा नहीं कविता कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की एक प्रेरणादायक कविता है। इस कविता में कवि ने स्वाभिमान-पूर्वक जीवन जीने का संदेश दिया है। इसी के साथ ही कवि ने जीवन संग्राम का सामना करने की प्रेरणा दी है। इस विषय में किसी की दया पर निर्भर होने के स्थान पर अपने आत्मबल से जीवन-पथ पर बढ़ने के दृढ़ संकल्प को इस कविता में देने का सराहनीय प्रयास है। कवि का यह मानना है कि व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थिति में कठिनाइयों से विचलित हुए बिना जीवन-पथ पर चलते जाना चाहिए।

वरदान मागूँगा नहीं कवि-परिचय

प्रश्न
श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन परिचय-शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म 1916 में उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव जिले के झगरपुर गाँव में हुआ था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही सम्पन्न हुई। इसके पश्चात् आपने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में प्रवेश लिया और बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और बाद में यहीं से पी-एच.डी. और डी. लिट की उपाधि प्राप्त की। आपने ग्वालियर और होल्कर कॉलेज, इन्दौर में अध्यापन-कार्य भी किया। इसी बीच आपकी नियुक्ति नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक सहायक के रूप में हो गई। 1961 ई. में माधव कॉलेज, उज्जैन के प्राचार्य पद पर नियुक्त हुए तथा कुछ वर्षों बाद विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति का कार्यभार ग्रहण किया।

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साहित्यिक परिचय-समन जी ने छात्र जीवन से ही कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया था और छात्रों में लोकप्रियता प्राप्त की। वे मूल रूप से प्रगतिशील कवि हैं और वर्गहीन समाज की कामना करते हैं। पूँजीवाद के प्रति उनमें तीव्र आक्रोश और शोषित वर्ग के प्रति गम्भीर संवेदना है। उनकी कविताओं में एक ओर राष्ट्रीयता और नवजागरण के स्वर हैं तो दूसरी ओर इनके गीतों में प्रेम और प्रकृति की सरस व्यंजना है। इनकी छोटी कविताओं में और गीतों में अधिक व्यंग्यात्मकता, सरसता और चित्रात्मकता है और लम्बी कविताएँ वर्णनात्मक हैं।

रचनाएँ-हिल्लोल, जीवन के गान, प्रलय सृजन, मिट्टी की बारात, विंध्य हिमालय, पर आँखें नहीं भरी तथा विश्वास बढ़ता ही गया समन जी की प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं।

भाषा-सुमन जी की भाषा ओजपूर्ण, प्रवाहमयी और स्वाभाविक है। आपकी भाषा ने उनके काव्य को संगीतमय बनाया है। मुख्य रूप से उन्होंने गीत शैली को अपनाया है। प्रायः उनकी कविताएँ ध्वनि-माधुर्य से ओत-प्रोत हैं। सुमन जी ने कुछ छन्दमुक्त कविताओं की भी रचना की है।

वरदान मागूँगा नहीं कविता का सारांश

प्रश्न
श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ एक स्वाभिमानपूर्ण कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है
कवि का यह मानना है जीवन एक युद्ध है और इसमें हुई हार एक ठहराव है। इसलिए मैं यह संकल्प कर रहा हूँ कि मैं मिट-मिट कर भी किसी के सामने दया के लिए हाथ नहीं फैलाऊँगा और न लूँगा। चाहे मैं जीवन-युद्ध जीत जाऊँ, या हार जाऊँ, संघर्ष करते हुए तनिक भयभीत नहीं होऊँगा। इस दौरान मुझे जो कुछ भी मिलेगा, उसे सही मानकर स्वीकार कर लूँगा। मुझे कोई भले ही छोटा समझे, समझोता रहे, मैं अपने हदय की पीड़ा को यों ही नहीं त्यागूंगा! कोई महान बनने की बात करता है, तो करता रहे, मुझे उसकी कुछ भी परवाह नहीं। चाहे मुझे कोई कुछ भी समझे, मैं अपने कर्त्तव्य-पथ से कभी-पीछे नहीं हटूंगा। इस तरह मैं किसी की दया पर नहीं निर्भर रहूँगा।

वरदान मागूँगा नहीं संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

‘पद्यांश की सप्रंसग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

1. यह हार एक विराम है,
जीवन महा-संग्राम है,
तिल-तिल मिलूंगा, पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं,
वरदान माँगूंगा नहीं।

शब्दार्थ-विराम-रुकावट, ठहराव । महा-संग्राम-बहुत बड़ा युद्ध (संघर्ष)। तिल-तिल मिटूंगा-एक-एक कर समाप्त हो जाऊँगा। दया की भीख-सहायता, सहारा। वरदान

माँगूंगा नहीं-किसी की दया पर निर्भर नहीं रहूँगा।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती हिन्दी सामान्य’ में संकलित व श्री शिव मंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ से है। इसमें कवि ने अपनी दृढ़ता को बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या-यह जीवन महायुद्ध है, अर्थात् यह जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। इसमें हार जाना एक बड़ी रुकावट है। अर्थात संघर्ष करते हुए हिम्मत छोड़ देना बहुत बड़ी हानि है। इसलिए मैं इस जीवन रूपी महायुद्ध में भले ही एक-एक करके मिट जाऊँगा, लेकिन किसी के सामने अपना हाथ फैलाकर दया अर्थात् सहायता की कोई भीख नहीं माँगूंगा। यह मेरा दृढ़ सकंल्प है कि मैं किसी से कछ भी नहीं प्राप्त करने की भावना से यह जीवन का महायुद्ध लगा।

विशेष-

  1.  कवि का कथन दृढभावों से लबालब है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. जीवन को महासंग्राम के रूप में चित्रित करने के कारण इसमें रूपक अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य स्वरूप ओजपूर्ण है। भावों को काव्य के स्वरूपों में मुख्य रूप से रस, छन्द, अलंकार और प्रतीक से सँवारने का प्रयास किया गया है। इसमें रूपक अलंकार और मुक्त छन्द लाए गए हैं, जिन्हें वीर रस से प्रवाहित करने का आकर्षक प्रयास किया गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य ओजस्वी शब्दों से बनकर प्रस्तुत हुआ है। जीवन महायुद्ध में विजय श्री हासिल करने की आत्मनिर्भरता का दृढ़ संकल्प काबिलेतारीफ है। इससे यह पद्यांश भावों को प्रेरित करता हुआ हदयस्पर्शी बन गया है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
(ii) कवि किस प्रकार का जीवन जीना चाहता है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है आत्मनिर्भर होकर कठिनाइयों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए जीवन जीना चाहिए।
(ii) कवि स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीना चाहता है।

2. स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
यह जान लो में विश्व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं,
बरदान माँगूंगा नहीं।

शब्दार्थ-स्मृति-बीते हुए। सुखद-सुख देने वाले । प्रहरों-क्षणों, समय । विश्व-संसार। सम्पत्ति-सुख-सुविधा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने अपने जीवन महायुद्ध में विजय श्री प्राप्त करने से पहले दृढ़ संकल्प करते हुए कह रहा है कि

व्याख्या-यह सभी को अच्छी तरह से ज्ञात होना चाहिए कि जीवन एक महायुद्ध ही है। सभी वीर पुरुष इसमें अपने-अपने ढंग से भाग लेते हैं। मैं भी इसमें अपने ही ढंग से भाग लेने जा रहा हूँ। मेरा ढंग यह है कि मैं इसमें भाग लेने से पहले अपने बीती हुई सभी सुख-सुविधाओं को भूल जाऊँगा। यह भी कि मैं यह महायुद्ध किसी सुखद स्वरूप को मन में रखकर नहीं करूंगा। यह भी मैं स्पष्ट कर देना समुचित समझ रहा हूँ कि मैं संसार की कोई भी सुविधा नहीं चाहूँगा। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से होकर किसी की सहायता नहीं चाहूँगा। किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहूँगा, अपितु आत्मनिर्भर होकर ही मैं इस महायुद्ध में भाग लूँगा।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली सरल है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. वीर रस का संचार है।
  4. यह पद्यांश प्रेरक रूप में है।

1. पयांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i)उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य वीर रस से प्रवाहित अनुप्रास अलंकार (स्मृति सुखद) से मण्डित है। मुक्त छन्द से प्रस्तुत हुए भावों की स्वच्छन्दता सराहनीय है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य में दृढ़ता, स्पष्टता, सहजता, प्रवाहमयता और रोचकता जैसी असाधारण विशेषताएँ हैं। इससे इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य प्रभावशाली रूप में है, ऐसा निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘सुखद प्रहर’ से क्या तात्पर्य है?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में कवि का कौन-सा भाव व्यक्त हो रहा है?
उत्तर
(i) ‘सुखद प्रहर’ से तात्पर्य है-संघर्षों और कठिनाइयों का पलायन कर सुविधाओं को अपनाना।
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवि का निःस्वार्थ भाव व्यक्त हुआ है।

3. क्या हार में क्या जीत में,
किंचित नहीं भयभीत में,
संघर्ष-पथ पर जो मिले,
यह भी सही, वह भी सही,
वरदान माँगूगा नहीं।

शब्दार्थ-किंचित-कुछ। भयभीत-डरा हुआ। संघर्ष-पथ पर-कठिनाइयों का सामना करते हुए बढ़ते जाने पर।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने जीवन रूपी महायुद्ध में भाग लेने को ही मुख्य जीबनोद्देश्य मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-जीवन रूपी महायुद्ध में भाग लेना ही वह अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य समझता और मानता है। उसमें होने वाली हार या जीत को नहीं। दूसरे शब्दों में वह जीवन-रूपी महायुद्ध में होने वाली हार या जीत उसकी वीरता को प्रभावित नहीं कर सकती है। इस प्रकार वह जीवन रूपी महायुद्ध के और किसी परिणाम या प्रभाव से कुछ भयभीत नहीं है। वह तो उसे ही सब कुछ सही, अच्छा मानता और समझता
है जो उसे अपने संघर्ष के रास्ते पर बढ़ते हुए प्राप्त हो जाता है। इसलिए वह किसी पर निर्भर होकर अपने जीवन-पथ पर बढ़ना नहीं चाहता है, अपितु अपने आत्मबल से दृढ़ संकल्पों से आगे बढ़ना चाहता है।

विशेष-

  1.  तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. सम्पूर्ण कथन सुस्पष्ट है।
  4. संघर्ष-पथ में रूपक अलंकार है।
  5. वीर रस का प्रवाह है।

1. पयांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य अधिक उत्साहवर्द्धक है। इसके लिए किया गया वीर रस का प्रयोग आकर्षक रूप में है। भावात्मक शैली-विधान और मुक्तक छन्द के द्वारा बिम्बों और प्रतीकों की योजना इस पद्यांश को और सुन्दर बना रही है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना ओजस्वी और प्रभावशाली कही जा सकती है। जीवन-संघर्ष करने की दृढ़ आत्म-निर्भरता की भावाधारा देखते ही बनती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘किंचित भयभीत नहीं मैं’ का क्या तात्पर्य है?
(ii) कवि के संघर्ष-पथ की क्या विशेषता है?
उत्तर
(i) किंचित भयभीत नहीं ‘मैं’ का तात्पर्य है-कवि अपने संघर्ष के दौरान आने वाली कठिनाइयों के प्रभाव को बिल्कुल ही नहीं मानता है। वह उससे न तो शंकित है और न भयभीत ही।
(ii) कवि के संघर्ष-पथ की यह विशेषता है कि उस दौरान उसको हार मिले या जीत, सुख मिले या दुख वह इन सबको एक समान मानता है। वह इन सभी को गलत नहीं, अपितु ठीक ही मानता है।

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4. लपुता न अब मेरी छुओ,
तुम हो महान बने रहो,
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्व त्यागूंगा नहीं,
वरदान माँगूगा नहीं।

शब्दार्थ-लपुता-छोटापन। छुआ-स्पर्श करो। वेदना-पीड़ा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने स्वतन्त्र व आत्मनिर्भर होकर जीवन-संघर्ष करने का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हुए कहा है कि

व्याख्या-वह जीवन संघर्ष-पथ पर आगे बढ़ते हुए किसी की तनिक भी परवाह नहीं करेगा। अगर कोई उसकी कमियों और दोषों को उछालना चाहेगा तब भी वह उसकी ओर ध्यान नहीं देगा। अगर उससे कोई महान बनने की बात कहेगा तब भी वह उसकी ओर ध्यान नहीं देगा। उसकी वह यह कहकर उपेक्षा कर देगा कि वह महान है तो महान बना रहे। उसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वह तो अपने जीवन के संघर्ष-पथ पर बढ़ता चला जायेगा। उसके हृदय में दुख-पीड़ा भरी हुई है, उसे वह यों ही नहीं त्याग देगा। वह उन्हें किसी-न-किसी प्रकार सार्थक करके ही त्यागेगा। इस प्रकार वह अपने जीवन-संघर्ष पथ की कठिनाइयों से डरकर-घबड़ाकर किसी की कोई भी सहायता की अपेक्षा-आशा नहीं करेगा। वह तो आत्म-निर्भर होकर ही आगे बढ़ता चला जायेगा।

विशेष-

  1. भाषा ठोस है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. वीर रस का प्रवाह है।
  4. यह अंश प्रेरक रूप में है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य आकर्षक रूप में है। वीर रस के संचार-प्रवाह से मुक्तक छन्द की पुष्टि हुई है। इसके लिए आए हुए बिम्ब-प्रतीक की सहजता सराहनीय है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरल और सुस्पष्ट भावों का है। आत्म-संघर्षों के लिए प्रस्तुत की गई आत्म-निर्भरता की भाव-योजना न केवल आकर्षक है, अपितु प्रेरक भी है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पयांश का मुख्य भाव लिखिए।
(11) प्रस्तुत पयांश में कवि का कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का मुख्य भाव है-संघर्ष के पथ पर बिना किसी की परवाह करते हुए बढ़ते जाना।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि का आत्म-निर्भरता के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आत्मबल को लेकर बढ़ते जाने का भाव व्यक्त हुआ है।

5. चाहे हृदय का ताप दो,
चाहे मुझे अभिशाप दो,
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किन्तु भागूंगा नहीं,
वरदान माँगूंगा नहीं।

शब्दार्च-ताप-दुख। अभिशाप-श्राप, शाप।

प्रसंग-पूर्ववत्। इसमें कवि ने किसी प्रकार के दख-दर्द की परवाह किए बिना जीवन रूपी महायुद्ध में आत्मनिर्भर होने के दृढ़-संकल्प को व्यक्त किया है। इस विषय में कवि का कहना है कि.

व्याख्या-उसका यह दृढ़ संकल्प है कि उसे जीवन-पथ पर संघर्ष करते समय चाहे उसे कोई हृदय को चोट पहुँचाने वाला कष्ट दे अथवा उसे कोई शाप दे या उसे कोई और ही तरह का दुख पहुँचाये, वह तनिक भी अपने दृढ-संकल्प स्वरूप कर्तव्य-पथ से पीछे नहीं हटेगा, अपितु उस पर आगे ही बढ़ता जायेगा। इसके लिए वह अपनी आत्मनिर्भरता का परित्याग नहीं करेगा। वह अपने आत्मबल का एकमात्र आधार लेकर बढ़ता चला जायेगा। इस प्रकार किसी की दया-सहायता की तनिक भी आशा-इच्छा नहीं करेगा।

विशेष-

  1. भाषा ओजस्वी और प्रवाहमयी है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. कर्त्तव्य-पथ में रूपक अलंकार है।
  4. तुकान्त शब्दावली है।
  5. वीर रस का प्रवाह.है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य को लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौन्दर्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा-शैली भावानुसार है। वीर रस के संचार से तुकान्त शब्दावली को पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (चाहे-चाहे) और रूपक अलंकार (कर्त्तव्य-पथ) से चमकाने का प्रयास मन को छू लेता है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान गतिशील भावों से पुष्ट है। कुछ कर गुजरने के लिए स्वाभिमानपूर्वक किसी की परवाह न करने की भाव-योजना सचमुच में अद्भुत है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश का मुख्य भाव क्या है?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में कवि की कौन-सी विशेषता प्रकट हुई है? ।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-कठिन और विपरीत परिस्थिति में भी लक्ष्य-पथ पद दृढ़तापूर्वक बढ़ते जाना।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में कवि की दृढ़ता और आत्मनिर्भरता की विशेषता प्रकट

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