MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अनुवाद रचना

एक भाषा को दूसरी भाषा के बदलने का नाम अनुवाद है। संस्कृत में शब्दों के रखने का कोई क्रम नहीं है। वाक्य का कोई भी शब्द कहीं भी रखा जा सकता है, जैसे

रामः विद्यालयं गच्छति।
या
विद्यालयं रामः गच्छति।

इत्यादि अनुवाद करने के लिए हमें विभक्ति, कारक, वचन, पुरुष, लिंग, शब्द, रूप, धातु रूप का ज्ञान होना आवश्यक है। नीचे सरलता के लिए कारक और उनके चिह्न दिए जा रहे हैं-
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पुरुष

कहने वाले, सुनने वाले. या जिसके विषय में बात की जाती है, उस संज्ञा या सर्वनाम का पुरुष कहते हैं। पुरुष तीन प्रकार के होते हैं
(क) अन्य पुरुष या प्रथम पुरुष-जिसके विषय में बात की जाए उसे अन्य पुरुष कहते हैं। जैसे-रामः, सः, सा, तत्, किम्, बालक, बालिका इत्यादि।
(ख) मध्यम पुरुष-जिससे प्रत्यक्ष बात की जाती है उसे मध्यम पुरुष कहते हैं। जैसे-त्वम्, (तुम्), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम सब)।।
(ग) उत्तम पुरुष-जो बात को कहता है उसके लिए उत्तम पुरुष का प्रयोग होता है। जैसे-अहम् (मैं), आवाम् (हम दोनों) वयम् (हम सब)।

लिङ्ग

संस्कृत में लिंग के तीन प्रकार होते हैं
(क) पुल्लिग-रामः, बालकः, हरिः, गुरुः, सः इत्यादि।
(ख) स्त्रीलिंग-सीता, बालिका, सा, माला, रमा, इत्यादि।
(ग) नपुंसकलिंग-फलम्, पुस्तकम्, वस्त्रम्, जलम्, मित्रम्, इत्यादि।

वचन

प्रत्येक विभक्ति में तीन वचन होते हैं-
(क) एकवचन-एक व्यक्ति या वस्तु के लिए एक वचन का प्रयोग होता है। जैसेबालकः (एक बालक), रामः (राम), बालिका (एक लड़की) इत्यादि।
(ख) द्विवचन-दो व्यक्ति या वस्तुओं के लिए द्विवचन का प्रयोग होता है। जैसेबालकौ (दो बालक), बालिके (दो लड़कियाँ), पुस्तके (दो पुस्तकें) इत्यादि।
(ग) बहुजन-तीन या तीन से अधिक व्यक्ति या वस्तुओं के लिए बहुवचन का प्रयोग होता है। जैसे-बालक (बहुत से बच्चे), बालिकाः (लड़कियाँ), पुस्तकानि (पुस्तके) इत्यादि।

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अभ्यास 1.
लट्लकार (वर्तमानकाल)
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अभ्यास 2.
लट्लटकार (वर्तमान काल)
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अभ्यास 3.
लङ्लकार (भूतकाल)
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अभ्यासः 4.
लुट्लकार (भविष्यकाल)
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अभ्यास 5.
लोट्लकार (आज्ञार्थ)
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अभ्यास 6.
विधिलिंग लकार (चाहिए अर्थ में)
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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण समास प्रकरण

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण समास प्रकरण

दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक शब्द बनाना समास कहलाता है। समस्तपद के पहले शब्द को पूर्वपद तथा बाद वाले शब्द को उत्तरपद कहते हैं।

समास शब्द सम् उपसर्ग के साथ अस् धातु से बना है। समास का अर्थ है-संक्षेप में कहना। समास छः प्रकार के होते हैं

1. तत्पुरुष समास

जिस समास में दो शब्दों के मध्य से विभक्तियों का लोप कर दिया जाता है तथा उत्तर पद प्रधान होता है वह तत्पुरुष समास होता है। विभक्तियों के अनुसार तत्पुरुष छः भेद होते हैं-
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2. द्विगु समास

जिस समास का पूर्वपद संख्यावाची हो वह समस्त द्विगु समास कहलाता है। यह समास समाहार (समूह) अर्थ में होता है।।

  • त्रयाणाम् पथाम् समाहारः = त्रिपथम्
  • पंचानां रात्रीणां समाहारः = पंचारात्रम
  • सप्त च ते ऋषयः = सप्तर्षयः
  • पञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी
  • नवानां रात्रीणां समाहारः = नवरात्रम्
  • त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रिलोकी
  • पचानाम् पात्राणां समाहारः = पञ्चपात्रम्
  • शतानाम् अब्दानां समाहारः = शताब्दी

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3. द्वन्द्व समास

जिस समास में दो या दो से अधिक शब्दों के मध्य ‘च’ (और) शब्द का लोप हो जाए वह समास द्वन्द्व समास कहलाता है।

जैसे-

  • त्रयाणाम् पथाम् समाहारः – त्रिपथम्
  • रामः च लक्ष्मणः च – रामलक्ष्मणौ
  • हेमन्तः च शिशिरः च वसन्तः च – हेमन्तशिशिरवसन्ताः
  • सीता च रामः च – सीतारामौ
  • उमा च शंकरः च – उमाशंकरौ
  • पत्रं च पुष्पां च फलं च – पत्र पुष्प फलानि
  • हरि च हरः च – हरिहरौ
  • धर्मः च अर्थः च – धर्मार्थों
  • गुरुः च शिष्यः च – गुरुशिष्यौ
  • माता च पिता च – मातापितरौ
  • धर्मः च अर्थः च कामः च मोक्षः च – धर्मार्थकाममोक्षाः
  • धनं च मानं च – धनमानौ
  • पार्वती च परमेश्वरः च – पार्वतीपरमेश्वरी

4. कर्मधारय समास

इस समास में प्रथमपद विशेषण होता है तथा द्वितीय पद विशेष्य होता है। अथवा प्रथम पद उपमान होता है तथा द्वितीय पद उपमेय होता है।

जैसे-

  • नीलम् चतत् उत्पलम् – नीलोपतलम्
  • नीलम् च तत् कमलम् – नीलकमलम्
  • कृष्णः च असौ सर्पः – कृष्णसर्पः
  • महान् च असौ पुरुषः – महापुरुषः
  • महान् च असौ आत्मा – महात्मा
  • महान् च असौ जनः – महाजनक
  • उत्तमः च असौ जनः – उत्तमजनः
  • राजा च असौ ऋषिः – राजर्षिः
  • घन इव श्यामः – घनश्यामः
  • चरणं कमलम् इव – चरणकमलम्
  • चनद्र इव मुखम् – चन्द्रमुखम्
  • नरः सिंहः इव – नृसिंहः
  • नरः शार्दूलः इव – नरशार्दूलः

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5. बहुव्रीहि समास

बहुव्रीहि समास उन दो या दो से अधिक शब्दों का होता है जो मिलकर किसी अन्य पद का विशेषण बन जाते हैं।

जैसे-

  • पीतम् अम्बरम् यस्य सः – पीताम्बरः
  • सागरः मेखला यस्याः सा – सागरमेखला
  • त्यक्तं सर्वस्यं येन सः – त्यक्तसर्वस्यः
  • चक्रं पाणौ यस्य सः – चक्रपाणिः
  • दश आननानि यस्य सः – दशाननः
  • चन्द्रः शेखरेयस्य सः – चन्द्रशेखरः
  • जितानि इन्द्रियाणि येन सः – जितेन्द्रियः
  • कण्ठे कालः यस्य सः – कण्ठकालः
  • चत्वारि मुखानि यस्य सः – चतुर्मुखः
  • श्वेतं वस्त्रं यस्य सः – श्वेतवस्त्रः
  • त्रीणि नयनानि यस्य सः – त्रिनयनः
  • चत्वारि आननानि यस्य सः – चतुराननः
  • सपरिवार – परिवारेण सहितः यः सः
  • चन्द्रः मौलौ यस्य सः = चन्द्रमौलिः
  • प्राप्तम् उदकं यं सः = प्राप्तोदकः
  • दत्तं भोजनं यस्मै सः – दत्त भोजनः

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6. नञ् तत्पुरुष समास

नञ् अर्थात् न (जिसका अर्थ है नहीं) का पदों के साथ समास होता है। इस समास को नत्र तत्पुरुष कहते हैं। यदि न के आगे स्वरादि शब्द हो तो न के स्थान पर अनु हो जाता है।

  • न ब्राह्मणः, अब्राह्मणः
  • न सत्, असत्।
  • न चतुरः, अचुतरः।
  • न उचितम्, अनुचितम्।
  • न अर्थः, अनर्थः।
  • न एक्यम्, अनैक्यमम्।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण पर्यायवाचीशब्दपरिचयः

शब्द पर्यायवाची शब्दः
आकाशःनभः, गगनम्, व्योयम्, अन्तरिक्षम, अम्बरम्, खम्।
राजाभूपतिः, नृपः, अधिपतिः, नरेशः, नृपतिः।
वायुःअनिलः, समीरः, वातः, पवनः, मारुतः, गन्धवहः।
सूर्यःरविः, दिनकरः, भानुः, दिवाकरः, दिनेशः।
कमलम्पंकजम्, नीरजम्, अम्बुजम्, सरोजम्, सरोरुहम्।
गंगाभागीरथी, मन्दाकिनी, देवनदी, सुरनदी।
पर्वतःगिरीः, अचलः, भूधरः, शैलः, महीध्र, नगः।
अग्निःपावकः, वह्नि, अनलः, हुताशनः।
अमृतम्पीयूषम्, सुधा, सोमः
पृथ्वीभूमिः, अवनिः, मही, धरा, वसुन्धरा, वसुधा, भू।
जलम्वारि, नीरम्, सलिलम्, अम्बु, तोयम्।
समुद्रःवारिधिः, जलधिः, सागरः, नदीशः, सिन्धुः।
पक्षीखगः, विहगः, द्विजः, विहंगम्, पतलिः।
नदीनिम्नगा, गिरितनया, सरित्, निर्झरिणी।
नेत्रम्अक्षि, चक्षुः, दृक, लोचनम्, नयनम्।
चन्द्रमाचन्द्रः, इन्दुः, निशाकरः, विधुः, सुधाकरः, मयंकः।
दुग्धम्पयः, द्रुमः, विटपः, महीरुहः।।
गजःमातंगा, करि, वारणः, हस्ती, द्विपः, नागः, कुञ्जरः।
रात्रिःरजनी, निशा, यामिनी, विभावरी।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण विलोमशब्दपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण विलोमशब्दपरिचयः

शब्दः विलोमशब्दः
तिमिरःप्रकाशः
उत्कर्षःअपकर्षः
अमृतम्विषम्
गुणःदोषः
मित्रम्शत्रुः
जयःपराजयः
उत्थानम्पतनम्
सुखम्दुःखम्
पृथ्वीआकाशः
स्वर्गःनरकः
उपकारःअपकारः
उदयःअस्तः
देवःदानवः
उन्नतिःअवनतिः
सुन्दरःकुरूपः
कटुःमधुरम्
लाभःहानिः
एकःअनेकः
सरलःकठिनः
संयोगःवियोगः
धनीनिर्धनः
जन्ममृत्युः
स्तुतिःनिन्दा
क्रयःविक्रयः
आस्तिकःनास्तिकः
प्रत्यक्षःपरोक्ष/अप्रत्यक्षः
पण्डितःमूर्खः
सबलःनिर्बलः
स्वतन्त्रःपरतन्त्रः
मानःअपमानः
प्रातःसायम्
पक्षःविपक्षः
दिवसःरात्रिः
लाभःहानिः
प्रकाशःअन्धकारः
जड़ःचेतनः
प्रश्नःउत्तरम्
अल्पायुःदीर्घायुः

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अव्ययपरिचयः

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण अव्ययपरिचयः

सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तुिष।
वचनेषु च सर्वेषु यन्नव्येति तदव्ययम्॥

अर्थात् जिन शब्दों में लिंग, कारक और वचन के कारण किसी प्रकार का विकार (परिवर्तन) नहीं होता और जो प्रत्येक दशा में एक समान रहते हैं, उन्हें अव्यय शब्द कहते हैं।

अव्ययों के भेद
अव्ययों के पाँच भेद हैं-

I. उपसर्गः
II. क्रियाविशेषणम्
III. चादिः
IV. समुच्चयबोधकः
V. विस्मयादिबोधकः

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I. उपसर्गः

धातु अथवा धातु से बने अन्य शब्दों (संज्ञा, विशेलण) आदि के पूर्व लगने वाले निम्नलिखित 22 शब्दांशों को उपसर्ग कहते हैं-
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II. क्रियाविशेषणम्

जिन शब्दों से क्रिया के काल, स्थान आदि विशेषताओं का बोध होता है, उन्हें क्रिया-विशेषण कहते हैं। ये अव्यय हैं, इनके रूप नहीं बनते हैं।
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III. चादिः

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IV. समुच्चयबोधकाः

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V. विस्मयादिबोधकाः

अव्ययम् – अर्थः
अहह – शोक या खेद अर्थ में प्रयुक्त
अहो – आश्यर्चसूचक
बत – शोक या खेद अर्थ में प्रयुक्त
हा – कष्टसूचक

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण संधि प्रकरण

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण संधि प्रकरण

दो वर्गों के मिलने पर जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं। जैसे-हिम+आलय-हिमालयः।

संधि तीन प्रकार की होती है-
1. स्वर संधि
2. व्यंजन संधि
3. विसर्ग संधि

1. स्वर संधि-दो स्वरों के मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। स्वर संधि के छः भेद होते हैं-
(i) दीर्घ,
(ii) गुण,
(iii) वृद्धि,
(iv) यण,
(v) अयादि,
(vi) पूर्वरूप,
(vi) प्रकृति भाव।”

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(i) दीर्घ संधि-अ, आ के बाद अ, आ आने पर आ इ, ई के बाद इ, ई आने पर ई, उ, ऊ के बाद उ, ऊ आने पर ऊ तथा ऋ, ऋ के बाद ऋ आने पर ऋ हो जाता है, उसे दीर्घ संधि कहते हैं।

जैसे-
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(ii) गुण संधि (आदगुणः)-अ, आ के बाद इ, ई आने पर ‘ए’ बन जाता है। इसी प्रकार अ, आ के आगे उ, ऊ हो तो ‘ओ’ और ऋ आ जाने पर ‘अर’ बन जाता है।

जैसे-
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(iii) वृद्धि संधि (वृरिचि)-अ, आ के आगे ए, ऐ आने से ‘ऐ’ हो जाता है और अ, आ के आगे ओ या औ आने से ‘औ’ हो जाता है। ऐ और औ स्वरों के वृद्धि रूप हैं।

जैसे-
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(iv) यण संधि (इकोयणचि)-इ, ई, उ, ऊ ऋ से आगे उनसे भिन्न स्वर आने पर इ को यु, ड को व् और ऋ को र होता है-
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(v) आयादि संधि (एचोऽयवायावः)-ए, ऐ, ओ, औ से आगे यदि कोई भिन्न स्वर आ जाए तो पहले वर्णों को क्रमशः अय्, आय, अव् और आव् हो जाते हैं।

जैसे-
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(vi) पूर्णरूप संधि-पदान्त ए तथा ओ के पश्चात् अ आने पर अ का लोप हो जाता है तथा उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) लगा दिया जाता है।

  • हरे + अत्र = हरेऽत्र
  • विष्णो + अत्र = विष्णोऽत्र
  • सखे + अर्पय = सखेऽर्पय
  • सर्वे + अपि = सर्वेऽपि।

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MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण वर्ण परिचय

MP Board Class 9th Sanskrit व्याकरण वर्ण परिचय

वर्ण-भाषा की वह छोटी-से-छोटी इकाई जिसके और अधिक टुकड़े न किए जा सकें ‘वर्ण’ कहलाती है। वर्ण को अक्षर भी कहते हैं।

वर्ण के भेद-वर्णों के दो भेद हैं :
(अ) स्वर,
(ब) व्यंजन।

(अ) स्वर-जिस वर्गों का उच्चारण किसी अन्य वर्ण की सहायता के बिना स्वतन्त्र रूप से हो सकें वे वर्ण स्वर कहलाते हैं।

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संस्कृत भाषा में तेरह स्वर हैं-

अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ऋ, लु।

स्वरों के भेद-स्वर तीन प्रकार के होते हैं-

  1. ह्रस्व स्वर,
  2. दीर्घ स्वर,
  3. प्लुत स्वर,
  4. संयुक्त स्वर।

1. ह्रस्व स्वर-जिन स्वरों का उच्चारण करने में कम-से-कम समय लगे वे ह्रस्व स्वर कहलाते हैं ये पांच हैं-अ, इ, उ, ऋ, तृ।
2. दीर्घ स्वर-जिन स्वरों का उच्चारण करने में में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगे, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। ये स्वर आठ हैं-आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ।
3. प्लुत स्वर-जिन स्वरों क उच्चारण करने से ह्रस्व स्वरों से तिगुना समय लगे, उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। किसी व्यक्ति को दूर से पुकारने में प्लुत स्वरों का प्रयोग होता है। प्लुत स्वर के आगे ३ का चिह्न लगा दिया जाता है। जैसे ओ३म, बाइल।
4. संयुक्त स्वर-ए, ऐ, ओ, औ ये चार वर्ण संयुक्त स्वर कहलाते हैं।
5. व्यंजन-जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से ही होता है वे वर्ण व्यंजन कहलाते हैं। व्यंजन वर्ण तेंतीस (33) हैं।

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व्यंजनों के भेद-व्यंजनों के तीन भेद हैं-

  1. स्पर्श,
  2. अन्तःस्थ,
  3. ऊष्म।

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1. स्पर्श-स्पर्श वर्ण पच्चीस हैं-

क् ख् ग् घ्
ङ् च् छ् ज्
झ् ज् ट् ठ्
ड् ढ् ण् त्
थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्

इन्हें स्पर्श वर्ण कहा जाता है क्योंकि इनके उच्चारण के समय जिह्वा । कण्ठ्, तालु, मूर्धा, दन्त आदि स्थानों का विशेषतः स्पर्श करती है।
2. अन्तःस्थ-य् र् ल् व् ये चार वर्ण अन्तःस्थ वर्ण कहलाते हैं। इनकी स्थिति स्वरों तथा व्यंजनों के मध्य होती है अतः इन्हें अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं।
3. ऊष्म-श् श् स् ह् ये चार वर्ण ऊष्म कहलाते हैं इनके उच्चारण करते समय श्वास वायु घर्षण करती हुई बाहर निकलती है जिससे ऊष्मा उत्पन्न होती है अतः ये वर्ण ऊष्म कहलाते हैं।

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण धातु रूप-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण धातु रूप-प्रकरण

क्रिया-जिसके द्वारा किसी कार्य का करना अथवा होना पाया जाता है, उसे क्रिया कहते हैं। प्रयोग के अनुसार क्रियाओं में परिवर्तन होने से पहले क्रिया का जो मूल रूप होता है, उसे संस्कृत में ‘धातु’ कहते हैं।

जैसे-

‘रामः मन्दिरं गच्छति’
(राम मन्दिर जाता है।)

इस वाक्य में ‘गच्छति’ (जाता है) क्रिया के द्वारा जाने का कार्य हो रहा है, अतः ‘गच्छति’ क्रिया है। यह गम्’ मूल धातु से बनी है। अतः इसमें ‘गम्’ धातु है।
पद-क्रियाओं के रूप चलने के क्रम को पद कहते हैं। पद दो होते हैं-
१. परस्मैपद,
२. आत्मनेपद,

पद के अनुसार धातु भेद-पद के अनुसार धातुएँ तीन प्रकार की होती हैं-
१. परस्मैपदी,
२. आत्मनेपदी,
३. उभयपदी।

प्रत्येक क्रिया किसी न किसी समय में सम्पन्न होती है। अतः इस समय को सूचित करने के लिए संस्कृत में दस लकार होते हैं। यहाँ पाठयक्रम में पाँच लकारों के रूप दिये जा रहे हैं-
१. लट्लकार – वर्तमान काल।
२. लुट्लकार – भविष्यकाल।
३. लङ्लकार – भूतकाल।
४. लोट्लकार – आज्ञा-सूचक।
५. विधिलिङ्लकार – इच्छार्थक – चाहिए अर्थ में।

♦ I. परस्मैपदी

१. “भू” (भव्) होना

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२. गम् (गच्छ) जाना

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३. दृश् (पश्य) देखना

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४. पच् (पकाना)

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५. पा (पिब्) पीना

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♦ II. आत्मनेपदी

६. लभ् (पाना)

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७. सेव (सेवा करना)

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८. वृध् (बढ़ना)

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९. वृत् (होना)

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♦ III. अभयपदी

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लङ्लकार
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लुट्लकार
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लोट्लकार
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विधिलिङ्लकार
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११. ह् (हरना)

लट्लकार
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लङ्लकार
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लङ्लकार
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लोट्लकार
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विधिलिङ्लकार
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१२. याच् (माँगना)

लट्लकार
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ललकार
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लुट्लकार
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लोट्लकार
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विधिलिङ्लकार
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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न १. ‘भवति’ रूप बनता है
(अ) प्रथम पुरुष – द्विवचन,
(ब) प्रथम पुरुष – एकवचन,
(स) प्रथम पुरुष – बहुवचन,
(द) मध्यम पुरुष – एकवचन।
उत्तर-
(ब) प्रथम पुरुष – एकवचन,

२. ‘भू’ धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन का रूप
(अ) भवन्ति,
(ब) भविष्यामि,
(स) भविष्यामः,
(द) भविष्यन्ति।
उत्तर-
(द) भविष्यन्ति।

३. ‘गम्’ धातु, लङ्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का रूप
(अ) अगच्छत्,
(स) अगच्छः
(ब) अगच्छम्,
(द) अगच्छत।
उत्तर-
(अ) अगच्छत्,

४. ‘दृश्’ धातु का ‘द्रक्ष्यति’ रूप किस प्रकार का है?
(अ) लट्,
(ब) लङ्,
(स) लृट,
(द) लोट।
उत्तर-
(स) लृट,

५. ‘पिबन्ति’ रूप ‘पा’ धातु के किस पुरुष, से बनता है?
(अ) प्रथम,
(ब) मध्यम,
(स) उत्तम,
(द) अधम।
उत्तर-
(अ) प्रथम,

रिक्त स्थान पूर्ति
१. ‘भू’ धातु, लङ् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन का रूप ………………………………… है।
२. ‘गम्’ धातु, लृट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप ………………………………… है।
३. ‘दृश्’ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन का रूप ………………………………… है।
४. ‘पचेत्’ रूप ………………………………… लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का रूप ………………………………… है।
५. ‘द्रक्ष्यति’ रूप लट् लकार, प्रथम पुरुष, ………………………………… वचन का रूप है।
उत्तर-
१. अभवम्,
२. गमिष्यथ,
३. पश्यावः,
४. विधिलिङ्,
५. एक।

सत्य/असत्य
१. ‘भवामि’ रूप लृट् लकार का है।
२. ‘गमिष्यामि’ रूप मध्यम पुरुष में बनता है।
३. ‘द्रक्ष्यति’ रूप लृट् लकार में बनता है।
४. ‘पचेत्’ रूप विधिलिङ् लकार प्रथम पुरुष का है।
५. ‘पा’ धातु, लट्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन का रूप पचामः
उत्तर-
१. असत्य,
२. असत्य,
३. सत्य,
४. सत्य,
५. सत्य।

जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण धातु रूप-प्रकरण img 34t
उत्तर-
१. → (iv)
२. → (i)
३. → (v)
४. → (ii)
५. → (iii)

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MP Board Class 10th Sanskrit कथाक्रमसंयोजनम्

MP Board Class 10th Sanskrit कथाक्रमसंयोजनम्

निम्नलिखित वाक्यों के घटना के अनुसार क्रम से लगाओ
(क)
(१) तेषां मध्ये सर्पः फटाटोपं कुर्वन् न्यगदत्।
(२) पक्षिणः तस्य शाखासु नीडानि विरच्य वसन्ति स्म।
(३) कस्मिंश्चित् ग्रामे एकः प्राचीनः विशाल: न्यग्रोधवृक्षः आसीत्।
(४) अनन्तरं शुकः उच्चैः अभणत्।
(५) अस्माभिः मानवैः अपि वृक्षसम्पत् वर्धनीया ननु।
(६) अहम् अस्मिन् वृक्षे चिरात् वसामि’ इति काकः अवदत्।
(७) ततःशाखातःशाखान्तरं चंक्रम्य एकः कीट: प्रत्यवदत्।
(८) वृक्षच्छेदकम् आह्वयामि इमं वृक्षं खण्डशः कर्तुम्।
(९) काकस्य रहनं श्रुत्वा सर्वे प्राणिनः पशवः पक्षिणः साश्च समायाताः।
(१०) ततश्च कृमयः कीटाश्च स्वं-स्वम् अधिकारं घोषयन् कोलाहलम् अकुर्वन्।
उत्तर-

(३) → (२) → (६) → (९) → (१) → (७) → (४) → (१०) → (८) → (५)।

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(ख)
(१) पीवरतनुरुष्ट्री सज्जाता।
(२) अहो! धिगियं दरिद्रताऽस्मद्गेहे।
(३) ततश्च गुर्जरदेशं गत्वोष्ी गृहीत्वा स्वगृहमागतः।
(४) सोऽपि दासेरको महानुष्ट्रः सज्जातः।
(५) सः प्रसववेदनया पीड्यमानाम् उष्ट्रीम् अपश्यत्।
(६) इति चिन्तयित्वा देशान्निष्क्रान्तः।
(७) कस्मिश्चिदधिष्ठाने उज्जवलको नाम रथकारः प्रतिवसति स्म।
(८) स च पूर्वदासेरको मदातिरेकात्पृष्ठे आगत्य मिलति।
(९) ततस्तेन महदुष्ट्रयूथं कृत्वा रक्षापुरुषो धृतः।
(१०) ततः सः नित्यमेव दुग्धं गृहीत्वा स्वकुटुम्बं परिपालयति।
उत्तर-

(७) → (२) → (६) → (५) → (१) → (४) → (१०) → (३) → (९) → (८)।

(ग)
(१). तत्र मुनेः पुरतः ते अश्वं दृष्टवन्तः।
(२) सूर्यवंशस्य राजा सगरः आसीत्।
(३) सः गङ्गां भूमौ आनीतवान्।
(४) सः एकदा अश्वमेधयागं कृतवान्।
(५) भगीरथः तपः कृतवान्।
(६) तस्मात् सः मागस्य विघ्नं कर्तुम् मार्ग चिन्तितवान्।
(७) सगरस्य वंशे भगीरथस्य जन्म अभवत्।
(८) अश्वमेधं कृत्वा सगरः स्वयम् इन्द्रः भविष्यति इति देवेन्द्रस्य असूया आसीत्।
(९) कुपितः मुनि सगरपुत्रान् क्रोधाग्निना दग्धवान्।
(१०) सगरस्य षष्टिसहस्रपुत्राः अश्वम् अन्वेष्टुं सर्वत्र गतवन्तः।
उत्तर-

(२) → (४) → (८) → (६) → (१०) → (१) → (९) → (७) → (५) → (३)।

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण शब्द रूप-प्रकरण

संज्ञा, सर्वनाम और विशेषणों में लिंग के अनुसार एवं शब्दों के अन्तिम स्वर अथवा अन्तिम व्यञ्जन के अनुसार परिवर्तन होता है। जिस प्रकार हिन्दी भाषा में कंर्ता, कर्म, करण आदि कारकों का सम्बन्ध प्रकट करने के लिए “ने, को, से/के द्वारा” इत्यादि चिन्ह संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि में जोड़े जाते हैं। उसी प्रकार संस्कृत भाषा में इन सम्बन्धों को प्रकट करने के लिए विभक्तियों के रूप रखे जाते हैं। इनमें हिन्दी के समान अलग से कोई चिह्न नहीं लगता है।

जैसे-
हिन्दी भाषा – संस्कृत भाषा
बालक ने → बालकः
बालक को → बालकम्
बालक से → बालकेन
दो बालकों को → बालकौ इत्यादि।

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(I) संज्ञा शब्दों के रूप
अकारान्त पुल्लिङ्ग “राम” शब्द
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निर्देश-‘राम’ शब्द के समान ही बालक, छात्र, नर, पुत्र, वानर इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
इकारान्त पुल्लिङ्ग “कवि” शब्द
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निर्देश-‘कवि’ शब्द के समान ही हरि, रवि, कपि, गिरि, अग्नि इत्यादि शब्दों के रूप बनेंगे।
उकारान्त पुल्लिङ्ग “साधु” शब्द
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निर्देश- साधु’ शब्द के समान ही गुरु, भानु, तरु, पशु, रिपु इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
ऋकारान्त पुल्लिङ्ग “पितृ” शब्द
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निर्देश-‘पितृ’ शब्द के समान ही दातृ, भ्रातृ इत्यादि के रूप होते हैं।
हलन्त पुल्लिङ्ग “राजन्” शब्द
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हलन्त पुल्लिङ्ग “भवत्” (आप) शब्द
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निर्देश- भवत्’ शब्द के समान ही गच्छत्, धीमत्, श्रीमत्, बुद्धिमत् इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
हलन्त पुल्लिङ्ग “आत्मन्” शब्द
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निर्देश-‘आत्मन्’ शब्द के समान ही ब्रह्मन्, अध्वन् आदि के रूप होते हैं।
आकारान्त स्त्रीलिङ्ग “रमा” शब्द
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निर्देश-‘रमा’ शब्द के समान ही बाला, बालिका, लता, छात्रा, माला, सीता इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
इकारान्त स्त्रीलिङ्ग “मति” शब्द
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निर्देश-‘मति’ शब्द के समान ही गति, औषधि, भूमि, जाति इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग “नदी” शब्द
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निर्देश-‘नदी’ शब्द के समान ही जननी, पार्वती, पत्नी, नारी इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग “मातृ” शब्द
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निर्देश-‘मातृ’ शब्द के समान ही ‘दुहितृ’ इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
अकारान्त नपुंसकलिङ्ग “फल” शब्द
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निर्देश-‘फल’ शब्द के समान ही पुस्तक, गृह, पुष्प, वन | इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
इकारान्त नपुंसकलिङ्ग “वारि” शब्द
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निर्देश-‘मधु’ शब्द के समान ही वसु, अश्रु, अम्बु इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
नकारान्त नपुंसकलिङ्ग “नामन्” शब्द
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निर्देश-‘नामन्’ शब्द के समान हेमन्, प्रेमन्, व्योमन्, धामन्, दामन्, सामन्, लोमन् इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं।
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(II) सर्वनाम शब्दों के रूप
नोट-सर्वनाम शब्दों में सम्बोधन नहीं होता। इसलिए इनके रूप प्रथमा से सप्तमी विभक्ति तक ही चलते हैं, सम्बोधन में नहीं।
“अस्मद्” (मैं, हम) शब्द
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“युष्मद्” (तू, तुम, तुझे) शब्द
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पुल्लिङ्ग “तत्” (वह, उस) शब्द
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स्त्रीलिङ्ग “तत्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “तत्” शब्द
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पुल्लिङ्ग “एतत्” शब्द (यह)
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स्त्रीलिङ्ग “एतत्” शब्द (यह)
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नपुंसकलिङ्ग “एतत्” शब्द (यह)
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पुल्लिङ्ग “किम्” (कौन, किस) शब्द
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स्त्रीलिङ्ग “किम्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “किम्” शब्द
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पुल्लिङ्ग “यत्” (जो) शब्द
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स्त्रीलिङ्ग “यत्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “यत्” शब्द
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पुल्लिङ्ग “इदम्” (यह, दस, ये, इन) शब्द

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स्त्रीलिङ्ग “यत्” शब्द
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नपुंसकलिङ्ग “इदम्” शब्द
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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न १.
‘राम’ शब्द का षष्ठी विभक्ति का रूप है
(अ) रामः,
(ब) रामम्,
(स) रामेण,
(द) रामस्य।

२. ‘कवि’ शब्द का द्वितीया विभक्ति का रूप है
(अ) कविम्,
(ब) कविः
(स) कविना,
(द) कवेः।

३. ‘साधोः’ शब्द में विभक्ति है
(अ) प्रथमा,
(ब) द्वितीया,
(स) चतुर्थी,
(द) पंचमी।

४. ‘पित्रा’ शब्द में विभक्ति है
(अ) चतुर्थी,
(ब) तृतीया,
(स) प्रथमा,
(द) पंचमी।

५. ‘राज्ञः’ शब्द में विभक्ति है
(अ) प्रथमा,
(ब) षष्ठी
(स) सप्तमी,
(द) सम्बोधन।
उत्तर-
१. (द),
२. (अ),
३. (द),
४. (ब),
५. (ब)

रिक्त स्थान पूर्ति
१. ‘रामेण’ शब्द में ………………………………. विभक्ति है।
२. ‘रमायै’ शब्द ………………………………. विभक्ति का है।
३. ‘कवि’ शब्द द्वितीया विभक्ति बहुवचन का रूप ………………………………. है।
४. ‘साधुना’ शब्द में ………………………………. विभक्ति है।
५. ‘पितुः’ शब्द ………………………………. विभक्ति का है।
उत्तर-
१. तृतीया,
२. चतुर्थी,
३. कवीन्,
४. तृतीया,
५. षष्ठी।

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सत्य/असत्य
१. ‘माम्’ रूप प्रथमा विभक्ति का है।
२. ‘राज्ञा’ रूप तृतीया विभक्ति में बनता है।
३. ‘तेन’ रूप में तृतीया विभक्ति है।
४. ‘रामे’ रूप प्रथमा विभक्ति से बनता है।
५. ‘रमायाः’ रूप पंचमी और षष्ठी विभक्ति में बनता है।
उत्तर-
१. असत्य,
२. सत्य,
३. सत्य,
४. असत्य,
५. सत्य।

जोड़ी मिलाइए
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उत्तर-
१. → (iii)
२. → (i)
३. → (iv)
४. → (ii)
५. → (vi)
६. →(v)

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