MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 7 मातृभाषा

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solution Chapter 7 मातृभाषा (भारतेन्दु)

मातृभाषा अभ्यास-प्रश्न

मातृभाषा लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उन्नति का आधार कवि ने मातृभाषा को क्यों बताया है?
उत्तर
उन्नति का आधार कवि ने मातृभाषा को बताया है। यह इसलिए कि इससे ही जीवन में सभी प्रकार की उन्नति हो सकती है।

प्रश्न 2.
कवि ने किस भाषा में बातचीत करने की सलाह दी है और क्यों?
उत्तर
कवि ने हिन्दी भाषा में बातचीत करने की सलाह दी है। यह इसलिए कि यह गुण और किसी भाषा में नहीं है। .

प्रश्न 3.
भाषा में क्या-क्या समाया हुआ है?
उत्तरभाषा में धर्म, युद्ध, विद्या, कला, गीत-संगीत, काव्य आदि से संबंधित ज्ञान की बातें समाई हुई हैं।

मातृभाषा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारतेन्दु जी ने मातृभाषा को सर्वोपरि क्यों कहा है?
उत्तर
भारतेन्दु जी ने मातृभाषा हिन्दी का महत्त्वांकन किया है। उन्होंने हिन्दी का महत्त्वांकन करते हुए उसे सर्वोपरि कहा है। यह इसलिए कि यही सभी प्रकार की उन्नति का मूल है। इसमें ही सभी प्रकार का ज्ञान समाया हुआ है।

प्रश्न 2.
सफल जीवन जीने के लिए हिन्दी भाषा को कवि ने अनिवार्य क्यों बताया है?
उत्तर
सफल जीवन जीने के लिए हिन्दी भाषा को कवि ने अनिवार्य बताया है। यह इसलिए कि इससे ही धर्म, युद्ध, ज्ञान, कला, गीत-संगीत और काव्य के ज्ञान प्राप्त किए जा सकते हैं।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों का भावार्य लिखिए

(क) अंग्रेजी पढ़के जदपि सब गुन होत प्रबीन।
पे निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
उत्तर
उपर्युक्त पंक्तियों के द्वारा कवि ने यह भावं प्रकट करना चाहा है कि अंग्रेजी भाषा का महत्त्व है। वह गुणों को प्रदान करती है, फिर भी अपनी भाषा अर्थात् हिन्दी भाषा के सामने वह छोटी है। वह हृदय की पीड़ा को मिटाने में असमर्थ है। भाव यह कि हमें अंग्रेजी भाषा की चमक-दमक में अपनी भाषा-बोली को नहीं भूलना चाहिए।

(ख) धर्म, जुद्ध, विया, कला, गीत, काव्य अरु ज्ञान।
सबके समझन जोग है, भाषा भांति समान।
उत्तर
उपर्युक्त पंक्तियों के द्वारा कवि ने यह भाव प्रकट करना चाहा कि हमारी हिन्दी भाषा से ही सभी प्रकार के ज्ञान संभव हैं, चाहे वह धर्म, युद्ध, कला का हो या काव्य और गीत-संगीत का हो। भाव यह है कि हिन्दी भाषा ही सभी भाषाओं से सबल, योग्य और ग्राह्य है।

प्रश्न 4.
‘बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल।’ इस पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल। इस पंक्ति में निहित भाव यह है कि हिन्दी भाषा ही सब प्रकार की हार्दिक पीड़ा को समाप्त करने में समर्थ है, अर्थात् हिन्दी भाषा ही जनसम्पर्क का बहुत बड़ा साधन है, जिससे परस्पर बातचीत करके अपने दुख-अभाव को बाँटा जा सकता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों की संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या लिखिए

(क) पढ़े संस्कृत जतन करि पंडित भे विख्यात।
पै निज भाषा ज्ञान बिन कहि न सकत इक बात।।
उत्तर
भारतेन्दु जी कह रहे हैं कि मेरे जीवन की एकमात्र धारणा और विचार है कि जीवन की सभी प्रकार की उन्नति की जड़ तो अपनी मातृभाषा हिन्दी ही है। इसकी ही उन्नति से जीवन में सभी प्रकार की उन्नति हो सकती है अन्यथा और कोई उपाय नहीं है। इसीलिए अपनी इस मातृभाषा हिन्दी के ज्ञान और उन्नति के बिना मेरे हृदय की पीड़ा किसी भी प्रकार से दूर नहीं हो सकती है।

(ख) विविध कला शिक्षा अमित ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से ले करहू भाषा मांहि प्रचार ॥
उत्तर
कवि भारतीयों को मातृ-भाषा के प्रचार एवं प्रसार हेत उद्बोधन करते हुए कहता है कि संसार में कला, शिक्षा और ज्ञान का क्षेत्र अपरिमित है। अतः, सभी
देशों से सम्पर्क अधिक-से-अधिक ग्रहण करके, उसे अपनी मातृभाषा के माध्यम से प्रचारित कीजिए। इस प्रकार सहज ही मातृ-भाषा की उन्नति हो सकेगी।

मातृभाषा भाषा-अध्ययन/काव्य-सौंदर्य

प्रश्न 1. कुछ क्षेत्र विशेष में ‘य’ का उच्चारण ‘ज’ के रूप में किया जाता है। जैसे-जतन, जोग। इसी तरह के कुछ शब्द पठित पाठ से चुर्ने तथा अर्व लिखें।
प्रश्न 2. ब्रज भाषा के अनेक शब्द जैसे-बिन, तवै, सुने आदि। ऐसे ही अन्य शब्दों की सूची पाठ के आधार पर बनाइए।
प्रश्न 3. सूल तथा देसन शब्दों में श के स्थान पर स का प्रयोग हुआ है। इसी तरह के कुछ शब्द छाँटकर उनके मानक रूप लिखिए।
उत्तर
1. शब्द – अर्थ
जदपि – फिर भी
सोग – चिन्ता
जुद्ध – लड़ाई।

2. ब्रजभाषा के अनेक शब्द : जैसे-अहै, बिनु, कौ, करि, नाहीं, लोक-रहु, माँहि, समझन आदि।
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मातृभाषा योग्यता-विस्तार

1. हिन्दी दिवस कब मनाया जाता है, क्यों मनाया जाता है? अपने शिक्षक से जानकारी प्राप्त कीजिए। एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी विषय पर आलेख तैयार कीजिए।
2. अपनी मातृभाषा के अन्य कवियों की कविताएँ संकलित कर हस्तलिखित पुस्तिका तैयार करें।
3. किसी समय विशेष में बना अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किए केवल हिन्दी में वार्तालाप करने का खेल खेलें। अंग्रेजी के आने पर अंक काटें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मातृभाषा परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपनी भाषा के ज्ञान के बिना क्या होता है?
उत्तर
अपनी भाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा मिटती नहीं है। वह बनी रहती है।

प्रश्न 2.
मूढ़ता का शोक कैसे मिटता है?
उत्तर
मूढ़ता का शोक परस्पर एक ही भाषा के व्यवहार और एक ही विचारधारा से मिटता है।

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प्रश्न 3.
मातृभाषा की उन्नति कैसे हो सकती है?
उत्तर
संसार में अनेक प्रकार हैं-शिक्षा, कला और ज्ञान के। इन सभी का सम्पर्क-संसार के देशों से करके अपनी मातृभाषा के माध्यम से प्रचारित करना चाहिए। इससे मातृभाषा की उन्नति हो सकती है।

मातृभाषा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अंग्रेजी भाषा से हिन्दी भाषा क्यों श्रेष्ठ है?
उत्तर
यद्यपि अंग्रेजी भाषा को पढ़ने से ज्ञान प्राप्त होता है। उससे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में विस्तार होता है। उससे अनेक प्रकार के ज्ञान में प्रवीणता हासिल होती है। फिर अपनी भाषा हिन्दी के ज्ञान के बिना सब कुछ अधूरा है। यही नहीं हर प्रकार की हीनता और कमी बनी ही रहती है।

प्रश्न 2.
मातृभाषा के प्रयोग का लाभ क्या है?
उत्तर
मातृभाषा के प्रयोग का लाभ यह है कि यदि केवल अपनी ही मातृभाषा में ज्ञान और विद्या की बातें की जाएँ, तो बड़ी आसानी से वह ज्ञान और विद्या प्राप्त हो जाती है। यह और किसी दूसरी भाषाओं के प्रयोग से किसी प्रकार न तो सुलभ है और न संभव ही।

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प्रश्न 3.
संस्कृत और हिन्दी भाषा में क्या अंतर है?
उत्तर
संस्कृत और हिंदी भाषा में बड़ा अंतर है। संस्कृत भाषा हिंदी भाषा की तुलना में कठिन है। इसलिए उसे समझना या उसका ज्ञान प्राप्त करना आसान नहीं है। बहुत प्रयत्न करके ही कोई उसमें पंडित हो सकता है। इसकी तरह हिंदी भाषा नहीं है। उसे समझना या उसका ज्ञान प्राप्त करना बड़ा ही आसान है। उसमें आसानी से कोई भी पंडित हो सकती है। इस प्रकार अंग्रेजी भाषा में अपने अनुभव (ज्ञान) को नहीं कहा जा सकता है, जबकि हिन्दी में इसे वही आसानी से कहा-सुना जा सकता है।

प्रश्न 4.
‘मातृभाषा’ कविता का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-विरचित प्रस्तुत कविता ‘मातृभाषा’ में मातृभाषा की उन्नति और उसके महत्त्व को बड़े ही सरल और स्पष्ट शब्दों में बतलाया गया है। कविवर भारतेन्दु जी का यह मानना है कि मातृभाषा को छोड़कर किसी और भाषा में कितना ही प्रवीण हो जाए, किन्तु मातृभाषा के ज्ञान के अभाव में उसके ज्ञान का क्षेत्र बिल्कुल अधूरा ही माना जाएगा। किसी के लिए भी धर्म, युद्ध, ज्ञान, कला और काव्य के क्षेत्र में ज्ञानार्जन तभी संभव है, जब उसे अपनी मातृभाषा का ज्ञान हो। देश के सुव्यवस्थित संचालन, समुन्नत करने में मातृभाषा का सर्वोच्च स्थान है। इस प्रकार कवि ने दूसरी भाषाओं का सम्मान करते हुए मातृभाषा को ही उन्नति के शिखर पर पहुँचाने वाला सबसे बड़ा माध्यम बताया है।

मातृभाषा कवि-परिचय

प्रश्न
कविवर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-युग-प्रवर्तक बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी के एक सम्पन्न परिवार में सन् 1850 में हुआ था। उनके पिता बाबू गोपालचन्द (उपनाम गिरिधर दास) भी ब्रजभाषा के विख्यात कवि थे। छोटी अवस्था में ही बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने बंगला, हिन्दी, संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। पाँच वर्ष की आयु में ही उन्होंने एक दोहा लिखकर सबको चौंका दिया था। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपनी लाखों की सम्पत्ति साहित्य-सेवा में लगा दी। उनकी मृत्यु सन् 1885 में हुई।

रचनाएँ-भारतेन्दु जी की निम्नलिखित रचनाएँ हैं

1. कविता संग्रह-‘प्रेम माधुरी’, ‘प्रेम फुलवारी’, ‘प्रेम-मालिका’, ‘प्रेम-प्रलाप’ आदि।

पत्रिकाएँ-‘कवि वचन सुधा’ तथा ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन।

नाटक-‘भारत-दुर्दशा’, ‘वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति’, ‘नीलदेवी’, ‘अंधेर नगरी’ आदि।

साहित्यिक महत्त्व-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सच्चे युग-चेत्ता कवि की मते जहाँ जन-जीवन के मर्म को परखा और काव्य-वाणी प्रदान की, वहाँ उसके उद्धार और कल्याण के लिए मार्ग-दर्शन भी दिया। हिन्दी-भाषा के प्रचार और काव्य में समन्वयवादी दृष्टि से उनके महत्त्व को कभी नहीं भुलाया जा सकता। युग और जीवन की आन्तरिक स्थिति के अनुरूप आपने जहाँ कविता के भावपक्ष को विस्तृत किया और उसमें जन-जीवन की ध्वनि को गुंजित किया। वहाँ कलापक्ष की दृष्टि से भी अनेक नूतन प्रयोग कर विविध काव्य-रूपों को गति प्रदान की। निःसन्देह वह सच्चे समाज और राष्ट्र के प्रतिनिधि कवि थे। उनकी वाणी में देश की वाणी गूंजती थी। वह हदय से सच्चे भक्त, स्वभाव से रसिक और साधना की दृष्टि से सफल, सजग एवं युग-प्रतिष्ठापक कवि-कलाकार थे। हिन्दी-साहित्य की प्रत्येक विधा को छूकर आपने उसे जीवन-शक्ति दी। अतः, उसके इतिहास में आपका नाम सदैव अविस्मरणीय रहेगा।

मातृभाषा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पदों की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौंदर्य एवं विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

शब्दार्थ-निज-अपनी। हिय-हृदय। सूल-पीड़ा।

प्रसंग-प्रस्तुत अंश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिंदी सामान्य’ संकलित तथा महाकवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा लिखित कविता ‘मातृभाषा की उन्नाते पर

व्याख्यान’ शीर्षक से है। इसमें भारतेन्दु जी ने हिन्दी भाषा-साहित्य के प्रति अपनी अपार श्रद्धा-आस्था को व्यक्त किया है।

व्याख्या-भारतेन्दु जी कह रहे हैं कि मेरे जीवन की एकमात्र धारणा और विचार है कि जीवन की सभी प्रकार की उन्नति की जड़ तो अपनी मातृभाषा हिन्दी ही है। इसकी ही उन्नति से जीवन में सभी प्रकार की उन्नति हो सकती है अन्यथा और कोई उपाय नहीं है। इसीलिए अपनी इस मातृभाषा हिन्दी के ज्ञान और उन्नति के बिना मेरे हृदय की पीड़ा किसी भी प्रकार से दूर नहीं हो सकती है।

विशेष-

  1. भाषा ब्रजभाषा है।
  2. राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति सच्चा प्रेम व्यक्त हुआ है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य ब्रजभाषा की शब्दावली से पुष्ट दोहा छंद में है। भावात्मक शैली के प्रयोग से काव्य की सुन्दरता और बढ़ गई है।
(ii) प्रस्तुत पद में हिन्दी भाषा को अपनी भाषा कहकर एक विशेष प्रकार से अपनापन का भाव व्यक्त किया है। इस भाव में सहजता और सरलता दोनों ही है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद में किसका उल्लेख हुआ है?
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में हिन्दी भाषा के महत्त्व का उल्लेख हुआ है।
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव है-हिन्दी भाषा की प्राण-प्रतिष्ठा करना।

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2. पढ़े संस्कृत जतन करि पंडित भे, विख्यात।
पै निजभाषा ज्ञान बिन कहि न सकत एक बात ॥

शब्दार्थ-जतन-प्रयल, कोशिश। विख्यात-प्रसिद्ध। निजभाषा-अपनी भाषा। बिन-बिना।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें भारतेन्दु जी ने अपनी भाषा के महत्त्व को बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या-संस्कृत को पूरे प्रयत्न करके पढ़ने पर कोई प्रसिद्ध पंडित तो हो सकता है, लेकिन अपनी भाषा हिन्दी के ज्ञान के बिना अपने हृदय की एक भी बात नहीं कही जा सकती है। दूसरे शब्दों में संस्कृत तो पढ़नी चाहिए लेकिन हिन्दी के प्रति लगाव उससे अधिक होना चाहिए, कम नहीं।

विशेष-

  1. ब्रजभाषा की शब्दावली है।
  2. यह अंश हिन्दी को महत्त्व देने वाला है।
  3. भाव रोचक है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) उपर्युक्त पद दोहा छंद में है और ब्रजभाषा की शब्दावली से पुष्ट हुआ है। संपूर्ण कथन अभिधाशक्ति में होने के कारण सहज रूप में है। भावात्मक शैली से यह अंश रोचक बन गया है।
(ii) उपर्युक्त पद की भाव-योजना सरल और सपाट है। भावों को बेझिझक प्रस्तुत किया गया है। इससे कहने का अभिप्राय अपने आप स्पष्ट हो जाता है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त अंश का मुख्य भाव क्या है?
(ii) उपर्युक्त अंश में किस ओर संकेत किया गया है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त अंश का मुख्य भाव हिन्दी का महत्त्वांकन करना है।
(ii) उपर्युक्त अंश में संस्कृत से बढ़कर हिन्दी के प्रति ध्यान देने की ओर संकेत किया गया है।

3. अंगरेजी पढ़िके जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।

शब्दार्थ-प्रवीन-गुणवान, पण्डित । निज-अपनी। हीन-मूर्ख।

प्रसंग-प्रस्तुत अंश महाकवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा लिखित ‘मातृभाषा की उन्नति पर व्याख्यान’ शीर्षक से है। इसमें भारतेन्दु जी ने हिन्दी-भाषा साहित्य के प्रति अपनी अपार श्रद्धा-आस्था को व्यक्त किया है।

व्याख्या-अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों के प्रति यहाँ कवि अपनी उदासीनता व्यक्त करता हुआ, मातृ-भाषा के महत्त्व की ओर संकेत करता हुआ कह रहा है कि यद्यपि यह ठीक है कि आज अनेक भारतीय अंग्रेजी-भाषा को पढ़कर ब्रिटिश साम्राज्य में बड़े गुणवान तथा पण्डित बन रहे हैं, तो भी भारत में रहने पर अपनी मातृभाषा के ज्ञान के अभाव में वे पण्डित और चतुर होने पर भी मूर्ख-के-मूर्ख ही बने रहते हैं क्योंकि दैनिक व्यवहार में मातृ-भाषा से ही काम लेना पड़ता है।

विशेष-

  1. भाषा ब्रजभाषा है।
  2. राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति सच्चा प्रेम व्यक्त हुआ है।
  3. दोहा छंद।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद ब्रजभाषा की शब्दावली और दोहा छंद में प्रस्तुत होकर भावात्मक शैली के द्वारा सहज रूप में है। शब्द-चयन बहुत सरल है। इसमें गति है तो प्रवाह भी है।
(ii) उपर्युक्त पद की भाव-योजना प्रभावशाली है। अंग्रेजी भाषा का विरोध चतुराई के साथ करते हुए अपनी भाषा हिन्दी के महत्त्व को स्वीकारने का सुझाव है। इस सुझाव को अप्रत्यक्ष रूप से देने की कुशलता सचमुच प्रशंसनीय है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में किसको किससे श्रेष्ठ कहा गया है?
(ii) निजभाषा से कवि का आशय किससे है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में हिन्दी भाषा को अंग्रेजी भाषा से श्रेष्ठ कहा गया है।
(ii) निजभाषा से कवि का आशय हिन्दी भाषा से है।

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4. इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।
तब बनत है सबने सों, मिटत मूढ़ता सोग।

शब्दार्च-इक-एक। मति-बुद्धि। मूढ़ता-मूखता।

प्रसंग-पूर्ववत।

व्याख्या-भारतेन्दु जी भाषा आदि के एकीकरण के सुपरिणाम की ओर संकेत करते हुए कह रहे हैं कि यदि घर में सभी एक ही भाषा का व्यवहार करें और एक ही विचारधारा के पोषक हों तो परस्पर फूट और दूरी नहीं हो सकती है। किसी में किसी प्रकार के भेदभाव अथवा तनाव उत्पन्न नहीं हो सकते। फिर तो मुर्खता का उपचार तो बड़ी ही आसानी से हो सकता है। इसलिए भाषा (हिन्दी भाषा) की एकता का परित्याग किसी भी दशा में नहीं छोड़ना चाहिए।

विशेष-

  1. भाषा ब्रजभाषा है।
  2. भाव हृदयस्पर्शी है।
  3. “मिटत मूढ़ता’ में अनुप्रास अलंकार है।
  4. दोहा छंद है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद भाषा और शैली की दृष्टि से आकर्षक है। ब्रजभाषा की शब्दावली दोहा छंद में प्रस्तुत होकर अनुप्रास अलंकार (मिटत मूढ़ता) से चमत्कृत और मोहक बन गई है।
(ii) उपर्युक्त पद का भाव सरल और स्पष्ट है। एकता के सूत्रों को सहजतापूर्वक प्रस्तुत करने का कवि का प्रयास सार्थक और सफल है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में किस तथ्य को महत्त्व दिया गया है?
(ii) उपर्युक्त पद में हिन्दी भाषा को किस रूप में देखा गया है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में एक ही भाव और एक ही भाषा के प्रयोग को महत्त्व दिया गया है।
(ii) उपर्युक्त पद में हिन्दी भाषा को एकता लाने वाली भाषा के रूप में देखा गया

5. और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए जो विद्या की बात।

शब्दार्थ-प्रगट-प्रकट। लखात-दिखाई पड़ता है।

प्रसंग-पूर्ववत्।

व्याख्या-परिवार में एक ही मातृभाषा के प्रयोग के लाभ पर दृष्टिपात करता हुआ कवि कह रहा है कि यदि एक ही अपनी मातृभाषा में ज्ञान और विद्या की बातें की जाएँ, तो सहज ही वह ज्ञान तथा विद्या ग्राह्य हो जाती है, अन्य या विविध भाषाओं के प्रयोग में यह सम्भव नहीं है।

विशेष

  1. भाषा प्रभावशाली है।
  2. हिन्दी भाषा का महत्त्व प्रतिपादित करने का सफल प्रयास किया गया है।
  3. भावात्मक शैली है।
  4. दोहा छंद है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य लिखिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य बताइए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद दोहा छंद में है। ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली है। भावात्मक शैली से अभिधा शब्द के द्वारा कथन को प्रभावशाली बनाने का प्रयास सराहनीय है।
(ii) प्रस्तुत पद की भाव-योजना सरल और सपाट है। हिन्दी भाषा के लाभ और उसके समुचित उपयोग के कथन को स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह अंश सार्थक रूप में सिद्ध हुआ है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद में किसको किससे क्या कहा गया है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद का भाव सरल और सुस्पष्ट है। इससे हिन्दी भाषा के लाभ को बतलाया गया है।
(ii) प्रस्तुत पद में हिन्दी भाषा को अंग्रेजी और अन्य भाषाओं से श्रेष्ठ और लाभदायक कहा गया है।

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6. तेहि सुनि पावें लाभ सब, बात सुने जो कोय।
यह गुन भाषा और महँ, कबहुँ नाहीं होय॥

शब्दार्च-कोय-कोई। नाहीं-नहीं। होय-हो सकता है।

प्रसंग-पूर्ववत्।

व्याख्या-मातृ-भाषा के व्यापक प्रभाव की व्यंजना करता हुआ कवि कहता है कि मातृभाषा में ज्ञान और विद्या का प्रचार अधिक होता है, इस लाभ को सुनकर सभी स्वीकार करेंगे। निदान, मातृभाषा के अतिरिक्त यह गुण किसी और भाषा में कभी नहीं हो सकता है।

विशेष-

  1. ‘महँ कबहूँ नाहीं’ में ‘ह’ वर्ण की क्रमशः आवृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार है।
  2. भाषा ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली से पुष्ट है।
  3. हिन्दी भाषा के प्रति बड़ी आत्मीयता दिखाई गई है।
  4. दोहा छंद है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद के भाक्-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद का काव्य-सौंदर्य सरल और सहज ब्रजभाषा को भावात्मक शैली से पुष्ट हुआ दिखाई दे रहा है। दोहा छंद में अनप्रास अलंकार के चमत्कार को लाने का कवि-प्रयास काबिलेतारीफ है।
(ii) उपर्युक्त पद का भाव-सौंदर्य अपनी सरलता और प्रवाहमयता’के फलस्वरूप आकर्षक कहा जा सकता है। यह इसलिए भी कि इसके लिए शब्द-प्रयोग भी अधिक सहज रूप में आया हुआ है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में मातृभाषा की क्या विशेषता बतलाई गई है?
(ii) उपर्युक्त पद में मातृभाषा के प्रति कवि की भावना कैसी है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में मातृभाषा की व्यापकता, ज्ञान प्रदायिनी और विद्या प्रचारिणी जैसी विशेषताएं बतलाई गई हैं।
(ii) उपर्युक्त पद में मातृभाषा के प्रति कवि की भावना अपनत्व और अपनापन की है।

7. विविध कला शिक्षा, अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन सौं ले करहु, भाषा माँहि प्रचार ॥

शब्दार्च-विविध-अपार, अपरिमित। माहि-माध्यम से। देशन-देशों में।

प्रसंग-पूर्ववत्। इसमें भारतेन्दु जी ने मातृभाषा हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का उद्बोधन किया है।

व्याख्या-कवि भारतीयों को मातृ-भाषा के प्रचार एवं प्रसार हेत उद्बोधन करते हुए कहता है कि संसार में कला, शिक्षा और ज्ञान का क्षेत्र अपरिमित है। अतः, सभी
देशों से सम्पर्क अधिक-से-अधिक ग्रहण करके, उसे अपनी मातृभाषा के माध्यम से प्रचारित कीजिए। इस प्रकार सहज ही मातृ-भाषा की उन्नति हो सकेगी।

विशेष-

  1. भाव हृदयस्पर्शी है।।
  2. सम्पूर्ण अंश प्रेरणादायक है।
  3. ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली है।
  4. शैली सरस और सरल है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य लिखिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में स्वभावोक्ति अलंकार को ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली से चमत्कृत करने का प्रयास अनूठा है। दोहा छंद और बोधगम्यता से यह पद सुन्दर बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद की भावधारा सरल है, लेकिन उसमें प्रवाह और गति है। इससे यह पद हृदयस्पर्शी बन गया है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद में मातृभाषा के लिए भारतीयों को क्या सझाव दिया गया है?
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद में मातृभाषा के लिए भारतीयों को सभी देशों से सम्पर्क करके प्रचार-प्रसार करने के सुझाव दिए गए हैं।
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव मातृभाषा के विकास के लिए सुझाव देना है।

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8. धर्म, जुद्ध, विद्या, कला, गीत, काव्य अरू
सबके समझन जोग है, भाषा माँहि समा।

शब्दार्थ-अरु-और । जुद्ध-युद्ध । समझन-समझने। जोग-योग्य।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने हिन्दी भाषा को अद्भुत और सबसे श्रेष्ठ बतलाने का प्रयास करते हुए कहा है कि

व्याख्या-धर्म, युद्ध, विद्या, कला, गीत-संगीत, काव्य आदि सभी के लिए समझने योग्य हैं। लेकिन यह तभी संभव है, जब अपनी भाषा हिन्दी में हो। दूसरी बात यह भी है कि हमारी हिन्दी भाषा में धर्म, युद्ध, विद्या, कला, गीत-संगीत, कविता आदि उच्च संस्कारों को प्रदान करने वाले सभी आधार और साधन मौजूद हैं।

विशेष-

  1. भाषा ब्रजभाषा की सरल शब्दावली से प्रस्तुत हुई है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. अभिधा शब्द-शक्ति है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य को लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में हिन्दी भाषा की सम्पन्नता को आकर्षक बनाने के लिए काव्य-स्वरूप के अपेक्षित सौंदर्य-विधान को प्रयुक्त किया गया है। फलस्वरूप इस पद में प्रयुक्त हुआ अनुप्रास अलंकार (सबके समझन) ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली के द्वारा आकर्षक रूप में है।
(ii) उपर्युक्त पद की भाव-योजना रोचक और हृदयस्पर्शी रूप में है। हिन्दी भाषा की विविधता का बयान बड़ी ही विश्वसनीयता के साथ प्रकट किया गया है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में हिन्दी भाषा की किस विशेषता पर प्रकाश डाला गया है?
(ii) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में हिन्दी भाषा की विविधता पर प्रकाश डाला गया है।
(ii) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव है-हिन्दी भाषा को प्रेरक रूप में प्रस्तुत करना।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 6 टेलीफोन

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 6 टेलीफोन (हरिशंकर परसाई)

टेलीफोन अभ्यास-प्रश्न

टेलीफोन लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हरिशंकर परसाई के अनुसार टेलीफोन के आविष्कार के क्या कारण हैं?
उत्तर
हरिशंकर परसाई के अनुसार टेलीफोन के आविष्कार के कारण हैं कि पहले आदमी की सूरत देखे बिना उससे बातचीत करने की कला की खोज नहीं हुई थी।

प्रश्न 2.
प्रतिष्ठित व्यक्ति फोन उठाने के लिए नौकर क्यों रखते हैं?
उत्तर
प्रतिष्ठित व्यक्ति फोन उठाने के लिए नौकर रखते हैं। यह इसलिए कि वे झूठ बोल सकें। वे यह समझ जाएँ कि किससे अपना स्वार्थ पूरा होगा और किससे नहीं।

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प्रश्न 3.
व्यंग्यकार ने टेलीफोन के क्या-क्या लाभ बताए हैं? फोन के रिसीवर में दो भाग कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर
व्यंग्यकार ने टेलीफोन के अनेक लाभ बताए हैं, जैसे-फोन पर सच और झूठ दोनों ही अधिक सच्चाई से बोले जा सकते हैं। टेलीफोन से संसार में सत्य-भाषण लगभग 67 प्रतिशत बढ़ा है। इससे मनुष्य जाति इतनी वीर बनी है कि जिसकी छाया से भी डर लगता था, उसे गाली दी जा सकती है। उसकी पकड़ में आने से पहले फरार हुआ जा सकता है। फोन के रिसवीर के दो भाग होते हैं-एक कान पर लगाकर सुनने के लिए और दूसरा बोलने के लिए।

प्रश्न 4.
लिफाफे में कोरा कागज भेजकर पत्र-व्यवहार किस प्रकार के लोगों को किया जाता है?
उत्तर
लिफाफे में कोरा कागज भेजकर पत्र-व्यवहार उन लोगों को किया जाता है जिनसे बोल-चाल बन्द हो गई है।

टेलीफोन दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
फोन आने पर पहले अपना नाम नहीं बताने के लिए लेखक ने क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर
फोन आने पर पहले अपना नाम नहीं बताने के लिए लेखक ने यह तर्क दिए हैं कि इसमें खतरा है। वह यह कि दूसरे सिरे पर आपसे उधारी के पैसे माँगने वाला हआ, तो आप पकड़ में आ जाएंगे।

प्रश्न 2.
‘मनुष्य जाति के मुँह तीन आकारों के होते हैं’ इसका क्या आशय है?
उत्तर
‘मनुष्य जाति के मुँह तीन आकारों के होते हैं। इसका यह आशय है कि मनुष्य किस मुँह से कब क्या कह दे, कुछ कहा नहीं जा सकता है।

प्रश्न 3.
‘फोन से मुफ्त बात करने में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘फोन से मुफ्त बात करने में निहित व्यंग्य यह है कि मुफ्त फोन करने वाले बड़े ही चतुर और चापलूस होते हैं। वे मुफ्त में फोन करने के अनेक प्रकार के बहाने बनाने की कला में माहिर होते हैं।

प्रश्न 4.
‘वर्तमान समय में आधुनिक सुविधाओं का दुरुपयोग हो रहा है। इस विषय पर अपने विचार दीजिए।
उत्तर
वर्तमान समय में आधुनिक सुविधाओं का दुरुपयोग हो रहा है। यह इसलिए कि लोग वर्तमान सुख-सुविधाओं के महत्त्व नहीं समझे हैं। सुविधाओं की मौजूदगी को इसलिए अनदेखा कर रहे हैं।

टेलीफोन भाषा-अध्ययन

(क) निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों को अलग-अलग छाँटकर लिखिए
कान, टेलीफोन, हैलो, फोकट, सूरत, ऊब, फिट, कॉल, नफरत, जवाब, गृह, काम, सत्य, मुख, मुँह, हफ्ता , रेट।
तत्सम – …………….
तद्भ व – ……………
देशज – …………….
विदेशी – ……………

(ख) निम्नलिखित अनेकार्थी शब्दों के अलग-अलग अर्थ लिखते हुए दो-दो वाक्य बनाइए।
अर्थ, कल, कर, पत्र, वार।
उत्तर
(क) तत्सम शब्द-गृह, सत्य, मुख।
तद्भव शब्द-कान, काम, मुँह।
देशज शब्द-सूरत, फोकट, ऊब।
विदेशी शब्द-टेलीफोन, हैलो, फिट, कॉल, नफरत, जवाब, हफ्ता, रेट ।

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 6 टेलीफोन img 1
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 6 टेलीफोन img 2

टेलीफोन योग्यता-विस्तार

(क) टेलीफोन का आविष्कार किसने किया, कब किया लिखिए तथा विज्ञान के अन्य आविष्कारों और उनकी खोज करने वाले वैज्ञानिकों की सूची तैयार कीजिए।
(ख) टेलीफोन के आज के विविध उपयोगों को ध्यान में रखकर एक निबंध लिखिए।
(ग) चलित टेलीफोन के पक्ष-विपक्ष में अपने विचार लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्राएँ अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

टेलीफोन परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक ने क्या देखा?
उत्तर
वैज्ञानिक ने यह देखा कि दुनिया के आधे लोग बाकी आधे लोगों की सूरत से नफरत करते हैं, लेकिन उनसे जरूर बात करना चाहते हैं।

प्रश्न 2.
हमारे पास फोन है, यह दिखाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर
हमारे पास फोन है, यह दिखाने के लिए हमें घंटी बजते ही चोंगा नहीं उठाना चाहिए। जब घंटी थक जाए और आराम करने लगे, तब फोन उठाना चाहिए।

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प्रश्न 3.
जिसे रिंग किया जाए, उसे पहले अपना नाम बताने में क्या खतरा है?
उत्तर
जिसे रिंग किया जाए, उसे पहले अपना नाम बताने में खतरा है। वह यह कि दूसरे सिरे पर आपसे उधारी के पैसे माँगने वाला हआ, तो आप पकड़ में आ जाएँगे।

प्रश्न 4.
कॉल रेट न होने का लोग क्या फायदे उठाते हैं?
उत्तर
कॉल रेट न होने का लोग बहुत फायदा उठाते हैं। वे खूब बातें करते हैं। फिजूल की बातें करते हैं। खूब डींगें मारते हैं। इस तरह वे कॉल रेट का अनुचित फायदे ‘उठाते हैं।

टेलीफोन दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
टेलीफोन की खोज किस प्रकार हुई?
उत्तर
टेलीफोन की खोज करने वाले वैज्ञानिक ने दो तार लिये। उसटे दोनों सिरों पर एक-एक चोंगा लगा दिया। एक को उसने अपनी प्रयोगशाला में रखा दूसरे को अपने दुश्मन के घर में। फिर वह कई सालों तक अपने चोंगे में कहता रहा,’तुम बदमाश हो। उधर से कोई उत्तर नहीं आता था। लेकिन इससे वह निराश नहीं हुआ। एक दिन उधर से क्रोध भरा उत्तर आया, “तुम भी बदमाश हो।” इस पर वह वैज्ञानिक खुशी से उछल पड़ा। इस तरह टेलीफोन का आविष्कार हुआ।

प्रश्न 2.
मुँहवाला चोंगा कैसा होता है?
उत्तर
मुँहवाला चोंगा कानवाले चोंगे से अलग प्रकार का होता है। यह सबके मुँह पर ठीक से फिट नहीं होता है। इसलिए अलग-अलग आकार वाले मुँह होते हैं-चोंगे से बड़ा मुँह, चोंगे से छोटा मुँह और चोंगे के बराबर मुँह । इन तीनों प्रकार के लिए इसे प्रयोग में लाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं। अगर मैंह चोंगे से बड़ा है, तो चोंगे को मुँह में घुसेड़ देना चाहिए। अगर दोनों बराबर हैं तो, चोंगे को मुँह पर बिल्कुल फिट कर देना चाहिए। चोंगे के बराबर के मुँह को चोंगा कहा जा सकता है।

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प्रश्न 3.
‘टेलीफोन’ निबंध का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री हरिशंकर परसाई लिखित ‘टेलीफोन’ निबंध एक व्यंग्यात्मक निबंध है। परसाई जी ने इस निबंध में टेलीफोन के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देना ही पर्याप्त नहीं समझा है, अपितु मनुष्य की कमजोरियों पर हँसते-हँसते फायदे की दो-तीन बातें सूचित कर देना भी अपना मकसद समझा है। इस प्रकार फोन के निरर्थक उपयोग के प्रकार बताकर अंत में फोन से क्या लाभ और हानियाँ हैं, मानवीय जीवन में परसाई जी ने इसे चुटीले अंदाज में प्रस्तुत किया है।

टेलीफोन लेखक-परिचय

प्रश्न
श्री हरिशंकर परसाई का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-हरिशंकर परसाई का जन्म जिला होशंगाबाद के जामानी गाँव में 22 अगस्त, 1922 ई. में हुआ था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया था। कुछ वर्ष उन्होंने अध्यापन-कार्य किया। सन् 1947 में नौकरी छोड़कर उन्होंने स्वतन्त्र लेखन को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने ‘वसुधा’ नामक मासिक पत्रिका निकाली थी। इसे वे घाटे के बावजूद कई वर्ष तक चलाते रहे। कई वर्षों से निरंतर वे नियमित रूप से व्यंग्य रचनाएँ लिखने में लगे रहे।

व्यंग्य लेखक-परसाई जी मुख्यतः व्यंग्य लेखक हैं। उनका व्यंग्य लेखन मनोरंजन के लिए नहीं है। वे अपने व्यंग्य के द्वारा बार-बार पाठकों का ध्यान व्यक्ति और समाज की कमजोरियों और विसंगतियों की ओर दिलाते हैं और दूर करने के लिए प्रेरित करते हैं। इन्हीं बुराइयों और कमजोरियों के कारण हमारा जीवन दूभर हो रहा है। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार और शोषण पर भी करारा व्यंग्य किया है।

रचनाएँ-परसाई जी ने दो दर्जन के लगभग पुस्तकों की रचना की है। इन रचनाओं में प्रमुख हँसते हैं, रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे कहानी-संग्रह हैं। रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज उनके उपन्यास हैं और तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत पगडंडियों का जमाना, सदाचार की ताबीज शिकायत मुझे भी है और अन्त में उनके निबंध संग्रह हैं। वैष्णव की फिसलन, तिरछी रेखाएँ, ठिठुरता हुआ गणतन्त्र, विकलांग श्रद्धा का दौर उनके व्यंग्य निबंध-संग्रह हैं। सन् 1955 में उनका निधन हो गया था।

महत्त्व-हरिशंकर परसाई का हास्य-व्यंग्यकारों में प्रतिष्ठित स्थान है। वे हिन्दी व्यंग्य विधा के समर्थ रचनाकार हैं। उन्होंने व्यंग्य के माध्यम से अपनी समूची समकालीनता को खंगालते हुए पाठकों के मस्तिष्क को जगाने का अद्भुत प्रयास किया है।

टेलीफोन व्यंग्य का सारांश

प्रश्न
श्री हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्य ‘टेलीफोन’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री हरिशंकर परसाई लिखित ‘टेलीफोन’ हास्य-व्यंग्यात्मक निबंध है। इस निबंध का सारांश इस प्रकार है किसी वैज्ञानिक ने एक ऐसी कला की खोज की, जिससे एक आदमी दूसरे आदमी को बिना देखे बातचीत कर सकता है। इसके लिए उसने एक तार के दोनों सिरों पर एक-एक चोंगा लगा दिया। फिर उसने एक चोंगे को अपनी प्रयोगशाला और दूसरे को अपने शत्रु के घर में लगाकर वर्षों कहता रहा कि वह बदमाश है। लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आता। एक दिन उसके ऐसा कहने पर दूसरी ओर से जवाब आया कि वह भी बदमाश है। यह सुनकर उस वैज्ञानिक के खुशी का ठिकाना नहीं रहा। टेलीफोन की इस खोज से सच बोलने की मनुष्य जाति की नैतिकता का स्तर करीब-करीब 67 प्रतिशत बढ़ गया है।

इससे किसी को गाली देने की वीरता इतना अधिक बढ़ गई है कि उसे सुनकर पिटाई करने आए हुओं से भागकर बचा जा सकता है। भारत के पिछड़ेपन का एक यह भी कारण है कि यहाँ के लोग फोन पर बात करना तो नहीं जानते हैं, लेकिन देर तक घंटी बजने के बाद ही चोंगा उठाते हैं, ताकि लोगबाग यह जान जाएँ कि उनके पास फोन आते हैं। चोंगा उठाकर बहुत जोर से है लो’ अलग-अलग कहना चाहिए। चोंगा के दो भाग होते हैं-कान पर लगाकर सुनने के लिए और मुँह पर रखकर बोलने के लिए। कान पर लगाकर सुनने के लिए चोंगा तो कान पर ठीक से फिट हो जाता है, जबकि मुँह पर रखकर बोलने के लिए चोंगे का आकार छोटे-बड़े मुँह के आकार के कारण सब पर ठीक फिट नहीं हो पाता है। अनफिट होने की दशा में चोंगे में मुँह डालकर जोर से बोलना चाहिए।

फोन की घंटी बजने पर सोच-विचार कर फोन उठाना चाहिए। किसी प्रकार की झंझट की आशंका के कारण व्यवसायी-नेता स्वयं फोन नहीं उठाते हैं। वे अपने नौकरों से फोन उठवाकर पूछवाते हैं कि किसका फोन है। जिसे कुछ देना, उसे वे कहलवा देते हैं कि घर पर नहीं हैं, लेकिन जिससे कुछ लेना है, उसके लिए कहलवा देते हैं कि घर पर हैं। चतुर और सयाने लोग अपना नाम नहीं बताते हैं, वे दूसरे के नाम और पता पूछते हैं। ऐसे लोग काल रेट वाले फोन नहीं करते हैं। वे तो मुफ्त वाले फोन करते हैं। इसके लिए वे किसी अपने परिचित के पास पहुँचकर कहते हैं-“घर से निकलने पर अमुक को जरूरी फोन करना है, याद आया।

फोन करने के बाद वे अपने उस परिचित को काल रेट का पैसा देने के लिए हाथ बढ़ाते हैं, तो बाइज़्जत उनसे पैसे जेब में रखने के लिए कहता है। इस प्रकार मुक्त फोन कई बार किए जा सकते हैं। मफ्त के फोन का मजा कुछ और ही होता है। जब चाहे, जो चाहे बातें की जा सकती हैं-आँखें बन्दकर, लेटकर, टॉगें फैलाकर, उठकर, बैठकर आदि। इस प्रकार मुफ्त फोन से मजा-ही-मजा है। खासतौर से युवा पीढ़ी को इससे बड़ा और क्या मजा मिल सकता है।

टेलीफोन संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या अर्थग्रहण व विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

1. वैज्ञानिक अनुसंधान के सबसे महान क्षण में भी पुलिस को नहीं भूलता, यह मानव स्वतन्त्रता के लिए शुभ लक्षण है। इस आविष्कार से मानवीय सम्बन्धों में क्रान्ति हो गई है। अब दुश्मन से बोलचाल बन्द करने की आवश्यकता नहीं रह गई। उसकी सूरत बिना देखे उससे बात की जा सकती है। यह वैज्ञानिक उतना ही महान हुआ, जितना वह विचारक, जिसने यह सूत्र बताया था कि किसी से बोलचाल बंद हो तो उससे लिफाफे में कोरा कागज भेजकर पत्र व्यवहार किया जा सकता है।

शब्दार्थ-शुभ लक्षण-अच्छा संकेत । आविष्कार-खोज। मानवीय-मनुष्य के।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती हिंदी सामान्य’ में संकलित तथा श्री हरिशंकर परसाई लिखित ‘टेलीफोन’ व्यंग्य निबंध से है। इसमें लेखक ने टेलीफोन के आविष्कार के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा है कि

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व्याख्या-टेलीफोन की खोज करने वाला वैज्ञानिक अपने खुशी को खुलेआम प्रकट करना चाहता था, लेकिन उसे पुलिस के अनुचित और अमानवीय कदम की याद आ गई। उसे आशंका हुई कि उसके प्रति कहीं वह अत्याचार न कर बैठे। इस प्रकार वह इस सुखद समय में भी मानवीय स्वतन्त्रता को भूल गया। टेलीफोन के उस आविष्कार (खोज) से मानवीय सम्बन्धों और चरित्रों में बहुत बड़ा उलट-फेर हुआ है। उस खोज से मित्र से ही नहीं, अपितु दुश्मन से भी आराम से बातें करने में एक अद्भुत अनुभव होता है। उस खोज के कारण ही वह वैज्ञानिक प्रसिद्ध हो गया। एक महान वैज्ञानिक के ही रूप में नहीं, अपितु एक महान विचारक के भी रूप में उसे बहुत बड़ी लोकप्रियता प्राप्त हुई। उस वैज्ञानिक और विचारक ने ही लोगों को यह सुझाव दिया था कि जब किसी से बातचीत बन्द हो जाए, तो उससे निफाफे में कोरा कागज भेजकर उससे बातचीत शुरू की जा सकती है।

विशेष-

  1. व्यंग्यात्मक शैली है।
  2. पुलिस-दमन पर सीधा व्यंग्य-प्रहार है।
  3. भाषा में गति और ओज है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) वैज्ञानिक अनुसंधान के महान क्षण में भी पुलिस को क्यों नहीं भलता?
(ii) किस आविष्कार से मानवीय संबंधों में क्रान्ति हुई?
उत्तर
(i) वैज्ञानिक अनुसंधान के महान क्षण में भी पुलिस को नहीं भूलता है। यह इसलिए कि पुलिस किसी के प्रति भी अति अमानवीय और निरंकुश कदम उठाकर उसकी स्वतंत्रता पर रोक लगा देती है।
(ii) टेलीफोन के आविष्कार से मानवीय-संबंधों में क्रान्ति आ गई।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) टेलीफोन से पहले संपर्क का माध्यम क्या था?
(ii) टेलीफोन से क्या सुविधा है?
उत्तर
(i) टेलीफोन से पहले संपर्क का माध्यम पत्र-व्यवहार था।
(ii) टेलीफोन से दुश्मन से बन्द हुई बोलचाल को शुरू किया जा सकता है।

2. टेलीफोन के आविष्कार से मनुष्य जाति का नैतिक स्तर उठ गया। फोन पर सच और झूठ दोनों अधिक सफाई से बोले जा सकते हैं। आदमी आमने-सामने तो बेखटके झूठ बोल जाता है, पर सच बोलने में झेंपता है। टेलीफोन के कारण संसार में सत्य भाषण लगभग 67 प्रतिशत बढ़ा है। इससे मनुष्य जाति अधिक वीर भी बनी है। जिसकी छाया से भी डर लगता था, उसी आदमी को फोन पर गाली भी दी जा सकती है और जब तक वह पता लगाकर आपको मारने आए, आप भागकर बच सकते हैं।

शब्दार्थ-बेखटके-तुरन्त। झेंपता-संकोच करता।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें लेखक ने टेलीफोन के महत्त्व को बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या-टेलीफोन की खोज ने मनुष्य जाति के जीवन-स्तर को अधिक नैतिक और ऊँचा बनाने में अहम भूमिका निभाई है। टेलीफोन से यह एक बहुत बड़ी सुविधा हुई है कि इससे किसी को अपनी इच्छानुसार कुछ भी झूठ-सच या मनगढ़त कोई बात सुनाई जा सकती है। इस पर कोई विश्वास करे या न करे, यह दूसरी बात है। झूठ बोलने में आदमी किसी के सामने संकोच नहीं करता है, लेकिन सच बोलने के लिए कई बार सोचता है और संकोच करता है। टेलीफोन ने सच्ची बात करने के वातावरण को बहुत बढ़ा दिया है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य जाति ने बहुत बड़ी वीरता दिखाई है। उसकी वीरता सचमुच में काबिलेतारीफ है। इस प्रकार यह सच्चाई सामने आई है कि जिसके नाम, काम और रूप को याद करने से भय होता था, उसे फोन पर ललकारा जा सकता है। और उसे कुछ भी अपशब्द कहकर उसे नीचा दिखाया जा सकता है। यह साहसी कदम उसके पास आने से पहले उठकर कहीं भी लापता होकर उसके क्रोध का शिकार होने से बचा जा सकता है।

विशेष-

  1. भाषा में प्रवाह है।
  2. शैली व्यंग्यात्मक है।
  3. व्यंजना शब्द-शक्ति है।
  4. फोन का महत्त्वांकन किया गया है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) टेलीफोन के आविष्कार से मनुष्य जाति पर क्या प्रभाव पड़ा है?
(ii) आदमी सच बोलने में क्यों झेंपता है?
उत्तर
(i) टेलीफोन के आविष्कार से मनुष्य जाति की नैतिकता पूर्वापेक्षा बढ़ गई
(ii) आदमी सच बोलने में झेंपता है। यह इसलिए कि वह स्वयं सच से कतरातां है। फिर उसे दूसरों के सामने कहने में और कठिनाई व आशंका होती है।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) टेलीफोन से क्या-क्या लाभ हैं?
(ii) उपर्युक्त गयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) टेलीफोन से कई लाभ हैं, जैसे-सच बोलने का विस्तार, मनुष्य जाति की वीरता, अपने विरोधियों को नीचा दिखाने की सुविधा आदि।
(ii) उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव है-टेलीफोन की सुविधा और लाभ को बतलाना।

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MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.4

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.4

Question 1.
Visualise 3.765 on the number line, using successive magnification.
Solution:
Visualizing 3.765
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.4 img-1

Question 2.
Visualise 4.26 on the number line, up to 4 decimal places.
Solution:
Visualising 4.26 = 4.2626
= 4.263
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.4 img-2

Rationalisation of the Denominator of an irrational number having two terms in the Denominator:
To rationalise the denominator of an irrational number having two terms in the denominator, multiply the numerator and denominator of the number by the conjugate of its denominator.

Example 1.
If a and b are rational numbers and \(\frac { 3+\sqrt { 7 } }{ 3-\sqrt { 7 } } \) = a + b√7 find value of a and b.
Solution:
We have \(\frac { 3+\sqrt { 7 } }{ 3-\sqrt { 7 } } \) = a + b√7
Multiply denominator and numerator by 3 + √7 on LHS, then we have
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.4 img-3
On comparing LHS and RHS, we get
a = 8, b = 3

Example 2.
Determine a and b if \(\frac { 5+\sqrt { 3 } }{ 7-4\sqrt { 3 } } \) = 94a + 3 √3b
Multiply numerator and denominator by 7 + 4√3 on LHS, then we have
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.4 img-4
On comparing LHS and RHS, we get
a = \(\frac{1}{2}\) and b = 9.

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Example 3.
Determine a and 6 if \(\frac { 7+\sqrt { 5 } }{ 7-\sqrt { 5 } } \) – \(\frac { 7-\sqrt { 5 } }{ 7+\sqrt { 5 } } \) = a + 7√5b.
Solution:
We have
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.4 img-5
On comparing LHS and RHS, we get
a = 0 and b = \(\frac{1}{11}\).

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 5 ऋतु वर्णन

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 5 ऋतु वर्णन (पद्माकर)

ऋतु वर्णन अभ्यास-प्रश्न

ऋतु वर्णन लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बसंत की छटा कहाँ-कहाँ दिखाई दे रही है?
उत्तर
वसंत की छटा सब जगह दिखाई दे रही है।

प्रश्न 2.
एक ऋतु विशेष को ऋतुराज क्यों कहा गया है?
उत्तर
एक ऋतु विशेष को ऋतुराज कहा गया है। यह इसलिए कि उसका स्वरूप और प्रभाव अन्य ऋतुओं से हर प्रकार बढ़कर आकर्षक, सरस और सहज है।

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प्रश्न 3.
पद्माकर ने शरद ऋतु के सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर
पद्माकर ने शरद ऋतु के सौंदर्य का वर्णन बड़े ही भाववर्द्धक रूप में किया है। कवि ने शरद ऋतु के वर्णन को प्रभावशाली बनाने के लिए उसके विविध रूपों को प्रस्तुत किया है।

ऋतु वर्णन दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘पद्माकर प्रेम और उल्लास के कुशल कवि हैं।’ इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पद्माकर रीतिकाल के सुप्रसिद्ध कवि हैं। उनकी ‘जगद्विनोद’ रचना को प्रेम और उल्लास का सागर माना जाता है। इनकी कविता रसिक लोगों का कंठाहार है। भावुकता, तन्मयता और चमत्कार उनकी कविताओं में एक साथ दिखाई देते हैं।

प्रश्न 2.
पद्माकर का वसंत वर्णन अद्वितीय है, कारण लिखिए।
उत्तर
पद्माकर का वसंत वर्णन अद्वितीय है। उसकी अद्वितीय होने का कारण यह है कि उसमें व्यापकता, सरसता और कल्पना की सुन्दर त्रिवेणी प्रवाहित हुई है। लयात्मकता, संगीतात्मकता और क्रमबद्धता का त्रिवेग है, जो निरन्तरता से अधिक प्रभावशाली बन गया है। पद्माकर के वसंत वर्णन के अद्वितीय होने का तीसरा कारण है-हमारे परिवेश को न केवल प्रभावित करने का है, अपितु उसे स्वस्थ और सम्पन्न बनाने का भी है।

प्रश्न 3.
पद्माकर के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
पद्माकर के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. पद्माकर का काव्य अत्यंत सरस और कौशलपूर्ण है।
  2. उनके काव्य में मधुर-मधुर कल्पनाएँ हैं जो स्वाभाविक और हाव-भावपूर्ण हैं।
  3. उनके काव्य में अलंकारों की छटा विभिन्न उपमानों की सजीवता लिए हुए है।
  4. उनके काव्य में शृंगार रस का सागर उमड़ता है।
  5. उनके काव्य में विषयों की विविधता को प्रकट करने वाली भाषा मौजूद है।

प्रश्न 4.
निम्न पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए

वीथिन में, ब्रज में नवेलिन में बेलिन में,
बनन में बागन में बगरयो वसंत है।
उत्तर
उपर्युक्त पक्तियों का आशय यह है कि ऋतुराज वसंत का आगमन प्रकत में रहा है। वह व्यापक रूप से हो रहा है। इसलिए मनुष्य के साथ-साथ प्रकृति के और स्वरूप उससे प्रभावित हो रहे हैं। उसका प्रभाव सबको उल्लसित और उमंगित कररहा है।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्यांश की व्याख्या सन्दर्भ-प्रसंग सहित लिखिए।

कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में
क्यारिन में कलित कलीन किलकन्त है।
कहै पदमाकर परागहू में पौनहूं में,
पातन में पिक में पलासन पगन्त है।
उत्तर
नदियों के तट पर, केलियों में, कछारों में, कुंजों में, क्यारियों में वसंत उल्लासपूर्ण किलकारी मार रहा है। कविवर पदमाकर का पुनः कहना है कि फूलों के परागों में, हवाओं में, पेड़-पौधों के पत्तों में, कोपलों में, पलाशों में वसंत की सरसता लिए हुए है। द्वार-द्वार में, दिशाओं में, दूर देश-परदेश में, दीपों में, सभी दिशाओं में वसंत की चमक-दमक है। गलियों में, ब्रज में, बेलों में, वनों में, बागों में वसंत का साम्राज्य फैला हुआ है।

ऋतु वर्णन भाषा-अध्ययन/काव्य-सौंदर्य

प्रश्न 1.
‘कलित कलीन किलकन्त’ में अनुप्रास अलंकार है। पठित पाठ के आधार पर पाँच उदाहरण दीजिए।
उत्तर
1. ‘पलासन – पगन्त’
2. देस – देसन
3. दीप -दीपन
4. दीप – दिगन्त
5. बगर्यो – बसंत

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
देश, जीवन, अखण्ड, योग्यता, प्रकाश।
उत्तर
शब्द – विलोम शब्द
देश – विदेश
जीवन – मरण
अखण्ड – खण्ड
योग्यता – अयोग्यता
प्रकाश – अंधकार।

ऋतु वर्णन योग्यता – विस्तार

प्रश्न 1. अनेक कवियों ने ऋतु-वर्णन से संबंधित कविताएँ लिखी हैं, अपने शिक्षक की सहायता से ऋतु-वर्णन से संबंधित कविताएँ संकलित कीजिए।
प्रश्न 2. आपको कौन-सी ऋतु सबसे अच्छी लगती है? क्यों? अखबारों तथा पुरानी पत्रिकाओं से चित्र काटकर चित्र-युक्त निबंध तैयार करें इसे ‘फीच’ लेखन कहते हैं जिसकी जानकारी अपने शिक्षक से लीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

ऋतु वर्णन परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वसंत की छटा किस रूप में दिखाई देती है?
उत्तर
वसंत की छटा अत्यन्त सहज, मनमोहक और व्यापक रूप में दिखाई देती है।

प्रश्न 2.
वसंत किसका प्रतीक है?
उत्तर
वसंत सम्पन्नता और उल्लास का प्रतीक है।

प्रश्न 3.
वसंत का आगमन कब होता है?
उत्तर
वसंत का आगमन पतझड़ के बाद होता है।

ऋतु वर्णन दीर्य उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पद्माकर ने बसंत और शरद इन दोनों ऋतुओं की किन प्रमुख विशेषता को सामने लाया है?
उत्तर
पद्माकर ने वसंत और शरद इन दोनों ऋतुओं की निम्नलिखित विशेषताओं को सामने लाने का प्रयास किया है :
1. वसंत ऋतु की विशेषताएँ

  • वसंत मानवीय अनुभूतियों का प्रतीक है।
  • वसंत मानव जीवन को विकसित करने का प्रतीक है।
  • वसंत सौंदर्यवर्द्धक और उत्साहवर्द्धक है।
  • वसंत व्यापक सम्पन्नता का प्रमुख कारक है।

2. शरद ऋतु की विशेषताएँ

  • शरद सरसता और सरलता का प्रतीक है।
  • शरद में मधुरता और सुन्दरता है।
  • शरद की चाँदनी प्रेमरस को सरलतापूर्वक प्रवाहित करती है।

प्रश्न 2.
पद्माकर का साहित्यिक महत्त्वाकंन कीजिए।
उत्तर
पद्माकर रीतिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। पद्माकर का साहित्यिक महत्त्वांकन करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है “उनकी मधुर कल्पना ऐसी स्वाभाविकता और हाव-भावपूर्ण मूर्ति-विधान करती है कि पाठक भावों की प्रत्यक्ष अनुभूति में मग्न हो जाता है।” संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि पद्माकर की कविता में रीतिकाल की कविता की सभी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ मौजूद हैं।

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प्रश्न 3.
पद्माकर विरचित कविता ‘ऋतु-वर्णन’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पद्माकर का ऋतु-वर्णन अत्यधिक अनूठा और बेजोड़ कवित्त है। विभिन्न प्रकार की ऋतुओं के सौंदर्य-बोध को उन्होंने अनेक तरह से अपनी कविता में प्रस्तुत किया है। ऋतुओं की बदलती सुन्दरता का क्रियाशील वर्णन उनके काव्य को एक अलग ही आकर्षण प्रदान करता है। कविवर पदमाकर ने वसंत ऋतु को विकसित प्रक्रिया का वर्णन मानवीय अनुभूतियों के स्तर पर तो किया ही है। इसके साथ ही वसंत की नयनाभिराम छटा भी उनकी कविताओं में प्राप्त होती है। वसंत हमारे परिवेश को कैसे प्रभावित कर सम्पन्न करता है? यह उनकी प्रस्तुत कविता से बड़ी सहजता से स्पष्ट हो जाता है। शरद वर्णन में वह राधा-कृष्ण को नहीं भूल पाते। शरद की चाँदनी, उन्हें प्रभावित करती है। इस कविता में कवि ने उद्दीपन भाव को व्यक्त किया है।

ऋतु वर्णन कवि-परिचय

प्रश्न
कविवर पद्माकर का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि पद्माकर का जन्म उत्तर-प्रदेश के बाँदा में सन् 1753 में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित मोहनलाल भट्ट था। वे तैलंग ब्राह्मण थे। यही नहीं वे एक उच्चकोटि के विद्वान और रसिक कवि भी थे। पद्माकर बचपन से ही अपने पिता की कविताओं को सुन-सुनकर काव्य-रचना करने लगे। उनका निधन 1836 में हुआ।

रचनाएँ-पदमाकर के छः प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं, जो इस प्रकार हैं-जगविनोद, ‘पद्माभरण’, ‘हिम्मत बहादुर’, ‘विरुदावली’, ‘गंगालहरी’, ‘प्रबोध-पचीसी’ और ‘राम-रसायन।’
साहित्यिक महत्त्व-पद्माकर रीतिकाल के चुने हुए कवियों में से एक हैं। उनका काव्य-स्वरूप अधिक आकर्षक है। पद्माकर के साहित्यिक महत्त्व का वर्णन करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है “उनकी मधुर कल्पना ऐसी स्वाभाविक और हाव-भावपूर्ण मूर्ति-विधान करती है कि पाठक भावों की प्रत्यक्ष अनुभूति में मग्न हो जाता है।”

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि पद्माकर का काव्य-विधान विभिन्न प्रकार के काव्य-लक्षणों से पुष्ट है। उनकी भाषा ब्रजभाषा है, जो बहुत ही सरल और सजीव है।
भावुकता, तन्मयता और चमत्कार तो उनकी कविताओं के निश्चित आधार हैं। कुल मिलाकर वे एक युगीन महाकवि ठहरते हैं।

ऋतु वर्णन कविता का सारांश

प्रश्न-कवि पद्माकर-विरचित कविता ‘ऋतु-वर्णन’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कवि पद्माकर-विरचित कविता ‘ऋतु-वर्णन’ के दो भाग हैं-‘वसंत’ और ‘शरद’ । ‘वसंत’ कविता में कवि ने वसंत ऋतु के व्यापक प्रवेश का अत्यन्त भावपूर्ण वर्णन किया है। ‘शरद’ कविता में कवि ने शरद ऋतु की सुन्दरता तब और मन मोह लेती है, जब कवि राधा-कृष्ण के रासमण्डल का चित्रण करता है। शरद ऋतु की चाँदनी की छटा निश्चित रूप से प्रभावशाली है।

वसंत:

ऋतु वर्णन  संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य एवं विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में,
क्यारिन में कलित कलीन किलकन्त है।

कहै पद्माकर परागहू में पौनहूं में,
पातन में, पिक में पलासन पगन्त है।

द्वारे में दिसान में दुनी में देस देसन में,
देखो दीप दीपन में दीपत दिगन्त है।

बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में,
बनन में बागन में बगरयो बसन्त है।

शब्दार्थ-कूलन-नदी के तट पर। किलकन्त-उल्लास से किलकारी मारना । पौनहूं-पवन। पिक-कोयल। दिगन्त-समस्त दिशाओं में। बीथिन-गलियों में।
नवेलिन-युवती, तरुणी।

प्रसंग-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी-सामान्य’ में संकलित तथा महाकवि पदमाकर द्वारा विरचित कविता ‘वसंत’ से लिया गया है। इसमें कवि ने वसंत ऋतु के व्यापक प्रवेश का चित्रण किया है। इस विषय में कवि का कहना है

व्याख्या-नदियों के तट पर, केलियों में, कछारों में, कुंजों में, क्यारियों में वसंत उल्लासपूर्ण किलकारी मार रहा है। कविवर पदमाकर का पुनः कहना है कि फूलों के परागों में, हवाओं में, पेड़-पौधों के पत्तों में, कोपलों में, पलाशों में वसंत की सरसता लिए हुए है। द्वार-द्वार में, दिशाओं में, दूर देश-परदेश में, दीपों में, सभी दिशाओं में वसंत की चमक-दमक है। गलियों में, ब्रज में, बेलों में, वनों में, बागों में वसंत का साम्राज्य फैला हुआ है।

विशेष-

  1. भाषा ब्रजभाषा है।
  2. लय और संगीत का सुन्दर मेल है।
  3. वर्णनात्मक शैली है।
  4. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. शृंगार रस का संचार है।

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1. पद पर आरित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) बसंत उल्लास से कहाँ-कहाँ किलकारी मार रहा है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में वसंत ऋतु के सुखद आगमन को विविध काव्य-सौंदर्य से चित्रित किया गया है। ब्रजभाषा की शब्दावली के द्वारा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का चमत्कार शृंगार रस से पुष्ट हुआ है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य वसंत ऋतु के आगमन की विविधा को अच्छी तरह से दर्शाने वाला है। इस प्रकार इस पद का भाव-सौंदर्य अपनी सरसता और सरलता के साथ स्वाभाविकता को प्रस्तुत कर हृदयस्पर्शी बन गया है।
(iii) वसंत अपने उल्लास से नदियों के तटों पर केलियों में, कछारों में, कुंजों में किलकारी मार रहा है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर ।

प्रश्न
(i) बसंत को किस रूप में चित्रित किया गया है?
(ii) वसंत का अन्य ऋतुओं से बढ़कर क्या महत्त्व है?
उत्तर-
(i) वसंत को मनुष्य के रूप में चित्रित किया गया है।
(ii) वसंत का अन्य ऋतुओं से बढ़कर महत्त्व है। यह इसलिए कि वह अपने आगमन से हमारे जीवन में आनंद की झड़ी लगा देता है। वसंत के आने से प्रकृति के प्रत्येक स्वरूप में उल्लास और सरसता का संचार होने लगता है।

शरद:

ऋतु वर्णन
  संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौंदर्य एवं विषय-वस्तु से संबंधी प्रश्नोत्तर

2. तालन पै ताल पै तमालन पै मालन पै,
वृन्दावन बीथिन बहान बंसीवट पै।

कहै पदमाकर अखण्ड रासमण्डल पै,
मण्डित उमण्डि महा कालिंदी के तट पै॥

छिति पर छान पर छाजत छतान पर,
ललित लतान पर लाड़िली की लट पै।

आई भली छाई यह सरद-जुन्हाई, जिहि,
पाई छवि आज ही कन्हाई के मुकुट पै॥

शब्दार्थ-तालन-तालाबों। तमालन-तमाल नामक वृक्षों में। मालन-मालाएँ। बीविन-गलियाँ। बहार-शोभा। बंसीवट-जिस पर बैठकर कृष्ण बंशी बजाते थे। अखण्ड रासमण्डल-निरन्तर रासलीला। मण्डित-सुशोभित उमण्डि-घिरना, घुमड़ना। महाकालिन्दी-यमुना का बड़ा रूप। ठिति-पृथ्वी। छान-छप्पर की छत। छाजत छतान-छाया हुआ। ललित लतान-सुन्दर लताएँ। सरद जुन्हाइ-शरद की चाँदनी। कन्हाइ-कृष्ण।

प्रसंग-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक वासंती हिंदी सामान्य’ में संकलित तथा महाकवि पद्माकर-विरचित कविता ‘शरद’ से लिया गया है। इसमें कविवर पदमाकर ने शरद ऋतु के स्वरूप-प्रभाव का अनूठा चित्र खींचते हुए कहा है कि

व्याख्या-तालाबों में, तमाल नामक पेड़ों में, मालाओं में वृन्दावन की गलियों में और बंशीवट में शरद ऋतु की चाँदनी की बहार आई हुई है। कविवर पद्माकर का कहना है कि शरद ऋतु की चाँदनी में निरन्तर रासलीलाएँ हो रही हैं। यमुना के तट पर भ्रमण करना बहुत ही शोभा दे रहा है। इस प्रकार पृथ्वी पर, छप्पर की छत पर, सुन्दर-सुन्दर लताओं पर, युवतियों की लटों पर शरद ऋतु की चाँदनी छायी हुई बहुत ही अच्छी लग रही है। इसकी सुन्दरता तो आज कृष्ण के मुकुट पर पड़ने से और ही बढ़ गई है।

विशेष-

  1. ब्रजभाषा की शब्दावली।
  2. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  3. शृंगार रस का प्रवाह।
  4. चित्रमयी शैली है।

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1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पद में वृन्दावन का क्या उल्लेख हुआ है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य अनुप्रास अलंकार से चमत्कृत है। इसे शृंगार रस से पुष्ट करके चित्रमयी शैली के द्वारा अधिक मनमोहक बनाने का प्रयास किया गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य शरद-पूर्णिमा की चाँदनी की सरसता को क्रमशः उजागर करने में सफल दिखाई देता है। भावों की सरलता उनकी प्रवाहमयता के कारण और रोचक हो गई है।
(iii) प्रस्तुत पद में वृन्दावन की गलियों में शरद की चाँदनी का उल्लासपूर्ण उल्लेख हुआ है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद में किसका चित्रण हुआ है?
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में शरद ऋतु की चाँदनी का अत्यन्त प्रभावशाली, रोचक और आकर्षक चित्रण हुआ है।
(ii) प्रस्तुत पद का शरद की चाँदनी का प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों को सरसतापूर्वक प्रभावित करने का चित्रण करना मुख्य भाव है। यह भाव हर प्रकार से हमारे सोए हुए भावों को जगाता है।

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MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3

Write the following in decimal form and say what kind of decimal expansion each has:

  1. \(\frac{36}{100}\)
  2. \(\frac{1}{11}\)
  3. 4\(\frac{1}{8}\)
  4. \(\frac{3}{13}\)
  5. \(\frac{2}{11}\)
  6. \(\frac{329}{400}\)

Solution:
1. \(\frac{36}{100}\)
\(\frac{36}{100}\) = 0.36
The decimal expansion is terminating.

2. \(\frac{1}{11}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-1
The decimal expansion is non-terminating repeating.

3. 4\(\frac{1}{8}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-2
The decimal expansion is terminating.

4. \(\frac{3}{13}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-3'
The decimal expansion is non-terminating repeating.

5. \(\frac{2}{11}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-4
The decimal expansion is non-terminating repeating.

6. \(\frac{329}{400}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-5
The decimal expansion is terminating.

Question 2.
You know that \(\frac{1}{7}\) = \(\overline { 0.142857 } \). Can vou predict what the decimal expansions of \(\frac{2}{7}\), \(\frac{3}{7}\), \(\frac{4}{7}\), \(\frac{5}{7}\), \(\frac{6}{7}\) are, without actually doing the long division? If so, how?
[Hint: Study the remainders while finding the value of \(\frac{1}{7}\) carefully.]
Solution:
\(\frac{1}{7}\) = \(\overline { 0.142857 } \)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-6

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Question 3.
Expressthe following in the form \(\frac{p}{q}\), wherep and q are integers and q ≠ 0.

  1. \(0 . \overline{6}\)
  2. \(0 . \overline{oo1}\)

Solution:
1. \(0 . \overline{6}\)
Let x = \(0 . \overline{6}\) …(i)
10x = \(6 . \overline{6}\)
[Multiplying (i) by 10 on both sides] …(ii)
Subtracting (i) from (ii). we get
9x = 6
x = \(\frac{6}{9}\) = \(\frac{2}{3}\)
∴ \(6 . \overline{6}\) = \(\frac{2}{3}\)

2. \(0 . \overline{oo1}\)
1000x = \(1 . \overline{001}\)
[Multiplying (i) by 1000] …(ii)
Subtracting (i) from (ii), we get
999x = 1
x = \(\frac{1}{999}\)
∴ \(0 . \overline{001}\) = \(\frac{1}{999}\)

Question 4.
Express 0.99999….. in the form \(\frac{p}{q}\). Are you surprised by vour answer? With your teacher and classmates, discuss why the answer make sense.
Solution:
0.99999 = \(0 . \overline{9}\)
Let x = 0.9 …(i)
10x = \(9 . \overline{9}\)
[Multiplying (i) by 10] …(ii)
Subtracting (i) from (ii), we get
9x = 9
x = \(\frac{9}{9}\)
∴ \(9 . \overline{9}\) = 1

Question 5.
What can the maximum number of digits be in the repeating block of digits in the decimal expansion of \(\frac{1}{17}\)? Perform the division to check your answer.
Solution:
The maximum number of digits in the repeating block of digits in the decimal expansion \(\frac{1}{17}\) can be 16.
0. 05882352941176470588235294117647….
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-7
By Long Division, the number of digits in the repeating block of digits in the decimal expansion of = \(\frac{1}{17}\) = 16
∴ The answer is verified.

Question 6.
Look at several examples of rational numbers in the form \(\frac{p}{q}\) (q ≠ 0),where p and q are integers with no common factors other than 1 and having terminating decimal representation (expansions). Can you guess what property q must satisfy?
Solution:
Examples:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.3 img-8
The property that q must satisfy is that the prime factorisation of q have only powers of 2 or powers of 5 or both.

Question 7.
Write three numbers whose decimal expansions are non – terminating non – recurring.
Solution:
0. 01001000100001……..,
0. 20200220002200002…….,
0. 003000300003

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Question 8.
Find three different irrational numbers between the rational numbers \(\frac{5}{7}\) and \(\frac{9}{11}\).
Solution:
Irrational numbers between \(\frac{5}{7}\) and \(\frac{9}{11}\)
\(\frac{5}{7}\) = 0.71 and \(\frac{9}{11}\) = 0.81
Three irrational numbers between \(\frac{5}{7}\) and \(\frac{9}{11}\) are
0. 7201001000…
0. 7301001000…
0. 7401001000…

Question 9.
Classify the following numbers as rational or irrational:

  1. \(\sqrt{23}\)
  2. \(\sqrt{225}\)
  3. 0. 3796
  4. 7. 478478…
  5. 1. 101001000100001…

Solution:

  1. \(\sqrt{23}\) is an irrational number
  2. \(\sqrt{225}\) = 15, a rational number
  3. 0. 3796 is a rational number
  4. 7. 478478….. is an irrational number
  5. 1. 101001000100001… is an irrational number

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MP Board Class 10th Special Hindi अपठित बोध

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित बोध

अपठित का तात्पर्य है जो पढ़ा हुआ न हो। अपठित का अवतरण पाठ्य-पुस्तकों से सम्बन्धित नहीं होता। परीक्षा में अपठित के अन्तर्गत निम्न प्रश्न पूछे जाते हैं। देखिए

  1. अवतरण का शीर्षक।
  2. समस्त गद्य-अवतरण अथवा पद्यावतरण का स्वयं की भाषा में सारांश।
  3. अवतरण पर आधारित प्रश्नों के उत्तर।

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(1) शीर्षक–अवतरण का शीर्षक जहाँ तक हो सके लघु (छोटा) तथा उपयुक्त होना चाहिए। शीर्षक में अवतरण का समस्त भाव परिलक्षित होना नितान्त आवश्यक है। शीर्षक के लिए गद्यांश के प्रारम्भिक एवं आखिरी अंश का चिन्तन एवं मनन करना चाहिए।

(2) सारांश परीक्षा में अवतरण का सारांश अथवा भाव लिखने को आता है। सारांश छोटा तथा सारगर्भित होना चाहिए। इसमें अपनी भाषा का प्रयोग करना परमावश्यक है। अवतरण की भाषा को ज्यों का त्यों लिखना वर्जित है। भाषा का परिमार्जित होना जरूरी है।

सार-लेखन में पूछे गये अवतरण का ही भाव परिलक्षित होना चाहिए। सारांश का कलेवर एक तिहाई से किसी भी दशा में अधिक नहीं होना चाहिए।

(3) प्रश्नोत्तर–प्रश्नों के उत्तर लघु तथा सारगर्भित होने चाहिए। अवतरण के आधार पर ही उत्तर देने चाहिए। अनर्गल उत्तर देना वर्जित है। प्रश्नोत्तरों की भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए।

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित गद्यांश

प्रश्न-
निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. मन के सशक्त होने पर शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आती है। यदि मन दुर्बल है तो शरीर निष्क्रिय और निरुद्यम ही रहेगा। यह संसार शक्तिशाली का है। दुर्बल का इस संसार में कहीं ठिकाना नहीं। कायर व्यक्ति मृत्यु से पहले ही सहस्रों बार मरता है। कायरता का सम्बन्ध मन से है। कायरता और निरुत्साह का दूसरा नाम ही मन की हार है। परिणामत: मन की हार अत्यन्त भयंकर है। मनुष्य भाग्य का निर्माता है, पर कायर पुरुष नहीं। सबल ही भाग्य निर्माता की सामर्थ्य रखता है। कायर तो दैव-दैव ही पुकारता है। साहसी व्यक्ति को अपने मानसिक बल पर अभिमान होता है।

प्रश्न-
(1) इस अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) इस अवतरण में भाग्य का निर्माता किसे कहा गया है?
(3) इस अवतरण का सारांश 30 शब्दों में दीजिए।
(4) मन के सशक्त होने पर शरीर में क्या होता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘मनोबल’।’
(2) मानव को स्वयं अपने भाग्य का निर्माता कहा गया है।
(3) सारांश-मन का सबल एवं पुष्ट होना सबसे बड़ी ताकत है। मन के दुर्बल होने पर मानव भीरु (कायर) बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का दुनिया में जीवित रहना अथवा न रहना एकसमान है। अतः मन को सशक्त बनाओ तथा अपने भाग्य की सृष्टि (निर्माण) करो।
(4) मन के सशक्त होने पर शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आती है।

2. क्षमा पृथ्वी का गण-धर्म है। क्षमा वीरों का भूषण है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से अपराध होते रहते हैं,गलतियाँ होती रहती हैं। हमारी दृष्टि में कोई अपराधी है तो हम भी किसी की दृष्टि में अपराधी हैं। यहाँ निर्दोष कोई भी नहीं है, इसलिए परस्पर क्षमा-भावना की अति आवश्यकता है। क्षमा के अभाव में क्रोध, हिंसा, संघर्ष का साम्राज्य छा जायेगा जिसे कोई भी स्वीकार नहीं करता है। माता-पिता, गुरु सभी क्षमाशील होते हैं। मानव जीवन में क्षमा के अवसर आते रहते हैं। क्षमा के अभाव में जीवन चलना दूभर हो जाता है। अहिंसा, करुणा, दया, मैत्री, क्षमा आदि दैवीय गुण हैं। ये गुण मानव-जीवन के लिए आवश्यक हैं। (2009)

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) क्षमा के अभाव में किसका साम्राज्य छा जाता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक–’क्षमा दैवीय गुण’।

(2) सारांश-क्षमा पृथ्वी का गुण है। पृथ्वी अनेक आघातों को सहकर भी मानव सेवा में तत्पर रहती है। क्षमा वीरों का आभूषण है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से जाने-अनजाने में अपराध करता रहता है। सब एक-दूसरे की दृष्टि में अपराधी हैं। अत: मानव को अपने मन मानस में क्षमा को प्रथम वरीयता देनी चाहिए। जीवन में क्षमा के अनेक अवसर आते हैं। अहिंसा, दया, मित्रता, क्षमा आदि ईश्वरीय गुणों के परिचायक हैं।

(3) क्षमा के अभाव में क्रोध, हिंसा और संघर्ष का साम्राज्य छा जायेगा।

3. मानव का अकारण ही मानव के प्रति अनुदार हो उठना न केवल मानवता के लिए लज्जाजनक है, वरन् अनुचित भी है। वस्तुतः यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है, कर सकता है। केवल इसलिए कि कोई मनुष्य बुद्धिहीन है अथवा दरिद्र वह घृणा का तो दूर रहा, उपेक्षा का भी पात्र नहीं होना चाहिए। मानव तो इसलिए सम्मान के योग्य है कि वह मानव है, भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है। [2009, 14]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) यथार्थ मनुष्य किसे कहा गया है?
(3) उक्त गद्य खण्ड का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘आदर्श मानव’।
(2) यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है।
(3) सारांश-मानव का उदारता रहित होना मानवता के लिए लज्जाजनक ही नहीं अपितु अनुचित भी है। वास्तव में सच्चा मनुष्य वही है जिसके मन मानस में मानवता के प्रति संवेदना हो। वह प्रत्येक व्यक्ति का आदर करना जानता हो।

बद्धिहीन निर्धन व्यक्ति के प्रति भी उपेक्षा की भावना नहीं होनी चाहिए अपितु उनको भी यथेष्ट सम्मान प्रदान करना चाहिए।

4. राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त होने के कारण हिन्दी का दायित्व कुछ बढ़ जाता है। अब वह मात्र साहित्य की भाषा ही नहीं रह गयी है, उसके माध्यम से ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई उपलब्धियों का भी ज्ञान विकास करना तथा प्रशासन की भाषा के रूप में उसका नव-निर्माण करना हमारा दायित्व है। यह बड़ा महान् कार्य है और इसके लिए बड़ी उदार और व्यापक दृष्टि तथा कठिन साधना की अपेक्षा है।

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) हिन्दी भाषा किस पद पर अभिषिक्त है?
(4) हिन्दी का दायित्व क्यों बढ़ गया है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-राष्ट्रभाषा हिन्दी।’
(2) सारांश-आज हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन है। आज हिन्दी भाषा से ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी की जानकारी मिल रही है। प्रशासकीय स्तर पर भी हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया है। हिन्दी सभी क्षेत्रों में एक गौरवशाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर हिन्दी को पूरा सम्मान देना होगा। इसी में सबका हित-साधन है।
(3) हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त है।
(4) राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त होने से हिन्दी का दायित्व बढ़ जाता है, क्योंकि अब यह ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की भाषा बन चुकी है।

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5. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज से अलग उसके अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। परिचित तो बहुत होते हैं,पर मित्र बहुत कम हो पाते हैं,क्योंकि मैत्री एक ऐसा भाव है जिसमें प्रेम के साथ समर्पण और त्याग की भावना मुख्य होती है। मैत्री में सबसे आवश्यक है, परस्पर विश्वास। मित्र ऐसा सखा, गुरु और माता है जो सभी स्थानों को पूर्ण करता है। [2009]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का एक सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) मैत्री में कौन-कौन से भाव सम्मिलित हैं?
उत्तर-
(1) शीर्षक ‘सच्चा मित्र’।
(2) सारांश-मानव एक समाज में रहने वाला प्राणी है। उसका अस्तित्व ही समाज पर है। समाज में परिचित तो अनेक होते हैं लेकिन मित्रों की संख्या कम होती है। सच्ची मित्रता में त्याग एवं समर्पण की भावना प्रमुख रूप से निहित होती है।

मित्रता में आपसी विश्वास का होना अपेक्षित है। सच्चा मित्र गुरु एवं माता के समान है जो समस्त स्थानों की पूर्णता का द्योतक है।

(3) मैत्री में प्रेम भाव के साथ-साथ समर्पण, त्याग और परस्पर विश्वास होना आवश्यक है।

6. अमृत तो प्रत्येक प्राणी के हृदय में समाया हुआ है, जरूरत है तो उसे जानने की। इस काया के अन्दर भरपूर अमृत है। गुरु के शब्द पर विचार करके ही उसे प्राप्त किया जा सकता है। जो प्रभु की खोज करते हैं वह इस अमृत को देह से ही प्राप्त करते हैं लेकिन गुरु के शब्द पर विचार न कर पाने के कारण अज्ञानी जीव व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है। इस शरीर के नौ द्वार हैं परन्तु इन नौ द्वारों में से हमें अमृत प्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि वह दसवें द्वार में स्थित है। मनुष्य नौ द्वारों के रहस्य को तो जानता है परन्तु गुरु रूपी दसवें द्वार को भूला हुआ है। गुरु का कार्य उस द्वार को प्रकट करना है। यदि अन्तर में परमपिता परमात्मा से हमें प्रेम है, परन्तु जब तक हमें परमात्मा के दर्शन नहीं होते हम तब तक अमृतपान नहीं कर सकते। [2011]

प्रश्न- (1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) व्यक्ति अमृतपान कब कर सकता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक–’अमृत की अभिलाषा।’

(2) सारांश इस गद्यांश के द्वारा लेखक ने यह बताने का प्रयत्न किया है, कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में ईश्वर का निवास है। लेकिन ईश्वर तक पहुँचने का साधन गुरु है। गुरु के द्वारा ही व्यक्ति अपने गन्तव्य तक पहुँच सकता है। व्यक्ति अज्ञानता के कारण इधर-उधर भटकता रहता है और अपने जीवन को बेकार ही नष्ट कर लेता है। लेखक के अनुसार मानव उसके शरीर में मौजूद नौ द्वारों के रहस्य को तो जानता है किन्तु अमृत से तृप्त दसवें द्वार को वह भूला हुआ है, जिसे बिना गुरु के मार्गदर्शन के वह प्राप्त नहीं कर सकता है। सच्चे गुरु का कर्त्तव्य उस दसवें द्वार को प्रकट कर शिष्य भगवानरूपी अमृत से साक्षात्कार करवाना है।

(3) व्यक्ति गुरु के सानिध्य में रहकर अमृत पान कर सकता है।

7. यदि हम समय का सदुपयोग करना सीख लें,तो इससे लाभ ही लाभ हैं। व्यर्थ ही समय व्यतीत करके जो काम दिन भर में कर पाते हैं,उसे कुछ घण्टों में ही कर सकते हैं। इस प्रकार पूरे जीवन में हम कई गुना कार्य करके अपना विकास और मानवता की सेवा कर सकते हैं। अधिक कार्य करके हम अधिक धन,यश, सम्मान अर्जित कर सकते हैं। निरन्तर ऊँचे उठते हुए जीवन को सार्थक बना सकते हैं। हममें कर्मठता आती है, चरित्र में दृढ़ता आती है। सच्चे अर्थों में हम मनुष्य बन जाते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं,सभी ने समय के महत्व को समझा तथा उसका सम्पूर्ण उपयोग किया था। [2009]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
(3) जीवन को सार्थक किस प्रकार बनाया जा सकता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘समय का सदुपयोग।
(2) सारांश-मानव जीवन में समय का पालन करना नितान्त आवश्यक है। समय के सदुपयोग से कार्य पूर्ण होने में समय की बचत होती है।

समय के सदुपयोग से स्वयं का विकास एवं मानवता की सेवा भी सम्भव है। समय के सदुपयोग से हमारी कर्मशीलता एवं चरित्र का विकास होता है। हम सच्चे अर्थों में मानव कहे जाने के अधिकारी बन सकते हैं।

(3) अधिक कार्य करके धन, यश, सम्मान अर्जित करके निरन्तर ऊँचे उठते हुए जीवन को सार्थक बना सकते हैं।

8. धर्म एक व्यापक शब्द है। मजहब, मत,पंथ या संप्रदाय सीमित रूप है। संसार के सभी धर्म मूल रूप में एक ही हैं। सभी मनुष्य के साथ सद्व्यवहार सिखाते हैं। ईश्वर किसी विशेष धर्म या जाति का नहीं। सभी मानवों में एक प्राण स्पंदन होता है। उसके रक्त का रंग भी एक ही है। सुख-दुःख का भाव बोध भी उनमें एक जैसा है। आकृति और वर्ण, वेशभूषा और रीतिरिवाज तथा नाम ये सब ऊपरी वस्तुएँ हैं। ईश्वर ने मनुष्य या इंसान को बनाया है और इंसान ने बनाया है धर्म या मजहब को। ध्यान रहे मानवता या इंसानियत से बड़ा धर्म या मजहब दूसरा कोई नहीं। वह मिलना सिखाता है, अलगाव नहीं। ‘धर्म’ तो एकता का द्योतक है। [2010]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।
(2) सबसे बड़ा धर्म कौन-सा है?
(3) बाह्य वस्तुएँ क्या हैं?
उत्तर-
(1) शीर्षक-धर्म का अर्थ।’
(2) इन्सानियत या मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
(3) संसार में भिन्न-भिन्न आकृति एवं वर्ण वाले लोग होते हैं। इन व्यक्तियों के रीतिरिवाज और वेशभूषा भी अलग-अलग होती हैं। ये सभी बाह्य वस्तुएँ कहीं जाती हैं।

9. मनुष्य का जीवन बहुत संघर्षमय होता है। उसे पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। फिर भी ईश्वर के द्वारा जो मनुष्यरूपी वरदान की निर्मिति इस पृथ्वी पर हुई है मानो धरती का रूप ही बदल गया है। यह संसार कर्म करने वाले मनुष्यों के आधार पर ही टिका हुआ है। देवता भी उनसे ईर्ष्या करते हैं। मनुष्य अपने कर्म बल के कारण श्रेष्ठ है। धन्य है मनुष्य का जीवन। [2012]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) मनुष्य किस कारण श्रेष्ठ माना गया है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘मनुष्य और कर्म।’
(2) सारांश-मानव ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है। यद्यपि मानव जीवन कदम-कदम पर कठिनाइयों और संघर्षों की अनवरत कहानी है किन्तु ईश्वर द्वारा पृथ्वी पर मानव की रचना एक वरदान जैसी है। पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति से धरती का स्वरूप पूर्णतः बदल गया है और उसका सबसे बड़ा कारण है मानव का कर्म प्रधान व्यवहार। वास्तव में यह दुनिया ऐसे लोगों के कारण ही इतनी सुन्दर है जो कर्म को अपना धर्म मानते हैं। देवता तक ऐसे कर्मशील व्यक्तियों से ईर्ष्या करते हैं, या कहें प्रेरित होते हैं। मानव जन्म मात्र अपने कर्म कौशल के कारण ही सभी जीवजन्तुओं में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऐसे कर्म के धनी मानव जीवन की जय है।
(3) मनुष्य अपने कर्म-बल के कारण श्रेष्ठ माना गया है।

10. कई लोग समझते हैं कि अनुशासन और स्वतन्त्रता में विरोध है, किन्तु वास्तव में यह भ्रम है। अनुशासन द्वारा स्वतन्त्रता नहीं छीनी जाती, बल्कि दूसरों की स्वतन्त्रता की रक्षा होती है। सड़क पर चलने के लिए हम स्वतन्त्र हैं, हमें बाईं तरफ से चलना चाहिए किन्तु चाहें तो हम बीच में भी चल सकते हैं। इससे हम अपने प्राण तो संकट में डालते हैं, दूसरों की स्वतन्त्रता भी छीनते हैं। विद्यार्थी भारत के भावी राष्ट्र-निर्माता हैं। उन्हें अनुशासन के गुणों का अभ्यास अभी से करना चाहिए जिससे वे भारत के सच्चे सपूत कहला सकें। [2013, 18]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘अनुशासन और विद्यार्थी जीवन’।
(2) सारांश-प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनुशासन आवश्यक है। इससे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के साथ-साथ दूसरों की स्वतन्त्रता की भी रक्षा होती है। अपना जीवन सुरक्षित होता है और दूसरों का भी। भविष्य के आशा पुंज विद्यार्थियों को अनुशासन में रहना चाहिए, जिससे वे भावी भारत का स्वस्थ निर्माण कर सकें।

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11. स्वार्थ और परमार्थ मानव की दो प्रवृत्तियाँ हैं। हम अधिकतर सभी कार्य अपने लिए करते हैं, पर’ के लिए सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानवता है। यही धर्म है,यही पुण्य है। इसे ही परोपकार कहते हैं। प्रकृति हमें निरन्तर परोपकार का संदेश देती है। नदी दूसरों के लिए बहती है। वृक्ष मनुष्यों को छाया तथा फल देने के लिए ही धूप, आँधी,वर्षा और तूफानों में अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं। [2015]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) सच्ची मानवता क्या है?
(3) वृक्ष हमें परोपकार का सन्देश कैसे देते हैं?
(4) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘परोपकार का महत्व’।
(2) दूसरों के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानवता है।
(3) वृक्ष धूप, आँधी, वर्षा और तूफानों में डटकर खड़े रहते हैं और सब कुछ सहन करने के बावजूद भी मनुष्यों को अपनी शीतल छाया व रसदार फल प्रदान करके हमें परोपकार का सन्देश देते हैं।
(4) सारांश-अपने लिए जीना’ तथा दूसरों के हित में अपना सब कुछ बलिदान करना’, मानव की ये दो प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ हैं। अपने लिए तो प्रत्येक व्यक्ति कार्य करता ही है किन्तु दूसरों के लिए अपना सबकुछ दाँव पर लगा देने वाला व्यक्ति ही सच्चा परोपकारी होता है। परोपकार करना ही सच्चा धर्म और बहुत बड़ा पुण्य माना गया है। नदी स्वयं अपना जल नहीं पीती,वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाते और न ही अपनी शीतल छाया का उपयोग स्वयं के लिए करते हैं। अर्थात् प्रकृति भी हमें परोपकार करने की सीख देती है।

12. आप हमेशा अच्छी जिन्दगी जीते आ रहे हैं। आप हमेशा बढ़िया कपड़े, बढ़िया जूते, बढ़िया घड़ी, बढ़िया मोबाइल जैसे दिखावों पर बहुत खर्च करते हैं मगर आप अपने शरीर पर कितना खर्च करते हैं? इसका मूल्यांकन जरूरी है। यह शरीर अनमोल है। अगर शरीर स्वस्थ नहीं होगा तो आप ये सारे सामान किस पर टाँगेंगे? अतः स्वयं का स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है एवं स्वस्थ रहने में हमारे खान-पान का सबसे बड़ा योगदान है। [2016]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) अनमोल क्या है?
(3) शुद्ध व असली शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘पहला सुख निरोगी काया’।
(2) मानव शरीर अनमोल है।
(3) शुद्ध = अशुद्ध; असली = नकली।

13. आदर्श व्यक्ति कर्मशीलता में ही अपने जीवन की सफलता समझता है। जीवन का प्रत्येक क्षण वह कर्म में लगाता है। विश्राम और विनोद के लिए उसके पास निश्चित समय रहता है। शेष समय जन सेवा में व्यतीत होता है। हाथ पर हाथ धर कर बैठने को वह मृत्यु के समान समझता है। काम करने की उसमें लगन होती है। उत्साह होता है। विपत्तियों में भी वह अपने चरित्र का सच्चा परिचय देता है। धैर्य की कुदाली से वह बड़े-बड़े संकट पर्वतों को ढहा देता है। उसकी कार्यकुशलता देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाते हैं। संतोष उसका धन है। वह परिस्थितियों का दास नहीं है। परिस्थितियाँ उसकी दासी हैं। [2017]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश में वर्णित व्यक्ति के गुणों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-कर्म ही पूजा है।
(2) कर्मशील व्यक्ति सदैव कर्म को ही पूजा समझता है। वह व्यर्थ में समय नहीं गँवाता। आराम तथा मनोरंजन के लिए भी उसके पास एक पूर्व निर्धारित समय होता है। बेकारी की बजाय वह बेगारी करना पसंद करता है। कार्य के प्रति उसमें लगन एवं उत्साह होता है। संकट के समय में भी वह धैर्य के बल पर विजेता बनकर उभरता है। वह परम संतोषी होता है। उसकी कार्यकुशलता प्रेरणाप्रद होती है। वह परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता अपितु परिस्थितियाँ उसकी दासी होती हैं।

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित पद्यांश

निम्नलिखित पद्यांशों को पढ़कर उनके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए

1. वे मुस्काते फूल, नहीं-
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं-
जिनको भाता है बुझ जाना।

वे नीलम के मेघ, नहीं-
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनन्त ऋतुराज नहीं
जिसने देखी जाने की राह।

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प्रश्न-
1. उपर्युक्त पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
2. उक्त पद्यांश का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
3. कवयित्री के अनुसार देवलोक के पुष्प किस प्रकार के हैं?
4. देवलोक का ऋतुराज किस प्रकार का है?
उत्तर-
1. शीर्षक–’अपरिवर्तनीय प्रकृति।’
2. सारांश-कवयित्री का कथन है कि देवलोक में प्रत्येक वस्तु अपरिवर्तनीय है, इसलिए वहाँ आनन्द नहीं है,क्योंकि परिवर्तन ही जीवन का आनन्द है। देवलोक के पुष्प एक बार खिलते हैं,तो वे मुरझाते ही नहीं हैं। तारे चमकते हैं,तो वे बुझते ही नहीं हैं। नीलम जैसे काले चमकीले मेघ आसमान में छा जाते हैं, किन्तु बरसते नहीं। वहाँ का ऋतुराज अनन्त है और वह सदैव स्थायी रहता है।
3. कवयित्री के अनुसार देवलोक के पुष्प सदैव खिले रहते हैं, वे कभी मुरझाते नहीं हैं।
4. देवलोक का ऋतुराज (वसन्त) स्थायी रूप से वहाँ निवास करता है।

2. तुम माँसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण! हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की
जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन।
तुम मांस तुम्ही हो रक्त अस्थि
निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा निःस्व त्याग
हे विश्व भोग का वर साधन।

प्रश्न-
1. प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
2. प्रस्तुत पद्यांश का सारांश लिखिए।
3. कवि ने जीवन की पूर्ण इकाई किसे कहा है?
4. नवयुग का तन किससे निर्मित होगा?
उत्तर-
1. शीर्षक–’आत्मा की अमरता।’
2. सारांश-कवि का कथन है कि ऋषि जो संसार के निमित्त जीवन जीते हैं, वे केवल अस्थि मात्र से ही शेष दिखलाई देते हैं, किन्तु उनकी शुद्ध बुद्ध आत्मा जीवन की पूर्ण इकाई है। उनके निःस्वार्थ त्याग के आधार पर देश की संस्कृति का ढाँचा रखा जाएगा। उन्हीं से देश का युवा पल्लवित और पुष्पित होगा, जो संसार के भोगों को आनन्द प्राप्त करेगा।।
3. कवि ने जीवन की पूर्ण इकाई शुद्ध चिन्तनशील और निःस्वार्थ आत्मा से युक्त ऋषि को कहा है।
4. नवयुग का तन ऋषि की अमर आत्मा से निर्मित होगा।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 मित्रता

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 मित्रता (रामचन्द्र शुक्ल)

मित्रता अभ्यास-प्रश्न

मित्रता लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वर्तमान समय में व्यक्ति के किस व्यवहार को देखकर हम शीघ्र ही अपना मित्र बना लेते हैं?
उत्तर
वर्तमान समय में व्यक्ति का हँसमुख चेहरा, बातचीत के ढंग, थोड़ी चतुराई या साहस ये दो-चार व्यवहार देखकर हम उसे शीघ्र अपना मित्र बना लेते हैं।

प्रश्न 2.
लेखक ने कुसंग के ज्वर को सबसे भयानक क्यों कहा है?
उत्तर
लेखक ने कुसंग के ज्वर को सबसे भयानक इसलिए कहा है कि वह नीति, सद्वृत्ति और बुद्धि का नाश करता है।

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प्रश्न 3.
राजदरबार में जगह न मिलने पर इंग्लैंड का बिद्वान अपने भाग्य को क्यों सराहता रहा?
उत्तर
राजदरबार में जगह न मिलने पर इंग्लैंड का विद्वान अपने भाग्य को इसलिए सराहता रहा कि वह अपनी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक बुरे संगति से दूर रहा।

प्रश्न 4.
लेखक ने हमें किन बातों से दूर रहने को कहा है?
उत्तर
लेखक ने हमें अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातों से दूर रहने को कहा है।

मित्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अच्छे मित्र के गुण लिखिए।
उत्तर
अच्छे मित्र के गुण निम्नलिखित हैं :

  1. वह प्रतिष्ठित हो।
  2. वह दृढ़चित्त और सत्य-संकल्प का हो।
  3. उसमें आत्मविश्वास हो।
  4. वह भरोसमंद हो।

प्रश्न 2.
दृढ़चित्त और सत्य संकल्पित व्यक्ति से मित्रता करने के क्या लाभ हैं?
उत्तर
दृढ़चित्त और सत्य संकल्पित व्यक्ति से मित्रता करने से अनेक लाभ हैं। उससे हमें दृढ़ता प्राप्त होती है। हम दोषों और त्रुटियों से बच जाते हैं। हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम पुष्ट होते हैं। हम कुमार्ग से सचेत हो जाते हैं। हतोत्साहित होने पर हमें उत्साह मिलता है।

प्रश्न 3.
विवेक को कुंठा से बचाने के लिए हमें क्या-क्या करना चाहिए?
उत्तर
विवेक को कुंठा से बचाने के लिए हमें अत्यधिक दृढ़ संकल्प के लोगों के साथ नहीं रहना चाहिए। दूसरी बात यह है कि हमें मनमाने और दबाव डालने वाले लोगों से बचना चाहिए। तीसरी बात यह कि अपनी ही बात को ऊपर रखने वालों से सावधान रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में होनी वाली मित्रता की सार्थकता लिखिए।
उत्तर
बचपनावस्था की मित्रता बड़ी आनंदमयी होती है। उसमें हदय को बेधने वाली ईर्ष्या और खिन्नता नहीं होती है। उसमें अत्यधिक मधुरता और प्रेम की ऊँची तरंगें होती हैं। यही नहीं अपार विश्वासमयी कल्पनाएँ होती हैं। उसमें वर्तमान के प्रति आनंदयम दृष्टि और भविष्य के प्रति आकर्षक विचार भरे होते हैं। छात्रावास या सहपाठी की मित्रता में भावों का भारी उथल-पुथल होता है।

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प्रश्न 5.
भिन्न प्रकृति और स्वभाव के लोगों में मित्रता कैसे बनी रहती है?
उत्तर
भिन्न प्रकृति और स्वभाव के लोगों में मित्रता परस्पर अत्यधिक प्रगाढ़ प्रेम के कारण बनी रहती है। जो गुण जिसमें नहीं, वह चाहता है कि उसे ऐसा कोई मित्र मिले, जिसमें वे गुण हों। फलस्वरूप चिंतनशील मनुष्य प्रसन्नचित्त का साथ ढूँढ़ता है। निर्बल बली का और धीर उत्साही का।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए
(अ) ‘लेखक ने विश्वासपात्र मित्र को खजाना, औषधि और माता जैसा कहा है।” स्पष्ट कीजिए।
(ब) “संगति का गुप्त प्रभाव हमारे आचरण पर भारी पड़ता है।”
(स) “ऐसे नवयुवकों से बढ़कर शून्य, निःसार और शोचनीय जीवन और किसका है?”
उत्तर
(अ) “लेखक ने विश्वापात्र मित्र को खजाना, औषधि और माता जैसा कहा है।” लेखक के ऐसा कहने का आशय यह है कि विश्वासपात्र मित्र का महत्त्व असाधारण होता है। जो विश्वासपात्र मित्र होता है, वह हमारे लिए रक्षा-कवच के समान होता है। इसलिए ऐसे मित्र तो बड़े ही भाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं। वास्तव में ऐसे मित्र एक खजाने की तरह अपने मित्र की प्रत्येक दशा में सहायता करते हैं।

(ब) संगति का गुप्त प्रभाव हमारे आचरण पर भारी पड़ता है। लेखक के इस कथन का आशय यह है कि अगर हम सुसंगति में रहते हैं, हम दिनोंदिन उन्नति के शिखर पर चढ़ते जाते हैं। इसके विपरीत अगर हम कुसंगति में रहते हैं, तो हम दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरते जाएँगे।

(स) “ऐसे नवयुवकों से बढ़कर शून्य, निःसार और शोचनीय जीवन और किसका है?” लेखक के इस वाक्य का आशय यह है कि मनचले युवक हर प्रकार से उद्दण्ड और अशिष्ट होते हैं। वे अपने जीवन की सार्थकता केवल ऐशो-आराम करना समझते हैं। फलस्वरूप वे अपने जीवन को नरक बनाकर न केवल स्वयं के लिए दुःखद साबित होते हैं, अपितु अपने संपूर्ण समाज और वातावरण के लिए भी। इसलिए ऐसे शून्य, निःसार और शोचनीय युवकों से सावधान होकर दूर ही रहना चाहिए।

मित्रता भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
(क) उत्साह में ‘इत’ प्रत्यय जोड़ने से ‘उत्साहित’ बना है। इसी प्रकार पाठ से छाँटकर प्रत्यय लगाकर पाँच शब्द बनाइए।
(ख) दिए गए शब्दों की वर्तनी शुद्ध कीजिए।
मीत्रता – मित्रता
अपरीमार्जित – ……………….
आशचर्य – ………………..
चतुरायी – …………………
प्रतीष्टित – ………………..
सहानूभूति – ………………
दरबारीयों – ……………
कठिंत – ……………….

(ग) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
कोमल, शुद्ध, विश्वास, भारी, सत्य, मर्यादित, लाभ, परिपक्व, असफलता, उपयुक्त, गुप्त, बुरा।

(घ) दिए गए वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द लिखिए
(i) जिस पर विश्वास किया जा सके-विश्वासपात्र
(ii) जो पका हुआ न हो।
(iii) चित्त में दृढ़ता हो।
(iv) जिसका उत्साह नष्ट हो गया हो।
(v) जो पवित्र न हो।
(vi) सत्य में निष्ठा रखने वाला।
उत्तर
MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 मित्रता img 1

(ख) शब्द – शुद्ध शब्द
मीत्रता – मित्रता
अपरीमार्जित – अपरिमार्जित
आशचर्य – आश्चर्य
चतुरायी – चतुराई
प्रतीष्ठित – प्रतिष्ठित
दरबारीयों – दरबारियों
कुंठित – कुंठित।

(ग) शब्द – विलोम शब्द
कोमल – कठोर
शुद्ध – अशुद्ध
विश्वास – अविश्वास
भारी – हल्का
सत्य – असत्य
मर्यादित – अमर्यादित
लाभ – हानि
परिपक्व – अपरिपक्व
असफलता – सफलता
उपयुक्त – अनपयुक्त
गुप्त – प्रकट
बुरा- भला।

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(घ) वाक्यांश – एक शब्द
(i) जिस पर विश्वास किया जा सके – विश्वासपात्र
(ii) जो पका हुआ न हो – अपरिपक्व
(iii) चित्त में दृढ़ता हो – दृढ़चित्त
(iv) जिसका उत्साह नष्ट हो गया हो – हतोत्साहित
(v) जो पवित्र न हो – अपवित्र
(vi) सत्य में निष्ठा रखने वाला – सत्यनिष्ठ

मित्रता योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
सुसंग और कुसंग संबंधी दोहों को संकलित कर चार्ट बनाकर कक्षा में लगाइए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

प्रश्न 2.
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग॥

रहीम के इस दोहे का आशय यह है कि सज्जन पर बुरी संगति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्या आप इस बात से सहमत हैं? इस तरह के अन्य दोहों का संकलन कर हस्तलिखित पुस्तिका तैयार कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मित्रता परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
युवा पुरुष को मित्र चुनने में कठिनाई कब पड़ती है?
उत्तर
जब कोई युवापुरुष अपने घर से बाहर निकलकर बाहरी संसार में अपनी स्थिति जमाता है, तब पहली कठिनाई उसे मित्र चुनने में होती है।

प्रश्न 2.
विश्वासपात्र मित्र के विषय में एक प्राचीन विद्वान ने क्या कहा है?
उत्तर
विश्वासपात्र मित्र के विषय में एक प्राचीन विद्वान ने कहा है-“विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा रहती है। जिसको ऐसा मित्र मिल जाए, उसे समझना चाहिए कि खजाना मिल गया।”

प्रश्न 3.
मित्र किसे कहते हैं?
उत्तर
मित्र उसे कहते हैं, जो एक सच्चे पथ-प्रदर्शक के समान होता है. जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकें।

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प्रश्न 4.
सच्चे मित्र की चार विशेषताएँ लिखिए
उत्तर
सच्चे मित्र की चार विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1. वह प्रतिष्ठित हो।
  2. वह दृढ़चित्त और सत्य-संकल्प का हो।
  3. उसमें आत्मविश्वास हो।
  4. वह भरोसेमंद होना चाहिए।

प्रश्न 5.
प्रस्तुत पाठ से अच्छे मित्रों के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत पाठ से अच्छे मित्रों के तीन उदाहरण इस प्रकार हैं

  1. राम और लक्ष्मण।
  2. चन्द्रगुप्त और चाणक्य।
  3. राम और सुग्रीव।

प्रश्न 6.
मित्र का कर्त्तव्य क्या बतलाया गया है?
उत्तर
मित्र का कर्त्तव्य इस प्रकार बतलाया गया है, “उच्च और महान, कार्यों में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना, और साहस दिलाना कि हम अपनी-अपनी सामर्थ्य के बाहर काम करते जाएं।”

मित्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मित्रता’ पाठ का भाव उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मित्रता’ निबंध आचार्य रामचंद्र शक्ल का एक विचारात्मक निबंध है। इस निबंध के द्वारा निबंधकार ने मित्रता के अर्थ, इससे सावधानी, लाभ, आदर्श और आवश्यकता को बतलाने का सफल प्रयास किया है। इस निबंध के द्वारा लेखक ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि मित्रता की धुन सभी को होती है और सभी मित्र बनाते हैं लेकिन बहुत कम श्रेष्ठ, लाभकारी और योग्य मित्र सिद्ध होते हैं। अधिकतर तो मित्र ही होते हैं। इसलिए लेखक ने यह सुझाव दिया है कि अच्छी मित्रता करनी चाहिए। सोच-समझकर मित्रता करनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि श्रेष्ठ मित्रों के योगदान से जीवन निश्चय ही महान् बनता जाता है।

प्रश्न 2.
‘मित्रता’ निबंध के आधार पर मित्रता से लाभ बतलाइए।
उत्तर
‘मित्रता’ निबंध में आचार्य शुक्ल ने मित्रता से लाभ पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि विश्वासपात्र मित्र जीवन की औषधि और खजाना होता है। मित्र हमारे संकल्पों को दृढ़ और दोषों को दूर, सद्गुणों का विकास करता है। हृदय में सत्य, प्रेम और पवित्रता के भावों को उत्पन्न करता है। वह कुमार्ग से हटाकर सुमार्ग पर ले जाता है। वह निराशा में आशा की ज्योति जलाता है। सच्चे मित्र में एक कशल वैद्य के सभी गुण होते हैं।

प्रश्न 3.
कुसंग का ज्वर भयानक क्यों होता है? सोदाहरण बताइए।
उत्तर
कसंग का ज्वर भयानक इसलिए होता है कि यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता अपितु बुद्धि का भी विनाश करता है। उदाहरण के लिए, किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी जो उसे दिन-रात अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहू के समान होगी जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।

प्रश्न 4.
‘विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा रहती है’ इस कथन के आधार पर मित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
व्यक्ति का परिचय एक से अधिक व्यक्ति से संभव है, पर मित्र उनमें कोई बिरला ही होता है और मित्रों में भी विश्वासपात्र मित्र तो बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। विश्वासपात्र मित्र ही जीवन में उपयोगी सिद्ध होता है। वह प्रत्येक कठिनाई से हमें उबार सकता है। अपने हितकारी तथा उपदेशों से वह अपने मित्र की कुरीतियों को दूर कर सकता है। इस तरह विश्वासपात्र मित्र से जीवन निश्चय ही सफल हो जाता है।

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प्रश्न 5.
मित्र का चुनाव करने में क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?
उत्तर
मित्र बनाते समय सर्वप्रथम उसके आचरण तथा स्वभाव पर ध्यान देना चाहिए। मित्र बनाते समय प्रायः उसकी कुछ अच्छी बातों को देखकर ही, उसे मित्र बना लेते हैं। जबकि हमें जिसे मित्र बनाना हो, उसके सम्बन्ध में पूरी तरह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जीवन-पथ पर कितने मित्र हमें आगे बढ़ा सकते हैं। अच्छा मित्र जहाँ हमारे जीवन की दिशा ही बदल देता है वहाँ बुरा मित्र हमें गर्त में भी ढकेल सकता है।

प्रश्न 6.
लेखक ने मित्र का क्या कर्त्तव्य बतलाया है?
उत्तर
लेखक ने मित्र के कर्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अपने मित्र में साहस, बुद्धि और एकता का भाव उत्पन्न करे। वह जीवन और मरण में अपने मित्र का सहारा बने। वह सत्यशील, न्यायी और पराक्रमी बना रहे। वह अपने मित्र का हर कदम पर सहारा बना रहे। जो अपनी सामर्थ्य से बाहर काम कर जाए। मित्र का कर्तव्य है कि वह अपने मित्र पर पूरा विश्वास करे और उसे धोखा न दे।

प्रश्न 7.
अच्छे मित्र में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
उत्तर
अच्छे मित्र में निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  1. अच्छे मित्र पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए।
  2. मित्र पर पूरा विश्वास करे।
  3. सच्चा मित्र भाई के समान होता है।
  4. उसमें सच्ची सहानुभूति होती है।
  5. सच्चा मित्र एक के हानि-लाभ को अपना हानि-लाभ समझता है।
  6. सच्चा मित्र जीवन व मरण में सहायक होता है।

मित्रता लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के श्रेष्ठ निबंधकार तथा समीक्षक हैं। आपका जन्म बस्ती जिले के अगोना नामक गाँव में सन् 1884 में हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा उर्दू तथा अंग्रेजी में हुई। विधिवत् शिक्षा तो वे इंटरमीडिएट तक ही प्राप्त कर सके। शुक्ल जी ने आरंभ में मिर्जापुर के मिशन स्कूल में पढ़ाया। जब काशी में नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा ‘हिंदी शब्द सागर’ का सम्पादन आरंभ हुआ, तो शुक्ल जी को वहाँ कार्य करने का मौका मिला। फिर हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हुए तथा विभागाध्यक्ष बने। शुक्ल जी ने अंग्रेजी, बंगला, संस्कृत तथा हिंदी के प्राचीन साहित्य का गंभीर अध्ययन किया।

शुक्ल जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश ‘आनंद-कादम्बिनी’ पत्रिका के संपादन से हुआ। उसका सम्पादन उन्होंने कई वर्षों तक कुशलतापूर्वक किया था। इसके बाद वे नागरी प्रचारिणी सभा में हिंदी शब्द-सागर’ के सहयोगी संपादक नियुक्त हुए थे। इसके बाद आपने ‘नागरी प्रचारिणी’ पत्रिका का कई वर्षों तक कशलता के साथ संपादन किया। साहित्य-सेवा करते हुए शुक्ल जी ने 8 फरवरी 1941 को अंतिम साँस ली।नाएँ-यों तो शुक्ल जी प्रमुख रूप से निबंधकार और समालोचक के रूप में ही सुविख्यात हैं लेकिन इसके साथ ही कवि भी रहे हैं। यह बहुत कम चर्चा में हैं। उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. निबंध-संग्रह-

  • विचार-वीथि
  • चिन्तामणि भाग 1-2
  • त्रिवेणी।

2. समालोचना

  • जायसी, सूर और तुलसी पर श्रेष्ठ आलोचनाएँ।

3. इतिहास-

  • हिंदी-साहित्य का इतिहास
  • काव्य में रहस्यवाद।

4. कविता-संग्रह-

  • वसंत
  • पथिक
  • शिशिर-पथिक
  • हृदय का मधुर भार,
  • अभिमन्यु-वध।

5. संपादन-

  • हिंदी शब्द-सागर
  • नागरी-प्रचारिणी पत्रिका
  • तुलसी
  • जायसी।

6. अनुवाद-

  • शशांक
  • बुद्ध-चरित
  • कल्पना का आनन
  • आदर्श-जीवन,

5. मेगास्थनीज का भारतीयवर्षीय वर्णन,
6. राज्य प्रबंध-शिक्षा,
7. विश्वप्रपंच।

भाषा-शैली-शुक्ल जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ साहित्यिक भाषा है। उसमें कहीं-कहीं तद्भव शब्द भी आए हैं। मुख्य रूप से आपकी भाषा गम्भीर, संयत, भावपूर्ण और सारगर्भित है। आपके शब्द चयन ठोस, संस्कृत और उच्च-स्तरीय हैं। उर्दू, अंग्रेजी और फारसी शब्दों के प्रयोग कहीं-कहीं हुए हैं। अधिकतर संस्कृत और प्रचलित शब्द ही आए हैं। शक्ल जी की शैली गवेषणात्मक, मुहावरेदार और हास्य-व्यंग्यात्मक है। इससे विषय का प्रतिपादन सुंदर ढंग से हुआ है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शुक्ल जी की भाषा-शैली विषयानुकूल होकर सफल है।

व्यक्तित्व-शक्ल जी का व्यक्तित्व सर्वप्रथम कविमय व्यक्तित्व था। वह धीरे-धीरे समीक्षक और निबंधकार सहित इतिहासकार के रूप में बदलता गया। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि शुक्ल जी का व्यक्तित्व विविध है। इसीलिए वे एक साथ कई रूपों में देखे जाते हैं। अगर हम संक्षेप में उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना चाहें तो कह सकते हैं कि शुक्ल जी युग-प्रवर्तक प्रधान व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार हैं।

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प्रश्न 2.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-लिखित निबंध ‘मित्रता’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
यह निबंध आचार्य रामचंद्र शुक्ल का विवरण प्रधान निबंध है। इसमें मित्र के विषय में अच्छा उल्लेख हुआ है। मित्र-कुमित्र का परिचय देते हुए लेखक ने मित्रता की परिभाषा और महत्त्व को बतलाया है। लेखक के अनुसार जब कोई युवक बाहरी संसार में प्रवेश करता है तो उसे सबसे पहले अपना मित्र चुनने में कठिनाई होती है। जरा-सी असावधानी के कारण कुछ लोगों से उसकी मित्रता हो जाती है। इसकी सफलता उसकी जीवन की सफलता पर निर्भर होती है। ऐसा इसलिए कि जब हम समाज में प्रवेश करते हैं तब हमारा चित्त बहुत ही कच्चा होता है। इसलिए ऐसे लोगों का साथ एकदम बुरा होता है जो हमें नियंत्रित रखते हैं। विवेक के कारण इस बात का डर नहीं रहता लेकिन युवा मन में विवेक बहुत कम होता है।

यह आश्चर्य की बात है कि घोड़े के गुण-दोष को तो लोग परखते हैं, लेकिन मित्र के नहीं। ऐसे लोग मित्रता के उद्देश्य को भूल जाते हैं। एक प्राचीन विद्वान के अनुसार-“विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा होती है। जिसे ऐसा मित्र मिल गया हो, मानो उसे खजाना मिल गया हो। इसलिए हमें अपने मित्रों से यही आशा रखनी चाहिए कि वे हमारे उत्तम संकल्पों को दृढ़ करेंगे। दोषों और त्रुटियों से बचाएँगे और हममें सत्य, पवित्रता और मर्यादा को पुष्ट करेंगे। हमें कुमार्ग से बचाएँगे-यही नहीं हमें हतोत्साह से उत्साह की ओर ले जाएंगे।छात्रावस्था में मित्रता की धुन इतनी सवार रहती है कि मित्र बनाने में आनंद का ओर-छोर नहीं होता है। उस समय मित्रता के आदर्शों को भूल जाते हैं। थोड़ी-सी बातें देखकर झट मित्र बना लेते हैं। ऐसे मित्र जीवन-संग्राम में साथ नहीं देते। वास्तव में मित्र तो एक विश्वासपात्र पथ-प्रदर्शक होता है।

दो मित्रों के बीच में परस्पर सहानुभूति होनी आवश्यक है न कि प्रकृति और आचरण आवश्यक है। इसीलिए राम और लक्ष्मण के परस्पर स्वभाव भिन्न तो रहे लेकिन मित्रता खूब निभी थी। हमें ऐसे मित्रों की खोज करनी चाहिए जिनमें हमसे कहीं अधिक आत्मबल हो। हमें उनका पल्ला उसी प्रकार पकड़ना चाहिए जैसे सुग्रीव ने राम का पकड़ा था। शिष्ट और सत्यनिष्ठ, मृदुल, पुरुषार्थी और शुद्ध बुद्धि वाले ही मित्र भरोसेमंद होते हैं। यही बातें जान-पहचान वालों के भी संबंध में लागू हैं। ऐसे लोगों से ही हम अपने जीवन को आनंदमय और उत्तम बना सकते हैं। जान-पहचान बढ़ा लेना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन जीवन-पथ पर सच्चे प्रेम का सुख और शान्ति प्रदान करने वालों का साथ मिलना निश्चय ही कठिन है।

कुसंग का असर सबसे बढ़कर भयानक होता है, क्योंकि इससे न केवल नीति और सद्वृत्ति का ही अपितु सद्बुद्धि का भी नाश होता है। इसलिए कुसंगति तो पैरों में बँधी हुई चक्की और सुसंगति सहारा देने वाली भुजा के समान होती है। यही कारण है कि कुछ ऐसी ही न पड़ने वाली बुरी बातें कुसंगति से कानों में कुछ ही समय में पड़ जाती हैं जिनसे पवित्रता नष्ट हो जाती है। इतनी जल्दी तो कोई भी अच्छी बात प्रभावित नहीं करती है। इसीलिए हमें ऐसी पूरी कोशिश करनी चाहिए कि हम किसी प्रकार की कुसंगति न करें। यह ध्यान देना चाहिए कि हम किसी प्रकार की बुरी बातों के अभ्यस्त न होवें। शुरू-शुरू में ही आने वाली हर बुरी बातों की छूत से हम बच जावें, एक पुरानी कहावत है

‘काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय,
एक लीक काजल की लागि है पै लागि है।”

मित्रता संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गयांशों की सप्रसंग व्याख्या, अर्वग्रहण संबंधी एवं विषय-वस्त पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. हम लोग ऐसे समय में समाज में प्रवेश करके अपना कार्य आरंभ करते हैं, जब कि हमारा चित्त कोमल और हर तरह का संस्कार ग्रहण करने योग्य रहता है। हमारे भाव अपरिमार्जित और हमारी प्रवृत्ति अपरिपक्व रहती हैं। हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं, जिसे जो जिस रूप में चाहे, उस रूप में ढाले-चाहे राक्षस बनाए, चाहे देवता।

शब्दार्थ-चित्त-हदय। संस्कार-आदत, स्वभाव। अपरिमार्जित-मलीन। अपरिपक्व-कच्चा।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित और आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने नए-नए

व्यक्ति के अनुभवहीनता के स्वरूप को प्रकाश में लाते हुए कहा है कि

व्याख्या-समाज में प्रवेश करने वाले व्यक्ति लगभग जीवन-क्षेत्र के अनुभव से कोसों दूर रहते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति अपनी अनुभवहीनता को लेकर अपना कार्य आरंभ करते हैं। उस समय ऐसे व्यक्ति अपने हृदय के बहुत ही कोमल, सरस और सरल होते हैं। यही कारण है कि उनकी योग्यता सभी प्रकार की आदतों और प्रभावों को अपनाने में सफल दिखाई पड़ती है। इस प्रकार के व्यक्ति अपने स्वभाव और स्वरूप से मलिन और असुन्दर दिखाई देते हैं। उनकी सभी प्रकार की आदतें भी पूरी कच्ची-ही-कच्ची होती हैं। इसे यों समझा जा सकता है जिस प्रकार कच्ची मिट्टी मूर्ति के समान चुपचाप और सरल होती है और जिसे चाहे जो चाहे वह बना ले। ठीक उसी प्रकार समाज में नया-नया प्रवेश करने वाला व्यक्ति भी स्वयं पर निर्भर न होकर समाज के दूसरे अनुभवी और पुराने लोगों पर ही निर्भर होता है। ऐसे लोगों के हाथ में उस नए व्यक्ति का भाग्य होता है। इसे वे देवता, राक्षस आदि जिसमें चाहें उसे बदल दें।

विशेष-

  1. भाषा में प्रवाह है।
  2. शैली बोधगम्य है।
  3. सभी तथ्य सुझावपूर्ण है।
  4. इस अंश से प्रेरणा मिलती है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कार्य आरंभ करने के लिए लेखक ने क्या आवश्यक बतलाया है?
(ii) कार्य आरंभ करते समय हमारी प्रवृत्ति कैसी रहती है?
उत्तर
(i) कार्य आरंभ करने के लिए लेखक ने चित्त को अत्यधिक सरस, सरल और कोमल होना आवश्यक बतलाया है। इसके साथ ही उसे यह भी होना आवश्यक बतलाया है कि वह हर प्रकार के संस्कारों को ग्रहण करने योग्य हो।
(ii) कार्य आरंभ करते समय हमारी प्रवृत्ति बहुत ही कच्ची रहती है। उसे किसी प्रकार का अनुभव प्राप्त नहीं हुआ होता है। इस प्रकार वह किसी प्रकार के संस्कारों को तुरंत ही ग्रहण करने लगती है।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कच्ची मिट्टी की मूर्ति की क्या विशेषता होती है?
(ii) ‘चाहे राक्षस बनाए, चाहे देवता’ का आशय क्या है?
उत्तर
(i) कच्ची मिट्टी की मूर्ति की यह विशेषता होती है कि वह दूसरे के अधीन होती है। वह इतनी सरल, सीधी और शान्त होती है कि उसे कोई कुछ भी रूप या आकार दे दे, वह उसका तनिक भी विरोध न करके उसे चुपचाप स्वीकार कर लेती है।
(ii) ‘चाहे राक्षस बनाए, चाहे देवता’ का आशय यह है कि समाज में प्रवेश करनेवाला हर प्रकार से अनुभवरहित होता है। वह इसीलिए आत्मनिर्भर होकर कोई काम करने में असमर्थ होता है। वह तो अनुभवी लोगों पर पूरी तरह से निर्भर होता है। वह अपने को उन्हीं लोगों को सौंप देता है। अब उनके ऊपर निर्भर होता है कि वे उसे बुरा बनाते हैं या अच्छा।

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2. मित्र भाई के समान होना चाहिए जिसे हम अपना प्रीतिपात्र बना सकें। हमारे और हमारे मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए। ऐसी सहानुभूति जिससे एक के हानि-लाभ समझे। मित्रता के लिए यह आवश्यक नहीं कि दो मित्र एक ही प्रकार के कार्य करते हों या एक ही रुचि के हों। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में बराबर प्रीति और मित्रता रही है।

शब्दार्थ-प्रीति-प्रेम। सहानुभूति-दुःख-सुख समझने का अनुभव। रुचि-इच्छा।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल-लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने मित्र के अच्छे स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-मित्र कल्याणकारी और उपकारी होना चाहिए। उसका किया हुआ कल्याण और उपकार निश्चित रूप से सगे भाई के समान होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि सगे भाई का कल्याण और उपकार हर प्रकार से प्रीतिकारक सिद्ध होता है। इससे – हमारे और हमारे बने हुए मित्र के बीच परस्पर सही और वास्तविक सहानुभूति का होना परम आवश्यक होता है। इस प्रकार की सहानुभूति के द्वारा ही एक दूसरा अपनी-अपनी हानि-लाभ के विषय में सोच-समझ सकता है अन्यथा नहीं। मित्रता के विषय में यह निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि परस्पर दोनों एक ही प्रकार के कार्य-व्यापार करते हों। यह भी आवश्यक नहीं कि परस्पर दोनों एक ही विचारधारा के हों। मित्र तो एक-दूसरे के विपरीत विचारधारा के होकर भी परस्पर अधिक प्रीतिकारक और कल्याणकारक सिद्ध होते हैं।

विशेष-

  1. भाव सरल और स्पष्ट है।
  2. मित्र के सच्चे स्वरूप का उल्लेख हुआ है।
  3. मित्रता के लिए आवश्यक गुणों का वर्णन हुआ है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) मित्र को भाई के समान क्यों होना चाहिए?
(ii) मित्र के बीच कैसी सहानुभूति होनी चाहिए?
उत्तर
(i) मित्र को भाई के समान होना चाहिए। यह इसलिए कि उससे हम अपना दुःख-सुख कहकर उसमें उसे भागीदार बना सकें।
(ii) मित्र के बीच वह सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए, जो हानि-लाभ का पूरा-पूरा ध्यान रखे।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त गद्यांश में किसका उल्लेख हुआ है?
(ii) मित्रता के लिए मुख्य रूप से क्या आवश्यक है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त गद्यांश में सच्चे मित्र के स्वरूप का उल्लेख हुआ है।
(ii) मित्रता के लिए मुख्य रूप से प्रीतिकारक और कल्याणकारक होना आवश्यक है।

3. कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि युद्ध का भी क्षय करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-रात अवनति के गहे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाह के समान होगी, जो उसे निरंतर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।

शब्दार्थ-कुसंग-बुरा संग। सद्वृत्ति-अच्छाई। क्षय-नाश। अवनति-अविकास। बाहु-भुजा। निरन्तर-हमेशा।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित लेखक आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने कुसंगति के भयानक फल को बतलाते हुए कहा है कि
व्याख्या-जो भी व्यक्ति एक बार भी कुसंगति में पड़ जाता है उसके भयानक फलों को भोगने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसा इसलिए कि कुसंगति सभी प्रकार की अच्छाइयों को ही नष्ट करने में लग जाती है। इसलिए इससे, अच्छे-अच्छे सिद्धांतों-संस्कारों और अच्छे उद्देश्यों का विनाश तो होता ही है, इसके साथ-ही-साथ सद्बुद्धि का भी पूरा विनाश होने में तनिक भी देर नहीं लगती है। इसलिए यह कहना बहुत ही उचित है कि किसी भी बुरी संगति वाले अनुभव से ही युवक की कुसंगति बहुत ही दुःखद होती है। यह तो ठीक उसी प्रकार की होती है जिस प्रकार से किसी के पैरों में बंधी हुई चक्की होती है। और वह उसे विकास और सुख की ओर न ले जाकर बार-बार दुःख के गड्ढे में ही गिराती जाती है। लेखक का पुनः कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को अच्छी संगति मिल गई है तो इससे उसको निरंतर भला और सुख ही मिलता जाएगा। इस प्रकार की संगति तो उस भुजा के समान ही होती है जो उसे हर प्रकार से सुख और कल्याण के शिखर पर बैठाने में सहायक होगी।

विशेष-

  1. भाव हृदयस्पर्शी है।
  2. उपदेशात्मक शैली है।
  3. तत्सम शब्दावली की प्रधानता है।
  4. संपूर्ण अंश प्रेरणादायक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुसंगति का असर कैसा होता है?
(ii) कुसंगति का असर सबसे अधिक किस पर होता है और क्यों?
उत्तर
(i) कुसंगति का असर बहुत ही भयानक होने के कारण दुखद होता है। जिस पर कुसंगति का असर पड़ जाता है, उसके नियम-सिद्धान्त समाप्त हो जाते हैं। इससे उसकी सद्वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इस तरह कुसंगति से बुद्धि-विवेक देखते-देखते समाप्त हो जाते हैं।
(ii) कुसंगति का असर युवा-पीढ़ी पर सबसे अधिक पड़ता है। ऐसा इसलिए कि उसकी समझ बहुत कम होती है। उसका चित्त बिल्कुल अविकसित होता है। उसका अनुभव बिल्कुल न के बराबर होता है।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कुसंग क्या होता है?
(ii) कुसंग का क्या फल होता है?
उत्तर-
(i) कुसंग एक भयंकर ज्वर के समान होता है, जिसकी चपेट में आने वालों को केवल हानि उठानी पड़ती है।
(ii) कुसंग का फल बड़ा ही भयानक होता है। इसकी चपेट में प्रायः युवावर्ग आता है। वह कुसंग में पड़कर हानि ही उठाता रहता है। उससे उसका बाहर निकलना असंभव-सा हो जाता है।

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4. बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनके घड़ी भर के साथ से भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है क्योंकि उतने ही बीच में ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं जो कानों में न पड़नी चाहिए। चित्त पर ऐसे प्रभाव पड़ते हैं जिनसे उसकी पवित्रता का नाश होता है। बुराई अटल भाव से धारण करके बैठती है। बुरी बातें हमारी धारणा में बहुत दिनों तक टिकती हैं। इस बात को प्रायः सभी लोग जानते हैं कि भद्दे-फूहड़ गीत जितनी जल्दी ध्यान पर चढ़ते हैं उतनी जल्दी कोई गंभीर या अच्छी बात नहीं।

शब्दार्थ-भ्रष्ट-नष्ट। चित्त-हदय। पवित्रता-सच्चाई। अटल-स्थिर। धारणा-विचार। गंभीर-ठोस।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित लेखक आचार्य श्री रामचंद्र शुक्ल-लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने अच्छी-बुरी बातों के प्रभाव के विषय में बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या-संसार में अधिकांश लोग ऐसे अवश्य ही मिल जाएँगे जिनका थोड़ा-सा भी साथ अनेक प्रकार के विनाश का कारण बन जाता है। ऐसे लोगों का साथ निश्चय ही सद्बुद्धि को विनष्ट करने में देर नहीं लगाता है। ऐसा इसलिए कि इस थोड़े से ही समय में कुछ ऐसी उलजलूल बातें अवश्य हो जाती हैं जो हर प्रकार से अनुचित और अहितकर ही होती हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बुराई का प्रभाव हृदय-स्थल पर इस तरह से पड़ता है कि इससे कहीं कुछ भी सच्चाई-अच्छाई का नामोनिशान नहीं रह जाता है। यह सब कुछ इसलिए होता है कि जो एक बार भी बुरी बातें हमारे हृदय में प्रवेश कर जाती हैं वे स्थिर और अटल भाव से होती हैं। वे बहुत दिनों तक ज्यों-की-त्यों पड़ी रहती हैं। इसलिए इस बात को सभी मानते और समझते हैं कि भद्दे और गन्दे गीतों के असर इतनी जल्दी और देर तक होते हैं कि ऐसे असर सुंदर और अच्छे गीतों के भी नहीं होते हैं।

विशेष-

  1. अच्छी और बुरी बातों के प्रभाव का आकर्षक उल्लेख है।
  2. तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. शैली बोधगम्य है।
  4. सारा अंश उपदेशात्मक है।
  5. उपमा अलंकार है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i)कुसंग का असर किस प्रकार होता है?
(ii) बुराई और अच्छाई में क्या अंतर है?
उत्तर
(i) कुसंग का असर तुरंत पड़ने लगता है। यहाँ तक कि घड़ी भर में ही कुसंग अपना दुष्प्रभाव दिखाने लगता है।
(ii) बुराई और अच्छाई में बहुत बड़ा अंतर है। बुराई में अटलता होती है, जबकि अच्छाई में नहीं। बुराई तुरंत अपना प्रभाव डालती है, जबकि अच्छाई धीरे-धीरे।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बुराई से सबसे पहले क्या हानि होती है?
(ii) उपर्युक्त गांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) बुराई से सबसे पहले बुद्धि की हानि होती है। इससे अच्छाई की पवित्रता विनष्ट हो जाती है। इससे हमारा सोच-समझ मलिन हो जाती है।
(ii) उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव है-कुसंगति और सत्संगति क्या होती है। इसे समझाते हुए सत्संगति का महत्त्व बतलाना।

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 10th Special Hindi पत्र-लेखन

MP Board Class 10th Special Hindi पत्र-लेखन

इस प्रश्न की परिधि में पारिवारिक, विद्यालयीन एवं कार्यालयीन पत्र लिखने को आते हैं। इसके हेतु 5 अंक नियत हैं।

पत्र लिखना भी कला के अन्तर्गत आता है। इस कला में जो व्यक्ति जितना सिद्धहस्त तथा पटु होगा, जिन्दगी में उतनी ही उन्नति की डगर तय करेगा। पत्र मात्र भावों तथा विचारों को व्यक्त करने का ही साधन नहीं है अपितु इसकी परिधि में लेखक का व्यक्तित्व परोक्ष रूप से झाँकता है।

पत्र चाहे पारिवारिक हो अथवा सामाजिक,सब में लेखक का व्यक्तित्व मुखरित होता है। व्यक्तित्व भिन्न होने के कारण पत्र लेखन की शैली भी अनेकरूपता लिए होती है। शासकीय, कार्यालयीन, व्यावसायिक एवं विद्यालयीन पत्र एक नियत पद्धति के अनुसार लिखे जाते हैं। निरन्तर अभ्यास तथा पढ़ने-लिखने से इसे सफलतापूर्वक लिखा जा सकता है।

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प्रस्तुत पुस्तक में क्रमशः पारिवारिक, विद्यालयीन और कार्यालयीन पत्र दिये गये हैं, जो क्रमशः इस प्रकार हैं-

1. पारिवारिक पत्र

प्रश्न 1.
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए अपने मित्र को बधाई देते हुए एक पत्र लिखिए। [2010]
उत्तर-

49,गाँधी नगर,
ग्वालियर
20.7.20……

प्रिय मित्र नगेन्द्र कुमार,

सप्रेम हार्दिक अभिनन्दन!
आज तुम्हारा पत्र प्राप्त हुआ। सौभाग्य से आज ‘अमर उजाला’ में तुम्हारा परीक्षा परिणाम भी पढ़ा। जैसे ही तुम्हारा अनुक्रमांक प्रथम श्रेणी के कॉलम में देखा,मन प्रसन्नता से गद्गद् हो उठा। हर्षातिरेक में मैंने अपने भाई को गोद में उठा लिया और नाचने लगा।

तो सबसे पहले तुम्हें मेरी बहुत-बहुत बधाई। मैं परम पिता परमात्मा से सदैव यह प्रार्थना करता रहूँगा कि तुम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता अर्जित करो और दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करते रहो। माताजी,पिताजी को सादर अभिवादन। छोटे बच्चों को स्नेह। पत्रोत्तर शीघ्र देना।

तुम्हारा शुभेच्छु
रजनीकान्त

प्रश्न 2.
वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर अपने मित्र को एक बधाई-पत्र लिखिए। (2013)
उत्तर-
प्रश्न 1 के उत्तर की सहायता से स्वयं लिखिए।

प्रश्न 3.
अपने मित्र/छोटे भाई को एक पत्र लिखकर उसे नित्य समाचार-पत्र पढ़ने की प्रेरणा दीजिए। (2009)
उत्तर

कमलागंज,
शिवपुरी
10-6-20…

प्रिय मित्र रमेश,
नमस्कार।
तुम्हारा पत्र बहुत समय से प्राप्त नहीं हुआ। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम मुझे पत्र लिखना ही भूल गये हो।

तुम्हें अपनी पढ़ाई निरन्तर करते रहना चाहिए। इसी में तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है। पुस्तकीय ज्ञान-प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य ज्ञान भी होना आवश्यक है। व्यक्ति को समाचार-पत्रों से भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। इस हेतु व्यक्ति को समाचार-पत्र पढ़ना बहुत आवश्यक है। समाचार-पत्रों से देश-विदेश का ज्ञान प्राप्त होता है। अतः मेरी यह राय है कि अपने ज्ञान को और उन्नत बनाने को समाचार-पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। आधुनिक युग में समाचार-पत्र पढ़ना आवश्यक है।

तुम्हारा मित्र
देवेन्द्र

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प्रश्न 4.
अपने मित्र को उसके अनुत्तीर्ण हो जाने पर संवेदना प्रकट करते हुए एक प्रेरक पत्र लिखिए जिससे वह इस बार अच्छी तैयारी के साथ उत्साहपूर्वक परीक्षा में बैठे। [2009]
उत्तर-

30, रामनगर,
सागर
26-7-20….

प्रिय मित्र देवेन्द्र,

सप्रेम नमस्कार।
आज के समाचार-पत्र ‘दैनिक भास्कर’ में तुम्हारा परीक्षा परिणाम देखा। लेकिन तुम्हारा अनुक्रमांक वहाँ नहीं था। यह जानकर मुझे दुःख है कि तुम परीक्षा में सफल नहीं हो सके। इस वर्ष बोर्ड का परीक्षाफल अधिक अच्छा न था।

अतः तुम चिन्ता न करो। अगले वर्ष की परीक्षा के लिए उचित प्रकार से तैयारी करके अच्छे अंक प्राप्त करना। मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं। बड़ों को प्रणाम व छोटे भाई-बहनों को प्यार।

तुम्हारा मित्र
प्रदीप

प्रश्न 5.
मित्र को पत्र लिखकर प्रात:काल उठने का महत्त्व समझाइये। (2009)
उत्तर-

शिवपुरी,
दिनांक 20-7-20…

प्रिय रोहित,

नमस्कार।
तुम्हारा पत्र आया तुम्हारी कुशलता का पूर्ण समाचार मिला। यहाँ पर सब ठीक प्रकार से हैं। मैं तुम्हें मित्र होने के कारण एक अच्छी सलाह दे रहा हूँ कि प्रातःकाल उठकर तुम घूमने के लिए जाओ। घूमना प्रत्येक व्यक्ति के लिए लाभदायक है।

घूमने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है, किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते हैं। व्यक्ति पूर्णरूप से स्वस्थ रहता है। अतः तुम प्रतिदिन प्रातः काल टहलने जाया करो। पूज्यजनों को यथायोग्य नमस्कार कहना,छोटे भाई-बहिनों को प्यार। पत्रोत्तर शीघ्र देना।

तुम्हारा मित्र
प्रेम कुमार

प्रश्न 6.
अपने बड़े भाई के विवाह में अपने मित्र को आमन्त्रित करने के लिए पत्र लिखिए। [2015]
उत्तर

16, माधव कुंज,
ग्वालियर (म.प्र)
दिनांक : 10-01-20…

प्रिय मित्र स्वप्निल,

सप्रेम नमस्कार।
शुभ समाचार यह है कि मेरे बड़े भाई श्री सुरेश कुमार का शुभ विवाह दिनांक 24 जनवरी, 20… को होना निश्चित हुआ है। तुम तो जानते ही हो कि ऐसे शुभ अवसर पर तुम्हारा आगमन मेरे लिए कितना सुखद और आनन्ददायक होगा। तुम्हें इस विवाह में वैवाहिक कार्यक्रमों से पूर्व ही आना होगा। निमन्त्रण पत्र छपते ही तुम्हें भेज दूंगा। तुम इसी निमन्त्रण को स्वीकार कर पधारने का कष्ट करना। पिताजी और माताजी को चरण स्पर्श।

तुम्हारा अभिन्न मित्र
अखिलेश

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प्रश्न 7.
अपने पिताजी को पत्र लिखकर अपनी शैक्षिक प्रगति एवं लक्ष्य से अवगत कराइए। [2011, 18]
अथवा
वार्षिक परीक्षा की तैयारी का उल्लेख करते हुए अपने पिताजी को एक पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर-

ग्वालियर
19 जनवरी,20……..

आदरणीय पिताजी/माताजी,

सादर प्रणाम।
आपकी अनुकम्पा से मैं पूरी तरह स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त हूँ। मेरी वार्षिक परीक्षा बहुत निकट है। परीक्षा को दृष्टि-पथ में रखकर मैं पूरी तरह से तैयारी करने में जुटा हूँ। इस समय मुझ पर भूगोल तथा अंग्रेजी की पुस्तकें नहीं हैं। पुस्तकों के अभाव में मेरी विधिवत् पढ़ाई नहीं हो पा रही है। अपनी तरफ से मैं पढ़ाई की तैयारी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा हूँ। विज्ञान एवं गणित में कुछ कठिनाई का अनुभव कर रहा हूँ, अतः इसके निमित्त कोचिंग की आवश्यकता है।

मुझे पूरा भरोसा है कि गत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष मैं आपकी आशा के अनुरूप उत्तम श्रेणी प्राप्त करने में सक्षम सिद्ध होऊँगा।

माताजी को चरण-वंदना,छोटे भाइयों को ढेर सारा प्यार तथा बहिनजी को शत-शत प्रणाम कहना। पत्र के उत्तर की प्रतीक्षा में।

आपका बेटा
पुलकित

प्रश्न 8.
अपने बड़े भाई को पत्र लिखिए और उन्हें बताइए कि गर्मी की छुट्टियाँ किस प्रकार व्यतीत करना चाहते हैं ? [2014, 17]
उत्तर

20, अशोकनगर
जबलपुर
दिनांक-1 मार्च,20…..

आदरणीय भाईसाहब,

सादर प्रणाम।
मैं यहाँ कुशल हूँ, आशा है कि आप सानन्द होंगे। आजकल मैं परीक्षा की तैयारी में लगा हूँ, इसीलिए पत्र लिखने में देर हो गई है। मेरी परीक्षाएँ 7 मार्च से प्रारम्भ होंगी और 5 अप्रैल तक चलेंगी। परीक्षाएँ समाप्त होते ही विद्यालय की ओर से एक ग्रीष्मावकाश भ्रमण का आयोजन निश्चित किया गया है। भ्रमण के लिए सभी लोग कश्मीर जायेंगे। इसके लिए प्रत्येक विद्यार्थी को दो हजार रुपये जमा करने हैं। यात्रा,आवास और भोजन का प्रबन्ध इसी में से किया जायेगा। कुछ धनराशि विद्यालय लगायेगा। मैं इस भ्रमण में जाना चाहता हूँ। अतः आप तीन हजार रुपये भिजवाने की कृपा करें ताकि मैं रुपये जमा कर सकूँ। घर पर माताजी, पिताजी को चरण स्पर्श, भाभीजी को प्रणाम,प्रिय चिन्मय को प्यार।

आपका अनुज
धीरज

2. विद्यालयीन-पत्र

प्रश्न 9.
बुक बैंक से पुस्तकें प्राप्त करने के लिए अपने विद्यालय के प्राचार्य को प्रार्थनापत्र लिखिए। [2009]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
दूरा उ.मा.शाला,
ग्वालियर

विषय-बुक बैंक से पुस्तकें प्राप्त करने हेतु आवेदन।

महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा 10 ‘अ’ का एक अत्यन्त निर्धन छात्र हूँ। मेरे पिताजी मजदूरी करके घर का लालन-पालन करते हैं।

पिताजी की आय अल्प होने की वजह से मैं पुस्तकें खरीदने में भी असमर्थ हैं। अत: श्रीमान् जी से अनुरोध है कि मुझे बुक बैंक से पुस्तकें प्रदत्त करने की कृपा करें। इस सन्दर्भ में शाला के जो नियम होंगे उनका मैं पूरी तरह पालन करूँगा। आपकी इस महती कृपा के लिए मैं आजन्म आभारी रहूँगा।

दिनांक : 11-8-20……..

प्रार्थी
विकास जैन
कक्षा 10 ‘अ’

प्रश्न 10.
अपने प्राचार्य महोदय को विद्यालय छोड़ने (स्थानान्तरण) का प्रमाण-पत्र देने के लिए आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 14,16, 18]
अथवा
पिताजी के स्थानान्तरण के कारण अपनी शाला के प्राचार्य को शाला-त्याग प्रमाण-पत्र देने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
उत्तर-
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
शासकीय उच्चतर मा.वि.,
ग्वालियर

मान्यवर,
सेवा में विनम्र प्रार्थना है कि प्रार्थी ने आपके विद्यालय से कक्षा 9 की परीक्षा उत्तम अंक लेकर उत्तीर्ण की है। संयोगवश मेरे पिताजी का स्थानान्तरण मुरैना हो गया है। इस हेतु मैं आपके आदर्श विद्यालय में आगे अध्ययन करने में असमर्थ हूँ।

अतः मुझे सधन्यवाद शाला त्याग (स्थानान्तरण) प्रमाण-पत्र प्रदान करने की अनुकम्पा करें।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
अक्षय कुलश्रेष्ठ
कक्षा 9-स
अनुक्रमांक -1537

 

दिनांक :10-8-20………

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प्रश्न 11.
प्राचार्य को शुल्क मुक्ति के लिए आवेदन कीजिए। [2010]
अथवा
अपनी निर्धनता का उल्लेख करते हुए शाला शुल्क मुक्ति हेतु अपने प्राचार्य को आवेदन पत्र लिखिए। [2015]
अथवा
शाला शुल्क मुक्ति के आर्थिक कारण बताते हुए प्राचार्य को आवेदन पत्र लिखिए। [2009]
उत्तर-
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
शासकीय उच्चतर मा.वि,
रायपुर

विषय-शाला शुल्क मुक्ति के सम्बन्ध में।

मान्यवर,
विनम्र निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय का कक्षा X का छात्र हूँ। मेरे अभिभावक (पिताजी) एक स्थान पर प्राइवेट नौकरी करते हैं। उन्हें मासिक वेतन मात्र पाँच सौ रुपये मिलता है। इतने अल्प वेतन से परिवार की रोजी-रोटी की समस्या भी कठिनाई से हल हो पाती है। पिताजी पर पैसे की कमी होने के कारण मैं अपनी पाठ्य-पुस्तकों को क्रय करने में भी असमर्थ हूँ।

अतः श्रीमान् जी से करबद्ध निवेदन है कि मुझे शाला के शुल्क से मुक्ति प्रदान करने की महती कृपा करें। इस कृपा के लिए मैं आपका आजीवन आभारी रहूँगा।

दिनांक :25-7-20……..

प्रार्थी
मनोज कुमार
कक्षा X-C

3. कार्यालयीन-पत्र

प्रश्न 12.
डाक वितरण में अनियमितता के कारण आपको जो हानि हुई है, उसके सम्बन्ध में एक शिकायती पत्र डाक अधीक्षक महोदय को लिखिए।
उत्तर-
गाँधी नगर,
ग्वालियर (म.प्र)।
दिनांक : 07-09-20……..

श्रीमान् अधीक्षक महोदय.
मुख्य डाक-तार घर,
ग्वालियर (म.प्र)

महोदय,
मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि हमारे इलाके के अन्तर्गत डाक वितरण की उचित व्यवस्था नहीं है। मेरे पत्र ज्यादातर दूसरे के पते पर प्रेषित कर दिये जाते हैं।

मान्यवर भूल से मेरा एक नौकरी का साक्षात्कार पत्र किसी और के यहाँ चला गया, परिणामस्वरूप में साक्षात्कार से वंचित रह गया। इससे मुझे जो कष्ट हुआ उसका उत्तरदायी कौन है ?

अतः आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि इस ओर विशेष ध्यान देकर डाक वितरण की उचित व्यवस्था करें, जिससे भविष्य में जन-सामान्य को इस भाँति की असुविधा न हो।

सधन्यवाद

भवदीय
मोहित

प्रश्न 13.
आप सुरेश कुमार हैं। आप ई-5/102 न्यू ईदगाह कॉलोनी, भोपाल में रहते हैं। आप नगर निगम को एक आवेदन-पत्र लिखिए, जिसमें नालियों की सफाई व कीटनाशक दवा के छिड़काव का सुझाव हो।
उत्तर-

ई-5/102, न्यू ईदगाह कॉलोनी,
भोपाल

सेवा में,
आयुक्त महोदय,
नगर निगम, भोपाल।

मान्यवर,
मैं आपका ध्यान न्यू ईदगाह कॉलोनी की स्वच्छता के सन्दर्भ में आकर्षित करना चाहता हूँ। इस कॉलोनी में नियमित रूप से सफाई नहीं होती है। नालियाँ तथा सड़कें घोर गन्दगी से पटी रहती हैं। नालियों पर मच्छरों का अम्बार लगा हुआ है।

आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि अपने अधीनस्थ सफाई कर्मियों को कॉलोनी में नालियों की सफाई करने तथा कीटनाशक दवा का छिड़काव करने का आदेश दें। ऐसा होने से कालोनी का वातावरण स्वच्छ एवं स्वास्थ्यप्रद बनेगा।

भवदीय
अक्षय कुमार

दिनांक : 15-1-20………..

MP Board Solutions

प्रश्न 14.
परीक्षाकाल में ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक लगाने हेतु जिलाधीश महोदय को पत्र लिखिए। [2012]
उत्तर-
डी-6/133,शान्ति कॉलोनी,
मुरैना

सेवा में,
जिलाधीश महोदय,

मुरैना। मान्यवर,
मैं आपका ध्यान अपनी कॉलोनी में ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के जोर से बजने की वजह से उपस्थित समस्या की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। कारण यह है कि माध्यमिक शिक्षा मण्डल की हाईस्कूल तथा इण्टरमीडिएट की परीक्षाएँ सम्पन्न होने जा रही हैं। परीक्षाकाल में ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के शोर के कारण छात्रों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। पढ़ाई का क्रम रुक रहा है तथा चित्त की एकाग्रता भंग हो रही है।

अतः आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि आप तत्काल ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के बजने पर प्रतिबन्ध लगाने का निर्देश पारित करें, जिससे छात्रगण शान्त वातावरण में परीक्षा की भली प्रकार तैयारी करने में सक्षम हो सकें।

भवदीय
राहुल

दिनांक : 10 मार्च,20…….

प्रश्न 15.
अपने शहर के नगरपालिका अधिकारी को शिकायती पत्र लिखते हुए मोहल्ले में व्याप्त गन्दगी को दूर करने का निवेदन कीजिए। [2011, 17]
उत्तर-
सेवा में,
अधिशासी अधिकारी,
नगरपालिका-शिवपुरी।
विषय-गन्दगी की समस्या।

महोदय,
मैं आपका ध्यान न्यू कॉलोनी में व्याप्त गन्दगी और दुर्दशा की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। इस मोहल्ले में आये हुए छ: वर्ष हो गये लेकिन यहाँ पर कुछ सड़कें ऐसी हैं,जहाँ पर जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं और स्थान-स्थान पर नालियाँ भी टूटी हुई हैं। उन नालियों में गन्दगी भरी होने के कारण नालियों का पानी सड़कों पर बहता रहता है।

सफाई कर्मचारियों की लापरवाही के कारण यह मोहल्ला जीता-जागता नरक बना हुआ है। मौसम बदलाव व गन्दगी के कारण मच्छरों का भी प्रकोप हो गया है, जो कि बीमारियों का कारण है।

आपसे निवेदन है कि कृपया इस बस्ती की दुर्दशा को देखते हुए इसकी सड़कों की सफाई और नालियों की मरम्मत करवाने का कष्ट करें। धन्यवाद सहित

भवदीय
अक्षय कुलश्रेष्ठ

दिनांक : 5-4-20…

प्रश्न 16.
मध्य प्रदेश बोर्ड भोपाल से हाईस्कूल परीक्षा प्रमाण-पत्र मँगाने हेतु सचिव मा. शि. म. को आवेदन-पत्र लिखिए। [2009]
उत्तर-
7-7-20..

सेवा में,
श्रीमान सचिव,
मा.शि.म, भोपाल

महोदय,
विनम्र निवेदन यह है कि मैंने हाईस्कूल की परीक्षा सन् 2008 में (अनुक्रमांक 302810) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। अब मेरे पिताजी का स्थानान्तरण ग्वालियर हो गया है। अत: मुझे अन्यत्र विद्यालय में प्रवेश लेने के लिए हाईस्कूल प्रमाण-पत्र की आवश्यकता है।

कृपा करके मेरे घर के पते पर मेरा प्रमाण-पत्र भेजने का कष्ट करें। मेरी अंक प्रतिलिपि प्रार्थना-पत्र के साथ संलग्न है। कष्ट के लिए क्षमा।

भवदीय
कुमार गौरव
15, माधव नगर,
शिवपुरी

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प्रश्न 17.
सचिव, मा. शि. मण्डल, भोपाल को दसवीं बोर्ड परीक्षा की अंक-सूची की द्वितीय प्रति प्राप्त करने हेतु एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2012]
उत्तर-
सेवा में,
8-7-20….

श्रीमान् सचिव,
मा.शि. म, भोपाल

महोदय
विनम्र निवेदन यह है कि मैंने दसवीं की बोर्ड परीक्षा 2009 में (अनुक्रमांक 27711) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। उपरोक्त परीक्षा की अंक-सूची खो गयी है। अतः मुझे द्वितीय प्रति भेजने का कष्ट करें। इसके लिए मैं 20 रुपये का बैंक ड्राफ्ट नं.37701 आपके नाम भेज रहा हूँ।

कृपा करके मेरे घर के पते पर अंक-सूची की द्वितीय प्रति भेजने का कष्ट करें। कष्ट के लिए क्षमा।

भवदीय
राकेश कुमार
10/51,माधवन मार्ग,
शहडोल

MP Board Class 10th Hindi Solutions

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2

MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2

Question 1.
State whether the following statements are true or false. Justify your answers.

  1. Every irrational number is a real number.
  2. Every point on the number line is of the form √m , where m is a natural number.
  3. Every real number is an irrational number.

Solutions:

  1. True, because all irrational numbers come in the collection of real numbers.
  2. False, because a negative number cannot be the square root of any natural number.
  3. False, because the collection of real numbers contains not only irrational numbers but also rational numbers.

Question 2.
Are the square roots of all positive integers irrational? If not, give an example of the square root of a number that is a rational number.
Solution:
No. For example, √4 = 2 is a rational number.

Question 3.
Show how √5 can be represented on the number line.
Solution:
Representing √5 on a number line as shown in fig. below.
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-1

  1. Take OA = 2 units and draw perpendicular AB on A.
  2. Cut AB = 1 unit and join OB.
  3. By taking O as centre and OB as radius, draw an arc which inter-sect the number line at C.

Hence OC = √5
∴ Point C represents ^5 on the number line.
Proof:
OBD is a right angled A.
∴ OD2 = OB2 + BD2
OD2 = (2)2 + (1)2 = 5
OD = √5
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-2

Representation of Real Numbers on Number Line

Real Numbers:
The rational and irrational numbers taken together are known as real numbers. Every real number Is either rational or irrational. Different operations on real numbers are shown below:
For example:

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Example 1.
Add (3√2 + 5√3) and (√2 + √3).
Solution:
(3√2+ 5√5)+ (√2+ √3)
= 3√2 + 5√5 + √5 + √5 = (3√5+ √5)+ (5√5+ √5)
= 4√2 + 6√3
= 4√5 + 6√5

Example 2.
Add (√5 + 7√5) and (4√3 + 6√5).
Solution:
(√5 + 7√5) + (4√3 + 6√5)
= √3 + 7√5 + 4√3 + 6√5
= (√3 + 4√3) + (7√5 + 6√5)
= 5√3 + 13√5.

Example 3.
Simplify (3 + √2) (3 – √2).
Solution:
(3)2 – (√2)2
(∴ a2 – b2 = (a + b) (a – b))
= 9 – 2
= 7.

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Example 4.
Divide 16√6 by 4√2 .
Solution:
16√6 ÷ 4√2
\(\frac { 16\sqrt { 6 } }{ 4\sqrt { 2 } } \)
4√3.

Example 5.
Simplify the following:
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-3
Solution:
(i) \(\sqrt{45}\) – 3\(\sqrt{20}\) = 4\(\sqrt{5}\) = \(\sqrt{9×5}\) – 3\(\sqrt{4×5}\) + 4\(\sqrt{5}\)
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-4
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-5

Example 6.
Simplify by rationalising the denominator of \(\frac { 2+3\sqrt { 5 } }{ 2-3\sqrt { 5 } } \)
Solution:
We have 3 \(\frac { 2+3\sqrt { 5 } }{ 2-3\sqrt { 5 } } \), multiply numerator and denominator by 2 + 3√5, we have
MP Board Class 9th Maths Solutions Chapter 1 Number Systems Ex 1.2 img-6

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 1 साखियाँ

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 1 साखियाँ (कबीरदास)

साखियाँ अभ्यास-प्रश्न

साखियाँ लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधु का स्वभाव किसके समान होना चाहिए और क्यों?
उत्तर
साधु का स्वभाव सूप के समान होना चाहिए, क्योंकि वह तत्त्व की बातों को ग्रहण करता है और व्यर्थ की बातों को छोड़ देता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर
मनुष्य की तुलना काल के चबैना, पानी के बुलबुले, भोर के तारे, अनमोल हीरे और कच्चे घड़े से की गई है।

प्रश्न 3.
नदी और वृक्ष से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर
नदी और वृक्ष से परमार्थी होने की शिक्षा मिलती है।

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प्रश्न 4.
आज का काम कल के लिए क्यों नहीं छोड़ना चाहिए?
उत्तर
आज का काम कल पर इसलिए नहीं छोड़ना चाहिए कि न जाने कल फिर समय मिले न मिले।

प्रश्न 5.
काँच के घड़े की तुलना शरीर से क्यों की गई है?
उत्तर
काँच के घड़े की तुलना शरीर से इसलिए की गई है कि दोनों ही नश्वर हैं। दोनों का अनिश्चित जीवन है।

साखियाँ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समय का महत्त्व न समझने के क्या दुष्परिणाम होते हैं?
उत्तर
समय का महत्त्व न समझने के दुष्परिणाम ये होते हैं कि हीरे के समान अमूल्य जीवन व्यर्थ में ही बीत जाता है। फलस्वरूप अच्छे कर्म न करने से अंत में बहुत पछताना पड़ता है। लेकिन इस प्रकार पश्चाताप करने से कुछ भी हाथ में नहीं आता है।

प्रश्न 2.
कुम्हार और मिट्टी के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर
कुम्हार और मिट्टी के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि जीवन नश्वर है। उसकी नश्वरता अनिश्चित होने के साथ ही अवश्यसंभावी है। इसलिए हमें अपनी शक्ति-बल का घमंड नहीं करके ईश्वर की शक्ति को याद करके उसके प्रति ध्यान लगाना चाहिए।

प्रश्न 3.
मनुष्य को कब पछताना पड़ता है?
उत्तर
मनुष्य को समय का सदुपयोग करना चाहिए। समय के अनुसार कार्य करने से किसी प्रकार का न तो दुख उठाना पड़ता है और पश्चाताप ही करना पड़ता है। इसके विपरीत समय का दुरुपयोग करने से बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती है। उस समय बहुत पछताना पड़ता है।

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प्रश्न 4.
‘हीरा जनम अमोल वा कौड़ी बदले जाय’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय।
उपर्युक्त पंक्ति का आशय यह है कि मनुष्य का जन्म हीरा की तरह अनमोल होता है। उसको सार्थक न बनाकर उसे यों ही रात-दिन सोकर और खा-पीकर बीता देने से उसकी सार्थकता समाप्त हो जाती है। फलस्वरूप वह कौड़ी के समान मूल्यहीन रह जाता है।

प्रश्न 5.
नीचे दी गई पंक्तियों की संदर्भ सहित व्याख्या लिखिएक.
(क) वृक्ष कबहूँ नहिं फल भखें, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर ॥
(ख) यह तन काँचा कुम्भ है, लिये फिरै था साथ।
टपका लागा फूटिया, कछु नहिं आया हाथ।।
उत्तर
(क) कबीरदास का कहना है कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल को स्वयं न खाकर दूसरों को ही खाने के लिए प्रदान करता है। नदी अपने जल का संग्रह करके अपने पास नहीं रखती है, अपितु उसे दूसरों को पीने के लिए प्रदान करती है। ठीक इसी प्रकार से सज्जन अपने लिए ही जीवित नहीं रहते हैं, अपित ये दूसरों की भलाई के लिए ही जीवित रहते हैं।

(ख) कबीरदास का कहना है कि यह शरीर कच्चे घड़े के समान है, जिसे अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य उस पर इतराते हुए इधर-उधर घूमता-फिरता है। उस पर जब मृत्यु (काल) का ठोकर लगता है, तब वह फूट (समाप्त हो जाता है। फलस्वरूप कुछ भी हाथ नहीं आता है, अर्थात् सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है।

साखियाँ भाषा अध्ययन/काव्य सौंदर्य

प्रश्न 1.
साघु ऐसा चाहिए जैसा………….उड़ाय। कबीर की इन पंक्तियों में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग कहाँ हुआ है? छाँटकर लिखिए।
उत्तर
‘सूप सुभाय’ और ‘सार सार’ में अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पाठ में सुभाय, परमारव, मानुष, परभात जैसे अनेक तद्भव शब्दों का प्रयोग हुआ है पाठ में से पाँच तद्भव शब्द छॉटिए?
उत्तर
पाँच तद्भव शब्द-भूखा, साधुन, दिविस, जनम और औसर।

प्रश्न 3.
पाठ में सुख-दुख, रात-दिन, आज-कल जैसे विलोम शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसी तरह के अन्य विलोम शब्दों को लिखिए?
उत्तर
विलोम शब्द-सार-थोथा, हीरा-कौड़ी, मिट्टी-कुम्हार।

साखियाँ योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. कबीर की भक्ति एवं नीति से संबंधित दोहों को संकलित कीजिए तथा अपनी कक्षा में अंत्याक्षरी का आयोजन करें।
प्रश्न 2. भक्तिकाल के कवियों की सूची संकलित करें।
प्रश्न 3. कबीर की वेशभूषा के अनुरूप कबीर का चित्र बनाएँ।
प्रश्न 4. कबीर के चित्र भी हूँढ़े जा सकते हैं।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

साखियाँ परीक्षापयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

लघुउत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधू किसका भूखा नहीं होता है और क्यों?
उत्तर
साधू धन का भूखा नहीं होता है। वह तो भाव का भूखा होता है। यह इसलिए कि उसे सांसारिक सुख-सुविधा से विराग होता है।

प्रश्न 2.
परमार्थी किसे कहा गया है?
उत्तर
परमार्थी वृक्ष, नदी और साधु को कहा गया है।

प्रश्न 3.
मनुष्य क्या समझकर (मानकर) फूले नहीं समाता है?
उत्तर
मनुष्य झूठे सुख को सच्चा सुख समझकर (मानकर) फूले नहीं समाता है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
मनुष्य के क्षणभंगुर जीवन को किसके समान बतलाया गया है?
उत्तर
मनुष्य के क्षणभंगुर जीवन को पानी के बुलबुले और भोर के तारे के समान बतलाया गया है।

प्रश्न 5.
पश्चाताप करने से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर
पश्चाताप करने से बचने के लिए समय का सदुपयोग करना चाहिए।

साखियाँ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधु के स्वभाव की तुलना सूप के साथ क्यों की गई है?
उत्तर
सूप थोथी (बेकार की) वस्तुओं को उड़ा देता है और सार (तत्त्व) की वस्तुओं को अपने पास रख लेता है। ठीक इसी प्रकार सच्चे साधु का भी स्वभाव होता है। वह भी व्यर्थ की बातों को छोड़ देता और अच्छी बातों को ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार साधु का स्वभाव सूप से बिल्कुल मिलता-जुलता है। इसलिए साधु के स्वभाव की तुलना सूप के साथ की गई है।

प्रश्न 2.
‘आज-काल के करत ही, औसर जासी चाल’ का क्या आशय है?
उत्तर
‘आज-काल के करत ही, औसर जासी चाल’ का आशय है-समय का टालमटोल करना। दूसरे शब्दों में यह, मनुष्य जब आज का काम कल पर और कल का काम अगले कल पर छोड़ने लगता है, तो समय उसका इंतजार नहीं करता है। वह तो अपनी ही रफ्तार से आगे बढ़ता जाता है। इस प्रकार समय का सदुपयोग न करने के कारण मनुष्य को बार-बार पछताना पड़ता है। इसलिए आज का काम कल पर और कल का काम अगले कल पर नहीं छोड़ना चाहिए।

प्रश्न 3.
‘इक दिन अइसा होइगा, मैं सैंदूंगी तोहि’ कहकर माटी ने कुम्हार को क्या चेतावनी दी है?
उत्तर
‘इक दिन अइसा होइगा, मैं रूँदूँगी तोहि’ कहकर माटी ने कुम्हार को यह चेतावनी दी है कि समय हमेशा एक समान नहीं रहता है। इसलिए किसी को अपनी ताकत पर नहीं इतराना चाहिए। अपनी ताकत के सामने किसी को कमजोर नहीं समझना चाहिए। समय के बदलते हुए कमजोर-से-कमजोर भी शक्तिशाली को शक्तिविहीन कर देते हैं।

प्रश्न 4.
शरीर को कच्चा घड़ा क्यों कहा गया है?
उत्तर
शरीर को कच्चा घड़ा कहा गया है। यह इसलिए कि दोनों ही लगभग एक समान होते हैं। कच्चा घड़ा कब फूट जाए, कोई ठीक नहीं। इसी प्रकार यह शरीर कब समाप्त हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस प्रकार दोनों ही नश्वर हैं। उनकी नश्वरता अनिश्चित है।

प्रश्न 5.
कबीरदास विरचित साखियों का प्रतिपाय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
महात्मा कबीरदास द्वारा विरचित ‘साखियाँ न केवल शिक्षाप्रद हैं, अपितु यथार्थपूर्ण भी हैं। कबीर ने इन साखियों में साधु-संतों अर्थात् सज्जनों के स्वभाव, उनके द्वारा किए जाने वाले परोपकार के साथ-साथ मनुष्य के क्षणभंगुर जीवन का चित्रण किया है। मनुष्य को अपने क्षणिक जीवन से सावधान होकर सद्कर्म करने की प्रेरणा इन साखियों में दी गई है। इस प्रकार इन साखियों में यह भी सीख दी गई है कि मनुष्य को सत्कर्म करना चाहिए, दुष्कर्म नहीं। समय का सदुपयोग करते हुए उसे किसी प्रकार काट नहीं करना चादिशा।

साखियाँ कवि-परिचय

प्रश्न
कबीरदास का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनका साहित्य में स्थान बतलाइए।
उत्तर
निरक्षर संत कवियों में कबीरदास का नाम सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। ज्ञान के द्वारा ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बतलाने में कबीरदास अत्यधिक लोकप्रिय हैं। जीवन-परिचय-महात्मा कबीरदास का जन्म संवत् 1455 ई. में वाराणसी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था जिसने नवजात शिशु को लोक-लाज के कारण लहरतारा नामक तालाब के किनारे रख दिया। नीरु नामक जुलाहा इस बालक को उठाकर अपने घर लाया। इस बालक का लालन-पालन नीरु-नीमा दम्पत्ति ने किया। कबीरदास का विवाह लोई से हुआ था जिससे कमल और कमाली नामक पुत्र और पुत्री उत्पन्न हुए। कबीरदास को कहीं से कोई शिक्षा नहीं मिली थी। इन्होंने स्वयं कहा था’मसि कागद छूयो नहि, कलम गह्यो नहीं हाथ।’

कबीरदास उस समय के महान् धर्मोपदेशक स्वामी रामानन्द के विचारों से अधिक प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु मानकर उपदेश देने लगे। कुछ लोग इनके गुरु ‘शेख तकी’ को एक मुसलमान संत मानते हैं। जीवन के अंतिम दिनों में ये काशी छोड़कर मगहर चले गए और वहीं इनकी मृत्यु संवत् 1575 में हो गई।

कृतियाँ – कबीरदास ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखा बल्कि उन्होंने मौखिक रूप से जो कुछ भी व्यक्त किया, वे ही उनके शिष्यों के द्वारा ग्रंथ के रूप में तैयार किया गया। कबीर की वाणी का संग्रह बीजक के रूप में प्रकाशित हो चुका है। इसे अलग-अलग रूपों में ‘साखी’, ‘शबद’ और ‘रमैनी’ के रूप में जाना जाता है।

भाषा-शैली – कबीरदास की भाषा में खड़ी बोली, हिन्दी भाषा के साथ, अवधी, पूर्वी (बिहारी), पंजाबी, उर्दू आदि भाषाओं के साथ-साथ देशज शब्दों का भी प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। इनकी भाषा को इसी कारण खिचड़ी-मिश्रित भाषा कहा जाता है। कुछ लोगों का यह मानना ठीक भी है कि कबीरदास की भाषा सधुक्कड़ी भाषा है।

साहित्य में स्थान – कबीरदास का हिन्दी भक्ति काव्यधारा के ज्ञानमार्गी काव्यधारा में निश्चयपूर्वक सर्वोपरि स्थान है। हिन्दू-मुस्लिम एकता की विचारधारा के मूल प्रवर्तक कबीरदास ही थे। इन्होंने अपनी विचारधारा के अनुसार ही अपना पंथ चलाया। आपकी रचनाओं का प्रभाव आज भी समाज पर अत्यधिक है, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रेरणा और उत्साह जगाकर आत्म-चिंतन को बढ़ाता है।

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साखियाँ कविता का सारांश

महात्मा कबीरदास विरचित साखियाँ उपदेश और यथार्थ हैं। कबीर ने इन साखियों में यह कहना चाहा है कि साधु-संतों का स्वभाव सूप की तरह अच्छी बातों को ग्रहण करने वाला और बेकार बातों को छोड़ देने वाला होना चाहिए। साधु अर्थात् सज्जन भाव के भूखे होते हैं, धन के नहीं। वे तो पेड़ की तरह ही परमार्थ होते हैं। कबीर ने यह चेतावनी दी है कि मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान है, जो भोर के तारों के समान देखते-देखते ही समाप्त हो जाता है। मनुष्य अपने हीरे की तरह बहुमूल्य जीवन को अपनी अज्ञानता के कारण रात-दिन सो-सोकर और खाकर व्यर्थ में बीता देता है। वह आज और कल पर ईश्वर भजन-याद को टाल देता है। अच्छे दिनों में तो उसने अपने गुरु से प्रेम नहीं किया। अब पछताने से क्या लाभ। कुम्हार की मिट्टी उसे चेतावनी देती हुई कहती है कि उसे अपने बल-ताकत पर घमंड नहीं करना चाहिए कि वह हमेशा वैसा ही ताकतवर बना रहेगा। एक दिन ऐसा आएगा कि उसकी ताकत बिल्कुल ही काम नहीं आएगी। उसे समझना चाहिए कि उसका शरीर कच्चे घड़े के समान है। उस पर वह इतराता फिरता है। एक दिन जब उस पर मौत का टपका लगेगा तो वह फूटकर समाप्त हो जाएगा। फिर तो उसे कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।

साखियाँ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौंदर्य एवं विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहे, चोथा देइ उड़ाय॥

शब्दार्थ-सुभाव-स्वभाव । सार-तत्त्व, सार्थक। थोथा-व्यर्थ, बेकार।

प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती’ हिंदी सामान्य में संकलित तथा महात्मा कबीरदास विरचित ‘साखियाँ’ शीर्षक से है। इसमें कबीरदास ने सज्जनों के स्वभाव को बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि सज्जनों का स्वभाव सूप की तरह होना चाहिए। दूसरे शब्दों में सज्जन का स्वभाव अच्छी-अच्छी बातों को ग्रहण करने वाला और व्यर्थ की बातों को छोड़ देने वाला होना चाहिए। इस प्रकार उनका स्वभाव सूप की तरह होना चाहिए, जो तत्त्व की वस्तुओं को ग्रहण करके व्यर्थ की वस्तुओं को छोड़ देता है।

विशेष-

  1. सज्जनों के स्वभाव का महत्त्वांकन किया गया है।
  2. दोहा छंद है।
  3. भाषा सधुक्कड़ी है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य लिखिए।
(ii) प्रस्तुत पद के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद में कवि ने सज्जनों के स्वभाव को बतलाने के लिए सरल शब्दों का प्रयोग किया है। उपदेशात्मक शैली के द्वारा कवि ने अपने कथन को सुस्पष्ट करने के लिए उपमालंकार (सूप की उपमा) का प्रयोग किया है। दोहा छंद में प्रस्तुत यह कथन अधिक सार्थक बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाष-सौंदर्य सज्जनों के स्वभाव को बतलाने में अधिक उपयुक्त दिखाई दे रहा है। सज्जनों की सज्जनता अर्थात् सरलता (सीधापन) कितना गुणग्राही होती है। इसे समझाने के लिए सूप का उदाहरण देना एकदम सटीक और उपयुक्त लग रहा है। इस प्रकार से प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य निश्चय ही आकर्षण और प्रभावशाली है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) सज्जनों और सूप में क्या समानता होती है?
(ii) सज्जनों के स्वभाव को सूप की तरह कहने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर-
(i) सज्जनों और सूप में यह समानता होती है कि दोनों ही अच्छाई को ग्रहण करते हैं और बुराई को छोड़ देते हैं।
(ii) सज्जनों के स्वभाव को सूप की तरह कहने से कवि का आशय है कि हमें अपने स्वभाव को सरल और गुणग्राही ही बनाने का प्रयास करना चाहिए।

2. साधू भुखा भाव का, धन का भूखा नाहिं।
धन का भूखा जो फिरे, सो तो साघू नाहिं।

शब्दार्थ-नाहि-नहीं।। सो-वह।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने सज्जनों की चाह को बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि सज्जन बड़े ही सरल और सीधे होते हैं। यही नहीं, वे किसी प्रकार से लोभी और धन-सुख की तनिक भी इच्छा नहीं रखते हैं। वे केवल सच्चे और अच्छे भावों को ही चाहते हैं। बुरे भावों से नफरत करते हैं। इस प्रकार वे किसी प्रकार के धन और सुख की तनिक भी इच्छा न करके अच्छे भावों को ही महत्त्व देते हैं। यही कारण है कि धन-सुख की इच्छा न रखने वाले सज्जन होते हैं और जो धन-सुख की इच्छा रखते हैं, वे सज्जन नहीं, बल्कि दुर्जन होते हैं।

विशेष-

  1. भाषा सधुक्कड़ी है।
  2. दोहा छंद है।
  3. सज्जनों के सरल और निर्लोभी स्वभाव का उल्लेख है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य लिखिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में सज्जनों के भावों की सादगी सरल और स्पष्ट शब्दों के द्वारा रखने के लिए कवि ने दोहा छंद का उपयोग किया है। सधुक्कड़ी भाषा के द्वारा स्वभावोक्ति अलंकार का प्रयोग आकर्षक रूप में है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य सज्जनों की भावनाओं को सरसता के साथ प्रस्तुत करने में अधिक उपयुक्त सिद्ध हो रहा है। कवि की भाव-योजना अधिक यथार्थपूर्ण होने के कारण विश्वसनीय है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) सज्जन भाव के भूखे होते हैं। क्यों?
(ii) धन के भूखे कौन होते हैं और क्यों?
उत्तर
(i) सज्जन भाव के भूखे होते हैं। यह इसलिए कि उनका मन सांसारिक वस्तुओं धन, साधन आदि के प्रति न लगकर सरल और सादा जीवन की ओर ही लगा रहता है।
(ii) धन के भूखे दुर्जन होते हैं। यह इसलिए कि उनका सांसारिक सुख को छोड़कर सरल और सादा जीवन के प्रति बिल्कुल लगाव नहीं होता है।

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3. वृक्ष कबहें नहि फल भखें, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर॥

शब्दार्व-कबह-कभी। भखें-खाना। संचै-संग्रह। परमारव-परोपकार, दूसरों की भलाई। कारने-कारण के लिए। साधुन-सज्जन। धरा-धारण करते हैं।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने सज्जनों के जीवन के उद्देश्य को बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल को स्वयं न खाकर दूसरों को ही खाने के लिए प्रदान करता है। नदी अपने जल का संग्रह करके अपने पास नहीं रखती है, अपितु उसे दूसरों को पीने के लिए प्रदान करती है। ठीक इसी प्रकार से सज्जन अपने लिए ही जीवित नहीं रहते हैं, अपित ये दूसरों की भलाई के लिए ही जीवित रहते हैं।

विशेष-

  1. सधुक्कड़ी भाषा है।
  2. दोहा छंद है।
  3. सज्जनों को परोपकारी सिद्ध किया गया है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) उपर्युक्त पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में वृक्ष और नदी की तरह सज्जनों को परोपकारी सिद्ध करने के लिए कवि ने दोहा छंद का प्रयोग किया है। ‘धरा-शरीर’ में अनुप्रास अलंकार रोचक रूप में है। अपने कथन को सधुक्कड़ी भाषा की शब्दावली से कवि ने सचमुच प्रेरक बना दिया है।
(ii) सज्जन परोपकारी होते हैं। उनकी इस अच्छाई को कवि ने वृक्ष और नदी की तरह बतलाने का प्रयास किया है। कवि ने सज्जनों के परोपकारी होने की विशेषता को स्वयं के लिए कुछ भी संग्रह न करने वाले वृक्ष और नदी की ही तरह बतलाया है। कवि का यह दृष्टिकोण अधिक आकर्षक और रोचक ही नहीं अपितु प्रेरक भी है। भाव-योजना का प्रवाहमयता और उपयुक्तता सराहनीय है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) वृक्ष और नदी की क्या विशेषता होती है?
(ii) वृक्ष और नदी की उपमा देकर कवि ने क्या सिद्ध करना चाहा है?
उत्तर
(i) वृक्ष और नदी की एक समानता होती है कि यह दोनों ही परोपकारी होते हैं। वृक्ष अपने फल को स्वयं न खाकर दूसरों को प्रदान करता है। नदी अपने जल
को स्वयं न पीकर दूसरों को ही प्रदान कर देती है।
(ii) वृक्ष और नदी की उपमा देकर कवि ने यह सिद्ध करना चाहा है कि वृक्ष और नदी की ही तरह सज्जन स्वयं के लिए नहीं, अपितु दूसरों के लिए ही जीवित रहते हैं।

4. झूठे सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद।
जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद।।

शब्दार्थ-मोद-प्रसन्नता! जगत-संसार।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने सांसारिक सुख को झूठा और क्षणिक सुख बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण सांसारिक सुख को सच्चा सुख मानकर फूले नहीं समाता है। उसे यह बिल्कुल ही ज्ञान नहीं होता है कि यह सांसारिक सुख झूठा और क्षणिक है। इस प्रकार वह अपनी अज्ञानता के कारण यह नहीं समझ पाता है कि यह सारा संसार काल (मृत्यु) का चबैना है, जिसे वह कुछ अपने मुँह में ले लिया और कुछ गोद में (बाद में चबाने अर्थात् खाने के लिए) ले रखा है।

विशेष-

  1. सांसारिक सुख को झठा और क्षणिक कहा गया है।
  2. ‘मन-मोद’ में अनुप्रास अलंकार है।
  3. उपदेशात्मक शैली है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में सांसारिक सुख को क्षणिक और झूठा बतलाने के लिए कवि ने काव्य-सौंदर्य के अपेक्षित स्वरूपों को रखने का प्रयास किया है। इसके लिए सधुक्कड़ी भाषा की शब्दावली का प्रयोग किया है। उपदेशात्मक शैली, अनुप्रास अलंकार और दोहा छंद को समुचित स्थान देकर कवि ने काव्यात्मक सौंदर्य ला दिया है।
(ii) प्रस्तुत पद में सांसारिक क्षण-भंगुर सुख को झूठा बतलाने के लिए सरल और प्रचलित शब्दावली की योजना भावानुकूल है। मनुष्य की अज्ञानता का बोध कराने के लिए संसार को काल का चबैना कहना कथ्य के तथ्य के अनुसार ही है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) संसार की नश्वरता को क्या कहकर दर्शाया गया है?
(ii) झूठे सुख को मनुष्य सच्चा सुख क्यों मानता है?
उत्तर
(i) संसार की नश्वरता को काल का चबैना कहकर दर्शाया गया है।
(ii) झूठे सुख को मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण सच्चा सुख मानता है।

5. पानी केरा बुदबुदा, अस मानुष की जात।
देखत ही छिपि जावगी, ज्यों तारा परभात।।

शब्दार्थ-केरा-के। बुदबुदा-बुलबुला। अस-समान। जात-जाति। छिपि-समाप्त। ज्यों-जैसे, जिस प्रकार । परभात-प्रभात, भोर।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने मनुष्य के जीवन को पानी के बुलबुले के समान ही क्षणभंगुर बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान ही क्षणभंगुर और अनिश्चित है। वह कब तक है और कब तक नहीं, यह कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए कि वह देखते-देखते वैसे ही समाप्त हो जाता है-जैसे भोर का तारा देखते-देखते छिप जाता है। इसलिए मनुष्य को अपने इस क्षणभंगुर जीवन की सच्चाई को समझकर इतराना-इठलाना नहीं चाहिए।

विशेष-

  1. उपमालंकार (पानी के बुलबुले और भोर के तारे से मनुष्य के जीवन की क्षणभंगुरता की उपमा दी गई है) है।
  2. दोहा छंद है।
  3. शान्त रस है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में मानव-जीवन की क्षण-भंगुरता को बतलाने के लिए पानी के बुलबुले और भोर के तारे की उपमा सटीक रूप में दी गई है। इसके लिए कवि द्वारा प्रस्तुत उपमालंकार का चमत्कार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सधुक्कड़ी भाषा और शान्त रस के संचार से सम्पूर्ण कथन उपदेशात्मक शैली में होकर हदयस्पर्शी बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य प्रचलित सधुक्कड़ी शब्दावली से रोचक रूप में है। मानव-जीवन की असारता और उसकी क्षणभंगुरता को पानी के बुलबुले और भोर के तारे के समान बतलाया गया है। ये दोनों ही उपमान भावों को न केवल स्पष्ट करते हैं। अपितु प्रभावशाली और सरस भी बना रहे हैं।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) मनुष्य की जाति कैसी है?
(ii) पानी के बुलबुले और भोर के तारे की उपमा देने का कवि का क्या आशय है?
उत्तर
(i) मनुष्य की जाति पानी के बुलबले और देखते-देखते छिप जाने वाले भोर के तारे के समान क्षणभंगुर है।
(ii) पानी के बुलबुले और भोर के तारे की उपमा देने का कवि का आशय है कि मनुष्य को अपने जीवन की क्षणभंगुरता को नहीं भूलना चाहिए। इसे याद करके उसे अच्छे कामों को ही करके अपने जीवन को बिताना चाहिए।

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6. रात गँवाई सोय करि, दिविस गँवायो खाय।
हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय॥

शब्दार्व-गवाई-बिताई। सोय-सोकर । करि-करके। दिविस-दिन । खाय-खाकर। जनम-जन्म। अमोल-अनमोल, अमूल्य। जाय-बिता दिया। – प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने मनुष्य को व्यर्थ में ही जीवन बिताने के प्रति फटकार लगाई है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण रात को सो-सोकर और दिन को खा-पीकर बिता देता है। इस प्रकार वह हीरे जैसे बहुमूल्य जीवन को कौड़ी के समान व्यर्थ में ही बिता देता है।

विशेष-

  1. भाषा सधुक्कड़ी शब्दों की है।
  2. शैली उपदेशात्मक है।
  3. दोहा छंद है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य मनुष्य के अज्ञानमय जीवन को प्रभावशाली रूप में रखने में सफल दिखाई देता है। इसकी यह विशेषता सधुक्कड़ी भाषा और. व्यंग्यमय शब्द-शक्ति के फलस्वरूप है। दोहा छंद से कवि ने इसे दर्शाने का सार्थक प्रयास किया है।
(ii) प्रस्तुत पद की भाव-योजना कथ्य के तथ्य के अनुसार है। मनुष्य जीवन को हीरे के समान बहुमूल्य बताकर उसे कौड़ी की तरह निरर्थक बतलाने का कवि का प्रयास बड़ा ही रोचक और भाववर्द्धक है। इस प्रकार इस पद का भाव-सौंदर्य बढ़कर है, ऐसा कहा जा सकता है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) मनुष्य अपने जीवन को किस तरह बिताता है?
(ii) मनुष्य का जन्म किस तरह का होता है?
उत्तर
(i) मनुष्य अपने जीवन को रात को सोकर और दिन को खा-पीकर बिता देता है।
(ii) मनुष्य का जन्म हीरे की तरह बहुमूल्य होता है।

7. आज कहै कल भजूंगा, काल कहै फिर काल।
आज-कल के करत ‘ही, औसर जासी चाल॥

शबार्थ-भजूंगा-भजन करूँगा। काल-कल । ओसर-अवसर, मौका।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने भगवान के प्रति ध्यान लगाने में टालमटोल करने वाले मनुष्य को सावधान करते हुए कहा है कि

व्याख्या-मनुष्य अपना जीवन सार्थक बनाने की भूल करता ही रहता है। खासतौर से वह ईश्वर के प्रति ध्यान और चिन्तन करने में टालमटोल करता रहता है। वह ईश्वर-भजन करने के विषय में इस प्रकार टालमटोल करता है कि आज कहता है-कल अवश्य ईश्वर का ध्यान करूँगा। कल को वह फिर कल पर टाल देता है। इस प्रकार वह आज-कल का टालमटोल करके अपने सुनहले अवसर को खो देता है।

विशेष-

  1. भाषा सरल और सुबोध है।
  2. शैली उपदेशात्मक है।
  3. ‘कहै कल’ व ‘काल कहै’ में अनुप्रास अलंकार है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य लिखिए।
उत्तर
(i) आज को कल पर और कल को फिर कल पर टालकर ईश्वर-भजन के प्रति टालमटोल करने में मनुष्य की अज्ञानता को दर्शाया गया है। इसके लिए कवि ने दोहा छंद का चुनाव किया है। फिर उसे अनुप्रास अलंकार से मंडित करने के लिए प्रचलित सरल शब्दों को प्रयुक्त भाषा में अधिक आकर्षक बनाने का सार्थक प्रयास किया है।
(ii) मनुष्य का टालमटोल ईश्वर-भजन के प्रति करने के तथ्य को बड़े ही स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। आज को कल पर और कल को परसों पर टालने के क्रम में नयापन है तो रोचकता भी है। इस तरह धीरे-धीरे सुनहले अवसर को खोते जाने का ढंग सचमुच में निराला है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) आज को कल पर और कल को फिर कल पर मनुष्य क्यों छोड़ता है?
(ii) मनुष्य जीवन की निरर्थकता क्या है?
उत्तर
(i) मनुष्य आज को कल पर और कल को फिर कल पर इसलिए छोड़ता है कि वह बहुमूल्य और अमूल्य समय का अपनी अज्ञानता के कारण सदुपयोग नहीं करना चाहता है।
(ii) मनुष्य जीवन की निरर्थकता यह है कि वह आज-कल करके ईश्वर-भजन में अपने बहुमूल्य और अमूल्य समय को नहीं लगाता है।

8. अच्छे दिन पाछे गये गुरु से कियो न हेत।
अब पछतावा क्या करे, चिड़िया चुग गई खेत।

शब्दार्थ-पाछे-पीछे। हेत-मेल, प्रेम। चुग गई-खा गई।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने मनुष्य द्वारा अपने सुनहले समय का सदुपयोग न करके पश्चाताप करने के प्रति फटकारा है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि हे मनुष्य! गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति-भाव करने का जो अच्छा समय था, उसे तुमने यों ही खो दिया। अब तो तुम्हारे चारो ओर से बुरे दिन आ गए हैं। इससे अब गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्तिभाव नहीं कर पाने से तुम बार-बार पश्चाताप कर रहे हो। इससे तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा। तुम्हारा बार-बार पश्चाताप करना उसी प्रकार व्यर्थ है, जिस प्रकार चिड़ियों के द्वारा खेत चुग जाने पर किसान बार-बार पश्चाताप करता है।

विशेष-

  1. भाषा सरल है।
  2. शैली उपदेशात्मक है।
  3. ‘चिड़िया चुग’ में अनुप्रास अलंकार है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) उपर्युक्त पद के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में कवि ने समय के चूक जाने पर पश्चाताप करने वालों के लिए अपना विचार व्यक्त किया है कि इससे कोई लाभ नहीं। इसे कवि ने काव्य के विविध स्वरूपों, जैसे-भाषा, छंद, अलंकार, रस, प्रतीक आदि का प्रयोग किया है। यहाँ पर सधुक्कड़ी भाषा, दोहा, छंद अनुप्रास अलंकार, करुण रस और चिड़िया की प्रतीकात्मकता बड़ी ही सुन्दर और अनूठी है।
(ii) उपर्युक्त पद की भाव-योजना बड़ी सटीक और सुव्यवस्थित है। गुरु से लगाव रखने के सनहले मौके को गँवाकर मनष्य की वही दशा होती है जो चिडियों के द्वारा खेत के चुग जाने पर किसान की होती है। दोनों ही हाथ मलमल कर पछताते हैं। दोनों को कोई लाभ नहीं होता है। इस प्रकार दोनों के भावों और स्थिति में कवि ने जो समानता और एकरूपता लाने का प्रयास किया है, उसमें वह सफल हुआ दिखाई देता है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) ‘अच्छे दिन’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
(ii) ‘अब पछताए क्या करे, चिड़िया चुग गई खेत’ के स्थान पर कोई दूसरी लोकोक्ति लिखिए।
उत्तर-
(i) अच्छे दिन’ से कवि का तात्पर्य समय का सदुपयोग करने से है।
(ii) ‘अब पछताये क्या करै, जब चिड़िया चुग गई खेत’ के स्थान पर दूसरी लोकोक्ति है-‘का बरखा जब कृषि सुखानी, समय चूकि पुनि का पछतानी॥’

9. माटी कहै कुम्हार को, तू क्या रूँदै मोहि।
इक दिन अइसा होइगा, मैं दूंगी तोहि।

शब्दार्थ-माटी-मिट्टी। रूँदै-मिताना। मोहि-मुझे। अइसा-इस प्रकार, ऐसा ही। होइगा-होगा। तोहि-तुम्हें, तुमकी।

प्रसंग-पूवर्वत् । इसमें कबीरदास ने मनुष्य के क्षणभंगुर और अनिश्चित जीवन को मिट्टी के माध्यम से बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि कुम्हार रोज-रोज मिट्टी को मिट्टी में मिलाकर बरतन बनाने का अपना नित्यकर्म करता है। उसे इस तरह देखकर मिट्टी ने उस पर अपना क्रोध प्रकट करते हुए कहा कि वह उसे क्यों इस तरह बार-बार मिलाकर उसके अस्तित्व (कुछ होने के भाव) को समाप्त कर रहा है। इस तरह करके वह अपनी होने वाली इस प्रकार की दशा को क्यों भूल रहा है। उसे तो यह कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि एक समय ऐसा भी आएगा, जब वह भी उसे इसी प्रकार मिट्टी में मिलाकर उसके अस्तित्व (कुछ होने के अहंकार) को मिट्टी में मिलाकर रख देगी।

विशेष-

  1. सधुक्कड़ी भाषा है।
  2. ‘कहे कुम्हार’ में अनुप्रास अलंकार है।
  3. माटी (मिट्टी) को मनुष्य के रूप में चित्रित किया गया है। इसलिए इसमें मानवीयकरण अलंकार है।
  4. शान्त रस का प्रवाह है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य, भाव, भाषा, रस, छंद, अलंकार और प्रतीक-दृष्टान्त की दृष्टि से प्रभावशाली बन गया है। मिट्टी का कुम्हार के प्रति फटकार को कवि ने दोहा छंद, अनुप्रास अलंकार और सधुक्कड़ी शब्द के द्वारा व्यक्त करके अपने कथन को यथार्थ बना दिया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य सरल और प्रचलित सधुक्कड़ी शब्दावली के फलस्वरूप हृदयस्पर्शी बन गया है। मिट्टी की मनुष्य की शक्ति से कहीं अधिक बढ़कर बतलाने का प्रयास. वास्तव में बड़ा ही अद्भुत और सराहनीय है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) मिट्टी ने मनुष्य को क्या चेतावनी देकर फटकार लगाई है?
(ii) मिट्टी और मनुष्य में क्या अंतर बतलाया गया है?
उत्तर
(i) मिट्टी ने मनुष्य को यह चेतावनी दी है कि उसे अपनी शक्ति-बल का घमंड नहीं करना चाहिए। उसे यह भूलना नहीं चाहिए कि वह भी एक दिन मिट्टी में मिलकर समाप्त हो जाएगा।
(ii) मिट्टी और मनुष्य में यह अंतर बतलाया गया है कि मिट्टी को जीवन की नश्वरता का ज्ञान है, जबकि मनुष्य को नहीं।

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10. यह तन काँचा कुम्भ है, लिये फिरै था साथ।
टपका लागा फूटिया, कछु नहिं आया हाय।।

शब्दार्थ-तन-शरीर। काँचा-कच्चा। कुम्भ-घड़ा। टपका-ठोकर। लागा-लग गया। फुटिया-फूट गया। कछु-कुछ।।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कबीरदास ने शरीर की अनिश्चय क्षणभंगुरता को बतलाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-कबीरदास का कहना है कि यह शरीर कच्चे घड़े के समान है, जिसे अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य उस पर इतराते हुए इधर-उधर घूमता-फिरता है। उस पर जब मृत्यु (काल) का ठोकर लगता है, तब वह फूट (समाप्त हो जाता है। फलस्वरूप कुछ भी हाथ नहीं आता है, अर्थात् सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है।

विशेष-

  1. सधुक्कड़ी भाषा है।
  2. शरीर को कच्चे घड़े के रूप में व्यक्त करने से रूपक अलंकार है। ‘काँचा कम्भ’ और ‘फिरैथा साथ’ में अनुप्रास अलंकार है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद के भाव-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद, भाव, भाषा, शैली-विधान, रस, छंद, अलंकार, प्रतीक और बिम्ब-योजना से अलंकृत-चमत्कृत है। शरीर को कच्चे घड़े के रूप में रूपायित करके कवि ने उसकी स्वाभाविक विशेषताओं को काव्यात्मक ढंग से आकर्षक रूप दिया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य सरल शब्दों से पुष्ट है। भावों की प्रवाहमयता और क्रमबद्धता से कथ्य का तथ्य सुस्पष्ट होने से यह अंश अधिक रोचक हो गया है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोतर

प्रश्न-
(i) तन और काँचा कुम्भ में क्या समानता है?
(ii) ‘कुछ न हाव आना’ एक मुहावरा है, इसका मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) तन और काँचा कुंभ में कई समानताएँ हैं

  1. दोनों कच्चे अर्थात् कम अनुभवी होते हैं।
  2. दोनों कोमल और सुन्दर होते हैं।
  3. दोनों ही अस्थाई और नश्वर होते हैं।
  4. दोनों चलते-फिरते अचानक समाप्त हो जाते हैं।

(ii) ‘कुछ न हाथ आना’ मुहावरे का मुख्य भाव है-सब कुछ खो देना।

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