MP Board Class 9th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 5 विश्व मन्दिर

MP Board Class 9th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 5 विश्व मन्दिर (सामाजिक निबन्ध, वियोगी हरि)

विश्व मन्दिर अभ्यास

बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक अपना विश्व मन्दिर कहाँ निर्मित करना चाहता है?
उत्तर:
लेखक अपना विश्व मन्दिर भारत की तपोभूमि पर ही निर्मित करना चाहता है।

प्रश्न 2.
परमेश्वर का महामन्दिर किसे कहा गया है?
उत्तर:
परमेश्वर का महामन्दिर इस समस्त विश्व को कहा गया है। यह समस्त विश्व उसी घट-घट व्यापी का घर है जब हम उसे अपने दिल के मन्दिर में बैठा लेंगे तो सर्वत्र हमें सुख शान्ति एवं आनन्द मिलेगा। उसके आने से अविद्या की अँधेरी रात समाप्त हो जाएगी और प्रेम का आलोक सर्वत्र बिखर जाएगा। यह महामन्दिर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय होगा। यह महामन्दिर किसी एक धर्म सम्प्रदाय का न होकर सर्व धर्म सम्प्रदायों का समन्वय मन्दिर होगा।

प्रश्न 3.
विश्व मन्दिर हमें कब दिखाई देगा?
उत्तर:
यह विश्व मन्दिर हमें प्रेम के प्रकाश में दिखाई देगा।

प्रश्न 4.
समन्वय मन्दिर किसके लिए होगा?
उत्तर:
समन्वय मन्दिर सभी धर्म एवं सम्प्रदायों के लिए होगा। यह किसी विशेष धर्म या सम्प्रदाय के लिए नहीं होगा।

प्रश्न 5.
विश्व मन्दिर की दीवारों पर किन-किन धर्म ग्रन्थों के महावाक्य खुदे होंगे? धर्म ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
विश्व मन्दिर की दीवारों पर वेद के मन्त्र, कुरान की आयतें, अवेस्ता की गाथाएँ, बौधों के सुत्त, इंजील के सरमन, कन्फ्यू शियस के सुवचन, कबीर के सबद और सूर के भजन आप उस मन्दिर की पवित्र दीवारों पर पढ़ सकेंगे।

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प्रश्न 6.
इस काल्पनिक विश्व मन्दिर में “मैं-तू न होगा।” इस वाक्य का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त कथन का भाव यह है कि उस काल्पनिक विश्व मन्दिर में साधकगण लोक सेवा एवं विश्व प्रेम का प्रचार-प्रसार करेंगे। धार्मिक झगड़े से ऊबे हुए या घबराये हुए शान्ति प्रिय साधक वहाँ बैठकर दिव्य प्रेम की साधना किया करेंगे। उस मन्दिर में ‘मैं’ और ‘तू’ का झगड़ा नहीं होगा। वहाँ तो वही एक प्रभु होगा जो सबका होगा।

प्रश्न 7.
काल्पनिक विश्व मन्दिर के भव्य और दिव्य रूप को देखकर विपक्षियों के मन में कौन-से भाव जाग्रत होंगे?
उत्तर:
काल्पनिक विश्व मन्दिर के भव्य और दिव्य रूप को देखकर विपक्षियों के मन में प्रेम एवं सत्य की भावनाएँ जन्म लेंगी। चारों ओर स्नेह ही स्नेह होगा। सभी एक साथ मिलकर स्नेह का प्रसाद वितरित कर रहे होंगे। विपक्षियों का भी प्रवेश मन्दिर में वर्जित नहीं होगा।

प्रश्न 8.
समन्वय मन्दिर में बैठकर लोग क्या करेंगे?
उत्तर:
समन्वय मन्दिर में किसी विशेष धर्म या सम्प्रदाय का प्रवेश न होगा अपितु वहाँ तो सर्वधर्म सम्प्रदायों के लोगों का वास रहेगा। वह सबके लिए होगा, सबका होगा। यहाँ बैठकर लोग सत्य, प्रेम एवं करुणा का सन्देश दुनिया को सुनायेंगे। उसमें आपसी मन-मुटाव तथा तू-तू, मैं-मैं का झगड़ा नहीं होगा।

प्रश्न 9.
विश्व मन्दिर पाठ का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
‘विश्व मन्दिर’ पाठ का प्रमुख उद्देश्य है कि समस्त विश्व में धर्म, जाति देश एवं दिशा के आधार पर भेद-भाव को समाप्त करके सर्वत्र एकता, सहानुभूति एवं सह-अस्तित्व की भावना को जाग्रत करना है। इसी बन्धुत्व भाव से रहते हुए हमें जगत् पिता के दर्शन हो जाएँगे।

प्रश्न 10.
लेखक ने काल्पनिक विश्व मन्दिर के निर्माण की कल्पना किस उद्देश्य से की है? लिखिए।
उत्तर:
लेखक ने काल्पनिक विश्व मन्दिर के निर्माण की कल्पना सब धर्म एवं सम्प्रदायों में आपसी सहमति एवं सहृदयता जगाने की भावना से की है। उसकी दीवारों पर संसार के सभी प्रचलित धर्म ग्रन्थों के समन्वय सूचक महावाक्य दीवारों पर खुदे होंगे। किसी भी धर्मवाक्य में भेद न दिखाई देगा। सबका एक ही लक्ष्य एक ही मतलब होगा। उसकी दीवारों पर खुदे हुए प्रेम मन्त्र मानवों के मन से संशय और भ्रम का पर्दा उठायेंगे तथा उनसे अनेकता में एकता की झलक दिखाई देगी।

प्रश्न 11.
विश्व मन्दिर की स्थापना की आवश्यकता लेखक क्यों अनुभव करता है?
उत्तर:
विश्व मन्दिर की स्थापना की आवश्यकता लेखक इसलिए अनुभव करता है क्योंकि इससे यह समस्या समाप्त हो जाएगी कि यह राम का निवास स्थल है या नहीं। ईश्वर की सार्वभौमिकता प्रश्नों की परिधि से बाहर रहेगी। सर्वसामान्य के हितों की रक्षा हो पाएगी। इसकी स्थापना से संशय, नास्तिकता एवं भेदभाव की भावना समाप्त हो जाएगी। इसमें सभी धर्म, वर्ण एवं जातियों के लोग प्रवेश पाने में समर्थ होंगे। इसमें पापी-पुण्यात्मा तथा ऊँचा-नीच का भेद नहीं होगा।

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MP Board Class 9th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 4 वैद्यराज जीवक

MP Board Class 9th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 4 वैद्यराज जीवक (वैज्ञानिक निबन्ध, घनश्याम ओझा)

वैद्यराज जीवक अभ्यास

बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवक किस शास्त्र के विद्वान थे?
उत्तर:
जीवक आयुर्वेदिक चिकित्साशास्त्र के विद्वान थे।

प्रश्न 2.
जीवक के मन में किनके दर्शन की इच्छा थी?
उत्तर:
जीवक के मन में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध के दर्शन की इच्छा थी।

प्रश्न 3.
राजकुमार अभय के प्रति जीवक ने अपनी कृतज्ञता कैसे व्यक्त की?
उत्तर:
अयोध्या नगरी में एक सेठ की बीमार पत्नी के सफल इलाज के फलस्वरूप सेठ द्वारा जीवक को सहस्र स्वर्ण मुद्राएँ दी गयीं। राजगृह पहुँचकर जीवक ने अपने प्रतिपालक राजकुमार अभय को सेठ द्वारा दी गयी सारी स्वर्ण मुद्राएँ देकर कृतज्ञता ज्ञापित की।

प्रश्न 4.
अवंती नरेश से तेज चलने वाला हाथी माँगने के पीछे जीवक का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
अवन्ती नरेश पीलिया रोग से पीड़ित थे और इस रोग का इलाज गाय के घी के सेवन से ही हो सकता था पर अवन्ती नरेश को घी से उल्टी आती थी। बिना घी के सेवन के उपचार नहीं हो सकता था। जीवक इसी समस्या से उलझे हुए थे तभी उन्होंने अवन्ती नरेश से तेज चलने वाला हाथी माँगा। हाथी मिल जाने पर जीवक ने घी के साथ राजा को औषधि देने का ऐसा समय बताया जबकि वे हाथी पर सवार होकर अवन्ती राज्य की सीमा पार कर चुके होते। यदि दवाई का अनुकूल प्रभाव उनकी उपस्थिति में न होता तो उन्हें दण्ड का भागी होना पड़ता। इसी भय से उन्होंने राजा से तेज गति से चलने वाला हाथी माँगा।।

प्रश्न 5.
जीवक के खाली हाथ लौटने पर भी आचार्य ने उन्हें परीक्षा में उत्तीर्ण क्यों कहा?
उत्तर:
तक्षशिला के आचार्य ने जीवक की परीक्षा लेने के लिए यह प्रश्न दिया था कि वत्स संसार में ऐसी किसी वनस्पति को खोजो जिसमें औषधीय गुण न हो। जीवक ने अनेक दिनों तक अथक परिश्रम किया पर उसे एक भी वनस्पति ऐसी न मिली जिसमें औषधीय गुण न हों। यद्यपि जीवक अपने आचार्य के प्रश्न का उत्तर नहीं ढूँढ़ सका था। पर फिर भी आचार्य ने उसे परीक्षा में उत्तीर्ण कह दिया। क्योंकि आचार्य जी जानते थे कि मेरे द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रश्न वास्तव में गलत था।

प्रश्न 6.
जीवक ने कौन-सा संकल्प लिया था?
उत्तर:
जीवक ने यह संकल्प लिया था कि वे कठिन परिश्रम और तप से योग्यता हासिल करेंगे तथा कभी भी किसी पर आश्रित बनकर नहीं रहेंगे और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबकी सहायता करेंगे।

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प्रश्न 7.
सम्राट बिम्बसार के पुत्र ने ‘जीवक’ नाम क्यों दिया?
उत्तर:
महाराज बिम्बसार के पुत्र राजकुमार ‘अभय’ को यह नवजात शिशु एक मिट्टी के ढेर पर पड़ा हुआ मिला था। इतनी विषम परिस्थिति में भी वह जीवित था इसलिए उसका नाम ‘जीवक’ रख दिया गया।

प्रश्न 8.
आचार्य द्वारा जीवक को विदा करते समय कौन-सी सीख दी गई थी? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
जीवक को जब कोई भी वनस्पति औषधीय गुणों से हीन नहीं दिखाई दी तथा सभी में उन्हें सजीवता के दर्शन हुए तो इस बात से प्रसन्न होकर तक्षशिला के आचार्य ने उसे उसकी अन्तिम परीक्षा में उत्तीर्ण कर दिया तथा उसे आशीर्वाद दिया। जीवक को विदाई देते समय आचार्य ने उन्हें शिक्षा दी कि तुम्हें ऋग्वेद में जो रोग एवं उनके उपचार बताए हैं, उन्हें तुम्हें आगे बढ़ाना है। भारद्वाज, अत्रेय, धन्वंतरि, चरक एवं सुश्रुत आदि आचार्यों ने इस कार्य को आगे बढ़ाया है। इन सभी ने वनस्पतियों में भी प्राणियों के समान जीवन माना है। अत: इसी कार्य को तुम्हें और आगे बढ़ाना है। यह कहकर आचार्य चुप हो गये। यह उपदेश सुनकर जीवक बहुत प्रसन्न हुआ।

प्रश्न 9.
जीवक द्वारा किन-किन रोगियों की चिकित्सा की गयी? विवरण दीजिए।
उल्लर:
अपने आचार्य से दीक्षा प्राप्त करके तथा उनसे विदा लेकर जीवक राजगृह लौट आये। राजगृह वापस आने के बाद जीवक ने दो असाध्य रोगियों को शल्य क्रिया द्वारा स्वस्थ बनाया। उन्होंने एक युवक के पेट की शल्य क्रिया करके उसकी उलझी हुई आँतों की गाँठे खोलकर तथा पुनः सिलाई करके औषधि का लेप लगाया। दूसरी शल्य क्रिया एक सेठ के मस्तिष्क की करके उसे नया जीवन प्रदान किया था।

अयोध्या नगरी में सात वर्षों से सिर की पीड़ा से तड़प रही नगर सेठ की पत्नी का बिना शल्य क्रिया के ही उपचार कर दिया था। इसी भाँति उन्होंने अवंती नरेश चंदप्रद्योत के पीलिया रोग का इलाज किया था।

प्रश्न 10.
जीवक को ऐसा क्यों लगा कि वे भगवान बुद्ध के कृपापात्र बन गये हैं?
उत्तर:
आयुर्वेद का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर जीवक वैद्य बहुत सन्तुष्ट थे पर वे उस युग के महान् धर्म प्रवर्तक भगवान बुद्ध के दर्शन करना चाहते थे। संयोग से उन्हें भगवान बुद्ध की चिकित्सा का अवसर प्राप्त हो गया। भगवान बुद्ध के पाँव में धारदार पत्थर से चोट लग गई थी। इससे पाँव से खून बहने लगा था। जीवक ने औषधियों का लेप करके पैर पर पट्टी बाँध दी। लेकिन पट्टी के एक निश्चित सीमा के बाद खोलने का उन्हें ध्यान नहीं रहा। इससे वे बड़े दुःखी हुए।

इधर भगवान बुद्ध ने जीवक के मन की बात जानकर स्वयं पट्टी खोल दी थी। भगवान बुद्ध से सुबह भेंट होने पर भगवान ने जीवक को स्वयं ही बताया कि “जीवक जब तुम मेरी पट्टी खोलने के लिए चिंतित हो रहे थे, तभी मैंने उस पट्टी को खोल दिया था।” जीवक ने आश्चर्य से भगवान बुद्ध की ओर देखा और वे उनके चरणों में नतमस्तक हो गये। उन्हें यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि भगवान बुद्ध ने उनके मन को अपने मन से जोड़ लिया है, वे उनके कृपापात्र बन चुके हैं।

प्रश्न 11.
सेठ के मस्तिष्क की शल्य क्रिया करने के पूर्व जीवक ने क्या शर्त रखी?
उत्तर:
सेठ के मस्तिष्क की शल्य क्रिया करने से पूर्व जीवक ने एक शर्त रखी थी कि तुम्हें इक्कीस महीने तक बिस्तर पर लेटना होगा। सात महीने दाईं तरफ, सात महीने बाईं तरफ और सात महीने सीधे।

पर सेठ सात महीने के स्थान पर सात दिन भी एक तरफ नहीं लेट पाया तो जीवक ने सात, सात दिन में ही उसे करवटें बदलवा कर स्वस्थ कर दिया था। उन्होंने सेठ से कहा कि मैं आपको केवल इक्कीस दिन ही विश्राम देना चाहता था लेकिन आपके धैर्य की कमी को देखकर मैंने इक्कीस दिनों को इक्कीस महीने बताया था।

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MP Board Class 9th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 3 हल्दीघाटी

MP Board Class 9th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 3 हल्दीघाटी (कविता, श्यामनारायण पाण्डेय)

हल्दीघाटी अभ्यास

बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
चेतक को प्रलय मेघ-सा क्यों कहा गया है?
उत्तर:
चेतक को प्रलय मेघ-सा इसलिए कहा गया है क्योंकि वह रणभूमि में शत्रु सेना पर प्रलय काल के मेघ के समान भयंकरता से टूट पड़ता था।

प्रश्न 2.
राणा प्रताप की तलवार को किसके समान कहा गया है?
उत्तर:
राणा प्रताप की तलवार को विषयुक्त नागिन, विद्युत् एवं जिह्वा निकाले हुए चण्डी के समान कहा गया है।

प्रश्न 3.
अजब विषैली नागिन किसे कहा गया है?
उत्तर:
अजब विषैली नागिन राणा प्रताप की तलवार को कहा गया है।

प्रश्न 4.
मानसिंह के हाथी की कमर क्यों झुक गई?
उत्तर:
मानसिंह ने राणा प्रताप के ऊपर भाले से प्रहार करना चाहा तभी राणा प्रताप ने उस प्रहार को थाम कर इस तरह का झटका दिया कि हाथी की भी कमर झुक गई।

प्रश्न 5.
अम्बर कलंक किसे और क्यों कहा गया है?
उत्तर:
अम्बर कलंक का अर्थ होता है आकाश को कलंकित करने वाला। अम्बर कलंक मानसिंह को कहा गया है क्योंकि मानसिंह ने मेवाड़ पर आक्रमण करने का षड्यंत्र रचा था। अकबर तो राणा प्रताप के शौर्य एवं रणकौशल से भयभीत था। लेकिन मानसिंह के उकसाने पर और उसी के नेतृत्व में हल्दी घाटी पर आक्रमण किया गया। मेवाड़ की धरती के आकाश को कलंकित करने के कारण ही मानसिंह को अम्बर कलंक कहा गया है।

प्रश्न 6.
‘तो फिर लड़ ले भाला लेकर’ यह किसने, किससे कहा?
उत्तर:
‘तो फिर लड़ ले भाला लेकर’ यह कथन राणा प्रताप ने मानसिंह से कहा।

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प्रश्न 7.
प्रताप के भाले के वार से मानसिंह कैसे बचा? उसके बदले में कौन मारा गया?
उत्तर:
प्रताप के भाले के वार से मानसिंह हौंदे के तल में छिपकर बच सका पर भाले के वार से हाथी का चालक पीलवान मारा गया।

प्रश्न 8.
हल्दी घाटी कहाँ स्थित है और क्यों प्रसिद्ध है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हल्दी घाटी अरावली पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित है। इस क्षेत्र में अकबर द्वारा भेजी गयी सेना ने मानसिंह के नेतृत्व में हमला किया। यह युद्ध एक भयनाक युद्ध था। अकबर, राणा प्रताप की शक्ति से डरता था पर मानसिंह के उकसाने पर उसने युद्ध किया। इस युद्ध में अकबर की सेना का बहुत नुकसान हुआ। महाराणा प्रताप सैनिकों की कमी के कारण युद्ध तो नहीं जीत पाये पर उन्होंने हार कभी भी स्वीकार नहीं की। भामाशाह से धन की मदद मिलने पर उन्होंने अपनी सेना को फिर इकट्ठा किया और वे देश की स्वतंत्रता के लिए जंगल-जंगल भटकते फिरे पर अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राणा प्रताप का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है।

प्रश्न 9.
चेतक के शौर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक अत्यन्त तीव्र गति से दौड़ता था। वह दौड़ने में हवा को कभी को भी मात देता था। उसको चलाने के लिए चाबुक का प्रयोग नहीं किया जाता था। वह तो इशारे में ही उड़ जाता था। वह शत्रुओं को रौंदता हुआ युद्ध क्षेत्र से निकल जाता था। चौकड़ी भरते समय वह आकाश में उड़ने लगता था। तलवारों के युद्ध में भी वह बिना किसी डर के सरपट दौड़ जाता था।

वह शत्रु सेना पर प्रलय काल के बादलों के समान आक्रमण करता था। वह हाथी के मस्तक पर अपने आगे के दोनों पैर गड़ाकर उन्हें रोक देता था।

प्रश्न 10.
राणा प्रताप के युद्ध कौशल व वीरोचित व्यवहार का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
राणा प्रताप एक महान वीर योद्धा था। वह शत्रुओं से जरा भी नहीं डरता था। राणा प्रताप युद्धक्षेत्र में शत्रुओं के सिरों को एक झटके में काट डालता था। जब भी राणा का आक्रमण होता था शत्रुदल में आतंक मच जाता था और वे इधर-उधर बचने के लिए भागने लग जाते थे। उसकी तलवार शत्रुओं के सिर काट-काटकर लहराती रहती थी। उसकी तलवार को देखकर ऐसा लगता था मानो रणचण्डी अपनी जीभ पसार कर खून पीने के लिए व्याकुल हो रही है।

महान् योद्धा होते हुए भी वीरोचित व्यवहार शत्रु से भी करता था। जब प्रताप के प्रहार से मानसिंह का भाला टूट गया था। वह चाहता तो इस मौके का लाभ उठाकर मानसिंह का वध कर सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया अपितु मानसिंह से पुनः भाला हाथ में लेने को कहा। जब मानसिंह ने दुबारा भाला ले लिया तो राणा प्रताप ने हँसकर कहा-हे मानसिंह अब तू बस कर युद्ध हो चुका। अब यदि तू अपनी खैर चाहता है तो अपनी जान बचाकर यहाँ से भाग जा। जब मानसिंह नहीं माना तो राणा ने ऐसा भीषण प्रहार किया कि हाथी का हौदा टूट गया और मानसिंह ने उसमें छिपकर अपनी जान बचाई लेकिन दूसरे ही क्षण राणा के प्रहार से पीलवान की मौत हो गई। इस प्रकार हम देखते हैं कि राणा जहाँ महान् योद्धा था वहीं वह शत्रु के निशस्त्र होने पर उस पर वार नहीं करता था।

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MP Board Class 9th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 2 पुस्तक

MP Board Class 9th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 2 पुस्तक (आत्मकथा, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी)

पुस्तक अभ्यास

बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य पुस्तकों से कौन-कौन-से गुण अर्जित करता है?
उत्तर:
मनुष्य पुस्तकों से सदाचार, प्रेम, करुणा, परोपकार तथा न्याय आदि मानवीय गुण अर्जित करता है।

प्रश्न 2.
सत् साहित्य की रचना कब होती है?
उत्तर:
जब कवि का विवेक या ज्ञान उल्लास का रूप धारण करता है तभी सत् साहित्य की रचना होती है।

प्रश्न 3.
इस पाठ में वर्णित दो महाकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
इस पाठ में लेखक ने तुलसीकृत रामचरितमानस और महाकवि व्यास रचित ‘महाभारत’ महाकाव्यों की चर्चा की है।

प्रश्न 4.
चिरन्तन आनन्द और गौरव किसमें निहित है?
उत्तर:
चिरन्तन आनन्द और गौरव सत् साहित्य में निहित है। जब कवि का विवेक आनन्द का रूप ग्रहण करता है, तब सत् साहित्य का निर्माण होता है।

प्रश्न 5.
मुझमें किसी दूसरे की आत्मा निवास करती है से क्या आशय है? समझाइए।
उत्तर:
‘मुझमें किसी दूसरे की आत्मा निवास करती है’ से यह आशय है कि एक पुस्तक की रचना में रचनाकार की साधना ही प्रमुख तथा अपूर्व प्रकाश सम्पन्न होती है। उसके अन्तर्गत उल्लास, सुख, सुषमा, शौर्य, आतंक एवं विस्मय जब किसी रचनाकार के हृदय स्थल में रसरूप में परिणत होते हैं, तभी पुस्तक की रचना होती है। वास्तव में पुस्तक में लेखक की आत्मा का प्रकाश ही निहित होता है।

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प्रश्न 6.
‘किताब का यथार्थ मूल्य’ किसमें निहित है?
उत्तर:
किताब का यथार्थ मूल्य तो पुस्तक में निहित ज्ञान में होता है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। किताब एक अमूल्य कोश है। पुस्तक रचनाकार के आनन्द का स्रोत है। वास्तव में किताब का यथार्थ मूल्य रचनाकार के यश, गौरवपूर्ण चिन्तन और उल्लास में होता है जिसका रसास्वादन पाठक किया करते हैं।

प्रश्न 7.
व्यक्ति द्वारा किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्य किए जाते हैं?
उत्तर:
जीवन निर्वाह के लिए धन की आवश्यकता होती है। अतः व्यक्ति द्वारा किसी-न-किसी रूप में इसी अर्थसिद्धि के लिए अर्थात् उद्देश्य की पूर्ति के लिए काम करना पड़ता है।

प्रश्न 8.
पुस्तक एक निष्प्राण ग्रंथ क्यों नहीं है?
उत्तर:
पुस्तक एक निष्प्राण ग्रंथ नहीं हो सकती क्योंकि उसमें कवि/लेखक की आत्मा का प्रकाश समाया हुआ है। पुस्तक में कवि/लेखक का ज्ञान, अनुभव एवं अध्यवसाय समाया रहता है। इन्हीं गुणों को धारण कर मानव सच्चा मानव बनता है। वह समाज एवं मानवता को सन्मार्ग पर ले जाता है जिससे जीवन में समरसता और आनन्द की वर्षा होती है।

प्रश्न 9.
संसार में सफलता की कसौटी क्या है?
उत्तर:
संसार में जब ज्ञान आनन्द के रूप में प्रतिष्ठित होता है तब सत् साहित्य का निर्माण होता है। इसके विपरीत जब वह व्यवसाय के रूप में परिणत हो जाता है तब वह लाभ-हानि एवं लेन-देन का एक उपकरण मात्र रह जाता है। सामान्यतः अपनी इच्छा की पूर्ति को ही मानव सफलता की कसौटी मानता है लेकिन यह भावना चिरस्थायी नहीं है। यदि हममें आत्मबल है, दृढ़ संकल्प है तो हमारा कोई काम असफल नहीं होगा। अतः संसार में सफलता की कसौटी प्राप्त करने के लिए हमें इन गुणों का संचय अपने में करना चाहिए।

प्रश्न 10.
जिन्हें केवल उदरपूर्ति की चिन्ता रहती है वे किस महत्व को नहीं जानते?
उत्तर:
जिन्हें केवल उदरपूर्ति की चिन्ता रहती है वे ज्ञान के गौरव के महत्त्व को नहीं जानते हैं। जो ज्ञान के महत्त्व को नहीं जानते वे न सत् साहित्य की महिमा को जानते हैं और न विज्ञान की शक्ति को।

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MP Board Class 9th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 1 नया वर्ष नया विहान

MP Board Class 9th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 1 नया वर्ष नया विहान (आलेख, अमृतलाल बेगड़)

नया वर्ष नया विहान अभ्यास

बोध प्रश्न

प्रश्न 1.
हमारी पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में कितने दिन लगते हैं?
उत्तर:
हमारी पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में 365 दिन लगते हैं।

प्रश्न 2.
सौर पंचांग किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी को सूर्य के चक्कर लगाने में 365 दिन का समय लगता है। इसी के आधार पर बनाई गई तिथियों आदि के क्रमवार विवरण को हम सौर पंचांग कहते हैं।

प्रश्न 3.
अधिकांश देशों में कौन-सा संवत् प्रचलित है?
उत्तर:
अधिकांश देशों में ईसवी संवत् प्रचलित है।

प्रश्न 4.
चन्द्रमा कितने दिनों में पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है?
उत्तर:
चन्द्रमा 27½ दिन में पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है।

प्रश्न 5.
हमारे देश में कौन-कौन से संवत् चलते हैं?
उत्तर:
हमारे देश में अनेक संवत् चलते हैं जिनमें वीर निर्माण संवत्, शक संवत्, ईसवी संवत् तथा विक्रम संवत् प्रमुख हैं।

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प्रश्न 6.
लेखक ने स्वाद के सम्बन्ध में किस प्रकार की जिज्ञासा प्रकट की है?
उत्तर:
स्वाद के सम्बन्ध में यह जिज्ञासा उत्पन्न होने पर कि स्वाद जीभ में है या गुलाब जामुन में? यदि स्वाद गुलाब जामुन में है तब तो वह तश्तरी में रखे-रखे ही स्वाद देगा और यदि जीभ में स्वाद है तो फिर गुलाब जामुन खाने की क्या जरूरत है? वास्तव में स्वाद न केवल जीभ में है और न केवल गुलाब जामुन में अपितु वह तो दोनों के योग में है।

प्रश्न 7.
हमें निराश क्यों नहीं होना चाहिए?
उत्तर:
हमें कभी भी निराश नहीं होना चाहिए। क्योंकि निराशा हमारी आत्मा के खेत में जंगली घास के समान है। अतः उसे समय पर उखाड फेंक देना चाहिए नहीं तो वह सारे खेत पर छा जाएगी। निराशा कायरता है, आशा साहस है।

प्रश्न 8.
संकल्प से होने वाले लाभों के बारे में बताइए।
उत्तर:
संकल्प से अनेक लाभ मिलते हैं। इसके द्वारा हम असम्भव कार्यों को भी सम्भव बना लेते हैं। इसके द्वारा ही हम अपनी क्षमताओं पर विश्वास करना सीखते हैं। इसके द्वारा हमें जीवन में नयी ऊर्जा प्राप्त होती है।

प्रश्न 9.
लेखक ने व्यायाम के क्या लाभ बताये हैं?
उत्तर:
लेखक ने व्यायाम के लाभों के बारे में बताया है कि एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत है। व्यायाम करने से हमारा स्वास्थ्य ठीक रहेगा। हम कभी रोगी नहीं होंगे। इससे हमारा जीवन सहज और सुखमय बनता है। प्रतिदिन आधा घंटा तेज गति से चलकर हम अपने यौवन को वापस ला सकते हैं।

प्रश्न 10.
मानव ने समय को कितने भागों में विभाजित किया है?
उत्तर:
मानव ने समय को वर्ष, महीने, सप्ताह, दिन, घंटे आदि में विभाजित किया है।

प्रश्न 11.
मिस्रवासियों ने वर्षों की गणना किस आधार पर की है?
उत्तर:
मिस्रवासियों ने वर्षों की गणना नदी की बाढ़ों को देखकर की है। वे एक बाढ़ से दूसरी बाढ़ तक के समय को पूरा एक वर्ष मानते थे।

प्रश्न 12.
अतीत को भुला देने के पीछे लेखक ने क्या तर्क दिए हैं? लिखिए।
उत्तर:
अतीत को भुला देने के पीछे लेखक ने यह तर्क दिए हैं कि अतीत के विषय में पश्चात्ताप करना व्यर्थ है। अतीत के विषय में सोचना व्यर्थ का बोझ ढोना है। दु:ख के क्षण जब बीत जाएँ तो उनको भूल जाने में ही मानव का भला है। जब हम यह जानते हैं कि बीता हुआ पल कभी वापस नहीं लौटता है तब उसके विषय में सोचने से क्या लाभ? अतीत को बदलने की शक्ति मानव में नहीं है तब उसके बारे में सोचना व्यर्थ ही मानसिक तनाव को न्यौता देना है।

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प्रश्न 13.
आशय स्पष्ट कीजिए-
(i) मनुष्य की मंगल यात्रा निरन्तर चलती रहेगी।
उत्तर:
आशय-लेखक कहता है कि चलना और आगे बढ़ना मानव का स्वाभाविक धर्म है। उसकी मंगल यात्रा निरन्तर चलती रहेगी। दुःख और अवसाद उस यात्रा में क्षणिक रुकावट भले ही पैदा करे पर उस मंगल यात्रा को रोक नहीं सकते।।

(ii) दुःख और पीड़ा हमारे जीवन को नया आयाम देते हैं।
उत्तर:
आशय-लेखक का आशय है कि मनुष्य के भाग्य में सुख भी आता है और दुःख भी। इसी का नाम जिन्दगी है। हमें दु:ख को, पीड़ा को जीवन का आवश्यक अंग समझना चाहिए। कवियों और दार्शनिकों ने दुःख और पीड़ा को नया जीवन देने वाला बताया है।

(iii) निराशा हमारी आत्मा के खेत में जंगली घास है।
उत्तर:
आशय-लेखक कहता है कि हमें जीवन में कभी भी निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि निराशा हमारी आत्मा के खेत में जंगली घास के समान है। अगर इसे समय रहते न उखाड़ा गया तो वह सारे खेत पर छा जाएगी और अच्छे बीज के उगने की जगह नहीं बचेगी। निराशा कायरता है, आशा साहस है।

प्रश्न 14.
स्वाद के विषय में लेखक का तर्क स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्वाद के सम्बन्ध में यह जिज्ञासा उत्पन्न होने पर कि स्वाद जीभ में है या गुलाब जामुन में? यदि स्वाद गुलाब जामुन में है तब तो वह तश्तरी में रखे-रखे ही स्वाद देगा और यदि जीभ में स्वाद है तो फिर गुलाब जामुन खाने की क्या जरूरत है? वास्तव में स्वाद न केवल जीभ में है और न केवल गुलाब जामुन में अपितु वह तो दोनों के योग में है।

प्रश्न 15.
अमृतलाल बेगड़ मूलतः किस विधा के रचनाकार हैं? उस विद्या का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
अमृतलाल बेगड़ मूलत: चित्रकार हैं। उन्होंने अपनी कूँची से नर्मदा के सौन्दर्य को अनेक छवियों में उकेरा है। जितने अच्छे वे चित्रकार हैं उतने ही अच्छे वे शब्द शिल्पी भी हैं। उन्होंने नर्मदा परिक्रमा पर आधारित अनेक यात्रा-प्रसंगों को जीवंत-रूप में लिखा है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 2 ताई

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 2 ताई (कहानी, विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’)

ताई अभ्यास

बोध प्रश्न

ताई अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“ताऊजी हमें रेलगाड़ी ला दोगे।” यह वाक्य किसने और किससे कहा?
उत्तर:
“ताऊजी हमें रेलगाड़ी ला दोगे।” यह वाक्य मनोहर ने अपने ताऊ रामजीदास ने कहा।

प्रश्न 2.
मनोहर और रामेश्वरी का क्या रिश्ता था?
उत्तर:
मनोहर रामेश्वरी देवी के देवर का बेटा था तथा वह उसकी ताई है।

प्रश्न 3.
रामेश्वरी के मन में किस चीज की कामना थी?
उत्तर:’
रामेश्वरी के मन में निजी सन्तान की कामना थी।

प्रश्न 4.
‘ताई’ कहानी का प्रमुख उद्देश्य एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर:
‘ताई’ कहानी का प्रमुख उद्देश्य प्रेम द्वारा घृणा को जीतना है।

प्रश्न 5.
कहानी से उन दो प्रमुख स्थलों को लिखिए जिसमें नायिका में मार्मिक भाव जागता है।
उत्तर:
कहानी का एक स्थल है-शाम का समय था। रामेश्वरी खुली छत पर बैठी हवा खा रही थी। मनोहर तथा उसकी बहिन भी खेल रहे थे। मनोहर की बहिन खिलखिलाती हुई दौड़कर रामेश्वरी की गोद में आ गिरी। उसके पीछे-पीछे मनोहर भी दौड़ा हुआ आया और वह भी ताई की गोद में जा गिरा। रामेश्वरी उस समय द्वेष भूल गई। उन्होंने दोनों बच्चों को उसी प्रकार हृदय से लगा लिया जिस तरह वह मनुष्य लगाता है जो कि बच्चों के लिए तरस रहा हो।

दूसरा स्थल है :
छत पर रामेश्वरी खड़ी है। तभी मनोहर छत पर आ जाता है। आकाश में पतंगें उड़ रही हैं। पतंगें देखकर मनोहर ताई से पतंग मँगाने की बात कहता है पर ताई उसे अनसुना कर देती है। थोड़ी देर में एक पतंग कटकर उसी छत पर आती है। मनोहर उसे पकड़ने के लिए दौड़ता है तभी उसका पैर फिसल जाता है। पैर फिसलने पर वह मुंडेर को पकड़ लेता है और ‘ताई’ को बचाव के लिए पुकारता है। पहले तो ताई अनसुना कर देती है फिर दुबारा पुकारने पर उसका हृदय पसीज जाता है और वह मनोहर को बचाने के दौड़ती है लेकिन तभी मनोहर के हाथ से मुंडेर छूट जाती है और वह धड़ाम से नीचे गिर जाता है। इसी समय रामेश्वरी भी चीख मारकर छज्जे पर गिर पड़ी। अपनी बीमारी की दशा में होश आने पर वह मनोहर का ही हाल-चाल पूछती है।

प्रश्न 6.
विशम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ की दो प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कौशिक की दो प्रमुख कहानियाँ हैं-‘इक्केवाला’ और ‘अशिक्षित छन्द’।

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ताई लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रामेश्वरी ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति हैं, कहानी के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
रामेश्वरी एक साधारण स्त्री है। उसे भी सन्तानहीनता का दुःख सताता है लेकिन हृदय से वह उदार एवं ममतामयी है। इस कहानी में दो घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे उसके ममत्व और त्याग की पहचान होती है। एक दिन शाम के समय वह खुली छत पर बैठकर हवा खा रही थी। दोनों बच्चे भी छत पर खेल रहे थे। रामेश्वरी उनके खेलों को देख रही थी। इस समय रामेश्वरी को उन बच्चों का खेलना-कूदना बड़ा भला मालूम हो रहा था। हवा में उड़ते हुए उनके बाल, कमल की तरह खिले हुए उनके नन्हे-नन्हे मुख, उनकी प्यारी-प्यारी तोतली बातें, उनका चिल्लाना, भाग जाना, लोट जाना इत्यादि क्रीड़ाएँ उनके हृदय को शीतल कर रही थी। सहसा मनोहर अपनी बहन को मारने दौड़ा। वह खिलखिलाती हुई दौड़कर रामेश्वरी की गोद में आ गिरी। उसके पीछे-पीछे मनोहर भी दौड़ता हुआ आया और वह भी ताई की गोद में जा गिरा। रामेश्वरी इस समय सारा द्वेष भूल गई। उन्होंने दोनों बच्चों को उसी प्रकार हृदय से लगा लिया जिस तरह वह मनुष्य लगाता है जो कि बच्चों के लिए तरस रहा हो।

दूसरी घटना मनोहर के छज्जे से गिरने की है। “वह अत्यन्त भय तथा करुण नेत्रों से रामेश्वरी की ओर देखकर चिल्लाता है-“अरी ताई।” रामेश्वरी की आँखों से मनोहर की आँखें आ मिली। मनोहर की वह करुण दृष्टि देखकर रामेश्वरी का कलेजा मुँह को आ गया। उन्होंने व्याकुल होकर मनोहर को पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। उसका हाथ मनोहर के हाथ तक पहुँचा भी नहीं था कि मनोहर के हाथ से मुंडेर छूट गई। वह नीचे आ गिरा, रामेश्वरी चीख मारकर छज्जे पर गिर पड़ी। दोनों घटनाओं से यह ज्ञात होता है कि रामेश्वरी ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति थी।

प्रश्न 2.
पूर्ण स्वस्थ होने के बाद ताई के हृदय में क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर:
एक दिन रामेश्वरी अपने घर की छत पर टहल रही थी। उसी समय मनोहर वहाँ आ जाता है। आकाश में उड़ती हुई पतंगों को देखकर उसका मन भी पतंग उड़ाने के लिए ललचा जाता है। अत: वह ताई से पतंग मँगाने की बात कहता है परन्तु रामेश्वरी उसे अनसुना कर देती है। तभी एक पतंग टूटकर आती है। मनोहर उसे पकड़ने के लिए छत पर दौड़ लगाता है। पर उसका पैर फिसल जाता है। वह गिरते समय छज्जे की मुंडेर पकड़ लेता है। वह बचाव के लिए ताई को आवाज लगाता है पर रामेश्वरी उनको अनसुना कर देती है।

तब फिर वह दुबारा बचाने की प्रार्थना करता है। मनोहर की डबडबाई आँखें देखकर उसके मन में ममता की भावना हिलोरें लेने लगती हैं तभी उसे बचाने के लिए जैसे ही वह कदम बढ़ाती है, उससे पूर्व ही मनोहर गिर पड़ता है। इस दृश्य को देखकर वह अपने मन को धिक्कारती है तथा चेतना शून्य होकर छत पर गिर जाती है। होश आने पर उसकी ईर्ष्या की भावना ममता में परिवर्तित हो जाती है। अब वे मुन्नी से भी बात करने लगती हैं। अब मनोहर उन्हें प्राणों से भी अधिक प्यारा लगने लगा।।

प्रश्न 3.
“ताई हमें प्याल नहीं करती” वाक्य में मनोहर ने किसकी बात की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
“ताई हमें प्याल नहीं करती” इस वाक्य में मनोहर ने ताई के व्यवहार की ओर संकेत किया है।

प्रश्न 4.
मनोहर की बाल सुलभ चेष्टाएँ अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
मनोहर रामजीदास के छोटे भाई का पुत्र है। वह लगभग पाँच वर्ष का है। वह एक अबोध तथा सरल हृदय वाला बालक है।

मनोहर की चेष्टाएँ बाल सुलभ हैं। अन्य बालकों के समान वह अपने ताऊ एवं ताई से खिलौने एवं पतंग लाने का आग्रह करता है। वह यह बात अच्छी तरह जानता है कि उसकी ताई उससे प्रेम नहीं करती है पर फिर भी वह ताई से पतंग मँगाने का आग्रह करता है।

ताऊ द्वारा यह पूछे जाने पर कि रेल में वह किन-किन को बैठायेगा तो वह सहज रूप में कह देता है कि वह रेल में ताऊ को बैठायेगा और ताई को नहीं। ताऊ द्वारा यह पूछे जाने पर कि वह ताई को क्यों नहीं बैठायेगा तो वह सहज भाव से कह देता है कि ताई मुझे प्यार नहीं करती है।

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ताई दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रामेश्वरी, मनोहर, रामजीदास के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
रामेश्वरी का चरित्र-रामेश्वरी ‘ताई’ कहानी की प्रमुख पात्र है। उसके चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-रामेश्वरी बाबू रामजीदास की पत्नी है। वह नि:सन्तान है। इसी कारण वह प्रायः खिन्न रहती है। सन्तान के लिए उसके मन में तीव्र अभिलाषा है। इस बात का उलाहना वह अपने पति को भी देती है।

बाबू रामजीदास का अपने भाई के पुत्र-पुत्री से विशेष स्नेह है जबकि रामेश्वरी का नहीं। रामेश्वरी जब भी अपने पति को उन बच्चों से प्यार करते देखती है तो उसके मन में उन बच्चों के प्रति द्वेष भावना उत्पन्न हो जाती है। रामेश्वरी का हृदय ममता से शून्य नहीं है। एक दिन खेलते-खेलते जब ये बच्चे उसकी गोद में आ जाते हैं तो वह उन्हें बहुत प्यार करती है। मनोहर के छत से गिरने पर उसको आघात लगता है, वह चीखकर बेहोश हो जाती है और जब होश में आती है तभी वह मनोहर का हाल-चाल पूछती है। होश में आने तथा स्वस्थ होने पर वह मनोहर को हृदय से लगा लेती है और बेहद प्यार करने लग जाती है।

मनोहर का चरित्र :
मनोहर रामजीदास के छोटे भाई का पुत्र है। वह लगभग पाँच वर्ष का है। वह एक अबोध एवं सरल हृदय का बालक है। कहानी का आरम्भ ही ‘ताऊजी हमें लेलगाड़ी ला दोगे।’ के वाक्य से होता है।

वह जब जान लेता है कि उसकी ताई उसे प्रेम नहीं करती है तो वह सहज रूप में ताऊ द्वारा पूछने पर कह देता है कि वह रेल में ताऊ को तो बैठायेगा पर ताई को नहीं। क्योंकि ताई उसे प्यार नहीं करती है।

वह बालकों के समान ही कभी ताऊ से तो कभी ताई से रेल एवं पतंग लाने का आग्रह करता है। वह ताई की नीरसता एवं ताऊ के लाड़-प्यार को भली-भाँति जानता है।

रामजीदास का चरित्र :
रामजीदास यद्यपि नि:सन्तान हैं पर वे अपने छोटे भाई के बच्चों को भी अपना बच्चा समझते हैं और उनसे बहुत प्यार करते हैं। यद्यपि उनके इस प्यार से कभी-कभी उनकी पत्नी नाराज हो जाती है। पर वह अपनी पत्नी को भी इन बच्चों से प्यार करने की बात कहता है। वे अपनी पत्नी का भी ध्यान रखते हैं और संयुक्त परिवार की भावना को समझाते हैं।

प्रश्न 2.
ताई के हृदय में उठने वाले द्वन्द्वों को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
ताई रामेश्वरी नि:सन्तान हैं। वह कहानी के आरम्भ से अन्त तक द्वन्द्वों से घिरी रहती हैं। जब वह द्वन्द्व से बाहर आती हैं वह अपने भतीजे एवं भतीजी को प्रेम करने लग जाती हैं।

उसका मन बच्चों से प्रेम तो करना चाहता है पर अपने-पराये की भावना से ग्रसित होने पर वह उनसे उपेक्षा करने लग जाती है। जब रामजीदास मनोहर को उसकी गोद में बैठाते हैं तो वह ईर्ष्या से जलने लग जाती है।

एक बार खेलते-खेलते जब मुन्नी और मनोहर उसकी गोद में आ जाते हैं तो वह उन्हें भरपूर प्यार करने लग जाती है लेकिन रामजीदास को देखकर वह उन्हें गोद से हटाकर फटकार देती है।

रामेश्वरी का हृदय प्रेम शून्य नहीं है लेकिन द्वन्द्व में फँसी | होने के कारण वह बच्चों को भरपूर स्नेह नहीं दे पाती है। कहानी
के अंतिम भाग में जब पतंग पकड़ने के बहाने मनोहर छत से गिर पड़ता है तो इस दृश्य को देखकर उनका हृदय परिवर्तित हो जाता है और फिर वह बच्चों को बहुत प्यार करने लग जाती हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) मनुष्य का हृदय ………….. उससे प्रेम करता है।
उत्तर:
सन्दर्भ :
यह गद्यांश ‘ताई’ नामक कहानी से अवतरित है। इसके लेखक विशम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ हैं।

प्रसंग :
इस गद्यांश में कहानीकार ने यह बताया है कि मानव तभी किसी से प्रेम करता है जब वह उसे अपना समझता है।

व्याख्या :
कहानीकार कहता है कि मानव किसी के प्रति तभी प्रेम करता है जब उसके हृदय में उसके प्रति ममता की भावना हो। जब उसे यह ज्ञात हो जाता है कि वह वस्तु विशेष या व्यक्ति विशेष उसका अपना न होकर पराया है तो उसके प्रति वह अपनेपन की भावना नहीं रखता है। इसके विपरीत यदि किसी अनुपयोगी या भद्दी से भद्दी वस्तु को भी वह अपना प्यार देता है जब उससे उसका अपनेपन का नाता जुड़ जाता है। अतः प्रेम के लिए अपनापन होना बहुत आवश्यक है।

(ब) रामेश्वरी की आँखों………मुंडेर छूट गई।”
उत्तर:
सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जिस समय कटी पतंग पकड़ने के लिए मनोहर दौड़ा तो उसका पैर फिसल गया और वह मुंडेर पकड़कर लटक गया। मदद के लिए उसने ताई को पुकारा, तब ताई ने उसकी ओर जो देखा, उसी का यहाँ वर्णन है।

व्याख्या :
छत पर कटी हुई पतंग को पकड़ने के लिए मनोहर दौड़ा। तभी उसका पैर फिसल गया। उसने सहायता के लिए ताई को पुकारा। रामेश्वरी ने पहले तो उसकी बात को अनसुना कर दिया लेकिन दूसरी बार पुकारने पर उसका हृदय पिघल जाता है

और वह जैसे ही मनोहर को पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाती है, उससे पहले ही मनोहर के हाथ से मुंडेर छूट जाती है और वह नीचे गिर जाता है। इस घटना से रामेश्वरी को बड़ा आघात लगता है। वह संज्ञा शून्य होकर छज्जे पर ही गिर जाती है। उसके मन में यह अपराध बोध जन्म ले लेता है कि उसकी उपेक्षा के कारण ही मनोहर छज्जे से गिरा है। इसका उसे बहुत दुःख होता है।

प्रश्न 4.
‘ताई’ कहानी का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
एक दिन संध्या के समय रामेश्वरी छत पर घूम रही थीं तभी मनोहर उनका भतीजा वहाँ आ गया। आकाश में पतंगें उड़ रही थीं। पतंगों को देखकर उसने ताई रामेश्वरी से पतंग दिलाने को कहा पर रामेश्वरी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसी समय आसमान से एक पतंग कटकर छत के छज्जे की ओर गई। मनोहर उस पतंग को पकड़ने के लिए छज्जे की ओर दौड़ा। इसी समय मनोहर का पैर अचानक फिसल गया और गिरते समय उसने दोनों हाथों से मुंडेर को पकड़ लिया था।

वह ‘ताई’ को मदद के लिए चीखा। पहले तो रामेश्वरी ने उसकी चीख की ओर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन उसके दुबारा पुकारने पर रामेश्वरी का हृदय पिघल गया और वह पकड़ने के लिए भागी लेकिन तब तक मनोहर के हाथ से मुंडेर छूट गयी और वह धड़ाम से नीचे गिर गया। इस दृश्य को देखकर रामेश्वरी भी चीखकर छज्जे पर गिर पड़ी। एक सप्ताह तक वह बुखार से पीड़ित रही तथा मूर्छित रही। जब उन्हें होश आया तो उसने सबसे पहले मनोहर की कुशलता पूछी। इसके बाद स्वस्थ होने पर प्रेम से अभिभूत होकर उसने मनोहर को गले लगा लिया और अब मनोहर उसे प्राणों से भी अधिक प्यारा हो गया है। यहीं कहानी समाप्त हो जाती है।

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ताई भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए-
परवाह, मुबारक, चुहलबाजी, गुस्सा।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 2 ताई img 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग एवं प्रत्यय पहचानकर अलग कीजिए-
मूल्यवान, अपरिचित, तत्पश्चात्, समझता, मेहनती, पराई, अपशब्द, प्रसन्नता, असह्य।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 2 ताई img 2
प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिएनेत्र, आकाश, हृदय, चिराग, प्रार्थना, माँ।
उत्तर:
नेत्र – चक्षु, अक्षि।
आकाश – गगन, अम्बर।
हृदय – दिल, अन्त:करण।
चिराग – दीपक, दीप।
प्रार्थना – विनती, आराधना।
माँ – माता, जननी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित लोकोक्तियों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
आँखों का अंधा नाम नैन सुख, चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात।
उत्तर:
(क) आँखों का अंधा नाम नैन सुख (नाम के विपरीत काम होना)-घर में फूटी कौड़ी नहीं है नाम है कुबेर सिंह। इसे ही कहते हैं आँख के अंधे नाम नैन सुख।
(ख) चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात (अल्पकाल के लिए सुख मिलना)-उत्तर प्रदेश में बेरोजगारों को मिलने वाला बेरोजगारी भत्ता ऐसे ही है जैसे चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात।

प्रश्न 5.
मुहावरा और लोकोक्ति में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मुहावरे और लोकोक्तियों में मुख्य अन्तर यह है कि मुहावरा वाक्यांश है जबकि लोकोक्ति पूरा वाक्य है।

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ताई पाठ का सारांश

बाबू रामजीदास एक सम्पन्न परिवार के मुखिया हैं। उनकी पत्नी का नाम राजेश्वरी है। रामजीदास नि:सन्तान हैं इस कारण उनकी पत्नी रामेश्वरी खिन्न रहती है। रामजीदास के छोटे भाई के यहाँ एक पुत्र और एक पुत्री है। रामजीदास अपने भतीजे तथा भतीजी को बहुत प्यार करते हैं। उनका यह प्रेम उनकी पत्नी को अच्छा नहीं लगता है। उनके भतीजे रामजीदास को ही सब कुछ मानते थे। जब भी वे घर में घुसते बालक उन्हें पकड़ लेता और तरह-तरह की फरियाद करता है। एक दिन बालक ने ताऊजी से रेलगाड़ी लाने की फरियाद की। ताऊ ने पूछा कि उस रेल में किन-किनको बिठायेगा तो बालक सहज स्वभाव से कह देता है कि ताऊ जी को। जब ताऊजी ने यह पूछा कि वह अपनी ताई को नहीं बैठायेगा तो बालक ने सहज रूप में कह दिया कि वह ताईजी को रेल में नहीं बैठायेगा क्योंकि ताई उसे प्यार नहीं करती हैं।”

रामेश्वरी अपने नि:सन्तान जीवन पर दुःखी र्थी पर कभी इन बच्चों की किलकारियों में खेल-कूद से वे बहुत अधिक प्रसन्न भी हो जाया करती थीं।

एक दिन संध्या के समय रामेश्वरी छत पर घूम रही थीं तभी मनोहर उनका भतीजा वहाँ आ गया। आकाश में पतंगें उड़ रही थीं। पतंगों को देखकर उसने ताई रामेश्वरी से पतंग दिलाने को कहा पर रामेश्वरी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसी समय आसमान से एक पतंग कटकर छत के छज्जे की ओर गई। मनोहर उस पतंग को पकड़ने के लिए छज्जे की ओर दौड़ा। इसी समय मनोहर का पैर अचानक फिसल गया और गिरते समय उसने दोनों हाथों से मुंडेर को पकड़ लिया था। वह ‘ताई’ को मदद के लिए चीखा।

पहले तो रामेश्वरी ने उसकी चीख की ओर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन उसके दुबारा पुकारने पर रामेश्वरी का हृदय पिघल गया और वह पकड़ने के लिए भागी लेकिन तब तक मनोहर के हाथ से मुंडेर छूट गयी और वह धड़ाम से नीचे गिर गया। इस दृश्य को देखकर रामेश्वरी भी चीखकर छज्जे पर गिर पड़ी। एक सप्ताह तक वह बुखार से पीड़ित रही तथा मूर्छित रही। जब उन्हें होश आया तो उसने सबसे पहले मनोहर की कुशलता पूछी। इसके बाद स्वस्थ होने पर प्रेम से अभिभूत होकर उसने मनोहर को गले लगा लिया और अब मनोहर उसे प्राणों से भी अधिक प्यारा हो गया है। यहीं कहानी समाप्त हो जाती है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 1 बड़े घर की बेटी

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 1 बड़े घर की बेटी (कहानी, प्रेमचंद)

बड़े घर की बेटी अभ्यास

बोध प्रश्न

बड़े घर की बेटी अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेनी माधवसिंह के पिता ने गाँव में क्या-क्या बनवाया था?
उत्तर:
बेनी माधवसिंह के पिता ने गाँव में मन्दिर, पक्का तालाब आदि बनवाये थे।

प्रश्न 2.
श्रीकंठ का चेहरा कान्तिहीन क्यों था?
उत्तर:
बी. ए. तक की पढ़ाई में अधिक मेहनत करने के कारण श्रीकंठ का चेहरा कान्तिहीन हो गया था।

प्रश्न 3.
आनन्दी का विवाह किसके साथ हुआ था?
उत्तर:
आनन्दी का विवाह श्रीकंठ के साथ हुआ था।

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बड़े घर की बेटी लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ठाकुर भूपसिंह के घर का वातावरण कैसा था?
उत्तर:
ठाकुर भूपसिंह एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार थे। वे ऑनरेरी मजिस्ट्रेट थे तथा इसके साथ ही वे एक उदार व्यक्ति थे। उनके घर में सभी रईसी ठाठ-बाट थे। उनके घर में एक हाथी, तीन कुत्ते आदि पालतू जानवर थे। घर में झाड़-फानूस की सजावट हो रही थी। खाने-पीने का भी उच्च स्तर था।

प्रश्न 2.
“हाथी मरा भी नौ लाख का” यह बात किसने कही और क्यों कही?
उत्तर:
दाल में घी न डालने पर लालबिहारी आनन्दी से लड़ने लगा। लड़ाई में उसने आनन्दी के मायके पर व्यंग्य कसा। इस पर आनन्दी ने पलटवार करते हुए कहा कि पहले जैसा वैभव न होने पर भी उसके मायके में रहन-सहन और खान-पान में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि मरा हाथी भी नौ लाख का होता है।

प्रश्न 3.
आनन्दी की संयुक्त परिवार के बारे में क्या राय थी?
उत्तर:
आनन्दी की संयुक्त परिवार के बारे में अच्छी राय नहीं थी। कारण कि वह यह मानती थी कि यदि संयुक्त परिवार में खूब परस्पर सम्मान देने और बहुत कुछ करने के पश्चात् भी यदि परिवार में खुशहाली का वातावरण नहीं बनता है और बात-बात में नुक्ताचीनी और काट-छाँट होती है तो उससे अलग होकर रहना चाहिए। इससे कम-से-कम मन में शान्ति तो रहेगी।

प्रश्न 4.
श्रीकंठ का अपने भाई के साथ कैसा व्यवहार था?
उत्तर:
श्रीकंठ का अपने छोटे भाई लालबिहारी के साथ बड़े ही प्रेम का व्यवहार था। वह जब भी इलाहाबाद से आते उसके लिए कुछ-न-कुछ लेकर आते थे। एक बार जब अखाड़े में लालबिहारी ने दूसरे पहलवान को पछाड़ दिया था तो उन्होंने पाँच रुपये के पैसे लुटाए थे।

किन्तु आनन्दी के साथ हुए अभद्र व्यवहार को सुनकर उनका सारा प्रेम समाप्त हो जाता है और उसके प्रति घृणा पैदा हो जाती है यहाँ तक कि वे उसका मुँह भी देखना पसन्द नहीं करते हैं। लेकिन जब आनन्दी ने अपने बड़प्पन का परिचय देते हुए लालबिहारी को माफ कर दिया तो श्रीकंठ का हृदय पुनः परिवर्तित होकर अपने भाई से प्यार करने लग जाते हैं।

प्रश्न 5.
“अब अन्याय और हठका प्रकोप हो रहा है”-यह कथन श्रीकंठ ने क्यों कहा?
उत्तर:
इलाहाबाद से शनिवार को जब श्रीकंठ अपने घर पर आये तो आनन्दी से लालबिहारी द्वारा की गयी अभद्रता की जानकारी हुई। रातभर वे बेचैन रहे और सुबह होते ही अपने पिता से बोले-“दादा, अब इस घर में मेरा निर्वाह न होगा।” बेनी माधव अपने पुत्र की यह बात सुनकर घबरा उठे और बोले- क्यों’। इस पर श्रीकंठ ने कहा-“इसलिए कि मुझे भी अपनी मान-प्रतिष्ठा का कुछ विचार है। आपके घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर करना चाहिए, वे उनके सिर चढ़ते हैं।”

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बड़े घर की बेटी दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लालबिहारी सिंह के स्वभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लालबिहारी सिंह, बेनी माधव सिंह का छोटा पुत्र है। लाड़-प्यार में वह पढ़-लिख नहीं पाया है। खेतों-खलिहानों में घूमना और कुश्ती-दंगल में भाग लेना उसकी दिनचर्या के अंग थे। वह दोहरे बदन का सजीला जवान था। भरा हुआ मुखड़ा और चौड़ी छाती थी। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठकर सुबह पी जाता था।

वह अपने बड़े भाई श्रीकंठ का बहुत आदर करता था। श्रीकंठ के सामने न तो वह चारपाई पर बैठता था और न हुक्का पी सकता था और न पान खा सकता था। वह अपने बाप से भी ज्यादा अपने भाई का मान करता था।

पर वह बिना पढ़ा-लिखा एवं उजड्ड था। बिना सोचे-समझे ऐसा निर्णय ले लेता था जिसके लिए उसे प्रायश्चित्त करना पड़ता था। एक दिन दाल में घी न होने की बात पर वह अपनी भाभी से उल्टा-सीधा व्यवहार कर डालता है जिससे परिवार टूटने के कगार पर आ जाता है पर आनन्दी के बड़प्पन से वह परिवार टूटने से बच जाता है।

प्रश्न 2.
आनन्दी के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
आनन्दी ताल्लुकेदार भूपसिंह की बेटी और ‘बड़े घर की बेटी’ कहानी की प्रधान नायिका है। उसके पति का नाम श्रीकंठ है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
(i) स्वाभिमानी :
आनन्दी एक स्वाभिमानी स्त्री है। अपने देवर लालबिहारी के अभद्रतापूर्ण व्यवहार से वह दु:खी हो जाती है और इस घटना की जानकारी वह अपने पति के आने पर उसको देती है।

(ii) उदार एवं करुण हृदय वाली :
आनन्दी का हृदय करुणा एवं दया से पूर्ण है। जब उसका देवर लालबिहारी अपनी गलती को स्वीकार करके भाई और भाभी से पश्चात्ताप करता हुआ माफी माँगता है तो आनन्दी का हृदय करुणा से पिघल जाता है और वह अपनी सौगंध देकर उसको घर छोड़ने से रोक लेती है। इस प्रकार वह एक संयुक्त परिवार को टूटने से बचा लेती है। वास्तव में वह एक उच्च चरित्र वाली उदार एवं स्वाभिमानी स्त्री है।

प्रश्न 3.
आनन्दी के मायके और ससुराल के वातावरण में क्या अंतर था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आन के मायके के अनौखे ठाठ-बाट थे। उसके पिता एक यासर ताल्लुकेदार थे। उनके पास विशाल भवन, एक हाथा, तोन, कुत्ते, बाज, वहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, ऑनरेरी मजिस्ट्रटी और ऋण देने आदि की सुविधाएँ थी। आनन्दी की तीन बहिनों का बड़े ठाठ-बाट से विवाह हुआ था।

आनन्दी के ससुराल का वातावरण कुछ और ही था। यहाँ उसके मायके जैसी न टीम-टाम थी और न अन्य सुविधाएँ। हाथी-घोड़ों की बात तो बहुत दूर यहाँ कोई सजी हुई सुन्दर बहली तक न थी। न यहाँ बाग-बगीचे थे न मकान में खिड़कियाँ, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरे। यहाँ तो एक सीधा-सादा देहाती मकान था परन्तु आनन्दी ने थोड़े ही दिनों में अपने आपको इस नयी व्यवस्था में ढाल लिया था।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिएजिस तरह सूखी लकड़ी …………. तिनक जाता है।
उत्तर:
भाव-कहानीकार प्रेमचन्द कहते हैं कि जिस प्रकार सूखी लकड़ी जल्दी से आग पकड़ लेती है उसी तरह भूख से पागल मनुष्य भी जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है, वह लड़ने-मरने को आमादा हो जाता है।

प्रश्न 5.
“बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।” इस कथन से लेख्क का क्या आशय है?
उत्तर:
इस कथन से लेखक का आशय यह है कि बड़े घर की बेटियाँ बहुत सभ्य, व्यवहारकुशल और घर को बनाने वाली होती हैं। वे सही समय पर उचित निर्णय लेकर परिवार की विपत्ति को दूर कर देती हैं। पहले तो आनन्दी अपने देवर के अभद्र व्यवहार पर बहुत क्रोधित होती है पर जब उसने देखा कि उसके क्रोध से घर उजड़ जाएगा तो वह माफी माँगने पर अपने देवर को क्षमा कर देती है तथा अपने पति से भी उसे क्षमा दिला देती है।

प्रश्न 6.
इस कहानी से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर:
इस कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि यदि हम उदार हैं, दूसरों के प्रति सहृदय हैं तो बड़ी-से-बड़ी विपत्ति भी दूर हो जाती है। आज के संयुक्त परिवारों को टूटने से बचाने वाली यह कहानी शिक्षाप्रद है। इस कहानी की नायिका अपने देवर के अभद्र व्यवहार से बहुत दु:खी होती है पर देवर द्वारा सच्चे हृदय से माफी माँगने पर वह उसे क्षमा कर देती है तथा जब वह घर छोड़ने की बात कहता है तो अपनी सौगन्ध देकर तथा उसका हाथ पकड़कर रोक लेती है। ऐसा करके वह टूटते परिवार को बचा लेती है।

प्रश्न 7.
किस घटना ने आनन्दी के हृदय को परिवर्तित कर दिया? विवरण सहित लिखिए।
उत्तर:
श्रीकंठ के मुख से यह बात सुनकर कि अब मैं लालबिहारी की सूरत नहीं देखना चाहता। लालबिहारी तिलमिला गया तथा कपड़े पहनकर आनन्दी के द्वार पर आकर बोला-“भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि वह मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। अब वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते, इसलिए अब मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह न दिखाऊँगा। मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा करना।” लालबिहारी की इस बात से आनन्दी का हृदय परिवर्तित हो गया वह अपने कमरे से निकली और लालबिहारी का हाथ पकड़ लिया और कहा “तुम्हें मेरी सौगंध, अब एक पग भी आगे न बढ़ाना” बाद में श्रीकंठ का हृदय भी पिघल गया और दोनों भाई गले लगकर फूट-फूटकर रोए। इस प्रकार आनन्दी ने अपने उदार हृदय से टूटते हुए घर को बचा लिया।

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बड़े घर की बेटी भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्द-युग्मों से पुनरुक्त और विलोम शब्द युग्म छाँटकर लिखिए।
गरम-गरम, फूट-फूट, साथ-साथ, अच्छा-बुरा, सुख-दुख, दिन-रात।
उत्तर:
पुनरुक्त शब्द – गरम-गरम, फूट-फूट, साथ-साथ।
विलोम शब्द – अच्छा-बुरा, सुख-दुख, दिन-रात।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए-
व्याह, भावज, निबट, लात, जवाब, कर्ज।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 1 बड़े घर की बेटी img 1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रत्यय जोड़कर शब्द बनाइए-
आहट, आई, ता, हारा, वान, हीन, ईय, माला, कार।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 1 बड़े घर की बेटी img 2

प्रश्न 4.
उपसर्गों के योग से शब्द बनाइए-
उप, अभि, सु, अप, कु, अव, वि, अधि, अनु।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions कहानी Chapter 1 बड़े घर की बेटी img 3

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बड़े घर की बेटी पाठ का सारांश

गौरीपुर गाँव के जमींदार ठाकुर बेनी माधवसिंह थे। उनके पिता इलाके के प्रतिष्ठित रईस थे पर बेनी माधव की माली हालत अच्छी नहीं थी। उनकी साल भर की आमदनी मात्र हजार रुपये रह गयी थी। ठाकुर के दो पुत्र थे-श्रीकंठ और लालबिहारी। श्रीकंठ बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर किसी ऑफिस में इलाहाबाद में नौकरी करने लगा था। छोटा भाई लालबिहारी पढ़ा-लिखा नहीं था। कुश्ती, लड़ाई -झगड़ा और खेत-खलिहानों में अपना समय बिताया करता था।

श्रीकंठ अंग्रेजी से डिग्री लेने के बाद भी अंग्रेजी रीति-रिवाजों के विरोधी थे। वे सम्मिलित परिवार के पक्षधर थे। उनकी इस विचारधारा के कारण गाँव की नवविवाहिता उनकी आलोचना किया करती थीं।

भूपसिंह एक छोटी रियासत के ताल्लुकेदार थे। उन्होंने अपनी चौथी बेटी आनन्दी का विवाह श्रीकंठ से कर दिया। आनन्दी जब नये घर में आई तो यहाँ का वातावरण उसे अपने परिवार से बिल्कुल भिन्न मिला परन्तु आनन्दी ने एक वर्ष में ही अपने को उस परिवार में खपा लिया था।

एक दिन सब्जी पकाते समय आनन्दी ने जितना घी (एक पाव) डिब्बे में बचा था, वह सब सब्जी में डाल दिया। फलतः दाल में डालने के लिए घी बचा ही नहीं। जब लाल बिहारी खाना खाने बैठा तो दाल में घी न देखकर भाभी से इसका कारण पूछा। भाभी द्वारा पूरी बात बताई जाने पर भी लालबिहारी ने गुस्से में आकर भोजन की थाली फेंक दी और अपने पैर की खड़ाऊ आनन्दी को मारने के लिए फेंकी। आनन्दी ने हाथ से इस वार को बचा लिया लेकिन इस कारण उसकी उँगली में चोट लग गयी। इस घटना ने आनन्दी को झकझोर डाला। उसने गुस्से में खाना-पीना छोड़ दिया। उसका पति श्रीकंठ इलाहाबाद से हर शनिवार को आता था। जब श्रीकंठ दो दिन बाद घर वापस आता है तो उसके पिता बेनीमाघव उल्टे आनन्दी के व्यवहार की शिकायत उससे करते हैं।

इस पर पहले तो श्रीकंठ आनन्दी पर गुस्सा करते हैं लेकिन पूछने पर जब आनन्दी ने पूरी घटना श्रीकंठ को बताई तो श्रीकंठ आग बबूला हो उठे। सुबह होते ही उसने अपने पिता से कहा कि वह अब इस घर में एक पल भी नहीं रह सकता। वह अपने छोटे भाई लालबिहारी को उल्टा-सीधा कहते हैं। जब लालबिहारी अपने बड़े भाई के अपने विषय में इस प्रकार के विचार सुनते हैं तो उन्हें प्रायश्चित्त के साथ बड़ा दुःख होता है और भाई की बात रखने के लिए वह हमेशा के लिए घर छोड़कर जाना चाहता है। लालबिहारी ने आनन्दी के द्वार पर आकर कहा-“भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि वह मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते, इसलिए अब मैं जाता हूँ उन्हें फिर मुँह न दिखाऊँगा। मुझसे जो अपराध हुआ, उसे क्षमा करना।”

लालबिहारी के इन वचनों को सुनकर आनन्दी का हृदय परिवर्तित हो गया और स्वयं अपने पति से कहा ‘लालाजी’ को अन्दर बुला लो। श्रीकंठ ने इस पर कुछ उत्तर नहीं दिया तो आनन्दी ने स्वयं आगे बढ़कर लालबिहारी को रोक लिया और कहने लगी “तुम्हें मेरी सौगंध, अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।”

कुछ ही देर में श्रीकंठ भी पिघल गया और उसने भी लालबिहारी को अपने गले से लगा लिया। दोनों भाई रोने लगते हैं। इसी समय बेनी माधव आ जाते हैं और खुश होकर कहने लगते हैं “बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।”

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions एकांकी Chapter 2 बहू की विदा

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions एकांकी Chapter 2 बहू की विदा (एकांकी, विनोद रस्तोगी)

बहू की विदा अभ्यास

बोध प्रश्न

बहू की विदा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बहू की विदा’ एकांकी किस समस्या पर आधारित है?
उत्तर:
‘बहू की विदा’ एकांकी समाज में फैली दहेज की समस्या पर आधारित है।

प्रश्न 2.
प्रमोद अपनी बहिन की विदा क्यों कराना चाहता था?
उत्तर:
प्रमोद अपनी बहिन की विदा इसलिए कराना चाहता था जिससे वह अपनी शादी के पश्चात् पड़ने वाले पहले सावन को अपने मायके में बिता सके।

प्रश्न 3.
जीवनलाल ने कमला को विदा करने से क्यों मना कर दिया?
उत्तर:
जीवनलाल ने कमला को विदा करने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि कमला के पिता ने शादी में उनके स्तर के अनुरूप दहेज दिया था।

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बहू की विदा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“बेटी वाले होकर हमारी मूंछे ऊँची हैं।” इस कथन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इस कथन का अभिप्राय यह है कि हमने अर्थात् जीवनलाल ने तो अपनी बेटी की शादी में भरपूर दहेज दिया था अतः हमें ससुराल वालों के सामने झुकने की कोई आवश्यकता नहीं है अर्थात् हमारी मूंछ ऊँची है हम उनसे दबकर नहीं रह सकते।

प्रश्न 2.
प्रमोद अपना घर क्यों बेचना चाहता था?
उत्तर:
प्रमोद अपना घर जीवनलाल की इच्छा पूर्ति अर्थात् दहेज के लिए पाँच हजार रुपये जटाने के लिए बेचना चाहता था।

प्रश्न 3.
राजेश्वरी ने बहू की विदा करवाने के लिए क्या उपाय किया?
उत्तर:
राजेश्वरी को जब यह बात ज्ञात हुई कि उसका पति कमला की विदाई के बदले में पाँच हजार रुपये माँग रहा है तो वह अपने पास से पाँच हजार रुपये देकर जीवनलाल के मुँह पर मारने की बात कहती है।

बहू की विदा बहू की विदा

प्रश्न 1.
‘बहू की विदा’ एकांकी की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
इसके लिए पाठ के प्रथम भाग ‘पाठ का सारांश’ देखें।

प्रश्न 2.
जीवनलाल का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
बहू की विदा’ एकांकी के रचनाकार श्री विनोद रस्तोगी हैं। इस एकांकी का प्रधान पात्र जीवनलाल है। यह व्यक्ति अहंकारी एवं लालची है। उसके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ देखी जा सकती हैं
(i) दहेज लोभी :
जीवनलाल दहेज का लोभी व्यक्ति है। तभी तो वह पाँच हजार रुपये पाये बिना प्रमोद के संग कमला को भेजने को तैयार नहीं होता है।

(ii) अहंकारी :
जीवनलाल एक अहंकारी व्यक्ति है। कम दहेज मिलने पर वह प्रमोद का अपमान करता है और अपनी बेटी की शादी में दिए गए दहेज की डींगें मारता है और वह यहाँ तक कह देता है कि मैं बेटी वाला होकर भी अपनी मूंछे ऊँची रखता हूँ।

(iii) हृदयहीन :
जीवनलाल एक हृदयहीन व्यक्ति है। प्रमोद के बार-बार विनती करने का भी उस पर कोई असर नहीं होता है और वह स्पष्ट कर देता है कि जब तक उसे पाँच हजार रूपये नहीं मिलेंगे वह कमला की विदा नहीं करेगा।

(iv) हृदय परिवर्तन :
जीवनलाल की लड़की को भी जब उसका ससुर विदा नहीं करता है और अधिक दहेज की माँग करता है तब जीवनलाल को पता चलता है कि उसका व्यवहार कितना गलत था लेकिन उसकी पत्नी की भलमनसाहत से उसका हृदय बदल जाता है और वह कमला की विदा कर देता है।

प्रश्न 3.
किस घटना ने जीवनलाल का हृदय परिवर्तित कर दिया। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जीवनलाल एक धनलोभी व्यक्ति है। वह अपनी बहू कमला की विदा इसलिए नहीं करता है कि उसे पाँच हजार रुपये दहेज के रूप में और मिलने चाहिए। कमला के भाई प्रमोद की विनती का उस पर कोई असर नहीं होता है। लेकिन थोड़ी ही देर बाद जब उसका बेटा रमेश उसकी बेटी गौरी को ससुराल से लाये बिना अकंला लौटता है तथा वह यह भी बताता है कि दहेज पूरा न मिलने के कारण उसके ससुराल वालों ने गौरी को नहीं भेजा है तो जीवनलाल को इससे धक्का लगता है। इसी समय उसकी पत्नी राजेश्वरी उसे फटकारती हुई कहती है कि जो व्यवहार तुम्हें कष्ट दे रहा है वही व्यवहार तुम अपनी बहू कमला के साथ कर रहे हो। इससे जीवनलाल का हृदय परिवर्तित हो जाता है और वह कमला को विदा कर देता है।

प्रश्न 4.
राजेश्वरी के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
राजेश्वरी ‘बहू की विदा’ एकांकी के प्रधान पात्र जीवनलाल की पत्नी है। पर वह अपने व्यवहार में सभ्य एवं उदार महिला है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
(i) ममतामयी :
राजेश्वरी ममतामयी माँ है। उसके हृदय में ममता की भावना कूट-कूटकर भरी है। वह अपने पुत्र रमेश के समान ही अपनी बहू कमला के भाई प्रमोद को समझती है, उसे ढाँढ़स बँधाती है। तभी तो वह प्रमोद से कहती है-“मेरे लिए जैसा रमेश, वैसे तुम ! बोलो कितना रूपया चाहते हैं वे! वह मैं अभी तुम्हें लाकर देती हूँ। वह अपनी बहू के साथ भी पुत्री के तुल्य व्यवहार करती है। वह प्रमोद से कहती है कि माँ होने के नाते वह समझ सकती है कि उसकी माँ भी अपनी पुत्री कमला का वैसे ही आँखें बिछाये इंतजार कर रही होगी, जैसा मैं अपनी पुत्री गौरी की प्रतीक्षा कर रही हूँ।

(ii) दहेज विरोधी :
राजेश्वरी प्रारम्भ से ही दहेज विरोधी है। उसकी मान्यता है कि बेटी वाला कितना भी दहेज दे पर बेटे वाले कभी सन्तुष्ट नहीं होते। बेटी गौरी के विदा न होने पर जब जीवनलाल को गहरा आघात पहुँचता है तब भी वह यही कहती है-“बेटी वाले चाहे अपना घर-द्वार बेचकर दे दें पर बेटे वालों की नाक-भौंह सिकुड़ी रहती है।” इस समस्या के समाधान के लिए वह कहती है कि यदि सब बेटे वाले यह ध्यान रखें कि वे बेटी वाले भी हैं तो सब उलझनें दूर हो जाएँ।

(ii) मानवता से पूर्ण :
राजेश्वरी मानवता से पूर्ण है। वह अपनी भावनाओं के समान ही दूसरों की भावनाओं को भी समझती है। वह अपने पति जीवनलाल से कहती है-“जो व्यवहार अपनी बेटी के लिए तुम दूसरों से चाहते हो, वह दूसरे की बेटी को भी दो।”

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बहू की विदा भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों की शुद्ध वर्तनी कीजिएदरद, हां, विनति, व्यरथ, किमत, सूहाग, भय्या, आंचल।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions एकांकी Chapter 2 बहू की विदा 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए
ख्याल, बेवकूफ, ज्यादा, तबियत, नजर, शराफत, इंसानियत, जिद, खून।
उत्तर:
MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions एकांकी Chapter 2 बहू की विदा 2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित मुहावरों एवं लोकोक्तियों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर:

  1. हृदय टूटना-परीक्षा में असफल होने पर गोपाल का हृदय टूट गया।
  2. नाक-भौं सिकोड़ना-बहू कमला के घर का पूरा काम निबटा देने पर भी ससुर जीवनलाल की नाक-भौं सिकुड़ी रहती थी।
  3. ठेस पहुँचान-उधार के रुपये न लौटाने पर हरीश ने अपने मित्र के हृदय को ठेस पहुंचाई।
  4. दाँतों तले उँगली दबाना-रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के आगे अंग्रेज सेना दाँतों तले उँगली दबा लेती थी।
  5. राह देखना-उर्मिला ने अपने पति लक्ष्मण के वन से लौटकर आने के लिए चौदह वर्ष तक उनकी राह देखी।
  6. नाक वाले होना-जीवनलाल अपने को बहुत ही नाक वाला मानता था।
  7. बाल धूप में सफेद होना-बुजुर्गों के बाल धूप में सफेद नहीं होते हैं।
  8. झोंपड़ी में रहकर महलों से नाता जोड़ना-झोपड़ी में रहने वालों को जीवन में कभी भी महलों से नाता नहीं जोड़ना चाहिए।
  9. मूंछ ऊँची होना-केवल थोथी शान बघारने से किसी की मूंछ ऊँची नहीं होती है। उसे कुछ ठोस काम करके दिखाना चाहिए।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्द-युग्मों से-पूर्ण पुनरुक्त, अपूर्ण, पुनरुक्त, प्रतिध्वन्यात्मक और भिन्नार्थक शब्द अलग-अलग कीजिए।
उत्तर:
पूर्ण पुनरुक्त – समझाते-समझाते, हँसती-हँसाती।
अपूर्ण पुनरुक्त – भोली-भाली, रंग-बिरंगे, इधर-उधर।
प्रतिध्वन्यात्मक – सखी-सहेलियाँ, हँस-खेलकर। सुखसुहाग।।
भिन्नार्थक शब्द – माँ-बहन, सात-आठ, भाई-बहन, घर-द्वार।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:
शब्द        विलोम
आशा       अपना
पराया      अन्याय
न्याय        सुन्दर
कुरूप      निराशा

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बहू की विदा पाठका सारांश

इस एकांकी की कथावस्तु उच्चवर्ग के परिवार से सम्बन्ध रखती है। हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार सावन के महीने में सावन से पूर्व विवाहिता स्त्री पहला सावन अपने घर पर ही मनाती है। प्रमोद भी अपनी बहिन कमला को ससुराल से ले आने के लिए उसकी ससुराल जाता है। कमला के ससुर जीवनलाल अहंकारी व्यक्ति हैं तथा अपने पैसे के आगे किसी को कुछ भी नहीं समझते हैं। जब प्रमोद जीवनलाल से अपनी बहिन की विदा की बात छेड़ता है तो जीवनलाल यह बहाने बनाते हैं कि तुम्हारे पिता ने उनकी हैसियत के हिसाब से दहेज नहीं दिया है। प्रमोद द्वारा अपनी मजबूरी बताने पर भी जीवनलाल टस से मस नहीं होते हैं और वे अपना अन्तिम निर्णय प्रमोद को सुनाते हुए कहते हैं कि जब तक तुम पाँच हजार रुपये लेकर नहीं आओगे तब तक कमला को यहाँ से विदा नहीं किया जाएगा। प्रमोद मन मसोसकर रह जाता है और जीवनलाल से कहता है कि बेटी वाला होने के कारण आपने मेरा अपमान किया है। लेकिन याद रखिए आप भी बेटी वाले हैं। इस बात का उत्तर देते हुए जीवनलाल कहता है कि मेरी बेटी तो पहला सावन अपने मायके में ही मनायेगी क्योंकि मैने पूरा दहेज दिया है।

कमला जब कमरे में आती है तो अपने भाई से गले मिलकर बहुत रोती है। तभी प्रमोद कमला को बताता है कि तुम्हारे श्वसुर ने पाँच हजार रुपये की हमसे माँग की है, अतः वह रुपये का प्रबंध करने वापस लौटकर जा रहा है। इसी समय कमला की सास राजेश्वरी आ जाती है। जब राजेश्वरी को अपने पति की जिद्द का पता चलता है तो वह अपने पति से छिपाकर पाँच हजार रुपये प्रमोद को देने को तैयार हो जाती है। कमला अपनी सास की इस ममता को देखकर उनसे लिपट जाती है तभी उसके श्वसुर जीवनलाल का प्रवेश होता है। जीवनलाल अपनी बेटी के ससुराल से आने की आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं।

तभी उनका पुत्र रमेश आकर बताता है कि गौरी को उसके ससुराल वालों ने भेजने से मना कर दिया है। यह सुनकर जीवनलाल के हृदय को चोट पहुँचती है और वे कहते हैं कि मैंने तो उनको भरपूर दहेज दिया था अब वे किस दहेज की बातें कर रहे हैं। तभी उनकी पत्नी राजेश्वरी कहती है कि दूसरों के साथ हमें वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा कि हम अपने लिए चाहते हैं। बहू और बेटी को समान समझना चाहिए तभी घर में सुख-समृद्धि एवं शान्ति आ सकती है। अपनी पत्नी के इन वचनों को सुनकर जीवनलाल की आँखें खुल जाती हैं और वे खुशी-खुशी कमला की विदा कर देते हैं। यहीं एकांकी समाप्त हो जाती है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 कर्म कौशल

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 कर्म कौशल (निबन्ध, डॉ. रघुवीर प्रसाद गोस्वामी)

कर्म कौशल अभ्यास

बोध प्रश्न

कर्म कौशल अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नैसर्गिक नियमों को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
व्यक्ति के जीवन को चलाने के लिए जो नैसर्गिक नियम बनाये गये हैं, उन्हें प्राकृतिक नियम कहा जाता है।

प्रश्न 2.
किस ग्रन्थ में विवेचित कर्म सिद्धान्त की विशिष्ट पहचान है?
उत्तर:
श्रीमद्भगवद्गीता में विवेचित कर्म सिद्धान्त जो सार्वकालिक, सार्वजनीय एवं सत्य से अनुप्राणित है, की आज विश्व में विशिष्ट पहचान है।

प्रश्न 3.
कर्ता को किस प्रकार का कार्य करना चाहिए?
उत्तर:
कर्ता द्वारा वही कार्य करना चाहिए जिसके कार्य का सम्पन्न होना उसके लिए लाभदायक हो।

प्रश्न 4.
किस कारण से मनुष्य स्वयं को कर्ता मानने लगता है?
उत्तर:
अज्ञान एवं मिथ्या अभियान के कारण ही मनुष्य स्वयं को कर्ता मानने लगता है।

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कर्म कौशल लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीव समुदाय से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
ईश्वर की अनुपम रचना है-प्रकृति जिसमें सजीवनिर्जीव, सुन्दर-कुरूप, लाभदायक-हानिकारक, सत्-असत् आदि समस्त रचनाएँ आती हैं। इसी प्रकार प्रकृति जीव-समुदाय से परिपूर्ण है। अतः जीव समुदाय का तात्पर्य है-वृक्ष, वनस्पति, जीव-जन्तु और मानव संसृति। यहाँ पर लेखक के द्वारा प्रकृति में केवल सजीव वस्तुओं को ही लिया गया है।

प्रश्न 2.
कर्म के पाँच कारण कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
इस जीव-जगत् में कोई भी जीव (प्राणी) एक पल भी बिना कर्म के नहीं रह सकता और प्रत्येक कर्म का कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। इसलिए गीता में कहा गया है कि सम्पन्न किए जाने वाले किसी भी कर्म के पाँच कारण होते हैं-अधिष्ठान, कर्ता, कारण, इन्द्रिय चेष्टाएँ तथा देव। सभी कर्म इन पाँच तत्वों के समूहीकरण के द्वारा उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 3.
युद्ध के लिए प्रेरित करते हुए योगेश्वर ने अर्जुन से क्या कहा?
उत्तर:
युद्ध के लिए प्रेरित करते हुए योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा था कि परिणाम पर दृष्टि न रखते हुए मनुष्य को अपना कर्म अत्यन्त श्रद्धा एवं पूर्ण समर्पण भाव से करना चाहिए क्योंकि मनुष्य कर्म का निमित्त मात्र है, कर्ता तो योगेश्वर हैं। जो संस्कार युक्त बुद्धि न होने के कारण यह समझे कि एक मैं ही कर्म का कर्ता हूँ, वह प्राणी की भूल है।

प्रश्न 4.
किस कारण से कर्ता का समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है?
उत्तर:
मनुष्य स्वाभाविक रूप से कर्म से बँधा है। वह कर्म किए बिना एक पल भी नहीं रह सकता, परन्तु जब मनुष्य केवल फल-प्राप्ति का चिन्तन करके कर्म करता है तो कर्ता का समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है। फल प्राप्त होने के पश्चात् वह उसी फल-भोग में उलझकर रह जाता है। इस प्रकार फल-प्राप्ति के चिन्तन और फल-भोग में उसका सारा समय नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 5.
श्रेष्ठ व्यक्ति का चरित्र कैसा होता है?
उत्तर:
श्रेष्ठ व्यक्ति का चरित्र अन्य व्यक्तियों के लिए सदा ही अनुकरणीय अर्थात् अनुसरण करने के योग्य होता है और वही लोक में प्रमाण बन जाता है। अतः समाज के श्रेष्ठ व्यक्तियों को यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि वे कहीं अपने सद्कर्म से गिर तो नहीं गये हैं या भटक तो नहीं गये हैं। उन्हें सदैव सद्कर्मों पर अटल रहना चाहिए। श्रेष्ठ व्यक्तियों का चरित्र ही एक आदर्श समाज की रचना करता है।

कर्म कौशल दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सबसे प्रमुख सावधानी की ओर अर्जुन का ध्यान आकृष्ट करते हुए श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
उत्तर:
गीताकार ने कर्म करते समय अर्जुन को अनेक सावधानियाँ बरतने के लिए कहा था जिसमें सबसे प्रमुख सावधानी की ओर कृष्ण ने अर्जुन का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा था कि किसी सिद्धि और असिद्धि तथा अनुकूलता और प्रतिकूलता में समान भाव रखकर मन, वाणी और क्रिया के पूर्ण भाव से युक्त होकर कर्म करे। तात्पर्य है कि कर्म का फल अच्छा हो या बुरा, यह सोचे बिना मन, वाणी और क्रिया के साथ कर्म करें। व्यक्ति का जीवन एक युद्ध के समान है अत: उसमें जय-पराजय, लाभ-हानि, सुख-दुःख दोनों ही सम्भव हैं। इन दोनों बातों की परवाह किए बिना मोह को त्याग कर कर्म करना है। इसी निष्काम कर्म करने की सावधानी बरतने के लिए कृष्ण ने अर्जुन से कहा। कामना रहित या निष्काम कर्म करना ही प्रमुख सावधानी है और फल के प्रति समान भाव रखना भी, जिसे योग कहते हैं, प्रमुख सावधानी है।

प्रश्न 2.
फल प्राप्ति में सन्देह का प्रश्न किस स्थिति में नहीं रहता है?
उत्तर:
फल प्राप्ति में सन्देह का प्रश्न निम्नलिखित स्थितियों में नहीं रहता है-

  1. कर्ता की दृष्टि या भाव शुद्ध हों।
  2. कर्म में बुद्धि की पूर्णता का समावेश हो।
  3. फल प्राप्ति का चिन्तन न हो।
  4. निष्काम कर्म की भावना हो।
  5. कर्म अनासक्त भाव से किया जाए।
  6. फल के प्रति समत्व की भावना हो।
  7. मन, वाणी और कर्म में शुद्धता हो।
  8. स्वार्थपरायणता को त्यागने की भावना हो।

प्रश्न 3.
अपने संकल्प से विपरीत होने पर भी मनुष्य को कर्म क्यों करना पड़ता है?
उत्तर:
मनुष्य का स्वभाव है कर्म करते रहना, इसीलिए मनुष्य कर्म के पराधीन होता है। कहावत है-‘कर्म प्रधान सब जग जाना’। अनेक बार उसे बिना इच्छा के बिना चाहे हुए कर्म करना पड़ता है। उसका स्वभाव तथा ये पाँच कारण-अधिष्ठान, कर्ता, करण, इन्द्रिय चेष्टाएँ और देवसिद्धि सर्वोपरि शक्तियाँ-सामूहिक रूप से मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य निर्धारित कर्म को नहीं छोड़ सकता। कर्म को छोड़ना उसके लिए असम्भव होता है। इसीलिए मनुष्य को न चाहते हुए भी कर्म करना होता है। वह अपने संकल्पों को त्यागकर कर्म करता है क्योंकि उसका स्वभाव कर्म से बँधा होता है। जीवन में कर्म अनिवार्य होता है। मनुष्य के लिए कर्म त्याग असम्भव होता है, इस कारण उसे सत्कर्म ही करना चाहिए।

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कर्म कौशल भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए-
नैसर्गिक, समुदाय, मिथ्या, योगेश्वर, व्यवधान।
उत्तर:

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए शब्द लिखिए
उत्तर:

  1. अपयश को देने वाला = अपयशदायक।
  2. हानि करने वाला = हानिकारक।
  3. कामना से रहित कर्म = निष्काम कर्म।
  4. जो योग का ईश्वर हो = योगेश्वर।
  5. स्वार्थ से रहित भाव वाला व्यक्ति = नि:स्वार्थी।

कर्म कौशल संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) प्रकृति अनेकानेक जीव-समुदाय से परिपूर्ण है। जीव-समुदाय का तात्पर्य है वृक्ष, वनस्पति, जीव-जन्तु और मानव संसृति। प्रत्येक के जीवन-संचालन हेतु जो नैसर्गिक नियम बने उन्हें प्राकृतिक नियम कहा गया पर मानव-बुद्धि ने निरन्तर परिष्कार करके जिस नियम पद्धति का विकास किंया उसे कर्तव्य या कर्म कहा गया। कर्म या कर्म साधना की आवश्यकता एवं अनिवार्यता न केवल सभ्य समाज के लिये अपरिहार्य है अपितु सृष्टि के स्थायित्व के लिये भी महत्त्वपूर्ण है।

कठिन शब्दार्थ :
नैसर्गिक = प्राकृतिक। परिष्कार = सुधार। अपरिहार्य = जिसे टाला न जा सके। सृष्टि = संसार।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘कर्म कौशल’ निबन्ध से अवतरित है। इसके लेखक डॉ. रघुवीर प्रसाद गोस्वामी हैं।

प्रसंग :
कुरुक्षेत्र में मैदान में खडे अर्जन को जो युद्ध रूपी कर्म से मोह के कारण विमुख हो गया था। उसे कृष्ण नै निष्काम कर्म का उपदेश दिया था इन पंक्तियों में कर्म का अर्थ व उसकी आवश्यकता को बताया गया है।

व्याख्या :
डॉ. रघुवीर प्रसाद गोस्वामी कहते हैं कि इस संसार में अनेक प्राकृतिक जीव-प्राणियों के वर्ग हैं। जीव-प्राणियों का अर्थ केवल मनुष्य से ही नहीं है बल्कि पशु, पक्षी, पेड़, पौधे अर्थात् जीवित प्रत्येक वस्तु जीव जगत् में मानी जाती है। प्रत्येक जीव-प्राणी को अपना जीवन बिताने के लिय कुछ-न-कुछ कार्य अवश्य करना पड़ता है तथा उन कार्यों के करने के कुछ नियम हैं। इन नियमों को प्राकृतिक या अनिवार्य नियम कहा जाता है। परन्तु मनुष्य ने बुद्धि पाई है इस कारण वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है तथा नियमों में परिवर्तन करता रहता है।

साथ ही प्रकृति व बुद्धि दोनों ही परिवर्तनशील हैं, अतः वह प्रतिदिन नये-नये नियम बनाता रहता है। इन नियमों के बनाने की प्रक्रिया को ही कर्म कहते हैं। यह कर्म सभ्य समाज के लिए ही आवश्यक नहीं है वरन् इस संसार को स्थायी बनाये रखने के लिए भी कर्म आवश्यक है। इसका अर्थ यह हुआ कि सम्पूर्ण जीव-जगत् के लिए कर्म जरूरी है जिससे यह संसार बना रहे और संसार के क्रियाकलाप चलते रहें। भगवान की इस संसार रूपी सुन्दर रचना का अन्त न हो।

विशेष :

  1. कर्म की अनिवार्यता बताई गई है।
  2. भाषा अति क्लिष्ट खड़ी बोली है।
  3. संस्कृत के शब्दों का प्रयोग है।
  4. गम्भीर व विचारात्मक शैली का प्रयोग है।

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(2) कर्म शुद्धि का साधन यही है कि मनुष्य वासनाओं एवं आसक्ति की अशुद्धताओंतथा अपूर्णताओंका मन सेमूलोच्छेदन कर दे। कर्मों का संचालन आत्मा अर्थात् एक विशिष्ट सत्ता करती रहती है। मनुष्य अनन्यभाव से सम्पूर्ण कर्मफल को ईश्वरार्पण करके अनासक्त स्थिति में परम लक्ष्य को प्राप्त होता है और उसके परम उद्देश्य में ईश्वर भी सहायक होता है।

कठिन शब्दार्थ :
आसक्ति = मोह। मूलोच्छेदन = जड़ से उखाड़ना। अनन्यभाव = एक ही भाव को समर्पित। अनासक्त = बिना मोह के।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक डॉ. रघुवीर प्रसाद गोस्वामी कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव है प्रतिपल कर्म करना, अर्थात् मनुष्य कर्म को त्याग नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को सदैव सत्कर्म ही करने चाहिए। तब ही उसे अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

व्याख्या :
इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि मनुष्य हर समय कुछ-न-कुछ कर्म अवश्य करता रहता है चाहे वह कर्म अच्छा हो या बुरा। यह प्रकृति का नियम है कि हम अच्छाई की ओर जाते हैं। इस कारण हमें सदा शुद्ध कर्म अर्थात् सत्कर्म ही करना चाहिए। सत्कर्म करने के लिए आवश्यक है कि हम मन में बुरे विचारों को न आने दें। कर्म के फल में हमारा मोह न हो तथा कर्म के पूरा न होने का हमारे मन में भय न हो। कर्म करना मनुष्य के हाथ में नहीं होता, वह तो आत्मा या कहें ईश्वर के हाथ में होता है।

कर्म करना प्राणी के वश की बात नहीं होती, अतः मनुष्य को अपना कर्म तथा कर्म फल ईश्वर को अर्पित करके समान भाव से (सुख-दुःख से परे) करना चाहिए। जब मनुष्य फल प्राप्ति के लालच में नहीं पड़ता है तो उसे अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है। कर्म को पूरा करने और उद्देश्य को प्राप्त करने में भगवान भी सहायता करते हैं। जब भगवान सहायता करते हैं तो कर्म में सफलता और सफलता से सुख-शान्ति अवश्य मिलेगी। यही मनष्य का परम लक्ष्य है।

विशेष :

  1. सत्कर्म करने की प्रेरणा दी गई है।
  2. मूलोच्छेदन, अनन्यभाव आदि शब्दों के प्रयोग से भाषा दुरूह हो गई है।
  3. खड़ी बोली का प्रयोग है।
  4. विचारात्मक शैली।

(3) वस्तुतः गीता का चिन्तन जीवन-संग्राम में शाश्वत विजय का क्रियात्मक अथवा व्यावहारिक प्रशिक्षण है। यह सत् एवं असत् प्रवृत्तियों का संघर्ष है। हमारा शरीर ही एक क्षेत्र (खेत) है जिसमें बोया हुआ भला और बुरा बीज संस्कार-रूप में सदैव उगता है। इसीलिये इसमें व्यक्ति को स्वयं को संस्कारित करते हुए निश्चित कर्म-कर्तव्य में निरन्तर रत रहने की दृष्टि समाहित है।

कठिन शब्दार्थ :
वस्तुतः = वास्तव में। शाश्वत = हमेशा रहने वाली। संस्कारित = सुधार कर। रत = लगा हुआ। समाहित = मिली हुई।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
डॉ. रघुवीर प्रसाद गोस्वामी ने बताया है कि गीता मनुष्य को संस्कारित कर्म करने की प्रेरणा देती है। कर्म के अनुसार ही फल मिलता है। अतः सत्कर्म करना ही मनुष्य का उद्देश्य है।

व्याख्या :
गीता में बताया गया है कि कर्म का सिद्धान्त मानव जाति को स्थायी सुख देने वाला है। यह जीवन कर्म का युद्ध है। इस युद्ध में गीता अनन्त विजय को प्राप्त करने का रास्ता दिखाती है। इस विजय को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को कर्तव्यशील बनना होगा। उसे इस संसार के व्यवहार को समझना होगा, तब ही उसका कर्म शाश्वत होगा। महाभारत अच्छाई व बुराई का युद्ध है। जिसमें अच्छाई की जीत दिखाई गई है। लेखक एक उदाहरण देकर कर्म का महत्त्व बताता है।

जैसे एक खेत में जैसा बीज बोया जाता है वैसी ही फसल उगती है। ठीक उसी प्रकार इस शरीर में जैसे कर्मों का बीज डाला जाता है वैसे ही संस्कार व आदतें बनती हैं। कर्म का परिणाम संस्कार होते हैं। संसार में जो व्यक्ति अपने में सत् विचारों को धारण करता है, तब कर्म में संलग्न होता है। व्यक्ति कर्म थोड़े समय के लिए न करके लगातार जीवन भर सत् कर्म करता रहता है, तब उसे स्थायी रहने वाली विजय अर्थात् परम आनन्द व सुख मिलता है। अन्त में वह व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। इसी मुक्ति को पाने का चिन्तन गीता में किया गया है।

विशेष :

  1. गीता का चिन्तन विषय सत् कर्म बताया गया है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग है।
  3. शरीर रूपी खेत तथा संस्कार रूपी बीज में रूपक अलंकार है।
  4. भाषा क्लिष्ट होते हुए भी बोधगम्य है।

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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 एक कुत्ता और एक मैना

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 एक कुत्ता और एक मैना (संस्मरण, हजारीप्रसाद द्विवेदी)

एक कुत्ता और एक मैना अभ्यास

बोध प्रश्न

एक कुत्ता और एक मैना अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक सर्वव्यापक पक्षी किसे समझ रहा था?
उत्तर:
लेखक सर्वव्यापक पक्षी’कौए’ को समझ रहा था।

प्रश्न 2.
दूसरी बार सबेरे गुरुदेव के पास कौन उपस्थित था?
उत्तर:
दूसरी बार गुरुदेव के पास स्वयं लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी उपस्थित थे।

प्रश्न 3.
लेखक के अनुसार मैना कैसा पक्षी है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार मैना दूसरों पर अनुकम्पा दिखाने वाला पक्षी है।

प्रश्न 4.
गुरुदेव कहाँ रहते थे?
उत्तर:
गुरुदेव श्री निकेतन के पुराने तिमंजिले मकान में रहते थे।

प्रश्न 5.
गुरुदेव ने शांति निकेतन को छोड़ कहीं और रहने का मन क्यों बनाया?
उत्तर:
गुरुदेव ने शंति निकेतन को छोड़कर स्वास्थ्य के गड़बड़ होने के कारण दूसरी जगह रहने का मन बनाया।

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एक कुत्ता और एक मैना लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों का आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) भावहीन दृष्टि की करुण व्याकुलता जो कुछ समझती है, उसे समझा नहीं पाती और मुझे इस सृष्टि में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।
उत्तर:
आशय-गुरुदेव शान्ति निकेतन छोड़कर श्री निकेतन में रहने लगते हैं। उनका पालूत कुत्ता अपने अन्तर्मन से गुरुदेव का नया ठिकाना ढूँढ़ लेता है। वह दो मील की दूरी बिना किसी के बताये अकेला ही तय करके गुरुदेव के पास पहुँच जाता है। उस कुत्ते की भावदृष्टि की करुणामय व्याकुलता ने बिना भाषा के प्रयोग किए ही गुरुदेव को समझा दिया कि उसका लगाव गुरुदेव के प्रति सच्चा है।।

(ख) “सबेरे की धूप में मानो सहज मन से आहार चुगती हुई झड़े हुए पत्तों पर कूदती फिरती है सारा दिन।”
उत्तर:
आशय-लेखक कहता है कि वह विधवा मैना सबेरे के समय की धूप में सहज भाव से अपने आहार को चुगती हुई पेड़ से गिरे हुए पत्तों पर पूरे दिन कूदती फिरती रहती है।

(ग) मूक प्राणी मनुष्य से कम संवेदनशील नहीं होते।
उत्तर:
आशय-लेखक कहता है कि बोलने की क्षमता ईश्वर ने केवल मनुष्य को प्रदान की है पर मूक प्राणी भी मनुष्य से किसी भी दशा में कम संवेदनशील नहीं होते हैं। कहने का भाव यह है कि इन मूक प्राणियों को भी दु:ख सुख, हर्ष-विषाद की अनुभूति होती है और उसे वे अपने आचरण से व्यक्त कर देते हैं।

एक कुत्ता और एक मैना दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन कला की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध, उपन्यास, आलोचना, शोध हिन्दी साहित्य का इतिहास आदि विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। इन विविध विषयों में उन्होंने अनेक शैलियों का प्रयोग किया है। आपने अपनी रचनाओं के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा के तीन रूप हैं-तत्सम प्रधान, तद्भव प्रधान एवं उर्दू-अंग्रेजी शब्द युक्त व्यावहारिक रूप। आपकी भाषा प्रांजल, सुबोध एवं प्रवाहमय है। शब्द चयन उत्तम और वाक्य-विन्यास सुगठित है। यथास्थान आपने लोकोक्तियों एवं मुहावरों का भी प्रयोग किया है।

प्रश्न 2.
निबंध गद्य साहित्य की उत्कृष्ट विधा है, जिसमें लेखक अपने भावों और विचारों को कलात्मक और लालित्यपूर्ण शैली में अभिव्यक्त करता है। इस निबंध में उपर्युक्त विशेषताएँ कहाँ झलकती हैं? किन्हीं चार विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर:
लेखक ने अपने भावों और विचारों को कलात्मक और लालित्यपूर्ण शैली में इस अंश में व्यक्त किया है, उदाहरण प्रस्तुत है “एक दिन हमने सपरिवार दर्शन की ठानी। दर्शन को मैं जो यहाँ विशेष रूप से दर्शनीय बनाकर लिख रहा हूँ। उसका कारण यह है कि गुरुदेव के पास जब कभी मैं जाता था तो प्रायः वे यह कहकर मुस्करा देते थे कि ‘दर्शनार्थी हैं क्या?’ शुरू-शुरू में मैं उनसे ऐसी बांग्ला में बात करता था जो वस्तुतः हिन्दी मुहावरों का अनुवाद हुआ करती थी।”

एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है-
“गुरुदेव वहाँ बड़े आनन्द में थे। अकेले रहते थे। भीड़-भाड़ उतनी नहीं होती थी जितनी शांति निकेतन में। जब हम लोग ऊपर गए तो गुरुदेव बाहर एक कुर्सी पर चुपचाप बैठे अस्तगामी सूर्य की ओर ध्यान स्तिमित नयनों से देख रहे थे। हम लोगों को देखकर मुस्कराए, बच्चों से जरा छेड़छाड़ की, कुशल प्रश्न पूछे और फिर चुप हो रहे।”

अन्य उदाहरण-
“इसकी भावहीन दृष्टि की करुण व्याकुलता जो कुछ . समझती है, समझा नहीं पाती और मुझे इस सृष्टि में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।

अन्य उदाहरण-
“सबेरे की धूप में मानो सहज मन से आहार चुगती हुई झड़े हुए पत्तों पर कूदती फिरती है, सारा दिन।”

प्रश्न 3.
करुण मैना को देखकर गुरुदेव ने कविता लिखी, उसका सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
“उस मैना को आज न जाने क्या हो गया है? वह न मालूम अपने दल से क्यों अलग हो गई है? पहले दिन मैंने उसे एक पैर से लंगड़ाते हुए देखा था। इसके बाद नित्य प्रात:काल मैं उसे देखता हूँ तो वह अकेली ही बिना अपने नर मैना के कीड़ों का शिकार किया करती है और नाच-कूदकर इधर-उधर फुदकती रहती है। उसकी यह चिंतनीय दशा क्यों हो गई, इसे मैं बार-बार सोचा करता हूँ।”

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एक कुत्ता और एक मैना भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में से रूढ़ योगरूढ़ और यौगिक शब्द अलग-अलग कीजिए।
विद्यानगर, त्रिवेणी, महादेवी, श्रीहीन, असामयिक, चरण, निर्मल, काव्य-सरोवर, दशानन, दशरथनन्दन, प्रसाद, अनुराग, विवेकानन्द, ब्रजनंदन, गुण, चहलकदमी।
उत्तर:
रूढ़ शब्द – चरण, प्रसाद, गुण।
योगरूढ़ – विद्यानगर, त्रिवेणी, महादेवी, श्रीहीन, निर्मल, दशानन, अनुराग विवेकानन्द।
यौगिक – असामयिक, काव्य-सरोवर, दशरथनन्दन चहलकदमी।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर:

  1. विभूतियाँ-हिन्दी साहित्य में अनेक विभूतियाँ! उत्पन्न हुई। यथा-रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, भारतेन्दु, हरिश्चन्द्र विद्यानिवास मिश्र आदि।
  2. अधिवेशन-हिन्दी परिषद् का अधिवेशन आगामी में 15 अप्रैल, 2008 को होगा।
  3. अवसाद-मनुष्य के जीवन में कभी-कभी अवसाद के क्षण आ जाते हैं।
  4. आशुतोष-शिव भगवान आशुतोष हैं।
  5. रसानुभूति-अच्छी कविता पढ़ने में पाठकों को रसानुभूति होती है।
  6. गंगाजल-भारतीय संस्कृति में गंगाजल बड़ा पवित्र माना जाता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों की शुद्ध वर्तनी लिखिए।
उत्तर:
दुरभाग = दुर्भाग्य; आसुतोष = आशुतोष; औजसवी = ओजस्वी; अनकूल = अनुकूल; विशाद = विषाद; निशतेज = निस्तेज; साहित्यक = साहित्यिक।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए।
उत्तर:

  1. हृदय को स्पर्श करने वाली दृष्टि = हृदयस्पर्शी, मर्म-स्पर्शी।
  2. साहित्य की रचना करने वाला = साहित्यकार।
  3. जानने की इच्छा = जिज्ञासा।
  4. रस की अनुभूति करना = रसानुभूति।
  5. जो पढ़ा-लिखा न हो = अशिक्षित।
  6. जो सब जगह व्याप्त हो = सर्वव्यापक।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के युग्मरूप लिखिए।
उत्तर:
समय-असमय; अवस्था-अनअवस्था; शक्ति-भक्ति; दिन-रात।

प्रश्न 6.
पाठ में आये वाक्यांशों के अर्थ लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी पाठ पढ़कर स्वयं लिखे।।

प्रश्न 7.
नीचे पाठ के आधार पर कुछ शब्द-युग्म दिये गए हैं, जैसे-संभव-असंभव, स्वस्थ-अस्वस्थ।
इसी तरह पाठ से कुछ शब्द चुनिए एवं अया अन् उपसर्ग लगाकर नए शब्द बनाइए।
उत्तर:
प्रगल्भ – अप्रगल्भ
स्थान – अस्थान
अवस्था – अनवस्था
स्वीकृति – अस्वीकृति
करुण – अकरुण
दृष्टि – अदृष्टि
सत्य – असत्य।

प्रश्न 8.
भाषा और बोली में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बोली बहुत सीमित स्थान में ही बोली जाती है। इसमें लिखा हुआ कोई साहित्य नहीं होता है। जब बोलने वालों का क्षेत्र बढ़ जाता है तब बोली भाषा बन जाती है और भाषा में साहित्य का सृजन होने लगता है। कभी-कभी राजनैतिक कारणों से किसी बोली का स्थान ऊँचा उठ जाता है जैसे कि आज की खड़ी बोली जो राष्ट्रभाषा के पद पर बैठी है वह स्वतन्त्रता से पूर्व केवल दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ आदि के आस-पास बोली जाती थी। साथ ही उस समय उसमें कोई विशेष साहित्य भी नहीं था। पर दिल्ली राजधानी होने से उसका स्थान बहुत ऊँचा हो गया है और वह आज राष्ट्रभाषा मानी जाती है अर्थात् पूरे देश की मानक भाषा। ब्रज, अवधी आदि भाषाएँ हैं।

प्रश्न 9.
मध्य प्रदेश की प्रमुख चार बोलियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
ग्वालरी, भदावरी, उज्जैनी, मालवी।

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एक कुत्ता और एक मैना संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) यहाँ यह दुःख के साथ कह देना चाहता हूँ कि अपने देश के दर्शनार्थियों में कितने ही इतने प्रगल्भ होते थे कि समय-असमय, स्थान-अस्थान, अवस्था-अनवस्था की एकदम परवाह नहीं करते थे और रोकते रहने पर भी आ जाते थे। ऐसे दर्शनार्थियों से गुरुदेव कुछ भीत-भीत से रहते थे।

कठिन शब्दार्थ :
दर्शनार्थियों में दर्शन के लिए आने वालों में; प्रगल्भ = लापरवाह, धृष्ट; भीत-भीत से = डरते से।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘एक कुत्ता और एक मैना’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने भारतवर्ष के दर्शनार्थियों की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि हमारे देश के नागरिकों में सभ्य समाज के सिद्धान्तों एवं ढंगों का ज्ञान तक नहीं होता है। वे बड़े ही दु:ख के साथ कह देना चाहते हैं कि हमारे देश के दर्शनार्थियों में शिष्टता की कमी होती है। वे जिन महान् पुरुषों का दर्शन करना चाहते हैं उनसे मिलने का कौन-सा उचित समय है, उनसे मिलने का कौन-सा उचित स्थान है और कौन-सी अवस्था है। इस तक का ज्ञान नहीं होता है। उनको रोकने की चेष्टा भी व्यर्थ जाती थी। इस प्रकार के अशिष्ट दर्शनार्थियों से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को भय लगा रहता था।

विशेष :

  1. लेखक ने अपने देश के दर्शनार्थियों में जो शिष्टता की कमी है, उस ओर ध्यान दिलाया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) इस वाक्यहीन प्राणिलोक में सिर्फ यही एक जीव अच्छा-बुरा सबको भेदकर सम्पूर्ण मनुष्य को देख सका है, उस आनन्द को देख सका है, जिसे प्राण दिया जा सकता है जिसमें अहेतुक प्रेम ढाल दिया जा सकता है, जिसकी चेतना असीम चैतन्य लोक में राह दिखा सकती है। जब मैं इस मूक हृदय का प्राणपण आत्मनिवेदन देखता हूँ, जिसमें वह अपनी दीनता बताता रहता है, तब मैं यह सोच ही नहीं पाता कि उसने अपने सहज बोध से मानव स्वरूप में कौन-सा मूल आविष्कार किया है। इसकी भावहीन दृष्टि की करुण व्याकुलता जो कुछ समझती है, उसे समझा नहीं पाती और मुझे इस सृष्टि में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।

कठिन शब्दा :
र्थवाक्यहीन = मुख से न बोलने वाले प्राणिलोक = प्राणी संसार में; अहेतुक = बिना किसी कारण या अभिप्राय के; असीम = सीमा रहित; चैतन्य लोक = चेतना युक्त संसार में; प्राणपण = प्राणों की बाजी लगाने वाले आविष्कार = खोज; सृष्टि = संसार में।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के स्वामीभक्त कुत्ते की मानवीय भावना का वर्णन करते हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि अपने स्वामीभक्त पालतू कुत्ते की भावनाओं की अभिव्यक्ति में कविवर टैगोर ने ‘आरोग्य’ नामक पत्रिका में एक कविता लिखी थी। उसी कविता के भावों का वर्णन यहाँ किया गया है। कवि टैगोर के शब्दों को व्यक्त करते हुए लेखक कहता है कि वह मूक प्राणी प्राणियों की अच्छी बुरी भावनाओं से भी ऊपर उठकर मनुष्य को देख सका है, वह उस आनन्द को देख सका है जिसे प्राण दिया जा सकता है, साथ ही वह अहेतुक प्रेम में ऐसा ढल गया था कि उसकी चेतना असीम चैतन्य लोक में मार्ग दिखा सकती है।

कवि टैगोर जी आगे कहते हैं कि जब मैं इस मूक प्राणी के प्राणों की बाजी लगा देने वाले आत्मनिवेदन को देखता हूँ जिसमें कि वह अपनी दीनता को व्यक्त करता रहता है, तब उस क्षण मैं यह सोच ही नहीं पाता कि उस मूक प्राणी ने अपने सहज ज्ञान से मानक स्वरूप में कौन-सी नई चीज खोज ली है। उसकी भावहीन दृष्टि की करुण बेचैनी जो कुछ मुझे समझाना चाहती है, उसे वह समझा नहीं पाती है. और मुझे इस जगत् में उसके स्वरूप में मनुष्य का सच्चा परिचय समझा देती है।

विशेष :

  1. गुरुदेव टैगोर अपने स्वामीभक्त कुत्ते से बहुत स्नेह करते थे। उसके आन्तरिक अलौकिक गुणों की उन्हें पहचान थी।
  2. भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं दुरूह है।

(3) तीन-चार वर्ष से मैं एक नये मकान में रहने लगा था। मकान के निर्माताओं ने दीवारों में चारों ओर एक-एक सुराख छोड़ रखी है। यह शायद आधुनिक वैज्ञानिक खतरे का समाधान होगा। सो, एक मैना दंपति नियमित भाव से प्रतिवर्ष यहाँ गृहस्थी जमाया करते हैं, तिनके और चीथड़ों का अम्बार लगा देते हैं, भलेमानस गोबर के टुकड़े तक ले आना नहीं भूलते। हैरान होकर हम सूराखों में ईंट भर देते हैं, परन्तु वे खाली बची जगह का भी उपयोग कर लेते हैं।

कठिन शब्दार्थ :
निर्माताओं = बनाने वालों ने; सुराख = छेद; समाधान = इलाज, बचाव; दम्पति = नर और मादा का जोड़ा; प्रतिवर्ष = हर साल; गृहस्थी= घर-परिवार; अम्बार = ढेर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक जब नये मकान में रहने आता है तो वह वहाँ दीवारों के सुराख में मैना के अण्डे सैने की घटना का वर्णन करते हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि तीन-चार वर्ष से मैं एक नये मकान में किरायेदार रूप में रह रहा हूँ। इस भवन के निर्माणकर्ताओं ने संभवतः किसी वैज्ञानिक सिद्धान्त के सहारे मकान की दीवारों में कुछ सुराख करवा रखे थे। इन दीवारों के सुराखों में एक मैना दम्पति प्रतिवर्ष अण्डे सैने के लिए अपना घोंसला बना लेते थे। इस घोंसले के निर्माण के लिए वे तिनके, चीथड़ों का एक ढेर इकट्ठा कर देते थे और इससे भी जब उनका मन नहीं भरता तो वे गोबर के टुकड़े तक ले आया करते थे। उनके द्वारा निर्मित घोंसले से हमारे घर में गन्दगी फैलती थी अतः हैरान होकर हमने मकान की दीवारों के सुराखों को ईंटों से भर दिया था परन्तु उसने भी जो खाली जगह मिल जाती उसी में वे अपना घोंसला जमा लिया करते थे।

विशेष :

  1. इस अवतरण में लेखक ने मैना दम्पति के गृह निर्माण की कथा को व्यक्त किया है।
  2. भाषा सहज एवं भावानुकूल है।

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(4) उस मैना को क्या हो गया है, यही सोचता हूँ। क्यों वह दल से अलग होकर अकेली रहती है ? पहले दिन देख था संसार के पेड़ के नीचे मेरे बगीचे में। जान पड़ा जै एक पैर से लंगड़ा रही हो। इसके बाद उसे रोज सबेरे देखन हूँ संगीहीन होकर कीड़ों का शिकार करती फिरती है। चढ़ जाती है बरामदे में। नाच-नाचकर चहलकदमी किया करती है, मुझसे जरा भी नहीं डरती। क्यों है ऐसी दशा इसकी? समाज के किस दंड पर उसे निर्वासन मिला है, दल के किस अविचार पर उसने मान किया है।

कठिन शब्दार्थ :
संसार = एक वृक्ष का नाम; संगीहीन = अपने नर पति के बिना; चहलकदमी = घूमना-फिरना; निर्वासन = पति से अलग; अविचार = अनुचित निर्णय पर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक इस अंश में यह बताता है कि गुरुदेव के बगीचे एवं बरामदे में एक अकेली मैना मादा इधर-उधर फुदकती रहती है। इसी मादा को आधार बनाकर गुरुदेव ने उस पर एक कविता लिखी थी। इसी कविता का भाव इस अंश में है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि गुरुदेव ने उस विधवा मैना पर जो कविता लिखी है उसका भाव यह है कि उस मैना को न मालूम क्या हो गया है, मैं यही सोचता रहता है। वह बेचारी अपने संगी-साथियों से अलग होकर क्यों रह रही है? प्रथम दिन मैंने उसे अपने बगीचे में संसार पेड़ के नीचे देखा था। ऐसा लग रहा था कि वह एक पैर से लंगड़ा रही हो। इसके बाद मैं उसे रोजाना सबेरे के समय देखता हूँ कि वह अपने नर साथी के अभाव में अकेली ही कीड़ों को पकड़कर खा रही है। कभी वह बरामदे पर चढ़ जाती है। वह मुझसे जरा भी भय नहीं करती है और मेरे सामने ही नाच-नाचकर इधर-उधर घूमा करती है। मैं उसकी इस दशा को देखकर दुःखी हो उठता हूँ और सोचने लग जाता हूँ कि पक्षी समाज ने कौन-सा दण्ड देकर उसे अकेला छोड़ दिया है या फिर पक्षी समाज का ऐसा कौन-सा विवेकहीन निर्णय था जिस पर वह अकेली ही मान किये अलग-अलग थिरक रही है।

विशेष :

  1. कविवर गुरुदेव की पैनी दृष्टि ने पक्षियों के व्यवहार को भी पढ़ लिया था।
  2. भाषा सहज एवं भावानुकूल है।

(5) इस बेचारी को ऐसा कुछ भी शौक नहीं है। इसके जीवन में कहाँ गाँठ पड़ी है, यही सोच रहा हूँ। “सवेरे की धूप में मानो सहज मन से आहार चुगती हुई झड़े हुए पत्तों पर कूदती फिरती है सारा दिन।” किसी के ऊपर इसका कुछ अभियोग है, यह बात बिलकुल नहीं जान पड़ती। इसकी चाल में वैराग्य का गर्व भी तो नहीं है, दो आग सी जलती आँखें भी तो नहीं दिखतीं।

कठिन शब्दार्थ :
सहज = स्वाभाविक; आहार = भोजन; अभियोग = मुकदमा; वैराग्य = विरक्ति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग:
इस अंश में लेखक ने उसी विधवा मैना का वर्णन किया है जो गुरुदेव के बगीचे में फुदकती रहती है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि यह विधवा ना अन्य मैनाओं से अलग रूप में दिखाई देती है। क्योंकि जहाँ अन्य मैनाएँ बक-बक करती हुई उछल-कूद कर रही हैं। वैसा व्यवहार इस मैना का नहीं है। मैं बार-बार यही सोचता रहता हूँ कि इसके जीवन में न मालूम कौन-सी गाँठ पड़ गई है जिसने इसकी सहज खुशी को छीन लिया है। वह प्रात:काल की धूप में सहज भाव से अपना आहार चुगती रहती हैं। वह पेड़ से गिरे हुए पत्तों पर पूरे दिन कूदती-फिरती रहती है। किसी अन्य जीव ने इसके साथ कुछ धोखा किया है, यह बात भी पता नहीं चलती है। उसकी चाल में विरक्ति का भाव भी दिखाई नहीं देता है और क्रोध के कारण उसकी दोनों आँखें जलती हुई भी दिखाई नहीं देती।

विशेष :

  1. लेखक पक्षी जगत् के जीवों के मनोभावों को बड़े ही सहज रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
  2. भाषा भावानुकूल है।

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