MP Board Class 10th Special Hindi अपठित बोध

अपठित का तात्पर्य है जो पढ़ा हुआ न हो। अपठित का अवतरण पाठ्य-पुस्तकों से सम्बन्धित नहीं होता। परीक्षा में अपठित के अन्तर्गत निम्न प्रश्न पूछे जाते हैं। देखिए

  1. अवतरण का शीर्षक।
  2. समस्त गद्य-अवतरण अथवा पद्यावतरण का स्वयं की भाषा में सारांश।
  3. अवतरण पर आधारित प्रश्नों के उत्तर।

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(1) शीर्षक–अवतरण का शीर्षक जहाँ तक हो सके लघु (छोटा) तथा उपयुक्त होना चाहिए। शीर्षक में अवतरण का समस्त भाव परिलक्षित होना नितान्त आवश्यक है। शीर्षक के लिए गद्यांश के प्रारम्भिक एवं आखिरी अंश का चिन्तन एवं मनन करना चाहिए।

(2) सारांश परीक्षा में अवतरण का सारांश अथवा भाव लिखने को आता है। सारांश छोटा तथा सारगर्भित होना चाहिए। इसमें अपनी भाषा का प्रयोग करना परमावश्यक है। अवतरण की भाषा को ज्यों का त्यों लिखना वर्जित है। भाषा का परिमार्जित होना जरूरी है।

सार-लेखन में पूछे गये अवतरण का ही भाव परिलक्षित होना चाहिए। सारांश का कलेवर एक तिहाई से किसी भी दशा में अधिक नहीं होना चाहिए।

(3) प्रश्नोत्तर–प्रश्नों के उत्तर लघु तथा सारगर्भित होने चाहिए। अवतरण के आधार पर ही उत्तर देने चाहिए। अनर्गल उत्तर देना वर्जित है। प्रश्नोत्तरों की भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए।

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित गद्यांश

प्रश्न-
निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. मन के सशक्त होने पर शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आती है। यदि मन दुर्बल है तो शरीर निष्क्रिय और निरुद्यम ही रहेगा। यह संसार शक्तिशाली का है। दुर्बल का इस संसार में कहीं ठिकाना नहीं। कायर व्यक्ति मृत्यु से पहले ही सहस्रों बार मरता है। कायरता का सम्बन्ध मन से है। कायरता और निरुत्साह का दूसरा नाम ही मन की हार है। परिणामत: मन की हार अत्यन्त भयंकर है। मनुष्य भाग्य का निर्माता है, पर कायर पुरुष नहीं। सबल ही भाग्य निर्माता की सामर्थ्य रखता है। कायर तो दैव-दैव ही पुकारता है। साहसी व्यक्ति को अपने मानसिक बल पर अभिमान होता है।

प्रश्न-
(1) इस अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) इस अवतरण में भाग्य का निर्माता किसे कहा गया है?
(3) इस अवतरण का सारांश 30 शब्दों में दीजिए।
(4) मन के सशक्त होने पर शरीर में क्या होता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘मनोबल’।’
(2) मानव को स्वयं अपने भाग्य का निर्माता कहा गया है।
(3) सारांश-मन का सबल एवं पुष्ट होना सबसे बड़ी ताकत है। मन के दुर्बल होने पर मानव भीरु (कायर) बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का दुनिया में जीवित रहना अथवा न रहना एकसमान है। अतः मन को सशक्त बनाओ तथा अपने भाग्य की सृष्टि (निर्माण) करो।
(4) मन के सशक्त होने पर शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आती है।

2. क्षमा पृथ्वी का गण-धर्म है। क्षमा वीरों का भूषण है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से अपराध होते रहते हैं,गलतियाँ होती रहती हैं। हमारी दृष्टि में कोई अपराधी है तो हम भी किसी की दृष्टि में अपराधी हैं। यहाँ निर्दोष कोई भी नहीं है, इसलिए परस्पर क्षमा-भावना की अति आवश्यकता है। क्षमा के अभाव में क्रोध, हिंसा, संघर्ष का साम्राज्य छा जायेगा जिसे कोई भी स्वीकार नहीं करता है। माता-पिता, गुरु सभी क्षमाशील होते हैं। मानव जीवन में क्षमा के अवसर आते रहते हैं। क्षमा के अभाव में जीवन चलना दूभर हो जाता है। अहिंसा, करुणा, दया, मैत्री, क्षमा आदि दैवीय गुण हैं। ये गुण मानव-जीवन के लिए आवश्यक हैं। (2009)

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) क्षमा के अभाव में किसका साम्राज्य छा जाता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक–’क्षमा दैवीय गुण’।

(2) सारांश-क्षमा पृथ्वी का गुण है। पृथ्वी अनेक आघातों को सहकर भी मानव सेवा में तत्पर रहती है। क्षमा वीरों का आभूषण है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से जाने-अनजाने में अपराध करता रहता है। सब एक-दूसरे की दृष्टि में अपराधी हैं। अत: मानव को अपने मन मानस में क्षमा को प्रथम वरीयता देनी चाहिए। जीवन में क्षमा के अनेक अवसर आते हैं। अहिंसा, दया, मित्रता, क्षमा आदि ईश्वरीय गुणों के परिचायक हैं।

(3) क्षमा के अभाव में क्रोध, हिंसा और संघर्ष का साम्राज्य छा जायेगा।

3. मानव का अकारण ही मानव के प्रति अनुदार हो उठना न केवल मानवता के लिए लज्जाजनक है, वरन् अनुचित भी है। वस्तुतः यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है, कर सकता है। केवल इसलिए कि कोई मनुष्य बुद्धिहीन है अथवा दरिद्र वह घृणा का तो दूर रहा, उपेक्षा का भी पात्र नहीं होना चाहिए। मानव तो इसलिए सम्मान के योग्य है कि वह मानव है, भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है। [2009, 14]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) यथार्थ मनुष्य किसे कहा गया है?
(3) उक्त गद्य खण्ड का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘आदर्श मानव’।
(2) यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है।
(3) सारांश-मानव का उदारता रहित होना मानवता के लिए लज्जाजनक ही नहीं अपितु अनुचित भी है। वास्तव में सच्चा मनुष्य वही है जिसके मन मानस में मानवता के प्रति संवेदना हो। वह प्रत्येक व्यक्ति का आदर करना जानता हो।

बद्धिहीन निर्धन व्यक्ति के प्रति भी उपेक्षा की भावना नहीं होनी चाहिए अपितु उनको भी यथेष्ट सम्मान प्रदान करना चाहिए।

4. राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त होने के कारण हिन्दी का दायित्व कुछ बढ़ जाता है। अब वह मात्र साहित्य की भाषा ही नहीं रह गयी है, उसके माध्यम से ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई उपलब्धियों का भी ज्ञान विकास करना तथा प्रशासन की भाषा के रूप में उसका नव-निर्माण करना हमारा दायित्व है। यह बड़ा महान् कार्य है और इसके लिए बड़ी उदार और व्यापक दृष्टि तथा कठिन साधना की अपेक्षा है।

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) हिन्दी भाषा किस पद पर अभिषिक्त है?
(4) हिन्दी का दायित्व क्यों बढ़ गया है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-राष्ट्रभाषा हिन्दी।’
(2) सारांश-आज हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन है। आज हिन्दी भाषा से ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी की जानकारी मिल रही है। प्रशासकीय स्तर पर भी हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया है। हिन्दी सभी क्षेत्रों में एक गौरवशाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर हिन्दी को पूरा सम्मान देना होगा। इसी में सबका हित-साधन है।
(3) हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त है।
(4) राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर अभिषिक्त होने से हिन्दी का दायित्व बढ़ जाता है, क्योंकि अब यह ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की भाषा बन चुकी है।

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5. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज से अलग उसके अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। परिचित तो बहुत होते हैं,पर मित्र बहुत कम हो पाते हैं,क्योंकि मैत्री एक ऐसा भाव है जिसमें प्रेम के साथ समर्पण और त्याग की भावना मुख्य होती है। मैत्री में सबसे आवश्यक है, परस्पर विश्वास। मित्र ऐसा सखा, गुरु और माता है जो सभी स्थानों को पूर्ण करता है। [2009]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का एक सटीक शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) मैत्री में कौन-कौन से भाव सम्मिलित हैं?
उत्तर-
(1) शीर्षक ‘सच्चा मित्र’।
(2) सारांश-मानव एक समाज में रहने वाला प्राणी है। उसका अस्तित्व ही समाज पर है। समाज में परिचित तो अनेक होते हैं लेकिन मित्रों की संख्या कम होती है। सच्ची मित्रता में त्याग एवं समर्पण की भावना प्रमुख रूप से निहित होती है।

मित्रता में आपसी विश्वास का होना अपेक्षित है। सच्चा मित्र गुरु एवं माता के समान है जो समस्त स्थानों की पूर्णता का द्योतक है।

(3) मैत्री में प्रेम भाव के साथ-साथ समर्पण, त्याग और परस्पर विश्वास होना आवश्यक है।

6. अमृत तो प्रत्येक प्राणी के हृदय में समाया हुआ है, जरूरत है तो उसे जानने की। इस काया के अन्दर भरपूर अमृत है। गुरु के शब्द पर विचार करके ही उसे प्राप्त किया जा सकता है। जो प्रभु की खोज करते हैं वह इस अमृत को देह से ही प्राप्त करते हैं लेकिन गुरु के शब्द पर विचार न कर पाने के कारण अज्ञानी जीव व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है। इस शरीर के नौ द्वार हैं परन्तु इन नौ द्वारों में से हमें अमृत प्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि वह दसवें द्वार में स्थित है। मनुष्य नौ द्वारों के रहस्य को तो जानता है परन्तु गुरु रूपी दसवें द्वार को भूला हुआ है। गुरु का कार्य उस द्वार को प्रकट करना है। यदि अन्तर में परमपिता परमात्मा से हमें प्रेम है, परन्तु जब तक हमें परमात्मा के दर्शन नहीं होते हम तब तक अमृतपान नहीं कर सकते। [2011]

प्रश्न- (1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) व्यक्ति अमृतपान कब कर सकता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक–’अमृत की अभिलाषा।’

(2) सारांश इस गद्यांश के द्वारा लेखक ने यह बताने का प्रयत्न किया है, कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में ईश्वर का निवास है। लेकिन ईश्वर तक पहुँचने का साधन गुरु है। गुरु के द्वारा ही व्यक्ति अपने गन्तव्य तक पहुँच सकता है। व्यक्ति अज्ञानता के कारण इधर-उधर भटकता रहता है और अपने जीवन को बेकार ही नष्ट कर लेता है। लेखक के अनुसार मानव उसके शरीर में मौजूद नौ द्वारों के रहस्य को तो जानता है किन्तु अमृत से तृप्त दसवें द्वार को वह भूला हुआ है, जिसे बिना गुरु के मार्गदर्शन के वह प्राप्त नहीं कर सकता है। सच्चे गुरु का कर्त्तव्य उस दसवें द्वार को प्रकट कर शिष्य भगवानरूपी अमृत से साक्षात्कार करवाना है।

(3) व्यक्ति गुरु के सानिध्य में रहकर अमृत पान कर सकता है।

7. यदि हम समय का सदुपयोग करना सीख लें,तो इससे लाभ ही लाभ हैं। व्यर्थ ही समय व्यतीत करके जो काम दिन भर में कर पाते हैं,उसे कुछ घण्टों में ही कर सकते हैं। इस प्रकार पूरे जीवन में हम कई गुना कार्य करके अपना विकास और मानवता की सेवा कर सकते हैं। अधिक कार्य करके हम अधिक धन,यश, सम्मान अर्जित कर सकते हैं। निरन्तर ऊँचे उठते हुए जीवन को सार्थक बना सकते हैं। हममें कर्मठता आती है, चरित्र में दृढ़ता आती है। सच्चे अर्थों में हम मनुष्य बन जाते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं,सभी ने समय के महत्व को समझा तथा उसका सम्पूर्ण उपयोग किया था। [2009]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सटीक शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
(3) जीवन को सार्थक किस प्रकार बनाया जा सकता है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘समय का सदुपयोग।
(2) सारांश-मानव जीवन में समय का पालन करना नितान्त आवश्यक है। समय के सदुपयोग से कार्य पूर्ण होने में समय की बचत होती है।

समय के सदुपयोग से स्वयं का विकास एवं मानवता की सेवा भी सम्भव है। समय के सदुपयोग से हमारी कर्मशीलता एवं चरित्र का विकास होता है। हम सच्चे अर्थों में मानव कहे जाने के अधिकारी बन सकते हैं।

(3) अधिक कार्य करके धन, यश, सम्मान अर्जित करके निरन्तर ऊँचे उठते हुए जीवन को सार्थक बना सकते हैं।

8. धर्म एक व्यापक शब्द है। मजहब, मत,पंथ या संप्रदाय सीमित रूप है। संसार के सभी धर्म मूल रूप में एक ही हैं। सभी मनुष्य के साथ सद्व्यवहार सिखाते हैं। ईश्वर किसी विशेष धर्म या जाति का नहीं। सभी मानवों में एक प्राण स्पंदन होता है। उसके रक्त का रंग भी एक ही है। सुख-दुःख का भाव बोध भी उनमें एक जैसा है। आकृति और वर्ण, वेशभूषा और रीतिरिवाज तथा नाम ये सब ऊपरी वस्तुएँ हैं। ईश्वर ने मनुष्य या इंसान को बनाया है और इंसान ने बनाया है धर्म या मजहब को। ध्यान रहे मानवता या इंसानियत से बड़ा धर्म या मजहब दूसरा कोई नहीं। वह मिलना सिखाता है, अलगाव नहीं। ‘धर्म’ तो एकता का द्योतक है। [2010]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।
(2) सबसे बड़ा धर्म कौन-सा है?
(3) बाह्य वस्तुएँ क्या हैं?
उत्तर-
(1) शीर्षक-धर्म का अर्थ।’
(2) इन्सानियत या मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
(3) संसार में भिन्न-भिन्न आकृति एवं वर्ण वाले लोग होते हैं। इन व्यक्तियों के रीतिरिवाज और वेशभूषा भी अलग-अलग होती हैं। ये सभी बाह्य वस्तुएँ कहीं जाती हैं।

9. मनुष्य का जीवन बहुत संघर्षमय होता है। उसे पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। फिर भी ईश्वर के द्वारा जो मनुष्यरूपी वरदान की निर्मिति इस पृथ्वी पर हुई है मानो धरती का रूप ही बदल गया है। यह संसार कर्म करने वाले मनुष्यों के आधार पर ही टिका हुआ है। देवता भी उनसे ईर्ष्या करते हैं। मनुष्य अपने कर्म बल के कारण श्रेष्ठ है। धन्य है मनुष्य का जीवन। [2012]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
(3) मनुष्य किस कारण श्रेष्ठ माना गया है?
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘मनुष्य और कर्म।’
(2) सारांश-मानव ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है। यद्यपि मानव जीवन कदम-कदम पर कठिनाइयों और संघर्षों की अनवरत कहानी है किन्तु ईश्वर द्वारा पृथ्वी पर मानव की रचना एक वरदान जैसी है। पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति से धरती का स्वरूप पूर्णतः बदल गया है और उसका सबसे बड़ा कारण है मानव का कर्म प्रधान व्यवहार। वास्तव में यह दुनिया ऐसे लोगों के कारण ही इतनी सुन्दर है जो कर्म को अपना धर्म मानते हैं। देवता तक ऐसे कर्मशील व्यक्तियों से ईर्ष्या करते हैं, या कहें प्रेरित होते हैं। मानव जन्म मात्र अपने कर्म कौशल के कारण ही सभी जीवजन्तुओं में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऐसे कर्म के धनी मानव जीवन की जय है।
(3) मनुष्य अपने कर्म-बल के कारण श्रेष्ठ माना गया है।

10. कई लोग समझते हैं कि अनुशासन और स्वतन्त्रता में विरोध है, किन्तु वास्तव में यह भ्रम है। अनुशासन द्वारा स्वतन्त्रता नहीं छीनी जाती, बल्कि दूसरों की स्वतन्त्रता की रक्षा होती है। सड़क पर चलने के लिए हम स्वतन्त्र हैं, हमें बाईं तरफ से चलना चाहिए किन्तु चाहें तो हम बीच में भी चल सकते हैं। इससे हम अपने प्राण तो संकट में डालते हैं, दूसरों की स्वतन्त्रता भी छीनते हैं। विद्यार्थी भारत के भावी राष्ट्र-निर्माता हैं। उन्हें अनुशासन के गुणों का अभ्यास अभी से करना चाहिए जिससे वे भारत के सच्चे सपूत कहला सकें। [2013, 18]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘अनुशासन और विद्यार्थी जीवन’।
(2) सारांश-प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनुशासन आवश्यक है। इससे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के साथ-साथ दूसरों की स्वतन्त्रता की भी रक्षा होती है। अपना जीवन सुरक्षित होता है और दूसरों का भी। भविष्य के आशा पुंज विद्यार्थियों को अनुशासन में रहना चाहिए, जिससे वे भावी भारत का स्वस्थ निर्माण कर सकें।

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11. स्वार्थ और परमार्थ मानव की दो प्रवृत्तियाँ हैं। हम अधिकतर सभी कार्य अपने लिए करते हैं, पर’ के लिए सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानवता है। यही धर्म है,यही पुण्य है। इसे ही परोपकार कहते हैं। प्रकृति हमें निरन्तर परोपकार का संदेश देती है। नदी दूसरों के लिए बहती है। वृक्ष मनुष्यों को छाया तथा फल देने के लिए ही धूप, आँधी,वर्षा और तूफानों में अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं। [2015]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) सच्ची मानवता क्या है?
(3) वृक्ष हमें परोपकार का सन्देश कैसे देते हैं?
(4) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘परोपकार का महत्व’।
(2) दूसरों के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानवता है।
(3) वृक्ष धूप, आँधी, वर्षा और तूफानों में डटकर खड़े रहते हैं और सब कुछ सहन करने के बावजूद भी मनुष्यों को अपनी शीतल छाया व रसदार फल प्रदान करके हमें परोपकार का सन्देश देते हैं।
(4) सारांश-अपने लिए जीना’ तथा दूसरों के हित में अपना सब कुछ बलिदान करना’, मानव की ये दो प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ हैं। अपने लिए तो प्रत्येक व्यक्ति कार्य करता ही है किन्तु दूसरों के लिए अपना सबकुछ दाँव पर लगा देने वाला व्यक्ति ही सच्चा परोपकारी होता है। परोपकार करना ही सच्चा धर्म और बहुत बड़ा पुण्य माना गया है। नदी स्वयं अपना जल नहीं पीती,वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाते और न ही अपनी शीतल छाया का उपयोग स्वयं के लिए करते हैं। अर्थात् प्रकृति भी हमें परोपकार करने की सीख देती है।

12. आप हमेशा अच्छी जिन्दगी जीते आ रहे हैं। आप हमेशा बढ़िया कपड़े, बढ़िया जूते, बढ़िया घड़ी, बढ़िया मोबाइल जैसे दिखावों पर बहुत खर्च करते हैं मगर आप अपने शरीर पर कितना खर्च करते हैं? इसका मूल्यांकन जरूरी है। यह शरीर अनमोल है। अगर शरीर स्वस्थ नहीं होगा तो आप ये सारे सामान किस पर टाँगेंगे? अतः स्वयं का स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है एवं स्वस्थ रहने में हमारे खान-पान का सबसे बड़ा योगदान है। [2016]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) अनमोल क्या है?
(3) शुद्ध व असली शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘पहला सुख निरोगी काया’।
(2) मानव शरीर अनमोल है।
(3) शुद्ध = अशुद्ध; असली = नकली।

13. आदर्श व्यक्ति कर्मशीलता में ही अपने जीवन की सफलता समझता है। जीवन का प्रत्येक क्षण वह कर्म में लगाता है। विश्राम और विनोद के लिए उसके पास निश्चित समय रहता है। शेष समय जन सेवा में व्यतीत होता है। हाथ पर हाथ धर कर बैठने को वह मृत्यु के समान समझता है। काम करने की उसमें लगन होती है। उत्साह होता है। विपत्तियों में भी वह अपने चरित्र का सच्चा परिचय देता है। धैर्य की कुदाली से वह बड़े-बड़े संकट पर्वतों को ढहा देता है। उसकी कार्यकुशलता देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाते हैं। संतोष उसका धन है। वह परिस्थितियों का दास नहीं है। परिस्थितियाँ उसकी दासी हैं। [2017]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश में वर्णित व्यक्ति के गुणों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-कर्म ही पूजा है।
(2) कर्मशील व्यक्ति सदैव कर्म को ही पूजा समझता है। वह व्यर्थ में समय नहीं गँवाता। आराम तथा मनोरंजन के लिए भी उसके पास एक पूर्व निर्धारित समय होता है। बेकारी की बजाय वह बेगारी करना पसंद करता है। कार्य के प्रति उसमें लगन एवं उत्साह होता है। संकट के समय में भी वह धैर्य के बल पर विजेता बनकर उभरता है। वह परम संतोषी होता है। उसकी कार्यकुशलता प्रेरणाप्रद होती है। वह परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता अपितु परिस्थितियाँ उसकी दासी होती हैं।

MP Board Class 10th Special Hindi अपठित पद्यांश

निम्नलिखित पद्यांशों को पढ़कर उनके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए

1. वे मुस्काते फूल, नहीं-
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं-
जिनको भाता है बुझ जाना।

वे नीलम के मेघ, नहीं-
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनन्त ऋतुराज नहीं
जिसने देखी जाने की राह।

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प्रश्न-
1. उपर्युक्त पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
2. उक्त पद्यांश का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
3. कवयित्री के अनुसार देवलोक के पुष्प किस प्रकार के हैं?
4. देवलोक का ऋतुराज किस प्रकार का है?
उत्तर-
1. शीर्षक–’अपरिवर्तनीय प्रकृति।’
2. सारांश-कवयित्री का कथन है कि देवलोक में प्रत्येक वस्तु अपरिवर्तनीय है, इसलिए वहाँ आनन्द नहीं है,क्योंकि परिवर्तन ही जीवन का आनन्द है। देवलोक के पुष्प एक बार खिलते हैं,तो वे मुरझाते ही नहीं हैं। तारे चमकते हैं,तो वे बुझते ही नहीं हैं। नीलम जैसे काले चमकीले मेघ आसमान में छा जाते हैं, किन्तु बरसते नहीं। वहाँ का ऋतुराज अनन्त है और वह सदैव स्थायी रहता है।
3. कवयित्री के अनुसार देवलोक के पुष्प सदैव खिले रहते हैं, वे कभी मुरझाते नहीं हैं।
4. देवलोक का ऋतुराज (वसन्त) स्थायी रूप से वहाँ निवास करता है।

2. तुम माँसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण! हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की
जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन।
तुम मांस तुम्ही हो रक्त अस्थि
निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा निःस्व त्याग
हे विश्व भोग का वर साधन।

प्रश्न-
1. प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
2. प्रस्तुत पद्यांश का सारांश लिखिए।
3. कवि ने जीवन की पूर्ण इकाई किसे कहा है?
4. नवयुग का तन किससे निर्मित होगा?
उत्तर-
1. शीर्षक–’आत्मा की अमरता।’
2. सारांश-कवि का कथन है कि ऋषि जो संसार के निमित्त जीवन जीते हैं, वे केवल अस्थि मात्र से ही शेष दिखलाई देते हैं, किन्तु उनकी शुद्ध बुद्ध आत्मा जीवन की पूर्ण इकाई है। उनके निःस्वार्थ त्याग के आधार पर देश की संस्कृति का ढाँचा रखा जाएगा। उन्हीं से देश का युवा पल्लवित और पुष्पित होगा, जो संसार के भोगों को आनन्द प्राप्त करेगा।।
3. कवि ने जीवन की पूर्ण इकाई शुद्ध चिन्तनशील और निःस्वार्थ आत्मा से युक्त ऋषि को कहा है।
4. नवयुग का तन ऋषि की अमर आत्मा से निर्मित होगा।

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