MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 5 नेताजी का तुलादान

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 5 नेताजी का तुलादान

नेताजी का तुलादान अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
नेताजी के तुलादान के अवसर पर सिंगापुर की सजावट का वर्णन कीजिए। (2012)
उत्तर:
नेताजी (सुभाषचन्द्र बोस) के तुलादान के अवसर पर सिंगापुर की सजावट की सुन्दरता चारों ओर बिखरकर सभी को विमुग्ध कर रही थी। सिंगापुर एक उपवन की रौनक को अपने अन्दर समेटे हुए था। इस दिन अर्थात् 23 जनवरी, सन् 1897 ई. को एक छोटी-सी कली चटककर खिली थी अर्थात् इस दिन सुभाष बाबू का जन्म हुआ था। हर एक व्यक्ति के चेहरे पर एक जोश, ताजगी छाई हुई थी। आज क्योंकि नेताजी का जन्म दिन है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में व्याप्त खुशी और उल्लास भरा वातावरण अपने आप में कहीं पर समा नहीं रहा है। अर्थात् लोगों के मन में खुशी और उल्लास का उफान उमड़ रहा है। इस प्रकार सिंगापुर का कोना-कोना मतवालेपन से भीगा हुआ सा लग रहा है। सिंगापुर की हर एक गली, बाजार और चौराहे जनता ने सजाए हुए थे। प्रत्येक घर में खुशी का मंगलाचार हो रहा था। बधाइयाँ परस्पर दी जा रही थीं। भारत के प्रत्येक प्रान्त के निवासियों ने खासकर युवतियों ने अपने पुराने वस्त्र उतारकर नये वस्त्र धारण किये हुए थे। प्रत्येक व्यक्ति देशभक्ति के और देश की आजादी के तराने गा रहा था।

प्रश्न 2.
‘नेताजी का था जन्म दिवस, उल्लास न आज समाता था’ के अनुसार सिंगापुर के निवासियों के जोश और उल्लास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सिंगापुर में युवक-युवतियाँ ढोलक-मंजीरें की तान पर अपने गीत गा रहे थे। वे सब गोल घेरे में बैठे हुए थे। वे सभी पठानी गीत स्वर और लय में गा रहे थे जिससे सभी के हृदय उत्साह से भर उठते थे। सिंगापुर नगर एक फुलवारी में बदल गया था। फुलवारी में भिन्न-भिन्न रंग और सुगन्ध के फूल एक साथ खिल उठते हैं और उसकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी तरह भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त के लोग किसी भी जाति, धर्म, वर्ण, वेश धारण किये हों, वे सभी आपस में भारत की शोभा बढ़ाने वाले नागरिक हैं। महाराष्ट्र, बंगाल आदि सभी प्रान्तों की विशिष्ट धर्माचरण करती हुईं महिलाएँ इकतारा पर ध्वनि निकाल रही थीं। समर्थ स्वामी रामतीर्थ के प्रेरणादायी शब्दों का गायन किया जा रहा था। उनके मन फूले नहीं समा रहे थे। अपने-अपने इष्ट से मनौती मना रही थीं कि सुभाषचन्द्र बोस चिरंजीवी हों, भारत अपनी आजादी प्राप्त करे। हे कात्यायनी दुर्गे, भारतवर्ष में प्रजातन्त्र फैल जाए। सिंगापुर का प्रत्येक स्त्री-पुरुष, बालक-बालिका, जवान और वृद्ध उल्लसित दीख रहा था।

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प्रश्न 3.
नेताजी के तुलादान में क्या-क्या वस्तुएँ अर्पित की गई थीं? (2015)
उत्तर:
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के तुलादान के लिए एक फूलों से सुसज्जित तुला सामने आई। तुलादान के लिए वहाँ ठोस पदार्थ लाए गये थे। सुभाष बाबू एक महान शक्ति के रूप में उस तुला के एक पलड़े में विराजमान थे। दूसरे पलड़े को सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात से बाजी लगाते हुए भरा जाता था। इस तुलादान के अवसर पर मन्त्रोचार से मण्डप को पवित्र किया गया था। सभी लोग प्रसन्न थे। चारों ओर शंखध्वनि मधुर-मधुर उठ रही थी। ऐसे सुखद और उत्साहवर्द्धक पवित्र बेला में कुन्दन के समान काया वाले सुभाष बाबू उस तुला के एक पलड़े से मुस्कान भर रहे थे।

सर्वप्रथम एक वृद्ध औरत ने स्वर्ण की ईंटों से तुलादान किया। गुजरात की एक माँ भी. पाँच ईंटें सोने की लाई थी। वहाँ उपस्थित सभी महिलाओं ने, युवतियों ने एक-एक करके अपने आभूषण उतारकर तुलादान में दिये। कोई तो अपनी मुदरी, छल्ले, कंगन, बाजूबन्द आदि का दान कर रही थी। किसी-किसी ने हार-मालाएँ, गले की जंजीरें, तलवार की सोने की गूंठें, सोने के सिक्के, कर्ण फूल, ताबीज आदि तुलादान में प्रदान कर दिये।

आज के दिन इतने स्वर्ण आदि का दान भी तुच्छा दिख रहा था क्योंकि हिन्दुस्तान भर में और प्रत्येक हिन्दुस्तानी के मन में बलिदान का जज्बा हावी था।

प्रश्न 4.
नेताजी ने टोपी उतारकर किस महिला का सम्मान किया था और क्यों? लिखिए। (2008, 09, 13)
उत्तर:
तुलादान के स्थल पर कप्तान लक्ष्मी को एक कोने से उसी समय कुछ सिसकियाँ सुनाई देने लगी। यह सिसकियाँ उस तरुणी की थी, जिसका पति कल ही युद्धस्थल पर कठिन काल के द्वारा निगल लिया गया था। उसका जूड़ा खुला हुआ था, उसकी आँखें सूजी हुई और लाल हो रही थीं। वह तरुणी अपने साथ धन सम्पत्ति लिए हुए थी; जिसे वह तुलादान में देने के लिए लेकर आई थी। नेताजी सुभाष बाबू ने जब उस तरुणी को देखा तो उन्होंने अपनी टोपी उतार ली और उस महिला का बहुत सम्मान किया। उसने अपने पति को आजादी की बलि वेदी पर कुर्बान कर दिया था। उस महिला ने अपने काँपते हाथों से तुला के पलड़े में अपना शीशफूल रख दिया। यह उस महिला के सौभाग्य का चिह्न था। जैसे ही उसने उस शीशफूल को पलड़े में रखा तो तुला का काँटा सहम गया और कम्पित होने लगा। (उस तरुणी का तुलादान सबसे गौरवशाली और गुरुतर था)। इसलिए नेताजी ने अपनी टोपी उतारकर उस तरुणी महिला का सम्मान किया था।

प्रश्न 5.
“हे बहन, देवता तरसेंगे, तेरे पुनीत पद वन्दन को।” किसने, किससे और क्यों कहा है? (2008, 14)
उत्तर:
“हे बहन! देवता तरसेंगे, तेरे पुनीत पद वन्दन को” यह कथन नेताजी श्री सुभाष बाबू का है। इन शब्दों को नेताजी ने उस तरुणी महिला से कहा है, जिसके पति का भारत माता की आजादी के लिए लड़ते-लड़ते बलिदान हो गया। उन्होंने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा कि “हम भारतवासी तुम्हारे इस करुण क्रन्दन को याद रखेंगे क्योंकि इससे हमें आजादी की लड़ाई में प्रेरणा मिलेगी।”

प्रश्न 6.
तराजू के पलड़े सम पर कैसे आये?
उत्तर:
तरुणी महिलाओं के सौभाग्यसूचक चिह्नों एवं स्वर्ण राशि को तुला के पलड़े में रखने पर भी पलड़े सम पर नहीं आए, तभी अपने शरीर से जर्जर हुई, काँपती एक वृद्धा अपनी छाती से लगाए हुए छिपाकर एक सुन्दर सा चित्र लेकर आई थी। वह वृद्धा व्याकुल थी। उसने कहा कि मैं अपने इकलौते पुत्र का चित्र लेकर आई हूँ। हे नेताजी ! यह मेरा सर्वस्व है, इसे लीजिए, ऐसा कहते हुए उस वृद्धा ने उस चित्र को पटक दिया तो चरमराकर शीशा टूट गया और चौखटा अलग हो गया। वह चौखटा स्वर्ण से निर्मित था। क्रोध में भरी शेरनी के समान उस वृद्धा ने गर्व से कहा कि मेरे बेटे ने आजादी के लिए फाँसी खाई थी। उसने मेरी कोख को कलंकित नहीं किया था। अब भी मेरा अन्य पुत्र होता तो उसे भी भारतमाता की भेंट चढ़ा देती। इसी बीच उस सोने के चौखटे को तुलादान के पलड़े में चढ़ाया तो तुला का काँटा सम पर आ गया। सुभाष बाबू उठे और उस वृद्धा के चरणों का स्पर्श करते हुए कहा कि “हे माँ ! मैं केवल आप जैसी माताओं के बलबूते पर धन्य हो गया।”

प्रश्न 7.
इस पाठ से हमें क्या प्रेरणा मिलती है ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ से हमें प्रेरणा मिलती है कि हम भारतवासी अपनी आजादी को अपना सर्वस्व निछावर करते हुए भी सुरक्षित रहेंगे। दुनिया में कोई भी हमारा शत्रु होगा तो हम उसे मुँह की खाने के लिए मजबूर कर देंगे तथा उसके मुख पर कालिख पोत देंगे।

‘भारत माता’ हमारी वन्दनीय माता है। हमने इसकी कोख से जन्म लिया है, इसकी मिट्टी, धान्य, जल और वायु से अपने आपको पोषित और पुष्ट किया है। बताओ फिर अपनी इस पुण्य प्रदायी माता की मुक्ति के लिए, उसकी आजादी की रक्षा के लिए हम किस महत्त्वपूर्ण वस्तु का बलिदान करने से मुख मोड़ेंगे? अर्थात् इसकी सुरक्षा के लिए अपने जीवन का दान करना भी कम महत्त्व का होगा, क्योंकि इस मातृभूमि के उपकार कहीं अधिकतर हैं, गुरुतर हैं।

नेताजी का तुलादान अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नेताजी का तुलादान’ कविता में नेताजी का जन्म दिवस किस देश में मनाने की बात कही गई है?
उत्तर:
उपर्युक्त कविता में नेताजी का जन्म दिवस सिंगापुर में बनाने की बात कही गई है।

प्रश्न 2.
इस कविता में नेताजी की किस प्रमुख सहयोगी एवं भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी का ज़िक्र आया है?
उत्तर:
इस कविता में नेताजी की प्रमुख सहयोगी और आजाद हिन्द फौज की महिला सिपाही कप्तान लक्ष्मी का ज़िक्र आया है।

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नेताजी का तुलादान पाठका सारांश

प्रस्तावना :
प्रात:काल का समय है, पूर्व दिशा से सूर्य की किरणें उगती हैं और सभी प्राणियों को आजादी का सन्देश देती हैं। उस सन्देश का अनुपालन सभी भारतीय करते हैं और आजादी के लिए प्रयास करने में जुट जाते हैं। प्रात:काल में खिली कली सभी लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरती है। सभी खुश हैं क्योंकि उस दिन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म दिन था। सिंगापुर की भूमि पर उनके जन्म दिन को मनाने के लिए लोग इकट्ठे हो रहे थे। हर गली, हर चौराहे पर, द्वार पर मंगलाचार हो रहे थे। सभी लोग अपनी-अपनी वेशभूषा में सुसज्जित थे। मदमस्त लोगों की भीड़ ढोलक, मंजीरे बजाकर नेताजी के जन्मोत्सव पर बधाइयाँ गा रही थीं। प्रत्येक प्रान्त के सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे थे। बसन्त का आगमन था।

परिचय :
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, सन् 1897 को कटक में हुआ था। भारतीय जन सुभाष की दीर्घ आयु, भारत की आजादी, भारत में प्रजातन्त्र के फलने-फूलने की कामना माँ कात्यायनी के मन्दिर में कर रहे थे। सुभाष जी ने ध्वज फहराया, तिरंगें फूलों का तुला बनाया गया। देश को आजाद कराने के लिए संकल्पित सैनिकों के संगठन के लिए धन की आवश्यकता को देश के प्रत्येक नागरिक ने अनुभव किया और नेताजी के जन्म दिन पर उनके भार के बराबर धन-सोना, चाँदी आदि सब कुछ एकत्र करने का विचार लोगों ने किया। इस धन से आजाद हिन्द फौज का संगठन किया गया। प्रत्येक महिला-युवती, विवाहिता, वृद्धा ने अपने सभी आभूषण तुलादान में प्रदान किए।

उत्साह :
प्रत्येक माँ ने, पत्नी ने, बहन ने, बाप ने, भाई ने अपने पुत्र, बेटे, पति, भाई को सैनिक रूप में सुभाष बाबू के जन्म दिन पर तुलादान में दे दिया। माँ ने बेटे को वचनबद्ध कराया कि वह मातृभूमि की आजादी की लड़ाई में अपनी माँ की पवित्र कोख को कलंकित नहीं करेगा। कुछ अपूती माँ दुर्गे महारानी से मनौती माँगती हैं कि माँ, मुझे पुत्रवती बना, मैं उसे अपनी भारत माता की भेंट चढ़ाना चाहती हूँ। तुलादान की क्रिया सम्पन्न हुई और नेताजी के वचन से भी अधिक धन तुलादान में प्राप्त हुआ।

उपसंहार :
चारों ओर स्वर गूंजने लगा कि दुश्मन जीवित नहीं रहेगा। भारत आजाद होकर रहेगा !!!

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 4 असफलता दिखाती है नयी राह

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 4 असफलता दिखाती है नयी राह

असफलता दिखाती है नयी राह अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
डॉ. कलाम बचपन में कौन-सी पौराणिक कहानी सुना करते थे? उसका उन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
डॉ. कलाम को उनके पिताजी अबूबेन आदम की एक पौराणिक कथा सुनाया करते थे। एक रात अबू एक सपना देखकर जाग जाता है। सपने में वह देखता है कि एक फरिश्ता सोने की किताब में उन लोगों के नाम लिख रहा है जो ईश्वर से प्यार करते हैं। अबू उस फरिश्ते से पूछता है कि क्या खुद उसका नाम भी इस सूची में है। इस पर फरिश्ता नकारात्मक उत्तर देता है। तब निराश मगर खुशी से अबू कहता है कि मेरा नाम उनमें लिख दो, जो उसके अनुयायियों से प्रेम करते हैं। फरिश्ते ने नाम लिख दिया और गायब हो गया। अगली रात फिर फरिश्ता आया और उन लोगों के नाम दिखाए जिन्हें ईश्वर के प्रेम से आशीर्वाद मिला था। इसमें अबू का नाम सबसे ऊपर था।

इस पौराणिक कहानी का कलाम पर इतना प्रभाव पड़ा कि वे प्रत्येक जगह ईश्वर की उपस्थिति मानते थे और यह मानते थे कि सभी प्राणी ईश्वर की कृति हैं। उन्हें परस्पर सभी से प्रेम करना चाहिए। इन्हें अल्लाह में गहरी आस्था है।

प्रश्न 2.
परिवार में लगातार होने वाली मौतों के बाद, डॉ. कलाम की दिनचर्या में क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर:
डॉ. कलाम के परिवार में लगातार तीन वर्ष तक तीन मौतें हो जाने के बाद, उनमें अपने काम के प्रति पहले से ज्यादा प्रतिबद्धता आ गई। उन्होंने अपने लिए वह सब कुछ तलाश लिया था जिससे उन्हें आगे बढ़ना था, तरक्की करनी थी। एस. एल. वी. डॉ. कलाम के लिए एक ईश्वर द्वारा प्रदत्त मिशन था। इसके क्षेत्र में प्रगति करना उनका उद्देश्य था, ध्येय बन चुका था। इसलिए उन्होंने अपनी सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी। यद्यपि उनकी अन्य गतिविधियाँ अधिक नहीं थीं, फिर भी जो कुछ थीं, उनको भी समाप्त कर दिया। वे शाम को बैडमिन्टन खेला करते थे, उसका खेलना भी बन्द हो गया। उन्हें साप्ताहिक अथवा अन्य अवकाश मिला करते थे, उन्हें भी लेना बन्द कर दिया। वे अपने परिवार अथवा रिश्तेदारी में यदा-कदा आया-जाया करते थे, वह भी बन्द कर दिया। प्रतिदिन मुलाकातें जिनसे हो सकती थीं, प्रायः वे उनसे मिलने जाया भी करते थे, इस श्रेणी में आने वाले दोस्तों और सहयोगियों से मिलने जाना अथवा किसी काम के सन्दर्भ में उनके यहाँ पहुँच जाना हुआ करता था, वह सब बन्द हो गया।

उन्होंने अपने मिशन को सफल बनाने की इच्छा से अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित्त होकर स्वयं को समर्पित कर दिया। डॉ. कलाम सरीखे व्यक्तियों को कार्याधिकता से ग्रसित व्यक्ति कहा जाता है। उन्हें ऐसा कहे जाने के लिए विरोध करना उचित लगता था। इसका एक कारण है। कार्याधिकता से ग्रसित के रूप में पुकारा जाना एक बीमारी (रुग्णता) का प्रतीक बनता है। यह शब्द किसी बीमारी का द्योतक है। जबकि प्रतिबद्धता (वचनबद्धता), एकाग्रचित्तता अपने लक्ष्य (उद्देश्य) को प्राप्त करने का साधन हुआ करता है, किसी रोग का सूचक नहीं। डॉ. कलाम ज्यादा से ज्यादा वही करना चाहते थे, जिससे उन्हें दुनिया में सबसे ज्यादा खुशी प्राप्त हो अर्थात् अधिक से अधिक कार्य करने से उद्देश्य के निकट पहुँचा जा सकता है। सफलता प्राप्त हो सकती है। सफलता हमें प्रसन्नता देती है।

ऐसे व्यक्ति जो अपने पेशे में शीर्ष तक पहुँचना चाहते हैं, उनके अन्दर पूर्ण वचनबद्धता का मूलभूत गुण विकसित कर लेना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण क्षमता के साथ कार्य सम्पादन की इच्छा रखता है, उसमें शायद ही कोई अन्य इच्छा जन्म लेती हो। पुरुष हो अथवा स्त्री उन सबमें वचनबद्धता का गुण अवश्य होना चाहिए।

डॉ. कलाम के अन्दर भी इन तीन वर्षों का दुःखद घटनाओं के बाद शीर्ष पर पहुँचने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता गया।

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प्रश्न 3.
रामेश्वरम् मन्दिर के पास डॉ. कलाम संध्या का समय किस प्रकार व्यतीत करते थे? (2011)
उत्तर:
डॉ. कलाम अपने बचपन की स्मृतियों को पुनः जाग्रत करके स्पष्ट रूप से बतलाते हैं कि रामेश्वरम् मन्दिर के आस-पास ही घूमा करते थे। समुद्र के आस-पास की बलुई मिट्टी चाँदनी रात में चमकती दिखाई देती थी। डॉ. कलाम को सान्ध्यकालीन वातावरण बहुत ही आकर्षित करता था। इसके अतिरिक्त समुद्र की उठती, इठलाती लहरें एक विशेष प्रकार का नृत्य प्रस्तुत करती जान पड़ती थीं। वहाँ का असीम आकाश खुला हुआ आनन्दातिरेक से डॉ. कलाम को आत्मविभोर कर देता था। अनन्त आकाश में बिखरे हुए टिमटिमाते तारे अपनी मद्धिम रोशनी विकीर्ण करते हुए धीमे से उनके कानों में कुछ रहस्यपूर्ण सन्देश देते प्रतीत होते थे। डॉ. कलाम के साथ उनके बहनोई उन्हें सान्ध्यकालीन डूबते क्षितिज को दिखाने के लिए ले जाया करते थे। उनके बहनोई का नाम जलालुद्दीन था।

डॉ. कलाम की अन्तश्चेतना पर बचपन में प्रकृति की गोद में रहने का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उनमें चिन्तन की गहराई परिपक्वता को प्राप्त थी।

प्रश्न 4.
एस. एल. वी.-3 की तैयारी में डॉ. कलाम किस तरह व्यस्त रहते थे? (2017)
उत्तर:
एस. एल. वी.-3 पर अभी काम चल रहा था। साथ ही इसकी उप-प्रणालियों को तैयार करने का काम भी पूरा होने जा रहा था। जून 1974 ई. में कुछ जटिल प्रणालियों के परीक्षण के लिए सैंटोर साउण्डिग रॉकेट छोड़ा। इन उपप्रणालियों में जो सम्मिश्र पदार्थ, कन्ट्रोल इन्जीनियरिंग और सॉफ्टवेयर प्रयोग में लाए गये थे, उनका देश में पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया था, परीक्षण पूरी तरह सफल रहा, तब तक भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम साउण्डिग रॉकेटों से आगे नहीं बढ़ा था और यहाँ तक कि जानकार लोग भी इसकी कोशिशों को देखने-समझने और स्वीकार करने को राजी नहीं थे, पहली बार इन्हें राष्ट्र के विश्वास से प्रेरणा मिली थी। एस. एल. वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट के ऊपरी हिस्से का विकास डायामाण्ट की तरह ही तैयार किया गया। इसका उड़ान परीक्षण फ्रांस में होना था। इसमें कई समस्याएँ आ गई थीं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए डॉ. कलाम को तत्काल फ्रांस जाना था।

एस. एल. वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट के सफल परीक्षण के बाद फ्रांस से लौटने पर एक दिन ब्रह्म प्रकाश ने वनहर फॉन ब्रॉन के पहुँचने के बारे में सूचना दी। रॉकेट विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाला हर व्यक्ति फॉन ब्रॉन के बारे में जानता है। फॉन ब्रॉन को मद्रास से थुम्बा लाने को कहा तो डॉ. कलाम बहुत ही रोमांचित हो उठे, चेन्नई से त्रिवेन्द्रम तक डॉ. कलाम व अन्य एयरक्राफ्ट से गये। इस यात्रा में नब्बे मिनट का समय लगा। फॉन-ब्रॉन ने काम के विषय में पूछा। उन्होंने इस सन्दर्भ में एक छात्र की तरह जानकारी ली। डॉ. कलाम को यह पता नहीं था कि रॉकेट विज्ञान के जन्मदाता इतने विनम्र, ग्रहणशील एवं प्रेरणा देने वाले होंगे। पूरी उड़ान के दौरान बहुत अच्छा महसूस किया। डॉ. कलाम को मिसाइलों के इतने बड़े ज्ञाता से बात करके पता चला कि वे अपनी प्रशंसा के इच्छुक नहीं हैं।

फॉन ब्रॉन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एस. एल. वी.-3 एक विशुद्ध भारतीय डिजाइन है। आपके सामने समस्याएँ भी आ सकती हैं। इसके लिए तुम्हें ध्यान रखना है कि व्यक्ति का सफलताओं से ही नहीं, असफलताओं से भी निर्माण होता है। उन्होंने आगे कहा कि रॉकेट विज्ञान में कठोर परिश्रम और प्रतिबद्धता की जरूरत होती है। साथ ही उस परिश्रम के द्वारा बड़ा सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। इस विज्ञान को पेशा न बनाकर अपना धर्म समझो।

सन् 1979 ई. में छः सदस्यों की टीम नियन्त्रण प्रणाली का रूपान्तर तैयार करने में लगी थी। इस प्रणाली के बारह बाल्वों में से एक को ठीक करते समय नाइट्रिक एसिड का टैंक फट गया। एसिड टीम सदस्यों पर गिरा। वे सभी गम्भीर रूप से घायल हो गये। उन सभी को डॉ. कलाम ने त्रिवेन्द्रम् मेडिकल कॉलेज ले जाकर इलाज के लिए भर्ती कराया। घायल टीम के सदस्य दर्द से कराह रहे थे, लेकिन उपचार उचित होने से उन्हें राहत मिली। डॉ. कलाम इस दौरान बड़े चिन्तित और व्यथित रहे। परीक्षण काम रुक गया और विलम्ब हो गया। इस दुर्घटना से असफलता होने से हमें साहस अधिक मिला और सोचा कि हमारी टीम चट्टान की तरह साथ रहने में मजबूत है। अब एस. एल. वी.-3 का ठोस आकार आने लगा और उसकी परियोजना अब सफल हो रही थी।

एस. एल. वी.-3 का प्रायोगिक उड़ान परीक्षण 10 अगस्त, 1979 को निर्धारित किया गया। श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केन्द्र से समेकित प्रक्षेपण यान विकसित करना था। उड़ान प्रणालियों में-स्टेज मोटर्स, निर्देशन व नियन्त्रण प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली को जाँचना था। चैक आउट, टैकिंग, टेलीमीटरी एवं आँकड़ों से सम्बन्धित सुविधाएँ भी इस केन्द्र में विकसित करनी थीं। इस प्रकार तेईस मीटर लम्बा, चार चरणों वाला एस. एल. वी.-3 रॉकेट सुबह सात बजकर अट्ठावन मिनट पर छोड़ा गया। इसका वजन सत्रह टन था। प्रक्षेपण के तुरन्त बाद ही इसकी प्रणालियों ने अपने काम शुरू कर दिये।

इसकी उड़ान निश्चित हो जाने पर, इसमें अचानक कोई गड़बड़ी आ गई। उम्मीदों पर पानी फिर गया। रॉकेट का दूसरा चरण नियन्त्रण से बाहर हो गया। 317 सेकण्ड के बाद ही उड़ान बन्द हो गई और पूरा यान श्रीहरिकोटा से पाँच सौ साठ किमी दूर समुद्र में जा गिरा।

इस घटना से इनकी टीम को गहरा सदमा लगा। डॉ. कलाम स्वयं अपने पर नाराज हुए और निराशा हाथ लगी। उन्हें लगा कि उनके पैर थक गये हैं। उनमें पीड़ा थी। इस समस्या का असर शरीर की अपेक्षा मस्तिष्क में बहुत अधिक था।

प्रश्न 5.
जो व्यक्ति शीर्ष पर पहुँचना चाहते हैं, उनमें कौन-कौन से गुण होने चाहिए ? इसे डॉ. कलाम के जीवन के आधार पर समझाइए। (2008, 09)
उत्तर:
जो लोग अपने पेशे में शीर्ष पर पहुँचना चाहते हैं। उनमें पूर्ण वचनबद्धता का मूलभूत गुण होना चाहिए। हम अपनी सफलता चाहते हैं तो हमें यह भरोसा करना पड़ेगा कि हम जो भी काम करना चाहते हैं, तो हमें अपनी क्षमताओं पर भरोसा व दृढ़ आस्था होनी चाहिए।

अपनी क्षमताओं को जागृत कर, अपने निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जो इच्छा उठती है, तो बाद में फिर कोई भी इच्छा जन्म नहीं लेती है। डॉ. कलाम के साथ काम करने वाले व्यक्तियों को प्रत्येक सप्ताह में चालीस घण्टे काम करना पड़ता था। इस प्रकार उन्हें चालीस घण्टे तक काम करने का पैसा दिया जाता था। डॉ. कलाम बताते हैं कि वे ऐसे व्यक्तियों से भी परिचित हैं, जो सप्ताह में कम से कम साठ, अस्सी और यहाँ तक है कि वे सौ घण्टे प्रति सप्ताह काम करते थे। इसके अनुसार उन्हें पैसा दिया जाता था। वे जानते थे और समझते भी थे कि उनका काम रोमांच पैदा करने वाला है, साथ ही साथ चुनौतियों से भरा है। इसलिए इस काम से उन्हें सबसे अच्छा प्रतिफल प्राप्त होगा। इस तरह के वे पुरुष या स्त्री जो भी हों वे चुनौती भरे कामों को हाथ में लेते हैं। उन्हें अपने इन कामों में पूर्ण सफलता मिलती है क्योंकि उनमें पूर्ण-रूपेण वचनबद्धता पाई जाती है।

जिन व्यक्तियों में अपने कार्य के पूर्ण करने की वचनबद्धता होती है तो उनमें ऊर्जा अधिक होती है। उनका काम जब चुनौतीपूर्ण होता है, तो उन्हें अपने आप को पूर्ण स्वस्थ बनाए रखना पड़ेगा। पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए विशेष ऊर्जा की जरूरत होती है।

शीर्ष पर पहुँचने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की परम आवश्यकता है। यह काम माउण्ट एवरेस्ट पर चढ़ने का अथवा अपने कार्य क्षेत्र का शीर्ष हो सकता है। परन्तु हर व्यक्ति में ऊर्जा अलग-अलग मात्रा में होती है, जो जन्म के साथ ही मिलती है। अत: जो व्यक्ति सबसे पहले प्रयास करेगा और अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल करेगा, वही सबसे पहले और शीघ्रता से अपने जीवन को सुव्यवस्थित कर पायेगा।

प्रश्न 6.
डॉ. कलाम का जीवन संघर्षों के मध्य उभरती प्रतिभा की कहानी है, उदाहरण देते हुए समझाइए। (2008, 16)
उत्तर:
डॉ. कलाम का सारा जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। उनके मध्य भी उन्होंने निराशा या हार नहीं मानी। अनेक बाधाओं के मध्य अपनी प्रतिभा की ऊर्चस्वलता का प्रदर्शन करते ही रहे। वे अपने जीवन के शुरूआती पक्ष में वायु सेना में भर्ती होकर पायलट बनना चाहते थे। विमान उड़ाने की उनकी चाहत पूर्ण नहीं हो सकी। इसका एक कारण यह था कि चयन बोर्ड ने उन्हें उपयुक्त नहीं समझा। लेकिन देखिये, जो व्यक्ति अपनी युवावस्था में विमान चालक की क्षमताओं से रहित माना गया, वही अपनी वृद्ध अवस्था में ऐसे विमान में उड़ने लगा जो आवाज से भी तेज गति वाला था। इस प्रकार व्यक्ति अपने अन्तःस्थल की गहराई में इच्छा की पूर्ति किसी भी तरह और किसी भी अवस्था में पूर्ण करने की क्षमता विकसित कर लेता है। प्रश्न है केवल अपनी सद् इच्छाओं के प्रति सद्प्रयास करने एवं कथनी की प्रतिबद्धता का होना। इन्हीं बातों को, गुणों को डॉ. कलाम में हम देखते हैं और उन्हें वचनबद्धता और प्रतिबद्धता से शीर्ष तक पहुँचने में सफलता मिली।

प्रतिभा के विकास और उभार में पारिवारिक स्थिति और पैतृक योग कोई खास भूमिका नहीं निभाते। डॉ. कलाम पारिवारिक रूप से बहुत साधारण माता-पिता की सन्तान थे। बस, महत्त्वपूर्ण बात थी तो केवल महान विचारों को जीवन में स्थान देने की और उनके अनुसार कर्म करने की।

डॉ. कलाम के परिवार की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी जो उन्हें उत्तम साधन उपलब्ध करा पाती। उन्हें सही मार्गदर्शन देने वाला भी उनके परिवार में कोई नहीं था। एक महानुभाव जलालुद्दीन महोदय थे भी, लेकिन अल्लाह ने उन्हें असमय ही अपने पास बुला लिया। जलालुद्दीन डॉ. कलाम के बहनोई थे। वे ही इनके लिए पुस्तकों का खर्च जुटाते थे। व्यय करने के लिए रुपये-पैसे भी वही जुटाते थे। यहाँ तक है कि सांताक्रूज हवाई अड्डे पर इनको विदा करने के लिए वे ही आया करते थे।

श्री जलालुद्दीन ही इन्हें रामेश्वरम् के आस-पास घुमाते थे। चाँदनी रात में चमकती मिट्टी, नाचती हुई समुद्री लहरें, आकाश में टिमटिमाते सितारे उन्हें ऊँचा उठने और ऊँची उड़ान भरने के सपने उनमें पैदा करते थे। चमकती मिट्टी उन्हें प्रेरित करती कि अपनी मातृभूमि की सेवा करने से तुम्हें भी वही चमक प्राप्त होगी। अब उन्हें लगने लगा कि वे काल के भंवर में फंस गये हैं।

डॉ. कलाम ने हिम्मत नहीं हारी। वे अपने अन्दर ऊर्जावान बने रहे। उस ऊर्जा ने इनकी प्रतिभा को शक्ति प्रदान की जिसके कारण सांसारिक आपदाओं से, बाधाओं से लड़ने की हिम्मत और हौंसला बना रहा। जो व्यक्ति हौंसला पस्त नहीं होता वह उन्नति के शिखर पर विराजमान होकर ही रहता है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं, “एस. एल. वी.-3 को तैयार करना कष्ट साध्य प्रक्रिया थी।” …..” इसी बीच उनके बहनोई और उन्हें रास्ता दिखाने वाले जनाब अहमद जलालुद्दीन जब इस दुनिया से चले गये थे, तो वे एकदम थम से गये, कुछ भी सोच नहीं पाये, काम करने में ध्यान लगाने की कोशिश की, लेकिन अपने आप में बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। तब उन्हें इस बात की अनुभूति हुई कि “अहमद जलालुद्दीन के साथ मेरा भी एक हिस्सा चला गया है।”

अहमद जलालुद्दीन की मौत के बाद उनके पिता का देहावसान होना और फिर उनकी माँ का भी चला जाना, इस तरह तीन वर्ष में लगातार तीन मौतों के दौर से गुजरना और एस. एल. वी. -3 का निर्माण व परीक्षण व्यवस्था का कार्य सभी विपरीत स्थितियाँ थीं; जिनमें से डॉ. कलाम धैर्य, उद्देश्य के प्रति आस्था और वचनबद्धता तथा ध्येय प्राप्ति की प्रतिबद्धता के गुणों के कारण आगे निकल सकें।

उपर्युक्त वर्णन से सिद्ध है कि डॉ. कलाम का जीवन संघर्षों के मध्य उभरती प्रतिभा की कहानी है।

असफलता दिखाती है नयी राह अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम क्या बनना चाहते थे?
उत्तर:
डॉ. कलाम वायुसेना में भर्ती होना चाहते थे तथा विमान उड़ाना चाहते थे, यद्यपि चयन बोर्ड ने उन्हें इसके उपयुक्त नहीं पाया था।

प्रश्न 2.
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के पिताजी का नाम क्या था ? वह कितने वर्ष तक जीवित रहे?
उत्तर:
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के पिताजी का नाम जैनुल आबदीन था। सन् 1976 में रामेश्वरम् में एक सौ दो वर्ष तक रहने के पश्चात् उनका निधन हो गया।

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असफलता दिखाती है नयी राह पाठ का सारांश

प्रस्तावना :
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का नाम कौन नहीं जानता ? वे भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति रहे हैं। वे प्रारम्भ में वायुसेना में भर्ती होना चाहते थे। लेकिन चयन बोर्ड ने उन्हें उपयुक्त नहीं पाया। उस युवक का सपना टूट गया। वह वायु सेना में भर्ती होकर विमान उड़ाना चाहता था। लेकिन उसी युवक ने, जब वह कुछ बूढ़ा हो रहा था, तब आवाज से भी तेज गति वाले विमान उड़ाकर अपने सपने को पूरा किया। डॉ. कलाम का जन्म एक कस्बे के साध पारण से परिवार में हुआ था। कलाम अपने जीवन में बड़े सपने देखते थे। साथ ही, उन्हें पूरा करने की भी जिद करते और सफलता प्राप्त करते थे। ‘अग्नि की उड़ान’ उनकी आत्मकथा है। यहाँ इस उड़ान के कुछ रोमांचक अंश प्रस्तुत हैं-

एस. एल. वी-3 पर अभी काम चल रहा था। इसकी उप-प्रणालियों को तैयार करने का काम भी पूरा होने जा रहा था। सन् 1974 के जून महीने में कुछ जटिल प्रणालियों के परीक्षण के लिए “सैंटोर साउण्डिंग रॉकेट” छोड़ा गया। इन उप-प्रणालियों में जो सम्मिश्र पदार्थ, कन्ट्रोल इन्जीनियरिंग और सॉफ्टवेयर प्रयोग में लाये गये, उनका देश में पहली बार प्रयोग किया गया। परीक्षण सफल रहा। राष्ट्र के विश्वास से प्रेरणा मिली।

कष्टसाध्य प्रक्रिया :
एस. एल. वी.-3 को तैयार करना एक कष्टसाध्य प्रक्रिया थी। एक दिन डॉ. कलाम और उनकी टीम पहले चरण की मोटर परीक्षण के काम में पूरी तरह तल्लीन थी। तभी डॉ. कलाम को सूचना मिली कि उनके बहनोई अहमद जलालुद्दीन अब इस दुनिया में नहीं रहे। इस खबर से कलाम महोदय कुछ समय तक अस्त-व्यस्त रहे। काम में उनका मन नहीं लगा क्योंकि मुः जलालुद्दीन डॉ. कलाम के जीवन का अहम् हिस्सा थे।

बचपन की यादें :
डॉ. कलाम को अपने बचपन की स्मृतियाँ उभर कर आने लगीं। मुहम्मद जलालुद्दीन उन्हें संध्याकाल में रामेश्वर मन्दिर के आस-पास घुमाने ले जाते थे। चाँदनी रात में चमकती समुद्र की रेत और नृत्य करती समुद्री लहरें, अनन्त आकाश से टिमटिमाते तारों का प्रकाश तथा डूबते सूरज के क्षितिज को दिखाने ले जाते थे। वे ही कलाम साहब के लिए पुस्तकों का बन्दोबस्त करते थे। सांताक्रूज हवाई अड्डे पर इन्हें विदा करने के लिए जलालुद्दीन (डॉ. कलाम के बहनोई) ही जाया करते थे।

डॉ. कलाम का अधीर होना :
मुहम्मद जलालुद्दीन का इस दुनिया से चला जाना कलाम को ऐसा लगा मानो समय और काल के भंवर में उन्हें फेंक दिया हो। उनके पिता की उम्र सौ साल से अधिक रही होगी। उनके दामाद का जनाजा उठाना था जो उनकी उम्र से आधी उम्र के थे। कलाम की बहन जोहरा की आत्मा कलप रही थी। उसका चार साल का बेटा भी चल बसा था, उसके चले जाने के घाव अभी भरे भी नहीं थे। ये सभी दृश्य कलाम की धुंधलाई सी आँखों के सामने तैर रहे थे। कलाम ने स्वयं को सम्भाला और परियोजना के उप निदेशक डॉ. एस. श्रीनिवास को अपनी गैरहाजिरी में काम को देख लेने के बारे में निर्देश दिये।

अल्लाह में गहरी आस्था :
बसें बदलते हुए रामेश्वर का सफर तय किया। डॉ. कलाम के पिता इनका हाथ थामे थे। उनकी आँखों में कोई भी आँसू नहीं था। पिता बोले देखो ईश्वर किस प्रकार अन्धेरा कर देता है। जलालुद्दीन तुम्हें रास्ता दिखाने वाला सूरज था, वही गहरी नींद में सो गया। वह पूरी तरह शान्त और अचेतन है। अल्लाह की नियति के आगे कुछ नहीं कर सकते। बेटे कलाम! अल्लाह पर भरोसा रखो।

वैराग्यभाव की जागृति :
डॉ. कलाम थुम्बा लौट आये। उन्हें हर काम निरर्थक लगा। एक वैराग्य जैसा अनुभव हुआ।

पिता की मृत्यु :
सन् 1976 ई. में डॉ. कलाम के पिता का इन्तकाल हो गया। वे रामेश्वरम् की भूमि पर एक सौ दो वर्ष तक रहे। उनका नाम जैनुल आबदीन था।

प्राणिमात्र से प्रेम :
डॉ. कलाम के पिता सभी प्राणियों से प्रेम करते थे। इस दुनिया के प्राणी ईश्वर की प्रतिकृति हैं। इनसे प्रेम करना ईश्वर से प्रेम करना है। ऐसा डॉ.कलाम के पिता का जीवन दर्शन था।

एस. एल.वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट का निर्माण व परीक्षण :
एस. एल. वी.-3, ए. पी. जी. रॉकेट का निर्माण सफलतापूर्वक किया गया और इसका परीक्षण विदेश में फ्रांस की भूमि पर किया गया। इस परीक्षण में आई हुई जटिल समस्याओं का निराकरण करने डॉ. कलाम को फ्रांस तत्काल जाना था। परन्तु उसी दिन इनकी माँ के इन्तकाल की खबर दी गई। डॉ. कलाम नागर कोइल से रामेश्वर पहुँचे। उनका अन्त समय आ गया था। डॉ. कलाम ने उसी मस्जिद में प्रार्थना की जहाँ उनके पिताजी हर शाम इन्हें ले जाया करते थे। कलाम ने ईश्वर से क्षमा माँगी। ईश्वर ने जो उन्हें जिम्मेदारी दी, उसका निर्वाह डॉ. कलाम ने ईमानदारी से किया। कलाम ने स्वयं को समझाते हुए कहा कि शोक क्यों मना रहे हो ? उस काम पर ध्यान दो जो तुम्हारे लिए पड़ा है। अपने कार्यों के करने से ही परमानन्द प्राप्त करो। मस्जिद में कलाम ने इन शब्दों को सुना। मस्जिद से बाहर आकर, अपने घर की ओर देखे बिना ही वहाँ से चल दिये।

अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्धता :
डॉ. कलाम के घर में तीन वर्ष में तीन मौतें हो गईं। फिर भी वे अपने काम में उनकी प्रतिबद्धता बनी रही। एस. एल. वी. उनके लिए ईश्वरीय मिशन है और उसकी प्रगति उनका उद्देश्य बन गया था। उन्होंने बैडमिन्टन खेलना बन्द कर दिया। साप्ताहिक छुट्टियाँ भी नहीं करते। रिश्तेदारी और मित्रों के यहाँ आना-जाना सब छूट गया। डॉ. कलाम के अनुसार वचनबद्धता, एकाग्रचित्तता लक्ष्य प्राप्त करने के साधन हैं।

नियन्त्रण प्रणाली का उड़ान रूपान्तर :
सन् 1979 ई. में छः सदस्यों की टीम दूसरे चरण की जटिल नियन्त्रण प्रणाली की उड़ान रूपान्तर तैयार करने में लगी थी। परन्तु अचानक ही लाल धुएँ वाले नाइट्रिक एसिड (आर. एफ. एन. ए.) का टैंक फट गया और नाइट्रिक एसिड टीम के सदस्यों पर जा गिरा। टीम के सदस्य गम्भीर रूप से जल गये। कलाम सभी को त्रिवेन्द्रम मेडीकल कॉलेज ले गये और उनका इलाज कराया।

इस टीम में कलाम को गहरा विश्वास हो गया कि ये सभी सफलता और असफलता में एक चट्टान की भाँति खड़े रह सकते हैं। जीवन एक प्रवाह है जिसमें काम करते-करते आराम और आनन्द की अनुभूति होती है। सन् 1979 के मध्य तक एस. एल. वी. का सपना पूरा हो गया और श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण केन्द्र से एल. एल. वी.-3 का प्रायोगिक उड़ान परीक्षण 10 अगस्त, 1979 को निर्धारित किया गया।

उपसंहार :
पहले चरण का कार्य पूर्ण सफल हुआ परन्तु दूसरे चरण में परिवर्तित करने का कार्य एस. एल. वी.-3 को उड़ते देखना उम्मीदों से पीछे रहा। 317 सेकण्ड के बाद उड़ान बन्द हो गई और चौथे चरण सहित पूरा यान श्रीहरिकोटा से पाँच सौ साठ किमी. दूर समुद्र में आ गिरा। इस घटना से हम सभी निराश हुए। परन्तु डॉ. ब्रह्म प्रकाश के साथ डॉ. कलाम के अन्दर एक विश्वास जगा और इसी विश्वास से नई सफलताओं के क्षितिजों तक पहुँचा जा सकता है।

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MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants

Sexual Reproduction in Flowering Plants Important Questions

Sexual Reproduction in Flowering Plants Objective Type Questions

Question 1.
Choose the correct answers:

Question 1.
Apomixis in plants means the development of a plant :
(a) Fusion of gametes
(b) Without fusion of gametes
(c) Stem cuttings
(d) Root cuttings.
Answer:
(b) Without fusion of gametes

Question 2.
Polygonum type of embryo sac is :
(a) 8 – nucleated
(b) 16 – nucleated
(c) 24 – nucleated
(d) 32 – nucleated
Answer:
(a) 8 – nucleated

Question 3.
In angiosperms, female gametophyte is represented by :
(a) Synergids
(b) Carpel
(c) Egg
(d) Pollen grain
Answer:
(c) Egg

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Question 4.
The term ‘xenia’ denotes the effect of pollen on the :
(a) Endosperm
(b) Flower
(c) Somatic tissue
(d) Root.
Answer:
(a) Endosperm

Question 5.
The fusion of male gamete with the secondary nucleus of the embryo sac is a process of:
(a) Fertilization
(b) Double fertilization
(c) Parthenocarpy
(d) Parthenogenesis.
Answer:
(b) Double fertilization

Question 6.
Which of the following is formed as a result of double fertilization :
(a) Endosperm
(b) Megaspore
(c) Seed
(d) Fruit.
Answer:
(a) Endosperm

Question 7.
What is the fusion product of polar nucleus and male gamete :
(a) Secondary nucleus
(b) Triple fusion
(c) Primary endosperm nucleus
(d) Zygote.
Answer:
(c) Primary endosperm nucleus

Question 8.
In which of the following plants, water is not necessary for fertilization :
(a) Vallisneria
(b) Pisus sativum
(c) Funaria
(d) Fern.
Answer:
(b) Pisus sativum

Question 9.
Tepetum is a part of :
(a) Male gametophyte
(b) Female gametophyte
(c) Ovary wall
(d) Anther wall.
Answer:
(d) Anther wall.

Question 10.
The endosperm is generally :
(a) Haploid
(b) Diploid
(c) Triploid
(d) Tetraploid
Answer:
(c) Triploid

Question 11.
The exine of pollen grain is made up of:
(a) Cellulose
(b) Pectdcellulose
(c) Lignin
(d) Sporopollenin
Answer:
(d) Sporopollenin

Question 12.
After fertilization ovary develops in to :
(a) Embryo
(b) Fruit
(c) Endosperm
(d) Seed
Answer:
(b) Fruit

Question 13.
A typical embryo sac is eight nuleate and :
(a) Single celled
(b) Seven celled
(c) Eight celled
(d) Four celled
Answer:
(b) Seven celled

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Question 14.
Germ pore is the place where exine is :
(a) Thick
(b) Uniform
(c) Thick and Uniform
(d) Absent.
Answer:
(d) Absent.

Question 2.
Fill in the blanks:

  1. The main function of endosperm in embryo is ……………. storage.
  2. Type of pollination which occurs by birds is called …………….
  3. Apple is the example of ……………. fruit.
  4. Ovules are situated on these tissue is called …………….
  5. In sunflower ……………. types of anther is found.
  6. In plants fruit is formed by …………….
  7. Single cotyledon of maize is called …………….
  8. Outer membrane of pollen grain is called …………….
  9. Process of double fertilization is discoverd by …………….
  10. The process of pollination of Vallisneria is occurs by …………….
  11. The study of pollen grain is called …………….
  12. Smell and nectar is the adaptation of ……………. pollinated flowers.
  13. Pollination in cobra plant is occurs through the …………….
  14. Tetradynamous stamen are found in …………….

Answer:

  1. Food material
  2. Omithophily
  3. False fruit
  4. Placenta
  5. Syngenesious
  6. Ovary
  7. Scutellum
  8. Exine
  9. Nawaschin
  10. Water
  11. Palynology
  12. Insect
  13. Snail
  14. Mustard.

Question 3.
Match the followings :
I.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 1
Answer:

  1. (e)
  2. (d)
  3. (b)
  4. (a)
  5. (c)
  6. (f)

II.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 2
Answer:

  1. (c)
  2. (a)
  3. (d)
  4. (b)

Question 4.
Write the answer in one word/sentences:

  1. What is the ploidy of microspore tetrad?
  2. Which component prepare intine of the pollen grain?
  3. Name a scar on a seed marking the point of attachment of the ovule.
  4. Name the type of pollination in which found in Salvia.
  5. What is the ploidy of angiospermic endosperm.
  6. Stigma, style and oVary is the part of.
  7. Name the largest flower of the world.
  8. Name the plant in which found in longest style and stigma.
  9. Name the hormone which is induced the ovary in the form of fruit.
  10. Name the layer of pollen grain which has binuleated cell.
  11. Name the mass of cells which is produced in culture medium.

Answer:

  1. Haploid
  2. Cellulose and Pectin
  3. Hilum
  4. EntomophiIy
  5. Triploid
  6. Female gamete
  7. Rafflesia
  8. Maize
  9. Auxin
  10. Tapetum
  11. Callus.

Sexual Reproduction in Flowering Plants Very Short Answer Type Questions

Question 1.
Development of female gametophyte occurs in which cell?
Answer:
By functional megaspore mother cell.

Question 2.
What is the other name of female gametophyte?
Answer:
Embryo sac.

Question 3.
Ovule derives nourishment from which part of the carpel?
Answer:
Ovule derives nourishment from placenta.

Question 4.
What are cleistogamous flowers? Give an example.
Answer:
The flowers which do not open are called cleistogamous flowers, e.g., Commelina.

Question 5.
What is the substance found on the exine of pollen grains?
Answer:
Sparopollenin.

Question 6.
Give the characters of wind pollinated flowers.
Answer:
White in colour, small in size and.pollen grains are formed in large number.

Question 7.
What is the ploidy of angiospermic endosperm?
Answer:
Triploid.

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Question 8.
Give an example of a monocotyledonous endospermic seed.
Answer:
Ricinus.

Question 9.
Give example of two false fruit.
Answer:
Apple, Jackfruit.

Question 10.
What are monocious plants ?
Answer:
Plants which have both male and female flower.

Sexual Reproduction in Flowering Plants Short Answer Type Questions

Question 1.
Write three merits of sexual reproduction in plants.
Answer:

  1. Due to sexual reproduction variations possibilities of evolution become more.
  2. Seeds thus produced can be preserved for years.
  3. It helps the plants to develop adaptations.

Question 2.
Name the parts of an angiosperm flower in which development of male and female gametophyte take place.
Answer:
Development of male gametophyte takes place in anther and female gametophyte in ovary.

Question 3.
Differentiate between microsporogenesis and megasporogenesis. Which type of cell division occurs during these events ? Name the structure formed at the end of these two events.
Answer:
Differences between Microsporogenesis and Megasporogenesis:

Microsporogenesis:

  • In this process haploid microspores are formed from diploid microspore mother cell.
  • The four microspores formed from a single microspore mother cell are generally aranged in a tetrahedral structure.
  • All the four microspores arranged in a tetrahedral tetrad are functional.

Megasporogenesis:

  • In this process, haploid megaspores are formed from diploid megaspore mother cell.
  • The four megaspores formed from a me – gaspore mother cell are arranged in the from of a linear tetrad.
  • Only one megaspore remain functional while the other three degenerates.

Meiosis occurs during micro and megasporogenesis. Microspores (pollen grain) are formed at the end of microsporogenesis and female gametophyte (embryo sac) are formed at the end of megasporogenesis.

Question 4.
Arrange the following terms in the correct developmental sequence :
Pollen grain, sporogenous tissue, microspore tetrad, pollen mother cell, male gametes.
Answer:
Sporogenous tissue → Pollen mother cell → Microspore → Tetrad → Pollen grain → Male gametes.

Question 5.
With a neat, labelled diagram, describe the parts of a typical angiosperm ovule.
Answer:
Structure of Ovule: Each ovule consists of the following parts as visible in a longitudinal section:

1. A small stalk or funicle by which the ovule remains attached with the placenta of the ovary.

2. Hilum is the point at which it is attached with the ovule. In inverted ovule the funicle fuses with the main body of the ovule and is called as raphe.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 4
3. The ovule is surrounded on all sides by two integuments but not at the apex where an aperture called micropyle is present. This end of the ovule is called as micropylar, while the end of the ovule opposite to it is called as chalazal end.

4. Embryo sac is situated inside the nucellus.

5. Towards the micropyle end of embryo sac one egg or oospore and 2 synergids are found, and towards the chalaza end of embryo sac 3 antipodal cells are fpund. At the centre secondary nuclei is found.

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Question 6.
Differentiate self – pollination and cross – pollination.
Answer:
Differences between Self and Cross – pollination:

Self – pollination:

  • It is the process of transfer of pollen grains from one flower to the stigma of same flower or another flower of same plant.
  • Medium is not required for pollination.
  • Pollination is sure.
  • Less number of pollen grains are produced.
  • Plants do not show any special character.
  • Pure breed can be obtained.

Cross – pollination:

  • It is the process of transfer of pollen grains from one flower to the stigma of flower of another plant.
  • Medium is required for pollination.
  • Pollination depends on medium.
  • More number of pollen grains are produced.
  • Attractive, coloured, scent or honey bearing flowers are produced to attract insects.
  • Hybrids are produced.

Question 7.
What is apomixis and what is its importance?
Answer:
Apomixis is the process of asexual production of seeds, without fertilisation. The plants that grow from these seeds are identical to the mother plant.
Uses:

  1. It is a cost effective method for producing seeds.
  2. It has great use for plant breeding when specific traits of a plant have to be preserved.

Question 8.
With a neat diagram explain the 7 – celIed, 8 – nucleate nature of the female gametophyte.
Answer:
Explanation:
Nucleus of the functional megaspore undergoes mitosis resulting in 2 – nuclei that move to two opposite poles forming 2 – nucleate embryo sac. Two more mitotic nuclear divisions result in 4 – nucleate and later 8 – nucleate stages of the embryo sac. so far no cytokinesis (cytoplasmic division) has taken place. Now cell walls start to build leading to the organisation of female gametophyte or embryo sac. Six of the 8 – nuclei are bound by cell wall and the ramaining 2 – celled polar nuclei lie below the egg apparatus in the large central cell.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 3

Seven – celled stage:
Three cells are grouped together at the micropylar end and constitute the egg apparatus, which is constituted of two synergids and one egg cell. Three cells at the chalazal end are called antipodals. The large central cell has 2 – polar nuclei. Thus, a typical angiosperm embryo sac at maturity is 7 – celled but 8 – nucleated as the central cell has 2 – nuclei.

Question 9.
What are chasmogamous flowers? Can cross – pollination occur in cleistogamous flower? Give reason for your answer.
Answer:
Chasmogamous flowers are open flowers with exposed stamens and stigma which facilitate cross – pollination. No cross – pollination occurs in cleistogamous flowers. As these flowers are closed and never open and thus no transfer of pollen from outside to stigma of the flower is possible. So there is no cross – pollination.

Question 10.
What is polyembryony?
Answer:
Polyembryony:
When more than one embryo develops in one seed then this condition is called as polyembryony. It is generally found in citrus family. It is also found in nicotiana, conifers, rice, wheat. It occurs when fertilization occurs in all embryo sacs found in the ovule,

Question 11.
Mention two strategies evolved to prevent self – pollination in flowers.
Answer:
Two strategies evolved to prevent self – pollination are:

  1. Pollen release and stigma receptivity is not synchronized.
  2. Anthers and stigma are placed at such positions that pollen doesn’t reach stigma.

Question 12.
What is self – incompatibility? Why does self – pollination not lead to seed formation in self – incompatible species?
Answer:
Self – incompatibility is a genetic mechanism to prevent self – pollen from fertilizing the ovules by inhibiting pollen germination or pollen tube growth in the pistil, In these cases, self – pollination does not lead to seed formation because fertilization is inhibited.

Question 13.
What is bagging technique? How is it useful in a plant breeding programme?
Answer:
It is the covering of female plant with butter paper or polythene to avoid their contamination from foreign pollens during breeding programme.

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Question 14.
What is triple fusion? Where and how does it take place? Name the nuclei involved in triple fusion.
Answer:
Triple fusion refers to the process of fusion of three haploid nuclei. It takes place , in the embryo sac. The 3 – nuclei that fuse together are, nucleus of the male gamete and 2 – polar nuclei of the central cell to produce a triploid primary endosperm nucleus,

Question 15.
Why do you think the zygote is dormant for sometime in a fertilized ovule?
Answer:
The zygote is dormant in fertilized ovule for sometime because at this time, endosperm needs to develop. As endosperm is the source of nutrition for the developing j embryo, the nature ensures the formation of enough endosperm tissue before starting the process of embryogenesis.

Question 16.
Differenciate between:
(a) Hypocotyl and Epicotyl
(b) Colcoptile and Coleorhiza,
(c) Integument and Testa
(d) Perisperm and Pericarp.
Answer:
(a) Differences between Hypocotyl and Epicotyl:

Hypocotyl:

  • The region of the embryonal axis that lies between the radicle and the point of attachment of cotyledons is called hypocotyl.
  • Hypocotyl pushes the seed above the soil in epigeal germination.
  • It is an important component of embryonic root system.

Epicotyl:

  • The region of the embryonal axis that lies between the plumule and cotyledons is called epicotyl.
  • Epicotyl pushes the plumule above the soil in hypogeal germination.
  • It is an important component of embryonic shoot system.

(b) Differences between Coleoptile and Coleorhiza:

Coleoptile:

  • The shoot apex and few leaf primordia are enclosed in epicotyl region is called coleoptile.
  • It comes out of the soil.

Coleorhiza

  • The redicle and rootcap are situated at the lower end of embryonal axis are enclosed by protective sheath called coleorhiza.
  • It remains inside the soil.

(c) Differences between Integement and Testa:

Integument:

  • It is the protective covering of the ovule.
  • It is a part of pre fertilisation.

Testa:

  • It is the protective covermg of the seed.
  • It is a part of post fertilisation.

(d) Differences between Perisperm and Pericarp:

Perisperm:

  • It is the part of nucellus which remains in form of thin layer after seed germination.
  • It is a part that belongs to seed.
  • It is usually dry.

Pericarp:

  • Ovary is convert into pericarp after fertilisation.
  • It is a part that belongs to fruit.
  • It can be dry and fleshy.

Question 17.
Why is apple called a false fruit? Which part of the flower forms the fruit?
Answer:
Apple is called a false fruit because it develops from the thalamus instead of ovary (thalamus is the enlarged structure at the the base of the flower).

Question 18.
What is meant by emasculation? When and why does a plant breeder employ this technique?
Answer:
Emasculation means removal of anthers, with a forceps, from the flower bud before dehiscence. Plant breeder employs this technique to prevent contamination of stigma with the undesired pollen. This is useful in artificial hybridisation, where desired pollen is required.

Question 19.
If one can induce parthenocarpy through the application of growth sub – stances, which fruits would you select to induce parthenocarpy and why?
Answer:
Orange, lemon, litchi could be potential fruits for inducing the parthenocarpy because seedless variety of these fruits would be much appreciated by the consumers.

Sexual Reproduction in Flowering Plants Long Answer Type Questions

Question 1.
Describe structure of ovule with labelled diagram.
Answer:
Structure of Ovule:
Each ovule consists of the following parts as visible in a longitudinal section:

1. A small stalk or funicle by which the ovule remains attached with the placenta of the ovary.

2. Hilum is the point at which it is attached with the ovule. In inverted ovule the funicle fuses with the main body of the ovule and is called as raphe.

3. The ovule is surrounded on all sides by two integuments but not at the apex where an aperture called micropyle is present. This end of the ovule is called as micropylar, while the end of the ovule opposite to it is called as chalazal end.
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4. Embryo sac is situated inside the nucellus.

5. Towards the micropyle end of embryo sac one egg or oospore and 2 synergids are found, and towards the chalaza end of embryo sac 3 antipodal cells are found. At the centre secondary nuclei is found.

Question 2.
Describe structure of anther with labelled diagram.
Answer:
Structure of Anther:
Transverse section of anther shows that it consists of 2 lobes which are connected by connective. Each lobe contains two pollen sacs. Innermost layer of pollen sac is called as tapetum. Tapetum is a layer rich in nutritive contents which supplies food material for the developing pollen grains. At first many pollen mother cells are formed in them which divides meiotically to form haploid pollen grains.
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Question 3.
Give four contrivances for self – pollination.
Answer:
Contrivances for self – pollination:
1. Bisexuality:
When male and female parts are found in same flower then possibility of self – pollination increases.

2. Cleistogamy:
In Commelina benghalensis both cleistogamous and chasmogamous flowers are produced. The former are the underground flowers and the latter are the aerial ones developed on branches. In the small, inconspicuous cleistogamous flowers the pollen are shed within the closed flowers so that self – pollination is a must. This is also observed in Impatiens, Oxalis, Viola, Portulaca etc.

3. Homogamy:
Here the stamens and carpels mature at the same time. So, there is a greater chance of self – pollination as compared to cross – pollination, example Mirabilis, Argemone etc.

4. Failure of cross – pollination:
In some flowers generally cross pollination occurs but if they fails to do cross-pollination then self pollination occurs.

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Question 4.
What do you mean by micropropagation?
Answer:
Micropropagation:
It is a modem method of reproduction. By this process thousands of new plants can be obtained from few tissues of mother plant. This method is based on tissue and cell culture technique. In this process a small part of tissue is separated from the plant and then it is grown in nutrient medium in aseptic condition. The tissue develops to form a cluster of cells which is called as callus.

This callus can be preserved for long time for multiplication. A small part of the callus is transferred to nutrient medium, where it grows into a new plant. This plant is then transferred to the field. By this process Orchids, Carnations, Chrysanthemum plants can be grown successfully.

Question 5.
What is self – pollination? Give advantages and disadvantages of self – pollination.
Answer:
Self – pollination:
When the pollen grain of one flower are transferred to the stigma of the same flower then the process is called as self – pollination.

Advantages of self – pollination : These are the advantages of self – pollination:

  1. Parental characters can be preserved indefinitely in several generations.
  2. Self – pollination helps in maintaining pure lines for experimental hybridization.
  3. It is most economical method of pollination. The plants do not consume their energies in the production of large number of pollen grains, nectar and coloured corolla.
  4. It ensures seed production and flowers do not take chances of the failure of fertilization.

Disadvantages of self – pollination : These are the disadvantages of self – pollination:

  1. The weaker characteristics or defects of the plant can never be eliminated from the race.
  2. No useful characters can be introduced in the race.
  3. The immunity of race towards diseases falls and ultimately it falls prey to many diseases.

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Question 6.
Describe development of endosperm.
Answer:
Development of endosperm:
It develops from the triploid tissue of the fertilized embryo sac after the act of double fertilization. It is of the following three types:

  1. Free nuclear endosperm.
  2. Cellular type of endosperm.
  3. Helobial type of endosperm.

The name refers to the type of nuclear divisions of the endosperm nucleus. If triploid nucleus divides by free nuclear division the endosperm produced contains many nuclei ly¬ing freely in it and hence it is termed as free nuclear endosperm. If the nuclear division is followed by wall formation it is called as cellular type. If endosperm is intermediate between the two types it is called as helobial type.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 2 Sexual Reproduction in Flowering Plants 6
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Question 7.
Differentiate between:

  1. Embryo sac and Endosperm,
  2. Seed and Ovule.

Answer:
1. Differences between Embryo sac and Endosperm:

Embryo sac:

  • It is haploid structure.
  • It is found in ovule.
  • It is formed before fertilization.
  • Nutritive materials are stored.
  • It consists of antipodal cells, egg cell, synergid cells and two polar nuclei.

Endosperm:

  • It is triploid structure.
  • It is found in seed.
  • It is formed after fertilization.
  • Nutritive materials are not stored.
  • Antipodal cells, egg cell, synergid cells are absent and all cells are similar

2. Differences between Seed and Ovule:

Seed:

  • It is formed in the fruit seed is formed after fertilization of ovule.
  • Seed is surrounded by integument. Outer covering is called outer integument and inner covering is called inner integument.
  • Embryosac is absent in seed.
  • Embryo is present in seed
  • Endosperm may be found in seed
  • Seed germinates to produce new paint.

Ovule:

  • Before fertilization ovule is found into the ovary called mega sporangium.
  • Nucellus is present below the ovule and is surrounded by inner and outer covering.
  • Embryosac is present in ovule.
  • Embryo is absent in ovule.
  • Endosperm is not found in ovule.
  • Ovule does not germinate.

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Question 8.
Explain any five differences between pollination and fertilization.
Answer:
Differences between Pollination and Fertilization:

Pollination:

  • In pollination, pollen grains are transferred from stamens to stigma of the flower.
  • Two male gametes are formed in this process.
  • Haploid cells participating in this process.
  • A medium is required for this process.
  • There is no morphological change after this process.

Fertilization:

  • Fertilization is a process in whieh male and female gametes fused to form the zygote.
  • Zygote is formed at the end of this process.
  • Haploid cells fused to form a diploid cell.
  • Medium is not required for this process.
  • Flower is modified into fruit and seed after this process.

Question 9.
What do you understand by double fertilization? Write its importance.
Answer:
Double fertilization:
It is the process of fusion of one male gamete with the egg nucleus and other male gamete with the polar nuclei or secondary nucleus is called double fertilization. In all angiospermic plants there is double fertilization. This process was discovered by S. N. Navaschin (1898) and Grignard (1899) in Lilium and Fritillaria. In this process, pollen grains reach stigma and then germinate. A short pollen tube comes out through a germpore. The pollen grain nucleus divides mitotically into a tube nucleus and a generative nucleus. The generative nucleus again divides into two male nuclei.

The pollen tube may enter the ovule through micropyle or through integuments or through chalazal end. One of the two male nuclei fuses with the egg nucleus and forms a zygote and this process is called syngamy. The male nucleus fuses with the two polar nuclei or secondary nucleus (diploid) and gives rise to triploid primary endosperm nucleus. This process is called triple fusion and whole process is called double fertilization. This triploid nucleus forms endosperm of the seed.

Importance:
After double fertilization triploid nucleus (endosperm nucleus) developed to form an endosperm which provide nourishment to the developing embryo resulting in the formation of healthy seed and plant.
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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 3 बन्दी पिता का पत्र

MP Board Class 11th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 3 बन्दी पिता का पत्र

बन्दी पिता का पत्र अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
‘बन्दी पिता का पत्र’ किसने किसे संबोधित कर लिखा है?
उत्तर:
‘बन्दी पिता का पत्र’ पंडित कमलापति त्रिपाठी ने अपने प्रिय पुत्र लाल जी को सम्बोधित करते हुए लिखा है।

प्रश्न 2.
पत्र में कैदियों के जीवन के विषय में किन-किन बातों का उल्लेख किया है? (2017)
उत्तर:
पत्र में कैदियों के जीवन के विषय में जिन बातों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं-इन कैदियों के जीवन में आनन्द, सुख और सन्तोष के लिए स्थान नहीं होता है। इनके साथ पशओं जैसा व्यवहार किया जाता है, उन्हें पीसा जाता है। इन कैदियों को समाज से उपेक्षित समझा जाता है। संसार में कहीं पर भी सम्मानपूर्वक इनको खड़े होने का कोई स्थान नहीं है। इनका भविष्य भी अन्धकारपूर्ण ही होता है। इन कैदियों के जीवन के अनेक वर्ष यहाँ ही समाधिस हो गए।

इन जेल के कैदियों के जीवन में कहाँ है बसन्त? और कहाँ है सावन की मेघगर्जन? यहाँ ये ऐसे प्राणी हैं जिनकी सारी जवानी इसी में कट गई। बुढ़ापा यहाँ आ गया और अब मौत भी इन्हें यहाँ ही आकर समाधिस्थ करेगी। वे, फिर किसी भी बन्धन से मुक्त हो जाएँगे।

जेल के कैदियों में ऐसे व्यक्तियों की भी संख्या इतनी अधिक है जिन्हें यह भी पता नहीं कि उनके घर की क्या दशा है? अपने जिन बच्चों को छोड़ आए थे, वे अब कैसे हैं? उनके घर वाले भी अब उन्हें भूल चुके हैं। यदि आज जेल से छूट कर जाएँ, और अपने सौभाग्य से अपने बेटों से मिलें, और अपनी बीबी के सामने खड़े हों तो शायद न बेटा बाप को पहचानेगा और न ही बीबी अपने मियाँ को।

क्या कभी कोई ऐसी कल्पना भी कर सकता है कि इनके हृदय में भी रस का संचार होगा, सम्भव है? क्या होली, क्या दीवाली-किसी में यह सामर्थ्य कहाँ हो सकती है कि इनके हृदय में टूटे हुए तारों को पुनः जोड़ दिया जाए और फिर उनमें से झंकृति निकल सके।

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प्रश्न 3.
जीवन के सुख-दुःख से सम्बन्धित विचारों को लेखक ने किस प्रकार व्यक्त किया है?
उत्तर:
प्रकृति एक नटी है। लीलामयी प्रकृति मानव में वह क्षमता उत्पन्न करती है जिससे सुख-दुःख की परिस्थिति में एक सामंजस्य स्थापित हो उठता है। मनुष्य की इस क्षमता को अद्भुत ही कहा जायेगा। परिस्थितिवश स्वयं को उसके अनुकूल किस सरलता से ढाल लेता है। मनुष्य के हृदय में कला, संतुलन और धैर्य का कितना माद्दा है कि प्रत्येक परिस्थिति को अपने अनुसार ढालने में कोई कसर नहीं छोड़ता। अपनी इसी क्षमता के बलबूते पर मनुष्य जीवन धारण करने में समर्थ है।

मेरा स्वयं का अनुभव है कि यह जगत अनन्त वेदना और दुःखों से ही भरा हुआ है। यह जीवन प्रबल गति से बहते महान् काल रूपी नदी के प्रवाह पर उठे हुए बुलबुले के समान क्षणिक है। यह जीवन अस्थायी अस्तित्व लिए हुए है। इस जीवन के कितने क्षण ऐसे हैं जो सुख और शान्ति से बीते हैं। इस जीवन में सुख, आनन्द और तृप्ति नाम का पदार्थ ढूँढ़े नहीं मिल सकता।

यह जीवन बित्तेभर का है, उसके भी बड़े हिस्से में वेदना, पीड़ा और अवसाद भरा हुआ है। यदि सुख के कुछ क्षण यहाँ आ भी जाते हैं, तो वे बिजली की भाँति क्षण भर कौंध जाते हैं और मानव जीवन जो प्रायः अंधकार से भरा हुआ है, कभी-कभी आलोकित हो उठता है। सुख का प्रकाश शीघ्र ही लुप्त हो जाता है। यह सुख नश्वर है, क्षणिक है। परन्तु इस सुख की क्षणिकाओं में सत्य समाया रहता है। यह सत्य अमिट स्मृतियाँ छोड़ चला जाता है। इसी न मिटने वाली स्मृति को जीवन की शक्ति का स्रोत कहते हैं; यही स्मृति निराशा में आशा का संचार करती है, अंधकार में प्रकाश विकीर्ण करती है। मृत्यु और विनाश में जीवन का सृजन का आधार बनकर पुष्ट होती है।

संसारी जीव दु:खों से प्रभावित है। समाज में कौन ऐसा है जो तप्त हो, और अभावों से ग्रस्त न हो। फिर भी दुःखमय, क्षणिक जीवन के प्रति मनुष्य का इतना मोह क्यों? सुख के कणों को बटोरने के प्रयास में जीवन कितने दुःख, वेदना और यातना सहन करता है। कितने अचम्भे की बात है यह?

प्रश्न 4.
पत्र-लेखक ने गाँधी जी के सत्याग्रह के विषय में क्या लिखा है?
उत्तर:
ब्रिटेन अपनी साम्राज्यवादी नीतियों से लोगों के हृदय में अपने प्रति घृणा की आग सुलगा रहा था। यह अवस्था असहनीय हो चुकी थी जिससे लोगों में झुंझलाहट पैदा हो रही थी। इस महान् देश के करोड़ों लोग नपुंसकतापूर्ण ग्लज्जा का उद्रेक कर रहे थे। उस समय हम सोच रहे थे कि गाँधी जी विकट संकट में फंस गए हैं। गाँधी जी उन लोगों में से थे जो अपनी प्रतिज्ञा से एक कदम भी पीछे हटने वाले नहीं थे। शरीर को चाहे दो भागों में विभक्त क्यों न कर दिया जाए? गाँधी जी के शरीर में विदेहत्व का आदर्श सजीव रूप में मूर्तिमान हो चुका था। आदर्श और सत्य के लिए उस व्यक्ति की दृष्टि में न जीवन का मूल्य है और न जगत का।

परन्तु दूसरी ओर स्वार्थ में अंधे हुए कठोर हृदय साम्राज्यवादियों की सत्ता देखी। जिनमें नर रक्तपान करते-करते मनुष्यता नाम के किसी पदार्थ की छाया भी नहीं रह गई है। भय होता, भय नहीं विश्वास था कि यदि कहीं, वह अशिव मुहूर्त आ ही गया जब गाँधी जी की भौतिक देह इस तप के बोझ को सहन करने में असमर्थ होती दिखाई देगी, तो उस समय भी वे मानवता की इस विभूति और पृथ्वी के इस अमूल्य रत्न को नष्ट कर देने में आगा-पीछा न करेंगे। आखिर वे तो मनुष्य ही थे जिन्होंने ईसा के तपःपूत शरीर में लोहे की कील ठोंककर प्रसन्नता और सन्तोष प्राप्त किया था। यदि इतिहास उसी की पुनरावृत्ति करे तो उसे कौन रोक सकेगा।

अब हम यह अनुभव कर रहे हैं कि आज गाँधी नहीं मर रहा है। बल्कि उसके साथ वह आदर्श और वह सत्य भी मर रहा है जिसका प्रतिनिधित्व वह स्वयं कर रहा है और जिसका दिव्य संदेश लेकर यह देवदूत अवनि पर अवतीर्ण हुआ है। अब प्रश्न यह भी उठता है कि क्या मानव के चरम कल्याण के लिए और उसके लिए चेष्टा करना ही कोई जघन्य अपराध है जिसके कारण इतना भयानक दंड मिल रहा है।

यदि मानव समाज को संहार से, विनाश से और पाप से बचाना है, तो उसकी समस्त व्यवस्था को अहिंसा के आधार पर स्थापित करने का आयोजन करना ही होगा। लोग कह देते हैं कि अहिंसा मानव-प्रकृति के प्रतिकूल है और कभी हिंसा का उन्मूलन संभव नहीं है। वे इतिहास को साक्षी रूप में उद्धृत करते हैं। लेकिन लेखक के अनुसार लोग उसी इतिहास को गलत ढंग से देखते हैं। वे यह नहीं देखते कि विकास-पथ का पथिक मानव सदा प्रवृत्तियों से युद्ध करता। उनका संयम और नियंत्रण करता रहता तो आगे बढ़ता चला गया होता। उसकी यही साधना संस्कृतियों को जन्म देती रही है।

प्रश्न 5.
कैदियों ने होली के उत्सव को किस प्रकार मनाया था?
उत्तर:
आज जेल में कैदियों द्वारा होली का उत्सव मनाया जा रहा है। मैंने अपने कानों से अभी-अभी मंद-मंद किन्तु उनके उल्लास से परिपूर्ण स्वर लहरी को सुना है। यह स्वर लहरी मेरे पास वाली बैरक से सुनाई पड़ रही है। परन्तु इन बेचारे कैदियों के जीवन में आनन्द कहाँ? सुख और सन्तोष के क्षण कहाँ? इन्हें तो समाज से उपेक्षित रखा गया है। ये समाज में सम्मान से खड़े भी नहीं रह सकते। इनके जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा कैद में ही समाधिस्थ हो गया है। फिर भी अपने हृदय की भावनाओं को अपनी मस्त स्वर लहरियों में व्यक्त करते हुए इन्हें देख रहा हूँ।

इन्होंने ढपली बनाई है। धुंघरू बनाए हैं। फटे-पुराने चिथड़ों को एकत्रकर रंगा है। अपनी-अपनी बैरकों से बाहर निकल आए हैं और वे स्वाँग रच रहे हैं। फगुआ गा रहे हैं। कोई-कोई तो धुंधरू पहनकर नाच रहा है। इन अभागे कैदियों का उल्लास और उन्माद दर्शनीय है।

स्वतंत्र वायु और निर्मुक्त अनंत आकाश से भी वंचित होकर वे जीवन को कुछ क्षण के लिए मोहक और आकर्षक बनाने में सफल हुए हैं। आज होली न आई होती, तो आज इन्हें इतना भी नसीब न हुआ होता।

प्रश्न 6.
ब्रिटेन की सरकार की मनमानी से लेखक को क्यों क्षोभ हुआ?
उत्तर:
ब्रिटेन की सरकार साम्राज्यवादी है। वह सरकार निष्ठुरता की पराकाष्ठा से ऊपर तक जा चुकी है। उसकी निष्ठुरता के विरुद्ध लोगों के हृदयों में विरोध की आग फूट पड़ने लगी है। उसने जो अवस्था उत्पन्न की है, वह असह्य है, जिससे ब्रितानी शासक वर्ग किसी भी भारतीय की झंझलाहट के पात्र हो सकते हैं। ब्रिटिश सरकार की ज्यादतियों को भारत जैसे महान् देश के लोग सहन कैसे कर रहे हैं? शायद उनमें नपुंसकता का संचार हो गया है। इससे तो लज्जा का उद्रेक हुआ है।

अब बात आती है, गाँधी जी द्वारा आमरण उपवास की। हम लोग सोचते हैं कि गाँधी जी किसी विकट संकट में पड़ गए हैं। गाँधी जी उन लोगों में से एक हैं जो अपनी प्रतिज्ञा से डिगना नहीं जानते; चाहे उनके शरीर के कितने ही टुकड़े क्यों न हो जायें? वस्तुतः उनमें विदेहत्व का एक आदर्श रूप मूर्तिवान हो गया है, जिसमें सजीवता है। गाँधी जी अपने आदर्श और सत्य के लिए जीवन त्याग सकते हैं, जगत से नाता छोड़ सकते हैं। अतः उनके लिए जीवन और जगत-अपने आदर्श और सत्य के लिए कोई महत्त्व नहीं रखते।

अब थोड़ा-सा नर-पिशाचियों की ब्रितानी सरकार पर विहंगम दृष्टि डालते हैं, तो हम पाते हैं कि वे अपने स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं। वह सरकार साम्राज्यवादियों की है। उन स्वार्थी साम्राज्यवादी सरकार की सत्ता नर रक्तपात को मौन खड़ी देख सकती है। उन लोगों में मानवता का एक बिन्दु रूप भी नहीं है। यह अत्यन्त भय की अथवा अशिवता की बात घटित हो जाती है, जिसका हम सबको भय था, और गाँधी जी की भौतिक देह तप के गहन बोझ को सहन करने में असमर्थ हो जाती तो क्या इस मानवता की विभूति और पृथ्वी के रत्न गाँधी को नष्ट करने देने में क्या हम भारतीय आगा-पीछा न करेंगे? अर्थात् अवश्य करेंगे। आखिर वे मनुष्य ही तो थे; जिन्होंने तप से पवित्र शरीर वाले ईसा मसीह के शरीर में लोहे की कील ठोंक दी और स्वयं उन्होंने प्रसन्नता और सन्तोष का अनुभव किया। इतिहास, यदि उसी की पुनरावृत्ति करे तो कर सकता है, उसे रोकने वाला कौन है?

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प्रश्न 7.
इस पत्र के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पत्र के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि-
(1) प्रकृति ने मनुष्य की रचना की है और उसमें विचित्रता पैदा की है कि मनुष्य सदैव सुख और दुःख में सामंजस्य बैठाता रहा है। इस सामंजस्य की क्षमता भी उसमें अद्भुत है। सुख क्षणिक होता है। दुःख की अन्धेरी रात्रि अपार होती है। सुख की स्मृतियाँ जीवन में शक्ति, ऊर्जा और उत्साह की स्त्रोत कहलाती हैं।

(2) लेखक वैदिक युग के समाज का दिग्दर्शन कराता हुआ कहता है कि उस युग में स्त्री-पुरुष समाज के उत्सवों में समान रूप से भाग लेते थे। खेलों और उत्सवों तथा क्रीड़ाओं में दोनों की ही सहभागिता महत्त्व रखती थी।

(3) उस युग में इन उत्सवों और पर्वो पर सम्पन्न आयोजनों में ही युवक-युवतियाँ अपने वर और वधुओं का वरण कर लेती थी। माता-पिता की और अन्य सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की उपस्थिति में यह स्वयंवर सम्पन्न हुआ करते थे। पुरातन आर्यों की संस्कृति सुसम्पन्न थी।

(4) आज के होली-दीवाली आदि उत्सवों पर बन्धनयुक्त कल्पित आजादी विषैली हो गयी है। जीवन में पराधीनता का बन्धन सत्य नहीं है। आज हमें सत्य और असत्य से मिश्रित जीवन का उपभोग करने की बाध्यता अनुभव हो रही है।

(5) हम भारतीयों ने लम्बे समय तक पराधीनता के कष्ट भोगे हैं। इस पराधीनता में साम्राज्यवादी सत्ता की निष्ठुरता ने सभी भारतीयों को शताब्दियों तक झुलसाया है। फिर भी गाँ ती जी ने विश्वमानव को अपने शुद्ध तपभूत मन से यह बता दिया कि हिंसा पर अहिंसा विजय पा सकती है, यदि उसके पालन करने वाले सत्य और अपने आदर्श को जीवित रखने के लिए कटिबद्ध हैं। यद्यपि हिंसा मनुष्य में प्राकृत रूप से मौजूद है। सत्य कभी मरता नहीं है।

(6) यदि मानव समाज को संहार से, विनाश से और पाप से बचाना है तो समाज की समस्त व्यवस्था को अहिंसा के आधार पर स्थापित करना होगा। मनुष्यों का कहना है कि अहिंसा मानव-प्रकृति के प्रतिकूल है। अत: हिंसा का उन्मूलन कभी भी सम्भव नहीं है। परन्तु उन्हें यह समझने की कोशिश करनी होगी कि विकास पथ का पथिक मानव सदा प्रारम्भिक प्रवृत्तियों से युद्ध करता रहा है, उन पर संयम साधता रहा है, उन पर नियंत्रण करता रहा है, और परिणामत: वह आगे बढ़ता गया है। इसी तरह की साधना से विश्व में संस्कृतियों ने जन्म लिया।

(7) मनुष्यता का इतिहास परम साधना का इतिहास है। सहज प्रवृत्तियों का उन्मूलन मानव द्वारा सम्भव नहीं है। लेकिन उन प्रवृत्तियों को एक व्यवस्था दे सकता है। उन्हें कला के रंग से रंग सकता है। उन्हें नियंत्रित कर सकता है। इस सहज प्रवृत्तियों को उन्नत पथ की ओर मोड़ा जा सकता है। हिंसात्मक प्रवृत्ति के साथ ही मनुष्य में उसके ऊपर संयम करने की प्रवृत्ति भी तो मानव के अन्दर प्रकृति ने प्रदान की है। इस प्रकार मानव के अन्दर एक विशेष गुण है, वह है मनुष्य का द्वन्द्वात्मक स्वरूप। गाँधी जी ने बताया कि इस हिंसात्मक प्रवृत्ति पर विजय पाने में असफलता, मानवता की पुनीत साधना की असफलता होगी।

(8) मनुष्य लेखन के माध्यम से अपने मन में उठे उद्गारों को स्पष्ट कर देता है। यह उसकी कल्पना शक्ति की अभिव्यक्ति है। जिस पर अन्तःकरण की छाप लगी हुई होती है। लेखक के मन की अनुभूतियाँ जीवन के स्वरूप को बताती हैं। समस्याओं का समाधन आकलित होता है। वैचारिक भिन्नता अनिवार्य है। लेकिन आशा है कि भारत का विविधामय स्वरूप प्रेम और सौन्दर्य के सूत्र में अभिन्नता से पिरोया हुआ होने की आशा की जाती है।

बन्दी पिता का पत्र अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बन्दी पिता का पत्र’ कहाँ लिखा गया था?
उत्तर:
‘बन्दी पिता का पत्र’ पंडित कमलापति त्रिपाठी ने नैनी सैंट्रल जेल में लिखा था।

प्रश्न 2.
पत्र-लेखन के समय नैनी सेंट्रल जेल में कौन-सा त्यौहार मनाया जा रहा था?
उत्तर:
पत्र-लेखन के समय नैनी सेंट्रल जेल में होली का उत्सव मनाया जा रहा था।

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बन्दी पिता का पत्र पाठका सारांश

प्रस्तावना :
लेखक अपने प्रिय पुत्र लाल जी को जेल से पत्र लिखता है। वह बताता है कि आज जेल में होली का उत्सव मनाया जा रहा है। लेखक के पास वाली बैरक से उल्लास भरी स्वर लहरियाँ उसे कान में सुनाई पड़ रही हैं। जेल की बैरके ही बहुत से कैदियों की समाधि स्थल बन गयी हैं। कुछ अपनी हड्डियाँ और मांस तक को सुखा चुके हैं; उनके लिए अब बसंत अथवा वर्षा ऋतु के सावन का मेघ गर्जन कहाँ? यहाँ कुछ कैदी ऐसे भी हैं जिनकी सुध लेने वाला बाहर कोई भी नहीं है। घरवाले उन्हें भूल चुके हैं, यहाँ तक कि बेटे, बाप, पत्नी परस्पर उन्हें पहचान नहीं सकते। तो फिर उनके हृदय में रस का संचार कहाँ हो सकता है? ऐसे होली, दीवाली पर्यों में आज वह सामर्थ्य कहाँ जो इनके टूटे हुए तारों को पुनः जोड़ दे?

प्रकृति एक महानटी है :
प्रकृति ने मनुष्य को एक विचित्रता दी है जिससे उसमें सुख और दुःख के सामंजस्य की स्थापना की क्षमता है। जीवन एक अस्थायी अस्तित्व को लिए हुए है जिसमें अनन्त वेदना और दुःख परिपूर्ण है। अतः यहाँ सुख, आनन्द और तृप्ति नाम का पदार्थ ढूँढ़े भी नहीं मिल सकता। सुख क्षणिक है, दु:ख की अनन्त कारा की कलियाँ सर्वत्र फैली हैं यहाँ। परन्तु फिर भी इस दुनिया में निराशा में आशा, अन्धकार में प्रकाश, मृत्यु में जीवन के सृजन का आधार बना रहता है।

समाज में अतृप्ति और अभाव :
सम्पूर्ण मानव समाज अतृप्ति और अभाव की समस्या से व्यथित है। मनुष्य सुख की तलाश ओस की बूंदों से प्यास बुझाने की तरह करता है। इसी तरह जेल के कैदी भी किसी भी तरह अपने मन के अवसाद को भुलाने के लिए ‘फगुआ गा रहे हैं’, कोई ढपली बजा रहा है, तो कोई अपने पैरों में घुघरू पहन नृत्य कर रहा है। इन कैदियों का भाग्य अभागेपन में डूब चुका है। परन्तु अपने जीवन में ये बंदी लोग उल्लारा की मादकता उत्पन्न करने की कोशिश कर रहे हैं। मुक्त आकाश का सौन्दर्य तो इन्हें मिलेगा नहीं, लेकिन कुछ क्षण के लिए मोहक और आकर्षक झलकियाँ जीवन का संचार कर ही देती हैं। इस होली पर्व का भी लम्बा इतिहास है। वैदिक युग में यही होली बसन्तोसव के रूप में मनाई जाती थी। विविध खेलकूद, नाचरंग, नाटक, घुड़दौड़, रथदौड़ होती थी। जीवन में जीवन का संचार था। स्त्री-पुरुष सभी इन उत्सवों में भाग लेते थे।

स्वयंवर प्रथा :
इन विविध प्रक्रियाओं के आयोजनों के बीच ही युवतियाँ भी मन के अनुकूल किसी युवक को पतिरूप में वरण करती थीं। माता-पिता उन युवक-युवतियों की इच्छाओं के अनुकूल आचरण करते थे। परन्तु ज्ञात नहीं कि जीवन और हृदयों के मिलन को पुण्यशाली पर्व की वह स्वस्थ परम्परा काल के गर्त में कब समा गई।

ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सरकार की निष्ठुरता :
ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सरकार की निष्ठुरता के समक्ष मानवतावादी दृष्टि अन्धत्व में समा गई है। उनके लिए न जीवन का मूल्य है, और न जगत का। उन्हें तो स्वार्थ के अन्धेरे में घेरा हुआ है। मनुष्यता से तो उनका दूर का भी परिचय नहीं है।

आदर्शों और सत्य के मूल्यों का ह्रास परन्तु बचाव :
स्वार्थपरता के अन्धकार को विकीर्ण करती यह सरकार आदर्शों और सत्य के मूल्यों से कोई सरोकार नहीं रखती। सम्पूर्ण मानव समाज को संहार से बचाने का प्रयास अहिंसा से ही हो सकता है। लेकिन हिंसा का उन्मूलन भी सम्भव नहीं है। लेकिन निराशा में आशा एवं विकास पथ का पथिक बना मानव सदा से ही इन कुत्सित प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने का क्रम अपनाता रहा है। यही वह साधना है जो संस्कृतियों को जन्म देती रही है।

मानवता का इतिहास ही साधना का इतिहास :
मनुष्य सहज और प्राकृतिक प्रवृत्तियों का उन्मूलन नहीं कर सकता। लेकिन इनको एक व्यवस्था दे सकता है। कला का रंग चढ़ा सकता है। उन्हें उन्नत पथ की ओर मोड़कर ले जाने का भागीरथी प्रयत्न कर सकता है। संस्कृतियों का विकास इसी तपस्या का फल है। हिंसा सहज प्रवृत्ति है लेकिन उस सहज प्रवृत्ति पर अंकुश डाला जा सकता है।

मानव का द्वन्द्वात्मक स्वरूप :
मानव अपने समाज में अपने इस द्वन्द्वात्मक स्वरूप से अभिशप्त है। गाँधी जी हिंसा पर अहिंसा द्वारा नियंत्रण का मंत्र जपते हैं तो यह असफलता उनकी नहीं, वरन् मानवता की पवित्र साधना की असफलता है। हिंसा में मनुष्य गतिहीन हो जाएगा। गाँधीजी उसी हिंसा के विरुद्ध इक्कीस दिन का आमरण व्रत लिए हुए हैं। जीवन निराशा में डूब रहा है।

उपसंहार :
मनुष्य अपनी जीवन नैया को आगे बढ़ाने के उपाय अपनाता है, लेखक भी अपनी लेखन शैली के माध्यम से समय काटता है। लिखता है, परन्तु उस लेखन में सम्बोधन किसी को भी कर सकता है। पत्र लेखक का प्रयोजन केवल सम्बोधित किए व्यक्ति के लिए ही नहीं होता, वह तो स्वयं लेखक के लिए भी महत्त्वपूर्ण होता है। विविध अनुभूतियाँ जीवन चक्र को विविधता देती हैं। विविधता का दृश्य जगत अभिन्नता के धारा प्रवाह में बहता रहे, एक ऐसा अदृश्य सूत्र इस विविधता को पिरोकर आकर्षण का केन्द्र बने भारत माता के हृदय का हार।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 2 सवा सेर गेहूँ

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सवा सेर गेहूँ अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
सवा सेर गेहूँ उधार लेने के बाद शंकर को क्या-क्या कष्ट सहने पड़े? (2009, 13, 15)
उत्तर:
प्रस्तावना :
अतिथियों की सेवा और भक्ति के लिए शंकर, एक दिन अपने घर पर आए हुए महात्माओं को भोजन कराने के लिए गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ लेकर आया। उसकी पत्नी ने गेहूँ पीसे और गेहूँ के आटे का भोजन उन महात्माओं को कराया। अगले दिन प्रात:काल महात्मा तो आशीर्वाद देकर चलते बने। लेकिन शंकर की घरेलू दशा इस तरह खराब हुई कि उस पर आठ-आठ आँसू रोना आता है। क्योंकि महाराज के सवा सेर गेहूँ साढ़े पाँच मन में बदल गये थे।

पारिवारिक विघटन :
शंकर का छोटा भाई मंगल अलग हो गया। घर का बँटवारा हो गया। साथ रहकर दोनों किसान थे। अब दोनों ही मजूर (मजदूर) हो गए। चूल्हे अलग-अलग जलने लगे। भाई-भाई शत्रु बन गए। प्रेम, खून और दूध के बन्धन टूट गए। कुल मर्यादा का स्थापित वृक्ष सूखने लगा। कई दिन तक शंकर को भूख-प्यास और नींद नहीं आई। शारीरिक रूप से दुर्बल हो गया। बीमारी ने जकड़ लिया। खेती केवल मर्यादा भर के लिए रह गई थी।

शंकर :
एक बन्धुआ मजदूर-महाराज से महाजन बने महाराज के यहाँ ऋण न चुका पाने की दशा में शंकर को बंधुआ मजदूर होना पड़ा। उसे आधा सेर जौ प्रतिदिन, एक कम्बल और मिरजई वर्ष में एक बार दिया जाने लगा।

उपसंहार :
शंकर को बीस वर्ष तक बंधुआ मजदूर की तरह काम करना पड़ा महाराज महाजन के यहाँ, फिर भी एक सौ बीस रुपये का ऋण उसके सिर बाकी रहा। शंकर के जवान बेटे को गरदन पकड़कर उस ऋण की अदायगी के लिए बंधुआ मजदूर बनाया गया। जब तक. शंकर जीवित रहा तब तक महाराज के सवा सेर गेहूँ किसी देवता के अभिशाप के दाने की तरह उसके सिर से नहीं उतरे।

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प्रश्न 2.
‘महाराज’ के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
महाराज :
एक सहायक के रूप में-शंकर के गाँव का महाराज गाँव के लोगों की सहायता आवश्यकता पड़ने पर किया करता था। शंकर को जब गेहूँ की जरूरत पड़ी तो वह उसे सवा सेर गेहूँ देता है और उसकी सहायता समय पर कर देता है।

खलिहानी लेने वाला महाराज :
महाराज अपने गाँव के किसानों से वर्ष में दो बार खलिहानी माँगने जाता है। प्रत्येक किसान आदरपूर्वक श्रद्धा से खलिहानी में अच्छी तौल का अन्न देते हैं। शंकर तो उसे बेहिसाब खलिहानी देता है।

गाँव का अकेला महाजन महाराज :
गाँव के किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता अन्न या धन देकर करता रहता है। गाँव में वह ऐसा अकेला ही व्यक्ति है, जो सभी किसानों की जरूरत के समय सहायता करने को तैयार रहता है। लेकिन सभी से ऊँचे दर का मूद वसूल करता है।

लोभी लालची महाजन :
शंकर के गाँव का महाजन लोभी और लालची है। वह किसी भी व्यक्ति को अपने लालच के चंगुल में फंसाकर उसे शीघ्र मुक्ति नहीं देता। स्वयं शंकर उससे सवा सेर गेहूँ उधार लेता है। सात वर्ष में उस सवा सेर गेहूँ का साढ़े पाँच मन गेहूँ के ऋण का बोझ शंकर पर डाल देता है। जीवन भर उसके ऋण को शंकर चुका नहीं पाता।

निर्दयी और कठोर हृदय महाराज :
महाराज सूदखोर होने के साथ-साथ निर्दयी भी है और कठोर हृदय भी। शंकर के बीमार होने की दशा में भी वह उसे अपने यहाँ काम करने से मुक्ति नहीं देता है। अन्त में शंकर इस संसार से विदा लेता है। उसके बाद भी एक सौ बीस रुपये का ऋण शेष बताकर उसके (शंकर के) जवान बेटे को भी बंधुआ मजदूरी करने के लिए पकड़ लेता है। उसमें दीन-दुःखियों के प्रति कोई भी सहृदयता और सहानुभूति नहीं है।

एहसान न मानने वाला बेईमान महाराज :
शंकर अपने खेतों से महाराज को जी खोलकर खलिहानी देता है। वह सोचता है कि मैं इनके सवा सेर गेहूँ को अलग से क्या दूँ? वह सोचता है कि महाराज भी इसी तरह समझ लेंगे, जिस तरह मैं सोच रहा हूँ। लेकिन शंकर की उदारता का लाभ वह महाराज लेता रहा और उसके ऊपर सवा सेर गेहूँ के बदले साढ़े पाँच मन गेहूँ के ऋण का बोझ रख दिया। महाराज एहसान फरामोश और बेईमान व्यक्ति है।

लोगों की श्रद्धा और भक्ति का लाभ लेना :
महाराज शंकर के गाँव के सभी किसानों की श्रद्धा और भक्ति की भावना का लाभ स्वयं लेता रहा। प्रत्येक किसान उस महाराज को वर्ष में खेती पकने पर दो बार खलिहानी देते हैं। वे उसके प्रति अंधी भक्ति रखते हैं। उन लोगों को अगले जन्म में ऋण चुकता करने का भय दिखाकर सरल और उदार हृदय लोगों का शोषण करता है।

उपसंहार :
शंकर के गाँव का महाराज एक चालाक, धोखेबाज, सूदखोर व्यक्ति है जो प्रत्येक क्षण लोगों के शोषण का नया मार्ग अपनाता रहता है।

प्रश्न 3.
“शंकर एक गरीब किसान होते हुए भी समस्याओं से कभी घबराता नहीं था।” उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
प्रस्तावना :
शंकर गाँव का किसान है। सीधा सादा व्यक्ति है। आहार-व्यवहार में भी भोला-भाला। वह यदि ठगा भी गया, तो भी खुश ही रहा। भाग्य और जन्म-जन्मान्तर के खेल में वह विश्वास करता था। उसके दरवाजे पर आये हुए अतिथि भगवान होते थे। उनकी खातिर में सब कुछ खर्च कर देता था। वह विश्वास करता था कि ‘साधु न भूखा जाय’, का सिद्धान्त उसके लिए सर्वोपरि था।

महात्माओं का आना :
शंकर के घर में आर्थिक तंगी थी। दोनों समय भोजन मिलने में भी कोताही। परन्तु महात्माओं के लिए गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ उधार लाया और फिर उन अतिथियों को छककर भोजन कराया गया। महात्मा आशीष देकर विदा हुए।

सवा सेर गेहूँ का ऋण बना पहाड़ जैसा भार :
शंकर गाँव के महाराज को खलिहानी में वर्ष में दो बार अन्न देता रहा। वह भी पाँच सेर से बढ़कर। फिर भी महाराज ने अपने सवा सेर गेहूँ के ऋण को द्रोपदी का चीर बना दिया। अपने सवा सेर गेहूँ के बदले उसने शंकर पर साढ़े पाँच मन गेहूँ का ऋण लाद दिया।

बंधुआ मजदूर बना शंकर :
शंकर महाराज के ऋण को चुकाने की स्थिति में नहीं रहता। सूद के रूप में वह मजदूर बनकर महाराज के यहाँ काम करता है। घर के खर्चे के लिए उसकी पत्नी और बच्चे मजदूरी करते हैं। इतना सब कुछ होने की दशा में शंकर बिल्कुल भी नहीं घबराता। महाराज की प्रत्येक बात को अपना संस्कार और पूर्वजन्म का प्रभाव समझकर स्वीकार कर लेता है।

शंकर का अन्त और पुत्र का बंधुआ मजदूर होना :
शंकर महाराज के यहाँ बीस वर्ष तक बंधुआ मजदूर की तरह कार्य करता है। अन्त में उसकी मृत्यु हो जाती है। फिर भी “एक सौ बीस रुपये” का ऋण अपने सिर छोड़कर दूसरी दुनिया में चला जाता है। महाराज उसके जवान बेटे को गरदन पकड़कर अपने घर बंधुआ मजदूर बनाकर रखता है।

उपसंहार :
इस दुनिया में शंकर जैसे परिश्रमी, ईमानदार लोग पूर्व संस्कारों और अगले जन्म के भय के वशीभूत होकर सवा सेर गेहूँ के ऋण को किसी देवता के “अभिशाप के दाने की तरह” भोगते रहते हैं।

प्रश्न 4.
“यह कहानी प्राचीन भारत में किसानों के होने वाले शोषण को उजागर करती है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर:
प्रस्तावना-शंकर एक गरीब किसान अपने गाँव में कृषि करता है। वे दो भाई हैं। उसका दूसरा भाई मंगल है। दोनों भाइयों का परिवार सन्तोष और धैर्य से गरीबी में भी एक इज्जतदार कृषक परिवार के सम्मान को पाया हुआ है। दो बैलों से किसानी करते हैं। निर्धनता का यह आलम है कि शंकर को भोजन मिला तो खाया, न भी मिला तो भला, चना-चबैना से गुजर हुई-पानी पिया सो गया। ‘राम’ का जाप करते नींद आयी।

लेकिन उस शंकर में अतिथियों, महात्माओं के प्रति बड़ी श्रद्धा थी, भक्ति थी। उनके आने पर उनका आतिथ्य अच्छे भोजन से कराया जाना नहीं भूलता। वह स्वयं भूखा सो सकता था, लेकिन साधू को कैसे भूखा सुलाता क्योंकि भगवान के भक्त जो ठहरे।

एक दिन संध्या समय कुछ साधु-महात्मा आए। सन्ध्या समय भोजन आदि का इन्तजाम करने की चिन्ता में शंकर गाँव में गया। किसी ने भी गेहूँ का आटा नहीं दिया। देते भी कहाँ से, उनके घर में जौ के अलावा कोई अन्य अन्न होता ही नहीं। चिन्तित शंकर को गाँव के महाराज के यहाँ से सवा सेर गेहूँ उधार मिल गए। उसकी पत्नी ने गेहूँ पीसा और साधु महात्माओं को भोजन कराया। प्रातः हुई और महात्मा आशीष देकर चले गये।

महाराज रूपी महाजन :
शंकर ने महाराज को खलिहानी के रूप में कुछ ज्यादा खलिहानी दे देना उचित समझा कि सवा सेर गेहूँ क्या लौटाऊँ ? पसेरी के बदले कुछ ज्यादा ही खलिहानी दे दी गई। वर्ष में दो बार खलिहानी उगाहने का रिवाज इन महाराज महोदय ने पनपा लिया था। प्रति किसान दो बार खलिहानी से वर्ष में काफी अन्न प्राप्त होता रहा। ये लोग बिना परिश्रम किए ही मुफ्त में अन्न धन प्राप्त करते रहे। ये सब होता था किसानों की उदारता और दरियादिली के कारण।

शोषण की स्थिति :
कृषक के कृषि उत्पादन पर न जाने कितने प्रकार की रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्था के चलते निकम्मे लोगों के पोषण का भार होता था। इसका प्रभाव सीधा कृषक की आर्थिक दशा पर पड़ता था। कथित महाराज भी इन्हीं निकम्मे लोगों का प्रतीक है जिसने शंकर जैसे सीधे भोले-भाले कृषक को अपने चंगुल में फंसाया हुआ है।

शंकर को दिए गये सवा सेर गेहूँ का ऋण जीवन के बीस वर्ष तक बंधुआ मजदूर के रूप में महाराज के यहाँ मजदूरी करते-करते चुकता नहीं होता है। उसे अगले जन्म में चुकाने का भय दिखाकर, शंकर जैसे भोले और अशिक्षित किसानों को चतुर चालाक निकम्मे व्यक्ति ठगते रहते हैं।

महाराज से बना महाजन सवा सेर गेहूँ के बदले साढ़े पाँच मन गेहूँ का ऋण वसूलता है। सूद में सारे जीवन भर मजदूरी कराता है, बेगार लेता है। अन्त में बीस वर्ष की बंधुआ मजदूरी में, रोगी होकर, तिल-तिल जलती जिन्दगी से मुक्ति पाता हुआ शंकर दूसरी दुनिया में चला जाता है।

तात्पर्य है कि किसान ऋण में ही पैदा हुआ, ऋण में ही जीवन जीता रहा और ऋण में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। फिर भी ऋण का चुकता नहीं हुआ। शंकर सम्पूर्ण किसान जाति का प्रतीक है। महाराज रूपी महाजन उसके जवान पुत्र को भी एक सौ बीस रुपये का ऋण जिसे उसका बाप चुका नहीं पाया, बंधुआ मजदूर के रूप में चुकाने को मजबूर करता है।

अतः किसान का शोषण अन्तहीन हो गया। वह ऋण पीढ़ी-दर-पीढ़ी चुकाने के लिए ये महाराज रूपी महाजन अपने जाल बुनते रहते थे।

उपसंहार :
“यह कहानी प्राचीन भारत में किसानों के ऊपर होने वाले शोषण को उजागर करती है” इस कथन से हम पूर्णतः सहमत हैं। भारत के कुछ क्षेत्रों में यह शोषण अभी भी चालू है। सरकार इस तरह के शोषण के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करे और ऐसे कदम उठाए जिससे किसानों को उनकी आवश्यकता का ऋण समय पर उपलब्ध हो सके। साथ ही किसानों को भी अपने भले-बुरे का ज्ञान होना चाहिए। उन्हें भी शिक्षित होकर इन महाजन रूपी दैत्यों के चंगुल से बचे रहने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रश्न 5.
प्रस्तुत कहानी में आपको किस पात्र ने अधिक प्रभावित किया है? और क्यों? लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तावना :
एक गाँव है किसानों का। प्रायः सभी कृषि कर्म करते हैं। अपने-अपने कार्य में लगे रहकर, दीनता की पराकाष्ठा तक पहुँचकर भी स्वयं को धन्य, संतुष्ट और भाग्यशाली समझते हैं। भाग्य भरोसे और जन्म-जन्मान्तर के भोग और संस्कारों का प्रतिफल मानते हुए इस जीवन के घोर नरकतुल्य अवसादों की जिन्दगी जीते हैं।

पात्र परिचय :
प्रस्तुत कहानी में-शंकर, महाराज (महाजन), महात्मा (अतिथि), मंगल (शंकर का भाई), शंकर की पत्नी, उसका बेटा और मंगल की पत्नी और बच्चे, सभी पात्र हैं जो भारतीय कृषक गाँवों के निवासी किसान हैं। सभी अशिक्षित, महाजन (महाराज) की ठगी के शिकार, साधु-महात्माओं के आतिथ्य में बढ़-चढ़कर सामर्थ्य से अधिक खर्च करके स्वयं को ईश भक्तों की कतार में खड़ा करने की होड़ वाले हैं। इनका प्रतीक पात्र शंकर है। शंकर अपनी सीधी-सादगी भरी जिन्दगी, कर्मठ, अशिक्षा के कारण ठगी का शिकार होता है। जीवन भर शोषित ही रहकर संसार से विदा लेता है। उसका परिवार विघटित हो जाता है। दोनों भाई इज्जतदार किसान से मजदूर होकर दैन्य जीवन गुजारते हैं। प्रतिष्ठा दाँव पर लगा दी जाती है।

उपर्युक्त निर्दिष्ट पात्रों में मुझे प्रभावित किया है शंकर ने। इस पात्र ने मुझे क्यों प्रभावित किया है-इसका उत्तर भी इसी शोषित शंकर की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक दशा के चित्रण के संदर्भ में दे दिया जाएगा।

शंकर और मंगल निर्धन और शोषित कृषक परिवार के सदस्य हैं। लेकिन अपनी सीधी व सादगी भरी जिन्दगी की गाड़ी परिश्रम करके खींच रहे हैं। सामाजिक रूप से थोड़ा अधिक सम्मान पाने वाला अशिक्षित व्यक्ति दिखावे और बड़प्पन के चक्कर में पड़कर विपत्तियों और कष्टों को आमंत्रित करता रहता है। यही इस शंकर ने किया, स्वयं को अतिथि सत्कार करने में श्रेष्ठ, ईश भक्तों में श्रेष्ठ प्रदर्शित करने की आदत वाला अशिक्षित व्यक्ति साहूकारों से प्राप्त ऋण के चंगुल में पड़कर अपना सर्वस्व गँवा बैठता है।

महात्मा को गेहूँ का श्रेष्ठ भोजन कराने के चक्कर में सवा सेर गेहूँ का साढ़े पाँच मन गेहूँ हो जाता है और उस पहाड़ जैसे ऋण के चुकाने में सारा जीवन बंधुआ मजदूर के रूप में व्यतीत करता है। बड़े धैर्य से इसको सहन करते हुए अपनी पत्नी और पुत्र को भी ऋण चुकाने के चक्कर में कष्ट की चक्की में पिसने को मजबूर कर देता है।

यह शंकर ही है, जो प्रत्येक नई समस्या पैदा करता है अपने परिवार के लिए और स्वयं अविचलित होते हुए उस समस्याग्रस्त जीवन में फंसा रहता है। अपनी श्रेष्ठता को कायम रखने के कारण उसका और उसके भाई मंगल का आपसी विभाजन हुआ। स्वयं ने कड़े परिश्रम से परिवार के वृक्ष को रोपा, सींचा, बड़ा किया परन्तु अन्त में उसको काटने के लिए भी स्वयं महाजन के ऋण को अस्त्र रूप में प्रयोग करता है।

वर्ष में दो बार खलिहानी लेने वाला महाराज रूपी महाजन उसकी उदारता, सहृदयता, भोलेपन, श्रद्धा और भक्ति का लाभ उठाता है। शंकर ऐसे ठग की चालों में अपनी उदारता का प्रभाव देखना चाहता है। इसे चाहिए था पहली बार की ही खलिहानी पर सवा सेर गेहूँ अलग से अधिक दे देता है। परन्तु अपनी अव्यावहारिक नीति के कारण अपने परिवार के सदस्यों को भी कष्ट में झोंक देता है। स्वयं भी बीस वर्ष बंधुआ मजदूर की जिन्दगी भोगता हुआ चल बसता है।

उपर्युक्त सभी कारण ऐसे हैं जिनसे प्रभावित होकर शंकर सभी पाठकों का प्रिय पात्र बन जाता है। सभी इसके प्रति सहानुभूति रखते हैं।

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प्रश्न 6.
‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी के आधार पर शंकर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी के आधार पर शंकर के चरित्र की दो विशेषताएँ लिखिए। (2017)
उत्तर:
प्रस्तावना :
‘सवा सेर गेहूँ’ मुंशी प्रेमचन्द की सामाजिक विरसता को अभिव्यक्ति देने वाली श्रेष्ठ कहानी है। कहानीकार ने इस कहानी में पात्रों का चयन एक खास वर्ग से किया है जिसकी करतूतों से समस्त भारतीय कृषक समुदाय सदैव से त्रस्त रहा है। आजादी के बाद लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था कायम होने के उपरान्त भी इस शोषक, शोषित और शोषण की अवस्था में कोई भी फर्क नहीं दीख पड़ा है। मुंशी प्रेमचन्द अपनी कहानियों में किसी एक समस्या को प्रधान रूप से इंगित करके जरूर चलते हैं लेकिन उसके परिप्रेक्ष्य में अन्य समस्याएँ उत्पन्न होकर समाज को जड़ समेत उखाड़ती-सी प्रतीत होती हैं।

शंकर एक प्रमुख पात्र :
‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी का प्रमुख पात्र शंकर है। सम्पूर्ण कहानी का घटना चक्र उसके चारों ओर घूमता है। अब यहाँ उसके चरित्र की कुछ विशेषताओं का उल्लेख करते हैं

(1) शंकर का आतिथ्य भाव :
शंकर अपने द्वार पर आए किसी भी महात्मा, साधु, संन्यासी या अन्य अतिथियों का आतिथ्य भक्ति और श्रद्धा से करता है। उसके लिए वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। घर में महात्मा को सांध्यकालीन भोजन में गेहूँ के आटे का उत्तम भोजन देकर, पुण्य अर्जन की कामना करता है। इसके निमित्त अपने ही गाँव के महाराज (महाजन) से सवा सेर गेहूँ उधार लाता है। उसकी पत्नी गेहूँ पीसती है, फिर भोजन तैयार होता है। इस अतिथि सत्कार के कार्यक्रम में शंकर के घर के सभी सदस्य अपना योग देते हैं। परन्तु स्वयं अपने और घर के : सदस्यों के लिए सम्भवत: चना-चबैना खाकर या पानी पीकर ही रात्रि गुजारना उनकी नियति था। आतिथ्य सत्कार का पुण्य और श्रेष्ठ गृहस्थी के जीवन का सपना कंगाली की कराहट में विभाजन तक पहुँच जाता है।

(2) अपने परिवार के प्रति समर्पित :
शंकर अपने परिवार के प्रति पूर्णतः समर्पित है। वह सप्रयास दोनों भाइयों के परिवार को सम्मिलित रूप में खड़ा करता है। वह परिवार रोपे गये, सींचे गए वृक्ष की तरह पल्लवित हुआ है। परन्तु दीनता की आरी ने असमय में काटना प्रारम्भ कर दिया जिससे शंकर की दर्द भरी चीख उठती है। लेकिन रात्रि के अन्धकार में अपने दुपट्टे से मुँह बाँधकर हफ्तों तक भूखे रहते समय बिताता है। वह नहीं चाहता कि उसका समृद्ध वृक्ष-परिवार विभाजित हो।

(3) सादगी भरा शंकर :
शंकर अपने व्यवहार और आचरण में सीधा-सादा और सादगी भरा है। वह ठग विद्या नहीं जानता। अतः वह स्वयं जैसा है, वैसे ही व्यवहार की आशा अन्य लोगों से करता है। महाराज (महाजन) अपनी चालों से, ठगी के पेंचों से ‘सवा सेर गेहूँ’ देकर ‘साढ़े पाँच मन’ गेहूँ के पहाड़ सरीखे कर्ज में डुबो देता है। यदि वह चालबाज होता, ठग विद्या अपनाने वाला होता तो निश्चय ही उसका परिवार कर्ज के सागर में न डूबता।

(4) अशिक्षित :
शंकर अशिक्षित किसान है। शिक्षित होता तो वह किसी भी तरह महाजन द्वारा ठगाई में नहीं आता और ‘सवा सेर गेहूँ’ का कर्ज तिल से ताड़ नहीं बनने देता।

(5) बंधुआ मजदूर :
शंकर महाजन (महाराज) की कुचालों में फंसकर उसका बँधुआ मजदूर होकर पूरी जिन्दगी बिता देता है। फिर भी उसका एक सौ बीस रुपये का ऋण शेष रह जाता है जिसे चुकता करने के लिए शंकर का नौजवान बेटा उसी राक्षस वृत्ति वाले निर्दयी महाराज द्वारा बंधुआ मजदूर बनाया जाता है।

(6) पति और पिता के रूप में शंकर :
शंकर एक पति के रूप में अपनी पत्नी के प्रति व्यवहार में श्रेष्ठता अपनाता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी उसके कारण हुए कर्ज को चुकाने के लिए कष्ट भोगे।।

शंकर एक पिता के रूप में खरा उतरता है। वह स्वयं निर्धनता के अनेक कष्ट भोगता हुआ भी अपने पुत्र को इन सभी कष्टों का आभास तक नहीं होने देता।

(7) सहृदय भाई :
शंकर एक सहृदय भ्राता है। जब उसका भाई मंगल पारिवारिक रूप से अलग होकर रहने लगता है, तो घर के इस विभाजन को बड़ी मुश्किल से सहन कर पाता है। विघटन और विभाजन को रोकने का उसका प्रयास विफल हो जाता है। अन्त में वह स्वयं इस विभाजन से टूट जाता है।

(8) शंकर की उदारता :
शंकर सहृदय और उदार है। सबसे पहले तो वह अपने परिवार के प्रति उदारता का व्यवहार करता है। दूसरे, घर के द्वार पर आए हुए अतिथियों का अपनी शक्ति से ऊपर होकर सत्कार करता है। साथ ही ठग और चालबाज महाराज को भी खलिहानी के रूप में अधिक अन्न देता है। यह सब शंकर के हृदय की उदारता ही है।

(9) उपसंहार :
शंकर सीधा, सरल व्यवहार वाला किसान है। किसान प्रकृति से सहनशील, कष्ट-सहिष्णु, भाग्यवादी और पूर्वजन्म के संस्कारों के प्रभाव से प्रभावित होते रहते हैं। ये सभी गुण शंकर में एक साथ विद्यमान हैं।

सवा सेर गेहूँ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शंकर के द्वार पर पधारे महात्मा की वेशभूषा कैसी थी?
उत्तर:
संध्या समय शंकर के द्वार पर एक महात्मा पधारे। वह तेजस्वी मूर्ति थे, पीताम्बर गले में, जटा सिर पर, पीतल का कमंडल हाथ में, खड़ाऊँ पैर में, ऐनक आँखों पर, सम्पूर्ण वेष महात्माओं का सा था।

प्रश्न 2.
शंकर ने किससे, कितना और क्यों गेहूँ उधार लिया था?
उत्तर:
गरीब किसान शंकर ने गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ उधार लिये थे क्योंकि एक दिन उसके द्वार पर एक महात्मा आ पहुँचे थे और उसके पास उन्हें खिलाने के लिए गेहूँ का एक दाना तक न था।

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सवा सेर गेहूँ पाठ का सारांश

शंकर एक किसान :
किसी गाँव में शंकर नाम का एक किसान था। वह अपने काम से काम रखता था, वह सीधा सादा और गरीब था। वह किसी के भी लेन-देन से दूर रहता था। व्यवहार में सरल; भोजन-अशन में सादा, जो मिला खा लिया। परन्तु द्वार पर आए अतिथि उसके लिए भगवान थे। स्वयं भूखा रह लेता, परन्तु आगन्तुक साधु-संन्यासियों की सेवा में दत्तचित्त रहता था। एक दिन घर आए हए महात्माओं के लिए घर में गेहूँ का आटा नहीं था। घर में सिर्फ जौ का ही आटा था। अतिथियों को तो गेहूँ का ही भोजन कराना है। अतः वह गाँव भर में आटे की तलाश में गया। पूरे गाँव में आटा नहीं मिला।

गाँव का महाराज :
गाँव के महाराज से सवा सेर गेहूँ लिए, स्त्री ने आटा तैयार किया। महात्मा लोग भोजन करके आशीर्वाद देकर अगले दिन प्रात:काल चल दिए।

महाराज की खलिहानी :
महाराज वर्ष में दो बार खलिहानी लेते थे। शंकर ने सोचा कि इन्हें सेवा सेर गेहूँ क्या हूँ, पसेरी भर से ज्यादा खलिहानी दे दूँगा। दोनों ही आपस में समझ लेंगे। चैत के महीने में महाराज पहुँचे, डेढ़ पसेरी गेहूँ दे दिए गए। शंकर ने सवा सेर गेहूँ से स्वयं को उऋण समझ लिया। सवा सेर गेहूँ की चर्चा महाराज ने कभी नहीं की। महाराज अब महाजन होने लगे।

शंकर के घर की दशा :
शंकर किसान से मजदूर हो गया। छोटा भाई मंगल अलग हो गया। भाई के अलग होने पर शंकर फूट-फूट कर रोने लगा। कुल मर्यादा का वृक्ष उखड़ने लग गया। सात दिन लगातार एक दाना भी उसके मुंह तक नहीं गया। दिन में धूप में काम करता। मुँह लपेटकर रात को सोता। रक्त जल गया मांस मञ्जा घुल चुकी। खेती मान-मर्यादा के लिए रह गई। सब चौपट हो चला। सात वर्ष बीत चुके। शंकर मजदूरी से लौटकर आ रहा था। महाराज ने बुलाया और कहा कि तू अपने बोज-बेंग का हिसाब कर ले। तेरे हिसाब में साढ़े पाँच मन गेहूँ बाकी पड़े हैं। तू देने का नाम ही नहीं लेता, हजम करना चाहता है।

सवा सेर का साढ़े पाँच मन गेहूँ :
शंकर को अचम्भा हुआ। उसने कहा कि मैंने तुमसे कब गेहूँ लिए जो साढ़े पाँच मन हो गए। मुझ पर किसी का भी एक दाना व एक पैसा भी उधार नहीं है। महाराज ने कहा कि तुम अपनी नीयत के कारण कष्ट भोग रहे हो तभी तो खाने को नहीं जुड़ता। तब फिर महाराज ने सवा सेर गेहूँ का जिक्र किया।

शंकर ने कहा कि मैं बढ़-चढ़कर खलिहानी देता रहा। तुम्हारे सवा सेर गेहूँ अभी चुकता नहीं हुए। महाराज ने कहा-बख्शीस सौ-सौ हिसाब जौ-जौ। व्यर्थ की बहस छोड़, मेरा उधार दे।

बंधुआ मजदूर :
शंकर काँप गया। मेहनत मजदूरी करके साल भर में 60 रुपये जुड़े, उन्हें जमा करा दिया, शेष रुपया दो-तीन माह में लौटा देने का वादा किया। पन्द्रह रुपए शेष रह गए। उन्हें चुका नहीं सका। शंकर महाराज के यहाँ बंधक मजदूर हो गया। उसे आधा सेर जौ रोज कलेवा के लिए, ओढ़ने को साल में एक कम्बल मिला करता। एक मिरजई बनवा देता। शंकर महाराज की गुलामी में बँध गया। सवा सेर गेहूँ की बदौलत उम्र भर के लिए गुलामी की बेड़ियों में बँध गया।

उपसंहार :
शंकर इस सब को पूर्व जन्म का संस्कार मानता था। वे गेहूँ के दाने किसी देवता के शाप की भाँति पूरे जीवन उसके सिर से नहीं उतरे। शंकर महाराज के यहाँ बीस वर्ष तक गुलामी करता रहा। संसार से चल बसा। फिर भी एक सौ बीस रुपये उसके सिर पर सवार थे। शंकर के जवान बेटे को गरदन पकड़कर अपने यहाँ शंकर के ऋण को चुकाने के लिए बंधक मजदूर बनाया। वह आज भी काम करता है। ऐसे शंकरों और महाराजों से दुनिया भरी पड़ी है।

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MP Board Class 11th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 1 कर्मयोगी लाल बहादुर शास्त्री

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कर्मयोगी लाल बहादुर शास्त्री अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
लाल बहादुर शास्त्री को निष्काम कर्मयोगी क्यों कहा गया? (2014)
उत्तर:
प्रस्तावना-लाल बहादुर शास्त्री के नाम के साथ यदि ‘कर्मयोगी’ भी जोड़ दिया जाए, तो यह अधिक उपयुक्त होगा। उनका सम्पूर्ण जीवन कर्म से परिपूर्ण था। शास्त्री जी एक सामान्य परिवार में जन्मे, पले, बड़े हुए और शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा भी सामान्य स्तर से प्रारम्भ हुई। इस तरह एक साधारण परिवार का बालक प्रधानमन्त्री के उत्तरदायित्वपूर्ण पद तक पहुँचे, यह एक अति आश्चर्य की बात मानी जाएगी। उनके जीवन में असुविधाएँ ही असुविधाएँ थीं। कठिनाइयों का तो कोई जोड़-तोड़ ही नहीं रहा। लेकिन इन सबके पीछे स्वयं शास्त्री जी की विचारधारा और कर्म प्रधान जीवन में ही उनके जीवन की सफलता का रहस्य छिपा था। उनको जीवन का रास्ता स्वयं निर्मित करना पड़ा। उन्हें किसी के द्वारा बना-बनाया रास्ता नहीं मिला।

जीवन शैली और दर्शन :
अब आती है बात, शास्त्री के जीवन की शैली और उनके जीवन के प्रति दर्शन की। वे ऐसे लोगों में से नहीं थे जो भाग्य में विश्वास करते थे और यह सोचकर बैठ जाते कि जो भाग्य में होगा, वही प्राप्त होगा और देखा जाएगा। भाग्यवादी लोगों को कभी अचानक सफलता मिल जाती है, ऐसा उनके साथ नहीं था। यह उनके जीवन की शैली नहीं थी। वे ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें अपने चिन्तन और कर्म शक्ति पर अधिक भरोसा होता है। वे अपने हाथ की लकीरों को मिटाकर चलने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन का रास्ता स्वयं चुना और उस पर आगे बढ़ते गये।

कर्मफल में निष्काम भाव :
शास्त्री ने अपने कर्म और उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। कर्म साधना ही उनके लिए ईश्वर की साधना थी, भक्ति थी। वे अपने कर्म के लिए समर्पित थे। कर्म के फल और उसकी परिणति में उन्हें कभी भी आशा नहीं थी। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे निराशावादी थे। सम्पूर्ण भाव से कर्म में निरत रहना, उनकी ईश आराधना और भक्ति से कम नहीं थी। उन्हें अपने कर्म फलानुसार जब भी अवसर प्राप्त हुए, वे उस कर्म के फल की ओर उपेक्षापूर्ण दृष्टि ही अपनाते रहे। इस तरह ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में भगवान् श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म की व्याख्या करते हुए जो मार्ग दिखाया है, उसी का अनुपालन उन्होंने अपने जीवन में पूरे समय किया। इस सबका यह निष्कर्ष निकलता है कि श्री शास्त्री जी निष्काम कर्मयोगी थे।

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प्रश्न 2.
“शास्त्री जी अत्यन्त लोकप्रिय थे”, कारण सहित उनकी लोकप्रियता पर प्रकाश डालिए। (2008, 09)
उत्तर:
प्रस्तावना :
शास्त्री जी सदैव ही भारतीय आजादी के आन्दोलनों के दौरान- चाहे जेल में रहे या जेल से बाहर; वे समाजगत समस्याओं के निराकरण के लिए जूझते रहे। उनके जीवन का उद्देश्य समाज और देश में रचनात्मक कार्यों को प्राथमिकता से पूरा करना था। इस दिशा में, वे पूरी लगन और तत्परता से प्रयत्नशील रहे और कार्यों को सम्पन्न किया और सहयोगीजनों से सहयोग प्राप्त किया।

शास्त्रीजी और जनसेवा :
रचनात्मक कार्यों के अतिरिक्त एक पदाधिकारी के रूप में भी जनसेवा को महत्त्व प्रदान किया। वे सन् 1935 ई. में संयुक्त प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे और सन् 1938 तक जनसेवा में लगे रहे। खासतौर से उनका लगाव किसानों की सेवा व उनके उत्थान के उपायों के प्रति रहा। उन्होंने किसानों को संगठित किया। इस कार्य शैली और जीवन दिशा की सोच के कारण उन्हें उस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया, जो किसानों की दशा का अध्ययन कर रही थी। यह सन् 1936 की बात है। उन्होंने अपनी पक्की लगन और दृढ़ आस्था से अपनी रिपोर्ट तैयार की और उस रिपोर्ट में जमींदारी उन्मूलन पर विशेष बल दिया था।

इलाहाबाद की नगरपालिका से भी लगातार 6 वर्षों तक किसी न किसी रूप में जुड़े रहे। वे ग्रामीण जीवन शैली से पूर्णतः परिचित थे ही। अब इसके साथ इलाहाबाद नगरपालिका ने जनसेवा का भी अनुभव जोड़ दिया। लोकतन्त्र की आधारभूत इकाई इलाहाबाद नगरपालिका थी। इसके कार्य करने से देश की छोटी-छोटी समस्याओं और उनके निराकरण की व्यावहारिक प्रक्रिया से वे बहुत अच्छी तरह परिचित हो चुके थे।

शास्त्रीजी का संसदीय जीवन :
शास्त्री जी के व्यक्तित्व में कार्य के प्रति निष्ठा और परिश्रम करने की अदम्य क्षमता व्याप्त थी। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें सन् 1937 ई. में संयुक्त प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभा के लिए निर्वाचित कर लिया गया। अगर सही अर्थ की बात मानें तो शास्त्री जी का संसदीय जीवन यहीं से प्रारम्भ हुआ और उसका समापन देश के प्रधानमन्त्री के पद तक पहुँचने में हुआ।

उपसंहार :
शास्त्रीजी को भारतीय राजनीति की इतनी सही और गहरी पकड़ थी कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा कि वे उनके राजनीतिक गुरु थे और उन्हीं के मार्गदर्शन में उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई।

प्रश्न 3.
शास्त्री जी के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2012)
अथवा
कर्मयोगी लाल बहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व की दो विशेषताएँ लिखिए। (2016)
उत्तर:
शास्त्री जी के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं-
(1) शास्त्री जी का निष्काम कर्मयोग :
शास्त्री जी एक सामान्य स्थिति के परिवार से ऊपर उठकर देश के प्रधानमन्त्री के अति महत्त्वपूर्ण पद तक पहुँचे, इस सबका रहस्य उनके कर्मयोगी होने में निहित है। लोगों को बहुत से आसान तरीके मिल जाते हैं और वे आगे तक सुविधाभोगी जीवन बिताते हैं। लेकिन शास्त्री जी ऐसे नहीं थे। वे भाग्य पर भरोसा करके बैठे रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे तो उन लोगों में से थे, जो अपने हाथ की लकीर मिटाकर अपने चिन्तन और कर्म की शक्ति पर भरोसा करते थे और आगे बढ़ते थे। शास्त्री जी के लिए कर्म ही ईश्वर था। वे किसी भी कर्म के फल के प्रति आशावान नहीं थे। वे तो मात्र कर्म में ही समर्पित थे। उनका जीवन दर्शन गीता के निष्काम कर्मयोग से प्रभावित था।

(2) अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ आस्था :
शास्त्री जी अपने कर्म उद्देश्य को प्राप्त करने में आस्था रखते थे। उद्देश्य में सफलता उनका ध्येय होता था।

(3) उद्देश्य प्राप्ति के लिए कर्म :
शास्त्री जी अपने निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कर्म के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। अपनी समग्र क्षमताओं से विश्वास के द्वारा उद्देश्य प्राप्ति के लिए कर्म करते जाना उनके जीवन का प्रधान लक्ष्य था।

(4) उद्देश्य प्राप्ति हेतु कर्म करने के लिए समर्पित :
शास्त्री जी सदैव ही अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के प्रति सद्प्रयासों से कर्म के प्रति संकल्पित थे। इस संकल्प की पूर्ति करने तक वे कर्म निष्पादन में समर्पित रहते थे।

(5) स्वस्थ चिन्तन :
शास्त्री जी का चिन्तन पूर्णतः स्वस्थ था। अपने स्वस्थ चिन्तन से ही वे अपनी सफलताएँ प्राप्त करते चले गये। शास्त्री का चिन्तन ही ऐसा था जिससे स्वयं अपना, देश का विकास आगे बढ़ सका। इस चिन्तन में भी भक्ति और कर्म का सिद्धान्त निहित था।

(6) श्रम, सेवा, सादगी और समर्पण :
शास्त्री जी को कोई भी उत्तरदायित्व सौंपा गया, वे उस उत्तरदायित्व का निर्वाह श्रम से, सेवाभाव से, सादगी से और समर्पण (त्याग) की भावना से करते थे। इस तरह किसी भी कर्म के फल के प्रति उनका स्वार्थ अथवा लगाव नहीं था।

(7) सादगी, विनम्रता एवं सरलता :
शास्त्री जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी सादगी। वे साधारण परिवार में उत्पन्न हुए, सादगी से ही परवरिश हुई परन्तु देश के प्रधानमन्त्री पद पर आरूढ़ शास्त्री जी सदैव सामान्य बने रहे, सादगी से जीवन बिताते रहे। विनम्रता, सादगी और सरलता ने उनके व्यक्तित्व में एक विचित्र आकर्षण पैदा कर दिया था।

(8) कठिनाइयों में भी न घबराना :
शास्त्री जी ने सन् 1930 से सन् 1942 तक के जीवन के सफर में अर्थात् बारह वर्ष की इस समयावधि में लगभग सात वर्ष तक जेल का जीवन काटा। उस साधारण स्थिति वाले व्यक्ति के लिए इस तरह की साधना अत्यन्त कठिनताओं से भरी हुई थी। वे अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं हुए। राजनैतिक अथवा सामाजिक तौर पर उन्हें कोई भी कार्य सौंपा गया, वे उस कार्य के सम्पादन में सफल हुए, घबराए नहीं।

(9) लोकप्रियता :
शास्त्री जी अपनी कार्य शैली और विविध पहलुओं की पूर्ति सम्बन्धी कार्यों के लिए लोगों में बहुत ही प्रिय और प्रसिद्ध हो गए।

(10) आत्मसंयम :
देश में शास्त्री को अति महत्त्वपूर्ण पदों पर स्वाभाविक रूप से अधिकार भी प्राप्त थे परन्तु उन अधिकारों का उपयोग कर्त्तव्यपालन से किया, जिसमें शास्त्री जी का आत्मसंयम ही काम आया। आत्मसंयम से एक श्रेष्ठ नागरिक के गुण विकसित किये जा सकते हैं, ऐसा विचार था शास्त्री जी का।

शास्त्री जी सोचते थे कि हमारा देश प्रजातन्त्रात्मक रूप से आजाद है। अतः उस आजादी का उपभोग एक व्यवस्थित समाज के हित में स्वेच्छा से लगाए गए प्रतिबन्धों के तहत होना चाहिए। इस तरह शास्त्री जी का व्यक्तित्व एक अनुशासित रूप से कर्त्तव्य और अधिकार सम्पन्न कर्मशीलत्व लिए हुए धैर्य और शौर्य (वैचारिक दृढ़ता) का अनुकरणीय उदाहरण है।

प्रश्न 4.
शास्त्री जी ने किन रूपों में प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया?
उत्तर:
प्रस्तावना :
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गाँधी जी द्वारा निर्देशित रचनात्मक कार्यों में लगे रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक पदाधिकारी के रूप में जनसेवा के कार्यों को भी महत्त्व दिया।

संयुक्त प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सचिव :
शास्त्री जी सन् 1935 ई. में संयुक्त प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सचिव बनाए गये। इस पद पर सन् 1938 ई. तक बने रहे। किसानों के प्रति उनके मन में विशेष लगाव था। इसलिए किसानों की दशा का अध्ययन करने के लिए एक विशेष कमेटी बनाई गई और उस कमेटी का उन्हें अध्यक्ष बनाया गया।

जमींदारी उन्मूलन की सिफारिश :
शास्त्री जी ने किसानों की दशा का अध्ययन पूरी लगन से किया। काम पूरा करके एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिस रिपोर्ट में जमींदारी उन्मूलन पर विशेष जोर दिया गया।

नगरपालिका इलाहाबाद से जुड़ाव :
इसके बाद छः वर्ष तक वे इलाहाबाद की नगरपालिका में किसी न किसी रूप में जुड़े रहे। इससे शास्त्री जी के व्यक्तित्व और चिन्तन को नागरिकों की समस्याओं का अति निकटता से अनुभव प्राप्त हुआ। नगरपालिका प्रजातन्त्र की एक आधारभूत इकाई होती है। अतः इसमें कार्य करने से वे देश की छोटी-छोटी समस्याओं और उनके निराकरण की व्यावहारिक प्रक्रिया से अच्छी तरह परिचित हो गए थे।

संयुक्त प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभा के लिए निर्वाचित :
शास्त्री जी सन् 1937 ई. में संयुक्त प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभा के लिए निर्वाचित हुए। इस निर्वाचन के पीछे शास्त्री जी की कार्य के प्रति निष्ठा और मेहनत करने की अदम्य क्षमता थी। सही अर्थ में यदि देखा जाए तो शास्त्री जी के संसदीय जीवन की शुरूआत यहीं से हुई। इसके साथ ही शास्त्री जी प्रधानमन्त्री के पद पर सुशोभित हुए तो इस पद तक पहुँचने के साथ ही संसदीय जीवन का समापन हो गया।

भारतीय राजनीति की सही और गहरी पकड :
शास्त्री जी को भारतीय राजनीति की इतनी सही और गहरी पकड़ थी कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानती थीं। उन्हें उत्तर प्रदेश और केन्द्र में भिन्न-भिन्न पदों पर कार्य करने का विशद अनुभव था। उन्होंने रेल, परिवहन, संचार, वाणिज्य, उद्योग और गृह मन्त्रालय जैसे महत्त्वपूर्ण पदों को सम्भाला।

उपसंहार :
अन्त में यह कहा जा सकता है कि शास्त्री जी ने भारतीय प्रदेश और संघीय सरकार के पदों पर रहकर अपनी प्रशासकीय दक्षता का परिचय दिया, वह एक उदाहरण के रूप में देश के लिए एक गौरव की बात है। अपने मन्त्रालयों के कार्यों में उनका दृष्टिकोण अत्यन्त व्यावहारिक बना रहा एवं सभी प्रकार की औपचारिकताओं से परे रहा। उन्होंने देश की सेवा एक शासक के रूप में नहीं, वरन् एक जनसेवक के रूप में की। लोक सेवक शास्त्री जी को अपनी कार्य शैली के कारण लोकप्रियता प्राप्त हुई। वे एक लोकप्रिय नेता थे। आत्मानुशासन, अधिकार और कर्तव्य का तालमेल लोकतन्त्र प्रशासकीय पद्धति का मूल आधार होता है, ऐसा मानते हुए एक व्यवस्थित समाज के लिए निष्ठा, भक्ति और श्रद्धा से निष्काम कर्म करना अति महत्त्वपूर्ण है।

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प्रश्न 5.
“शास्त्री जी श्रम, सेवा, सादगी और समर्पण की प्रतिमूर्ति थे।” उदाहरण देकर समझाइए। (2009)
उत्तर:
प्रस्तावना-श्री लाल बहादुर शास्त्री का सम्पूर्ण जीवन श्रम, सेवा, सादगी और समर्पण (त्याग) की भावना से भरा हुआ था। श्रम’ से उन्होंने जन्म से ही नाता जोड़ा हुआ था। सेवा और सादगी उनके व्यवहार और वार्तालाप से परिलक्षित होते थे। समर्पण (त्याग) तो उनकी जीवन शैली थी।

समन्वय :
उनके ये गुण केवल उनके कार्यों और विचारों में ही अभिव्यक्ति नहीं पाते थे। वरन् उनको देखने मात्र से ही इन सभी भावों का अहसास हो जाता था। उनमें श्रम, सेवा, सादगी और समर्पण का समन्वय था। वे अपने मुख से जो भी कहते, उसे तद्नुसार ही करके रहते थे।

राष्ट्रहित :
शास्त्री जी का वचन, उनका कथन और उनकी करनी इन तीनों की समय पर अन्विति होती थी जिसमें राष्ट्रहित, कल्याण समाहित रहता था। वे जो भी करते अथवा कहते उस सब में राष्ट्र के लाभ की बात छिपी रहती थी। उनका वचन और कथन एकमात्र राष्ट्र-लाभ की भावना से प्रेरित रहता था।

समर्पण :
शास्त्री जी में समर्पण भाव भरा हुआ था। उनके समर्पण के भाव की विशेषता उनके चरित्र से आभासित होती थी। इस चारित्रिक विशेषता के कारण देशवासी उनका विश्वास करते थे और वे सम्पूर्ण भारतीय नागरिकों की प्रथम पसंद थे।

विनम्रता और सूझबूझ :
शास्त्री जी विनम्रता और सूझबूझ के धनी थे। उनकी प्रत्येक बात से, आचरण से, वेशभूषा से उनकी विनम्रता झलकती थी। उनके वचनों की विनम्रता के आगे शक्तिसम्पन्न राष्ट्र भी नतमस्तष्क थे। राजनैतिक सूझबूझ ने तो उन्हें इतना विशाल हृदय और उदारता प्रदान की हुई थी कि देश की जनता का प्रतिनिधित्व शास्त्री जी जैसा व्यक्तित्व ही कर सका।

उपसंहार :
अन्त में, कहा जा सकता है कि शास्त्री जी की ताकत और शख्त-नम्र व्यक्तित्व ही पंडित जवाहरलाल नेहरू की समृद्ध राजनैतिक विरासत को सँभालने में सफल हो सका। वे ही उस विरासत को आगे बढ़ा सके। अन्य किसी के लिए यह काम बहुत ही कठिन रहा होता। सम्पूर्ण देश ने इन सभी विशेषताओं के समन्वित स्वरूप को शास्त्री जी में देखा और उनके निर्मल चरित्र और दृढ़ संकल्प शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण देश की इस आकांक्षा को पूरा किया।

प्रश्न 6.
“संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति शास्त्री जी के क्या विचार थे?” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तावना :
सन् 1964 ई. में पं. नेहरू का देहावसान हो गया। इनके बाद, देश ने श्री लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया। इसका एकमात्र कारण था शास्त्री जी का भारतीय जनता के प्रति सेवा का भाव। वे स्वयं को शासक नहीं सेवक मानते थे। उनकी लोकप्रियता एवं श्रम साध्य कर्मों में सफलता ने ही शास्त्री जी को पं. नेहरू के बाद प्रधानमंत्री के रूप में देश ने स्वीकार किया। शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री के रूप में मात्र 19 महीने की बहुत छोटी सी अवधि में जितनी लोकप्रियता और सफलताएँ अर्जित की वे एक उदाहरण हैं।

प्रत्येक व्यक्ति भारत का नागरिक है :
शास्त्री जी ने 19 दिसम्बर, 1964 ई. में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में अपने सम्बोधन में कहा था कि आपके जीवन के उद्देश्य अलग-अलग हो सकते हैं, आपकी मंजिलें जो भी हों, लेकिन आप सभी को यह सोचना चाहिए कि आप सबसे पहले देश के नागरिक हैं।

अधिकार और कर्त्तव्य :
विशाल भारतीय संघ के नागरिक होने के कारण आप सभी को संविधान द्वारा कुछ अधिकार दिए गए हैं, लेकिन साथ ही आप सभी नागरिकों पर कुछ कर्बव्यों का बोझ भी स्वतः ही आ गया है अर्थात् अधिकारों की प्राप्ति कर्त्तव्यों के निर्वाह करने में ही परिणति होती है। यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसका समझना अति आवश्यक है।

स्वैच्छिक प्रतिबन्धों में ही स्वतंत्रता का उपयोग :
श्री शास्त्री जी ने आगे कहा कि हमारे देश में प्रजातांत्रिक (लोकतंत्रात्मक) शासन पद्धति प्रस्तावित की है। अत: यहाँ के प्रत्येक नागरिक को निजी स्वतंत्रता भी प्राप्त है। लेकिन उन्हें इस स्वतंत्रता का उपयोग स्वेच्छा से लगाए गए प्रतिबन्धों के अनुसार करना चाहिए। इसका एक कारण है-हम सभी यह देख चुके हैं कि हमारा समाज एक व्यवस्थित समाज है। उस व्यवस्था का प्रधान समाज के लिए प्रतिबन्ध बहुत अनिवार्य है। इस तरह, इन स्वैच्छिक प्रतिबन्धों का उपयोग और प्रदर्शन जीवन में प्रतिदिन ही होना चाहिए।

उपसंहार :
अन्त में, यह बात स्पष्ट है कि शास्त्री जी ने अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति बड़ी विशेष व्याख्या अत्यल्प शब्दों के प्रयोग में कर दी थी कि अधिकारों की उपभुक्ति कर्त्तव्यों के सुयोग्य सम्पादन से ही सम्भव है।

प्रश्न 7.
शास्त्री जी देश के प्रधानमंत्री कब बने? (2015)
उत्तर:
भारत राष्ट्र के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का देहावसान 27 मई, 1964 ई. को हो गया। इसके निधन के बाद देश ने श्री लाल बहादुर शास्त्री में वे महान् गुण और विशेषताओं को देखा जिनसे वे पं. नेहरू द्वारा प्रस्थापित समृद्ध राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ा सकते थे। अतः सन् 1964 ई. में ही श्री लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने।

प्रश्न 8.
इस पाठ से हमें क्या प्रेरणा मिलती है? लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ से हम सभी छात्रों एवं पाठकों को इस बात की प्रेरणा मिलती है कि हम सभी कर्मयोगी बनें। क्रियाशील व्यक्ति रचनात्मक शैली के गुण से सम्पन्न होता है। वह सदैव कर्म सम्पादन में संलग्न होकर स्वयं को उस स्थान तक ले जाता है, जहाँ से उसमें निस्वार्थ भाव की जागृति हो। निस्वार्थ भाव से किया कर्म ही असली और निष्काम भाव की उत्पत्ति करता है। प्रलोभनों से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य कर्म का निर्वाह करते रहें।

अपने जीवन के निर्धारित उद्देश्यों और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनी आन्तरिक और बाह्य क्षमताओं में दृढ़ विश्वास रखें। अपने आपको कर्म में समर्पण भाव से, निष्ठा से लगा देंगे तो हमें चारित्रिक बल की प्राप्ति होगी जिसके द्वारा राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र के सभी कार्यों का निष्पादन करते जायेंगे।

हमारा चिन्तन स्वस्थ रहना चाहिए। जीवन में श्रम, सेवा, सादगी और समर्पण भाव का विकास हमें उन्नत बनाता है। साथ ही व्यक्तित्व में विनम्रता मनुष्य को पृथ्वी का वारिस बना देती है। कठिनाइयों के दौर में भी धैर्य और शौर्य व शील का त्याग नहीं होना चाहिए। हमारा व्यावहारिक पक्ष खुला और समृद्ध हो, इसका हमें प्रयास करना चाहिए।

हमें अपने अधिकारों की माँग न करके अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने वाला होना चाहिए क्योंकि कर्त्तव्यों की इति अधिकारों के रूप में प्रतिफलित होती ही है। व्यक्तिगत आजादी के उपयोग में भी प्रतिबन्धन होते हैं। तब ही सम्पूर्ण समाज व्यवस्थित रूप से चल सकता है। वहाँ उच्छृखलता के लिए कोई अवकाश नहीं है।

सर्वोपरि मुख्य बात है जिसकी प्रेरणा हमें मिलती है, वह है आत्मसंयम। आत्मसंयम खो देने से किसी भी कार्य के सम्पादन की शक्ति का ह्रास हो जाता है।

उपर्युक्त सभी गुणों को अपने अन्दर विकसित करने की प्रेरणा प्रस्तुत पाठ से हमें प्राप्त होती है।

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कर्मयोगी लाल बहादुर शास्त्री अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘कर्मयोगी’ विशेषण किसके नाम के साथ जोड़ना उपयुक्त है?
उत्तर:
पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी के नाम के साथ कर्मयोगी विशेषण जोड़ना बिल्कुल उपयुक्त है।

प्रश्न 2.
शास्त्री जी के चरित्र एवं जीवन दर्शन में कौन-सी तीन बातें स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं?
उत्तर:
अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ आस्था, उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कर्म का भाव तथा उस कर्म के प्रति सम्पूर्ण समर्पण-ये तीन बातें शास्त्री जी के सम्पूर्ण चरित्र तथा जीवन दर्शन में दिखाई पड़ती हैं।

कर्मयोगी लाल बहादुर शास्त्री पाठ का सारांश

कर्मयोगी शास्त्री जी :
श्री लालबहादुर शास्त्री का सम्पूर्ण जीवन कर्म प्रधान ही था। शास्त्री जी एक साधारण परिवार से ऊपर उठकर भारतवर्ष के प्रधानमन्त्री पद तक पहुँचे। यह सब उनकी कर्त्तव्यपरायणता, निष्ठा, देशभक्ति का परिणाम था। उन्होंने अपने कर्म और चिन्तन की विशिष्ट शैली से भाग्य की रेखाओं को पलट दिया। शास्त्री जी को अपने कर्म और ईश्वर पर ही भरोसा था। उन्होंने पं. जवाहरलाल नेहरू जैसे राजनेता की समृद्ध राजनीति की विरासत को सँभाल कर रखा। यह शास्त्री जी का निष्काम कर्मयोगी का प्रतिरूप ही था।

शास्त्री जी का जीवन दर्शन :
शास्त्री जी के जीवन दर्शन में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें दिखायी पड़ती हैं-(1) उद्देश्य के प्रति दृढ़ आस्था, (2) उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कर्म का भाव, (3) उस कर्म के प्रति सम्पूर्ण समर्पण। शास्त्री जी ने सदैव ही यह कहा कि यदि अपने दायित्वों की पूर्ति करना चाहते हो तो अपने कार्य, समर्पण, भक्ति और कर्म में समन्वय होना चाहिए। वे सोचा करते थे कि किसी भी व्यक्ति, समाज और देश के विकास का रहस्य भक्ति और कर्म के सिद्धान्त में निहित है।

सेवा, सादगी का सिद्धान्त :
उन्होंने श्रम, सेवा और सादगी के सिद्धान्त का अनुसरण किया। उन्होंने अपने निर्मल चरित्र और दृढ़ संकल्प शक्ति द्वारा देश की आकांक्षा को पूरा किया। शास्त्री जी का जन्म सामान्य परिवार में हुआ, सामान्य रूप से ही परवरिश हुई। आप देश के प्रधानमन्त्री होकर भी सामान्य बने रहे। विनम्रता, सादगी और सरलता उनके व्यक्तित्व के असाधारण आभूषण थे।

शास्त्री जी और भारतीय आजादी का आन्दोलन :
शास्त्री जी अपनी अल्पायु (17 वर्ष की उम्र) से ही भारतीय आजादी के आन्दोलनों से जुड़े रहे। सन् 1930 से सन् 1942 तक के आजादी के आन्दोलनों के बारह वर्षों के दौरान, शास्त्री जी ने सात वर्ष जेल में बिताए। सबसे लम्बी जेल यात्रा 1942 ई. की थी जो तीन वर्ष तक चली।

साहस और अनुशासन :
शास्त्री जी में अदम्य साहस और अनुशासन की भावना परिपक्वता को प्राप्त थी। वे समस्याओं के निराकरण में पूर्ण सक्षम थे। वे इन्दिरा गाँधी के राजनैतिक गुरु थे। शास्त्री जी ने उत्तर प्रदेश और केन्द्र में विभिन्न पदों पर कार्य किया। उन्हें जिन विभागों का उत्तरदायित्व दिया गया, उन्होंने उन सभी विभागों के कार्य को पूर्ण दक्षता से निभाया।

जनता के सेवक :
शास्त्री जी अपनी छवि ‘जनता के सेवक’ के कारण लोकप्रिय हुए। यद्यपि प्रधानमन्त्री जैसे भारी भरकम पद का कार्य उन्होंने मात्र 19 महीने ही किया लेकिन इस पद पर रहकर सफलताएँ और लोकप्रियता अपने आप में एक उदाहरण हैं। वे प्रायः प्रत्येक भारतीयजन से यही अपेक्षा करते थे कि वे यह समझें कि वे सबसे पहले देश के नागरिक हैं। देश के नागरिक हैं तो संविधान आपको अधिकार तो देता ही है, लेकिन उसके साथ तुम सभी से अपने कर्तव्यों के निर्वाह की आशा भी करता है। आप सभी स्वतन्त्र हैं परन्तु स्वतन्त्रता का उपयोग एक व्यवस्थित समाज के हित में स्वेच्छा से लगाए गए प्रतिबन्धों के अनुसार होना चाहिए। शास्त्री जी कहा करते थे कि अधिकार, कर्त्तव्य और आत्मसंयम अति महत्त्वपूर्ण बात हैं। हमें इनको व्यवहार में लाना चाहिए।

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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन

MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन

दोलन अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.1.
नीचे दिए गए उदाहरणों में कौन आवर्ती गति को निरूपित करता है?

  1. किसी तैराक द्वारा नदी के एक तट से दूसरे तट तक जाना और अपनी एक वापसी यात्रा पूरी करना।
  2. किसी स्वतंत्रतापूर्वक लटकाए गए दंड चुंबक को उसकी N – S दिशा से विस्थापित कर छोड़ देना।
  3. अपने द्रव्यमान केन्द्र के परितः घूर्णी गति करता कोई हाइड्रोजन अणु।
  4. किसी कमान से छोड़ा गया तीर।

उत्तर:

  1. यह आवश्यक नहीं है कि तैराक को प्रत्येक बार वापस लौटने में समान समय लगे। अर्थात् यह गति आवर्ती गति नहीं है।
  2. दण्ड चुंबक को N – S दिशा से विस्थापित कर छोड़ने पर उसकी गति आवर्ती गति होगी।
  3. यह गति आवर्ती है।
  4. तीर छूटने के बाद कभी भी पुनः प्रारम्भिक स्थिति में नहीं लौटता है। अतः यह गति आवर्ती नहीं है।

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प्रश्न 14.2.
नीचे दिए गए उदाहरणों में कौन (लगभग) सरल आवर्त गति को तथा कौन आवर्ती परंतु सरल आवर्त गति नहीं निरूपित करते हैं?

  1. पृथ्वी की अपने अक्ष के परितः घूर्णन गति।
  2. किसी U नली में दोलायमान पारे के स्तंभ की गति।
  3. किसी चिकने वक्रीय कटोरे के भीतर एक बॉल बेयरिंग की गति जब उसे निम्नतम बिन्दु से कुछ ऊपर के बिन्दु से मुक्त रूप से छोड़ा जाए।
  4. किसी बहुपरमाणुक अणु की अपनी साम्यावस्था की स्थिति के परित: व्यापक कंपन।

उत्तर:

  1. आवर्त गति लेकिन सरल आवर्त गति नहीं है।
  2. सरल आवर्त गति।
  3. सरल आवर्त गति
  4. आवर्ती गति लेकिन सरल आवर्त गति नहीं है।

प्रश्न 14.3.
चित्र में किसी कण की रैखिक गति के लिए चार x – t आरेख दिए गए हैं। इनमें से कौन-सा आरेख आवर्ती गति का निरूपण करता है? उस गति का आवर्तकाल क्या है? (आवर्ती गति वाली गति का)।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 1
उत्तर:

  1. ग्राफ से स्पष्ट है कि कण कभी भी अपनी गति की पुनरावृत्ति नहीं करता है; अतः यह गति आवर्ती गति नहीं
  2. ग्राफ से ज्ञात है कि कण प्रत्येक 2 s के बाद अपनी गति की पुनरावृत्ति करता है; अत: यह गति एक आवर्ती गति है जिसका आवर्तकाल 2 s है।
  3. यद्यपि कण प्रत्येक 3 s के बाद अपनी प्रारम्भिक स्थिति में लौट रहा है परन्तु दो क्रमागत प्रारम्भिक स्थितियों के बीच कण अपनी गति की पुनरावृत्ति नहीं करता; अतः यह गति आवर्त गति नहीं है।
  4. कण प्रत्येक 2 s के बाद अपनी गति को दोहराता है; अतः यह गति एक आवर्ती गति है जिसका आवर्तकाल 2 s है।

प्रश्न 14.4.
नीचे दिए गए समय के फलनों में कौन (a) सरल आवर्त गति (b) आवर्ती परंतु सरल आवर्त गति नहीं, तथा (c) अनावर्ती गति का निरूपण करते हैं। प्रत्येक आवर्ती गति का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए: ( ω कोई धनात्मक अचर है।)

  1. sin ωt – cos ωt
  2. sin3 ωt
  3. 3 cos (\(\frac{x}{4}\) – 2 ωt)
  4. cos ωt + cos 3ωt + cos 5ωt
  5. exp (-ω2t2)
  6. 1 + ωt + ω2t2

उत्तर:
1. x = sinωt – cos ωt
= 2 \(\frac { 1 }{ \sqrt { 2 } } \) sin ωt – \(\frac { 1 }{ \sqrt { 2 } } \) cos ωt]
= \(\sqrt { 2 } \) [sin ω + cos \(\frac { \pi }{ 4 } \) – cos ωt sin \(\frac { \pi }{ 4 } \)]
= \(\sqrt { 2 } \) sin (ωt – \(\frac { \pi }{ 4 } \))
स्पष्ट है कि यह सरल आवर्त गति को व्यक्त करता है। इसका आयाम = \(\sqrt { 2 } \)
∴ आवर्त काल, T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \)

2. दिया गया फलन आवर्ती गति को व्यक्त करता है लेकिन यह सरल आवर्त गति नहीं है।
आवर्त काल, T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \)

3. यह फलन स० आ० ग० को व्यक्त करता है।
आवर्त काल T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \) = \(\frac { pi }{ \omega } \)

4. यह फलन आवर्ती गति को व्यक्त करता है जोकि सरल आवर्त गति नहीं है।
फलन cos ωt का आवर्तकाल T1 = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \)
फलन cos 2ωt का आवर्तकाल T2 = \(\frac { 2\pi }{ 3\omega } \)
व फलन cos 5ωt का आवर्तकाल T3 = \(\frac { 2\pi }{ 5\omega } \) है।
यहाँ T1 = 3T2 = 5T3
अत: T1 समय पश्चात् पहले फलन की एक बार दूसरे की तीन बार व तीसरे की पाँच बार पुनरावृत्ति होती है।
∴ दिए गए फलन का आवर्तकाल T = \(\frac { 2\pi }{ \omega } \) है।

5. तथा

6. में दिये दोनों फलन न तो आवर्त गति और न ही सरल आवर्त गति को निरूपित करते हैं।

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प्रश्न 14.5.
कोई कण एक दूसरे से 10 cm दूरी पर स्थित दो बिन्दुओं A तथा B के बीच रैखिक सरल आवर्त गति कर रहा है। A से B की ओर की दिशा को धनात्मक दिशा मानकर वेग, त्वरण तथा कण पर लगे बल के चिह्न ज्ञात कीजिए जबकि यह कण –
(a) A सिरे पर है
(b) B सिरे पर है
(c) A की ओर जाते हुए AB के मध्य बिन्दु पर है
(d) A की ओर जाते हुए B से 2 cm दूर है
(e) B की ओर जाते हुए A से 3 cm दूर है तथा
(f) A की ओर जाते हुए B से 4 cm दूर है।
उत्तर:
प्रश्न से स्पष्ट है कि बिन्दु A व B अधिकतम विस्थापन की स्थितियाँ हैं जिनका मध्य बिन्दु 0 सरल आवर्त गति का केन्द्र है।

(a)

  • बिन्दु A पर कण का वेग शून्य होगा।
  • कण के त्वरण की दिशा बिन्दु A से 0 की ओर होगी। अतः त्वरण धनात्मक होगा।
  • कण पर बल त्वरण की दिशा में होगा। अतः बल धनात्मक होगा।

(b)

  • बिन्दु B पर कण का वेग शून्य होगा।
  • कण का त्वरण B से O की ओर दिष्ट होगा। अतः त्वरण ऋणात्मक होगा।

(c)

AB का मध्य बिन्दु O से सरल आवर्त गति का केन्द्र है। चूँकि कण B से A की ओर चलता हुआ O से गुजरता है। अतः वेग BA के अनुदिश है अर्थात् वेग ऋणात्मक है।

  • त्वरण शून्य है।
  • बल भी शून्य है।
  • बल भी शून्य है।

(d)

  • B से 2 सेमी० की दूरी पर कण Bव के मध्य होगा।
  • चूँकि कण B से A की ओर जा रहा है अत: वेग ऋणात्मक होगा।
  • त्वरण भी B से O की ओर दिष्ट है अतः त्वरण भी ऋणात्मक होगा।
  • बल भी ऋणात्मक होगा।

(e)

  • चूँकि कण B की ओर जा रहा है अत: वेग धनात्मक होगा।
  • चूँकि कण A व O के मध्य है अतः त्वरण A से 0 की ओर दिष्ट है। अतः त्वरण भी धनात्मक है।

(f)

  • चूँकि कण A की ओर गतिमान है अतः वेग ऋणात्मक होगा।
  • बल भी धनात्मक है।
  • चूँकि कण B तथा O के बीच है व त्वरण B से O की ओर दिष्ट है। अत: त्वरण ऋणात्मक है।
  • बल भी ऋणात्मक है।

प्रश्न 14.6.
नीचे दिए गए किसी कण के त्वरण a तथा विस्थापन x के बीच संबंधों में से किससे सरल आवर्त गति संबद्ध है:

  1. a = 0.7x
  2. a = – 200x2
  3. a = -10x
  4. a = 100x3

उत्तर:
उपरोक्त में से केवल विकल्प (3) में a = – 10x, त्वरण विस्थापन के समानुपाती है। इसमें त्वरण विस्थापन के विपरीत दिशा में है। अतः केवल यह सम्बन्ध सरल आवर्त गति को व्यक्त करता है।

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प्रश्न 14.7.
सरल आवर्त गति करते किसी कण की गति का वर्णन नीचे दिए गए विस्थापन फलन द्वारा किया जाता है,
x (t) = A cos (ωt + φ) यदि कण की आरंभिक (t = 0) स्थिति 1 cm तथा उसका आरंभिक वेग rcms-1 है, तो कण का आयाम तथा आरंभिक कला कोण क्या है? कण की कोणीय आवृत्ति πs-1 है। यदि सरल आवर्त गति का वर्णन करने के लिए कोज्या (cos) फलन के स्थान पर हम ज्या (sin) फलन चुने; x = B sin (ωt + α) तो उपरोक्त आरंभिक प्रतिबंधों में कण का आयाम तथा आरंभिक कला कोण क्या होगा?
उत्तर:
(a) x (t) = A cos (ωt +ϕ) ……. (i)
t = 0, ω = πs-1
∴ x = 1 cm पर
v = ω = cms-1 ……. (ii)
∴ समी० (i) व (ii) से,
1 = A cos (π × 0 + ϕ) = A cos ϕ ….. (iii)
पुनः ω = \(\frac { 2\pi }{ T } \)
∴ T = m \(\frac { 2\pi }{ \omega } \) = \(\frac { 2\pi }{ \pi } \) = 2s
समी० (i) का t के सापेक्ष अवकलन करने पर,
\(\frac{d}{dx}\)(x) = -A sin (ωt + ϕ)
= – Aωsin (ωt + ϕ) …… (iv)
समी० (ii) व (iv) से
π = – A × π × sin (ωt + ϕ)
= – A sin ϕ
या 1 = – A sin ϕ …. (v)
समी० (ii) व (v) का वर्ग करके जोड़ने पर,
12 + 12 = A2 (sin2ϕ + cos2ϕ) = A2
∴ A = \(\sqrt { 2 } \) cm
समी० (v) को समी० (iii) से भाग देने पर,
1 = – \(\frac { sin\phi }{ cos\phi } \) = -tan ϕ
या tan ϕ = – 1 = – tan \(\frac { \pi }{ 4 } \)
= tan (2π – \(\frac { \pi }{ 4 } \))
= tan \(\frac { 7\pi }{ 4 } \)
∴ ϕ = \(\frac{7}{4}\) π

(b) जब x = B sin (ωt + α)
या x = B cos [(ωt + α) – \(\frac { \pi }{ 2 } \)]
अब’ (a) t = 0 पर x = 1 सेमी
तथा ∴ v = πcms-1, ω = πs-1 से,
∴ 1 = B cos (π × 0 + α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))
= B cos (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) …. (vi)
पुनः माना v’ = वेग
∴ v’ = \(\frac{d}{dt}\)(x)
= – BW sin (ωt + α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))
या π = -B × π sin(π × 0 + α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)
= -Bπ sin (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))
= -Bπ sin (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) ….. (vii)
सभी० (vii) व (viii) का वर्ग कर जोड़ने पर,
12 + 12 = B2 [sin2(α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) + cos 2(α – \(\frac { \pi }{ 2 } \))]
या 2 = B2 or B = \(\sqrt { 2 } \) cm
समी० (viii) को (vii) से भाग देने पर,
1 = -tan (α – \(\frac { \pi }{ 2 } \)) = -1 = – tan \(\frac { \pi }{ 4 } \)
= tan (2π – \(\frac { \pi }{ 4 } \)) = tan \(\frac { 7\pi }{ 4 } \)
या
α – \(\frac { \pi }{ 2 } \) = \(\frac { 7\pi }{ 4 } \)
या α = \(\frac { 7\pi +2\pi }{ 4 } \) = \(\frac { 9\pi }{ 4 } \) = \(\frac { 9\pi }{ 4 } \)
= 2π + \(\frac { \pi }{ 4 } \)
∴ α = \(\frac { \pi }{ 4 } \)

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प्रश्न 14.8.
किसी कमानीदार तुला का पैमाना 0 से 50 kg तक अंकित है और पैमाने की लम्बाई 20 cm है। इस तुला से लटकाया गया कोई पिण्ड,जब विस्थापित करके मुक्त किया जाता है, 0.6 s के आवर्तकाल से दोलन करता है। पिंड का भार कितना है?
उत्तर:
दिया है, m = 50 kg,
अधिकतम प्रसार y = 20 – 0 = 20 cm
= 0.2 m, T = 0.6s
∴ अधिकतम बल
F = mg = 50 × 9.8 = 490.0 N
∴ स्प्रिंग नियतांक
k = \(\frac{F}{Y}\) = \(\frac{490}{0.2}\)
= \(\frac { 490\times 10 }{ 2 } \) = 2450 Nm-1
हम जानते हैं कि आवर्त काल T = 2π \(\sqrt { \frac { m }{ k } } \)
या T2 = 4π2 \(\frac{m}{k}\)
या m = \(\frac { T^{ k } }{ 4\pi ^{ 2 } } \)
= \(\frac { (0.6)^{ 2 }\times 2450 }{ 4\times 9.87 } \) = 22.36 kg
वस्तु का भार w = mg = 22.36 × 9.8
= 219.1 N = 22.36 kg

प्रश्न 14.9.
1200 Nm-1 कमानी – स्थिरांक की कोई कमानी (चित्र) में दर्शाए अनुसार किसी क्षैतिज मेज से जुड़ी है। कमानी के मुक्त सिरे से 3 kg द्रव्यमान का कोई पिण्ड जुड़ा है। इस पिण्ड को एक ओर 2.0 cm दूरी तक खींच कर मुक्त किया जाता है।

  1. पिण्ड के दोलन की आवृत्ति
  2. पिण्ड का अधिकतम त्वरण, तथा
  3. पिण्ड की अधिकतम चाल ज्ञात कीजिए।

उत्तर:
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 2
दिया है: k = 1200 Nm-1, m = 3.0 kg,
A = 2.0 cm = 0.02 m
= अधिकतम विस्थापन
1. हम जानते हैं कि आवर्तकाल T = 2π\(\sqrt { \frac { M }{ k } } \)
आवृत्ति, v = \(\frac{1}{T}\)
∴ v = \(\frac{1}{2π}\)\(\sqrt { \frac { k }{ m } } \)
= \(\frac { 1 }{ 2\times 3.142 } \) × \(\sqrt { \frac { 1200 }{ 3 } } \)
= \(\frac { 1 }{ 2\times 3.142 } \) = 3.18
∴ v = 3.18 s-1 = 3.2 s-1

2. त्वरण, 4 = -ω2x = \(\frac{-k}{m}\)x
या c|amax| = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) |xmax|, जहाँ ω = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) या x के अधिकतम होने पर त्वरण भी अधिकतम होगा।
या x = A = 0.02 m
∴ a = \(\frac{1200}{3}\) × 0.02 × 8.0 ms-2

3. द्रव्यमान की अधिकतम चाल
v = Aω = A\(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) = 0.02 × \(\sqrt { \frac { 1200 }{ 3 } } \)
= 0.02 × 20 = 0.40 ms-1

प्रश्न 14.10.
प्रश्न 14.9 में मान लीजिए जब कमानी अतानित अवस्था में है तब पिण्ड की स्थिति x = 0 है तथा बाएँ से दाएँ की दिशा x – अक्ष की धनात्मक दिशा है। दोलन करते पिण्ड के विस्थापन x को समय के फलन के रूप में दर्शाइए, जबकि विराम घड़ी को आरम्भ (t = 0) करते समय पिण्ड,
(a) अपनी माध्य स्थिति
(b) अधिकतम तानित स्थिति, तथा
(c) अधिकतम संपीडन की स्थिति पर है।
सरल आवर्त गति के लिए ये फलन एक दूसरे से आवृत्ति में,आयाम में अथवा आरंभिक कला में किस रूप में भिन्न है?
उत्तर:
चूँकि द्रव्यमान x = 0 पर स्थित है। अतः x – दिशा में विस्थापन निम्नवत् होगा
x = A sin ωt …. (i)
[∴ x = 0 पर प्रारम्भिक कला ϕ = 0]
प्रश्न 14.9 से A = 2 cm = 0.02 m
k = 1200 Nm-2 ω = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \)
= \(\sqrt { \frac { 1200 }{ 3 } } \) = 20 s-1

(a) जब वस्तु माध्य स्थिति में है, समी० (i) से,
x = 2 sin 20t ……. (ii)

(b) अधिकतम तानित स्थिति में ϕ = \(\frac{π}{2}\)
∴ x = A sin (ωt + ϕ)
= 2 sin (20t + \(\frac{π}{2}\)) = 2 cos 20t ………… (iii)

(c) अधिकतम सम्पीडन की स्थिति में,
φ = \(\frac{π}{2}\) + \(\frac{π}{2}\) = \(\frac{2π}{2}\)
∴ x = A sin (ωt + ϕ)
A sin (ωt + \(\frac{2π}{2}\)) = – A cos ωt
∴ x = A cos ωt = – 2cos (20t) ……… (iv)
समी० (ii), (iii) तथा (iv) से स्पष्ट है कि फलन केवल प्रारम्भिक कला. में ही असमान है चूँकि इनके आयाम (A = 2 cm) तथा आवर्तकाल समान है।
i.e.,T = \(\frac{2π}{ω}\) = \(\frac{2π}{10}\) = \(\frac{π}{10}\) rad s-1

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प्रश्न 14.11.
चित्र में दिए गए दो आरेख दो वर्तुल गतियों के तद्नुरूपी हैं। प्रत्येक आरेख पर वृत्त की त्रिज्या, परिक्रमण काल, आरंभिक स्थिति और परिक्रमण की दिशा दर्शायी गई है। प्रत्येक प्रकरण में, परिक्रमण करते कण के त्रिज्य – सदिश के x अक्ष पर प्रक्षेप की तद्नुरूपी सरल आवर्त गति ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 3
उत्तर:
(a) यहाँ t = 0 पर, OP, x अक्ष से \(\frac{π}{2}\) का कोण बनाती है। चूंकि गति वर्तुल है अतः ϕ = \(\frac{+π}{2}\) रेडियन। अतः t समय पर OP का मन्घटक सरल आवर्त गति करता है।
t = 0 पर OP, x – अक्ष से धन दिशा में T कोण बनाता है।
x = A cos (\(\frac{2πt}{T}\)) + ϕ)
= 3 cos (\((\pi t+\frac { \pi }{ 2 } )\))
(∴A = 3 cm, T = 2s, cx, cm में है)
x = 3 cos (\((\pi t+\frac { \pi }{ 2 } )\)) = -3 sin πt
x = -3 sin πt (cm)
T = 4s, A = 2m
it + 2)=-3 sin t
t = 0 पर Op x – अक्ष से धन,दिशा में T कोण बनाता है। i.e., = ϕ +π
अतः t समय में OP के x घटक की सरल आवर्त गति की समीकरण निम्न होगी –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 4

प्रश्न 14.12.
नीचे दी गई प्रत्येक सरल आवर्त गति के लिए तद्नुरूपी निर्देश वृत्त का आरेख खींचिए। घूर्णी कण की आरंभिक (t = 0) स्थिति, वृत्त की त्रिज्या तथा कोणीय चाल दर्शाइए। सुगमता के लिए प्रत्येक प्रकरण में परिक्रमण की दिशा वामावर्त लीजिए। (x को cm में तथाt को s में लीजिए।)

  1. x = – 2 sin (3t + π/3)
  2. x = cos (π/6 – t)
  3. x = 3 sin (2πt + π/4)
  4. x = 2 cos πt

उत्तर:
1. x = – z sin (3t + π/3)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 5
∴संगत निर्देश वृत्त चित्र (a) में दिखाया गया है।
समी० (i) की तुलना x = A cos (ωt + ϕ) से करने पर,
T = \(\frac{2πt}{3}\) , ϕ = \(\frac{5π}{6}\), A = 2 cm

2. x = cos (\(\frac{π}{6}\) – t)
= cos (t – \(\frac{π}{6}\))
= 1 cos (\(\frac{2π}{2π}\) t – \(\frac{π}{6}\)) ………… (ii)
∴ संगत निर्देश वृत्त चित्र (a) में दिखाया गया है।
समी० (ii) की तुलना x = A cos (\(\frac{2π}{t}\) + ϕ) से करने पर …. (iii)
A = 1cm, t = 2π, ϕ = – \(\frac{π}{-6}\)
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 6
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 6-2
संगत निर्देश वृत्त चित्र (c) में दिखाया गया है।
समी० (iv) की (iii) से तुलना करने पर
A = 3 cm
T = 1s
φ = – \(\frac{π}{4}\)

4. x = 2 cos πt
= 2 cos (\(\frac{π}{1}\) t + 0) ……….. (v)
संगत निर्देश वृत्त चित्र (c) में दिखाया गया है।
में दिखाया गया है। समी० (iii) की (v) से तुलना करने पर,
A = 2 cm, T = 15, ϕ = 0
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 7

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प्रश्न 14.13.
चित्र (a) में k बल – स्थिरांक की किसी कमानी के एक सिरे को किसी दृढ़ आधार से जकड़ा तथा दूसरे मुक्त सिरे से एक द्रव्यमान m जुड़ा दर्शाया गया है। कमानी के मुक्त सिरे पर बल F आरोपित करने से कमानी तन जाती है। चित्र (b) में उसी कमानी के दोनों मुक्त सिरों से द्रव्यमान m जुड़ा दर्शाया गया है। कमानी के दोनों सिरों को चित्र में समान बल F द्वारा तानित किया गया है।
(a) दोनों प्रकरणों में कमानी का अधिकतम विस्तार क्या है।
(b) यदि (a) का द्रव्यमान तथा (b) के दोनों द्रव्यमानों को मुक्त छोड़ दिया जाए, तो प्रत्येक प्रकरण में दोलन का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 8
उत्तर:
माना कि स्प्रिंग का बल नियतांक = k
मुक्त सिरे से लटकाया गया द्रव्यमान = M

(1) मुक्त सिरे पर लगाया गया बल = F
(a) माना बल F लगाने पर मुक्त सिरे पर द्रव्यमान m लटकाने से उत्पन्न त्वरण a है।
अतः F = ma ……. (i)
माना कि चित्र (a) में उत्पन्न विस्तार y1 है।
F = – ky1
समी० (i) व (ii) से,
ky1 = ma = m \(\frac { d^{ 2 }y }{ dt^{ 2 } } \)
जहाँ a = \(\frac { d^{ 2 }y }{ dt^{ 2 } } \) = \(\sqrt { \frac { -k }{ m } } \) y1 … (ii)
या
a = \(\frac { d^{ 2 }y }{ dt^{ 2 } } \) = \(\sqrt { \frac { -k }{ m } } \) y1
= \(\sqrt { \frac { -k }{ m } } \) y ………….. (iii)
जहाँ y विस्थापन y1 के समान है। पुनः हम जानते हैं कि
a = – ω2 y ……….. (iv)
∴समी० (iii) व (iv) से,
ω2 = \(\frac{k}{m}\) या ω = \(\sqrt { \frac { k }{ m } } \) ….. (v)
∴स्प्रिंग में उत्पन्न अधिकतम प्रसार y1 = y या
y1 = \(\frac{F}{K}\)
(b) समी० (v) से, a ∝ y अधिकतम प्रसार y1 = y
या
∴ माना m द्रव्यमान के दोलन का आवर्तकाल T1 है।
अतः T1 = \(\frac{2π}{ω}\)
= 2π \(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) (समी० (v) से)
या T1 = 2π\(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) ……… (vi)

(2) (a) माना दोनों द्रव्यमानों को छोड़ने पर, स्प्रिंग में कुल उत्पन्न प्रसार y2 है। चूँकि दो द्रव्यमान समान हैं अतः प्रत्येक द्रव्यमान के कारण स्प्रिंग में उत्पन्न प्रसार y है। अतः
y2 = y’ + y’ = 2y’
पुनः 1 (a) से,
y2 + \(\frac{F}{K}\)
\(\frac{F}{K}\) = 2y’
या y’ = \(\frac{1}{2}\)\(\frac{F}{K}\)
∴ y2 = 2.\(\frac{F}{2k}\) = \(\frac{F}{K}\)
∴ प्रत्येक द्रव्यमान का विस्थापन
\(\frac { d^{ 2 }y’ }{ dt^{ 2 } } \) = – \(\frac{F}{m}\) = – \(\frac { 2ky’ }{ m } \)
∴ प्रत्येक द्रव्यमान में \(\frac { d^{ 2 }y’ }{ dt^{ 2 } } \) = – \(\frac{F}{m}\) = \(\frac { 2ky’ }{ m } \)
परन्तु स० आ० ग० में \(\frac { d^{ 2 }y’ }{ dt^{ 2 } } \) = – ω2y’
अतः ω2 = \(\frac{2k}{m}\)
या ω = \(\sqrt { \frac { 2k }{ m } } \)
(b) माना प्रत्येक द्रव्यमान का आवर्तकाल T2 है।
अतः T = \(\frac{2π}{ω}\) = \(\frac { 2\pi }{ \sqrt { \frac { 2k }{ m } } } \)
= 2π \(\sqrt { \frac { m }{ 2k } } \)

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प्रश्न 14.14.
किसी रेलगाड़ी के इंजन के सिलिंडर हैड में पिस्टन का स्ट्रोक (आयाम का दो गुमा) 1.0 m का है। यदि पिस्टन 200 rad/min की कोणीय आवृत्ति से सरल आवर्त गति करता है तो उसकी अधिकतम चाल कितनी है?
उत्तर:
दिया है:
ω = 200 रेडियन/मिनट = \(\frac{200}{60}\) = \(\frac{10}{3}\) रेडियन प्रति सेकण्ड
स्ट्रोक की लम्बाई = 1 मीटर
माना सरल आवर्त गति का आयाम = a
∴ 2a = 1 मीटर
या a = \(\frac{1}{2}\) = 0.5 मीटर
सूत्र चाल = aω से,
पिस्टन की अधिकतम चाल,
vmax = 400 = 0.5 × \(\frac{10}{3}\)
= \(\frac{5}{3}\) = 1.67 मीटर/सेकण्ड

प्रश्न 14.15.
चंद्रमा के पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण 17 ms-2 है। यदि किसी सरल लोलक का पृथ्वी के पृष्ठ पर आवर्तकाल 3.5 s है, तो उसका चंद्रमा के पृष्ठ पर आवर्तकाल कितना होगा? ( पृथ्वी के पृष्ठ पर g = 9.8 ms-2)
उत्तर:
दिया है:
पृथ्वी के पृष्ठ पर आवर्तकाल T = 3.5 s
चंद्रमा के पृष्ठ पर आवर्तकाल = Tm = ?
पृथ्वी के पृष्ठ पर गुरुत्वाकर्षण के कारण त्वरण
ge = 9.8 ms-2
सरल लोलक की लम्बाई l = ?
सूत्र
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 9
समी० (ii) व (i) से भगा देने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 11
Tm = 8.4s

प्रश्न 14.16.
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(a) किसी कण की सरल आवर्त गति के आवर्तकाल का मान उस कण के द्रव्यमान तथा बल-स्थिरांक पर निर्भर करता T = 2π\(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) कोई सरल लोलक सन्निकट सरल आवर्त गति करता है। तब फिर किसी लोलक का आवर्तकाल लोलक के द्रव्यमान पर निर्भर क्यों नहीं करता?
(b) किसी सरल लोलक की गति छोटे कोण के सभी दोलनों के लिए सन्निकट सरल आवर्त गति होती है। बड़े कोणों के दोलनों के लिए एक अधिक गूढ़ विश्लेषण यह दर्शाता है कि T का मान 2π\(\sqrt { \frac { l }{ g } } \) से अधिक होता है। इस परिणाम को समझने के लिए किसी गुणात्मक कारण का चिंतन कीजिए।
(c) कोई व्यक्ति कलाई घड़ी बाँधे किसी मीनार की चोटी से गिरता है। क्या मुक्त रूप से गिरते समय उसकी घड़ी यथार्थ समय बताती है?
(d) गुरुत्व बल के अंतर्गत मक्त सिरे से गिरते किसी केबिन में लगे सरल लोलक के दोलन की आवृत्ति क्या होती है?
उत्तर:
(a) चूँकि सरल लोलक के लिए k स्वयं m के अनुक्रमानुपाती होता है अत: m निरस्त हो जाता है।
(b) sin θ < θ पर, यदि प्रत्यानयन बल mg sin θ का प्रतिस्थापन mg θ से कर दें तब इसका तात्पर्य यह होगा कि बड़े कोणों के लिए g के परिमाण में प्रभावी कमी व इस प्रकार सूत्र T = 2π\(\sqrt { \frac { l }{ g } } \) से प्राप्त आवर्तकाल के परिमाण में वृद्धि होगी।
(c) हाँ, क्योंकि कलाई घड़ी में आवर्तकाल कमानी क्रिया पर निर्भर करता है, जिसका गुरुत्वीय त्वरण से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।
(d) स्वतन्त्रतापूर्वक गिरते हुए मनुष्य के लिए गुरुत्वीय त्वरण का प्रभावी मान शून्य हो जाता है। अतः आवृत्ति शून्य होती है।

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प्रश्न 14.17.
किसी कार की छत से l लम्बाई का कोई सरल लोलक, जिसके लोलक का द्रव्यमान M है, लटकाया गया है। कार R त्रिज्या की वृत्तीय पथ पर एकसमान चाल से गतिमान है। यदि लोलक त्रिज्य दिशा में अपनी साम्यावस्था की स्थिति के इधर-उधर छोटे दोलन करता है, तो इसका आवर्तकाल क्या होगा?
उत्तर:
कार जब मोड़ पर मुड़ती है तो उसकी गति में त्वरण \(\frac { v^{ 2 } }{ R } \) होता है। अत: कार एक अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र है।
अत: गोलक पर एक छद्म बल \(\frac { mv^{ 2 } }{ R } \) वृत्तीय पथ के बाहर की ओर लगेगा जिस कारण लोलक ऊर्ध्वाधर रहने के स्थान पर थोड़ा तिरछा हो जाएगा।
इस क्षण लोलक पर दो बल क्रमश: उपकेन्द्र बल \(\frac { mv^{ 2 } }{ R } \) व भार mg’ लगेंगे।
यदि लोलक के लिए गुरुत्वीय त्वरण g का प्रभावी मान g’ हो, तो गोलक पर प्रभावी बल mg’ होगा जो कि उक्त दो बलों का परिणामी है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 12
अतः लोलक का नया आवर्तकाल, सूत्र T = 2π\(\sqrt { \frac { l }{ g } } \) से
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 13

प्रश्न 14.18.
आधार क्षेत्रफल A तथा ऊँचाई h के एक कॉर्क का बेलनाकार टुकड़ा ρi घनत्व के किसी द्रव में तैर रहा है। कॉर्क को थोड़ा नीचे दबाकर स्वतंत्र छोड़ देते हैं, यह दर्शाइए कि कॉर्क ऊपर-नीचे सरल आवर्त दोलन करता है जिसका आवर्तकाल
T = 2π\(\sqrt { \frac { h\rho }{ \rho _{ i }g } } \) है।
यहाँ ρ कर्क का धनाथव है (ध्रुव की सायनाथा के कारन अवमंदन को नगण्य मानिये)।
उत्तर:
मना कर्क के टुकड़ों का द्रव्यमान m है मना समथदस्थता मे इस टुकड़ों की l लंबदइ दुव मे डूबती है
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 14
तैरने के सिद्धान्त से, कॉर्क के डूबे भाग द्वारा हटाए गए द्रव का भार कॉर्क के भार के समान होगा। अतः
1g = mg
जहाँ V = डूबे भाग द्वारा विस्थापित द्रव का आयतन माना कि कॉर्क का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है।
∴ V = A × lρig = mg
या Aρil = m ………. (i)
कॉर्क को द्रव में नीचे की ओर दबाकर छोड़ने पर यह ऊपर नीचे दोलन करने लगता है। माना किसी क्षण इसका साम्यावस्था से नीचे की ओर विस्थापन y है। इस क्षण, इसकी लम्बाई (y) द्वारा विस्थापित द्रव का उत्क्षेप बेलनाकार बर्तन को प्रत्यानयन बल प्रदान करेगा।
∴ F = -AYρ1g
यहाँ ऋण चिह्न प्रदर्शित करता है कि प्रत्यानयन बल F1 कॉर्क के टुकड़े के विस्थापन के विपरीत दिशा में लगता है। अतः टुकड़े का त्वरण,
a = \(\frac{F}{m}\) = \(\frac { -Ay\rho _{ 1 }g }{ m } \) … (ii)
चूँकि कॉर्क के टुकड़े का घनत्व ρ व ऊँचाई h है।
m = Ahρ
अतः त्वरण a = \(\frac { -Ay\rho _{ 1 }g }{ Ah } \)ρ
= – (\(\frac { \rho _{ 1 }g }{ h } \rho \)) y
∴ a ∝(-y)
अतः कॉर्क के टुकड़े का त्वरण α, विस्थापन के अनुक्रमानुपाती परन्तु दिशा विस्थापन के विपरीत है। अतः यह स० आ० ग० करता है।
समी० (ii) से,
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अतः कॉर्क का आवर्तकाल T = 2π\(\sqrt { \frac { y }{ a } } \)
= 2π\(\sqrt { \frac { h\rho }{ \rho _{ 1 }g } } \)

प्रश्न 14.19.
पारे से भरी किसी U नली का एक सिरा किसी चूषण पम्प से जुड़ा है तथा दूसरा सिरा वायुमण्डल में खुला छोड़ दिया गया है। दोनों स्तम्भों में कुछ दाबान्तर बनाए रखा जाता है। यह दर्शाइए कि जब चूषण पम्प को हटा देते हैं, तब U नली में पारे का स्तम्भ सरल आवर्त गति करता है।
उत्तर:
स्पष्ट है कि चूषण पम्प की अनुपस्थिति में दोनों नलियों में पारे के तल समान होंगे। यह साम्यावस्था की स्थिति है। चूषण पम्प लगाने पर पम्प वाली नली में पारे का तल ऊपर उठ जाता है और पम्प हटाते ही पारा साम्यावस्था को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 16
माना पम्प हटाने के बाद किसी क्षण दूसरी नली में पारे का तल साम्यावस्था से ) दूरी नीचे है तो दूसरी ओर यह y दूरी ऊपर होगा।
यदि नली में एकांक लम्बाई में भरे पारे का द्रव्यमान m है तो पम्प वाली नली में चढ़े अतिरिक्त पारद स्तम्भ का भार 2y × mg होगा। यह भार ही द्रव को दूसरी ओर धकेलता है, अतः प्रत्यानयन बल F = – 2mgy होगा।
ऋण चिह्न यह प्रदर्शित करता है कि यह बल विस्थापन के विपरीत दिष्ट है।
माना साम्यावस्था में दोनों नलियों में पारद स्तम्भ की ऊँचाई h है, तब नलियों में भरे पारे का कुल द्रव्यमान M = 2hm होगा।
यदि पारद स्तम्भ का त्वरण a है तो
F = ma
⇒ – 2mgy = 2hma
⇒त्वरण a = – (\(\frac{g}{h}\)) y
अतः a ∝(-y)
इससे स्पष्ट है कि पारद स्तम्भ की गति सरल आवर्त गति है।
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∴आवर्तकाल T = 2π\(\sqrt { \frac { y }{ a } } \)
⇒ T = 2π\(\sqrt { \frac { h }{ g } } \)

दोलन अतिरिक्त अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.20.
चित्र में दर्शाए अनुसार V आयतन के किसी वायु कक्ष की ग्रीवा (गर्दन) की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल a है। इस ग्रीवा में m द्रव्यमान की कोई गोली बिना किसी घर्षण के ऊपर-नीचे गति कर सकती है। यह दर्शाइए कि जब गोली को थोड़ा नीचे दबाकर मुक्त छोड़ देते हैं, तो वह सरल आवर्त गति करती है। दाब आयतन विचरण को समतापी मानकर दोलनों के आवर्तकाल का व्यंजक ज्ञात कीजिए [चित्र देखिए]।
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 18
उत्तर:
गोली को नीचे की ओर दबाकर छोड़ने पर यह अपनी साम्यावस्था के ऊपर नीचे सरल रेखीय दोलन करने लगती है।
माना कि किसी क्षण गोली का साम्य अवस्था से नीचे की ओर विस्थापन है। माना इस स्थिति में कक्ष में भरी वायु का आयतन। के स्थान पर V – ∆V हो जाता है व दाब P ये (P + ∆P) हो जाता है।
∴ बॉयल के नियम से,
PV = (P + ∆P) (V – ∆V)
या ∆P.V = P.∆V (∆P∆V को छोड़ने पर)
∴ P = \(\frac { \Delta P }{ (\Delta V/V) } \)
लेकिन P = ET = वायु की समतापी प्रत्यास्थता है।
∴ ET = \(\frac { \Delta P }{ (\Delta V/V) } \)
∴अभिलम्ब प्रतिबल,
∆P = \(\frac{F}{A}\) = ET. \(\frac { \Delta V }{ V } \)
जहाँ F वायु द्वारा गोली पर लगने वाला अतिरिक्त बल है व a ग्रीवा का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल है।
चूँकि ग्रीवा के गोली का नीचे की ओर विस्थापन ∆V = ax
∴ \(\frac{F}{a}\) = Et.\(\frac { ax }{ V } \)
या F = (\(\frac { E_{ T }a^{ 2 } }{ V } \)) x …………… (i)
परन्तु गोली पर वायु द्वारा लगने वाला बल बाहर की ओर लगता है। अत: यह बल गोली के विस्थापन x के विपरीत दिशा में है अर्थात् यह एक प्रत्यानयन बल है।
सूत्र F = ma से,
ma = – (\(\frac { E_{ T }-a^{ 2 } }{ V } \)) x [समी० (i) से]
∴ त्वरण = – \(\frac { E_{ T }a^{ 2 } }{ mv } \) x ……. (ii)
∴ त्वरण ∝ (-x)
अर्थात् त्वरण विस्थापन के विपरीत दिशा में हैं।
अतः गोली स० आ० ग० करती है।
समी० (ii) से,
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∴ आवर्तकाल,
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प्रश्न 14.21.
आप किसी 3000 kg द्रव्यमान के स्वचालित वाहन पर सवार हैं। यह मानिए कि आप इस वाहन की निलंबन प्रणाली के दोलनी अभिलक्षणों का परीक्षण कर रहे हैं। जब समस्त वाहन इस पर रखा जाता है, तब निलंबन 15 cm आनमित होता है। साथ ही, एक पूर्ण दोलन की अवधि में दोलन के आयाम में 50% घटोतरी हो जाती है। निम्नलिखित के मानों का आंकलन कीजिए:
(a) कमानी स्थिरांक, तथा
(b) कमानी तथा एक पहिए के प्रघात अवशोषक तंत्र के लिए अवमंदन स्थिरांक b यह मानिए कि प्रत्येक पहिया 750 kg द्रव्यमान वहन करता है।
उत्तर:
(a) दिया है: M = 3000 kg
प्रत्येक पहिए पर लटकाया गया द्रव्यमान = m = 750 kg
y = 15 cm = 0.15 m, α = g
स्प्रिंग नियतांक k = ?
हम जानते हैं कि, \(\frac{m}{k}\) = \(\frac{y}{a}\) = \(\frac{y}{g}\)
या mg = ky
या k = \(\frac{mg}{y}\) = \(\frac { 750\times 9.8 }{ 0.15 } \)
= 4.9 × 104 Nm-1
= 5 × 104 Nm-1
(b) \(\sqrt { km } \) = \(\sqrt { 5\times 10^{ 4 }\times 750 } \)
= 61.24 × 102 kgs -1
T = 2π \(\sqrt { \frac { m }{ k } } \) ………. (i)
पुनः माना कि प्रारम्भिक मान के आधे मान तक छोड़ने पर आयाम की आवर्त काल T1/2 है।
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दिए गए प्रतिबन्ध से T = T1/2 एक दोलन का समय
या
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= 0.135037 × 104 = 1350 kgs-1

प्रश्न 14.22.
यह दर्शाइए कि रैखिक सरल आवर्त गति करते किसी कण के लिए दोलन की किसी अवधि की औसत गतिज ऊर्जा उसी अवधि की औसत स्थितिज ऊर्जा के समान होती है।
उत्तर:
माना कि m द्रव्यमान का कण सरल आवर्त गति करता है जिसका आवर्त काल T है। किसी क्षण t पर जबकि समय माध्य स्थिति से मापा गया है, कण का विस्थापन निम्नवत् है –
y = a sinωt
V = कण का वेग
\(\frac { dy }{ dt } \) = \(\frac { d }{ dt } \) (a sin ωt)
= a \(\frac { d }{ dt } \) (sin ωt) …. (i)
K.E., Ek = \(\frac{1}{2}\) mv2
= \(\frac{1}{2}\) m (aω cos ωt)2
= \(\frac{1}{2}\) ma2ω2cos2ωt
P.E., Ep = \(\frac{1}{2}\) ky2
= \(\frac{1}{2}\) m(αωcosωt)2
= \(\frac{1}{2}\) ma2a2sin2ωt (∴k = mω2)
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पुनः प्रति चक्र औसत स्थितिज ऊर्जा निम्नवत् है –
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 24
अतः समी० (ii) व (iii) से स्पष्ट है कि दोलन काल के दौरान औसत गतिज ऊर्जा समान; दोलनकाल में औसत स्थितिज ऊर्जा के समान होती है।

प्रश्न 14.23
10 kg द्रव्यमान की कोई वृत्तीय चक्रिका अपने केन्द्र से जुड़े किसी तार से लटकी है। चक्रिका को घूर्णन देकर तार में ऐंठन उत्पन्न करके मुक्त कर दिया जाता है। मरोड़ी दोलन का आवर्तकाल 1.5 s है। चक्रिका की त्रिज्या 15 cm है। तार का मरोड़ी कमानी नियतांक ज्ञात कीजिए। [मरोड़ी कमानी नियतांक a संबंध J = – αθ द्वारा परिभाषित किया जाता है, जहाँ J प्रत्यानयन बल युग्म है तथा θ ऐंठन कोण है।]
उत्तर:
सम्पूर्ण निकाय मरोड़ी दोलन की भाँति कार्य करता है जिसका साम्य मरोड़ी आघूर्ण निम्नवत् है –
τ = \(\frac { \pi \eta r^{ 4 } }{ 2I } \) θ …. (i)
जहाँ t = तार की त्रिज्या
η = लटकाए गए तार की दृढ़ता गुणांक, θ = तार में ऐंठन कोण प्रति ऐंठन मरोड़ी आघूर्ण
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 25
चूंकि चक्रिका दोलन करती है अतः इस पुर लगने पर विक्षेषणा आधूर्ण = I\(\frac { d^{ 2 }\theta }{ dt^{ 2 } } \)
साम्यावस्था में Cθ = I\(\frac { d^{ 2 }\theta }{ dt^{ 2 } } \) …. (iii)
जहाँ \(\frac { d^{ 2 }\theta }{ dt^{ 2 } } \) = कोणीय त्वरण
समी० (i) की तुलना दी हुई समी० J = -αθ से करने पर,
J = τ
तथा
α = \(\frac { \pi \eta r^{ 4 } }{ 2I } \) ……….. (iv)
∴ समी० (ii) व (iv) से
α ~ C
समीकरण (iv) मरोड़ी कमानी नियतांक को व्यक्त करता है। वृत्तीय चक्रिका के पुनः I = \(\frac{1}{2}\)mr2
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MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 26-2
दिया है:
r =15 cm = 0.15 cm,
T = 1.5 s, m=10 kg
इन मानों को समी० (v) में रखने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 27
= 1.97 Nm rad-1
= 2.0 Nm rad-1

प्रश्न 14.24.
कोई वस्तु 5 cm के आयाम तथा 0.2 सेकण्ड की आवृत्ति से सरल आवृत्ति गति करती है। वस्तु का त्वरण तथा वेग ज्ञात कीजिए जब वस्तु का विस्थापन (a) 5 cm (b) 3 cm (c) 0 cm हो।
उत्तर:
दिया है: आयाम, r = 5 cm = 0.05 m
T = 0.2 s
ω = \(\frac { 2\pi }{ T } \) = \(\frac { 2\pi }{ 0.2 } \) = 10π rad s-1
माना कि वस्तु का विस्थापन y है। अतः
v = ω\(\sqrt { r^{ 2 }-y^{ 2 } } \)
तथा a = \(\frac { dv }{ dt } \) = – ω2y
(a) दिया है:
y = 5 cm = 5 × 10-2 m
∴ v = 10π \(\sqrt { (0.05)^{ 2 }=(0.03)^{ 2 } } \) – 0
तथा a = – (10π)2 × 0.05 = – 5π2ms-2
(b) दिया है: y = 3 cm = 3 × 10-2
∴ v = 10π \(\sqrt { (0.05)^{ 2 }=(0.03)^{ 2 } } \)
= 10π × 0.04 ms -1
= 0.4π ms -1
तथा a = – (10π)2 (3 × 10-2)
= – 3π2 ms -2
(c) दिया है: y = 0 cm
v = ω\(\sqrt { r^{ 2 }-0^{ 2 } } \)
= rω = 0.05 × 10π
= 0.5π ms-1
तथा a = -ω2 × 0 = 0

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प्रश्न 14.25.
किसी कमानी से लटका एक पिण्ड एक क्षैतिज तल में कोणीय वेग से घर्षण या अवमंद रहित दोलन कर सकता है। इसे जब x0 दूरी तक खींचते हैं और खींचकर छोड़ देते हैं तो यह संतुलन केन्द्र से समय t = 0 पर, v0 वेग से गुजरता है। प्राचल ωx0, तथा v0 के पदों में परिणामी दोलन का आयाम ज्ञात करिये। [संकेत: समीकरण x = a cos (ωt + θ) से प्रारंभ कीजिए। ध्यान रहे कि प्रारंभिक वेग ऋणात्मक है।]
उत्तर:
माना किसी क्षण t कण का विस्थापन निम्न है –
x = a cos (ωt + φ0) ……. (i)
जहाँ a = आयाम
φ0 = प्रा० कला
माना किसी क्षण पर वेग v है। तब,
v = \(\frac { dy }{ dt } \)
= \(\frac { d }{ dt } \) [a cos (ωt + φ0)]
= – aω sin (ωt + φ0) ………. (ii)
t = 0, x0 = x व v = v0 पर
t = 0 रखने पर, समी० (i) व (ii) से,
x0 = a cos φ0
तथा v0 = 0 aωsinφ0
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समी० (iii) यह व्यक्त करता है कि प्रा० वेग ऋणात्मक है। (iii) में दोनों ओर का वर्ग करने पर,
MP Board Class 11th Physics Solutions Chapter 14 दोलन img 28

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MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms

Reproduction in Organisms Important Questions

Reproduction in Organisms Objective Type Questions

Question 1.
Choose the correct answers:

Question 1.
The endosperm in angiospermic plant is :
(a) Haploid
(b) Diploid
(c) Triploid
(d) Polyploid.
Answer:
(c) Triploid

Question 2.
The function of tapetum innermost layer of the anther is :
(a) Dehiscence
(b) Mechanical
(c) Protection
(d) Nutritional.
Answer:
(c) Protection

Question 3.
In angiosperms, female gametophyte is represented by :
(a) Synergids
(b) Carpel
(c) Egg
(d) Pollen grain
Answer:
(c) Egg

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Question 4.
The endocarp of coconut is :
(a) Liquid
(b) Soft
(c) Fibrous
(d) Very hard and stony.
Answer:
(b) Soft

Question 5.
In Vallisneria, pollination takes place by :
(a) Water
(b) Insect
(c) Animal
(d) Air
Answer:
(d) Air

Question 6.
Movement of male gamete towards archegonium in prothallus of fern is :
(a) Thermotactic
(b) Chemotropic
(c) Chemotactic
(d) Hygroscopic movement.
Answer:
(d) Hygroscopic movement.

Question 7.
The process of double fertilization (triple fusion) was discovered by: (MP 2012)
(a) Navaschin
(b) Leeuwenhoek
(c) Strasburger
(d) Hofmeister.
Answer:
(a) Navaschin

Question 8.
Clonal cell line is obtained from :
(a) Tissue culture
(b) Tissue isolation
(c) Tissue mixture
(d) Tissue system.
Answer:
(a) Tissue culture

Question 9.
Plants simillar to their parents can be obtained by :
(a) Seeds
(b) Stem cutting
(c) Cutting
(d) Both (a) and (b).
Answer:
(d) Both (a) and (b).

Question 10.
A scion is grafted over stock. The quality of fruit depends on :
(a) Scion
(b) Stock
(c) Both (a) and (b)
(d) None of these.
Answer:
(a) Scion

Question 11.
The life span of a parrot is :
(a) One – two week
(b) 15 years
(c) 20 years
(d) 140 years.
Answer:
(d) 140 years.

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Question 12.
Stem cutting are commonly used for the propagation of :
(a) Banana
(b) Rose
(c) Mango
(d) Cotton.
Answer:
(b) Rose

Question 13.
If the organism is forged from male gamete without fertilization :
(a) Parthenogenesis
(b) Parthenocarpy
(c) Apogamy
(d) Apospory.
Answer:
(a) Parthenogenesis

Question 2.
Fill in the blanks:

  1. Coconut water is the example of ………………
  2. ……………… is the fusion of male and female gamete.
  3. After fertilization of ovule ……………… is formed.
  4. ……………… is formed from ovary.
  5. The endosperm of gymnosperms is ………………
  6. The fusion of male and female gamete of the same flower of same plant is called ………………
  7. ……………… is called the end of reproductive cycle.
  8. The outer wall of pollen grain is called
  9. In Oxalis vegetative propagation takes place by ………………
  10. In Penicilliumasexual reproduction takes place by ………………

Answer:

  1. Endosperm
  2. Fertilization
  3. Seed
  4. Fruit
  5. Haploid
  6. Self polli – nation
  7. Ageing
  8. Exine
  9. Bulbils
  10. Conidia.

Question 3.
I.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 1
Answer:

  1. (c)
  2. (a)
  3. (d)
  4. (e)
  5. (b)

II.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 2
Answer:

  1. (d)
  2. (e)
  3. (a)
  4. (b)
  5. (c)

Question 4.
Write the answer in one word/sentences:

  1. Name the process in which fruits are formed without fertilisation.
  2. Name the mode of reproduction in which new plants are formed from vegetative parts of the plants.
  3. Transfer of pollen grains from pollengrains to stigma of flower is called.
  4. Name the outer covering of seed.
  5. How many male gametes found in a pollen tube?
  6. Who provide nutrition to developing embryo?
  7. Write the name of an algae in which reproductive metshod occurs by zoospores.
  8. Give an example of vegetative propagation which is occurs by leaf.
  9. Name the animal which is reproduced by asexual reproduction.
  10. Split part of the body which is reproduce and developed in new plant is called.
  11. What we called the population of genetically similar organisms formed by asexual reproduction?
  12. Name the animal in which reproduction occurs by transverse binary fission.

Answer:

  1. Parthenogenesis
  2. Vegetative propagation
  3. Pollination
  4. Seedcoat
  5. Two
  6. Endosperm
  7. Chlamydomonas
  8. Bryophyllum
  9. Spongilla
  10. Fragmentation
  11. Clone
  12. Paramoecium.

Reproduction in Organisms Very Short Answer Type Questions

Question 1.
What is meant by life span?
Answer:
The period from birth to the natural death of an organism is called life span.

Question 2.
Give definition of fertilization.
Answer:
Fertilization is a process in which male and female gametes fused to form the zygote.

Question 3.
What is clone?
Answer:
Morphologically and genetically similar individuals who are produced by single parent is called clone.

Question 4.
Give the name of an organism in which asexual reproduction occurs through conidia.
Answer:
Penicillium.

Question 5.
In which plant vegetative propagation occurs through rhizome?
Answer:
In Ginger and Turmeric.

Question 6.
Give the name of an organism in which transverse binary fission occurs.
Answer:
Paramoecium.

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Question 7.
What is ageing?
Answer:
When humans are not capable for reproduction is known as ageing.

Question 8.
Give two examples of hermaphrodite plants.
Answer:
Cucurbita and Coconut are hermaphrodite plants.

Reproduction in Organisms  Short Answer Type Questions

Question 1.
Name the types of reproduction occur in the living organisms.
Answer:
Two types of reproduction occur in the living organisms:

  1. Asexual reproduction
  2. Sexual reproduction.

Question 2.
Which is a better mode of reproduction, sexual or asexual. Why?
Answer:
Sexual mode of reproduction is better because it is biparental reproduction and introduces variation among offsprings and their parants due to crossing over and recombination during gamete formation by meiosis.

Question 3.
Why is the offspring formed by asexual reproduction referred to as clone ?
Answer: In sexual reproduction, the offspring is morphologically and genetically identi-cal to the parent and to each other. Hence, it is called clone.

Question 4.
Write three advantages of asexual reproduction.
Answer:
Following are the three advantages of asexual reproduction:

  1. Large number of offsprings can be produced by single parent.
  2. Purity can be maintained.
  3. It helps in dispersal to far off places.

Question 5.
Offsprings formed due to sexual reproduction have better chances of survival. Why? Is this statement always true?
Answer:
Offsprings formed due to sexual reproduction have better chance of survival because:

  1. The offspring consists of hybrid characters which may adapt better with the different environment.
  2. Genetic variations are introduced among the offsprings which increases the bio – logical tolerance.
  3. Sexual reproduction occurs in adverse condition in lower plant kingdom, so sexual spores survive in adverse condition.

Sexual reproduction may not always show better chances of survival because the off – spring may be inferior to the parents.

Question 6.
How does the progeny formed from asexual reproduction differ from those formed by sexual reproduction?
Answer:
The progenies have similar genetic make up and are exact copies of their parents in asexual reproduction but the progenies have different genetic make up and different from each other and dissimilar to the parent in sexual reproduction.

Variation is absent in asexual reproduction but it is a common phenomenon of sexual reproduction. In asexual reproduction, variation may occur due to mutation whereas variation occurs due to mutation, crossing over and recombination in sexual reproduction.

Question 7.
Distinguish between asexual and sexual reproduction. Why is vegetative reproduction also considered as a type of asexual reproduction?
Answer:
Differences between Asexual and Sexual reproduction:

Asexual reproduction:

  • In this type of reproduction only one parent is required.
  • Whole body or a single cell acts as reproductive unit.
  • Offsprings remain pure, i.e., alike their parents.
  • It occurs by mitosis cell division.
  • Variation does not occur.

Sexual reproduction:

  • In this type of reproduction two parents of different sexes are required.
  • Reproductive units are called as gametes which are produced by specific tissues.
  • Offsprings differ from their parents.
  • Gametes are formed by meiosis cell division and zygote develops by mitosis cell division.
  • Variation occurs.

Vegetative reproduction is considered as a type of asexual reproduction because:

  1. It is uniparental reproduction.
  2. There is no involvement of gametes or sex cells.
  3. Cell division and no reduetional division take place.
  4. Vegetative propagules are somatic cells.

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Question 8.
What is vegetative propagation? Give two suitable examples.
Answer:
In plants, the vegetative propagules (runner, rhizome, sucker, etc.) are capable, of producing new offsprings by the process called vegetative propagation. As the formation of these vegetative propagules does not involve both the parents, the process involved is asexual.
Examples:

  1. Adventitious buds in the notches along the leaf margins of bryophyllum grow to form new plants.
  2. Potato tuber having buds when grown, develops into a new plant.

Question 9.
Define:

  1. Juvenile phase
  2. Reproductive phase
  3. Senescent phase.

Answer:
1. Juvenile phase:
It is the pre – reproductive in which all organisms require a certain growth and maturity in the life before reproducing sexually.

2. Reproductive phase:
Reproductive phase is the phase in the life cycle, where an organism possesses all the capacity and potential to reproduce sexually. It is the end of juvenile phase or vegetative phase.

3. Senescent phase:
It is the post reproductive phase in the life cycle where an organism slowly looses the rate of metabolism, reproductive potential and show deterioration of the physiological activity of the body.

Question 10.
Higher organisms have resorted to sexual reproduction inspite of its complexity.Why?
Answer:
Higher organisms have resorted to sexual reproduction to:

  1. Get over the unfavourable conditions.
  2. Restore high gene pool in a population.
  3. Restore vigour and vitality of the race.
  4. Get proper parental care.
  5. Introduce variations to enable better adaptive capacity.

Question 11.
Explain, why meiosis and gametogenesis are always interlinked.
Answer:
Gametogenesis (formation of male and female gametes) is associated with reduction in chromosome number. Thus, the gamete formed contains half chromosome set of the parental cell. So, gametogenesis is interlinked with meiosis because in meiosis reduction of chromosome number from diploid set (2n) to haploid set (n) takes place.

Question 12.
Identify each part in a flowering plant and write whether it is haploid (n) or diploid (2n).
Answer:
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 3

Question 13.
Define external fertilization, mention its disadvantages.
Answer:
The fusion of compatible gametes (male and female) outside the body of an organism is called external fertilization, example in Frog.
Disadvantages of external fertilization:

  1. It requires a medium for fusion of gametes.
  2. The young ones are often exposed to the predators.
  3. After fertilization, offsprings are produced large in number but no parental care is provided.

Question 14.
Differentiate between a zoospore and zygote.
Answer:
Differences between Zoospores and Zygote:

Zoospore:

  • These are endogenously, asexually produced, unicellular, naked and motile spores having one or two flagella.
  • It may be haploid or diploid.
  • Zoospores takes part in dispersal.

Zygote:

  • Zygote is a diploid cell formed by fusion of male and female gametes.
  • It is always diploid.
  • Zygote does not have significant role in dispersal.

Question 15.
Differentiate between gametogenesis and embryogenesis.
Answer:
Differences between Gametogenesis and Embryogenesis:

Gametogenesis:

  • It is the formation of gametes from me – iocytes.
  • This is a pre – fertilization event.
  • It occurs inside reproductive organs.
  • It produces haploid gamete.
  • The cell division during gametogenesis is meiotic in diploid organisms.

Embryogenesis:

  • It is the formation of embryo from zyg – ote cell.
  • This is a post fertilization event.
  • It occurs outside or inside the female body.
  • It gives rise to diploid embryo.
  • The cell division during embryogenesis is mitotic in diploid organisms.

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Question 16.
What is gootee? How it is prepared?
Answer:
Gootee or Air layering:
It is a modified form of layering in which the cut or injured branch is not buried in the soil but is bound with mud and rags, etc. which is kept moist with the help of water kept in an earthen pot. The roots develop at this portion within a period of about a month or two. Now, the branch is cut and separated from the parent plant and planted in the soil. This method is applied for the vegetative, propagation of Lemon, Orange, Litchi, Guava, Lokat, etc.

MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 4

Question 17.
What do you understand by grafting? Write down the method of grafting.
Answer:
Vegetative propagation:
Vegetative reproduction or vegetative propagation is the process of multiplication in which a portion or fragment of the plant body functions as propagate and develops into new individual. Grafting is a type of artificial vegetative propagation.

Importance of vegetative propagation:

  1. Pure variety can be produced
  2. It increases production.

Grafting:
This is a very significant method and is extensively used for growing Roses and Mangoes. Grafting is making a twig or bud of one plant grow on the trunk and root system of another. In this process a detached portion of one plant is inserted into the stem or root system of another plant. The former is called scion (short piece of detached shoot containing several dormant buds) and the latter stock (lower portion of the plant which is fixed to the soil by its root system).

Grafting is done in such a way that the cambium tissue of both scion and stock comes in contact and forms a cambium layer common to both. Consequently the scion and the stock grow together and the scion becomes part of the plant into which it is grafted.
MP Board Class 12th Biology Important Questions Chapter 1 Reproduction in Organisms 5

MP Board Class 12th Biology Important Questions

MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व

MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व

11 p-ब्लॉक तत्त्व NCERT अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.

  1. B से TIतक
  2. C से Pb तक की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की भिन्नता के क्रम की – व्याख्या कीजिए।

उत्तर:
1. B से TI तक की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की भिन्नता का क्रम –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 3
बोरॉन तथा ऐल्युमिनियम केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं, क्योंकि ये d-अथवा f- इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति के कारण अक्रिय युग्म प्रभाव नहीं दर्शाते हैं। Ga से TI तक के तत्व + 1 तथा +3 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं। + 1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाने की प्रवृत्ति वर्ग में नीचे की ओर जाने पर बढ़ती जाती है, क्योंकि संयोजी कोश के ns2 इलेक्ट्रॉनों की आबंध की प्रवृत्ति घटती जाती है। इसे अक्रिय युग्म प्रभाव कहते हैं। TI+ TI की अपेक्षा अधिक स्थायी है।

2. से Pb तक की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की भिन्नता का क्रम –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 4
कार्बन तथा सिलिकॉन केवल + 4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। भारी सदस्यों + 2 में ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति Ge < Sn < Pb के क्रम में बढ़ती है। यह संयोजी कोश के ns इलेक्ट्रॉनों की आबंध के प्रति कम रूचि के कारण होता है (अक्रिय युग्म प्रभाव) Ge + 4 अवस्था में स्थायी यौगिक बनाता है । Sn दोनों अवस्थाओं में यौगिक बनाता है तथा लेड के यौगिक +4 अवस्था की तुलना में, + 2 अवस्था में अधिक स्थायी होते हैं।

प्रश्न 2.
TICl3 की तुलना में BCl3 के उच्च स्थायित्व को आप कैसे समझायेंगे ?
उत्तर:
बोरॉन केवल + 3 अवस्था प्रदर्शित करता है। अतः यह एक स्थायी यौगिक BCl3 बनाता है। वर्ग में नीचे आने पर अक्रिय युग्म प्रभाव क्रमशः अधिक प्रभावी होता जाता है, जिसके कारण थैलियम की + 1 ऑक्सीकरण अवस्था, + 3 ऑक्सीकरण अवस्था की अपेक्षा BCl3 अधिक स्थायी होता है।

प्रश्न 3.
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड लुईस अम्ल के समान व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है ?
उत्तर:
BF3, इलेक्ट्रॉन न्यून होने के कारण, एक प्रबल लुईस अम्ल है। यह लुईस क्षार के कारण, एक प्रबल लुईस अम्ल है। यह लुईस क्षार के साथ सुगमतापूर्वक क्रिया करके बोरॉन के प्रति अष्टक पूरा करता है।
F3B + : NH3 → F3B → NH3
लुईस अम्ल लुईस क्षार

प्रश्न 4.
BCl3 तथा CCl4 यौगिक का उदाहरण देते हुए जल के प्रति इनके व्यवहार के औचित्य समझाइए।
उत्तर:
BCl3 एक इलेक्ट्रॉन न्यून अणु है। यह जल से सरलता से इलेक्ट्रॉनों का एक युग्म ग्रहण करता है तथा बोरिक अम्ल (H3BO3) तथा HCl बनाता है।
BCl3 + 3H2O → H3BO3 + 3HCl
CCl4 एक इलेक्ट्रॉन समृद्ध अणु है, जिसमें C परमाणु में d- कक्षक अनुपस्थित होते हैं । जिसके कारण यह ना तो इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण करता है और न ही देता है। अतः CCl4का जल-अपघटन नहीं होता है।

प्रश्न 5.
क्या बोरिक अम्ल प्रोटीनो अम्ल है ? समझाइए।
उत्तर:
बोरिक अम्ल प्रोटीनो अम्ल नहीं है, क्योंकि यह जल में आयनीकृत होकर प्रोटॉन नहीं देता है। यह एक लुईस अम्ल की भाँति व्यवहार करते हुए H2O अणु के हाइड्रॉक्सिल आयन से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करता है तथा अंत में H+ आयन मुक्त करता है।
B(OH)3 + 2HOH → [B(OH)3] + H3O+

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प्रश्न 6.
क्या होता है, जब बोरिक अम्ल को गर्म किया जाता है ?
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 5

प्रश्न 7.
BF3 तथा BH4 की आकृति की व्याख्या कीजिए।इन स्पीशीज में बोरॉन के संकरण को निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर:
BF3 में बोरॉन में 3 आबंध युग्म उपस्थित होते हैं । अतः यह sp2संकरित तथा त्रिकोणीय तथा त्रिकोणीय समतलीय संरचना का होता है जबकि [BH4] में आबंध संख्या = 4 होने के कारण संकरण sp3 तथा संरचना चतुष्फलकीय होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 6

प्रश्न 8.
ऐल्युमिनियम के उभयधर्मी व्यवहार दर्शाने वाली अभिक्रियाएँ दीजिए।
उत्तर:
Al, अम्ल तथा क्षार दोनों में घुलकर डाइहाइड्रोजन मुक्त करता है, इसका यह व्यवहार उभयधर्मी होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 7

प्रश्न 9.
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक क्या होते हैं ? क्या BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है ? समझाइए।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक वे यौगिक होते हैं, जिनमें इनके अणुओं में उपस्थित केन्द्रीय परमाणु एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखता है। इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक लुईस अम्ल भी कहलाते हैं। हाँ, BCI और SiCl, दोनों इलेक्ट्रॉन न्यून होते हैं। जहाँ B परमाणु में एक रिक्त 2p – कक्षक होता है। वहीं Si परमाणु मे रिक्त 3d-कक्षक होता है। ये दोनों परमाणु, इलेक्ट्रॉन दाता स्पीशीज से इलेक्ट्रॉन युग्मों को ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 10.
CO2-3 – तथा HCO 3 की अनुनादी संरचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
CO2-3आयन की अनुनादी संरचनाएँ –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 8
HCO 3 आयन की अनुनादी संरचनाएँ –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 9

प्रश्न 11.

  1. CO2-3
  2. हीरा तथा
  3. ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण अवस्था क्या होती है ?

उत्तर:
CO2-3 हीरा तथा ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण अवस्थाएँ क्रमशः sp2 sp3 तथा sp2 हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 10

प्रश्न 12.
संरचना के आधार पर हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों में निहित भिन्नता समझाइए।
उत्तर:
हीरा तथा ग्रेफाइट में अंतर –
हीरा:

  • इसमें C2 sp3संकरित अवस्था में है।
  • इसमें ज्यामिति द्विविमीय परतीय होती है।
  • यह उच्च घनत्व तथा उच्च क्वथनांक के साथ कठोरतम पदार्थ है।
  • यह ऊष्मा तथा विद्युत् का कुचालक (मुक्त इलेक्ट्रॉन मुक्त होता है) होता है।
  • इसका प्रयोग काँच काटने में, आभूषणों तथा अपघर्षक के रूप में होता है।

ग्रेफाइट:

  • इसमें C2 sp2 संकरित अवस्था में है।
  • इसकी ज्यामिति त्रिविमीय चतुष्फलकीय होती है।
  • यह निम्न घनत्व तथा उच्च क्वथनांक के साथ मुलायम तथा चिकनाई वाला पदार्थ है।
  • यह ऊष्मा तथा विद्युत् का सुचालक (चौथा इलेक्ट्रॉन की अनुपस्थिति) होता है।
  • यह स्नेहक के रूप में, इलेक्ट्रोड निर्माण में, पेंसिल में, क्रूसीबल (उच्च गलनांक के कारण) आदि के निर्माण में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित कथनों को युक्तिसंगत कीजिए तथा रासायनिक समीकरण दीजिए –
1. लेड (II) क्लोराइड, Cl2 से क्रिया करके PbCl4 देता है।
2. लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी है।
3. लेड एक आयोडाइड PbI4 नहीं बनाता है।
उत्तर:
1. लेड (Pb) की +2 ऑक्सीकरण अवस्था अर्थात् Pb(II), + 4 ऑक्सीकरण अवस्था अर्थात् Pb(IV) की अपेक्षा अधिक स्थायी क्लोराइड Pb(IV) क्लोराइड नहीं बनाएगा।
PbCl2(g) + Cl2(g) →PbCl4(g)

2. लेड की (II) ऑक्सीकरण अवस्था, (IV) ऑक्सीकरण अवस्था की तुलना में अधिक स्थायी होती है। अतः लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी होता है। यह गर्म करने पर विघटित होकर लेड (II) क्लोराइड बनाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 11

3. शक्तिशाली अपचायक होने के कारण I आयन विलयन में Pb4+ आयन को Pb2+ आयन में अपचयित कर देता है, जिससे लेड PbI4 नहीं बना पाता है। अतः प्रायः PbI2 बनाता है।
Pb4+ + 2I → Pb2+ + I2

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प्रश्न 14.
BF3 तथा BF4 में B – F बंध लम्बाई क्रमशः 130 pm तथा 143 pm होने का कारण बताइए।
उत्तर:
BF3 में, बोरॉन sp2 – संकरित है। इसमें रिक्त कक्षक होता है। प्रत्येक में पूर्णतया भरे हुए, अप्रयुक्त कक्षक होते हैं। चूँकि ये दोनों कक्षक समान ऊर्जा-स्तर के होते हैं। अतः pr – pz पश्च बंधन होता है, जिसमें पूर्णतया भरे हुए अप्रयुक्त 2p – कक्षक द्वारा एक इलेक्ट्रॉन युग्म, B के अतिरिक्त 2p – कक्षक को स्थानांतरित होता है। इस प्रकार का बंध निर्माण पश्च बंधन कहलाता है। अत: B – Fबंध में कुछ द्विबंध व्यवहार पाया जाता है। यही कारण है कि सभी तीन B – F बंधों की बंध लम्बाई से कम होती है।

[B – F4] आयन में, बोरॉन sp3 संकरित होती है। इसके पास रिक्त 2p – कक्षक नहीं होते हैं, जिसके कारण इसमें पश्च बंधन नहीं पाया जाता है।[B – F4]आयन में, सभी 4B – F की पूर्णतया एकल बंध होते हैं। द्विबंध, एकल बंध की अपेक्षा छोटे होते हैं। अत: B-F बंध लम्बाई [B – F4] (143 pm) की अपेक्षा BF3 (130 pm) में कम होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 12

प्रश्न 15.
B – Cl आबंध द्विध्रुव आघूर्ण रखता है, किन्तु BCl3 अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। क्यों?
उत्तर:
BCl3 में बोरॉन sp2 संकरित होती है, जिसके कारण BCl3 अणु की संरचना ज्यामिति त्रिकोणीय समतलीय होती है। यह आकार में सममित होता है तथा सममित अणुओं के लिए परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण का मान शून्य होता है (क्योंकि सभी द्विध्रुव आघूर्ण, अणु की सममितता के कारण निरस्त हो जाते हैं)।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 13
अतः BCl3 का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है।

प्रश्न 16.
निर्जलीय HF में ऐल्युमिनियम ट्राइफ्लुओराइड अविलेय है, परन्तु NaF मिलाने पर घुल जाता है। गैसीय BF3 को प्रवाहित करने पर परिणामी विलयन में से ऐल्युमिनियम ट्राइफ्लुओराइड अवक्षेपित हो जाता है। इसका कारण बताइए।
उत्तर:
ऐल्युमिनियम ट्राइफ्लुओराइड (AIF3) अपनी सहसंयोजी प्रकृति के कारण निर्जल HF में अघुलनशील होता है। किन्तु NaF के साथ क्रिया करने पर यह एक जटिल यौगिक बनाता है जो जल में घुलनशील होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 14
(घुलनशील) जब BF3की वाष्प को जलीय विलयन में प्रवाहित कराया जाता है तो संकुल विदलित हो जाता है। इसके फलस्वरूप ऐल्युमिनियम ट्राइफ्लुओराइड पुनः अवक्षेपित हो जाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 15

प्रश्न 17.
co के विषैली होने का एक कारण बताइए।
उत्तर:
रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन फेफड़े में संयोजित होकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। हीमोग्लोबिन + ऑक्सीजन ⥨ ऑक्सीहीमोग्लोबिन। कार्बन मोनोऑक्साइड अत्यधिक विषाक्त प्रकृति की होती है। इसकी विषाक्तता रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन के साथ संयोग करने की इसकी प्रवृत्ति के कारण होता है, जिससे कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनता है।

कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन अन्दर खींची गयी ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न भागों में ले जाने की स्थिति में नहीं होता है। इससे गला घुटने लगता है और अंत में मृत्यु हो जाती है। हीमोग्लोबिन + CO → कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन
हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मोनोऑक्साइड, हीमोग्लोबिन की रक्त परिवहन की क्षमता को कम कर देती है।

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प्रश्न 18.
CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायी कैसे है ?
उत्तर;
हम जानते हैं कि पौधों के प्रकाश संश्लेषण के लिए CO2 अति आवश्यक है। विभिन्न प्रकार की दहन अभिक्रियाओं से यह गैस बनकर वातावरण में मुक्त होती है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, पौधों द्वारा इसे ग्रहण किया जाता है। अत: वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड चक्र कार्य करता है और इसकी प्रतिशतता लगभग नियत रहती है। जबकि पिछले कई वर्षों में दहन अभिक्रियाएँ अत्यधिक बढ़ गयी हैं और पेड़-पौधे (जंगल) घट गये हैं।

इससे अब वातावरण में CO2 अधिकता में उपस्थित है। मेथेन की भाँति यह भी हरित गृह गैस की भाँति व्यवहार करती है और पृथ्वी के ऊष्मीय विकिरण को अवशोषित कर लेती है। कुछ ऊष्मा वातावरण में मुक्त होती है और शेष पृथ्वी की ओर पुनः विकिरित हो जाती है। इससे धीरे-धीरे भूमण्डलीय ताप वृद्धि हो जाती है एवं बड़े मौसमी परिवर्तन होते हैं।

प्रश्न 19.
डाइबोरेन तथा बोरिक अम्ल की संरचना समझाइए।
उत्तर:
डाइबोरेन की संरचना:
डाइबोरेन में, सिरे वाले चार हाइड्रोजन परमाणु तथा दो बोरॉन परमाणु एक ही तल में होते हैं। इस तल के ऊपर तथा नीचे दो सेतुबंध हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। सिरे वाले चार – B – Hबंध नियमित बंध होते हैं, जबकि दो सेतु बंध (B – H – B) भिन्न प्रकार के होते हैं तथा इन्हें केला बंध (या विकेंद्रीय बंध) कहते हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 16
बोरिक अम्ल की संरचना-बोरिक अम्ल की परतीय संरचना होती है, जिससे H3BO3 इकाइयाँ हाइड्रोजन बंध द्वारा जुड़ी होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 17

प्रश्न 20.
क्या होता है ? जब –
1. बोरेक्स को अधिक गर्म किया जाता है।
2. बोरिक अम्ल को जल में मिलाया जाता है।
3. ऐल्युमिनियम की तनु NaOH से अभिक्रिया कराई जाती है।
4. BF3 की क्रिया अमोनिया से की जाती है।
उत्तर:
1. बोरेक्स को अत्यधिक गर्म करने पर सोडियम मेटाबोरेट तथा बोरिक एनहाइड्राइड का काँच के समान पारदर्शक मानक प्राप्त होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 18
2. बोरिक अम्ल ठण्डे जल में अल्प विलेय है जबकि गर्म जल में शीघ्र विलेय है। यह दुर्बल मोनो क्षारीय अम्ल की भाँति कार्य करता है। यह प्रोटीन अम्ल नहीं है परन्तु जल के एक हाइड्रॉक्साइड आयन को ग्रहण करके प्रोटॉन देने के कारण लुईस अम्ल की भाँति व्यवहार करता है।
H – OH + B(OH)3 — [B(OH)3] + H+

3. जब ऐल्युमिनियम की क्रिया तनु NaOH से कराई जाती है तो डाइहाइड्रोजन मुक्त होती है।
2Al(s) + 2NaOH(aq) + 6H2O(l) → 2Na+[AI(OH)4](aq) + 3H2(g)

4. BF3 लुईस अम्ल होने के कारण, NHसे एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके संकर यौगिक बनाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 19

प्रश्न 21.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को समझाइए –
1. कॉपर की उपस्थिति में उच्च ताप पर सिलिकॉन को मेथिल क्लोराइड के साथ गर्म किया जाता है।
2. सिलिकॉन डाइऑक्साइड की क्रिया हाइड्रोजन फ्लुओराइड के साथ की जाती है।
3. CO को ZnO के साथ गर्म किया जाता है।
4. जलीय ऐलुमिना की क्रिया जलीय NaOH के साथ की जाती है।
उत्तर:
1. सिलिकॉन को कॉपर उत्प्रेरक की उपस्थिति में लगभग 300°C ताप पर मेथिल क्लोराइड के साथ गर्म करने पर निम्न क्रिया होती है –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 20
जल अपघटन करने पर यह सिलिकॉन के बहुलकों का निर्माण करता है।

2. सिलिकॉन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन फ्लुओराइड के साथ अभिक्रिया करके सिलिकॉन टेट्राफ्लुओराइड (SiFa) बनाता है।
SiO2 + 4HF → SiF4 + 2H2O
पुनः SiF4 हाइड्रोजन फ्लुओराइड के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोफ्लुओरोसैलिसिलीक अम्ल बनाता है।
SiF4 + 2HF → H2SiF6

3. CO द्वारा जो कि एक प्रबल अपचायक है, ZnO जिंक (Zn) में अपचयित हो जाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 21

4. ये दोनों यौगिक दाब के अधिक गर्म करने पर अभिक्रिया करके एक घुलनशील संकुल बनाते हैं।
Al2O3(s)+ 2NaOH(aq) + 3H2 O(l) → 2Na[Al(OH)Al4](aq)

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प्रश्न 22.
कारण बताइए –
1. सांद HNO3 का परिवहन ऐल्युमिनियम के पात्र द्वारा किया जा सकता है।
2. तनु NaOH तथा ऐल्युमिनियम के टुकड़ों के मिश्रण का प्रयोग अपवाहिका खोलने के लिए किया जाता है।
3. ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।
4. हीरे का प्रयोग अपघर्षक के रूप में क्यों करते हैं ?
5. वायुयान बनाने में ऐल्युमिनियम मिश्रधातु का उपयोग होता है।
6. जल को ऐल्युमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए।
7. संचरण केबल बनाने में ऐल्युमिनियम तार का प्रयोग होता है।
उत्तर:
1. Al सांद्र HNO3 के साथ क्रिया करके अपनी सतह पर ऐल्युमिनियम ऑक्साइड की रक्षी परत बना लेता है, जो इसकी पुनः क्रियाओं को रोकती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 22
अत: A निष्क्रिय हो जाता है। यही कारण है कि, सांद्र HNO3 का परिवहन ऐल्युमिनियम के पात्र द्वारा किया जाता है।

2. NaOH, AI के साथ क्रिया करके डाइहाइड्रोजन गैस मुक्त करता है । इस हाइड्रोजन गैस के दाब का प्रयोग अपवाहिका खोलने के लिए किया जाता है।
2Al(s) + 2NaOH(aq) + 2H2O(l) → 2NaAlO2(aq) + 3H2(g)

3. ग्रेफाइट की परतीय संरचना होती है। ये परतें परस्पर दुर्बल वाण्डर वाल्स आकर्षण बलों द्वारा बँधी होती हैं, अतः एक दूसरे के ऊपर फिसल सकती हैं। इसी कारण ग्रेफाइट को शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त करते हैं।

5. हीरे में, प्रत्येक sp3 संकरित परमाणु, चार अन्य कार्बन परमाणुओं द्वारा जुड़ा रहता है। इससे परमाणुओं के त्रिविमीय जालक का निर्माण होता है। इस विस्तृत सहसंयोजक बंधन को तोड़ना कठिन कार्य होता है। अतः हीरा पृथ्वी पर पाये जाने वाला कठोरतम पदार्थ है। इसी कारण इसका प्रयोग अपघर्षक के रूप में करते हैं।

6. ऐल्युमिनियम के मिश्रधातु जैसे ड्यूरालुमीन हल्की, मजबूत तथा जंगरोधी होती है। इसी कारण इनका प्रयोग वायुयान बनाने में होता है।

7. ऐल्युमिनियम जल तथा ऑक्सीजन (जल में उपस्थित) के साथ क्रिया करके विषैले ऐल्युमिनियम ऑक्साइड की पतली परत पात्र दीवार पर बना देता है। इसलिए जल को ऐल्युमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए।

8. ऐल्युमिनियम में विद्युत् चालकता अत्यधिक होती है। इसका प्रयोग संचरण केबल बनाने में होता है। पुनः भारानुसार AI विद्युत् चालकता Cu की अपेक्षा दुगुनी होती है।
2Al(s) + O2(g) + H2O(l) → Al2O(s) + H2(g)

प्रश्न 23.
कार्बन से सिलिकॉन तक आयनीकरण एन्थैल्पी में प्रघटनीय कमी होती है, क्यों ?
उत्तर:
आवर्त सारणी में कार्बन से सिलिकॉन की ओर चलने पर, परमाणु आकार में वृद्धि होती है, अर्थात् बाह्यतम इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक में दूरी बढ़ती है। अतः ये इलेक्ट्रॉन नाभिक का आकर्षण बहुत कम अनुभव करते हैं, जिसके कारण इन्हें निकालना अत्यन्त आसान है। चूँकि Si परमाणु का आकार छोटा है, जिसके कारण बाह्यतम इलेक्ट्रॉन न्यूनतम आकर्षण अनुभव करते हैं। अतः इसकी आयनन एन्थैल्पी (1 इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा) न्यूनतम होती है।

प्रश्न 24.
AI की तुलना में Ga की कम परमाण्वीय त्रिज्या को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
AI तथा Ga की इलेक्ट्रॉनिक संरचनाएँ निम्न हैं –
Al13= 1s2,2s22p6, 3s23p1
Ga51 = 1s2,2s22p6, 3s23p63d10, 4s2,4p1.
इनमें d – इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव अत्यन्त कम है। अत: AI से Ga की ओर चलने पर, 10 d – इलेक्ट्रॉनों का रक्षी प्रभाव बढ़े हुए नाभिकीय आवेश को निष्प्रभावी करने में असमर्थ है। अतः Ga की परमाण्विक त्रिज्या प्रभावी नाभिकीय आवेश के कारण ऐल्युमिनियम की परमाण्विक त्रिज्या से कम होती है।

प्रश्न 25.
अपरूप क्या होता है ? कार्बन के दो महत्वपूर्ण अपरूप हीरा तथा ग्रेफाइट की संरचना का क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
जब कोई तत्व दो या दो से अधिक रूपों में पाया जाता है तथा इन रूपों के भौतिक गुण भिन्नभिन्न तथा रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं, तो इस गुण को अपरूपता तथा तत्व के विभिन्न रूप अपरूप कहलाते हैं। क्रिस्टलीय कार्बन मुख्यतः दो अपररूपों –

  • ग्रेफाइट तथा
  • हीरा रूप में पाया जाता है।

1985 में कार्बन का एक तीसरा अपररूप फुलरीन की खोज एच. डब्लू. क्रोटो, ई. स्माले तथा आर. एफ. कर्ल द्वारा की गई। हीरे में प्रत्येक कार्बन sp3 संकरित होता है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति से चार अन्य कार्बन परमाणु से होता रहता है। हीरे में कार्बन परमाणुओं का त्रिविमीय जालक बना होता है। ग्रेफाइट में प्रत्येक कार्बन sp2 संकरित होता है तथा तीन समीपवर्ती कार्बन परमाणुओं के साथ तीन सिग्मा (6) बंध बनाता है। इसकी संरचना परतीय होती है तथा ये परतें दुर्बल वाण्डर वाल्स बलों से जुड़ी होती हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 23
कार्बन के दो अपरूपों हीरा तथा ग्रेफाइट की संरचना तथा इनके भौतिक गुणों पर प्रभाव –

  • हीरा, अपनी कठोरता के कारण, अपघर्षक तथा रूपदा (dye) बनाने में प्रयुक्त होता है, जबकि ग्रेफाइट मुलायम होने के कारण पेंसिल के रूप तथा मशीनों में शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।
  • हीरा विद्युत् का चालक नहीं है, जबकि ग्रेफाइट विद्युत् का अच्छा चालक है, क्योंकि इसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु का इलेक्ट्रॉन मुक्त अवस्था में होता है।
  • हीरा पारदर्शी है, जबकि ग्रेफाइट अपारदर्शी है।

प्रश्न 26.
1. निम्नलिखित ऑक्साइड को उदासीन, क्षारीय तथा उभयधर्मी ऑक्साइड के रूप में वर्गीकृत कीजिए – CO, B,03, SiO2, AI,03, Pb02, TI2O3.
(b) इनकी प्रकृति को दर्शाने वाली रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
1. उदासीन ऑक्साइड – CO
अम्लीय ऑक्साइड – B2O3, SiO2, CO2
क्षारीय ऑक्साइड – TI2O3
उभयधर्मी ऑक्साइड – Al2O3, PbO2.

2. (i) B2O3, SiO2 तथा CO2 अम्लीय होने के कारण क्षारों के साथ क्रिया करके लवण बनाते हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 24

3. Al2O3 तथा PbO2 उभयधर्मी होने के कारण, अम्लों तथा क्षारों दोनों के साथ क्रिया करते हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 25
4. Tl2O3क्षारीय होने के कारण अम्लों के साथ क्रिया करता है।
TI2O3 + 6HCl → 2TICl3 +3H2O

प्रश्न 27.
कुछ अभिक्रियाओं में थैलियम, ऐल्युमिनियम से समानता दर्शाता है, जबकि अन्य में यह समह – 1 के धातुओं से समानता दर्शाता है। इस तथ्य को कुछ प्रमाणों के द्वारा सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
थैलियम तथा ऐल्युमिनियम दोनों वर्ग – 13 के तत्व हैं। इसके संयोजी कोश का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np1 है। ऐल्युमिनियम केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। ऐल्युमिनियम की भाँति, थैलियम भी कुछ यौगिकों में + 3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। उदाहरण- TI2O3, TIC, आदि। ऐल्युमिनियम की भाँति थैलियम भी अष्टफलकीय आयन जैसे [AlF6]3- तथा [TIF]3- बनाता है।

वर्ग – 1 की क्षार धातुओं के समान, थैलियम अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण + 1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। उदाहरण- TICl, TIO आदि। क्षार धातु हाइड्रॉक्साइडों की भाँति, TIOH भी जल में विलेय है तथा जलीय विलयन प्रबल क्षारीय है। TI,SOA, क्षार धातु सल्फेटों की भाँति फिटकरी बनाता है तथा TI2O3, क्षार धातु कार्बोनेट की भाँति जल में विलेय है।

प्रश्न 28.
जब धातु X की क्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ की जाती है, तो श्वेत अवक्षेप (A) प्राप्त होता है, जो NaOH के आधिक्य में विलेय होकर विलेय संकुल (B) बनाता है। यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर यौगिक (C) बनाता है। यौगिक (A) को अधिक गर्म किए जाने पर यौगिक (D) बनता है, जो एक निष्कर्षित धातु के रूप में प्रयुक्त होता है।X,A, B, C तथा D को पहचानिए तथा इनकी पहचान के समर्थन में उपयुक्त समीकरण दीजिए।
उत्तर:
आँकड़े सुझाते हैं कि यह धातु ‘X’ ऐल्युमिनियम है। यौगिक (A), (B), (C) और (D) के निर्माण में ऐल्युमिनियम की अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –
1. ऐल्युमिनियम (X) को NaOH के साथ गर्म करने पर AI(OH)3 का एक सफेद अवक्षेप अर्थात् यौगिक A बनता है, जो NaOH के आधिक्य में घुलकर घुलनशील संकुल ‘B’ बनाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 27
2. यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर ऐल्युमिनियम क्लोराइड (C) बनाता है।
Al(OH)3 + 3HCl(aq) → AlCl3(aq) + 3H2O(l)

3. AI(OH)3 गर्म करने पर ऐलुमिना (D) में बदल जाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 28
Al2O3, Al धातु के निष्कर्षण में प्रयुक्त होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 29

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प्रश्न 29.
निम्नलिखित से आप क्या समझते हैं(a) अक्रिय युग्म प्रभाव, (b) अपरूप, (c) श्रृंखलन।
उत्तर:
1. अक्रिय युग्म प्रभाव:
जबs – इलेक्ट्रॉनों की प्रवृत्ति स्वयं के साथ ही रहने की हो या sइलेक्ट्रॉनों की प्रवृत्ति अभिक्रिया में भाग लेने के प्रति विमुखता हो तो इस प्रवृत्ति को अक्रिय युग्म प्रभाव कहते हैं । इसका कारण यह है कि ns – इलेक्ट्रॉनों को अयुग्मित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा दो अतिरिक्त ऊर्जा दो अतिरिक्त बंध बनाने में निर्मुक्त ऊर्जा से अधिक नहीं होती है। वर्ग-13, 14, 15 के भारी सदस्य तत्व अपने संयोजी कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या से कम ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए TI में +1 ऑक्सीकरण अवस्था, + 3 ऑक्सीकरण अवस्था की अपेक्षा अधिक स्थायी है।

2. अपरूप:
जब कोई तत्व दो. या दो से अधिक रूपों में पाया जाता है तथा इन रूपों के भौतिक गुण भिन्न-भिन्न तथा रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं, तो इन रूपों को अपरूप तथा इस गुण को अपरूपता कहते हैं। इसका कारण या तो अणुओं में परमाणुओं की संख्या में अंतर है (जैसे- O2 तथा O3) अथवा अणु में परमाणुओं की व्याख्या में भिन्नता होती है। [जैसे – ग्रेफाइट, हीरा तथा फुलेरीन (कार्बन के क्रिस्टलीय अपरूप)]

3. श्रृंखलन:
एक जैसे परमाणुओं की परस्पर, जुड़कर लंबी, खुली या बंद श्रृंखला बनाने का गुण श्रृंखलन कहलाता है। यह कार्बन में अधिकतम पाया जाता है तथा वर्ग में नीचे की ओर जाने पर क्रमशः घटता है। वर्ग-14 में क्रम निम्नवत् है –
C >> Si > Ge = Sn >> Pb

प्रश्न 30.
एक लवण x निम्नलिखित परिणाम देता है –
1. इसका जलीय विलयन लिटमस के प्रति क्षारीय होता है।
2. तीव्र गर्म किए जाने पर यह काँच के समान ठोस में स्वेदित हो जाता है।
3. जब X के गर्म विलयन में सान्द्र H2SO4 मिलाया जाता है, तो एक अम्ल Z का श्वेत क्रिस्टल बनता है।
उपर्युक्त अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए और X, Y तथा Z को पहचानिए।
उत्तर:
आँकड़ों से पता चलता है कि लवण ‘X’ बोरेक्स (Na2B4O7. 10H2O) है।
1. बोरेक्स का जलीय विलयन क्षारीय प्रकृति का होता है और लाल लिटमस को नीला कर देता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 30
2. बोरेक्स को तेज गर्म करने पर इसका आकार बढ़ जाता है और यह क्रिस्टलन जल के अणुओं को त्यागकर ठोस (Y) बनाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 31
3. बोरेक्स, सान्द्र H2SO4 के साथ अभिक्रिया करके बोरिक अम्ल (H3BO3) बनाता है। यह विलयन में सफेद क्रिस्टलों (Z) के रूप में प्राप्त होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 38

प्रश्न 31.
निम्नलिखित के लिये संतुलित समीकरण लिखिये –
1. BF3 + LiH →
2. B2H6 + H2O →
3. NaH + B2H6
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 32
5. AI + NaOH + H2O →
6. B2H6 + NH2
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 33

प्रश्न 32.
CO तथा CO2 प्रत्येक के संश्लेषण के लिए एक प्रयोगशाला तथा एक औद्योगिक विधि समझाइए।
उत्तर:
(a) कार्बन मोनोऑक्साइड –
1. औद्योगिक विधि;
गर्म कोक पर भाप प्रवाहित करने पर CO प्राप्त होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 34
2. प्रयोगशाला विधि:
सांद्र H2SO4 की उपस्थिति में फॉर्मिक अम्ल के निर्जलीकरण द्वारा CO प्राप्त होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 35

(b) कार्बन डाइऑक्साइड –
1.  औद्योगिक विधि – चूने के पत्थर को गर्म करने पर CO2प्राप्त होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 36
2. प्रयोगशाला विधि – CaCO3 पर तनु HCl की क्रिया से CO2 प्राप्त होती है।
CaCO3(s) + 2HCl(aq) →CaCl2(aq)+ CO2(g)+ H2O(l)

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प्रश्न 33.
बोरेक्स के जलीय विलयन की प्रकृति कौन-सी होती है –
(i) उदासीन
(ii) उभयधर्मी
(iii) क्षारीय
(iv) अम्लीय।
उत्तर:
क्षारीय।

प्रश्न 34.
बोरिक अम्ल के बहुलकीय होने का कारण
(i) इसकी अम्लीय प्रकृति है
(ii) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है
(iii) इसकी एकक्षारीय प्रकृति है
(iv) इसकी ज्यामिति है।
उत्तर:
(ii) हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति।

प्रश्न 35.
डाइबोरेन में बोरॉन का संकरण कौन:
सा होता है –
(i) sp2
(ii) sp2
(iii) sp3
(iv) dsp2
उत्तर:
(iii) sp3 संकरण।

प्रश्न 36.
ऊष्मागतिकीय रूप से कार्बन का सर्वाधिक स्थायी रूप कौन-सा है –
(i) हीरा
(ii) ग्रेफाइट
(iii) फुलेरीन्स
(iv) कोयला।
उत्तर:
(ii) कार्बन अपरूपों में ग्रेफाइट सर्वाधिक स्थायी है।

प्रश्न 37.
निम्नलिखित में से समूह-14 के तत्वों के लिए कौन-सा कथन सत्य है –
(i) +4 ऑक्सीकरण प्रदर्शित करते हैं।
(ii) +2 तथा + 4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।
(iii) M2- तथा M4+ आयन बनाते हैं।
(iv) M2+ तथा M4-आयन बनाते हैं।
उत्तर:
(ii) +2 और +4 ऑक्सीकरण अवस्था।

प्रश्न 38.
यदि सिलिकॉन-निर्माण में प्रारंभिक पदार्थ RSiC3 है, तो बनने वाले उत्पाद की संरचना दीजिए।
उत्तर:
एल्किलट्राइक्लोरोसिलेन के जल-अपघटन तथा इसके पश्चात् संघनन बहुलीकरण द्वारा शृंखला बहुलक (सिलिकॉन) प्राप्त होते हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 37

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11 p-ब्लॉक तत्त्व अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

11 p-ब्लॉक तत्त्व वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न 1.
बोरिक अम्ल के बारे में कौन-सा कथन असत्य है –
(a) यह एक भास्मिक अम्ल है
(b) यह बोरॉन हैलाइड के जल-अपघटन से बनता है
(c) इसकी आकृति समतलीय होती है
(d) यह त्रिभास्मिक अम्ल है।
उत्तर:
(a) यह एक भास्मिक अम्ल है

प्रश्न 2.
डाइबोरेन में बोरॉन परमाणु का संकरण है –
(a) sp
(b) sp2
(c) sp3
(d) sp3d2
उत्तर:
(b) sp2

प्रश्न 3.
बोरिक अम्ल के बहुलीकृत होने का कारण है –
(a) अम्लीय प्रकृति
(b) H – बंध
(c) मोनो-भास्मिक प्रकृति
(d) इसकी ज्यामिति।
उत्तर:
(b) H – बंध

प्रश्न 4.
ऐल्युमिनियम का प्रमुख अयस्क है –
(a) बॉक्साइट
(b) डोलोमाइट
(c) गैलेना
(d) फेल्स्पार।
उत्तर:
(a) बॉक्साइट

प्रश्न 5.
त्रिकेन्द्रित दो इलेक्ट्रॉन बंध किसमें उपस्थित हैं –
(a) NH3
(b)B2H 6
(c) BCl3
(d) Al2Cl6
उत्तर:
(b)B2H6

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प्रश्न 6.
कार्बोरंडम है –
(a) B4C
(b) SiC
(c) Al3C4
(d) CaC2
उत्तर:
(b) SiC

प्रश्न 7.
कौन-सा हैलाइड इलेक्ट्रॉन न्यून है –
(a) CCl4
(b) NCl3
(c) Cl2O
(d) BCl3
उत्तर:
(d) BCl3

प्रश्न 8.
कार्बन का स्थायी अपरूप है –
(a) हीरा
(b) ग्रेफाइट
(c) कोल
(d) ऐंथेसाइट।
उत्तर:
(b) ग्रेफाइट

प्रश्न 9.
विद्युत् चालकता किसमें नहीं है –
(a)K
(b) ग्रेफाइट
(c) हीरा
(d) Na.
उत्तर:
(c) हीरा

प्रश्न 10.
कठोरतम ज्ञात पदार्थ है –
(a) कोक
(b) कार्बोरण्डम
(c) कोरंडम
(d) हीरा।
उत्तर:
(d) हीरा।

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. जब एलुमिना में Fe2O3 एवं SiO2दोनों प्रकार की अशुद्धियाँ उपस्थित रहती हैं तो इसका शोधन ………….. की विधि द्वारा किया जाता है।
  2. सिलिका युक्त अशुद्धि वाले बॉक्साइट खनिज को N2 की धारा में कोक के साथ 1800°C पर गर्म करने से ………….. प्राप्त होता है तथा सिलिकॉन वाष्पशील होने से अलग हो जाता है।
  3. समूह 13 के तत्वों के कुछ ऑक्साइड जलीय विलयन में नीले लिटमस को लाल एवं लाल लिटमस को नीला करते हों, इस प्रकार के ऑक्साइडों का विलयन ………….. कहा जाता है।
  4. ऐल्युमिनियम क्लोराइड द्विलक के रूप में पाया जाता है, जिसका रासायनिक सूत्र ………….. है।
  5. ठोस CO2 को ………….. कहते हैं।
  6. ओजोन परत को नष्ट करने वाला प्रमुख कारक ………….. है।
  7. कार्बन मोनोऑक्साइड सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरीन से क्रिया करके एक विषैली गैस ………….. बनाती है।
  8. कृत्रिम हीरे बनाने वाले सर्वप्रथम वैज्ञानिक ………….. हैं।
  9. जर्मेनियम एक ………….. है।
  10. ग्रेफाइट विद्युत् का ………….. तथा हीरा ………….. है।

उत्तर:

  1. हॉल की
  2. ऐल्युमिनियम नाइट्राइड, (AIN)
  3. उदासीन
  4. Al2Cl6
  5. शुष्क बर्फ
  6. क्लोरो फ्लोरो कार्बन
  7. फॉस्जीन
  8. मोयसाँ
  9. उपधातु
  10. कुचालक, सुचालक।

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प्रश्न 3.
उचित संबंध जोडिए –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 1
उत्तर:

  1. (b) अम्लीय
  2. (c) क्षारीय
  3. (d) क्षारीय
  4. (a) उभयधर्मी
  5. (e) उभयधर्मी।

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उत्तर:

  1. (e) CS2
  2. (c) B4C
  3. (a) CCl4
  4. (b) C2 H2
  5. (d) ग्रेफाइट

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प्रश्न 4.
एक शब्द / वाक्य में उत्तर दीजिए –

  1. TI की + 1 ऑक्सीकरण अवस्था + 3 की अपेक्षा अधिक स्थायी होता है।
  2. बोरॉन के हाइड्राइड को क्या कहते हैं ?
  3. Two electron three center bond’ किसे कहते हैं ? .
  4. कॉपर सल्फेट के विलयन में अमोनिया विलयन को अधिकता में मिलाने पर क्या होगा?
  5. ऐलम का सूत्र लिखिए।
  6. C60 कार्बन क्रिस्टल का नाम क्या है?
  7. कौन-सा कार्बाइड हीरे से भी कठोर है?
  8. कार्बन के किस गुण के कारण इसके यौगिकों की संख्या इतनी अधिक है?
  9. कार्बन के विद्युत् सुचालक अपररूप का नाम बताइये।
  10. जल ग्लॉस किसे कहते हैं?

उत्तर:

  1. अक्रिय युग्म प्रभाव
  2. बोरेन
  3. डाइबोरेन
  4. क्यूप्रिक अमोनियम सल्फेट का संकर यौगिक बनेगा.
  5. K2SO4Al2 (SO4)3.24H20
  6. बकमिंस्टर फुलेरीन
  7. बोरॉन कार्बाइड
  8. श्रृंखलन का गुण
  9. ग्रेफाइट
  10. सोडियम सिलिकेट।

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11 p-ब्लॉक तत्त्व अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्या कारण है कि कास्टिक क्षार जैसे NaOH को ऐल्युमिनियम के बर्तन में नहीं रखा जाता?
उत्तर:
कास्टिक क्षार जैसे NaOH को ऐल्युमिनियम के पात्र में रखने पर ऐल्युमिनियम क्षार में विलेय होकर सोडियम मेटा ऐल्युमिनेट बनाता है इसीलिए क्षार को ऐल्युमिनियम के पात्र में नहीं रखा जाता। 2Al + 2NaOH + 2H2O → 2NaAlO2  + 3H2

प्रश्न 2.
साधारण ताप पर ऐल्युमिनियम जल के साथ कोई अभिक्रिया नहीं करता, क्यों?
उत्तर:
वायु की उपस्थिति में AI की सतह पर पारदर्शी असरन्ध्रमय संरक्षक ऑक्साइड पर्त बन जाती है। इस पर्त के कारण साधारण ताप पर जल के साथ कोई अभिक्रिया नहीं दर्शाता।

प्रश्न 3.
आयरन तथा ऐल्युमिनियम में ऐल्युमिनियम, आयरन की तुलना में अधिक क्रियाशील है किन्तु ऐल्युमिनियम की तुलना में आयरन पर जंग सरलता से लगता है, क्यों?
उत्तर:
वायु की उपस्थिति में ऐल्युमिनियम की सतह पर पारदर्शी असरन्ध्रमय संरक्षक ऑक्साइड पर्त बन जाती है, जिसके कारण यह साधारण ताप पर वायु में उपस्थित ऑक्सीजन तथा नमी के साथ कोई अभिक्रिया नहीं दर्शाती जबकि आयरन की सतह पर सरन्ध्रमय ऑक्साइड पर्त बनती है। जिसके कारण आयरन की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। इसीलिये आयरन पर सरलता से जंग लगता है।

प्रश्न 4.
द्विक लवण या एलम का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
द्विक लवण का सामान्य सूत्र R2SO4 M2(SO4)3 है। जहाँ R कोई एकसंयोजी धातु जैसे – Na, K, Rb, Cs या NH+4 मूल तथा M त्रिसंयोजक धातु जैसे- Fe+3 Al+3 या Cr+3 हो सकता है।
उदाहरण – K2SO4 Al2 (SO4)3.24H2O पोटाश एलम

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प्रश्न 5.
ऐल्युमिनियम के अयस्कों के नाम बताइये। अयस्कों के सूत्र दीजिए।
उत्तर:
ऐल्युमिनियम के अयस्क निम्नलिखित हैं –

  1. बॉक्साइट – Al2O3 2H2O
  2. डायस्योर – Al2O3H2O2
  3. क्रायोलाइट – Na3AlF 6
  4. एलुनाइट – K2SO4 Al2 (SO4)3 2Al(OH)3
  5. कोरण्डम – Al2O3
  6. फेल्स्पार – K2OA2O3 SiO3

प्रश्न 6.
क्या होता है जब (समीकरण देकर स्पष्ट कीजिए) –

  1. ऐल्युमिनियम क्लोराइड को गर्म करते हैं।
  2. फिटकरी को गर्म करते हैं।

उत्तर:
(1) ऐल्युमिनियम क्लोराइड को गर्म करने पर Al2O3प्राप्त होता है।
2AlCl3l.6H2 O → Al2O3 + 6HCl + 3H2O
(2) फिटकरी को गर्म करने पर 200°C पर सरन्ध्र पदार्थ में बदल जाती है।
K2SO4.Al2 (SO4)3 .24H2O → K2O + Al2O3 + 4SO2 + 24H2O

प्रश्न 7.
ऐल्युमिनियम एक प्रबल अपचायक है, क्यों?
उत्तर:
वे तत्व जो रासायनिक अभिक्रिया में इलेक्ट्रॉन दान करके धनायन बनाते हैं, अपचायक कहलाते हैं। किसी भी तत्व की अपचायक प्रवृत्ति उसके मानक इलेक्ट्रोड विभव पर निर्भर करती है। किसी भी तत्व का मानक इलेक्ट्रोड विभव का मान जितना अधिक ऋणात्मक होगा वह तत्व उतना प्रबल अपचायक होगा। Al का मानक इलेक्ट्रोड विभव -1.67 है इसलिये ऐल्युमिनियम एक प्रबल अपचायक की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 8.
कमरे के तापक्रम पर गैलियम द्रव क्यों है ?
उत्तर:
ठोस अवस्था में गैलियम की क्रिस्टलीय संरचना इस प्रकार की होती है कि इसकी जालक ऊर्जा बहुत कम होती है तथा कम ताप पर ही इसके परमाणुओं के बीच के धात्विक बंध टूटने लगता है। इसलिये कमरे के तापक्रम पर ही गैलियम द्रव अवस्था में प्राप्त होता है।

प्रश्न 9.
बोरॉन त्रिसंयोजी आयन नहीं बनाता, क्यों?
उत्तर:
बोरॉन के छोटे आकार के कारण इसकी आयनन ऊर्जा अत्यन्त उच्च होती है तथा तृतीय आयनन ऊर्जा का मान प्रथम आयनन ऊर्जा तथा द्वितीय आयनन ऊर्जा से अधिक होता है। इसलिये बोरॉन के संयोजी कोश से तीन इलेक्ट्रॉन का सरलता से निकाला जाना या दान करना संभव नहीं है। इसलिये बोरॉन त्रिसंयोजी आयन नहीं बनाता।

प्रश्न 10.
बोरॉन के गलनांक तथा क्वथनांक अत्यधिक उच्च क्यों हैं ?
उत्तर:
बोरॉन का क्रिस्टल परमाणुओं के बीच सहसंयोजी बंध स्थापित होकर बनता है। 2 परमाणु ‘मिलकर इकोसेहेड्रॉन नेटवर्क तैयार करते हैं, जिसके 20 त्रिभुजाकार फलक तथा 12 कोने होते हैं। यह बोरॉन को अत्यधिक कठोर बनाता है इसीलिये बोरॉन के गलनांक तथा क्वथनांक अत्यधिक उच्च होते हैं।

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प्रश्न 11.
बोरॉन सामान्यतः अम्ल या क्षार से अभिक्रिया नहीं करता, वह किन परिस्थितियों में अम्ल या क्षार से अभिक्रिया करता है?
उत्तर:
बोरॉन सामान्यतः अम्ल या क्षार से अभिक्रिया नहीं करता है लेकिन अम्ल यदि प्रबल ऑक्सीकारक हो तो बोरॉन उसके साथ उच्च ताप पर अभिक्रिया कर बोरिक अम्ल बनाता है। इसी प्रकार क्षार के साथ उच्च ताप पर अभिक्रिया करके बोरेट बनाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 39

प्रश्न 12.
अकार्बनिक बेंजीन किसे कहते हैं?
उत्तर:
बोरेजीन को अकार्बनिक बेंजीन कहा जाता है इसका रासायनिक सूत्र B3N3H6 है। बोरेजीन की संरचना बेंजीन के समान चक्रीय तथा समतलीय षट्कोणीय संरचना होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 40

प्रश्न 13.
कोरण्डम किसे कहते हैं ?
उत्तर:
Al एक से अधिक क्रिस्टलीय रूपों में मिलता है। इसका सबसे अधिक कठोर क्रिस्टलीय रूप कोरन्डम कहलाता है, जो अपघर्षक की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 14.
बोरॉन के अयस्कों के नाम बताइये। अयस्कों के सूत्र दीजिये।
उत्तर:
बोरॉन के अयस्क निम्नलिखित हैं –

  • बोरेक्स – Na2 B4O710H2O
  • केनाइट – Na2B4O7 2H2O
  • कोलेमेनाइट – Ca3[B3HO4 (OH)3] .2H2O
  • आर्थोबोरिक अम्ल – H3BO3

प्रश्न 15.
सिद्ध कीजिए कि TI+3 ऑक्सीकारक है जबकि Al+3 नहीं।
उत्तर-अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण बोरॉन परिवार में +1 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व समूह में ऊपर से नीचे आने पर बढ़ता है जबकि + 3 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व घटता है इसलिये TI+1, TI+3 की तुलना में अधिक स्थायी है, अतः
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 41
अभिक्रिया से स्पष्ट है कि TI+3 का TI+1 में अपचयन हो रहा है इसलिये TI+3 ऑक्सीकारक है लेकिन Al में Al+3 ऑक्सीकरण अवस्था संभव है। किन्तु Al+3 का ऑक्सीकारक होना संभव नहीं है।

प्रश्न 16.
क्या होता है, जब बोरॉन की अभिक्रिया कास्टिक क्षार के साथ कराई जाती है?
उत्तर:
बोरॉन साधारण ताप पर क्षार के साथ कोई अभिक्रिया नहीं दर्शाता लेकिन कास्टिक क्षार NaOH या कास्टिक पोटाश KOH के साथ अभिक्रिया कर बोरेट बनाता है तथा H2 गैस मुक्त करता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 42

प्रश्न 17.
विषमानुपाती अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
गैलियम +1 तथा +3 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है। गैलियम की +3 ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी होती है इसलिये गैलियम की +1 ऑक्सीकरण अवस्था वाला यौगिक + 3 ऑक्सीकरण अवस्था वाले यौगिक में ऑक्सीकृत हो जाता है।
3GaCl → 2Ga + GaCl3

प्रश्न 18.
बोरिक अम्ल लुईस अम्ल की तरह कार्य करता है प्रोटिक अम्ल की तरह नहीं, क्यों?
उत्तर:
बोरिक अम्ल में केन्द्रीय धातु बोरॉन का अष्टक पूर्ण नहीं होता है। इसके संयोजी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं इसे अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये एक एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म की आवश्यकता होती है। इलेक्ट्रॉन युग्म ग्राही होने की वजह से बोरिक अम्ल लुईस अम्ल की तरह कार्य करता है। यह जल से अभिक्रिया कराने पर H + आयन मुक्त करता है।
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प्रश्न 19.
कोलेमेनाइट से बोरेक्स किस प्रकार प्राप्त किया जाता है ?
उत्तर:
कोलेमेनाइट को सान्द्र सोडियम कार्बोनेट विलयन के साथ उबालने पर बोरेक्स प्राप्त होता है।
Ca2B6O11 + 2Na2CO3 → Na2B4O7 + 2NaBO2 + 2CaCO3
प्राप्त निस्यंद का सान्द्रण करने पर बोरेक्स के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं। मातृद्रव में कार्बन डाइ-ऑक्साइड प्रवाहित करने पर बोरेक्स प्राप्त होता है।
4NaBO2 + CO2 → Na2B407 + Na2CO3

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प्रश्न 20.
बोरिक अम्ल पर ऊष्मा का क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
बोरिक अम्ल को 100°C ताप पर गर्म करने पर मेटाबोरिक अम्ल बनता है जो उच्च ताप पर गर्म करने पर बोरिक एनहाइड्राइड बनाता है।
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प्रश्न 21.
ऐलुमिना से ऐल्युमिनियम के निष्कर्षण में क्रायोलाइट का उपयोग किया जाता है, क्यों?
उत्तर:
शुद्ध ऐलुमिना का गलनांक बहुत उच्च 2050°C होता है, परन्तु क्रायोलाइट और फ्लोरस्पार की उपस्थिति में यह 870°C पर ही पिघल जाता है। इस प्रकार क्रायोलाइट ऐलुमिना का गलनांक कम कर देता है एवं वैद्युत अपघट्य का भी कार्य करता है।

प्रश्न 22.
कैसे सिद्ध करोगे कि हीरा तथा ग्रेफाइट कार्बन के अपरूप हैं ?
उत्तर:
हीरा तथा ग्रेफाइट को वायु की उपस्थिति में दहन करने पर CO2 गैस निकलती है जिसे चूने के पानी में प्रवाहित करने पर चूने का पानी दूधिया हो जाता है। जिससे स्पष्ट है कि हीरा तथा ग्रेफाइट कार्बन के . अपरूप हैं।
Cहीरा + O2 → CO2
Cप्रेफाइट + O2 → CO2

प्रश्न 23.
क्या होगा यदि हीरे के किसी टुकड़े को दहकते चारकोल में डाल दिया जाये?
उत्तर:
यदि हीरे के टुकड़े को दहकते चारकोल में डाल दिया जाये तो वह पूर्णत: जल जाएगा और जलने के पश्चात् केवल CO2 गैस प्राप्त होती है तथा दहन के पश्चात् कोई अवशेष नहीं रहता जिससे स्पष्ट है कि हीरा कार्बन का शुद्धतम रूप है।
Cहीरा + O2 → CO2

प्रश्न 24.
कार्बन मोनोऑक्साइड के उपयोग लिखिये।
उत्तर:

  • यह जल गैस (CO + H2) तथा प्रोड्यूसर गैस (CO + N2) का प्रमुख घटक है।
  • कुछ धातु कार्बोनिल को बनाने के लिये प्रयुक्त होता है।
  • कार्बन मोनोऑक्साइड अपचायक के रूप में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 25.
प्रकृति में ग्रेफाइट की तुलना में हीरा कम मिलता है, क्यों? .
उत्तर:
हीरे का निर्माण कार्बन की पिघली हुई अवस्था में अत्यधिक दाब से क्रिस्टलीय रूप में परिवर्तन के कारण होता है। लेकिन प्रकृति में ऐसी अवस्था बहुत कम होती है इसलिये हीरा ग्रेफाइट की तुलना में कम मिलता है।

प्रश्न 26.
शुष्क बर्फ किसे कहते हैं ? इसके प्रमुख उपयोग लिखिए।
उत्तर:
ठोस कार्बन डाइ-ऑक्साइड को शुष्क बर्फ कहते हैं क्योंकि इसके क्रिस्टल बर्फ के समान दिखते हैं तथा ये कागज तथा कपड़े को गीला नहीं करते हैं। – 78.5° पर द्रव हुए बिना ही ठोस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। इसका उपयोग शीतलक के रूप से खाद्य पदार्थों को सड़ने से बचाने के लिये तथा शल्य चिकित्सा में निश्चेतक के रूप में किया जाता है।

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प्रश्न 27.
कार्बोरण्डम क्या है ? इसका प्रमुख उपयोग लिखिए।
उत्तर:
सिलिकॉन कार्बाइड की संरचना हीरे के समान कठोर होती है इसे कार्बोरण्डम कहते हैं। इसका उपयोग धातुओं में धार बनाने के लिये तथा पीसने के लिये होता है।

प्रश्न 28.
प्रशीतक, निश्चेतक एवं विलायक के रूप में प्रयुक्त होने वाले कार्बनिक यौगिक का नाम एवं संरचना सूत्र लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 45

प्रश्न 29.
ग्रेफाइट के उपयोग लिखिए।
उत्तर:
ग्रेफाइट के उपयोग –

  • यह विद्युत् का सुचालक है। इसलिये इसका उपयोग शुष्क सेल, विद्युत् आर्क में इलेक्ट्रोड के रूप में होता है।
  • इससे पेंसिल, काला पेंट, काली स्याही बनाई जाती है।
  • इसके स्नेहक गुण के कारण इसका उपयोग उच्च ताप पर मशीनों को चिकना बनाये रखने में होता है।

प्रश्न 30.
कोल की किस्मों के नाम लिखिये।
उत्तर:
कोल में उपस्थित कार्बन के आधार पर इसके निम्न प्रकार होते हैं –

  • पीट – इसमें 60% कार्बन होता है।
  • लिग्नाइट – इसमें 70% कार्बन होता है।
  • बिटुमिनस – इसमें 80% कार्बन होता है।
  • ऐन्थेसाइटइसमें 90% कार्बन होता है।

प्रश्न 31.
हीरे के उपयोग लिखिए।
उत्तर:
हीरे के उपयोग –

  • बहुमूल्य जवाहरात के रूप में
  • काँच को काटने के काम में आता है।
  • चट्टानों में छेद करने के काम आता है।
  • नगों पर पॉलिश करने के काम आता है।

प्रश्न 32.
कार्बन डाइ-ऑक्साइड की प्रकृति अम्लीय है। समीकरण सहित समझाइये।
उत्तर:
कार्बन डाइ – ऑक्साइड का जलीय विलयन अम्लीय होता है।
CO2 + H2O →H2CO2 (कार्बोनिक अम्ल)
यह नीले लिटमस को लाल कर देता है तथा क्षार में क्रिया कराने पर लवण बनाता है। .
2 NaOH + CO2 → Na2CO3 + H2O
Ca (OH)2 + CO2 → CaCO3 + H2O.

प्रश्न 33.
किसी बंद कमरे में अंगीठी जलाकर क्यों नहीं सोना चाहिए?
उत्तर:
बंद कमरे में अंगीठी इसलिये नहीं जलानी चाहिए, क्योंकि अंगीठी से निकलने वाली गैस में CO की मात्रा अधिक होती है। यह श्वसन की क्रिया के द्वारा शरीर के भीतर पहुँचकर रक्त की हीमोग्लोबिन के साथ संयुक्त होकर कार्बोक्सी हीमोग्लोबिन बनाती है जो शरीर के विभिन्न भागों में ऑक्सीजन एवं रक्त परिवहन में बाधा उत्पन्न कर देता है। इस कारण मनुष्य को बेहोशी आ सकती है तथा उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

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प्रश्न 34.
कार्बाइड क्या होते हैं ?
उत्तर:
कार्बन के वे द्विअंगी यौगिक जो कार्बन अपने से कम ऋणविद्युती या उच्च धनविद्युती तत्व के साथ बनाता है, कार्बाइड कहलाते हैं। ये अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे –

  • आयनिक कार्बाइड
  • धात्विक कार्बाइड
  • माध्यमिक कार्बाइड
  • सहसंयोजी कार्बाइड।

प्रश्न 35.
सिलिका जेल का उपयोग लिखिए।
उत्तर:
सिलिका जेल सरन्ध्र अक्रिस्टलीय ठोस हैं जिसमें 4% नमी होती है-इसका उपयोग उत्प्रेरक के रूप में पेट्रोलियम उद्योग में होता है। क्रोमेटोग्राफी में भी प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 36.
थिक्सोट्रॉपी किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी द्रव को हिलाने से या मथने से अस्थायी रूप से उसकी श्यानता घट जाती है। इस गुण को थिक्सोट्रॉपी कहते हैं। जब SiCl4 का जल-अपघटन उच्च ताप पर किया जाता है तो प्राप्त होने वाले सिलिका में थिक्सोट्रॉपी का गुण होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 46
पॉलीएस्टर तथा एपॉक्सी रेजिन एवं पेंट की श्यानता कम करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 37.
अंतराकाशी कार्बाइड किसे कहते हैं ?
उत्तर:
संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालकों के अंतराकाशी स्थानों में जब कार्बन परमाणु समावेशित होते हैं। तो ऐसे बनने वाले कार्बाइड अंतराकाशी कार्बाइड होते हैं। ये अत्यंत कठोर होते हैं तथा इनके गलनांक उच्च होते हैं।
उदाहरण – टंगस्टन कार्बाइड, आयरन कार्बाइड।

प्रश्न 38.
मेथेनाइड तथा एसीटिलाइड क्या होते हैं ?
उत्तर:
1. जो कार्बाइड जल-अपघटित होकर मेथेन देते हैं वे मेथेनाइड कहलाते हैं।
Al4C3 +12H2O →4Al(OH)3 + 3CH4
2. जो कार्बाइड जल-अपघटित होकर एसीटिलीन देते हैं, एसीटिलाइड कहलाते हैं।
CaC2 + 2H2O → Ca(OH)2 + C2H2

प्रश्न 39.
बेरीलियम तथा कैल्सियम दोनों एक ही समूह के सदस्य हैं फिर भी कैल्सियम कार्बाइड CaC2 है जबकि बेरीलियम कार्बाइड Be2C है, क्यों?
उत्तर:
कैल्सियम कार्बाइड का जल-अपघटित होकर एसीटिलीन बनता है, अतः इसकी संरचना कैल्सियम कार्बाइड के रूप में है।
जबकि बेरीलियम कार्बाइड का जल-अपघटित होकर मेथेन बनता है, अतः इसकी संरचना बेरोलियम मेथेनाइड के रूप में होनी चाहिये।

प्रश्न 40.
सिलेन तथा जर्मेन किसे कहते हैं ?
उत्तर:
Si तथा Ge के हाइड्राइड को सिलेन तथा जर्मेन कहते हैं जिसे Mn H2n+2) से दर्शाते हैं जहाँ M = Si, Ge है। सिलेन में n का मान 1 से 8 तक हो सकता है। जबकि जर्मेन में n का मान 1 से 5 तक हो सकता है।

प्रश्न 41.
सक्रिय चारकोल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
चारकोल मुलायम तथा सरन्ध्र होता है। यह रंगीन पदार्थ एवं गंध वाली गैसों को शोषित कर लेता है। यदि इसको भाप में 1100°C पर गर्म किया जाता है, तो इसकी शोषण शक्ति और बढ़ जाती है और यह सक्रिय चारकोल कहलाता है।

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11 p-ब्लॉक तत्त्व लघु उत्तरीय प्रश्न – I

प्रश्न 1.
क्या होता है, जब बोरिक अम्ल को गर्म किया जाता है ?
उत्तर:
बोरिक अम्ल को गर्म करने पर विभिन्न तापों पर जल के तीन अणु मुक्त करता है तथा अन्त में बोरॉन ट्राइऑक्साइड बनाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 47

प्रश्न 2.
फिटकरी क्या है ? इसका सामान्य सूत्र बताकर इसके उपयोग बताइये।
उत्तर:
पहले पोटैशियम सल्फेट और ऐल्युमिनियम सल्फेट के द्विक लवण K2SO4 AI2 (SO4)3.24H2O को फिटकरी कहते थे। परन्तु आजकल R2SO4 : M2 (SO4)3.24H2O सामान्य सूत्र वाले सभी द्विक लवण फिटकरी कहलाते हैं । जहाँ K = एकसंयोजी धातु जैसे- Na, K, Rb, Cs आदि ।
M= त्रिसंयोजी धातु जैसे – Al, Cr, Fe इत्यादि।
उपयोग –

  • जल के शोधन में
  • चमड़ा रंगने में
  • कागज उद्योग में
  • आग बुझाने के यंत्रों में
  • कपड़ों की रंगाई में
  • रक्त का बहना रोकने में।

प्रश्न 3.
ऐल्युमिनियम की चार मिश्र धातुओं के नाम, संघटन एवं उपयोग लिखिये।
उत्तर:
ऐल्युमिनियम की मिश्र धातुएँ –
(1) ऐल्युमिनियम ब्रांज – Cu (90%) + Al (10%)
उपयोग –
बर्तन, सस्ते आभूषण, सिक्के बनाने में।

(2) मैग्नेलियम –
Mg (10%) + Al (90%)
उपयोग –
वायुयान, औजार और तुला बनाने में।

(3) यूरेनियम – Al(95%) + Cu (4%) + Mn (0.5%) + Mg (0.5%)
उपयोग –
वायुयान बनाने में।

(4) निकेलॉय –
AI(95%) + Cu(4%) + Ni (1%)

प्रश्न 4.
ऐल्युमिनियम ताँबे की तुलना में विद्युत् का दुर्बल सुचालक है फिर भी विद्युत् केबल में ऐल्युमिनियम का उपयोग होता है। क्यों ?
उत्तर:
कॉपर, ऐल्युमिनियम की तुलना में अच्छा सुचालक है, किन्तु ऐल्युमिनियम हल्की धातु है तथा ऐल्युमिनियम का घनत्व कॉपर की तुलना में अत्यंत कम है। इस प्रकार भारानुसार ऐल्युमिनियम कॉपर की तुलना में अच्छा चालक है। इसलिये इलेक्ट्रिक वायर तथा केबल बनाने में कॉपर के स्थान पर ऐल्युमिनियम का उपयोग ज्यादा होता है।

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प्रश्न 5.
बोरॉन केवल सहसंयोजी यौगिक बनाता है, क्यों?
उत्तर:
बोरॉन के छोटे आकार तथा उच्च आयनन ऊर्जा के कारण धनायन बनाने की प्रवृत्ति अत्यन्त कम होती है। इसलिये बोरॉन तीन इलेक्ट्रॉन को त्यागकर त्रिसंयोजी आयन नहीं बना सकता है। अपना स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिये यह अन्य तत्वों के परमाणु के साथ इलेक्ट्रॉन का साझा करके स्थायी यौगिकों का निर्माण करता है इसलिये बोरॉन केवल सहसंयोजी यौगिक बनाता है।

प्रश्न 6.
बोरॉन के हैलाइड प्रबल लुईस अम्ल की तरह कार्य करते हैं, क्यों?
उत्तर:
बोरॉन के संयोजी कोश में तीन इलेक्ट्रॉन होते हैं। जब यह तीन हैलोजन परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉन का साझा करके बोरॉन ट्राई हैलाइड बनाता है। तब भी इस बोरॉन ट्राई हैलाइड के संयोजी कोश में कुल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं इन्हें अभी भी अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म की आवश्यकता होती है। इसलिये ये इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है तथा इलेक्ट्रॉन ग्राही की तरह कार्य करता है तथा किसी भी इलेक्ट्रॉन युग्म दाता यौगिक द्वारा दिये गये एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण कर उप-सहसंयोजी बंध बनाते हैं तथा एक योगात्मक यौगिक का निर्माण करते हैं । इसलिये ये प्रबल लुईस अम्ल की तरह कार्य करते हैं।

प्रश्न 7.
ऐल्युमिनियम को उसके अयस्कों से अपचयन विधि द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्यों?
उत्तर:
ऐल्युमिनियम प्रबल धन विद्युती होने के कारण अपचायक की तरह कार्य करता है। इसलिये ऐल्युमिनियम को सरलता से ऑक्सीकृत किया जा सकता है, आयनन ऊर्जा तथा इलेक्ट्रॉन बंधुता के आधार पर यह स्पष्ट है कि ऐल्युमिनियम इलेक्ट्रॉन दाता की तरह कार्य करता है इलेक्ट्रॉन ग्राही की तरह नहीं । इसलिये इसे अपचयित नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि ऐल्युमिनियम को उसके अयस्कों के अपचयन द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
गैलियम की परमाण्विक त्रिज्या ऐल्युमिनियम से कम होती है, क्यों?
उत्तर:
गैलियम में d कक्षक में 10 इलेक्ट्रॉन होते हैं। d कक्षक की आकृति इस प्रकार की होती है कि उसका परिरक्षण प्रभाव कम प्रभावी होता है। जिसके कारण बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉन के प्रति नाभिक का आकर्षण बल अधिक होता है जिसके फलस्वरूप बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉन नाभिक की ओर अधिक दृढ़ता से आकर्षित होने लगते हैं। जिसके कारण गैलियम की परमाण्विक त्रिज्या में कमी आती है। इसलिये गैलियम की परमाण्विक त्रिज्या ऐल्युमिनियम से कम है।

प्रश्न 9.
क्या कारण है कि बोरॉन के हैलाइड अमोनिया तथा एमीन के साथ सहसंयोजी यौगिक बनाते हैं ?
उत्तर:
बोरॉन के संयोजी कोश में तीन इलेक्ट्रॉन होते हैं । जब यह तीन हैलोजन परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉन का साझा करके बोरॉन ट्राइहैलाइड बनाता है। तब भी इस बोरॉन ट्राइहैलाइड के संयोजी कोश में कुल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन्हें अभी भी अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म की आवश्यकता होती है। इसलिये ये इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक हैं तथा इलेक्ट्रॉन ग्राही की तरह कार्य करते हैं तथा किसी भी इलेक्ट्रॉन युग्म दाता यौगिक जैसे अमोनिया या एमीन द्वारा दिये गये एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण कर उप-सहसंयोजी बंध बनाते हैं तथा एक योगात्मक यौगिक का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 10.
बोरॉन परिवार सामान्यतः + 1 तथा + 3 ऑक्सीकरण संख्या दर्शाते हैं, क्यों ?
उत्तर:
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 48
बोरॉन परिवार के सभी सदस्यों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns- np’ है । साधारण अवस्था में इनके संयोजी कोश के p उपकोश में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन रहता है। लेकिन उत्तेजित अवस्था में 2s का एक इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर 2p उपकोश में चला जाता है। इस प्रकार उत्तेजित अवस्था में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं । इसलिये बोरॉन परिवार के सभी सदस्य + 1 तथा + 3 ऑक्सीकरण संख्या दर्शाते हैं।

प्रश्न 11.
बोरॉन परिवार में अक्रिय युग्म प्रभाव को समझाइये।
उत्तर:
बोरॉन परिवार के सदस्य साधारण अवस्था में +1 तथा उत्तेजित अवस्था में +3 ऑक्सीकरण संख्या दर्शाते हैं। समूह में ऊपर से नीचे आने पर +1ऑक्सीकरण संख्या का स्थायित्व बढ़ता है लेकिन +3 ऑक्सीकरण संख्या का स्थायित्व कम होता है। क्योंकि संयोजी कोश के 5 कक्षक के दो इलेक्ट्रॉन बंध निर्माण में भाग नहीं लेते। इसे अक्रिय युग्म प्रभाव कहते हैं।

जब परमाणु क्रमांक में वृद्धि होती है तो इलेक्ट्रॉन d उपकोश में प्रवेश करता है तथा d तथा f उपकोश की आकृति इस प्रकार की होती है कि उनका परिरक्षण प्रभाव न्यूनतम होता है जिसके कारण संयोजी कोश के इलेक्ट्रॉनों पर नाभिक का आकर्षण बल बढ़ जाता है तथा इस आकर्षण बल में वृद्धि 5 उपकोश के इलेक्ट्रॉनों पर p उपकोश की तुलना में अधिक होती है। इसलिये ऽ उपकोश के इलेक्ट्रॉन बंध बनाने में भाग नहीं लेते।

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प्रश्न 12.
कोलमेनाइट से बोरिक अम्ल किस प्रकार प्राप्त करते हैं ?
उत्तर:
कोलमेनाइट को उबलते हुये जल में विलेय करके सल्फर डाइ ऑक्साइड गैस प्रवाहित करने पर बोरिक अम्ल व कैल्सियम बाइ सल्फाइट बनता है। कैल्सियम बाइसल्फाइट विलेय रहता है जबकि बोरिक अम्ल क्रिस्टलीत हो जाता है।

  • Ca2B6O11  + 4H2 O + 4SO2  → H4 B6O11 + 2Ca(HSO3 )2
  • H4 B6 O11  + 7H2O → 6H3BO3
  • Ca2B6O11 + 11H2O + 4SO2 → 6H3BO3 + 2Ca(HSO3)2

प्रश्न 13.
बोरेक्स काँच क्या है ?
उत्तर:
निर्जल सोडियम टेट्राबोरेट Na2 B4O7 बोरेक्स काँच कहलाता है। साधारण बोरेक्स को उसके गलनांक के ऊपर गर्म करने पर प्राप्त होता है। यह एक रंगहीन काँच जैसा पदार्थ है। वायु से नमी शोषित करके डेकाहाइड्रेट रूप में बदल जाता है। गर्म जल में विलेय है। इसका जलीय विलयन अपघटन के कारण क्षारीय होता है। गर्म करने पर श्वेत अपारदर्शी पदार्थ में फूल जाता है। निर्जल पदार्थ 740°C पर बोरेक्स काँच देता है।
Na2B4O7 + 2H2O  ⇌  H2B4O7 + 2NaOH

प्रश्न 14.
बोरेक्स पर ऊष्मा के प्रभाव को समझाइये।
उत्तर:
बोरेक्स को तीव्र गर्म करने पर इसका क्रिस्टलीय जल अलग हो जाता है तथा अंततः वह पिघल कर पारदर्शी मणिका में बदल जाता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 49
बोरिक एनहाइड्राइड B2O3 धात्विक ऑक्साइडों से क्रिया कर मेटाबोरेट बनाता है। जिनका अपना विशिष्ट रंग होता है। सुहागा मणिका परीक्षण के नाम से जानी जाती है यह क्रिया भास्मिक मूलकों के परीक्षण में सहायक होती है।

प्रश्न 15.
बोरेक्स बीड परीक्षण क्या है ?
उत्तर:
बोरेक्स को गर्म करने पर क्रिस्टलन जल का निष्कर्षण करके श्वेत काँच जैसा पदार्थ देता है जो मनका बना लेता है। इस मनके में सोडियम मेटाबोरेट और बोरिक एनहाइड्राइड होता है।
Na2B4O7. 10H2O →2NaBO2 + B2O2 + 10H2O
जब इस मनके को रंगीन मिश्रण के साथ गर्म किया जाता है तो बोरिक एनहाइड्राइड धातु लवण के साथ क्रिया करके मेटा बोरेट बना लेता है जिसका एक विशेष रंगीन मनका होता है।
उदाहरण –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 50
इस परीक्षण को करने के लिये साफ प्लेटीनम तार का छल्ला बनाकर उस पर बोरेक्स के क्रिस्टल को गर्म करके एक पारदर्शक मनका प्राप्त कर लिया जाता है। गर्म मनके को रंगीन मिश्रण के साथ छुआ देते हैं और फिर ऑक्सीकारक तथा अपचायक ज्वाला पर गर्म करते हैं । रंगों के आधार पर धातुओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

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प्रश्न 16.
बोरेक्स के कितने रूप होते हैं ? इनका संक्षिप्त में वर्णन कीजिये।
उत्तर:
बोरेक्स निम्नलिखित तीन रूपों में पाया जाता है –
(1) प्रिज्मीय बोरेक्स – यह डेकाहाइड्रेट Na2B4O7 10H2O है। यह साधारण रूप है तथा साधारण ताप पर विलयन का क्रिस्टलीकरण करने पर प्राप्त होता है।
(2) अष्टफलकीय बोरेक्स – यह बोरेक्स पेन्टा हाइड्रेट Na2B4O7 ·5H2O है। यह विलयन का 60°C से ऊपर क्रिस्टलीकरण करने पर बनता है।
(3) बोरेक्स काँच – यह निर्जल सोडियम टेट्राबोरेट Na2B4O7 है । यह साधारण बोरेक्स को उसके गलनांक के ऊपर गर्म करने पर प्राप्त होता है। यह एक रंगहीन काँच जैसा पदार्थ है। यह वायु से नमी शोषित करके डेकाहाइड्रेट रूप में बदल जाता है। इसका जलीय विलयन क्षारीय होता है।
Na2B4O7 + 2H2O → H2B4O7 +2NaOH

प्रश्न 17.
बोरेट मूलक का परीक्षण किस प्रकार करते हैं ? ..
उत्तर:
प्रयोगशाला में अम्लीय बोरेट मूलक BO-33 का परीक्षण करने के लिये लवण को एथेनॉल तथा सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करते हैं जिससे एथिल बोरेट की वाष्प निकलती है। यह वाष्प हरे कोर की ज्वाला से जलती है। वास्तव में लवण पहले बोरिक अम्ल में परिवर्तित होता है। यह बोरिक अम्ल एथेनॉल से क्रिया कर ट्राइ एथिल बोरेट बनाता है।
H3BO3 + 3C2H5OH → BOC2H5)3 + 3H2O

प्रश्न 18.
ऐल्युमिनियम क्लोराइड की संरचना को समझाइये।
उत्तर:
ऐल्युमिनियम ट्राइक्लोराइड वास्तव में डाईमर Al2Cl6 के रूप में प्राप्त होता है। Al के संयोजी कोश में तीन इलेक्ट्रॉन होते हैं। जब यह तीन क्लोरीन के साथ इलेक्ट्रॉन का साझा करके AlCl3 का निर्माण करता है तो Al के संयोजी कोश में कुल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसे अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में AlCl3 का ऐल्युमिनियम इसके AlCl3 के क्लोरीन का इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर अपना अष्टक पूर्ण कर लेता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 51

प्रश्न 19.
कुछ अभिक्रियाओं में थैलियम, ऐल्युमिनियम से समानता दर्शाता है, जबकि अन्य में यह समूह-1 के धातुओं से समानता दर्शाता है। इस तथ्य को कुछ प्रमाणों के द्वारा सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
थैलियम तथा ऐल्युमिनियम दोनों वर्ग-13 के तत्व हैं। इसके संयोजी कोश का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns – np’ है। ऐल्युमिनियम केवल + 3 ऑक्सीकरण अवस्था, प्रदर्शित करता है। ऐल्युमिनियम की भाँति, थैलियम भी कुछ यौगिकों में + 3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।  उदाहरण- TI2O3, TIC3 आदि। ऐल्युमिनियम की भाँति थैलियम भी अष्टफलकीय आयन जैसे [AIF6]-3 तथा [TIF6]-3 बनाता है। वर्ग-1 की क्षार धातुओं के समान, थैलियम अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण + 1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। उदाहरण- TICl, TI2O आदि। क्षार धातु हाइड्रॉक्साइडों की भाँति, TIOH भी जल में विलेय है तथा जलीय विलयन प्रबल क्षारीय है। TI2SO4, क्षार धातु सल्फेटों की भाँति फिटकरी बनाता है। TI2SO2, क्षार धातु सल्फेटों की भाँति फिटकरी बनाता है तथा TI2CO3, क्षार धातु कार्बोनेट की भाँति जल में विलेय है।

प्रश्न 20.
संरचना के आधार पर हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों में निहित भिन्नता समझाइए।
उत्तर:
हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों में भिन्नता –

हीरा:

  • इसमें C, sp3 संकरित है।
  • इसकी ज्यामिति त्रिविमीय चतुष्फलकीय होती है।
  • यह उच्च घनत्व तथा उच्च क्वथनांक के साथ
  • यह ऊष्मा तथा विद्युत् का कुचालक (मुक्त इलेक्ट्रॉन मुक्त होता है) होता है।
  • इसका प्रयोग काँच काटने में, आभूषणों तथा अपघर्षक के रूप में होता है।

ग्रेफाइट:

  • इसमें C, sp2 संकरित है।
  • इसमें ज्यामिति द्विविमीय परतीय होती है।
  • यह निम्न घनत्व तथा उच्च क्वथनांक के साथ कठोरतम पदार्थ है। मुलायम तथा चिकनाई वाला पदार्थ है।
  • यह ऊष्मा तथा विद्युत् का सुचालक (चौथा इलेक्ट्रॉन की अनुपस्थिति) होता है।
  • यह स्नेहक के रूप में, इलेक्ट्रोड निर्माण में, पेंसिल में, क्रूसीबल (उच्च गलनांक के कारण) आदि के निर्माण में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 21.
बैक बॉण्डिंग को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
बोरॉन ट्राइ क्लोराइड के संयोजी कोश में कुल 6 इलेक्ट्रॉन हैं, इलेक्ट्रॉन ग्राही होने की वजह से BF लुईस अम्ल की तरह कार्य करता है तथा इसे प्रबल लुईस अम्ल होना चाहिये लेकिन यह दुर्बल लुईस अम्ल की तरह कार्य करता है। BF3 में बोरॉन sp2संकरित अवस्था में होने के कारण BF3 समतलीय अणु है। इस अणु में बोरॉन का एक 2pz कक्षक पूर्णतः रिक्त रहता है। दूसरी ओर फ्लुओरीन के 2pz कक्षक में 2 इलेक्ट्रॉन हैं। ऐसी स्थिति में बोरॉन के 2pz कक्षक तथा फ्लुओरीन के 2pz कक्षक में अतिव्यापन कर बंध बना सकते हैं। इसे बैक बॉण्डिंग कहते हैं।

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प्रश्न 22.
(1) BCl3 स्थायी है किन्तु B2Cl6 का अस्तित्व नहीं जबकि AlCl3 अस्थायी है, क्यों ?
(2) AlCl3 अस्थायी है, Al2Cl6 स्थायी, इसका क्या कारण है ?
उत्तर:
(1) BCl3 स्थायी है क्योंकि BCl3 के संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉन होते हैं लेकिन बैक बॉण्डिंग (Back Bonding) के कारण बनने वाली विभिन्न अनुनाद संरचनाएँ अनुनाद के द्वारा BCl3 को स्थायित्व प्रदान करती है। लेकिन B के पास रिक्त d कक्षक नहीं है इसलिये बोरॉन क्लोरीन परमाणु द्वारा दिये जाने वाले इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण नहीं कर पाता इसलिये B2Cl6 का बनना संभव नहीं है।

(2) AlCl3 के संयोजी कोश में कुल 6 इलेक्ट्रॉन हैं अष्टक पूर्ण न होने के वजह से AlCl3 अस्थायी है लेकिन Al2Cl6 डाईमर में ऐल्युमिनियम का रिक्त d कक्षक क्लोरीन द्वारा दिये गये एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण कर अपना अष्टक पूर्ण कर लेता है इसलिये Al2Cl6 स्थायी है।

प्रश्न 23.
निम्नलिखित यौगिकों के सूत्र एवं कोई दो उपयोग लिखिए –
(1) बोरेक्स
(2) बोरिक अम्ल।
उत्तर:
(1) बोरेक्स-सूत्र-Na2B4O7.10H2O
उपयोग –
(1) अपने प्रतिरोधी गुण के कारण औषधीय साबुन बनाने में इसका उपयोग किया जाता है।
(2) चश्में के काँच (बोरोग्लास) बनाने में।

(2) बोरिक अम्ल-सूत्र – H3BO3
उपयोग –
(1) बोरिक अम्ल का उपयोग इनेमल के निर्माण में तथा बर्तनों को चमकाने में किया जाता है।
(2) बोरिक अम्ल अपने पूतिरोधी (Antiseptic) स्वभाव के कारण आँखों को धोने में काम आता है।

11 p-ब्लॉक तत्त्व लघु उत्तरीय प्रश्न – II

प्रश्न 1.
श्रृंखलन किसे कहते हैं तथा यह प्रवृत्ति किस तत्व में सबसे अधिक है और क्यों?
उत्तर:
किसी तत्व की अपने अन्य परमाणुओं के साथ संयोग कर लंबी श्रृंखला बनाने की प्रवृत्ति को श्रृंखलन कहते हैं। यह प्रवृत्ति कार्बन में सबसे अधिक होती है, क्योंकि कार्बन के छोटे आकार तथा प्रबल बंध के कारण श्रृंखला में बनने वाले बंध अधिक प्रबल व स्थायी होते हैं। Si में यह प्रवृत्ति कार्बन से कम होती है। Ge में यह प्रवृत्ति अत्यन्त कम होती है। Sn तथा Pb में यह प्रवृत्ति नगण्य होती है।

प्रश्न 2.
हीरे की संरचना लिखिये।
उत्तर:
हीरे में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित अवस्था में होता है तथा प्रत्येक कार्बन अन्य चार कार्बन परमाणुओं से एकल सहसंयोजी बंध द्वारा जुड़ा रहता है तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु एक समचतुष्फलक के केन्द्र पर स्थित है, तथा अन्य चार कार्बन परमाणु समचतुष्फलक के कोनों पर स्थित है। इस त्रिविमीय संरचना के कारण हीरा अत्यंत कठोर व उच्च गलनांक वाला होता है। इसमें C-C बंध लंबाई 1.54 A होता है।

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प्रश्न 3.
ग्रेफाइट की संरचना लिखिये।
उत्तर:
ग्रेफाइट में प्रत्येक C परमाणु sp3संकरित अवस्था में / होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु तीन अन्य कार्बन परमाणुओं द्वारा एकल सहसंयोजक बंध से जुड़ा रहता है एवं प्रत्येक परमाणु का चौथा इलेक्ट्रॉन मुक्त होता है। इससे C – C बंध लंबाई 1.42 A होती है। इसमें कार्बन परमाणु एक-दूसरे के साथ जुड़कर अनेक षट्भुजीय रिंग बनाते हैं। ये रिंग आपस में मिलकर तल बनाते हैं, तथा इन पर्तों के मध्य दुर्बल वाण्डर वाल्स बल होने के कारण ये पर्ते एक-दूसरे के ऊपर आसानी से फिसल सकती हैं। अतः इसका उपयोग स्नेहक के रूप में होता है।
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प्रश्न 4.
कृत्रिम ग्रेफाइट बनाने की औद्योगिक विधि का रासायनिक समीकरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कृत्रिम ग्रेफाइट अमेरिका के रसायनज्ञ एडवर्ड जी. एकीसन की विधि द्वारा बनाया जाता है। इस विधि द्वारा कोक और बालू के मिश्रण 6 को एक विद्युत् भट्टी में गर्म करते हैं जिसमें कार्बन के दो इलेक्ट्रोड लगे रहते हैं जो आपस में कार्बन कोक+बालू की एक पतली सलाखा से जुड़े रहते हैं। विद्युत धारा प्रवाहित करने पर 3000°C ताप पर कार्बन सिलिका के साथ अभिक्रिया कर सिलिकॉन कार्बाइड बनाता है, इस अभिक्रिया में आयरन ऑक्साइड उत्प्रेरक का कार्य करता है। यह सिलिकॉन कार्बाइड विघटित होकर ग्रेफाइट बनाता है।
3C + SiO2  → 2CO + SiC
SiC → Si + C (ग्रेफाइट)।
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प्रश्न 5.
कृत्रिम हीरा बनाने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ग्रेफाइट की प्याली में शर्करा, चारकोल एवं आयरन ऑक्साइड का मिश्रण लेकर उसे विद्युत् भट्टी में 3000°C ताप पर गर्म करते हैं। इसके बाद इसे गलित लेड में रखा जाता है। गलित लेड का ताप लोहे की तुलना में कम होता है जिसके कारण लोहा ठोस अवस्था में आने लगता है जिसके फलस्वरूप दाब के कारण कार्बन छोटे-छोटे हीरे के क्रिस्टल के रूप में पृथक होने लगता है। लोहे को HCl में विलेय करके पृथक् कर लिया जाता है। इस प्रकार कृत्रिम हीरा प्राप्त होता है।

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प्रश्न 6.
कार्बन परमाणु की संयोजकता सम्बन्धी लेवेल तथा वाण्ट हॉफ का नियम समझाइये। अथवा, कार्बन की समचतुष्फलक प्रकृति से क्या समझते हो?
उत्तर:
कार्बन का परमाणु क्रमांक 6 है इसके आधार पर प्रथम कक्ष में 2 इलेक्ट्रॉन और द्वितीय कोश में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं। अत: इसकी संयोजकता चार होती है। लेवेल तथा वाण्ट हॉफ के अनुसार यदि कार्बन परमाणु को समचतुष्फलक के केन्द्र पर स्थित माने तो चतुष्फलक की चारों भुजायें कार्बन की चारों संयोजकता को दर्शाती है, किन्हीं भी दो संयोजकताओं के बीच कोण का मान 109° 28° होता है। हेनरी के प्रयोग के अनुसार कार्बन संयोजकतायें सममित रूप में व्यवस्थित होती हैं। ये अंतरिक्ष में चतुष्फलकीय रूप से व्यवस्थित होती हैं। एक ही तल में स्थित नहीं होती हैं।
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प्रश्न 7.
ग्रेफाइट में स्नेहक गुण का कारण लिखिये।
उत्तर:
ग्रेफाइट में कार्बन परमाणु एक-दूसरे से सहसंयोजक बंधों द्वारा जुड़कर षट्कोणीय जाल बनाते हैं। ये रिंग आपस में मिलकर तल बनाते हैं। ग्रेफाइट में ऐसे कई तल एक के ऊपर एक, एक-दूसरे से 3.4A की दूरी पर होते हैं तथा प्रत्येक तल दुर्बल वाण्डर वाल्स बल के द्वारा बँधे होने के कारण एक-दूसरे पर सरलता से फिसल सकते हैं जिसके कारण ग्रेफाइट नर्म होता है तथा इसके गलनांक उच्च होते हैं। इसलिये ऐसी मशीनें जो चलने पर अधिक गर्म हो जाती हैं उनके लिये ग्रेफाइट का उपयोग स्नेहक के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 8.
हीरे का उपयोग काटने वाले औजारों में किया जाता है, क्यों?
उत्तर:
हीरे में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2 संकरित अवस्था में होता है तथा प्रत्येक कार्बन अन्य चार कार्बन परमाणुओं से प्रबल सहसंयोजी बंध द्वारा जुड़ा होता है। इस प्रकार हीरे में एक चतुष्फलकीय त्रि – आयामी संरचना बन जाती है जो अत्यन्त सुदृढ़ होती है। इसलिये हीरा सबसे कठोर ज्ञात तत्व है और इसलिये इसका उपयोग काटने वाले औजारों में किया जाता है।

प्रश्न 9.
हीरे में एक विशेष चमक होती है, क्यों? अथवा, हीरे का उपयोग आभूषण बनाने में होता है, क्यों?
उत्तर:
हीरे के उच्च अपवर्तनांक होने के कारण पूर्ण आंतरिक परावर्तन इसे चमकदार एवं सुंदर बना देता है। इसलिये हीरा अत्यन्त चमकीला होता है और इसका उपयोग कीमती आभूषण बनाने में होता है।

प्रश्न 10.
ग्रेफाइट मुलायम तथा हीरा कठोर होता है, क्यों ?
उत्तर:
ग्रेफाइट में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2संकरित अवस्था में होता है तथा ग्रेफाइट में कार्बन का प्रत्येक परमाणु अपने निकट के तीन परमाणुओं से उसी तल में जुड़कर एक षट्कोणीय जाल बनाता है। ऐसे अनेक तल एक के ऊपर एक ढीली अवस्था में सटे रहते हैं तथा इनके मध्य दुर्बल वाण्डर वाल्स बल होते हैं जिसके कारण ग्रेफाइट की पर्ते एक-दूसरे के ऊपर सरक सकती हैं इसी गुण के कारण ग्रेफाइट मुलायम होता है। हीरे में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित अवस्था में होता है जिसमें प्रत्येक कार्बन अन्य चार कार्बन परमाणुओं द्वारा सहसंयोजी बंध द्वारा जुड़ा रहता है और एक चतुष्फलकीय त्रि-आयामी संरचना बनाता है इसलिये हीरा अत्यंत कठोर होता है।

प्रश्न 11.
हीरा विद्युत् का कुचालक है जबकि ग्रेफाइट सुचालक है, कारण स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
हीरा तथा ग्रेफाइट दोनों ही कार्बन के अपररूप हैं तथा इनके परमाणु के बाह्यतम कोश में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं। हीरे में कार्बन sp3 संकरित अवस्था में होता है तथा प्रत्येक कार्बन के चारों संयोजी इलेक्ट्रॉन अपने निकटतम चार कार्बन परमाणुओं से प्रबल सहसंयोजी बंध द्वारा जुड़े होते हैं इस प्रकार किसी भी कार्बन के पास कोई स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन नहीं होता इसलिये यह अत्यन्त कठोर व विद्युत् का कुचालक है।

ग्रेफाइट में प्रत्येक कार्बन sp2 संकरित अवस्था में होता है तथा प्रत्येक कार्बन केवल तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन अपने निकटतम तीन कार्बन परमाणुओं से प्रबल सहसंयोजक बंध द्वारा जुड़े रहते हैं तथा चौथा संयोजी इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रहता है। इसलिये ग्रेफाइट में इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह सरलता से हो सकता है । इसलिये ग्रेफाइट नर्म एवं विद्युत् का सुचालक होता है।

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प्रश्न 12.
हीरे तथा ग्रेफाइट के भौतिक गुणों को तालिकाबद्ध कीजिए।
उत्तर:
हीरे तथा ग्रेफाइट के भौतिक गुणों की तुलना –
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प्रश्न 13.
सुपर क्रिटिकल द्रव क्या होता है ?
उत्तर;
किसी भी गैस को उसके क्रिटिकल ताप से कम ताप पर दबाव बढ़ाते हुये द्रवित किया जा सकता है। जिस दाब पर किसी गैस को द्रवित किया जा सकता है उसे उस द्रव का क्रिटिकल दाब कहते हैं। लेकिन CO2 गैस के ऊर्ध्वपातन गुण के कारण इसे द्रव अवस्था में नहीं लाया जा सकता इसलिये क्रिटिकल दाब से अधिक पर यह सुपर क्रिटिकल द्रव में बदल जाती है। CO2 के लिये क्रिटिकल ताप तथा क्रिटिकल दाब क्रमशः 31°C तथा 72.9 वायुमण्डलीय दाब है।

प्रश्न 14.
कार्बन मोनो-ऑक्साइड की वे अभिक्रियाएँ लिखिये जो बताती हैं कि वे हैं
1. ज्वलनशील,
2. असंतृप्त यौगिक
3. अपचायक।
उत्तर:
1. ज्वलनशील – ऑक्सीजन की उपस्थिति में यह दहन के पश्चात् CO, गैस देती है।
CO + \(\frac {1 }{ 2 }\)O2 → CO2
2. असंतृप्त यौगिक – कार्बन मोनो-ऑक्साइड असंतृप्त यौगिक होने के कारण योगात्मक यौगिक बनाती है।
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3. अपचायक – धातु ऑक्साइडों से क्रिया करके धातु अवकृत करती है।
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प्रश्न 15.
कार्बन तथा सिलिकॉन में समानता तथा असमानता लिखिये।
उत्तर:
समानता –

  • कार्बन तथा सिलिकॉन दोनों अधातु हैं।
  • दोनों के संयोजी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np2 है।
  • दोनों अपरूपता दर्शाते हैं।
  • दोनों सहसंयोजी यौगिक बनाते हैं।
  • दोनों की सहसंयोजकता 4 है।
  • दोनों में शृंखलन की प्रवृत्ति होती है।
  • दोनों के ऑक्साइड अम्लीय हैं।

असमानता:
कार्बन तथा सिलिकॉन में असमानताएँ –
कार्बन:

  • ग्रेफाइट को छोड़कर कार्बन विद्युत् का कुचालक है।
  • कार्बन की अधिकतम सहसंयोजकता 4 है।
  • कार्बन में श्रृंखलन की प्रवृत्ति अधिक है।
  • कार्बन बहु आबंध बनाता है।
  • CO ज्ञात है।
  • CCl2  जल – अपघटित नहीं होता।

सिलिकॉन:

  • सिलिकॉन अर्धचालक है।
  • सिलिकॉन की अधिकतम सह संयोजकता 6 है।
  • सिलिकॉन में श्रृंखलन की प्रवृत्ति कम है।
  • सिलिकॉन बहु आबन्ध नहीं बनाता है।
  • SiO अज्ञात है।
  • SiC4  जल-अपघटित नहीं होता।

प्रश्न 16.
कार्बन तथा सिलिकॉन चतुर्संयोजकता दर्शाते हैं। जबकि Ge, Sn तथा Pb द्विसंयोजी होते हैं, क्यों?
उत्तर:
कार्बन तथा सिलिकॉन के छोटे आकार के कारण इनकी आयनन ऊर्जा अत्यधिक उच्च होती है। इसलिये यह इलेक्ट्रॉन का त्याग कर आयनिक यौगिक नहीं बनाते लेकिन अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये अन्य तत्वों के परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉन का साझा करके सहसंयोजी यौगिक बनाते हैं और चतुर्संयोजकता को दर्शाते हैं। Ge, Sn तथा Pb के बड़े आकार के कारण इनकी आयनन ऊर्जा अत्यन्त कम होती है।

इसलिये यह इलेक्ट्रॉन दान करके आयनिक यौगिक भी बना सकते हैं तथा इन यौगिकों में +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं। अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण समूह में ऊपर से नीचे आने पर समूह में + 4 ऑक्सीकरण संख्या का स्थायित्व कम होता है। लेकिन +2 ऑक्सीकरण संख्या का स्थायित्व बढ़ता है। इसलिये यह +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं।

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प्रश्न 17.
SnCl4 द्रव है जबकि SnCl2 ठोस है, क्यों?
अथवा,
टिन के एक यौगिक का अणुभार 189 तथा दूसरे का 260 है। इसके बावजूद पहला यौगिक ठोस जबकि दूसरा द्रव है। ऐसा क्यों? ।
उत्तर:
SnCl4 में Sn + 2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है तथा सहसंयोजी यौगिकों का निर्माण करता है इसलिये SnCl4 द्रव है जबकि SnCl4 में Sn + 2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है तथा आयनिक यौगिकों का निर्माण करता है इसलिये SnCl4 ठोस है।

प्रश्न 18.
Si, C के समान ग्रेफाइट संरचना नहीं बनाता, क्यों?
उत्तर:
Si ग्रेफाइट के समान संरचना नहीं बनाता, क्योंकि –
1. Si, sp2 संकरित यौगिकों का निर्माण नहीं करता जबकि ग्रेफाइट में कार्बन sp2संकरित अवस्था में होता है।
2. Si की परमाण्विक त्रिज्या कार्बन की परमाण्विक त्रिज्या से अधिक है जिसके कारण Si की इलेक्ट्रॉन बंधुता आयनन ऊर्जा इत्यादि कार्बन से कम है। जिसके कारण Si, C के समान 7 बंधों का निर्माण नहीं करता।

प्रश्न 19.
कार्बन की अधिकतम सहसंयोजकता 4 है जबकि इस समूह के अन्य सदस्यों की अधिकतम सहसंयोजकता 6 है, क्यों?
अथवा
कार्बन Si के समान उच्च ऑक्सीकरण नहीं दर्शाते, क्यों?
उत्तर:
कार्बन परिवार के सभी सदस्यों के संयोजी कोश में उत्तेजित अवस्था में 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन्हें अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये 4 अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है। इसलिये अन्य तत्वों के साथ साझा कर सहसंयोजी बंध बनाते हैं। इसलिये इनकी सहसंयोजकता 4 होती है। कार्बन में d कक्षक की उपस्थिति के कारण उच्च ऑक्सीकरण संख्या संभव नहीं है।

जबकि अन्य सदस्यों में रिक्त d कक्षक की उपस्थिति के कारण उच्च ऑक्सीकरण संख्या संभव है क्योंकि रिक्त d कक्षक की उपस्थिति के कारण इलेक्ट्रॉन ग्राही की तरह कार्य करने लगता है तथा किसी भी अन्य इलेक्ट्रॉन दाता समूह द्वारा दिये गये एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण करके उप-सहसंयोजी बंध बना सकते हैं। इसलिये इनकी अधिकतम ऑक्सीकरण संख्या 6 होती है।

प्रश्न 20.
CCl4 जल – अपघटित नहीं होता जबकि SiCl4 जल – अपघटित हो जाता है, क्यों?
उत्तर:
कार्बन में रिक्त d कक्षक की अनुपस्थिति के कारण उच्चतम ऑक्सीकरण संख्या 4 है तथा d कक्षक की अनुपस्थिति के कारण यह अपनी ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि नहीं कर सकता इसलिये CCl4जल अपघटित नहीं होता। जबकि Si में रिक्त d कक्षक की उपस्थिति के कारण अधिकतम ऑक्सीकरण संख्या 6 है इसलिये SiCl4 जल द्वारा दिये गये एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म को सरलता से ग्रहण कर लेता है और इस प्रकार उसकी ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि हो जाती है। जिसके कारण यह सरलता से जल-अपघटित हो जाता है।
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प्रश्न 21.
CO2 गैस है जबकि SiO2 उच्च गलनांक वाला ठोस है, क्यों ?
अथवा
CO2तथा SiO2 की संरचना को समझाइये।
उत्तर:
CO2की संरचना रेखीय होती है। इसमें कार्बन sp संकरित अवस्था में होता है तथा CO2 के अणु दुर्बल वाण्डर वाल्स आकर्षण बल द्वारा आकर्षित रहते हैं। इसलिये साधारण ताप पर CO2 गैस अवस्था में होता है।
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SiO2 ठोस है। इसकी संरचना त्रिविम जाल के समान होती है। इसमें प्रत्येक Si चार ऑक्सीजन परमाणु के साथ चतुष्फलकीय रूप से जुड़ा होता है। Si तथा 0 परमाणु के बीच एकल सह-संयोजी बंध होता है। यह एकल। सहसंयोजी बंध वाण्डर वाल्स की तुलना में अधिक प्रबल है। इसलिये SiO2 ठोस व कठोर है तथा इसके गलनांक उच्च होते हैं।
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प्रश्न 22.
CO2तथा SiO4 में तुलना कीजिए।
उत्तर:
CO2 तथा SiO2 में तुलना| –
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प्रश्न 23.
कार्बन अपने समूह के अन्य सदस्यों के समान संकुल यौगिक का निर्माण नहीं करता, क्यों?
उत्तर:
किसी भी तत्व की उपसहसंयोजी या संकुल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –
(1) छोटी परमाण्विक त्रिज्या
(2) उच्च आवेश घनत्व
(3) d कक्षक की उपस्थिति।
कार्बन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से स्पष्ट है कि कार्बन के पास रिक्त d कक्षक अनुपस्थित होता है। इसलिये वह लिगेण्ड द्वारा दिये गये इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण कर संकुल यौगिक नहीं बनाता। जबकि इस समूह के अन्य सदस्यों के पास रिक्त d कक्षक होता है। जिसके कारण वह लिगेण्ड द्वारा दिये गये इलेक्ट्रॉन युग्म को सरलता से ग्रहण करके उपसहसंयोजी बंध बना सकते हैं। इसलिये वह सरलता से संकुल यौगिक का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 24.
M+2 आयन प्रबल अपचायक है, जबकि M+4 आयन सहसंयोजी गुण दर्शाता है, क्यों?
उत्तर:
कार्बन परिवार के सभी सदस्यों के संयोजी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा M +4 अवस्था में आयनन ऊर्जा अत्यधिक उच्च होती है। इसलिये सभी तत्व अपना अष्टक पूर्ण करने के लिये अन्य तत्वों के H परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉन का साझा करके सहसंयोजी यौगिक बनाते हैं। जबकि दो इलेक्ट्रॉन निकालने के लिये कम आयनन ऊर्जा की आवश्यकता होती है इसलिये +2 ऑक्सीकरण अवस्था में यह आयनिक यौगिकों का निर्माण करते हैं। इलेक्ट्रॉन दान करने की प्रवृत्ति के कारण यह अपचायक की तरह कार्य करते हैं।

प्रश्न 25.
सामान्यतः टिन तथा लेड के यौगिक जैसे SnCl, तथा PbCl, का उपयोग अपचायक के रूप में जबकि SnCl, तथा PbCl का उपयोग ऑक्सीकारक के रूप में होता है, क्यों?
उत्तर:
Sn तथा Pb में +2 की तुलना में +4 ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी है। अत: Sn+2,Sn+4 में जाने की प्रवृति रखता है जिसके कारण यह दूसरों का अपचयन करता है। Sn तथा Pb में +4 ऑक्सीकरण संख्या कम स्थायी हैं। अत: Pb+2 से Pb+4 में जाने की प्रवृत्ति रखता है। इसी कारण यह दूसरों का ऑक्सीकरण करता है।

प्रश्न 26.
कार्बन से मोनो-ऑक्साइड की आर्बिटल संरचना को समझाइये।
उत्तर:
CO में कार्बन तथा ऑक्सीजन दोनों sp संकरित अवस्था में होते हैं। कार्बन का एक sp आर्बिटल ऑक्सीजन के एक sp आर्बिटल के साथ अतिव्यापन कर ०-बंध बनाते हैं। कार्बन के तथा ऑक्सीजन के दूसरे sp आर्बिटल में एक-एक इलेक्ट्रॉन युग्म होता है, जो अनाबंधित रहता है। कार्बन के pz आर्बिटल में एक इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन के pz आर्बिटल के एक इलेक्ट्रॉन से पार्वीय अतिव्यापन करके एक L – बंध बनाता है।
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अब कार्बन के py आर्बिटल में एक भी इलेक्ट्रॉन नहीं है, जबकि ऑक्सीजन के py आर्बिटल में 2 इलेक्ट्रॉन हैं। इनके बीच भी पार्वीय अतिव्यापन होकर बंध बनता है। जो लुईस संरचना में उपसहसंयोजकता को दर्शाता है।
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प्रश्न 27.
सिलिका उद्यान किसे कहते हैं?
उत्तर:
सोडियम सिलिकेट के संतृप्त जलीय विलयन की नली में यदि बालू, कॉपर सल्फेट, फेरस सल्फेट, निकिल सल्फेट, कैडमियम नाइट्रेट, मैंगनीज सल्फेट और कोबाल्ट नाइट्रेट आदि के क्रिस्टल डाल दें तो दो तीन दिन पश्चात् विलयन में रंग-बिरंगे पौधे उगे हुये प्रतीत होते हैं तथा यह सिलिका उद्यान कहलाता है।

प्रश्न 28.
कार्बन मोनो-ऑक्साइड की तरह सिलिकॉन मोनो-ऑक्साइड क्यों नहीं बनता?
उत्तर:
कार्बन ऑक्सीजन के साथ एक सहसंयोजी बंध बना लेने के बाद एक बंध बना सकता है। साथ ही कार्बन के एक और रिक्त 2pz आर्बिटल के साथ ऑक्सीजन के 2pz में स्थित एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म का अतिव्यापन भी हो सकता है। क्योंकि ऑक्सीजन से एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर सके इतनी ऋणविद्युतता कार्बन में है। जबकि.Si की ऋणविद्युतता भी कम है तथा आकार भी बड़ा है। जिससे वह ऑक्सीजन के साथ 3pr – 2pz बंध नहीं बना सकता इसलिये SiO संभव नहीं है।

प्रश्न 29.
भाप अंगार गैस, कार्बोरेटेड भाप अंगार गैस तथा प्रोड्यूसर गैस बनाने के लिये संतुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर:
1. भाप अंगार गैस:
यह गैस कार्बन मोनो-ऑक्साइड तथा हाइड्रोजन का मिश्रण होती है। पानी की भाप को रक्त तप्त कोक पर प्रवाहित करके बनायी जाती है।
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2. कार्बोरेटेड भाप अंगार गैस-भाप अंगार गैस को तेल में पड़ी हुई गर्म ईंटों पर प्रवाहित करने पर एसीटिलीन तथा एथिलीन बनती है तथा भाप अंगार गैस से मिश्रित होकर कार्बोरेटेड भाप अंगार गैस बनती है। इसमें CO = 30%, H2 = 35%, संतृप्त हाइड्रोकार्बन = 15-20%, हाइड्रोकार्बन = 10%, N2 = 2.5-5%, CO2 = 2% होती है।

3. प्रोड्यूसर गैस:
कार्बन मोनो-ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन का मिश्रण होती है। रक्त तप्त कोक पर वायु की सीमित मात्रा प्रवाहित करने पर प्राप्त होती है।
2C + वायु (O2 + N2) → 2CO + N2

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प्रश्न 30.
सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड से सिलिका जेल किस प्रकार प्राप्त किया जाता है ?
उत्तर:
सिलिकॉन की क्लोरीन से क्रिया कराने पर सिलिकॉन टेट्रा क्लोराइड प्राप्त होता है।
Si + 2Cl2 → SiCl4

SiCl4 का जल-अपघटन कराने पर सिलिकॉन टेट्रा हाइड्रॉक्साइड प्राप्त होता है।
SiCl4 + 4HOH → Si(OH)4 + 4HCl

यह सिलिकॉन टेट्रा हाइड्रॉक्साइड वास्तव में सिलिसिक अम्ल मोनोहाइड्रेट है।
Si (OH)4H2SiO3.H2O

यह सिलिसिक अम्ल गर्म करने पर सिलिका में टूट जाता है।
H2SiO3 ⥨ H2O → SiO2 + 2H2O
यही सिलिका, सिलिका जेल (SiO2 xH2O) कहलाता है।

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11 p-ब्लॉक तत्त्व दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
Be तथा Al में विकर्ण संबंध लिखिए।
उत्तर:
द्वितीय एवं तृतीय आवर्त में एक-दूसरे के विकर्णतः उपस्थित तत्वों के गुणों में समानता होती है विकर्णतः उपस्थित समान गुणों वाले तत्वों के बीच संबंध को विकर्ण संबंध कहते हैं।
(1) दोनों की विद्युत् ऋणात्मकता समान होती है।
Be = 1.5 Al = 1.5
(2) Be+2 तथा Al+3 के ध्रुवित करने की क्षमता लगभग समान होती है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 66
(3) क्षारीय मृदा धातुएँ कोमल होती हैं परन्तु बेरीलियम ऐल्युमिनियम के समान कठोर है।

(4) Be, Al के समान सान्द्र नाइट्रिक अम्ल में निष्क्रिय हो जाता है।

(5) Be2C ऐल्युमिनियम कार्बाइड की तरह जल से अभिक्रिया कर मेथेन मुक्त करता है।

  • Be2C + 2H2O + 2BeO + CH4
  • Al4C3 + 12H2O → 4Al(OH)3 + 3CH4

(6) Be तथा A1 की NaOH से क्रिया कर हाइड्रोजन मुक्त करते हैं।

  • Be + 2NaOH →Na2BeO2 + H2
  • 2Al + 2NaOH + 2H2O → 2NaAlO2 + 3H2

(7) दोनों के ऑक्साइड उभयधर्मी है।

  • BeO +2HCl → BeCl2 + H2O
  • BeO + 2NaOH → Na2BeO2 + H2O
  • Al2O3 + 6HCl → 2AlCl3 + 3H2O
  • Al2O3 + 2NaOH → 2NaAlO2 + H2O

(8) BeCl2 तथा AlCl3, द्विलक तथा बहुलक रूप में मिलते हैं।

(9) दोनों के हाइड्रॉक्साइड जल में अविलेय हैं तथा गर्म करने पर अपघटित हो जाते हैं।

  • Be(OH)2 → BeO + H2O
  • 2Al(OH)3 → Al2O3 + 3H2O

(10) BeCl2 तथा AlCl3 प्रबल लुईस अम्ल है।

(11) दोनों धातुएँ हैलोजन से क्रिया कर हैलाइड बनाते हैं।

  • Be + Cl2 → BeCl2
  • 2Al + 3Cl2 → 2AlCl3

(12) दोनों के हैलाइड सहसंयोजक प्रवृत्ति दर्शाते हैं तथा कार्बनिक विलायकों में विलेय हैं।

प्रश्न 2.
B तथा AI में समानता तथा असमानता लिखिए।
उत्तर:
समानता:

  • दोनों के संयोजी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np1 है।
  • दोनों की सहसंयोजकता 6 है।
  • दोनों की ऑक्सीकरण संख्या +3 है।
  • दोनों M2O3 प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं।
  • दोनों के यौगिक प्रबल लुईस अम्ल की तरह कार्य करते हैं।
  • दोनों के ऑक्साइड उभयधर्मी प्रकृति के होते बोरॉन

असमानता:
बोरॉन तथा ऐल्युमिनियम में असमानताएँ हैं –

बोरॉन:

  • बोरॉन अधातु है।
  • बोरॉन विद्युत् एवं ऊष्मा का कुचालक होता है।
  • इसका गलनांक बहुत अधिक है।
  • ये तनु HCl एवं H2SO4 के साथ क्रिया नहीं करते
  • ये सान्द्र HNO3 से क्रिया करते हैं।
  • B + 3HNO3 → H3BO3 + 3NO2
  • ये धातु के साथ क्रिया कर मिश्र धातु बनाते हैं।
  • 3Mg + 2B → Mg2B2
  • बोरॉन कई हाइड्राइड बनाता है।
  • बोरॉन की अधिकतम सहसंयोजकता 4 है।
  • इसके कार्बाइड सहसंयोजी हैं।

ऐल्युमिनियम:

  • ऐल्युमिनियम धातु है।
  • ऐल्युमिनियम विद्युत् एवं ऊष्मा का सुचालक है।
  • इसका गलनांक बहुत कम है।
  • ये तनु HCl एवं H2SO4 से क्रिया कर H2 मुक्त करते हैं।
  • 2Al + 3H2SO4 → Al2 (SO4)3 + 3H2
  • ये सान्द्र HNO3 के लिये निष्क्रिय होते हैं।
  • ये धातु के साथ क्रिया कर बोराइड बनाते हैं।
  • ऐल्युमिनियम का हाइड्राइड अस्थायी है।
  • Al की अधिकतम सहसंयोजकता 6 है।
  • इनके कार्बाइड आयनिक होते हैं तथा जल अपघटित होकर मेथेन देते हैं।

प्रश्न 3.
बोरॉन अपने समूह के अन्य सदस्यों से अपसामान्य व्यवहार दर्शाता है, समझाइये।
उत्तर:
बोरॉन अपने समूह के अन्य सदस्यों से अपसामान्य व्यवहार दर्शाता है, क्योंकि –

  • बोरॉन की परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्या कम होती है।
  • आयनन ऊर्जा उच्च होती है।
  • इलेक्ट्रॉन बंधुता उच्च होती है।
  • d कक्षक की अनुपस्थिति है।

अपसामान्य व्यवहार:

  • बोरॉन अधातु है जबकि समूह के अन्य सदस्य धातु हैं।
  • बोरॉन विद्युत् का कुचालक है जबकि अन्य सदस्य विद्युत् के सुचालक हैं।
  • बोरॉन सहसंयोजी यौगिक बनाता है जबकि समूह के अन्य सदस्य आयनिक यौगिक बनाते हैं।
  • बोरॉन के यौगिक जल में अविलेय लेकिन कार्बनिक विलायकों में विलेय हैं जबकि समूह के अन्य सदस्यों के यौगिक जल में विलेय हैं।
  • बोरॉन अन्य सदस्यों के समान त्रिसंयोजी आयन नहीं बनाता।
  • बोरॉन की अधिकतम सहसंयोजकता 4 है जबकि अन्य सदस्यों की अधिकतम सहसंयोजकता 6 है।
  • बोरॉन का ऑक्साइड अम्लीय है जबकि अन्य सदस्यों के ऑक्साइड उभयधर्मी या क्षारीय प्रकृति के होते हैं।
  • बोरॉन अन्य धातु के साथ क्रिया करके बोराइड बनाता है जबकि अन्य सदस्य धातुओं के साथ क्रिया करके मिश्र धातु बनाते हैं।
  • बोरॉन एक से अधिक प्रकार के हाइड्राइड बनाता है जबकि अन्य सदस्य केवल एक ही हाइड्राइड बनाते हैं।

प्रश्न 4.
बोरेन क्या है ? इसकी विशेषतायें व उपयोग लिखिए।
उत्तर:
बोरॉन के हाइड्राइड को बोरेन कहा जाता है। बोरॉन दो श्रेणियों में हाइड्राइड बनाता है –
निडो बोरेन श्रेणी:
इसका सामान्य सूत्र BnHn+4 +4 है। इसके प्रथम सदस्य BH5 का अस्तित्व नहीं है, दूसरा सदस्य B2H6 सबसे महत्वपूर्ण है जिसे डाइबोरेन कहा जाता है। अन्य महत्वपूर्ण सदस्य पेंटा बोरेन B5H9 हेक्साबोरेन B6H10 है।

एरेक्नो बोरेन श्रेणी:
जिसका सामान्य सूत्र BnHn+6 है। इस श्रेणी के महत्वपूर्ण सदस्य टेट्राबोरेन B4H10,पेंटा बोरेन B5H11, हेक्सा बोरेन B6H12 हैं।

बनाने की विधि:
1. BX3की अभिक्रिया लीथियम हाइड्राइड के साथ 450K ताप पर कराने पर डाइबोरेन प्राप्त होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 67

2. बोरॉन ट्राइ हैलाइड का अपचयन लीथियम ऐल्युमिनियम टेट्राहाइड्राइड के द्वारा कराने पर डाइबोरेन प्राप्त होता है।
4BCl3 + 3LiAlH4 → 2B2H6 + 3LiCl + 3AlCl3

विशेषताएँ:

  • डाइबोरेन रंगहीन गैस है जबकि उच्चतर सदस्य वाष्पशील तथा ठोस हैं।
  • डाइबोरेन ऑक्सीजन की उपस्थिति में दहन के पश्चात् ऊष्मा उत्सर्जित करता है। इसलिये इसका उपयोग रॉकेट ईंधन के रूप में करते हैं।
  • यह निम्न ताप पर स्थायी होते हैं। उच्च ताप पर यह विघटित होने लगते हैं।

उपयोग:

  • रॉकेट ईंधन के रूप में
  • बहुलीकरण अभिक्रिया में उत्प्रेरक के रूप में।

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प्रश्न 5.
डाइबोरेन की संरचना को समझाइये।
अथवा
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक किसे कहते हैं?
अथवा
2 इलेक्ट्रॉन -3 केन्द्रीय यौगिक किसे कहते हैं ?
उत्तर:
डाइबोरेन के संयोजी कोश में कुल 12 इलेक्ट्रॉन होते हैं। जिसमें से तीन-तीन इलेक्ट्रॉन दोनों बोरॉन के संयोजी कोश में तथा एक-एक प्रत्येक हाइड्रोजन के संयोजी कोश में होता है। B2H6 के स्थायी अवस्था हेतु 16 अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन की आवश्यकता होती है। डाइबोरेन के अणु में दो समतलीय BH2 समूह होते हैं तथा दो हाइड्रोजन इन दोनों BH2 समूह के मध्य लंबवत् रूप से स्थित रहते हैं। चारों कोनों पर स्थित चारों हाइड्रोजन बोरॉन के साथ सहसंयोजी बंध द्वारा जुड़े रहते हैं।

इन्हें टर्मिनल हाइड्रोजन कहते हैं। जबकि सेतु बनाने वाले हाइड्रोजन इस तल के ऊपर व नीचे लंबवत् रूप से व्यवस्थित होते हैं तथा B – H – B बंध में इलेक्ट्रॉन की न्यूनता होती है। इस बंध संरचना में 2 इलेक्ट्रॉन 3 परमाणुओं को जोड़ने का कार्य करते हैं इसलिये इन्हें 2- इलेक्ट्रॉन 3- केन्द्र यौगिक कहते हैं तथा इलेक्ट्रॉन की न्यूनता के कारण इन्हें इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक कहते हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 68

प्रश्न 6.
बोरॉन तथा कार्बन में तुलना कीजिए।
उत्तर:
समानता:

  • बोरॉन तथा कार्बन दोनों अधातु हैं।
  • दोनों अपरूपता दर्शाते हैं।
  • दोनों एक से अधिक प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं।
  • दोनों के यौगिक सहसंयोजी यौगिक होते हैं।
  • दोनों के यौगिक कार्बनिक विलायकों में विलेय हैं।
  • बोरॉन का क्रिस्टलीय रूप भी डायमंड के समान कठोर है।
  • CO2 तथा B2 O3 दोनों क्षार में विलेय होकर कार्बोनेट तथा बोरेट बनाते हैं।
    2NaOH + CO2 → Na2 CO3 + H2 O
    2NaOH + B5O3 → Na2 B2 O3 + H2O

असमानता:
बोरॉन तथा कार्बन में असमानताएँ –

बोरॉन:

  • बोरॉन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2-2s22p1 है।
  • बोरॉन की सहसंयोजकता 3 है।
  • बोरॉन द्विबंध तथा त्रिबंध नहीं बनाता।
  • बोरॉन के यौगिक इलेक्ट्रॉन न्यून हैं।
  • कार्बन के यौगिक लुईस अम्ल नहीं हैं।

कार्बन:

  • कार्बन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s22s22p1 है।
  • कार्बन की सहसंयोजकता 4 है।
  • कार्बन द्विबंध तथा त्रिबंध बनाता है।
  • कार्बन के यौगिक इलेक्ट्रॉन न्यून नहीं हैं।
  • बोरॉन के यौगिक लुईस अम्ल हैं।

प्रश्न 7.
BCl3 तथा AlCl3 की संरचना में तुलना कीजिए।
उत्तर:
BCl3 एक इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है जो हमेशा एकलक अवस्था में मिलता है। BCl3 में बोरॉन sp2 संकरित अवस्था में होता है। इसलिये इसकी संरचना त्रिफलकीय होती है तथा बंध कोण 120° होता है। क्योंकि बोरॉन की परमाण्विक त्रिज्या छोटी होती है तथा क्लोरीन सेतु अस्थायी होता है इसलिये यह द्विलक संरचना नहीं बनाता। AlCl3 सदैव द्विलक संरचना के रूप में होता है इस द्विलक संरचना र में प्रत्येक Al परमाणु दूसरे Al से जुड़े क्लोरीन परमाणु से एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर अपना अष्टक पूर्ण कर लेता है तथा स्थायित्व प्राप्त कर लेता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 69
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 70

प्रश्न 8.
गोल्ड श्मिट की ऐल्युमिनो थर्मिक विधि का सचित्र वर्णन कीजिए।
अथवा
थर्माइट वेल्डिंग विधि को समझाइये।
उत्तर:
कुछ धात्विक ऑक्साइडों, जैसे – Cr2O3
Fe2O3 आदि का कार्बन से अपचयन नहीं होता है। इनका अपचयन ऐल्युमिनियम चूर्ण द्वारा किया जाता है तो इस विधि को गोल्ड श्मिट ऐल्युमिनो तापी विधि या थर्माइट. विधि कहा जाता है।
Cr2O3 + 2Al → Al2O3 + 2Cr
Fe2O3 + 2Al → 2Fe + Al2O3

इस विधि में एक अग्निसह क्रूसीबल में धातु ऑक्साइड एवं Al चूर्ण जिसे थर्माइट कहते हैं, भरते हैं। इस मिश्रण में फायर क्ले का साँचा Mg फीते के द्वारा जिसके सिरे पर Mg चूर्ण एवं बेरियम परॉक्साइड की पोटली बँधी होती है, आग लगा देते हैं। अभिक्रिया के ऊष्माक्षेपी होने के कारण उच्च ताप उत्पन्न होता है और ऑक्साइड के अपचयित होने के कारण धातु मुक्त होती है। इस विधि का उपयोग टूटे हुये लोहे के गर्डर या मशीनों के पुों को जोड़ने के लिये होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 71

प्रश्न 9.
फिटकरी बनाने की विधि, गुण तथा उपयोग लिखिए।
अथवा
फिटकरी क्या है ? इसका सामान्य सूत्र लिखकर कोई एक उदाहरण दीजिए तथा फिटकरी के कोई चार उपयोग लिखिए।
उत्तर:
वे द्विक सल्फेट लवण जिनका सामान्य सूत्र R2SO4 · Al2 (SO4)3 24H2O होता है फिटकरी या एलम कहलाते हैं जहाँ R एकसंयोजी धातु जैसे – Na, K, NH4 इत्यादि और M त्रिसंयोजक धातु जैसे – Al, Fe, Cr आदि होता है।

नामकरण:
1. वे फिटकरी जिनमें त्रिसंयोजक धातु के रूप में Al रहता है उसमें उपस्थित एकसंयोजक धातु या मूलक के एकलक के नाम से जानी जाती है। जैसे –
K2SO4 . Al2 (SO4)3 24H2O (पोटाश एलम)
(NH4)SO4Al2 (SO4)3 24H2O (अमोनियम एलम)

2. वे फिटकरी जिनमें Al नहीं होता उनमें उपस्थित दोनों धातुओं के नाम से जानी जाती है।
K2SO2 Cr(SO4)3 .24H2O (पोटैशियम क्रोमियम एलम)
(NH4)2 SO4. Fe2 (SO4)3.24H2O (अमोनियम आयरन एलम)

बनाने की विधि:
(1) पोटैशियम सल्फेट के विलयन में ऐल्युमिनियम सल्फेट की सम अणुक मात्रा का विलयन मिलाकर विलयन का क्रिस्टलन करने पर एलम प्राप्त होता है।
K2SO4 + Al2 (SO4)3 + 24H2O → K2SO4 . Al2 (SO4)324H2O

(2) एलम स्टोन से:
एलम स्टोन K2SO4 Al2 (SO4)3.4Al(OH)3 को बारीक पीस कर तनु H,SO, के साथ उबाला जाता है। प्राप्त विलयन को छानकर आवश्यक मात्रा में K2SO4मिलाकर सम्पूर्ण विलयन का सान्द्रण कर क्रिस्टलन करने पर फिटकरी के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं।
K2SO4 + Al2 (SO4)3 + 4AI(OH)3+ 6H2SO4 → K2SO4 + 3Al2 (SO4)2 + 12H2O K2SO4 + Al2 (SO4)3 + 24H2O → K2SO4 + Al2 (SO4).24H2O

गुण:

  • रंगहीन, अष्टफलकीय क्रिस्टल।
  • इसका जलीय विलयन जल-अपघटन के कारण अम्लीय होता है।
  • जल में विलेय परन्तु ऐल्कोहॉल में अविलेय।
  • गर्म करने पर 92°C पर पिघल जाता है। 200°C तक गर्म करने पर सम्पूर्ण क्रिस्टलन जल के निकल जाने के कारण सरन्ध्र होकर फूल जाता है इस प्रकार की फिटकरी को जली हुई फिटकरी कहते हैं।

उपयोग:

  • रक्त के बहाव को रोकने में
  • कपड़े की रंगाई और छपाई में
  • चमड़ा पकाने में
  • कागज को चिकना करने में
  • जल को साफ करने में।

प्रश्न 10.
कार्बन अपने समूह के अन्य सदस्यों की तुलना में अपसामान्य व्यवहार दर्शाता है, क्यों? उत्तर- कार्बन अपने समूह के अन्य सदस्यों की तुलना में अपसामान्य व्यवहार दर्शाता है, क्योंकि

  • परमाण्विक त्रिज्या तथा आयनिक त्रिज्या कम होती है।
  • आयनन ऊर्जा उच्च होती है।
  • उच्च इलेक्ट्रॉन बंधुता,
  • d कक्षक की अनुपस्थिति।

अपसामान्य व्यवहार:

  • कार्बन के गलनांक तथा क्वथनांक अन्य सदस्यों की तुलना में उच्च है।
  • C की श्रृंखलन की प्रवृत्ति अन्य सदस्यों से अधिक है।
  • कार्बन बहुआबन्ध बनाता है। जबकि अन्य सदस्य बहुआबन्ध नहीं बनाते।
  • C का मोनो-ऑक्साइड ज्ञात है जबकि अन्य सदस्यों के मोनो-ऑक्साइड अज्ञात हैं।
  • C की अधिकतम सहसंयोजकता 4 है जबकि अन्य सदस्यों की अधिकतम सहसंयोजकता 6 है।
  • कार्बन अन्य सदस्यों की तरह संकुल यौगिकों का निर्माण नहीं करता।
  • कार्बन एक से अधिक प्रकार के हाइड्राइड बनाता है जबकि अन्य सदस्य केवल एक ही प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं।
  • CCl4 जल-अपघटित नहीं होता जबकि अन्य सदस्यों के टेट्रा हैलाइड सरलता से जल-अपघटित हो जाते हैं।
  • CO2 गैस है जबकि अन्य सदस्यों के डाइऑक्साइड ठोस हैं।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –
1. फ्रिऑन,
2. सिलिकॉन।
उत्तर:
1. फ्रिऑन:
डाइ क्लोरो डाइ – फ्लोरोमिथेन को फ्रिऑन कहते हैं, कार्बन टेट्रा क्लोराइड की अभिक्रिया HF या SbF3 के साथ SbCl5 की उपस्थिति में कराने पर फ्रिऑन बनता है। फ्रिऑन का उपयोग प्रशीतक के रूप में रेफ्रिजरेटर तथा ए.सी. में करते हैं।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 72

2. सिलिकॉन:
सिलिकॉन एक संश्लेषित बहुलक है। जिसकी मूल इकाई R2 SiCl2 है। इसका मूलानुपाती सूत्र कीटोन के समान होता है इसलिये इन्हें सिलिकॉन नाम दिया है। एल्किल हैलाइड और Si की अभिक्रिया Cu की उपस्थिति में 575K ताप पर कराने पर डाइ-एल्किल डाइ-क्लोरो हैलाइड सिलेन प्राप्त होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 73

इनका जल:
अपघटन कराने पर Si – Cl बंध टूटने लगता है तथा Cl का प्रतिस्थापन OH समूह द्वारा होने लगता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 74

OH बंध बनने के बाद संघनन होने लगता है। इस प्रक्रम में HO के अणु निकलते हैं और सिलिकॉन प्राप्त होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 75
गुण:

  • रासायनिक रूप से निष्क्रिय
  • जल प्रतिकर्षी
  • कुचालक
  • ऊष्मा द्वारा अप्रभावित या.. ऊष्मा प्रतिकर्षी।

उपयोग:

  • वॉटर प्रूफ पेपर के रूप में
  • स्नेहक के रूप में।

प्रश्न 12.
फुलेरीन्स पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
फुलेरीन्स कार्बन का क्रिस्टलीय अपरूप है, किन्तु इसकी गेंद के समान आकृति होती है तथा प्रत्येक गोलीय क्रिस्टल में कार्बन के 60 परमाणु होते हैं, इस प्रकार से इसके क्रिस्टल धूल के कणों के समान होते हैं। एक क्रिस्टल इकाई का सूत्र C60, Cr70, C84 होता है। C60 फुलेरीन्स को बकमिन्स्टर फुलेरीन भी कहा जाता है। ग्रेफाइट को विद्युत् आर्क में हीलियम या ऑर्गन माध्यम में वाष्पीकृत कर संघनित्र करने से धूल के समान पाउडर एकत्र होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 76
गुण:
फुलेरीन्स धूल के कण के समान होते हैं जो चिकने तथा गोल होते हैं। कार्बनिक विलायकों में विलेय होकर रंगीन विलयन देते हैं। सोडियम जैसी क्षार धातुओं से क्रिया कर Na3C60यौगिक देता है । पराबैंगनी किरणों में फुलेरीन्स का बहुलीकरण होता है। जबकि लगभग 1375K तापक्रम पर भी इनके क्रिस्टल टूटते नहीं हैं।

संरचना:
फुलेरीन्स में 20 छ: कार्बन परमाणु के चक्र तथा 12 पाँच कार्बन परमाणु के चक्र होते हैं। सभी पाँच परमाण्विक चक्र छः परमाण्विक चक्र के साथ जुड़े रहते हैं। जिससे एक गोलीय सममित आकृति प्राप्त होती है। इसीलिये Co60 फुलेरीन्स बकी बॉल के नाम से भी जाना जाता है । फुटबॉल की तरह यह पिंजरा होता है। प्रत्येक गोले का व्यास 700 pm होता है।

उपयोग:

  • स्नेहक के रूप में
  • क्षार धातुओं के साथ बने यौगिक अतिचालक के रूप में।

प्रश्न 13.
जियोलाइट पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जियोलाइट एक प्रकार के जटिल सिलिकेट हैं जिनमें कुछ सिलिकॉन आयनों को प्रतिस्थापित कर Al+3 आयन जुड़े रहते हैं। Si+4 तथा Al+3 आयन की संयोजकता के अंतर को संतुलित करने के लिये कुछ अन्य आयन जैसे – Na+, K+; Ca+2, Mg+2 इत्यादि उपस्थित रहते हैं। जो अणु को विद्युत् उदासीन बनाये रखते हैं। इनका सामान्य सूत्र Mx [(AIO2)x(SiO2)y] – mH2O है।
उदाहरण:
Na2[Al2Si3O10].2H2O
Ca[Al2Si7O18].6H2O
जियोलाइट की संरचना मधुमक्खी के छत्ते के समान होती है। इसमें विभिन्न आकार के छिद्र व गुहिकाएँ होती हैं। इन छिद्रों का आकार 260 pm से 740 pm के मध्य होता है इन छिद्रों में उचित आकार के अणुओं या आयनों का अवशोषण हो सकता है।

तथा गुहिकाओं के द्वारा जल आदि अणुओं का उत्सर्जन व अवशोषण हो सकता है। इसलिये इन्हें आण्विक चालनी भी कहते हैं तथा ये आकार चयन करने वाले उत्प्रेरक की तरह कार्य करते हैं। इनके द्वारा उत्प्रेरित अभिक्रिया इनमें उपस्थित छिद्रों के आकार तथा अभिकारक व उत्पाद के आकार पर निर्भर करती है।

संरचना:
चतुष्फलकीय SiO-44 आयन की 24 इकाइयाँ जुड़कर जियोलाइट का एक ब्लॉक निर्मित करती है। इस घनीय अष्टफलकीय ब्लॉक या सोडालाइट केज कहते हैं। सोडालाइट केज के ये ब्लॉक चार सदस्यीय रिंग के द्वारा आपस में जुड़कर द्विविमीय अथवा त्रिविमीय नेटवर्क का निर्माण करते हैं । इस प्रकार की संरचना के कारण जियोलाइट की संरध्रता बहुत अधिक होती है। यदि सोडालाइट केज के ब्लॉक दोहरी छः सदस्यीय रिंग के द्वारा जुड़े होते हैं तो बनने वाला नेटवर्क फौजासाइट कहलाता है।

उपयोग –

  • व्यावसायिक एवं घरेलू उपयोग में जियोलाइट का उपयोग आयन विनिमय द्वारा पानी को शुद्ध करने में किया जाता है।
  • गैसों के पृथक्करण में – जियोलाइट की छिद्रयुक्त संरचना के उपयोग से प्राकृतिक गैसों से H2O, CO2 एवं SO2 को पृथक् किया जाता है।
  • कृषि क्षेत्र में प्राकृतिक जियोलाइट क्लिनोप्टिलोलाइट (Clinoptilolite) का उपयोग भूमि उपचार में किया जाता है। यह भूमि में धीरे-धीरे पोटैशियम को मुक्त करता है।
  • डिटर्जेन्ट बनाने में – कृत्रिम जियोलाइट का उपयोग डिटर्जेन्ट बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 14.
CO2की लुईस संरचना एवं अनुनाद संरचना लिखिए।
उत्तर:
संरचना:
CO2 की लुईस संरचना निम्नानुसार है –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 77
CO2 की मानक ऊष्मा AH° f = -393.5kJ/mol होती है तथा C – O बंध लंबाई 115 pm होती है। इससे स्पष्ट है कि लुईस संरचना के आधार पर CO2 का जो स्थायित्व आना चाहिये CO2 उससे भी अधिक स्थायी है। यह तभी संभव है जब CO2 की अनुनाद संरचना संभव है। कार्बन डाइ-ऑक्साइड अग्रलिखित अनुनाद संरचना का अनुनाद संकर है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 78
ऑर्बिटल संरचना – CO2 में कार्बन sp संकरित अवस्था में तथा दोनों ऑक्सीजन sp2संकरित अवस्था में होते हैं। प्रत्येक ऑक्सीजन के दो-दो sp कक्षक में अनाबंधित इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं। एक sp2 कक्षक कार्बन के sp2 कक्षक के साथ अतिव्यापन करके बंध बनाता है। एक ऑक्सीजन का pzकक्षक कार्बन के pzकक्षक से पाश्वर्ती अतिव्यापन करके 7 बंध बनाता है। दूसरे ऑक्सीजन का py कक्षक कार्बन के py कक्षक से पाश्वर्ती अतिव्यापन करके 7 बंध बनाता है। इस प्रकार CO2 का अणु रेखीय होता है तथा इसका द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 79

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प्रश्न 15.
(a) R2SiCl2 तथा RSiCl3के जल – अपघटन से बनने वाले सिलिकोन्स में मूलभूत अंतर क्या है ?
(b) [SiF6]-2 ज्ञात है जबकि [SiCl6]-2 नहीं, क्यों?
उत्तर:
(a) R2SiCl2 के जल-अपघटन से सिलिकोन्स का रेखीय बहुलक बनता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 80
जबकि RSiCl3 के जल – अपघटन से सिलिकोन्स का द्विविमीय बहुलक बनता है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 81
(b) फ्लुओराइड आयनों का आकार छोटा होता है इसलिये सिलिकॉन परमाणु 6 फ्लुओराइड आयनों को समाहित कर सकता है। इसलिये [SiF6]-2 ज्ञात है जबकि क्लोराइड के बड़े आकार के सिलिकॉन क्लोराइड आयनों को समाहित नहीं कर सकता इसलिये [SiCl6]-2 अज्ञात है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(1) सोडियम जियोलाइट
(2) सोडियम सिलिकेट
(3) सिलिकोन्स।
उत्तर:
(1) सोडियम जियोलाइट:
सोडियम और ऐल्युमिनियम के मिश्रित सिलिकेट्स को परम्यूटिट कहते हैं। इसका सूत्र Na2 [Al2SiO8.xH3O] है। इसको सोडियम जियोलाइट या सोडियम परम्यूटिट भी कहते हैं। कठोर पानी स्तम्भ में रखते हुए परम्यूटिट से प्रवाहित पुनर्निर्माण हेतु किया जाता है। कैल्सियम और मैग्नीशियम लवण सोडियम NaCl विलयन द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। सोडियम लवण जल को कठोर नहीं करते। इस प्रकार मृदु जल प्राप्त होता है। बाइ-सोडियम परम्यूटिट Na2P से व्यक्त किया जाये तो पानी को मृदु बनाने की अभिक्रियाएँ निम्न प्रकार लिखी मृदु जल जा सकती हैं –
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 84
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 82
इस विधि द्वारा पानी की अस्थायी कठोरता भी दूर की जा सकती है।

(2) सोडियम सिलिकेट:
यह काँच की भाँति चमकदार तथा जल में विलेय है, इसी कारण यह जल काँच (Water glass) कहलाता है। यह सोडियम कार्बोनेट और बालू के मिश्रण को एक परावर्तनी भट्टी में गलाकर बनाया जाता है।
Na2CO3 + SiO2 Na2SiO3 + CO2
प्राप्त पदार्थ कड़ा होने पर काँच जैसा-ठोस कठोर जल होता है तथा जल में विलेय हो जाता है सोडियम मृदु जल सिलिकेट के संतृप्त जलीय विलयन को नली में बालू CuSO4, FeSO4, NISO4, Cd(NO3)2 MnSO4 और CO(NO3)2 आदि के क्रिस्टल डाले तो दो तीन दिन पश्चात् विलयन में रंग बिरंगे पौधे उगे हुए प्रतीत होते हैं जो सिलिका गार्डन कहलाता है।

(3) सिलिकोन्स:
ये सिलिकॉन और कार्बन क्वार्टजी यौगिकों के रेजिन है ये प्रायः रेत NaCl तथा पेट्रोलियम से बनाये जाते हैं। इनको गैस, चिपचिपे द्रव, रबर की भाँति ठोस या पत्थर के समान कठोर ठोस रुप में प्राप्त किया जा सकता है। ये कार्ब सिलिकॉन बहुलक है।
MP Board Class 11th Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व - 83

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MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता

MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता (निबंध, पं. बालकृष्ण भारद्वाज)

मन की एकाग्रता पाठ्य-पुस्तक पर आधारित प्रश्न

बोध प्रश्न

मन की एकाग्रता अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
छात्रों की समस्या क्या है?
उत्तर:
जब छात्र पढ़ने के लिए बैठता है तो उसके मन को अनेक विचार घेरने लगते हैं, मन भटक उठता है। सोचता है कि पढ़कर अधिक उच्च पद प्राप्त करूँ और अधिक अर्थ अर्जित करूँ, पर जब पढ़ने बैठता है तो सिनेमा व क्रिकेट, मित्र-मण्डल की मौज-मस्ती याद आ जाती है और उसके मन की एकाग्रता हट जाती है।

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प्रश्न 2.
स्थित प्रज्ञता कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर:
मन को किसी परम उच्च में लगा देने से स्थितप्रज्ञता प्राप्त की जा सकती है। जैसे लोक-संग्रह के कार्य में, राष्ट्रभक्ति में, दीन-दुखियों की सेवा में।

प्रश्न 3.
मन कितने प्रकार से उत्तेजित होता है?
उत्तर:
मन दो प्रकार से उत्तेजित होता है-एक तो बाहरी विषयों से और दूसरे भीतर की वासनाओं की स्मृतियों से।

प्रश्न 4.
गीता में परं का अर्थ क्या है?
उत्तर:
गीता में परं का अर्थ परमात्मा है। इसे परिभाषित करते हुए गीता में कहा गया है कि सब विश्व ईश्वर है। मुझ ईश्वर को सब ईश्वर में जानो और मुझमें संपूर्ण विश्व समझो।

मन की एकाग्रता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्जुन की स्वीकारोक्ति को लिखिए।
उत्तर:
अर्जुन की स्वीकारोक्ति है-“चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है।”

प्रश्न 2.
मन को एकाग्र करने की बाह्य साधना क्या है?
उत्तर:
मन को एकाग्र करने की बाह्य साधना यह है कि दो बाहरी आकर्षणों अर्थात् बाहरी चकाचौंध से हटा दिया जाए। जैसे मित्रों के साथ भोज-मस्ती, क्रिकेट, सिनेमा आदि से।

प्रश्न 3.
छात्र की समस्याएँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:
छात्र की समस्याएँ हैं आज के प्रौद्योगिकी युग में भौतिक उन्नति प्राप्त की जाए। इसके लिए जब पढ़ने बैठता है तो उसके मन की एकाग्रता भंग होने लगती है। उसका मन भटकने लगता है। जब पढ़ने में मन नहीं लगता तो उदास हो जाता है और सोचता है कि मैं बिना परीक्षा उत्तीर्ण किए किस प्रकार अच्छे अंक लाकर पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करूँगा? इस तरह तो जीवन बोझ हो जाएगा।

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प्रश्न 4.
इंद्रियों का क्या कार्य होना चाहिए।
उत्तर:
जीवन में इंद्रियों का सेवन तो होना चाहिए पर यह आसक्ति व द्वेष से नहीं किया जाना चाहिए। इन्हें स्वच्छंद और निरंकुश कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अगर ऐसा किया तो यह व्यवहार में अनेक समस्याओं का कारण बन सकती हैं।

मन की एकाग्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयम को समझाइए।
उत्तर:
संयम का अर्थ है संसार में सांसारिक भोग भोगते रहें पर उतनी ही मात्रा में जितने आवश्यक हों। जीवन में इंद्रियों का सेवन आसक्ति व द्वेषभाव से कभी नहीं करना चाहिए। इंद्रियों को कभी स्वच्छद नहीं छोड़ना चाहिए। अन्यथा भविष्य में इतनी समस्याएँ पैदा हो जाएँगी कि जीवन को ही नरक बना देंगी।

प्रश्न 2.
परं उच्च लक्ष्य का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
परम का अर्थ है मन को किसी परम् अर्थात् परम लक्ष्य में लगाया जाए। यह लक्ष्य है सेवा-कार्य में लगना, लोक- संग्रह करना, राष्ट्र की सेवा में स्वयं को लगाना। दीन-दुखियों की सहायता करना। जब व्यक्ति इस तरह के कार्यों में अपने मन को लगाता है तो तब उसके मन में व्याप्त आसक्ति स्वयं नष्ट हो जाती है।

मन की एकाग्रता भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
विलोम शब्द लिखिए।
राग, अनाचार।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता img-1

प्रश्न 2.
दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
चंचल, कामनाएँ, निग्रह।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Makrand Solutions Chapter 21 मन की एकाग्रता img-2

प्रश्न 3.
उपसर्ग पहचानकर लिखिए।
विचलना, निग्रह, परिभाषित।
उत्तर:
उपसर्ग की पहचान:

  • विचलना – वि + उपसर्ग – विचलना।
  • निग्रह – नि + उपसर्ग – निग्रह।
  • परिभाषित – परि + उपसर्ग – परिभाषितं।

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प्रश्न 4.
समास विग्रह कर नाम बताइए।
अशक्य, बहिर्मुख, लोकसंग्रह।
उत्तर:
विग्रह और नाम:

  • अशक्य – शक्य का अभाव, अव्ययीभाव समास।
  • बहिर्मुख – बाहर की ओर जो मुख, कर्मधारय समास।
  • लोकसंग्रह – लोक के लिए संग्रह, संप्रदान तत्पुरुष या चतुर्थी तत्पुरुष समास।

मन की एकाग्रता योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
स्थित प्रज्ञ के द्वितीयाध्याय के 18 श्लोकों का अर्थ विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
स्थित प्रज्ञ के लक्षण श्रीमद्भगवत् गीता में द्वितीय अध्याय में हैं। इस अध्याय का नाम कर्मयोग है। इसमें 72 श्लोक हैं। 52 से 72 श्लोकों में स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण बताए गए हैं। अर्जुन ने पूछा, हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थितप्रज्ञ पुरुष के क्या लक्षण हैं? स्थित प्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? श्री भगवान ने कहा कि हे अर्जुन! जिस काल में पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है। हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाववाली इंद्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं। इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ मेरे प्रति परायण होकर ध्यान में वैठे हैं। क्रोध से मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।

भगवान् ने अर्जुन से कहा कि अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके संपूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भली-भाँति स्थिर हो जाती है। श्रीभगवान् ने कहा कि संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानंद की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिंस नाशवान् सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं परमात्मा के तत्त्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है।

उन्होंने अपने प्रिय भक्त से कहा कि जैसे नाना नदियों के जल सब और परिपूर्ण अचल, प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परमशान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं। अन्तिम श्लोक में श्रीभगवान् ने कहा- हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अन्तकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानंद को प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 2.
गीता पर लिखी गई पुस्तकों का अध्ययन कीजिए।
उत्तर:
गीता पर बहुत-से विद्वानों ने व्याख्यात्मक व आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी हैं। सबसे श्रेष्ठ पुस्तक बालगंगाधर तिलक की मानी जाती हैं जिसका नाम है ‘गीता रहस्य’ । इसी तरह ‘श्रीमद्भगवद् गीता यथा रूप’ नाम से ग्रंथ प्रसिद्ध है जिसे श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने लिखा है। इन दोनों ग्रंथों में व्याख्याकारों ने विषयों को ही विस्तार से उठाया है। छात्र इन ग्रंथों का अध्ययन कर अपने विषय को विस्तार से समझ सकते हैं।

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प्रश्न 3.
अवसाद जीवन-मूल्य और सामाजिक समरसता पर निबंध लिखिए।
उत्तर:
निबंध:
अवसाद जीवन-मूल्य और सामाजिक समरसता:
जब व्यक्ति जीवन में निराश हो जाता है तब उसे चारों ओर से अवसाद घेर लेता है। इसका मूल कारण यह है कि वह अपने जीवन-मूल्यों से दूर होता जा रहा है। पहले वह अपने जीवन के लिए कुछ मूल्य निश्चित कर लिया करता था और उन पर चलने का उम्रभर निर्णय करता था।

वह जानता था कि सत्य पर आचरण करने से कभी व्यथित नहीं हो सकता। दूसरों का विश्वास प्राप्त करने पर वह हमेशा लोगों में लोकप्रिय हो सकता है। सभी के साथ समान व्यवहार करने और सबको साथ लेकर चलने से वह सामाजिक समरसता को मजबूत कर सकता है क्योंकि सामाजिक समरसता किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

समाज में बदलाव आया तो लोग केवल अपने बारे में सोचने लगे। दूसरों के बजाय अपनी उन्नति का ख्वाब देखने लगे क्योंकि समाज में एकतानता की जगह अकेलेपन की भावना पैदा हुई इसलिए समाज में अवसाद ने लोगों को घेरना शुरू कर दिया। व्यक्ति अपनी विषय-भावना न पूरी होने पर सही रास्ते के बजाय गलत रास्ते अपनाने लगा। सही-गलत का फर्क मिट गया। आज समाज मन की एकाग्रता के अभाव में बिखर गया है इसलिए उसका जीवन अवसादमय हो गया है।

अगर व्यक्ति चाहता है कि उसका जीवन प्रसन्न हो, तो उसे अपने सही जीवन-मूल्यों पर चलने का निर्णय करना होगा। उसे सत्य और विश्वास के बल पर अपना जीवन का पथ निश्चित करना होगा। वासनाओं का आवश्यक उपभोग करते हुए और उन पर नियंत्रण करते हुए आगे बढ़ना होगा। अतः व्यक्ति को अवसाद से उबरना होगा, निराशा से दूर भागना होगा। सत्य और विश्वास पर टिकने वाले जीवन-मूल्य के बल पर सामाजिक समरसता लाने का प्रयत्न करना होगा, तभी समाज में आनंद का वातावरण बन सकेगा।

प्रश्न 4.
‘मन की एकाग्रता’ विषयक लेखों और विचारों का संग्रह कीजिए।
उत्तर:
‘मन की एकाग्रता’ के संबंध में अनेक निबंधकारों ने लेख लिखे हैं। उन लेखों में एक लेख द्विवेदीयुगीन रचनाकार का है। रचनाकार हैं बालकृष्ण भट्ट इस निबंध का शीर्षक है मन की दृढ़ता। लेखक इस पर जोर देता है कि मन दृढ़ होता है तो उसमें स्थितप्रज्ञता आ जाती है। एक प्रसिद्ध उक्ति है ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत।’ इस उक्ति में भी कवि ने मन की एकाग्रता पर बल दिक है क्योंकि मन अगर एकाग्र होता है तो वह कभी हारता नहीं।

वह सदैव जीतता है। सुदृढ़ मन वाला व्यक्ति उन्नति पर उन्नति करता चला जाता है, पीछे नहीं देखता। एक निबंध ‘एकाग्र मन के गुण’ शिवशंकर चौहान ने लिखा है। यह निबंध योग साधना पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस प्रकार यदा-कदा मन की एकाग्रता पर लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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प्रश्न 5.
अपने अशांत मन को संतुलित कर जिन महापुरुषों ने कीर्ति पाई उनका वृत्त संकलित कीजिए।
उत्तर:
भारत में ऐसे अनेक महापुरुष हुए जिन्होंने असंतुलित मन को संतुलित कर देश में यश की पताका फहराई है, जिनमें स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानंद आदि महापुरुषों का नाम लिया जा सकता है। पूर्वप्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के भी इस तरह के कई किस्से हैं। विद्यार्थी इस संदर्भ में पुस्तकालयों से संबंधित महापुरुषों की पुस्तकें नामांकित कर इनके बारे में विशद जानकारी प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 6.
यदि आप अर्जुन होते तो कृष्ण से क्या-क्या प्रश्न करते?
उत्तर:
अगर हम अर्जुन होते तो कृष्ण से प्रश्न करते –

  1. हे भगवन्! मेरा मन अध्ययन में नहीं लग रहा है मुझे क्या करना चाहिए?
  2. सांसारिक वासनाएँ मुझे आपका नाम नहीं लेने देतीं, इनसे मुक्त होने का कोई उपाय बताइए।
  3. मेरा मन आज बहुत उद्विग्न है क्योंकि परीक्षाएँ निकट आ रही हैं, मैं अपना मन कैसे शांत कर सकता हूँ?
  4. मैं जीवन में संतोष कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?
  5. क्या संसार के सीमित भोगों के साथ जीवन-निर्वाह करते हुए मैं मन एकाग्र कर सकता हूँ? आदि।

मन की एकाग्रता परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

प्रश्न 1.
मन की एकाग्रता……… है –
(क) सनातन
(ख) अस्थायी
(ग) वेगमय
(घ) मंदमय
उत्तर:
(क) सनातन।

प्रश्न 2.
छात्र का मन …… घबरा उठता है –
(क) मौज-मस्ती के कारण
(ख) अध्ययन न कर पाने के कारण
(ग) होटल में जाने पर
(घ) ईर्ष्या के कारण
उत्तर:
(ख) अध्ययन न कर पाने के कारण।

प्रश्न 3.
चंचल मन का निग्रह वायु की ….. रोकने के समान दुष्कर है।
(क) आँधी
(ख) गति
(ग) साँसें
(ख) मंदता
उत्तर:
(ख) गति।

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प्रश्न 4.
मन ………. प्रकार से उत्तेजित होता है।
(क) चार
(ख) केवल एक
(ग) दो
(घ) पाँच
उत्तर:
(ग) दो।

प्रश्न 5.
…..अभाव तभी संभव है जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना संतुष्ट हो।
(क) कामनाओं का
(ग) जीवन का
(ग) बुद्धि का
(घ) परमात्मा
उत्तर:
(क) कामनओं का।

प्रश्न 6.
मन की एकाग्रता पाठ के लेखक हैं…..
(क) बालमुकुंद गुप्ता
(ख) पं. बालकृष्ण भट्ट
(ग) पं. बालकृष्ण भारद्वाज
(घ) पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन
उत्तर:
(ग) पं. बालकृष्ण भारद्वाज।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथनों के सही विकल्प चुनिए –
‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ किस ग्रंथ की सूक्ति है?
(क) श्रीमद्भागवत महापुराण
(ख) शिवपुराण
(ग) श्रीमद्भगवत् गीता
(घ) श्रीराधाकृष्ण चरितमानस
उत्तर:
(क) श्रीमद्भगवत् गीता।

प्रश्न 8.
…… इच्छाएँ समाज में अनाचार पनपाएँगी।
(क) अनियंत्रित
(ख) नियंत्रित
(ग) चंचल
(घ) स्थिर
उत्तर:
(क) अनियन्त्रित।

II. निम्नलिखित कथनों में सत्य या असत्य छाँटिए –

  1. ऐसी छात्र की तीन समस्याएँ हैं।
  2. ‘मन की एकाग्रता’ के लेखक बालकृष्ण भारद्वाज हैं।
  3. स्थितप्रज्ञ पुरुष मन के विषयों के पास जा सकता है।
  4. गीता में परम का अर्थ बहुत अधिक है।
  5. अनियंत्रित इच्छाएँ समाज में अनाचार पनपाएँगीं।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

मन की एकाग्रता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो पंक्तियों में दीजिए।

प्रश्न 1.
जब छात्र पढ़ने बैठता है तो उसका मन कहाँ विचरण करने लगता है?
उत्तर:
जब छात्र पढ़ने बैठता है तो उसका मन क्रिकेट और सिनेमा में विचरण करने लगता है।

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प्रश्न 2.
छात्र को अपना जीवन बोझ कव लगने लगता है?
उत्तर:
जब छात्र का मन पढ़ाई से भटक जाता है तब उसे अपना जीवन बोझ लगने लगता है क्योंकि सोचता है कि न पढ़े पाने के कारण न तो वह अच्छी नौकरी पा सकेगा और न ही प्रतिष्ठित पद।

प्रश्न 3.
कामनाओं का अभाव कब संभव है?
उत्तर:
कामनाओं का अभाव तभी संभव है जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना भी संतुष्ट रह सकता है।

प्रश्न 4.
बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियों की लेखक ने किससे उपमा दी है?
उत्तर:’
बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियों की लेखक ने ग्रीष्म ऋतु के बाद होने वाली वर्षा से उपमा दी है क्योंकि जिस तरह गमी में सूखी वनस्पतियाँ वर्मा का जल गिरने से हरी-भरी हो जाती हैं उसी प्रकार हठयोग से हटाई गई शुष्क इंद्रियाँ विषय का रस पाकर पुनः जाग उठती हैं।

प्रश्न 5.
जीवन का परम सत्य लेखक ने क्या बताया है?
उत्तर:
लेखक ने जीवन का परम सत्य बताया है कि इंद्रियों को वश में नहीं किया जा सकता, अतः इंद्रियों का आवश्यक सेवन करते हुए उस पर अंकुश लगाने का प्रयास करना चाहिए।

मन की एकाग्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मन की एकाग्रता’ निबंध का केंद्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
पं. बालकृष्ण भारद्वाज ने ‘मन की एकाग्रता’ में कहा है कि आज छात्र के पास ज्ञान के अनिवार्य साधन उपलब्ध हैं। पुस्तकालय, इंटरनेट, मेधावी शिक्षक आदि के सहयोग से छात्र बहुमुखी ज्ञान प्राप्त कर रहा है परन्तु प्रतिभा के बिना सब व्यर्थ है। इस प्रतिभा को मन की एकाग्रता से प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
‘मन की एकाग्रता’ के लिए कौन-से साधन महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
‘मन की एकाग्रता’ के लिए दो साधन अपनाए जाते हैं। पहला साधन संसार के आकर्षणों से मुँह मोड़ लेना और दूसरा है आंतरिक मन पर संयम करना। इनमें बाहरी आकर्षणों पर सरलता से अंकुश लगाया जा सकता है पर आंतरिक मन पर संयम करना कठिन है। इसके लिए गीता में बताए गए मार्ग से मन एकाग्र रखा जा सकता है।

प्रश्न 3.
स्थितप्रज्ञ दर्शन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
स्थितप्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए मन विषयों के पास नहीं ले जाना चाहिए और यह तभी संभव है जब इंद्रियों के भोगों में आसक्त न रहे। उनसे दूर रहे। मन इंद्रियों से दूर तभी हो सकता है जब उसमें रहने वाली कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं। कामनाएँ तभी समाप्त हो सकती हैं जब उसमें वस्तुओं के होते हुए भी इच्छाएँ न हों। वह संतुष्ट रहे। ऐसे ही व्यक्ति को स्थित प्रज्ञ की दिशा में गतिशील कहा जा सकता है।

प्रश्न 4.
गीता के अनुसार परं का क्या अर्थ है?
उत्तर:
गीता में परं का अर्थ परमात्मा कहा गया है। इसे परिभाषित करते हुए गीता में कहा गया है कि सारा संसार ही ईश्वर है। मुझे ईश्वर को समस्त विश्व में समझो। मुझसे ही सारा संसार समझो। ईश्वर व विश्व एक-दूसरे से अभिन्न हैं। अतः गीता सबके प्रति सेवाभाव और मन की वासनाओं को शुद्ध करने के लिए दीक्षित करती है।

प्रश्न 5.
क्या इंद्रियों पर नियन्त्रण मन में कुंठाएँ उत्पन्न कर सकता है?
उत्तर:
यह समझा जाता है कि अगर हम अपनी इंद्रियों पर जबरदस्ती नियंत्रण करेंगे तो इससे अनेक कुंठाएँ जन्मेंगी। हम अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाएँगे। पर ऐसा नहीं है। अनियंत्रित इच्छाएँ निश्चित रूप से समाज में अनाचार व व्यभिचार पैदा करती हैं पर इन्हें अनिवार्य रूप से भोगते हुए काबू में रखा जाए तो निश्चित रूप से मन की एकाग्रता में सहायता करेंगी।

मन की एकाग्रता पाठ का सारांश

प्रश्न 1.
‘मन की एकाग्रता’ निबंध का सार लिखिए।
उत्तर:
मन किस प्रकार एकाग्र होना चाहिए वह सदा से व्यक्ति की समस्या रही है। आज प्रौद्योगिकी का समय है और इसमें प्रगति की सीमाहीन संभावनाएं हैं। ऐसे में जब वह अध्ययन करने के लिए बैठता है तो अनेक चिंताएँ मन की एकाग्रता में बाधा बनती हैं। उत्कृष्ट पद पाने के लिए मन एकाग्र करना चाहता है पर मनोरंजन के साधन उसके लक्ष्य में रुकावट बन जाते हैं। इस कारण वह बार-बार निराशा का शिकार होता है। तब उसे यह ठीक लगता है कि चंचल मन को एकाग्र करना उसी तरह कठिन है जिस प्रकार वायु की गति रोकना दुष्कर है।

मन एकाग्र करने वाले छात्र की दो समस्याएँ हैं-पहली मन का भोगों की ओर भागना और दूसरी पढ़ने में एकाग्रचित्त न होना। वह बाहरी परिस्थितियों से किसी तरह स्वयं को बचा लेता है पर भीतरी मन का चक्र उसे अनेक कामनाओं में भटका देता है। प्राणायाम आदि से कुछ समय के लिए मन पर नियंत्रण हो भी जाता है पर हमेशा नहीं रहता। गीता में इसका उपाय अवश्य लिखा है, : स्थित प्रज्ञ वह है जिसकी बुद्धि अस्थिर व चंचल नहीं है।

स्थित प्रज्ञता इन्द्रिय और मन संयमित बुद्धि का नाम है। इंद्रियों को भोगों से दूर रखकर स्थित प्रज्ञ रहा जा सकता है। कामनाओं को नष्ट कर मन को इंद्रियों से दूर रखा जा सकता है। यह तभी संभव है जब व्यक्ति बिमा वस्तुओं के संतुष्ट हो। गीता में भी कहा गया है कि व्यक्ति अपनी संतुष्टि के लिए अन्य वस्तुओं की इच्छा नहीं रखता। जब तक उसकी एक भी वृत्तिं बाहरी होगी तब तक वह मन के पराधीन होगा।

हठयोग से मन भागों से दूर करके भी नहीं हटता, अवसर पाते ही पुनः उस ओर भागने लगता है। इसी तरह बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियाँ विषय-चिंतन रूपी जल से फिर हरी हो जाती हैं, अतः प्राणायाम आदि उपाय क्षणिक हैं। – मन की उत्तेजना दो कारणों से है : बाहरी विषयों से और भीतरी वासनाओं की याद से। जब तक वासनाएँ हैं तब तक विषय से मन दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे में गीता में दिए गए उपाय का अनुसरण किया जा सकता है। यह उपाय है, मन को किसी परम लक्ष्य के लिए लगाया जाए। जैसे राष्ट्रभक्ति में, दीनों की सेवा में। ऐसा करने से मन में व्याप्त विषयों की आसक्ति नष्ट हो जाएगी। छात्रों के लिए अध्ययन परम लक्ष्य है।

गीता में परं का अर्थ परमात्मा कहा गया है। मैन की वासनाओं को मिटाने का सूत्र गीता में है। उसके अनुसार सब विश्व ईश्वर है, अतः सबके प्रति सेवाभाव रखो। यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या इंद्रियों को भोगों से दूर करने पर मानसिक कुंठाओं का उदय नहीं होगा? गीता में इसका उत्तर तार्किक है। इसमें कहा गया है कि जीवन के लिए इंद्रियों का सेवन आवश्यक है पर यह आसक्ति व द्वेषभाव से नहीं किया जाना चाहिए। इन्हें खुला नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इससे जीवन जीने में अनेक बाधाएँ खड़ी हो जाती हैं। अनियंत्रित इच्छाओं से समाज में अनाचार फैलता है। इसलिए कहा गया है कि इंद्रियों से विषयों का सेवन तो किया जाए पर विवेकशील होकर किया जाए। उन पर नियंत्रण रहे पर अनिवार्य विषयों में वे प्रवृत्त भी रहें।

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मन की एकाग्रता संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

प्रश्न 1.
मन की एकाग्रता की समस्या सनातन है। आज के प्रौद्योगिकी युग में जहाँ भौतिक उन्नति की संभावनाएँ अपार हैं ऐसे में छात्र जब अध्ययन करने बैठता है, तब उसके मन को अनेक तरह के विचार घेरने लगते हैं। वह सोचता है इस अर्थ प्रधान युग में मुझे उत्कृष्ट पद प्राप्ति के लिए एकाग्र मन से पढ़कर परीक्षा में उच्चतम श्रेणी प्राप्त करना आवश्यक है। लेकिन वह जब पढ़ने बैठता है तो क्रिकेट, सिनेमा या मित्र मण्डली की मौज-मस्ती के विचार में उसका मन भटकने लगता है। मन का यह विचलन बुद्धि की एकाग्रता भंग कर देता है।

वह घबड़ा कर सोचता है, परीक्षा तिथि पास है, मन उद्विग्न है, कैसे अध्ययन करूँ? क्या करूँ? व्यर्थ के विचारचक्र से बुद्धि अस्थिर और मन चंचल बना रहता है। वह सोचता है यदि परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। पद, प्रतिष्ठा, वैभव कुछ नहीं मिलेगा, जीवन बोझ बन जाएगा, वह बार-बार हताशा से घिर जाता है। अनियंत्रित मन और एकाग्रहीनता उसे चिंताओं में डुबो देती है। अर्जुन की यह स्वीकारोक्ति कि ‘चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है उसे उचित प्रतीत होने लगता है।’ (Page 96)

शब्दार्थ:

  • एकाग्रता – मन को एक ओर लगाना।
  • सनातन – पुरानी।
  • अपार – असीमित।
  • उत्कृष्ट – श्रेष्ठ।
  • विचलन – चंचल।
  • उद्विग्न – बेचैन, व्याकुल।
  • विचारचक्र – विचारों का चक्कर।
  • अस्थिर – गतिमान।
  • प्रतिष्ठा – सम्मान।
  • हताशा – निराशा।
  • स्वीकारोक्ति – स्वीकार की गई उक्ति।
  • निग्रह – नियंत्रण।
  • दुष्कर – कठिन, जिसे करना बहुत मुश्किल हो।
  • प्रतीत – लगना।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। आज छात्र उच्च पद की प्राप्ति के लिए अध्ययन करना चाहता है पर मन एकाग्र नहीं रहता। लेखक ने यहाँ उसकी इसी समस्या पर विचार किया है।

व्याख्या:
मन किस प्रकार नियंत्रण में किया जाए, यह सदा से व्यक्ति की समस्या रही है। छात्र चाहता है कि वह प्रौद्योगिकी युग में अपने लिए कोई उच्च पद प्राप्त करे और इसके लिए मन अध्ययन में लगाना चाहता है, पर नहीं, लगता। उसका मन बाहरी विचारों में विचरण करने लगता है। वह सोचता है कि अर्थप्रधान युग में अच्छे अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण करूँ ताकि मुझे उच्च पद प्राप्त हो। वह इस बात को अच्छी तरह जानता है कि जब तक परीक्षा में अच्छे अंकों से पास नहीं होगा तब तक अच्छी नौकरी नहीं प्राप्त कर सकता।

पर जब वह पढ़ने के लिए बैठता है तो बाहरी मनोरंजन के साधन उसके लिए समस्या पैदा कर देते हैं। कभी तो उसका मन क्रिकेट की ओर विचरण करने लगता है तो कभी सिनेमा-जगत् की ओर। कभी वह सोचने लगता है कि पढ़ने में क्या रखा है, जरा मित्र-मण्डली में बैठकर गप-शप की जाए। उसका मन जब इस प्रकार की बातें सोचने लगता है तो उसकी बुद्धि की एकाग्रता भटकं जाती है। वह घबरा जाता है। सोचता है कि मन तो पढ़ाई में लग नहीं रहा है, अब क्या करूँ? मन बहुत बेचैन है, किस तरह इसे पढ़ाई में लगाऊँ? अगर ऐसा रहा तो परीक्षा में अच्छे अंक कैसे आएँगे? और अच्छे अंक नहीं आए तो वह अच्छी नौकरी कैसे पा सकेगा?

सोचता है कि अगर मन एकाग्र न होने के कारण परीक्षा में ही अनउत्तीर्ण हो गया तो तब क्या होगा? मेरा तो जीवन ही नष्ट हो जाएगा! न मुझे कोई प्रतिष्ठित पद मिल पाएगा और न ही अच्छी नौकरी। तब तो यह जीवन बोझ बन जाएगा। यह सोचकर वह बार-बार निराशा में घिर जाता है। अनियंत्रित मन उसे अनेक चिंताओं में डुबो देता है। तब उसे अर्जुन की यह स्वीकारोक्ति याद. आने लगती है कि मन बहुत चंचल है। इस पर नियंत्रण उसी तरह पाना कठिन है जिस तरह बहती हवा को रोकने की नाकाम कोशिश करना।

विशेष:

  1. एकाग्र मन न होने से छात्र में कितना भय व्याप्त हो जाता है, इसका यथार्थ चित्रण है।
  2. ‘मन की एकाग्रता की समस्या सनातन है’, सूक्तिपरक वाक्य है। इसी प्रकार अन्य सूत्र वाक्य है- ‘अर्जुन की यह सकारोक्ति है कि चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है।’
  3. सूत्रात्मक, व्याख्यात्मक और विवेचनात्मक शैली है।
  4. भाषा संस्कृतनिष्ट है, किंतु तद्भव व विदेशी शब्दों के इस्तेमाल से परहेज भी नहीं किया गया है। घेरने, घबरा जैसे शब्द तद्भव हैं तो एकाग्रता, संभावनाएँ, अध्ययन जैसे तत्सम। क्रिकेट, सिनेमा, मौज-मस्ती जैसे शब्द विदेशी हैं। प्रौद्योगिकी पारिभाषिक शब्द है। एकाग्र अर्द्धपारिभाषिक शब्द है। बार-बार युग्म शब्द है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
छात्र के लिए भौतिक उन्नति की क्या संभावनाएँ हैं?
उत्तर:
छात्र के लिए आज प्रौद्योगिकी युग में भौतिक उन्नति की अपार संभावनाएँ – हैं। जैसे इंटरनेट की सुविधा, पुस्तकालय की सुविधा, विद्वान शिक्षकों का समूह और छात्रवृत्ति आदि।

प्रश्न (ii)
छात्र का मन पढ़ने से क्यों भटक जाता है?
उत्तर:
छात्र जब पढ़ने के लिए बैठता है तो उसके सामने बाहरी आकर्षण आकर खड़े हो जाते हैं। ये आकर्षण उसे सिनेमा चलने, मित्रों के साथ गप-शप मारने और क्रिकेट आदि खेलने के संबंध में होते हैं। ऐसे में उसका मन भटक जाता है और उसे समझ नहीं आता कि अब वह अपना अध्ययन किस प्रकार जारी रखे।

प्रश्न (iii)
छात्र के अनियंत्रित मन में किस प्रकार की आंशकाएँ जागती हैं?
उत्तर:
छात्र सोचता है कि मेरा मन तो बाहरी आकर्षणों के कारण पढ़ाई से हट गया है। अब मैं ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाऊँगा, परिणामतः असफल हो जाऊँगा। इससे मुझे न तो अच्छी नौकरी मिल पाएगी और न ही प्रतिष्ठित पद।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
अर्जुन की स्वीकारोक्ति लेखक को उचित क्यों लगती है?
उत्तर:
अर्जुन की स्वीकारोक्ति है कि चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है। यह इसलिए कहा गया है कि मन एकाग्र करना उसी तरह कठिन है जिस तरह वायु की गति को रोकना।

प्रश्न (ii)
मन की एकाग्रता को लेखक ने सनातन क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक ने कहा है कि आदिकाल से ही ऋषि-मुनि इंद्रियों पर निग्रह करने के प्रयास करते रहे हैं। उनमें अधिकांश को सफलता प्राप्त नहीं हो पाई है। आज भी यही समस्या है। आज भी इसे नियंत्रण में करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। इसलिए लेखक का कहना है कि यह समस्या सदा से रही है।

प्रश्न (iii)
मन का विचलन क्या प्रभाव पैदा करता है?
उत्तर:
मन का विचलन बुद्धि के प्रभाव को भंग कर देता है। व्यक्ति का मन किए जाने वाले कार्य से दूर हो जाता है। इससे उसे काम में सफलता प्राप्त नहीं होती। काम पूरा न होने पर वह घबरा जाता है। उसमें कई प्रकार की निराशाएँ जन्म ले लेती हैं।

प्रश्न 2.
ऐसे छात्र की दो समस्याएँ हैं। पहली उसका मन भोग और ऐश्वर्य पाने के लिए उसे लुभा रहा है, और दूसरी पढ़ने में उसकी बुद्धि की एकाग्रता का न होना। बाहर की चकाचौंध उसे अपनी ओर खींचती है और आन्तरिक मन उसे अनेक स्मृतियों और कामनाओं में भटका रहा है। वह बाहर की परिस्थितियों में स्वयं को बचा सकता है, पर आन्तरिक मनश्चक्र की गति अनियंत्रित वेग से चलती रहती है। ऐसी स्थिति में मन का संयम कैसे करें। यम-नियम, आसन, प्राणायाम आदि कुछ क्षण के लिए मन को एकाग्र कर सकते हैं पर ये सब मन की पूर्ण और स्थायी एकाग्रता कराने मन की एकाग्रता में समर्थ नहीं है। इसका पूर्ण उपाय गीता के स्थित प्रज्ञ के विवरण में है। स्थित प्रज्ञ वह है जिसकी बुद्धि अस्थिर, चंचल तथा विचलित नहीं है। स्थित प्रज्ञता इन्द्रिय और मन से संयमित बुद्धि का नाम है। (Page 90)

शब्दार्थ:

  • ऐश्वर्य-भोग – विलास।
  • लुभाना – ललचाना।
  • चकाचौंध – चमक-दमक।
  • आन्तरिक – मन की।
  • मनश्चक्र – मन का चक्र।
  • वेग – तेज।
  • संयम – नियंत्रण।
  • यम-नियम – ये योग के शब्द हैं।
  • प्राणायाम – प्राणों का यौगिक प्रयोग प्राणायाम कहलाता है।
  • समर्थ – क्षमतावान।
  • स्थितप्रज्ञ – जिसने अपनी बुद्धि को वश में कर लिया है।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। आज छात्र उच्च पद की प्राप्ति के लिए अध्ययन करना चाहता है पर मन एकाग्र नहीं रहता। लेखक ने उसकी दो समस्याओं का यहाँ वर्णन किया है, पहली भोग की ओर आकर्षण व दूसरा मन की एकाग्रता का न होना। यहीं इसके उपाय की ओर भी संकेत किया गया है।

व्याख्या:
आज के छात्र की दो सबसे बड़ी समस्याएँ दिखाई दे रही हैं। पहली समस्या यह है कि सांसारिक भोग-विलास उसे अपनी ओर खींचे बिना नहीं रहते और दूसरी यह है कि उसका मन एकाग्र नहीं हो रहा है। इसकी उसे यह हानि उठानी पड़ रही है कि उसका मन पढ़ने में नहीं लग रहा है। बाहर की चकाचौंध यानी क्रिकेट के मैच, सिनेमा व मित्र-मण्डली की गप-शप उसे अपनी ओर खींचती है। उसका भीतरी मन अनेक स्मृतियों के कारण उसे आकुल करता है। जैसे सैर-सपाटा, अच्छे होटलों में खाना खाना, मनोरंजन के साधनों में मन लगे रहना आदि।

वह पढ़ने के लिए कोशिश करते हुए बाहरी परिस्थितियों से मन दूर रखने का प्रयास करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि वह मित्र-मण्डली से किनारा कर लेता है, सिनेमा-क्रिकेट या होटल वगैरह से मन हटा लेता है पर भीतरी परिस्थितियाँ उसे शांत नहीं रहने देतीं। उसका मन इन सब चीजों को प्राप्त करने के लिए व्याकुल रहता है। उसके सामने बड़ी समस्या आकर खड़ी हो जाती है कि आखिर वह इन सबसे किस प्रकार अपने आप को बचाए। वह अपने मन पर किस प्रकार निग्रह करे। मन पर नियंत्रण के लिए वह यम-नियम आदि करता है, आसन-प्राणायाम आदि करता है पर ये सब उसे कुछ समय के लिए ही मन नियंत्रित करने में सहयोग करते हैं।

कुछ देर बाद उसका मन पुनः इन सब बाहरी पदार्थों के लिए विचरण करने लगता है। लेखक कहता है कि मन को किस प्रकार एकाग्र किया जा सकता है, इसका उपाय श्रीमद्भगवत् गीता में है। गीता में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का विवरण दिया गया है। इसमें कहा गया है कि वही व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहलाता है जिसकी बुद्धि स्थिर रहती है और मन चंचल नहीं होता। स्थितप्रज्ञता भी उसे ही कहते हैं जब — इन्द्रिय और मन पर संयम हो जाता है।

विशेष:

  1. लेखक ने छात्रों की प्रमुख दो समस्याओं पर विचार किया है-मन का बाहरी आकर्षणों की ओर भागना व बुद्धि का एकाग्र न होना।
  2. छात्र बाहरी समस्याओं पर किसी प्रकार संयम करता है तो भीतरी मन उसे स्थिर नहीं रहने देता। इस ओर रचनाकार ने विशेष ध्यान दिया है।
  3. यम-नियम, आसन-प्राणायाम मन की एकाग्रता के स्थायी उपचार नहीं हैं।
  4. मन को स्थिर कैसे किया जा सकता है, इसका उपाय गीता में है।
  5. भाषा संस्कृतनिठ है। भोग, ऐश्वर्य, एकाग्रता, स्मृतियाँ आदि तत्सम शब्द हैं। यम-नियम युग्म शब्द हैं। लुभा, सब आदि तद्भव शब्द हैं। चकाचौंध, भटकना आदि देशज शब्द हैं। मनश्चक्र में विसर्ग संधि है। यम-नियम में द्वंद्व समास है। एकाग्र में ता प्रत्यय है। प्रज्ञ में ता प्रत्यय मिलाकर प्रज्ञता शब्द बनाया गया है।
  6. सूक्ति वाक्य है-स्थितप्रज्ञता इन्द्रिय और मन में संयमित बुद्धि का नाम है।
  7. सूत्रात्मक, विवेचनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
भटके हुए छात्र की दो समस्याएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
भटके हुए छात्र की दो समस्याएँ हैं-एक तो यह है कि उसका मन भोग-विलास के लिए हमेशा लुभाता रहा है और दूसरी यह है कि उसकी बुद्धि पढ़ने को नहीं करती। पढ़ने के लिए जिस प्रकार की एकाग्र बुद्धि की आवश्यकता है, वह उसके पास नहीं है।

प्रश्न (ii)
व्यक्ति को मन का संयम करने में क्या दिक्कत आती है?
उत्तर:
व्यक्ति का मन संयम में नहीं हो पाता। इसके मार्ग में पहली दिक्कत यह आती है कि बाहर की चमक-दमक उसे अपनी ओर खींचती है और आंतरिक मन में उन आकर्षणों की यादें उसे भटकाती रहती हैं। इसी कारण उसे अपना मन संयमित करने में दिक्कत आती है।

प्रश्न (iii)
मन को संयम में करने के लिए व्यक्ति को किन विधियों का पालन करना पड़ता है?
उत्तर:
मन को संयमित करने के लिए वह योग साधना में बताए यम-नियम, प्राणायाम आदि का आसरा लेता है। पर वे सब उसके मन को पूरी तरह एकाग्र करने में असफल रहते हैं। ये तो कुछ क्षण के लिए ही मन को नियंत्रित कर पाते हैं।

गयांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
मन को एकाग्र करने का पूरा उपाय कहाँ बताया गया है?
उत्तर:
यों तो मन को एकाग्र करना निश्चित रूप से कठिन है पर श्रीमद्भगवत् गीता में मन को एकाग्र करने का उपाय अवश्य बताया गया है। अगर व्यक्ति उस उपाय का पालन करता है तो वह निश्चित रूप से मन एकाग्र कर सकता है।

प्रश्न (ii)
स्थितप्रज्ञ किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह व्यक्ति स्थित प्रज्ञ कहलाता है जिसकी बुद्धि अस्थिर नहीं है। चंचल व विचलित नहीं है। वस्तुतः स्थित प्रज्ञता इंद्रिय और मन से संयमित होने वाली बुद्धि को कहते हैं।

प्रश्न (iii)
अगर व्यक्ति बाहरी आकर्षण से बच भी जाए तो उसे कौन-सा कारण स्थित प्रज्ञ नहीं होने देना चाहता?
उत्तर:
व्यक्ति प्रयत्न कर बाहरी आकर्षण से बचने का प्रयत्न कर लेता है। उसे सफलता मिल भी जाती है तब भी उसका मन एकाग्र नहीं हो पाता क्योंकि भोगों की स्मृति उसके सभी प्रयास धूल में मिला देती है। परिणामतः वह पुनः आकर्षणों में स्वयं को फँसा पाता है।

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प्रश्न 3.
स्थित प्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए आवश्यक है कि मन को विषयों के पास न ले जावें। पर यह तभी संभव है जब मन इन्द्रियों के भोगों में आसक्त न हो, उनसे दूर रहे। मन इन्द्रियों से दूर तभी तक रह सकता है जब उसमें रहने वाली कामनाएँ नष्ट हो जाएँ। पर कामनाओं का अभाव तभी संभव है जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना स्वयं संतुष्ट हो। इसे गीता में ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ कहा है अर्थात् व्यक्ति अपनी तुष्टि के लिए अन्य या भिन्न वस्तु की इच्छा नहीं करता। अतः चित्तं की एक भी वृत्ति जब तक बहिर्मुखी है तब तक मन अशांत रहेगा। इन्द्रियों की गुलामी से वह मुक्त नहीं रह सकता। ऐसा मन, बुद्धि को अस्थिर करता है। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • आसक्त – रमा हुआ।
  • कामनाएँ – अभिलाषाएँ।
  • तुष्टि – संतोष।
  • चित्त – हृदय।
  • वृत्ति – स्वभाव।
  • बहिर्मुखी – बाहरी।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थिर प्रज्ञ नहीं होने देतीं। ये तभी समाप्त हो सकती हैं जब वह अन्य वस्तुओं के बिना भी स्वयं को संतुष्ट अनुभव कर सके।

व्याख्या:
अगर व्यक्ति स्थितप्रज्ञ बनना चाहता है तो उसके लिए परम आवश्यक है कि बुद्धि को स्थिर रखे। यह तभी संभव है जब वह अपने पास विषयों को न फटकने दे। इसलिए उसे अपने मन को इंद्रियों से एकदम हटाना होगा। उनसे बिलकुल दूर रखना होगा। उसका मन तभी इंद्रियों से दूर रह सकता है जब उससे कामनाएँ दूर हो जाएँ। पर कामनाओं का अभाव इतना आसान भी नहीं है। अलबत्ता, जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना भी स्वयं को संतुष्ट या संतोषी अनुभव करने लगेगा, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जा सकेगा।

लेखक श्रीमद्भगवत् गीता से उद्धरण प्रस्तुत करता है कि ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः सूक्ति का अर्थ है कि जो व्यक्ति अपने संतोष के लिए दूसरी वस्तुओं की कामना नहीं करता। लेखक कहता है कि चित्त की एक वृत्ति जब तक बाहरी रहेगी तब तक व्यक्ति का मन शांत नहीं होगा। उसमें व्याकुलता बराबर बनी रहेगी। वह किसी भी सूरत में इन्द्रियों की गुलामी से आज़ाद नहीं हो सकता। ऐसा व्यक्ति अस्थिर मन का ही होता है। उसकी बुद्धि कभी स्थिर हो ही नहीं सकती।

विशेष:

  1. लेखक ने स्थितप्रज्ञ दर्शन का विवेचन किया है।
  2. लेखक का मानना है कि मन की एकाग्रता की पहली शर्त यह है कि व्यक्ति को विषयों से दूर रहना होगा। और मन इन्द्रियों से तब दूर होगा जब उसमें कोई कामना नहीं होगी।
  3. कामना का अभाव उस व्यक्ति में हो सकता है जो बिना अन्य वस्तुओं के मिलने पर भी संतोषी होता है।
  4. गीता से उद्धरण लिया गया है ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ यह इस ..अनुच्छेद का सूत्रवाक्य है।
  5. भाषा संस्कृतनिष्ठ है। तत्सम शब्दों में स्थितप्रज्ञ, बुद्धि की अस्थिरता, संभव, आसक्त आदि हैं। स्थितप्रज्ञ अर्द्ध पारिभाषिक शब्द है। इसी प्रकार वृत्ति और बहिर्मुखी शब्द हैं। स्थिरता में ता प्रत्यय है, अभाव में अ उपसर्ग है। गुलाम में ई प्रत्यय लगने से गुलामी शब्द बना है। बहिर्मुखी बहि + मुखी, विसर्ग संधि है। सूत्रात्मक वाक्य है-“अतः चित्त की एक भी वृत्ति जब तक बहिर्मुखी है तब तक मन अशांत रहेगा। इन्द्रियों की गुलामी से वह मुक्त नहीं रह सकता।”
  6. सूत्रात्मक और विवेचनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
स्थितप्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
स्थितप्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए प्रयत्न करना चाहिए कि मन विषयों की ओर न जाए। यह तभी संभव है जब यह इंद्रियों के वशीभूत न हो व भोगों में न यह फँसे। मन इंद्रियों से दूर तभी हो सकता है जब उसमें किसी प्रकार की कामना न हो।

प्रश्न (ii)
मन की कामनाएँ किस मन में नहीं निवास करती?
उत्तर:
मन की कामनाएँ ऐसे व्यक्ति के मन में निवास नहीं करतीं जिसके मन में भोगों के प्रति कोई लालसा न हो। जिसके पास भोग न हो, तब भी संतोषी रहे। ऐसे व्यक्ति के मन में कामनाओं का कोई काम नहीं है।

प्रश्न (iii)
गीता के किस सूत्र की इस अनुच्छेद में व्याख्या की गई है?
उत्तर:
इस अवतरण में गीता के इस सूत्र की व्याख्या की है : ‘आत्मन्येयात्मना तुष्टः’ इस सूत्र का अर्थ है कि व्यक्ति अपने संतोष के लिए अन्य अथवा भिन्न वस्तु की अभिलाषा नहीं करता।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
व्यक्ति का मन कब तक अशांत रहेगा?
उत्तर:
वही व्यक्ति सुखी है जिसके मन में एक भी वृत्ति अशांत नहीं है। जब तक उसकी वृत्ति बहिर्मुखी है. तब तक उसका मन शांत हो ही नहीं सकता।

प्रश्न (ii)
स्थितप्रज्ञ शब्द लेखक ने किस स्थान से ग्रहण किया है?
उत्तर:
स्थितप्रज्ञ लेखक ने गोता से ग्रहण किया है। गीता के द्वितीय अध्याय कर्मयोग में भगवान ने अर्जुन को स्थित प्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण बताए हैं। वहीं से यह शब्द भारद्वाज ने चयन किया है।

प्रश्न (iii)
आत्मन्येयात्मना तुष्टः सूत्र का हिंदी अनुवाद कीजिए।
उत्तर:
आत्मन्येयात्मना तुष्टः सूत्र का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी तुष्टि के लिए अन्य या भिन्न वस्तु की इच्छा नहीं करता।

प्रश्न 4.
समस्या यह है कि यदि इंद्रियों को विषयों से बलपूर्वक हठयोग के द्वारा दूर भी कर लें, तो भी विषयों का चिंतन नहीं छूटता वह अवसर आने पर पुनः विकसित होगा। जैसे ग्रीष्म ऋतु के ताप से पृथ्वी पर वनस्पतियाँ सूख जाती हैं, पर वर्षा ऋतु में जल पाकर फिर पल्लवित हो जाती हैं। – इसी प्रकार विषयों से बलपूर्वक हटाई गयी शुष्क इन्द्रियाँ विषय चिन्तन रूपी जल से फिर विषयों में लिप्त हो जाती हैं। क्योंकि इन्द्रियों की विषय रस की चाह बाह्य दमन से नष्ट नहीं होती है। इसीलिए प्राणायामादि के अभ्यास से मन कुछ समय के लिए विषय शून्य हो जाएगा, किंतु बाद में वह अवसर पाकर फिर विषयों में डूब जाएगा। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • बलपूर्वक – जबरदस्ती।
  • हठयोग – योग का एक प्रकार।
  • पल्लवित – विकसित।
  • लिप्त – लीन।
  • दमन – नष्ट करना।
  • प्राणायाम – योग में साँस लेने की एक पद्धति।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से लिया गया है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थित प्रज्ञ नहीं होने देतीं। यहाँ भारद्वाज कहते हैं कि इन्द्रियों को जबरदस्ती विषयों से हटाने पर भी समस्या बनी रहती है क्योंकि विषयों के चिंतन से व्यक्ति का नाता नहीं छूटता।

व्याख्या:
लेखक मन की एकाग्रता पर विचार कर रहा है। वह कामनाओं के संदर्भ में सोचता है कि अगर व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना संतोष कर ले तो उसकी कामनाएँ शांत हो जाएँगी। इस प्रकार वह मन को एकाग्र कर सकेगा। लेखक के विचार में यह भी उचित नहीं लगता। इसमें समस्या यह पैदा होती है कि हम इंद्रियों को बलपूर्वक अपने से अलग तो कर देते हैं पर उनका चिन्तन निरन्तर करते रहते हैं। ऐसे में उनका मन से हटना न हटना व्यर्थ ही है। जैसे ही मन उन विषयों के बारे में चिंतन करता है, वैसे ही वे फिर जाग जाती हैं।

यह स्थिति ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार गर्मी में अतिशय ताप के कारण वनस्पतियाँ सूख जाती हैं परन्तु वर्षा ऋतु आती है तो पुनः हरी-भरी हो जाती हैं। वे पुनः पल्लवित हो जाती हैं। अतःएव बलपूर्वक हटाई गई इन्द्रियाँ अवसर मिलते ही पुनः जाग उठती हैं। और यह काम विषय चिंतन करता है। शुष्क इन्द्रियाँ विषय चिंतन रूपी जल से पुनः विषयों में लिप्त हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यम-नियम, आसन-प्राणायाम आदि से कुछ समय के लिए इंद्रियाँ दब अवश्य जाती हैं पर अवसर आने पर पुनः खड़ी हो जाती हैं और मानव की हानि करना आरम्भ कर देती हैं।

विशेष:

  1. लेखक ने साधक के बलपूर्वक इंद्रियों के दमन को गलत बताया है। उसका मानना है कि बलपूर्वक हटाई गई इंद्रियाँ उसी तरह पुनः जाग जाती हैं जिस प्रकार गर्मी में सूखी वनस्पतियाँ वर्षा ऋतु में पुनः पल्लवित हो जाती हैं।
  2. उपमा अलंकार है। प्रसाद गुण है।
  3. ऋतुओं के उपयोग की सुंदर व्याख्या की गई है। ग्रीष्म का काम – सूखना और वर्षा का काम हरा-भरा करना है।
  4. विषय किस प्रकार मानव मन पर आक्रमण कर देते हैं, इसका सुंदर विवेचन किया गया है।
  5. संस्कृतनिष्ट भाषा है। इन्द्रियों, बलपूर्वक, वनस्पतियाँ आदि शब्द तत्सम हैं। हठयोग और प्राणयाम शब्द अर्द्ध पारिभाषिक शब्द हैं।
  6. दृष्टांत या उदाहरण व विवेचनात्मक शैली है। सूत्रात्मक शैली भी देखी जा सकती है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
लेखक ने इस अनुच्छेद में किस समस्या की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
लेखक ने व्यक्ति की इस समस्या की ओर संकेत किया है कि इंद्रियों को हठयोग से दूर कर भी लिया जाए तब भी उसका विषयों के चिंतन से पीछा नहीं छूटता। अवसर आने पर वे पुनः व्यक्ति पर हावी हो जाती हैं।

प्रश्न (ii)
कामनाओं का पुनः लौट आने को लेखक ने किस उदाहरण से समझाया है?
उत्तर:
लेखक ने कहा है कि जिस प्रकार ग्रीष्म में सूखी वनस्पतियाँ वर्षा का जल पीने पर पुनः हरी-भरी हो जाती हैं उसी प्रकार बलपूर्वक मन से हटाई गई इच्छाएँ विषयों का चिन्तन करने से पुनः जाग जाती हैं।

प्रश्न (iii)
इंद्रियाँ क्यों नहीं समाप्त होती?
उत्तर:
इंद्रियों का समाप्त न होने का कारण यह है कि इन्हें विषय-रस समाप्त नहीं होने देता। हम चाहे हठयोग से इन पर कुछ समय के लिए नियंत्रणं क्यों न कर लें पर जैसे ही विषय याद आते हैं ये पुनः रसमग्न हो जाती हैं।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
हठयोग का इस अवतरण में क्या उपयोग है?
उत्तर:
हठयोग योग का शब्द है। इसे अर्द्धपारिभाषिक शब्द कहा जाता है। हठयोग में बलपूर्वक इंद्रियों को वश में किया जाता है। लेखक यहाँ कहना चाहता है कि व्यक्ति बाहरी वासनाओं को अपने वश में कर लेता है और इसके लिए हठयोग का प्रयोग करता है।

प्रश्न (ii)
क्या हठयोग से मन एकाग्र हो सकता है?
उत्तर:
हठयोग से मन एकाग्र नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे हम बाहरी वासनाओं पर लगाम लगा सकते हैं। वस्तुतः मन का भीतरी पक्ष वासनाओं को स्मरण कर पुनः जीवन धारण करता रहता है। ऐसे में हठयोग मन को एकाग्र करने का कारगर साधन नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न (iii)
शुष्क इंद्रियाँ लेखक ने किसे कहा है?
उत्तर:
लेखक ने शुष्क इंद्रियाँ उन्हें कहा है जिन्हें बलपूर्वक वश में करने का प्रयास किया गया है।

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प्रश्न 5.
मन दो प्रकार से उत्तेजित होता है-बाहर के विषयों से एवं भीतर की वासनाओं और स्मृतियों से। अतः जब तक वासनाएँ हैं विषय रस का संस्कार नष्ट नहीं किया जा सकता। यद्यपि बाह्य प्राणायामादि कुछ सहायक हैं पर पूरी तरह विषय रस का निस्सारण नहीं करते, तब मन से विषय रस कैसे निवृत्त हो? गीता बताती है कि ‘परं दृष्ट्वा निवर्तते’, परं का अर्थ है कि मन को किसी परं अर्थात् परम उच्च लक्ष्य में लगाना जैसे सेवा-कार्य के प्रकल्पों में, लोक-संग्रह में, राष्ट्र भक्ति में या दीन-दरिद्रों की सेवा में। ऐसा करने से मन की विषय आसक्ति नष्ट हो जाती है। इस संदर्भ में छात्रों के लिए अध्ययन ही परम लक्ष्य है। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • उत्तेजित – तनाव।
  • निस्सारण – निकालना।
  • निवृत्त – फारिग।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर लेखक का विचार यह है कि मन दो कारणों से उत्तेजित होता है। इस उत्तेजना को परम लक्ष्य में लगाने पर व्यक्ति मन एकाग्र कर सकता है।

व्याख्या:
भारद्वाज कहते हैं कि मन अगर एकाग्र नहीं होता तो इसके दो कारण कहे जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में मन दो कारणों से उत्तेजित होता है। एक तो उसे बाहरी विषय यानी सैर-सपाटे, होटलों में खाना-पीना, मौज-मस्ती वगैरह मन एकाग्र नहीं करने देते और दूसरे भीतर की वासनाएँ उसे नोच-नोच कर खाती हैं। उसके मन में उठी वासनाओं की आँधी उसे बार-बार याद आती है। उनसे वह उत्तेजित होता है। अगर व्यक्ति मन को एकाग्र करना चाहता है तो उसे सबसे पहले विषय-रस के संस्कार खत्म करने होंगे। यह ठीक है कि मन को एकाग्र करने के लिए प्राणायाम, यम, आसन आदि कुछ लाभ देते हैं पर उनका यह लाभ क्षणिक होता है।

वे पूरी तरह व्यक्ति के मन में रमे विषय रस को मिटा नहीं सकते। तब सवाल पैदा होता है कि मन से विषय रस कैसे समाप्त किए जाएँ? इसका उत्तर हमें मीता में मिलता है कि मन को किसी परं यानी परम उच्च लक्ष्य में लगा देना चाहिए। लोक-संग्रह के कामों में लगा देना चाहिए, राष्ट्रभक्ति में मन लगाना चाहिए, दीन-दुखियों की सेवा में लग जाना चाहिए। इस तरह के काम करने से मन की विषय आसक्ति समाप्त हो जाती है। छात्र के लिए क्योंकि परम लक्ष्य अध्ययन है अतः इस दृष्टि से वह मन को एकाग्र कर सकता है साथ ही अर्थप्रधान युग में उच्च पद पर प्रतिष्ठित भी हो सकता है। अच्छा धनार्जन भी कर सकता है।

विशेष:

  1. मन के एकाग्र न होने के कारण बताए गए हैं। लेखक का कहना है कि बाहर के विषयों से और भीतरी वासनाओं की स्मृति से मन एकाग्र नहीं रह पाता।
  2. प्राणायाम, यम-नियम मन की एकाग्रता में सहायक हैं पर यह चिरकालिक उपाय नहीं हैं।
  3. मन को नियंत्रित करने का उपाय बताया गया है कि इसे उच्च लक्ष्य की ओर मोड़ दो जैसे दीन-दुखियों की सेवा करना, राष्ट्रभक्ति की ओर उन्मुख हो जाना।
  4. छात्र इसी माध्यम से मन एकाग्र कर सकते हैं और उच्च पद पर प्रतिष्ठित हो सकते हैं।
  5. भाषा संस्कृतनिष्ठ है। वासनाओं, उत्तेजित, संस्कार आदि तत्सम शब्द हैं। निस्सारण नि+सारण। यहाँ विसर्ग सन्धि है। प्राणायाम अर्द्ध पारिभाषिक शब्द है। दीन-दरिद्रों मे द्वंद्व समास है।
  6. सूत्रात्मक शैली है। इसके अतिरिक्त विवेचनात्मक शैली है।

गयांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
मन को उत्तेजित करने के दो प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर:
मन को उत्तेजित करने के दो प्रकार हैं-एक तो बाहर के विषयों से मन उत्तेजित होता है और दूसरा विषय-चिंतन से वह तनाव में आ जाता है।

प्रश्न (ii)
विषय की वासनाएँ क्यों नष्ट नहीं होती?
उत्तर:
जब तक इंद्रियों की विषय-वासना रसमग्न रहती हैं तब तक नष्ट नहीं होतीं। कारण यह है कि मन से विषय रस का संस्कार नष्ट नहीं होता। संस्कार के नष्ट न होने से विषय वासनाओं का अंत होने लगता है।

प्रश्न (iii)
वासनाओं पर लगाम लगाने के लिए प्राणायाम का अभ्यास कितना उपयोगी है?
उत्तर:
प्राणायाम का अभ्यास करने से वासनाओं पर नियंत्रण अवश्य होता है पर यह बाहरी आकर्षण पर ही प्रतिबंध लगा सकता है। जैसे मित्र-मण्डली में न जाना, होटलों में जाकर बढ़िया खाना न खाना, क्रिकेट-सिनेमा आदि न देखना। बाहरी आकर्षण के बाद जो भीतरी वासनाएँ व्यक्ति को प्रताड़ित करती हैं, उससे मन एकाग्र नहीं रह पाता।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
गीता में परं का अर्थ क्या है? लेखक ने इस शब्द का यहाँ किस प्रकार उपयोग किया है?
उत्तर:
गीता में परं का अर्थ है मन को किसी श्रेष्ठ कार्य के लिए लगाना। यह . किसी की सेवा करना हो सकता है, दीन-दुखियों की मदद करना हो सकता है अथवा राष्ट्रभक्ति में अपने को खो देना हो सकता है।

प्रश्न (ii)
छात्रों के लिए परम शब्द कितना उपयोगी है?
उत्तर:
छात्रों के लिए परम शब्द बहुत उपयोगी है। लेखक का मानना है कि अगर छात्र अपना मन एकाग्र करने के लिए भटकते मन को देश-सेवा या दीन-दुखियों की सेवा के लिए लगा देते हैं तो उनके मन में एकाग्रता स्थान ग्रहण कर सकती है।

प्रश्न (iii)
मन से विषय रस कैसे दूर किया जा सकता है?
उत्तर:
मन से विषय रस दूर करने के लिए परम लक्ष्य को अपनाना होगा। इसके बिना विषय रस से मुक्ति संभव नहीं।

प्रश्न 6.
गीता में परं का अर्थ परमात्मा है इसे परिभाषित करते हुए गीता कहती है कि सब विश्व ईश्वर ही है। वासुदेवः सर्वम्। यह भी कहा गया है कि मुझ ईश्वर को सब विश्व में व्याप्त जानो और मुझमें संपूर्ण विश्व को समझो। अर्थात् ईश्वर और विश्व अभिन्न हैं। अतः सबके प्रति सेवाभाव रखो। यही मन की वासनाओं की शुद्धि का सूत्र गीता देती है। क्या इंद्रियों के भोगों को नियंत्रण करने से मानसिक कुंठाएँ नहीं उभरेंगी तथा व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रोगों से पीड़ित नहीं हो जाएगा। गीता का इस विषय में उत्तर पूर्णतः तर्क संगतं है। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • परं – परमात्मा।
  • वासुदेव – ईश्वर।
  • व्याप्त – संपूर्ण।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ नहीं रहने देतीं। स्थिर मन के उपायों पर विचार करते हुए लेखक गीता के प्रधान सूत्र का उल्लेख करता है कि यह वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना उत्पन्न करती है। इसी में मन की एकाग्रता का सूत्र विद्यमान है।

व्याख्या:
गीता के एक सूत्र में आए परं शब्द की व्याख्या करते हुए रचनाकार कहता है, परं का अर्थ है परमात्मा। यह समस्त विश्व और कुछ नहीं है, ईश्वर है। कहा भी गया है कि सबमें ईश्वर समाया हुआ है। मुझ ईश्वर को संसार के कण-कण में व्याप्त जानो। यह विश्व किसी अन्य में नहीं, मुझमें ही है। ईश्वर और विश्व को अलग अलग नहीं देखा जा सकता। ये एक-दूसरे में लीन हैं।

इसलिए लेखक गीता के इस सूत्र का आधार लेकर अपने विषय को विवेचित करता है और व्यक्ति मा को संदेश देता है कि मन की वासनाओं को शुद्ध करने का एक ही उपाय है कि सबके प्रति सेवाभाव रखो। यहीं एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि अगर हम वासनाओं पर नियंत्रण करेंगे तो इससे मन में अनेक प्रकार की कुंठाएँ जन्म लेंगी। इससे व्यक्ति में मानसिक व शारीरिक पीड़ा पैदा होगी। ऐसे में संभव नहीं लगता कि व्यक्ति मन एकाग्र कर सकेगा।

विशेष:

  1. इस अंश में लेखक ने वेद सूक्त को विवेचित किया है कि मैं एक अवश्य हूँ पर समस्त विश्व में व्याप्त हूँ। एकोहं….। यहीं लेखक ने एक अन्य सूत्र का उल्लेख भी किया है, “वासुदेवः सर्वम्।
  2. दर्शनशास्त्र में बड़ा झगड़ा है। आत्मा और ब्रह्म अलग-अलग हैं या एक हैं। कुछ ब्रह्मज्ञानी इन्हें अलग-अलग मानते हैं और कुछ अभिन्न। यहाँ ईश्वर व विश्व अभिन्न में ब्रह्मज्ञानियों की यही भावना परिलक्षित होती है।
  3. वासनाओं की शुद्धि का मूल मंत्र बताया गया है-सबके प्रति सेवाभाव रखो, वासनाएँ शांत हो जाएँगी।
  4. यहाँ एक महत्त्वपूर्ण आशंका उठाई गई है कि क्या इन्द्रियों के भोगों को नियन्त्रण करने से मानसिक कुंठाएँ जन्म नहीं लेंगी? शारीरिक पीड़ा नहीं होगी?
  5. भाषा संस्कृतनिष्ठ है। सूत्रात्मक विवेचनात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
गीता में परं का अर्थ क्या है?
उत्तर:
गीता में परम का अर्थ परमात्मा है।

प्रश्न (ii)
परं को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
परं को गीता में इस प्रकार परिभाषित किया है–सारा विश्व ईश्वर है। मुझ ईश्वर को सबमें व्याप्त समझो। मुझमें ही सारा विश्व बना है। दूसरे शब्दों में ईश्वर और विश्व अभिन्न हैं।

प्रश्न (iii)
मन की वासनाओं को दूर करने का गीता में क्या उपाय बताया गया है?
उत्तर:
गीता में कहा गया है कि अगर मन की वासनाओं को शांत करना चाहते हो तो सबके प्रति सेवाभाव रखो। इससे मन की वासनाएँ शुद्ध हो जाएंगी।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
इस अनुच्छेद का केंद्रीय भाव क्या है?
उत्तर:
इस अनुच्छेद का केंद्रीय भाव है कि ईश्वर कण-कण में बसा है। सबके प्रति सेवाभाव से मन की वासनाओं को शुद्ध किया जा सकता है।

प्रश्न (ii)
इंद्रियों पर नियंत्रण करने से क्या समस्या पैदा हो सकती है?
उत्तर:
इंद्रियों पर नियंत्रण करने से मन में कुंठाएँ जन्म ले सकती हैं। इससे व्यक्ति अनेक प्रकार की बीमारियों का शिकार हो सकता है।

प्रश्न (iii)
गीता में इंद्रियों के नियंत्रण से पनपने वाली कुंठाओं का क्या समाधान बताया है? .
उत्तर:
गीता में कहा गया है कि वासमाओं पर नियंत्रण से मन में कुंठाएँ तो उपज सकती हैं पर उनका सरल उपाय यह कि विषय का सेवन तो किया जाए पर आसक्ति या द्वेष से न किया जाए। इससे मन में कुंठाएँ उपजने का भय नहीं रह सकता।

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प्रश्न 7.
अनियन्त्रित इच्छाएँ समाज में अनाचार पनपाएँगी। लोग कामनाओं से आवेशित होकर निषिद्ध आचरण में प्रवृत्त होवेंगे। अतः इन्द्रियों द्वारा विषयों का सेवन – तो हो पर विवेक शून्य आसक्ति न हो। इन्द्रियाँ अपने वश में रहें। उन पर अंकुश रहे अनिवार्य विषयों में इंद्रियाँ प्रवृत्त हों, पर निषिद्ध वर्जित विषयों में नहीं। (Page 97)

शब्दार्थ:

  • अनियन्त्रित – जिन पर नियंत्रण लगा दिया गया है।
  • आवेशित – क्रोधित।
  • वर्जित – त्याज्य।

प्रसंग:
यह अवतरण पं. बालकृष्ण भारद्वाज द्वारा रचित है और ‘मन की एकाग्रता’ पाठ से उद्धृत है। मन की एकाग्रता पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि कामनाएँ व्यक्ति को स्थित प्रज्ञ नहीं रहने देतीं। लेखक ने अंत में स्वीकार कर लिया है कि कामनाएँ कभी समाप्त नहीं हो सकती हैं पर आवश्यकता इस बात है कि व्यक्ति को उनका दास नहीं होना चाहिए।

व्याख्या:
लेखक का मानना है कि व्यक्ति वासनाओं से स्वयं को कभी दूर नहीं कर सकता पर इन्हें नियंत्रित कर जीवन में अपनाया जाए तो वह अपने मन को एकाग्र कर सकता है। क्योंकि वासनाएँ समाज के लिए अनेक प्रकार अनाचार पैदा करती हैं। लोग कामनाओं से संचालित होने लगते हैं और ऐसे आचरण करने लगते हैं जिनकी समाज में करने की मनाही है। अतः लेखक कहता है कि इन्द्रियों से विषय सेवन करो, तुम्हें कोई नहीं रोकने वाला पर इनके सेवन में विवेक को मत भूलो। उन पर आपका हर हालत में नियंत्रण रहना चाहिए। अनिवार्य हो तो विषयों का सेवन करो अन्यथा इनसे परहेज करो।

विशेष:

  1. जब वासनाओं पर नियंत्रण नहीं होता तो समाज में तरह-तरह के अत्याचार पैदा हो जाते हैं। इससे समाज में अनाचार फैलता है।
  2. इंद्रियों के सेवन की मनाही नहीं है पर विवेक का प्रयोग करते हुए करना चाहिए।
  3. तत्सम प्रधान शब्द हैं, संस्कृतनिष्ठ भाषा है। अनियंत्रित में अ और नि दो उपसर्गों का प्रयोग किया गया है तब जाकर अनियंत्रित शब्द का निर्माण किया गया है। इसी तरह अनाचार में अ उपसर्ग का प्रयोग है। प्र उपसर्ग लगाकर प्रवृत्त शब्द तैयार किया गया है।
  4. विवेचित व सूत्रात्मक शैली है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
अनियंत्रित इच्छाएँ समाज का क्या अहित करती हैं?
उत्तर:
जिन इंद्रियों पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं रहता वे समाज को भयावह बना देती हैं। समाज को अनुशासनहीन बना देती हैं। लोग कामनाओं से तनाव में आकर समाज के विरुद्ध आचरण करने लगते हैं।

प्रश्न (ii)
इंद्रियों के सेवन के लिए लेखक ने क्या परामर्श दिया है?
उत्तर:
लेखक ने कहा है कि इंद्रियों का सेवन तो किया जाए पर विवेक से किया जाए। इनके सेवन में आसक्ति का लेश मात्र भी अंश नहीं होना चाहिए।

प्रश्न (iii)
लेखक इंद्रियों का सेवन करते समय किस बात की ओर ज़्यादा ध्यान देना चाहता है?
उत्तर:
इंद्रियों का नियंत्रण अपने हाथ में होना चाहिए। अगर नियंत्रण छूटा तो समाज में अनाचार फैल सकता है।

गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न (i)
अनाचार से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
जब समाज-विरुद्ध क्रियाएँ की जाती हैं तो उसे अनाचार की श्रेणी में रखा जाता है। इंद्रियों का नियंत्रित सेवन समाज-सम्मत है और अनियंत्रित सेवन निश्चित रूप से समाज-विरुद्ध है।

प्रश्न (ii)
इस अनुच्छेद में कोई एक पारिभाषिक शब्द का चुनाव कीजिए।
उत्तर:
इस अनुच्छेद में पारिभाषिक शब्द है–आसक्ति।

प्रश्न (iii)
आवेशित शब्द किस प्रकार बना है?
उत्तर:
आवेश में इत प्रत्यय लगकर आवेशित शब्द का निर्माण हुआ है।

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