MP Board Class 9th Special Hindi निबन्ध-लेखन

1. ‘दीपावली’ अथवा ‘किसी त्यौहार का वर्णन’

प्रस्तावना-भारतीय त्यौहार समाज के लिए सामूहिक उत्सव हैं, इन त्यौहारों पर जनसामान्य अपनी आन्तरिक और बाह्य भावनाओं को अपनी किसी भी कार्य-शैली के माध्यम से प्रकट करता है। इसका कारण है कि मनुष्य इन उत्सवों के मनाने के लिए विविध आयोजनों की रूपरेखा तैयार करता है।

भारत में वर्ष के प्रत्येक महीने त्यौहार मनाये जाते दिखते हैं। अतः भारत में वर्ष के प्रत्येक दिन उत्सव व त्यौहार आदि का आयोजन होता ही रहता है। इस आधार पर भारत को त्यौहारों और पर्वो का देश कहा जाता है। दीपावली हिन्दुओं का सबसे प्रमुख त्यौहार है।

तैयारियाँ-दीपावली आने से 10-15 दिन पहले से ही इसकी तैयारी करना प्रारम्भ कर दी जाती है। घरों और दुकानों की सफाई की जाती है। उनमें चित्र टाँग दिए जाते हैं। इन चित्रों से वे सजे हुए अच्छे लगते हैं। चारों ओर चाहे शहर हो या गाँव अथवा छोटा शहर, सभी सजे हुए इस तरह प्रतीत होते हैं जैसे मानो वे लक्ष्मीजी के आने की प्रतीक्षा कर रहे हों। यह दीपावली त्यौहार शरद ऋतु के प्रारम्भ में आता है। उस समय न अधिक गर्मी होती है और न अधिक ठण्ड। मौसम सुहावना होता है। इस समय धीरे-धीरे शीतल और सुगन्ध युक्त हवा बहती रहती है। प्रकृति खुशनुमा होती है। पशु-पक्षी, लता-वृक्ष, स्त्री-पुरुष सभी आनन्दमय होते हैं। प्रकृति भी इस त्यौहार को मनाने के लिए तत्पर प्रतीत होती है।

दीपावली कैसे मनाई जाती है ?-दीपावली का पर्व हिन्दू कार्तिक महीने की अमावस्या को पड़ता है। वैसे यह त्यौहार कार्तिक महीने की कृष्णपक्षीय तेरस (धन तेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (दौज) तक लगातार पाँच दिन तक बड़ी धूमधाम और सज-धज के साथ मनाया जाता है। धन तेरस का दिन भगवान धन्वन्तरि का जन्मदिन माना जाता है। अतः वैद्य लोग इस दिन उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। लोग इस दिन बर्तनों की खरीददारी करना शुभ मानते हैं। अतः इस दिन बाजारों में बड़ी-बड़ी दुकानें बर्तनों से भरी हुई और सजावट की हुई आकर्षक लगती हैं। इसके दूसरे दिन चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) होती है। इसे छोटी दीपावली कहते हैं। लोग प्रातः तेल-मालिश कर नहाते हैं और समझा जाता है कि इस तरह के स्नान करने से उनके शारीरिक रोग व पाप दूर हो जाते हैं। सायंकाल घर की प्रमुख नाली के पास दीपक जलाया जाता है।

इसके बाद बड़ी दीपावली आती है। अमावस्या का दिन दीपावली का मुख्य दिन होता है। दिन में पकवान बनते हैं। घरों में प्रायः रसगुल्ले बनाने का रिवाज अधिक है। बच्चे नये स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। वे अति प्रसन्न दिखते हैं। विभिन्न पकवान और मिठाइयाँ खाकर वे चारों ओर धमा-चौकड़ी भरते नजर आते हैं। सर्वत्र खुशी का वातावरण होता है। रात्रि का आगमन होता है। निर्दिष्ट बेला में लक्ष्मी जी का पूजन होता है। घर, दुकान, कारखानों पर पूजा विद्वान पण्डित कराते हैं। उन्हें विविध उपहार व मिठाइयाँ दी जाती हैं। व्यापारी लोग अपने खाते और बहीखाते बदलते हैं। पूजा में प्रमुख रूप से ताजे फूल, रोली, चन्दन, धूपबत्ती व खील रखी जाती हैं। लोग व बालक पटाखे चलाते हैं। दीपक जलाये जाते हैं, चारों ओर उजाला होता है।

दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपदा (पड़वा) होती है। इस दिन गोवर्धन पूजा का उत्सव हुआ करता है। दूध, खील और पकवानों से गोवर्धन की पूजा की जाती है। गोबर का गोवर्धन बनाया जाता है। सायंकाल को घर के सभी सदस्य एकत्र होकर पूजा करते हैं। पाँचवें दिन भैया दौज होती है। बहन अपने भाइयों का टीका करती हैं। उन्हें मिठाई, वस्त्र आदि देती हैं और उनके स्वस्थ रहने तथा दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इस दौज को भाई-बहन (यम-द्वितीयां पर) यमुना में साथ-साथ स्नान करके दीर्घ आयु प्राप्त करने का वरदान पाते हैं।

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दीपावली का महत्त्व-दीपावली हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। इस पर्व पर सभी प्रतिष्ठानों आदि की मरम्मत आदि करा दी जाती है। सफाई की जाती है। रंगाई और पुताई से दुकान और घर सुन्दर लगते हैं। मक्खी-मच्छर मर जाते हैं। लोगों में विशेष उत्साह होता है। क्योंकि उनकी खरीफ की फसल पक जाती है और रबी की फसल बोये जाने की तैयारी की जाती है। लोग परस्पर मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं। सभी में सद्भाव और सहानुभूति की जागृति होती है।

उपसंहार-इस उत्सव पर लोग जुआ आदि खेलकर इसकी पवित्रता को दाग लगा देते हैं। इन गन्दी आदतों से मुक्ति पाने के लिए सभी समाज के लोगों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

2. भारत की राष्ट्रीय एकता

प्रस्तावना-वही राष्ट्र सुख, वैभव एवं प्रगति की मंजिल. को प्राप्त कर सकता है जहाँ समस्त नागरिक बन्धुत्व, स्नेह, सद्भावना तथा एकता के सूत्र में आबद्ध हो। यदि नागरिकों के मनमानस में एकता एवं अपनेपन की भावना नहीं होगी तो वह राष्ट्र पतन के गर्त में चला जाएगा।

राष्ट्र के अंग-राष्ट्र के तीन अंग होते हैं। प्रथम वहाँ के निवासी, द्वितीय संस्कृति, तृतीय सभ्यता। ये तीनों चीजें ही एक राष्ट्र का निर्माण करती हैं तथा उन्हें एकता के सूत्र में पिरोती हैं। सभ्यता यदि शरीर है तो राष्ट्र उसका प्राण है। इसीलिए राष्ट्ररूपी शरीर के लिए संस्कृतिरूपी प्राण को बनाए रखना अत्यावश्यक है।

एकता की अनिवार्यता-आज समस्त विश्व में आतंकवाद अपना सिर उठा रहा है। निरीह लोगों की हत्या करके ये आतंकवादी अपने कुत्सित एवं घृणित इरादों को भी अंजाम दे रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हुआ वह इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। अतः आज के युग में राष्ट्रीय एकता परमावश्यक है।

भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की एजेन्सियाँ लगातार हमला कर रही हैं। असंख्य क्षेत्रीय लोग मारे जा चुके हैं। वहाँ से पलायन कर चुके हैं। इससे भारतीय नागरिक भारतीय संघ से अलग होने की विचारधारा बना रहे हैं। हमारी फौज अवश्य इस दिशा में सही निर्णय लेती है। परन्तु राजनैतिक दबाव उसे उचित कार्यवाही नहीं करने देता।

स्वार्थ लोलप राजनीति-ये स्वार्थी राजनीतिज्ञ, राष्ट्र के समक्ष अवसर मिलते ही गम्भीर संकट खड़ा कर देते हैं। इन्हें नैतिकता तथा राजनीतिक स्तर का तनिक भी ध्यान नहीं रहता।

एकता के मार्ग में अवरोध-एकता के मार्ग में कुछ तत्व आज भी अवरोध बने हुए हैं। अंग्रेजों ने इस देश की धरती पर ऐसे विषैले बीजों को बो दिया है जो आज भी पनप रहे हैं। आज अनेक विघटनकारी शक्तियाँ हमारे देश का नाश करने पर तुली हुई हैं। अगर राष्ट्र के कर्णधार देश या राष्ट्र की एकता को स्थिर रखने का प्रयास करते हैं तो वे इसमें सफल नहीं हो पाते।

भारत की भूमि पर ही भारत के खिलाफ प्रपंच रचकर यहाँ की अखण्डता को खण्डित करना चाहते हैं। उल्फा संगठन, दक्षिण भारत तथा कश्मीर के आतंकी संगठन सभी देश को खण्डित करना चाहते हैं। भाषायी आधार भी उन्हें भड़काने का काम करता है।

सम्पूर्ण वर्गों का योगदान-राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को सुरक्षित रखने के लिए सभी वर्गों का योगदान अपेक्षित है।

विद्यार्थी, राजनीतिक, मजदूर, धर्म सुधारक एवं वैज्ञानिक सभी को किसी-न-किसी रूप में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में सहयोग देना चाहिए। सभी वर्गों में एक-दूसरे के धर्म के प्रति सम्मान होना चाहिए। आर्थिक स्वतन्त्रता भी परमावश्यक है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है “जब जेब में पैसा है तथा पेट में रोटी है, तो हर एक शबनम मोती है।”

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उपसंहार-आज साम्प्रदायिकता का जहरीला नाग मानवता को डसने के लिए अपना फन फैला रहा है, सबसे प्रथम उसका फन कुचलना होगा। देश के कर्णधारों को सत्ता लोलुप एवं स्वार्थ की भावना से ऊपर उठकर राष्ट्र का हित चिन्तन करना होगा तभी राष्ट्र में एकता के स्वर गुंजित होंगे तथा निम्न राग दोहराना होगा-“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।”

3. भारत की बढ़ती जनसंख्या

प्रस्तावना-विश्व के विभिन्न देश अपनी-अपनी समस्याओं से ग्रसित हैं। उसी तरह भारतीय गणराज्य भी सबसे . अधिक समस्याओं से घिरा हुआ राष्ट्र है। जिनमें सर्वोपरि है-भारत की बढ़ती जनसंख्या। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ ही अन्य अनेक समस्याएँ स्वतः ही उत्पन्न होती रहती हैं जिससे देश की तरक्की के विषय में जारी की गई योजनाएँ, प्रभावित हो जाती हैं। भारत में जनसंख्या की वृद्धि एक गम्भीर समस्या है, लेकिन इसे लेकर यहाँ के नागरिक उसके प्रति बिल्कुल भी गम्भीर नहीं हैं।

जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ-जनसंख्या वृद्धि एक ऐसी समस्या है, जो अन्य अनेक समस्याओं को जन्म देती है। उन समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या है-बढ़ते लोगों को रोटी देने की, उनके लिए वस्त्र आदि की व्यवस्था करने की तथा उन्हें आवास प्रदान करने की। इनकी समस्याओं के साथ ही, उनको उचित शिक्षा देने, उन्हें रोजगार देने, उन लोगों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के सुलझाने की स्वच्छ पानी देने, स्वच्छ वातावरण प्रदान करने सम्बन्धी विभिन्न समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।

अभाव की स्थिति-देश ने आजादी प्राप्त की। इसके साथ ही विकास योजनाएँ प्रारम्भ हुईं। कृषि, उद्योग एवं व्यवसाय के क्षेत्र में विकास की दिशा पकड़ी गई। लगभग सभी क्षेत्रों में विकास तीव्र गति से बढ़ने लगा। खेतों, कारखानों में उत्पादन शुरू हुआ। नई तकनीक अपनाई गई। कृषि आधारित उद्योग पनपने लगे। विकास तो अपनी तीव्र गति से होने लगा परन्तु बढ़ती जनसंख्या ने उसकी गति को बहुत ही प्रभावित कर दिया।

विकास के कार्यों के लिए राष्ट्र हित में कर्ज लिया जाने लगा। देश जिस गति से आगे बढ़ता, उतनी गति विकास के क्षेत्र में नहीं पकड़ सका। इस जनसंख्या वृद्धि ने सभी क्षेत्र के विकास सम्बन्धी कार्यों को ठप्प कर दिया।

जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव-जनसंख्या की बढ़ोत्तरी ने अपना प्रभाव सभी क्षेत्रों में दिखाया। शिक्षा का क्षेत्र भी प्रभावित हुआ, यातायात व्यवस्था-रेल परिवहन, सड़क परिवहन आदि का विकास रुक गया। भोजन, पानी, आवास व वस्त्र आदि की समस्या से ग्रसित भारतीय समाज फिर से अभावग्रस्त होने लगा। परन्तु भारतीय सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, कल-कारखानों और व्यवसाय के क्षेत्र में तीव्र विकास करना शुरू किया। बढ़ती जनसंख्या को रोजगार देने की दिशा में प्रभावकारी कदम उठाया। परन्तु इन सभी समस्याओं के समाधान के साथ-ही-साथ अन्य अनेक समस्याओं, जैसे-भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य समस्याओं और प्रदूषण समस्याओं ने देश को बुरी तरह जकड़ा हुआ है। साथ ही बेरोजगार लोगों की फौज प्रतिवर्ष बढ़ जाती है। उस दिशा में तो विकास दर गिरती लग रही है। इस तरह इस जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने अनेक ऐसी समस्याओं को जन्म दे दिया है जिनका समाधान शायद निकट भविष्य में होता दिखाई नहीं पड़ता।

जनसंख्या वृद्धि की समस्या का समाधान-राष्ट्रीय समस्या बनी जनसंख्या वृद्धि एक विकराल रूप धारण करती जा रही है। इसके हल के लिए किए गए उपाय भी कम और प्रभावहीन होते नजर आ रहे हैं। लोगों में इस समस्या के निराकरण के लिए जागृति की जा रही है। उन्हें बताया जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण करें। नियोजित परिवार ही सुखी हो सकता है। तरक्की कर सकता है, समृद्धि प्राप्त कर सकता है। सरकार की ओर से और व्यक्तिगत रूप से विविध संस्थानों द्वारा लोगों को इस समस्या के समाधान के उपाय बताए गए हैं। लोगों को उत्साहित किया जा रहा है कि वे शिक्षित बनें, अपनी सन्तान को, बालिकाओं और बालकों को शिक्षा ग्रहण करायें जिससे वे राष्ट्र हित की सोच सकें तथा स्वयं को राष्ट्र कल्याण के मार्ग से जोड़कर कार्य करें।

उपसंहार-देशवासियों को राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए निरन्तर कार्य करना चाहिए। उन्हें जन-जागृति पैदा करके अपने कर्त्तव्य का और उत्तरदायित्व का पालन करना चाहिए।

4. विज्ञान के चमत्कार

प्रस्तावना-आज विज्ञान का युग है। विज्ञान ने विश्व में सभी क्षेत्रों में अपनी विजय पताका फहरा रखी है। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज के युग को यदि हम वैज्ञानिक युग का नाम दे दें। प्राचीन और आधुनिक काल में पूर्णतः विपरीतता आ गयी है। रहन-सहन, वस्त्र पहनावा, यातायात तथा जीवन प्रणाली पूर्णतः परिवर्तित हो गई है। उसमें नवीनता का समावेश हो चुका है। आज की दुनियाँ प्रतिक्षण बदलती दिखती है। परिवर्तन ही विकास है।

आवागमन के साधन-आज आवागमन के साधन भी विज्ञान की कृपा से सर्वसुलभ हो गये हैं। रेल, मोटर, साइकिल, स्कूटर, जलयान तथा वायुयान इस क्षेत्र में अभूतपूर्व चुनौती दे रहे हैं। राष्ट्रीय पर्यों एवं शोक के अवसर पर समस्त राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्षों का एक मंच पर उपस्थित होना इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है।

बिजली वरदान स्वरूप-बिजली प्रतिपल एक दासी की भाँति सेवा में जुटी रहती है। कारखाने, रेडियो, टेलीविजन बिजली की सहायता से चलते हैं। बिजली से चलने वाले पंखे दुपहरी में निरन्तर चलकर मानव को परम शान्ति प्रदान कर रहे हैं।

कृषि में योगदान-कृषि के लिए नये यन्त्र विज्ञान ने आविष्कृत किये हैं। विज्ञान द्वारा उपलब्ध रासायनिक खाद्य उत्पादन क्षमता में एवं रासायनिक दवाइयाँ फसल को नष्ट होने से रोक रही हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान-एक्स-रे शरीर का आन्तरिक फोटो लेकर अनेक बीमारियों का पता लगा रहा है। कैंसर तथा एड्स जैसे रोगों पर निरन्तर शोध जारी है। परमाणु शक्ति भी विज्ञान की ही देन है।

श्रम की बचत-विज्ञान के द्वारा आविष्कृत मशीनों के माध्यम से पूरे दिन का कार्य मनुष्य कुछ ही घंटों में समाप्त कर लेता है। बचे हुए समय को मनुष्य मनोरंजन या स्वाध्याय में व्यतीत करता है।

अन्तरिक्ष के क्षेत्र में योगदान-अन्तरिक्ष के क्षेत्र में भी आज मनु पुत्र अपने कदम बढ़ा चुका है। जो चन्दा मामा कभी बालकों के लिए अगम बना हुआ था, आज वैज्ञानिक उसके तल पर पहुँचने में सक्षम हुए हैं।

विज्ञान से हानि-हर अच्छाई के पीछे बुराई छिपी है। जहाँ विज्ञान ने मनुष्य को अनेक सुख-सुविधाएँ प्रदत्त की हैं, वहाँ अशान्ति तथा दुःख का भी सृजन किया है।

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अगर हम सावधानीपूर्वक विचार करें तो विदित होता है कि इसमें विज्ञान का इतना दोष नहीं है जितनी कि मानव की कुत्सित प्रवृत्तियाँ दोषी हैं।

उपसंहार-विज्ञान स्वयं में अच्छा-बुरा नहीं है। यह मानव के प्रयोग पर निर्भर है। आज विज्ञान के गलत प्रयोग के फलस्वरूप ही दुनिया में विनाशकारी दृश्य नजर आ रहा है। अतः आज हमें विज्ञान को मानव के कल्याण के निमित्त प्रयोग करके सुख एवं समृद्धि का साधन बनाना है। इसी में सबका हित सन्निहित है।

5. भ्रष्टाचार-समस्या और समाधान

प्रस्तावना-भ्रष्टाचार का शब्दिक अर्थ होता है-आचरण (व्यवहार या चरित्र) से गिरा हुआ। इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति नैतिक रूप से पतित व्यवहार करता है वह अनैतिक और भ्रष्ट आचरण वाला हुआ करता है। जब कोई व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था में न्याय के पक्ष से गिरकर समाज के मान्य नियमों का पालन न करते हुए अपने गलत निर्णय लेता है और व्यवहार में गिरा हुआ हो जाता है, तो वह भ्रष्टाचारी कहा जाता है। वह इस तरह के व्यवहार को अपनी स्वार्थपरता के कारण किया करता है। अनुचित रूप से स्वयं लाभ प्राप्त करता है।

आचरण भी भ्रष्टता, रिश्वत लेकर, कालाबाजारी करके, भाई-भतीजावाद फैलाकर जातीय आधार पर उल्लू सीधा करना, किसी वस्तु पर जान-बूझकर अधिक लाभ कमाने की दृष्टि से मूल्य वृद्धि कर देना, रुपये-पैसे लेकर कार्य करना, अपने तुच्छ लाभ के लिए दूसरों को बड़ी हानि पहुँचा देना आदि सभी आचरण भ्रष्ट (पतित) कहे जाते हैं।

आजकल देश व सम्पूर्ण समाज भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ चुका है। भारतीय संस्कृति, राजनीति, समाज, धर्म, व्यापार, उद्योग, कला एवं शासन-प्रशासन पूर्णतः भ्रष्ट हो चुका है। इस भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना तो असम्भव ही लगता है।

भ्रष्टाचार के कारण-

  1. किसी क्षेत्र में अभाव के कारण उत्पन्न असन्तोष किसी को व्यावहारिक रूप से भ्रष्ट और पतित बना देता है। अपनी इस विवशता के कारण वह भ्रष्टाचारी हो जाता है।
  2. स्वार्थ के वशीभूत होकर सम्मान प्राप्त न होने से आर्थिक, सामाजिक पद-प्रतिष्ठा में कमी के कारण भ्रष्टाचार पनपने लगता है।
  3. भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण भाई-भतीजावाद, जाति-वर्ग एवं साम्प्रदायिकता, भाषावाद आदि के कारण उचित न्याय नहीं कर पाते और भ्रष्ट बन जाते हैं।

भ्रष्टाचार से प्रभावित क्षेत्र-भ्रष्टाचार का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। जीवन का प्रत्येक भाग भ्रष्टाचार से प्रभावित है। किसी भी क्षेत्र का विधायक या सांसद हो, वह अपने निजी जीवन में किसी भी तरह प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक रूप से भ्रष्ट पाया जाता है, तो यह उसकी महान् गलती है। हमारे ऊपर बैठी ईश्वरीय सत्ता के प्रति विश्वास और श्रद्धा समाप्त हो जाती है। इस भ्रष्टाचार ने सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों को इतना प्रदूषित कर दिया है कि वहाँ साँस लेना भी दूभर हो गया है।

भ्रष्टाचार के दुष्परिणाम-भ्रष्टाचार के दुष्परिणाम यह हुए हैं कि ईमानदारी और सत्यता पूर्णतः विलुप्त हो चुकी है। बेईमानी और कपट का प्रसार होता जा रहा है। भ्रष्टाचार को मिटाना बड़ी चुनौती हो चुकी है। नकली माल बेचना, खरीदना, वस्तुओं में मिलावट करना, धर्म के नाम पर अधर्म का आचरण करना, रिश्वतखोर अपराधी को रिश्वत के ही बल पर छुड़ा लेना, कालाबाजारी करना आदि भ्रष्टाचार के ही दुष्परिणाम हैं। – भ्रष्टाचार को रोकने के उपाय-भ्रष्टाचार संक्रामक रोग की तरह सब ओर फैलता जा रहा है। अतः समाज में व्याप्त इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार की दशा ऐसी है कि भ्रष्ट व्यक्ति रिश्वत देकर (भ्रष्टाचार के द्वारा) ही मुक्त हो जाता है। उसे राजदण्ड का कोई भय नहीं है। उसके जीवन में शिष्ट आचरण की महत्ता बिल्कुल भी नहीं है। भ्रष्टाचारी को कठोर दण्ड से ही सुधारा जा सकता है। कितने ही ऊँचे प्रतिष्ठित पद पर आसीन भ्रष्ट व्यक्ति को कठोरतम दण्ड देकर ही दण्डित किया जाय। भ्रष्टाचारी को दण्डित किये बिना स्थिति में सुधार नहीं आ सकता। भ्रष्टाचारी को किसी भी सामाजिक उत्सव में उपेक्षित किया जाना बहुत ही आवश्यक है।

उपसंहार-भ्रष्टाचारी लोग समाज और राष्ट्र को बहुत बड़ी हानि पहुँचा रहे हैं हमारे राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लग चुका है। इसे मिटाने की दिशा में राजनैतिक लोगों और समाज के प्रबुद्ध लोगों को आगे आना होगा और स्वयं को सर्वप्रथम न्यायवादी और शिष्टाचारी सिद्ध करना होगा।

6. वृक्षारोपण

प्रस्तावना-भारत प्रकृति का पालना है। यहाँ की धरती पर चहुँओर हरियाली दृष्टिगोचर होती है। कहीं-कहीं वनों में मयूर नृत्य करते हुए नजर आते हैं तो कहीं कोयल की मधुर कूक सुनायी देती है। यह हरियाली, सुषमा वृक्षों के कारण अस्तित्व में है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही वृक्षों को अति महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वृक्षों की छाया में बैठकर ही ऋषि-मुनियों ने ज्ञान को अर्जित किया था। प्राणिमात्र के पालन-पोषण के उपयोगी तत्वों के स्रोत वन ही थे। अतः इनके आरोपण और संरक्षण की अति आवश्यकता है।

वृक्षों पर कुठाराघात-आज का मानव पूरी तरह भौतिकवादी बन गया है। लोभ के वशीभूत होकर उद्योगों के नाम पर विशाल पैमाने पर वृक्षों का विनाश कर रहा है। वृक्षों को पूर्ण वयस्क होने में वर्षों लग जाते हैं लेकिन उन्हें कटने में कुछ ही समय लगता है। प्रकृति से दूर होने के कारण आज मनुपुत्र अनेक रोगों का शिकार हो रहा है।

वृक्षों की उपयोगिता-वृक्ष मानव के लिए बहुत ही उपयोगी हैं। वनों से जीवनदायिनी औषधि प्राप्त होती है। भवनों . को बनाने के लिए दियासलाई तथा कागज बनाने में भी वनों की लकड़ी आवश्यक है। इन वृक्षों से फल-फूल, वनस्पति, औषधि, जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं। धरती पर प्राण वायु संचरित होती है। वनों से पहाड़ों का कटाव रुकता है। नदियों को उचित बहाव मिलता है। इमारती लकड़ी, आश्रय आदि सभी मिलते हैं।

वृक्ष विषाक्त गैस कार्बन डाइ-ऑक्साइड का शोषण करके मानव को बीमारियों से बचाते हैं। नदियों के किनारे लगे वृक्ष . भूमि के कटाव को रोकते हैं। वृक्ष लगाना एक तरह से परोपकार की कोटि में आता है। ये हमें प्राण वायु देते हैं।

सरकार का प्रयास-हमारी राष्ट्रीय सरकार ने आज वनों की सुरक्षा तथा वृक्षों को बढ़ाने का संकल्प लिया है। प्रत्येक वर्ष वन महोत्सव सप्ताह सम्पन्न किया जाता है। यदि कोई स्वार्थी व्यक्ति इन वृक्षों को काटता है तो कानून की दृष्टि से वह अपराध का भागी होता है।

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उपसंहार-हम सबको वृक्षों के पल्लवन एवं विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देना चाहिए। वृक्ष लगाने के लिए लोगों के मनमानस में नयी उमंग जगानी चाहिए। वृक्षों के विकास में ही राष्ट्र की प्रगति सन्निहित है।

7. विद्यार्थी जीवन

प्रस्तावना-जीवन में प्रतिपल ही सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है। विद्यार्जन के लिए उम्र का बन्धन बाधा नहीं पहुँचाता है। परन्तु विद्यार्थी जीवन वह काल है जिसमें विद्यार्थी विद्यालय में रहकर विद्यार्जन करता है। इस विद्यार्जन की प्रक्रिया में एक क्रम होता है। जितनी अवधि तक विद्यार्थी विद्यार्जन करता है, उसका वह जीवन विद्यार्थी जीवन कहलाता है।

विद्यार्थी जीवन का महत्त्व-विद्यार्थी जीवन जिन्दगी का स्वर्णिम काल होता है। इसी जीवन में विद्यार्थी अपने भविष्य के जीवन की आधारशिला रखता है। यहीं से सुन्दर और दृढ़ जीवन की पड़ी आधारशिला (नीव) पर उस विद्यार्थी के भविष्य का भवन खड़ा हो पाता है जो बहुत ही आकर्षक होगा।

विद्यार्थी जीवन में ही एक छात्र अपने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक गुणों को विकास की एक दिशा प्रदान करता है। इन गुणों के विकसित होने पर ही वह विद्यार्थी एक ठोस व्यक्तित्व का धनी होता है।

विद्यार्थी के लक्षण-विद्यार्थी का जीवन किसी तपस्वी के जीवन से कम कठोर नहीं होता। माँ सरस्वती की कृपा प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। विद्या कभी भी आराम से, सुख से प्राप्त नहीं हो सकती। जीवन में संयम और नियमों के अनुसार चलना पड़ता है। विद्यार्थी के पाँच लक्षणों को निम्न प्रकार बताया गया है..

“काकचेष्टा, बकोध्यानम्, श्वाननिद्रातथैवच।
गृहत्यागी, अल्पाहारी, विद्यार्थी पंच लक्षणम्॥

उपर्युक्त पद्यांश में बताए गए लक्षणों वाला विद्यार्थी अपने जीवन में सदैव सफल होता है। यह जीवन साधना और सदाचार का है।

आधुनिक विद्यार्थी जीवन-आज हमारे देश की समाज व्यवस्था लड़खड़ा रही है। विद्यार्थी ने अपने जीवन की गरिमा को भुला दिया है। विद्यार्थी के लिए स्कूल मौज-मस्ती का स्थल रह गया है। वह अब विद्यादेवी की आराधना का मन्दिर नहीं . रह गया है। वह तो उसके लिए मनोरंजन तथा समय काटने का स्थल भर रह गया है। विद्यार्थी में उद्दण्डता और असत्यता घर बनाए बैठी है। परिश्रम करने से अब वह पीछे हट रहा है। उसका लक्ष्य प्राप्त करना, केवल धोखा और चालपट्टी रह गया है। वह अनुशासनहीन होकर ही अपना कल्याण करना चाहता है। उसने विनय, सदाचार और संयम को पूर्णतः भुला दिया है। विद्यार्थी ने स्वयं को कलंकित बना लिया है। . अनुशासनहीनता को दूर किया जा सकता हैअनुशासनहीनता को दूर करने के लिए विद्यार्थी को अपने अंग्रेजों के अनुशासित जीवन से सीख प्राप्त करें। विद्यालयों के वातावरण को सही कर देना चाहिए। अध्यापकों को विशेष रूप से विद्यार्थियों की प्रत्येक प्रक्रिया पर सख्त नजर रखनी होगी। उनके प्रति अपने आचरण का भी प्रभाव छोड़ना पड़ेगा।

उपसंहार–आज के विद्यार्थी कल के राष्ट्र के कर्णधार हैं। अतः इन्हें अपने अन्दर ऊँचे वैज्ञानिक के, ऊँचे विचारक के, ऊँचे चिन्तनकर्ता के महान गणों को अपने में विकसित करते हुए अपने अभिलाषित लक्ष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए। ज्ञान पिपासा, श्रम, विनय, संयम, आज्ञाकारिता, सेवा, सहयोग, सह-अस्तित्व के गुणों को अपने अन्दर विकसित कर लेना चाहिए। एक आदर्श नागरिक बन कर विद्यार्थी राष्ट्र की सेवा करते हुए राष्ट्र धर्म का पालन कर सकने में समर्थ होते हैं।

8. अनुशासन का महत्त्व
अथवा
विद्यार्थी और अनुशासन

प्रस्तावना-विद्यार्थी किसी राष्ट्र विशेष का अक्षय कोष होते हैं। जो आज का विद्यार्थी है वह कल देश के भविष्य का कर्णधार बन सकता है। देश की प्रगति उन्ही के कन्धों पर अवलम्बित है। विद्यार्थी जीवन में बालक में अच्छे भाव, विचार, संस्कार एवं मानवीय भावनाएँ पल्लवित एवं विकसित होती हैं। विद्यार्थी जीवन में अर्जित ज्ञान जीवन पथ का सम्बल बनता है।

अनुशासन का महत्त्व-अनुशासन के नियमों का बीजारोपण बाल्यकाल से होना चाहिए क्योंकि विद्यार्थी जीवन में जो संस्कार पड़ जाते हैं, वे स्थायी होते हैं। प्रकृति भी अनुशासन में बँधकर संचालित हो रही है। जिस भाँति रात-दिने तथा ऋतु परिवर्तित होती रहती हैं, उसी प्रकार नियमबद्ध जीवन में भी परिवर्तन का चक्र निरन्तर रहता है। _ अनुशासन की जड़ें-शिक्षा संस्कारयुक्त होनी चाहिए। अनुशासन स्वेच्छा से होना चाहिए, यह हमें संयमी बनाता है। छात्रों के लिए अनुशासन वायु तथा जल की भाँति आवश्यक है। छात्र जीवन जितना सदाचार, अनुशासित तथा सुन्दर होगा उतना ही शेष जीवन भी सुखी तथा सम्पन्न होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

विद्यार्थी से आशाएँ-आज का विद्यार्थी ही कल देश का कर्णधार बनेगा। वही राष्ट्र का भाग्य विधाता बनेगा। आज भारत माता की लौह-श्रृंखलाएँ छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं, अत: छात्रों को जागरूक होकर अनुशासित होकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए।

छात्रों में अनुशासनहीनता तथा उसका निवारण-छात्रों द्वारा निरन्तर तोड़-फोड़, हड़तालें तथा सरकारी सम्पत्ति के विनाश के समाचार हर रोज समाचार-पत्रों में आते रहते हैं। परिवार का वातावरण भी पूर्णतः अनुशासित नहीं है। विद्यालय आज घिनौनी राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं। इस समस्या से निपटने के लिए विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा गोष्ठियों का आयोजन होना चाहिए। छात्रों के समक्ष उनके भविष्य निर्माण के लिए भी एक सुनियोजित योजना का प्रारूप होना चाहिए जिससे वे चिन्तारहित होकर जीवनयापन कर सकें।

अनुशासन की जरूरत-अनुशासन से ‘छात्रों में अपने उत्तरदायित्व को निभाने का गुण स्वयं उभर कर आता है। अपनी उन्नति के लिए अनुशासन और आज्ञापालन नितान्त आवश्यक है। अनुशासन से योग्य नागरिक बनकर देश की अच्छी तरह सेवा कर सकते हैं। अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह भी उचित रूप से करते हैं। ऐसे विद्यार्थी कर्त्तव्यपरायण होकर राष्ट्र रूपी भवन की गहरी नींव डालते हैं। अनुशासनं से स्वर्ग धरती पर उतर सकता है।

उपसंहार-जीवन को सुखमय एवं प्रगतिशील बनाने का – साधन अनुशासनमय जीवन ठहराया गया है। अनुशासित इन्सान ही उत्तरदायित्व का सफल निर्वाह कर सकता है, जो मानव अनुशासन को अपने जीवन का अंग बना लेते हैं, वे स्वयं तो सुखी रहते ही हैं, समाज को भी सुखमय एवं शान्तमय बनाते हैं। उद्देश्य भी उन्हें आसानी से प्राप्त हो जाता है। अतः क्या ही अच्छा हो कि हम अनुशासन का पालन करके राष्ट्र के गौरव में चार चाँद लगा सकें।

9. खेलों का महत्त्व

प्रस्तावना-जीवन में वही मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन कर सकता है, जो स्वस्थ एवं सबल हो। किसी विद्वान ने उचित ही कहा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। शरीर को स्वस्थ एवं निरोग बनाने के लिए सम्यक् खान-पान के साथ ही नियमित रूप से व्यायाम करना भी परमावश्यक है। खेलों के माध्यम से शरीर स्वस्थ रहता है। साथ-साथ भरपूर मनोरंजन भी होता है।

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मन मस्तिष्क एवं खेल-मानव के मन तथा मस्तिष्क से खेल का घनिष्ठ सम्बन्ध है। खिलाड़ी अपनी रुचि के अनुसार खेल का चयन करता है।

आज का जीवन संघर्षमय है। मनुष्य दिनभर रोजी-रोटी की समस्या को हल करने में लगा रहता है। दिनभर की मानसिक थकान को मिटाने के लिए मानव खेल के मैदान में उतरता है। इससे उसे असीम उल्लास एवं ताजगी का अनुभव होता है। – खेलों के प्रकार-प्रमुख रूप से दो प्रकार के खेल खेलने का प्रचलन है। एक वे जो घर के अन्दर खेले जाते हैं। दूसरे प्रकार के खेल मैदानों में खेले जाते हैं। घर के अन्दर खेलने वाले खेल लूडो, टेनिस, शतरंज, कैरम आदि हैं। मैदानों में खेले जाने वाले खेलों के अन्तर्गत हॉकी, क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी तथा बास्केटबॉल इत्यादि हैं।

खेलों का महत्त्व-खेल मनोरंजन का सबसे उत्तम साधन है। इससे मानव की थकान दूर होती है। समय का सदुपयोग होता है। सामाजिक भावना का भी खेल के मैदान में पल्लवन होता है। इससे जीवन में निखार तथा प्रेम का अभ्युदय होता है।

खेल हमें अनुशासन एवं समय का पाठ पढ़ाते हैं। जीवन में संघर्षों से जूझने की शक्ति आती है। साहस, धीरता, गम्भीरता तथा उदारता के भाव भी जाग्रत होते हैं।

उपसंहार-भली प्रकार चिन्तन एवं मनन करने से यह तथ्य उजागर होता है कि खेलों का जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। खेल यथार्थ में शिक्षा एवं जीवन का एक भाग है। खेलों से खेल भावना के साथ ही भाईचारे की भावना का भी विकास होता है। श्रम के प्रति निष्ठा खेलों से उत्पन्न होती है। हार को प्रसन्नतापूर्वक सहन करने की क्षमता का विकास होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमें राजनैतिक दाँव-पेंच में न उलझकर खेलों को प्रोत्साहन देना चाहिए। छात्रों में खेल के मैदान में खेल की भावना विकसित होती है। उसके सहारे प्रगति की मंजिल पर निरन्तर अग्रसर होते जाते हैं।

10. पुस्तकालय के लाभ

प्रस्तावना-मनुष्य के मनमानस में जिज्ञासा की भावना प्रतिपल जाग्रत होती रहती है। उसकी यह आकांक्षा रहती है कि सीमित समय में अधिक-से-अधिक जानकारी हासिल कर सके। लेकिन प्रत्येक मनुष्य की अपनी सीमाएँ होती हैं। प्रायः प्रत्येक मनुष्य में इतनी क्षमता नहीं होती कि मनवांछित पुस्तकें क्रय करके उनका अध्ययन कर सके। पुस्तकालय मानव की इसी इच्छा की पूर्ति करता है।

पुस्तकालय का अर्थ-पुस्तकालय का अर्थ है-‘पुस्तकों का घर’, जिस जगह अनेक प्रकार की पुस्तकों को संग्रह होता है, उसे पुस्तकालय कहा जाता है। पुस्तकालयों में मानव मन में उमड़ती-घुमड़ती शंकाओं का निराकरण करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। – पुस्तकालयों के प्रकार-जिन्हें पुस्तकों से लगाव होता है वे अपने घर में निजी पुस्तकालय बना लेते हैं। विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में भी पुस्तकालय होते हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय भी होते हैं जिनमें अधिक-से-अधिक लोग ज्ञान अर्जन कर सकते हैं। सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाएँ ऐसे पुस्तकालयों का संचालन करती हैं। आज पुस्तकों की माँग के फलस्वरूप चलते-फिरते पुस्तकालय भी अवलोकनीय इसके अतिरिक्त वाचनालयों में दैनिक, साप्ताहिक-मासिक पत्रिकाएँ भी सुगमता से पढ़ने को उपलब्ध हो जाती हैं।

पुस्तकालयों से लाभ-पुस्तकालय ज्ञान-विज्ञान, साहित्य एवं संस्कृति का अक्षय कोष होते हैं। प्राचीन ग्रन्थ भी यहाँ उपलब्ध होते हैं। आविष्कार करने वाले यहाँ हर विषय की जिज्ञासा शान्त करते हैं।

पुस्तकालयों में पाठक विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन करके मनोरंजन के साथ-साथ अपने ज्ञान का विकास भी करता है। पुस्तकालय के अमूल्य ग्रन्थों से हमें धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों की प्रेरणा मिलती है।

विख्यात पुस्तकालय-पुस्तकालय प्रत्येक समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होते हैं। नालन्दा तथा तक्षशिला में भारत के गौरव पुस्तकालय थे। आज भी कोलकाता, दिल्ली, वाराणसी तथा पटना में बहुत से प्रसिद्ध पुस्तकालय हैं।

उपसंहार-पुस्तकालय ज्ञान का ऐसा पवित्र एवं स्वच्छ सरोवर हैं जिसमें स्नान करके मन एवं मस्तिष्क को एक नयी ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम पुस्तकालयों का क्षमता के अनुसार प्रयोग करने का अधिक-से-अधिक प्रयत्न करें। पुस्तकालय के अपने कुछ निर्धारित नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मानव का दायित्व है। आज हमें देश की धरती पर एक ऐसे पुस्तकालय की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला एवं संगीत सभी विषयों की पुस्तकें आसानी से उपलब्ध हो सकें। उन्नत पुस्तकालय देश के भावी कर्णधारों के लिए एक अमूल्य धरोहर है जो उनके जीवन के लिए प्रगति का एक सबल माध्यम है।

11. कम्प्यूटर

प्रस्तावना-विज्ञान ने आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपना जबरदस्त प्रभाव छोड़ा है। उसकी सहायता से मनुष्य ने जीवन में काम आने वाली अनेक उपयोगी वस्तुओं और मशीनों का आविष्कार किया है। इन मशीनों ने मनुष्य की व्यस्तता प्रधान जीवन-शैली को सुखकर बनाया है। सुविधाएँ दे दी गई हैं। कम्प्यूटर की सहायता से मनुष्य ने अपने लिए श्रम, समय और शक्ति की बचत कर डाली है। मानव अपनी बची हुई शक्ति, श्रम . और समय को अन्य किसी काम में लगाकर अपने लिए उपयोगी बना लेता है और उसका सीधा लाभ प्राप्त करता है। .. .

विज्ञान की महत्वपूर्ण देन-‘कम्प्यूटर विज्ञान का अनौखा उपहार है। इसकी सहायता से सही और सरल तरीके से नाप-तौल कर सकते हैं। उसके आँकड़े भी आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। कम्प्यूटर की सहायता से हमें तत्काल ही स्थितियों का ज्ञान हो जाता है। इस मशीन से एक ही बार में अन्य कई काम किये जा सकते हैं।

क्या है कम्प्यूटर ?-कम्प्यूटर यान्त्रिक मस्तिष्कों का समन्वयात्मक एवं गुणात्मक योग है जिससे हमें त्रुटिहीन जानकारी बहुत कम समय में प्राप्त हो जाती है। इससे प्राप्त गणनाएँ शुद्ध, उपयोगी तथा त्वरित हुआ करती हैं।

इसके सारे कार्य संकेतों पर अवलम्बित होते हैं। ये संकेत गणितीय भाषा में होते हैं। बड़े-बड़े रिकॉर्डों को कम्प्यूटर की स्मृति-भण्डार में संचित किया जाता है। इच्छानुसार इन्हें उपयोग के लिए प्राप्त कर सकते हैं।

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कम्प्यूटर के उपयोग-कम्प्यूटर का उपयोग सुरक्षा, उद्योग, व्यापार, उत्पादन, वितरण, परिवहन आदि सभी कामों में किया जाता है। व्यापक रूप से कम्प्यूटर का उपयोग प्रकाशन में किया जा रहा है। साथ ही, इसका उपयोग बैंकिंग में काफी हो रहा है। इसके अलावा मेडिकल के क्षेत्र में कम्प्यूटर का उपयोग हो रहा है।

उपसंहार-कम्प्यूटर से सहायता प्राप्त करने के लिए इसकी सारी जानकारी रखना अनिवार्य है। अनुभव से अपना कार्य क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।

12. गणतन्त्र दिवस
अथवा
राष्ट्रीय पर्व

प्रस्तावना-भारत त्यौहारों का देश है। इसकी धरती पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक त्यौहार सम्पन्न किये जाते हैं। परन्तु ये त्यौहार किसी धर्म सम्प्रदाय अथवा ज़ाति से जुड़े रहते हैं। लेकिन जो पर्व समस्त देश में एक साथ मनाया जाता है उसे राष्ट्रीय पर्व की संज्ञा से विभूषित किया जाता है। इसी श्रृंखला में 26 जनवरी हमारा राष्ट्रीय पर्व है। हर वर्ष 26 जनवरी को विशेष उल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन हमारे देश को पूर्ण गणतन्त्र घोषित किया गया था।

गणतन्त्र दिवस का इतिहास-यद्यपि सन् 1857 में स्वतन्त्रता की चिंगारी भड़की थी, परन्तु पारिवारिक फूट का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने इन आन्दोलनों को कुचल दिया। परन्तु तिलक, गाँधी, सुभाष तथा नेहरू ने देश को आजाद कराने का प्रण लिया। राजनीतिक क्षितिज पर 1947 को भारत को आजादी मिली। 26 जनवरी, सन् 1950 से हमारा संविधान लागू हुआ

और यह दिन हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। अंग्रेजों के गवर्नर जनरल की जगह भारत का शासन राष्ट्रपति के हाथों में आया। इस भाँति 26 जनवरी की महिमा सर्वत्र व्याप्त है।

26 जनवरी के कार्यक्रम-26 जनवरी को सभी जगह ध्वजारोहण किया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। प्रभात फेरियाँ निकाली जाती हैं। दिल्ली में सैनिकों की परेड भी उत्साहवर्द्धक होती है। आकाशवाणी से राष्ट्रपति तथा प्रधानमन्त्री के भाषण प्रसारित होते हैं। रात्रि में भी दिन जैसा प्रकाश होता है।

26 जनवरी का गौरव-यह दिन हमें देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की याद दिलाता है। दिल्ली में आयोजित विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम देश के उत्थान के परिचायक हैं।

स्वतन्त्र भारत के नागरिकों का दायित्व-स्वतन्त्र भारत ने अपनी, आजादी और इसकी अखण्डता की सुरक्षा के लिए अति महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हमारी सीमाओं की सुरक्षा, आन्तरिक शान्ति व्यवस्था में सैनिक बल और अर्द्ध-सैनिक बल अपना उत्तरदायित्व निभाते हुए पूर्ण सहयोग कर रहे हैं। साथ ही सम्पूर्ण जनता उनकी अभिवृद्धि और खुशहाली के लिए सहयोग

के साथ प्रार्थना भी करती है। – यद्यपि देश में आतंकवादी एजेन्सियाँ मिलकर अपना कार्य कर रही हैं, परन्तु हमारे सैनिक व सुरक्षा बल उस आतंकवाद को समूल नष्ट करने के लिए तत्पर हैं, सक्षम हैं।

गणतन्त्र का पर्व हम सभी भारतवासियों का आह्वान करता है कि अभी वास्तविक रूप से गणतन्त्र की स्थापना में कुछ कमी है। वह कमी है सभी को सामाजिक व्यवस्था में समानता के अधिकार की। आर्थिक शैक्षिक विपन्न व्यक्ति भारत गणराज्य की ओर एकटक बेबसी की दृष्टि से देखने को मजबूर है।

उपसंहार-हमारे देश में स्वतन्त्रता देवी का आगमन कठोर साधना एवं बलिदान के फलस्वरूप हुआ है। अत: देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि इसे अक्षुण्ण बनाने में सहयोग दें। तभी इस पावन पर्व को सम्पन्न करना सार्थक होगा।

13. पर्यावरण और प्रदूषण

प्रस्तावना-आज पर्यावरण प्रदूषण विश्व के समक्ष एक विकराल समस्या की तरह उपस्थित है। पर्यावरण प्रदूषण ने मानव के जीवन को नरकतुल्य बना दिया है। आज विश्व में कोई भी देश ऐसा शेष नहीं है जो इस समस्या से ग्रस्त न हो। विश्व के वैज्ञानिक एवं मनीषी लोग इस समस्या के निवारण के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। साधन तलाश कर रहे हैं।

प्रदूषण का आशय-जल, वायु, पृथ्वी के रासायनिक, जैविक, भौतिक गुणों में घटित होने वाला अवांछनीय परिवर्तन प्रदूषण की श्रेणी में आता है। वर्तमान में विश्व नवीन युग में पदार्पण कर रहा है। लेकिन खेद का विषय है कि आज विषाक्त वातावरण उसके जीवन में जहर घोल रहा है।

प्रदूषण के कारण-प्रदूषण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण जनसंख्या वृद्धि है। बढ़े हुए कल-कारखाने भी पर्यावरण प्रदूषण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, पानी का शुद्ध न होना, ध्वनि प्रदूषण में आविष्कृत वाहन ये सभी पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। गन्दगी फैलने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो रहे हैं। पर्यावरण को प्रदूषित करने का महत्त्वपूर्ण कारण है-

  • निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या।
  • वनों और वृक्षों का अनियोजित ढंग से काटा जाना।
  • शहरों के कूड़े-करकट का सुनियोजित निस्तारण न किया जाना।
  • जल निकासी और उसके प्रवाह का अनुचित प्रबन्ध।

पर्यावरण प्रदूषण के निराकरण के उपाय-वृक्षारोपण, ध्वनि नियन्त्रण यन्त्रों का प्रयोग, परमाणु विस्फोटों पर रोक, कल-कारखानों में फिल्टर का प्रयोग, नुकसानदायक, रासायनिक तत्वों को नष्ट करना, नदियों में प्रवाहित गन्दगी पर रोक, इन सभी के द्वारा हम प्रदूषण को पूर्णरूप से तो नष्ट नहीं कर सकते लेकिन उसे कुछ मात्रा में कम तो कर ही सकते हैं। प्रदूषण को रोकने वाले तत्वों में प्रधान तत्व हैं-वृक्षों का आरोपण, उनकी सुरक्षा और देखभाल का उचित प्रबन्ध। प्राचीन वनों को सुरक्षित रखा जाए। नवीन वनों का प्रबन्ध किया जाए। वृक्ष लगाये जाएँ। वृक्षों की सिंचाई व्यवस्था ठीक की जाए।

उपसंहार-पर्यावरण प्रदूषण के निवारण हेतु विश्व के समस्त देश निरन्तर प्रयासरत हैं। आशा है निकट भविष्य में मनु पुत्र को इस समस्या से कुछ हद तक निजात अवश्य प्राप्त होगी। क्योंकि बीमारी का तो इलाज है लेकिन प्रदूषण द्वारा उत्पन्न रोग असाध्य है।

14. परोपकार

प्रस्तावना-संसार के अनेक जीवों में मनुष्य समझदार और बुद्धिमान प्राणी है। वह स्वयं अकेला और अपने तक ही सीमित रहकर जीवित नहीं रह सकता। मनुष्य अपनी सामाजिकता के गुण के कारण परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सभी प्राणियों से जुड़ा हुआ है। यही जुड़ाव उसे दूसरों की भलाई करने के लिए प्रेरित करता है।

परोपकार का अर्थ-‘परोपकार’ शब्द ‘पर + उपकार’ के मेल से बना है। ‘पर’ का तात्पर्य दूसरों का होता है तथा उपकार’ का अर्थ भलाई से होता है। अर्थात् दूसरों की भलाई करना ही परोपकार है। हम अपने सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में इसी परोपकार की भावना से सक्रियता और प्रेरणा प्राप्त करते हैं। परोपकार में दया, करुणा, सहयोग आदि भाव आते हैं। ये सात्विक भाव होते हैं।

परोपकार की आवश्यकता-इस विश्व में तरह-तरह के जीवों को तरह-तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं, उन्हें कष्टदायी रोग पीड़ा पहुँचाते हैं। अतः हमें उनके प्रति दयालुता और करुणा प्रदर्शित करते हुए परोपकार करना चाहिए।

यह प्रकृति भी परोपकारी शिक्षा देती है। नदी पानी बहाकर लाती है, उस पानी का उपयोग, प्राणियों के लिए पीने के काम आता है। फसलों की सिंचाई के काम आता है। पेड़ हमें फल देते हैं। उनके फूल व पत्तियाँ भी हमें शुद्ध वायु, पर्यावरण की शुद्धता देकर लाभ प्राप्त कराती है। वर्षाऊ बादल झुककर नीचे आ जाते हैं और समय पर वर्षा कर देते हैं। इस तरह प्रकृति के विभिन्न उपादान-चन्द्रमा (शीतल चाँदनी देता है), सूरज (प्रकाश देता है) आदि प्रत्येक पहलू हमारे लिए लाभ देता है, साथ ही हमें परोपकार की शिक्षा भी देता है।

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उपसंहार-‘परोपकार’ करना महाविभूतियों की विशेषता है। वे सदैव परोपकार का कार्य स्वयं ही खुश हुआ करते हैं।

15. समाचार-पत्र का महत्त्व

प्रस्तावना-आज समाचार-पत्र जनजीवन का अभिन्न अंग बन गया है। प्रात:काल उठते ही हर व्यक्ति चाय ग्रहण करने के साथ ही अखबार को पढ़कर अपना मनोरंजन कर लेता है। परिवार के सभी सदस्य अखबार पढ़ने एवं समाचार जानने के लिए लालायित हो उठते हैं। समाचार देश-विदेश की खबरों को जानने का सर्वसुलभ साधन है।

इतिहास-समाचार-पत्र का प्रचलन इटली के वेनिस नगर में तेरहवीं शताब्दी में हुआ। जैसे-जैसे मुद्रण कला का विकास हुआ, समाचार-पत्रों का भी उसी गति से प्रचार एवं प्रसार हुआ।

विभिन्न व्यक्तियों को लाभ-बेरोजगार युवक रोजगार के विषय में, खिलाड़ी खेल के विषय में, नेता राजनीतिक हलचल के विषय में, व्यापारी वस्तु के भावों के विषय में सूचना समाचार-पत्रों के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं।

समाचार-पत्रों का महत्त्व-आज विश्व की परिस्थिति निरन्तर जटिल होती चली जा रही है। जीवन संघर्षमय हो गया है, राजनीतिक गतिविधियाँ निरन्तर अपना रंग दिखा रही हैं, ऐसे में समाचार-पत्रों के माध्यम से इनके विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इनके अभाव में ज्ञान का क्षेत्र अधूरा प्रतीत होता सम्पादक का दायित्व-सम्पादकीय टिप्पणी पढ़कर ही किसी समाचार-पत्र का स्तर निर्धारित होता है। इसमें राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को उजागर किया जाता है।

अखबार प्रकाशन के आज के साधन-आज हैण्ड कम्पोजिंग के स्थान पर कम्प्यूटर काम में लाया जाता है। इससे समाचार-पत्रों का प्रकाशन सुलभ एवं सस्ता हो गया है। ज्ञान के प्रचारक एवं प्रमुख वाहक-समाचार-पत्र पाठकों के ज्ञान का विस्तार करता है। देश के कर्णधारों के आदर्शों से प्रभावित होकर जन-सामान्य उनका अनुगमन करके अपने जीवन को सफल बनाते हैं।

स्वतन्त्रता से पूर्व समाचार-पत्रों का दायित्व-सम्पादकों ने अंग्रेजों के शोषण तथा अत्याचार को देश के समक्ष अखबारों के माध्यम से निडरता से उजागर किया। ऐसा करने से उन्हें कठिनाईयों का सामना करना पड़ा लेकिन वे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए।

युद्ध एवं विपत्ति में समाचार-पत्रों का दायित्व-प्राकृतिक प्रकोपों की सूचना जन-सामान्य तक समाचार-पत्रों के माध्यम से पहुँचती है। इसको पढ़कर समाज सेवी संस्थाएँ उन स्थानों तक यथासम्भव सहायता पहुँचाती हैं।

हानियाँ-कल्पित तथा झूठे समाचार-पत्र जन-सामान्य को भुलावे में डाल देते हैं। यदा-कदा इनके फलस्वरूप साम्प्रदायिक दंगों का जन्म होता है। जनता का सम्बन्ध-समाचार-पत्रों के माध्यम से सरकार जनता की भावनाओं से अवगत होती है।

उपसंहार-समाचार-पत्र राष्ट्र विशेष की अमूल्य सम्पत्ति होते हैं, इनकी तनिक-सी लापरवाही से राष्ट्र की विशेष हानि हो सकती है। अतः समाचार-पत्रों को अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिपल सजग रहना चाहिए। ये राष्ट्र विशेष के जीवन्त प्रहरी हैं। इनके प्रभाव से राष्ट्र अवनति के गर्त में जा सकता है। अतः इनका प्रतिपल जागरूक रहना अत्यावश्यक है।

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