MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 6 स्नेह बन्ध

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 6 स्नेह बन्ध

स्नेह बन्ध अभ्यास

स्नेह बन्ध अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘स्नेहबंध’ कहानी किन सम्बन्धों पर आधारित है?
उत्तर:
‘स्नेहबंध’ कहानी पारिवारिक सम्बन्धों पर आधारित है। इस कहानी में प्रमुख रूप से सास, ससुर एवं बहू के सम्बन्धों पर प्रकाश डाला गया है।

प्रश्न 2.
मीता से पहली भेंट पर उसकी सास पर क्या प्रभाव पड़ा? (2015)
उत्तर:
मीता से पहली बार भेंट करने पर उसकी सास उसकी आधुनिक वेशभूषा और उच्छृखल व्यवहार को देखकर स्तब्ध रह गयी।

प्रश्न 3.
मीता के ससुराल वालों ने जात-पाँत के बजाय किन बातों को महत्त्व दिया था? (2017)
उत्तर:
मीता के ससुराल वालों ने जात-पाँत के बजाय उसके रूप-गुण, विद्या-बुद्धि एवं संभ्रांत परिवार को महत्त्व दिया था।

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प्रश्न 4.
“अपनी बिटिया को भूल कैसे गई थी मैं?” इस वाक्य में बिटिया शब्द किसके लिए कहा गया है?
उत्तर:
“अपनी बिटिया को भूल कैसे गई थी मैं?” यह वाक्य मीता की सास ने अपनी बहू के लिए प्रयोग किया था।

प्रश्न 5.
मीता के पति व देवर का नाम लिखिए। (2016)
उत्तर:
मीता के पति का नाम ध्रुव और देवर का नाम शिव है।

स्नेह बन्ध लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ध्रुव ने मीता के पिता को किस प्रकार आश्वस्त किया?
उत्तर:
ध्रुव ने मीता के पिता को यह कहकर आश्वस्त किया कि उसकी माँ बहुत ही सहनशील एवं स्नेहमयी हैं। वे मीता को अपने अनुसार ही बदल लेंगी।

प्रश्न 2.
शादियों में कुछ लोग किस उद्देश्य से जाते हैं? सबसे अधिक आलोचना किसे झेलनी पड़ती है?
उत्तर:
शादियों में कुछ लोग केवल टीका-टिप्पणी करने के उद्देश्य से ही आते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य किसी न किसी प्रकार की कमी निकालकर हँसने का होता है। सबसे अधिक आलोचना नवविवाहिता वधू को झेलनी पड़ती है।

प्रश्न 3.
मीता की सास को मीता की कौन-कौन सी बातें खटकती थीं?
उत्तर:
मीता की सास को मीता का प्रत्येक व्यक्ति से बेधड़क बात करना, बात करते समय संकोच न करना, छोटे-बड़े के मध्य दूरी न बनाये रखना बहुत अखरता था।

प्रश्न 4.
मीता के विदेश न जाने के पीछे क्या भावना थी? (2009, 14)
उत्तर:
मीता अनावश्यक खर्च न करके अपनी ससुराल में ही रहना चाहती थी। क्योंकि उसके पति का विदेश जाने का खर्च कम्पनी दे रही थी, मीता का नहीं। उसकी यह भावना घर के प्रति उत्तरदायित्व एवं मितव्ययिता का परिचायक थी।

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स्नेह बन्ध दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“हम लोग इतने दकियानूसी नहीं हैं कि एक आर्किटेक्ट लड़की में सोलहवीं सदी की बहू तलाशें।” कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
“हम लोग इतने दकियानूसी नहीं हैं” यह कथन ध्रुव के पिता का मीता के पिता के प्रति है। इस वाक्य द्वारा ध्रुव के पिता ने यह भावना व्यक्त की है कि वे इतने परम्परावादी नहीं हैं कि वे एक आर्किटेक्ट लड़की में सोलहवीं सदी की बहू तलाशें-ऐसा कहकर उन्होंने मीता के पिता को आश्वस्त किया।

इसका प्रमुख कारण था कि मीता के पिता को अपनी पुत्री की बहुत अधिक चिन्ता थी, क्योंकि उनकी पुत्री मातविहीन थी। अधिकतर उसकी शिक्षा हॉस्टल में रहकर सम्पन्न हुई थी। घर और परिवार के परिवेश से वंचित थी। वह घर और परिवार के रीति-रिवाज से अनभिज्ञ थी। इसी कारण मीता के पिता को ध्रुव के पिता ने अपने उचित व्यवहार एवं तर्कसंगत विचारों से पूर्ण आश्वस्त किया और यह भी दर्शा दिया कि वे रूढ़िवादी नहीं हैं।

प्रश्न 2.
‘स्नेहबंध’ कहानी के माध्यम से लेखिका क्या कहना चाहती हैं? (2008)
उत्तर:
‘स्नेहबंध’ कहानी के माध्यम के द्वारा लेखिका मालती जोशी यह कहना चाहती हैं कि प्रत्येक स्त्री के हृदय में ममत्व, स्नेह एवं वात्सल्य की अजस्र धारा प्रवाहित होती रहती है। स्त्री सास हो अथवा माँ, वह ममत्व की भावना संजोये रहती है। प्रस्तुत कहानी में मीता अपनी सास के प्रति अगाध प्रेम एवं श्रद्धा रखती है। लेकिन उसकी सास सदैव ही उससे रुष्ट रहती है। उसका प्रमुख कारण है मीता को व्यावहारिक ज्ञान न होगा।

ससुर, मीता की सास को बार-बार समझाते हैं कि बिना माँ की बच्ची है, उससे स्नेहपूर्ण व्यवहार करो। परन्तु वह हमेशा झुंझलाती रहती है। मीता के ससुर जब बीमार हो जाते हैं तब वह रात-दिन एक करके अपने ससुर की निष्कपट भाव से सेवा करती है। उसकी ससुर के प्रति निष्कपट एवं समर्पित सेवा भावना देखकर मीता की सास का हृदय परिवर्तित हो जाता है। उसके मन-मानस में मीता के प्रति प्रेम का सागर हिलोरें लेने लगता है।

‘स्नेहबंध’ कहानी के माध्यम से लेखिका ने यह व्यक्त करने का प्रयास किया है कि समय के अनुरूप मानव में परिवर्तन उपस्थित हो जाता है, चाहे वह कितना भी निष्ठुर क्यों न हो? वास्तव में ‘स्नेहबंध’ कहानी के द्वारा लेखिका ने सास-बहू के आदर्श प्रेम को दर्शाया है।

प्रश्न 3.
कहानी के आधार पर मीता की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2010)
उत्तर:
आधुनिक विचारधारा की मीता एक प्रतिष्ठित परिवार की लड़की है। उसे बनावटी बातें पसन्द न थीं। वह जब पहली बार ध्रुव के साथ अपनी ससुराल गयी तो ध्रुव ने उससे साड़ी पहनने को कहा, तब वह बोली, “मैं जैसी हूँ वैसी ही उन्हें देख लेने दो। बेकार नाटक करने से फायदा …….. खैर कपड़ों की छोड़ो।” पहली बार ससुराल जाती है तो वह वहाँ हँसी-मजाक करती है। उसके हृदय में किसी भी प्रकार का छल-कपट न था। वह विनम्रता की साक्षात् मूर्ति थी। साथ ही, रूप-गुण एवं बुद्धि से परिपूर्ण थी।

सौन्दर्य व गुणों से परिपूर्ण होने पर भी उसे तनिक भी घमण्ड न था। अपनी प्रत्येक बात को स्नेह से मनवाना चाहती थी। जब वह पहली बार मैक्सी पहनकर घर में खड़ी हुई तो उसकी ननद ने टोका और कहा-“मीता रानी ! आज ये कौन-सी पोशाक निकाल ली।” “घर की ड्रेस है दीदी।” यह उत्तर साधारण रूप से दे देती है। कहती है दीदी आप तो घर की हैं, अपनी हैं। इस प्रकार वह प्रत्येक प्रश्न का उत्तर सहजता से दे देती है। साथ ही साथ सास को समझाती है कि-

“पर माँ साड़ी पहनकर जरा-भी आरामदायक नहीं लगता। काम तो कर ही नहीं सकती मैं। बस गुड़िया की तरह बैठे रहना पड़ता है।” इस प्रकार साधारण रूप से अपनी सास को परेशानी बता देती है। सास भी उसकी बात को सहजता से स्वीकार कर लेती है।

बाल प्रवृत्ति-यद्यपि मीता का विवाह हो गया था परन्तु वह अपना बचपना नहीं छोड़ती है। उसे तनिक भी झिझक नहीं है। वह सुबह होते ससुर की कुर्सी के हत्थे पर बैठकर पूरा अखबार पढ़ती है।

“घर में रहती तब तक उनके आस-पास मँडराया करती, पापा का जाप किए जाती। इन्हें इसरार करके खाना खिलाती, दवाई समय पर न लेने के लिए डाँटती है।” लेकिन उसकी यह आदतें उसकी सास को पसन्द नहीं थीं। जब मीता के सास-ससुर की शादी की सालगिरह थी वह बातों में मगन थी। उसे कुछ क्षण के लिए याद न था-“मेरा चेहरा देखते ही वह गले में झूल गई-“पकड़ी गई न ! आप लोगों ने सोचा होगा, चुप्पी लगा जायेंगे तो सस्ते में छूटे जायेंगे।”

परिवार के प्रति उत्तरदायी – मीता को अपने परिवार की जिम्मेदारियों का पूर्ण अहसास था, क्योंकि जब मीता का पति जर्मनी जाने लगा तो सभी परिवार के सदस्यों ने कहा-यह भी ध्रुव के साथ चली जाय परन्तु मीता ने इस प्रस्ताव का विरोध इस प्रकार किया-
“वह बोली बेकार रुपये फेंकने से क्या फायदा पापाजी ! ध्रुव का खर्च तो कम्पनी देगी।” इस वाक्य के द्वारा यह प्रतीत होता है कि वह परिवार के प्रति उत्तरदायी है।

हँसमुख व्यवहार – मीता सदैव प्रसन्न रहती है तथा अपने व्यवहार द्वारा परिवार के सभी सदस्यों को प्रसन्न रखने का प्रयास करती है। इसी कारण वह सबसे हँसी-मजाक कर लेती है और स्नेहयुक्त व्यवहार करती है।

आदर्श वधू – मीता को जैसे ही पता चलता है कि उसके ससुर बीमार हैं वह तुरन्त उनकी सेवा तत्परता से करती है। रात-दिन एक कर डालती है। उसे हर समय एक ही दुःख सताता है कि उसके ससुराल वालों ने उसे उसके ससुर के बीमार होने की खबर क्यों नहीं दी? वह अपनी सास के पास चुपचाप लेट जाती है तभी उसकी सास ने पूछा “क्या हुआ बेटे?” मैंने प्यार से पूछा, वह एकदम पलटी। कुछ क्षण मुझे देखती रही फिर मेरी छाती में मुँह छुपाकर सुबकते हुए बोली, “पहले यह बताइए, आपने हमें खबर क्यों नहीं की? पापाजी इतने बीमार हो गये, किसी को मेरी याद भी न आई।”

उसके इस प्रकार की सेवा भावना से प्रतीत होता है कि वह एक आदर्श वधू है। वह अपने असीम स्नेह द्वारा सास का हृदय परिवर्तित कर देती है और सास भी उसको पुत्रीवत् स्नेह करने लगती है।

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प्रश्न 4.
उस प्रसंग का उल्लेख कीजिए जिसके कारण मीता की सास के व्यवहार में परिवर्तन आया?
उत्तर:
मीता आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी युवती है। वह जिस दिन से विवाह करके आयी थी वह हर समय प्रयास करती है कि वह अपनी सास की इच्छा के विरुद्ध न चले। वह हर सम्भव प्रयास करती है कि वह अपनी सास को प्रसन्न रखे परन्तु वह सदैव रुष्ट ही रहती हैं। यद्यपि मीता के ससुर ने भी अपने इन शब्दों द्वारा समझाया, “वह लड़की बेचारी माँ-माँ कहकर मरी जाती है और तुम?”

“बिना माँ की है तो क्या करूँ।” एकदम फट पड़ी। लेकिन कुछ समय के लिए मीता अपने पिता के घर चली जाती है। अचानक ही वह किसी काम से अपनी ससुराल पहुंची तब उसे पता चला कि उसके ससुर बीमार हैं।

मीता तुरन्त ही अपने बीमार ससुर के लिए प्राइवेट वार्ड में कमरा आरक्षित करवा कर उस कमरे की साफ-सफाई स्वयं करती है। जब उसकी सास कमरे में प्रवेश करती है तो कमरे की सुन्दर व्यवस्था को देखकर हैरान रह जाती है। इसके बाद मीता स्वयं स्टोव जलाकर सास के लिए चाय बना देती है और कहती है-
“माँ चाय पी लीजिये।” थोड़ी देर में वह मेरे सामने खड़ी थी। कमरे में आने के बाद से उसने पहली बार बात की थी और उसका स्वर अत्यन्त सपाट था।
“चाय यहाँ?”
तो कहाँ पियेंगी। क्या पापा को इस हालत में छोड़कर जायेंगी?

इसके पश्चात् रातभर जागकर वह कुर्सी पर बैठी रही। मीता की सेवा भावना को देखकर पहली बार सास ने कहा-
“मीता।” मैंने स्नेहयुक्त स्वर में आवाज दी, “भैया आराम कुर्सी में लेट जायेंगे। तू इधर पलंग पर आ जाना, दिन-भर खड़ी की खड़ी है।” इस प्रकार मीता के प्रति सास के हृदय में स्नेह उमड़ आया।

मीता चुपचाप सास के पास नहीं बच्ची की भाँति लेट जाती है। मीता के अबोध शिशु के समान व्यवहार को देख पहली बार मीता की सास को उस पर स्नेह उमड़ आया। क्योंकि दिनभर थकान के बाद वह एक निष्पाप अबोध निरीह शिशु लग रही थी। इस स्थिति को देखकर मीता की सास के मन में ममत्व की भावना जाग्रत हुई।

मीता की सास के शब्दों में ममता का एक ज्वार-सा उठा मन में। एकदम उसे अंक में भर लेने की इच्छा हुई। पर संकोच में मैं बस उसकी पीठ पर, बालों पर हाथ फेरती रही।

अचानक मेरी उँगलियाँ उसकी पलकों को छू गईं।
वे गीली थीं।
“क्या हुआ बेटे?” मैंने प्यार से पूछा।
वह कुछ नहीं बोली। बस, जैसे रुलाई रोकने के लिए होंठ सख्ती से भींच लिए। इसके बाद मीता ने सास की छाती में मुँह छिपाकर सुबकते हुए पूछा, “पहले यह बताइए आपने हमें खबर क्यों नहीं दी?” पापाजी इतने बीमार हो गये ………

इस वाक्य को सुनकर मीता की सास की अन्तरात्मा हिल उठी और उसे लगा कि वह व्यर्थ ही मीता के प्रति आक्रोश की भावना रखती है। जबकि वह उसको सच्चे हृदय से माँ मानती है।

इस घटना के पश्चात् ही मीता की सास ने स्वयं को-
“कटघरे में खड़ा करके मैं बार-बार पूछ रही थी-मुझे उसकी याद क्यों नहीं आई? अपनी बिटिया को कैसे भूल गई थी मैं?”
इस प्रकार मीता की सास के मन में मीता के प्रति पुत्रीवत स्नेह उमड़ आया और मन की शंका भी समाप्त हो गयी।

प्रश्न 5.
मीता के रोने का क्या कारण था?
उत्तर:
मीता के रोने का प्रमुख कारण था कि मीता अपनी ससुराल से अत्यधिक स्नेह करती थी। विशेषकर अपने ससुर से लेकिन जब मीता का पति ध्रुव विदेश चला गया तो वह अपने पिता के घर रहने चली गयी। इसी मध्य में उसके ससुर की तबियत अधिक खराब हो गयी।

इस बात का पता उसे मेहता जी से चलता है इसलिए वह दुःखी हो जाती है। क्योंकि जिस ससुर को व पिता के समान मानती थी तथा अपूर्व स्नेह रखती थी, उनकी अस्वस्थता के विषय में उसे कोई सूचना नहीं दी गयी थी।

मीता को अपने ससुर से अगाध स्नेह था। उसे यह बात कष्टप्रद प्रतीत हुई जिस पिता को वह अपार स्नेह करती है उन्हीं की अस्वस्थता को उसे न बताकर उसको पराया समझ लिया गया।

लेकिन मीता को पता चलते ही उसने ससुर की तन-मन-धन से सेवा की, परन्तु इस बात को भूलने में असमर्थ रही कि उसे ससुर की बीमारी को नहीं बताया गया। जब भी वह इस बात को सोचती तो उसे रोना आने लगता था।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित गद्यांश की सन्दर्भ व प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) ममता का एक ज्वर …………………… फेरती रही।
(2) कभी कभार …………. घुल रही है।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर मीता के व्यवहार से प्रभावित उसकी सास के मन की ममता की सहज अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या :
मीता के अत्यन्त सरल और संवेदनशील सेवाभावी व्यवहार से उद्विग्न हुई मीता की सास के मन में ममता का तीव्र झंझावात जाग उठा। पास लेटी मीता उसे अपनी पुत्री प्रतीत होने लगी। वह उसे अपनी गोद में भर लेना चाहती थी, किन्तु संकोचवश मात्र उसकी पीठ पर तथा बालों पर प्यार भरा हाथ फेरती रही।

(2) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘स्नेह बंध’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसकी लेखिका मालती जोशी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्ति में लेखिका ने मीता की उस समय की मनोदशा का सशक्त अकन किया है जब उसके पति जर्मनी चले गये थे। इससे मीता के ससुर एवं सास भी चिन्तित थे।

व्याख्या :
मीता यदा-कदा अपने मायके से ससुराल आ जाती थी। लेकिन वह पहले की भाँति उछल-कूद नहीं करती थी। हँसती-मुस्कराती तो अवश्य थी। परन्तु पहले जैसी हल-चल नहीं करती थी। उसके हास्य के पीछे पहले जैसे जीवंतता नहीं थी। हास्य के पीछे मन की व्यथा निहित थी। जब मीता पुनः अपने मायके प्रस्थान करती थी तब उसके ससुर सास कहते कि उस समय तो अपने पति ध्रुव के साथ विदेश गमन इसलिए नहीं किया कि व्यर्थ ही रुपये व्यय होंगे। लेकिन अब वह मन-ही-मन पश्चाताप कर रही है। उसके मन में प्रतिपल अपने पति की याद कौंधती रहती है। मीता यद्यपि व्यवहार कुशल एवं दूरदर्शी है, परन्तु नारी के हृदय में पति के प्रति स्नेह भावना रहती है, उसे किस प्रकार नकारा जा सकता है।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-विस्तार कीजिए
(1) माँ की जीवन भर की साधना है।
(2) सभी सौजन्य और विनम्रता की मूर्ति बने थे।
(3) मन पर काँटे से उग आते हैं।
उत्तर:
(1) उपर्युक्त कथन ध्रुव का है-जब मीता की सास नाश्ता बनाकर लाती है तब मीता ध्रुव की माँ से कहती है कि आप इतना भारी नाश्ता देती हैं तभी आपके दोनों सुपुत्र मोटूमल हो रहे हैं। इसी बात का खण्डन करते हुए ध्रुव कहता है कि तुम हमें नजर मत लगाओ, क्योंकि हम दोनों पुत्र ही अपनी माँ की जीवन भर की जमा पूँजी हैं।

हमारी माँ ने हमें पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करके पाला-पोसा है, अतः हमारे खाने-पीने पर टोक मत लगाओ। क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि खाते समय किसी को टोकना अशुभ माना जाता है। माँ के हाथ से दिया हुआ नाश्ता अमृत तुल्य हो जाता है। उसकी तुलना में संसार के समस्त स्वादिष्ट पदार्थ फीके हैं।

(2) प्रस्तुत वाक्य में मीता के विवाह का उल्लेख है क्योंकि अन्तर्जातीय विवाह को लेकर टीका-टिप्पणी करने के लिए बहुत से लोग लालायित थे, परन्तु मीता के परिवार की ओर से आवभगत में किसी भी प्रकार की कोई भी कमी नहीं थी। मीता के परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने-अपने उत्तरदायित्व का सजगता एवं विनम्रता से निर्वाह कर रहा था।

कहने का अभिप्राय है कि पापा के अलावा परिवार के अन्य सदस्य भी विनम्रता की साक्षातमूर्ति थे। कहीं भी किसी भी प्रकार का तनाव न था। इस प्रकार से उनकी विनम्रता के द्वारा कन्यापक्ष की शालीनता और विनम्रता प्रकट हो रही थी।

(3) प्रस्तुत कथन मीता की सास का है जब मीता की सास ने रात जनरल वार्ड में गुजारी थी। उस रात को याद करके उनका मन व्यथित हो जाता है। वह यह जानकर परेशान थी कि उसके पति बीमार हैं उनकी देख-रेख की व्यवस्था उचित प्रकार से नहीं हो पा रही थी। उसका कारण था कि अस्पताल में गन्दगी बहुत थी। ऐसे वातावरण में रहना असहनीय था।

मीता की सास को अस्पताल के अव्यवस्थित माहौल में रात भर बेचैनी रही। वह स्वयं को ही बीमार समझने लगी थी। अस्पताल के दूषित वातावरण एवं दुर्गन्ध को याद करके उनका मन-मानस व्यथित हो रहा था।

उस अस्पताल की दुर्गन्ध की याद करके आज भी मन विह्वल हो उठता है। एक तो पति की बीमारी दूसरे अव्यवस्थित माहौल मन में काँटे की भाँति चुभ रहे थे एवं मन को व्यथित कर रहे थे।

स्नेह बन्ध भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों में प्रयुक्त मुहावरे छाँटकर लिखिए.
(अ) पहली नजर में उसका हुलिया देखा और मन खट्टा हो गया था।
(आ) उस समय तो सचमुच मेरा खून जल जाता पर मैंने किसी को हवा नहीं लगने दी।
(इ) प्रेम करते समय इन लोगों की अक्ल क्या घास चरने चली जाती है।
(ई) हमें नजर मत लगाओ।
(उ) बहू को लेकर मन में कितनी कोमल कल्पनाएँ थीं सब राख हो गईं।
उत्तर:
(अ) मन खट्टा हो गया।
(आ) खून जल जाना, हवा न लगने देना।
(इ) अक्ल घास चरने जाना।
(ई) नजर लगाना।
(उ) राख हो जाना।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के सामने कुछ विकल्प दिये गये हैं, उनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

  1. स्ट्रेचर (हिन्दी, अंग्रेजी, देशज शब्द)
  2. नज़र (हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू शब्द)
  3. जीवन (तत्सम, तद्भव, देशज शब्द)
  4. माटी (तत्सम, विदेशी, देशज शब्द)।

उत्तर:

  1. स्ट्रेचर-अंग्रेजी शब्द
  2. नज़र-उर्दू शब्द
  3. जीवन-तत्सम शब्द
  4. माटी-देशज शब्द।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों में अशुद्ध वर्तनी वाले शब्दों को शुद्ध करके लिखिए
उत्तर:
(क) अशुद्ध-लेकिन बहू घर में आति न थी।
शुद्ध-लेकिन बहू घर में आती न थी।

(ख) अशुद्ध-उसे परदरशन करने की क्या जरूरत थी?
शुद्ध-उसे प्रदर्शन करने की क्या जरूरत थी?

(ग) अशुद्ध-राम को यह सब सेहज-स्वाभाविक लगता था।
शुद्ध-राम को यह सब सहज स्वाभाविक लगता था।

(घ) अशुद्ध-पापा का स्वास्थ्य इन दीनों ठीक न था।
शुद्ध-पापा का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक न था।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित अनुच्छेद में यथास्थान विराम चिह्नों का प्रयोग कीजिए-
कभी कभार वह भी घर पर आ जाती पर पहले का सा तूफान नहीं करती हँसती खिलखिलाती पर उसमें पहले की सी जीवंतता नहीं थी जब वह चली जाती तो यह कहते कहा था साथ चली जाओ तब नहीं मानी पैसे का मुँह देखती रही अब मन ही मन घुल रही है।
उत्तर:
कभी-कभार वह भी घर पर आ जाती है, पर पहले का-सा तूफान नहीं करती। हँसती-खिलखिलाती, पर उसमें पहले की-सी जीवंतता नहीं थी। जब वह चली जाती तो यह कहते, “कहा था, साथ चली जाओ। तब नहीं मानी, पैसे का मुँह देखती रही। अब मन-ही-मन घुल रही है।”

स्नेह बन्ध पाठ का सारांश

‘स्नेह बंध’ कहानी का सम्पूर्ण घटनाक्रम मीता एवं उसकी सास पर आधारित है। यदा-कदा किसी व्यक्ति विशेष के सम्बन्ध में जो धारणा बना लेते हैं उससे छुटकारा पाना दुष्कर है। मीता का आचरण मध्यमवर्गीय संस्कारों से मेल नहीं खाता। यही बात सास एवं बहू के मध्य एक दीवार खड़ी कर देती है। सास की हठधर्मिता सम्बन्धों को सहज रूप बनने में बाधक है। मीता के पति ध्रुव एवं देवर शिव को अपनी माँ का मीता के प्रति ऐसा व्यवहार खलता है।

संयोगवश मीता का पति विदेश गमन करता है। ससुर के आग्रह करने पर भी अपने पति के साथ विदेश इसलिए नहीं जाती है क्योंकि वहाँ अनावश्यक रूप से धन का व्यय होगा। पति की अनुपस्थिति में वह अपने घर के दायित्व के प्रति जागरूक है।

मायके में जब मीता को अपने ससुर की बीमारी का पता चलता है तो अस्पताल जाकर उनकी तत्परता से सेवा करती है। इससे प्रभावित होकर मीता की सास को वह बेटी के रूप में प्रिय प्रतीत होने लगती है।

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स्नेह बन्ध कठिन शब्दार्थ

प्रतिक्रिया = प्रतिकार, बदला। मुआयना = निरीक्षण। तल्ख = कटु, कड़वा, तीखा, तीखापन। कंठस्थ = मौखिक रूप से याद किया। कहकहा = हँसी-मजाक के स्वर, ठहाके। गुलजार = फूलों से भरे बाग की तरह, आनन्दित वातावरण, प्रसन्नता से भरा, हरा-भरा। अदब कायदा = विनीत या शिष्ट व्यवहार। किलककर = प्रसन्न होकर, हर्षित। कृत्रिम = बनावटी। कर्कश = तीखा स्वर। तन्द्रा = नींद। उत्सुक = इच्छुक। अव्यक्त= जिसे व्यक्त न किया जाय। अंधड़ = तूफान। आजिजी = अनमने, बिना मन के। हुलिया = रंग रूप। उसाँस = दीर्घ स्वाँस लेना। औपचारिक = व्यावहारिक। करबद्ध निवेदन = हाथ जोड़कर की गई प्रार्थना। आश्वस्त = भरोसा। सहनशील = विनम्र। स्नेहमयी = ममतामयी। दकियानूसी = रूढ़िवादी। आर्किटेक्ट = वास्तुकार। सौजन्यपूर्ण = सज्जनतापूर्ण। आचारसंहिता = नियमावली। मकसद = उद्देश्य। मीनमेख = नुक्स दोष निकालना। अव्यवस्था = व्यवस्था का अभाव। कोंचना = ताने मारना। उन्मुक्त = स्वतन्त्र। इसरार = अनुरोध। शिकन = सलवट, बल पड़ना। गद्गद् = प्रसन्न होना। आग्नेय दृष्टि = कड़ी नजर से देखना। खीझकर = झुंझलाकर। धींगामुश्ती = शरारत। प्रशिक्षण = ट्रेनिंग, अभ्यास। आक्रोश = क्रोध। स्नेहसिक्त = प्रेम में डूबा हुआ। मिमियाया = गिड़गिड़ाया। प्रतिवाद = विरोध करना। निस्पंद = शान्त, स्वर-मुक्त। निरीह = उदासीन, विरक्त। अंक = गोद। सरजाम = व्यवस्था।

स्नेह बन्ध संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. कभी-कभार वह भी घर पर आ जाती, पर पहले का-सा तूफान बरपा नहीं करती। हँसती-खिलखिलाती, पर उसमें पहले की-सी जीवंतता नहीं थी। जब वह चली जाती तो यह कहते “कहा था, साथ चली जाओ। तब नहीं मानी, पैसे का मुँह देखती रही। अब मन-ही-मन घुल रही है।”

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘स्नेह बंध’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसकी लेखिका मालती जोशी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्ति में लेखिका ने मीता की उस समय की मनोदशा का सशक्त अकन किया है जब उसके पति जर्मनी चले गये थे। इससे मीता के ससुर एवं सास भी चिन्तित थे।

व्याख्या :
मीता यदा-कदा अपने मायके से ससुराल आ जाती थी। लेकिन वह पहले की भाँति उछल-कूद नहीं करती थी। हँसती-मुस्कराती तो अवश्य थी। परन्तु पहले जैसी हल-चल नहीं करती थी। उसके हास्य के पीछे पहले जैसे जीवंतता नहीं थी। हास्य के पीछे मन की व्यथा निहित थी। जब मीता पुनः अपने मायके प्रस्थान करती थी तब उसके ससुर सास कहते कि उस समय तो अपने पति ध्रुव के साथ विदेश गमन इसलिए नहीं किया कि व्यर्थ ही रुपये व्यय होंगे। लेकिन अब वह मन-ही-मन पश्चाताप कर रही है। उसके मन में प्रतिपल अपने पति की याद कौंधती रहती है। मीता यद्यपि व्यवहार कुशल एवं दूरदर्शी है, परन्तु नारी के हृदय में पति के प्रति स्नेह भावना रहती है, उसे किस प्रकार नकारा जा सकता है।

विशेष :

  1. यहाँ पर लेखिका ने मीता के सास-ससुर की मनोदशा का वर्णन किया है।
  2. मुहावरों का प्रयोग है जैसे मन-ही-मन घुलना, तूफान नहीं बरपा, पैसे का मुँह देखना।
  3. शैली परिमार्जित है।

2. मेरे पास लेटी यह नन्हीं सी लड़की। इसका भी तो कभी-कभी मन होता होगा। तब किसके आँचल में मुँह छिपाती होगी। बड़ी बहन है, वह सात समुन्दर पार इतनी दूर है। भाभी तो खुद ही लड़की है अभी। (2008)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में लेखिका बहू की निरीहता और मासूमियत का वर्णन कर रही है जिसे कभी माँ की गोद नसीब नहीं हुई थी।

व्याख्या :
नन्हीं सी बालिका अपने मन की व्यथा, अपनी भावनाओं और अपनी इच्छाओं को किससे कहती होगी। लेखिका इस बात को सोचकर अत्यन्त द्रवित है कि यह बालिका जो मेरे पास लेटी है, कितनी एकाकी और असहाय है। इसकी माँ नहीं है। यह अपनी व्यथा किससे बाँटे। इसका मन होता होगा कि कोई माँ का आँचल होता जिसमें वह स्वयं को छिपाती और स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती। यद्यपि इसकी एक बड़ी बहन है किन्तु वह सुदूर विदेश में रहती है और भाभी जी हैं वह स्वयं ही बालिका हैं। उससे यह अपना सुख-दुःख किस प्रकार बाँट सकती है ? यह सोचकर वह द्रवित है कि सास को उसे अपनी बच्ची की भाँति मानते हुए स्नेह-दुलार देना चाहिए था।

विशेष :

  1. नारी मन का मनोवैज्ञानिक चित्रण है।
  2. पूर्वाग्रहों और परम्पराओं की बेड़ियों में जकड़ी सास अपनी बहू के निश्छल स्नेह और त्याग को नहीं पहचान पाती है। इसका यहाँ पर सूक्ष्म चित्रण किया गया है।

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3. ममता का एक ज्वर सा छा मन में। एकदम उसे अंक में भर लेने की इच्छा हुई। पर संकोच में मैं बस उसकी पीठ पर, बालों पर हाथ फेरती रही। (2015)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर मीता के व्यवहार से प्रभावित उसकी सास के मन की ममता की सहज अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या :
मीता के अत्यन्त सरल और संवेदनशील सेवाभावी व्यवहार से उद्विग्न हुई मीता की सास के मन में ममता का तीव्र झंझावात जाग उठा। पास लेटी मीता उसे अपनी पुत्री प्रतीत होने लगी। वह उसे अपनी गोद में भर लेना चाहती थी, किन्तु संकोचवश मात्र उसकी पीठ पर तथा बालों पर प्यार भरा हाथ फेरती रही।

विशेष :

  1. मीता की दायित्व भावना से प्रभावित उसकी सास की भाव विह्वल दशा को प्रस्तुत किया गया है।
  2. सरल, सपाट भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. भावात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन किया गया है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 5 नीरा

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नीरा अभ्यास

नीरा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नीरा के पिता को क्या पढ़ने का शौक था?
उत्तर:
नीरा के पिता को अखबार पढ़ने का शौक था।

प्रश्न 2.
अमरनाथ ने अपना लेख किनके विषय में लिखा था?
उत्तर:
अमरनाथ ने अपना लेख लौटे हुए प्रवासी कुलियों के विषय में लिखा था।

प्रश्न 3.
नीरा के पिता कुली बनकर कहाँ गये थे? (2016)
उत्तर:
नीरा के पिता कुली बनकर मॉरीशस गये थे।

प्रश्न 4.
नीरा की माँ का क्या नाम था?
उत्तर:
नीरा की माँ का नाम ‘कुलसम’ था।

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नीरा लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“भगवान यदि हों तो आपका भला करें,” कहने के पीछे नीरा के पिता बूढ़े बाबा के किस भाव का आभास होता है?
उत्तर:
‘भगवान यदि हों तो आपका भला करें’ इस कथन का भाव है कि बूढ़े बाबा को अनायास ही साइकिल के कारण चोट लग गयी। साइकिल वाले ने बूढ़े को एक अठन्नी दी। यह उस व्यक्ति की दया का प्रतीक थी। इसी कारण गद्गद् होकर बूढ़े बाबा ने साइकिल वाले के प्रति यह भाव व्यक्त किया।

प्रश्न 2.
नीरा के पिता को किस बात की चिन्ता थी? (2014, 15)
उत्तर:
नीरा के पिता को यह चिन्ता थी कि उसके मरणोपरान्त नीरा की देखभाल करने वाला कोई भी नहीं था। इसी कारण पिता को भय था कि आज समाज में असामाजिक तत्त्व यत्र-तत्र घूमते रहते हैं। ऐसे नर पिशाचों के हाथ में पड़कर नीरा का जीवन बरबाद हो जायेगा। यही चिन्ता उसे प्रति पल कचोटती रहती थी।

प्रश्न 3.
अपराधों का दण्ड तत्काल न मिलने का क्या परिणाम हुआ?
उत्तर:
अपराधों का दण्ड तत्काल न मिलने के फलस्वरूप आज समाज में दिन-प्रतिदिन अपराधों की संख्या में कई गुनी वृद्धि होती चली जा रही है। व्यक्ति का नैतिक पतन निरन्तर हो रहा है। मानवीय मूल्यों की भी गिरावट अवलोकनीय है। यदि यह कहा जाय कि जीवन में अपराधों का इतना जाल फैला हुआ है कि इससे मुक्त होने में मानव को कितना समय लगेगा यह प्रश्न भविष्य के अन्तराल में तिरोहित है।

नीरा दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
देवनिवास नीरा के किन गुणों से प्रभावित है? (2008)
उत्तर:
देवनिवास नीरा के अपूर्व सौन्दर्य, सरलता एवं सहृदयता से प्रभावित है। उसका प्रमुख कारण है कि नीरा यद्यपि निर्धन थी परन्तु उसके पास जो भी रूखा-सूखा पदार्थ सुलभ था उसी को ग्रहण करके अपूर्व सुख तथा आनन्द का अनुभव करती थी। इसके साथ ही उसे अपने बूढ़े बाबा की चिन्ता प्रतिपल सताती रहती थी। उनकी सेवा में वह कोई भी कसर नहीं छोड़ती थी।
बाबा के प्रति कर्त्तव्य निर्वाह को अपने जीवन का सर्वोपरि कर्त्तव्य मानती थी।
नीरा का धनिकों के प्रति कहा गया निम्न कथन देखिए, “जाओ, मेरी दरिद्रता का स्वाद लेने वाले धनी विचारकों और सुख तो तुम्हें मिलते ही हैं, एक न सही।”
देवनिवास नीरा की स्वाभिमानी एवं निश्छल प्रवृत्ति से प्रभावित है।

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प्रश्न 2.
कहानी का शीर्षक ‘नीरा’ कितना सार्थक है?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘नीरा’ कहानी अभावग्रस्त मध्यमवर्गीय परिवार की व्यथा कथा है।

इस कहानी की मुख्य पात्र नीरा है। नीरा मातृविहीन एक बूढ़े की पुत्री है। उसकी माँ का निधन बचपन में ही हो गया था। उसका बूढ़ा पिता अभावग्रस्त होते हुए भी जागरूक है। उसे जीवन के कटु अनुभव हैं। अतः हर पल नीरा के बूढ़े बाबा को अपनी पुत्री की सुरक्षा का भय रहता है। बूढ़े को लगता है कि मेरे मरने के बाद कहीं मेरी पुत्री किसी अत्याचारी के हाथ पड़कर नष्ट न हो जाये।

यद्यपि उसका बूढ़ा बाबा मरणासन्न है लेकिन पुत्री के लिए व्याकुल है। उसकी पुत्री निरन्तर अपने पिता को सांत्वना देती रहती है कि “बाबा, तुम मेरी चिन्ता न करो भगवान मेरी रक्षा करेंगे।”

इसी मध्य देवनिवास ने नीरा के पिता से विवाह का प्रस्ताव रखा और कहा, “यदि तुम्हें ………. इस बात को सुनकर वृद्ध बाबा का हृदय पुलकित हो गया।

उसने अपने दोनों हाथ देवनिवास और नीरा पर फैलाकर रखते हुए कहा-“हे मेरे भगवान।” इस प्रकार हम देखते हैं कि समस्त कहानी का केन्द्र बिन्दु नीरा है। कहानी का ताना-बाना नीरा पर ही आधारित है।

नीरा के प्रणय बँधन में बँधने के पश्चात् कहानी का समापन हो जाता है। कहानी में ऐसा कोई स्थल नहीं है जहाँ नीरा दृष्टिगोचर न होती हो। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि नीरा प्रस्तुत कहानी का शीर्षक सटीक एवं सार्थक है।

प्रश्न 3.
देवनिवास या बूढ़े बाबा नीरा के पिता के चरित्र के आधार पर सिद्ध कीजिए कि यह कहानी अपने पात्रों के चरित्र-चित्रण में सफल रही है?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित ‘नीरा’ नामक कहानी सामाजिक एवं चरित्र-चित्रण की दृष्टि से एक सफल कहानी है। कहानी में पात्रों की संख्या सीमित होते हुए भी कहानीकार ने उनके चरित्र-चित्रण में अभूतपूर्व सफलता पायी है।

कहानी के पात्र जीवन्त एवं यथार्थता के धरातल पर प्रतिष्ठित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक का मुख्य उद्देश्य पाठकों के हृदय में ईश्वर के प्रति आस्था उत्पन्न करना है, क्योंकि कहानी का मुख्य पात्र बूढ़ा बाबा प्रारम्भ में नास्तिक विचारों वाला दिखाया गया है। देवनिवास एवं अमरनाथ दोनों ही उस वृद्ध व्यक्ति को विभिन्न तर्कों द्वारा ईश्वर के प्रति विश्वास करने को कहते हैं। लेकिन बूढ़े के विचार तनिक भी परिवर्तित नहीं होते।

संयोगवश देवनिवास का साधारण कथन बूढ़े व्यक्ति की विचारधारा को बदल देता है और ईश्वर में आस्था जगा देता है। बाबा अपने जीवन के प्रति उदासीन है। कहानी में देवनिवास, बूढ़े बाबा एवं नीरा प्रमुख पात्र हैं। गौण रूप में अमरनाथ हैं। इस कहानी में समस्त पात्रों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कहानीकार ने प्रमुख रूप से यह बताने का प्रयास किया है कि “जो जस करिय तो तस फल चाखा”।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बूढ़ा बाबा नास्तिक था लेकिन कहानीकार ने उसे ईश्वर के प्रति आस्था रखने के लिए प्रेरित किया। कहानीकार अपने इस उद्देश्य में पूर्णतः सफल हुआ है।

आज भी बूढ़े बाबा का चरित्र पाठक के स्मृति पटल पर छा जाता है। देवनिवास ईश्वर के प्रति आस्था रखने वाला व्यक्ति है। वह दूसरों के कष्टों में भाग लेकर अपनी सहृदयता का परिचय देने वाला है।

बूढ़े बाबा की लाचारी को देखकर उसने जो नीरा के साथ विवाह करने का प्रस्ताव रखा वह उसके उज्ज्वल चरित का द्योतक है।

अमरनाथ ईश्वर के प्रति आस्थावान है। लेकिन वह बूढ़े बाबा की नास्तिक विचारधारा को परिवर्तित करने में असमर्थ है। इस कारण वह बूढ़े के प्रति आक्रोश व्यक्त करता है जो उसकी संकुचित मानसिकता का प्रतीक है।

अन्त में कहा जा सकता है कि जयशंकर प्रसाद ने मानव को ईश्वर के प्रति सदैव आस्थावान रहने की प्रेरणा दी है। चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियाँ आयें, व्यक्ति को ईश्वर के प्रति आस्था नहीं त्यागनी चाहिए। इस प्रकार कहानी चरित्र-चित्रण की दृष्टि से सफल एवं प्रेरणादायक है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) सुख और सम्पत्ति ………………….. ठुकराता नहीं।
(2) जैसे एक साधारण ……………….. कराना चाहते हो।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक की ‘नीरा’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक ‘जयशंकर प्रसाद’ हैं।

प्रसंग :
अमरनाथ एवं देवनिवास इस तथ्य को स्पष्ट कर रहे हैं कि अत्यधिक निर्धनता के फलस्वरूप मानव ईश्वर के प्रति अविश्वासी हो जाता है।

व्याख्या :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने इस तथ्य को दर्शाने का प्रयास किया है कि मानव यदि निरन्तर कष्ट भोगता रहे तो उसका ईश्वर के प्रति विश्वास कम होने लगता है। वह अपने समस्त कष्टों को उत्तरदायी ईश्वर को ठहराता है। भगवान सर्वव्यापी हैं, वह प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं, उनकी दृष्टि में मानव-मानव में तनिक भी भेद नहीं है। जब मानव दु:ख के झंझावातों से निराश होने लगता है तो ऐसी दशा में भगवान मानव को कभी दुत्कारता नहीं, ठुकराता नहीं और न प्रताड़ित करता है। मानव को प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर के प्रति अनन्य निष्ठा रखनी चाहिए, जीवन में सुख-दुःख का चक्र तो निरन्तर चलता ही रहता है।

(2) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि विपत्तियों के फलस्वरूप बूढ़े बाबा की ईश्वर के प्रति आस्था नहीं रही।

व्याख्या :
देव निवास ने कहा जिस प्रकार एक आलोचक हर लेखक से अपने मनोनुकूल कहानी कहलवाने का आकांक्षी रहता है तथा इस बात का भरसक प्रयास करता है कि मैं जिस प्रकार की भावना रखता हूँ तदनुरूप अन्य व्यक्ति भी उसी के अनुकूल चलें।

बूढ़े बाबा भी भगवान् से अपने जीवन में घटित होने वाली घटनाओं, सुख-दुःख के झंझावातों एवं अपनी मनोव्यथा को ईश्वर के माध्यम से सुख और शान्ति में परिवर्तित देखने के इच्छुक हैं।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्ति का भाव पल्लवन कीजिएआलोक एक उज्ज्वल सत्य है। (2008)
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति का भाव है कि जीवन की सत्यता उसी प्रकार है जैसे कि प्रकाश में प्रत्येक वस्तु अच्छी हो अथवा बुरी, स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। लेखक ने अपनी इस पंक्ति द्वारा नीरा की दरिद्रता का परिचय दिया है। नीरा अपनी दरिद्रता को किसी भी प्रकार प्रकट नहीं करना चाहती है लेकिन रूखी रोटी मुख में नहीं प्रवेश कर पा रही है फिर भी उसको चबाने का प्रयास कर रही थी। “टीन का गिलास अपने खुरदरे रंग का नीलापन नीरा की आँखों में उड़ेल रहा था।”

अर्थात् उस गिलास में नीरा के जीवन की सत्यता उजागर हो रही थी जिसे नीरा संकोचवश व्यक्त नहीं करना चाहती थी।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आलोक (प्रकाश) जीवन का एक ऐसा सत्य है जिसको व्यक्ति किसी भी भाँति छिपा नहीं सकता है। जैसे प्रकाश के सम्पर्क में आने पर सभी पदार्थ स्पष्टरूपेण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। तद्नुरूप वास्तविकता के ऊपर पड़ा हुआ पर्दा कभी न कभी हट ही जाता है जो वस्तुओं की यथार्थता को स्पष्ट करता है।

प्रश्न 6.
“जो काम देवनिवास अपने तर्कों से नहीं कर सका उसे उसके कर्म ने सम्भव बना दिया।” बूढ़े बाबा के नास्तिक से आस्तिक बनने के घटनाक्रम को दृष्टिगत रखते हुए कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन का भाव है कि निरन्तर प्रयत्न करने के उपरान्त व्यक्ति को कभी न कभी सफलता प्राप्त होती है। अतः व्यक्ति को निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए।

बूढ़ा बाबा नास्तिक था। उसे ईश्वर के प्रति तनिक भी आस्था और विश्वास न था। देवनिवास प्रतिदिन बूढ़े बाबा को विभिन्न प्रकार से ईश्वर के प्रति आस्था रखने के लिए प्रेरित करता रहता था। बूढ़े के मन पर उसके तर्कों का नाममात्र को भी प्रभाव नहीं पड़ता था। लेकिन देवनिवास हताश नहीं हुआ। एक दिन अचानक ही बूढ़े बाबा के समक्ष नीरा से विवाह का प्रस्ताव रखकर देवनिवास ने बूढ़े बाबा के हृदय में ईश्वर के प्रति निष्ठा उत्पन्न कर दी। अन्त में बूढ़े बाबा ईश्वर की सत्ता के प्रति नतमस्तक हो गये। क्योंकि बूढ़े बाबा को पुत्री के विवाह की चिन्ता आकुल-व्याकुल करती रहती थी। उन्हें कदापि देवनिवास से ऐसी उम्मीद न थी। इसी कारण बूढ़े बाबा को देवनिवास के कर्म ने नास्तिक से आस्तिक बना दिया।

नीरा भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों को वाक्य में प्रयोग कीजिएढोंग रचना, बिजली कौंधना, दाँत किटकिटाना, चौंक उठना, सुख की नींद सोना।
उत्तर:

  1. ढोंग रचना-आजकल साधु-सन्त ढोंग रचकर भोली-भाली जनता को मूर्ख बनाते हैं।
  2. बिजली कौंधना-उसका झूठ पकड़े जाने पर उसके शरीर में बिजली कौंध गयी।
  3. दाँत किटकिटाना-व्यर्थ में दाँत किटकिटाने से क्या लाभ है? कुछ करके दिखाओ तो जानें।
  4. चौंक उठना-बोर्ड की परीक्षा में आकाश ने सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया इसको देख सभी चौंक उठे।
  5. सुख की नींद सोना-बेटी के विवाह के पश्चात् माता-पिता सुख की नींद सोते हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों में यथास्थान विराम चिह्नों का प्रयोग कीजिए
(अ) क्षमा मैं करूँ अरे आप क्या कह रहे हैं।
(ब) नहीं-नहीं बाबूजी मुझे यह कहने का अधिकार नहीं। मैं हूँ अभागा हाय रे भाग।
उत्तर:
(अ) क्षमा मैं करूँ? अरे ! आप क्या कह रहे हैं?
(ब) नहीं-नहीं बाबूजी, मुझे यह कहने का अधिकार नहीं, मैं हूँ अभागा ! हाय रे भाग !

प्रश्न 3.
प्रस्तुत पाठ में निम्नलिखित द्विरुक्ति वाले शब्दों का प्रयोग हुआ है। उनमें से यह शब्द किस प्रकार की द्विरुक्ति के अन्तर्गत आते हैं। लिखिए।
गिरते-गिरते, खड़े-खड़े, कुछ न कुछ, कभी-कभी, कौन-कौन, ठीक-ठीक, मन ही मन, दूर-दूर, धीरे-धीरे, कहते-कहते।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 5 नीरा img-1

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए।
उत्तर:
(क) जो ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास न रखता हो – नास्तिक।
(ख) जो विश्वास करने योग्य न हो – अविश्वसनीय।
(ग) किए गये उपकार को मानने वाला – कृतज्ञ।
(घ) तर्क से सम्बन्धित – तार्किक।
(ङ) जो क्षमा करने योग्य न हो – अक्षम्य।

नीरा पाठ का सारांश

प्रस्तुत कहानी अभावग्रस्त जीवन एवं आस्था के मध्य संघर्षों से जूझते हुए पात्र के हृदय में प्रच्छन्न व्यथा की मार्मिक घटना है। जीवन का अभाव व्यक्ति विशेष को ईश्वर के अस्तित्व के प्रति दुविधा में डाल देता है। सब तरफ से निराश होकर मानव ईश्वर को ही कष्टों के लिए सर्वे सर्वा ठहराकर आस्तिकता की ओर कदम बढ़ाता है।

नीरा बूढ़े बाबा की मातृहीन बेटी है। निर्धन होने के फलस्वरूप नीरा के विवाह के लिए बूढ़ा बाबा अत्यन्त ही व्याकुल है। अमरनाथ को बूढ़े बाबा की नास्तिकता से चिढ़ है, लेकिन देवनिवास एवं नीरा को उससे सहानुभूति है। देवनिवास बूढ़े के कष्टों से द्रवीभूत होकर उसके पास जाकर नीरा के साथ विवाह का प्रस्ताव रखता है। देवनिवास का यह साधारण किन्तु यथार्थ कर्म बूढ़े बाबा की मानसिकता को परिवर्तित कर देता है। बूढ़े बाबा के मन में ईश्वर के प्रति अनायास ही आस्था उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार परिस्थितियाँ जगतनियन्ता के समक्ष व्यक्ति को नास्तिक से आस्तिकता की ओर उन्मुख करती हैं।

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नीरा कठिन शब्दार्थ 

विरक्त= वैराग्य। दर्बल = कमजोर। चिथडे = फटे कपड़े। अडियल = हठीला, जिद्दी। मसखरा = मजाकिया, हसोड़। उज्ज्वल आलोक = चमकता हुआ प्रकाश। आत्मविस्मृत = सुध-बुध न रहना, अपने को भूल जाना। स्मरण = याद। अनिच्छापूर्वक = बिना इच्छा के। मनोयोग = मन से। मलिना = मैली। उत्कण्ठा = उत्सुकता। मुखाकृति = मुख की आकृति, रूपरंग, चेहरे के भाव। मॉरिशस = हिन्द महासागर में एक द्वीप। दरिद्रता = निर्धनता। उलाहनों = उपालम्भ। अवलम्बन = सहारा। उत्कण्ठा = इच्छा, लालसा। नास्तिक = ईश्वर को न मानने वाला। तार्किक = तर्क के योग्य। चरायँध = दुर्गन्ध, जलते हुए शरीर से निकलने वाली गन्ध। हताश = निराश। ऐश्वर्यशाली = धनवान, ऐश्वर्य वाला। सर्वत्र = चारों ओर। मनोनुकूल = मन के अनुरूप। सृष्टिकर्ता = सृष्टि का निर्माण करने वाला। तत्काल = शीघ्र। प्रणत = प्रणाम करने को झुकना। आतिथ्य = आवभगत, सत्कार। वैभव = ऐश्वर्य। अच्छी युक्तियाँ = अच्छे तर्क, उचित विचार। जीर्ण = पुराने। पुआल = धान का चारा, डण्ठल। अभिमान = घमण्ड। धारणा = मान्यता। उच्छृखल = बन्धन न मानने वाला। अन्तरात्मा = अन्त:करण। पुलकित = आनन्दित, हर्ष विह्वल, प्रसन्नचित्त। विनीत = विनम्र।

नीरा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. सुख और सम्पत्ति में क्या ईश्वर का विश्वास अधिक होने लगता है? क्या मनुष्य ईश्वर को पहचान लेता है? उसकी व्यापक सत्ता को मलिन वेश में देखकर दुरदुराता ‘ नहीं, ठुकराता नहीं। (2009)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक की ‘नीरा’ नामक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक ‘जयशंकर प्रसाद’ हैं।

प्रसंग :
अमरनाथ एवं देवनिवास इस तथ्य को स्पष्ट कर रहे हैं कि अत्यधिक निर्धनता के फलस्वरूप मानव ईश्वर के प्रति अविश्वासी हो जाता है।

व्याख्या :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने इस तथ्य को दर्शाने का प्रयास किया है कि मानव यदि निरन्तर कष्ट भोगता रहे तो उसका ईश्वर के प्रति विश्वास कम होने लगता है। वह अपने समस्त कष्टों को उत्तरदायी ईश्वर को ठहराता है। भगवान सर्वव्यापी हैं, वह प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं, उनकी दृष्टि में मानव-मानव में तनिक भी भेद नहीं है। जब मानव दु:ख के झंझावातों से निराश होने लगता है तो ऐसी दशा में भगवान मानव को कभी दुत्कारता नहीं, ठुकराता नहीं और न प्रताड़ित करता है। मानव को प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर के प्रति अनन्य निष्ठा रखनी चाहिए, जीवन में सुख-दुःख का चक्र तो निरन्तर चलता ही रहता है।

विशेष :

  1. भाषा सरल, बोधगम्य एवं प्रभावपूर्ण है।
  2. साधारण बोलचाल के शब्दों दुरदुराता, ठुकराता आदि का प्रसंगानुकूल प्रयोग है।

2. जैसे एक साधारण आलोचक प्रत्येक लेखक से अपनी मन की कहानी कहलाना चाहता है और हठ करता है कि नहीं यहाँ तो ऐसा नहीं होना चाहिए था, ठीक उसी तरह तुम सृष्टिकर्ता से अपने जीवन की घटनावली अपने मनोनुकूल सही कराना चाहते हो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि विपत्तियों के फलस्वरूप बूढ़े बाबा की ईश्वर के प्रति आस्था नहीं रही।

व्याख्या :
देव निवास ने कहा जिस प्रकार एक आलोचक हर लेखक से अपने मनोनुकूल कहानी कहलवाने का आकांक्षी रहता है तथा इस बात का भरसक प्रयास करता है कि मैं जिस प्रकार की भावना रखता हूँ तदनुरूप अन्य व्यक्ति भी उसी के अनुकूल चलें।

बूढ़े बाबा भी भगवान् से अपने जीवन में घटित होने वाली घटनाओं, सुख-दुःख के झंझावातों एवं अपनी मनोव्यथा को ईश्वर के माध्यम से सुख और शान्ति में परिवर्तित देखने के इच्छुक हैं।

विशेष :

  1. भाषा परिमार्जित, सरल एवं बोधगम्य है।
  2. शैली विषयानुरूप है।

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3. इसके बाद मेरी वह सब उद्दण्डता तो नष्ट हो गई थी, जीवन की पूँजी जो मेरा निज का अभिमान था-वह भी चूर-चूर हो गया था। मैं नीरा को लेकर भारत के लिए चल पड़ा। तब एक तो मैं ईश्वर के सम्बन्ध में एक उदासीन नास्तिक था, किन्तु इस दुःख ने मुझे विद्रोही बना दिया। मैं अपने कष्टों का कारण ईश्वर को ही समझने लगा और मेरे मन में यह बात जम गई कि यह मुझे दण्ड दिया गया है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में जयशंकर प्रसाद ने बूढ़े बाबा की पत्नी ‘कुलसम’ की मृत्यु के पश्चात् उसके जीवन में होने वाले परिवर्तन का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
बूढ़े बाबा का कथन है कि पत्नी की मृत्यु के पूर्व वह एक मस्त-मौला प्रवृत्ति का घमण्डी मानव था। लेकिन पत्नी की मृत्यु ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसके पश्चात् बूढ़े बाबा की उच्छृखलता समाप्त हो गयी। गाढ़ी कमाई तो बरे व्यसनों में नष्ट हो गयी। लेकिन जीवन की वास्तविक पूँजी जो उसकी धर्मपत्नी थी वह भी मौत की गोद में सो गयी। वही मेरे जीवन की यथार्थ पूँजी थी। इसके पश्चात् मेरा घमण्ड नष्ट हो गया। मैं अपनी बेटी नीरा को लेकर भारत आ गया। उस समय तक मैं घोर नास्तिक था, विपत्तियों ने मुझे विद्रोही बना दिया। बूढ़ा बाबा अपने समस्त कष्टों का मूल कारण ईश्वर को ठहराता है और उसके मन में यह बात गहरे रूप से बैठ चुकी है कि शायद मुझे भगवान ने यह सारी मुसीबतें दण्ड स्वरूप प्रदान की हैं।

विशेष :

  1. भाषा, सरल, सहज एवं विषयानुरूप है।
  2. मुहावरों का प्रयोग है-चूर-चूर होना, बात जमाना।
  3. व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्था रखनी चाहिए।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

धूपगढ़ की सुबह साँझ अभ्यास

धूपगढ़ की सुबह साँझ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धूपगढ़ कहाँ स्थित है?
उत्तर:
धूपगढ़ प्रसिद्ध पचमढ़ी पर स्थित है।

प्रश्न 2.
प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
लेखक ने प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ मानी हैं-सुबह और साँझ।

प्रश्न 3.
सतपुड़ा का गौरव किसे कहा गया है? (2017)
उत्तर:
धूपगढ़ को सतपुड़ा का गौरव कहा गया है।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने सुबह और साँझ की तुलना माता-पिता के किन गुणों से की है?
उत्तर:
लेखक ने सुबह की तुलना पिता की प्रेरणा और शक्ति सम्पन्नता से की है तथा माता की ममता की तुलना साँझ की सहृदयता से की है।

प्रश्न 2.
साँझ की आँखों में करुणा क्यों उभर आती है?
उत्तर:
वनवासी की पगड़ी पर एवं वनवासी स्त्री की चूनर पर फूल संध्या के समय गिर जाते हैं। इससे साँझ की आँखें करुणा से द्रवित हो जाती हैं।

प्रश्न 3.
सुबह और साँझ की परस्पर तुलना क्यों अनुचित है?
उत्तर:
सुबह और साँझ की तुलना परस्पर अनुचित इसलिए है क्योंकि सुबह और साँझ दोनों की दुनिया अलग-अलग है, दोनों का अपना-अपना महत्व और सम्मोहन है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने प्रातःकालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना किन-किन बातों से की
उत्तर:
लेखक ने प्रात:कालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना विभिन्न प्राकृतिक उपमानों के माध्यम से की है-जिस प्रकार रोली से स्नात कलश को किरण से युक्त अल्पना पर रख दिया हो या किसी बड़े कुम्हार ने लाल मिट्टी का घड़ा अँधेरी सड़क पर प्यास से व्याकुल मानव की प्यास को बुझाने के लिए भर दिया हो। इसके अतिरिक्त जितने भी सेवा में व्यस्त मनुष्य हैं उनकी निस्वार्थ भावना युक्त सोने की कलश की चमक से तुलना की है।

प्रश्न 2.
तमतमाते दिवस की अवसान बेला कैसी है?
उत्तर:
तमतमाते दिवस की अवसान बेला में एक विशेष प्रकार का परिवर्तन आ जाता है। उसका प्रमुख कारण है कि इस बेला में सब कुछ शान्त हो जाता है। वनस्पति शान्त है, पक्षी भी शान्त हैं। सांसारिक झमेले भी शान्त हैं। आसमान की नीलिमा भी शान्त है। कभी न थकने वाले पक्षियों की उड़ान भी शान्त है क्योंकि वे संध्या काल में अपने नीड़ में विश्राम करते हैं। इसी कारण उनकी तीव्रगामी गति शान्त है। प्रकम्पित ध्वनियाँ शान्त हैं। उसका कारण है कि इस बेला में चारों ओर का कोलाहल शान्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
लेखक सुबह और साँझ के माध्यम से क्या कहना चाहता है? (2008, 09)
उत्तर:
लेखक ने सुबह और साँझ के माध्यम से जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन किया है। इसमें जीवन, मृत्यु, सुख, दु:ख और आदि-अंत तथा विभिन्न प्रकार के उतार-चढ़ाव के द्वारा जीवन के काल चक्र को दर्शाया है।।

सुबह और साँझ एक-दूसरे के विपरीत नहीं है अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। पिता की तुलना एवं माता की तुलना लेखक ने सुबह और साँझ से की है और यह बताने का प्रयास किया है कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों को सहृदय व स्नेह द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं तदनुकूल सुबह और साँझ मानव को जीवन पथ पर अग्रसर होने का पाठ पढ़ाते हैं। साथ ही सन्देश देते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति को धैर्य से बढ़ते रहना चाहिए।

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प्रश्न 4.
लेखक की भाषा अलंकारिक तथा शैली ललित है। उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की अलंकारिक भाषा का उदाहरण निम्नवत् है-
(1) वैसे तो कई सुबहों और साँझों का प्रकाश भीगी-पलकों ने उठते-गिरते देखा है परन्तु उन साँझों में एक साँझ यादों के वृक्ष पर फल की तरह लगी हुई है। धूपगढ़ की साँझ का रूप, रंग, आकार, रस सब कुछ निराकार बनकर अंतरिक्ष में फैला हुआ है। पंचमढ़ी, पर्वतों की रानी कही जाती है। सतपुड़ा का सारा निसर्गगत सौन्दर्य पचमढ़ी की गोदी में झूल रहा है।

(2) लेखक की भाषा शैली का अनुपम उदाहरण द्रष्टव्य है-प्राची के हिरण्य गर्भ से बालारूण की जन्म बेला की प्रतीक्षा में विश्व मोहिनी शक्ति जैसे जाग गई हो। क्षितिज पर पतली-सी रेखा उभरती है और बालक की किलकारी दिशाओं तक फैल जाती है। पक्षी उसी किलक को अपने स्वरों में भरकर आकाश को जाते हैं। क्षितिज पर भुवन भास्कर की पहली रेखा जैसे किसी बालक ने पूरब की स्लेट पर स्वर्णिम पेन से लकीर खींच दी हो; जिसका बीच का भाग ऊपर की ओर हल्का-सा उठा हुआ है। जैसे अंधेरे के महासमुद्र में आती हुई ऊषा का जल सतह पर सुनहरे रंग का केशबंध’ (हेयर बैंड) दिखाई दे रहा है।

(3) अन्य उदाहरण देखिए-यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंसक पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येत्तर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। उपर्युक्त उदाहरणों द्वारा भाषा की अलंकारिकता एवं शैली की विशेषता अवलोकनीय है।

प्रश्न 5.
इन गद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) गगन से सूर्योदय ……………. विरला ही पहुँचता है।
(2) धूपगढ़ की साँझ…………….. सुला लेती है।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

(2) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

प्रश्न 6.
(क) प्रकृति सुख-दुःख से परे है। वह नियंता है।
(ख) जन्म और मृत्यु प्रकृति के लिए दो सहज स्थितियाँ हैं।
(ग) सुख के केन्द्र में स्वतन्त्रता और उन्मुक्तता होती है।
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव पल्लवन कीजिए।
उत्तर:
(क) लेखक ने इस पंक्ति द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि प्रकृति पर दुःख हो अथवा सुख, किसी भी प्रकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। प्रकृति नियंता एवं वीतराग है। वह भौतिक सुख-दुःख से परे रहकर विश्व का नियन्त्रण करती है। उसी के निर्देशन में परिवर्तन के दृश्य उपस्थित होते रहते हैं। प्रकृति पर विषम से विषम परिस्थितियाँ तनिक भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकतीं।

(ख) लेखक का कथन है कि इस धरती पर प्रकृति के माध्यम से निरन्तर जन्म और मृत्यु चक्र चलता ही रहता है। इनसे किसी को भी मुक्ति नहीं मिल सकती है। लेखक ने यहाँ गीता के इस तथ्य को उजागर किया है जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु निश्चित है तथा मृत्यु के पश्चात् पुनः जन्म होता है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नवीन वस्त्र धारण करता है। तद्नुरूप आत्मा पुराना काया रूपी वस्त्र उतारकर नया कायारूपी वस्त्र धारण करती है।

(ग) लेखक का कथन है धूपगढ़ वन क्षेत्र में रहने वाले मानव अभावों एवं गरीबी से त्रस्त हैं। वे इन अभावों के अन्तर्गत एक असीम सुख का अनुभव करते हैं। यद्यपि वे सांसारिक दृष्टि से कंगाल हैं लेकिन प्रकृति की गोद में पल कर एक अनिवर्चनीय सुख का अनुभव करते हैं। उनका सुख किसी के माध्यम से प्राप्त न होकर प्रकृति की निकटता का परिणाम है। वे स्वयं को पराधीन न मानकर स्वतन्त्र भाव से वन की धरती पर विचरण करते हैं।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय और उपसर्ग छाँटकर लिखिए
प्रस्थान, मनुष्यता, उन्मुक्तता, उज्ज्वल, तन्मयता, अविजित, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उत्तर:
प्रत्यय-मनुष्यता, उन्मुक्तता, तन्यता, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उपसर्ग : प्रस्थान, उज्ज्वल, अविजित।

प्रश्न 2.
निम्न शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
सुबह, साँझ, गाँव, पाँव, आँच।
उत्तर:
प्रातः, संध्या, ग्राम, पाद, अग्नि।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
उत्तर:

  1. जहाँ जाया न जा सके – अगम्य
  2. जिसकी उपमा न हो – अनुपमेय
  3. जिसे पढ़ा न हो – अपठित
  4. काँटों से भरा हुआ – कंटकाकीर्ण
  5. आकाश को छूने वाला – गगनचुम्बी
  6. सदा हरने वाला – अमर।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्य में विराम चिह्नों का यथास्थान प्रयोग कीजिए-
यह साँझ पृथ्वी को अमृत सोम शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है
उत्तर:
यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ पाठ का सारांश

पंचमढ़ी स्थित धूपगढ़ सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की सर्वाधिक ऊँची चोटी है। सूर्य के निकलने एवं अस्त होने के समय नेत्रों एवं मन को लुभाने वाले दृश्यों की शोभा देखते ही बनती है। पर्यटक इन्हें देखते-देखते अघाते नहीं हैं। डॉ. श्रीराम परिहार ने अपने निबन्ध में धूपगढ़ की -प्रातः एवं साँझ बेला का छायावादी चित्रण अंकित किया है। प्रकृति का मानवीकरण सटीक एवं जीवन्त है। सुबह एवं शाम के प्रतीकों के द्वारा जिन्दगी, मृत्यु, विषाद एवं सुख आदि कालचक्र का ऐसा गतिशील विवेचन किया है जो जीवन की वास्तविकता को हमारे नेत्रों के समक्ष उपस्थित करने में सक्षम है। वनवासियों के संकटग्रस्त जीवन का भी वर्णन किया है। पशुओं एवं वन प्रदेश का भी चित्रण किया है। प्रातः एवं सन्ध्या के माध्यम से जिन्दगी के संघर्ष एवं शान्ति के तालमेल को भी अंकित किया है। निबन्ध में जिन्दगी का राग गुञ्जित है। आत्मा का वैराग्य भी ध्वनित है। सुबह-शाम एक-दूसरे के विरोधी न होकर जीवन के संदेशप्रद हैं।

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धूपगढ़ की सुबह साँझ कठिन शब्दार्थ

सुगन्ध = खुशबू। साँझ = सायंकाल। वर्ण रंग। अदृश्य = जो दिखायी न दे। दिक्काल = दिशाओं के स्वामी। उद्गम = निकलने का स्थान। क्षितिज = जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले हुए दिखाई देते हैं। पखेरुओं = पक्षियों। कर्मपूर्णता = काम के पूरा होने का भाव। अग्निमय = आग से भरा हुआ। शक्ति सम्पन्नता = शक्ति से युक्त। हृदय रसज्ञता = हृदय के रस को जानने की क्षमता। भोर तक = प्रात:काल तक। भीगी पलकों = आँसुओं से गीली पलकें। अंतरिक्ष = आकाश। निसर्गगत सौन्दर्य = प्राकृतिक सुन्दरता। पाग = पगड़ी। निशिवासर = रात-दिन। सान्निध्य = सम्पर्क। ब्रह्ममुहूर्त = प्रात:काल। वन वल्लरियों = लताओं। प्राची = पूर्व। हिरण्य-गर्भ = स्वर्ण या सोने की कोख। बालारुण = प्रात:कालीन सूर्य। स्वर्णिम = सोने के। ऊषा = प्रात:काल। महानिलय = आकाश। तृषा = तृप्ति, प्यास बुझाने के लिए। निष्कलुष = पवित्र। गोरिक वसना = गेरुए वस्त्र धारण करने वाली। नील-कुसुमित = नीले पुष्प के रूप में खिलना, नीलकलिका। माधवी लता = माधवी पुष्प की लता। प्रातिभ = प्रात:कालीन सूर्य की लाली। देहयष्टि = शरीर सौष्ठव। अल्हड़ ठवनि = चंचलमुद्रा। नूपुरों = घुघरुओं। कर्ण आह्लादन = कानों में खुशी उत्पन्न करने वाली। सारस्वत = ज्ञानमयी, बौद्धिक। पूर्वपीठिका = पहली भूमिका। तिमिर = अन्धकार। अनुताप-पूरित = दुःख से भरा हुआ। दिवस = दिन। प्राण बल्लभा = प्रेयसी, प्रियतमा। मलयज चीर = सुगन्धित वस्त्र, मलय चन्दन गन्ध से सुगंधित। मृग मरीचिका = मृगतृष्णा, मिथ्या प्रतीति। भास्वर = प्रकाशवान। उत्पुल्ल = प्रसन्न। सारसवर्णी = सारस के रंग वाली। साँसोच्छेदन = साँसों को समाप्त करना। अहेतुक = निस्वार्थ, स्वार्थ हीन। वात्सल्य = सन्तान के प्रति माता-पिता का प्रेम। स्लथ = बकी। शुभ्र = श्वेत, स्वच्छ।

धूपगढ़ की सुबह साँझ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. गगन से सूर्योदय के प्रकाश का अमृत झरता है। किरणें फूटती हैं और रश्मि-सेतु सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक बन जाता है। इसे देखना अच्छा लगता है। इस रश्मि सेतु पर चलकर सूर्य तक कोई विरला ही पहुँचता है। (2015)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

विशेष :

  1. प्रकृति का मानवीकरण है।
  2. प्रात: बेला की मनोरम झाँकी है।
  3. शैली अलंकारिक एवं परिमार्जित है।

2. धूपगढ़ की सुबह देखी है, साँझ भी देखी है। दोनों में किसका सौन्दर्य ज्यादा है? किसका रंग घना है? किसका प्रभाव गहरा है? नहीं कह सकते। यह तुलना भी अनुचित है। सुबह, सुबह है। साँझ, साँझ है। दोनों की अपनी दुनिया है। अपनी महिमा है। अपना सम्मोहन है। सामान्यतः सुबह और साँझ अपने प्राकृतिक चक्र के कारण सहज रूप में आती जाती हैं। इनके होने में प्रकृति की इच्छा ही अभिव्यक्त होती है। (2016)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में सुबह और साँझ दोनों के स्वाभाविक महत्व को समझाया गया है।

व्याख्या :
धूपगढ़, प्राकृतिक सौन्दर्य का भण्डार है। यहाँ की सुबह और साँझ बहुत ही रोमांचकारी होती है। यहाँ की सुबह और साँझ दोनों की सुन्दरता को देखा है। दोनों का सौन्दर्य अद्भुत है। यह कहना सम्भव नहीं है कि इनमें किसकी सुन्दरता अधिक है। किसका रंग घना प्रभावी है अथवा किसकी प्रभावशीलता गहन है। इन दोनों की सुन्दरता की तुलना करना भी उचित नहीं है। सुबह का सौन्दर्य सुबह का है और साँझ की सुन्दरता साँझ की है। इन दोनों का संसार अपना-अपना है। इनका गौरव, महत्व एवं मोहकता भी अपनी-अपनी है। वास्तविकता यह है कि सुबह और साँझ प्रकृति के चक्र के कारण स्वाभाविक रूप से आती हैं और चली जाती हैं। ध्यान से देखें तो इन दोनों के सम्पादन में प्रकृति की मनोकामना ही व्यक्त होती प्रतीत होती है।

विशेष :

  1. सुबह और साँझ के आवागमन की स्वाभाविकता का सटीक अंकन हुआ है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. काव्यमयी आलंकारिक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

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3. यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंस्त्र पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येतर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं, तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। (2012)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

विशेष :

  1. संध्या के समय होने वाली गतिविधियों का रोचक वर्णन हुआ है।
  2. लाक्षणिक भाषा तथा रोचक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 3 जननी जन्मभूमिश्च

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 3 जननी जन्मभूमिश्च

जननी जन्मभूमिश्च अभ्यास

जननी जन्मभूमिश्च अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“गंगा और गंगा के कछार को मेरा सलाम कहें” यह कथन लेखक से किसने कहा?
उत्तर:
गंगा और गंगा के कछार को मेरा सलाम कहें; यह कथन लेखक से बनारस के रहने वाले एक व्यक्ति ने कराची में कहा।

प्रश्न 2.
जननी और जन्मभूमि किससे अधिक श्रेष्ठ है? (2009, 6)
उत्तर:
जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है।

प्रश्न 3.
आजादी की लड़ाई में ‘बड़े घर’ से आशय था? सही उत्तर लिखिए।
(अ) महल
(ब) जेलखाना
(स) बहुत बड़ी हवेली
(द) विशाल मकान।
उत्तर:
(ब) जेलखाना।

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जननी जन्मभूमिश्च लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मातृभूमि और स्वर्ग में क्या अन्तर है?
उत्तर:
मातृभूमि स्वर्ग से श्रेष्ठ होती है। मातृभूमि की गोद में हमारा लालन-पालन होता है। जिस प्रकार मानव अपनी माँ के कर्ज से उऋण नहीं हो सकता, तद्नुरूप अपनी मातृभूमि से भी उऋण नहीं हो सकता।

प्रश्न 2.
फूल की कामना क्या है?
उत्तर:
फूल की एक प्रबल कामना थी कि हे माली ! तुम मुझे तोड़ने के पश्चात् उस पथ पर फेंक देना जिस पथ से मातृभूमि के हितार्थ अपने प्राण प्रसूनों को अर्पित करने वाले शहीद गुजरते हैं।

प्रश्न 3.
गाय के दूध से माँ के दूध की तुलना क्यों नहीं की जा सकती? (2014, 17)
उत्तर:
गाय के दूध की तुलना माँ के दूध से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि गाय का दूध यत्र-तत्र सर्वत्र बाजार-हाट में उपलब्ध होता है। इसको व्यक्ति धन देकर खरीद सकता है। लेकिन माँ का दूध मूल्यवान है, कोई भी इसका मूल्य चुकता नहीं कर सकता।

प्रश्न 4.
लेखक ने अपने भारतीय हमवतन के चार सौ साल स्वर्ग को किस सुख पर हजार बार न्यौछावर किया है?
उत्तर:
लेखक ने अपने भारतीय हमवतन के चार सौ साल के स्वर्ग को मातृभूमि के सुख पर हजार बार न्यौछावर किया है, क्योंकि मातृभूमि के समान सुख एवं अपनत्व अन्यत्र प्राप्त होना दुर्लभ है।

जननी जन्मभूमिश्च दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जन्मभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्र प्रेम में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर:
जन्मभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्र प्रेम में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। उसका प्रमुख कारण है कि जो व्यक्ति जन्मभूमि के प्रति प्रेम व आस्था रखता है तथा मानव मूल्यों को समझता है वही व्यक्ति राष्ट्रीय दायित्व का भली प्रकार निर्वाह कर सकता है। मानव को अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है और तभी देशभक्ति का सही अर्थ चरितार्थ होता है। राष्ट्र के प्रति व्यक्ति तभी प्रेम कर सकता है, जबकि उसको अपनी जन्मभूमि से स्नेह हो।

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प्रश्न 2.
लेखक के नीग्रो कवि मित्र ने अमेरिका के सम्बन्ध में क्या विचार व्यक्त किए?
उत्तर:
लेखक के नीग्रो कवि मित्र ने अमेरिका के सम्बन्ध में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं कि यह कचरा फेंक उपभोक्ता का देश एवं यह आदमी और आदमी के बीच अदृश्य झिल्ली की दीवार बनाने वाली संस्कृति का देश है।

यह खरीदो-वह खरीदो के पागलपन वाला देश अगर वह स्थान स्वर्ग है तो फिर नरक कहाँ है? मन देश की छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए तरसता रहता है। तब भी स्वर्ग इसको नहीं छोड़ पाता। यद्यपि स्वर्ग के प्राणी उसे दुतकारते हैं, विभिन्न प्रकार से अपमानित करते हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि स्वर्ग में द्वितीय श्रेणी के नागरिक का अधिकार प्राप्त करने के लिए उसे अपने देश की सरकार की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। वह अपनी सरकार से अपेक्षा रखता है क्योंकि वह अपनी सरकार को विदेशी मुद्रा देता है।

लेकिन व्यक्ति उस समय इस बात को भूल जाता है कि मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। अतः अन्त में यह कहा जा सकता है कि नीग्रो कवि ने भी विदेश के महत्व को नकारते हुए मातृभूमि को श्रेष्ठ ठहराया है।

प्रश्न 3.
अपभ्रंश के पुराने दोहे में देश का सबसे बड़ा घर किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
अपभ्रंश के पुराने दोहे में देश का सबसे बड़ा घर वह है जहाँ प्यारे बन्धु रहते हैं। जो प्रत्येक व्यक्ति को दुःखों को सहने की क्षमता प्रदान करते हैं। वे दुःखी व्यक्ति के घावों पर मरहम अपने मधुर वचनों से लगाते हैं।

अत: देश का सबसे बड़ा घर यदि एक साधारण झोंपड़ी को कहा जाये तो उचित ही है। श्रीराम ने चित्रकूट में स्वयं पर्णकुटी बनायी तथा सुखपूर्वक निवास किया।

अन्य सुरम्य स्थान राधा की गौशाला है जहाँ श्रीकृष्णजी स्वयं गायों का दूध दुहने के लिए जाते थे। इसके अतिरिक्त भगवान बुद्ध की साधारण-सी आम की बगिया जहाँ पर उन्होंने महल त्यागने के पश्चात् अपना निवास स्थान बनाया और वैशाली की नगर वधू आम्रपाली को भिक्षा में लिया।

इसके अतिरिक्त जनसाधारण को सत्य, अहिंसा एवं प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गाँधी भी साबरमती आश्रम में साधारण सी कुटिया में रहे। गाँधी जी सच्चे अर्थों में आज भी जनसाधारण के हृदय में विद्यमान हैं।

अतः निष्कर्ष में कह सकते हैं कि वह स्थान ही बड़ा घर है जहाँ कि सच्चरित्र व्यक्ति रहते हैं।

प्रश्न 4.
सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) देश का वरण……………बस हो जाता है।
(ब) वह अपनी निजता……………..”प्राप्त नहीं होता।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘जननी जन्मभूमिश्च से उद्धत किया गया है। इसके लेखक ‘विद्यानिवास मिश्र’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में मिश्र जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि मातृभूमि का अन्य विकल्प नहीं है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि जब लोग अपने देश की धरती को छोड़कर विदेशों में गमन करते हैं, तो वहाँ रहकर विवशता एवं आवश्यकतावश उन्हें उस देश के वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयास करना पड़ता है। लेकिन अपनी धरती माँ के सदृश पूज्यनीय एवं वन्दनीय है, उसको अंगीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो मानव के हृदय पटल पर जन्म से ही अंकित रहती है। जिस प्रकार पुत्र का अपनी माँ के प्रति असीम अनुराग होता है, तदनुरूप व्यक्ति का मातृभूमि की मिट्टी के प्रति असीम लगाव होता है। विदेशों में भी जब उसके देश की चर्चा होती है तब भावनाओं का कोमल सागर हृदय में तरंगें लेने लगता है।

(ब) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी का कथन है प्रवासी भारतीय विदेशों में रहकर भी अपने देश के प्रति प्रेम से जुड़े रहना चाहते हैं।

व्याख्या :
मिश्र जी विदेश यात्रा पर गये। वहाँ प्रवासी भारतीयों की बातचीत से उनकी दुविधा उजागर हुई कि विदेशों में रहते हुए भी वे अपनी निजता या मातृभूमि के प्यार को किसी भी दशा में त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यद्यपि उन्हें विदेशी भाषाओं का ज्ञान नहीं था लेकिन भोजपुरी एवं थाई भाषा बोलने में पूरी तरह सक्षम थे। उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी कि वृद्धावस्था के आगमन पर वह अपनी मातृभूमि के प्रांगण में ही जीवनयापन करें।

मृत्यु की गोद में सोने से पूर्व तुलसी दल तथा गंगा के पवित्र जल की एक बूंद उसके गले में अवश्य डाली जाये। मानव मातृभूमि के प्रति अपने अपनत्व को इतना महत्व देता है जितना कंठगत प्राण को वह येन-केन प्रकारेण बचाने का भरसक प्रयास करता है। ये अपनी जड़ से अथवा मातृभूमि से जुड़े रहने का जीवन्त प्रमाण है। मातृभूमि की मिट्टी में जो प्यार निहित है, वह सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसा अनुराग अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

प्रश्न 5.
भाव पल्लवन कीजिए
(अ) मुल्क बदल जाये, वतन तो वतन होता है।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन में मिश्र जी ने विदेशों की धरती पर रहने वाले व्यक्ति का अपने देश के प्रति लगाव एवं प्यार को व्यक्त किया है।

मुझे मेरे देश का ही एक व्यक्ति करांची की सैर कराने में सहायक हुआ। उसने मेरा इतना स्वागत किया कि मेरे हृदय-तन्त्री के तारों को झंकृत कर दिया। मेरी वायुयान से दूसरी उड़ान का समुचित प्रबन्ध कर दिया। जब लेखक ने उससे विदा माँगी तो उसके नेत्रों में आँसू झलकनोलगे। उसने कहा कि अपना वतन अपना ही होता है। देशों के परिवर्तन से व्यक्ति के अपने देश के प्रति अनुराग में तनिक भी कमी नहीं आती।

(ब) जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन का भाव है कि जननी एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है। इस तथ्य को राम ने लंका के सत्कार को ठुकराकर मातृभूमि के प्रति अपने स्नेह को व्यक्त किया है। इस युक्ति की सार्थकता अचानक पाकिस्तानी की आँखों में छलछलाने वाले अश्रु बिन्दुओं में साकार रूप से दृष्टिगोचर हो रही थी। मनुष्य को मातृभूमि की महत्ता का ज्ञान विदेशों में रहने पर ही ज्ञात होता है, जहाँ आडम्बर एवं बाह्य प्रदर्शन का बोलबाला है।

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प्रश्न 6.
‘जननी जन्मभूमिश्च’ पाठ के आधार पर ‘मातृभूमि स्वर्ग के समान है’ विषय के पक्ष में तीन उदाहरण देकर अपनी बात समझाइए। (2010)
उत्तर:
मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है। इसका कारण है कि हम जन्म लेते ही मातृभूमि पर पैर रखते हैं। वह हमारा भार सहन करती है, हमारी लात सहती है। मातृभूमि ही हमें भोजन, पानी, फल आदि देती है और बड़ा करती है। मातृभूमि हमें अनायास ही सब कुछ देती है। इस तरह मातृभूमि स्वर्ग के समान ही नहीं उससे भी अधिक महत्व की है। यही कारण है कि मातृभूमि को भूल पाना असम्भव है।

जननी जन्मभूमिश्च भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए-
वतन, मुल्क, सलाम, जाहिल, हकीकत, कैदखाना।
उत्तर:
देश, राष्ट्र, प्रणाम, अशिक्षित, वास्तविक, बन्दीगृह।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
(क) राष्ट्र से सम्बन्धित भाव
(ख) आध्यात्म से सम्बन्धित
(ग) व्यवसाय से सम्बन्धित
(घ) बूढ़ा होने की अवस्था।
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय
(ख) आध्यात्मिक
(ग) व्यावसायिक
(घ) वृद्धावस्था।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
उत्तर:
(अ) अशुद्ध-मोहन कुत्ते को डण्डे से मारा।
शुद्ध-मोहन ने कुत्ते को डण्डे से मारा।

(आ) अशुद्ध-क्या आप खाना खा लिए हैं?
शुद्ध-क्या आपने खाना खा लिया है?

(इ) अशुद्ध-दरवाजे पर कौन आई है?
शुद्ध-दरवाजे पर कौन आया है?

(ई) अशुद्ध- मेरा बेटा और बेटी बाजार गई हैं।
शुद्ध-मेरा बेटा और बेटी बाजार गये हैं।

(उ) अशुद्ध- इतना मीठा चाय मैं नहीं पी सकती हूँ।
शुद्ध-इतनी मीठी चाय मैं नहीं पी सकती हूँ।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
पसरा होना, घेरे में डालना, आँखें छलछला आना, स्वर्ग बना रहना, लात सहना, भारी पड़ना।
उत्तर:

  1. पसरा होना-प्लेटफार्म पर यात्री रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में यत्र-तत्र पसरे हुए थे।
  2. घेरे में डालना-पुलिस ने अपराधियों को घेरे में डालकर बन्दी बना लिया।
  3. आँखें छलछला आना-विदेश में अपनी मातृभूमि का प्रकरण आते ही मेरी आँखें छलछला उठीं।
  4. स्वर्ग बना रहना-आत्मीयता के माध्यम से ही धरती पर स्वर्ग बना रहेगा।
  5. लात सहना-विदेशी शासन में भारतीयों को अंग्रेजों को लात सहनी पड़ी।
  6. भारी पड़ना-भारतीय क्रिकेट टीम इस बार कंगारुओं (ऑस्ट्रेलिया) पर भारी पड़ी।

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जननी जन्मभूमिश्च पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध के लेखक श्री विद्यानिवास मिश्र हैं। ललित निबन्ध लेखन के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने ऐतिहासिक प्रसंगों एवं विभिन्न संस्मरणों के माध्यम से जन्मभूमि के महत्त्व का दिग्दर्शन कराया है। जन्मभूमि का कोई भी विकल्प नहीं है। पौराणिक उदाहरणों एवं लोकगीत के माध्यम से जन्मभूमि की महिमा का बखान किया है। प्रवासी भारतीयों की भावनाओं को भी व्यक्त किया है जो अपनी मातृभूमि के प्रति लगाव रखते हैं। फूल भी मौन रूप से अपनी यह इच्छा व्यक्त करता है कि उसे देश की बलि वेदी पर प्राण-प्रसून अर्पित करने वाले वीरों के मार्ग पर बिखेर दिया जाये। लेखक के मतानुसार मानवीय मूल्यों पर प्रतिष्ठित भावना, मातृभूमि के प्रेम में बाधक नहीं है।

जननी जन्मभूमिश्च कठिन शब्दार्थ

प्रवास = विदेश में रहने वाला। उत्कण्ठा = आकांक्षा। कोफ्त = खीझ। कानून की कैद – कानून का बन्धन। मुल्क = देश। वतन = मातृभूमि, जन्मभूमि। अपि = भी। रोचते = अच्छी लगती। स्वर्गादपि गरीयसी = स्वर्ग से बढ़कर। सार्थकता वास्तविकता। बेकाबू = काबू से बाहर। दायित्व = जिम्मेदारी। निष्ठा = आस्था। सुधि = याद। लोकाचार = सामाजिक रीति-रिवाज। सुलक्षण कन्या = अच्छे गुणों वाली लड़की। नीग्रो = अश्वेत अमेरिकन नागरिक। जाहिल = अशिष्ट। भौतिक सुख-सुविधा = सांसारिक सुख-सुविधा। आध्यात्मिक = आत्मा सम्बन्धी, ब्रह्म और जीव से सम्बन्धित। उपभोक्ता = उपभोग करने वाला। अदृश्य झिल्ली = जो झिल्ली दिखायी न दे। उद्वेलित = उद्विग्न। विरक्ति = अलगाव, विराग। अनबूझ पहेली = अनसुलझी पहेली। दुतकारते = प्रताड़ित करना। विडम्बना = विसंगति। अपेक्षा = आशा करना। अलाव = आग जलाने का वह स्थान जिसके चारों ओर लोग बैठकर आग तापते हैं। निरुपायता = कोई उपाय न होना। उत्सुकता = जिज्ञासा। बहिश्त = स्वर्ग। रूमानी = रसिक, रस से युक्त। लुभावना = मन को अच्छा लगना। प्रवासी भारतीय = अन्य देश में रहने वाले भारतीय। विवशता = मजबूरी, लाचारी। आत्मीयता = अपनत्व, स्नेह के साथ। मार्गदर्शक = मार्ग दिखाने वाला। परिमार्जित = परिष्कृत। प्रतिबिम्ब = परछाईं। तृप्त = सन्तुष्ट। निजता = अपनापन। कण्ठगत प्राण = गले तक आ चुके प्राण, प्राण निकलने की स्थिति। अपभ्रंश = एक भाषा। बड़प्पन = श्रेष्ठता, बड़ाई। आराध्य = इष्ट देव, जिसकी आराधना की जाये। मुमूर्ष = मरणासन्न, मरण का इच्छुक। पेरियार = केरल प्रान्त का एक क्षेत्र। नवनीत = मक्खन। न्यौछावर = निछावर, समर्पण।

जननी जन्मभूमिश्च संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. देश का वरण न जाने किन-किन दबावों और जरूरतों से आदमी करता है पर माँ का कोई वरण नहीं करता, न कोई जन्मभूमि का वरण करता है। वह माँ का बस बेटा होता है, जन्मभूमि का, माटी का बस हो जाता है। (2008, 14, 17)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘जननी जन्मभूमिश्च से उद्धत किया गया है। इसके लेखक ‘विद्यानिवास मिश्र’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में मिश्र जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि मातृभूमि का अन्य विकल्प नहीं है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि जब लोग अपने देश की धरती को छोड़कर विदेशों में गमन करते हैं, तो वहाँ रहकर विवशता एवं आवश्यकतावश उन्हें उस देश के वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयास करना पड़ता है। लेकिन अपनी धरती माँ के सदृश पूज्यनीय एवं वन्दनीय है, उसको अंगीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो मानव के हृदय पटल पर जन्म से ही अंकित रहती है। जिस प्रकार पुत्र का अपनी माँ के प्रति असीम अनुराग होता है, तदनुरूप व्यक्ति का मातृभूमि की मिट्टी के प्रति असीम लगाव होता है। विदेशों में भी जब उसके देश की चर्चा होती है तब भावनाओं का कोमल सागर हृदय में तरंगें लेने लगता है।

विशेष :

  1. प्रवासी भारतीयों का अपने देश के प्रति अगाध स्नेह को दर्शाया है।
  2. मानवीय भावनाओं का अंकन है।
  3. शैली प्रांजल एवं प्रभावपूर्ण है।

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2. इस आदमी की दुविधा एक मानवीय दुविधा है, वह अपनी निजता का प्रतिबिम्ब तो पाना चाहता है, पाकर तृप्त भी होता है, पर अपनी निजता को खोना नहीं चाहता, कंठगत प्राण की तरह उसे बचाये रखना चाहता है। शायद अपनी जड़ से इतना लगाव न होता तो इतना प्यार, अनायास दूसरे से पाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। (2009, 11)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी का कथन है प्रवासी भारतीय विदेशों में रहकर भी अपने देश के प्रति प्रेम से जुड़े रहना चाहते हैं।

व्याख्या :
मिश्र जी विदेश यात्रा पर गये। वहाँ प्रवासी भारतीयों की बातचीत से उनकी दुविधा उजागर हुई कि विदेशों में रहते हुए भी वे अपनी निजता या मातृभूमि के प्यार को किसी भी दशा में त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यद्यपि उन्हें विदेशी भाषाओं का ज्ञान नहीं था लेकिन भोजपुरी एवं थाई भाषा बोलने में पूरी तरह सक्षम थे। उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी कि वृद्धावस्था के आगमन पर वह अपनी मातृभूमि के प्रांगण में ही जीवनयापन करें।

मृत्यु की गोद में सोने से पूर्व तुलसी दल तथा गंगा के पवित्र जल की एक बूंद उसके गले में अवश्य डाली जाये। मानव मातृभूमि के प्रति अपने अपनत्व को इतना महत्व देता है जितना कंठगत प्राण को वह येन-केन प्रकारेण बचाने का भरसक प्रयास करता है। ये अपनी जड़ से अथवा मातृभूमि से जुड़े रहने का जीवन्त प्रमाण है। मातृभूमि की मिट्टी में जो प्यार निहित है, वह सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसा अनुराग अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

विशेष :

  1. लेखक की गहन अनुभूति विद्यमान है।
  2. भाषा में कोमल कमनीयता का समावेश है।
  3. शैली सरस, सरल एवं सुबोध है।

3. स्वर्ग से मातृभूमि इसलिए ही शायद बड़ी है कि स्वर्ग का भोग करने वाला अपने को ऊँचा समझने लगता है, मातृभूमि से प्यार करने वाला विनम्र बना रहता है, यह समझने के लिए कि जैसे अपनी भूमि के लिए तड़पता है, वैसे ही दूसरा भी तड़पता होगा। बड़प्पन कहीं रहने से या कहीं न रहने से नहीं आता है, आता है दूसरे को बड़प्पन देने से, दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानने से। (2013)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी ने इस गद्यांश में मानवीय विनम्रता की महत्ता को उजागर किया गया है।

व्याख्या :
सामान्यतः स्वर्ग को सबसे उत्तम माना गया है, किन्तु जन्मभूमि से भी बढ़कर जो स्वर्ग का उपभोग करता है, वह स्वयं को अन्य से ऊँचा समझता है, परन्तु मातृभूमि को प्रेम करने वाला शिष्ट एवं नम्र बना रहता है। उसमें बड़े होने का गर्व नहीं आता है। वह जानता है कि जैसे मेरे मन में अपनी जन्मभूमि के लिए तड़पन है, वैसी ही तड़पन औरों में भी अपनी मातृभूमि के लिए अवश्य होगी। श्रेष्ठता किसी विशेष स्थान पर रहने अथवा नहीं रहने से नहीं आती है। यह तो दूसरे को श्रेष्ठ मानने से प्राप्त होती है, औरों के कष्ट को अपना कष्ट मानने से बड़प्पन आता है।

विशेष :

  1. जन्मभूमि के प्रति प्यार हृदय में विनम्रता का संचार करता है।
  2. सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. तर्कपूर्ण विवेचनात्मक शैली में विषय को स्पष्ट किया गया है।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकमंगल की भावना जिनके काव्य में व्यक्त हुई है (2008,09)
(i) सूरदास,
(ii) बिहारी
(iii) तुलसीदास,
(iv) रसखान।
उत्तर:
(iv) रसखान।

प्रश्न 2.
मीरा भक्त थीं (2009)
(i) राम की
(ii) कृष्ण की
(iii) ब्रह्म की
(iv) शिव की।
उत्तर:
(ii) कृष्ण की

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प्रश्न 3.
सूर ने मनोहारी वर्णन किया है
(i) बालक राम का
(ii) श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का
(iii) शिव के नृत्य का
(iv) नारद के भ्रमण का।
उत्तर:
(ii) श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का

प्रश्न 4.
गोपिका की आँख में दो तत्त्व भर गये थे नंदलाल और (2016)
(i) धूल
(ii) गुलाल
(iii) मिर्च
(iv) मिट्टी।
उत्तर:
(ii) गुलाल

प्रश्न 5.
वृक्ष फल देते हैं
(i) स्वयं के लिए
(ii) किसी के लिए नहीं
(iii) अहसान के लिए
(iv) दूसरों के लिए।
उत्तर:
(iv) दूसरों के लिए।

प्रश्न 6.
सेनापति के संकलित पदों में हुआ है
(i) ऋतु वर्णन
(ii) नगर वर्णन
(ii) दृश्य वर्णन
(iv) नख-शिव वर्णन।
उत्तर:
(i) ऋतु वर्णन

प्रश्न 7.
पन्तजी नौका विहार करने गये (2010, 14)
(i) प्रातःकाल
(ii) सायंकाल
(iii) दोपहर में
(iv) चाँदनी रात में।
उत्तर:
(iv) चाँदनी रात में।

प्रश्न 8.
भूषण के काव्य में वर्णन हुआ है
(i) शौर्य का
(ii) श्रृंखला का
(iii) वात्सल्य का
(iv) भक्ति का।
उत्तर:
(i) शौर्य का

प्रश्न 9.
‘दिनकर’ कविता का आह्वान किसलिए करते हैं?
(i) मनोरंजन के लिए
(ii) दया के लिए
(iii) जनता को जगाने के लिए
(iv) युद्ध के लिए।
उत्तर:
(iii) जनता को जगाने के लिए

प्रश्न 10.
साये में धूप महसूस की (2008)
(i) दिनकर ने
(ii) दुष्यन्त कुमार ने
(iii) गिरिजाकुमार माथुर ने
(iv) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने।
उत्तर:
(ii) दुष्यन्त कुमार ने

प्रश्न 11.
बालक कृष्ण का रुचिकर व्यंजन है (2015)
(i) माखन-मिश्री
(ii) दूध-रोटी
(iii) दाल-चावल
(iv) माखन-मलाई।
उत्तर:
(i) माखन-मिश्री

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प्रश्न 12.
कवच-कुण्डल किसने दान किए? (2017)
(i) अर्जुन ने
(ii) श्रीकृष्ण ने
(iii) कर्ण ने
(iv) दुर्योधन ने।
उत्तर:
(iii) कर्ण ने

रिक्त स्थान पूर्ति

  1. ………… ने राम के लोकमंगल व लोककल्याणकारी रूप को जनता के सामने प्रतिष्ठित किया। (2008)
  2. तुलसीदास के पदों में ………………… रस की प्रधानता है। (2008)
  3. …………………. को कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है। (2008)
  4. सेनापति ने …………… को ऋतुराज कहा है। (2015)
  5. कबीर ने ……………….. ज्ञान को उपयोगी माना है।
  6. ………………. के चले जाने के कारण ब्रजवासी दु:खी थे।
  7. अंगद ………………… का पुत्र था।
  8. कवियों ने …………….. की बोली का बखान किया है।
  9. ………………… ऋतु में सूर्य चन्द्रमा के समान लगता है। (2009, 16)
  10. ……………के तीन भाग हैं-साखी, सबद और रमैनी। (2008)
  11. ……………… ने कवच-कुंडल दान किए थे।
  12. बालि ने काँख में …………………. को छुपा लिया था। (2009)
  13. खंजन पक्षी का दुःख……………… ऋतु में मिट जाता है। (2009)
  14. महल बनाने के लिए ………………… का बलिदान होता है। (2012)
  15. मीरा ने …………….. को अपना आराध्य बताया है। (2017)

उत्तर:

  1. तुलसी
  2. शान्त
  3. केशव
  4. बसंत
  5. व्यावहारिक
  6. श्रीकृष्ण
  7. बालि,
  8. कोयल
  9. शिशिर
  10. बीजक
  11. कर्ण
  12. रावण
  13. शरद
  14. झोंपड़ी
  15. श्रीकृष्ण।

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सत्य/असत्य

  1. तुलसीदास प्रण करके राम के चरण-कमलों में बसना चाहते हैं। (2009)
  2. राधा विरह का दुःख भुलाने के लिए समाज सेवा करती हैं।
  3. शिवाजी के नगाड़ों की घोर से बादशाहों की छाती धड़कती थी।
  4. श्री राम भद्राचार्य ने श्रीकृष्ण का वर्णन किया है। (2010)
  5. बिना अवसर के कही गई अच्छी बात अच्छी लगती है। (2009)
  6. गोपियों की आँखों में दो तत्त्व भर गये थे। (2015)
  7. भूषण ने छत्रसाल के शौर्य का वर्णन किया है।
  8. दुष्यन्त कुमार ने उर्दू में ही गजलें लिखी हैं।
  9. कबीर अनुभूत ज्ञान को ज्यादा महत्व देते थे। (2009)
  10. कजरी ग्रीष्म ऋतु में गाई जाती है। (2016)

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य
  6. सत्य
  7. सत्य
  8. असत्य
  9. सत्य
  10. असत्य।

जोड़ी मिलाइए

I.
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (क)
3. → (घ)
4. → (ङ)
5. → (ग)
6. → (च)

II.
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न img-2
उत्तर:
1. → (च)
2. → (ग)
3. → (क)
4. → (ङ)
5. → (घ)
6. → (ख)

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एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
कौआ और कोयल में क्या समानता होती है? (2009)
उत्तर:
काले रंग की

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण ने किसका गर्व चूर करने को गोवर्धन पर्वत धारण किया था?
उत्तर:
इन्द्र का

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण के मुकुट में कौन-सी वस्तु लगी है? (2017)
उत्तर:
मोर पंख

प्रश्न 4.
सज्जन पुरुष किसलिए धन संचय करते हैं?
उत्तर:
परहित के लिए

प्रश्न 5.
‘तुम पै धनुरेख गई न तरी’ किससे कहा गया है? (2009)
उत्तर:
रावण के लिए

प्रश्न 6.
जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र क्या है? (2014)
उत्तर:
कर्मशील रहना

प्रश्न 7.
‘यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे बसते हैं’ से क्या आशय है?
उत्तर:
संवेदनशीलता का

प्रश्न 8.
कोई न कोई अभाव रहने के कारण जीवन को क्या कहा गया है?
उत्तर:
अपूर्ण

प्रश्न 9.
छत्रसाल की बरछी ने किनके बल खींच लिए हैं?
उत्तर:
दुष्ट मुगलों के

प्रश्न 10.
‘लाखों क्रोंच कराह रहे हैं’ से दिनकर क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर:
अनेक पीड़ित प्राणी

प्रश्न 11.
‘नौका विहार’ कविता में चंचल किरणों की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
चाँदी के साँपों से

प्रश्न 12.
वह कौन-सी सम्पत्ति है जो व्यय करने पर बढ़ती है? (2009)
उत्तर:
विद्या

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प्रश्न 13.
कजरी कब गाई जाती है? (2009)
उत्तर:
वर्षा ऋतु में

प्रश्न 14.
कवच-कुण्डल दान किसने किये थे? (2009)
उत्तर:
कर्ण ने

प्रश्न 15.
पंतजी की कविता ‘नौका विहार’ किस नदी पर विहार की अनुभूति है? (2012)
उत्तर:
गंगा नदी पर

प्रश्न 16.
तुलसीदास किसके चरण छोड़कर जाना नहीं चाहते? (2015)
उत्तर:
श्रीराम के।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 2 शिरीष के फूल

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 2 शिरीष के फूल

शिरीष के फूल अभ्यास

शिरीष के फूल अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिरीष किस ऋतु में फूलता है?
उत्तर:
शिरीष जेठ मास की तपती धूप में फलता-फूलता है।

प्रश्न 2.
शिरीष की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
शिरीष की तुलना अद्भुत अवधूत से की गई है।

प्रश्न 3.
शिरीष अपना पोषण कहाँ से प्राप्त करता है? (2017)
उत्तर:
शिरीष अपना पोषण वायुमण्डल से रस खींचकर प्राप्त करता है।

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शिरीष के फूल लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“शिरीष निर्धात फलता रहता है।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा है? (2014)
उत्तर:
शिरीष जेठ मासं की गर्मी में तो फलता-फूलता ही है बसन्त के आगमन के साथ लहक उठता है। आषाढ़ में मस्ती से भरा रहता है। यदि इच्छा हुई एवं मन रम गया तो भरे भादों में भी बेरोक-टोक फूलता रहता है। इसी कारण लेखक ने शिरीष निर्धात फूलता है, कहा है।

प्रश्न 2.
किन परिस्थितियों में शिरीष जीवन जीता है?
उत्तर:
चाहे जेठ की चिलचिलाती धूप हो, चाहे पृथ्वी धुयें से रहित अग्नि कुण्ड बनी हो; शिरीष नीचे से ऊपर तक फूल से लदा रहता है। बहुत ही कम पुष्प इस प्रकार की तपती दुपहरी में फूल सकने का साहस जुटा पाते हैं। अमलतास भी शिरीष की तुलना नहीं कर सकता है। इस प्रकार विषम परिस्थितियों में भी शिरीष जीवन जीता है।

प्रश्न 3.
लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना किससे की है और क्यों ? लेखक के अनुरूप शिरीष के फूलों की क्या प्रकृति है?
उत्तर:
लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना कालजयी अवधूत से की है क्योंकि अवधूत की भाँति ही यह हर परिस्थिति में मस्त रहकर जीवन की अजेयता का सन्देश देता है। शिरीष का फूल एक अवधूत की भाँति दुःख एवं सुख में समान रूप से स्थिर रहकर कभी पराजय स्वीकार नहीं करता है। उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं है। धरती एवं आसमान के जलते रहने पर भी यह अपना रस खींचता ही रहता है।

प्रश्न 4.
शिरीष के फूलों के सम्बन्ध में तुलसीदास जी का क्या कथन है?
उत्तर:
शिरीष के फूलों के सम्बन्ध में तुलसीदास जी ने कहा है-“धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना’ अर्थात् जो फूल फलता है वही अवश्य कुम्हलाकर झड़ जाता है। कुम्हलाने के पश्चात पुनः विकसित हो जाता है।

प्रश्न 5.
लेखक ने शिरीष के सम्बन्ध में किन-किन विद्वानों के नाम बताये हैं?
उत्तर:
लेखक ने शिरीष के सम्बन्ध में कालिदास, कबीरदास, तुलसीदास तथा आधुनिक काल में अनासक्ति सुमित्रानन्दन पंत एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि विद्वानों के नामों का उल्लेख किया है।

प्रश्न 6.
शिरीष और अमलतास में क्या अन्तर है?
उत्तर:
शिरीष का फूल हर मौसम में फलता फूलता है जबकि अमलतास मात्र पन्द्रह-बीस दिन के लिए फूलता है। बसन्त ऋतु के पलाश पुष्प की भाँति शिरीष का फूल कालजयी एवं अजेय है इस कारण इसकी तुलना अमलतास से नहीं की जा सकती है।

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शिरीष के फूल दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं। इस वाक्य पर अपने भाव अभिव्यक्त कीजिए।
उत्तर:
जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु ये दोनों ही संसार के चिरपरिचित एवं कटु सत्य हैं। यह तथ्य पूर्णतः सिद्ध एवं प्रामाणिक है। इसका उल्लेख गीता में भी है। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है। मृत्यु के उपरान्त जीव काया रूपी पुराने वस्त्र को त्याग नवीन शरीर धारण करता है। यह क्रम शाश्वत है। किसी कवि ने इस तथ्य को निम्नवत् व्यक्त किया है, देखिए-
“आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर”
कोई हाथी चढ़ चल रहा कोई बना जंजीर।”

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि जरा एवं मृत्यु ये दोनों ही तथ्य सत्य हैं इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस तथ्य को तुलसीदास ने भी स्वीकारा है।

प्रश्न 2.
लेखक ने कबीर की तुलना शिरीष से क्यों की है? समझाइए। (2009)
उत्तर:
लेखक ने कबीर की तुलना शिरीष से इसलिए की है क्योंकि जिस प्रकार शिरीष का फूल चाहे गर्मी हो, बरसात हो, बसन्त हो अथवा ग्रीष्म ऋतु की लू के भयंकर थपेड़े हों वह हर दशा में फलता-फूलता है तथा झूम-झूम कर अपनी प्रसन्नता को निरन्तर व्यक्त करता है। शिरीष पर सर्दी, गर्मी, धूप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

जिस प्रकार कबीर अनासक्त योगी थे एवं मस्त-मौजा प्रवृत्ति के संत थे। निन्दा, अपमान अथवा प्रशंसा का उन पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। जैसा कि कबीर के निम्न कथन से यह सत्य उजागर होता है-
“कबिरा खड़ा बाजार में लिए लकुटिया हाथ।
जो घर फूंकै आपनो चलै हमारे साथ।।”

लेखक ने शिरीष के फूल को कबीर की भाँति मस्त-मौला एवं मनमौजी प्रवृत्ति का पाया इसी कारण उन्होंने शिरीष की तुलना कबीर से की है और इसे कालजयी एवं अनासक्त अवधूत की संज्ञा प्रदान की।

प्रश्न 3.
कालिदास को अनासक्त योगी क्यों कहा गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कालिदास को अनासक्त योगी इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्हें सम्मान की तनिक भी लालसा नहीं थी। वे सत्ता एवं अधिकार लिप्सा के घोर विरोधी थे। ऐसे व्यक्ति भविष्य में आने वाली पीढ़ी की उपेक्षा को भी सहन कर लेते थे। कालिदास ने अपने शृंगारिक वर्णन में अनासक्त भाव का भली प्रकार विवेचन किया है। वे स्थित प्रज्ञ एवं अनासक्त योगी बनकर कवि सम्राट के आसन पर प्रतिष्ठित हुए। अन्त में कहा जा सकता है जिस प्रकार शिरीष का फूल हर विषम परिस्थिति में फूलता-फलता एवं मुस्कुराता रहता है उसी प्रकार कालिदास भी विषम परिस्थूिति में प्रसन्नतापूर्वक अनासक्त योगी की भाँति अविचल खड़े रहते थे। वास्तव में कालिदास एक सच्चे योगी थे।

प्रश्न 4.
शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। इस वाक्य के सन्दर्भ में अपने भाव लिखिए। (2008, 09)
उत्तर:
शिरीष का फूल एक अवधूत के समान चाहे दुःख की आँधी हो अथवा सुख की चाँदनी हो वह हर परिस्थिति को समान रूप से ग्रहण करता है। दुःख में कभी हताश नहीं होता तथा सुख में कभी इठलाता नहीं है। वह समान रूप से जीवन जीता है। पराजय स्वीकार करना तो वह जानता नहीं है क्योंकि उसकी धारणा है कि “गति ही जीवन है तथा निष्क्रियता घोर मरण है।”

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि शिरीष एक अद्भुत अवधूत की तरह सब कुछ सहन करने के लिए अटल होकर अपने स्थान पर प्रसन्नता से झूमता रहता है। ऋतुओं का क्रम उसको तनिक भी प्रभावित नहीं करता। उसने तो हर परिस्थिति में अवधूत की भाँति मस्त रहना सीखा है। जिस प्रकार अवधूत को सांसारिक भोगों की लिप्सा नहीं रहती है उसी प्रकार शिरीष को भी सर्दी, गर्मी, धूप, छाया की परवाह नहीं रहती है। “प्रसन्नता ही जीवन है”, यही उसके जीवन का मूलमन्त्र है।

प्रश्न 5.
शिरीष जीवन में किस गुण का प्रचार करता है? (2013)
उत्तर:
शिरीष जीवन में इस गुण का प्रचार करता है कि दुनिया के मानव दुःख आने पर क्यों आहें भरता है तथा सुख आने पर गर्व से झूम उठता है। सुख एवं दुःख तो क्रम से आते-जाते रहते हैं। जो मनुष्य आज दुःख की चट्टान के तले दबकर सिसकियाँ ले रहा है कल उसी के कंठ से सुख के स्वर ध्वनित होंगे। इस प्रकार से शिरीष का फूल जीवन में हमें निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सत्ता के मोह और अधिकार के प्रति हम लिप्त न रहें। यह उसका एकमात्र सन्देश है।

जो मानव निरन्तर सत्ता के प्रति लोलुप रहता है, उसका पराभव निश्चित है। धैर्य, साहस एवं तटस्थता जीवन के अपेक्षित गुण हैं जो व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर आरूढ़ करते हैं। शिरीष इन्हीं गुणों का परिचायक है।

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शिरीष के फूल भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों और लोकोक्तियों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
डटे रहना, आँख बचाना, हार न मानना, आँच न आना, न ऊधो का लेना न माधो का देना।
उत्तर:
प्रयोग : (1) डटे रहना – हमें हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य पालन के प्रति डटे रहना चाहिए।
(2) आँख बचाना – नौकरानी ने आँख बचाकर मालिक के सारे आभूषण गायब कर दिये।
(3) हार न मानना – उत्साही पुरुष कैसी भी विषम परिस्थिति हो कभी हार नहीं मानते।
(4) आँच न आना – सज्जन ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिससे उनके चरित्र पर कोई आँच आये।
(5) न ऊधो का लेना न माधो का देना – इस षड्यन्त्र में मधु का कोई हाथ नहीं है उसका तो एकमात्र उद्देश्य है न ऊधो का लेना न माधो का देना।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए-
(अ) अशुद्ध – महक उठता है शिरीष का फूल बसन्त के आगमन के साथ।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष का फूल बसन्त के आगमन के साथ महक उठता है।

(आ) अशुद्ध – हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं शिरीष के पुष्प मेरे मानस में।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष के पुष्प मेरे मानस में हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं।

(इ) अशुद्ध – छायादार हैं होते बड़े वृक्ष शिरीष के।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष के वृक्ष बड़े छायादार होते हैं।

(ई) अशुद्ध – शिरीष का फूल साहित्य में कोमल मानी जाती है।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष का फूल साहित्य में कोमल माना जाता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित गद्यांश में यथास्थान विरामचिह्नों का प्रयोग कीजिए-
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं तुलसीदास ने अफसोस के साथ इसकी गहराई पर मुहर लगाई थी धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना।
उत्तर:
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रमाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफसोस के साथ इसकी गहराई पर मुहर लगाई थी, “धरा को प्रमान यही तुलसी, जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना।”

शिरीष के फूल पाठ का सारांश

शिरीष का फूल, साहित्य मनीषी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक सफल एवं उच्च कोटि का प्रेरणादायक निबन्ध है। विद्वान लेखक ने शिरीष के फूल का विभिन्न रूपों में वर्णन किया है, वह प्रशंसनीय है। शिरीष एक ऐसा फूल है जिसने कालरूपी समय पर विजय प्राप्त कर ली है। वह हर ऋतु में झूमता एवं लहराता रहता है। वह जीवन की अजेय शक्ति का प्रतीक है।

अद्भुत अवधूत की भाँति दुःख एवं सुख को समान रूप से स्वीकार करता है। कबीर तथा आधुनिक काल के सुमित्रानन्दन पन्त एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर भी अनासक्ति भाव से जीवन जीते थे। महात्मा गाँधी भी मार-काट, लूटपाट, रक्त प्रवाह आदि परिस्थितियों में अडिग रहकर धैर्य एवं साहस का परिचय देते थे। अतः उनको भी अवधूत की संज्ञा से विभूषित किया गया है।

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शिरीष के फूल कठिन शब्दार्थ

शिरीष = अति कोमल फूलों वाला एक वृक्ष। धरित्री = धरती। निर्धूम = धुआँ रहित। पलाश = एक प्रकार का लाल रंग का पुष्प। लहक उठता = झूमता। निर्धात अवधूत = सुखदुःख को समान समझने वाला संन्यासी, योगी। कालजयी = जिसने काल पर विजय प्राप्त कर ली हो। मानस = हृदय। हिल्लोल = प्रसन्नता, लहर। अशोक, अरिष्ठ, पुन्नाग और शिरीष = वृक्षों के नाम। मसृण = चिकनी, हरियाली, हरीतिमा। परिवेक्षिष्ठत = घिरी हुई। तुन्दिल = तोंद वाले। पक्षपात = किसी का पक्ष लेना। अधिकार-लिप्सा = अधिकार की लालसा। जीर्ण = पुराने। दुर्बल = कमजोर। परवर्ती = बाद के। ऊर्ध्वमुखी = ऊपर की ओर मुख वाला। ततुंजाल = रेशों का जाल। अनाविल = स्वच्छ, साफ। अनासक्त= आसक्ति रहित। विस्मयविमूढ़ = आश्चर्यचकित। कृषीवल = गन्ने में लगने वाला कीट। कार्पण्य = कंजूस, लोभी। मृणाल = सफेद कमल की डंडी। ईक्षु दण्ड = गन्ना। गन्तव्य = पहुँचने का स्थान। अभ्रभेदी = आकाश को भेदने वाला।

शिरीष के फूल संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. बसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पत्र से मर्मरित होती रहती है। शिरीष के पुराने फूल बुरी तरह लड़खड़ाते रहते हैं। मुझे उनको देखकर उन नेताओं की याद आती है, जो किसी प्रकार जमाने का साथ नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते, तब तक जमे रहते हैं। (2013)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘शिरीष के फूल’ से उद्धृत है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यावतरण में लेखक ने शिरीष के पुराने फूलों के माध्यम से जमे रहने वाले वृद्ध खुर्रार नेताओं पर कटाक्ष किया गया है।

व्याख्या :
ऋतुराज बसंत के आते ही सारा वन प्रदेश फूल और पत्तों से भर उठता है। पत्तों और फूलों की रगड़ से सरसराहट का स्वर निकलता रहता है, परन्तु शिरीष के पुराने फूल अब तक पेड़ों पर लगे रहते हैं और सूख जाने के कारण परस्पर टकराकर खड़खड़ाहट करते रहते हैं। लेखक को इन फूलों को देखकर उन नेताओं का स्मरण हो उठता है, जो किसी भी तरह समय के परिवर्तन को पहचानने को तैयार नहीं होते हैं। वे राजनीति में जमे ही रहना चाहते हैं। जब नवीन पीढ़ी के नेता उन्हें धकियाकर बाहर कर देते हैं तब बेइज्जत होकर राजनीति से बाहर होते हैं।

विशेष :

  1. शिरीष के पुराने फूलों के टिके रहने के आधार बनाकर राजनीति में जमे बेशर्म नेताओं पर तीखा प्रहार हुआ है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
  3. विवेचनात्मक शैली अपनाई गई है।

2. मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने दुःख के साथ इसकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी,”धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा-सो बताना।” मैं शिरीष के फूलों को देखकर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा, कि झड़ना निश्चित है। सुनता कौन है? महाकाल देवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं। जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। (2011)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने वृद्धावस्था एवं मृत्यु को प्रामाणिक सत्य ठहराकर, इस सत्य की तुलना शिरीष के फूल से की है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि वृद्धावस्था एवं मृत्यु दोनों ही अटल सत्य हैं। इसे कोई भी कदापि असत्य नहीं ठहरा सकता। इतने पर भी मानव अधिकारों के प्रति, प्रतिक्षण लालायित रहता है। उसकी यह आकांक्षा रहती है कि वह अधिक से अधिक अधिकार सम्पन्न बने।

महाकवि तुलसीदास ने इस बात पर वेदना व्यक्त की है और इसकी सत्यता को इस कथन से उजागर किया है-जो फलता-फूलता है वह कुम्हलाकर झड़ भी जाता है। लेखक शिरीष के फूल को देखकर इस बात को स्पष्ट कर रहा है कि पल्लवित एवं पुष्पित होने वाला वृक्ष भी अवश्य ही झड़ता है। काल रूपी देवता निरन्तर बेधड़क कोड़े चला रहा है अर्थात् प्राणी निरन्तर काल-कवलित हो रहे हैं। लेकिन मनुष्य इस तथ्य को नहीं स्वीकार कर रहा है। जो समय के थपेड़े से जीर्ण-शीर्ण एवं दुर्बल हो चुके हैं, वे धराशायी हो रहे हैं। परन्तु जिनके प्राणों में ऊर्जा शक्ति विद्यमान है वे ही उन्नत रहने में सक्षम हैं।

विशेष :

  1. जीवन और मृत्यु दोनों ही प्रामाणिक सत्य हैं।
  2. भाषा अलंकारिक, परिमार्जित एवं प्रसंगानुकूल है।

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3. शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी अग्नि जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती है। इस चिलकती धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है? क्या ये बाह्य परिवर्तन-धूप, आँधी, लू अपने आप में सत्य नहीं हैं? हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूटपाट, खून-खच्चर का बवंडर बह गया है उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है । अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों? मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों सम्भव हुआ है? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है और अपने देश का वह बूढ़ा अवधूत था।
(2008)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने शिरीष के वृक्ष को अवधूत की भाँति स्वीकार किया है। इसके अतिरिक्त मानव को उस वृक्ष से प्रेरणा ग्रहण करने का संदेश दिया है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि शिरीष का वृक्ष एक योगी की तरह से हमारे मन-मानस में ऐसी साहस की अग्नि जगा देता है जो हमें सदैव जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। चिलचिलाती, धूप, आँधी एवं लू में भी वह सदैव झूमता एवं लहराता रहता है। ये प्रकृति के विभिन्न उपादान जो कि मानव को व्यथित एवं भयभीत करते रहते हैं, लेकिन शिरीष के फूल पर इन बाह्य परिवर्तनों का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता है। हमारे देश में हिंसा, मार-काट, लूट-पाट एवं रक्त-पात का ज्वार सर्वत्र व्याप्त है। परन्तु इस भयावह वातावरण में भारत देश का एक बूढ़ा राष्ट्र नायक शिरीष के फूल की भाँति जीवन में हमें स्थिर रहने का संदेश दे रहा है। गाँधी एवं शिरीष दोनों ही अवधूत की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

विशेष :

  1. गाँधी की तुलना शिरीष के फूल से की है। दोनों ही योगी हैं।
  2. अग्नि जगाना, खून-खच्चर का बवंडर आदि मुहावरों का प्रयोग है।
  3. भाषा-शैली प्रामाणिक एवं विषयानुरूप है।

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MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता

MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता

सांतत्य तथा अवकलनीयता Important Questions

सांतत्य तथा अवकलनीयता वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न 1.
यदि x = at2, y = 2at है, तो \(\frac{dy}{dx}\) होगा –
(a) t
(b) t2
(c) \(\frac{1}{t}\)
(d) \(\frac { 1 }{ t^{ 2 } } \)
उत्तर:
(c) \(\frac{1}{t}\)

प्रश्न 2.
यदि y = 2 \(\sqrt { cot(x^{ 2 }) } \) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) होगा –
(a) \(\frac { -2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
(b) \(\frac { 2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
(c) \(\frac { 2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
(d) \(\frac { 2\sqrt { x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
उत्तर:
(a) \(\frac { -2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)

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प्रश्न 3.
\(\frac{dy}{dx}\) (x3 + sinx2) का मान है –
(a) 3x2 + cos x2
(b) 3x2 + x sin2
(c) 3x2 + 2x cos x2
(d) 3x2 + x cos x2
उत्तर:
(c) 3x2 + 2x cos x2

प्रश्न 4.
\(\frac{d}{dx}\) ax का मान है –
(a) ax
(b) axlogae
(c) axlogea
(d) \(\frac { a^{ x } }{ log_{ e }a } \)
उत्तर:
(c) axlogea

प्रश्न 5.
यदि y = 500e7x + 6000e-7x हो, तो, \(\frac { d^{ 2 }y }{ dx^{ 2 } } \) का मान होगा –
(a) 45 y
(b) 47 y
(c) 49 y
(d) 50 y
(d) 50y.
उत्तर:
(c) 49 y

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प्रश्न 2.
(a) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. cosx0 का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ………………….. है।
  2. eloge aका x के सापेक्ष अवकल गुणांक ………………………..
  3. loge a का a के सापेक्ष अवकल गुणांक ……………………….
  4. ax का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ……………………………… है।
  5. sin 3x का 3x के सापेक्ष अवकल गुणांक …………………………… है।
  6. यदि y = sin-1(2x\(\sqrt { 1-x^{ 2 } } \) ) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ……………………… होगा।
  7. sin x का cos.x के सापेक्ष अवकल गुणांक ………………… है।
  8. \(\frac{d}{dx}\) (log tan x) का मान ………………………… है।
  9. log(log sin x) का अवकलन गुणांक ……………………………….. होगा।

उत्तर:

  1. – \(\frac { \pi }{ 180 } \) sin x0
  2. 0
  3. 0
  4. logea.ax
  5. cos x
  6. \(\frac { 2 }{ \sqrt { 1-x^{ 2 } } } \)
  7. – cot x
  8. cosec 2x
  9. \(\frac { cotx }{ logsinx } \)

प्रश्न 2.
(b) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. यदि x = \(\sqrt { 1-y^{ 2 } } \) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ………………………. होगा।
  2. sin x का n वाँ अवकलज ………………………………. होगा।
  3. यदि y = \(\sqrt { x+\sqrt { x+………..\infty } } \) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ………………………. होगा।
  4. यदि x = r cos θ, y = r sin θ हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ………………………. होगा।
  5. ex का \(\sqrt{x}\) के सापेक्ष अवकलज ………………………………. होगा।

उत्तर:

  1. \(\frac { \sqrt { 1-y^{ 2 } } }{ 1-2y^{ 2 } } \)
  2. sin ( \(\frac { n\pi }{ 2 } \) + x )
  3. \(\frac { 1 }{ 2y-1 } \)
  4. -cot θ
  5. 2\(\sqrt{x}\) ex

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प्रश्न 3.
निम्न कथनों में सत्य/असत्य बताइए –

  1. eloge x का अवकल गुणांक \(\frac{1}{x}\) है।
  2. यदि f (x) = \(\sqrt{x}\); x > 0 तो f'(2) का मान \(\frac { 1 }{ 2\sqrt { 2 } } \) है।
  3. कोई फलन f (x) किसी बिन्दु x = a पर अवकलनीय कहलाता है, जब Lf'(a) # Rf (a).
  4. sec-1a का x के सापेक्ष अवकल गुणांक 0 होता है।
  5. यदि y = aemx + Be-mx, तो = -m2y है।
  6. यदि y = sin-1 ( \(\frac { x-1 }{ x+1 } \) ) + cos-1 ( \(\frac { x-1 }{ x+1 } \) ) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = 0 होगा।
  7. प्रत्येक अवकलनीय फलन सतत् होता है।
  8. a2x का अवकल गुणांक a2xlog a.

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. असत्य
  6. सत्य
  7. सत्य
  8. असत्य।

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प्रश्न 4.
सही जोड़ी बनाइये –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 1
उत्तर:

  1. (d)
  2. (e)
  3. (a)
  4. (f)
  5. (h)
  6. (g)
  7. (c)
  8. (b)

प्रश्न 5.
एक शब्द/वाक्य में उत्तर दीजिए –

  1. \(\frac { 6^{ x } }{ x^{ 6 } } \) का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  2. y = eloge tanx का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  3. ax का n वाँ अवकलज ज्ञात कीजिए।
  4. y = sin(ax + b) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) का मान ज्ञात कीजिए।
  5. यदि x2 + y2 = sin xy, तो \(\frac{dy}{dx}\) का मान ज्ञात कीजिए।
  6. x के सापेक्ष log tan\(\frac{x}{2}\) का अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  7. sin-1 \(\frac { 2x }{ 1+x^{ 2 } } \) का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  8. e -logex का अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।

उत्तर:

  1. \(\frac { 6^{ x } }{ x^{ 6 } } \) [ [log 6 – \(\frac{6}{x}\) ]
  2. sec2 x
  3. ax(log a)n
  4. -a2 y
  5. \(\frac { ycosxy-2x }{ 2y-xcosxy } \)
  6. cosec x
  7. \(\frac { 2 }{ 1+x^{ 2 } } \)
  8. \(\frac { -1 }{ x^{ 2 } } \)

सांतत्य तथा अवकलनीयता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फलन के सभी असांतत्य के बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए, जबकि निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 2
हल:
x < 2 के लिए f (x) = 2x + 3 बहुपदी फलन है।
अत: x < 2 के लिए f (x) संतत फलन है। x > 2 के लिए f (x) = 2x – 3 बहुपदी फलन है।
अतः x > 2 के लिए f (x) संतत है।
अब हम केवल x = 2 पर f (x) की संततता का परीक्षण करेंगे।
x = 2 + h रखने पर
जब x → 2 तब h → 0
\(\underset { x\rightarrow 2^{ + } }{ lim } \) f(x) = \(\underset { h\rightarrow 0 }{ lim } \) 2(2 + h) – 3
= 2(2 + 0) – 3 = 4 – 3 = 1
x = 2 – h रखने पर
जब x → 2 तब h → 0
\(\underset { x\rightarrow 2^{ – } }{ lim } \) f(x) = \(\underset { h\rightarrow 0 }{ lim } \) 2(2 – h) + 3
= 2(2 – 0) + 3 = 7
f(2) = 2(2) + 3 = 7
\(\underset { x\rightarrow 2^{ – } }{ lim } \) f(x) = f(2) ≠ \(\underset { x\rightarrow 2^{ + } }{ lim } \) f(x)

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प्रश्न 2.
फलन के सभी असातत्य बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए, जबकि f निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 3
हल:
x ≠ 0 के लिए f (x) = \(\frac { |x| }{ x } \) संतत फलन है।
अत:
हम केवल x = 0 पर f (x) की संततता का परीक्षण करेंगे।
x = 0 + h रखने पर
जब x → 0 तब h → 0.
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 4
x = 0 – h रखने पर
जब x → 0 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 5
दिया है:
f (0) = 0
\(\underset { x\rightarrow 0^{ + } }{ lim } \) f (x) ≠ \(\underset { x\rightarrow 0^{ – } }{ lim } \) f (x) ≠ f (0)
अत: दिया गया फलन f(x), x = 0 पर असंतत है।

प्रश्न 3.
बिन्दु x = 0 पर निम्नलिखित फलन f (x) के सातत्य की जाँच कीजिए –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 6
हल:
f (x) = \(\frac { 1-cosx }{ x^{ 2 } } \), जब x ≠ 0
x = 0 + h रखने पर, x → 0 तो h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 7

MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 7a
पुनः x = 0 – h रखने पर, x → 0 तो h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 8
दिया है कि f (x) = \(\frac{1}{2}\) जब x = 0
या f (0) = \(\frac{1}{2}\)
इस प्रकार,
\(\underset { x\rightarrow 0^{ + } }{ lim } \) f(x) = \(\underset { x\rightarrow 0^{ + } }{ lim } \) f(x) = f(0)
अत: x = 0 पर f (x) संतत है।

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प्रश्न 4.
फलन f निम्न प्रकार से परिभाषित है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 9
दर्शाइये कि बिन्दु x = 4 के अतिरिक्त प्रत्येक बिन्दु पर संतत है।
हल:
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 10
स्पष्ट है कि x = 4 के लिये फलन f (x) संतत नहीं है क्योंकि
\(\underset { x\rightarrow 4^{ – } }{ lim } \) f (x) ≠ \(\underset { x\rightarrow 4^{ + } }{ lim } \) तथा f (4) = 0
जब x < 4 तब f (x) = – 1 जो कि एक अचर फलन है। अत: यह संतत फलन है। जब x > 4 तब f (x) = 1 जो कि एक अचर फलन है। अत: यह संतत फलन है।
अतः f (x) बिन्दु x = 4 के अतिरिक्त सभी बिन्दुओं पर संतत है। यही सिद्ध करना था।

प्रश्न 5.
k का मान ज्ञात कीजिए यदि फलन –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 11
बिन्दु x = \(\frac { \pi }{ 2 } \) + h रखने पर, जब x → \(\frac { \pi }{ 2 } \), तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 12
x = \(\frac { \pi }{ 2 } \) + h रखने पर, जब x → \(\frac { \pi }{ 2 } \) तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 13
x = \(\frac { \pi }{ 2 } \) – h रखने पर, जब x → \(\frac { \pi }{ 2 } \) तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 14
दिया है
f ( \(\frac { \pi }{ 2 } \) ) = 3
तथा दिया गया फलन संतत है।
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 15
⇒ \(\frac{k}{2}\) = \(\frac{k}{2}\) = 3
⇒ k = 6

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प्रश्न 6.
k का मान ज्ञात कीजिए यदि फलन –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 16
बिन्दु x = 2 पर संतत है।
हल: x = π + h रखने पर,
जब x → 7 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 17
x = π – h रखने पर
जब x → π तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 18
दिया गया फलन x = π पर संतत है।
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 19

प्रश्न 7.
निम्न फलन बिन्दु x = 0 पर संतत है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 20
k का मान ज्ञात कीजिये।
हल:
दिया है
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 21
दिया है –
f (0) = \(\frac{1}{2}\)
चूँकि फलन f (x) बिन्दु x = 0 पर संतत है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 21
⇒ \(\frac { k^{ 2 } }{ 2 } \) = \(\frac { k^{ 2 } }{ 2 } \) = \(\frac{1}{2}\)
⇒ k2 = 1 या k = ± 1

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प्रश्न 8.
a और b के बीच संबंध स्थापित कीजिए जिनके लिए –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 23
हल:
दिया है:
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 24
x = 3 + h रखने पर,
जब x → 3 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 24
x = 3 – h रखने पर,
जब x → 3 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 27
= a ( 3 – 0) + 1
= 3a + 1
f (3) = 3a + 1
∵ दिया गया पालन x = 3 पर संतत है।
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 26
⇒ 3a + 1 = 3b + 3
⇒ 3a = 3b + 2
⇒ a = b + \(\frac{2}{3}\)

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प्रश्न 9.
सिद्ध कीजिए कि फलन f (x) = |x – 1|, x ∈ R, x = 1 पर अवकलनीय नहीं है। (NCERT)
हल:
दिया है:
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 28
x = 1 – h रखने पर, जब x → 1 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 29
x = 1 + h रखने पर, जब x → 1 तब → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 30
अतः दिया गया फलन x = 1 पर अवकलनीय नहीं है।

प्रश्न 10.
दर्शाइए कि फलन
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 31
पर अवकलनीय नहीं है।
हल:
हम जानते हैं,
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 32
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 33

प्रश्न 11.
सिद्ध कीजिए कि फलन
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 34
यही सिद्ध करना था।
x = 0 पर संतत है तथा अवकलनीय भी।
हल: यहाँ f (0) = 0
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MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 35a
चूँकि f (0 + 0) = f (0 – 0) = f (0), अतएव x = 0 पर दिया हुआ फलन संतत है।
अब
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MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 36a
स्पष्टतः Rf’ (0) = Lf’ (0)
अतः x = 0 पर दिया हुआ फलन अवकलनीय है।
अतः दिया हुआ फलन x = 0 पर संतत है तथा अवकलनीय भी है। यही सिद्ध करना था।

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MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 1 उत्साह

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 1 उत्साह

उत्साह अभ्यास

उत्साह अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्साह के बीच किनका संचरण होता है?
उत्तर:
उत्साह के बीच धृति (धैर्य) और साहस का संचरण होता है।

प्रश्न 2.
लेखक ने वीरों के कितने प्रकार बताये हैं?
उत्तर:
लेखक ने वीरों के चार प्रकार बताये हैं-

  1. कर्मवीर
  2. युद्धवीर
  3. दानवीर, और
  4. दयावीर।

प्रश्न 3.
प्रयत्न किसे कहते हैं?
उत्तर:
बुद्धि द्वारा पूर्ण रूप से निश्चित की हुई व्यापार-परम्परा का नाम प्रयत्न है।

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उत्साह लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्येक कर्म में किस तत्त्व का योग अवश्य होता है?
उत्तर:
प्रत्येक कर्म में थोड़ा या बहुत बुद्धि का तत्त्व अवश्य होता है। कुछ कर्मों में बुद्धि और शरीर की तत्परता साथ-साथ चलती है। उत्साह की उमंग जिस प्रकार हाथ-पैर चलवाती है उसी प्रकार बुद्धि से भी कार्य करवाती है।

प्रश्न 2.
फलासक्ति का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
फलासक्ति से कर्म के लाघव की वासना उत्पन्न होती है। चित्त में यह आता है कि कर्म बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत-सा मिल जाए। इससे मनुष्य कर्म करने के आनन्द की उपलब्धि से भी वंचित रहता है।

प्रश्न 3.
कौन-सी भावना उत्साह उत्पन्न करती है? उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:
कर्म भावना उत्साह उत्पन्न करती है। किसी वस्तु या व्यक्ति के साथ उत्साह का सीधा लगाव नहीं होता। उदाहरणार्थ, समुद्र लाँघने के लिए उत्साह के साथ हनुमान उठे हैं उसका कारण समुद्र नहीं-समुद्र लाँघने का विकट कर्म है। अतः कर्मभावना ही उत्साह की जननी है।

उत्साह दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भय और उत्साह में क्या अन्तर है? (2009, 11)
उत्तर:
भय का स्थान दुःख वर्ग में आता है और उत्साह का आनन्द वर्ग में अर्थात् यदि किसी कठिन कार्य को हमें भयवश करना होता है तो उससे हमें कष्ट और दुःख का अनुभव होता है क्योंकि उस कार्य को करने में हमारी प्रवृत्ति नहीं होती। मन में उत्साह नहीं होता। हमारा मन चाहता है कि उक्त कार्य हमें न करना पड़े तो अच्छा रहे किन्तु उत्साह में मन के अन्दर सुख, उमंग, साहस और प्रेरणा का समावेश होता है। इसमें हम आने वाली कठिन परिस्थिति के भीतर भी साहस का अवसर ढूँढ़ते हैं और निश्चय करने से मन में प्रस्तुत कार्य को करने के सुख की उमंग का अनुभव करते हैं। अतः हम आनन्दित होकर उस कार्य को करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार भय में दुःख और उत्साह में आनन्द की सृष्टि होती है।

प्रश्न 2.
किसी कर्म के अच्छे या बुरे होने का निश्चय किस आधार पर होता है? उत्साह के सन्दर्भ में सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (2008)
उत्तर:
किसी कार्य के अच्छे या बुरे होने का निश्चय अधिकतर उसकी प्रवृत्ति के शुभ या अशुभ परिणाम के विचार से होता है। वही उत्साह जो कर्त्तव्य कर्मों के प्रति इतना सुन्दर दिखाई पड़ता है, अकर्त्तव्य कर्मों के प्रति होने पर वैसा प्रशंसनीय नहीं प्रतीत होता। आत्म-रक्षा, पर-रक्षा, देश-रक्षा आदि के निमित्त साहस की जो उमंग देखी जाती है और उसमें जो सौन्दर्य निहित है वह पर-पीड़ा, डकैती आदि जैसे साहसिक कार्यों में कभी दिखाई नहीं देता अर्थात् उत्साह में साहस और सौन्दर्य दोनों निहित हैं। अच्छे कर्मों को करने में दोनों होते हैं और उनकी प्रशंसा की जाती है। बुरे कर्मों को करने वाले उत्साह में केवल साहस होता है, सौन्दर्य नहीं होता। अत: ऐसा उत्साह प्रशंसनीय नहीं कहा जाता है।

प्रश्न 3.
उत्साह का अन्य कर्मों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
उत्साह में मनुष्य आनन्दित होता है और उस आनन्द के कारण उसके मन में एक ऐसी स्फूर्ति उत्पन्न होती है जो एक के साथ उसे अनेक कार्यों के लिए अग्रसर करती है। यदि मनुष्य को उत्साह से किए किसी एक कार्य में बहुत-सा लाभ हो जाता है या उसकी कोई बहुत बड़ी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो अन्य जो कार्य उसके सामने आते हैं उन्हें भी वह बड़े हर्ष और तत्परता के साथ करता है। उसके इस हर्ष और तत्परता में कारण उत्साह ही होता है। इसी प्रकार किसी उत्तम फल या सुख प्राप्ति की आशा या निश्चय से उत्पन्न आनन्द, फलोन्मुखी प्रयत्नों के अतिरिक्त अन्य दूसरे कार्यों के साथ संलग्न होकर उत्साह के रूप में दिखाई देता है। यदि हम किसी ऐसे उद्योग में संलग्न हैं जिससे भविष्य में हमें बहुत लाभ या सुख प्राप्त होने की आशा है तो उस उद्योग को हम बहुत उत्साह से करते हैं। इस प्रकार उत्साह का अन्य कर्मों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 4.
इन गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(अ) आसक्ति प्रस्तुत ………. का नाम उत्साह है।
(ब) धर्म और उदारता ………. सच्चा सुख है।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में आचार्य जी ने बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि कर्मफल में। तभी उसे अपने कार्य में आनन्द की उपलब्धि हो सकती है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि मनुष्य को लगाव अथवा आसक्ति अपने संकल्पित कर्म में होनी चाहिए क्योंकि हमारे सामने तो वह कर्म ही प्रस्तुत होता है जिसे हमें करना होता है अथवा वह वस्तु जिसे पाने का लक्ष्य हो, उसमें आसक्ति का होना उचित है क्योंकि तब हम कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित होंगे। इसका कारण है कि कर्म अथवा वह वस्तु तो हमारे सम्मुख उपस्थित है जिसे हमें करना है अथवा पाना है किन्तु उसका फल तो दूर रहता है फिर हम फल में आसक्ति क्यों करे।

फल में आसक्ति करने से कर्म करने का आनन्द जाता रहता है और हम कर्म करने से विरत हो जाते हैं। अतः हमें अपने कर्म का लक्ष्य ही ध्यान में रखना चाहिए। कर्म का लक्ष्य ध्यान रखने पर हमें कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। उससे एक प्रकार की उत्तेजना अथवा उमंग हमारे मन में भी भर जाती है। इससे हमें कार्य करते समय निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती रहती है। कर्म करने की उत्तेजना और आनन्द की अनुभूति इसी को उत्साह मनोभाव के नाम से जाना जाता है।

(ब) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्य खण्ड में लेखक ने बताया है कि जब मनुष्य उच्च और लोकोपकारी कर्म करता है तो उसे कर्म करते हुए ही फल की प्राप्ति के आनन्द की अनुभूति होने लगती है। इससे उसका मन एक दिव्य प्रकार के आनन्द से भर जाता है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि धर्म और उदार दृष्टिकोण से युक्त होकर जो कार्य किए जाते हैं उन कार्यों का आदर्श ऊँचा होता है। इनमें स्वतः ही एक ऐसा अलौकिक आनन्द भरा हुआ होता है कि जब कर्ता इन्हें करने में अग्रसर होता है तो उसे ऐसे आनन्द की प्रतीति होती है जैसे कि उसे उनका फल प्राप्त हो गया हो अर्थात् पर-कल्याण की भावना से युक्त होकर किए जाने वाले कार्य ही कर्ता को फल प्राप्ति जैसे आनन्द की अनुभूति करा देते हैं। ऐसा व्यक्ति अत्याचार और अनाचार को नष्ट करने में अपना पुरुषार्थ मानता है। संसार से कलह और संघर्ष को समाप्त करने में वह कर्त्तव्यनिष्ठ होता है। उसका चित्त एक अलौकिक उल्लास और आनन्द से भर जाता है। उसके मन में अच्छे कार्य करने का परम सन्तोष होता है। ऐसे व्यक्ति को ही कर्मवीर कहा जाता है। ऐसा कर्मवीर मनुष्य अपने कर्मों द्वारा संसार का उपकार करता है। इससे उसे भी परम सुख की प्राप्ति होती है।

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प्रश्न 5.
(अ) साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है।
(ब) कर्म में आनन्द उत्पन्न करने वालों का नाम ही कर्मण्य है। उपर्युक्त वाक्यों का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(अ) साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है-जब हमारे मन में किसी कार्य को करने का उत्साह होता है तो उस उत्साह में आनन्द की उमंग छिपी होती है अर्थात् उत्साह की अवस्था में कठिन स्थिति आने पर उसका सामना हम साहस से करते हैं। उस साहस में कर्म करने का सुख निहित रहता है। यही आनन्द की उमंग होती है, जिससे संकल्पित कार्य को हम पूर्ण तत्परता और मनोयोग से करते हैं। तब हमें कठिन परिस्थिति भी कठिन नहीं प्रतीत होती। इसी को उत्साह कहा जाता है।

(ब) कर्म में आनन्द उत्पन्न करने वालों का नाम ही कर्मण्य है-कर्म करने वाला अथवा कर्मण्य उसी को कहा जाता है जो प्रत्येक कर्म को आनन्दपूर्ण होकर सम्पादित करता है। आनन्दपूर्ण स्थिति उत्साह से प्राप्त होती है। उत्साह में आनन्द और कर्म करने की तत्परता दोनों का समावेश होता है। जो कार्य बिना उत्साह के किए जाते हैं वे एक प्रकार से विवशता अथवा भय ही प्रकट करते हैं। उनका परिणाम प्रायः दुःख ही रहता है। इसीलिए जो कर्म करने के महत्त्व को जानता है, वह कर्म उत्साह से सम्पादित करता है। वह कर्म में एक विशेष प्रकार का आनन्द उत्पन्न कर लेता है। अतः वास्तविक रूप में उसी को कर्मण्य अथवा कार्य करने वाला कहा जाता है।

उत्साह भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी पर्याय लिखिएहाकिम, मिजाज, मुलाकात, अर्दली, सलाम।
उत्तर:
अधिकारी, स्वभाव, मिलन, सेवक, नमस्ते।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिएभय, दु:ख, हानि, शत्रु, उपस्थित।
उत्तर:
निर्भय, सुख, लाभ, मित्र, अनुपस्थित।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग छाँटकर लिखिएविशेष, आघात, उत्कर्ष, अप्राप्ति, विशुद्ध।
उत्तर:
वि, आ, उत्, अ, वि।

प्रश्न 4.
पाठ में आए हुए विभिन्न योजक शब्दों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
आनन्द-वर्ग, साहस-पूर्ण, कर्म-सौन्दर्य, साहित्य-मीमांसकों, दान-वीर, दया-वीर, आनन्द-पूर्ण, हाथ-पैर, पर-पीड़न, प्रसन्न-मुख, आराम-विश्राम, दस-पाँच, इधर-उधर, आते-जाते, साथ-साथ, कर्म-शृंखला, युद्ध-वीर, कर्म-प्रेरक, कर्म-स्वरूप, विजय-विधायक, कीर्ति-लोभ-वश, श्रद्धा-वश, कर्म-भावना, फल-भावना, धन-धान्य, प्रयत्न-कर्म, एक-एक, व्यापार-परम्परा, ला-लाकर, दौड़-धूप, आत्म-ग्लानि, सोच-सोचकर, फल-स्वरूप, कर्म-वीर, थोड़ा-थोड़ा, बहुत-सा, स्थिति-व्याघात, सलाम-साधक।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध रूप में लिखिए
(अ) आप पुस्तक क्या पढ़ेंगे?
(आ) कितना वीभत्स दृश्य है, ओह ! यह !
(इ) बीमार को शुद्ध भैंस का दूध पिलाइए।
(ई) एक फूलों की माला लाओ।
(उ) छब्बीस जनवरी का भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व है।
(ऊ) यह बहुत सुन्दर चित्र है।
उत्तर:
शुद्ध वाक्य-
(अ) क्या आप पुस्तक पढ़ेंगे?
(आ) ओह ! यह कितना वीभत्स दृश्य है?
(इ) बीमार को भैंस का शुद्ध दूध पिलाइए।
(ई) फूलों की एक माला लाओ।
(उ) भारत के इतिहास में छब्बीस जनवरी का बहुत महत्त्व है।
(ऊ) यह चित्र बहुत सुन्दर है।

उत्साह पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित निबन्ध-ग्रन्थ चिन्तामणि-भाग 1 से संकलित है। प्रस्तुत निबन्ध में आचार्य जी ने ‘उत्साह’ मनोभाव की विश्लेषणात्मक विवेचना करते हुए बताया है कि यह एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को कार्य में प्रवृत्त रखने के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। उत्साह कार्य करने की एक आनन्दमय अवस्था है। इससे कठिन से कठिन कार्य सम्पादित करने में भी मन को थकान नहीं होती अपितु कार्य में एक तरह का आनन्द प्राप्त होता है जो मन को प्रफुल्लित बनाये रखता है। किसी कार्य में सफलता तभी मिल पाती है। जब उस कार्य को करने के लिए हमारे मन में उत्साह हो। साहसपूर्ण आनन्द की उमंग उत्साह है। उत्साह से कार्य करने वाले व्यक्ति ही युद्धवीर, दानवीर और दयावीर कहलाते हैं।

उत्साह कठिन शब्दार्थ 

आनन्द वर्ग = आनन्द का वर्गीकरण। कर्म सौन्दर्य = कार्य की सुन्दरता। उपासक = पुजारी, आराधना करने वाले। श्लाध्य = प्रशंसनीय। उत्कण्ठापूर्ण = जिज्ञासायुक्त। साहित्य-मीमांसक = साहित्य की मीमांसा (विवेचन, विश्लेषण आदि) करने वाले। आघात = चोट। परवा = चिन्ता, फिक्र। चरम उत्कर्ष = पराकाष्ठा। स्फुरित = फड़कना। धीरता = धैर्य, मन की स्थिरता। निश्चेष्ट = चेष्टा या प्रयत्न रहित। धुति = धैर्य। संचरण = संचार। अकर्तव्य कर्मों = न करने योग्य कार्यों। परपीड़न = दूसरे को सताना। विशुद्ध = शुद्ध, पूर्णतया। शौर्य = वीरता का भाव। सुभीते = सुविधा, आराम। विजेतव्य = विजय करने योग्य। आलम्बन = आधार। दुस्साध्य = कठिनता से प्राप्त होने वाला। निर्दिष्ट = निर्देशित। यौगिक= मिला-जुला। उन्मुख = उत्साहयुक्त। अनुष्ठान = सम्पादन करना, संकल्पित कार्य पूर्ण करना। आसक्ति = लगाव। लाघव = लघुता, छोटा करना, कौशल। फलासक्ति = फल की इच्छा। वासना = इच्छा। कर्मण्य = कर्म करने वाला। दिव्य = अलौकिक।शमन = शान्त करना। आत्मग्लानि = मन ही मन पछतावा। फलोन्मुख = फल प्राप्ति का इच्छुक। लोकोपकारी = संसार की भलाई करने वाला (कल्याण करने वाला)। क्रुद्ध = क्रोधित। व्याघात = व्यवधान, बाधा। सलाम साधक = दुआ सलाम करने वाले। हाकिमों = अधिकारियों। अर्दलियों = सेवकों। मिजाज = स्वभाव, आदत।

उत्साह संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. उत्साह में हम आने वाली कठिन स्थिति के भीतर साहस के अवसर के निश्चय द्वारा प्रस्तुत कर्म सुख की उमंग से अवश्य प्रयत्नवान् होते हैं। कष्ट या हानि सहने के साथ-साथ कर्म में प्रवृत्त होने के आनन्द का योग रहता है।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘उत्साह’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में शुक्ल जी ने ‘उत्साह’ मनोविकार पर प्रकाश डालते हुए उसकी विशेषताएँ बतलाई हैं।

व्याख्या :
जब हमारे मन के अन्दर उत्साह के भाव का संचार होता है तो हम कठिन से कठिन परिस्थिति की चिन्ता नहीं करते हैं और मन में आनन्द की उमंग के साथ उस कार्य को करने में प्रवृत्त होते हैं। तब हमारे मन में एक नया साहस भरा हुआ होता है। इस साहस और कार्य करने के सुख से कठिनाइयों को सहन करते हुए भी हम अपने संकल्पित कार्य में संलग्न रहते हैं। हमारे मन में इस बात का उत्साह रहता है कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे। कष्ट हो अथवा हानि हो, हम इसकी चिन्ता नहीं करते। अत: यह स्पष्ट है कि उत्साह का भाव हमारे मन में कार्य में संलग्न होने के साथ-साथ एक आनन्दमय अनुभूति भी प्रदान करता है जिससे हम विषम परिस्थिति में भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रहते हैं।

विशेष :

  1. उत्साह मनोभाव का मनोविश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
  2. उत्साह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है, लेखक ने इस बात पर प्रकाश डाला है।
  3. शैली विचारोत्तेजक एवं गवेषणापूर्ण है। भाषा सरल, सुबोध और साहित्यिक हिन्दी है।

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2. आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है। इससे आसक्ति उसी में चाहिए, फल दूर रहता है इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनन्द से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनन्द कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है। (2016)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में आचार्य जी ने बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि कर्मफल में। तभी उसे अपने कार्य में आनन्द की उपलब्धि हो सकती है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि मनुष्य को लगाव अथवा आसक्ति अपने संकल्पित कर्म में होनी चाहिए क्योंकि हमारे सामने तो वह कर्म ही प्रस्तुत होता है जिसे हमें करना होता है अथवा वह वस्तु जिसे पाने का लक्ष्य हो, उसमें आसक्ति का होना उचित है क्योंकि तब हम कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित होंगे। इसका कारण है कि कर्म अथवा वह वस्तु तो हमारे सम्मुख उपस्थित है जिसे हमें करना है अथवा पाना है किन्तु उसका फल तो दूर रहता है फिर हम फल में आसक्ति क्यों करे।

फल में आसक्ति करने से कर्म करने का आनन्द जाता रहता है और हम कर्म करने से विरत हो जाते हैं। अतः हमें अपने कर्म का लक्ष्य ही ध्यान में रखना चाहिए। कर्म का लक्ष्य ध्यान रखने पर हमें कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। उससे एक प्रकार की उत्तेजना अथवा उमंग हमारे मन में भी भर जाती है। इससे हमें कार्य करते समय निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती रहती है। कर्म करने की उत्तेजना और आनन्द की अनुभूति इसी को उत्साह मनोभाव के नाम से जाना जाता है।

विशेष :

  1. लेखक ने गीता में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए उपदेश ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का प्रतिपादन करते हुए बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि फल में। फल में आसक्ति होने से मनुष्य के मन में लोभ आदि वासनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और कर्म करने का आनन्द समाप्त हो जाता है। तब कर्म में उसकी प्रवृत्ति न होने से उसके जीवन में उत्साह नहीं रहता।
  2. शैली विचारोत्तेजक, गवेषणात्मक है।
  3. भाषा सरल, सहज और बोधगम्य है।

3. कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनन्द भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फलस्वरूप लगते हैं। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है वही लोकोपकारी कर्मवीर का सच्चा सुख है। (2008, 09, 14)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्य खण्ड में लेखक ने बताया है कि जब मनुष्य उच्च और लोकोपकारी कर्म करता है तो उसे कर्म करते हुए ही फल की प्राप्ति के आनन्द की अनुभूति होने लगती है। इससे उसका मन एक दिव्य प्रकार के आनन्द से भर जाता है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि धर्म और उदार दृष्टिकोण से युक्त होकर जो कार्य किए जाते हैं उन कार्यों का आदर्श ऊँचा होता है। इनमें स्वतः ही एक ऐसा अलौकिक आनन्द भरा हुआ होता है कि जब कर्ता इन्हें करने में अग्रसर होता है तो उसे ऐसे आनन्द की प्रतीति होती है जैसे कि उसे उनका फल प्राप्त हो गया हो अर्थात् पर-कल्याण की भावना से युक्त होकर किए जाने वाले कार्य ही कर्ता को फल प्राप्ति जैसे आनन्द की अनुभूति करा देते हैं। ऐसा व्यक्ति अत्याचार और अनाचार को नष्ट करने में अपना पुरुषार्थ मानता है। संसार से कलह और संघर्ष को समाप्त करने में वह कर्त्तव्यनिष्ठ होता है। उसका चित्त एक अलौकिक उल्लास और आनन्द से भर जाता है। उसके मन में अच्छे कार्य करने का परम सन्तोष होता है। ऐसे व्यक्ति को ही कर्मवीर कहा जाता है। ऐसा कर्मवीर मनुष्य अपने कर्मों द्वारा संसार का उपकार करता है। इससे उसे भी परम सुख की प्राप्ति होती है।

विशेष :

  1. लेखक के अनुसार जो मनुष्य संसार के हित को ध्यान में रखते हुए उदार दृष्टिकोण से कार्य करता है वही कर्मवीर होता है और वही कर्म करने में सच्चे आनन्द की उपलब्धि पाता है।
  2. शैली विचारपरक और मनोविश्लेषणात्मक है।
  3. भाषा सरल, सहज और बोधगम्य, साहित्यिक हिन्दी है।

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MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अभ्यास

सामाजिक समरसता अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा किस ज्ञान को उपयोगी माना है?
उत्तर:
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष ज्ञान को उपयोगी माना है।

प्रश्न 2.
राधा दुःखी माता यशोदा को क्या कहकर सांत्वना देती थीं?
उत्तर:
‘श्रीकृष्ण ब्रज को कैसे छोड़ सकते हैं वे अवश्य लौटकर आयेंगे’ यह कहकर राधा यशोदा को सांत्वना देती थीं।

प्रश्न 3.
राधा अपने विरह जनित दुःख को छिपाने के लिए किस प्रकार का बहाना बनाती थीं?
उत्तर:
‘मैं रो नहीं रही हूँ, मेरी आँखों में अति हर्ष का पानी छलक आया है।’ यह बहाना बनाकर राधा अपने दुख को छिपाती थीं।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के व्यथित होने का क्या कारण था? (201 15, 16)
उत्तर:
श्रीकृष्ण का ब्रज छोड़कर मथुरा चले जाना ब्रजवासियों के व्यथित होने का कारण था।

प्रश्न 5.
कबीर का मन फकीरी में क्यों सुख पाता है?
उत्तर:
नाशवान जगत से परे रहकर राम नाम के भजन का आनन्द मिलने के कारण कबीर को फकीरी में सुख प्राप्त होता है।

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सामाजिक समरसता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने संसार को पागल क्यों कहा है? भाव स्पष्ट कीजिए। (2017)
अथवा
‘साधो देखो जग बौराना’ पद के माध्यम से कबीर क्या कहना चाहते हैं? (2008)
उत्तर:
कबीर कहते हैं कि संसार पागल हो गया है। उससे सत्य बात कही जाय तो वह मारने दौड़ता है और जो झूठ कहते हैं उनका वह विश्वास कर लेता है। हिन्दू और मुसलमान राम तथा रहीम नाम पर झगड़ते हैं जबकि दोनों एक ही हैं। नियमी-धर्मी और पीर-औलिया नाना पाखण्ड करते हैं किन्तु संसार उन्हीं के बहकावे में आ जाता है। संसार के लोग सच्चे गुरु द्वारा बताए गए ज्ञान के मार्ग का अनुसरण न करके जीवन को नष्ट करने वाले संसार की ओर आकर्षित होते हैं। इससे स्पष्ट है कि वे पागल हो गए हैं।

प्रश्न 2.
कबीर ने कर्मकाण्ड पर करारा प्रहार किया है। स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
कबीर धार्मिक पाखण्ड के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कर्मकाण्ड पर करारे प्रहार किये हैं। वे कहते हैं किं बहुत से तथाकथित नियमों का पालन करने वाले धर्मात्मा मिले हैं जो प्रात:काल ही स्नान कर लेते हैं किन्तु आत्मा की आवाज न मानकर स्थूल पत्थर की पूजा करते हैं। उनका ज्ञान खोखला एवं दिखावटी है। इसी प्रकार अनेक पीर-औलिया देखें हैं जो वक्तव्य देकर अपने शिष्य बनाते हैं, किन्तु वे भी खुदा को नहीं जानते हैं। उनके हृदय में दया, अनुकम्पा आदि मानवीय भाव नहीं होते हैं।

प्रश्न 3.
राधा ने विरह व्यथा में डूबे ब्रजवासियों को कर्त्तव्य पालन का उपदेश क्यों दिया था? (2008)
उत्तर:
भारतीय संस्कृति का मूलाधार कर्म है। यहाँ कर्म को सर्वोपरि माना गया है। जीवन की सार्थकता कर्म में ही है। इसलिए राधा श्रीकृष्ण के विरह की वेदना में डूबे ब्रजवासियों को समझाती हैं कि उन्हें श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लग जाना चाहिए। इससे श्रीकृष्ण जो चाहते थे वे कार्य पूर्ण होंगे और ब्रजवासियों को भी सन्तोष होगा कि वे श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों को कर रहे हैं। कर्म करने से व्यक्ति को मानसिक सन्तोष भी मिलता है। ब्रजवासी जब कामों में लग जायेंगे तो उनका ध्यान भी बँटेगा। वे धीरे-धीरे विरह कष्ट से छुटकारा पा लेंगे।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के सुख-दुःख दूर करने के लिए राधा ने क्या-क्या उपाय किए थे?
उत्तर:
राधा ने नन्द, यशोदा, गोप, गोपियों, बच्चों, पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों के प्रति दया, सहानुभूति एवं सेवा का भाव अपनाया। उन्होंने यशोदा को कृष्ण के लौटने का आश्वासन दिया तो नंद को शास्त्रों का ज्ञान सुनाया। गोपों को श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाकर, बालकों को फूलों के खिलौने देकर तथा गोपियों को कृष्ण की लीला के गीत, वंशी तथा वीणा सुनाकर प्रसन्न किया। उन्होंने वृद्ध-रोगियों तथा अनाथों की सेवा की तथा दीन-हीन, निर्बलों एवं विधवाओं को सहारा दिया। इस तरह उन्होंने सभी के संताप (दुःख) दूर करने के लिए अनेक उपाय अपनाए।

प्रश्न 5.
राधा ब्रजबालाओं का दुःख किस प्रकार दूर करती थी?
उत्तर:
राधा ने ब्रजबालाओं का विरह दुःख दूर करने के लिए सेवा धर्म अपनाया था। उन्होंने यशोदा का दुःख पैर सहलाकर, आँखों के आँसू पोंछकर तथा सांत्वना देकर दूर किया तो नन्द का दुःख उनकी सेवा करके तथा शास्त्र ज्ञान सुनाकर समाप्त किया। गोपों की पीड़ा को कम करने के लिए उन्हें श्रीकृष्ण के काम में लगाया। विरहिणी गोपियों को श्रीकृष्ण की लीलाएँ वंशी आदि सुनाई और उनके दुःख को शान्त करने का प्रयास किया। बच्चों को फूलों के खिलौने देकर प्रसन्न करती तो रोगियों, अनाथों, विधवाओं, दीन-हीनों को सहारा देकर उनका कष्ट मिटाया। इस तरह राधा सभी की वेदना दूर करने का प्रयास करती थीं।

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सामाजिक समरसता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संकलित अंशों के आधार पर कबीर के विचार लिखिए।
उत्तर:
इस प्रश्न के उत्तर के लिए ‘कबीर की वाणी’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
(अ) मन लाग्यौ मेरा फकीरी में
जो सुख पायौ नाम भजन में, सो सुख, नाहि अमीरी में।
भला-बुरा सबकों सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।

(आ) तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सत गुरु धारा निरमल बाहे, वा में काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे॥
उत्तर:
इन पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

प्रश्न 3.
‘राधा की समाज सेवा’ विषय का केन्द्रीय भाव लिखिए। (2009)
उत्तर:
इसके लिए ‘राधा की समाज सेवा’ का भाव-सारांश पढ़िए।

प्रश्न 4.
“अपने दुःख को भुला देने का सबसे अच्छा उपाय है, अपने को किसी और काम में लगा देना।” राधा ने इस आदर्श का पालन किस प्रकार किया? (2009)
उत्तर:
जब व्यक्ति दुःखी होता है तब उसके चित्त पर बड़ा दबाव रहता है। इसलिए यह माना गया है कि दु:ख के समय व्यक्ति स्वयं को किसी अन्य कार्य में संलग्न कर दे ताकि उसका ध्यान उस कार्य से बँट जाए और दुःख भूल में पड़ जाए। जब श्रीकृष्ण ब्रजवासियों को बिलखता छोड़कर मथुरा चले गये तो उनकी प्रेमिका विरह वेदना से ग्रस्त हो गयी। उन्होंने उस वियोग की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए स्वयं को समाज की सेवा में संलग्न कर दिया। वे यशोदा को सांत्वना देने, उसके पैर सहलाने, आँसू पोंछने का कार्य करने लगीं। ब्रज के राजा नन्द को शास्त्र सुनाने लगीं। गोपों को काम में संलग्न कर दिया। गोपियों को कृष्ण लीला सुनाना और वंशी बजाकर प्रसन्न करना प्रारम्भ कर दिया। बच्चों को विविध फूलों के खिलौने देकर बहलाया। वृद्धों, रोगियों, अनाथों, विधवाओं आदि को सहारा देने में व्यस्त हो गयीं। इस तरह सभी की सेवा में व्यस्त होने के कारण वे अपना दुःख भूल गयीं।

प्रश्न 5.
“पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थीं।” आधुनिक सन्दर्भ में इसकी उपयोगिता समझाइए।
उत्तर:
वृक्ष-वनस्पतियाँ प्रदूषण को नियन्त्रित करने में बड़ी सहयोगी होती हैं। जितनी अधिक हरियाली होगी उतना पर्यावरण सुधार होगा। राधा को इस बात का ज्ञान था इसीलिए वे पेड़-पौधों की पत्तियों को व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। आज संसार भर में पर्यावरण प्रदूषण का प्रकोप है इसीलिए नाना प्रकार के वृक्ष लगाने के अभियान चलाये जा रहे हैं। वन संरक्षण की अनेक योजनाओं का कार्यान्वयन हो रहा है। हरित पट्टिकाएँ तथा हरित क्षेत्र निर्धारित किए जा रहे हैं ताकि हरियाली बनी रहे और मनुष्य को प्रदूषण से कुछ मुक्ति मिले। आज के वैज्ञानिक युग में प्राकृतिक सम्पदा का महत्त्व और बढ़ गया है। इस प्रकार के विचार हरिऔध के समय में आने लगे थे। इसीलिए उन्होंने राधा के द्वारा वनस्पतियों के संरक्षण का कार्य कराया है।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए
(अ) हो उद्विग्ना बिलख ………….. तजेंगे।
(आ) सच्चे स्नेही ………….. कोई न होवे।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

सामाजिक समरसता काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
पथरा, चदरिया, कागद, जुग, जतन, हाथ।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए
पृथ्वी, आँख, पक्षी, पुष्प, दिन।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-2

प्रश्न 3.
कबीर के संकलित पदों में कौन-सा रस है?
उत्तर:
कबीर के संकलित पदों में शान्त रस है।

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प्रश्न 4.
कबीर की भाषा के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
कबीर भ्रमण करने वाले सन्त थे। वे यहाँ-वहाँ जाकर जनमानस को ज्ञान का उपदेश दिया करते थे। वे एक स्थान पर स्थिर होकर नहीं रहे। अतः उनकी भाषा में विविध क्षेत्रों के शब्द आ गये हैं। इसलिए उनकी भाषा को खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है। ब्रज, अरबी, फारसी, अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली, उर्दू आदि सभी भाषाओं के शब्द कबीर के काव्य में मिल जाते हैं। विविध भाषाओं का संगम होते हुए भी कबीर की भाषा में अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में अलंकार पहचानकर लिखिए-
(अ) काहे के ताना काहे के मरनी, कौन तार से बीनी चदरिया।
(आ) जुगन जुगन समुझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
(इ) राधा जैसी सदय हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
(ई) पूजी जाती ब्रज अवनि में देवियों सी अतः थी।
उत्तर:
(अ) अनुप्रास
(आ) पुनरुक्तिप्रकाश
(इ) उपमा
(ई) उपमा।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए (2009)
(क) आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।
(ख) साधो देखो जग बौराना, सांची कहो तो मारन धावै झूठे जग पतियाना।
उत्तर:
(क) इस पंक्ति में सन्त कबीर ने भौतिक जगत् की नश्वरता का बोध कराया है। संसार की वस्तुओं पर अभिमान करना जीव की अज्ञानता है। ये सभी तो नष्ट होने वाली हैं। जिस शरीर के बल पर जीव अहंकार पाले फिरता है, एक दिन यह मिट्टी में मिल जाता है। इसलिए इस पर गर्व करना व्यर्थ है। अमर तो केवल आत्मा है, उसी का अनुसरण करना चाहिए।

(ख) साक्षात संसार से ज्ञान अर्जित करने वाले सन्त कबीर कहते हैं कि इस संसार के लोग अज्ञान अहंकार में फंसकर पागल हो गये हैं। यही कारण है कि जब उनसे सत्य बात कही जाती तो मारने दौड़ते हैं; उसका विश्वास नहीं करते हैं किन्तु कोई झूठा व्यक्ति उनसे कुछ कहता है तो वे उसका विश्वास कर लेते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
गुण, प्रेम, सदय, विधवा, सबल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-3

प्रश्न 8.
छन्द किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
मात्रा, वर्ण संख्या, यति, गति (लय) तथा तुक आदि के नियमों से युक्त रचना छन्द कहलाती है।
छन्द दो प्रकार के होते हैं।-
(1) मात्रिक छन्द-इसमें मात्राओं की गणना की जाती है।
(2) वर्णिक छन्द-इसमें वर्गों की गणना की जाती है।

प्रश्न 9.
आपकी पाठ्य-पुस्तक के पद्य भाग में कौन-कौन से पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं?
उत्तर:
हमारी पाठ्य-पुस्तक के विनय के पद, पदावली, कृष्ण की बाल लीलाएँ, पद्माकर के छन्द, मतिराम के छन्द, वृन्द के दोहे, रहीम के दोहे, ऋतु वर्णन, नौका विहार, छत्रसाल का शौर्य वर्णन, कविता का आह्वान, कबीर की वाणी, कुण्डलियाँ, दुष्यन्त की गजलें, बरसो रे तथा चलना हमारा काम है पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित पंक्तियों में गण पहचानिए
(क) जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
(ख) आटा चींटी विहग गण थे वारि औ अन्न पाते।
उत्तर:
(क) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽऽ। ऽऽ।
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
जो वे हो ता मलि न लख ती गोप के बाल कौं को
(ख) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽ।ऽ ऽ।ऽ
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
आटा ची टी विह गगण थेवारि औ अन्न पाते

प्रश्न 11.
निम्नलिखित काव्यांश में निहित काव्य सौन्दर्य को लिखिए
(अ) तो धीरे मधुर स्वर से हो विनीता बताती।।
हाँ आवेंगे व्यथित ब्रज को श्याम कैसे तजेंगे।
(आ) गाके लीला स्व प्रियतम की वेणु वीणा बजा के।
प्यारी बातें कथन करके वे उन्हें बोध देतीं।
उत्तर:
इन काव्यांशों के काव्य सौन्दर्य इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

कबीर की वाणी भाव सारांश

सारग्राही सन्त कबीर ने सभी धर्मों के सत्य को ग्रहण कर मानवतावादी व्यावहारिक धर्म अपनाया। जीवन के प्रत्यक्ष ज्ञान के सहारे उन्होंने सत्यासत्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उन्होंने बाह्य आडम्बरों, पाखण्डों, द्वेष-भावनाओं का डटकर विरोध किया। संकलित पदों में उन्होंने उन्हीं भावों को व्यक्त किया। फकीरी में रमने वाले कबीर को अमीरी के बजाय भगवान् का भजन प्रिय है। इस शरीर को नश्वर कहने वाले कबीर सन्तोष को सर्वोपरि मानते हैं। उन्हें पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान पर विश्वास है। इसीलिए वे समझाते हैं कि सजग रहकर सच्चे गुरु के बताये मार्ग पर चलकर ही उद्धार हो सकता है। धर्म या सम्प्रदाय के नाम पर आडम्बर करने वालों को उन्होंने खूब फटकारा है। उनके लिए राम और रहीम एक हैं। पत्थर पूजा, जीव हत्या आदि में संलग्न ढोंगी हिन्दू-मुसलमानों को उन्होंने करारी डाँट लगाई है। वे सत्य पर आधारित मानवता को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं।

कबीर की वाणी संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] मन लाग्यो मेरा यार फकीरी में।
जो सुख पावों नाम भजन में, सो सुख नाहि अमीरी में।।
भला-बुरा सबको सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।।
प्रेमनगर में रहनि हमारी, भलि बनि आई सबूरी में।।
हाथ में पूड़ी बगल में सोंटा, चारों दिसा जगीरी में।।
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी में ।।1।।

शब्दार्थ :
फकीरी = वैराग्य; अमीरी = वैभव सम्पन्नता; गुजरान = गुजारा; भलि = भला; सबूरी = सन्तोष; कँड़ी = पत्थर की बनी कटोरी; सोंटा = डण्डा, छड़ी; खाक = धूल; मगरूरी = अहंकार, अभिमान; साहिब = स्वामी।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद (शब्द) हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘कबीर की वाणी’ से अवतरित है। इसके रचयिता सन्त कबीरदास हैं।

प्रसंग :
इस पद में कवि ने मन की वैराग्य प्रवृत्ति पर बल दिया है।

व्याख्या :
कबीर कहते हैं कि मेरा मन तो वैराग्य में लग गया है। मुझे जो आनन्द परमब्रह्म के भजन में मिला है; वह वैभव सम्पन्नता में नहीं मिल सकता है। अमीरी नाशवान है और अस्थायी सुख देने वाली है। जबकि ब्रह्म परमानन्द देने वाले हैं। अभिमान से दूर रहकर जो कोई भला-बुरा कहे उसे सहन करके गरीबी में गुजारा करना अच्छा है। कवि का निवास तो प्रेम की नगरी है अर्थात् जहाँ प्रेम भाव है वहीं रहना उचित है। सन्तोष सबसे अधिक हितकारी है इसलिए मेरे हाथ में पूड़ी आदि पात्र तथा बगल में एक डण्डा रहता है। इनके साथ मैं संसार की चारों दिशाओं में चाहे जहाँ जाने को मुक्त हूँ। सांसारिक बन्धन व्यर्थ हैं, धन, वैभव अस्थिर हैं क्योंकि अन्त में यह शरीर मिट्टी में मिल जायेगा। अतः सम्पत्ति, बल आदि का अभिमान करना व्यर्थ है। हे सन्तो! वास्तविकता यह है कि सन्तोष से ही स्वामी (ब्रह्म) मिलते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सांसारिक आकर्षणों से परे रहकर सन्तोष के द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का सन्देश दिया गया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

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[2] मेरा तेरा मनवा, कैसे इक होई रे।
मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यों उरझाइ रे।।
मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोइ रे।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।।
जुगन जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सतगुरु धारा निरमल बाहै, वामें काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ।।2।। (2008)

शब्दार्थ :
मनवा = मन; लेखी = लिखी हुई; सुरझावन हारी = सुलझाने वाली; उरझाई = उलझाकर; निरमोही = मोह से मुक्त; जुगन-जुगन = युगों-युगों से; रंगी = संसार के माया मोह में डूबा; बिहंगी = पक्षी के समान इधर-उधर भटकने वाला; बाहै = बहती है; वामें = उसमें; काया = शरीर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान की महिमा को बताते हुए सच्चे गुरु के ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।

व्याख्या :
सांसारिक माया मोह में फँसे व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि मेरा और तुम्हारा मन एक कैसे हो सकता है। मैं तो वह कहता हूँ जो साक्षात् आँखों से देखा है और तुम वह बात कहते हो जो पुस्तकों में लिखी है। मैं व्यावहारिक ज्ञान के आधार पर सुलझाने वाली स्पष्ट बात करता हूँ। जबकि तुम अज्ञानतावश सोच में उलझे रहते हो। मैं समझाता हूँ कि सत्य, उचित की पहचान के प्रति जागरूक रहो, अन्धानुकरण मत करो किन्तु तुम अज्ञान की निद्रा में सोते रहते हो। मैं सजग करता हूँ कि संसार नाशवान है इसके प्रति मोह मत पालना परन्तु तुम इस नश्वर संसार के प्रति मोहित रहते हो।

मैं युगों-युगों से समझाते -समझाते थक गया हूँ कि मायावी संसार से मुक्त रहकर सत्य का अनुसरण करो किन्तु मेरी इस बात को कोई नहीं मानता है। तुम तो संसार के माया-मोह में लीन होकर उड़ने वाले पक्षी की तरह इधर-उधर भटक रहे हो। इस तरह भटकते हुए तुमने समस्त ज्ञानरूपी धन खो दिया है। सारा जीवन व्यर्थ गँवा दिया है। सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! ध्यान से सुन लो कि सच्चे गुरु के ज्ञान की पवित्र धारा बह रही है। उसी में अपने शरीर के विकारों को धो डालोगे तभी तुम्हारा मनचाहा हो सकेगा अर्थात् गुरु का सच्चा उपदेश ही तुम्हारा उद्धार कर सकेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. संसार की निरर्थकता को इंगित करते हुए सच्चे ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा अवलोकनीय है।
  3. सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा में दार्शनिक विषय का प्रतिपादन किया है।

[3] साधो, देखो जग बौराना।
साँची कहाँ तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
हिन्दू कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमाना।
आपस में दोऊ लहै मरतु हैं, मरम कोई नहिं जाना।।
बहुत मिले मोहि नेमी धर्मी प्रात करै असनाना।
आतम छोड़ि पषानै पू0, तिनका थोथा ज्ञाना।
बहुतक देखे पीर औलिया, पढ़े किताब कुराना।
करै मुरीद कबर बतजावै, उनहूँ खुदा न जाना।।
हिन्दु की दया मेहर तुरकन की, दोनों घर से भागी।
वे करैं जिबह वे झटका मारे, आग दोऊ घर लागी।
या विधि हँसत चलत है हमको, आपु कहावै स्याना।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दीवाना ।।3।।

शब्दार्थ :
जग = संसार; बौराना = पागल हो गया है; धावै = दौड़ता है; पतियाना = विश्वास करता है; मरम = रहस्य, वास्तविकता; नेमी = नियमों का पालन करने वाले आतम = आत्मा; पषाने = पाषाण, पत्थर; तिनका = उनका; थोथा = खोखला, निरर्थक; मुरीद = शिष्य; उनहूँ = उन्हें भी; मेहर = अनुकम्पा; तुरकन = मुसलमानों; जिबह = हलाल करना, पशु को धीरेधीरे काटना; झटका = एक ही बार में पशु का वध करना; स्याना = चतुर, होशियार; दीवाना = पागल।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद में धार्मिक पाखण्डों की निन्दा कर समरसता का सन्देश दिया है।

व्याख्या :
सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! देख लो संसार कैसा पागल हो गया है। पागलपन की यह स्थिति है कि यदि कोई व्यक्ति सत्य बात कहे तो उसे मारने दौड़ता है। यह संसार झूठे पाखण्डियों का विश्वास करता है। हिन्दू कहते हैं कि हमारे तो राम सब कुछ हैं और मुसलमान कहते हैं कि रहीम ही सब कुछ है। इस तरह ये आपस में लड़ते-मरते रहते हैं। उनमें इस रहस्य को कोई नहीं जानता है कि राम और रहीम दोनों एक ही हैं। कवि कहते हैं कि मुझे बहुत से नियमों का पालन करने वाले धार्मिक व्यक्ति मिले हैं। वे प्रात:काल ही स्नान-ध्यान करते हैं। आत्मा की आवाज की अवहेलना करके पत्थर की पूजा करने वाले उन लोगों का ज्ञान खोखला (दिखावटी) है।

मैंने बहुत से पीर और औलिया भी देखे हैं जो कुरान आदि पुस्तकें पढ़ते हैं। वे लोगों को अपने शिष्य बनाते हैं, बड़े-बड़े व्याख्यान देते हैं किन्तु उन्हें भी खुदा की जानकारी नहीं होती है। हिन्दुओं की दया तथा मुसलमानों की मेहर (कृपा)दोनों ही मनुष्यों के हृदय से पलायन कर गयी हैं। दोनों ही निर्दयी, हिंसक हो गये हैं। उनमें से एक हलाल करते हैं तो दूसरे झटका मारते हैं। इस तरह दोनों ही ओर हिंसा की आग लगी है। वे हम सब का उपहास करते हैं तथा स्वयं बहुत चतुर कहलाते हैं। कबीर कहते हैं कि ऐसी स्थिति में इनमें से किसे पागल कहा जाय। दोनों ही उन्मत्त हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. धार्मिक पाखण्ड जनित विद्वेष का तिरस्कार कर सामंजस्य एवं सहभाव का सन्देश दिया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा में समझाया गया है।

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राधा की समाज सेवा भाव सारांश

पौराणिक प्रसंगों का अपने काव्य का आधार बनाने वाले अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का प्रिय प्रवास कृष्ण काव्य परम्परा में आता है। ‘राधा की समाज सेवा’ अंश ‘प्रिय प्रवास’ महाकाव्य से लिया गया है।

परमप्रिय श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर चले जाने पर समस्त ब्रजवासियों में विरह-वेदना व्याप्त हो जाती है। राधा श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल हैं किन्तु वे अपने दुःख को भुला देने का सबसे उत्तम उपाय खोजती हैं और स्वयं को समाज सेवा में लगा देती हैं। वे नित्यप्रति यशोदा के पास जाकर उनको समझाती हैं। उनके पैर सहलाकर तथा आँसू पोंछकर सांत्वना देती हैं। उन्हें आश्वासन देती हैं कि दुःखी ब्रज को श्रीकृष्ण कैसे छोड़ सकते हैं, वे अवश्य लौटकर आयेंगे। नन्द की पीड़ा को मिटाने के लिए वे विभिन्न शास्त्रों को सुनाकर सांसारिक वैभव की हीनता का प्रतिपादन करती हैं। दुःखी ग्वालों को समझाकर श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाती हैं। ग्वालों के बालकों को दुःखी देखकर वे उन्हें फूलों के विभिन्न प्रकार के खिलौने लाकर देती हैं। उनसे श्रीकृष्ण की लीलाएँ कराती हैं और स्वयं ध्यानमग्न होकर उन्हें देखती रहती हैं। विरहिणी गोपियों को वे विधिपूर्वक सुखी करती हैं।

उन्हें श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर सुनाती हैं, वंशी तथा वीणा बजाती हैं। वृद्धों, रोगियों की वे सेवा करती हैं तथा दवा आदि देती हैं। निर्बल, दीन-हीन, अनाथ तथा विधवाओं को वे सम्मान सहित सहारा देती हैं। उनके मन में जो भी विकार हैं उनको अपने सद्व्यवहार से धो देती हैं। चींटी, पक्षी, कीड़ों आदि को अन्न-जल आदि देती हैं। वे वृक्षों के पत्तों को भी व्यर्थ में नहीं तोड़ती हैं। वे सज्जनों की संरक्षक तथा दुष्टों की प्रशासक बनी हैं। वे सभी प्राणियों की समृद्धि के कार्यों में लगी रहती हैं, कुमारी बालिकाएँ भी ब्रज में शान्ति का विस्तार करने में लगी हैं। कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर जाने पर जो महाकाली संकट देने वाली रात्रि अब आयी थी उसमें राधा चाँदनी के समान सुशोभित थीं। श्रीकृष्ण के संयोग से ब्रज में आनन्द वर्षा हुई थी, वह पुनः-पुनः आये। राधा और श्रीकृष्ण इस भूमि पर आयें किन्तु इस प्रकार की वियोग की घटना फिर न हो।

राधा की समाज सेवा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] राधा जाती प्रति- दिवस थीं पास नन्दांगना के।
नाना बातें कथन करके थीं उन्हें बोध देती।
जो वे होती परम- व्यथिता मूर्छिता या विपन्ना।
तो वे आठों पहर उनकी सेवना में बितातीं॥1॥ (2014)

घण्टे ले के हरि-जननि को गोद में बैठती थी।
वे थी नाना जतन करती पा उन्हें शोक मग्ना।
धीरे-धीरे चरण सहला औ मिटा चित्त-पीड़ा।
हाथों से थी दृग-युगल के वारि को पोंछ देती ॥2॥

शब्दार्थ :
प्रति-दिवस = रोजाना, प्रतिदिन; नन्दांगना = यशोदा, नन्द की पत्नी; नाना = तरह-तरह की; कथन = कहकर; बोध = ज्ञान समझाना; परम = बहुत; व्यथिता = पीड़ित; मूछिता = बेहोश; विपन्न = दु:खी; सेवना = सेवा; जननि = माँ; जतन = प्रयत्न, उपाय; शोक = दुख; चित्त-पीड़ा = हृदय का कष्ट; दृग-युगल = दोनों आँखें; वारि = जल, आँसू।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘राधा की समाज सेवा’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा की गयी यशोदा की सेवा का अंकन किया गया है।

व्याख्या :
श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होते हुए भी राधा प्रतिदिन नन्द की पत्नी यशोदा के पास जाती और तरह-तरह की बातें करके उन्हें समझाती थीं। यदि वे बहुत पीड़ित बेहोश या दुःखी होती तो राधा दिन-रात उनकी सेवा में ही बिताती थी अर्थात् हर समय उनकी देखभाल में ही लगी रहती थीं।

राधा श्रीकृष्ण की माँ यशोदा को अपनी गोद में लेकर घण्टों तक बैठी रहती थीं। उनको श्रीकृष्ण के चले जाने के दुःख से दुखी पाकर वे विभिन्न प्रकार के उपाय करती थीं। धीरे-धीरे उनके पैरों को सहलाती थीं और उनकी समस्त पीड़ा को मिटा देती थीं। वे अपने हाथों से यशोदा की दोनों आँखों के आँसू पोंछ देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभावी रूप का सजीव चित्रण किया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

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[2] हो उद्विग्ना बिलख जब यों पूछती थीं यशोदा।
क्या आवेंगे न अब ब्रज में जीवनाधार मेरे।
तो वे धीरे मधुर-स्वर से हो विनीता बतातीं।
हाँ आवेंगे, व्यथित बृज को श्याम कैसे तजेंगे ॥ 3 ॥

आता ऐसा कथन करते वारि राधा-दृगों में।
बूंदों-बूंदों टपक पड़ता गाल पै जो कभी था।
जो आँखों से सदुख उसको देख पातीं यशोदा।
तो धीरे यों कथन करतीं खिन्न हो तू न बेटी ॥ 4॥

शब्दार्थ :
उद्विग्ना = परेशान; बिलख = व्याकुल; जीवनाधार = जीवन के आधार, श्रीकृष्ण; विनीता = विनम्र; व्यथित = पीड़ित; तजेंगे = छोड़ेंगे; सदुःख = दुःख युक्त; खिन्न = परेशान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

इस प्रकार की बात कहते हुए विरह से व्याकुल राधा के नेत्रों में भी आँसू छलक आते थे। जो कभी-कभी आँसुओं की बूंदें यशोदा के गाल पर टपक पड़ती थीं तो वे कहती थीं कि बेटी राधा तू परेशान मत हो, सब ठीक होगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा द्वारा व्याकुल यशोदा की सेवा तथा यशोदा द्वारा राधा को सांत्वना देने का वर्णन है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली अपनायी गयी है।

[3] हो के राधा विनत कहतीं मैं नहीं रो रही हूँ।
आता मेरे दृग युगल में नीर आनन्द का है।
जो होता है पुलक कर के आप की चारु सेवा।
हो जाता है प्रगटित वही वारि द्वारा दृगों में ॥5॥

वे थीं प्रायः ब्रज नृपति के पास उत्कण्ठ जातीं।
सेवायें थीं पुलक करतीं क्लान्तियाँ थीं मिटाती।
बातों ही में जग विभव की तुच्छता थी दिखाती।
जो वे होते विकल पढ़ के शास्त्र नाना सुनातीं ॥6॥

शब्दार्थ :
विनत = विनम्र; दृग युगल = दोनों नेत्र; पुलक = रोमांच, हर्ष; चारु = सुन्दर; ब्रज-नृपति = ब्रज के राजा, नन्द; उत्कण्ठ उद्यत; क्लांतियाँ = दु:ख; जग-विभव = सांसारिक वैभव; तुच्छता = दीनता।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में सेवा भावी राधा के ज्ञानपरक प्रबोध को प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या :
राधा की आँखों में छलके आँसुओं की बूंद कभी यशोदा के गाल पर पड़ जाती थीं तो वे उसे सांत्वना देती तब राधा विनम्र होकर कहती कि मैं रो नहीं रही हूँ। मेरे दोनों नेत्रों में तो अति आनन्द के आँसू हैं। आपकी सुखद सेवा करके मुझे जो हर्ष होता है, वही आँखों से जल के रूप में प्रकट हो जाता है।

राधा प्रायः उद्यत होकर ब्रज के राजा के पास जाती और प्रसन्नतापूर्वक उनकी सेवा करती तथा उनके समस्त दुःखों को मिटाती थीं। बातों ही बातों में वे सांसारिक वैभव की दीनता प्रदर्शित करती और यदि वे अधिक व्याकुल होते थे तो राधा विभिन्न शास्त्र पढ़कर सुनाती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रबुद्ध राधा के सेवा भावी रूप का अंकन हुआ है।
  2. तत्सम प्रधान सानुप्रासिक भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दक्रान्ता छन्द है।

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[4] होती मारे मन यदि कहीं गोप की पंक्ति बैठी।
किम्वा होता विकल उनको गोप कोई दिखाता।
तो कार्यों में सविधि उनको यत्नतः वे लगाती।
औ ए बातें कथन करती भूरि गंभीरता से।। 7॥

जी से जो आप सब करते प्यार प्राणेश को हैं।
तो पा भू में पुरुष तन को, खिन्न हो के न बैठे।
उद्योगी हो परम रुचि से कीजिए कार्य ऐसे।
जो प्यारे हैं परम प्रिय के विश्व के प्रेमिकों के ॥8॥

शब्दार्थ :
किम्वा = अथवा; गोप = ग्वाला; सविधि = विधि से; यत्नतः = प्रयत्नपूर्वक; भूरि = बहुत अधिक; रुचि = लगन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा ने गोपों को कर्म में लीन होने का उद्बोधन दिया है।

व्याख्या :
यदि कहीं पर कोई मलिन मन वाले ग्वालाओं की कोई पंक्ति होती अथवा राधा को कोई ग्वाला व्याकुल होता हुआ दिखाई पड़ता तो वे विधि से प्रयत्नपूर्वक उनको अपने-अपने काम में लगा देतीं। वे बहुत गम्भीरता से यह बात कही कि यदि आप सभी प्राणप्रिय श्रीकृष्ण को हृदय से प्यार करते हो तो पृथ्वी पर दुर्लभ मनुष्य का शरीर पाकर दुःखी होकर न बैठे। पूरी लगन के साथ ऐसे कामों को करें जो परमप्रिय श्रीकृष्ण के प्रेमियों को अच्छे लगते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहने का उद्बोधन दिया गया है।
  2. कर्म के प्रति निष्ठा भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। उसी का प्रतिपादन यहाँ हुआ है।
  3. संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली में विषय की अभिव्यक्ति हुई है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[5] जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
देती पुष्पों रचित उनको मुग्धकारी-खिलौने।
दे शिक्षाएँ विविध उनसे कृष्ण लीला करातीं।
घंटों बैठी परम रुचि से देखतीं तद्गता हो ॥9॥

पाई जातीं यदि दुखित जितनी अन्य गोपांगनाएँ।
राधा द्वारा सुखित वह भी थीं यथा रीति होती।
गा के लीला स्व प्रियतम की वेणु, वीणा बजा के।
प्यारी-बातें कथन कर के वे उन्हें बोध देतीं ॥10॥

शब्दार्थ :
मलिन = उदास; लखती = देखती; मुग्धकारी = मोहित करने वाले तद्गता = तन्मय; गोपांगनाएँ = गोपियाँ, ग्वालों की पत्नियाँ; वेणु = वंशी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा ग्वालों के बच्चों तथा उनकी पत्नियों (गोपियों) की उदासी दूर करने का वर्णन है।

व्याख्या :
वे राधा यदि ग्वालों के बच्चों को उदास देखतीं तो वे उन्हें फूलों से बने मन को मोहित करने वाले खिलौने देतीं। वे उन्हें नाना प्रकार की शिक्षाएँ देकर कृष्ण लीला कराती । घण्टों तक बैठी रहतीं और उस लीला को तन्मय होकर देखती रहती थीं।

यदि ग्वालों की पत्नियाँ दु:खी पाई जाती तो वे भी राधा द्वारा इसी तरह सुखी होती थीं। अपने प्रियतम श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर, वंशी एवं वीणा बजाकर और प्यारी-प्यारी बातें कहकर उनको उद्बोधन देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ग्वालों के बच्चों तथा पत्नियों की सेवा का वर्णन किया गया है।
  2. मन्दाक्रान्ता छन्द है। तत्सम युक्त सरल सुबोध भाषा का प्रयोग किया गया है।

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[6] संलग्ना हो विविध कितने सान्त्वना कार्य में भी।
वे सेवा थीं सतत करती वृद्ध-रोगी जनों की।
दीनों, हीनों, निबल विधवा आदि को मानती थीं।
पूजी जाती बृज-अवनि में देवियों सी अतः थी ॥11॥

खो देती थीं कलह जनि, आधि के दुर्गुणों को।
धो देती थीं मलिन मन की व्यापनी कालिमायें।
बो देती थी हृदय तल में बीज भावज्ञता का।
वे थी चिन्ता-विजित गृह में शांति धारा बहाती ॥12॥

शब्दार्थ :
संलग्ना हो = लगकर; निबल = निर्बल; बृज-अवनि = ब्रज भूमि; आधि = मानसिक चिन्ता; व्यापिनी = प्रभावित करने वाली; कालिमाएँ = दोषों को; भावज्ञता = मनोभाव समझने; चिन्ता-विजित-गृह = चिन्ता को जीत लेने वाला घर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा किए गए सद्भावपूर्ण सेवा कार्यों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा नाना प्रकार के कितने ही सान्त्वना देने वाले कार्यों में लगी रहती थी। वे वृद्ध और रोगी जनों की निरन्तर सेवा करती रहती थीं। वे दीन-हीनों, निर्बलों, विधवाओं आदि का सम्मान करती थीं, उनकी सेवा करती थीं। इसीलिए ब्रजभूमि में वे देवियों की तरह पूजी जाती थीं।

राधा पारस्परिक कलह तथा मानसिक दुःखों को दूर कर देती थीं। वे दुःखी मन को प्रभावित करने वाले सभी दोषों को धो डालती थीं। वे मनुष्यों के तन-मन के सभी कष्टों को दूर करके उनके हृदय में सहृदयता भर देती थीं। वे चिन्ता को जीत लेने वाले घर में शान्ति की धारा प्रवाहित कर देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के जन सेवी रूप का वर्णन हुआ है।
  2. सानुप्रासिक भाषा तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  3. समास प्रधान तत्सम शब्दावली में विषय-का प्रतिपादन किया गया है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[7] आटा चींटी विह्या गण थे वारि ओ अन्न पाते।
देखी जाती सदय उनकी दृष्टि कीटादि में भी।
पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थी।
जी से भी निरस्त रहती भूत सम्बर्द्धना में ॥13॥

वे छाया थी सुजन शिर की शासिका थी खलों में।
कंगालों की परम निधि थी औषधि पीड़ितों की।
दोनों की थी बहिन, जननी थी अनाथाश्रितों की।
आराध्य थी ब्रज-अवधि की प्रेमिका विश्व की थीं ॥14॥

शब्दार्थ :
विा = पक्षी; कीटादि = कीड़े आदि; वृथा = व्यर्थ में; निरत = संलग्न; भूत सम्बर्द्धना = प्राणियों के उत्थान में; अनाथ = सहारे हीन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा की पशु-पक्षियों, अनाथों आदि की व्यापक सेवा का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा की सेवा का क्षेत्र व्यापक था। चींटी, पक्षी राधा से अन्न एवं जल पाते थे। कीड़े आदि के प्रति भी उनकी दयापूर्ण दृष्टि थी। श्रेष्ठ वृक्षों के पत्तों को भी वे व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। वे अपने हृदय से स्वाभाविक रूप में प्रेमियों के उत्थान के कार्यों में लगी रहती थीं।

वे (राधा) सज्जनों के सिर की छाया थीं तथा दुष्टजनों पर शासन करने वाली थीं। वे निर्धनों के लिए महान् सम्पत्ति का भण्डार थीं और पीड़ितों (रोगियों) के लिए सही उपचार करने वाली दवा थीं। वे दीन-हीनों की बहन थीं और जो अनाथ और आश्रयहीन थे उनके लिए माँ थीं। वे ब्रज भूमि के निवासियों की पूज्य थीं तथा समस्त संसार की प्रेमिका थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभाव का व्यापक रूप अंकित किया गया है।
  2. समास प्रधान संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

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[8] जैसा व्यापी विरह दुख था गोप गोपांगनाका।
वैसी ही थी सदै हृदया स्नेह की मूर्तिराधा।
जैसी मोहावरित ब्रज में तामसी रात आयी।
वैसी ही वे लसित उसमें कौमुदी के समा थी॥15॥

जो थी कौमार-व्रत निरता बालिकायें अनेकों।
वे भी पा के समय ब्रज में शान्ति विस्तारती थीं।
राधा के हृदय बल से दिव्य शिक्षा गुणों से।
वे भी छाया सृदृश उनकी वस्तुतः हो गई थीं॥16॥

शब्दार्थ :
सदै = दयामय; मोहावरित = मोह से जकड़ी; तामसी रात = महाकाली अंधेरी रात; निरता = संलग्न; विस्तारती = बढ़ाती; दिव्य = अलौकिक; छाया-सदृश = परछाईं के समान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा के स्नेहपूर्ण व्यापक सेवा भाव का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
जिस प्रकार की व्यापक विरह वेदना ग्वालों और ग्वालों की पत्नियों में थी, उसी प्रकार की दयामय हृदय वाली राधा साक्षात् स्नेह की प्रतिमा थीं। श्रीकृष्ण के ब्रज से चले जाने पर जिस प्रकार की मोह से जकड़ी महाकाली अन्धेरी रात ब्रज में आयी थी उसी तरह से वे (राधा) उस रात में चाँदनी के समान सुशोभित थीं अर्थात् श्रीकृष्ण के विरह से व्यथित ब्रजवासियों में वे सुख का संचार कर रही थीं।

जो कौमार्य व्रत में संलग्न अनेक बालिकाएँ थीं वे भी कुछ समय पाकर ब्रज में शान्ति का विकास करती थीं। राधा के हृदय में विद्यमान सद्भावनाओं के प्रभाव से और उनकी शिक्षा के अलौकिक गुणों के कारण वे उनकी परछाईं के समान हो गई थीं अर्थात् वे उनके हर कार्य में सहयोग करती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सहृदय राधा के सेवा भाव की प्रभावशीलता का अंकन हुआ है।
  2. सामाजिक एवं सानुप्रासिक भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है। उपमा, अनुप्रास, रूपक अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है।

[9] तो भी आई न वह घटिका और न वे बार आये।
वैसी सच्ची सुखद ब्रज में वायु भी आ न डोली।
वैसे छाये न घन रस की सोत सी जो बहाते।
वैसे उन्माद कर-स्वर से कोकिला भी न बोली ॥17॥

जीते भूले न ब्रज महि के नित्य उकण्ठ प्राणी।
जी से प्यारे जलद तनको, केलि क्रीड़ादिकों को।
पीछे छाया विरह दुख की वंशजों-बीच व्यापी।
सच्ची यों है ब्रज अवनि में आज भी अंकिता है ॥18॥

सच्चे स्नेही अवनिजन के देश के श्याम जैसे।
गधा जैसी सद्य हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
हे विश्वात्मा ! भरत भुव के अंक में और आवें।
‘ऐसी व्यापी विरह घटना किन्तु कोई न होवे ॥19॥

शब्दार्थ :
घटिका = घड़ी, 24 मिनट का समय; सोत = स्रोत; महि = भूमि। जलद-तन = बादल के समान श्याम शरीर वाले, श्रीकृष्ण; विश्व प्रेमानुरक्ता = संसार भर से प्रेम करने वाली; भरत भुव = भारत भूमि; अंक = गोद।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
ब्रज में राधा की सेवा के प्रभाव स्वरूप पर्याप्त अच्छा वातावरण था किन्तु जो आनन्द श्रीकृष्ण के ब्रज में होने पर था वे घड़ी या दिन आये ही नहीं। श्रीकृष्ण के समय जैसी सच्चा सुख देने वाली वायु भी ब्रज में फिर नहीं बही। आनन्द का स्रोत सा बहाने वाले वैसे बादल भी फिर नहीं छाए और न उस प्रकार के मस्ती भरे स्वर में कोयल ही कुहकी।

नित्य प्रति श्रीकृष्ण पुनः मिलन की उत्कण्ठा से भरे रहने वाले ब्रजभूमि के निवासी प्राणों से प्यारे श्रीकृष्ण और उनके क्रीड़ा-विहार आदि से मिलने वाले आनन्द को जीते जी नहीं भूल पाए। श्रीकृष्ण के वियोग जनित दुःख ने उनके वंशजों को भी प्रभावित किया। वास्तविक सत्य यह है कि ब्रजभूमि में आज भी उस विरह का प्रभाव अंकित है।

कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. श्रीकृष्ण के संयोग काल के सुख और विरह काल के दुःख का स्मरण किया गया है।
  2. परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि श्रीकृष्ण जैसी विभूतियाँ पुनः-पुनः अवतरित हों किन्तु विरह का व्यापक कष्ट न दें।
  3. उपमा एवं अनुप्रास अलंकार तथा सामाजिक भाषा का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

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MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2

विविधा-2 अभ्यास

विविधा-2 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि के लिए कब तक विराम नहीं है?
उत्तर:
कवि को जीवन की अन्तिम साँस तक विराम नहीं है।

प्रश्न 2.
जीवन को अपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर:
मानव जीवन में कोई न कोई अभाव रहता ही है। इसलिए जीवन को अपूर्ण कहा गया है।

प्रश्न 3.
कजरी कब गाई जाती है?
उत्तर:
कजरी वर्षा ऋतु में गाई जाती है।

प्रश्न 4.
बादलों से मिलने के लिए कौन-कौन से प्राणी आतुर रहते हैं?
उत्तर:
बादलों से मिलने के लिए मानव, कोयल, मयूर, दादुर आदि समस्त प्राणीमात्र आतुर रहते हैं।

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विविधा-2 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘विशद विश्व प्रवाह में बहने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
मानव इस विशाल संसार में जन्म लेता है। वह यहाँ के रहन-सहन, चाल-चलन, कार्य-व्यवहार आदि के क्रम में बचपन से ही सक्रिय होने लगता है। धीरे-धीरे वह इस जगत में पूरी तरह फंस जाता है। वह अन्यान्य कार्य अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर करता है, जिनमें उसे विभिन्न प्रकार की स्थितियों से गुजरना पड़ता है। कार्य में सफलता मिलते जाने पर उसे सुख होता है और जब काम में बाधाएँ आती हैं तो वह दुखी होता है। यह सुख-दुःख की अनुभूति करते हुए हर मानव जीवनयापन करता है। यही इस विशद संसार के प्रवाह का आशय है।

प्रश्न 2.
सफलता प्राप्त करने का मूल मंत्र क्या है? (2011)
उत्तर:
संसार में अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य प्रयास करता है। उसे विविध बाधाओं को पार करना पड़ता है। कुछ व्यक्ति बाधाएँ आने पर निराश हो जाते हैं, और कार्य को त्याग देते हैं। किन्तु कुछ ऐसे होते हैं जो अन्यान्य संकटों का सामना करते हैं उन संकटों से छुटकारा पाते हैं और लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। अन्त में सफलता उन्हीं को मिलती है जो निरन्तर चलते ही रहते हैं। जो रुक जाते हैं वे असफल रहते हैं। अतः सफलता प्राप्त करने का मूल मंत्र निरन्तर काम करते रहना है।

प्रश्न 3.
कवि मेघों से पृथ्वी पर उतरने के लिए आह्वान क्यों कर रहा है? (2008)
उत्तर:
कवि आकाश की चोटियों पर विराजमान बादलों से धरती पर उतरने का आह्वान इसलिए करता है कि वे जीवन की प्रत्येक राह से जल की धारा बहाकर जीवन के प्रवाह को जीवंत बना दें। वे गागर से लेकर सागर तक को पानी से सराबोर कर दें। वर्षा आने से पुरवाई हवा का मान बढ़ेगा तथा उल्लास से भर कर लोग कजरी की तान छेड़ेंगे। आकाश में बादलों के छा जाने से काम नहीं चलता। जब वे जल वर्षा करते हैं, तभी जीवन में आनन्द का संचार होता है। इसीलिए कवि मेघों से पृथ्वी पर उतरने के लिए आह्वान करता है।

प्रश्न 4.
‘कवि ने सूरज के रथ को धीमा-धीमा’ क्यों बताया है? (2014, 16)
उत्तर:
यह सत्य है कि सूर्य अपने रथ पर सवार होकर निरन्तर गतिमान रहता है। किन्तु जब वर्षा ऋतु में आकाश में बादल छाए रहते हैं तब वह ढक जाता है तथा दिखाई नहीं पड़ता है। उसका तीव्र ताप भी कम हो जाता है। जब तेज हवा चलती है तो आकाश में बादल भी बड़ी तेजी से दौड़ते हैं। उनकी तेज गति की तुलना से सूर्य की गति बहुत धीमी प्रतीत होती है। इसीलिए कवि ने तीव्र गति वाले बादलों का हौसला बढ़ाते हुए शीघ्र पृथ्वी पर जल वर्षा करने का आग्रह किया है।

विविधा-2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘गति-मति न हो अवरुद्ध’ इसके लिए कवि ने क्या-क्या प्रयास किए हैं?
उत्तर:
कवि मानते हैं कि मनुष्य का काम निरन्तर सफलता की ओर चलते रहना है। संभव है मार्ग में बाधाएँ आएँ, चलते हुए कभी कुछ मिल सकता तो कभी कुछ गँवाना भी पड़ सकता है। सफलता-असफलता के फलस्वरूप आशा-निराशा के भाव भी हो सकते हैं। परन्तु सुख-दुःखात्मक स्थितियों में मनुष्य को अपने बढ़ते कदम नहीं रोकने चाहिए और न अपने चिन्तन को सही बात सोचने से हटाना चाहिए। जीवन नाम चलते रहना है। यदि गति और मति अवरुद्ध हो जाएगी, तो मानव मृतवत् हो जाएगा। चलते रहने पर यह निश्चित है कि सही प्रयास रहे तो एक न एक दिन अवश्य सफलता मिलेगी। इसलिए कवि हर स्थिति में गति-मति को सचल रखने हेतु प्रयासरत हैं। वे हर प्रकार का सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि मानव जीवन पथ पर निरन्तर बढ़ता ही रहे।

प्रश्न 2.
‘चलना हमारा काम है’ कविता के मूलभाव का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। (2008, 09, 13)
अथवा
‘चलना हमारा काम है।’ शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की इस कविता के मूलभाव का चार बिन्दुओं में विस्तार कीजिए। (2012)
उत्तर:
इसका उत्तर ‘चलना हमारा काम है’ कविता के भाव-सारांश से पढ़िए।

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प्रश्न 3.
कवि बादलों को हँसते-गाते आने के लिए क्यों कहता है? (2009)
उत्तर:
वर्षा जनमानस में हर्ष और उल्लास का भाव पैदा करती है। मनुष्य ही नहीं जानवर, पक्षी, वनस्पतियों में भी एक स्फूर्ति की लहर वर्षा से दौड़ जाती है। वर्षा में बड़े-छोटे, ऊँच-नीच, धनी-निर्धन का भेद भी नहीं होता है। वह तो गागर से लेकर सागर तक को जल से सराबोर कर देती है। यह तभी सम्भव है जब बादल हँसते-गाते, उल्लास भरे होकर वर्षा करें। छुट-पुट वर्षा से काम नहीं चलेगा। बादल प्रसन्न होकर झूम के बरसेंगे, तभी आनन्द का भाव व्याप्त होगा। इसीलिए कवि बादलों को हँसते-गाते अठखेलियाँ करते हुए आने तथा मुक्त भाव से वर्षा करने की आग्रह करते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) ऊँची नीची जीवन घाटी ……………..”बाहों में।
(आ) आओ तुम ……………..अफवाहों में।
(इ) जीवन अपूर्ण ………………काम है।
(ई) मैं पूर्णतः ………………..काम है।
उत्तर:
(अ) शब्दार्थ :
अम्बर = आकाश; शिखरों = चोटियों; जीवन = जल, जिन्दगी; राहों = रास्तों; प्रतिध्वनि = अनुगूंज।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘विविधा-2’ पाठ के ‘बरसो रे’ गीत से अवतरित है। इसके रचयिता वीरेन्द्र मिश्र हैं।

प्रसंग :
भावों के कुशल चितेरे वीरेन्द्र मिश्र ने आकाश में छाए बादलों से बिना भेदभाव के सर्वत्र वर्षा करने का आग्रह किया है।

व्याख्या :
बादलों को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादल ! तुम जगत भर में जल की वर्षा कर दो। तुम आकाश की चोटियों से उतरकर मानव-जीवन के रास्तों पर उतरकर तीव्र वर्षा कर दो। जीवन की विकट-गहन, ऊँची-नीची घाटियों से तथा धरती की मिट्टी से यही अनुगूंज आ रही है कि तुम बिना भेदभाव के गागर से लेकर सागर तक को जल से परिपूर्ण कर दो अर्थात् सभी के प्रति समान व्यवहार करते हुए जीवन का दान करके हर्ष व्याप्त कर दो।

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में बादलों के घिरने तथा वर्षा की मदमस्त फुहारों के मध्य गाये जाने वाले गीतों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
वर्षा होते ही जो उल्लासमय वातावरण हो जाता है उसकी ओर इंगित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादलो! तुम वर्षा कर दो ताकि आनन्दोल्लास के गीत कजरी की तान छिड़ जाय। तुम्हारे वर्षा के जल से वाणी की मधुरता का वरदान मिल जायेगा अर्थात् मधुर स्वर में कजरी गीतों का गायन प्रारम्भ हो जायेगा। हे बादलो! अभी कल तक तो तुम घिर करके आकाश में चारों ओर छाए हुए थे और कुछ दिन पूर्व तो तुम वर्षा आई-वर्षा आई; इस प्रकार अफवाहों में आये थे अर्थात् तुम्हारे आने की चर्चा आकाश में आच्छादित होने से ही होने लगी थी। किन्तु आज तुम वास्तव में वर्षा कर दो ताकि वह अफवाह सत्य सिद्ध हो जाय।

(इ) शब्दार्थ :
अपूर्ण = अधूरा; अवरुद्ध = बाधित, रुके आठों याम= हर समय (दिन और रात दोनों आठ याम (प्रहर) के होते हैं)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि व्यक्ति अधूरा जीवन जीते हुए कभी कुछ प्राप्त कर लेता है, तो कभी कुछ खो भी देता है।

व्याख्या :
मानव के अधूरे जीवन की पूर्णता के प्रयास में कभी कुछ मिल जाता है तो कभी कुछ खो भी जाता है अर्थात् इस जीवन में लाभ-हानि, उत्थान-पतन, ऊँच-नीच चलती ही रहती है। इसी के अनुसार आशा-निराशा के भाव जगते ही रहते हैं। सफलता से आशा और असफलता से कुछ निराशा होती ही है। फलस्वरूप व्यक्ति हँसता-रोता हुआ जीवन पथ पर चलता ही जाता है। उसका ध्यान दिन-रात इस बात पर रहता है कि उसके जीवन की चाल कहीं बाधित न हो जाय। क्योंकि व्यक्ति का काम निरन्तर चलते रहना ही है।

(ई) शब्दार्थ :
दर-दर = द्वार-द्वार; पग = कदम; रोड़ा अटकता = बाधा आती रही; निराश = हताश।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन में आने वाली बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए।

व्याख्या :
मनुष्य जीवन में समग्र सफलता पाने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयास करता है। उसे द्वार-द्वार चक्कर काटने पड़ते हैं। जहाँ भी वहे प्रयास करता है वहाँ कुछ न कुछ बाधाएँ भी आती रहती हैं। व्यक्ति को उन बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए। आशा-निराशा तो जीवन में अपरिहार्य हैं। उनसे डरकर रुकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जीवन पथ पर चलते रहना ही व्यक्ति का कार्य है।

विविधा-2 काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिएसागर, आकाश, सूर्य, पानी, बादल, हाथी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2 img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिएछाँह, बरखा, नैया, माटी, बानी, अचम्भा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2 img-2

बरसो रे भाव सारांश

वर्तमान हिन्दी कविता को नवीन संवेदनाएँ प्रदान करने वाले गीतकार वीरेन्द्र मिश्र के गीतों ने विशेष पहचान बनाई है। ‘बरसो रे’ गीत में कवि ने वर्षा ऋतु के बादलों का आह्वान किया है। गीत आधुनिक जीवन के संदर्भ को भी व्यंजित करता है। कवि बादलों से वर्षा करने का आग्रह करते हुए कहते हैं कि तुम आकाश के शिखरों से उतरकर जगत की राहों में जल वर्षा कर जीवंतता का संचार कर दो। जीवन की ऊँची-नीची घाटियों से धरती के कोने-कोने से आवाज आ रही है कि तुम अपनी गागर से सागर के समान जल वर्षा कर गागर से सागर तक परिपूर्ण जल व्याप्त कर दो।

हे बादलो! तुम हँसते-गाते हुए खुशी से मदमस्त होकर आओ और मिलने को आतुर धरती की बाहों में समा जाओ। तुम्हारे आने से पुरवाई की मानवृद्धि होगी तथा आनन्द व्याप्त करने वाली कजरी की तान छिड़ जायेगी। तुम सघन रूप से आकाश में छा जाओगे तो सूर्य का रथ भी धीमा प्रतीत होगा और मन में विविध कल्पनाएँ उमड़ पड़ेंगी। तुम आम के बागों को वर्षा की बौछारों से जलमग्न कर दो ताकि वनस्पतियों में जीवंतता आ जाए। कल जब तुम आकाश में छाए हुए थे तो वर्षा के आगमन की अफवाहें प्रारम्भ हो गयी थीं। किन्तु आज तुम वर्षा करके जीवन में हर्ष व्याप्त कर दो।

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बरसो रे संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] बरसो रे, बरसो रे, बरसो रे,
अम्बर के शिखरों से उतरो रे
जीवन देने राहों में
ऊँची नीची जीवन घाटी से
प्रतिध्वनियाँ आती हैं माटी से
गागर से सागर दुलकाओ, धन! (2012)

शब्दार्थ :
अम्बर = आकाश; शिखरों = चोटियों; जीवन = जल, जिन्दगी; राहों = रास्तों; प्रतिध्वनि = अनुगूंज।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘विविधा-2’ पाठ के ‘बरसो रे’ गीत से अवतरित है। इसके रचयिता वीरेन्द्र मिश्र हैं।

प्रसंग :
भावों के कुशल चितेरे वीरेन्द्र मिश्र ने आकाश में छाए बादलों से बिना भेदभाव के सर्वत्र वर्षा करने का आग्रह किया है।

व्याख्या :
बादलों को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादल ! तुम जगत भर में जल की वर्षा कर दो। तुम आकाश की चोटियों से उतरकर मानव-जीवन के रास्तों पर उतरकर तीव्र वर्षा कर दो। जीवन की विकट-गहन, ऊँची-नीची घाटियों से तथा धरती की मिट्टी से यही अनुगूंज आ रही है कि तुम बिना भेदभाव के गागर से लेकर सागर तक को जल से परिपूर्ण कर दो अर्थात् सभी के प्रति समान व्यवहार करते हुए जीवन का दान करके हर्ष व्याप्त कर दो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. वर्षा ऋतु के बादलों से बरसने का आग्रह किया गया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. शुद्ध-साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

[2] अब तो हँसते गाते आओ, घन।
इन मिलनातुर बाहों में
पुरवैया नैया के पालों में
नभ के नारंगी रुमालों में
सूरज का रथ धीमा धीमा है।
सपनों की क्या कोई सीमा है
अमराई की छाँओ में।

शब्दार्थ :
मिलनातुर = मिलने के लिए बैचेन; नैया = नाव; पाल = नाव के मस्तूल के सहारे ताना जाने वाला एक कपड़ा जिसमें हवा भरने पर नाव चलती है; नभ = आकाश; अमराई = आम का बाग, उद्यान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में वर्षा ऋतु के बादलों से मुस्कराते हुए वर्षा करने के लिए आने का आग्रह किया गया है।

व्याख्या :
कवि बादलों को आमन्त्रित करते हुए कहते हैं कि हे बादलो ! तुम अब मुस्कराते और गायन करते हुए मिलन के लिए बेचैन धरती की इन बाँहों में आ जाओ, तुम पुरवाई पवन के पालों में आकर सम्मान बढ़ा दो तथा आकाश में रंगीन रुमालों (बदलियों) के रूप में छा जाओ। तुम्हारी गति इतनी तीव्र है कि सूर्य का रथ भी धीमा हो गया है। पुरवाई हवा के तेज झोंकों से बादल इतनी तीव्र गति से उड़ रहे हैं तथा सूर्य को ढक रहे हैं तो ऐसा लगता है कि सूर्य के रथ की गति धीमी हो गयी है। बादलों से होने वाली वर्षा के वातावरण में जो कल्पनाएँ उठती हैं, उनकी कोई सीमा नहीं है अर्थात् नाना प्रकार के मनोरम स्वप्न इस समय जागते हैं। इसलिए हे बादल! तुम आम के बागों की छाया में वर्षा करने आ जाओ ताकि वनस्पतियों को जल रूपी जीवन मिल जाए।

काव्य सौन्दर्य :

  1. आनन्द व्याप्त करने वाले बादलों से हर्षपूर्वक बरसने को कहा गया है।
  2. रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार। शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

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[3] आओ तुम कजरी को स्वर देने
वाणी को पानी के वर देने।
कल तक तुम घिर-घिर कर छाए थे
कल तक तो तुम केवल आए थे।
बरखा की अफवाहों में।

शब्दार्थ :
कजरी वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला गीत; वर = वरदान; बरखा = वर्षा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में बादलों के घिरने तथा वर्षा की मदमस्त फुहारों के मध्य गाये जाने वाले गीतों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
वर्षा होते ही जो उल्लासमय वातावरण हो जाता है उसकी ओर इंगित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादलो! तुम वर्षा कर दो ताकि आनन्दोल्लास के गीत कजरी की तान छिड़ जाय। तुम्हारे वर्षा के जल से वाणी की मधुरता का वरदान मिल जायेगा अर्थात् मधुर स्वर में कजरी गीतों का गायन प्रारम्भ हो जायेगा। हे बादलो! अभी कल तक तो तुम घिर करके आकाश में चारों ओर छाए हुए थे और कुछ दिन पूर्व तो तुम वर्षा आई-वर्षा आई; इस प्रकार अफवाहों में आये थे अर्थात् तुम्हारे आने की चर्चा आकाश में आच्छादित होने से ही होने लगी थी। किन्तु आज तुम वास्तव में वर्षा कर दो ताकि वह अफवाह सत्य सिद्ध हो जाय।

काव्य सौन्दर्य :

  1. उल्लास फैलाने वाली वर्षा के आगमन से पूर्व की उत्सुकता का वर्णन हुआ है।
  2. वर्षा काल में कजरी गीत गाये जाते हैं।
  3. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा दर्शनीय है।
  4. भावानुरूप भाषा का प्रयोग हुआ है।

चलना हमारा काम है भाव सारांश

अथक ऊर्जा, तेज और प्रेरणा के कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ द्वारा रचित ‘चलना हमारा काम है’ कविता मानव को जीवन पथ पर गतिशील रहने के प्रति सचेष्ट करती है। जब जीवन का विस्तृत विकास मार्ग खुला पड़ा है और मेरे पग अपार शक्ति तथा गति से परिपूर्ण हैं, तो मुझे लक्ष्य प्राप्ति तक विश्राम नहीं करना है। सांसारिक सम्पर्कों में कुछ कहना-सुनना होने से परस्पर का दुःख-सुख बँट जाता है और मन हल्का हो जाता है। साथ ही जीवन भी सरल बन जाता है। जब जीवन पथ पर बढ़ते हैं तो सफलता-असफलता जन्य सुख-दुःख, आशा-निराशा का आना स्वाभाविक है। उसको हँसते-रोते हुए पार करके आगे चलते रहना ही मानव का मन्तव्य होना चाहिए। उसे हर पल आगे बढ़ने के प्रति जागरूक रहना चाहिए।

संसार के इस विशाल प्रवाह में सभी को किसी न किसी रूप में सुख-दुःख तो सहने ही होते हैं, इसको भाग्य का दोष या गुण मानना संगत नहीं है। जब मनुष्य लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास करता है तो बाधाओं का आना भी निश्चित है। किन्तु इन बाधाओं से विचलित होने की आवश्यकता नहीं क्योंकि इन बाधाओं को पार करते हुए आगे का मार्ग प्रशस्त करना ही जीवन है। संसार में बढ़ते हुए अन्यान्य साथी मिलते हैं, उनमें से कुछ छूट जाते हैं और कुछ चलते रहते हैं। जो सतत् गतिशील रहते हैं, उनको सफलता का मिलना निश्चित है। लक्ष्य के प्रति सजग रहकर हर स्थिति में चलते रहना ही मानव की जीवन्तता का लक्षण है। इसलिए उसकी गति कभी भी अवरुद्ध नहीं होने देनी चाहिए।

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चलना हमारा काम है संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है। (2015, 16)

शब्दार्थ :
गति = चाल; प्रबल = तीव्र; दर-दर = द्वार-द्वार; मंजिल = लक्ष्य; विराम = आगम, रुकना।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित विविधा-2′ के ‘चलना हमारा काम है’ कविता से अवतरित है। इसके रचयिता शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हैं।

प्रसंग :
यहाँ कवि ने प्रेरित किया है कि क्षमता के रहते हुए व्यक्ति को लक्ष्य की ओर अविराम कदम बढ़ाने चाहिए।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि मेरे कदमों में चलने की तीव्र सामर्थ्य भरी हुई है इसलिए मैं द्वार-द्वार पर क्यों रुककर खड़ा रहूँ। जब आज मेरे सामने बहुत बड़ा प्रगति का मार्ग खुला पड़ा है तब मुझे खड़ा होने की क्या आवश्यकता है। मैं जब तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचता हूँ, तब तक मुझे रुकना स्वीकार नहीं है। क्योंकि हमारा वास्तविक कार्य तो जीवन में गतिशील रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत् सचेष्ट रहने की प्रेरणा दी गई है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है।
  3. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है।

[2] कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ तुम मिल गए
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है। (2010)

शब्दार्थ :
बोझ = भार; राह = मार्ग; राही = राहगीर, पंथी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि हिल-मिलकर चलने से जीवन की राह बड़ी सरलता से कट जाती है।

व्याख्या :
संसार में जीवन की राह पर जब साथ-साथ चलते हैं तो कुछ कहन-सुनन होना स्वाभाविक है। आपस में दुःख-दर्द की बातें कहने-सुनने से मानव के हृदय का भार तो कम हो ही जाता है। यह भी अच्छा रहा कि साथी मिल जाने से बातों ही बातों में जीवन का कुछ रास्ता कट गया। अब मैं अपने नाम आदि का क्या परिचय बताऊँ वास्तव में तो हम सभी इस जीवन पथ के पंथी हैं क्योंकि हमारा काम चलते रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. साथी से दुःख-दर्द बाँटकर जीवन की राह कुछ सहज कट जाती है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सुन्दर संयोग देखा जा सकता है।
  3. सरल, सुबोध तथा साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

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[3] जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी,
आशा निराशा से घिरा
हँसता कभी रोता कभी,
गति मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
अपूर्ण = अधूरा; अवरुद्ध = बाधित, रुके आठों याम= हर समय (दिन और रात दोनों आठ याम (प्रहर) के होते हैं)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि व्यक्ति अधूरा जीवन जीते हुए कभी कुछ प्राप्त कर लेता है, तो कभी कुछ खो भी देता है।

व्याख्या :
मानव के अधूरे जीवन की पूर्णता के प्रयास में कभी कुछ मिल जाता है तो कभी कुछ खो भी जाता है अर्थात् इस जीवन में लाभ-हानि, उत्थान-पतन, ऊँच-नीच चलती ही रहती है। इसी के अनुसार आशा-निराशा के भाव जगते ही रहते हैं। सफलता से आशा और असफलता से कुछ निराशा होती ही है। फलस्वरूप व्यक्ति हँसता-रोता हुआ जीवन पथ पर चलता ही जाता है। उसका ध्यान दिन-रात इस बात पर रहता है कि उसके जीवन की चाल कहीं बाधित न हो जाय। क्योंकि व्यक्ति का काम निरन्तर चलते रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सुख-दुःखमय जीवन की गति निरन्तर सचल रहनी चाहिए।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार।
  3. शुद्ध, साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

[4] इस विशद विश्व प्रवाह में
किसको नहीं बहना पड़ा,
सुख दुःख हमारी ही तरह
किसको नहीं सहना पड़ा,
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है। (2009)

शब्दार्थ :
विशद विशाल; विश्व-प्रवाह संसार का श्रम; व्यर्थ = बेकार, अनावश्यक रूप से; विधाता = भाग्य, ब्रह्मा; वाम = विपरीत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि संसार में सुख-दुःख तो सभी को सहने होते हैं। उनका बखान करना अनावश्यक है।

व्याख्या :
ऐसा कौन है जिसे संसार के इस विशाल क्रम की धारा में प्रवाहित न होना पड़ा हो अर्थात् सभी को इस संसार रूपी सरिता में बहना ही पड़ता है। संसार में सभी को जीवन में सुख और दुःख सहन करने ही पड़ते हैं। इनसे कोई नहीं बच पाता है। फिर दुःख आने पर यह कहना अनावश्यक है कि भाग्य मेरे विपरीत है। हमें तो दुःख की चिन्ता छोड़कर जीवन की राह पर चलते रहना चाहिए क्योंकि चलना ही हमारा कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. दु:ख आने पर भाग्य को दोष देना उचित नहीं है।
  2. सुख-दुःख तो आते-जाते ही रहते हैं।
  3. रूपक, अनुप्रास अलंकार।
  4. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

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[5] मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
दर-दर = द्वार-द्वार; पग = कदम; रोड़ा अटकता = बाधा आती रही; निराश = हताश।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन में आने वाली बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए।

व्याख्या :
मनुष्य जीवन में समग्र सफलता पाने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयास करता है। उसे द्वार-द्वार चक्कर काटने पड़ते हैं। जहाँ भी वहे प्रयास करता है वहाँ कुछ न कुछ बाधाएँ भी आती रहती हैं। व्यक्ति को उन बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए। आशा-निराशा तो जीवन में अपरिहार्य हैं। उनसे डरकर रुकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जीवन पथ पर चलते रहना ही व्यक्ति का कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन पथ में आने वाली बाधाओं से निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री।
  3. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

[6] कुछ साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
पर गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए,
चलता रहे हमदम, उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
फिर गए = वापस लौट गए; हमदम = साथी; अभिराम = सुन्दर, श्रेष्ठ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन के क्रम में कुछ साथ चलते रहते हैं, कुछ छूट जीते हैं किन्तु जो चलता रहता है उसे सफलता अवश्य मिलती है।

व्याख्या :
इस जीवन की राह के कुछ साथी तो साथ चलते ही रहे परन्तु कुछ मध्य मार्ग से ही लौट गये; किन्तु जीवन की चाल में ठहराव नहीं आया। वह तो चलता ही रहा, जो लौट गये सौ लौट गये। किन्तु जो साथी अथक रूप से निरन्तर साथ चलते रहते हैं, उन्हें श्रेष्ठ सफलता प्राप्त होती है। अतः मानव को निरन्तर चलते ही रहना चाहिए क्योंकि चलना ही हमारा कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन में श्रेष्ठ सफलता उसे मिलती है जो निरन्तर चलता ही रहता है।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार।
  3. सरल सुबोध तथा भाव के अनुरूप भाषा का प्रयोग हुआ है।

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