MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण समास प्रकरण

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण समास प्रकरण

दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक शब्द बनाना समास कहलाता है। समस्तपद के पहले शब्द को पूर्वपद तथा बाद वाले शब्द को उत्तरपद कहते हैं।

समास शब्द सम् उपसर्ग के साथ अस् धातु से बना है। समास का अर्थ है-संक्षेप में कहना। समास छः प्रकार के होते हैं

1. तत्पुरुष समास

जिस समास में दो शब्दों के मध्य से विभक्तियों का लोप कर दिया जाता है तथा उत्तर पद प्रधान होता है वह तत्पुरुष समास होता है। विभक्तियों के अनुसार तत्पुरुष छः भेद होते हैं-
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2. द्विगु समास

जिस समास का पूर्वपद संख्यावाची हो वह समस्त द्विगु समास कहलाता है। यह समास समाहार (समूह) अर्थ में होता है।।

  • त्रयाणाम् पथाम् समाहारः = त्रिपथम्
  • पंचानां रात्रीणां समाहारः = पंचारात्रम
  • सप्त च ते ऋषयः = सप्तर्षयः
  • पञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी
  • नवानां रात्रीणां समाहारः = नवरात्रम्
  • त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रिलोकी
  • पचानाम् पात्राणां समाहारः = पञ्चपात्रम्
  • शतानाम् अब्दानां समाहारः = शताब्दी

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3. द्वन्द्व समास

जिस समास में दो या दो से अधिक शब्दों के मध्य ‘च’ (और) शब्द का लोप हो जाए वह समास द्वन्द्व समास कहलाता है।

जैसे-

  • त्रयाणाम् पथाम् समाहारः – त्रिपथम्
  • रामः च लक्ष्मणः च – रामलक्ष्मणौ
  • हेमन्तः च शिशिरः च वसन्तः च – हेमन्तशिशिरवसन्ताः
  • सीता च रामः च – सीतारामौ
  • उमा च शंकरः च – उमाशंकरौ
  • पत्रं च पुष्पां च फलं च – पत्र पुष्प फलानि
  • हरि च हरः च – हरिहरौ
  • धर्मः च अर्थः च – धर्मार्थों
  • गुरुः च शिष्यः च – गुरुशिष्यौ
  • माता च पिता च – मातापितरौ
  • धर्मः च अर्थः च कामः च मोक्षः च – धर्मार्थकाममोक्षाः
  • धनं च मानं च – धनमानौ
  • पार्वती च परमेश्वरः च – पार्वतीपरमेश्वरी

4. कर्मधारय समास

इस समास में प्रथमपद विशेषण होता है तथा द्वितीय पद विशेष्य होता है। अथवा प्रथम पद उपमान होता है तथा द्वितीय पद उपमेय होता है।

जैसे-

  • नीलम् चतत् उत्पलम् – नीलोपतलम्
  • नीलम् च तत् कमलम् – नीलकमलम्
  • कृष्णः च असौ सर्पः – कृष्णसर्पः
  • महान् च असौ पुरुषः – महापुरुषः
  • महान् च असौ आत्मा – महात्मा
  • महान् च असौ जनः – महाजनक
  • उत्तमः च असौ जनः – उत्तमजनः
  • राजा च असौ ऋषिः – राजर्षिः
  • घन इव श्यामः – घनश्यामः
  • चरणं कमलम् इव – चरणकमलम्
  • चनद्र इव मुखम् – चन्द्रमुखम्
  • नरः सिंहः इव – नृसिंहः
  • नरः शार्दूलः इव – नरशार्दूलः

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5. बहुव्रीहि समास

बहुव्रीहि समास उन दो या दो से अधिक शब्दों का होता है जो मिलकर किसी अन्य पद का विशेषण बन जाते हैं।

जैसे-

  • पीतम् अम्बरम् यस्य सः – पीताम्बरः
  • सागरः मेखला यस्याः सा – सागरमेखला
  • त्यक्तं सर्वस्यं येन सः – त्यक्तसर्वस्यः
  • चक्रं पाणौ यस्य सः – चक्रपाणिः
  • दश आननानि यस्य सः – दशाननः
  • चन्द्रः शेखरेयस्य सः – चन्द्रशेखरः
  • जितानि इन्द्रियाणि येन सः – जितेन्द्रियः
  • कण्ठे कालः यस्य सः – कण्ठकालः
  • चत्वारि मुखानि यस्य सः – चतुर्मुखः
  • श्वेतं वस्त्रं यस्य सः – श्वेतवस्त्रः
  • त्रीणि नयनानि यस्य सः – त्रिनयनः
  • चत्वारि आननानि यस्य सः – चतुराननः
  • सपरिवार – परिवारेण सहितः यः सः
  • चन्द्रः मौलौ यस्य सः = चन्द्रमौलिः
  • प्राप्तम् उदकं यं सः = प्राप्तोदकः
  • दत्तं भोजनं यस्मै सः – दत्त भोजनः

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6. नञ् तत्पुरुष समास

नञ् अर्थात् न (जिसका अर्थ है नहीं) का पदों के साथ समास होता है। इस समास को नत्र तत्पुरुष कहते हैं। यदि न के आगे स्वरादि शब्द हो तो न के स्थान पर अनु हो जाता है।

  • न ब्राह्मणः, अब्राह्मणः
  • न सत्, असत्।
  • न चतुरः, अचुतरः।
  • न उचितम्, अनुचितम्।
  • न अर्थः, अनर्थः।
  • न एक्यम्, अनैक्यमम्।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

शब्द पर्यायवाची शब्दः
आकाशःनभः, गगनम्, व्योयम्, अन्तरिक्षम, अम्बरम्, खम्।
राजाभूपतिः, नृपः, अधिपतिः, नरेशः, नृपतिः।
वायुःअनिलः, समीरः, वातः, पवनः, मारुतः, गन्धवहः।
सूर्यःरविः, दिनकरः, भानुः, दिवाकरः, दिनेशः।
कमलम्पंकजम्, नीरजम्, अम्बुजम्, सरोजम्, सरोरुहम्।
गंगाभागीरथी, मन्दाकिनी, देवनदी, सुरनदी।
पर्वतःगिरीः, अचलः, भूधरः, शैलः, महीध्र, नगः।
अग्निःपावकः, वह्नि, अनलः, हुताशनः।
अमृतम्पीयूषम्, सुधा, सोमः
पृथ्वीभूमिः, अवनिः, मही, धरा, वसुन्धरा, वसुधा, भू।
जलम्वारि, नीरम्, सलिलम्, अम्बु, तोयम्।
समुद्रःवारिधिः, जलधिः, सागरः, नदीशः, सिन्धुः।
पक्षीखगः, विहगः, द्विजः, विहंगम्, पतलिः।
नदीनिम्नगा, गिरितनया, सरित्, निर्झरिणी।
नेत्रम्अक्षि, चक्षुः, दृक, लोचनम्, नयनम्।
चन्द्रमाचन्द्रः, इन्दुः, निशाकरः, विधुः, सुधाकरः, मयंकः।
दुग्धम्पयः, द्रुमः, विटपः, महीरुहः।।
गजःमातंगा, करि, वारणः, हस्ती, द्विपः, नागः, कुञ्जरः।
रात्रिःरजनी, निशा, यामिनी, विभावरी।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण विलोमशब्दपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण विलोमशब्दपरिचयः

शब्दः विलोमशब्दः
तिमिरःप्रकाशः
उत्कर्षःअपकर्षः
अमृतम्विषम्
गुणःदोषः
मित्रम्शत्रुः
जयःपराजयः
उत्थानम्पतनम्
सुखम्दुःखम्
पृथ्वीआकाशः
स्वर्गःनरकः
उपकारःअपकारः
उदयःअस्तः
देवःदानवः
उन्नतिःअवनतिः
सुन्दरःकुरूपः
कटुःमधुरम्
लाभःहानिः
एकःअनेकः
सरलःकठिनः
संयोगःवियोगः
धनीनिर्धनः
जन्ममृत्युः
स्तुतिःनिन्दा
क्रयःविक्रयः
आस्तिकःनास्तिकः
प्रत्यक्षःपरोक्ष/अप्रत्यक्षः
पण्डितःमूर्खः
सबलःनिर्बलः
स्वतन्त्रःपरतन्त्रः
मानःअपमानः
प्रातःसायम्
पक्षःविपक्षः
दिवसःरात्रिः
लाभःहानिः
प्रकाशःअन्धकारः
जड़ःचेतनः
प्रश्नःउत्तरम्
अल्पायुःदीर्घायुः

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अव्ययपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अव्ययपरिचयः

सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तुिष।
वचनेषु च सर्वेषु यन्नव्येति तदव्ययम्॥

अर्थात् जिन शब्दों में लिंग, कारक और वचन के कारण किसी प्रकार का विकार (परिवर्तन) नहीं होता और जो प्रत्येक दशा में एक समान रहते हैं, उन्हें अव्यय शब्द कहते हैं।

अव्ययों के भेद
अव्ययों के पाँच भेद हैं-

I. उपसर्गः
II. क्रियाविशेषणम्
III. चादिः
IV. समुच्चयबोधकः
V. विस्मयादिबोधकः

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I. उपसर्गः

धातु अथवा धातु से बने अन्य शब्दों (संज्ञा, विशेलण) आदि के पूर्व लगने वाले निम्नलिखित 22 शब्दांशों को उपसर्ग कहते हैं-
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II. क्रियाविशेषणम्

जिन शब्दों से क्रिया के काल, स्थान आदि विशेषताओं का बोध होता है, उन्हें क्रिया-विशेषण कहते हैं। ये अव्यय हैं, इनके रूप नहीं बनते हैं।
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III. चादिः

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IV. समुच्चयबोधकाः

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V. विस्मयादिबोधकाः

अव्ययम् – अर्थः
अहह – शोक या खेद अर्थ में प्रयुक्त
अहो – आश्यर्चसूचक
बत – शोक या खेद अर्थ में प्रयुक्त
हा – कष्टसूचक

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण संधि प्रकरण

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण संधि प्रकरण

दो वर्गों के मिलने पर जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं। जैसे-हिम+आलय-हिमालयः।

संधि तीन प्रकार की होती है-
1. स्वर संधि
2. व्यंजन संधि
3. विसर्ग संधि

1. स्वर संधि-दो स्वरों के मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। स्वर संधि के छः भेद होते हैं-
(i) दीर्घ,
(ii) गुण,
(iii) वृद्धि,
(iv) यण,
(v) अयादि,
(vi) पूर्वरूप,
(vi) प्रकृति भाव।”

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(i) दीर्घ संधि-अ, आ के बाद अ, आ आने पर आ इ, ई के बाद इ, ई आने पर ई, उ, ऊ के बाद उ, ऊ आने पर ऊ तथा ऋ, ऋ के बाद ऋ आने पर ऋ हो जाता है, उसे दीर्घ संधि कहते हैं।

जैसे-
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(ii) गुण संधि (आदगुणः)-अ, आ के बाद इ, ई आने पर ‘ए’ बन जाता है। इसी प्रकार अ, आ के आगे उ, ऊ हो तो ‘ओ’ और ऋ आ जाने पर ‘अर’ बन जाता है।

जैसे-
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(iii) वृद्धि संधि (वृरिचि)-अ, आ के आगे ए, ऐ आने से ‘ऐ’ हो जाता है और अ, आ के आगे ओ या औ आने से ‘औ’ हो जाता है। ऐ और औ स्वरों के वृद्धि रूप हैं।

जैसे-
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(iv) यण संधि (इकोयणचि)-इ, ई, उ, ऊ ऋ से आगे उनसे भिन्न स्वर आने पर इ को यु, ड को व् और ऋ को र होता है-
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(v) आयादि संधि (एचोऽयवायावः)-ए, ऐ, ओ, औ से आगे यदि कोई भिन्न स्वर आ जाए तो पहले वर्णों को क्रमशः अय्, आय, अव् और आव् हो जाते हैं।

जैसे-
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(vi) पूर्णरूप संधि-पदान्त ए तथा ओ के पश्चात् अ आने पर अ का लोप हो जाता है तथा उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) लगा दिया जाता है।

  • हरे + अत्र = हरेऽत्र
  • विष्णो + अत्र = विष्णोऽत्र
  • सखे + अर्पय = सखेऽर्पय
  • सर्वे + अपि = सर्वेऽपि।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण वर्ण परिचय

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण वर्ण परिचय

वर्ण-भाषा की वह छोटी-से-छोटी इकाई जिसके और अधिक टुकड़े न किए जा सकें ‘वर्ण’ कहलाती है। वर्ण को अक्षर भी कहते हैं।

वर्ण के भेद-वर्णों के दो भेद हैं :
(अ) स्वर,
(ब) व्यंजन।

(अ) स्वर-जिस वर्गों का उच्चारण किसी अन्य वर्ण की सहायता के बिना स्वतन्त्र रूप से हो सकें वे वर्ण स्वर कहलाते हैं।

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संस्कृत भाषा में तेरह स्वर हैं-

अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ऋ, लु।

स्वरों के भेद-स्वर तीन प्रकार के होते हैं-

  1. ह्रस्व स्वर,
  2. दीर्घ स्वर,
  3. प्लुत स्वर,
  4. संयुक्त स्वर।

1. ह्रस्व स्वर-जिन स्वरों का उच्चारण करने में कम-से-कम समय लगे वे ह्रस्व स्वर कहलाते हैं ये पांच हैं-अ, इ, उ, ऋ, तृ।
2. दीर्घ स्वर-जिन स्वरों का उच्चारण करने में में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगे, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। ये स्वर आठ हैं-आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ।
3. प्लुत स्वर-जिन स्वरों क उच्चारण करने से ह्रस्व स्वरों से तिगुना समय लगे, उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। किसी व्यक्ति को दूर से पुकारने में प्लुत स्वरों का प्रयोग होता है। प्लुत स्वर के आगे ३ का चिह्न लगा दिया जाता है। जैसे ओ३म, बाइल।
4. संयुक्त स्वर-ए, ऐ, ओ, औ ये चार वर्ण संयुक्त स्वर कहलाते हैं।
5. व्यंजन-जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से ही होता है वे वर्ण व्यंजन कहलाते हैं। व्यंजन वर्ण तेंतीस (33) हैं।

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व्यंजनों के भेद-व्यंजनों के तीन भेद हैं-

  1. स्पर्श,
  2. अन्तःस्थ,
  3. ऊष्म।

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1. स्पर्श-स्पर्श वर्ण पच्चीस हैं-

क् ख् ग् घ्
ङ् च् छ् ज्
झ् ज् ट् ठ्
ड् ढ् ण् त्
थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्

इन्हें स्पर्श वर्ण कहा जाता है क्योंकि इनके उच्चारण के समय जिह्वा । कण्ठ्, तालु, मूर्धा, दन्त आदि स्थानों का विशेषतः स्पर्श करती है।
2. अन्तःस्थ-य् र् ल् व् ये चार वर्ण अन्तःस्थ वर्ण कहलाते हैं। इनकी स्थिति स्वरों तथा व्यंजनों के मध्य होती है अतः इन्हें अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं।
3. ऊष्म-श् श् स् ह् ये चार वर्ण ऊष्म कहलाते हैं इनके उच्चारण करते समय श्वास वायु घर्षण करती हुई बाहर निकलती है जिससे ऊष्मा उत्पन्न होती है अतः ये वर्ण ऊष्म कहलाते हैं।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 18 पुरुषोत्तमः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 18 पुरुषोत्तमः (पद्यम्)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 18 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) नियतात्माः महावीर्यः कः? (मन को वश में रखने वाला कौन है?)
उत्तर:
प्रभवो रामः। (प्रभु राम)

(ख) रामः किमर्थं वनं गतः? (राम किसलिए वन को गए?)
उत्तर:
पितुर्वचननिर्देशात्। (पिता के वचनों का पालन करने के लिए।)

(ग) सुग्रीववचनात् रामः कं हतवान्? (सुग्रीव के वचन से राम ने किसका वध किया?)
उत्तर:
बालिन। (बालि का)

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(घ) महाकपिः कां दग्धवान्? (हनुमान ने किसे जलाया?)
उत्तर:
लङ्कां। (लंका को)

(ङ) सीता दृष्टा इति कः रामं न्यवेदयत? (सीता को देखकर किसने राम को सम्पूर्ण कथा सुनायी?)
उत्तर:
महाकपि हनुमानः (महावीर हनुमान ने)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) सीता लक्ष्मणश्च केन सह वनम् अगच्छताम्? (सीता और लक्ष्मण के साथ कौन वन को गए?)
उत्तर:
सीता लक्ष्मणश्च रामेण सह वनम् अगच्छताम्। (सीता और लक्ष्मण के साथ राम वन को गए।)

(ख) रामः कस्मिन् वंशे उत्पन्नः अभूत? (राम किस वंश में उत्पन्न हुए?)
उत्तर:
राम इक्ष्वाकुवंशे उत्पन्नः अभूत्। (राम इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न हुए।)

(ग) केन दशरथस्य मरणमभवत्? (किसके कारण दशरथ की मृत्यु हुई?)
उत्तर:
पुत्र शोकात् दशरथस्य मरणमभवत्।। (पुत्र शोक के कारण दशरथ की मृत्यु हुई।)

(घ) मायावी रावणः सीतां कथं जहार? (मायावी रावण ने सीता का कैसे हरण किया?)
उत्तर:
मायावी रावणः सीतां नृपात्मजौ दूरम् अपवाह्य रामस्य भार्यां जहार। (मायावी रावण ने सीता को राजकुमारों (राम-लक्ष्मण) को दूर भेजकर)

(ङ) श्रीराम बालिनः राज्ये कं प्रत्यपादयत्? (श्रीराम ने बालि का राज्य किसको प्रदान किया?)
उत्तर:
श्रीराम बालिनः राज्ये सुग्रीवमेव प्रत्यपादयत्। (श्रीराम ने बालि का राज्य सुग्रीव को प्रदान किया।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) रामस्य विशिष्टगुणाः के? (राम के विशिष्ट गुण कौन-कौन से हैं?)
उत्तर:
रामस्य विशिष्टगुणाः महावीर्यं द्युतिमान् धृतिमान् श्च आसीत्। (राम के विशिष्ट गुण महान बलशाली, वीर और कांति युक्त थे।)

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(ख) रामस्य वनगमनसमये के दूरम् अनुगतः? (राम के वनगमन के समय कौन दूर तक अनुगमन किया?)
उत्तर:
रामस्य वनगपन समये पित्रा दशरथेन पौरेः च दूरम् अनुगतः। (राम के वनगमन के समय पिता दशरथ और ग्रामवासी दूर तक अनुगमन किए।)

(ग) वने रामः शूर्पणखावाक्यादुधुक्तान् कान्-निजधान? (वन में राम शूर्पणखा द्वारा उत्तेजित किए गए किन-किन राक्षसों को मारा?)
उत्तर:
वने रामः शूर्पणखावाक्यादुधुक्तान् सर्वराक्षसान् खरं, त्रिशिरसं, दूषणं च निजधान। (वन में राम ने शूर्पणखा द्वारा उत्तेजित किए गए राक्षसों खर, त्रिशला, और दूषण आदि को मारा।)

(घ) हनुमान कं प्रियम् आख्यातुम आयात्! (हनुमान किसको प्रिय कथा सुनाने आये?)
उत्तर:
हनुमान रामं प्रियम् आख्यातुम् आधात्। (हनुमान राम को प्रिय कथा सुनाने आये।)

(ङ) रावणस्य वधानन्तरं रामः किं कृतवान्? (रावण का वध करके राम ने क्या किया?)
उत्तर:
रावणस्य वधानन्तरं रामं नदीग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितः सीताम् अनुप्राप्य राजं पुनः आप्तवान्। (रावण के वध के अनन्तर राम नंदी ग्राम में जटाओं को कटवाकर भाइयों सहित सीता के साथ राज्यभार पुनः प्राप्त किया।)

प्रश्न 4.
युग्ममेलनं कुरुत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 18 पुरुषोत्तम img-1

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं ‘न’ इति लिखत-
यथा-
श्रीरामः धैर्येण हिमवान इवं अस्ति।। – आम्
आम् सुग्रीवेण सह रामः मित्रतां न कृतवान् – न
(क) कैकेय्याः प्रियकारणात् रामः वनं गतः।
(ख) सुमित्रानन्दवर्धनः लक्ष्मणः वनं न गतः।
(ग) रामः चतुर्दशसह राक्षसान् हतवान्।
(घ) सुग्रीवः बालिनं हतवान्।
(ङ) रामः रावणं न हतवान।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) आम्
(घ) न
(ङ) न

प्रश्न 6.
उचितैः शब्दैः रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) रामः समुद्रइव गाम्भीर्ये अस्ति।
(ख) वनं गत्वा रामः राक्षसान् निजधान।
(ग) सुग्रीवेण पम्पातीरे सह रामस्य मित्रता सम्पन्नता।
(छ) लङ्का गत्वा रामः रावणं हतवान्।
(ङ) रामः नन्दिग्रामे जटां त्यक्तवान्।

प्रश्न 7.
अधोलिखितवाक्यानि भूतकाले परिवर्तयत
(क) राक्षसान् मारणाय रामः वनं गच्छति।
उत्तर:
राक्षसान मारणाय रामः वनं आगच्छत्।।

(ख) समेण सह सीता लक्ष्मणश्च वनं गच्छतः।
उत्तर:
रामेण सह सीता लक्ष्मणश्च वनं गतवन्तौ।

(ग) रामः सुग्रीवेण सह मैत्री करोति।”
उत्तर:
रामः सुग्रीवेण सह मैत्री अकरोत्।

(ध) वाल्मीकिः रामचरित लिखति।
उत्तर:
वाल्मीकिः रामचरितं अलिखत्।

(ङ) श्रीरामः विभीषणाय लङ्काराज्यं ददाति।
उत्तर:
श्रीरामः विभीषणाय लङ्काराज्यं अद्दात्/दत्ता।

प्रश्न 8.
उदाहरणानुसारं शब्दानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनं च लिखत-
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प्रश्न 9.
अधोलिखित शब्दानां समानार्थशब्दान् लिखत
उदाहरणं यथा- सुतः – पुत्रः
रामः – सीतापतिः।
हनमुान् – अंजनि पुत्रः।
शशी – मयङ्क
राजा – नृपः
समुद्रः – रत्नाकरः
वनम् – अरण्यम्।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित अव्ययानि प्रयुज्य वाक्यनिमाणं कुरुत-
इव – रामस्य गम्भीरता समुद्रः इव अस्ति।
च – कौशल्यानन्द स्य गंभीरता समुद्रः इव च धैर्येण हिमवान् इव आसीत्।
तत: – ततः रामः परिवार सहितेन वनं जगाम।
अपि – अहं अपि नगरं गमिष्यामि।
एव – गीता एव मधुरं गीतं गायति।

प्रश्न 11.
निम्नलिखितेषु प्रत्ययं च पृथक् कुरुत-
दृष्ट्वा – दृशृ + क्त्वा
कृत्वा – कृ + क्त्वा
श्रुत्वा – श्रु + क्त्वा
हत्वा – हनू + क्त्वा
दग्ध्वा – दग्ध् + क्त्वा।

पुरुषोत्तमः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

वाल्मीकि (चित रामायण विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य है। उसमें से उद्धृत कुछ गीत काव्य के महानायक राम के चरित्र को व्यक्त करते हैं।

पुरुषोत्तमः पाठ का हिन्दी अर्थ

1. इक्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी॥

शब्दार्थः :
इक्ष्वाकुवंश प्रभवो-इक्ष्वाकु-family; श्रुतः-सुना गया-listen; नियतात्मा-मन को वश में रखने वाले -controller of mind /who under the mind; द्युतिमान-कान्तिमान्-fame full.

हिन्दी अर्थः :
इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, अपने मन को वश में रखने वाले महावीर, कान्तिमान, धैर्यवान, इन्द्रियजयी राम का नाम सभी लोगों न सुना है।

2. स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः
समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥

शब्दार्थः :
कौसल्यानन्दवर्धनः-कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाला-who incresing of Kaushalya’s enjoyment; इव-के समान-like you.

हिन्दी अर्थः :
वे कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले सर्वगुण संपन्न, समुद्र के समान गम्भीर, हिमालय के समान धैर्यवान हैं।

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3. स जैगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन्।
पितुर्वचननिर्देशात् कैकेय्याः प्रियकारणात् ॥

शब्दार्थः :
पितुर्वचननिर्देशात्-पिता के वचनों के निर्देश से-orders of father’s sentence. कैकेयाप्रियकारणात्-कैकेयी को प्रिय लगने के कारण-reason of loving Kaikeyi.

हिन्दी अर्थ :
वे कैकेयी के अभीष्ट सिद्धि एवं पिता की प्रतिज्ञा के पालनार्थ उनकी आज्ञा से वन गए।

4. तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणेऽनुजगाम ह।
स्नेहाद् विनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः॥

शब्दार्थ :
भ्राता-भाई-Brother; विनयसम्पन्नः-विनय से युक्त-Full of respect; सुमित्रानन्दवर्धनः-सुमित्रा के आनन्द को बढ़ाने वाला-for Sumitra and Anand; अनुजगाम-अनुसरण किया-followed.

हिन्दी अर्थ :
उनको जाते देख उनके प्रिय भाई स्नेह व विनय से संपन्न, सुमित्रा के आनन्द को बढ़ाने वाले लक्ष्मण ने भी उनका अनुसरण किया।

5. सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा।
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च॥

शब्दार्थः :
पौरैः-ग्रामवासी-villagers; अनुगतः-अनुकरण-follower; शशिं-चन्द्रमा-Moon.

हिन्दी अर्थ :
वन जाते समय पिता दशरथ एवं नगरवासियों द्वारा उनका बहुत दूर तक अनुगमन किया। सीता भी चन्द्रमा-रोहिणी के समान उनका अनुगमन किया अर्थात् उनके साथ वन को गईं।

6. चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तदा।
राजा दशरथः स्वर्गे जगाम विलपन् सुतम्॥

शब्दार्थः :
गते-गए हुए-went; जगाम्-गया-went. विलाप-रोना-weep.

हिन्दी अर्थ :
राम के चित्रकूट चले जाने पर पुत्र शोक से विह्वल महाराज दशरथ विलाप करते हुए स्वर्गारोहण किया।

7. ततः शूर्पणखावाक्यादुधुक्तान् सर्वराक्षसान्।
खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम्
निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान्॥

शब्दार्थः :
ततः-तब-then; चैव-और भी-and also; विजधान्-विजय को-to receive Victory.

हिन्दी अर्थः :
इसके बाद (रावण की बहन) शूर्पणखा द्वारा उत्तेजित किए जाने वाले सभी राक्षस गण-खर, दूषण, त्रिसिरा और उनके सहयोगी सभी राम द्वारा युद्ध में मारे गए।

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8. वने तस्मिन् निवसता जनस्थाननिवासिनाम्।
रक्षसां निहतान्यासन् सहस्त्राणि चतुर्दश।
ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्छितः॥

शब्दार्थः :
तस्मिन्-उस-His; जनस्थानं-लोक स्थान-public place; सहस्राणि-हजारों-thousands; ततो-तब-then; श्रुत्वा-सुनकर-to listen.

हिन्दी अर्थः :
वन में रहते हुए जनस्थान के निवासियों की रक्षार्थ चौदह हजार राक्षस राम के द्वारा मारे गए। यह जानकर कि (जनस्थान में खर-दूषण आदि सारे राक्षस मारे गए) रावण क्रोधान्ध हो गया।

9. तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ।
जहार भार्यां रामस्य गृधं हत्वा जटायुषम्॥

शब्दार्थः :
तेन-उससे-his,him;जहार-अपहरण-kiddnap; गृधं-गिद्ध (जटायु)-A big bird; हत्वा-मारकर-after kill.

हिन्दी अर्थः :
तब रावण ने (अपने मामा) मायावी मारीच राजपुत्रों (राम-लक्ष्मण) को दूर ले जाकर राम की भार्या सीता का अपहरण कर लिया और जटायु नामक गिद्ध को मार दिया।

10. पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह।
हनुमद्वैचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः॥

शब्दार्थः :
पम्पा तीरे-पम्पा नामक सरोवर के किनारे-Near by the Pumpa; सङ्गतो-मित्रता–friendship; वानरेण-वानर के द्वारा-By monkey; सुग्रीवेण-सुग्रीव के ART-By Sugreev.

हिन्दी अर्थ :
उसके बाद पम्पासर के तट पर हनुमान नामक वानर के साथ मित्रता हुई। हनुमान के कहने पर सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई।

11. ततः सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे।
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत्॥

शब्दार्थः :
ततः-तब-then; सुग्रीववचनात्-सुग्रीव के वचन से;प्रत्ययादयत्-बैठा दिया-to sat.

हिन्दी अर्थ :
फिर सुग्रीव के कहने पर (राम ने) बाली का वध कर सुग्रीव को उस राज्य (किष्किंधा) का राजा नियुक्त किया।

12. ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम्।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायात्महाकपिः॥

शब्दार्थः :
दग्ध्वा-जलाकर-to burn; मैथिलीम-सीता को-to Sita; प्रियमाख्यातुं-शुभ समाचार-Good news.

हिन्दी अर्थ :
उसके बाद हनुमान ने समुद्र को लांघकर, लंकापुरी को भस्मसात कर मैथिली सीता का समाचार राम को सुनाया।

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13. सोभिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम्।
न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः॥

शब्दार्थ :
सोभिगम्य-बहुत अधिक-Highly; महात्मानं-महात्मा को-to saint; कृत्वा-करके-doing.

हिन्दी अर्थ :
अपरिमित, अतुलित बलशाली हनुमान ने आकर भगवान राम की प्रदक्षिणा करके माँ सीता का समाचार उन्हें सुनाया और कहा–हमने माँ सीता को देखा है।

14. तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे।
रातः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत्।।

शब्दार्थः :
तेन-उससे-his, her; गत्वा-जाकर-going; परां-बहुत अधिक-very much.

हिन्दी अर्थ :
तब राम ने समुद्र में सेतु का निर्माण कर लंका पुरी में जाकर रावण को युद्ध में मार कर सीता को प्राप्त कर लज्जित हुए।

15. नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः।
रामः सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान्॥

शब्दार्थः :
नन्दिग्रामे-नंदिग्राम में-In Nandigram; भ्रातृभिः-भाईयों के साथ-with brothers; पुनःप्राप्तवान्-पुनः प्राप्त किया-re-received.

हिन्दी अर्थः :
पुनः पाप रहित राम ने नन्दिग्राम में आकर अपनी बढ़ी हुई जटाओं को कटवा कर अपने साथ सीता को प्राप्त कर पुनः राज्याभिषिक्त हुए।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणिः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणिः (संवादः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 17 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) आरुणेः गुरोः नाम किम्? (आरुणि के गुरु का क्या नाम था?)
उत्तर:
धौम्य आयोदः ।(धौम्य आयोद)।

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(ख) गुरुपूर्णिमायां किम् भवति? (गुरु पूर्णिमा को क्या होता है?)
उत्तर:
गुरुजनानां पूजनं सम्मानञ्च। (गुरुजनों का पूजन एवं सम्मान होता है।)

(ग) धौम्यः आरुणिं कुत्र प्रेषयति? (धौम्य ने आरुणि को कहाँ भेजा?)
उत्तर:
केदारखण्ड बधान इति। (खेत की क्यारी को बाँधने।)

(घ) आरुणिः केदारखण्डे किमकरोत? (आरुणि ने खेत के खण्ड में क्या किया?)
उत्तर:
तत्केदारखण्डे संविवेश। (तब वह खेत की क्यारी में लेट गया।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) गुरुः आरुणिं पाञ्चाल्यं किमर्थम् प्रेषयति स्म? (गुरु ने आरुणि को पाञ्चाल किसलिए भेजा?)
उत्तर:
गुरुः आरुणिं पाञ्चाल्यं केदारखण्डे बधान इति प्रेषयति स्म। (गुरु ने आरुणि को पाञ्चाल खेत की क्यारी को बाँधने के लिए भेजा।)

(ख) गुरोः आदेशेन आरुणिः किमकरोत? (गुरु के आदेश से आरुणि ने क्या किया?)
उत्तर:
गुरोः आदेशेन आरुणिः तत्केदारखण्डे संविवेश। (गुरु के आदेश से आरुणि खेत की क्यारी में लेट गया।)

(ग) आरुणिः गुरोः शब्दं श्रुत्वा किं कृतवान्? (आरुणि गुरु के शब्दों को सुनकर क्या किया?)
उत्तर:
आरुणिः गुरोः शब्द श्रुत्वा केदारखण्डात् सहसेत्थाय ऋषि समीपं प्रत्यागच्छत् कृतवान्। (आरुणि गुरु के शब्द को सुनकर खेत की क्यारी को छोड़कर पास में आकर नमस्कार किया।)

(घ) धौम्यः शिष्याय कमाशीर्वादम् अददात्? (आचार्य धौम्य ने शिष्य को क्या आशीर्वाद दिया?)
उत्तर:
धौम्यः शिष्याय ते सर्वे वेदाः प्रतिभाष्यन्ति सर्वाणि च शास्त्राणीति आशीर्वादम् अददात्। (धौम्य ने शिष्य को सभी वेद तथा शास्त्रों के ज्ञाता होने का आशीर्वाद दिया।)

प्रश्न 3.
उचितशब्देन रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) तस्य शिष्यः आरुणिः आसीत्।
(ख) उपाध्यायः धौम्यः शिष्यान् अपृच्छत्।
(ग) भवान् उद्दालक इति नाम्ना भविष्यति।
(घ) अहमभिवादये भवन्तम्।
(ङ) ते सर्वे वेदाः प्रतियास्यन्ति।

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प्रश्न 4.
शुद्धकथनानां समक्षम् “आम्” अशुद्धकथनानां समक्षं “न” इति लिखत
(क) आरुणिः महान् पितृभक्तः आसीत्।
(ख) धौम्यः आरुणिम् आह्वनाय शब्दं चकार।
(ग) आरुणिः गुरोः आज्ञया केदारखण्डम् प्रति गतवान्।
(घ) आरुणिः उद्दालक नाम्ना प्रसिद्धः।
उत्तर:
(क) न
(ख) आम्
(ग) आम्
(घ) आम्

प्रश्न 5.
निम्नलिखितैः अव्ययशब्दैः वाक्यानि रचयत्
(क) श्वः – श्वः गुरुपूर्णिमा पर्व अस्ति।
(ख) तत्र – तत्र आरुणि आसीत्।
(ग) यत्र – यत्र केदारखण्डं आसीत्।
(घ) बाढम् – उपाध्यायः बाढम् कथित्वा अगच्छत्।
(ङ) क्व – क्व आरुणि पाञ्चाल्य।

प्रश्न 6.
क्रियापदानां धातुं लकारं पुरुषं वचनं च लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-1

प्रश्न 7.
निम्नलिखितशब्दानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत-
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-2

प्रश्न 8.
निम्नलिखित शब्दानां धातुं प्रत्ययं च विभज्य लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-3

प्रश्न 9.
निम्नलिखितशब्दानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनं लिङ्गं च लिखत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 17 गुरुभक्तः आरुणि img-4

पश्न 10.
निम्नलिखितवाक्यानि कथानुसारेण क्रमेण लिखत
(क) शयाने तस्मिन् प्रवाहं विरराम।
(ख) स तत्र संविवेश केदारखण्डे।
(ग) तदभिवादये भवन्तम्।
(घ) गुरुजनानामाज्ञा पालनीया।
(ङ) तस्य शिष्यः आमीत आरुणिरिति
उत्तर:
(ङ) तस्य शिष्यः आसीत् आरुणिरिति।
(घ) गुरुजनानामाज्ञा पालनीया।
(ख) स तत्र संविवेश केदारखण्डे।
(क) शयाने तस्मिन् प्रवाहं विरराम।
(ग) तद्भिवादये भवन्तम्।

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गुरुभक्तः आरुणिः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

‘श्रद्धागन को ही ज्ञान लाभ होता है’ इस कथन के अनुसार श्रद्धालु शिष्य ही गुरु से ज्ञान प्राप्त करते हैं। न केवल बुद्धि अपितु आसक्ति (गुरु के प्रति) भी ज्ञान प्राप्त करने हेतु आवश्यक होता है। उपनिषदों में अनेक उदाहरण श्रद्धा के महत्त्व को सिद्ध करते हैं। आरुणि का चरित्र भी गुरु-भक्ति का एक उदाहरण है।

गुरुभक्तः आरुणिः पाठ का हिन्दी अर्थ

1. शिक्षक-(छात्रान प्रति) श्वः किम् पर्व अस्ति?
रुचिरा-महोदय! श्वः गुरुपूर्णिमा-पर्व अस्ति।
प्रसून-गुरुपूर्णिमा पर्वणि किम् भवति?

शिक्षक :
अस्मिन् पर्वणि गुरुजनानां पूजनं सम्मानञ्च भवति। लोके आरुणिः, एकलव्यः, उपमन्युः इत्यादयः गुरुभक्तिं कृत्वा प्रसिद्धिं गताः।

अक्षत :
गुरुवर्य! आरुणिः कः आसीत?

शिक्षक :
शोभनम्, शृणोतु! आसीत् कश्चिद् ऋषिः धाम्यो नाम आयोदः। तस्य शिष्यः आसीत् आरुणिरिति।

प्रज्ञा :
तेन गुरोः कीदृशी सेवा कृता?

शिक्षक :
शृणोतु, ऋषि धौम्यः आरुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषयति स्म-गच्छ, केदारखण्डं बधान इति। उपाध्यायेन आदिष्टः आरुणिः तत्र गतवान् परञ्च केदारखण्डं बर्बु नाशक्नोत्। मयङ्क-तदनन्तरं स किमकरोत्?

शब्दार्थः :
श्वः-कल (आने वाला)-tomorrow; भवति-होता है-happens; अस्मिन्-हमारे-our; सम्मानञ्च-सम्मान-Honour; शोभनम्-सुन्दर-beautiful; शृणोतु-सुनाए-to listen;कीदृशी-किस तरह-How;कृता-किया-did;धाम्मो-भेजा-to sent; केदारखण्ड वधान-आचार्य धौम्य-Acharaya Dhoumya. उपाध्यायेन-शिक्षक के द्वारा-By teacher; नाशक्नोत्-असमर्थ-not capable.

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक :
(छात्रों से) आज कौन-सा पर्व है? रुचिरा-महोदय! आज गुरु पूर्णिमा का पर्व है। प्रसून-गुरु पूर्णिमा का पर्व क्या होता है?

शिक्षक :
इस पर्व के दिन गुरु जनों का पूजन एवं सम्मान किया जाता है। संसार में आरुणि एकलव्य उपमन्यु इत्यादि गुरु-भक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं।

अक्षत :
गुरुवर! आरुणि कौन थे?

शिक्षक :
बहुत सुंदर, सुनो! कोई धौम्य आयादि नामक ऋषि थे। उन्हीं के शिष्य का नाम आरुणि था।

प्रज्ञा :
उन्होंने गुरु की किस प्रकार सेवा की?

शिक्षक :
सुनो, ऋषि धौम्य आरुणि पाञ्चाल को कहा-जाओ, खेत की मेड़ को बांधो। गुरु के इस तरह के ओदश को सुनकर आरूणि वहाँ गया किन्तु खेत के उस मेड़ को बाँधने में असमर्थ हो गया।

मयंक :
तब उसने क्या किया?

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2. शिक्षक-कष्टमनुभवन् स अचिन्तयदुपायम्-भवतु एवमहं करिष्यामीति। इति विचिन्त्य स तत्केदारखण्डे संविवेश। शयाने तस्मिन् तदुदकप्रवाहं विरराम। ततः परम्। बहुकालानन्तरमुपाध्यायः आयोदो धौम्यः शिष्यानपृच्छत्-“क्व आरुणिः पाञ्चाल्य गत इति।” ते प्रत्यवदन् भगवतैव प्रेषितः। बहुकालगतेऽपि स न प्रत्यागतः।

अक्षत :
तदा धौम्यः आरुणेः अन्वेषणाय प्रयत्नं न कृतवान् किम्?

शिक्षक :
अवश्यमेव, यदा आरुणिः न प्रत्यागच्छत् तदा चिन्तितः सशिष्यैः ऋषिः तत्र गतवान् यत्र स आरुणिः गतः। तत्र तमाह्वनाय उच्चैः शब्दं चकार-भो आरुणि! क्वासि वत्स? क्वासि? एतच्छ्रुत्वा स तस्मात् केदारखण्डात् सहसोत्थाय ऋषिसमीप प्रत्यागच्छत्। प्रत्यवदच्चैनम् अयमस्मि अत्र केदारखण्डे, अहं निस्सरदकमवारणीयं संरोद्धं संविष्टः। भवच्छब्दं श्रुत्वा केदारखण्ड विदार्य समुपस्थितः। तदभिवादये भवन्तम्। आज्ञापयतु भवान् किमिदानीं करवाणीति।

रुचिरा :
स गुरुणां पुरस्कृतः किम्?

शिक्षक :
शृणोतु! तमुपाध्यायोऽब्रबीत्-“यं केदारखण्डमवदार्य त्वमुपस्थितः, तस्मात् त्वमुद्दालक इति नाम्ना भविष्यतीति।” यस्मात् त्वया मद्वचनं अनुष्ठितं तस्मात् श्रेयोऽवाप्स्यसीति! ते सर्वे वेदाः प्रतिभवन्ति, सर्वाणि च शास्त्राणीति । अनेन स गुरुभक्तः आरुणिः उद्दालक नाम्ना प्रसिद्धो विद्वान शास्त्रज्ञो यशस्वी दीर्घायुश्चाजायतः।

प्रसून :
आस्मभिरपि गुरुजनानामाज्ञा पालनीया। शिक्षक-आम्, अवश्यमेव।

शब्दार्थः :
संविवेश-लेट गया-laid; क्लिश्यमानः-दुखीः होते हुए-being distressed; प्रेषितः-भेज दिया गया-has been sent; प्रत्युवाच-उत्तर भेजा-replied; उत्थाय उठकर-raising; प्रत्यागच्छत्-पास लौट आया-came near; उकम्-पानी को-water; संरोद्धम्-रोकने के लिए-for stop; संविष्टः-लेट गया-laid down; विदार्य-तोड़करbreaking; समुपस्थितः-पहुँचा हूँ-reached; आज्ञापयतु-आज्ञा दीजिए-grant me permission; अनुगृहीत-कृपा किया गया-was blessed; अनुष्ठितम्-किया गया-was done;अवाप्स्यसि-प्राप्त करोगे-will get;प्रतिभास्यन्ति -ज्ञात हो जाएँगे-will be known.

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक :
कष्ट का अनुभव करते हुए उसने एक उपाय सोचा-ठीक है, इस तरह ही मैं करूँगा-ऐसा सोच वह स्वयं उस खेत की मेड़ पर लेट गया। उसके लेटने से पानी का वह प्रवाह रुक गया। कुछ समय बीतने पर आचार्य आयोद धौम्य के शिष्यों से पूछा-आरुणि पाञ्चाल कहाँ गया है? वे बोले-आपने ही उसे भेजा है। बहुत समय व्यतीत हो जाने पर भी अभी तक नहीं लौटा है।

अक्षत :
तब धौम्य ने आरुणि को खोजने के लिए प्रयत्न नहीं किया?

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शिक्षक :
अवश्य किया। जब आरुणि नहीं लौटा तब चिंतित ऋषि शिष्यों सहित गए जहां आरुणि को भेजा था। वहाँ उन्होंने आरुणि का नाम लेकर जोर-जोर से पुकारा-हे आरुणि! तुम कहाँ हो, कहाँ हो। अपने को पुकारता सुन वह मेड़ से उठ गुरु के समीप आ गया और बोला-मैं यहाँ हूँ। यहाँ खेत की मेड़ से बहते हुए पानी को रोकने के लिए मैं यहाँ लेट गया था। आपके शब्दों को सुनकर खेत की मेड़ को छोड़कर यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। हे श्रीमान! मैं आपका अभिवादन करता हूँ। आप आज्ञा दें-अब मैं क्या करूँ।

रुचिरा :
उसे गुरु ने क्या पुरस्कार दिया?

शिक्षक ;
सुनो, आचार्य उससे बोले-जिस तरह खेत के इस खण्ड को तोड़ कर तुम उपस्थित हुए, इससे तुम्हारा नाम उद्दालक होगा और जिस तरह तुमने मेरे वचन का ज्ञान होगा। बाद में, वही गुरु भक्त आरुणि उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह विद्वान शास्त्रों का ज्ञाता एवं यशस्वी व दीर्घायु हुआ।

प्रसून :
हमें भी गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए।

शिक्षक :
हाँ, अवश्य ही।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 16 अध्ययने प्रत्यूहः

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 16 अध्ययने प्रत्यूहः (नाट्यांशः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 16 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) सद्भिः सङ्गः केन भवति? (सज्जनों के साथ सम्पर्क किससे होता है?)
उत्तर:
पुण्येना। (पुण्य से)

(ख) दण्डकारण्यप्रदेशे के प्रमुखाः वसन्ति? (दण्डकारण्य प्रदेश में प्रमुख रूप से कौन रहता है?)
उत्तर:
अगस्त्यादयः। (अगस्तादि प्रमुख ऋषि रहते हैं)

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(ग) देवताविशेषेण अद्भुतं किम् उपनीतम्? (देवता गण किस अद्भुत विशेषण को बताते हैं?)
उत्तर:
जृम्भकास्त्राणि। (जृम्भकास्त्र।)

(घ) दारको केन पोषितौ रक्षितौ च? (दोनों किसके द्वारा रक्षित पोषित हुए?)
उत्तर:
वल्मीकिना। (वाल्मीकि के द्वारा)।

(ङ) तयोः कानि जन्मसिद्धानि? (उन दोनों को क्या जन्म सिद्ध था?)
उत्तर:
जृम्भकास्त्र। (जृम्भकास्त्र।)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) आत्रेयी दण्डकारण्ये किमर्थं भ्रमति स्म? (आत्रेयी दण्डकारण्य वन में क्यों घूमते थे?)
उत्तर:
आत्रेयी दण्डकारण्ये महानध्ययनप्रत्यूह भ्रमति स्मः। (आत्रेयी दण्डकारण्य में पढ़ाई में विघ्न आ जाने के कारण घूमते थे।)

(ख) वाल्मीकिना तयोः कां विद्याम् अध्यापितौ? (वाल्मीकि के द्वारा उन दोनों को कौन-सी विद्या पढ़ाई जाती थी?)
उत्तर:
वाल्मीकिना तयोः त्रयीवर्जमितरास्तिस्त्रो विद्याम् अध्यापितौ। (वाल्मीकि के द्वारा उन दोनों को वेद को छोड़कर और तीनों (आन्वीक्षिकी, वार्ता और दण्डनीति) विद्याओं का अध्ययन कराया जाता था।)

(ग) गुरुः विद्या कथं वितरति? (गुरु विद्या कैसे देते हैं?)
उत्तर:
गुरुः विद्या प्राज्ञे विद्यां यथैव तथा जड़े वितरति। (गुरु जिस तरह बुद्धिमान छात्र को उसी तरह मन्द बुद्धि छात्र को भी विद्या देता है।)

(घ) ब्रह्मर्षिः किमर्थं तमसामनुप्रपन्नः? (बह्मर्षि तमसा नदी के किनारे किसलिए गए?)
उत्तर:
बह्मर्षिः माध्यन्दिनसवनाय नदीं तमसामनुप्रपन्नः। (ब्रह्मर्षि तमसा नदी के किनारे मध्याह्न (दोपहर की संध्या) वन्दन करने के लिए तमसा नदी के किनारे गए।)

(ङ) क्रौञ्चयोः एकं कः हतवान्? (क्रौञ्च में से एक को किसने मारा?)
उत्तर:
क्रौञ्चयोरेकं एक व्याधेन हतवान्। (क्रौञ्च में से एक को बहेलिया ने मारा।)

प्रश्न 3.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) वनदेवता वनस्य सौन्दर्य विषये तापसी किं वदति? (वनदेता वन के सौन्दर्य के विषय में तापसी से क्या कहता है?)
उत्तर:
वनदेवता वनस्य सौन्दर्य विषये तापसी यथेच्छा भोग्यं दो वदति। (वनदेवता वन के सौन्दर्य के विषय में तापसी से कहता है कि यह वन आपकी इच्छा के अनुसार उपभोग योग्य है।)

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(ख) पद्मयोनिः वाल्मीकि किमवोचत्? (ब्रह्मा ने वाल्मीकि से क्या कहा?)
उत्तर:
पद्मयोनिरवोचत्-ऋषेः प्रबुद्धोऽसि वागात्मनि ब्रह्ममणि। तदृ ब्रहि रामचरितम्। (ब्रह्मा ने वाल्मीकि से कहा कि ऋषि जी! तुम शब्द रूप ब्रह्म में ज्ञान सम्पन्न हो गए हो, इस कारण रामचरित का वर्णन करो।)

(ग) साधूनां चरित कीदृशमस्ति? (सज्जनों का चरित किस तरह का होता है?)
उत्तर:
साधूनां चरितं सतां सद्भिः सङ्गः कथमपि हि पुण्येन भवति। (सज्जनों की संगति सज्जनों द्वारा कष्टमय पुण्य से होती है।)

(घ) क्रौञ्चवधानन्तरं वाल्मीकिमुखात् का वाणी निर्गता? (क्रौञ्च के वध के अनन्तर वाल्मीकि के मुख से कौन-सी वाणी निकली?)
उत्तर:
क्रौञ्चवधानन्तरं वाल्मीकि किं मुखात् वाणी निर्गता-मा निषाद्। प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। (क्रौंच के वध के अनन्तर वाल्मीकि के मुख से वाणी निकली कि-हे व्याध! जो कि तूने एक का वध कर दिया है इसलिए तू बहुत समय तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सकेगा)

प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत
MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 16 अध्ययने प्रत्यूह img-1

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
उदाहरणम् :
तापसी अध्वगवेषा अस्ति। – आम्
व्याधः क्रौञ्च न हतवान्। – न
(क) गुरुः यथा प्राज्ञे तथैव जड़े विद्यां वितरति।
(ख) जृम्भकास्त्राणि जन्मसिद्धानि आसन्।
(ग) लवकुशौ त्रयी विद्यां न अधीतवन्तौ।
(घ) वाल्मीकिः आदिकविः अस्ति।
(ङ) वाल्मीकिः रामायणं न लिखितवान्
उत्तर:
(क) आम्
(ख) आम्
(ग) न
(घ) आम्
(ङ) न

प्रश्न 6.
उचितैः पदैः रिक्तस्थानानि पूरयत
(निगमान्तविद्याम्, पुण्येन, प्रतिष्ठाम, विशुद्धम्, माध्यन्दिनसवनाय)
(क) सतां सद्भिः सङ्गः पुण्येन भवति।
(ख) आत्रेयी निगमान्तविद्याम् अध्येतुम् पर्यटति।
(ग) महर्षि माध्यन्दिनसवनाय तमसामनुप्रपन्नः।
(घ) मा! निषाद प्रतिष्ठाम् त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
(ङ) रहस्यं साधूनामनुपधि विशुद्धं विजयते।

प्रश्न 7.
सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत
उदाहरणम् :
केनापि- केन + अपि = दीर्घस्वरसन्धिः।
(क) अथापरः – अथ + अपर = दीर्घस्वरसंधिः।
(ख) यथेच्छा – यथा इच्छा – गुणस्वरसंधिः।
(ग) यथैव – यथा + एव = वृद्धिस्वरसंधिः।
(घ) आत्रेय्यस्मि – आत्रेयी + अस्मि = यणस्वरसंधिः।
(ङ) अन्येऽपि – अन्ये + अपि = पूर्ण रूप।

प्रश्न 8.
अव्ययैः वाक्य निर्माण कुरुत
उदाहरणं यथाः
तत्र महर्षिः वाल्मीकिः वसति स्म।
(क) अपि – रामः अपि फलं खादति।
(ख) यदा – यदा मोहितः आगच्छति तदा अन्शुलः, राशिन्तश्च गच्छति।
(ग) किल – रामचन्द्रः किल पितृभक्तिः आसीत्।
(घ) खलु – पासः प्रधानं खलु योग्यतायाः।
(ङ) एकदा – एकदा अहं भेड़ाघट्टम्अवश्यमेव गमिष्यामि।

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अध्ययने प्रत्यूहः पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

महाकवि भवभूति रचित ‘उत्तर रामचरितम्’ नामक नाटक ग्रन्थ से उद्धृत यह अंश संस्कृत भाषा के नाट्य परम्परा का परिचय प्रस्तुत करने में सक्षम है। बुद्धि कौशल युक्त गुरु का छात्रों के प्रति समान रूप से समदर्शिता का भाव यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

अध्ययने प्रत्यूहः पाठ का हिन्दी अर्थ
(ततः प्रविशत्यध्वगवेषा तापसी)

1. तापसी-अये, वनदेवता फलकुसुमगर्भेण पल्लवायेण दूरान्मामुपतिष्ठते। (प्रविश्य) वनदेवता-(अर्घ्य विकीय)
यथेच्छाभोग्यं वो वनमिदमयं मे सुदिवसः
सतां सद्भिः सङ्गः कथमपि हि पुण्येन भवति।
तरुच्छाया तोयं यदपि तपसां योग्यमशनं
फलं वा मूलं वा तदपि न पराधीनमिह वः॥

तापसी :
किमत्रोच्यते?
प्रियप्राया वृत्तिर्विनयमधुरो वाचि नियमः
प्रकृत्या कल्याणी मतिरनवगीतः परिचयः।
पुरो वा पश्चाद् वा तदिदमविपर्यासितरसं
रहस्यं साधूनामनुपधि विशुद्धं विजयते॥
(उपविशतः)

शब्दार्थः :
वनदेवता-वनदेवता-forest God;फलकुसुमगर्भेण-फल और फलो से भरे-full of fruits and flowers; पल्लवादंण-पल्लवसहित-with new leaves; दूरान्मामुपतिष्ठते-दूर से ही मेरा सत्कार करती है-salute me from long distance; अर्घ्य विकीर्य-अर्घ्य देखकर-water give by hands; यथेच्छायोग्य इच्छा के अनुसार योग्य-like desire consumation; कथमपि-किसी तरह से-any how; पुण्येन-पुण्य के द्वारा-By good work; तरुछाया-वृक्ष की छाया-shade of tree; तदापि-वह भी-he also; किमत्रोक्यते-क्या कहा जाए-what do say; पुरो-पहले-first; पश्चाद्-बाद में-after; विनयमूर्धरा-विनय के कारण हृदयाकर्षक-to reason of attration by heart; अनवगीतः-अनिन्दित-not criticise; प्रियाप्रायव्रति-अतिशय प्रियकारी व्यवहार-lovely behavioure.

हिन्दी अर्थः :
(तब पथिक रूप में तपस्विनी का प्रवेश)

तापसी :
अरे! वन देवता पुष्प-फलों से पूर्ण, पल्लव फपी अर्घ्य के द्वारा दूर से ही मेरा स्वागत करते हैं। (प्रवेश करके)

वन देवता :
(अर्घ्य देकर) यह वन इच्छानुरूप भोग के लिए आप को अर्पित है क्योंकि सज्जनों का सज्जन पुरुष से संयोग बड़े पुण्य से होता है। वृद्धा की छाया, जल और तप के योग्य जो भी पदार्थ-फल मूल है वह आपकी सेवा में है, पराधीन नहीं है।

तापसी :
इस पर क्या कहा जाए?

व्यवहार अत्यधिक प्रीतियुक्त, हृदय को आकर्षित करने वाली नम्रता, स्वभाव से ही मंगल रूप बुद्धि, न बदलने वाला, व अनिंदित प्रेम, छल-कपट से रहित और विशुद्ध-ऐसा उत्कृष्ट रूप साधुओं का होता है। (दोनों बैठते हैं)

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2. वनदेवता-काम् पुनरत्रभवतीमवगच्छामि?

तापसी :
आत्रेय्यस्मि।

वनदेवता :
आर्ये आत्रेयि! कुतःपुनरिहागम्यते? किम् प्रयोजनो दण्डकारण्योपवनप्रचारः?

आत्रेयी :
अस्मिन्नगस्त्यप्रमुखाः प्रदेशे भूयांस उद्गीथविदो वदन्ति।
तेभ्योऽधिगन्तुं निगमान्तविद्यां वाल्मीकिपादिह पर्यटामि॥

वनदेवता :
यदा तावदन्येऽपि मुनयस्तमेव हि पुराणब्रह्मवादिनम् प्राचेतसमृषिम् ब्रह्मपारायणायोपासते, तत्कोऽयमार्यायाः प्रवासः?

आत्रेयी :
तस्मिन् हि महानध्ययनप्रत्यूह इत्येष दीर्घप्रवासोऽङ्गीकृतः। वनदेवता-कीदृशः?

आत्रेयी :
तत्र भगवतः केनापि देवताविशेषेण सर्वप्रकाराद्भुतं स्तन्यत्यागमात्रके वयसि धर्तमानं दारकद्वयमुपनीतम्। तत्खलु न केवलं तस्य, अपितु तिरश्चामप्यन्तः करणानि तत्त्वान्युपस्नेहयति।

शब्दार्थः :
आत्रेयरिम-मैं आत्रेयी हूं-I am Aitreyi. कुत्रः-कहां से-from where; प्रयोजना-प्रयोजन है -is pland. अगस्त्यप्रमुखाः -अगस्त्य आदि प्रमुख-Augustya and main; प्रदेशे-क्षेत्र में-In area; पर्यटामि-घूमते हुए आ रहा हूं-coming into wonderd; वदन्ति-कहते हैं-says; ब्रह्मवादिनाम्ब्रह्मवादी-of Bramha; उपासते-उपासना करते हैं-prayers; आर्याया-आर्यों का-Aryar; प्रवासः-प्रवास-migration; तस्मिनः-वहां-there; प्रत्यूह- विघ्न-disturbe; दीर्घ प्रवासो-दीर्घप्रवास को-lang bravery; अंगीकृता-स्वीकृत किया है-expect; कीदृशः-कैसा-how, सर्वेकारात-सभी प्रकार से-all types; वयस्वीउम्र में-In age; तस्य-उसके-his; अधिगतुम्-जानने के लिए-for knowing,

हिन्दी अर्थ :
वन देवता-आपको मैं क्या समझू?

तापसी :
मैं आत्रेयी हूँ।

वनदेवता :
आर्ये आत्रेयी! आप कहाँ से आ रही हैं? किस प्रयोजन से आप दण्डकारण्य में घूम रही हैं?

आत्रेयी :
इस स्थान में अगस्त्य आदि प्रमुख ऋषि रहते हैं। उनसे वेदान्त की शिक्षा प्राप्त करने के लिए ऋषि वाल्मीकि के आश्रम से आ रही हूँ।

वनदेवता :
जब अनेक ऋषि मुनि एवं अनुभवी ब्रह्मवेत्ता मुनि महर्षि वाल्मीकि के यहाँ वेदांत शिक्षा ग्रहण करते हैं, तब आर्या के यहाँ आकर प्रवास का क्या कारण है?

आत्रेयी :
वहाँ पढ़ने में व्यवधान उत्पन्न हो जाने के कारण मैंने दीर्घ प्रवास को स्वीकार किया।

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3. वनदेवता-तयैव किल देवतया तयोः कुशलवाविति नामनी प्रभावश्चाख्यातः।

वनदेता :
कीदृशः प्रभावः?

आत्रेयी :
तयोः किल सरहस्यानि जृम्भकास्त्राणि जन्मसिद्धनीति।

वनदेवता :
अहो नु भोश्चित्रमेतत्।

आत्रेयी :
तौ च भगवता वाल्मीकिना धात्रीकर्मतः परिगृह्य पोषितौ रक्षितौ च, निर्वृत्तचौलकर्मणोस्तयोस्त्रयी-वर्जमितरास्तिस्रो विद्याः सावधानेन परिनिष्ठापिताः। तदनन्तरं भगवतैकादशे वर्षे क्षात्रेण कल्पेनोपनीय त्रयीविद्यामध्यापितौ न त्वेताभ्यामतिदीप्तिप्रज्ञाभ्यामस्मदादेः सहाध्ययनयोगोऽस्ति यतः
वितरति गुरुः प्राज्ञे विद्यां यथैव तथा जडे
न तु खलु तयोाने शक्तिं करोत्यपहन्ति वा।
भवति हि पुनर्भूयान् भेदः फलम् प्रति, तद्यथा
प्रभवति शुचिबिम्बग्राहे मणिनं मृदादयः॥

वनदेवता :
अयमध्ययनप्रत्यूहः?

आत्रेयी :
अन्यश्च।

वनदेवता :
अथापरः कः?

शब्दार्थः :
कीदृशः-किस तरह-How type; वितरति-वितरित करती है-Distributes; प्राज्ञे-शास्त्र विषय-Knowledge of book; प्रभवति-प्रभावित करती है-to affect; सुचि-पवित्रता-holyness; प्रत्यूहः-बाध्य-trouble.

हिन्दी अर्थः :
वनदेवता-कैसा विघ्न?

आत्रेयी :
वहाँ भगवान वाल्मीकि के निकट किसी देवता ने सभी प्रकार से अद्भुत एवं स्तन त्याग करने की अवस्था के दो बच्चों को छोड़ दिया है। वे बालक केवल उन्हीं के नहीं वरन् पशु-पक्षियों के हृदय में भी स्नेह का संचार करते हैं।

वनदेवता :
क्या आप उन दोनों बालकों का नाम जानती हैं?

आत्रेयी :
उसी देवता ने उन दोनों का नाम लव एवं कुश यह नाम व प्रभाव बताया है।

वनदेवता :
कैसा प्रभाव? आत्रेयी-उन दोनों को मन्त्रपूरित जृम्भका नामक अस्त्र सिद्ध है। वनदेवता-यह आश्चर्य है।

आत्रेयी :
उन दोनों को भगवान वाल्मीकि ने धात्री के समान पालन-पोषण व रक्षित किया है। चूडाकर्म से निवृत्त होने के बाद बहुत कुशलतापूर्वक उन्हें वेदाध्ययन के अतिरिक्त अन्य तीन विद्याओं (आन्वीक्षिकी, वार्ता एवं दण्डनीति) का अध्ययन कराया। पुनः उनकी ग्यारहवीं साल की उम्र में क्षत्रिय विधि से उपनयन संस्कार कर उन्हें वेद की शिक्षा प्रदान की। अत्यंत प्रतिभा के धनी उन दोनों बालकों के साथ हम लोगों का पढ़ना बहुत कठिन है क्योंकि गुरु तीव्र बद्धि एवं मंद बुद्धि वाले दोनों तरह के छात्रों को एक समान शिक्षा प्रदान करता है। दोनों में से किसी को न अलग से समझने की सामर्थ्य प्रदान करता है और न ही किसी को बोध-शक्ति को नष्ट ही करता है। ऐसा होने पर भी परिणाम में बहुत भिन्नता होती है, जैसे कि हीरा, स्फटिक मणि आदि सभी प्रतिबिम्ब ग्रहण करने में समर्थ होते हैं किन्तु मिट्टी आदि पदार्थ प्रतिबिम्ब धारण नहीं कर सकते।

वन देवता :
पढ़ने में यही विघ्न है?

आत्रेयी :
और दूसरा भी

वन देवता :
और दूसरा विघ्न क्या है?

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4. आयेत्री-अथ स ब्रह्मर्षिरेकदा माध्यन्दिनसवनाय नदीं तमसामनुप्रपन्नः। तत्र युग्मचारिणोः क्रौञ्चयोरेकं व्याधेन वध्यमानं ददर्श। आकस्मिकप्रत्यवभासां देवीं वाचमानुष्टुभेन छन्दसा परिणतामभ्युदैरयत्-
मा निषाद! प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
वनदेवता-चित्रम्? भग्नायादन्यत्र नूतनश्छन्दसामवतारः।

आत्रेयी :
तेन हि पुनः समयेन तं भगवन्तमाविर्भूतशब्दप्रकाशमृषिमुपसङ्गम्य भगवान् भूतभावनः-पद्मयोनिरवोचत् ऋषे प्रबुद्धोऽसि वागात्मनि ब्रह्माणि। तब्रूहि रामचरितम्। अव्याहतज्योतिरार्षं ते चक्षुः प्रतिभातु। आयः कविरसि इत्युक्त्वान्तर्हितः। अथ स भगवान् प्राचेतसः प्रथमम् मनुष्येषु शब्दब्रह्मणस्तादृशं विवर्तमितिहासं रामायणम् प्रणिनाय।

वनदेवता :
हन्त! पण्डितः संसारः।

आत्रेयी :
तस्मादेव हि ब्रवीमि ‘तत्र महानध्ययनप्रत्यूह’ इति।

वनदेवता :
युज्यते। आत्रेयी-विश्रान्तास्मि भद्रे! संप्रत्यगस्त्याश्रमस्य पन्थानम् ब्रूहि।

वनदेवता :
इतः पञ्चवटीमनुप्रविश्य गम्यतामनेन गोदावरी तीरेण।
(इति निष्क्रान्तः)।

शब्दार्थः :
व्याधेन-बहेलिया ने-Hunter. पद्मयोनि-ब्रह्म-Brahma; प्रबुद्धोऽसि-प्रबुद्ध है-wise man; तादृशं-उस तरह-this type; तस्मादेव-इसी कारण से-for this reason; ब्रवीमि-कहती हूँ-says.

हिन्दी अर्थ :
एक दिन ब्रह्मर्षि दोपहर स्नान के लिए तमसा नदी के तट पर गए। वहाँ प्रेमरत नर-मादा क्रौंच पक्षियों में से एक नर को बहेलिए द्वारा मारे जाते हुए देखा। तब उन्होंने एकाएक उत्पन्न हुए छन्दबद्ध श्लोक के रूप में कहा-हे बहेलिए तुमने काम मोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार दिया, इस कारण तुम बहुत समय तक प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर सकोगे।।

वनदेवता :
आश्चर्य है! वेद के अतिरिक्त भी छन्द का नया जन्म हुआ।

आत्रेयी :
जिनको छन्द रूपी प्रकाश का दर्शन हो गया है एवं भगवान वाल्मीकि के पास आकर लोक के जन्मदाता ब्रह्मा ने आकर कहा-ऋषि! तुम शब्द रूप ब्रह्मा से अभिभूत हो गए हो। अब तुम रामचरित का वर्णन करो। न क्षीण होने वाला प्रकाश रूपी आर्य ज्ञान तुम्हें प्रकाशित करे। तुम आदि कवि हो। ऐसा कहकर ब्रह्मा अंतर्धान हो गए। तब भगवान वाल्मीकि ने मनुष्यों में सर्वप्रथम शब्द ब्रह्म का रूपान्तर कर रामायण नामक इतिहास की रचना की।

वनदेवता :
हाय! तब तो सांसारिक लोग भी पण्डित हो जाएँगे। आत्रेयी-इसी कारण वहाँ पढ़ने में विघ्न है-ऐसा मैं कहती हूँ। वनदेवता-ठीक है।

आत्रेयी :
हे भद्र! मैं विश्राम कर चुकी। अब मुझे भगवान अगस्त्य के आश्रम का मार्ग बताएँ।

वनदेवता :
वहाँ से पंचवटी में प्रवेश कर गोदावरी के किनारे से जाइए। इस तरह जाते हैं।

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MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Chapter 14 वीरबाला

MP Board Class 9th Sanskrit Solutions Durva Chapter 14 वीरबाला (संवादः)

MP Board Class 9th Sanskrit Chapter 14 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)-
(क) वीरबालायाः नाम किम्? (वीरबाला का क्या नाम था?)
उत्तर:
चम्पा। (वीरबाला का नाम चम्पा था)

(ख) चम्पायाः पितुः नान किम्? (चम्पा के पिता का नाम क्या था?)
उत्तर:
महाराणा प्रताप। (महाराणाप्रताप)।

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(ग) रोटिकाद्वयम् कुत्र स्थापितम्? (दोनों रोटियाँ कहाँ रखी थीं?)
उत्तर:
पाषाणतले। (पत्थर के नीचे)!

(घ) उद्वेलितः प्रतापः किं कर्तुमुद्यतः अभवत्? (दुःखी प्रताप क्या करने के जिए तैयार हो गए?)
उत्तर:
अकबरस्याधीनता। (अकबर की आधीनता स्वीकार करने के लिए)।

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) अस्माकं देशे काः काः वीरबालाः जाताः? (हमारे देश में कौन-कौन-सी वीरबालाएँ हुईं?)
उत्तर:
अस्माकं देशे चम्पा, कृष्णा, वीरमती, पद्मादयः वीरबालाः जाताः। (हमारे देश में चम्पा, कृष्णा, वीरमती, पद्ममा जैसी वीरबालाएँ हुईं।)

(ख) प्रतापेन का प्रतिज्ञा कृता? (राणा प्रताप ने क्या प्रतिज्ञा की?).
उत्तर:
प्रतापेन प्रतिज्ञा कृताः अकबरस्य अधीनतां न स्वीकृतवान्। (प्रताप ने अकबर की आधीनता न स्वीकरने की प्रतिज्ञा की।)

(ग) चम्पया रोटिकाद्वयम् किमर्थं संरक्षिता? (चम्पा दोनों रोटियों को किसलिए सुरक्षित रखी थी?)
उत्तर:
चम्पया रोटिकाद्वयम् अनुजाय भोजनार्थम् संरक्षिता। (चम्पा दोनों रोटियों को छोटे भाई के भोजन के लिए सुरक्षित रखी थी।)

(घ) राजकुमारः कथं सुप्तवान् आसीत्? (राजकुमार कैसे सो गया?)
उत्तर:
राजकुमारः बुभुक्षितः सुप्तवान् आसीत्। (राजकुमार भूखा सो गया।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
(क) महाराणाप्रतापस्य प्रतिज्ञा का आसीत्? (महाराणाप्रताप की प्रतिज्ञा क्या थी?)
उत्तर:
महाराणाप्रतापस्य प्रतिज्ञा आसीत् अकबरस्य अधीनतां न स्वीकृत। (महाराणा। प्रताप की प्रतिज्ञा थी कि अकबर की अधीनता न स्वीकारूँगा।)

(ख) चम्पा केन कारणेन मूर्छिता जाता? (चम्पा किस कारण से मूर्छित हो गई?)
उत्तर:
चम्पा दौर्बल्यात् कारणेन मूर्च्छिता जाता। (चम्पा दुर्बल होने के कारण मूर्च्छित हो गई।)

(ग) महाराणाप्रतापः किमर्थं चिन्तामग्नः आसीत्? (महाराणाप्रतापः को किस बात की चिंता थी?)
उत्तर:
महाराणाप्रतापः अतिथिः भोजनार्थम् चिन्तामग्नः आसीत्। (महाराणाप्रताप को अतिथि के लिए भोजन की व्यवस्था की चिंता थी।)

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प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत
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प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् ‘आम्’ अशुद्धवाक्यानां समक्ष कोष्ठके ‘न’ इति लिखत
(क) अरावलीपर्वतस्य उपत्यकायां महाराणाप्रतापः एकाकी आसीत्। (आम्)
(ख) अतिथिः महाराणागृहात् अनश्नन् गतवान्।
(ग) चम्पा स्वभागस्य रोटिकां स्वानुजं ददाति स्म।
(घ) महाराणाप्रतापः आधीनताविषये पत्रं लिखितवान्।
उत्तर:
(क) (आम्)
(ख) (न)
(ग) (आम्)
(घ) (न)

प्रश्न 6.
उचितविकल्पेन वाक्यानि पूरयत
(क) अरावलीपर्वतस्य उपत्यकायाम् कष्टमनुभूतम्। (उपत्यकायाम्/गुहायाम्)
(ख) पाषाणतले रोटिकाद्वयम् संरक्षिता आसीत्। (रोटिका/रोटिकाद्वयम्)
(ग) चम्पामूर्छिता जाता अनश्नन्। (अश्नन्/अनश्नन्)
(घ) कष्टान् अवलोक्य महाराणाप्रतापः उद्वेलितः जातः। (जाता/जातः)
(ङ) राजकुमारः बुभुक्षया पीडित सुप्तवान्। (बुभुक्षया/पिपासया)

प्रश्न 7.
कोष्टकात् चित्वा वाक्यानि रचयत्
यथा- घटना – एक घटना महाराणाप्रताप कालीना आसीत्
(क) चम्पा – एषा महाराणाप्रतापस्य पुत्री आसीत्।
(ख) राजकुमारः – एषः महाराणाप्रतापस्य पुत्रः आसीत।
(ग) शपथः – महाराणाप्रतापः शपथः गृहीतवान्।
(घ) पत्रम् – महाराणाप्रतापः पत्रम् अलिखत्।
(ङ) वीरः – महाराणाप्रतापः वीरः च आसीत्।

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प्रश्न 8.
अधोलिखितशब्दानां धातुं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत
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प्रश्न 9.
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प्रश्न 10:
निम्नलिखत क्रियापदानां धातुं लकारं पुरुषं वचनञ्च लिखत
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प्रश्न 11.
निम्ललिखित अव्यायानां वाक्यप्रयोगं कुरुत-
उदाहरणं यथा-
कदा – सः कदा पठति? तदा-यदा अहं आगमिष्यामि तदा त्वम् गमिष्यसि
अद्य – अद्य सोमवासरः अस्ति। ह्यः-ह्यः दीपावली अस्ति।।
कृते – संस्कृतस्य कृते अहं जीवनम् ददामि।
एव – अहं दुग्धं न पिवामि, अहं चायमेव पिवामि।
च – मोहितः राशिन्तश्च विद्यालयं गच्छति।

वीरबाला पाठ-सन्दर्भ/प्रतिपाद्य

मेवाड़ के राजा उदयसिंह के पुत्र महाराणा प्रताप पिता के समान विशाल, वीर व पराक्रमी थे। उसने प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं अकबर को पराजित नहीं करूँगा और चित्तौड़ के दुर्ग को नहीं जीत लूँगा तब तक पत्ते में भोजन करूँगा तथा जमीन पर शयन करूँगा परिवार पर आए संकट से विचलित होकर उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा बदलने की इच्छा की किन्तु उनकी पुत्री चम्पा के जीवन का उत्सर्ग करने के बाद महाराणा प्रताप अपनी पूर्व प्रतिज्ञा पर दृढ़ होकर मेवाड़ के गौरव की रक्षा के लिए पुनः प्रतिज्ञा की। प्रस्तुत पाठ में भारतीय बालाओं की गौरव गाथा है

वीरबाला पाठ का हिन्दी अर्थ

1. शिक्षक-भो छात्राः अस्माकं भारतदेशे बहव्यः वीरबालाः चम्पा, कृष्णा, वीरमती, पद्मा दयः सञ्जाताः।
आनन्द :
आचार्य! एतासु केयम् चम्पा? कृपया तद्विषये कथयतु। शिक्षक-आम्! शृणोतु, किं भवन्तः महाराणाप्रताप विषये जानन्ति?

वेदान्त :
किं स एव महाराणाप्रतापः यः भारतवर्षभूषणः स्वदेशस्वातन्त्र्याभिमानी च।

शिक्षक :
आम् तस्यैव पुत्री आसीत् चम्पा।

आरती :
तस्याः विषये विस्तारेण न जानीमः।

शिक्षक :
शृण्वन्तु। महाराणाप्रतापः अकबरस्य अधीनतां न स्वीकृतवान्। अनेन कारणेन अरावलीपर्वतस्य उपत्यकाय गुहासु वनेषु च सपरिवारंपरिभ्रमन् अत्यधिकं कष्टम् अन्वभवत्।

भरत :
तत्र ते कुत्र स्वपन्ति, स्म किञ्च खादन्ति स्म?

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शब्दार्थ :
बहव्य-बहुत-सी-Many; आदय-आदि-and; सजाता-हुए-Happen; केयम्-यह कौन-who is that; तद्विषये-उस विषय में-in that subjects;जानन्ति-जानते हैं-knows; किं-कौन-who; भवन्त-आप सब-every body; स-वह-He, Smile, it; एव-भी-also; भूषण-भूषण-Bhushan; तस्यैव-उसका ही-His; आसीत्-था-was; तस्याः -उसके-His; शृण्वन्तु-सुनिए-listen; जानीमः-जानते हैं-knows; अनेन-इस तरह-This type; अन्वभवत्-अनुभव किया-felt; स्वपन्ति-सोते थे-were sleeping, स्म-थे-were.

हिन्दी अर्थ :
शिक्षक-हे विद्यार्थियो! हमारे देश भारत में अनेक वीर बालाएँ-कृष्णा, चंपा, वीरमती, पद्मा आदि हुई हैं।

आनन्द :
गुरुजी! इनमें चम्पा कौन थी? कृपया उसके विषय में बताएँ।

शिक्षक :
ठीक है, सुनो। क्या आप लोग महाराणा प्रताप के विषय में जानते हैं?

वेदान्त :
क्या वही महाराणा प्रताप जो भारतवर्ष के गौरव तथा अपने देश की स्वतंत्रताभिमानी थे?

शिक्षक :
हाँ, उन्हीं की पुत्री चंपा थी।

आरती :
उसके विषय में हम विस्तारपूर्वक नहीं जानते।

शिक्षक :
सुनो! महाराणा प्रताप ने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता नहीं स्वीकार की जिसके कारण उन्होंने अरावली पर्वत की घाटियों, गुफाओं, उपत्यका में परिवार सहित गुप्त भ्रमण करते हुए अत्यधिक कष्ट पूर्ण जीवन बिताया।

भरत :
(उन उपत्यकाओं में) वे कहाँ सोते थे और क्या खाते थे।

2. शिक्षक-अहोरात्रं पदातिरेव ते चलन्ति स्म भूमौ शिलायां वा स्वपन्ति स्म। बहुधा उपवासं कृत्वा यदा कदा। बदरीफलानि वा तृणरोटिकांश्च खादन्ति स्म। नैकवारं ईदृशः समयः आगतः यदा तृणरोटिकाम् अपि त्यक्त्वा पलायनार्थं शत्रुभि विवशीकृताः। तस्मिन् काले प्रतापस्य पुत्री चम्पा एकादशवर्षीया पुत्रश्च चतुर्वर्षीयः आस्ताम्।

शालिनी :
आचार्य। यदि तयोः विषये कापि अस्ति तर्हि नूनं कथयतु।

शिक्षक :
एकदा राजकुमारः चम्पा च नदीतटे क्रीडतः आस्ताम्। तदैव राजकुमारः क्षुधापीडितः अभवत्। सः रोटिकां याचमानः रोदितवान!। सः न जानाति स्म यत् रोटिकायाः ग्रासमेकमपि नास्ति। चम्पा तं कथां श्रावयित्वा विनोदयामास। राजकुमारः बुभुक्षितः एव सुप्तवान्।

प्रियङ्का :
(सोत्साहेन पृच्छति) तदा किम् अभवत्?

शिक्षकः :
शृणवन्तु! सुप्तं अनुजं अङ्के नीत्वा चम्पा शयनाय मातुः समीपे आगत्य पितरं चिन्तामग्नम् अपश्यत् अपृच्छच्च भवान् किमर्थं चिन्तातुरोऽस्ति? तदा तेनोक्तम्-सुते। अस्माकं गृहे एकः अतिथिः आगतः, किं चित्तौड़महाराणागृहात् सः अनश्नन् एव गच्छेत् तदा चम्पा अवदत पितः! भवान् मा चिन्तयतु। ह्यः भवता दत्तम् रोटिकाद्वयं सुरक्षितम् अस्ति! मे बुभुक्षा नास्ति। भवान् रोटिकाद्वयम् तस्मै ददातु।

शब्दार्थ :
अहोरात्रं-रात्रि में-on night; चलन्ति-चलते हैं-walks; स्म-थे-were; स्वपन्ति-सोते थे-were slept; बहुधा-बहुत अधिक-very much; कृत्वा-करके-do; वदरीफलानि-बेर का फल-fruit of Bare; तृणरोटिकांश्च-और घास की रोटियाँ-and grass’s chapati; त्यक्त्वा -छोड़कर-After left; पलायनार्थ-भागने के लिए-for running; तस्मिन्-उस-That; प्रतापस्य-प्रताप के-famous; तयो-वे दोनों-these two; कापि-कोई भी-Anybody; वार्ता-वार्ता-Talking, conversation; नूनं-निश्चित ही-certainly;, कथयतु-कहिए-Say; च-और-and; तदेव-उसके अनुसार-According to him;अभवत्-हुआ-Happend; रोटिकां-रोटी को-for chapati; यत्-जो-who; तं-उसको-him; श्रावयित्वा-सुनकर-Listening; एव-भी-Also; मुप्तवान्-सो गया-he slept; नीत्वा-ले जाकर-for going; आगत्य-आकर-for coming; पितरं-माता-पिता-Mother and father; देखा-Seeing; अपश्यत्-देखा-seeing; भवान्-आप-you; तेनोक्तय-उसके कहे अनुसार-his according to saying; आगत-आया-came; गच्छेत्-जाने के लिए-for going; ह्य-बीता हुआ कल-Past; दत्तम्-देने के लिए-for giving; मे-मुझे-me: तस्मै-उसे-His; ददातु-दो-give.

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हिन्दी अर्थ :
शिक्षक-वे रात्रि में चलते थे, भूमि एवं शिलाओं पर सोते थे। अधिकतर उपवास करते थे। कभी-कभी बेर के फल एवं तृण आदि की रोटियाँ खाते थे। एक बार ऐसा समय आ गया जब शत्रुओं ने घास की रोटी खाता छोड़ भागने पर विवश कर दिया। उस समय प्रताप की पुत्री चम्पा ग्यारह वर्ष एवं बालक 4 वर्ष का था।

शालिनी :
गुरु जी! यदि उन दोनों के विषय में कोई कथा हो तो कहें।

शिक्षक :
एक बार राजकुमार एवं चम्पा नदी के तट पर क्रीड़ा कर रहे थे तभी राजकुमार भूख से पीड़ित हो गए और वह रोटियों की माँग करते हुए रोने लगे। उन्हें यह पता नहीं था कि रोटियों के लिए घास नहीं है। चम्पा ने उसे कहानियाँ सुनाकर मन बहलाया। राजकुमार भूखा-प्यासा ही सो गया।

प्रियंका :
(उत्साहपूर्वक) तब क्या हुआ?

शिक्षक :
सुनो! फिर चम्पा सोते हुए अनुज को गोद में लेकर माँ के पास आई तो पिता को चिंता में निमग्न देखा और पूछा-आप क्यों चिंतित हैं? उन्होंने (प्रताप) ने कहा-बेटी! हमारे घर में एक अतिथि आया है। क्या चित्तौड़गढ़ के महाराजा के घर से वह भूखा ही जाएगा? चम्पा बोली-पिताजी! आप चिंतित न हों। आपने कल जो दो रोटी मुझे दी थी, वे अब भी मसुरक्षित रखी हुई हैं। आप दोनों रोटी मेहमान को खिलाएँ। मुझे भूख नहीं है।

3. सर्वेश-ततः किम् अभवत्?

शिक्षक :
तदनन्तरं चम्पा पाषाणतले संरक्षितां तृणरोटिकाम् आनीत्य अतिथये ददाति अतिथिः उपभुज्य गतवान्। परन्तु स्वपरिवार प्रति आगतान् कष्टान् अवलोक्य उद्वेलितः महाराणा स्वप्रतिज्ञां परित्यज्य अकबरस्याधीनता विषये पत्रमलिखत्।

प्रभा :
तदनन्तरं किं जातम?

शिक्षक :
तस्यै बालायै नैक दिनान्तराले याः तृणरोटिकाः मिलन्ति स्म ताः अपि अनुजं भोजयति स्म। अनेन कारणेन क्षुत्क्षामा वीरबाला चम्पा अति दुर्बलतां प्राप्ता। एकदा दौर्बल्यात् सा मूर्छिता जाता। तदा महाराणाप्रतापः ताम् अङ्के उत्थाय रुदन्नवदत्-पुत्रि! इतोप्यधिकम! दुःखम् त्वाम् न दास्यामि। मया अकबरस्य कृते पत्रं लिखितम्। अर्धचेतनायाम् इदम् पितुर्वाक्यं श्रुत्वैव सा पितरमवदत् तात। भवान् किं कथयति, अस्मभ्यं जीवनरक्षणाय दासतां स्वीकरिष्यति भवान्। किं वयम् कदापि न मरिष्यामः? देशस्य अवमानं मा करोतु! देशस्य कुलस्य च गौरवरक्षार्थं लक्षवारमपि यदि वयम् प्राणानुत्सृजामः तदपि न्यूनमस्ति।

अतः मम आग्रहः एषः यत् भवान् कदापि अकबरस्य अधीनतां मा स्वीकरोतु। वीरबाला चम्पा एवं वदन्ती एव महाराणाङ्के चिरनिद्रां गता। ततः महाराणाप्रतापः पराधीनतायाः विचारम् अत्यजत्। इत्थं चम्पया स्वजीवनोत्सर्गेण न केवलं महाराणाप्रतापस्य विचारपरिवर्तनम् : अपितु मेवाड़गौरवस्य रक्षणमपि विहतम्।

शब्दार्थ :
अभवत्-हुआ-happen; तदनन्तरं-इसके बाद-After this; आनीत्यलाया-getting; ददाति-देता है-gives; गतवान्-गया-went; स्वपरिवारं-अपने परिवार को-for own family; आगतान्-आया-came; उद्वेलित-बहुत दुःखी-very sad; स्वप्रतिज्ञां-अपनी प्रतिज्ञा-our promise; तदनन्तरं-इसके बाद-After this; मिलन्ति-मिलते हैं-meet; स्म-थे-was; ता-उसके-his; अपि-भी-also; अनेन-इस कारण-That reason; अङ्के-गोद में-In lap; त्वाम्-तुम में-In you;मया-मेरे-my; कृते-के लिए-for; अर्धचेतनयाम्-अर्ध चेतन स्थिति में-half unconscious situation; श्रुत्वैव-सुनकर भी-to listening; भवान्-आप-you; कथयति-कहें-say; अस्मभ्यं-हमारे-our; दासतां-दासता-Slavery; वयम्-हम सब-we all; मरिष्याम-मरेंगे-will die; अवमान-अपमान-Defame; न्यूनमस्ति-थोड़ा-Little; मम-मेरा-my; आग्रह-निवेदन-Application; अधीनता-अधीनता-Under, Ruled; स्वीकरोतु-स्वीकार करो-to accept; अत्यजत्-छोड़ा-left; इत्थं-इस तरह-That type; रक्षणमपि-रक्षा में भी-In defence also; निहितम्-निहित-Constant.

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हिन्दी अर्थ :
सर्वेश-तब क्या हुआ?

शिक्षक :
तब चम्पा पत्थर के नीचे सुरक्षित रखी तृण की रोटियां निकाल कर अतिथि को प्रदान कर दी। अतिथि उसका उपभोग कर चले गए। परन्तु अपने परिवार पर आए कष्ट को देखकर राजा प्रताप का मन विचलित हो उठा और उन्होंने प्रतिज्ञा को छोड़कर अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए पत्र लिखा।

प्रभा :
फिर क्या हुआ?

शिक्षक :
उनके बच्चों को प्रतिदिन रोटी न मिलकर एक दिन के अंतराल पर रोटी खाने को मिलती थी। उसे भी उसका छोटा भाई खा जाता था इसलिए वह लड़की चम्पा बहुत दुबली हो गई। एक बार दुर्बलता के कारण वह बेहोश हो गई। तब महाराणा प्रताप उसे गोद में उठा रोते हुए बोले-पुत्री! अब मैं इससे अधिक कष्ट तुम्हें नहीं दूंगा, मैं अकबर को पत्र लिखूगा। अर्द्ध मूर्छितावस्था में इस तरह (हताश) पिता के वाक्यों को सुनकर बोली-पिताजी! यह आप क्या कह रहे हैं? हमारे जीवन की रक्षा के लिए आप गुलामी स्वीकार करेंगे? क्या हम कभी मरेंगे नहीं? पिताजी! देश का अपमान न करें देश और कुल के मान की रक्षा के लिए यदि हमें लाखों बार प्राण देने पड़ें तो भी वह थोड़ा है।

मेरी प्रार्थना है कि आप इस तरह कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार न करें…इस प्रकार कहती हुई वह वीर बाला चम्पा महाराणा प्रताप की गोद में ही प्राण त्याग दिए। तब महाराणा ने अधीनता स्वीकार करने की बात अपने मन से निकाल दी। इस प्रकार चम्पा के प्राणोत्सर्ग से न केवल महाराणा के विचारों में परिवर्तन हुआ, बल्कि मेवाड़ के गौरव की रक्षा भी हुई।

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