MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 18 डॉ. जगदीशचन्द्र बसु

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 18 डॉ. जगदीशचन्द्र बसु (संकलित)

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु अभ्यास-प्रश्न

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
डॉ. बसु ने अपने माता-पिता से कौन-कौन से गुण ग्रहण किये?
उत्तर
डॉ. बसु ने अपने पिता से साहस, दृढ़-संकल्प तथा सहानुभूति के गुण ग्रहण किये। इसी प्रकार उन्होंने अपनी माता से भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम के गुणों को ग्रहण किया।

प्रश्न 2.
डॉ. बसु सफलता की कुंजी किसे मानते थे और क्यों?
उत्तर
डॉ. बसु सफलता की कुंजी धैर्य, साहस और लगन के साथ काम करने को मानते थे। यह इसलिए कि उनका जीवन विज्ञान ही था। ज्ञान प्राप्त करने की उनमें इतनी तीव्र इच्छा थी कि इसके लिए हर प्रकार के कष्टों का सामना करने के लिए तैयार थे। इस प्रकार वे यह भलीभाँति जानते थे कि धैर्य, साहस और लगन के बिना कोई भी काम सफल नहीं हो सकता है।

प्रश्न 3.
डॉ. बसु ने बनस्पति विज्ञान को जानने के लिए जिन यंत्रों का आविष्कार किया, उनके नाम और प्रयोग लिखिए।
उत्तर
डॉ. बसु ने वनस्पति विज्ञान को जानने के लिए कई यंत्रों के आविष्कार किए। कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकार्ड आदि यंत्रों के आविष्कार करके संसार में अपनी धूम मचा दी। कास्कोग्राफ पौधों की वृद्धि नापने का यंत्र था तो रेजोनेंट रिकार्डर से यह ज्ञात हो जाता था कि चोट लगने पर और मरते समय पौधे भी काँपने लगते हैं।

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प्रश्न 4.
डॉ. बसु को ‘पूर्व का जादूगर’ किसने कहा और क्यों कहा?
उत्तर
डॉ. बसु ने पौधों के कष्ट और उनकी मृत्यु के दृश्य परदे पर दिखाए। उन्होंने जीवित पौधों में विद्युत की एक हल्की-सी लहर दौड़ाई। परदे पर पौधों का काँपना और तड़पना साफ-साफ दिखाई देने लगा। धीरे-धीरे पौधा निर्जीव हो गया। यह देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गए। उनकी आश्चर्यजनक खोजें, आविष्कारों तथा प्रयोगों को देखकर यूरोप के लोग उन्हें ‘पूर्व का जादूगर’ कहने लगे।

प्रश्न 5.
डॉ. बसु के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
डॉ. बसु का व्यक्तित्व मूल रूप से वैज्ञानिक था। विज्ञान ही उनका जीवन था। ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे सभी प्रकार के कष्टों को झेलने के लिए तैयार थे। उन्होंने अपने अपार धैर्य, साहस और लगन से ऐसे-ऐसे आविष्कार किए, जिन्हें देखकर सारा संसार दंग रह गया। यों तो डॉ. बसु महान वैज्ञानिक थे, फिर भी उनमें देश-प्रेम की भावना कम नहीं थी। यही कारण है कि उन्होंने जर्मन वैज्ञानिकों के द्वारा एक पूरा विश्वविद्यालय सौंपने के प्रस्ताव को ठुकाराते हुए कहा था- “मेरा कार्य क्षेत्र भारत ही रहेगा और मैं देश के उसी महाविद्यालय में काम करता रहूँगा, जिसमें मैंने उस समय काम करना शुरू किया था, जब मुझे कोई जानता नहीं था।”

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
देश की गुलामी का हमें क्या मूल्य चुकाना पड़ा? पठित पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने दूसरा जो अनुसंधान किया था, वह अपने आप में नहीं अपितु सारे संसार में पहला था। वह अनुसंधान था-बेतार के तार का। इटली के डॉक्टर मार्कोनी और एक अमरीकन भी इस संबंध में खोज करने में लगे हुए थे। 1895 में जगदीशचन्द्र बसु ने बंगाल के गवर्नर के सामने इसका सफल प्रदर्शन किया। उन्होंने बिना तार के ही दूर पर पड़े बोझ को हिला दिया था और घंटी को बजाकर दिखाया था। लेकिन बेतार के तार के आविष्कार का श्रेय जगदीशचन्द्र बसु को न मिलकर इटली के प्रोफेसर मार्कोनी को मिला। देश की गुलामी का हमें यह मूल्य चुकाना पड़ा। बाद में मार्कोनी ने यही आविष्कार करके इसे अपने नाम रजिस्टर्ड करा लिया।

प्रश्न 2.
डॉ. बसु भारत को ही अपना कार्य क्षेत्र क्यों बनाना चाहते थे? समझाइये।
उत्तर
डॉ. बसु भारत को ही अपना कार्य क्षेत्र बनाना चाहते थे। इसके निम्नलिखित कारण थे

  1. उनमें अपार देश-भक्ति की भावना भरी हुई थी।
  2. वे किसी के पिछलग्गू न होकर पूरी तरह स्वतंत्र विचारधारा के थे।
  3. उनके मन में अपने हरेक नए अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को बढ़ाने की प्रबल इच्छा थी।

प्रश्न 3.
‘बसु विज्ञान-मंदिर’ की स्थापना का क्या उद्देश्य था?
उत्तर
‘बसु विज्ञान-मंदिर’ की स्थापना के निम्नलिखित उद्देश्य थे

  1. डॉ. दसु अपने नए अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को बढ़ाने की प्रबल अभिलाषा तो करते थे। इसके लिए प्रयोगशाला की आवश्यकता था। उनके कॉलेज में अनुसंधानों के लिए उचित प्रबंधन था। इसलिए उन्होंने अपने घर पर ही एक निजी प्रयोगशाला बनाई।
  2. डॉ. बसु सच्चे अर्थों में एक सफल तथ्यान्वेषक थे। उन्होंने देश में विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञान-मंदिर नामक संस्था की स्थापना की।
  3. इस संस्था के द्वारा वैज्ञानिक विद्यार्थियों को शोध संबंधी सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का भी एक महान उद्देश्य था।

प्रश्न 4.
किस घटना से बसु के स्वाभिमानी होने का पता चलता है? उल्लेख कीजिए।
उत्तर
बसु को कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में और अध्यापकों से बहुत कम वेतन दिया गया। उससे उनके स्वाभिमान को बहुत भारी ठेस पहुँची। फलस्वरूप उन्होंने उस कॉलेज के प्रबन्धकों से स्पष्ट रूप से कहा कि या तो मुझे पूरा वेतन दिया जाए या मैंने बिना वेतन के ही काम करूँगा। तीन वर्ष तक वे बिना वेतन के कार्य करते रहे। पैसे की तंगी के कारण उनका जीवन काफी कठिनाई से बीत रहा था, पर वे झुकना नहीं जानते थे। अंत में कॉलेज के अधिकारियों को ही झुकना पड़ा। अंग्रेज अध्यापकों जितना वेतन उन्हें मिलने लगा।

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प्रश्न 5.
डॉ. बसु की वैज्ञानिक उपलब्धि पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर
डॉ. बसु हमारे देश के एक ऐसे महावैज्ञानिक के रूप में लोकप्रसिद्ध हैं, जिन्होंने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करके संसार को चकित कर दिया। उनका सारा जीवन विज्ञान ही था। ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उनमें इतनी तेज थी कि वे इसके लिए हर प्रकार की कठिनाइयों का सामना करने से पीछे नहीं हटते थे। धैर्य, साहस और लगन के साथ काम करना ही उनकी सफलता की कुंजी थी। डॉ. बसु के व्यक्तित्व की एक यह बड़ी विशेषता थी कि वे लकीर के फकीर नहीं थे।

वे स्वतंत्र विचारधारा के थे। उनमें आत्मनिर्भरता परी तरह से थी। अपनी इसी विशेषता के कारण उन्होंने अपने ही घर अपनी एक निजी प्रयोगशाला बनाई। उसका नाम उन्होंने रखा-‘बसु विज्ञान-मंदिर’ । उसका उद्देश्य था-अपने नए अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को तेजी से बढ़ाना। इसके साथ-ही-साथ वैज्ञानिक विद्यार्थियों के लिए शोध-संबंधी सभी आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराना।

इसके पीछे उनका यह भी उद्देश्य था कि भारत का नाम संसार में ऊँचा रहे। यही कारण है कि जब जर्मन वैज्ञानिक उनकी खोजों से प्रभावित होकर उन्हें एक पूरा विश्वविद्यालय सौंपने के लिए तैयार हो गए, तब उन्होंने उसे अस्वीकार अपने देश के उसी महाविद्यालय में काम करते रहने के अपने दृढ़ संकल्प को दोहराया। इससे उनकी अपार और अटूट देश-भक्ति की भावना प्रकट होती है। वास्तव में वे एक महान देश-भक्त थे। अपनी इस भावना को उन्होंने अपने अभिन्न मित्र रवीन्द्र नाथ टैगोर से एक पत्र के माध्यम से प्रकट किया-“यदि मुझे सौ बार भी जन्म लेना पड़े तो मैं हर बार अपनी मातृभूमि के रूप में हिन्दुस्तान का ही चयन करूँगा।”

डॉ. बसु ने पेड़-पौधों में भी जीवन है, इसे सिद्ध करने के लिए कई यंत्र बनाए। उनमें कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकॉर्डर आदि अधिक चर्चित हैं। ‘कास्कोग्राफ’ पौधों की वृद्धि नापने का यंत्र था, तो रेजोनेंट रिकॉर्डर से यह ज्ञात हो जाता था कि चोट लगने पर और मरते समय पौधे भी काँपने लगते हैं। डॉ. बसु आजीवन अपने विज्ञान साधना में लगे रहे। एक-से-एक बढ़कर उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान किये। उसमें उन्हें सफलता मिलती रही। उनकी इस प्रकार की मौलिकता और विविधता आज भी बेमिसाल मानी जाती है। फलस्वरूप उमकी खोजों से आने वाली वैज्ञानिक पीढ़ी को प्रेरणा मिलती रहेगी।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

(क) शीर्षकों के आधार पर एक-एक अनुच्छेद लिखकर डॉ. जगदीशचन्द्र बसु की जीवनी लिखिए बचपन, शिक्षा, कार्यक्षेत्र, सम्मान।
(ख) डॉ. बसु ने इसके बारे में क्या-क्या पता लगाया? बेतार का तार, धातु, पेड़-पौधे।
(ग) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए रुचि, ज्ञान, सफलता, इच्छा, आवश्यक, परतन्त्र, निर्जीव, उदय।
उत्तर
(क) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु की जीवनी
1. बचपन-डॉ. जगदीशचन्द्र बसु का जन्म 30 नवंबर 1858 को बंगला देश के ढाका जिले के मेमनसिंह नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री भगवान चन्द्र बसु था। वे बड़े विचारक थे। डॉ. बसु ने अपने पिता श्री से विचारशीलता, साहस, दृढ़ संकल्प तथा सहानुभूति और माता से भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम के गुणों को ग्रहण कर अपने भविष्य का निर्माण करने लगे।

2. शिक्षा-बालक जगदीश ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव की पाठशाला में प्राप्त की थी। पाठशाला में किसान और मछुआरों के बेटे उनके साथी थे। किसान के लड़के, खेतीबाडी और पौधों के बारे में बातें करते थे। इससे बचपन में ही जगदीशचन्द्र की रुचि पेड़-पौधों में हो गई। गाँव में उन्हें पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों के सम्पर्क में रहने का अवसर मिला। बालक जगदीश इन वस्तुओं को ध्यान से देखते और इनके विषय में अनेक बातें सोचते। इनकी इसी प्रवृत्ति ने आगे चलकर इन्हें एक महान वैज्ञानिक बना दिया। तेरह वर्ष की आयु में वे कलकत्ता के संत जेवियर्स का कॉलेज में भर्ती हुए। वहाँ की शिक्षा समाप्त करके वे इंग्लैंड चले गए, वहाँ से उन्होंने विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौट आए।

3. कार्यक्षेत्र-डॉ. बसु का कार्यक्षेत्र भारत ही रहा। वे कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रोफेसर रहे। अध्यापन के साथ उन्होंने ‘बसु विज्ञान-मंदिर’ नामक शोध संस्थान की स्थापना की। उन्होंने अपनी निजी प्रयोगशाला के द्वारा बेतार के तार, कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकॉर्डर जैसे अनेक अद्भुत यंत्रों का आविष्कार किया।

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4.सम्मान-डॉ. बसु को उनकी वैज्ञानिक खोजों के लिए अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया। विद्युत के विषय में उनके गवेषणापूर्ण लेखों के लिए लंदन की रायल सोसायटी ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की। डॉ. बसु ने अपने अनुसंधान का कार्य का पहला प्रतिवेदन रॉयल सोसायटी को भेजा। लंदन विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया। उनके आश्चर्यजनक खोजों, आविष्कारों और प्रयोगों को देखकर यूरोप के लोगों ने उन्हें ‘पूर्व का जादूगर’ कहा। 1911 में सरकार ने उनको सी. आई. ई., 1916 में अमेरिका से लौटने पर सी. एस. आई और 1917 में ‘सर’ की उपाधि से विभूषित किया।

(ख)
1. बेतार का तार-उन्होंने बिना तार के ही दूर पर पड़े बोझ को हिला दिया था और घण्टी बजाकर दिखाया था।
2. पात-उन्होंने धातु से कई यंत्र बनाए; जे-कास्कोग्राफ, रेजोनेंट रिकॉर्डर आदि
3. पेड़-पौधे-पेड़-पौधों में भी हमारे तरह की जीवन है। उनमें हमारे जैसी अनुभव शक्ति है।

(ग) शब्द
विलोम शब्द
रुचि – अरुचि
ज्ञान – अज्ञान
इच्छा – अनिच्छा
सफलता – विफलता
आवश्यक – अनावश्यक
परतंत्र – स्वतंत्र
निर्जीव – संजीव
उदय – अस्त।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु योग्यता-विस्तार

(क) अपने बाग-बगीचे या आस-पास लगे पेड़-पौधों का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन कर यह जानिये कि उनमें भी जीवन होता है। एक पौधा लागकर उसे बड़ा कीजिए।
(ख) महान वैज्ञानिक एवं उनके कार्य-चार्ट तैयार कर कक्षा में लगाइये।
(ग) भारतीय संस्कृति में किन-किन पेड़-पौधों की पूजा की जाती है? उनकी जानकारी एकत्र कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक अध्यापिका की सहायता से हल करें।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

1.लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपनी माँ की किन बात सुनकर बालक बसु पेड़-पौधों के बारे में सोचने लगे?
उत्तर
‘बेटा पौधे सो गए हैं। उन्हें मत जगाओ, गेंद सवेरे निकाल लेना।” अपनी माँ की इन बातों को सुनकर बालक बसु पेड़-पौधों के बारे में सोचने लगे।

प्रश्न 2.
बसु ने निजी प्रयोगशाला क्यों बनाई?
उत्तर
बसु अपने नये अनुसंधानों के द्वारा भारतीय गौरव को बढ़ाने के लिए मचल उठे थे। कलकत्ता से प्रेसीडेन्सी कॉलेज जहाँ पर वे प्रोफेसर थे, वहाँ की प्रयोगशाला में अनुसंधानों के लिए उचित प्रबंध नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने घर पर ही एक निजी प्रयोगशाला बनाई।

प्रश्न 3.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने वैज्ञानिक मंच पर अपने प्रसंगों द्वारा क्या प्रमाणित कर दिया?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने वैज्ञानिक मंच पर अपने प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। उन्हें भी हम प्राणियों जैसी सर्दी-गर्मी और भूख-प्यास आदि लगती है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं। वे भी आराम करते हैं और अंत में हमारी ही तरह मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 4.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु संसार के पहले वैज्ञानिक क्यों थे?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु संसार के पहले वैज्ञानिक थे। यह इसलिए कि उन्होंने ही संसार को सबसे पहले यह बतलाया कि पेड़-पौधों और धातओं में भी संवेदना होती है। उनके इस सिद्धान्त से वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में चिंतन के एक नये अध्याय की शुरुआत हुई।

प्रश्न 5.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पौधों के कष्ट और उनकी मृत्यु के दृश्य परदे पर किस प्रकार दिखाए?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पौधों के कष्ट और उनकी मृत्यु के दृश्य परदे पर दिखाए। इसके लिए उन्होंने स्वयं के द्वारा बनाए गए यंत्र ‘रेजोनेंट रिकॉर्डर से जीवित पौधों में विद्युत की एक हल्की-सी लहर दौड़ाई। परदे पर पौधों का काँपना और तड़पना साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा। धीरे-धीरे पौधा निर्जीव हो गया। इसे देखकर लोग हैरान हो गए।

प्रश्न 6.
डॉ. बसु ने अपने अभिन्न मित्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर को क्या लिखा था?
उत्तर
डॉ. बसु ने अपने अभिन्न मित्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक पत्र में लिखा था-“यदि मुझे सौ बार भी जन्म लेना पड़े, तो मैं हर बार अपनी मातृभूमि के रूप में हिन्दुस्तान का ही चयन करूँगा।”

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपनी माँ की बात सुनकर बालक बसु क्या सोचने लगे?
उत्तर
अपनी माँ की बात सुनकर बालक बसु सोचने लगे कि अगर पौधे हमारी तरह सोते-जागते हैं तो उनमें भी हमारी तरह प्राण होते होंगे। पौधों को पानी देते समय वह सोचता-क्या पौधे पानी और भोजन पाकर प्रसन्न होते हैं? क्या आकाश में उमड़ते बादलों को देखकर उनका मन भी आनन्द से नाच उठता है? फूलों को तोड़ लेने पर या आँधी से डालियों के टूटने पर पेड़-पौधों को भी कष्ट होता होगा?

प्रश्न 2.
लेखक के रूप में डॉ. बसु को विश्वस्तर पर बड़ी ख्याति कैसे मिली?
उत्तर
डॉ. जगदीश चन्द्र बसु ने 1895 में कई गवेषणापूर्ण लेख लिखे। इनमें से विद्युत संबंधी दो लेख इंग्लैण्ड के एक वैज्ञानिक पत्र में प्रकाशित हुए। इन लेखों के प्रकाशित होने से उन्हें बड़ी ख्याति मिली। लन्दन की रायल सोसायटी के मुखपत्र में अपने लेख के छपने का गौरव प्राप्त करने वाले यह प्रथम भारतीय थे। विद्युत के संबंध में लिखा गया यह लेख इतना अधिक सराहा गया कि उन्हें उसके विषय में विशेष अनुसंधान करने के लिए सोसायटी की ओर से विशेष छात्रवृत्ति दी गई। दो वर्ष पश्चात् बंगाल सरकार की ओर अनुसंधान कार्य के लिए विशेष सहायता प्रदान की गई।

प्रश्न 3.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु में देश-प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। सोदाहरण लिखिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पेड़-पौधों के विषय में एक-से-एक बढ़कर अद्भुत खोज और प्रयोग किए। उससे सारा संसार चकित हो गया। उनकी खोजों और प्रयोगों ने जर्मन वैज्ञानिकों को भी बहुत प्रभावित किया। उनकी खोजों और प्रयोगों से इतने अधिक प्रभावित हुए कि वे डॉ. बसु को एक विश्वविद्यालय सौंपने को तैयार हो गए। लेकिन डॉ. बसु ने उनके इस प्रस्ताव को अपने देश-प्रेम की भावना से अस्वीकार’ करते हए कहा, “मेरा कार्यक्षेत्र भारत ही रहेगा और में देश के उसी महाविद्यालय में काम करता रहूँगा, जिसमें मैं उस समय काम करना शुरू किया था, जब मुझे कोई जानता नहीं था।” यह था डॉ. बसु का देश-प्रेम।

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प्रश्न 4.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के जन्मदिन पर महात्मा गाँधी ने उन्हें क्या शुभकामना दी थी?
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के जन्मदिन के सुअवसर पर महात्मा गांधी ने उन्हें वर्धा से 5 दिसंबर 1928 को एक पत्र में लिखा था-‘मैं यहाँ कूपमण्डूक की तरह रहता हूँ। मुझे मालूम नहीं होता कि इस कुएँ की दीवारों के बाहर क्या हो रहा है? मुझे कल ही आपके जन्म दिन मनाए जाने का समाचार प्राप्त हुआ। यद्यपि में देरी से लिख रहा हूँ। फिर भी आपको जो अनेक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ प्राप्त हो रही हैं, उनमें मेरी शुभकामना और बधाई सम्मिलित कर लें। भगवान आपको चिरायु करे, जिससे कि आपके निरन्तर बढ़ने वाले महान गौरव एवं यश में सारा भारत भागीदार बन सके।”

प्रश्न 5.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के संपूर्ण व्यक्तित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु हमारे देश के महान वैज्ञानिक थे। उन्होंने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनेक अभूतपूर्व खोज और प्रयोग करके सारे संसार को आश्चर्य में डाल दिया। उससे उन्हें देश और विदेश में एक-से-एक बढ़कर सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए। उनमें विज्ञान के प्रति अटूट लगाव था तो देश-प्रेम के प्रति अपार त्याग-समर्पण के भाव भरे हुए थे। यही कारण है कि उन्होंने जर्मन के विश्वविद्यालय का उत्तरदायित्व सँभालने का आग्रह ठुकरा कर भारत में ही रहकर कार्य करने का फैसला लिया था। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि विज्ञान ही डॉ. जगदीशचन्द्र बसु का जीवन था। धैर्य, साहस और लगन के साथ काम करना ही उनकी सफलता की कुंजी थी।

प्रश्न 6.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु पर आधारित ‘वैज्ञानिक निबंध’ के मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु हमारे देश के एक ऐसे महान वैज्ञानिक थे, जिनकी महानता का लोहा संसार के सभी वैज्ञानिक मानते हैं। अद्भुत, बेजोड़ और असाधारण व्यक्तित्व के धनी महान वैज्ञानिक डॉ. जगदीशचन्द्र बसु की वैज्ञानिक खोजों पर आधारित यह लेख वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नई पीढ़ी के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है। इसमें यह बतलाने का प्रयास किया गया है कि बालक जगदीश की बाल-सुलभ बुद्धि में जिज्ञासा और खोज की प्रवृत्ति ने उन्हें विश्व का श्रेष्ठ वैज्ञानिक बना दिया। बचपन में अपनी माँ के द्वारा संध्या-समय गेंद खेलने से पेड़-पौधों के जागने की बात ने उन्हें ऐसा प्रभावित किया कि उन्होंने अपने पूरे शिक्षाकाल में अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अनेक प्रकार से चिंतन-मनन किए। फिर एक-से-एक बढ़कर वैज्ञानिक खोज और प्रयोग किए। उनकी खोजों और प्रयोगों में बेतार का तार तथा पेड़-पौधों में संवेदनशीलता प्रमुख है।

प्रश्न
डॉ. जगदीश चन्द्र बसु का संक्षिप्त परिचय देते हुए उनके महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. जगदीश चन्द्र बसु भारत के पहले और आधुनिक वैज्ञानिक रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने विज्ञान को अपने एक स्वस्थ दृष्टिकोण से देखा, उसे गहराई से समझा और उपयोगिता की दृष्टि से प्रस्तुत किया। इससे वे विश्व के महान वैज्ञानिकों में प्रतिष्ठित हो गए। उनकी इस महानता को सभी ने एकमत से स्वीकार किया। उनकी इस महानता के विषय में यह कहा जाता है कि वे अपने विद्यार्थी जीवन में जिज्ञासु प्रकृति के थे। खासतौर से वे अपनी माँ से प्रकृति के विषय में अधिकांश रूप में पेड़-पौधों के विषय में बहुत-सी बातों की जानकारी हासिल करते थे। इस तरह उनके अंदर प्रकृति-प्रेम मुख्य रूप से वनस्पति जगत के प्रति जिज्ञास प्रवृत्ति के कारण गहरा लगाव हो गया था।

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डॉ. जगदीशचन्द्र के व्यक्तित्व का दूसरा महान पक्ष यह है कि उनमें अपार देश-प्रेम की भावना भरी हुई थी। इसी भावना के कारण ही उन्होंने जर्मन के विश्वविद्यालय का उत्तरदायित्व संभालने का आग्रह ठुकराकर भारत में ही रहकर कार्य करने का फैसला किया था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि डॉ. जगदीशचन्द्र बसु हमारे देश के एक ऐसे महावैज्ञानिक हैं, जिनका जीवन एक अद्भुत मिसाल है। उनकी सर्वोच्च विशेषता यही थी कि उनमें अपार धैर्य, साहस और लगन थी। यही उनके जीवन की सफलता की कुंजी थी।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु निबंध का सारांश

प्रश्न.
डॉ. जगदीशचन्द्र बसु पर आधारित वैज्ञानिक निबंध का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. जगदीशचन्द्र बस पर आधारित वैज्ञानिक निबंध एक तथ्यपूर्ण निबंध है। इस निबंध में हमारे देश के महावैज्ञानिक डॉ. जगदीशचन्द्र बसु से संबंधित अनेक अप्रकाशित तथ्यों की जानकारी दी गई है, जिससे हमारी जिज्ञासा में तेजी आ जाती है। इस निबंध का सारांश इस प्रकार है

संध्या-समय एक बालक अपने बगीचे की लताओं में अटकी हुई गेंद लकड़ी से गिरा रहा था तो उसकी माँ ने कहा कि इस समय पौधे सो गए हैं। गेंद सेवेरे निकाल लेना। इसे सुनकर बालक के मन में तरह-तरह की जिज्ञासा होने लगी- ‘क्या पौंधों में हमारी तरह प्राण-जीवन होता है? क्या पानी-भोजन पाकर और बादलों को देखकर आनंदित होते हैं और उन्हें नुकसान पहुँचाने पर दुखी होते हैं। बड़ा होने पर उस बालक ने यह खोज की कि पौधों में भी हमारे जैसे जीवन की कई बातें मिलती हैं। इससे संसार हैरान हो गया। उस बालक का नाम था-जगदीशचन्द्र बसु।

जगदीशचन्द्र बसु का जन्म 30 नवम्बर 1858 को बंगाल प्रान्त (इस समय बंगला देश) के ढाका जिलान्तर्गत मेमन सिंह नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता विचारशील उच्च पदाधिकारी थे और माता भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट भाव प्रधान। बालक वसु ने अपने माता-पिता से इन गुणों को ग्रहण कर शिक्षा अध्ययन प्राप्त करने लगे। उनके प्रारंभिक सहपाठी किसानों और मछुआरों के लड़के थे। किसानों के लड़कों से उन्होंने पेड़-पौधों की ऐसी-ऐसी अपनी आरंभिक शिक्षा समाप्त कर तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने कलकत्ता के संत जेवियर्स कॉलेज में अपनी पढ़ाई समाप्त की। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड में जाकर महान वैज्ञानिकों के सम्पर्क में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। स्वेदश आकर उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रोफेसर के पद अध्यापन आरंभ कर दिया। उनकी योग्यता और स्वाभिमान के कारण उन्हें अच्छा वेतन मिलने लगा था।

1895 में खोजपूर्ण लिखे लेख इंग्लैंड के वैज्ञानिक पत्र में प्रकाशित हुए तो उन्हें बड़ी ख्याति मिली। वे इस दृष्टि से पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। विद्युत.संबंधी उनके उस लेख से प्रभावित होकर लन्दन की रायल सोसायटी ने उन्हें उस विषय में विशेष खोज करने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की। दो वर्ष के बाद बंगाल सरकार ने भी उन्हें इस दिशा में खोज करने के लिए विशेष सहायता राशि प्रदान की। उन्होंने अपनी मौलिक प्रतिभा को साकार करने के लिए. एक प्रयोगशाला बनाई। वह उनके मित्रों के सहयोग से ही चल पायी थी। उनके अनुसंधान कार्य के प्रतिवेदन को स्वीकार करके लंदन विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डॉक्टर ऑफ साइन्स’ की उपाधि से सम्मानित , किया। डॉ. बसु का दूसरा अनुसंधान था-बेतार के तार, जिसे उन्होंने 1895 में बंगाल के गवर्नर के सामने सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया। चूंकि उस समय हमारा देश गुलाम था। इसलिए इटली के डॉक्टर मार्कोनी ने इस आविष्कार को अपने नाम से रजिस्टर्ड करा लिया। फलस्वरूप इसका श्रेय डॉ. बसु को नहीं मिला।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने पेड़-पौधों के विषय में सबसे पहले बड़ी अद्भुत खोज की। उन्होंने वेदों-उपनिषदों के उस कथन को सत्य कर दिखाया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं और जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उनकी इस खोज से वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में चिंतन का एक नया अध्याय शुरू किया। उनके शोध-ग्रंथ ‘रिस्पांस इन दि लिविंग एंड नान-लिविंग’ ने सारे संसार में हलचल पैदा कर दिया। डॉ. बसु ने मैग्नेटिक कास्कोग्राफ’ के द्वारा यह सफलतापूर्वक प्रदर्शित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। इस दिशा में उनके द्वारा बनाए

यंत्रों में कास्कोग्राफ, रेजानेंट, रिकार्ड आदि अधिक चर्चित हैं। कास्कोग्राफ से पौधों . की वृद्धि और रेजोनेंट से उनके घायल होने या मरते समय के कंपन को देखा जा सकता है। इसे देखकर लोग हैरान हो गए। उनके इस प्रकार के चमत्कारी खोजों, आविष्कारों और प्रयोगों के कारण यूरोपियों ने उन्हें ‘पूर्व का जादूगर’ कहा है। उनकी ख्याति सारे संसार में फैल गई। लंदन की रायल सोसायटी ने उन्हें कई बार अपनी महत्त्वपूर्ण खोजों को प्रदर्शित करने और व्याख्यान देने के लिए बुलाया। 1906 में उनका ‘वृक्षों में जीव है’, नामक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। 1911 में भारत सरकार ने

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उनको सी.आई.ई., 1916 में सी.एस.आई. और 1917 में ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया। वे 1915 में प्रेसीडेन्सी कॉलेज से सेवा-निवृत्त हए तो अपनी 59वीं वर्षगाँठ पर अपने ‘वसु विज्ञान मंदिर की स्थापना की। 1928 में जब उनका 70वां शुभ जन्म-दिन बड़े उल्लास के साथ मनाया गया तो उन्हें देश-विदेश से शुभकामनाएँ भेंट की गयीं। वर्धा से 5 दिसंबर 1928 को महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखकर उनके दीर्घायु की मंगलकामना व्यक्त की थी। डॉ. वसु ने आजीवन विज्ञान-साधना की। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दौर में भी कई सफल वैज्ञानिक अनुसंधान किए। उनके द्वारा स्थापित ‘विज्ञान मंदिर’, एक ऐसा शोध संस्थान है, जिसमें वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों के लिए शोध-संबंधी सभी सुविधाएँ मौजूद हैं।

डॉ. बसु का निधन 23 नवबर 1937 को हुआ। वे वास्तव में वनस्पति विज्ञान के चमकते-दमकते नक्षत्र थे। उनमें अपार धैर्य, दृढ़ संकल्प, दयालुता विलक्षणता स्वाभिमान और देश-प्रेम भरा हुआ था। इन गुणों के कारण वे सदैव याद किए जाते रहेंगे।

डॉ. जगदीशचन्द्र बसु संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. कहते हैं कि कण-कण में भगवान मौजूद है। हमारे वेदों और उपनिषदों में भी यही कहा गया है। यहाँ जड़ और चेतन के बीच कोई भेदभाव नहीं बताया गया है। पर लोग धीरे-धीरे इसे भूलते चले गए। जड़ को अचेतन माना जाने लगा। जगदीशचन्द्र बसु ने इस विस्मृत ज्ञान को एक बार पुनः वैज्ञानिक मंच पर उठाया और अपने प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। उन्हें भी हम प्राणियों जैसी सर्दी-गर्मी व भूख-प्यास आदि लगती है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख की अनुभूति रखते हैं। वे भी आराम करते हैं और अंत में मनुष्यवत् ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

शब्दार्च-कण-कण-एक-एक रूप। विस्मृत-लुप्त, गायब । अनुभूति-अनुभव, ज्ञान, समझ। मनुष्यवत्-मनुष्य की तरह।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक वासंती’ हिन्दी सामान्य में संकलित महान वैज्ञानिक डॉ. जगदीशचन्द्र बसु के जीवन पर आधारित है ‘वैज्ञानिक निबंध’ नामक शीर्षक से है। इसमें डॉ. जगदीशचन्द्र बसु द्वारा पेड़-पौधों में जीवन को प्रमाणित किए जाने के विषय में प्रकाश डाला गया है। इस विषय में लेखक का कहना है कि

व्याख्या-हमारे धर्म-ग्रन्थों में यह कहा गया है कि सृष्टि के हर छोटे-बड़े रूप में ईश्वर की सत्ता और प्रभाव दिखाई देता है। खासतौर से हमारे चारो वेदों-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ईश्वर की सत्ता और उसकी उपस्थिति सृष्टि के हरेक रूप में बतलायी गयी है। इसी प्रकार के प्रमाण हमारे सभी पुराणों, उपनिषदों ‘ और ऋचाओं-स्मृतियों में बार-बार प्रस्तुत हुए हैं। इस प्रकार हमारे सभी धर्म-ग्रन्थ सृष्टि के जड़ और चेतन में ईश्वर की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। ऐसा करते हुए ने किसी का किसी के प्रति कोई अंतरभाव या भेदभाव नहीं प्रकट करते हैं। लेकिन यह बड़े ही अफसोस की बात कही जा सकती है कि आज के लोगबाग इतने आधुनिक मन-मस्तिष्क के हो गए हैं कि वे इसे लगभग भूल ही चुके हैं। उनके मन-मस्तिष्क की यही उपज है कि जड़ और अचेतन है।

लेखक का पुनः कहना है कि जब लोगों ने जड़ को अचेतन समझना शुरू कर दिया, तो डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने लोगों की इस भूल-भटकन को एक बार फिर से अपनी वैज्ञानिक सोच-समझ के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उन्होंने इसके लिए कई तरह के प्रयोग भी किए। उन प्रयोगों से यह साबित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी हमारी ही तरह का जीवन है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं। उन्हें भी सर्दी-गर्मी सताती है। उन्हें भी समय-समय पर भूख, प्यास और नींद लगती है। वे भी थकते हैं और आराम करते हैं। इस प्रकार हमारे जैसे जीवन जीते हुए अंत में मौत की गोद में चले जाते हैं।

विशेष-

  1. भाषा वैज्ञानिक शब्दों की है।
  2. शैली प्रामाणिक है।
  3. सम्पूर्ण कथन सत्य पर आधारित है।
  4. यह अंश ज्ञानवर्द्धक और भाववर्द्धक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर :

प्रश्न
(i). हमारे वेदों-उपनिषदों की क्या मान्यता है।
(ii) आज के लोगों की क्या मान्यता है?
(iii) डॉ. बसु ने वैज्ञानिक मंच पर क्या उठाया?
उत्तर
(i) हमारे वेदों-उपनिषदों की यह मान्यता है कि सृष्टि के एक-एक तत्त्व (रूप) में ईश्वर की सत्ता मौजूद है। इसलिए जड़ और चेतन में कोई अंतर नहीं है।
(ii) आज के लोगों की यह मान्यता है कि जड़ और चेतन में अंतर है। जड़ ही अचेतन है।
(iii) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने जड़ और चेतन क्या है? दोनों एक ही हैं या दोनों अलग-अलग हैं। इस तरह जड़-चेतन में भेद है या नहीं, इस प्रकार के तथ्य का गंभीरतापूर्वक अध्ययन-मनन किया। फिर इसे वैज्ञानिक मंच पर रखा।

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2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने क्या प्रमाणित कर दिया?
(ii) पेड़-पौधों और हमारे में मुख्य अंतर क्या है?
(iii) उपर्युक्त गद्यांश का प्रतिपाय क्या है?
उत्तर
(i) डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने अपने बार-बार के प्रयोगों से यह प्रमाणित कर दिया कि हमारी तरह ही पेड़-पौधों में जीवन है। वे भी हमारी तरह सुख-दुख का अनुभव करते हैं। उन्हें सर्दी-गर्मी और भूख सताती है। घायल होने पर वे भी दुख-दर्द से परेशान हो उठते हैं। इस प्रकार वे हमारी तरह जीवन-मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
(ii) पेड़-पौधों और हमारे में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। उनमें और हमारे में मुख्य अंतर यह है कि हम अपने दुखों और अभावों-कठिनाइयों को बड़ी गहराई से समझते हैं। अपने शक्ति-क्षमता से उन्हें दूर कर ही लेते हैं। पेड़-पौधे ऐसा नहीं कर पाते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति-क्षमता हमारी तुलना में बिल्कुल ही नहीं के बराबर होती है।
(iii) उपर्युक्त गद्यांश का प्रतिपाद्य है-पेड़-पौधों के विषय में अद्भुत और ज्ञानवर्द्धक जानकारी प्रस्तुत करना।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 17 मृत्तिका

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 17 मृत्तिका (नरेश मेहता)

मृत्तिका अभ्यास-प्रश्न

मृत्तिका लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी के मातृरूपा होने का क्या आशय है?
उत्तर
मिट्टी के मातृरूपा होने का आशय है-हर प्रकार से ऐसी सम्पन्नता जो भरण-पोषण कर जीवन-शक्ति प्रदान कर सके।

प्रश्न 2.
जब मनुष्य का अहंकार समाप्त हो जाता है, तब मिट्टी उसके लिए क्या बन जाती है?
उत्तर
जब मनुष्य का अहंकार समाप्त हो जाता है, तब मिट्टी उसके लिए पूज्य बन जाती है।

प्रश्न 3.
मिट्टी के किस रूप को प्रिया कहा गया है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी के कुंभ और कलश रूप को प्रिया कहा गया है। यह इसलिए कि इसे लेकर किसी की प्रिया जल भरने जाती है। वह उस जल को अपने प्रिय को पिला उसकी प्रिया होने के धर्म को निभाती है।

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प्रश्न 4.
में तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर
‘में तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी ने ऐसा कहा है। यह इसलिए कि उसे अपना कोई विशेष और चमत्कारी संस्कार नहीं प्राप्त होता है।

प्रश्न 5.
मिट्टी किस प्रकार चिन्मयी शक्ति बन जाती है?
उत्तर
मिट्टी को मनुष्य जब अपने पुरुषार्थ से पराजित होकर अपनेपन की भावना से पुकारता है, तब वह चिन्मयी शक्ति बन जाती है।

मृत्तिका दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी किन कष्टों को सहकर हमें धन-धान्य से पूर्ण करती है?
उत्तर
मिट्टी मनुष्य के पैरों से रौंद दिए जाने और हल के फाल से विदीर्ण किए जाने जैसे बहुत ही असहनीय कष्टों को सहकर हमें धन-धान्य से पूर्ण करती है।

प्रश्न 2.
इस कविता में मिट्टी के किन-किन स्वरूपों का उल्लेख किया गया
उत्तर
इस कविता में मिट्टी के विविध स्वरूपों का उल्लेख किया गया है।
माता, कुंभ, कलश, खिलौना, प्रजा, चिन्मयी शक्ति, आराध्या, प्रतिमा आदि मिट्टी के अलग-अलग स्वरूपों को इस कविता में चित्रित किया गया है।

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प्रश्न 3.
पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व क्यों कहा गया है?
उत्तर
पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व कहा गया है। यह इसलिए कि इससे ही किसी साधारण वस्तु को उसको महान और उपयोगी स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में पुरुष द्वारा असंभव को संभव किया जा सकता है और मिट्टी जैसे साधारण-सी वस्तु को देवत्व का दर्जा दिया जा सकता है।

प्रश्न 4.
‘मृत्तिका’ कविता के माध्यम से कवि ने क्या संदेश दिया है?
उत्तर
‘मृत्तिका’ कविता के माध्यम से कवि ने हमें यह संदेश दिया है कि हमें किसी भी साधारण-सी-साधारण चीज को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए। मिट्टी जैसी साधारण-सी वस्तु को मनुष्य अपने पुरुषार्थ के द्वारा उसे न केवल विविध स्वरूप प्रदान करता है अपितु अधिक उपयोगी और पूज्य स्वरूप में भी ढाल देता है। इसलिए हमें अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनी पूरी शक्ति, बुद्धि और विश्वास को लगा देना चाहिए। इससे कोई भी लक्ष्य दूर नहीं रह जाएगा। वह आसानी से हासिल हो ही जाएगा।

प्रश्न 5.
मृत्तिका के माता, प्रिया और प्रजा रूपों में से आपको सबसे अच्छा रूप कौन-सा लगता है और क्यों?
उत्तर
मृत्तिका के माता, प्रिया और प्रजा रूपों में हमें सबसे अच्छा रूप माता का लगता है। यह इसलिए कि माता से ही हमारा इस संसार में आना संभव हुआ। इससे हमारे जीवन की आरंभिक आवश्यकताएँ पूरी हुई, जिनके बलबूते पर हमने न केवल अपना विकास-विस्तार किया, अपितु दूसरों के विकास-विस्तार में सहायता की। अगर माता किसी को न प्राप्त हो, तो उसका कब अस्तित्व नहीं हो सकता है।

प्रश्न 6.
पुरुषार्थ पराजित स्वत्व से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पुरुषार्थ पराजित स्वत्व से आशय है-अहंकार के अपनापन का विसर्जन। जब पुरुषार्थ अहंकार के अपनापन का विसर्जन हो जाता है, तब दूसरों का महत्त्व और उपयोगिता का पता चलने लगता है। यह किसो के लिए आवश्यक है और कल्याणकारक भी।

मृत्तिका भाषा-अध्ययन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखत शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
अंतरंग, पराजित, स्वत्व, देवत्व, विश्वास।
उत्तर
शब्द – विलोम
अंतरंग – बहिरंग
पराजित – अपराजित
देवत्व – राक्षसत्व
विश्वास – अविश्वास।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
1. जिसकी रुचि साहित्य में हो।
2. जो सब कुछ जानता हो।
3. जो किए हुए उपकारों को मानता है।
4. जो किए उपकारों को नहीं मानता है।
5. जो देखा नहीं जा सकता है।
उत्तर
वाक्यांश के लिए एक शब्द
बाक्यांश – एक शब्द
1. जिसकी रुचि साहित्य में हो। – साहित्यिक
2. जो सब कुछ जानता हो। – सर्वज्ञ
3. जो किए हुए उपकारों को मानता है। – कृतज्ञ
4. जो किए हुए उपकारों नहीं मानता है। – कृतघ्न
5. जो देखा नहीं जा सकता है। – अदृश्य।

प्रश्न 3.
“अपने ग्राम देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ।” काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त काव्य-पंक्ति का काव्य-सौन्दर्य ओजस्वी भावों से पष्ट है। मिट्टी को वाणी प्रदान करने से मानवीकरण अलंकार की चमक से कथन को प्रभावशाली ढंग में प्रस्तुत करने का कवि प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। .

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प्रश्न 4.
(क) में तो मात्र मृत्तिका हूँ
जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो तव में
धनधान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ।

1. उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ मुक्त छंद हैं लय मात्रा से विहीन हैं इन्हें अतुकान्त पद भी कहा जाता है।
क. काव्य में मृत्तिका (मिट्टी) ने मानव को सम्बोधित करते हुए अपने विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। अतः सम्बोधन शैली द्रष्टव्य है।
ख. कविता में माँ के रूप में त्याग, प्रेमिका के रूप में शांति-तृप्ति, प्रजा के रूप में मनचाहा व्यवहार, प्रतिमा के रूप में आराधना बताई गयी है इस प्रकार भाषा के साधारण अर्व के साथ गहन (द्वितीय) अर्व भी हो तो लाक्षणिकता कहलाती है। कविता से लाक्षणिक शब्दों से युक्त पंक्तियाँ छाँटकर लिखिए।
उत्तर
कविता से लाक्षणिक शब्दों से युक्त पंक्तियाँ
1. जब तुम
मुझे पैरों से रौंदते हो
तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो,
तब में
धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ!

2. कुंभ और कलश बनकर
जल लाती तुम्हारी अंतरंग प्रिया हो जाती हूँ।

3. जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने रूप पर
आकर्षित होकर मचलने लगते हो
तब मैं
तुम्हारे शिशु-हाथों में पहुँच प्रजारूपा हा जाती हूँ।

4. पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्थ, पराजित स्वत्व से मुझे पुकारते हो
तब मैं
अपने ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मय शक्ति हो जाती हूँ।

5. प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ।

मृत्तिका योग्यता-विस्तार

(क) मृत्तिका कविता की तरह पवन और जल विषय पर अपनी कल्पना से कविता बनाइए और कक्षा में सुनाइए।
(ख) कवि शिवमंगल सिंह सुमन की कविता ‘मिट्टी की महिमा’ पढ़कर मिट्टी की सृजन-शक्ति और महिमा को जानिए।
(ग) मानव का पुरुषार्थ ही उसे देवत्व प्रदान करता है इस विषय पर कक्षा में अपने विचार लिखिए।
(घ) ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ ये पाँचों तत्त्व प्रकृति द्वारा प्रदत्त हैं। इनका महत्त्व प्रतिपादित करते हुए अपने शब्दों में आलेख लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मृत्तिका परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ’ मिट्टी के ऐसा कहने से उसका कौन-से भाव व्यक्त हो रहे हैं?
उत्तर
‘मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ मिट्टी के ऐसा कहने से उसका सरल, सामान्य और निराभिमान के भाव व्यक्त हो रहे हैं।

प्रश्न 2.
स्वयं को मातृरूपा कहकर मिट्टी ने माता की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर
स्वयं को मातृरूपा कहकर मिट्टी ने माता की कई विशेषताओं की ओर संकेत किया है। उसके अनुसार अपनी संतान की रक्षा और उसके सुख के लिए माता अनेक प्रकार के कष्टों को सहती है। यहाँ तक कि वह अपने प्राणों को संकट में डालने से भी पीछे नहीं हटती है।

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प्रश्न 3.
मिट्टी का सबसे लोकप्रिय रूप कौन-सा होता है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी का सबसे लोकप्रिय रूप उससे बने हुए खिलौने होते हैं। यह इसलिए कि उसे बनाकर मनुष्य उसे मेले में बेचने के लिए ले जाता है, तब देखने वाले उस पर लट्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
शिशु-हायों में पहुँचकर मिट्टी प्रजारूपा क्यों हो जाती है?
उत्तर
शिशु-हाथों में पहुँचकर मिट्टी प्रजारूपा हो जाती है। यह इसलिए कि शिशु-हाथ अपनी इच्छानुसार उसका उपयोग करते हैं।

प्रश्न 5.
सबसे बड़ा देवत्व क्या है?
उत्तर
सबसे बड़ा देवत्व यही है कि मनुष्य पुरुषार्थ करता है। मिट्टी उसके पुरुषार्थ से एक-से-एक महान और उपयोगी स्वरूप को प्राप्त करती है।

मृत्तिका दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मिट्टी को अत्यधिक आकर्षक स्वरूप कौन और कैसे प्रदान करता है?
उत्तर
मिट्टी को अत्यधिक आकर्षक स्वरूप कुम्हार प्रदान करता है। वह मिट्टी को भिगो-भिगो कर उसे फूलने देता है। उसके बाद वह उसे अपने पैरों से रौंदता है फिर वह अपने हाथों से मल-मलकर मुलायम करके रख देता है। उसे मनमाने रूप देने के लिए चाक पर रखकर घुमाने लगता है। ऐसा करते हुए वह उसे अपने हाथों से सहला-सहला कर मनमाने रूप में ढालकर चाक पर से उतारकर रख देता है। सूख जाने पर वह विभिन्न प्रकार के रंगों से रंगकर उसे सुन्दर और मोहक बना देता है।

प्रश्न 2.
मिट्टी का कौन-सा रूप हमारे लिए अधिक उपयोगी है और क्यों?
उत्तर
मिट्टी का उत्पादक स्वरूप हमारे लिए अधिक उपयोगी है। यह इसलिए कि इससे हमारा जीवन संभव होता है। हमारा अस्तित्व बना रहता है। अगर मिट्टी हमें एक माँ की तरह अन्न-धन प्रदान न करे तो हम जीवित नहीं रह सकेंगे। हमारा अस्तित्व नहीं रह सकेगा। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यों तो मिट्टी के सभी रूप-प्रतिरूप हमारे लिए उपयोगी और आवश्यक हैं, लेकिन उसका उत्पादक स्वरूप सबसे अधिक उपयोगी और आवश्यक है।

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प्रश्न 3.
कविता में मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख किया गया है, क्यों?
उत्तर
कविता में मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख किया गया है। यह इसलिए मिट्टी के विभिन्न स्वरूपों से अधिकांश लोग अनजान होते हैं। वे मिट्टी को सामान्य रूप में ही देखते-समझते हैं। कवि ने उनके इस भ्रम को तोड़ने के लिए ही मिट्टी के एक-से-एक बढ़कर आकर्षक और उपयोगी स्वरूपों को बहलाने का प्रयास किया है।

प्रश्न 4.
‘मृत्तिका’ कविता का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मृत्तिका’ कविता कविवर नरेश मेहता की एक ज्ञानवर्द्धक और रोचक कविता है। कविवर नरेश मेहता अपनी इस कविता में अपनी कल्पना को एक ओर रख करके केवल अपनी अनुभूति को ही स्थान दिया है। उन्होंने इस कविता के द्वारा मिट्टी के प्रति हमारे सोए हुए ज्ञान को जगाने का प्रयास किया है। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि मृत्तिका कविता में कवि ने मिट्टी के विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। माटी को मातृत्व स्वरूपा, प्रिया स्वरूपा और शिशु-भाव से जोड़कर उसे प्रजारूपा दर्शाया है। इन तीनों रूपों का सार्थक समन्वय ही देवत्व को प्रकट करता है।

मृत्तिका किवि-परिचय

प्रश्न
श्री नरेश मेहता का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-कविवर नरेश मेहता का नयी कविताधारा के कवियों में विशिष्ट स्थान है। उनकी कविताओं में उनके असाधारण और बहमुखी प्रतिभा की झलक साफ-साफ दिखाई देती है। चूंकि उनका रचनात्मक व्यक्ति बड़ा ही अद्भुत है तो उनकी रचनाएँ उनकी इस विशेषता को तुरन्त प्रकट कर देती हैं।
रचनाएँ-कविवर नरेश मेहता की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. वन पारखी सुनीं
  2. बोलने को चीड़ को
  3. संशय की एक रात
  4. समय देवता आदि नरेश मेहता जी के काव्य-संग्रह हैं।

साहित्यिक महत्त्व-कविवर नरेश जी का साहित्यिक महत्त्व नयी कविता के उल्लेखनीय कवियों में से एक है। मध्य-प्रदेश के साहित्यकारों में तो आपका अग्रणीय स्थान है। आपकी कविताओं की यह सर्वमान्य विशेषता है कि उनमें कल्पना की नहीं, अपितु अनुभूति की ही प्रधानता है। आपकी साहित्यिक सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपसे वर्तमान साहित्य और साहित्यकारों को अनेक अपेक्षाएँ हैं।

मृत्तिका कविता का सारांश

प्रश्न 1.
कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ एक ज्ञानवर्द्धक कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है मिट्टी मनुष्य को संबोधित करती हुई कह रही है-हे मनुष्य! मैं तो केवल मिट्टी हूँ। जब तुम अपने पैरों से मुझे रौंदते हो और हल के फाल से विदीर्ण करते हो, तब मैं धन-धान्य बनकर तुम्हारे लिए माँ के रूप में बन जाती हूँ। जब तुम मुझे अपने हाथों से स्पर्श करते हो और मुझे चाक पर रखकर घुमाने लगते हो, तब मैं घड़ा बनकर जल लाने वाली तुम्हारी प्रिया का रूप धारण कर लेती हूँ। जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने के रूप पर गद्गद् होकर मचलने लगते हो, तब मैं तुम्हारे बच्चों के हाथों में पहुँचकर प्रजा का रूप धारण कर लेती हूँ। जब तुम अपनी शक्ति-क्षमता को भूलकर मुझे बुलाते हो, तब मैं अपनी ग्रामीण शक्ति से चिन्मयी शक्ति को शरण कर लेती हूँ। उस समय मेरी मूर्ति तुम्हारी आराध्या हो जाती है। इसलिए हे पुरुषार्थी मनुष्य! तुम यह विश्वास कर लो कि यही मेरा मिट्टी स्वरूप देवत्व है।

मृत्तिका संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ
जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो
तवा हल के फाल से विदीर्ण करते हो
तब मैं धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूं।
जब तुम मुझे हाथों से स्पर्श करते हो
तथा चाक पर चढ़ाकर घुमाने लगते हो।

शब्दार्थ-मात्र-केवल। मृत्तिका-मिट्टी। रौंदते-कुचलते। विदीर्ण-फाड़ना। धन-धान्य-अन्न-धन। मातृरूपा-माता का रूप।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती, हिन्दी सामान्य’ में संकलित व कविवर नरेश मेहता-विरचित कविता ‘मृत्तिका’ से है। इसमें कविवर नरेश मेहता ने मिट्टी मनुष्य के प्रति क्या कह रही है, इसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कवि का कहना है कि

व्याख्या-हे मनुष्य! तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि जब तक मैं तुम्हारे सम्पर्क-स्पर्श में नहीं रहती है, तब तक मैं अपने साधारण रूप में ही रहती हैं। लेकिन जैसे ही मैं तुम्हारा सम्पर्क-स्पर्श प्राप्त करती हूँ, वैसे ही मैं कई रूपों को धारण कर लेती हूँ। उदाहरणस्वरूप जब तुम मुझे अपने पैरों से खूब मलते-कुचलते हो अर्थात् . रगड़ते हो। फिर हल के फाल से चीरते-फाड़ते हो, तब मैं वह साधारण मिट्टी नहीं रह पाती हूँ। दूसरे शब्दों में मैं अपने साधारण रूप को उतारकर असाधारण रूप को धारण कर लेती हूँ। मेरा यह असाधारण रूप धन-धान्य से भरा-पूरा होता है। वह मेरा भरा-पूरा रूप माता का होता है। इसी प्रकार जब तुम अपने हाथों से मुझे सहलाकर छूते हो, और फिर मुझे चाक पर चढ़ाकर नचाने लगते हो, तब मेरा रूप कुछ और ही हो जाता है।

विशेष-

  1. मिट्टी का आत्मकथन सत्यता और वास्तविकता पर आधारित है।
  2. भाषा की शब्दावली उच्चस्तरीय तत्सम शब्दों की है।
  3. शैली आत्मकथात्मक है।
  4. ‘मैं मात्र-मृत्तिका’ और ‘धन-धान्य’ में अनुप्रास अलंकार है।
  5. यह अंश रोचक और सरस है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-नरेश मेहता कविता-‘मृत्तिका’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की काव्य-योजना मुक्तछंद से तैयार है। इसमें तत्सम शब्द
(मात्र, मृत्तिका, विदीर्ण, मातृरूपा और स्पश) अधिक हैं: तो पैर, हाथ आदि तद्भव शब्द भी हैं। आत्मकथात्मक शैली में प्रस्तुत इस पद का काव्य-सौन्दर्य इससे निखरकर सामने आया है। कथन की सत्यता अद्भुत और चौंकाने वाली है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना.बड़ी लाक्षणिक और रोचक है। इस विशेषता को प्रस्तुत करने के लिए कवि ने मिट्टी के आत्मकथन की सत्यता को सामने रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। मिट्टी को विविध रूप देता हुआ मनुष्य मिट्टी की इस विशेषता को जान नहीं पाता है, इस तथ्य की विचित्रता को सरल भावों-कथनों से इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य और ही बढ़ गया है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) मिट्टी ने क्यों कहा है-“मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ।”
(ii) मिट्टी के मातृरूपा स्वरूप की क्या विशेषता है?
(iii) उपर्युक्त पयांश का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) मिट्टी ने कहा है-“मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ।” यह इसलिए कि मिट्टी मनुष्य के सम्पर्क-स्पर्श में जब तक नहीं आती है, तब तक उसका स्वरूप बिल्कुल साधारण और सामान्य ही बना रहता है।
(ii) मिट्टी के मातरूपा स्वरूप की बड़ी ही अद्भत विशेषता है। इस स्वरूप को प्राप्त हुई मिट्टी सचमुच में माता की ही तरह होती है। वह भी अपने पुत्र मनुष्य का भरण-पोषण अनेक प्रकार के धन-धान्य के द्वारा करती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-मिट्टी की अनोखी और उपयोगी विशेषताओं को प्रस्तुत करना। इसके द्वारा कवि ने मिट्टी में किस प्रकार से ऐसे गुण छिपे हुए हैं, इसे सुस्पष्ट करना चाहा है।

2. तब में
कुंभ और कलश बनकर
जल लाती तुम्हारी अंतरंग प्रिया हो जाती हूँ।
जब तुम मुझे मेले में मेरे खिलौने रूप पर
आकर्षित होकर मचलने लगते हो

तब मैं
तुम्हारे शिशु-हावों में पहुँच प्रजारूपा हो जाती हूँ।
पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्व-पराजित स्वत्व से मुझे पुकारते हो।

शब्दार्थ-कुंभ-घड़ा। अंतरंग-घनिष्ठ, अभिन्न। प्रिया-धर्मपत्नी। आकर्षित-लट्ट। शिशु-बालक। पुरुषार्थ-वीरता। पराजित-हार। स्वत्व-अपनापन।

प्रसंग-पूर्ववत । इसमें कवि ने मनुष्य के संपर्क-स्पर्श में आने पर मिट्टी के बदलते हुए स्वरूप को चित्रित करने का प्रयास किया है। इस विषय में कवि का कहना है कि मिट्टी मनुष्य से कह रही है

व्याख्या-हे मनुष्य! जब मैं तुम्हारे स्पर्श से चाक पर चढ़कर घूमने (चक्कर काटने लगती हूँ’ तब मैं एक नये और आकर्षक रूप को धारण कर लेती हैं। मह मेरा नया और आकर्षक स्वरूप कुंभ (घड़ा) और कलश का होता है। इस नये और आकर्षक स्वरूप की यह विशेषता होती है कि वह तुम्हारी अंतरंग प्रिया को प्रभावित किए बिना नहीं रहता है। दूसरे शब्दों में यह कि उस मेरे नये और आकर्षक स्वरूप कुंभ (घड़ा) और कलश को तुम्हारी अंतरंग प्रिया बड़े प्रेम से उठाकर तुम्हारे लिए उसमें जल लाती हूँ। इससे मुझे तुम्हारी अंतरंग प्रिया होने का गौरव प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार जब मैं तुम्हारे द्वारा चाक पर चढ़कर चक्कर काटने लगती हूँ, तब मुझे तुम एक और ही नया और अधिक स्वरूप दे देते हो। वह मेरा नया और अधिक स्वरूप खिलौने का होता है। फलस्वरूप उसे देखकर तुम खुशी से नाच उठते हो। फिर उसे मेले में ले जाकर तुम और अधिक खुशी से झूमने लगते हो। वहाँ जाकर जब मैं तुम्हारे बच्चों के हाथों में पहुँचती हूँ, तब मेरा रूप एक बार फिर बदल जाता है। वह बदला हुआ मेरा नया रूप प्रजा का रूप होता है। इतना होने पर जब कभी तुम अपने पुरुषार्थ के अहं का परित्याग कर अपनापन के भावों से मुझे जानने-समझने और पुकारने लगते हो, तब मैं उस समय कुछ और ही हो जाती हूँ।

विशेष-

  1. मिट्टी के बदलते स्वरूप पर प्रकश डाला गया है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. मुक्तक छंद है।
  4. मुझे मेले में मेरे, रूप पर, पहँच प्रजारूपा और पुरुषार्थ पराजित पराजित, में अनुप्रास अलंकार है।
  5. यह अंश भाव-वर्द्धक है।

1. पयांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
उपर्युक्त पयांश के कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-श्री नरेश मेहता कविता-‘मृत्तिका’।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-विधान आकर्षक है। इसके लिए कवि ने रस, छंद, अलंकार और प्रतीक-बिम्ब का चुन-चुन कर प्रयोग किया है। अनुप्रास अलंकार (मुझे मेले में मेरे, रूप पर, पहुँच प्रजा रूप और पुरुषार्थ-पराजित) की झड़ी लगा दी है। मुक्तक छंद से मिट्टी की मुक्त अभिव्यक्ति साकार होकर मन को छू लेती है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान सरल भावों का है। मिट्टी का कथन बड़ा ही स्वाभाविक और उपयुक्त है। मनुष्य का मिट्टी के बदलते स्वरूप से अज्ञान रहने की सच्चाई खोलने का प्रयास सचमुच में प्रशंसनीय है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुंभ और कलश से मिट्टी का कौन-सा स्वरूप प्रकट होता है?
(ii) मनुष्य मिट्टी के किस रूप को देखकर मचलने लगता है और क्यों?
(iii) मिट्टी के प्रजारूप से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) कुंभ और कलश से मिट्टी का नया और अत्यधिक आकर्षक रूप प्रकट होता है। वह आकर्षक रूप मनुष्य के प्रिया-स्वरूप का होता है, जो उसके लिए सुख और अधिक मोहक कहा जाता है।
(ii) मनुष्य मिट्टी के खिलौने रूप को देखकर मचलने लगता है। यह इसलिए कि उसमें बहुत बड़ा आकर्षण होता है। उससे उसके बच्चे जब फूले नहीं समाते हैं,
तो उसको अपनी मेहनत का बड़ा ही सुखद और अद्भुत अनुभव होने लगता है।
(iii) मिट्टी के प्रजारूप से तात्पर्य है-प्रजा का स्वरूप। जिस प्रकार प्रजा अपने स्वामी के प्रति कृतज्ञ होकर उसकी इच्छानुसार उसकी सेवा में लगी रहती है, उसी प्रकार मिट्टी भी मनुष्य द्वारा खिलाने-रूप में ढालने पर उसके और उसके बच्चों को खुश करने की सेवा में लग जाती है।

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3. तब मैं
अपने ग्राम्य देवत्य के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ
प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ
विश्वास करो
यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि
तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो
और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।

शब्दाभग्राम-देवत्व-गाँव के देवता । चिन्मयी शक्ति-चेतना युक्त शक्ति । प्रतिमा-मूर्ति। आराध्या-आराधना के योग्य, पूज्य। देवत्व-देवता होने का महत्त्व।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने मिट्टी का मनुष्य के प्रति अपने विविध स्वरूप में ढलने का कथन हैं इस विषय में कवि का कहना है कि मिट्टी मनुष्य को ज्ञानमयी बातों को बतला रही है। उसका कहना है

व्याख्या-हे मनुष्य! जब तुम अपने पुरुषार्थ से हार-थककर मुझे अपनेपन की ‘ भावना से पुकारते हो, तब मैं अपने गाँव के देवत्व (देवता होने के महत्त्व) की भावना के फलस्वरूप चेतनामुक्त शक्ति-सम्पन्न हो जाती हूँ। इसकी छवि और सुन्दरता को मैं अपनी अलग-अलग बनी हुई मूर्तियों में धारण करके तुम्हारे लिए पूज्य बन जाती हूँ। इसलिए मैं तुमसे यही कहना चाहती हूँ कि तुम मुझ पर विश्वास करो। इससे ही तुम्हें पूरी तरह से यह यकीन हो जाएगा कि सबसे बड़ा देवत्व है कि तुम असाधारण पुरुषार्थ करते हो और में तुम्हारे इस असाधारण पुरुषार्थ के फलस्वरूप ही अनेक रूपों-प्रतिरूपों में बदलती हुई महत्त्व प्राप्त करती हूँ।

विशेष-

  1. भाषा प्रभावशाली है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. शैली आत्मकथात्मक है।
  4. मुक्त क छंद है।
  5. मिट्टी को मनुष्य की वाणी दी जाने के कारण मानवीकरण अलंकार है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) कवि-नरेश मेहता कविता-मत्तिका।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-स्वरूप प्रभावशाली रूप में है। मिट्टी का मानवीकरण करके इसे और आकर्षक बनाने का जो प्रयास किया गया है, वह निश्चय ही
और सटीक है। मिट्टी के कथन को प्रभावशाली बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से चित्रित करने का ढंग भी कम अनोखा नहीं है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-स्वरूप सहज और रोचक है। सम्पूर्ण कथन सच्चा होने पर भी चौंकाने वाला है। यही नहीं यह ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ अधिक ध्यान दिलाने वाला है। मिट्टी की सहजता में उसकी छिपी हुई विशेषता को प्रकाशित करने का कवि-प्रयास को दाद दी जा सकती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) मिट्टी की चिन्मयी शक्ति से क्या अभिप्राय है?
(ii) मिट्टी कब पूज्य बन जाती है? ।
(iii) मनुष्य और मिट्टी की क्या सच्चाई है?
उत्तर
(i) मिट्टी की चिन्मयी शक्ति से अभिप्राय है-मिट्टी के चेतनायुक्त शक्ति। मिट्टी मनुष्य के तरह-तरह के परिश्रम से तरह-तरह के सजीव और आकर्षक रूपों में दिखाई देती है।
(ii) मिट्टी, मनुष्य के परिश्रम और अद्भुत बुद्धि-कला से विभिन्न आकर्षक और देव-देवी की प्रतिमा में बदल जाती है। उससे वह मनुष्य के लिए पूज्य बन जाती है।
(iii) मनुष्य और मिट्टी की सच्चाई बड़ी ही सुस्पष्ट है। मनुष्य पुरुषार्थ (मेहनत) करता है। उसके पुरुषार्थ मेहनत के कारण मिट्टी एक से एक बढ़कर आकर्षक महान रूपों को धारण करती है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 समर्पण

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 16 समर्पण (सुरेशचन्द्र शुक्ल)

समर्पण अभ्यास-प्रश्न

समर्पण लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मनुष्य कब देवतुल्य बन जाता है?
उत्तर
अपने उच्च और महान गुणों से मनुष्य देवतुल्य बन जाता है।

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने अकबर को संधि-पत्र क्यों भेजा था?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने अकबर को संघि-पत्र भेजा था। यह इसलिए कि उनमें अकबर का सामना करने की शक्ति नहीं रह गई थी।

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प्रश्न 3.
अकबर ने महाराणा प्रताप का संधि-पत्र क्यों अस्वीकार कर दिया?
उत्तर
अकबर ने महाराणा प्रताप का संधि-पत्र अस्वीकार कर दिया। यह इसलिए कि अकबर को वह संधि-पत्र जाली लगा। उसने राजकवि पृथ्वीराज को उसकी सत्यता का पता लगाने की आज्ञा दे दी।

प्रश्न 4.
भामाशाह के चरित्र में निहित राष्ट्रीय भावना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भामाशाह का पूरा चरित्र राष्ट्रीय भावनाओं से भरा हुआ था। उसमें अपार देशभक्ति की भावना थी। वह देश का सच्चा सेवक था। इसलिए वह मेवाड़ पर आए । हुए संकट को नहीं देख सकता था। इसके लिए महाराणा प्रतापं को धन की वह थेली भेंट की जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह साल तक चल सकता था। यही नहीं उसने फिर से तलवार ग्रहण करके प्रतिज्ञा की वह तन-मन और धन से मेवाड़ की रक्षा में आजीवन अपना योगदान देता रहेगा

समर्पण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप की स्तुति किन शब्दों में की?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप की स्तुति निम्नलिखित शब्दों में की आज भारत के अनेक राजाओं ने अकबर के आगे सिर झुका दिया है-सिर ही नहीं, रोटी और बेटी का संबंध भी जोड़ा है। अब आप ही भारत माँ के मस्तक की बिंदी की तरह बचे हैं। आपका सिर झुकाना भारत माँ का सिर झुकाना होगा। संसार में पार्थिव रूप से कोई अमर नहीं है प्रताप! यदि आपने अपने शीर्य को सँभाला तो आपकी यशगाथा युगों-युगों चलेगी।

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने के लिए क्या प्रतिज्ञा की?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने के लिए निम्नलिखित प्रतिज्ञा की जब तक मेवाड़ को स्वतंत्र न करा लूँगा, तब तक दाढ़ी और बाल न बनवाऊँगा। और न पलंग पर सोऊँगा, न स्वर्ण-पात्रों में भोजन करूँगा। (भूमि की ओर संकेत कर) यह भूमि ही मेरी शैया होगी और (मिट्टी को हाथ में उठाकर) इस मिट्टी के बने बर्तन ही मेरे पात्र होंगे। जब तक इस शरीर में प्राण रहेंगे, यह सिर अकबर के आगे नत न होगा।

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प्रश्न 3.
‘समर्पण’ एकांकी का नायक आप किसे मानते हैं? उसके चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
‘समर्पण’ एकांकी का नायक हम महाराणा प्रताप को मानते हैं। उनके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
1. पारिवारिक उत्तरदायित्व का निर्वाह-महाराणा प्रताप में पारिवारिक संबंधों को निभाने की अहम् विशेषता है। यद्यपि वे अपने मेवाड़ की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए तत्पर हैं। इससे पहले वे अपने परिवार के सदस्यों, पत्नी, बेटा और बेटी को सुखी और स्वतंत्र देखना चाहते हैं। यही कारण है कि वे उनके सुख के लिए ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए संधि-पत्र भेज देते हैं।

2. समय का सच्चा पारखी-महाराणा प्रताप के चरित्र की दूसरी विशेषता है-समय का सच्चा पारखी। सचमुच में महाराणा प्रताप समय के सच्चे पारखी हैं। हर प्रकार से अकबर से लोहा लेकर जब वे बार-बार हार जाते हैं तो उन्हें यही समझ में आता है कि समय उनके विपरीत है। अब तो अपने बच्चों और पत्नी का और दुख उनसे नहीं देखा जाता। इस प्रकार वे अपने बुरे समय की परख करके ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने को ही उचित समझते हैं।

3. कृतज्ञता-महाराणा प्रताप के चरित्र की तीसरी विशेषता है-कृतज्ञता। वे अकबर के राजकवि पृथ्वीराज के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं कि उन्होंने उनकी वीरता और महानता को उनके शत्रु अकबर के सामने खुलकर प्रकट की है। इसी प्रकार वे अपनी घोर विपत्ति के समय अपने मंत्री और दीवान भामाशाह द्वारा दी गई सहायता राशि को पाकर उसकी बार-बार प्रशंसा कर अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

4. महान देश-भक्त-महाराणा प्रताप महान देश-भक्त हैं। वे मेवाड़ को स्वतंत्र करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।

प्रश्न 4.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) ‘दुख में जो विचलित हो जाते हैं वे वीर नहीं कहलाते।’
(ख) परिस्थितियाँ मनुष्य को विवश कर देती हैं, मनुष्य चाहे तो परिस्थितियों को विवश कर सकता है। जो परिस्थितियों को मोड़कर आगे बढ़ते हैं उन्हीं की यशगाथा अमर रहती है।
उत्तर
(क) उपर्युक्त वाक्य का आशय यह है कि सच्चे वीर परुष किसी भी दशा में अपनी वीरता प्रकट करते ही रहे हैं। उन्हें कठिन-से-कठिन परिस्थितियाँ न तो झुका सकती हैं और न उन्हें बदल सकती हैं। कहने का भाव यह कि वीर पुरुष की वीरता सभी प्रकार की बाधाओं को पार कर आगे निकल जाती है।
(ख) उपर्युक्त वाक्यों का आशय यह है कि साधारण खासतौर से कायर मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है; लेकिन वीर पुरुष इसके ठीक विपरीत होते हैं। वे परिस्थितियों के न तो दास होते हैं और न उनसे वे विवश ही होते हैं। वे तो परिस्थितियों को अपना दास बना लेते हैं। उन्हें वे विवश कर देते हैं। ऐसे वीर पुरुष का यशगान संसार युगों-युगों तक करता रहता है।

प्रश्न 5.
भारत-माता को महाराणा प्रताप से क्या अपेक्षाएँ वी?
उत्तर
भारत-माता को महाराणा प्रताप से अनेक अपेक्षाएं थीं। उसे उनसे यह अपेक्षा वे अकबर के जनाने के कैद अबलाओं की पुकार सुनेंगे। फिर उन्हें आजाद करेंगे। यही नहीं वे भारत के उन राजाओं को स्वतंत्र करेंगे, जो अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके हैं।

समर्पण भाषा-अध्ययन

(क) वर्तनी सुधारिए
कीर्ती, करुड़, स्विकार, गृहण, आहूति, कालीख, शक्तीयाँ, प्रतीज्ञा।
उत्तर
(क) अशुद्ध वर्तनी शुद्ध वर्तनी
कीर्ती – कीर्ति
करुड़ – करुण
स्विकार – स्वीकार
गृहण – ग्रहण
आहूति – आहुति
कालीख – कालिख
शक्तीयाँ – शक्तियाँ
प्रतीज्ञा – प्रतिज्ञा।

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(ख) दिये गये वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए
(i) जिसे क्षमा न किया जा सके।
(ii) जो कुछ न करता हो।
(iii) जिसमें दया न हो।
(iv) जहाँ पहुँचना कठिन हो।
(v) उपकार को मानने वाला।
उत्तर
वाक्यांशों के लिए एक
शब्द वाक्यांश – एक शब्द
(i) जिसे क्षमा न किया जा सके। – अक्षम्य
(ii) जो कुछ न करता हो। – निठल्ला, निकम्मा
(ii) जिसमें दया न हो। – निर्दयी
(iv) जहाँ पहुँचना कठिन हो। – दुर्गम
(v) उपकार को मानने वाला। – कृतज्ञ।

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(घ) अपने मित्र को पत्र लिखिए जिसमें अपने प्रदेश की संपन्नता और संस्कृति के बारे में बताया गया हो।
उत्तर

मित्र के नाम पत्र

26 बंगलो रोड़
दिल्ली-110007
23-10-2008

प्रिय मित्र रवि,
सप्रेम नमस्ते!

तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। पत्र में तुमने मेरे प्रदेश (दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी) की संपन्नता और संस्कृति के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की है, इससे मुझे और प्रसन्नता हुई। मित्र! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मेरा प्रदेश दिल्ली है। इसे देश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह इसलिए कि यह देश के अन्य महानगरों से बहुत अधिक सम्पन्न है। यहाँ सब कुछ है। मुख्य रूप से ऐतिहासिक महानगर होने के साथ-साथ यह आधुनिक महानगर है। लाल किला, जामा मस्जिद, कुतुब मीनार, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन आदि से इसकी ऐतिहासिक संपन्नता है, तो अनेक विश्वविद्यालयों, शिक्षा-विज्ञान के संस्थानों, बाजारों, पर्यटन स्थलों, धार्मिक स्थलों, यातायात की सभी प्रकार की सुविधाओं को यहाँ देखा जा सकता है और उनसे आनंद प्राप्त किया जा सकता है। परस्पर मेल-मिलाप की संस्कृति यहाँ के किसी कोने में देखी जा सकती है। अलग-अलग भाषाओं, बोलियों, तिथि-त्यौहारों, उत्सवों, खान-पान, पहनावे आदि की संस्कृति की सम्पन्नता यहाँ जितनी अधिक और जिस रूप में है, उतनी और कहीं नहीं है। यही मेरे प्रदेश दिल्ली का कमाल है। इसे देखकर किसी ने कहा है

‘दिल्ली है दिलवालों की, बाम्बे पैसेवालों की!’
माँ को चरण-स्पर्श रवि

तुम्हारा अभिन्न
दयाल

रवि
17-ए कमच्छा
वाराणसी

समर्पण योग्यता-विस्तार

(1) भारत भूमि सदा से वीरों और महापुरुषों की भूमि रही है। हमारे स्वर्णिम इतिहास में जिन-जिन महापुरुर्षों और वीर-वीरांगनाओं का योगदान रहा है उनके चित्र और जानकारी एकत्रित कीजिए।
(2) आज हम पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर रहे हैं। हमें अपने जीवन-मूल्यों का महत्त्व समझना है। इस विषय पर कक्षा में अपने साथियों से चर्चा कीजिए।
(3) आप पाश्चात्य संस्कृति के किन बिन्दुओं से असहमत हैं अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर
उपयुक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

समर्पण परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अकबर के दरबार में महाराणा प्रताप की कौन-सी बात चल रही थी?
उत्तर
अकबर के दरबार में महाराणा प्रताप की वीरता की बात चल रही थी। अकबर कह रहा था-“मैंने प्रताप-सा वीर, अपने जीवन में नहीं देखा। भारत के बड़े-बड़े राजाओं ने मेरी अधीनता स्वीकार कर ली, पर प्रताप ने मेरे सामने सिर नहीं झुकाया। उसकी वीरता सराहनीय है।

प्रश्न 2.
राजकवि ने अकबर से संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने का क्या कारण कहा?
उत्तर
राजकवि ने अकबर से कहा कि जहाँपनाह सिसौदिया कुल के मेवाड़ राजाओं ने मेवाड़ की रक्षा अपने प्राणों को देकर की है, उसे महाराणा प्रताप इस तरह नहीं खो देगा। इसलिए इस संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने की उसे आज्ञा दी जाए।

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प्रश्न 3.
लक्ष्मी ने वीरों की क्या विशेषता बतलायी है?
उत्तर
लक्ष्मी ने वीरों की यह विशेषता बतलायी है-‘वीर सुख-दुख दोनों में कर्त्तव्य का ध्यान रखते हैं। दुख में जो विचलित हो जाते हैं, वे वीर नहीं कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
कौन मनुष्य नहीं देवता होते हैं? उत्तर-जो परिस्थितियों को मोड़कर आगे बढ़ते हैं, वे मनुष्य नहीं देवता होते हैं। प्रश्न 5. भामाशाह ने महाराणा प्रताप को क्या सहयोग दिया?
उत्तर
भामाशाह ने महाराणा प्रताप को धन की एक थैली दी, जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह वर्ष तक चल सकता था।

समर्पण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अकबर को संघि-पत्र भेजने पर अमर सिंह ने विरोध किया तो महाराणा प्रताप ने उससे क्या कहा?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने अमर सिंह को समझाते हुए कहा “बेटा समय सब कुछ करा लेता है। तुम देख रहे हो, किस प्रकार हम सब वन में मारे-मारे फिर रहे हैं। तुम्हारी माँ, जो महलों में आराम से रहती थी, भीलनियों के साथ, इस जलजलाती धूप में, हम सबके लिए फल ढूँढ़ रही है, और दिनों का फेर कि सुबह से शाम तक कभी-कभी एक भी फल नहीं मिलता।”

प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप ने राजकवि पृथ्वीराज से अपनी विवशता किन शब्दों में व्यक्त किया?
उत्तर
महाराणा प्रताप ने राजकवि पृथ्वीराज से अपनी विवशता निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया मोह में नहीं डूब रहा हूँ कवि। यदि मेरे पास साधन होते तो अकबर को दिखा देता कि प्रताप सिंह ने कितनी शक्ति है। असहाय होने के बाद भी, चार वर्ष से कोशिश कर रहा हूँ, पर कोई सहारा नहीं मिला। सब तरफ से निराश होकर मैंने संधि-पत्र लिखा था।

प्रश्न 3.
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप को किस प्रकार उत्साहित किया?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने राणा प्रताप को इस प्रकार उत्साहित करते हुए कहा साहस से काम लो प्रताप! देखो, बाप्पा रावल और हंसपाल ने शक्ति न होते हुए भी, जीते-जी मेवाड़ की रक्षा की। अपने पितामह को देखो, शरीर में अस्सी घाव होने पर भी पानीपत के मैदान में बहादुरी से लड़े। झालामाना पर दृष्टि डालो, जिसने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। आज आपके संधि-पत्र को देखकर इन वीरों का हृदय स्वर्ग में रहा रहा होगा।

प्रश्न 4.
राजकवि पृथ्वीराज से महाराणा प्रताप ने क्या अपनी व्यथा प्रकट की?
उत्तर
राजकवि पृथ्वीराज ने महाराणा प्रताप ने अपनी निम्नलिखित व्यथा प्रकट की “कवि! तुमने मेरी स्थिति न सोची होगी। बच्चों की करुण-पुकार तुम्हें न सुनाई पड़ी होगी, नहीं तो तुम्हारा हदय भर आता, और तुम ऐसा न करते। मैंने अपने सुख के लिए संधि पत्र नहीं लिखा। पर इन सबके (रजनी की ओर संकेत कर) कष्ट मुझसे नहीं देखे गए। जब बच्चे रोटी के एक-एक टुकड़े को रोते हैं, तो मेरा धैर्य पिघलकर पानी-पानी हो जाता है। अब मैं और अधिक नहीं रह सकता कवि! तुमने ऐसा क्यों किया?

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प्रश्न 5.
‘समर्पण’ एकांकी का प्रतिपाय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
‘समर्पण’ एकांकी महान एकांकीकार डॉ. सुरेश शुक्ल-लिखित ऐतिहासिक एकांकी है। इसमें मुगल शासक अकबर और मेवाड़ केसरी महाराणा के बीच होने वाली संधि को आधार बनाकर महाराणा प्रताप और उनके परिवार की सहनशीलता, देशभक्ति और वीरता से संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। ये सभी तथ्य न केवल चौकाने वाले हैं, अपितु देश-भक्ति के सोए हुए भावों को जगाने वाले भी हैं। इस प्रकार एकांकीकार ने इस एकांकी के माध्यम से हमें यह संदेश देना चाहा है कि हम कितनी ही कठिन, दुखद और अपार परिस्थितियों में क्यों न घिरे रहें, हमें अपनी मातृभूमि के दुख और दुर्दशा को नहीं भूलना चाहिए। उसे हर प्रकार से सुखमय और संपन्न बनाने के लिए हमें अपने तन-मन, धन सब कुछ न्यौछावर कर देना चाहिए।

समर्पण लेखक का परिचय

प्रश्न
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल का आधुनिक हिंदी एकांकीकारों में प्रमुख स्थान है। ऐतिहासिक एकांकी रचना के क्षेत्र में आप अधिक उल्लेखनीय हैं।

जीवन परिचय-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल हिंदी के एक ऐसे महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं, जिन्होंने हिंदी गद्य-विधा के लिए अपना अद्भुत योगदान दिया है। खासतौर से आपने ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित एकांकी रचना के लिए विशेष प्रयास किया है। इस तरह से आपका दृष्टिकोण पूरी तरह से स्वस्थ और नया है। इस तरह आपने आधुनिक हिंदी एकांकी-नाटकों को एक ऐसी नई दिशा दी है, जिनमें मुख्य रूप से मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना के स्वर सुनाई देते हैं।

रचनाएँ-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल के अब तक सोलह पूर्णाकार नाटक और चार एकांकी संग्रह, प्रकाशित हो चुके हैं; जो इस प्रकार हैं! ‘प्रत्यावर्तन’, ‘स्वप्न का सत्य’, ‘टूटते हए’ और ‘मेरे श्रेष्ठ रंग’

महत्त्व-डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल हिन्दी के जाने-माने सशक्त एकांकीकार हैं। उनका इस दृष्टि से दिया गया योगदान सर्वथा अपेक्षित रहा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि उनकी रचनाएँ नयी पीढ़ी को मार्गदर्शन प्रदान करती रहेंगी।

समर्पण एकांकी का सारांश

प्रश्न
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल लिखित एकांकी ‘समर्पण’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
डॉ. सुरेशचन्द्र शुक्ल लिखित एकांकी ‘समर्पण’ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित एक प्रेरक और भाववर्द्धक एकांकी है। इस एकांकी का सारांश इस प्रकार है

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भीषण गर्मी से पूरा पर्वत-प्रदेश लू की चपेट में है। चारों फैले हुए सन्नाटे में महाराणा प्रताप एक वृक्ष की छाया में बैठे हुए हैं। उनकी दाढ़ी और बाल बढ़े हुए हैं। वे धोती-कुर्ता पहने हुए तलवार लटका रहे हैं। उनका बेटा-बेटी के भी पैर नंगे हैं। तीनों ही खिन्न हैं। बेटी रजनी को भूख से सिसकती देखकर महाप्रताप उसे सहलाते हुए कहते हैं कि वह रोये नहीं। कुंजर अकबर को संधि-पत्र देकर आ रहा होगा। इसे सुनकर पुत्र अमर सिंह चकित होकर प्रश्न करता है कि क्या वे सब अकबर का गुलाम बनकर रहेंगे? अगर ऐसा है तो उसे यह मंजूर नहीं है। महाप्रताप उसे समझाते हैं कि उसकी माँ किस तरह भीलनियों के साथ वन-वन फल ढूँढ़ती हुई परेशान हो जाती है। फिर भी कभी-कभी उसे एक भी फल नहीं मिलता है।

अमर सिंह महाप्रताप को उनकी वीरता की याद दिलाता है तो महाप्रताप अकबर की अधीनता को स्वीकारने की अपनी मजबूरी बतलाते हैं। उसी समय वहाँ पर कुंजर आता है। उसने महाप्रताप को बतलाया कि उनकी प्रशंसा अकबर कर रहा था तो मानसिंह ने विरोध किया। दूसरे राजपूत अर्थात् पृथ्वीराज कवि ने उसे समझाते हुए उनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर अकबर ने जैसे संधि-पत्र को स्वीकार किया, वैसे ही पृथ्वीराज कवि ने कहा कि संधि-पत्र महाप्रताप का न होकर किसी षड्यंत्रकारी का है; क्योंकि वह महाराणा प्रताप को भलीभाँति जानता है कि वे किसी दशा में अधीनता नहीं स्वीकार करेंगे। जब मैंने (कुंजर ने कहा कि मैं महाप्रताप का सेवक हूँ। उन्होंने ही यह संधि-पत्र मुझसे भेजवाया है। इस पर राजकवि पृथ्वीराज ने संधि-पत्र की सत्यता का पता लगाने की आज्ञा अकबर से माँग ली। उसे देखकर मानसिंह राजकवि पर आरोप लगाया कि वे महाप्रताप का पक्ष ले रहे हैं। कुंजर ने कहा कि राजकवि आ रहे होंगे।

महाप्रताप को उनकी धर्मपत्नी महारानी लक्ष्मी ने समझाया कि वीर पुरुष दुख’ में भी अटल रहते हैं। उनसे ही भारत माँ को आशा है। एक पुत्री के आँसू से भारत के आँसू बढ़कर हैं। मैं अपनी पुत्री को भोजन दूंगी लेकिन मुझे अकबर की अधीनता मंजूर नहीं है। उसी समय राजकवि पृथ्वीराज का प्रवेश होता है।राजकवि ने महाप्रताप को समझाया कि वे भारत के मुकट हैं। संधि-पत्र तो उनकी वीरता को कलंकित कर रही है।

परिस्थितियाँ मनुष्य को विवश नहीं करती हैं, अपितु मनुष्य चाहे तो परिस्थितियों को विवश कर सकता है। परिस्थितियों को मोड़ने वाले ही अमर वीर पुरुष होते हैं। इसलिए वे मोह में न पड़े। इस अपने कर्तव्य को निभाने की आवश्यकता है। उन्हें अपने अमर वीरों की वीरतापूर्ण त्याग को याद करके साहस धारण करना चाहिए कि वीर पुरुष भटक सकते हैं, लेकिन अपयश नहीं ले सकते हैं। सभी भील उनकी सहायता अपने प्राणों की परवाह किए बिना करेंगे। उसी समय भामाशाह आकर महाप्रताप को पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह साल तक चलाने का धन भेंट करता है। महाप्रताप उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। भामाशाह ने कहा कि वह आजीवन मेवाड़ के राणा के साथ है। उससे उत्साहित होकर महाप्रताप प्रतिज्ञा करते हैं कि वे जब तक मेवाड़ को स्वतंत्र न करा लेंगे, तब तक दाढ़ी-बाल नहीं कटवायेंगे। मिट्टी के बर्तन में खायेंगे और जमीन पर सोयेंगे। सभी एक साथ बोलते हैं “हिन्दूपति महाप्रताप की जय”।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 15 वरदान मागूँगा नहीं

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 15 वरदान मागूँगा नहीं (शिवमंगल सिंह सुमन)

वरदान मागूँगा नहीं अभ्यास-प्रश्न

वरदान मागूँगा नहीं लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि किसी की दया का पात्र क्यों नहीं बनना चाहता है?
उत्तर
कवि किसी की दया का पात्र नहीं बनना चाहता है। यह इसलिए कि ‘वह आत्म-निर्भर है।

प्रश्न 2.
कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ वरदान क्यों नहीं माँगना चाहते हैं?
उत्तर
कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ वरदान नहीं माँगना चाहते हैं। यह इसलिए कि वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं। उन्हें अपने आत्मबल पर पूरा भरोसा है।

प्रश्न 3.
किस मार्ग से कवि कभी न हटने का संकल्प लेता है और क्यों?
उत्तर
कवि संघर्ष-पथ से कभी न हटने का संकल्प लेता है। यह इसलिए कि यही उसे स्वीकार है।

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प्रश्न 4.
अभिशाप मिलने के बाद भी कवि किस मार्ग से विचलित नहीं होगा?
उत्तर
अभिशाप मिलने के बाद भी कवि कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होगा?

वरदान मागूँगा नहीं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवन की प्रत्येक स्थिति में कवि ने क्या सन्देश दिया है?
उत्तर
जीवन की प्रत्येक स्थिति में कवि ने यह सन्देश दिया है कि यह जीवन महासंग्राम है। इसमें हुई हार एक विराम है। तिल-तिल मिटते हुए किसी की दया पर निर्भर न होकर अपने ऊपर ही निर्भर रहना चाहिए। जीवन-संघर्ष के दौरान सुख-सुविधाओं को भूल जाना चाहिए। संघर्ष-पथ पर जो कुछ मिले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। कोई क्या कहता है, यह ध्यान नहीं देना चाहिए और अपने कर्तव्य-पथ पर बढ़ते ही जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
कवि अपने हृदय की वेदना को क्यों नहीं छोड़ना चाहता है?
उत्तर
कवि अपने हृदय की वेदना को नहीं छोड़ना चाहता है। यह इसलिए कि वह उससे ही संघर्ष-पथ पर आगे बढ़ रहा है। उसके बिना उसके संघर्ष का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा। यही कारण है कि वह उसे यों ही त्यागना नहीं चाहता है।

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प्रश्न 3.
जीवन को महासंग्रम कहने के पीछे कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जीवन को महासंग्राम कहने के पीछे कवि का बहत बड़ा आशय है। वह यह कि जीवन में एक-से-एक बढ़कर कठिनाइयाँ आती ही रहती हैं। महासंग्राम में भी एक-से-एक विकट और बढ़कर योद्धा सामने आते रहते हैं। जीवन में वही सफल होता है, जो सामने आने वाली हर कठिनाई का न केवल सामना करता है, अपितु उसे दूर करके आगे बढ़ जाता है। महा संग्राम में भी वही विजयी होता है, जो सामने आने वाले हर योद्धा का न केवल सामना करता है, अपितु उसे परास्त कर आगे निकल जाता है।

प्रश्न 4.
‘तिल-तिल मिटने’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर
‘तिल-तिल मिटने’ से कवि का अभिप्राय है-निरन्तर अपनी पूरी शक्ति के साथ जीवन-संघर्ष करते रहना चाहिए। ऐसा करते हुए किसी की दया और सहायता पर निर्भर न होकर अपने ऊपर ही निर्भर रहना चाहिए। इस तरह अपने आत्मबल के साथ जीवन की हर कठिनाई का हल करते रहना चाहिए।

प्रश्न 5.
‘वरदान माँगूगा नहीं’ पाठ से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर
श्री शिव मंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता वरदान माँगूगा नहीं। एक न केवल प्रेरणादायक कविता है, अपितु शिक्षाप्रद भी है। इस कविता के माध्यम से कवि ने हमें यह शिक्षा देने का प्रयास किया है कि स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीना चाहिए। चूँकि जीवन महायुद्ध के समान है इसलिए उसमें विजयी होने के लिए हममें आत्मनिर्भरता और आत्मबल पूरी तरह से होना चाहिए। किसी की दया-सहायता की अपेक्षा-आशा न करके अपने-आप पर पूरा भरोसा रखते हुए हरेक परिस्थिति का डटकर सामना करते रहना चाहिए।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए।

क. यह हार एक विराम है
जीवन महा संग्राम है ।
तिल-तिल मिलूंगा, पर दया की भीख मैं
लूँगा नहीं, वरदान माँगूंगा नहीं

ख. क्या हार में
क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत में
संघर्ष पद पर जो मिले
यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूंगा नहीं।
उत्तर
(क) यह जीवन महायुद्ध है, अर्थात् यह जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। इसमें हार जाना एक बड़ी रुकावट है। अर्थात संघर्ष करते हुए हिम्मत छोड़ देना बहुत बड़ी हानि है। इसलिए मैं इस जीवन रूपी महायुद्ध में भले ही एक-एक करके मिट जाऊँगा, लेकिन किसी के सामने अपना हाथ फैलाकर दया अर्थात् सहायता की कोई भीख नहीं माँगूंगा। यह मेरा दृढ़ सकंल्प है कि मैं किसी से कछ भी नहीं प्राप्त करने की भावना से यह जीवन का महायुद्ध लगा।

(ख) जीवन रूपी महायुद्ध में भाग लेना ही वह अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य समझता और मानता है। उसमें होने वाली हार या जीत को नहीं। दूसरे शब्दों में वह जीवन-रूपी महायुद्ध में होने वाली हार या जीत उसकी वीरता को प्रभावित नहीं कर सकती है। इस प्रकार वह जीवन रूपी महायुद्ध के और किसी परिणाम या प्रभाव से कुछ भयभीत नहीं है। वह तो उसे ही सब कुछ सही, अच्छा मानता और समझता
है जो उसे अपने संघर्ष के रास्ते पर बढ़ते हुए प्राप्त हो जाता है। इसलिए वह किसी पर निर्भर होकर अपने जीवन-पथ पर बढ़ना नहीं चाहता है, अपितु अपने आत्मबल से दृढ़ संकल्पों से आगे बढ़ना चाहता है।

वरदान मागूँगा नहीं भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
तिल-तिल कर मिटना अर्वत थोड़ा-थोड़ा करके नष्ट होना। यह एक मुहावरा है पाँच मुहावरे खोजें और वाक्य में प्रयोग करें।
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 15 वरदान मागूँगा नहीं img 1

प्रश्न 2.
संघर्ष-पथ तथा कर्त्तव्य-पच में योजक चिह (-) का प्रयोग हुआ है ऐसे अन्य शब्द भी लिखिये।
उत्तर
महा-संग्राम, तिल-तिल

प्रश्न 3.
तिल-तिल तथा स्मृति-सुखद में अनुप्रास अलंकार है, ऐसे अन्य शब्द भी खोजें।
उत्तर
महा-संग्राम, दया की भीख, तिल-तिल, संघर्ष-पथ और कर्तव्य-पथ ।

वरदान मागूँगा नहीं योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. सुमन जी अपने गीतों के लिए भी साहित्य जगत में चर्चित रहे हैं। पुस्तकालय की सहायता से उनके गीतों को संकलित करें।
प्रश्न 2. मध्यप्रदेश के ऐसे कवियों की सूची तैयार कीजिए जिन्होंने जीवन में स्वाभिमान एवं संघर्ष के साथ जीवन को जीने की प्रेरणा दी।
प्रश्न 3. डॉ. शिवमंगल सिंह सुमनजी के जीवन पर आधारित घटनाओं पर जानकारी एकत्रित कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

वरदान मागूँगा नहीं परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘हार’ को कवि ने विराम क्यों कहा है?
उत्तर
‘हार’ को कवि ने विराम कहा है। यह इसलिए कि हार से जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त करने में रुकावट और कठिनाई आ जाती है।

प्रश्न 2.
कवि क्या नहीं चाहता है?
उत्तर
कवि स्मृति-सुखद प्रहरों के लिए संसार की सम्पत्ति नहीं चाहता है।

प्रश्न 3.
‘यह भी सही, वह भी सही’ कहने से कवि का किस ओर संकेत है?
उत्तर
‘यह भी सही वह भी सही’ कहने से कवि का सुख-दुख की ओर संकेत है।

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प्रश्न 4.
कर्त्तव्य-पथ पर डटे रहने के लिए कवि को क्या-क्या स्वीकार है?
उत्तर
कर्त्तव्य-पथ पर डटे रहने के लिए कवि को किसी के द्वारा दिये जाने वाले कष्ट, अभिशाप और सब कुछ स्वीकार है।

प्रश्न 5.
कवि किस-किस पथ पर चलकर जीवन का महासंग्राम जीतना चाहता है?
उत्तर
कवि संघर्ष-पथ और कर्तव्य-पथ पर चलकर जीवन का महासंग्राम जीतना चाहता है।

वरदान मागूँगा नहीं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ कविता में किन-किन भावों को व्यक्त किया है?
उत्तर
कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने ‘वरदान माँगँगा नहीं’ कविता में अपने जीवन-संघर्ष पर चलने के लिए अनेक प्रकार के भावों को व्यक्त किया है। उनके द्वारा व्यक्त भाव उनके स्वाभिमान को प्रमाणित करते हैं। वे दृढ़ निश्चय, आत्मनिर्भर, आत्मबल, आत्मत्याग, व्यर्थ की बातों को भूलकर आत्मनिष्ठा, निश्चिन्त और अटूट विश्वास जैसे भावों को व्यक्त किए हैं।

प्रश्न 2.
कवि किससे थोड़ा भी भयभीत नहीं है और क्यों?
उत्तर
कवि जीवन के महासंग्राम में मिलने वाली हार से तनिक भी भयभीत नहीं है। इसके दो कारण हैं-पहला यह कि उसे यह अच्छी तरह ज्ञात है कि जीवन के महासंग्राम में भी और महासंग्रामों की तरह जीत मिल सकती है, तो हार भी। जब हार निश्चित नहीं है, तो फिर भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। दूसरा यह कि वह जीवन के महासंग्राम में अपनी भागीदारी अपना कर्तव्य समझकर करने जा रहा है। इससे वह अपने कर्तव्य-पथ पर बढ़ना ही अपना एकमात्र लक्ष्य समझ रहा है न कि उसके अच्छे-बुरे परिणामों को। इस दृष्टि से भी भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 3.
‘वरदान माँगूंगा नहीं’ कविता का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
वरदान मॉगूंगा नहीं कविता कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की एक प्रेरणादायक कविता है। इस कविता में कवि ने स्वाभिमान-पूर्वक जीवन जीने का संदेश दिया है। इसी के साथ ही कवि ने जीवन संग्राम का सामना करने की प्रेरणा दी है। इस विषय में किसी की दया पर निर्भर होने के स्थान पर अपने आत्मबल से जीवन-पथ पर बढ़ने के दृढ़ संकल्प को इस कविता में देने का सराहनीय प्रयास है। कवि का यह मानना है कि व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थिति में कठिनाइयों से विचलित हुए बिना जीवन-पथ पर चलते जाना चाहिए।

वरदान मागूँगा नहीं कवि-परिचय

प्रश्न
श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन परिचय-शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म 1916 में उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव जिले के झगरपुर गाँव में हुआ था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही सम्पन्न हुई। इसके पश्चात् आपने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में प्रवेश लिया और बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और बाद में यहीं से पी-एच.डी. और डी. लिट की उपाधि प्राप्त की। आपने ग्वालियर और होल्कर कॉलेज, इन्दौर में अध्यापन-कार्य भी किया। इसी बीच आपकी नियुक्ति नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक सहायक के रूप में हो गई। 1961 ई. में माधव कॉलेज, उज्जैन के प्राचार्य पद पर नियुक्त हुए तथा कुछ वर्षों बाद विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति का कार्यभार ग्रहण किया।

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साहित्यिक परिचय-समन जी ने छात्र जीवन से ही कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया था और छात्रों में लोकप्रियता प्राप्त की। वे मूल रूप से प्रगतिशील कवि हैं और वर्गहीन समाज की कामना करते हैं। पूँजीवाद के प्रति उनमें तीव्र आक्रोश और शोषित वर्ग के प्रति गम्भीर संवेदना है। उनकी कविताओं में एक ओर राष्ट्रीयता और नवजागरण के स्वर हैं तो दूसरी ओर इनके गीतों में प्रेम और प्रकृति की सरस व्यंजना है। इनकी छोटी कविताओं में और गीतों में अधिक व्यंग्यात्मकता, सरसता और चित्रात्मकता है और लम्बी कविताएँ वर्णनात्मक हैं।

रचनाएँ-हिल्लोल, जीवन के गान, प्रलय सृजन, मिट्टी की बारात, विंध्य हिमालय, पर आँखें नहीं भरी तथा विश्वास बढ़ता ही गया समन जी की प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं।

भाषा-सुमन जी की भाषा ओजपूर्ण, प्रवाहमयी और स्वाभाविक है। आपकी भाषा ने उनके काव्य को संगीतमय बनाया है। मुख्य रूप से उन्होंने गीत शैली को अपनाया है। प्रायः उनकी कविताएँ ध्वनि-माधुर्य से ओत-प्रोत हैं। सुमन जी ने कुछ छन्दमुक्त कविताओं की भी रचना की है।

वरदान मागूँगा नहीं कविता का सारांश

प्रश्न
श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ एक स्वाभिमानपूर्ण कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है
कवि का यह मानना है जीवन एक युद्ध है और इसमें हुई हार एक ठहराव है। इसलिए मैं यह संकल्प कर रहा हूँ कि मैं मिट-मिट कर भी किसी के सामने दया के लिए हाथ नहीं फैलाऊँगा और न लूँगा। चाहे मैं जीवन-युद्ध जीत जाऊँ, या हार जाऊँ, संघर्ष करते हुए तनिक भयभीत नहीं होऊँगा। इस दौरान मुझे जो कुछ भी मिलेगा, उसे सही मानकर स्वीकार कर लूँगा। मुझे कोई भले ही छोटा समझे, समझोता रहे, मैं अपने हदय की पीड़ा को यों ही नहीं त्यागूंगा! कोई महान बनने की बात करता है, तो करता रहे, मुझे उसकी कुछ भी परवाह नहीं। चाहे मुझे कोई कुछ भी समझे, मैं अपने कर्त्तव्य-पथ से कभी-पीछे नहीं हटूंगा। इस तरह मैं किसी की दया पर नहीं निर्भर रहूँगा।

वरदान मागूँगा नहीं संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

‘पद्यांश की सप्रंसग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

1. यह हार एक विराम है,
जीवन महा-संग्राम है,
तिल-तिल मिलूंगा, पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं,
वरदान माँगूंगा नहीं।

शब्दार्थ-विराम-रुकावट, ठहराव । महा-संग्राम-बहुत बड़ा युद्ध (संघर्ष)। तिल-तिल मिटूंगा-एक-एक कर समाप्त हो जाऊँगा। दया की भीख-सहायता, सहारा। वरदान

माँगूंगा नहीं-किसी की दया पर निर्भर नहीं रहूँगा।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती हिन्दी सामान्य’ में संकलित व श्री शिव मंगल सिंह ‘सुमन’-विरचित कविता ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ से है। इसमें कवि ने अपनी दृढ़ता को बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या-यह जीवन महायुद्ध है, अर्थात् यह जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। इसमें हार जाना एक बड़ी रुकावट है। अर्थात संघर्ष करते हुए हिम्मत छोड़ देना बहुत बड़ी हानि है। इसलिए मैं इस जीवन रूपी महायुद्ध में भले ही एक-एक करके मिट जाऊँगा, लेकिन किसी के सामने अपना हाथ फैलाकर दया अर्थात् सहायता की कोई भीख नहीं माँगूंगा। यह मेरा दृढ़ सकंल्प है कि मैं किसी से कछ भी नहीं प्राप्त करने की भावना से यह जीवन का महायुद्ध लगा।

विशेष-

  1.  कवि का कथन दृढभावों से लबालब है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. जीवन को महासंग्राम के रूप में चित्रित करने के कारण इसमें रूपक अलंकार है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य स्वरूप ओजपूर्ण है। भावों को काव्य के स्वरूपों में मुख्य रूप से रस, छन्द, अलंकार और प्रतीक से सँवारने का प्रयास किया गया है। इसमें रूपक अलंकार और मुक्त छन्द लाए गए हैं, जिन्हें वीर रस से प्रवाहित करने का आकर्षक प्रयास किया गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य ओजस्वी शब्दों से बनकर प्रस्तुत हुआ है। जीवन महायुद्ध में विजय श्री हासिल करने की आत्मनिर्भरता का दृढ़ संकल्प काबिलेतारीफ है। इससे यह पद्यांश भावों को प्रेरित करता हुआ हदयस्पर्शी बन गया है।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
(ii) कवि किस प्रकार का जीवन जीना चाहता है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है आत्मनिर्भर होकर कठिनाइयों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए जीवन जीना चाहिए।
(ii) कवि स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीना चाहता है।

2. स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
यह जान लो में विश्व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं,
बरदान माँगूंगा नहीं।

शब्दार्थ-स्मृति-बीते हुए। सुखद-सुख देने वाले । प्रहरों-क्षणों, समय । विश्व-संसार। सम्पत्ति-सुख-सुविधा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने अपने जीवन महायुद्ध में विजय श्री प्राप्त करने से पहले दृढ़ संकल्प करते हुए कह रहा है कि

व्याख्या-यह सभी को अच्छी तरह से ज्ञात होना चाहिए कि जीवन एक महायुद्ध ही है। सभी वीर पुरुष इसमें अपने-अपने ढंग से भाग लेते हैं। मैं भी इसमें अपने ही ढंग से भाग लेने जा रहा हूँ। मेरा ढंग यह है कि मैं इसमें भाग लेने से पहले अपने बीती हुई सभी सुख-सुविधाओं को भूल जाऊँगा। यह भी कि मैं यह महायुद्ध किसी सुखद स्वरूप को मन में रखकर नहीं करूंगा। यह भी मैं स्पष्ट कर देना समुचित समझ रहा हूँ कि मैं संसार की कोई भी सुविधा नहीं चाहूँगा। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से होकर किसी की सहायता नहीं चाहूँगा। किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहूँगा, अपितु आत्मनिर्भर होकर ही मैं इस महायुद्ध में भाग लूँगा।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली सरल है।
  2. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  3. वीर रस का संचार है।
  4. यह पद्यांश प्रेरक रूप में है।

1. पयांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i)उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य वीर रस से प्रवाहित अनुप्रास अलंकार (स्मृति सुखद) से मण्डित है। मुक्त छन्द से प्रस्तुत हुए भावों की स्वच्छन्दता सराहनीय है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य में दृढ़ता, स्पष्टता, सहजता, प्रवाहमयता और रोचकता जैसी असाधारण विशेषताएँ हैं। इससे इस पद्यांश का भाव-सौन्दर्य प्रभावशाली रूप में है, ऐसा निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘सुखद प्रहर’ से क्या तात्पर्य है?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में कवि का कौन-सा भाव व्यक्त हो रहा है?
उत्तर
(i) ‘सुखद प्रहर’ से तात्पर्य है-संघर्षों और कठिनाइयों का पलायन कर सुविधाओं को अपनाना।
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवि का निःस्वार्थ भाव व्यक्त हुआ है।

3. क्या हार में क्या जीत में,
किंचित नहीं भयभीत में,
संघर्ष-पथ पर जो मिले,
यह भी सही, वह भी सही,
वरदान माँगूगा नहीं।

शब्दार्थ-किंचित-कुछ। भयभीत-डरा हुआ। संघर्ष-पथ पर-कठिनाइयों का सामना करते हुए बढ़ते जाने पर।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने जीवन रूपी महायुद्ध में भाग लेने को ही मुख्य जीबनोद्देश्य मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-जीवन रूपी महायुद्ध में भाग लेना ही वह अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य समझता और मानता है। उसमें होने वाली हार या जीत को नहीं। दूसरे शब्दों में वह जीवन-रूपी महायुद्ध में होने वाली हार या जीत उसकी वीरता को प्रभावित नहीं कर सकती है। इस प्रकार वह जीवन रूपी महायुद्ध के और किसी परिणाम या प्रभाव से कुछ भयभीत नहीं है। वह तो उसे ही सब कुछ सही, अच्छा मानता और समझता
है जो उसे अपने संघर्ष के रास्ते पर बढ़ते हुए प्राप्त हो जाता है। इसलिए वह किसी पर निर्भर होकर अपने जीवन-पथ पर बढ़ना नहीं चाहता है, अपितु अपने आत्मबल से दृढ़ संकल्पों से आगे बढ़ना चाहता है।

विशेष-

  1.  तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. सम्पूर्ण कथन सुस्पष्ट है।
  4. संघर्ष-पथ में रूपक अलंकार है।
  5. वीर रस का प्रवाह है।

1. पयांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य अधिक उत्साहवर्द्धक है। इसके लिए किया गया वीर रस का प्रयोग आकर्षक रूप में है। भावात्मक शैली-विधान और मुक्तक छन्द के द्वारा बिम्बों और प्रतीकों की योजना इस पद्यांश को और सुन्दर बना रही है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश की भाव-योजना ओजस्वी और प्रभावशाली कही जा सकती है। जीवन-संघर्ष करने की दृढ़ आत्म-निर्भरता की भावाधारा देखते ही बनती है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘किंचित भयभीत नहीं मैं’ का क्या तात्पर्य है?
(ii) कवि के संघर्ष-पथ की क्या विशेषता है?
उत्तर
(i) किंचित भयभीत नहीं ‘मैं’ का तात्पर्य है-कवि अपने संघर्ष के दौरान आने वाली कठिनाइयों के प्रभाव को बिल्कुल ही नहीं मानता है। वह उससे न तो शंकित है और न भयभीत ही।
(ii) कवि के संघर्ष-पथ की यह विशेषता है कि उस दौरान उसको हार मिले या जीत, सुख मिले या दुख वह इन सबको एक समान मानता है। वह इन सभी को गलत नहीं, अपितु ठीक ही मानता है।

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4. लपुता न अब मेरी छुओ,
तुम हो महान बने रहो,
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्व त्यागूंगा नहीं,
वरदान माँगूगा नहीं।

शब्दार्थ-लपुता-छोटापन। छुआ-स्पर्श करो। वेदना-पीड़ा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने स्वतन्त्र व आत्मनिर्भर होकर जीवन-संघर्ष करने का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हुए कहा है कि

व्याख्या-वह जीवन संघर्ष-पथ पर आगे बढ़ते हुए किसी की तनिक भी परवाह नहीं करेगा। अगर कोई उसकी कमियों और दोषों को उछालना चाहेगा तब भी वह उसकी ओर ध्यान नहीं देगा। अगर उससे कोई महान बनने की बात कहेगा तब भी वह उसकी ओर ध्यान नहीं देगा। उसकी वह यह कहकर उपेक्षा कर देगा कि वह महान है तो महान बना रहे। उसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वह तो अपने जीवन के संघर्ष-पथ पर बढ़ता चला जायेगा। उसके हृदय में दुख-पीड़ा भरी हुई है, उसे वह यों ही नहीं त्याग देगा। वह उन्हें किसी-न-किसी प्रकार सार्थक करके ही त्यागेगा। इस प्रकार वह अपने जीवन-संघर्ष पथ की कठिनाइयों से डरकर-घबड़ाकर किसी की कोई भी सहायता की अपेक्षा-आशा नहीं करेगा। वह तो आत्म-निर्भर होकर ही आगे बढ़ता चला जायेगा।

विशेष-

  1. भाषा ठोस है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. वीर रस का प्रवाह है।
  4. यह अंश प्रेरक रूप में है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य आकर्षक रूप में है। वीर रस के संचार-प्रवाह से मुक्तक छन्द की पुष्टि हुई है। इसके लिए आए हुए बिम्ब-प्रतीक की सहजता सराहनीय है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरल और सुस्पष्ट भावों का है। आत्म-संघर्षों के लिए प्रस्तुत की गई आत्म-निर्भरता की भाव-योजना न केवल आकर्षक है, अपितु प्रेरक भी है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पयांश का मुख्य भाव लिखिए।
(11) प्रस्तुत पयांश में कवि का कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का मुख्य भाव है-संघर्ष के पथ पर बिना किसी की परवाह करते हुए बढ़ते जाना।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि का आत्म-निर्भरता के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आत्मबल को लेकर बढ़ते जाने का भाव व्यक्त हुआ है।

5. चाहे हृदय का ताप दो,
चाहे मुझे अभिशाप दो,
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किन्तु भागूंगा नहीं,
वरदान माँगूंगा नहीं।

शब्दार्च-ताप-दुख। अभिशाप-श्राप, शाप।

प्रसंग-पूर्ववत्। इसमें कवि ने किसी प्रकार के दख-दर्द की परवाह किए बिना जीवन रूपी महायुद्ध में आत्मनिर्भर होने के दृढ़-संकल्प को व्यक्त किया है। इस विषय में कवि का कहना है कि.

व्याख्या-उसका यह दृढ़ संकल्प है कि उसे जीवन-पथ पर संघर्ष करते समय चाहे उसे कोई हृदय को चोट पहुँचाने वाला कष्ट दे अथवा उसे कोई शाप दे या उसे कोई और ही तरह का दुख पहुँचाये, वह तनिक भी अपने दृढ-संकल्प स्वरूप कर्तव्य-पथ से पीछे नहीं हटेगा, अपितु उस पर आगे ही बढ़ता जायेगा। इसके लिए वह अपनी आत्मनिर्भरता का परित्याग नहीं करेगा। वह अपने आत्मबल का एकमात्र आधार लेकर बढ़ता चला जायेगा। इस प्रकार किसी की दया-सहायता की तनिक भी आशा-इच्छा नहीं करेगा।

विशेष-

  1. भाषा ओजस्वी और प्रवाहमयी है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. कर्त्तव्य-पथ में रूपक अलंकार है।
  4. तुकान्त शब्दावली है।
  5. वीर रस का प्रवाह.है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य को लिखिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौन्दर्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा-शैली भावानुसार है। वीर रस के संचार से तुकान्त शब्दावली को पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (चाहे-चाहे) और रूपक अलंकार (कर्त्तव्य-पथ) से चमकाने का प्रयास मन को छू लेता है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान गतिशील भावों से पुष्ट है। कुछ कर गुजरने के लिए स्वाभिमानपूर्वक किसी की परवाह न करने की भाव-योजना सचमुच में अद्भुत है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश का मुख्य भाव क्या है?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में कवि की कौन-सी विशेषता प्रकट हुई है? ।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-कठिन और विपरीत परिस्थिति में भी लक्ष्य-पथ पद दृढ़तापूर्वक बढ़ते जाना।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश में कवि की दृढ़ता और आत्मनिर्भरता की विशेषता प्रकट

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Chapter 14 मेहमान की वापसी (मालती जोशी)

मेहमान की वापसी अभ्यास-प्रश्न

मेहमान की वापसी लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अजय के घर कौन-कौन आये थे और क्यों?
उत्तर
अजय के घर राय अंकल और राय आँटी अपने कुत्ते जॉली के साथ आये थे। वे बॉली को महीने भर की छुट्टियों में अजय के घर पर छोड़ने के लिए आये थे।

प्रश्न 2.
राय अंकल ने अजय से जॉली की दोस्ती कैसे कराई?
उत्तर
राय अंकल ने जॉली से कहा, “जॉली! कम हियर… शेक हैंड्स विद अजय।” जॉली ने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह अपना दाहिना पंजा उठाया। अजय ने जॉली की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया। इस तरह राय अंकल ने अजय से जॉली की दोस्ती कराई।

प्रश्न 3.
जॉली के घर लौटने के पश्चात् अजय के मन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
जॉली के घर लौटने के पश्चात् अजय के मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। उसके मन से शिकायतों का बोझ उतर गया। वह प्रसन्नता से खिल उठा।

मेहमान की वापसी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मेहमान की वापसी’ कहानी का उद्देश्य क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मेहमान की वापसी’ कहानी एक सोद्देश्यपरक कहानी है। इसमें मनुष्य और पशु के परस्पर प्रेम को दर्शाया गया है। इसके माध्यम से लेखिका ने मनुष्य के प्रति पशुओं की वफादारी, कृतज्ञता और निःस्वार्थता को प्रेरक रूप में प्रस्तुत किया

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प्रश्न 2.
अजय ने जॉली को अपनी दिनचर्या में कैसे सम्मिलित कर लिया?
उत्तर
अजय जॉली के साथ घुल-मिल गया था। वह सुबह उठते ही जॉली को गुड-मार्निंग बोलता था। वह जॉली के पास अपनी छोटी-सी मेज लगाकर.अपनी छुट्टियों का होमवर्क जॉली से बातें करते हुए करता था। वह घर से बाहर निकलने पर जॉली को ‘टा-टा’ करना नहीं भूलता था। शाम को वापस लौटने पर जब जॉली अपनी पूँछ हिलाकर अजय की अगवानी करता था तो वह उसके गले में हाथ डालकर उसे चूम लेता था। वह अपनी मम्मी-पापा के फर्स्ट शो देखने चले जाने पर घर में जॉली के साथ रह लेता। दोस्तों के कुट्टी कर लेने की उसे कोई परवाह नहीं थी, क्योंकि उसे खेलने के लिए जॉली एक अच्छा साथी मिल गया था। वह जॉली के साथ ही खाना खाता था। इस तरह अजय ने जॉली को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित कर लिया था।

प्रश्न 3.
कहानी के मुख्य पात्र अजय का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
कहानी के मुख्य पात्र अजय की चरित्रगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. बाल-सुलभ व्यवहार-अजय बालक है, इसलिए उसमें अनुभव की कमी है। उसे यह नहीं मालूम है कि कोई पालतू अपने स्वामी के साथ उसके पास आने पर उसे काट लेगा। इसलिए राय अँकल और राय आंटी के अल्सेशियन कुत्ते को देखकर डर जाता है। बहुत समझाने-बुझाने पर भी वह उससे डरा-डरा रहता है। अजय अपने बाल-सुलभ व्यवहार के कारण ही जॉली के प्रति धीरे-धीरे समझने का दृष्टिकोण अपनाने लगता है।

2. भावुक हदय-अजय के चरित्र की दूसरी विशेषता है-भावक हदय। अजय में भावुकता है। वह जॉली के रात-भर रोने-चिल्लाने पर भावुक हो उठता है। उसे आपबीती, अकेलेपन की दुखद बातें जब याद आती हैं, तो वह जॉली के प्रति सहानुभूति करने से स्वयं को रोक नहीं पाता है। उससे अपना प्यार जताने के लिए उसे थपथपाने लगता है। उसके प्यार को पाकर रूठा हुआ जॉली खुश होकर खाना खा लेता है।

3. सच्चा मित्र-अजय के चरित्र की तीसरी विशेषता है-सच्चा मित्र । अजय जॉली के प्रति दोस्ती का जब हाथ बढ़ाता है, तो उसका अन्त तक निर्वाह करता है। वह जॉली को अपना सबसे बड़ा और एक मात्र दोस्त मानता है। इसलिए वह अपने किसी भी पुराने दोस्त की परवाह नहीं करता है। वह जॉली को अपना सच्चा दोस्त मानकर उसे अपनी दिनचर्या में सम्मिलित कर लेता है। जॉली के चले जाने पर उसकी भूख गायब हो जाती है। उसे जॉली के लौट आने की आशा जोर मारने लगती है। जॉली के वापस आने पर उसकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगते हैं। उनसे उसकी जॉली के प्रति उसके न होने पर की गयी शिकायतें एक-एक कर बहकर समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 4.
पाठ में आए उन महत्त्वपूर्ण अंशों को लिखिए, जिसने अजय के बाल-सुलभ व्यवहार और भावुक हृदय को प्रभावित किया हो।
उत्तर
1. ‘मम्मी…’ उसने दरवाजे के बाहर खड़े होकर जोर से आवाज दी।

2. ‘मर गए। अजय ने सोचाः यह इतना बड़ा कुत्ता घर में रहेगा, तो मेरा एक दोस्त भी यहाँ पाँव नहीं रखेगा। मैं भी जैसे जेल में बन्द हो जाऊँगा। अब मम्मी की आँख बचाकर जब-तब बाहर नहीं निकला जा सकेगा। यह राक्षस जो बैठा होगा – बरामदे में। सारी छुट्टियों का मजा किरकिरा हो जाएगा। इस माहौल में घर में बैठना अजय को जरा भी अच्छा नहीं लगा। वह चुपचाप पिछले दरवाजे से खिसक गया और रात के खाने पर ही लौटा। मन-ही-मन प्रार्थना करता रहा कि हे भगवान, राय अँकल के पिता जी को जल्दी से अच्छा कर दो ताकि वे जल्दी लौट आएँ और यह मुसीबत हमारे यहाँ से जल्दी से विदा हो जाए।

3. क्या पता जॉली को भी अँकल और आंटी की याद आ रही हो। इस बार , जब उसकी रुलाई कान में पड़ी, तब वह सहन नहीं कर सका और धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर आ गया। जॉली कोने में सिमटकर बैठा हुआ था। दोपहर की तरह -अब वह बूंखार नहीं लग रहा था, बल्कि एक नन्हें बच्चे की तरह असहाय लग रहा था। अजय ने साहस बटोरा और उसके पास जा खड़ा हुआ और प्यार से बोला : ‘जॉली…!’

4. उनकी भी सावाज कुछ नम हो गई थी। और अजय? उसकी तो भख ही गायब हो गई थी। सामने रखी नाश्ते की प्लेट को वह यों ही घूरता रह गया था। उसे लग रहा था, अभी कहीं से जल्दी से जॉली आएगा और पास बैठकर बिस्कुट मांगेगा।

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5. नाश्ते की प्लेट वैसी की वैसी ही सरकाकर वह बाहर आया। बरामदे का वह कोना एकदम सूना लग रहा था। उसकी सारी गृहस्थी वहाँ से उठ गई थी। जगह पहले की तरह साफ हो गई थी-पर कितना उदास-उदास लग रही थी।

6. ‘खाक जानता है प्यार की कीमत!’ अजय ने सोचा : ‘कितना प्यार किया उसे। अपने दोस्त, अपनी पढ़ाई, अपना खाना-पीना सब कुछ भूल गया था मैं। पर उसे क्या, अंकल-आंटी को देखते ही सब कुछ भूल गया होगा।

7. खाना एकदम जहर लग रहा था उसे, फिर भी उसने खाया। क्यों भूखा रहे वह एक बेवफा कुत्ते के लिए। वह हजरत वहाँ मजे से अंकल और आंटी के हाथ से माल खा रहे होंगे।

मेहमान की वापसी भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
आवाज, हिदायतें, कम हियर आदि शब्द विदेशी भाषा से लिए गए हैं ऐसे ही विदेशी भाषा के अन्य शब्द कहानी से छाँटकर मानक भाषा में परिवर्तित कर लिखिए।
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी img 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
जान निछावर करना, साँस अटकना, मुसीबत गले पड़ना, मज़ा किरकिरा होना, ठण्डा करना, फूलकर कुप्पा हो जाना
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी img 2

प्रश्न 3.
‘सूना-सूना’ जैसे पुनरुक्त शब्दों का प्रयोग कहानी में किया गया है। कहानी में आए ऐसे शब्दों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर
पीछे-पीछे, टा-टा, दूर-दूर, सूना-सूना, उदास-उदास और भांय-भाय।

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प्रश्न 4.
दिए हुए अनेकार्थी शब्दों के दो-दो अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य बनाइये।
उदाहरण-राम ने अपना कार्य जल्दी कर लिया।
मुख्य अतिथि ने अपने कर कमलों से पुरस्कार बाँटे।
अपेक्षा, कल, पद, उपचार, हल
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 14 मेहमान की वापसी img 3

प्रश्न 5.
निम्नलिखित लोकोक्तियों के अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए
(i) ऊँची दुकान फीके पकवान
(ii) काला अक्षर भैंस बराबर
(iii) अँधा क्या जाने दो आँखें
(iv) चोर की दाढ़ी में तिनका
(v) जिसकी लाठी उसकी भेंस। उदाहरण देकर ऊपर लिखी लोकोक्तियों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य बनाइयेजैसे :-‘एक अनार सौ बीमार’ अर्थ-वस्तु एक चाहने वाले अनेक।
वाक्य रचना-चालीस ‘पद’ रिक्त हैं। प्रार्थना पत्र दस हजार हैं। यह तो वही बात हुई कि एक अनार, सौ बीमार।
उत्तर
(i) ऊँची दुकान फीका पकवान . अर्थ-आडम्बर अधिक असलियत कम
वाक्य-रचना-उसने लिखा तो है स्वादिष्ट भोजनालय, लेकिन उसके एक भी भोजन में कोई स्वाद नहीं है। इसे कहते हैं, ‘ऊँची दुकान फीका पकवान।’
(ii) काला अक्षर भैंस बराबर अर्थ-निरक्षर, अनपढ़
वाक्य-रचना-उसे बार-बार समझाया जाता है। फिर भी वह नहीं समझता है; क्योंकि वह पूरी तरह से काला अक्षर भैंस बराबर है।
(iii) अंघा क्या जाने दो आँखें अर्थ-दुखी को सुख का अनुभव नहीं होता
वाक्य-रचना-चुनाव के समय मन्त्री गरीबों को लाभकारी योजना की घोषणा करते हैं, लेकिन गरीब उन पर यकीन नहीं करते हैं। यह तो वही बात हुई कि अँधा क्या जाने दो आँखें।
(iv) चोर की दाढ़ी में तिनका अर्थ-बुरे व्यक्ति का मन हमेशा शंकालु होता है।
वाक्य-रचना-भ्रष्टाचारी तो भ्रष्टाचार करते हैं, लेकिन पकड़ लिए जाने के भय से परेशान रहते हैं। इसे कहते हैं ‘चोर की दाढ़ी में तिनका।’
(v) जिसकी लाठी उसकी भैंस अर्थ-हमेशा शक्तिशाली की विजय होती है।
वाक्य-रचना-आखिरकार उसने अपने धन-बल से चनाव जीत ही लिया। यह सच ही कहा गया है-‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’।

मेहमान की वापसी योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
यदि आपके घर कोई पालतू पशु है तो आप उसमें कितना ‘लगाव’ महसूस करते हैं। कोई एक घटना के आधार पर एक संस्मरण लिखिए।
प्रश्न 2.
आप अपनी दिनचर्या में कितने विदेशी शब्द प्रयोग करते हैं? उसकी सूची बनाइये।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मेहमान की वापसी परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अजय की साँस दरवाजे पर क्यों अटककर रह गई?
उत्तर
अजय ने बरामदे में एक शेर की तरह एक बड़ा-सा अल्सेशियन कुत्ता । देखा। उसे देखकर दरवाजे पर ही उसकी साँस अटककर रह गई।

प्रश्न 2.
जॉली कौन था?
उत्तर
जॉली शेर की तरह एक बड़ा-सा अल्सेशियन कुत्ता था।

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प्रश्न 3.
जॉली को वपथपाने का साहस अजय को कैसे हुआ?
उत्तर
अजय ने जॉली की बेबसी को समझने का प्रयास किया। उसने देखा कि जॉली रात-भर रो-रोकर थक गया है। वह एक कोने में एक नन्हें बच्चे की तरह सिमटा हुआ बड़ा ही असहाय लग रहा है। इससे उसके प्रति उसकी सहानुभूति हो गई। उसी के सहारे उसे थपथपाने का उसे साहस हुआ।

प्रश्न 4.
कुत्ते की क्या विशेषता होती है?
उत्तर
कुत्ते की यही विशेषता होती है कि वह प्यार की कीमत को जानता-समझता है। इसलिए वह प्यार करने वालों पर अपना प्राण निछावर कर देता है।

मेहमान की वापसी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जॉली के आने पर अजय ने क्या अनुभव किया?
उत्तर
जॉली के आने पर अजय ने अनुभव किया कि वह तो नाराज है ही। उसके मम्मी-पापा भी नाराज हैं। उसकी मम्मी की नाराजगी इस बात से है कि वह महीने जॉली के लिए खाना कैसे बना पायेगी। उसके पापा को उस समय गुस्सा आया, जब जॉली ने उनके द्वारा कटोरे में रखे गए दूध-रोटी को खाने से मुंह फेर लिया। इस प्रकार अजय ने अनुभव किया कि जब इतना बड़ा कुत्ता घर में रहेगा तो उसके दोस्तों का आना-जाना बन्द हो जायेगा और वह जैसे जेल में बन्द हो जाएगा।

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प्रश्न 2.
जॉली का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर
जॉली एक बड़ा-सा अल्सेशियन कुत्ता था। वह शेर की तरह भयानक था। फिर वह बहुत ही समझदार और वफादार था। वह अपने स्वामी के द्वारा दूसरे को सौंप दिए जाने से अपनापन को नहीं भूल पाता है। वह अपने स्वामी के प्रति वफादारी दिखाने के लिए रात-भर चीखता-चिल्लाता है। उसके प्रति वह आँसू बहाता है। विवश होकर ही वह अपने दूसरे स्वामी के बच्चे के साथ दोस्ती कर लेता है। उसे बड़ी समझदारी से निभाता है। उस बच्चे से इतना घुल-मिल जाता है कि वह अपने पहले स्वामी को भूल जाता है। वह उसे इतना भूल जाता है कि वह उसे अपने दूसरे स्वामी के बच्चे के पास हमेशा के लिए छोड़ने को मजबूर कर देता है।

प्रश्न 3.
‘मेहमान की वापसी’ कहानी का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मेहमान की वापसी’ कहानी सुप्रसिद्ध महिला कथाकार मालती जोशी की एक लोकचर्चित कहानी है। इसमें मूक पशुओं, और मनुष्यों के परस्पर प्रेम को बड़े ही भावपूर्ण शब्दों में चित्रित किया गया है। लेखिका की इस कहानी से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि यदि मनुष्य पशुओं के प्रेम की अनुभूति करता है, उनके दुःख-दर्द
और भावनाओं को समझता है तो पशु भी उनके प्रति अपने प्रेम को किसी-न-किसी प्रकार से अवश्य ही प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार वे आत्मीयता का भाव प्रकट करते रहते हैं।

मेहमान की वापसी लेखिका-परिचय

प्रश्न
श्रीमती मालती जोशी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-श्रीमती जोशी का हिन्दी के आधुनिक महिला कथाकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी शिक्षा समाप्त कर उन्होंने हिन्दी कथा-लेखन में सक्रिय रूप से भाग लिया। धीरे-धीरे उनके कथा-स्वरूप ने अपनी जड़ें जमाते हुए अत्यधिक सशक्त रूप ले लिया। उनके कथा-स्वरूप में पुरुष जगत-नारी जगत का विस्तार अधिक देखा जा सकता है। ‘ रचनाएँ-श्रीमती मालती जोशी के कथा-संग्रह इस प्रकार है-‘विश्वास गाथा’, ‘एक घर सपनों का’, ‘पटाक्षेप’, ‘रोग-विराग’, ‘समर्पण का सुख’, ‘सहचारिणी’, ‘मध्यान्तर’, ‘दादी की घड़ी’, आदि। महत्त्व-श्रीमती मालती जोशी का हिन्दी के उन आधुनिक महिला कथाकारों में बहुचर्चित स्थान है, जिन्होंने मध्यवर्गीय परिवारों का सूक्ष्म चित्रण मानवीय धरातल पर किया है। बाल-कथा-लेखन में भी उनका उन महिला बाल-कथाकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिन्होंने बाल-मनोविज्ञान का सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और गहन-से-गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस प्रकार श्रीमती मालती जोशी एक प्रतिष्ठित महिला कथाकार के रूप में आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेंगी।

मेहमान की वापसी कहानी का सारांश

प्रश्न
श्रीमती मालती जोशी-लिखित कहानी ‘मेहमान की वापसी’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्रीमती मालती जोशी-लिखित कहानी ‘मेहमान की वापसी’ पशु-मनुष्य के परस्पर प्रेम-चित्रण की कहानी है। इस कहानी का सारांश इस प्रकार है अजय रोज की तरह सीटी बजाते हुए अपने घर में आया तो उसने दरवाजे पर शेर की तरह एक अल्सेशियन कुत्ता देखकर डर गया। उसकी इस डर को देखकर उसके पापा के दोस्त राय अंकल ने उसे समझाया कि काटता नहीं है। उन्होंने अंकल से उसकी दोस्ती कराने के लिए उसे पुचकारते हुए कहा-“जॉली, कम हियर… शेक हैंड विद अजय।” जॉली ने अपना दाहिना पंजा उठाया तो अजय ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया। राय अंकल ने अजय से कहा कि जॉली महीने भर की छुट्टियों में उसके पास ही रहेगा और वह उससे दोस्ती निभाता रहे। इसे सुनकर अजय दुखी हो गया कि इससे तो उसके दोस्तों का आना-जाना बन्द हो जायेगा और वह घर में ही बन्द पड़ा रहेगा। राय अंकल के चले जाने पर उसकी मम्मी को भी यह ठीक. नहीं लगा था। उसके नाराज होने पर उसके पापा ने उसे समझाया कि वे लोग जॉली के लिए एक बोरी आटा रख गए हैं।

रात होने पर अजय के पापा ने दूध में रोटियों को मीड़कर कटोरे में जॉली के सामने रख दिया। लेकिन उसने देखा तक नहीं। इससे अजय की मम्मी और पापा दोनों झल्ला गए। सबके सोने पर जॉली बिलखने लगा। उसका रोना अजय की मम्मी को असगुन लगा तो उसके पापा ने तसल्ली देते हुए कहा कि नई जगह है, थोड़ी. देर बाद ठीक हो जायेगा। अजय को अपनी पिछली छुट्टियों में बीते हुए अपने अकेलेपन के कारण अपने बहाए आँसुओं की जॉली के आँसुओं से समानता दिखाई दी। इससे उसके प्रति अचानक सहानुभूति हो आयी। उस समय उसे जॉली खूखार न लगकर एक नन्हें बच्चे की तरह असहाय लग रहा था। उसने उसे थपथपाते हुए कहा, “ऑटी की याद आ रही है न!

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उन्हें जल्दी आने के लिए हम लोग कल ही पत्र लिखेंगे, फिर उसने उसके गले में हाथ डालकर पुचकारते हुए कटोरे में पड़े हुए दूध-रोटी को उसे खिला दिया। सुबह गुडमार्निंग कहने पर जॉली ने दोनों पंजे उठाकर स्वागत किया तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसने अपने आस-पास के सहमे हुए बच्चों को समझा दिया कि जॉली काटता नहीं, प्यार करता है। वह जब घर से बाहर निकलता तो जॉली उसे सड़क तक छोड़ने जाता और वापस लौटने पर वह पूँछ हिलाकर उसका स्वागत करता। उसके पापा ने राय अंकल को पत्र लिख दिया था। पत्र पाकर राय अंकल और राय आँटी जॉली को ले गए। इसे सुनकर अजय एकदम उदास हो गया। यों तो खाना उसे जहर लग रहा था। फिर भी उसने खाया। क्यों न खाये। एक बेवफा कुत्ते के लिए वह क्यों भूखा रहे। वह तो वहाँ पर राय

अंकल और राय आँटी के हाथ से माल खा रहा होगा। जॉली के जाने पर सारा घर मानो काटने को दौड़ रहा था। अजय की तरह उसके मम्मी-पापा भी खूब उदास थे। उसी मोटर की आवाज आयी। अजय के पापा ने दरवाजा खोला। राय अंकल ने कहा, “माफ करना भाई साहब, बड़े बेवक्त तकलीफ दे रहा हूँ, लेकिन… ‘इसी बीच जॉली तीर की तरह घर में आकर अजय के पैरों से ऐसे लिपट गया, जैसे बरसों बाद मिला हो। अजय की सारी शिकायतें आँसुओं में बह गई थीं।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय (सुभद्रा कुमारी चौहान)

बालिका का परिचय अभ्यास-प्रश्न

बालिका का परिचय लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इस कविता में जीवन-ज्योति का क्या आशय है? स्पष्ट करें।
उत्तर
इस कविता में जीवन-ज्योति का आशय है-जीवन का आधार । बिटिया के प्रति माँ का वात्सल्य प्रेम अनन्य होता है। वह उसके लिए अतुल्य होता है।

प्रश्न 2.
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है’ यह भाव किस पंक्ति में है? चुनकर लिखिये।
उत्तर
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है। यह भाव निम्नलिखित पंक्ति में हैं-‘दीपशिखा है अंधकार की।’

बालिका का परिचय सही उत्तर चुनिये

प्रश्न 1.
बेटी का परिचय कौन सबसे अच्छा दे सकता है?
(क) पिता
(ख) माता
(ग) दादा
उत्तर
(ख) माता।

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प्रश्न 2.
इस कविता में कौन-सा भाव है?
(क) श्रृंगार
(ख) वीरता
(ग) वात्सल्य
उत्तर
(ग) वात्सल्य।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालिका परिचय कविता का सारांश लिखिये।
उत्तर
देखें-‘कविता का सारांश’।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा क्यों कहा है स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा कहा है। यह इसलिए कि किसी भी माँ की गोद में उसकी बालिका का मचलना एक न केवल अपूर्व आनन्द देता है, अपितु मन को मोह भी लेता है। इससे माँ का हृदय बाग-बाग हो उठता है। उस समय की शोभा देखते ही बनती है।

प्रश्न 3.
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का क्या आशय है?
उत्तर
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का आशय है-बाल-सुलभ क्रियाएँ मन को भाने वाली और गुदगुदाने वाली होती है। अतएव उसे देखकर सभी आनन्द से झूम उठते हैं।

प्रश्न 4.
निम्न पंक्तियों का भावार्थ लिखो।
(क) मेरा मन्दिर …………………….. मेरी।
उत्तर
उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि किसी माँ के लिए उसकी बालिका सब कुछ होती है। माँ अपनी बालिका को किसी मन्दिर, मस्जिद, काबा, काशी, पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप से कम नहीं समझती है। इस प्रकार वह अपने हृदय में बसाए रहती है।

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(ख) प्रभु ईशा ………………………….. पास ॥
उत्तर
(ख) उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि बालिका में महान आत्माओं के गुण होते हैं। उसमें ईसामसीह की क्षमाशीलता, नबी-मुहम्मद का विश्वास और महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीव-दया के भाव भरे होते हैं।

प्रश्न 5.
वही जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥
इन पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
इन पंक्तियों का भाव यह है कि बालिका के महान और उच्च गुणों का वर्णन करना सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कि बालिका की महानता और श्रेष्ठता को कह-सुनकर नहीं, अपितु अनुभव करके ही जाना-समझा जा सकता है।

प्रश्न 6.
बेटी की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर
बेटी की तुलना राम, कृष्ण, ईसामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से की गई है।

बालिका का परिचय भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

क. कविता में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है। जैसे जीवन-ज्योति नष्ट नयनों की पंक्ति में ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति हुई है। कविता में से अनुप्रास अलंकार छाँटकर लिखिए।
ख. निम्नलिखित उदाहरण में ‘पतझड़ के साथ हरियाली का प्रयोग कर काव्य में विरोधाभास के सौन्दर्य को प्रस्तुत किया गया है। कविता में से इस प्रकार की अन्य पंक्तियाँ छाँटिए।
उदाहरण-
है पतझड़ की हरियाली
पतझड़ की हरियाली है।
उत्तर-(क) ‘सुख-सुहाग, शाही शान, मनोकामना मतवाली, घनी घटा. मस्ती मगन. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद, काबा-काशी, पूजा-पाठ, जप-तप, अपने आँगन और मात्र मोदे।

1. शाहीशान भिखारिन की है।
भिखारिन की शाही शान है।

2. दीपशिखा है अंधकार की।
अंधकार की दीपशिखा है

3. सुधा-धार यह नीरस दिल की।
नीरस दिल की यह सुधा-धार।

बालिका का परिचय योग्यता-विस्तार

प्रश्न
1. भारतीय संस्कृति में ‘कन्या’ के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए दो अनुच्छेद लिखिए।
2. धर्म अनेक परन्तु सन्देश एक है। हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई, धर्मों के मूल आदर्श जानिए, उनकी और शिक्षाओं और मूल्यों के चार्ट तैयार कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

बालिका का परिचय परीक्षोपयोग अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का आशय है-बालिका का अद्भुत प्रभाव। किसी माँ के लिए उसकी बालिका अमृत की धारा के समान होती है। अर्थात् बालिका अपनी माँ के सूनेपन को दूर कर उसमें चंचलता और सजीवता ला देती है।

प्रश्न 2.
इस कविता में किसके परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है?
उत्तर
इस कविता में माँ और बेटी के परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है।

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प्रश्न 3.
इस कविता में कवयित्री की कौन-सी भावना प्रकट हुई है?
उत्तर
इस कविता में कवयित्री की ‘बेटी माँ के भविष्य की निर्मात्री है’ यह भावना प्रकट हुई है।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इस कविता में रूपक अलंकार की छटा है। आप उन्हें छाँटकर लिखिए।
उत्तर
सुख-सुहाग की लाली, सुधा-धार और जीवन-ज्योति।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका के लिए कौन-कौन से उदाहरण प्रस्तुत किए हैं?
उत्तर
कवयित्री ने बालिका के लिए.अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, आँखों की ज्योति. ईशामसीह की क्षमा, नबी मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध की दया को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

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प्रश्न 3.
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत कविता ‘बालिका का परिचय’ कवयित्री श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की भाववर्द्धक कविता है। सुभद्राकुमारी चौहान ने इसमें वात्सल्य रस को उड़ेल दिया है। इसे लक्ष्य कर लिखी गई यह रचना ‘बालिका का परिचय’ आज भी मील का पत्थर कही जा सकती है। प्रस्तुत कविता में कवयित्री का मानो उनका मातृ हदय ही साकार हो उठा है। वे नन्हीं बालिका को अधिक प्रभावशाली रूप में अनुभव करती हैं। इसके लिए वे बालिका को अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, नयनों की ज्योति, ईशा की क्षमा, मुहम्मद का विश्वास तथा गौतम की दया जैसे अनेक यशस्वी प्रतीकों के रूप में देखती हैं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि उन्होंने माँ और शिशु के बीच के रागात्मक सम्बन्ध का नैसर्गिक चित्रण किया है। “बेटियाँ भविष्य की निर्माता हैं।” कवयित्री की यही भावना उनकी इस कविता में दिखाई देती है।

बालिका का परिचय कवयित्री-परिचय

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान वीर रस की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री हैं। जीवन परिचय-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयाग के निहालपुर महसे में श्री रामनाथ सिक नामक एक सुशिक्षित परिवार में हुआ था। आपके पिता सम्पन्न, ईश्वरभक्त, उदार, विद्यानुरागी एवं राष्ट्रीय-विचारधारा वाले व्यक्ति थे। आपकी प्रतिभा बचपन से ही विलक्षण थी। इससे प्रभावित होकर आपकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था हुई थी। आप प्रयाग के क्राइस्ट कालेज में अध्ययन करते समय काव्य-रचना किया करती थीं। उस समय भी आपकी कविताएँ राष्ट्रीय-भावों से ओत-प्रेत हुआ करती थीं। उसमें तत्कालीन राष्ट्रीय-आन्दोलनों की झलक, स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीयता की बलवती भावना मुखरित होती थी। ये ही भावनाएँ आपकी आगामी कविता की प्रेरणा-शक्ति बनकर आयीं। ‘कर्मवीर’ पत्र में प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से आपकी ख्याति अमर हो गई। आपका विवाह सन् 1919 में खण्डवा निवासी ठाकुर लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ। पति की स्वीकृति लेकर आपने अपने अध्ययन का क्रम नहीं छोड़ा। बनारस के थियोसोफिकल स्कूल में प्रवेश लेकर अध्ययन जारी रखा। महात्मा गाँधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आन्दोलन में आपने जमकर भाग लिया। फलतः आपको कई बार जेल जीवन बिताना पड़ा। इस स्थिति में भी आपने अपनी पारिवारिक व्यवस्था को अव्यवस्थित नहीं होने दिया। सन् 1934 ई. में आप विधान-परिषद् की सदस्या बनीं। सन् 1948 ई. में एक मोटर दुर्घटना में आपकी असामयिक मृत्यु हो गई।

कृतियाँ-आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. काव्य-संग्रह-

  • ‘मुकुल’
  • ‘नक्षत्र’
  • त्रिधारा’

2. कहानी-संग्रह

  • ‘सीधे-साधे चित्र’
  • ‘बिखरे मोती’
  • ‘उन्मादिनी’।

3. बाल-साहित्य-‘सभा के खेल’। भाषा-शैली-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान की भाषा सरल और प्रवाहमयी है। वह रोचक और हृदयस्पर्शी है। उसमें ओज और वेग है। वीर रस, करुण रस, वात्सल्य, शान्त रस आदि आपके प्रिय रस हैं। उपमा, अनुप्रास, मानवीकरण, उत्प्रेक्षा आदि आपके रुचिप्रद अलंकार हैं। बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग आपने यथावत् किए हैं। श्रीमती सुभ्रदा कुमारी चौहान की शैली चित्रात्मक, काव्यात्मक और भावात्मक गरसमें प्रवाहमयता और बोधगम्यता नामक शैलीगत विशेषताएँ अधिक रूप में दिखाई देती हैं। मूल रूप से आपकी शैली उपदेशात्मक और प्रेरणादायक है। वह सहज होकर भी कठिन दिखाई देती है।

साहित्यिक महत्त्व-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का साहित्यिक महत्त्व वीर रस काव्य-क्षेत्र में सर्वोच्च है। आपने राजनीति और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में अपनी बहुत बड़ी पहचान बनाई है। यही नहीं आपने ग़द्य-पद्य दोनों ही साहित्यिक विधाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है। एक ओर जहाँ ‘झाँसी की रानी’ कविता हर युवक की जबान पर है, वहीं दूसरी ओर बचपन सम्बन्धी कविताएँ प्रत्येक को मधुर बचपन की याद दिलाती हैं। यही नहीं आप एक सफल कहानी लेखिका भी हैं। आपकी कहानियों में नारी-जीवन, शोषित-समाज और पारिवारिक-जीवन का मार्मिक चित्रण है। आपका साहित्यिक-महत्त्व रखने के लिए आपके काव्य-संग्रह ‘मुकुल’ पर सन् 1931 ई. में आपको सेक्सरिया पुरस्कार मिला था।

बालिका का परिचय कविता का सारांश

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ माता के हृदय के भावों को प्रकट करने वाली एक ज्ञानवर्द्धक कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवयित्री अपनी बेटी के प्रति अपने वात्सल्य भावों को उडेलती हई कह रही है कि वह उनकी गोदी की शोभा और सुख-सुहाग की लालिमा है। वह अंधकार की दीपशिखा, घनी घटाओं की चमक, उषा काल में कमल-भंगों (भौरी) की तरह सुखदायक है,तो पतझड़ की हरियाली है। नीरस और उदास हदय में अमत की धारा बहाने वाली है तो मस्त मगन तपस्वी के समान है। ज्योति खोई आँखों की जीवन-ज्योति और मनस्वी की सच्ची लगन है। बीते हुए बचपन की क्रीड़ामयी वाटिका है। यह तो मेरे लिए मन्दिर-मस्जिद, काबा-काशी के समान है। यह तो मेरी पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप है। उसने अपने आँगन में बालक कृष्ण की क्रीड़ाओं को देखा है। माता कौशल्या की प्रसन्नता को अपने मन के भीतर देखा। आओ सभी ईशामसीह की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद के विश्वास, और गौतम बुद्ध का जीवों के प्रति दया की भावना को बालिका के पास आकर देख लें। अगर कोई उससे परिचय पूछ रहा है, तो वह उसका किस प्रकार परिचय दे सकती है। उसे तो वही अच्छी तरह से जान सकता है, जिसमें माता का दिल है।

बालिका का परिचय संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. यह मेरी गोदी की शोभा,
सुख सुहाग की है लाली।
शाही शान भिखारिन की है,
मनोकामना मतवाली ॥1॥

दीपशिखा है अंधकार की,
घनी घटा की उजियाली।
उषा है यह कमल-भंग की,
है पतझड़ की हरियाली ॥2॥

शब्दार्थ-सुहाग-सौभाग्य। शाही-सम्पन्नता, वैभव। शान-स्वाभिमान। दीप शिखा-दीपक की लौ। भृग-मौंरा।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी सामान्य’ में संकलित तथा श्रीमती सुभद्रा कुमारी विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ से है। इसमें कवयित्री ने अपनी बेटी को अपनी गोद की शोभा और सुख-सौभाग्य की लालिमा मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-यह मेरी बिटिया मेरी गोद की शोभा और मेरे सुख-सौभाग्य की लालिमा है। यह मेरे लिए भिखारिन की शाही शान और मेरी स्वच्छन्द मनोकामना को पूरी करने के लिए मानो मतवाली बनी रहती है। यह मेरे दुख-अभाव रूपी अंधकार की दीपशिखा और कठिनाइयों की उमड़ती घटाओं के बीच उत्पन्न आशा रूपी उजियाली है। यही नहीं, यह तो मेरे लिए वैसे ही सुखकर और आनन्द है, जैसे उषा के होने पर कमलों-भौरों को आनन्द और सुख मिलता है। इसी प्रकार यह मेरे जीवन में आए पतझड़ के लिए हरियाली स्वरूप है। कहने का भाव यह कि मेरी बिटिया मेरे जीवन के लिए हर प्रकार से सुखद और आनन्ददायक है।

विशेष-

  1. कवयित्री का वात्सल्य भाव सच्चे रूप में है।
  2. वात्सल्य रस का संचार है।
  3. भाषा सरल और सुबोध है।
  4. रूपक अलंकार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-विधान वात्सल्य रस से लबालब है। उसे रूपक अलंकार से आकर्षक बनाकर सरल और सुबोध शब्दावली से रोचक बनाने का प्रयास सचमुच में सराहनीय है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना में सरलता और स्वाभाविकता है, तो रोचकता और प्रवाहमयता भी है। इस तरह यह पद्यांश भाववर्द्धक रूप में है। यह कहा जा सकता है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने क्या किया है?
(ii) बालिका का चरित्र कैसा है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने बालिका का परिचय दिया है।
(ii) बालिका का चरित्र अत्यधिक विशुद्ध और स्वाभाविक है।

2. सुपा-धार यह नीरस दिल की मस्ती मगन तपस्वी की।
जीवन ज्योति नष्ट नयनों की सच्ची लगन मनस्वी की॥3॥

बीते हुए बालपन की यह क्रीड़ा पूर्ण वाटिका है।
वही मचलना, वही किलकना हँसती हुई नाटिका है।।4।।

शब्दार्च
सुधा-धार-अमृत की धार। नयनों-आँखों। मनस्वी-बुद्धिमान। बालपन-बचपन। नाटिका-नाटक करने वाली।

प्रसंग-पूर्ववत । इसमें कवयित्री ने अपनी बिटिया को नीरस दिल में अमृत धारा प्रवाहित करने वाली मानते हुए कहा है।

व्याख्या-मेरी बिटिया मेरे नीरस हृदय के लिए अमृत की धारा है। इसकी मस्ती और प्रसन्नता किसी तपस्वी से कम नहीं है। आँखों की गयी हुई रोशनी को वापस लाने वाली यह जीवन की ज्योति के समान है। इसमें बुद्धिमानों की तरह सच्ची लगन है। यह मेरे बीते हुए बचपन को लौटाने वाली क्रीड़ामयी वाटिका की तरह है। इसका मचलना और किलकना किसी हँसती हुई नाटिका से किसी प्रकार कम नहीं है।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली सरल और सुबोध है।
  2. शैली चित्रात्मक है।
  3. रूपक अलंकार है।
  4. वात्सल्य रस का संचार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न(i) प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-स्वरूप सरल और सुबोध शब्दावली से होकर वात्सल्य रस में प्रवाहित हुआ है। इसमें चमत्कार लाने के लिए किया गया रूपक अलंकार का प्रयोग मन को और लुभा रहा है।
(ii) प्रस्तुत पयांश की भाव-योजना हृदय को बड़ी आसानी से छू रही है। बालिका के प्रति वात्सल्य भावना की सच्चाई की रोचकता निश्चर्य ही आकर्षक है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) बालिका को किन-किन रूपों में प्रस्तुत किया गया है?
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से क्या अनुभूति होती है?
उत्तर
(i) बालिका को अमृत की धारा, मस्त मगन तपस्वी, जीवन-ज्योति, मनस्वी की सच्ची लगन, क्रीड़ामयी वाटिका और हँसती हुई नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से बीते हुए बचपन की अनुभूति होती है।

3. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद
काबा-काशी यह मेरी।
पूजा-पाठ, ध्यान-जप-तप है
घट-घट वासी यह मेरी ॥5॥

कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को
अपने आँगन में देखो।
कौशल्या के मात्र-मोदे को।
अपने ही मन में लेखो ॥6॥

शब्दार्थ-काबा-मुसलमानों का धार्मिक स्थान । घट-घट बासी-अन्दर निवास करने वाला परमात्मा। कृष्णचन्द्र-बालक श्रीकृष्ण। लेखो-देखो।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवयित्री ने बालिका को धर्मस्वरूप मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-मेरे लिए यह मेरी बेटी मन्दिर-मस्जिद, काबा, काशी के समान अत्यन्त पवित्र है। यह मेरे लिए पूजा-पाठ और ध्यान, जप-तप के समान है। यह मेरे घट-घट में निवास करती है। इस प्रकार मैंने अपनी बालिका को अपने आँगन में अनेक प्रकार के खेल-खेलते हुए देखा, तो मुझे ऐसा लगा मानो बालक श्रीकृष्ण ही मेरे ऑगन में बाल-क्रीड़ा कर रहे हैं। इसे आप लोग भी अपनी-अपनी बालिकाओं में देख सकते हैं। इस प्रकार माता कौशल्या के आनन्द को अपने मन में अनुभव कर सकते हैं।

विशेष-

  1.  भाषा में सजीवता है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. वात्सल्य रस का प्रवाह है।
  4. सामाजिक शब्दावली है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश वात्सल्य रस की सहज धारा से प्रवाहित है, जो सरल शब्दावली से पुष्ट हुआ है। अनुप्रास अलंकार (कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं की, अपने आँगन, मात्र मोदे और मन में) के आकर्षक प्रयोग से यह पद्यांश प्रभावशाली बन गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरल, स्वाभाविक और भाववर्द्धक है। यह पूरी तरह से बोधगम्य और हृदय को छू लेने वाला है। बालक के चरित्र की पवित्रता का उल्लेख सचमुच में बड़ा ही अनूठा है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर प्रश्न-10 बालिका की पवित्रता कैसी है?

(i) बालिका की बाल-लीला कैसी होती है? उत्तर-0 बालिका की पवित्रता मन्दिर, मस्जिद, काबा और काशी जैसी है।
(ii) बालिका की बाललीला बालक राम-कृष्ण जैसी होती है।

4. प्रभु ईशा की क्षमाशीलता
नवी मुहम्मद का विश्वास।
जीव दया जिनवर गौतम की
आओ देखो इसके पास ॥7॥

परिचय पूछ रहे हो मुझसे
कैसे परिचय हूँ इसका।
वहीं जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥8॥

शब्दार्थ-ईशा-ईशामसीह। नबी-इस्लाम धर्म के महापुरुष। जिनवर-तीर्थकर/ महावीर स्वीमी।

प्रसंग-पूर्ववत्। उसमें कवयित्री ने बालिका को संसार के महापुरुष के समान बतलाने का प्रयास किया है। इसके लिए कवयित्री का कहना है कि

व्याख्या-चूँकि बालिका का तन-मन स्वच्छंद और पवित्र भावों से भरा होता है।

इसलिए उसमें ईशामसीह की क्षमाशीलता और नबी-मुहम्मद के अटूट विश्वास को समझा जा सकता है। यही नहीं, उसमें महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति अपार दया की भावना जैसे अद्भुत और अनोखे उच्च गुणों को देखा-परखा जा सकता है। कवयित्री का पुनः कहना है कि अगर कोई उससे बालिका का परिचय पूछे तो वह क्या दे सकती है। उसका तो यही कहना है कि बालिका को एक माता का दिल ही सचमुच में जान सकता है।

विशेष-

  1. बालिका के उदार और विशाल हृदय को अत्यधिक श्रेष्ठ कहा गया है।
  2. ईशामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से बालिका की तुलना की गई है। इसलिए इसमें उपमा अलंकार है।
  3. उदाहरण शैली है।
  4. सम्पूर्ण कथन अत्यधिक रोचक है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश को उपमा अलंकार की झड़ी लगाकर अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास सचमुच में प्रशंसनीय है। इसे और रोचक बनाने के लिए भाषा को धारदार बनाकर कथन की सच्चाई का सामने लाया गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान स्वाभाविक, यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय और हदयस्पर्शी है। बालिका की अद्भुत विशेषता को महानतम रूप में लाने का कवयित्री का प्रयास न केवल अनूठा है, अपितु प्रेरक भी है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बालिका के असाधारण गुण कौन-कौन से हैं?
(ii) बालिका की सच्चाई को कौन बता सकता है?
उत्तर
(i) बालिका के असाधारण गुण हैं-ईशामसीह की क्षमाशीलता, नवी-मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति दया-भावना।
(ii) बालिका की सच्चाई माता ही बता सकती है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 12 जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 12 जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया (संकलित)

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया अभ्यास-प्रश्न

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया लबूतरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सैल्यूकस कहाँ का राजा वा? वह भारत क्यों आया था?
उत्तर
सैल्यूकस सीरिया का राजा था। वह भारत, भारत भ्रमण के लिए आया था।

प्रश्न 2.
मैगस्थनीज कौन था? उसने चाणक्य से मिलने का समय कब निश्चित किया?
उत्तर
मैगस्थनीज चन्द्रगुप्त के दरबार में नियुक्त राजदूत था। वह चाणक्य का प्रशंसक था। उसने चाणक्य से मिलने का समय सायंकाल निश्चित किया।

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प्रश्न 3.
जब चन्द्रगुप्त और सैल्यूकस कुटिया में पहुँचे, तब आचार्य चाणक्य किस कार्य में व्यस्त थे?
उत्तर
जब चन्द्रगुप्त और सैल्यूकस कुटिया में पहुँचे तब आचार्य चाणक्य राजकार्य से सम्बन्धित कुछ जरूरी दस्तावेजों की जाँच कर रहे थे।

प्रश्न 4.
सैल्यूकस के चकित होने का क्या कारण था?
उत्तर
सैल्यूकस के चकित होने का कारण यह था कि इतने बड़े साम्राज्य के प्रधानमन्त्री चाणक्य किसी भव्य और विशाल भवन में नहीं, अपितु एक कुटिया में रह रहे हैं।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य चाणक्य के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
आचार्य चाणक्य का व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की अदभत विशेषताओं का भण्डार है। उनका व्यक्तित्व अनोखे गुणों से भरा हुआ था। वे एक साथ प्रतिभाशाली, चरित्रवान, सुस्पष्ट, दूरदर्शी, कुशल राजनीतिज्ञ, राष्ट्रभक्त, त्यागशील, ईमानदार, बुद्धिमान और उदार प्रकृति के थे। उनमें किसी प्रकार का न तो अभिमान था और न ही पद-लोलुपता थी। वे कर्तव्यपरायण और अतिथि सम्मानकर्ता थे। इस प्रकार आचार्य चाणक्य की अद्भुत विशेषताओं से दूसरे देश के शासक भी अधिक प्रभावित थे।

प्रश्न 2.
सैल्यूकस ने कुटिया में क्या-क्या देखा? ।
उत्तर
सैल्यूकस ने कुटिया में निम्नलिखित समानों को देखा कटिया के अन्दर एक ओर जल का घड़ा रखा था। दूसरे कोने में उपलों और समिधाओं का ढेर था। एक चटाई बिछी थी। नमक आदि पीसने के लिए सील-बट्टा भी रखा था। एक बाँस लटका हुआ था जिस पर कपड़े रखे हुए थे। एक चौकी, जिस पर पढ़ने-लिखने की सामग्री थी। पास ही दो दीपाधार भी रखे हुए थे। उस समय चाणक्य गम्भीर और एकाग्रचित्त विचार मग्न होकर लेखन के काम में व्यस्त थे।

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प्रश्न 3.
एक दीपक बुझाकर दूसरे दीपक को जलाने के पीछे चाणक्य का क्या तर्क था?
उत्तर
एक दीपक बुझाकर दूसरे दीपक को जलाने के पीछे चाणक्य का तर्क था-पहले दीपक में राजकोष के पैसों से तेल डाला गया था। इसलिए उससे राजकार्य से सम्बन्धित जरूरी दस्तावेजों की जाँच की जा रही थी। जाँच का काम समाप्त होने पर उसे बुझा दिया गया। दूसरा दीपक निजी पैसे से खरीदा हुआ जल रहा है। इससे होने वाली बात भी निजी है।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया भाषा-अध्ययन

(क) नीचे लिखे अपठित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए:
स्वार्थ और परणाई मानव की दो प्रवृत्तियाँ हैं। हम अधिकतर सभी कार्य अपने लिए करते हैं ‘पर’ के लिए सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानक्ता है। यही धर्म है, यही पुण्य है। इसे ही परोपकार कहते हैं। प्रकृति हमें निरन्तर परोपकार का सन्देश देती है। नदी दूसरों के लिए बहती है। वृत मनुष्यों को छाया तथा फल देने के लिए ही घूप, आँधी, वर्षा और तूफानों के जल के रूप में अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं।

प्रश्न 1. सच्ची मानवता क्या है?
प्रश्न 2. वृक्ष हमें परोपकार का सन्देश कैसे देते हैं?
प्रश्न 3. मनुष्य की कौन-सी दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं?
प्रश्न 4. गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) वर्तनी सुधारियेचरीत्रवान, नियूक्त, आर्चाय, कुटीया, विशीष्ट, आशिर्वाद, सामराज्य, चटायी, चाडक्य।
उत्तर
1. परार्थ काम करना ही सच्ची मानवता है।
2. वृक्ष हमें छाया तथा फल देकर परोकार का सन्देश देते हैं।
3. स्वार्थ और परमार्थ मनुष्य की दो प्रमुख प्रवृत्तियों हैं।
4. शीर्षक-‘परोपकार’।
(ख) चरित्रवान्, नियुक्त, आचार्य, कुटिया, विशिष्ट, आशीर्वाद, साम्राज्य, चटाई, चाणक्य।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया योग्यता-विस्तार

(क) आचार्य चाणक्य की तरह प्रतिभाशाली और सूझबूझ रखने वाले राष्ट्र-भक्तों के बारे में साथियों से जानकारी प्राप्त कीजिए और उनके चित्रों को एकत्रित करिए। पुस्तकालय में जाकर जीवन-मूल्यों पर आधारित कहानियाँ पढ़िए और स्वयं इस प्रकार की कहानी लिखिए। चाणक्य से सम्बन्धित अन्य कहानियाँ जानिए और लिखिए।
‘सैल्यूकस की जन्म-भूमि अर्वात् ग्रीस के बारे में जानकारी एकत्रित कर लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य चाणक्य कौन ?
उत्तर
आचार्य चाणक्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री थे। वे महान प्रतिभाशाली, दूरदर्शी और कुशल राजनीतिज्ञ थे।

प्रश्न 2.
सैल्यूकस कौन था? वह आचार्य चाणक्य से क्यों मिलने गया?
उत्तर
सैल्यूकस सिरिया का राजा था। उसने आचार्य चाणक्य की प्रशंसा सुन रखी थी। इसलिए वह उनसे मिलने गया।

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प्रश्न 3.
सम्राट चन्द्रगुप्त सैल्यूकस को लेकर कहाँ गये?
उत्तर
सम्राट चन्द्रगुप्त सैल्यूकस को लेकर एक पुरानी टूटी-फूटी कुटिया में रह रहे आचार्य चाणक्य के पास गये।

प्रश्न 4.
राजकोष के तेल से जलने वाले दीपक को बुझाकर निजी कोष के तेल से दूसरा दीपक जलाने से आचार्य चाणक्य के किस दृष्टिकोण का पता चलता है?
उत्तर
राजकोष के तेल से जलने वाले दीपक को बुझाकर निजी कोष के तेल से दूसरा दीपक जलाने से आचार्य चाणक्य की राष्ट्रभक्ति और ईमानदारी के दृष्टिकोण का पता चलता है।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य चाणक्य ने सैल्यूकस की शंका का समाधान करते हुए क्या कहा?
उत्तर
आचार्य चाणक्य ने सैल्यूकस की शंका का समाधान करते हुए कहा-“दूसरे दीपक को जलाने और पहले दीपक को बुझाने के पीछे कोई सनक या उन्माद की भावना काम नहीं कर रही थी। सच्चाई तो यह है कि जब आप यहाँ आये तो मैं राजकार्य से सम्बन्धित कुछ जरूरी दस्तावेजों की जाँच कर रहा था। उस समय जो दीपक जल रहा था उसमें राजकोष के पैसों से तेल डाला गया था, इस समय आपसे बातचीत करेंगे, वह हमारी निजी होगी। इस कारण मैंने राजकीय दीपक को बुझाकर अपने कमाये हुए धन से खरीदा हुआ दीपक जलाया है। ऐसा करके मैंने कोई विचित्र काम नहीं किया है।”

प्रश्न 2.
इस प्रेरक प्रसंग से क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर
इस प्रेरक प्रसंग से हमें कई प्रकार की प्रेरणा मिलती है

  1. हमें अपने कर्तव्य का पालन सच्चाई से करना चाहिए।
  2. हमें अपने निजी स्वार्थ को देश और समाज के लिए न्यौछावर कर देना चाहिए।
  3. अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और भक्ति की भावना को प्रकट करते रहना चाहिए।
  4. हमें अपने पद और कार्यभार के दायित्व को सच्ची भावना से निभाना चाहिए।
  5. हमें पद-प्रतिष्ठा पाकर अहंकार नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 3.
‘जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया’ प्रेरक प्रसंग के मुख्य भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत प्रेरक प्रसंग का आधार एक ऐतिहासिक घटना है। इस घटना को आधार बनाकर यह दिखलाने का प्रयास किया गया है कि जहाँ एक ओर ‘त्याग’ . व्यक्ति के जीवन को उदात्त बनाता है। वहीं दूसरी ओर सामाजिक जीवन के एक विशिष्ट मूल्य के रूप में व्यवस्थाओं को लोकहितकारी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करता है। राजनीति और त्याग पर आधारित इस प्रेरक प्रसंग के माध्यम से महान सम्राट चन्द्रगुप्त के महामन्त्री चाणक्य की राष्ट्र-भक्ति को चित्रित किया गया है। राज्य के सभी प्रकार के सुख-वैभव को छोड़कर महामन्त्री चाणक्य का झोपड़ी। में रहना, के उल्लेख से जहाँ उनके अद्भुत त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। वहीं सैल्यूकस की निजी भेंट के समय राजकोष के तेल से जलने वाले दीपक को बुझाकर निजी कोष के तेल से दूसरा दीपक प्रज्ज्वलित करने के उल्लेख के द्वारा रनके राष्ट्रीय संचेतक एवं राजनीति के भोगवादी दृष्टिकोण के निषेध की भूमिका को भी बड़े अनूठे ढंग से सामने लाने का प्रयास किया गया है प्रस्तुत करता है।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया प्रेरक प्रसंग का सारांश

प्रश्न
‘जब चाणक्य ने दीपक जलाया’ प्रेरक प्रसंग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
प्रस्तुत प्रसंग प्रेरक रूप में है। सम्राट चन्द्रगुप्त के महामन्त्री चाणक्य की ईमानदारी को इस प्रसंग में लाकर शिक्षाप्रद बनाने का प्रयास किया गया है। इस प्रेरक प्रसंग का सारांश इस प्रकार है सम्राट चन्द्रगुप्त के महामन्त्री आचार्य चाणक्य अत्यधिक प्रतिभाशाली, दूरदर्शी, कुशल राजनीतिक और महान चरित्रवान् थे। उनकी इस अद्भूत विशेषता को सुनकर सीरिया का राजा सिल्यूकस ने भारत आने पर उनसे मिलने की इच्छा सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में नियुक्त राजदूत मैगस्थनीज से प्रकट की। चाणक्य से मिलने के लिए सूर्यास्त के बाद का समय निश्चित किया गया। एक विशाल साम्राज्य के महामन्त्री को एक पुरानी कुटिया में देखकर सिल्यूकस हैरान हो गये। चन्द्रगुप्त-सिल्यूकस ने उस कुटिया के भीतर जाकर देखा कि एक ओर पानी का घड़ा है तो दूसरी ओर उपले, सिल बट्टा, बाँस पर कपड़े और चौकी पर पढ़ने-लिखने की सामग्री थी।

पास में दो दीपाधार थे। उस समय चाणक्य गम्भीर मुद्रा में कुछ लिख रहे थे। लिखने का काम समाप्त करके उन्होंने चन्द्रगुप्त को आशीर्वाद और सिल्यूकस को सम्मान देते हुए दीपक बुझा दिया और दूसरा दीपक जला दिया। इसे देखकर सिल्यूकस हैरान हो गया। पूछने पर चाणक्य ने कहा कि जब वे वहाँ आये तो वे राजकार्य से सम्बन्धित जरूरी दस्तावेजों की जाँच कर रहे थे। उस समय जलते हुए उस दीपक में राजकोष के पैसों से तेल डाला गया था। इस समय उन दोनों की बात उनकी निजी होगी। इसलिए उन्होंने राजकीय दीपक को बुझाकर अपने कमाए हुए धन से खरीदा हुआ दीपक जलाया है। यह सुनकर सिल्यूकस और हैरान होकर सोचने लगे कि शायद ही ऐसे महान आदर्श महामन्त्री और किसी देश या राज्य में होगा।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 जागरण गीत

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 जागरण गीत (सोहनलाल द्विवेदी)

जागरण गीत अभ्यास-प्रश्न

जागरण गीत लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि गीत गाकर ही लोगों को क्यों जगाना चाहता है?
उत्तर
कवि गीत गाकर ही लोगों को जगाना चाहता है। यह इसलिए कि साधारण रूप से कही गई बातों की अपेक्षा गीत के माध्यम से कही बातें अधिक प्रभावशाली होती हैं।

प्रश्न 2.
इस गीत में किस रास्ते को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है?
उत्तर
इस गीत में उदयाचल को सर्वश्रेष्ठ रास्ता बताया गया है।

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प्रश्न 3.
कवि किस रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए आतुर है?
उत्तर
कवि प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए आतुर है।

प्रश्न 4.
संकीर्णताएँ तोड़ने के लिए कवि क्या करना चाहता है?
उत्तर
संकीर्णताएँ तोड़ने के लिए कवि सोए हुए दृढ़ भावों को जगाना चाहता है।

जागरण गीत दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि आकाश में उड़ने के लिए क्यों रोक रहा है? कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कवि आकाश में उड़ने के लिए रोक रहा है। यह इसलिए कि इससे जीवन की वास्तविकता का ज्ञान नहीं हो पाता है। फलस्वरूप जीवन दुखद और निरर्थक बना रहता है।

प्रश्न 2.
शूल को फूल बनाने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर
शूल को फूल बनाने से कवि का आशय है-जीवन में आने वाली कठिनाइयों, रुकावटों और कष्टों को अपनी क्षमता, शक्ति आर बुद्धिबल से दूर करके जीवन को हर प्रकार से सुखद और सुन्दर बना लेना। इसके द्वारा कवि ने आलसी और निराश लोगों को प्रेरित और उत्साहित करना चाहा है।

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प्रश्न 3.
‘अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूँगा। अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ।’ उपरोक्त पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा। अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ।’ उपरोक्त पंक्तियों के द्वारा कवि ने यह भाव दर्शाना चाहा है कि गहरी नींद में पड़े रहना, जीवन की सच्चाई को नकारना है। इस प्रकार का जीवन डूबते हुए सूरज के समान है, जिसमें न कोई आशा, विश्वास, आकर्षण, समुल्लास आदि जीवन-स्वरूप दिखाई देते हैं। इस प्रकार का जीवन न स्वयं के लिए अपितु दूसरे के लिए भी दुखद और कष्टकर होता है। इसलिए इस प्रकार के जीवन का परित्याग करके अरुण उदयाचल अर्थात् प्रगति के पथ पर बढ़ने के लिए हर प्रकार से कदम बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 4.
विपथ होकर मुड़ने का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विपथ होकर मुड़ने का आशय है-सन्मार्ग से हटकर कुमार्ग पर चलना। दूसरे शब्दों में अच्छाई और सुन्दरता को छोड़कर बुराई और कुरूपता को अपनाना।

जागरण गीत भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं उन्हें दूर कर पुनः लिखिए।
अरूण, सीस, सूल, मंझदार, श्रृंखलाएँ, पातवार, पृगति, संकीणताएँ, विपथ, झनझनाये।
उत्तर
अशुद्धियाँ – शुद्धियाँ
अरूण – अरुण
शीस – शीश
सूल – शूल
मंझदार – मैंनधार
श्रृंखलाएँ – श्रृंखलाएँ
पातवार – पतवार
पृगति – प्रगति
संकीणताएँ – संकीर्णताएँ
विपथ – बिपथ
झनझनाये – झनझनाए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखकर पुनः वाक्य लिखिए
1. अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूंगा।
2. फूल मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।
3. विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा।
4. मैं किनारे पर तुम्हें बकने न दूंगा।
5. सिंधु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।
उत्तर

  1. अब तुम्हें आसमान में उड़ने न दूंगा।
  2. पुष्प मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।
  3. कुपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा।
  4. मैं तट पर तुम्हें थकने न दूँगा।
  5. समुद्र बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों को पढ़िए और पाठ में आए शब्दों में से स्वर मैत्री समझकर लिखिए
अस्ताचल – उदयाचल
साधना – ……………..
मैंनदार – ………………..
उठाए – ……………….
गति – ………………..
शूल – ……………
उत्तर
अस्ताचल – उदयाचल
साधना – कल्पना
मँझदार – पतवार
उठाए – झनझजाए
गति – गति
शूल – फूल

जागरण गीत योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
जीवन में प्रगति तभी सम्भव है जब हम निराशा के क्षणों में तथा विरोधी परिस्थितियों में संघर्षरत रहकर आशावादी दृष्टिकोण रखकर आगे बढ़ें। इस सन्दर्भ की अन्य कविताएँ संकलित कीजिए तवा विभिन्न अवसरों पर अपने मित्रों/साथियों को सुलेख में लिखकर भेंट करें।

प्रश्न 2.
कक्षा में एक डिब्बा रखिए। अपने साथियों के किस गुण से किस परिस्थिति से आप प्रभावित हुए एक कागज पर लिखकर डिब्बे में डालिए। कुछ दिनों के उपरांत अपने शिक्षक एवं कक्षा के सम्मुख उन्हें खोलकर सबको सुनाएँ।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

जागरण गीत परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गहरी नींद में सोने वाले अब सो न सकेंगे। क्यों?
उत्तर
गहरी नींद में सोने वाले अब सो न सकेंगे। यह इसलिए कि कवि उन्हें गीत गाकर जगाने आ रहा है।

प्रश्न 2.
कवि अस्ताचल जाने के बजाय कहा जाने की बात कह रहा है? उत्तर-कवि अस्ताचल जाने के बजाय उदयाचल जाने की बात कह रहा है। प्रश्न 3. कवि के अनुसार क्या दुख-सुख है?
उत्तर
कवि के अनुसार नींद में सपने संजोना दुख है और इससे हटकर परिश्रम पूर्वक जीवन जीना सुख है।

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प्रश्न 4.
मैंनधार से किनारे पर आने के लिए कवि ने क्या कहा है?
उत्तर
मँझधार से किनारे पर आने के लिए कवि ने कहा है कि मैंझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। हिम्मत करके विश्वासपूर्वक हाथ में पतवार लेकर किनारे की ओर आने का लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।

जागरण गीत दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि गीत किसके लिए गा रहा है?
उत्तर
कवि गहरी नींद में सोने वालों, अतल अस्ताचल की ओर जाने वालों, कल्पना के पंख लगाकर आकाश में उड़ने वालों, जीवन को काँटा समझने वालों, जीवन के मँझधार में पड़कर घबड़ाने और थकने वालों, मन में तुच्छ विचारों को रखने वालों और विपथ होकर जीवन की सच्चाई को नकारने वालों के लिए गीत गा रहा है।

प्रश्न 2.
‘आ रहा हूँ। ऐसा कवि ने बार-बार क्यों कहा है?
उत्तर
‘आ रहा हूँ।’ ऐसा कवि ने बार-बार कहा है। यह इसलिए कि इसके द्वारा वह अपना जागरण सन्देश देना चाहा है। उसने अपना यह जागरण सन्देश उन लोगों को ही देना चाहा है, जो जीवन की सच्चाई को नकारते रहे हैं और संकीर्ण मनोवृत्तियों जैसे-आलस्य, निराशा आदि को स्वीकारते रहे हैं। कवि इस प्रकार की संकीर्ण मनोवृत्तियों को त्यागकर कर्मरत होते हुए जीवन की वास्तविकता को स्वीकारने के लिए ही बार-बार ‘आ रहा हूँ। कहकर आत्मीयता प्रकट करना चाहता है।

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प्रश्न 3.
‘जागरण गीत’ का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री सोहनलाल द्विवेदी-विरचित कविता ‘जागरण गीत’ एक प्रेरक कविता है। इस गीत के द्वारा द्विवेदी जी ने बड़े ही नपे-तुले शब्दों में जीवन की सार्थकता को बतलाने का प्रयास किया है। द्विवेदी जी इस जागरण गीत के माध्यम से जीवन की वास्तविकता का चित्रण किया है। उन्होंने यह बतलाना चाहा है कि जीवन में आलस्य, निराशा तथा संकीर्ण मनोवृत्ति को नकारते हुए मनोवृत्ति कर्मरत जीवन को ही प्रगति का मूलमंत्र बताया है। इस प्रकार उन्होंने पुराने मिथक तोड़ते हुए नव-जीवन के संचार का सन्देश इस गीत माध्यम से दिया है।

जागरण गीत कवि-परिचय

प्रश्न
श्री सोहनलाल द्विवेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परचिय-श्री सोहनलाल द्विवेदी का राष्ट्रीय विचारधारा के कवियों में प्रमुख स्थान है। उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता का अधिक स्वर सुनाई पड़ता है। उनका जन्म सन् 1905 ई. में हुआ था। उन्होंने छोटी-सी आयु में ही काव्य-रचना आरम्भ किया, जो क्रमशः देश-प्रेम और भक्ति के स्वर से गुंजित होता गया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय विचारधारा का प्रवाह है, तो गाँधीवादी चिन्तन और दृष्टिकोण भी है।

रचनाएँ-द्विवेजी जी की निम्नलिखत-रचनाएँ हैं-भैरवी-पूजा, ‘गीत’, ‘सेवाग्राम’, ‘दूध बतासा’, ‘चेतना’,’बाल भारती’ आदि।

भाषा-शैली-द्विवेदी जी की भाषा सहज और ऐसे प्रचलित शब्दों की है, जिसमें विविधता और अनेकरूपता है। तत्सम शब्दों की अधिकता है। जिसकी सहजता के लिए तभव और देशज शब्द बड़े ही उपयुक्त और सटीक रूप में प्रस्तुत हुए हैं। कहीं-कहीं मुहावरों-कहावतों को प्रयुक्त किया गया है। उनसे भाषा में और सजीवता आ गई है। बोधगम्यता और प्रवाहमयता उनकी शैली की पहली विशेषता है।

महत्त्व-द्विवेदी जी भारतीय संस्कृति को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के प्रबल समर्थक थे चूँकि गाँधी की विचारधारा से वे पूरी तरह प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने उसका न केवल समर्थन किया, अपितु उसे अपनी रचनाओं के माध्यम से जन-जन तक प्रेरित भी किया। गाँधीवादी विचारधारा में आस्था रखने के कारण उनकी रचनाओं में प्रेम, अहिंसा और समता के भाव दिखाई देते हैं। इस प्रकार वे अपने विशिष्ट योगदानों के लिए सदैव याद किए जाते रहेंगे।

जागरण गीत कविता का सारांश

प्रश्न
सोहन लात द्विवेदी विरचित कविता ‘जागरण गीत’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री सोहनलाल द्विवेदी-विरचित कविता ‘जागरण गीत’ एक भाववर्द्धक और सन्देशवाहक कविता है। इसमें कवि ने यथार्थ जीवन जीने का सन्देश दिया है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवि गहरी नींद में सोने वालों से कह रहा है कि वह गीत गाकर उसे जगाने के लिए आ रहा है। वह अब नींद की गहराई से ऊपर निकालकर उसे आकर्षक उदयाचल की तरह उत्साह प्रदान करने का जागरण गीत गा रहा है। कवि गहरी नींद में सोने वाले को फटकारते हुए कह रहा है कि वह आज तक नींद में पड़े-पड़े मीठी-मीठी कल्पना का उड़ान भरता रहा है। परिश्रम करने से कतराता रहा है।

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लेकिन वह ऐसा नहीं कर पायेगा। ऐसा इसलिए कि वह अपने जागरण गीत से उसे यथार्थ जमीन पर ला देगा। उसमें यह चेतना ला देगा कि नींद में सपने देखना सुखदायक नहीं है। उसके दुःखों को सुखों में वह अपने जागरण गीत से फूल में बदल देगा। गहरी नींद में सोने वाले को कवि की सीख है कि उसे जीवन के दुखों के मझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। ऐसा इसलिए कि वह अपने जागरण गीत से उसे पार लगा देगा। इसलिए उसे अपने मन में उठने वाली छोटी-छोटी बातों को भूल जाना चाहिए। उसे यह विश्वास होना चाहिए कि वह अपने जागरण गीत से उसकी हीनता को समाप्त कर देगा। यह सोच-समझकर अपने जीवन-पथ पर निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। वह अपने जागरण गीत से उसे उसके प्रगति के पथ से पीछे नहीं मुड़ने देगा।

जागरण गीत संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे,
गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूँ।
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा,
अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ॥

कल्पना में आज तक उड़ते रहे तुम,
साधना से सिहरकर मुड़ते रहे तुम।
अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूँगा,
आज धरती पर बसाने आ रहा हूँ॥

शब्दार्च-अतल-गहराई। अस्ताचल-पश्चिम का वह कल्पित पर्वत जिसके पीछे सूर्य का अस्त होना माना जाता है। उदयाचल-पूर्व का वह कल्पित पर्वत जहाँ से सूर्य उदित होता है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासन्ती’ हिन्दी सामान्य में संकलित तथा श्री सोहनलाल द्विवेदी विरचित कविता ‘जागरण गीत’ से है। इसमें कवि ने आलसी मनुष्यों को सावधान करते हुए कहा है कि

व्याख्या-अब मैं तुम्हें गहरी नींद में नहीं सोने दूंगा। मैं तुम्हें जगाने के लिए जागरण गीत तुम्हें सुनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ। अस्ताचल की गहराई अर्थात् जीवन की बर्बादी की ओर तुम्हें जाने से रोकने के लिए मैं आकर्षक उदयाचल को सजाने के लिए अर्थात् तुम्हारे जीवन को आनन्दित बनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ। तुम्हें अपने-आपके विषय में यह अच्छी तरह से जानकारी होनी चाहिए कि तुम आज तक कल्पना की ऊँची उड़ान उड़ते रहे हो। परिश्रम से मुँह मोड़ते रहे हो। लेकिन अब मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगा। अब तो मैं आकाश की उड़ान से नीचे धरती पर लाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हैं। दूसरे शब्दों में तम्हें जीवन की वास्तविकता बतलाने-समझाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. कवि का जागरण-सन्देश भाववर्द्धक है।
  2. शब्द-चयन लाक्षणिक है।
  3. तत्सम शब्दों एवं तदभव शब्दों के प्रयोग सटीक हैं।
  4. शैली उपदेशात्मक-भावात्मक है।
  5. वीर रस का संचार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य काव्यांग के स्वरूपों से पष्ट है। अनप्रास अलंकार की छटा (गीत गाकार व अतल अस्ताचल) इस पद्यांश में जहाँ है, वहीं मुहावरेदार शैली (गहरी नींद में सोना, आकाश में उड़ना और धरती पर बसाना) का प्रयोग आकर्षक है। वीर रस से यह अंश अधिक गतिशील होकर ओजपूर्ण बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरस और सहज शब्दों का है गहरी नींद में गीत गाकर जगाने का भाव न केवल अनूठा है अपित आत्मीयता से परिपूर्ण है।
गहरी नींद की सच्चाई को विश्वसनीयता के साथ बतलाने का ढंग रोचक होने के । साथ प्रेरक भी है। इससे कथन की सफलता को नकारा नहीं जा सकता है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि गीत गाकर किसे जगाना चाहता है?
(ii) आकाश में उड़ने के लिए कवि क्यों मना करता है?
उत्तर
(i) कवि गीत गाकर गहरी नींद में सोने वाले को जगाना चाहता है।
(ii) आकाश में उड़ने के लिए कवि मना करता है। यह इसलिए कि इससे जीवन की निरर्थकता सिद्ध होती है।

2. सुख नहीं यह, नींद में सपने संजोना,
दुख नहीं यह, शीश पर गुरू भार ढोना।
शूल तुम जिसको समझते वे अभी तक,
फूल में उसको बनाने आ रहा हूँ।
देखकर मँझधार को घबरा न जाना,
हाथ ले पतवार को घबरा न जाना।
मैं किनारे पर तुम्हें चकने न दूंगा,
पार में तुमको लगाने आ रहा हूँ।

शब्दार्थ-गुरूभार-भारीभार। शूल-काँटा (कठिनाई)। मझधार-बीच धारा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इस पद्यांश में कवि ने कायर और आलसी मनुष्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहा है कि

व्याख्या-हे आलसी, कायर मनुष्य! तुम्हें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि गहरी नींद में पड़े रहना किसी प्रकार से सुखद नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह हर प्रकार से दुखद और हानिकर ही होगा। इस प्रकार दुःखद होगा कि यह सिर का एक बहुत बड़ा बोझ बन जायेगा। उसे ढो पाना निश्चय ही असम्भव होगा। अब तक तुमने जिसे फूल अर्थात् जीवन की कठिनता समझते आ रहे हो। उसे ही मैं फूल बनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

कवि का पुनः गहरी नींद में सोने वाले अर्थात् जीवन-संघर्ष से भागने वाले मनुष्य को समुत्साहित करते हुए कहना है कि तुम स्वयं को जीवन-सागर के मँझधार में पाकर घबड़ाओ नहीं, अपितु धैर्य और हिम्मत से काम लो। जीवन-सागर के मँझधार से निकलकर किनारे पर आने के लिए तुम धैर्य रूपी पतवार को अपने हाथ में संभाल लो। इस प्रकार जब तुम साहस करोगे तो मैं तुम्हें किनारे पर आने तक उत्साहित करते हुए किसी प्रकार से निराश नहीं होने दूंगा। इस प्रकार मैं तुम्हें तुम्हारे जीवन-सागर से पार लगाने के लिए ही तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. वीर रस का प्रवाह है।
  2. तुकान्त शब्दावली है।
  3. शैली उपदेशात्मक है।
  4. ‘नींद में सपने संजोना’, ‘फूल बनाना’, हाथ में पतवार लेना और पार लगाना मुहावरों के सटीक और सार्थक प्रयोग हैं।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पयांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाक्-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश को काव्य:विधान-स्वरूप शब्द-भाव-योजना से निखारने का प्रयास प्रशंसनीय कहा जा सकता है। ‘घबरा न जाना’ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से अलंकृत यह पद्यांश कई मुहावरों के एकजुट आने से अधिक भावपूर्ण होकर सार्थकता में बदल गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना अपनी प्रभावमयता के फलस्वरूप रोचक और आकर्षक है। निराश और जीवन-संघर्ष के सामने घुटना टेकने वालों को सत्प्रेरित करने के विविध प्रयास प्रभावशाली रूप में हैं।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) नींद में सपने संजोना क्यों नहीं सुखद है?
(ii) मँझधार में पड़ने पर क्या नहीं करना चाहिए और क्या करना चाहिए?
उत्तर-
(i) नींद में सपने संजोना सुखद नहीं है। यह इसलिए कि इससे दुखों का बोझ कम न होकर बहुत भारी हो जाता है। फिर उसे ढोना असम्भव-सा हो जाता है।
(ii) मँझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। हाथ में पतवार लेकर किनारे पर आने के लिए पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए।

3. तोड़ दो मन में कसी सब शृंखलाएँ
तोड़ दो मन में बसी संकीर्णताएँ।
बिन्दु बनकर मैं तुम्हें ढलने न दूंगा
सिन्धु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ॥
तुम उठो, धरती उठे, नभ शिर उठाए,
तुम चलो गति में नई गति झनझनाए।
विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा,
प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ॥

शब्दार्व-संकीर्णताएँ-तुच्छ विचार । श्रृंखलाएँ-कड़ियाँ। नभ-आकाश । शिर-मस्तक, सिर। विपथ-बुरा रास्ता। प्रगति-उन्नति।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने आलसी और निराश व्यक्ति को समुत्साहित करते हुए कहा है कि

व्याख्या-तुम अपने मन को हीन करने वाली विचारों की कड़ियों को खण्ड-खण्ड कर डालो। इसी प्रकार तुम अपने अन्दर के तुच्छ विचारों और हीन भावों का परित्याग कर दो। तुम्हें स्वयं को कम न समझते हुए समुद्र की तरह विशाल और असीमित शक्ति से भरपूर समझना चाहिए। अगर तुम ऐसा नहीं समझते हो तो मैं तुम्हें ऐसा समझने के भावों को तुम्हारे अन्दर से जगाऊँगा।

इस प्रकार तुम्हें एक बिन्दु के समान जीवन जीने की स्थिति में नहीं रहने देगा। मैं तो तुम्हें समुद्र की तरह जीने देने के लिए तुम्हारे अन्दर सोई हुई भावनाओं को जगाने के लिए तुम्हारे ही पास आ रहा हूँ। कवि का पुनः जीवन में हारे हुए और निराश व्यक्ति को समुत्साहित करते हुए कहना है कि तुम अब अपनी गहरी नींद से जग जाओ। तुम्हारी जागृति और चेतना से इस संसार में जागृति और चेतना आ जाएगी। सारा आसमान अपना मस्तक ऊंचा कर लेगा। तुम्हारे गतिशील होने से सब ओर गतिशीलता आ जाएगी। तुम्हें विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के उद्देश्य से मैं तुम्हारे जीवन में हारने नहीं दूंगा। इस प्रकार मैं तुम्हें विकास के रास्ते पर निरंतर बढ़ाने के उद्देश्य से तुम्हारे पास ही आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. भाषा में ओज और गति है।
  2. मुहावरों के प्रयोग सटीक हैं।
  3. शब्द-चयन प्रचलित रूप में है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप प्रचलित तत्सम शब्दावली से परिपुष्ट है। उसे रोचक और आकर्षक बनाने के लिए तुकान्त शब्दावली की योजना ने लय
और संगीत को प्रस्तुत करके भाववर्द्धक बना दिया है। वीर रस के प्रवाह-संचार से यह पद्यांश प्रेरक रूप में है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य वीरता के भावों से प्रेरक रूप में है। निराश मनों को वीर रस से संचारित करने का प्रयास प्रशंसनीय है। भाव और अर्थ का सुन्दर मेल है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘शृंखलाओं’ से कवि का क्या आशय है?
(ii) ‘विपव’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) शृंखलाओं से कवि का आशय है हीन भावनाएँ।
(ii) ‘विपथ’ से कवि का तात्पर्य है-कुपथ। सन्मार्ग को छोड़कर दुखद रास्ते पर चलना।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 10 न्यायमंत्री

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 10 न्यायमंत्री (सुदर्शन)

न्यायमंत्री अभ्यास प्रश्न

न्यायमंत्री लघुत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशुपाल के घर आने वाला अतिथि कौन था? उसकी बातों से शिशुपाल क्यों नाराज हो गये?
उत्तर
शिशुपाल के घर आने वाला अतिथि एक परदेशी था। उसकी बातों से शिशुपाल नाराज हो गए, क्योंकि उसने उनके पुत्र को सेवक कहा था।

प्रश्न 2.
‘गोबर में फूल खिला हुआ है।’ यह वाक्य किसके लिए कहा गया है और क्यों ?
उत्तर
‘गोबर में फूल खिला हुआ है।’ यह वाक्य उस परदेशी अतिथि द्वारा शिशुपाल के लिए कहा गया है। यह इसलिए कि उसके युक्तियुक्त और शासन पद्धति का इतना विशाल ज्ञान उस छोटे-से गाँव के ऐसे व्यक्ति में होने की उसने कल्पना भी नहीं की थी।

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प्रश्न 3.
शिशुपाल महाराज अशोक के दरबार में जाने से क्यों घबरा रहे थे?
उत्तर
शिशुपाल महाराज अशोक के दरबार में जाने से घबरा रहे थे। यह इसलिए कि उनके मन में यह आशंका हो रही थी कि उनके शत्रओं ने महाराज से कोई शिकायत कर दी है। उन्हें हो सकता है कि प्राणदंड मिल जाए।

प्रश्न 4.
न्यायमंत्री को प्रहरी के हत्यारे का पता कैसे चला?
उत्तर
न्यायमंत्री को प्रहरी के हत्यारे का पता एक स्त्री के द्वारा गुप्त रूप से चला।

प्रश्न 5.
न्यायमंत्री ने महाराज को दंड किस तरह दिया?
उत्तर
न्यायमंत्री ने महाराज की सोने की मुर्ति को फाँसी पर लटकवाया और उनको चेतावनी देकर छोड़ दिया। इस प्रकार न्यायमंत्री ने महाराज को दंड दिया।

न्यायमंत्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“शिशुपाल का न्याय अंपा और बहरा है।’ यह उक्ति किन संदर्भो में कही गई है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शिशुपाल का न्याय अंधा और बहरा है। यह उक्ति उन संदर्भो में कही गई है कि शिशुपाल ने न्यायमंत्री के अधिकार से पूरे पाटलीपुत्र नगर में न्याय और सप्रबंध की धूम मचा दी। उन्होंने चोर-डाकुओं को इस प्रकार वश में कर लिया था, जिस प्रकार बीन बजाकर सपेरा साँप को वश में कर लेता है। उन दिनों लोगबाग दरवाजे खुले छोड़ देते थे, फिर भी किसी की हानि नहीं होती थी। इस प्रकार शिशपाल का न्याय अंधा और बहरा था। जो न सूरत देखता था, न कोई सिफारिश सुनता था। वह तो केवल शिक्षाप्रद दंड ही देना जानता था।

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प्रश्न 2.
पाठ के आधार पर शिशुपाल के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
शिशुपाल के चरित्र में हमें निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं
1. आतिथ्य सत्कार की भावना-शिशुपाल अपने गाँव का घोर दरिद्र ब्राह्मण था। उसकी जीविका थोड़ी-सी भूमि पर चलती थी। फिर भी एक परदेशी को द्वार पर खड़ा देखकर उसका मुख खिल गया। वह मुस्कुर.कर कहता है कि यह मेरा सौभाग्य है। आइए, पधारिए अतिथि के चरणों से मेरा चौका पवित्र हो जाएगा। इस प्रकार उसमें अतिथि-सत्कार की भावना दिखाई देती है।

2. सच्चा न्यायप्रिय-शिशुपाल ब्राह्मण को शासन-पद्धति का पूरा-पूरा ज्ञान था। सम्राट अशोक ने उसे न्यायमंत्री बना दिया। शिशुपाल का न्याय अंधा और बहरा था जो न सूरत देखता था और न सिफारिश मानता था। वह तो केवल दंड देना जानता था। उसने प्रहरी की हत्या के अपराध में सम्राट अशोक को भी दंडित किया। वह एक सच्चा न्यायी था।

3. निर्भीक और साहसी-शिशुपाल पाटलिपुत्र का न्यायमंत्री था। वह सम्राट अशोक से भी भयभीत नहीं होता था। जब सम्राट अशोक प्रहरी की हत्या के अपराध में पकड़े जाते हैं तो शिशुपाल उनके हाथ में बड़े साहस के साथ हथकड़ी डलवा देता है और निर्भीकता से सम्राट को दंडित करता है।

4. कर्तब्ध-परायण-शिशुपाल ने एक बार कहा था कि अवसर मिले तो दिखा हूँ कि न्याय किसे कहते हैं। मुझसे कोई अपराधी दंड से नहीं बचेगा। मैं न्याय का डंका बजाकर बता दूंगा। और शिशुपाल ने ऐसा ही करके दिखा दिया। प्रहरी की हत्या का पता उसने तीन दिन में निकाल लिया ! उसके न्याय के आगे न राजा बड़ा है और न रंक। वह राजा अशोक को प्रहरी की हत्या के अपराध में बंदी बनाता है और उसे दंडित भी करता है।

प्रश्न 3.
आपकी दृष्टि में न्यायमंत्री कैसा होना चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
हमारी दृष्टि में न्यायमंत्री सच्चा और निष्पक्ष होना चाहिए। उसमें अपने कर्तव्य का बोध होना चाहिए और उसका पालन करने की दृढ़ता होनी चाहिए। उसका न्याय दोषी और अपराधी के प्रति कठोर और सीधा होना चाहिए। उसे दंड-विधान का ज्ञान होना चाहिए। उसका दंड शिक्षाप्रद और सुधारप्रद होना चाहिए।

प्रश्न 4.
अपराधी घोषित होने पर भी महाराज अशोक का हृदय क्यों प्रफुल्लित वा?
उत्तर
अपराधी घोषित होने पर भी महाराज अशोक का हदय प्रफुल्लित था। यह इसलिए कि उन्होंने अपने गुप्त वेश में शिशुपाल की जो दृढ़ता सुनी थी, उसने उसे कर दिखाया। इस प्रकार शिशुपाल के न्याय को सुनकर उन्होंने प्रफुल्लित हदय से यह विचार किया कि यह मनुष्य सोना है, जो अग्नि में पड़कर कुंदन हो गया। ऐसे मनुष्यों पर जातियाँ अभिमान करती हुई अपने तन-मन को निछावर करने के लिए तैयार हो जाती हैं।

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प्रश्न 5.
न्यायमंत्री की जगह यदि आप होते, तो किसी प्रकार का न्याय करते? लिखिए।
उत्तर
न्यायमंत्री की जगह यदि हम होते तो उचित-अनुचित का ध्यान रखकर न्याय करते। ‘राजा को ईश्वर माना गया है। ईश्वर ही दंड दे सकता है।’ इसे हम ध्यान में रखकर महाराज अशोक की मूर्ति को फाँसी पर लटकाए जाने का आदेश तो अवश्य देते, लेकिन उन्हें सम्मान देते, उन्हें सार्वजनिक रूप से चेतावनी नहीं देते।

प्रश्न 6.
आशय स्पष्ट कीजिए

(क) जिसका अंतःकरण कुढ़ रहा हो जिसके नेत्र आँसू बहा रहे हों, जिसका मस्तिष्क अपने आपे में नहीं, उसके होंठों पर हँसी ऐसी भयानक प्रतीत होती है, जैसे श्मशान में चाँदनी वरन् उससे भी अधिक।
(ख) उन्होंने चोर-डाकुओं को इस प्रकार वश में कर लिया था जिस प्रकार बीन बजाकर सपेरा सर्प को वश में कर लेता है।
उत्तर
उपर्युक्त कथन का आशय है कि शुष्क हृदय, शुष्क आँखों और अव्यवस्थित मन और मस्तिष्क में अचानक आशाओं को जगा देने से क्षणिक सुख का अनुभव अवश्य होता है। वह सुखद होकर भी भयानकता से बाहर नहीं दिखाई देता है। भाव यह है कि दुखमय जीवन में आने वाले सुखद क्षणों से पूरा जीवन हरा-भरा नहीं दिखाई देता है।

(ख) उपर्युक्त वाक्य का आशय यह है कि सुशासन और सुप्रबंध से अपराधियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। जनता में प्रशासन के प्रति विश्वास बढ़ जाता है। भय और आतंक के पादल छंटने लगते हैं। चारों ओर अमन-चैन का माहौल बनने लगता है।

न्यायमंत्री भाषा-अध्ययन

1. वाक्य शुद्ध कीजिए
(क) मेरे को आपकी परीक्षा करना है।
(ख) मैं तुमही को जानमा हूँ।
(ग) हम लोग आपस में परस्पर हमेशा विचार विमर्श करने हैं।
(घ) मैं सोती नींद से उठ बैठा।
(ङ) कृपया उनका कार्य करने की कृपा करें।

2. दिए हुए शब्दों में से तत्सम, तद्भव शब्दों को छाँटकर लिखिए
सर्प, चरण, आँखें, रक्त, कठिन, अश्रु, अंधा, मृत्यु, आग, कदाचित, बातचीत, सफल, नींद, ग्राम।

3. निम्नलिखित शब्दों को पढ़कर उनका सही उच्चारण कीजिए
दृढ़-संकल्प, निर्विवाद, हतोत्साह, निस्तब्धता, आत्मोत्सर्ग।
उत्तर
1. शुद्ध वाक्य
(क) मुझे आपकी परीक्षा करनी है।
(ख) मैं तुम्हें जानता हूँ।
(ग) हम लोग आपस में हमेशा विचार-विमर्श करते हैं।
(घ) मैं नींद से उठ बैठा।
(ङ) उनका कार्य करने की कृपा करें।

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2. तत्सम शब्द तद्भव शब्द
सर्प – आँखें
चरण – कठिन
रक्त – अंधा
अश्रु – आग
मृत्यु – बातचीत
कदाचित – नींद
ग्राम – सफल।

3. निम्नलिखित शब्दों को पढ़कर उनका सही उच्चारण छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से करें
दृढ़-संकल्प, निर्विवाद, हतोत्साह, निस्तब्धता, आत्मोत्सर्ग।

न्यायमंत्री योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
बदलते परिवेश में शिशुपाल का चरित्र कितना प्रासंगिक है? इस संबंध में अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों के बारे में जानकारी एकत्रित करें जिससे आप प्रभावित हैं।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

2. पाठ में आए शिशुपाल के संवार्दो को अभिनय के साथ कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

3. सम्राट अशोक से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं को एकत्र करें तश नाटिका या कहानी लिखें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

न्यायमंत्री परीक्षापयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशुपाल कौन था?
उत्तर
शिशुपाल बुद्ध गया नामक गाँव का सबसे अधिक निर्धन ब्राह्मण था। बाद में महाराज अशोक के दरबार में न्यायमंत्री बना।

प्रश्न 2.
अशोक कैसा था?
उत्तर
अशोक बहुत ही निष्ठुर और निर्दयी था। वह ब्राह्मणों और स्त्रियों को भी फाँसी पर चढ़ा दिया करता था।

प्रश्न 3.
अशोक ने शिशुपाल के न्याय की परीक्षा लेने के लिए क्या कहा?
उत्तर
अशोक ने शिशुपाल के न्याय की परीक्षा लेने के लिए कहा, “यह राजमुद्रा है, तुम कल प्रातःकाल से सूर्य की पहली किरण के साथ न्यायमंत्री समझे जाओगे। मैं देखूगा, तुम अपने-आपको किस प्रकार सफल शासक सिद्ध कर सकते हो?

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प्रश्न 4.
न्यायमंत्री निरुत्तर क्यों हो गए?
उत्तर
न्यायमंत्री ने जब अशोक को उसकी मुद्रा लौटाते हुए कहा कि वे यह अपनी वस्तु सँभाले। वह अपने गाँव वापिस जाएगा, तब अशोक ने कहा, “आपका साहस मैं कभी नहीं भूलूँगा। यह बोझ आप ही उठा सकते हैं। मुझे कोई दूसरा इस पद के योग्य दिखाई नहीं देता।” अशोक की इन बातों को सुनकर न्यायमंत्री निरुत्तर हो गए।

न्यायमंत्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने राज्य में क्या व्यवस्था की थी?
उत्तर
न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने राज्य में व्यवस्था के लिए पुलिस और पहरेदारों को संगठित किया। पहरेदारों के कारण पहले तो अपराध होते ही नहीं थे। यदि अपराध हो जाए तो अपराधी को कठोर सजा मिलती थी। कुछ दिनों में सारे राज्य में शिशुपाल के न्याय की पताका फहरा उठी थी।

प्रश्न 2.
न्यायमंत्री ने अपनी कार्यकुशलता का परिचय किस प्रकार दिया?
उत्तर
सम्राट अशोक के बुलाने पर शिशुपाल सामने आए। महाराज ने पूछा-“घातक का पता लगा?” न्यायमंत्री ने कहा, “हाँ, लग गया।” न्यायमंत्री ने थोड़ी देर कुछ सोचा फिर दृढ़ संकल्प के साथ कहा, “मेरी आज्ञा है, सम्राट अशोक को गिरफ्तार कर लो।” इस पर अशोक क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने ब्राह्मण से कहा-“ब्राह्मण! तुममें इतनी शक्ति है कि जो तुम मुझ तक बढ़ आए” किंतु शिशुपाल ने सम्राट अशोक की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। शिशुपाल ने फिर दोहराया, “मैं आज्ञा देता हूँ गिरफ्तार कर लो। यह घातक है। इसे मेरी अदालत में पेश करो।”

धनवीर ने अशोक को हथकड़ी लगा दी और शिशुपाल की अदालत में सम्राट अशोक को बंदी के रूप में पेश किया। शिशपाल ने धीरे से कहा, “सम्राट तुम पर एक पहरेदार की हत्या का अपराध है। तुम इसका क्या उत्तर देते हो?” सम्राट अशोक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। परंतु उन्होंने उसे उद्दण्डता के कारण मारा था। शिशुपाल ने कहा, “अशोक! तुमने एक राजकर्मचारी की हत्या की है। मैं तुम्हारे वध की आज्ञा देता हूँ।”

प्रश्न 3.
लोग शिशुपाल के किस न्याय पर मुग्ध हो गए?
उत्तर
जब न्यायमंत्री ने खड़े होकर कहा, “महाशय! यह सच है कि एक राजकर्मचारी की हत्या की गई है। उसका दंड अवश्यंभावी है। परंतु शास्त्रों में राजा को ईश्वर माना गया है। उसे ईश्वर ही दंड दे सकता है। यह काम न्यायमंत्री की शक्ति के बाहर है, अतएव मैं आज्ञा देता हूँ कि महाराज को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए और उनकी मूर्ति फाँसी पर लटकाई जाए जिससे लोगों को शिक्षा मिले।”न्यायमंत्री का जय-जयकार हुआ। लोग इस न्याय पर मुग्ध हो गए।

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प्रश्न 4.
शिशुपाल और महाराज अशोक में तुम किसे श्रेष्ठ समझते हो और क्यों?
उत्तर
शिशुपाल और महाराज अशोक में हम शिशुपाल को श्रेष्ठ समझते हैं। यह इसलिए कि उसमें निष्पक्ष न्याय करने की योग्यता थी। वह अपराधी सिद्ध होने पर सम्राट अशोक को भी फाँसी की सजा देने से नहीं हिचकता है। वह परम न्यायी है। उसे न्याय के सिवाय और कुछ नहीं दिखाई देता है जबकि सम्राट अशोक न्याय के नाम पर क्रोधित हो जाते हैं। लेकिन वह निडर होकर अपने न्याय पर ही डटा रहता है।

प्रश्न 5.
सुदर्शन-लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’ का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
न्यायमंत्री’ शीर्षक कहानी महान कथाकार सुदर्शन की एक श्रेष्ठ और चर्चित कहानी है। इस कहानी में यह बतलाने का प्रयास किया गया है कि सम्राट अशोक के शासनकाल में शिशुपाल एक निर्धन ब्राह्मण था। इसके साथ ही वह एक न्यायप्रिय, निर्भीक तथा लोकप्रिय व्यक्ति भी था। शिशुपाल के यहाँ अतिथि के रूप में रहकर सम्राट अशोक ने उसकी उस अद्भुत योग्यता को परखा। उससे प्रभावित होकर उसे न्यायमंत्री के पद पर नियुक्त किया। उसने न्यायमंत्री बनते ही राज्य में सुख-शांति का वातावरण फैला दिया। अपने न्याय के बल पर उसने एक परिवार की रक्षा करते पहरेदार की हत्या के आरोप में सम्राट अशोक को ही दोषी सिद्ध कर दिया। फिर उन्हें मृत्युदंड के रूप में सजा सुना दिया। उसकी न्यायप्रियता और राज्यभक्ति वर्तमान समय में भी अनुकरणीय है।

न्यायमंत्री लेखक-परिचय

प्रश्न
श्री तुदर्शन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश झलिए।
उत्तर
श्री सुदर्शन प्रेमचंदकालीन कहानीकारों में एक प्रमुख कहानीकार हैं।

जीवन-परिचय-श्री सुदर्शन जी का असली नाम पंडित बदरीनाथ था। आपका जन्म सन् 1896 ई. में स्यालकोट में हुआ था। आपने हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू जादि भाषाओं का सम्यक अध्ययन किया। आपकी प्रवृत्ति लेखन की ओर आरंभ से ही थी। प्रेमचंद की तरह आपने उर्दू के बाद हिंदी में कच्ची उम्र में ही लिखना शुरू किया था।

रचनाएँ-‘तीर्थ-यात्रा’, ‘पनघट’, ‘फूलवती’, ‘भाग्यचक्र’, ‘सिकंदर’ आदि आपकी लोकचर्चित रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त आपने नाटक और बाल-साहित्य भी रचा है।

भाषा-शैली-श्री सुदर्शन जी की भाषा-शैली सरस और प्रवाहमयी है, आपकी भाषा शैली संबंधित निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

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1. भाषा-श्री सुदर्शनजी की भाषा में उर्दू-फारसी और अरबी के प्रचलित शब्द स्थान-स्थान पर दिखाई देते हैं। उसमें जगह-जगह कहावतों और मुहावरों के भी प्रयोग हुए हैं। इससे आपकी भाषा सुबोध भाषा कही जा सकती है।

2. शैली-श्री सुदर्शन जी की शैली में बोधगम्यता नामक विशिष्ट गुण है। वह सर्वत्र रोचक और हदयस्पर्शी है। मार्मिकता उसकी प्रमुख पहचान है। स्थान-स्थान पर उद्धरणों और कथा-सूत्रों को प्रयुक्त करके विषय को स्पष्ट करने के प्रयास अधिक आकर्षक लगते हैं। महत्त्व-श्री सुदर्शनजी का स्थान मुंशी प्रेमचंद के बाद है ये उनके अनुवर्ती हैं, उर्दू से हिंदी में लिखने वाले आप मुंशी प्रेमचंद के बाद सर्वप्रमुख हैं। कथा-साहित्य में आपने प्रेमचंद के बाद अत्यधिक भूमिका निभाई है।

न्यायमंत्री कहानी का सारांश

प्रश्न
श्री सुदर्शन लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’ का तारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री सुदर्शन लिखित कहानी न्यायमंत्री एक शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक कहानी है। इस कहानी का सारांश इस प्रकार है आज से 2500 साल पहले बुद्ध गया नामक गाँव में एक बहुत गरीब शिशुपाल नामक ब्राह्मण रहता था। उसके यहाँ एक परदेशी रहा। उस परदेशी की शिशुपाल ने यथाशक्ति आदर-सत्कार किया। उससे वह परदेशी बहुत खुश था। उसने उसकी खूब प्रशंसा की। उससे उसने यह भी कहा-“मुझे ख्याल भी न था कि गोबर में फूल खिलाहुआ है। महाराज अशोक को पता लग जाए तो कोई बड़ी-सी ऊँची पदवी पर नियुक्त कर दें।”

शिशुपाल ने उस परदेशी की बातें सुनकर मुस्कुरा दिया। कुछ देर बाद उसने उस परदेशी से कहा, “आजकल के बढ़ रहे अन्याय को देखकर मेरा रक्त उबलने लगता है। अगर मुझे अवसर मिले तो कोई अन्याय नहीं होने दूंगा और कोई अपराधी दंड से नहीं बचेगा।” परदेशी ने हँसते हुए कहा, “यदि मैं अशोक होता तो आपकी इच्छा पूरी कर देता।” . दूसरे दिन महाराज अशोक ने जब शिशुपाल को दरबार में बुलाया तो लोगों ने अशोक की कठोरता-निर्दयता को याद कर यह समझ लिया कि अब शिशुपाल जीवित नहीं लौटेगा।

शिशुपाल अपने पुत्र-स्त्री को समझाकर पाटलीपुत्र पहुँचा तो उसके मन में तरह-तरह की आशका होने लगी। उसे यह भी आशंका हुई कि कहीं वह परदेशी ही हो, यह उसी की लगाई हुई हो। इस प्रकार की आशंकाओं से उसका कलेजा धड़कने लगा। उसी समय महाराज अशोक ने राजकीय ठाठ से कमरे में आकर उससे पूछा कि क्या उसने उसे पहचान लिया? उसने कहा कि उसे पता होता कि वही महाराज हैं, तो वह उतनी स्वतंत्रता से बात नहीं करता। महाराज ने उससे कहा कि उसने कहा था कि उसे अवसर दिया जाए तो वह न्याय का डंका बजा देगा। महाराज ने उससे आगे कहा कि इसके लिए अब उसे एक परीक्षा देनी होगी। कल प्रातः से वह न्यायमंत्री के रूप में कार्य करेगा। उसके अधीन पुलिस अधिकारी होंगे। उसका उत्तरदायित्व पाटलीपुत्र में शांति रखने का होगा। यह देखा जाएगा कि वह स्वयं को किस प्रकार सफल शासक सिद्ध करता है। एक माह बीतते ही न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने अपने कड़े शासन की चारों ओर धूम मचा दी। इससे नगर की दशा में आकाश-पाताल का अंतर पड़ गया।

एक रात को एक अमीर ने एक विशाल भवन के द्वार को खटखटाकर खुलवाना चाहा, लेकिन उसके अंदर से किसी स्त्री ने खोलने से मना कर दिया। उसने उस स्त्री को धमकाया तो उसने उससे कहा कि शिशुपाल का राज्य है। कोई किसी को तंग नहीं कर सकता। लेकिन उस अमीर ने उसकी एक न सुनी और तलवार निकालकर दरवाजे पर आक्रमण कर दिया। अचानक आकर एक पहरेदार ने उसका हाथ थामकर उसे फटकारा। पूछने पर उस पहरेदार ने उसे बताया कि उसे न्यायमंत्री ने नियुक्त किया है। उसने यह प्रण किया है कि उसके तन में जब तक प्राण और खून की अंतिम बूँद है, वह अपने कर्त्तव्य से पीछे नहीं हटेगा। इसलिए अगर इस समय महाराज अशोक भी आ जाएँ तो भी वह नहीं टलेगा। उस अमीर ने उसकी बातों को अनसुना कर उस पर तलवार लेकर झपटा। उसका सामना करते हुए वह पहरेदार मारा गया। उसकी लाश को एक ओर करके वह अमीर वहाँ से भाग निकला।

इस घटना को सुनकर सब हैरान थे कि शिशुपाल के शासन में ऐसी घटना! शिशु की नींद हराम हो गई। वे खाना-पीना सब भूलकर उस घातक का पता न लगा सके। महाराज उनसे बार-बार पूछते-“घातक पकड़ा गया…कब तक पकड़ा जाएगा।” न्यायमंत्री उन्हें तसल्ली देते-“जल्दी ही पकड़ लिया जाएगा।” एक दिन महाराज ने क्रोध में आकर यह चेतावनी दे दी, “तुम्हें तीन दिन की अवधि दी जाती है। यदि इस बीच घातक न पकड़ा गया तो तुम्हें फाँसी दे दी जाएगी।” इस समचार से पूरे नगर में

हलचल मच गई। तीसरे दिन आने पर शिशुपाल नगर के घने बाजार में घूम रहे थे। एक स्त्री ने उन्हें खिड़की से देख लिया। उसने उन्हें अंदर बलाकर उस बीती घटना के बारे में सब कुछ बता दिया। दूसरे दिन दरबार में आते ही महाराज अशोक के पछने पर शिशुपाल ने कहा कि घातक का पता लग गया है और वह घातक तुम हो। तुम पर पहरेदार की हत्या का अपराध है। तुम इसका क्या उत्तर देते हो? महाराज अशोक ने कहा कि वह उइंड था। इसलिए उन्होंने उसको मार डाला। न्यायमंत्री शिशुपाल ने उन्हें एक राजकर्मचारी का वध करने के अपराध में उनके वध की आज्ञा दी।

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उसे सुनकर लोगों ने शिशुपाल को गाली दी। लेकिन अशोक ने उन्हें शांत रहने का संकेत किया। अशोक ने उपेक्षापूर्वक कहा कि वे इस आज्ञा के विरुद्ध कछ नहीं बोल सकते। न्यायमंत्री के आदेश पर एक मनुष्य अशोक की सोने की मूर्ति लेकर उपस्थित हुआ। न्यायमंत्री ने खड़े होकर कहा, “महाशय! यह सच है कि राजकर्मचारी की हत्या की गई है। उसका दंड अवश्यंभावी है। परंतु शास्त्रों में राजा को ईश्वर माना गया है। ईश्वर ही दंड दे सकता है। यह काम न्यायमंत्री की शक्ति से बाहर है। अतएव मैं आज्ञा देता हूँ कि महाराज को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए और उनकी मूर्ति को फाँसी दे दी जाए, जिससे लोगों को शिक्षा मिले।” इसे सुनकर सभी ने न्यायमंत्री की जय-जयकार की।

रात को न्यायमंत्री ने राजमहल में जाकर अशोक को उसकी अंगठी और मद्रा देते हुए अपने गाँव वापिस जाने की बात कही। अशोक ने उसे सम्मानभरी आँखों से देखते हुए कहा कि अब यह संभव नहीं है। वह उसके साहस को नहीं भूल सकता है। दूसरा. इस पद के योग्य उसे कोई नहीं दिखाई देता।

न्यायमंत्री संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, अर्थ-ग्रहण संबंधी व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. महाराज ने सिर झुका दिया। इस समय उनके हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें मार रहा था। सोचते थे, यह मनुष्य स्वर्ण है, जो अग्नि में पड़कर कुंदन हो गया। कहता था मेरा न्याय अपनी पूम मचा देगा, यह वचन झूठा न था। इसने अपने कहने की लाज रख ली है। ऐसे ही मनुष्य होते हैं जिन पर जातियाँ अभिमान करती हैं और जिन पर अपना तन-मन निष्ठावर करने को उद्धृत हो जाती हैं।

शब्दार्थ-ब्रह्मानंद-ब्रह्म का आनंद । लाज-इज्जत। निछावर-बलिदान।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश महाकथाकार श्री सुदर्शन द्वारा लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’

प्रसंग-इस गद्यांश में कहानीकार ने इस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहा है कि जब शिशुपाल ने अपराधी का पता लगा लिया और यह पाया कि अपराधी स्वयं सम्राट अशोक ही हैं तो शिशुपाल ने अपराधी होने के कारण उन्हें फाँसी की सजा दे दी। इस पर सम्राट अशोक की क्या प्रतिक्रिया हुई।

व्याख्या-जब फाँसी की सजा को न्यायमंत्री शिशुपाल ने सुनाया तब सम्राट अशोक का सिर झुक गया। उस समय उनके हृदय में स्वर्ग के आनंद की लहर उठ रही थी। ऐसा इसलिए कि उन्हें अपने एक सच्चे और निर्भीक न्यायमंत्री का न्याय देखकर आनंद आ रहा था। वे मन-ही-मन सोच रहे थे कि शिशुपाल वास्तव में सच्चा स्वर्ण-मानव था जो कत्र्तव्यरूपी अग्नि में पड़कर शुद्ध हो गया था। वह कहा करता था कि उसके न्याय की धूम मचेगी यह बात निःसंदेह सच ही निकली। उसने जो कुछ कहा था उसको पूरा कर दिया। शिशुपाल जैसे मनुष्य जो सच्चे और साहसी होते हैं उन पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व करती हैं और ऐसे ही लोगों पर अपना तन-मन-धन न्यौछावर करने के लिए वे तत्पर भी हो उठती हैं।

विशेष-

  1. सत्य और निष्पक्ष न्याय के महत्त्व को प्रदर्शित किया गया है।
  2. भाषा सरल और स्पष्ट है।
  3. ‘धूम मचाना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।
  4.  शैली सुबोध है।
  5. संपूर्ण अंश प्रेरणादायक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) महाराज ने सिर क्यों झुका लिया?
(ii) महाराज के हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें क्यों मार रहा था? .
उत्तर
(i) महाराज ने सिर झुका लिया। यह इसलिए कि उन्हें न्यायमंत्री शिशुपाल ने अपराधी सिद्ध कर दिया था। उसे सिर झुकाकर स्वीकार कर लेना उन्होंने अपना कर्तव्य समझ लिया था।
(ii) महाराज के हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें मार रहा था। यह इसलिए कि उनसे शिशुपाल ने कहा था कि उसका न्याय धूम मचा देगा तो उसने आज सचमुच यह कर दिखाया है। इस प्रकार उसने उनको झूठे वचन न देकर उनके विश्वास को कायम रखा था।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) जातियाँ किन पर अभिमान कर अपना तन-मन निछावर करने को उद्यत हो जाती हैं?
(ii) उपर्युक्त गयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) जातियाँ कथनी-करनी में अंतर न रखने वालों पर अपना तन-मन निछावर करने को उद्यत हो जाती हैं।
(ii) उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव है-किसी को दिए गए वचन को झूठा न होने देना। किसी भी परिस्थिति में अपने कहने की लाज रखना।

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MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 2 Polynomials Ex 2.1

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 2 Polynomials Ex 2.1

Question 1.
Which of the following expressions are polynomials in one variable and which are not? State reasons for your answer.

  1. 4x2 – 3x + 7
  2. y2 + √2
  3. 3√t + t√2
  4. y + \(\frac{2}{y}\)
  5. x10 + y3 + t50.

Solution:
1. 4x2 – 3x + 7
This expression is a polynomial in one variable .r because in the expression there is only one variable (x) and all the indices of x are whole numbers.

2. y2 + √2
This expression is a polynomial in one variable y because in the expression there is only one variable (y) and all the indices of y are whole numbers.

3. 3√t + t√2
This expression is not a polynomial because in the term 3√t, the exponent of t is \(\frac{1}{2}\), which is not a whole number.

4. y + \(\frac{2}{y}\)
This expression is not a polynomial because in the term \(\frac{2}{y}\) the exponent of y is (-1) which is not a whole number.

5. x10 + y3 + t50
This expression is not a polynomial in one variable because in the expression, three variables (x, y and t) occur.

Question 2.
Write the coefficients of x2 in each of the following:

  1. 2 + x2 + x
  2. 2 – x2 + x3
  3. \(\frac{π}{2}\)x2 + x
  4. \(\sqrt{2x}\) – 1

Solution:
1. 2 + x2 + x
Coefficient of x2 = 1

2. 2 – x2 + x3
Coefficient of x2 = – 1

3. \(\frac{π}{2}\)x2 + x
Coefficient of x2 = \(\frac{π}{2}\)

4. \(\sqrt{2x}\) – 1
Coefficient of x2 = 0.

Question 3.
Give one example each of a binomial of degree 35, and of a monomial of degree 100.
Solution:
One example of a binomial of degree 35 is 3x35 – 4.
One example of a monomial of degree 100 is √2y100

Question 4.
Write the degree of each of the following polynomials:

  1. 5x3 + 4x2 + 7x
  2. 4 – y2
  3. 5x3 – √7
  4. 3

Solution:
1. 5x3 + 4x2 + 7x
Term with the highest power of x = 5x3
Exponent of x in this term = 3
∴ Degree of this polynomial = 3.

2. 4 – y2
Term with the highest power of y = – y2
Exponent of y in this term = 2
∴ Degree of this polynomial = 2.

3. 5t – √7
Term with the highest power of t = 5t
Exponent of t in this term = 1
∴ Degree of this polynomial = 1.

4. 3
It is a non-zero constant. So the degree of this polynomial is zero.

Question 5.
Classify the following as linear, quadratic and cubic polynomials:

  1. x2 + x
  2. x – x3
  3. y + y2 + 4
  4. 1 + x
  5. 3t
  6. r2
  7. 7x3

Solution:

  1. Quadratic
  2. Cubic
  3. Quadratic
  4. Linear
  5. Linear
  6. Quadratic
  7. Cubic.

Zero’s of a Polynomial:
1. A zero of a polynomial p(x) is a number c such that p(c) = 0. Here p(x) = 0 is a polynomial equation and c is the root of the polynomial equation.

2. A non-zero constant polynomial has no zero. Every real number is a zero of the zero polynomial.

Some Observations:

  1. A zero of a polynomial need not be 0.
  2. 0 may be a zero of a polynomial.
  3. Every linear polynomial has one and only one zero.
  4. A polynomial can have more than one zero.

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