MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 4 धूपगढ़ की सुबह साँझ

धूपगढ़ की सुबह साँझ अभ्यास

धूपगढ़ की सुबह साँझ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धूपगढ़ कहाँ स्थित है?
उत्तर:
धूपगढ़ प्रसिद्ध पचमढ़ी पर स्थित है।

प्रश्न 2.
प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
लेखक ने प्रकृति की दो सहज स्थितियाँ मानी हैं-सुबह और साँझ।

प्रश्न 3.
सतपुड़ा का गौरव किसे कहा गया है? (2017)
उत्तर:
धूपगढ़ को सतपुड़ा का गौरव कहा गया है।

MP Board Solutions

धूपगढ़ की सुबह साँझ लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने सुबह और साँझ की तुलना माता-पिता के किन गुणों से की है?
उत्तर:
लेखक ने सुबह की तुलना पिता की प्रेरणा और शक्ति सम्पन्नता से की है तथा माता की ममता की तुलना साँझ की सहृदयता से की है।

प्रश्न 2.
साँझ की आँखों में करुणा क्यों उभर आती है?
उत्तर:
वनवासी की पगड़ी पर एवं वनवासी स्त्री की चूनर पर फूल संध्या के समय गिर जाते हैं। इससे साँझ की आँखें करुणा से द्रवित हो जाती हैं।

प्रश्न 3.
सुबह और साँझ की परस्पर तुलना क्यों अनुचित है?
उत्तर:
सुबह और साँझ की तुलना परस्पर अनुचित इसलिए है क्योंकि सुबह और साँझ दोनों की दुनिया अलग-अलग है, दोनों का अपना-अपना महत्व और सम्मोहन है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने प्रातःकालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना किन-किन बातों से की
उत्तर:
लेखक ने प्रात:कालीन पूर्ण सूर्य बिम्ब की तुलना विभिन्न प्राकृतिक उपमानों के माध्यम से की है-जिस प्रकार रोली से स्नात कलश को किरण से युक्त अल्पना पर रख दिया हो या किसी बड़े कुम्हार ने लाल मिट्टी का घड़ा अँधेरी सड़क पर प्यास से व्याकुल मानव की प्यास को बुझाने के लिए भर दिया हो। इसके अतिरिक्त जितने भी सेवा में व्यस्त मनुष्य हैं उनकी निस्वार्थ भावना युक्त सोने की कलश की चमक से तुलना की है।

प्रश्न 2.
तमतमाते दिवस की अवसान बेला कैसी है?
उत्तर:
तमतमाते दिवस की अवसान बेला में एक विशेष प्रकार का परिवर्तन आ जाता है। उसका प्रमुख कारण है कि इस बेला में सब कुछ शान्त हो जाता है। वनस्पति शान्त है, पक्षी भी शान्त हैं। सांसारिक झमेले भी शान्त हैं। आसमान की नीलिमा भी शान्त है। कभी न थकने वाले पक्षियों की उड़ान भी शान्त है क्योंकि वे संध्या काल में अपने नीड़ में विश्राम करते हैं। इसी कारण उनकी तीव्रगामी गति शान्त है। प्रकम्पित ध्वनियाँ शान्त हैं। उसका कारण है कि इस बेला में चारों ओर का कोलाहल शान्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
लेखक सुबह और साँझ के माध्यम से क्या कहना चाहता है? (2008, 09)
उत्तर:
लेखक ने सुबह और साँझ के माध्यम से जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन किया है। इसमें जीवन, मृत्यु, सुख, दु:ख और आदि-अंत तथा विभिन्न प्रकार के उतार-चढ़ाव के द्वारा जीवन के काल चक्र को दर्शाया है।।

सुबह और साँझ एक-दूसरे के विपरीत नहीं है अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। पिता की तुलना एवं माता की तुलना लेखक ने सुबह और साँझ से की है और यह बताने का प्रयास किया है कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों को सहृदय व स्नेह द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं तदनुकूल सुबह और साँझ मानव को जीवन पथ पर अग्रसर होने का पाठ पढ़ाते हैं। साथ ही सन्देश देते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति को धैर्य से बढ़ते रहना चाहिए।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
लेखक की भाषा अलंकारिक तथा शैली ललित है। उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की अलंकारिक भाषा का उदाहरण निम्नवत् है-
(1) वैसे तो कई सुबहों और साँझों का प्रकाश भीगी-पलकों ने उठते-गिरते देखा है परन्तु उन साँझों में एक साँझ यादों के वृक्ष पर फल की तरह लगी हुई है। धूपगढ़ की साँझ का रूप, रंग, आकार, रस सब कुछ निराकार बनकर अंतरिक्ष में फैला हुआ है। पंचमढ़ी, पर्वतों की रानी कही जाती है। सतपुड़ा का सारा निसर्गगत सौन्दर्य पचमढ़ी की गोदी में झूल रहा है।

(2) लेखक की भाषा शैली का अनुपम उदाहरण द्रष्टव्य है-प्राची के हिरण्य गर्भ से बालारूण की जन्म बेला की प्रतीक्षा में विश्व मोहिनी शक्ति जैसे जाग गई हो। क्षितिज पर पतली-सी रेखा उभरती है और बालक की किलकारी दिशाओं तक फैल जाती है। पक्षी उसी किलक को अपने स्वरों में भरकर आकाश को जाते हैं। क्षितिज पर भुवन भास्कर की पहली रेखा जैसे किसी बालक ने पूरब की स्लेट पर स्वर्णिम पेन से लकीर खींच दी हो; जिसका बीच का भाग ऊपर की ओर हल्का-सा उठा हुआ है। जैसे अंधेरे के महासमुद्र में आती हुई ऊषा का जल सतह पर सुनहरे रंग का केशबंध’ (हेयर बैंड) दिखाई दे रहा है।

(3) अन्य उदाहरण देखिए-यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंसक पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येत्तर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। उपर्युक्त उदाहरणों द्वारा भाषा की अलंकारिकता एवं शैली की विशेषता अवलोकनीय है।

प्रश्न 5.
इन गद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(1) गगन से सूर्योदय ……………. विरला ही पहुँचता है।
(2) धूपगढ़ की साँझ…………….. सुला लेती है।
उत्तर:
(1) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

(2) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

प्रश्न 6.
(क) प्रकृति सुख-दुःख से परे है। वह नियंता है।
(ख) जन्म और मृत्यु प्रकृति के लिए दो सहज स्थितियाँ हैं।
(ग) सुख के केन्द्र में स्वतन्त्रता और उन्मुक्तता होती है।
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव पल्लवन कीजिए।
उत्तर:
(क) लेखक ने इस पंक्ति द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि प्रकृति पर दुःख हो अथवा सुख, किसी भी प्रकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। प्रकृति नियंता एवं वीतराग है। वह भौतिक सुख-दुःख से परे रहकर विश्व का नियन्त्रण करती है। उसी के निर्देशन में परिवर्तन के दृश्य उपस्थित होते रहते हैं। प्रकृति पर विषम से विषम परिस्थितियाँ तनिक भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकतीं।

(ख) लेखक का कथन है कि इस धरती पर प्रकृति के माध्यम से निरन्तर जन्म और मृत्यु चक्र चलता ही रहता है। इनसे किसी को भी मुक्ति नहीं मिल सकती है। लेखक ने यहाँ गीता के इस तथ्य को उजागर किया है जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु निश्चित है तथा मृत्यु के पश्चात् पुनः जन्म होता है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नवीन वस्त्र धारण करता है। तद्नुरूप आत्मा पुराना काया रूपी वस्त्र उतारकर नया कायारूपी वस्त्र धारण करती है।

(ग) लेखक का कथन है धूपगढ़ वन क्षेत्र में रहने वाले मानव अभावों एवं गरीबी से त्रस्त हैं। वे इन अभावों के अन्तर्गत एक असीम सुख का अनुभव करते हैं। यद्यपि वे सांसारिक दृष्टि से कंगाल हैं लेकिन प्रकृति की गोद में पल कर एक अनिवर्चनीय सुख का अनुभव करते हैं। उनका सुख किसी के माध्यम से प्राप्त न होकर प्रकृति की निकटता का परिणाम है। वे स्वयं को पराधीन न मानकर स्वतन्त्र भाव से वन की धरती पर विचरण करते हैं।

MP Board Solutions

धूपगढ़ की सुबह साँझ भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय और उपसर्ग छाँटकर लिखिए
प्रस्थान, मनुष्यता, उन्मुक्तता, उज्ज्वल, तन्मयता, अविजित, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उत्तर:
प्रत्यय-मनुष्यता, उन्मुक्तता, तन्यता, नैसर्गिक, प्राकृतिक।
उपसर्ग : प्रस्थान, उज्ज्वल, अविजित।

प्रश्न 2.
निम्न शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
सुबह, साँझ, गाँव, पाँव, आँच।
उत्तर:
प्रातः, संध्या, ग्राम, पाद, अग्नि।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
उत्तर:

  1. जहाँ जाया न जा सके – अगम्य
  2. जिसकी उपमा न हो – अनुपमेय
  3. जिसे पढ़ा न हो – अपठित
  4. काँटों से भरा हुआ – कंटकाकीर्ण
  5. आकाश को छूने वाला – गगनचुम्बी
  6. सदा हरने वाला – अमर।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्य में विराम चिह्नों का यथास्थान प्रयोग कीजिए-
यह साँझ पृथ्वी को अमृत सोम शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है
उत्तर:
यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है।

धूपगढ़ की सुबह साँझ पाठ का सारांश

पंचमढ़ी स्थित धूपगढ़ सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की सर्वाधिक ऊँची चोटी है। सूर्य के निकलने एवं अस्त होने के समय नेत्रों एवं मन को लुभाने वाले दृश्यों की शोभा देखते ही बनती है। पर्यटक इन्हें देखते-देखते अघाते नहीं हैं। डॉ. श्रीराम परिहार ने अपने निबन्ध में धूपगढ़ की -प्रातः एवं साँझ बेला का छायावादी चित्रण अंकित किया है। प्रकृति का मानवीकरण सटीक एवं जीवन्त है। सुबह एवं शाम के प्रतीकों के द्वारा जिन्दगी, मृत्यु, विषाद एवं सुख आदि कालचक्र का ऐसा गतिशील विवेचन किया है जो जीवन की वास्तविकता को हमारे नेत्रों के समक्ष उपस्थित करने में सक्षम है। वनवासियों के संकटग्रस्त जीवन का भी वर्णन किया है। पशुओं एवं वन प्रदेश का भी चित्रण किया है। प्रातः एवं सन्ध्या के माध्यम से जिन्दगी के संघर्ष एवं शान्ति के तालमेल को भी अंकित किया है। निबन्ध में जिन्दगी का राग गुञ्जित है। आत्मा का वैराग्य भी ध्वनित है। सुबह-शाम एक-दूसरे के विरोधी न होकर जीवन के संदेशप्रद हैं।

MP Board Solutions

धूपगढ़ की सुबह साँझ कठिन शब्दार्थ

सुगन्ध = खुशबू। साँझ = सायंकाल। वर्ण रंग। अदृश्य = जो दिखायी न दे। दिक्काल = दिशाओं के स्वामी। उद्गम = निकलने का स्थान। क्षितिज = जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले हुए दिखाई देते हैं। पखेरुओं = पक्षियों। कर्मपूर्णता = काम के पूरा होने का भाव। अग्निमय = आग से भरा हुआ। शक्ति सम्पन्नता = शक्ति से युक्त। हृदय रसज्ञता = हृदय के रस को जानने की क्षमता। भोर तक = प्रात:काल तक। भीगी पलकों = आँसुओं से गीली पलकें। अंतरिक्ष = आकाश। निसर्गगत सौन्दर्य = प्राकृतिक सुन्दरता। पाग = पगड़ी। निशिवासर = रात-दिन। सान्निध्य = सम्पर्क। ब्रह्ममुहूर्त = प्रात:काल। वन वल्लरियों = लताओं। प्राची = पूर्व। हिरण्य-गर्भ = स्वर्ण या सोने की कोख। बालारुण = प्रात:कालीन सूर्य। स्वर्णिम = सोने के। ऊषा = प्रात:काल। महानिलय = आकाश। तृषा = तृप्ति, प्यास बुझाने के लिए। निष्कलुष = पवित्र। गोरिक वसना = गेरुए वस्त्र धारण करने वाली। नील-कुसुमित = नीले पुष्प के रूप में खिलना, नीलकलिका। माधवी लता = माधवी पुष्प की लता। प्रातिभ = प्रात:कालीन सूर्य की लाली। देहयष्टि = शरीर सौष्ठव। अल्हड़ ठवनि = चंचलमुद्रा। नूपुरों = घुघरुओं। कर्ण आह्लादन = कानों में खुशी उत्पन्न करने वाली। सारस्वत = ज्ञानमयी, बौद्धिक। पूर्वपीठिका = पहली भूमिका। तिमिर = अन्धकार। अनुताप-पूरित = दुःख से भरा हुआ। दिवस = दिन। प्राण बल्लभा = प्रेयसी, प्रियतमा। मलयज चीर = सुगन्धित वस्त्र, मलय चन्दन गन्ध से सुगंधित। मृग मरीचिका = मृगतृष्णा, मिथ्या प्रतीति। भास्वर = प्रकाशवान। उत्पुल्ल = प्रसन्न। सारसवर्णी = सारस के रंग वाली। साँसोच्छेदन = साँसों को समाप्त करना। अहेतुक = निस्वार्थ, स्वार्थ हीन। वात्सल्य = सन्तान के प्रति माता-पिता का प्रेम। स्लथ = बकी। शुभ्र = श्वेत, स्वच्छ।

धूपगढ़ की सुबह साँझ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. गगन से सूर्योदय के प्रकाश का अमृत झरता है। किरणें फूटती हैं और रश्मि-सेतु सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक बन जाता है। इसे देखना अच्छा लगता है। इस रश्मि सेतु पर चलकर सूर्य तक कोई विरला ही पहुँचता है। (2015)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘धूपगढ़ की सुबह साँझ’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक ‘डॉ. श्रीराम परिहार’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में परिहार जी ने धूपगढ़ की सुबह को देखने का अत्यन्त ही सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ में प्रात:काल आकाश से सूरज के प्रकाश का अमृत झरता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि यह प्रकाश मन एवं मस्तिष्क पर अमृत की शीतलप्रद बिन्दुओं के समान सुखदायी एवं आनन्दप्रद है। किरणें ही अमृत का स्रोत हैं। ये ही सूर्य से लेकर धूपगढ़ की चोटी तक किरणों का बाँध बनाती हैं। यद्यपि किरणों का बाँध देखने में तो मनोरम है लेकिन इस तक पहुँचने में कोई विरला ही सक्षम हो सकता है। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य का पान हर-एक के वश की बात नहीं है।

विशेष :

  1. प्रकृति का मानवीकरण है।
  2. प्रात: बेला की मनोरम झाँकी है।
  3. शैली अलंकारिक एवं परिमार्जित है।

2. धूपगढ़ की सुबह देखी है, साँझ भी देखी है। दोनों में किसका सौन्दर्य ज्यादा है? किसका रंग घना है? किसका प्रभाव गहरा है? नहीं कह सकते। यह तुलना भी अनुचित है। सुबह, सुबह है। साँझ, साँझ है। दोनों की अपनी दुनिया है। अपनी महिमा है। अपना सम्मोहन है। सामान्यतः सुबह और साँझ अपने प्राकृतिक चक्र के कारण सहज रूप में आती जाती हैं। इनके होने में प्रकृति की इच्छा ही अभिव्यक्त होती है। (2016)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में सुबह और साँझ दोनों के स्वाभाविक महत्व को समझाया गया है।

व्याख्या :
धूपगढ़, प्राकृतिक सौन्दर्य का भण्डार है। यहाँ की सुबह और साँझ बहुत ही रोमांचकारी होती है। यहाँ की सुबह और साँझ दोनों की सुन्दरता को देखा है। दोनों का सौन्दर्य अद्भुत है। यह कहना सम्भव नहीं है कि इनमें किसकी सुन्दरता अधिक है। किसका रंग घना प्रभावी है अथवा किसकी प्रभावशीलता गहन है। इन दोनों की सुन्दरता की तुलना करना भी उचित नहीं है। सुबह का सौन्दर्य सुबह का है और साँझ की सुन्दरता साँझ की है। इन दोनों का संसार अपना-अपना है। इनका गौरव, महत्व एवं मोहकता भी अपनी-अपनी है। वास्तविकता यह है कि सुबह और साँझ प्रकृति के चक्र के कारण स्वाभाविक रूप से आती हैं और चली जाती हैं। ध्यान से देखें तो इन दोनों के सम्पादन में प्रकृति की मनोकामना ही व्यक्त होती प्रतीत होती है।

विशेष :

  1. सुबह और साँझ के आवागमन की स्वाभाविकता का सटीक अंकन हुआ है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. काव्यमयी आलंकारिक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

MP Board Solutions

3. यह साँझ पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है। यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है। इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है, तो हिंस्त्र पशुओं की अंगड़ाई भी है। मनुष्य और मनुष्येतर जीव इसकी अतिथिशाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते हैं, तो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवों की साँसोच्छेदन में तत्पर भी होता है। (2012)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में धूपगढ़ की साँझ के रचनात्मक पक्ष का सटीक अंकन किया है।

व्याख्या :
धूपगढ़ की साँझ धरती को आनन्ददायी अमृत, चन्द्रमा, शीतलता प्रदान करती है। इससे दूध की धार प्रवाहित होती हैं। वन में रहने वाले पशुओं के लिए यह जागे रहकर सक्रिय रहने का समय है। साँझ होते ही दिनभर काम में लगे रहने वाला आदमी सोने को तत्पर होता है तो शिकारी पशु अंगड़ाई लेकर शिकार की खोज में निकल पड़ता है। आराम देने वाले संध्या के आवास में मानव चैन की नींद लेकर सूर्योदय के साथ पुनः संसार के कार्यों में सक्रिय हो जाता है। इसी समय वनराज सिंह अपनी तेज गर्जन से सारस आदि निरीह प्राणियों की स्वांसों के उच्छेदन के लिए तैयार होता है।

विशेष :

  1. संध्या के समय होने वाली गतिविधियों का रोचक वर्णन हुआ है।
  2. लाक्षणिक भाषा तथा रोचक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 3 जननी जन्मभूमिश्च

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 3 जननी जन्मभूमिश्च

जननी जन्मभूमिश्च अभ्यास

जननी जन्मभूमिश्च अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“गंगा और गंगा के कछार को मेरा सलाम कहें” यह कथन लेखक से किसने कहा?
उत्तर:
गंगा और गंगा के कछार को मेरा सलाम कहें; यह कथन लेखक से बनारस के रहने वाले एक व्यक्ति ने कराची में कहा।

प्रश्न 2.
जननी और जन्मभूमि किससे अधिक श्रेष्ठ है? (2009, 6)
उत्तर:
जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है।

प्रश्न 3.
आजादी की लड़ाई में ‘बड़े घर’ से आशय था? सही उत्तर लिखिए।
(अ) महल
(ब) जेलखाना
(स) बहुत बड़ी हवेली
(द) विशाल मकान।
उत्तर:
(ब) जेलखाना।

MP Board Solutions

जननी जन्मभूमिश्च लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मातृभूमि और स्वर्ग में क्या अन्तर है?
उत्तर:
मातृभूमि स्वर्ग से श्रेष्ठ होती है। मातृभूमि की गोद में हमारा लालन-पालन होता है। जिस प्रकार मानव अपनी माँ के कर्ज से उऋण नहीं हो सकता, तद्नुरूप अपनी मातृभूमि से भी उऋण नहीं हो सकता।

प्रश्न 2.
फूल की कामना क्या है?
उत्तर:
फूल की एक प्रबल कामना थी कि हे माली ! तुम मुझे तोड़ने के पश्चात् उस पथ पर फेंक देना जिस पथ से मातृभूमि के हितार्थ अपने प्राण प्रसूनों को अर्पित करने वाले शहीद गुजरते हैं।

प्रश्न 3.
गाय के दूध से माँ के दूध की तुलना क्यों नहीं की जा सकती? (2014, 17)
उत्तर:
गाय के दूध की तुलना माँ के दूध से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि गाय का दूध यत्र-तत्र सर्वत्र बाजार-हाट में उपलब्ध होता है। इसको व्यक्ति धन देकर खरीद सकता है। लेकिन माँ का दूध मूल्यवान है, कोई भी इसका मूल्य चुकता नहीं कर सकता।

प्रश्न 4.
लेखक ने अपने भारतीय हमवतन के चार सौ साल स्वर्ग को किस सुख पर हजार बार न्यौछावर किया है?
उत्तर:
लेखक ने अपने भारतीय हमवतन के चार सौ साल के स्वर्ग को मातृभूमि के सुख पर हजार बार न्यौछावर किया है, क्योंकि मातृभूमि के समान सुख एवं अपनत्व अन्यत्र प्राप्त होना दुर्लभ है।

जननी जन्मभूमिश्च दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जन्मभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्र प्रेम में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर:
जन्मभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्र प्रेम में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। उसका प्रमुख कारण है कि जो व्यक्ति जन्मभूमि के प्रति प्रेम व आस्था रखता है तथा मानव मूल्यों को समझता है वही व्यक्ति राष्ट्रीय दायित्व का भली प्रकार निर्वाह कर सकता है। मानव को अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है और तभी देशभक्ति का सही अर्थ चरितार्थ होता है। राष्ट्र के प्रति व्यक्ति तभी प्रेम कर सकता है, जबकि उसको अपनी जन्मभूमि से स्नेह हो।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
लेखक के नीग्रो कवि मित्र ने अमेरिका के सम्बन्ध में क्या विचार व्यक्त किए?
उत्तर:
लेखक के नीग्रो कवि मित्र ने अमेरिका के सम्बन्ध में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं कि यह कचरा फेंक उपभोक्ता का देश एवं यह आदमी और आदमी के बीच अदृश्य झिल्ली की दीवार बनाने वाली संस्कृति का देश है।

यह खरीदो-वह खरीदो के पागलपन वाला देश अगर वह स्थान स्वर्ग है तो फिर नरक कहाँ है? मन देश की छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए तरसता रहता है। तब भी स्वर्ग इसको नहीं छोड़ पाता। यद्यपि स्वर्ग के प्राणी उसे दुतकारते हैं, विभिन्न प्रकार से अपमानित करते हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि स्वर्ग में द्वितीय श्रेणी के नागरिक का अधिकार प्राप्त करने के लिए उसे अपने देश की सरकार की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। वह अपनी सरकार से अपेक्षा रखता है क्योंकि वह अपनी सरकार को विदेशी मुद्रा देता है।

लेकिन व्यक्ति उस समय इस बात को भूल जाता है कि मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। अतः अन्त में यह कहा जा सकता है कि नीग्रो कवि ने भी विदेश के महत्व को नकारते हुए मातृभूमि को श्रेष्ठ ठहराया है।

प्रश्न 3.
अपभ्रंश के पुराने दोहे में देश का सबसे बड़ा घर किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
अपभ्रंश के पुराने दोहे में देश का सबसे बड़ा घर वह है जहाँ प्यारे बन्धु रहते हैं। जो प्रत्येक व्यक्ति को दुःखों को सहने की क्षमता प्रदान करते हैं। वे दुःखी व्यक्ति के घावों पर मरहम अपने मधुर वचनों से लगाते हैं।

अत: देश का सबसे बड़ा घर यदि एक साधारण झोंपड़ी को कहा जाये तो उचित ही है। श्रीराम ने चित्रकूट में स्वयं पर्णकुटी बनायी तथा सुखपूर्वक निवास किया।

अन्य सुरम्य स्थान राधा की गौशाला है जहाँ श्रीकृष्णजी स्वयं गायों का दूध दुहने के लिए जाते थे। इसके अतिरिक्त भगवान बुद्ध की साधारण-सी आम की बगिया जहाँ पर उन्होंने महल त्यागने के पश्चात् अपना निवास स्थान बनाया और वैशाली की नगर वधू आम्रपाली को भिक्षा में लिया।

इसके अतिरिक्त जनसाधारण को सत्य, अहिंसा एवं प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गाँधी भी साबरमती आश्रम में साधारण सी कुटिया में रहे। गाँधी जी सच्चे अर्थों में आज भी जनसाधारण के हृदय में विद्यमान हैं।

अतः निष्कर्ष में कह सकते हैं कि वह स्थान ही बड़ा घर है जहाँ कि सच्चरित्र व्यक्ति रहते हैं।

प्रश्न 4.
सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) देश का वरण……………बस हो जाता है।
(ब) वह अपनी निजता……………..”प्राप्त नहीं होता।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘जननी जन्मभूमिश्च से उद्धत किया गया है। इसके लेखक ‘विद्यानिवास मिश्र’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में मिश्र जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि मातृभूमि का अन्य विकल्प नहीं है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि जब लोग अपने देश की धरती को छोड़कर विदेशों में गमन करते हैं, तो वहाँ रहकर विवशता एवं आवश्यकतावश उन्हें उस देश के वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयास करना पड़ता है। लेकिन अपनी धरती माँ के सदृश पूज्यनीय एवं वन्दनीय है, उसको अंगीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो मानव के हृदय पटल पर जन्म से ही अंकित रहती है। जिस प्रकार पुत्र का अपनी माँ के प्रति असीम अनुराग होता है, तदनुरूप व्यक्ति का मातृभूमि की मिट्टी के प्रति असीम लगाव होता है। विदेशों में भी जब उसके देश की चर्चा होती है तब भावनाओं का कोमल सागर हृदय में तरंगें लेने लगता है।

(ब) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी का कथन है प्रवासी भारतीय विदेशों में रहकर भी अपने देश के प्रति प्रेम से जुड़े रहना चाहते हैं।

व्याख्या :
मिश्र जी विदेश यात्रा पर गये। वहाँ प्रवासी भारतीयों की बातचीत से उनकी दुविधा उजागर हुई कि विदेशों में रहते हुए भी वे अपनी निजता या मातृभूमि के प्यार को किसी भी दशा में त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यद्यपि उन्हें विदेशी भाषाओं का ज्ञान नहीं था लेकिन भोजपुरी एवं थाई भाषा बोलने में पूरी तरह सक्षम थे। उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी कि वृद्धावस्था के आगमन पर वह अपनी मातृभूमि के प्रांगण में ही जीवनयापन करें।

मृत्यु की गोद में सोने से पूर्व तुलसी दल तथा गंगा के पवित्र जल की एक बूंद उसके गले में अवश्य डाली जाये। मानव मातृभूमि के प्रति अपने अपनत्व को इतना महत्व देता है जितना कंठगत प्राण को वह येन-केन प्रकारेण बचाने का भरसक प्रयास करता है। ये अपनी जड़ से अथवा मातृभूमि से जुड़े रहने का जीवन्त प्रमाण है। मातृभूमि की मिट्टी में जो प्यार निहित है, वह सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसा अनुराग अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

प्रश्न 5.
भाव पल्लवन कीजिए
(अ) मुल्क बदल जाये, वतन तो वतन होता है।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन में मिश्र जी ने विदेशों की धरती पर रहने वाले व्यक्ति का अपने देश के प्रति लगाव एवं प्यार को व्यक्त किया है।

मुझे मेरे देश का ही एक व्यक्ति करांची की सैर कराने में सहायक हुआ। उसने मेरा इतना स्वागत किया कि मेरे हृदय-तन्त्री के तारों को झंकृत कर दिया। मेरी वायुयान से दूसरी उड़ान का समुचित प्रबन्ध कर दिया। जब लेखक ने उससे विदा माँगी तो उसके नेत्रों में आँसू झलकनोलगे। उसने कहा कि अपना वतन अपना ही होता है। देशों के परिवर्तन से व्यक्ति के अपने देश के प्रति अनुराग में तनिक भी कमी नहीं आती।

(ब) जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन का भाव है कि जननी एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है। इस तथ्य को राम ने लंका के सत्कार को ठुकराकर मातृभूमि के प्रति अपने स्नेह को व्यक्त किया है। इस युक्ति की सार्थकता अचानक पाकिस्तानी की आँखों में छलछलाने वाले अश्रु बिन्दुओं में साकार रूप से दृष्टिगोचर हो रही थी। मनुष्य को मातृभूमि की महत्ता का ज्ञान विदेशों में रहने पर ही ज्ञात होता है, जहाँ आडम्बर एवं बाह्य प्रदर्शन का बोलबाला है।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
‘जननी जन्मभूमिश्च’ पाठ के आधार पर ‘मातृभूमि स्वर्ग के समान है’ विषय के पक्ष में तीन उदाहरण देकर अपनी बात समझाइए। (2010)
उत्तर:
मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है। इसका कारण है कि हम जन्म लेते ही मातृभूमि पर पैर रखते हैं। वह हमारा भार सहन करती है, हमारी लात सहती है। मातृभूमि ही हमें भोजन, पानी, फल आदि देती है और बड़ा करती है। मातृभूमि हमें अनायास ही सब कुछ देती है। इस तरह मातृभूमि स्वर्ग के समान ही नहीं उससे भी अधिक महत्व की है। यही कारण है कि मातृभूमि को भूल पाना असम्भव है।

जननी जन्मभूमिश्च भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए-
वतन, मुल्क, सलाम, जाहिल, हकीकत, कैदखाना।
उत्तर:
देश, राष्ट्र, प्रणाम, अशिक्षित, वास्तविक, बन्दीगृह।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखिए
(क) राष्ट्र से सम्बन्धित भाव
(ख) आध्यात्म से सम्बन्धित
(ग) व्यवसाय से सम्बन्धित
(घ) बूढ़ा होने की अवस्था।
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय
(ख) आध्यात्मिक
(ग) व्यावसायिक
(घ) वृद्धावस्था।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
उत्तर:
(अ) अशुद्ध-मोहन कुत्ते को डण्डे से मारा।
शुद्ध-मोहन ने कुत्ते को डण्डे से मारा।

(आ) अशुद्ध-क्या आप खाना खा लिए हैं?
शुद्ध-क्या आपने खाना खा लिया है?

(इ) अशुद्ध-दरवाजे पर कौन आई है?
शुद्ध-दरवाजे पर कौन आया है?

(ई) अशुद्ध- मेरा बेटा और बेटी बाजार गई हैं।
शुद्ध-मेरा बेटा और बेटी बाजार गये हैं।

(उ) अशुद्ध- इतना मीठा चाय मैं नहीं पी सकती हूँ।
शुद्ध-इतनी मीठी चाय मैं नहीं पी सकती हूँ।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
पसरा होना, घेरे में डालना, आँखें छलछला आना, स्वर्ग बना रहना, लात सहना, भारी पड़ना।
उत्तर:

  1. पसरा होना-प्लेटफार्म पर यात्री रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में यत्र-तत्र पसरे हुए थे।
  2. घेरे में डालना-पुलिस ने अपराधियों को घेरे में डालकर बन्दी बना लिया।
  3. आँखें छलछला आना-विदेश में अपनी मातृभूमि का प्रकरण आते ही मेरी आँखें छलछला उठीं।
  4. स्वर्ग बना रहना-आत्मीयता के माध्यम से ही धरती पर स्वर्ग बना रहेगा।
  5. लात सहना-विदेशी शासन में भारतीयों को अंग्रेजों को लात सहनी पड़ी।
  6. भारी पड़ना-भारतीय क्रिकेट टीम इस बार कंगारुओं (ऑस्ट्रेलिया) पर भारी पड़ी।

MP Board Solutions

जननी जन्मभूमिश्च पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध के लेखक श्री विद्यानिवास मिश्र हैं। ललित निबन्ध लेखन के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने ऐतिहासिक प्रसंगों एवं विभिन्न संस्मरणों के माध्यम से जन्मभूमि के महत्त्व का दिग्दर्शन कराया है। जन्मभूमि का कोई भी विकल्प नहीं है। पौराणिक उदाहरणों एवं लोकगीत के माध्यम से जन्मभूमि की महिमा का बखान किया है। प्रवासी भारतीयों की भावनाओं को भी व्यक्त किया है जो अपनी मातृभूमि के प्रति लगाव रखते हैं। फूल भी मौन रूप से अपनी यह इच्छा व्यक्त करता है कि उसे देश की बलि वेदी पर प्राण-प्रसून अर्पित करने वाले वीरों के मार्ग पर बिखेर दिया जाये। लेखक के मतानुसार मानवीय मूल्यों पर प्रतिष्ठित भावना, मातृभूमि के प्रेम में बाधक नहीं है।

जननी जन्मभूमिश्च कठिन शब्दार्थ

प्रवास = विदेश में रहने वाला। उत्कण्ठा = आकांक्षा। कोफ्त = खीझ। कानून की कैद – कानून का बन्धन। मुल्क = देश। वतन = मातृभूमि, जन्मभूमि। अपि = भी। रोचते = अच्छी लगती। स्वर्गादपि गरीयसी = स्वर्ग से बढ़कर। सार्थकता वास्तविकता। बेकाबू = काबू से बाहर। दायित्व = जिम्मेदारी। निष्ठा = आस्था। सुधि = याद। लोकाचार = सामाजिक रीति-रिवाज। सुलक्षण कन्या = अच्छे गुणों वाली लड़की। नीग्रो = अश्वेत अमेरिकन नागरिक। जाहिल = अशिष्ट। भौतिक सुख-सुविधा = सांसारिक सुख-सुविधा। आध्यात्मिक = आत्मा सम्बन्धी, ब्रह्म और जीव से सम्बन्धित। उपभोक्ता = उपभोग करने वाला। अदृश्य झिल्ली = जो झिल्ली दिखायी न दे। उद्वेलित = उद्विग्न। विरक्ति = अलगाव, विराग। अनबूझ पहेली = अनसुलझी पहेली। दुतकारते = प्रताड़ित करना। विडम्बना = विसंगति। अपेक्षा = आशा करना। अलाव = आग जलाने का वह स्थान जिसके चारों ओर लोग बैठकर आग तापते हैं। निरुपायता = कोई उपाय न होना। उत्सुकता = जिज्ञासा। बहिश्त = स्वर्ग। रूमानी = रसिक, रस से युक्त। लुभावना = मन को अच्छा लगना। प्रवासी भारतीय = अन्य देश में रहने वाले भारतीय। विवशता = मजबूरी, लाचारी। आत्मीयता = अपनत्व, स्नेह के साथ। मार्गदर्शक = मार्ग दिखाने वाला। परिमार्जित = परिष्कृत। प्रतिबिम्ब = परछाईं। तृप्त = सन्तुष्ट। निजता = अपनापन। कण्ठगत प्राण = गले तक आ चुके प्राण, प्राण निकलने की स्थिति। अपभ्रंश = एक भाषा। बड़प्पन = श्रेष्ठता, बड़ाई। आराध्य = इष्ट देव, जिसकी आराधना की जाये। मुमूर्ष = मरणासन्न, मरण का इच्छुक। पेरियार = केरल प्रान्त का एक क्षेत्र। नवनीत = मक्खन। न्यौछावर = निछावर, समर्पण।

जननी जन्मभूमिश्च संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. देश का वरण न जाने किन-किन दबावों और जरूरतों से आदमी करता है पर माँ का कोई वरण नहीं करता, न कोई जन्मभूमि का वरण करता है। वह माँ का बस बेटा होता है, जन्मभूमि का, माटी का बस हो जाता है। (2008, 14, 17)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘जननी जन्मभूमिश्च से उद्धत किया गया है। इसके लेखक ‘विद्यानिवास मिश्र’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में मिश्र जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि मातृभूमि का अन्य विकल्प नहीं है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि जब लोग अपने देश की धरती को छोड़कर विदेशों में गमन करते हैं, तो वहाँ रहकर विवशता एवं आवश्यकतावश उन्हें उस देश के वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयास करना पड़ता है। लेकिन अपनी धरती माँ के सदृश पूज्यनीय एवं वन्दनीय है, उसको अंगीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो मानव के हृदय पटल पर जन्म से ही अंकित रहती है। जिस प्रकार पुत्र का अपनी माँ के प्रति असीम अनुराग होता है, तदनुरूप व्यक्ति का मातृभूमि की मिट्टी के प्रति असीम लगाव होता है। विदेशों में भी जब उसके देश की चर्चा होती है तब भावनाओं का कोमल सागर हृदय में तरंगें लेने लगता है।

विशेष :

  1. प्रवासी भारतीयों का अपने देश के प्रति अगाध स्नेह को दर्शाया है।
  2. मानवीय भावनाओं का अंकन है।
  3. शैली प्रांजल एवं प्रभावपूर्ण है।

MP Board Solutions

2. इस आदमी की दुविधा एक मानवीय दुविधा है, वह अपनी निजता का प्रतिबिम्ब तो पाना चाहता है, पाकर तृप्त भी होता है, पर अपनी निजता को खोना नहीं चाहता, कंठगत प्राण की तरह उसे बचाये रखना चाहता है। शायद अपनी जड़ से इतना लगाव न होता तो इतना प्यार, अनायास दूसरे से पाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। (2009, 11)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी का कथन है प्रवासी भारतीय विदेशों में रहकर भी अपने देश के प्रति प्रेम से जुड़े रहना चाहते हैं।

व्याख्या :
मिश्र जी विदेश यात्रा पर गये। वहाँ प्रवासी भारतीयों की बातचीत से उनकी दुविधा उजागर हुई कि विदेशों में रहते हुए भी वे अपनी निजता या मातृभूमि के प्यार को किसी भी दशा में त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यद्यपि उन्हें विदेशी भाषाओं का ज्ञान नहीं था लेकिन भोजपुरी एवं थाई भाषा बोलने में पूरी तरह सक्षम थे। उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी कि वृद्धावस्था के आगमन पर वह अपनी मातृभूमि के प्रांगण में ही जीवनयापन करें।

मृत्यु की गोद में सोने से पूर्व तुलसी दल तथा गंगा के पवित्र जल की एक बूंद उसके गले में अवश्य डाली जाये। मानव मातृभूमि के प्रति अपने अपनत्व को इतना महत्व देता है जितना कंठगत प्राण को वह येन-केन प्रकारेण बचाने का भरसक प्रयास करता है। ये अपनी जड़ से अथवा मातृभूमि से जुड़े रहने का जीवन्त प्रमाण है। मातृभूमि की मिट्टी में जो प्यार निहित है, वह सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसा अनुराग अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

विशेष :

  1. लेखक की गहन अनुभूति विद्यमान है।
  2. भाषा में कोमल कमनीयता का समावेश है।
  3. शैली सरस, सरल एवं सुबोध है।

3. स्वर्ग से मातृभूमि इसलिए ही शायद बड़ी है कि स्वर्ग का भोग करने वाला अपने को ऊँचा समझने लगता है, मातृभूमि से प्यार करने वाला विनम्र बना रहता है, यह समझने के लिए कि जैसे अपनी भूमि के लिए तड़पता है, वैसे ही दूसरा भी तड़पता होगा। बड़प्पन कहीं रहने से या कहीं न रहने से नहीं आता है, आता है दूसरे को बड़प्पन देने से, दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानने से। (2013)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
मिश्र जी ने इस गद्यांश में मानवीय विनम्रता की महत्ता को उजागर किया गया है।

व्याख्या :
सामान्यतः स्वर्ग को सबसे उत्तम माना गया है, किन्तु जन्मभूमि से भी बढ़कर जो स्वर्ग का उपभोग करता है, वह स्वयं को अन्य से ऊँचा समझता है, परन्तु मातृभूमि को प्रेम करने वाला शिष्ट एवं नम्र बना रहता है। उसमें बड़े होने का गर्व नहीं आता है। वह जानता है कि जैसे मेरे मन में अपनी जन्मभूमि के लिए तड़पन है, वैसी ही तड़पन औरों में भी अपनी मातृभूमि के लिए अवश्य होगी। श्रेष्ठता किसी विशेष स्थान पर रहने अथवा नहीं रहने से नहीं आती है। यह तो दूसरे को श्रेष्ठ मानने से प्राप्त होती है, औरों के कष्ट को अपना कष्ट मानने से बड़प्पन आता है।

विशेष :

  1. जन्मभूमि के प्रति प्यार हृदय में विनम्रता का संचार करता है।
  2. सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. तर्कपूर्ण विवेचनात्मक शैली में विषय को स्पष्ट किया गया है।

MP Board Solutions

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकमंगल की भावना जिनके काव्य में व्यक्त हुई है (2008,09)
(i) सूरदास,
(ii) बिहारी
(iii) तुलसीदास,
(iv) रसखान।
उत्तर:
(iv) रसखान।

प्रश्न 2.
मीरा भक्त थीं (2009)
(i) राम की
(ii) कृष्ण की
(iii) ब्रह्म की
(iv) शिव की।
उत्तर:
(ii) कृष्ण की

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
सूर ने मनोहारी वर्णन किया है
(i) बालक राम का
(ii) श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का
(iii) शिव के नृत्य का
(iv) नारद के भ्रमण का।
उत्तर:
(ii) श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का

प्रश्न 4.
गोपिका की आँख में दो तत्त्व भर गये थे नंदलाल और (2016)
(i) धूल
(ii) गुलाल
(iii) मिर्च
(iv) मिट्टी।
उत्तर:
(ii) गुलाल

प्रश्न 5.
वृक्ष फल देते हैं
(i) स्वयं के लिए
(ii) किसी के लिए नहीं
(iii) अहसान के लिए
(iv) दूसरों के लिए।
उत्तर:
(iv) दूसरों के लिए।

प्रश्न 6.
सेनापति के संकलित पदों में हुआ है
(i) ऋतु वर्णन
(ii) नगर वर्णन
(ii) दृश्य वर्णन
(iv) नख-शिव वर्णन।
उत्तर:
(i) ऋतु वर्णन

प्रश्न 7.
पन्तजी नौका विहार करने गये (2010, 14)
(i) प्रातःकाल
(ii) सायंकाल
(iii) दोपहर में
(iv) चाँदनी रात में।
उत्तर:
(iv) चाँदनी रात में।

प्रश्न 8.
भूषण के काव्य में वर्णन हुआ है
(i) शौर्य का
(ii) श्रृंखला का
(iii) वात्सल्य का
(iv) भक्ति का।
उत्तर:
(i) शौर्य का

प्रश्न 9.
‘दिनकर’ कविता का आह्वान किसलिए करते हैं?
(i) मनोरंजन के लिए
(ii) दया के लिए
(iii) जनता को जगाने के लिए
(iv) युद्ध के लिए।
उत्तर:
(iii) जनता को जगाने के लिए

प्रश्न 10.
साये में धूप महसूस की (2008)
(i) दिनकर ने
(ii) दुष्यन्त कुमार ने
(iii) गिरिजाकुमार माथुर ने
(iv) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने।
उत्तर:
(ii) दुष्यन्त कुमार ने

प्रश्न 11.
बालक कृष्ण का रुचिकर व्यंजन है (2015)
(i) माखन-मिश्री
(ii) दूध-रोटी
(iii) दाल-चावल
(iv) माखन-मलाई।
उत्तर:
(i) माखन-मिश्री

MP Board Solutions

प्रश्न 12.
कवच-कुण्डल किसने दान किए? (2017)
(i) अर्जुन ने
(ii) श्रीकृष्ण ने
(iii) कर्ण ने
(iv) दुर्योधन ने।
उत्तर:
(iii) कर्ण ने

रिक्त स्थान पूर्ति

  1. ………… ने राम के लोकमंगल व लोककल्याणकारी रूप को जनता के सामने प्रतिष्ठित किया। (2008)
  2. तुलसीदास के पदों में ………………… रस की प्रधानता है। (2008)
  3. …………………. को कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है। (2008)
  4. सेनापति ने …………… को ऋतुराज कहा है। (2015)
  5. कबीर ने ……………….. ज्ञान को उपयोगी माना है।
  6. ………………. के चले जाने के कारण ब्रजवासी दु:खी थे।
  7. अंगद ………………… का पुत्र था।
  8. कवियों ने …………….. की बोली का बखान किया है।
  9. ………………… ऋतु में सूर्य चन्द्रमा के समान लगता है। (2009, 16)
  10. ……………के तीन भाग हैं-साखी, सबद और रमैनी। (2008)
  11. ……………… ने कवच-कुंडल दान किए थे।
  12. बालि ने काँख में …………………. को छुपा लिया था। (2009)
  13. खंजन पक्षी का दुःख……………… ऋतु में मिट जाता है। (2009)
  14. महल बनाने के लिए ………………… का बलिदान होता है। (2012)
  15. मीरा ने …………….. को अपना आराध्य बताया है। (2017)

उत्तर:

  1. तुलसी
  2. शान्त
  3. केशव
  4. बसंत
  5. व्यावहारिक
  6. श्रीकृष्ण
  7. बालि,
  8. कोयल
  9. शिशिर
  10. बीजक
  11. कर्ण
  12. रावण
  13. शरद
  14. झोंपड़ी
  15. श्रीकृष्ण।

MP Board Solutions

सत्य/असत्य

  1. तुलसीदास प्रण करके राम के चरण-कमलों में बसना चाहते हैं। (2009)
  2. राधा विरह का दुःख भुलाने के लिए समाज सेवा करती हैं।
  3. शिवाजी के नगाड़ों की घोर से बादशाहों की छाती धड़कती थी।
  4. श्री राम भद्राचार्य ने श्रीकृष्ण का वर्णन किया है। (2010)
  5. बिना अवसर के कही गई अच्छी बात अच्छी लगती है। (2009)
  6. गोपियों की आँखों में दो तत्त्व भर गये थे। (2015)
  7. भूषण ने छत्रसाल के शौर्य का वर्णन किया है।
  8. दुष्यन्त कुमार ने उर्दू में ही गजलें लिखी हैं।
  9. कबीर अनुभूत ज्ञान को ज्यादा महत्व देते थे। (2009)
  10. कजरी ग्रीष्म ऋतु में गाई जाती है। (2016)

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य
  6. सत्य
  7. सत्य
  8. असत्य
  9. सत्य
  10. असत्य।

जोड़ी मिलाइए

I.
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (क)
3. → (घ)
4. → (ङ)
5. → (ग)
6. → (च)

II.
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न img-2
उत्तर:
1. → (च)
2. → (ग)
3. → (क)
4. → (ङ)
5. → (घ)
6. → (ख)

MP Board Solutions

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
कौआ और कोयल में क्या समानता होती है? (2009)
उत्तर:
काले रंग की

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण ने किसका गर्व चूर करने को गोवर्धन पर्वत धारण किया था?
उत्तर:
इन्द्र का

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण के मुकुट में कौन-सी वस्तु लगी है? (2017)
उत्तर:
मोर पंख

प्रश्न 4.
सज्जन पुरुष किसलिए धन संचय करते हैं?
उत्तर:
परहित के लिए

प्रश्न 5.
‘तुम पै धनुरेख गई न तरी’ किससे कहा गया है? (2009)
उत्तर:
रावण के लिए

प्रश्न 6.
जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र क्या है? (2014)
उत्तर:
कर्मशील रहना

प्रश्न 7.
‘यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे बसते हैं’ से क्या आशय है?
उत्तर:
संवेदनशीलता का

प्रश्न 8.
कोई न कोई अभाव रहने के कारण जीवन को क्या कहा गया है?
उत्तर:
अपूर्ण

प्रश्न 9.
छत्रसाल की बरछी ने किनके बल खींच लिए हैं?
उत्तर:
दुष्ट मुगलों के

प्रश्न 10.
‘लाखों क्रोंच कराह रहे हैं’ से दिनकर क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर:
अनेक पीड़ित प्राणी

प्रश्न 11.
‘नौका विहार’ कविता में चंचल किरणों की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
चाँदी के साँपों से

प्रश्न 12.
वह कौन-सी सम्पत्ति है जो व्यय करने पर बढ़ती है? (2009)
उत्तर:
विद्या

MP Board Solutions

प्रश्न 13.
कजरी कब गाई जाती है? (2009)
उत्तर:
वर्षा ऋतु में

प्रश्न 14.
कवच-कुण्डल दान किसने किये थे? (2009)
उत्तर:
कर्ण ने

प्रश्न 15.
पंतजी की कविता ‘नौका विहार’ किस नदी पर विहार की अनुभूति है? (2012)
उत्तर:
गंगा नदी पर

प्रश्न 16.
तुलसीदास किसके चरण छोड़कर जाना नहीं चाहते? (2015)
उत्तर:
श्रीराम के।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 2 शिरीष के फूल

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 2 शिरीष के फूल

शिरीष के फूल अभ्यास

शिरीष के फूल अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिरीष किस ऋतु में फूलता है?
उत्तर:
शिरीष जेठ मास की तपती धूप में फलता-फूलता है।

प्रश्न 2.
शिरीष की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
शिरीष की तुलना अद्भुत अवधूत से की गई है।

प्रश्न 3.
शिरीष अपना पोषण कहाँ से प्राप्त करता है? (2017)
उत्तर:
शिरीष अपना पोषण वायुमण्डल से रस खींचकर प्राप्त करता है।

MP Board Solutions

शिरीष के फूल लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“शिरीष निर्धात फलता रहता है।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा है? (2014)
उत्तर:
शिरीष जेठ मासं की गर्मी में तो फलता-फूलता ही है बसन्त के आगमन के साथ लहक उठता है। आषाढ़ में मस्ती से भरा रहता है। यदि इच्छा हुई एवं मन रम गया तो भरे भादों में भी बेरोक-टोक फूलता रहता है। इसी कारण लेखक ने शिरीष निर्धात फूलता है, कहा है।

प्रश्न 2.
किन परिस्थितियों में शिरीष जीवन जीता है?
उत्तर:
चाहे जेठ की चिलचिलाती धूप हो, चाहे पृथ्वी धुयें से रहित अग्नि कुण्ड बनी हो; शिरीष नीचे से ऊपर तक फूल से लदा रहता है। बहुत ही कम पुष्प इस प्रकार की तपती दुपहरी में फूल सकने का साहस जुटा पाते हैं। अमलतास भी शिरीष की तुलना नहीं कर सकता है। इस प्रकार विषम परिस्थितियों में भी शिरीष जीवन जीता है।

प्रश्न 3.
लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना किससे की है और क्यों ? लेखक के अनुरूप शिरीष के फूलों की क्या प्रकृति है?
उत्तर:
लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना कालजयी अवधूत से की है क्योंकि अवधूत की भाँति ही यह हर परिस्थिति में मस्त रहकर जीवन की अजेयता का सन्देश देता है। शिरीष का फूल एक अवधूत की भाँति दुःख एवं सुख में समान रूप से स्थिर रहकर कभी पराजय स्वीकार नहीं करता है। उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं है। धरती एवं आसमान के जलते रहने पर भी यह अपना रस खींचता ही रहता है।

प्रश्न 4.
शिरीष के फूलों के सम्बन्ध में तुलसीदास जी का क्या कथन है?
उत्तर:
शिरीष के फूलों के सम्बन्ध में तुलसीदास जी ने कहा है-“धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना’ अर्थात् जो फूल फलता है वही अवश्य कुम्हलाकर झड़ जाता है। कुम्हलाने के पश्चात पुनः विकसित हो जाता है।

प्रश्न 5.
लेखक ने शिरीष के सम्बन्ध में किन-किन विद्वानों के नाम बताये हैं?
उत्तर:
लेखक ने शिरीष के सम्बन्ध में कालिदास, कबीरदास, तुलसीदास तथा आधुनिक काल में अनासक्ति सुमित्रानन्दन पंत एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि विद्वानों के नामों का उल्लेख किया है।

प्रश्न 6.
शिरीष और अमलतास में क्या अन्तर है?
उत्तर:
शिरीष का फूल हर मौसम में फलता फूलता है जबकि अमलतास मात्र पन्द्रह-बीस दिन के लिए फूलता है। बसन्त ऋतु के पलाश पुष्प की भाँति शिरीष का फूल कालजयी एवं अजेय है इस कारण इसकी तुलना अमलतास से नहीं की जा सकती है।

MP Board Solutions

शिरीष के फूल दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं। इस वाक्य पर अपने भाव अभिव्यक्त कीजिए।
उत्तर:
जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु ये दोनों ही संसार के चिरपरिचित एवं कटु सत्य हैं। यह तथ्य पूर्णतः सिद्ध एवं प्रामाणिक है। इसका उल्लेख गीता में भी है। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है। मृत्यु के उपरान्त जीव काया रूपी पुराने वस्त्र को त्याग नवीन शरीर धारण करता है। यह क्रम शाश्वत है। किसी कवि ने इस तथ्य को निम्नवत् व्यक्त किया है, देखिए-
“आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर”
कोई हाथी चढ़ चल रहा कोई बना जंजीर।”

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि जरा एवं मृत्यु ये दोनों ही तथ्य सत्य हैं इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस तथ्य को तुलसीदास ने भी स्वीकारा है।

प्रश्न 2.
लेखक ने कबीर की तुलना शिरीष से क्यों की है? समझाइए। (2009)
उत्तर:
लेखक ने कबीर की तुलना शिरीष से इसलिए की है क्योंकि जिस प्रकार शिरीष का फूल चाहे गर्मी हो, बरसात हो, बसन्त हो अथवा ग्रीष्म ऋतु की लू के भयंकर थपेड़े हों वह हर दशा में फलता-फूलता है तथा झूम-झूम कर अपनी प्रसन्नता को निरन्तर व्यक्त करता है। शिरीष पर सर्दी, गर्मी, धूप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

जिस प्रकार कबीर अनासक्त योगी थे एवं मस्त-मौजा प्रवृत्ति के संत थे। निन्दा, अपमान अथवा प्रशंसा का उन पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। जैसा कि कबीर के निम्न कथन से यह सत्य उजागर होता है-
“कबिरा खड़ा बाजार में लिए लकुटिया हाथ।
जो घर फूंकै आपनो चलै हमारे साथ।।”

लेखक ने शिरीष के फूल को कबीर की भाँति मस्त-मौला एवं मनमौजी प्रवृत्ति का पाया इसी कारण उन्होंने शिरीष की तुलना कबीर से की है और इसे कालजयी एवं अनासक्त अवधूत की संज्ञा प्रदान की।

प्रश्न 3.
कालिदास को अनासक्त योगी क्यों कहा गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कालिदास को अनासक्त योगी इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्हें सम्मान की तनिक भी लालसा नहीं थी। वे सत्ता एवं अधिकार लिप्सा के घोर विरोधी थे। ऐसे व्यक्ति भविष्य में आने वाली पीढ़ी की उपेक्षा को भी सहन कर लेते थे। कालिदास ने अपने शृंगारिक वर्णन में अनासक्त भाव का भली प्रकार विवेचन किया है। वे स्थित प्रज्ञ एवं अनासक्त योगी बनकर कवि सम्राट के आसन पर प्रतिष्ठित हुए। अन्त में कहा जा सकता है जिस प्रकार शिरीष का फूल हर विषम परिस्थिति में फूलता-फलता एवं मुस्कुराता रहता है उसी प्रकार कालिदास भी विषम परिस्थूिति में प्रसन्नतापूर्वक अनासक्त योगी की भाँति अविचल खड़े रहते थे। वास्तव में कालिदास एक सच्चे योगी थे।

प्रश्न 4.
शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। इस वाक्य के सन्दर्भ में अपने भाव लिखिए। (2008, 09)
उत्तर:
शिरीष का फूल एक अवधूत के समान चाहे दुःख की आँधी हो अथवा सुख की चाँदनी हो वह हर परिस्थिति को समान रूप से ग्रहण करता है। दुःख में कभी हताश नहीं होता तथा सुख में कभी इठलाता नहीं है। वह समान रूप से जीवन जीता है। पराजय स्वीकार करना तो वह जानता नहीं है क्योंकि उसकी धारणा है कि “गति ही जीवन है तथा निष्क्रियता घोर मरण है।”

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि शिरीष एक अद्भुत अवधूत की तरह सब कुछ सहन करने के लिए अटल होकर अपने स्थान पर प्रसन्नता से झूमता रहता है। ऋतुओं का क्रम उसको तनिक भी प्रभावित नहीं करता। उसने तो हर परिस्थिति में अवधूत की भाँति मस्त रहना सीखा है। जिस प्रकार अवधूत को सांसारिक भोगों की लिप्सा नहीं रहती है उसी प्रकार शिरीष को भी सर्दी, गर्मी, धूप, छाया की परवाह नहीं रहती है। “प्रसन्नता ही जीवन है”, यही उसके जीवन का मूलमन्त्र है।

प्रश्न 5.
शिरीष जीवन में किस गुण का प्रचार करता है? (2013)
उत्तर:
शिरीष जीवन में इस गुण का प्रचार करता है कि दुनिया के मानव दुःख आने पर क्यों आहें भरता है तथा सुख आने पर गर्व से झूम उठता है। सुख एवं दुःख तो क्रम से आते-जाते रहते हैं। जो मनुष्य आज दुःख की चट्टान के तले दबकर सिसकियाँ ले रहा है कल उसी के कंठ से सुख के स्वर ध्वनित होंगे। इस प्रकार से शिरीष का फूल जीवन में हमें निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सत्ता के मोह और अधिकार के प्रति हम लिप्त न रहें। यह उसका एकमात्र सन्देश है।

जो मानव निरन्तर सत्ता के प्रति लोलुप रहता है, उसका पराभव निश्चित है। धैर्य, साहस एवं तटस्थता जीवन के अपेक्षित गुण हैं जो व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर आरूढ़ करते हैं। शिरीष इन्हीं गुणों का परिचायक है।

MP Board Solutions

शिरीष के फूल भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों और लोकोक्तियों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
डटे रहना, आँख बचाना, हार न मानना, आँच न आना, न ऊधो का लेना न माधो का देना।
उत्तर:
प्रयोग : (1) डटे रहना – हमें हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य पालन के प्रति डटे रहना चाहिए।
(2) आँख बचाना – नौकरानी ने आँख बचाकर मालिक के सारे आभूषण गायब कर दिये।
(3) हार न मानना – उत्साही पुरुष कैसी भी विषम परिस्थिति हो कभी हार नहीं मानते।
(4) आँच न आना – सज्जन ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिससे उनके चरित्र पर कोई आँच आये।
(5) न ऊधो का लेना न माधो का देना – इस षड्यन्त्र में मधु का कोई हाथ नहीं है उसका तो एकमात्र उद्देश्य है न ऊधो का लेना न माधो का देना।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए-
(अ) अशुद्ध – महक उठता है शिरीष का फूल बसन्त के आगमन के साथ।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष का फूल बसन्त के आगमन के साथ महक उठता है।

(आ) अशुद्ध – हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं शिरीष के पुष्प मेरे मानस में।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष के पुष्प मेरे मानस में हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं।

(इ) अशुद्ध – छायादार हैं होते बड़े वृक्ष शिरीष के।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष के वृक्ष बड़े छायादार होते हैं।

(ई) अशुद्ध – शिरीष का फूल साहित्य में कोमल मानी जाती है।
उत्तर:
शुद्ध – शिरीष का फूल साहित्य में कोमल माना जाता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित गद्यांश में यथास्थान विरामचिह्नों का प्रयोग कीजिए-
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं तुलसीदास ने अफसोस के साथ इसकी गहराई पर मुहर लगाई थी धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना।
उत्तर:
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रमाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफसोस के साथ इसकी गहराई पर मुहर लगाई थी, “धरा को प्रमान यही तुलसी, जो फरा सो झरा जो बरा सो बताना।”

शिरीष के फूल पाठ का सारांश

शिरीष का फूल, साहित्य मनीषी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक सफल एवं उच्च कोटि का प्रेरणादायक निबन्ध है। विद्वान लेखक ने शिरीष के फूल का विभिन्न रूपों में वर्णन किया है, वह प्रशंसनीय है। शिरीष एक ऐसा फूल है जिसने कालरूपी समय पर विजय प्राप्त कर ली है। वह हर ऋतु में झूमता एवं लहराता रहता है। वह जीवन की अजेय शक्ति का प्रतीक है।

अद्भुत अवधूत की भाँति दुःख एवं सुख को समान रूप से स्वीकार करता है। कबीर तथा आधुनिक काल के सुमित्रानन्दन पन्त एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर भी अनासक्ति भाव से जीवन जीते थे। महात्मा गाँधी भी मार-काट, लूटपाट, रक्त प्रवाह आदि परिस्थितियों में अडिग रहकर धैर्य एवं साहस का परिचय देते थे। अतः उनको भी अवधूत की संज्ञा से विभूषित किया गया है।

MP Board Solutions

शिरीष के फूल कठिन शब्दार्थ

शिरीष = अति कोमल फूलों वाला एक वृक्ष। धरित्री = धरती। निर्धूम = धुआँ रहित। पलाश = एक प्रकार का लाल रंग का पुष्प। लहक उठता = झूमता। निर्धात अवधूत = सुखदुःख को समान समझने वाला संन्यासी, योगी। कालजयी = जिसने काल पर विजय प्राप्त कर ली हो। मानस = हृदय। हिल्लोल = प्रसन्नता, लहर। अशोक, अरिष्ठ, पुन्नाग और शिरीष = वृक्षों के नाम। मसृण = चिकनी, हरियाली, हरीतिमा। परिवेक्षिष्ठत = घिरी हुई। तुन्दिल = तोंद वाले। पक्षपात = किसी का पक्ष लेना। अधिकार-लिप्सा = अधिकार की लालसा। जीर्ण = पुराने। दुर्बल = कमजोर। परवर्ती = बाद के। ऊर्ध्वमुखी = ऊपर की ओर मुख वाला। ततुंजाल = रेशों का जाल। अनाविल = स्वच्छ, साफ। अनासक्त= आसक्ति रहित। विस्मयविमूढ़ = आश्चर्यचकित। कृषीवल = गन्ने में लगने वाला कीट। कार्पण्य = कंजूस, लोभी। मृणाल = सफेद कमल की डंडी। ईक्षु दण्ड = गन्ना। गन्तव्य = पहुँचने का स्थान। अभ्रभेदी = आकाश को भेदने वाला।

शिरीष के फूल संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. बसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पत्र से मर्मरित होती रहती है। शिरीष के पुराने फूल बुरी तरह लड़खड़ाते रहते हैं। मुझे उनको देखकर उन नेताओं की याद आती है, जो किसी प्रकार जमाने का साथ नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते, तब तक जमे रहते हैं। (2013)

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘शिरीष के फूल’ से उद्धृत है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यावतरण में लेखक ने शिरीष के पुराने फूलों के माध्यम से जमे रहने वाले वृद्ध खुर्रार नेताओं पर कटाक्ष किया गया है।

व्याख्या :
ऋतुराज बसंत के आते ही सारा वन प्रदेश फूल और पत्तों से भर उठता है। पत्तों और फूलों की रगड़ से सरसराहट का स्वर निकलता रहता है, परन्तु शिरीष के पुराने फूल अब तक पेड़ों पर लगे रहते हैं और सूख जाने के कारण परस्पर टकराकर खड़खड़ाहट करते रहते हैं। लेखक को इन फूलों को देखकर उन नेताओं का स्मरण हो उठता है, जो किसी भी तरह समय के परिवर्तन को पहचानने को तैयार नहीं होते हैं। वे राजनीति में जमे ही रहना चाहते हैं। जब नवीन पीढ़ी के नेता उन्हें धकियाकर बाहर कर देते हैं तब बेइज्जत होकर राजनीति से बाहर होते हैं।

विशेष :

  1. शिरीष के पुराने फूलों के टिके रहने के आधार बनाकर राजनीति में जमे बेशर्म नेताओं पर तीखा प्रहार हुआ है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
  3. विवेचनात्मक शैली अपनाई गई है।

2. मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अति परिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने दुःख के साथ इसकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी,”धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा-सो बताना।” मैं शिरीष के फूलों को देखकर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा, कि झड़ना निश्चित है। सुनता कौन है? महाकाल देवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं। जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। (2011)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने वृद्धावस्था एवं मृत्यु को प्रामाणिक सत्य ठहराकर, इस सत्य की तुलना शिरीष के फूल से की है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि वृद्धावस्था एवं मृत्यु दोनों ही अटल सत्य हैं। इसे कोई भी कदापि असत्य नहीं ठहरा सकता। इतने पर भी मानव अधिकारों के प्रति, प्रतिक्षण लालायित रहता है। उसकी यह आकांक्षा रहती है कि वह अधिक से अधिक अधिकार सम्पन्न बने।

महाकवि तुलसीदास ने इस बात पर वेदना व्यक्त की है और इसकी सत्यता को इस कथन से उजागर किया है-जो फलता-फूलता है वह कुम्हलाकर झड़ भी जाता है। लेखक शिरीष के फूल को देखकर इस बात को स्पष्ट कर रहा है कि पल्लवित एवं पुष्पित होने वाला वृक्ष भी अवश्य ही झड़ता है। काल रूपी देवता निरन्तर बेधड़क कोड़े चला रहा है अर्थात् प्राणी निरन्तर काल-कवलित हो रहे हैं। लेकिन मनुष्य इस तथ्य को नहीं स्वीकार कर रहा है। जो समय के थपेड़े से जीर्ण-शीर्ण एवं दुर्बल हो चुके हैं, वे धराशायी हो रहे हैं। परन्तु जिनके प्राणों में ऊर्जा शक्ति विद्यमान है वे ही उन्नत रहने में सक्षम हैं।

विशेष :

  1. जीवन और मृत्यु दोनों ही प्रामाणिक सत्य हैं।
  2. भाषा अलंकारिक, परिमार्जित एवं प्रसंगानुकूल है।

MP Board Solutions

3. शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी अग्नि जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती है। इस चिलकती धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है? क्या ये बाह्य परिवर्तन-धूप, आँधी, लू अपने आप में सत्य नहीं हैं? हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूटपाट, खून-खच्चर का बवंडर बह गया है उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है । अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों? मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों सम्भव हुआ है? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है और अपने देश का वह बूढ़ा अवधूत था।
(2008)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने शिरीष के वृक्ष को अवधूत की भाँति स्वीकार किया है। इसके अतिरिक्त मानव को उस वृक्ष से प्रेरणा ग्रहण करने का संदेश दिया है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि शिरीष का वृक्ष एक योगी की तरह से हमारे मन-मानस में ऐसी साहस की अग्नि जगा देता है जो हमें सदैव जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। चिलचिलाती, धूप, आँधी एवं लू में भी वह सदैव झूमता एवं लहराता रहता है। ये प्रकृति के विभिन्न उपादान जो कि मानव को व्यथित एवं भयभीत करते रहते हैं, लेकिन शिरीष के फूल पर इन बाह्य परिवर्तनों का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता है। हमारे देश में हिंसा, मार-काट, लूट-पाट एवं रक्त-पात का ज्वार सर्वत्र व्याप्त है। परन्तु इस भयावह वातावरण में भारत देश का एक बूढ़ा राष्ट्र नायक शिरीष के फूल की भाँति जीवन में हमें स्थिर रहने का संदेश दे रहा है। गाँधी एवं शिरीष दोनों ही अवधूत की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

विशेष :

  1. गाँधी की तुलना शिरीष के फूल से की है। दोनों ही योगी हैं।
  2. अग्नि जगाना, खून-खच्चर का बवंडर आदि मुहावरों का प्रयोग है।
  3. भाषा-शैली प्रामाणिक एवं विषयानुरूप है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता

MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता

सांतत्य तथा अवकलनीयता Important Questions

सांतत्य तथा अवकलनीयता वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

प्रश्न 1.
यदि x = at2, y = 2at है, तो \(\frac{dy}{dx}\) होगा –
(a) t
(b) t2
(c) \(\frac{1}{t}\)
(d) \(\frac { 1 }{ t^{ 2 } } \)
उत्तर:
(c) \(\frac{1}{t}\)

प्रश्न 2.
यदि y = 2 \(\sqrt { cot(x^{ 2 }) } \) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) होगा –
(a) \(\frac { -2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
(b) \(\frac { 2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
(c) \(\frac { 2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
(d) \(\frac { 2\sqrt { x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)
उत्तर:
(a) \(\frac { -2\sqrt { 2x } }{ sinx^{ 2 }\sqrt { sin2x^{ 2 } } } \)

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
\(\frac{dy}{dx}\) (x3 + sinx2) का मान है –
(a) 3x2 + cos x2
(b) 3x2 + x sin2
(c) 3x2 + 2x cos x2
(d) 3x2 + x cos x2
उत्तर:
(c) 3x2 + 2x cos x2

प्रश्न 4.
\(\frac{d}{dx}\) ax का मान है –
(a) ax
(b) axlogae
(c) axlogea
(d) \(\frac { a^{ x } }{ log_{ e }a } \)
उत्तर:
(c) axlogea

प्रश्न 5.
यदि y = 500e7x + 6000e-7x हो, तो, \(\frac { d^{ 2 }y }{ dx^{ 2 } } \) का मान होगा –
(a) 45 y
(b) 47 y
(c) 49 y
(d) 50 y
(d) 50y.
उत्तर:
(c) 49 y

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
(a) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. cosx0 का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ………………….. है।
  2. eloge aका x के सापेक्ष अवकल गुणांक ………………………..
  3. loge a का a के सापेक्ष अवकल गुणांक ……………………….
  4. ax का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ……………………………… है।
  5. sin 3x का 3x के सापेक्ष अवकल गुणांक …………………………… है।
  6. यदि y = sin-1(2x\(\sqrt { 1-x^{ 2 } } \) ) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ……………………… होगा।
  7. sin x का cos.x के सापेक्ष अवकल गुणांक ………………… है।
  8. \(\frac{d}{dx}\) (log tan x) का मान ………………………… है।
  9. log(log sin x) का अवकलन गुणांक ……………………………….. होगा।

उत्तर:

  1. – \(\frac { \pi }{ 180 } \) sin x0
  2. 0
  3. 0
  4. logea.ax
  5. cos x
  6. \(\frac { 2 }{ \sqrt { 1-x^{ 2 } } } \)
  7. – cot x
  8. cosec 2x
  9. \(\frac { cotx }{ logsinx } \)

प्रश्न 2.
(b) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. यदि x = \(\sqrt { 1-y^{ 2 } } \) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ………………………. होगा।
  2. sin x का n वाँ अवकलज ………………………………. होगा।
  3. यदि y = \(\sqrt { x+\sqrt { x+………..\infty } } \) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ………………………. होगा।
  4. यदि x = r cos θ, y = r sin θ हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = ………………………. होगा।
  5. ex का \(\sqrt{x}\) के सापेक्ष अवकलज ………………………………. होगा।

उत्तर:

  1. \(\frac { \sqrt { 1-y^{ 2 } } }{ 1-2y^{ 2 } } \)
  2. sin ( \(\frac { n\pi }{ 2 } \) + x )
  3. \(\frac { 1 }{ 2y-1 } \)
  4. -cot θ
  5. 2\(\sqrt{x}\) ex

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
निम्न कथनों में सत्य/असत्य बताइए –

  1. eloge x का अवकल गुणांक \(\frac{1}{x}\) है।
  2. यदि f (x) = \(\sqrt{x}\); x > 0 तो f'(2) का मान \(\frac { 1 }{ 2\sqrt { 2 } } \) है।
  3. कोई फलन f (x) किसी बिन्दु x = a पर अवकलनीय कहलाता है, जब Lf'(a) # Rf (a).
  4. sec-1a का x के सापेक्ष अवकल गुणांक 0 होता है।
  5. यदि y = aemx + Be-mx, तो = -m2y है।
  6. यदि y = sin-1 ( \(\frac { x-1 }{ x+1 } \) ) + cos-1 ( \(\frac { x-1 }{ x+1 } \) ) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) = 0 होगा।
  7. प्रत्येक अवकलनीय फलन सतत् होता है।
  8. a2x का अवकल गुणांक a2xlog a.

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. असत्य
  6. सत्य
  7. सत्य
  8. असत्य।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
सही जोड़ी बनाइये –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 1
उत्तर:

  1. (d)
  2. (e)
  3. (a)
  4. (f)
  5. (h)
  6. (g)
  7. (c)
  8. (b)

प्रश्न 5.
एक शब्द/वाक्य में उत्तर दीजिए –

  1. \(\frac { 6^{ x } }{ x^{ 6 } } \) का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  2. y = eloge tanx का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  3. ax का n वाँ अवकलज ज्ञात कीजिए।
  4. y = sin(ax + b) हो, तो \(\frac{dy}{dx}\) का मान ज्ञात कीजिए।
  5. यदि x2 + y2 = sin xy, तो \(\frac{dy}{dx}\) का मान ज्ञात कीजिए।
  6. x के सापेक्ष log tan\(\frac{x}{2}\) का अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  7. sin-1 \(\frac { 2x }{ 1+x^{ 2 } } \) का x के सापेक्ष अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।
  8. e -logex का अवकल गुणांक ज्ञात कीजिए।

उत्तर:

  1. \(\frac { 6^{ x } }{ x^{ 6 } } \) [ [log 6 – \(\frac{6}{x}\) ]
  2. sec2 x
  3. ax(log a)n
  4. -a2 y
  5. \(\frac { ycosxy-2x }{ 2y-xcosxy } \)
  6. cosec x
  7. \(\frac { 2 }{ 1+x^{ 2 } } \)
  8. \(\frac { -1 }{ x^{ 2 } } \)

सांतत्य तथा अवकलनीयता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फलन के सभी असांतत्य के बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए, जबकि निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 2
हल:
x < 2 के लिए f (x) = 2x + 3 बहुपदी फलन है।
अत: x < 2 के लिए f (x) संतत फलन है। x > 2 के लिए f (x) = 2x – 3 बहुपदी फलन है।
अतः x > 2 के लिए f (x) संतत है।
अब हम केवल x = 2 पर f (x) की संततता का परीक्षण करेंगे।
x = 2 + h रखने पर
जब x → 2 तब h → 0
\(\underset { x\rightarrow 2^{ + } }{ lim } \) f(x) = \(\underset { h\rightarrow 0 }{ lim } \) 2(2 + h) – 3
= 2(2 + 0) – 3 = 4 – 3 = 1
x = 2 – h रखने पर
जब x → 2 तब h → 0
\(\underset { x\rightarrow 2^{ – } }{ lim } \) f(x) = \(\underset { h\rightarrow 0 }{ lim } \) 2(2 – h) + 3
= 2(2 – 0) + 3 = 7
f(2) = 2(2) + 3 = 7
\(\underset { x\rightarrow 2^{ – } }{ lim } \) f(x) = f(2) ≠ \(\underset { x\rightarrow 2^{ + } }{ lim } \) f(x)

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
फलन के सभी असातत्य बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए, जबकि f निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 3
हल:
x ≠ 0 के लिए f (x) = \(\frac { |x| }{ x } \) संतत फलन है।
अत:
हम केवल x = 0 पर f (x) की संततता का परीक्षण करेंगे।
x = 0 + h रखने पर
जब x → 0 तब h → 0.
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 4
x = 0 – h रखने पर
जब x → 0 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 5
दिया है:
f (0) = 0
\(\underset { x\rightarrow 0^{ + } }{ lim } \) f (x) ≠ \(\underset { x\rightarrow 0^{ – } }{ lim } \) f (x) ≠ f (0)
अत: दिया गया फलन f(x), x = 0 पर असंतत है।

प्रश्न 3.
बिन्दु x = 0 पर निम्नलिखित फलन f (x) के सातत्य की जाँच कीजिए –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 6
हल:
f (x) = \(\frac { 1-cosx }{ x^{ 2 } } \), जब x ≠ 0
x = 0 + h रखने पर, x → 0 तो h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 7

MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 7a
पुनः x = 0 – h रखने पर, x → 0 तो h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 8
दिया है कि f (x) = \(\frac{1}{2}\) जब x = 0
या f (0) = \(\frac{1}{2}\)
इस प्रकार,
\(\underset { x\rightarrow 0^{ + } }{ lim } \) f(x) = \(\underset { x\rightarrow 0^{ + } }{ lim } \) f(x) = f(0)
अत: x = 0 पर f (x) संतत है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
फलन f निम्न प्रकार से परिभाषित है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 9
दर्शाइये कि बिन्दु x = 4 के अतिरिक्त प्रत्येक बिन्दु पर संतत है।
हल:
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 10
स्पष्ट है कि x = 4 के लिये फलन f (x) संतत नहीं है क्योंकि
\(\underset { x\rightarrow 4^{ – } }{ lim } \) f (x) ≠ \(\underset { x\rightarrow 4^{ + } }{ lim } \) तथा f (4) = 0
जब x < 4 तब f (x) = – 1 जो कि एक अचर फलन है। अत: यह संतत फलन है। जब x > 4 तब f (x) = 1 जो कि एक अचर फलन है। अत: यह संतत फलन है।
अतः f (x) बिन्दु x = 4 के अतिरिक्त सभी बिन्दुओं पर संतत है। यही सिद्ध करना था।

प्रश्न 5.
k का मान ज्ञात कीजिए यदि फलन –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 11
बिन्दु x = \(\frac { \pi }{ 2 } \) + h रखने पर, जब x → \(\frac { \pi }{ 2 } \), तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 12
x = \(\frac { \pi }{ 2 } \) + h रखने पर, जब x → \(\frac { \pi }{ 2 } \) तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 13
x = \(\frac { \pi }{ 2 } \) – h रखने पर, जब x → \(\frac { \pi }{ 2 } \) तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 14
दिया है
f ( \(\frac { \pi }{ 2 } \) ) = 3
तथा दिया गया फलन संतत है।
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 15
⇒ \(\frac{k}{2}\) = \(\frac{k}{2}\) = 3
⇒ k = 6

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
k का मान ज्ञात कीजिए यदि फलन –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 16
बिन्दु x = 2 पर संतत है।
हल: x = π + h रखने पर,
जब x → 7 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 17
x = π – h रखने पर
जब x → π तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 18
दिया गया फलन x = π पर संतत है।
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 19

प्रश्न 7.
निम्न फलन बिन्दु x = 0 पर संतत है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 20
k का मान ज्ञात कीजिये।
हल:
दिया है
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 21
दिया है –
f (0) = \(\frac{1}{2}\)
चूँकि फलन f (x) बिन्दु x = 0 पर संतत है –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 21
⇒ \(\frac { k^{ 2 } }{ 2 } \) = \(\frac { k^{ 2 } }{ 2 } \) = \(\frac{1}{2}\)
⇒ k2 = 1 या k = ± 1

MP Board Solutions

प्रश्न 8.
a और b के बीच संबंध स्थापित कीजिए जिनके लिए –
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 23
हल:
दिया है:
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 24
x = 3 + h रखने पर,
जब x → 3 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 24
x = 3 – h रखने पर,
जब x → 3 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 27
= a ( 3 – 0) + 1
= 3a + 1
f (3) = 3a + 1
∵ दिया गया पालन x = 3 पर संतत है।
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 26
⇒ 3a + 1 = 3b + 3
⇒ 3a = 3b + 2
⇒ a = b + \(\frac{2}{3}\)

MP Board Solutions

प्रश्न 9.
सिद्ध कीजिए कि फलन f (x) = |x – 1|, x ∈ R, x = 1 पर अवकलनीय नहीं है। (NCERT)
हल:
दिया है:
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 28
x = 1 – h रखने पर, जब x → 1 तब h → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 29
x = 1 + h रखने पर, जब x → 1 तब → 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 30
अतः दिया गया फलन x = 1 पर अवकलनीय नहीं है।

प्रश्न 10.
दर्शाइए कि फलन
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 31
पर अवकलनीय नहीं है।
हल:
हम जानते हैं,
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 32
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 33

प्रश्न 11.
सिद्ध कीजिए कि फलन
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 34
यही सिद्ध करना था।
x = 0 पर संतत है तथा अवकलनीय भी।
हल: यहाँ f (0) = 0
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 35
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 35a
चूँकि f (0 + 0) = f (0 – 0) = f (0), अतएव x = 0 पर दिया हुआ फलन संतत है।
अब
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 36
MP Board Class 12th Maths Important Questions Chapter 5A सांतत्य तथा अवकलनीयता img 36a
स्पष्टतः Rf’ (0) = Lf’ (0)
अतः x = 0 पर दिया हुआ फलन अवकलनीय है।
अतः दिया हुआ फलन x = 0 पर संतत है तथा अवकलनीय भी है। यही सिद्ध करना था।

MP Board Class 12 Maths Important Questions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 1 उत्साह

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions गद्य Chapter 1 उत्साह

उत्साह अभ्यास

उत्साह अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्साह के बीच किनका संचरण होता है?
उत्तर:
उत्साह के बीच धृति (धैर्य) और साहस का संचरण होता है।

प्रश्न 2.
लेखक ने वीरों के कितने प्रकार बताये हैं?
उत्तर:
लेखक ने वीरों के चार प्रकार बताये हैं-

  1. कर्मवीर
  2. युद्धवीर
  3. दानवीर, और
  4. दयावीर।

प्रश्न 3.
प्रयत्न किसे कहते हैं?
उत्तर:
बुद्धि द्वारा पूर्ण रूप से निश्चित की हुई व्यापार-परम्परा का नाम प्रयत्न है।

MP Board Solutions

उत्साह लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्येक कर्म में किस तत्त्व का योग अवश्य होता है?
उत्तर:
प्रत्येक कर्म में थोड़ा या बहुत बुद्धि का तत्त्व अवश्य होता है। कुछ कर्मों में बुद्धि और शरीर की तत्परता साथ-साथ चलती है। उत्साह की उमंग जिस प्रकार हाथ-पैर चलवाती है उसी प्रकार बुद्धि से भी कार्य करवाती है।

प्रश्न 2.
फलासक्ति का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
फलासक्ति से कर्म के लाघव की वासना उत्पन्न होती है। चित्त में यह आता है कि कर्म बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत-सा मिल जाए। इससे मनुष्य कर्म करने के आनन्द की उपलब्धि से भी वंचित रहता है।

प्रश्न 3.
कौन-सी भावना उत्साह उत्पन्न करती है? उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:
कर्म भावना उत्साह उत्पन्न करती है। किसी वस्तु या व्यक्ति के साथ उत्साह का सीधा लगाव नहीं होता। उदाहरणार्थ, समुद्र लाँघने के लिए उत्साह के साथ हनुमान उठे हैं उसका कारण समुद्र नहीं-समुद्र लाँघने का विकट कर्म है। अतः कर्मभावना ही उत्साह की जननी है।

उत्साह दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भय और उत्साह में क्या अन्तर है? (2009, 11)
उत्तर:
भय का स्थान दुःख वर्ग में आता है और उत्साह का आनन्द वर्ग में अर्थात् यदि किसी कठिन कार्य को हमें भयवश करना होता है तो उससे हमें कष्ट और दुःख का अनुभव होता है क्योंकि उस कार्य को करने में हमारी प्रवृत्ति नहीं होती। मन में उत्साह नहीं होता। हमारा मन चाहता है कि उक्त कार्य हमें न करना पड़े तो अच्छा रहे किन्तु उत्साह में मन के अन्दर सुख, उमंग, साहस और प्रेरणा का समावेश होता है। इसमें हम आने वाली कठिन परिस्थिति के भीतर भी साहस का अवसर ढूँढ़ते हैं और निश्चय करने से मन में प्रस्तुत कार्य को करने के सुख की उमंग का अनुभव करते हैं। अतः हम आनन्दित होकर उस कार्य को करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार भय में दुःख और उत्साह में आनन्द की सृष्टि होती है।

प्रश्न 2.
किसी कर्म के अच्छे या बुरे होने का निश्चय किस आधार पर होता है? उत्साह के सन्दर्भ में सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (2008)
उत्तर:
किसी कार्य के अच्छे या बुरे होने का निश्चय अधिकतर उसकी प्रवृत्ति के शुभ या अशुभ परिणाम के विचार से होता है। वही उत्साह जो कर्त्तव्य कर्मों के प्रति इतना सुन्दर दिखाई पड़ता है, अकर्त्तव्य कर्मों के प्रति होने पर वैसा प्रशंसनीय नहीं प्रतीत होता। आत्म-रक्षा, पर-रक्षा, देश-रक्षा आदि के निमित्त साहस की जो उमंग देखी जाती है और उसमें जो सौन्दर्य निहित है वह पर-पीड़ा, डकैती आदि जैसे साहसिक कार्यों में कभी दिखाई नहीं देता अर्थात् उत्साह में साहस और सौन्दर्य दोनों निहित हैं। अच्छे कर्मों को करने में दोनों होते हैं और उनकी प्रशंसा की जाती है। बुरे कर्मों को करने वाले उत्साह में केवल साहस होता है, सौन्दर्य नहीं होता। अत: ऐसा उत्साह प्रशंसनीय नहीं कहा जाता है।

प्रश्न 3.
उत्साह का अन्य कर्मों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
उत्साह में मनुष्य आनन्दित होता है और उस आनन्द के कारण उसके मन में एक ऐसी स्फूर्ति उत्पन्न होती है जो एक के साथ उसे अनेक कार्यों के लिए अग्रसर करती है। यदि मनुष्य को उत्साह से किए किसी एक कार्य में बहुत-सा लाभ हो जाता है या उसकी कोई बहुत बड़ी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो अन्य जो कार्य उसके सामने आते हैं उन्हें भी वह बड़े हर्ष और तत्परता के साथ करता है। उसके इस हर्ष और तत्परता में कारण उत्साह ही होता है। इसी प्रकार किसी उत्तम फल या सुख प्राप्ति की आशा या निश्चय से उत्पन्न आनन्द, फलोन्मुखी प्रयत्नों के अतिरिक्त अन्य दूसरे कार्यों के साथ संलग्न होकर उत्साह के रूप में दिखाई देता है। यदि हम किसी ऐसे उद्योग में संलग्न हैं जिससे भविष्य में हमें बहुत लाभ या सुख प्राप्त होने की आशा है तो उस उद्योग को हम बहुत उत्साह से करते हैं। इस प्रकार उत्साह का अन्य कर्मों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 4.
इन गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(अ) आसक्ति प्रस्तुत ………. का नाम उत्साह है।
(ब) धर्म और उदारता ………. सच्चा सुख है।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में आचार्य जी ने बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि कर्मफल में। तभी उसे अपने कार्य में आनन्द की उपलब्धि हो सकती है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि मनुष्य को लगाव अथवा आसक्ति अपने संकल्पित कर्म में होनी चाहिए क्योंकि हमारे सामने तो वह कर्म ही प्रस्तुत होता है जिसे हमें करना होता है अथवा वह वस्तु जिसे पाने का लक्ष्य हो, उसमें आसक्ति का होना उचित है क्योंकि तब हम कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित होंगे। इसका कारण है कि कर्म अथवा वह वस्तु तो हमारे सम्मुख उपस्थित है जिसे हमें करना है अथवा पाना है किन्तु उसका फल तो दूर रहता है फिर हम फल में आसक्ति क्यों करे।

फल में आसक्ति करने से कर्म करने का आनन्द जाता रहता है और हम कर्म करने से विरत हो जाते हैं। अतः हमें अपने कर्म का लक्ष्य ही ध्यान में रखना चाहिए। कर्म का लक्ष्य ध्यान रखने पर हमें कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। उससे एक प्रकार की उत्तेजना अथवा उमंग हमारे मन में भी भर जाती है। इससे हमें कार्य करते समय निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती रहती है। कर्म करने की उत्तेजना और आनन्द की अनुभूति इसी को उत्साह मनोभाव के नाम से जाना जाता है।

(ब) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्य खण्ड में लेखक ने बताया है कि जब मनुष्य उच्च और लोकोपकारी कर्म करता है तो उसे कर्म करते हुए ही फल की प्राप्ति के आनन्द की अनुभूति होने लगती है। इससे उसका मन एक दिव्य प्रकार के आनन्द से भर जाता है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि धर्म और उदार दृष्टिकोण से युक्त होकर जो कार्य किए जाते हैं उन कार्यों का आदर्श ऊँचा होता है। इनमें स्वतः ही एक ऐसा अलौकिक आनन्द भरा हुआ होता है कि जब कर्ता इन्हें करने में अग्रसर होता है तो उसे ऐसे आनन्द की प्रतीति होती है जैसे कि उसे उनका फल प्राप्त हो गया हो अर्थात् पर-कल्याण की भावना से युक्त होकर किए जाने वाले कार्य ही कर्ता को फल प्राप्ति जैसे आनन्द की अनुभूति करा देते हैं। ऐसा व्यक्ति अत्याचार और अनाचार को नष्ट करने में अपना पुरुषार्थ मानता है। संसार से कलह और संघर्ष को समाप्त करने में वह कर्त्तव्यनिष्ठ होता है। उसका चित्त एक अलौकिक उल्लास और आनन्द से भर जाता है। उसके मन में अच्छे कार्य करने का परम सन्तोष होता है। ऐसे व्यक्ति को ही कर्मवीर कहा जाता है। ऐसा कर्मवीर मनुष्य अपने कर्मों द्वारा संसार का उपकार करता है। इससे उसे भी परम सुख की प्राप्ति होती है।

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
(अ) साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है।
(ब) कर्म में आनन्द उत्पन्न करने वालों का नाम ही कर्मण्य है। उपर्युक्त वाक्यों का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(अ) साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है-जब हमारे मन में किसी कार्य को करने का उत्साह होता है तो उस उत्साह में आनन्द की उमंग छिपी होती है अर्थात् उत्साह की अवस्था में कठिन स्थिति आने पर उसका सामना हम साहस से करते हैं। उस साहस में कर्म करने का सुख निहित रहता है। यही आनन्द की उमंग होती है, जिससे संकल्पित कार्य को हम पूर्ण तत्परता और मनोयोग से करते हैं। तब हमें कठिन परिस्थिति भी कठिन नहीं प्रतीत होती। इसी को उत्साह कहा जाता है।

(ब) कर्म में आनन्द उत्पन्न करने वालों का नाम ही कर्मण्य है-कर्म करने वाला अथवा कर्मण्य उसी को कहा जाता है जो प्रत्येक कर्म को आनन्दपूर्ण होकर सम्पादित करता है। आनन्दपूर्ण स्थिति उत्साह से प्राप्त होती है। उत्साह में आनन्द और कर्म करने की तत्परता दोनों का समावेश होता है। जो कार्य बिना उत्साह के किए जाते हैं वे एक प्रकार से विवशता अथवा भय ही प्रकट करते हैं। उनका परिणाम प्रायः दुःख ही रहता है। इसीलिए जो कर्म करने के महत्त्व को जानता है, वह कर्म उत्साह से सम्पादित करता है। वह कर्म में एक विशेष प्रकार का आनन्द उत्पन्न कर लेता है। अतः वास्तविक रूप में उसी को कर्मण्य अथवा कार्य करने वाला कहा जाता है।

उत्साह भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी पर्याय लिखिएहाकिम, मिजाज, मुलाकात, अर्दली, सलाम।
उत्तर:
अधिकारी, स्वभाव, मिलन, सेवक, नमस्ते।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिएभय, दु:ख, हानि, शत्रु, उपस्थित।
उत्तर:
निर्भय, सुख, लाभ, मित्र, अनुपस्थित।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग छाँटकर लिखिएविशेष, आघात, उत्कर्ष, अप्राप्ति, विशुद्ध।
उत्तर:
वि, आ, उत्, अ, वि।

प्रश्न 4.
पाठ में आए हुए विभिन्न योजक शब्दों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
आनन्द-वर्ग, साहस-पूर्ण, कर्म-सौन्दर्य, साहित्य-मीमांसकों, दान-वीर, दया-वीर, आनन्द-पूर्ण, हाथ-पैर, पर-पीड़न, प्रसन्न-मुख, आराम-विश्राम, दस-पाँच, इधर-उधर, आते-जाते, साथ-साथ, कर्म-शृंखला, युद्ध-वीर, कर्म-प्रेरक, कर्म-स्वरूप, विजय-विधायक, कीर्ति-लोभ-वश, श्रद्धा-वश, कर्म-भावना, फल-भावना, धन-धान्य, प्रयत्न-कर्म, एक-एक, व्यापार-परम्परा, ला-लाकर, दौड़-धूप, आत्म-ग्लानि, सोच-सोचकर, फल-स्वरूप, कर्म-वीर, थोड़ा-थोड़ा, बहुत-सा, स्थिति-व्याघात, सलाम-साधक।

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध रूप में लिखिए
(अ) आप पुस्तक क्या पढ़ेंगे?
(आ) कितना वीभत्स दृश्य है, ओह ! यह !
(इ) बीमार को शुद्ध भैंस का दूध पिलाइए।
(ई) एक फूलों की माला लाओ।
(उ) छब्बीस जनवरी का भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व है।
(ऊ) यह बहुत सुन्दर चित्र है।
उत्तर:
शुद्ध वाक्य-
(अ) क्या आप पुस्तक पढ़ेंगे?
(आ) ओह ! यह कितना वीभत्स दृश्य है?
(इ) बीमार को भैंस का शुद्ध दूध पिलाइए।
(ई) फूलों की एक माला लाओ।
(उ) भारत के इतिहास में छब्बीस जनवरी का बहुत महत्त्व है।
(ऊ) यह चित्र बहुत सुन्दर है।

उत्साह पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित निबन्ध-ग्रन्थ चिन्तामणि-भाग 1 से संकलित है। प्रस्तुत निबन्ध में आचार्य जी ने ‘उत्साह’ मनोभाव की विश्लेषणात्मक विवेचना करते हुए बताया है कि यह एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को कार्य में प्रवृत्त रखने के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। उत्साह कार्य करने की एक आनन्दमय अवस्था है। इससे कठिन से कठिन कार्य सम्पादित करने में भी मन को थकान नहीं होती अपितु कार्य में एक तरह का आनन्द प्राप्त होता है जो मन को प्रफुल्लित बनाये रखता है। किसी कार्य में सफलता तभी मिल पाती है। जब उस कार्य को करने के लिए हमारे मन में उत्साह हो। साहसपूर्ण आनन्द की उमंग उत्साह है। उत्साह से कार्य करने वाले व्यक्ति ही युद्धवीर, दानवीर और दयावीर कहलाते हैं।

उत्साह कठिन शब्दार्थ 

आनन्द वर्ग = आनन्द का वर्गीकरण। कर्म सौन्दर्य = कार्य की सुन्दरता। उपासक = पुजारी, आराधना करने वाले। श्लाध्य = प्रशंसनीय। उत्कण्ठापूर्ण = जिज्ञासायुक्त। साहित्य-मीमांसक = साहित्य की मीमांसा (विवेचन, विश्लेषण आदि) करने वाले। आघात = चोट। परवा = चिन्ता, फिक्र। चरम उत्कर्ष = पराकाष्ठा। स्फुरित = फड़कना। धीरता = धैर्य, मन की स्थिरता। निश्चेष्ट = चेष्टा या प्रयत्न रहित। धुति = धैर्य। संचरण = संचार। अकर्तव्य कर्मों = न करने योग्य कार्यों। परपीड़न = दूसरे को सताना। विशुद्ध = शुद्ध, पूर्णतया। शौर्य = वीरता का भाव। सुभीते = सुविधा, आराम। विजेतव्य = विजय करने योग्य। आलम्बन = आधार। दुस्साध्य = कठिनता से प्राप्त होने वाला। निर्दिष्ट = निर्देशित। यौगिक= मिला-जुला। उन्मुख = उत्साहयुक्त। अनुष्ठान = सम्पादन करना, संकल्पित कार्य पूर्ण करना। आसक्ति = लगाव। लाघव = लघुता, छोटा करना, कौशल। फलासक्ति = फल की इच्छा। वासना = इच्छा। कर्मण्य = कर्म करने वाला। दिव्य = अलौकिक।शमन = शान्त करना। आत्मग्लानि = मन ही मन पछतावा। फलोन्मुख = फल प्राप्ति का इच्छुक। लोकोपकारी = संसार की भलाई करने वाला (कल्याण करने वाला)। क्रुद्ध = क्रोधित। व्याघात = व्यवधान, बाधा। सलाम साधक = दुआ सलाम करने वाले। हाकिमों = अधिकारियों। अर्दलियों = सेवकों। मिजाज = स्वभाव, आदत।

उत्साह संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. उत्साह में हम आने वाली कठिन स्थिति के भीतर साहस के अवसर के निश्चय द्वारा प्रस्तुत कर्म सुख की उमंग से अवश्य प्रयत्नवान् होते हैं। कष्ट या हानि सहने के साथ-साथ कर्म में प्रवृत्त होने के आनन्द का योग रहता है।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक के निबन्ध ‘उत्साह’ से उद्धृत किया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत अवतरण में शुक्ल जी ने ‘उत्साह’ मनोविकार पर प्रकाश डालते हुए उसकी विशेषताएँ बतलाई हैं।

व्याख्या :
जब हमारे मन के अन्दर उत्साह के भाव का संचार होता है तो हम कठिन से कठिन परिस्थिति की चिन्ता नहीं करते हैं और मन में आनन्द की उमंग के साथ उस कार्य को करने में प्रवृत्त होते हैं। तब हमारे मन में एक नया साहस भरा हुआ होता है। इस साहस और कार्य करने के सुख से कठिनाइयों को सहन करते हुए भी हम अपने संकल्पित कार्य में संलग्न रहते हैं। हमारे मन में इस बात का उत्साह रहता है कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे। कष्ट हो अथवा हानि हो, हम इसकी चिन्ता नहीं करते। अत: यह स्पष्ट है कि उत्साह का भाव हमारे मन में कार्य में संलग्न होने के साथ-साथ एक आनन्दमय अनुभूति भी प्रदान करता है जिससे हम विषम परिस्थिति में भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रहते हैं।

विशेष :

  1. उत्साह मनोभाव का मनोविश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
  2. उत्साह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है, लेखक ने इस बात पर प्रकाश डाला है।
  3. शैली विचारोत्तेजक एवं गवेषणापूर्ण है। भाषा सरल, सुबोध और साहित्यिक हिन्दी है।

MP Board Solutions

2. आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है। इससे आसक्ति उसी में चाहिए, फल दूर रहता है इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनन्द से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनन्द कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है। (2016)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियों में आचार्य जी ने बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि कर्मफल में। तभी उसे अपने कार्य में आनन्द की उपलब्धि हो सकती है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि मनुष्य को लगाव अथवा आसक्ति अपने संकल्पित कर्म में होनी चाहिए क्योंकि हमारे सामने तो वह कर्म ही प्रस्तुत होता है जिसे हमें करना होता है अथवा वह वस्तु जिसे पाने का लक्ष्य हो, उसमें आसक्ति का होना उचित है क्योंकि तब हम कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित होंगे। इसका कारण है कि कर्म अथवा वह वस्तु तो हमारे सम्मुख उपस्थित है जिसे हमें करना है अथवा पाना है किन्तु उसका फल तो दूर रहता है फिर हम फल में आसक्ति क्यों करे।

फल में आसक्ति करने से कर्म करने का आनन्द जाता रहता है और हम कर्म करने से विरत हो जाते हैं। अतः हमें अपने कर्म का लक्ष्य ही ध्यान में रखना चाहिए। कर्म का लक्ष्य ध्यान रखने पर हमें कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। उससे एक प्रकार की उत्तेजना अथवा उमंग हमारे मन में भी भर जाती है। इससे हमें कार्य करते समय निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती रहती है। कर्म करने की उत्तेजना और आनन्द की अनुभूति इसी को उत्साह मनोभाव के नाम से जाना जाता है।

विशेष :

  1. लेखक ने गीता में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए उपदेश ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का प्रतिपादन करते हुए बताया है कि मनुष्य को आसक्ति अपने कर्म में रखनी चाहिए न कि फल में। फल में आसक्ति होने से मनुष्य के मन में लोभ आदि वासनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और कर्म करने का आनन्द समाप्त हो जाता है। तब कर्म में उसकी प्रवृत्ति न होने से उसके जीवन में उत्साह नहीं रहता।
  2. शैली विचारोत्तेजक, गवेषणात्मक है।
  3. भाषा सरल, सहज और बोधगम्य है।

3. कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनन्द भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फलस्वरूप लगते हैं। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है वही लोकोपकारी कर्मवीर का सच्चा सुख है। (2008, 09, 14)

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत गद्य खण्ड में लेखक ने बताया है कि जब मनुष्य उच्च और लोकोपकारी कर्म करता है तो उसे कर्म करते हुए ही फल की प्राप्ति के आनन्द की अनुभूति होने लगती है। इससे उसका मन एक दिव्य प्रकार के आनन्द से भर जाता है।

व्याख्या :
लेखक का कथन है कि धर्म और उदार दृष्टिकोण से युक्त होकर जो कार्य किए जाते हैं उन कार्यों का आदर्श ऊँचा होता है। इनमें स्वतः ही एक ऐसा अलौकिक आनन्द भरा हुआ होता है कि जब कर्ता इन्हें करने में अग्रसर होता है तो उसे ऐसे आनन्द की प्रतीति होती है जैसे कि उसे उनका फल प्राप्त हो गया हो अर्थात् पर-कल्याण की भावना से युक्त होकर किए जाने वाले कार्य ही कर्ता को फल प्राप्ति जैसे आनन्द की अनुभूति करा देते हैं। ऐसा व्यक्ति अत्याचार और अनाचार को नष्ट करने में अपना पुरुषार्थ मानता है। संसार से कलह और संघर्ष को समाप्त करने में वह कर्त्तव्यनिष्ठ होता है। उसका चित्त एक अलौकिक उल्लास और आनन्द से भर जाता है। उसके मन में अच्छे कार्य करने का परम सन्तोष होता है। ऐसे व्यक्ति को ही कर्मवीर कहा जाता है। ऐसा कर्मवीर मनुष्य अपने कर्मों द्वारा संसार का उपकार करता है। इससे उसे भी परम सुख की प्राप्ति होती है।

विशेष :

  1. लेखक के अनुसार जो मनुष्य संसार के हित को ध्यान में रखते हुए उदार दृष्टिकोण से कार्य करता है वही कर्मवीर होता है और वही कर्म करने में सच्चे आनन्द की उपलब्धि पाता है।
  2. शैली विचारपरक और मनोविश्लेषणात्मक है।
  3. भाषा सरल, सहज और बोधगम्य, साहित्यिक हिन्दी है।

MP Board Solutions

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अभ्यास

सामाजिक समरसता अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा किस ज्ञान को उपयोगी माना है?
उत्तर:
कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष ज्ञान को उपयोगी माना है।

प्रश्न 2.
राधा दुःखी माता यशोदा को क्या कहकर सांत्वना देती थीं?
उत्तर:
‘श्रीकृष्ण ब्रज को कैसे छोड़ सकते हैं वे अवश्य लौटकर आयेंगे’ यह कहकर राधा यशोदा को सांत्वना देती थीं।

प्रश्न 3.
राधा अपने विरह जनित दुःख को छिपाने के लिए किस प्रकार का बहाना बनाती थीं?
उत्तर:
‘मैं रो नहीं रही हूँ, मेरी आँखों में अति हर्ष का पानी छलक आया है।’ यह बहाना बनाकर राधा अपने दुख को छिपाती थीं।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के व्यथित होने का क्या कारण था? (201 15, 16)
उत्तर:
श्रीकृष्ण का ब्रज छोड़कर मथुरा चले जाना ब्रजवासियों के व्यथित होने का कारण था।

प्रश्न 5.
कबीर का मन फकीरी में क्यों सुख पाता है?
उत्तर:
नाशवान जगत से परे रहकर राम नाम के भजन का आनन्द मिलने के कारण कबीर को फकीरी में सुख प्राप्त होता है।

MP Board Solutions

सामाजिक समरसता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ने संसार को पागल क्यों कहा है? भाव स्पष्ट कीजिए। (2017)
अथवा
‘साधो देखो जग बौराना’ पद के माध्यम से कबीर क्या कहना चाहते हैं? (2008)
उत्तर:
कबीर कहते हैं कि संसार पागल हो गया है। उससे सत्य बात कही जाय तो वह मारने दौड़ता है और जो झूठ कहते हैं उनका वह विश्वास कर लेता है। हिन्दू और मुसलमान राम तथा रहीम नाम पर झगड़ते हैं जबकि दोनों एक ही हैं। नियमी-धर्मी और पीर-औलिया नाना पाखण्ड करते हैं किन्तु संसार उन्हीं के बहकावे में आ जाता है। संसार के लोग सच्चे गुरु द्वारा बताए गए ज्ञान के मार्ग का अनुसरण न करके जीवन को नष्ट करने वाले संसार की ओर आकर्षित होते हैं। इससे स्पष्ट है कि वे पागल हो गए हैं।

प्रश्न 2.
कबीर ने कर्मकाण्ड पर करारा प्रहार किया है। स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
कबीर धार्मिक पाखण्ड के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कर्मकाण्ड पर करारे प्रहार किये हैं। वे कहते हैं किं बहुत से तथाकथित नियमों का पालन करने वाले धर्मात्मा मिले हैं जो प्रात:काल ही स्नान कर लेते हैं किन्तु आत्मा की आवाज न मानकर स्थूल पत्थर की पूजा करते हैं। उनका ज्ञान खोखला एवं दिखावटी है। इसी प्रकार अनेक पीर-औलिया देखें हैं जो वक्तव्य देकर अपने शिष्य बनाते हैं, किन्तु वे भी खुदा को नहीं जानते हैं। उनके हृदय में दया, अनुकम्पा आदि मानवीय भाव नहीं होते हैं।

प्रश्न 3.
राधा ने विरह व्यथा में डूबे ब्रजवासियों को कर्त्तव्य पालन का उपदेश क्यों दिया था? (2008)
उत्तर:
भारतीय संस्कृति का मूलाधार कर्म है। यहाँ कर्म को सर्वोपरि माना गया है। जीवन की सार्थकता कर्म में ही है। इसलिए राधा श्रीकृष्ण के विरह की वेदना में डूबे ब्रजवासियों को समझाती हैं कि उन्हें श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लग जाना चाहिए। इससे श्रीकृष्ण जो चाहते थे वे कार्य पूर्ण होंगे और ब्रजवासियों को भी सन्तोष होगा कि वे श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों को कर रहे हैं। कर्म करने से व्यक्ति को मानसिक सन्तोष भी मिलता है। ब्रजवासी जब कामों में लग जायेंगे तो उनका ध्यान भी बँटेगा। वे धीरे-धीरे विरह कष्ट से छुटकारा पा लेंगे।

प्रश्न 4.
ब्रजवासियों के सुख-दुःख दूर करने के लिए राधा ने क्या-क्या उपाय किए थे?
उत्तर:
राधा ने नन्द, यशोदा, गोप, गोपियों, बच्चों, पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों के प्रति दया, सहानुभूति एवं सेवा का भाव अपनाया। उन्होंने यशोदा को कृष्ण के लौटने का आश्वासन दिया तो नंद को शास्त्रों का ज्ञान सुनाया। गोपों को श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाकर, बालकों को फूलों के खिलौने देकर तथा गोपियों को कृष्ण की लीला के गीत, वंशी तथा वीणा सुनाकर प्रसन्न किया। उन्होंने वृद्ध-रोगियों तथा अनाथों की सेवा की तथा दीन-हीन, निर्बलों एवं विधवाओं को सहारा दिया। इस तरह उन्होंने सभी के संताप (दुःख) दूर करने के लिए अनेक उपाय अपनाए।

प्रश्न 5.
राधा ब्रजबालाओं का दुःख किस प्रकार दूर करती थी?
उत्तर:
राधा ने ब्रजबालाओं का विरह दुःख दूर करने के लिए सेवा धर्म अपनाया था। उन्होंने यशोदा का दुःख पैर सहलाकर, आँखों के आँसू पोंछकर तथा सांत्वना देकर दूर किया तो नन्द का दुःख उनकी सेवा करके तथा शास्त्र ज्ञान सुनाकर समाप्त किया। गोपों की पीड़ा को कम करने के लिए उन्हें श्रीकृष्ण के काम में लगाया। विरहिणी गोपियों को श्रीकृष्ण की लीलाएँ वंशी आदि सुनाई और उनके दुःख को शान्त करने का प्रयास किया। बच्चों को फूलों के खिलौने देकर प्रसन्न करती तो रोगियों, अनाथों, विधवाओं, दीन-हीनों को सहारा देकर उनका कष्ट मिटाया। इस तरह राधा सभी की वेदना दूर करने का प्रयास करती थीं।

MP Board Solutions

सामाजिक समरसता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संकलित अंशों के आधार पर कबीर के विचार लिखिए।
उत्तर:
इस प्रश्न के उत्तर के लिए ‘कबीर की वाणी’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
(अ) मन लाग्यौ मेरा फकीरी में
जो सुख पायौ नाम भजन में, सो सुख, नाहि अमीरी में।
भला-बुरा सबकों सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।

(आ) तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सत गुरु धारा निरमल बाहे, वा में काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे॥
उत्तर:
इन पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

प्रश्न 3.
‘राधा की समाज सेवा’ विषय का केन्द्रीय भाव लिखिए। (2009)
उत्तर:
इसके लिए ‘राधा की समाज सेवा’ का भाव-सारांश पढ़िए।

प्रश्न 4.
“अपने दुःख को भुला देने का सबसे अच्छा उपाय है, अपने को किसी और काम में लगा देना।” राधा ने इस आदर्श का पालन किस प्रकार किया? (2009)
उत्तर:
जब व्यक्ति दुःखी होता है तब उसके चित्त पर बड़ा दबाव रहता है। इसलिए यह माना गया है कि दु:ख के समय व्यक्ति स्वयं को किसी अन्य कार्य में संलग्न कर दे ताकि उसका ध्यान उस कार्य से बँट जाए और दुःख भूल में पड़ जाए। जब श्रीकृष्ण ब्रजवासियों को बिलखता छोड़कर मथुरा चले गये तो उनकी प्रेमिका विरह वेदना से ग्रस्त हो गयी। उन्होंने उस वियोग की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए स्वयं को समाज की सेवा में संलग्न कर दिया। वे यशोदा को सांत्वना देने, उसके पैर सहलाने, आँसू पोंछने का कार्य करने लगीं। ब्रज के राजा नन्द को शास्त्र सुनाने लगीं। गोपों को काम में संलग्न कर दिया। गोपियों को कृष्ण लीला सुनाना और वंशी बजाकर प्रसन्न करना प्रारम्भ कर दिया। बच्चों को विविध फूलों के खिलौने देकर बहलाया। वृद्धों, रोगियों, अनाथों, विधवाओं आदि को सहारा देने में व्यस्त हो गयीं। इस तरह सभी की सेवा में व्यस्त होने के कारण वे अपना दुःख भूल गयीं।

प्रश्न 5.
“पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थीं।” आधुनिक सन्दर्भ में इसकी उपयोगिता समझाइए।
उत्तर:
वृक्ष-वनस्पतियाँ प्रदूषण को नियन्त्रित करने में बड़ी सहयोगी होती हैं। जितनी अधिक हरियाली होगी उतना पर्यावरण सुधार होगा। राधा को इस बात का ज्ञान था इसीलिए वे पेड़-पौधों की पत्तियों को व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। आज संसार भर में पर्यावरण प्रदूषण का प्रकोप है इसीलिए नाना प्रकार के वृक्ष लगाने के अभियान चलाये जा रहे हैं। वन संरक्षण की अनेक योजनाओं का कार्यान्वयन हो रहा है। हरित पट्टिकाएँ तथा हरित क्षेत्र निर्धारित किए जा रहे हैं ताकि हरियाली बनी रहे और मनुष्य को प्रदूषण से कुछ मुक्ति मिले। आज के वैज्ञानिक युग में प्राकृतिक सम्पदा का महत्त्व और बढ़ गया है। इस प्रकार के विचार हरिऔध के समय में आने लगे थे। इसीलिए उन्होंने राधा के द्वारा वनस्पतियों के संरक्षण का कार्य कराया है।

MP Board Solutions

प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए
(अ) हो उद्विग्ना बिलख ………….. तजेंगे।
(आ) सच्चे स्नेही ………….. कोई न होवे।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

सामाजिक समरसता काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
पथरा, चदरिया, कागद, जुग, जतन, हाथ।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए
पृथ्वी, आँख, पक्षी, पुष्प, दिन।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-2

प्रश्न 3.
कबीर के संकलित पदों में कौन-सा रस है?
उत्तर:
कबीर के संकलित पदों में शान्त रस है।

MP Board Solutions

प्रश्न 4.
कबीर की भाषा के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
कबीर भ्रमण करने वाले सन्त थे। वे यहाँ-वहाँ जाकर जनमानस को ज्ञान का उपदेश दिया करते थे। वे एक स्थान पर स्थिर होकर नहीं रहे। अतः उनकी भाषा में विविध क्षेत्रों के शब्द आ गये हैं। इसलिए उनकी भाषा को खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है। ब्रज, अरबी, फारसी, अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली, उर्दू आदि सभी भाषाओं के शब्द कबीर के काव्य में मिल जाते हैं। विविध भाषाओं का संगम होते हुए भी कबीर की भाषा में अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में अलंकार पहचानकर लिखिए-
(अ) काहे के ताना काहे के मरनी, कौन तार से बीनी चदरिया।
(आ) जुगन जुगन समुझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
(इ) राधा जैसी सदय हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
(ई) पूजी जाती ब्रज अवनि में देवियों सी अतः थी।
उत्तर:
(अ) अनुप्रास
(आ) पुनरुक्तिप्रकाश
(इ) उपमा
(ई) उपमा।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए (2009)
(क) आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।
(ख) साधो देखो जग बौराना, सांची कहो तो मारन धावै झूठे जग पतियाना।
उत्तर:
(क) इस पंक्ति में सन्त कबीर ने भौतिक जगत् की नश्वरता का बोध कराया है। संसार की वस्तुओं पर अभिमान करना जीव की अज्ञानता है। ये सभी तो नष्ट होने वाली हैं। जिस शरीर के बल पर जीव अहंकार पाले फिरता है, एक दिन यह मिट्टी में मिल जाता है। इसलिए इस पर गर्व करना व्यर्थ है। अमर तो केवल आत्मा है, उसी का अनुसरण करना चाहिए।

(ख) साक्षात संसार से ज्ञान अर्जित करने वाले सन्त कबीर कहते हैं कि इस संसार के लोग अज्ञान अहंकार में फंसकर पागल हो गये हैं। यही कारण है कि जब उनसे सत्य बात कही जाती तो मारने दौड़ते हैं; उसका विश्वास नहीं करते हैं किन्तु कोई झूठा व्यक्ति उनसे कुछ कहता है तो वे उसका विश्वास कर लेते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
गुण, प्रेम, सदय, विधवा, सबल।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-3

प्रश्न 8.
छन्द किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
मात्रा, वर्ण संख्या, यति, गति (लय) तथा तुक आदि के नियमों से युक्त रचना छन्द कहलाती है।
छन्द दो प्रकार के होते हैं।-
(1) मात्रिक छन्द-इसमें मात्राओं की गणना की जाती है।
(2) वर्णिक छन्द-इसमें वर्गों की गणना की जाती है।

प्रश्न 9.
आपकी पाठ्य-पुस्तक के पद्य भाग में कौन-कौन से पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं?
उत्तर:
हमारी पाठ्य-पुस्तक के विनय के पद, पदावली, कृष्ण की बाल लीलाएँ, पद्माकर के छन्द, मतिराम के छन्द, वृन्द के दोहे, रहीम के दोहे, ऋतु वर्णन, नौका विहार, छत्रसाल का शौर्य वर्णन, कविता का आह्वान, कबीर की वाणी, कुण्डलियाँ, दुष्यन्त की गजलें, बरसो रे तथा चलना हमारा काम है पाठ मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं।

MP Board Solutions

प्रश्न 10.
निम्नलिखित पंक्तियों में गण पहचानिए
(क) जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
(ख) आटा चींटी विहग गण थे वारि औ अन्न पाते।
उत्तर:
(क) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽऽ। ऽऽ।
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
जो वे हो ता मलि न लख ती गोप के बाल कौं को
(ख) ऽऽऽ ऽ।। ।।। ऽ।ऽ ऽ।ऽ
मगण भगण नगण तगण तगण ऽऽ
आटा ची टी विह गगण थेवारि औ अन्न पाते

प्रश्न 11.
निम्नलिखित काव्यांश में निहित काव्य सौन्दर्य को लिखिए
(अ) तो धीरे मधुर स्वर से हो विनीता बताती।।
हाँ आवेंगे व्यथित ब्रज को श्याम कैसे तजेंगे।
(आ) गाके लीला स्व प्रियतम की वेणु वीणा बजा के।
प्यारी बातें कथन करके वे उन्हें बोध देतीं।
उत्तर:
इन काव्यांशों के काव्य सौन्दर्य इस पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से पढ़िए।

कबीर की वाणी भाव सारांश

सारग्राही सन्त कबीर ने सभी धर्मों के सत्य को ग्रहण कर मानवतावादी व्यावहारिक धर्म अपनाया। जीवन के प्रत्यक्ष ज्ञान के सहारे उन्होंने सत्यासत्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उन्होंने बाह्य आडम्बरों, पाखण्डों, द्वेष-भावनाओं का डटकर विरोध किया। संकलित पदों में उन्होंने उन्हीं भावों को व्यक्त किया। फकीरी में रमने वाले कबीर को अमीरी के बजाय भगवान् का भजन प्रिय है। इस शरीर को नश्वर कहने वाले कबीर सन्तोष को सर्वोपरि मानते हैं। उन्हें पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान पर विश्वास है। इसीलिए वे समझाते हैं कि सजग रहकर सच्चे गुरु के बताये मार्ग पर चलकर ही उद्धार हो सकता है। धर्म या सम्प्रदाय के नाम पर आडम्बर करने वालों को उन्होंने खूब फटकारा है। उनके लिए राम और रहीम एक हैं। पत्थर पूजा, जीव हत्या आदि में संलग्न ढोंगी हिन्दू-मुसलमानों को उन्होंने करारी डाँट लगाई है। वे सत्य पर आधारित मानवता को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं।

कबीर की वाणी संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] मन लाग्यो मेरा यार फकीरी में।
जो सुख पावों नाम भजन में, सो सुख नाहि अमीरी में।।
भला-बुरा सबको सुनि लीजै, करि गुजरान गरीबी में।।
प्रेमनगर में रहनि हमारी, भलि बनि आई सबूरी में।।
हाथ में पूड़ी बगल में सोंटा, चारों दिसा जगीरी में।।
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी में ।।1।।

शब्दार्थ :
फकीरी = वैराग्य; अमीरी = वैभव सम्पन्नता; गुजरान = गुजारा; भलि = भला; सबूरी = सन्तोष; कँड़ी = पत्थर की बनी कटोरी; सोंटा = डण्डा, छड़ी; खाक = धूल; मगरूरी = अहंकार, अभिमान; साहिब = स्वामी।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद (शब्द) हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘कबीर की वाणी’ से अवतरित है। इसके रचयिता सन्त कबीरदास हैं।

प्रसंग :
इस पद में कवि ने मन की वैराग्य प्रवृत्ति पर बल दिया है।

व्याख्या :
कबीर कहते हैं कि मेरा मन तो वैराग्य में लग गया है। मुझे जो आनन्द परमब्रह्म के भजन में मिला है; वह वैभव सम्पन्नता में नहीं मिल सकता है। अमीरी नाशवान है और अस्थायी सुख देने वाली है। जबकि ब्रह्म परमानन्द देने वाले हैं। अभिमान से दूर रहकर जो कोई भला-बुरा कहे उसे सहन करके गरीबी में गुजारा करना अच्छा है। कवि का निवास तो प्रेम की नगरी है अर्थात् जहाँ प्रेम भाव है वहीं रहना उचित है। सन्तोष सबसे अधिक हितकारी है इसलिए मेरे हाथ में पूड़ी आदि पात्र तथा बगल में एक डण्डा रहता है। इनके साथ मैं संसार की चारों दिशाओं में चाहे जहाँ जाने को मुक्त हूँ। सांसारिक बन्धन व्यर्थ हैं, धन, वैभव अस्थिर हैं क्योंकि अन्त में यह शरीर मिट्टी में मिल जायेगा। अतः सम्पत्ति, बल आदि का अभिमान करना व्यर्थ है। हे सन्तो! वास्तविकता यह है कि सन्तोष से ही स्वामी (ब्रह्म) मिलते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सांसारिक आकर्षणों से परे रहकर सन्तोष के द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का सन्देश दिया गया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

MP Board Solutions

[2] मेरा तेरा मनवा, कैसे इक होई रे।
मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यों उरझाइ रे।।
मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोइ रे।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।।
जुगन जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे।।
सतगुरु धारा निरमल बाहै, वामें काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ।।2।। (2008)

शब्दार्थ :
मनवा = मन; लेखी = लिखी हुई; सुरझावन हारी = सुलझाने वाली; उरझाई = उलझाकर; निरमोही = मोह से मुक्त; जुगन-जुगन = युगों-युगों से; रंगी = संसार के माया मोह में डूबा; बिहंगी = पक्षी के समान इधर-उधर भटकने वाला; बाहै = बहती है; वामें = उसमें; काया = शरीर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद में पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष ज्ञान की महिमा को बताते हुए सच्चे गुरु के ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।

व्याख्या :
सांसारिक माया मोह में फँसे व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि मेरा और तुम्हारा मन एक कैसे हो सकता है। मैं तो वह कहता हूँ जो साक्षात् आँखों से देखा है और तुम वह बात कहते हो जो पुस्तकों में लिखी है। मैं व्यावहारिक ज्ञान के आधार पर सुलझाने वाली स्पष्ट बात करता हूँ। जबकि तुम अज्ञानतावश सोच में उलझे रहते हो। मैं समझाता हूँ कि सत्य, उचित की पहचान के प्रति जागरूक रहो, अन्धानुकरण मत करो किन्तु तुम अज्ञान की निद्रा में सोते रहते हो। मैं सजग करता हूँ कि संसार नाशवान है इसके प्रति मोह मत पालना परन्तु तुम इस नश्वर संसार के प्रति मोहित रहते हो।

मैं युगों-युगों से समझाते -समझाते थक गया हूँ कि मायावी संसार से मुक्त रहकर सत्य का अनुसरण करो किन्तु मेरी इस बात को कोई नहीं मानता है। तुम तो संसार के माया-मोह में लीन होकर उड़ने वाले पक्षी की तरह इधर-उधर भटक रहे हो। इस तरह भटकते हुए तुमने समस्त ज्ञानरूपी धन खो दिया है। सारा जीवन व्यर्थ गँवा दिया है। सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! ध्यान से सुन लो कि सच्चे गुरु के ज्ञान की पवित्र धारा बह रही है। उसी में अपने शरीर के विकारों को धो डालोगे तभी तुम्हारा मनचाहा हो सकेगा अर्थात् गुरु का सच्चा उपदेश ही तुम्हारा उद्धार कर सकेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. संसार की निरर्थकता को इंगित करते हुए सच्चे ज्ञान के मार्ग को अपनाने पर बल दिया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा अवलोकनीय है।
  3. सरल, सुबोध, व्यावहारिक भाषा में दार्शनिक विषय का प्रतिपादन किया है।

[3] साधो, देखो जग बौराना।
साँची कहाँ तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
हिन्दू कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमाना।
आपस में दोऊ लहै मरतु हैं, मरम कोई नहिं जाना।।
बहुत मिले मोहि नेमी धर्मी प्रात करै असनाना।
आतम छोड़ि पषानै पू0, तिनका थोथा ज्ञाना।
बहुतक देखे पीर औलिया, पढ़े किताब कुराना।
करै मुरीद कबर बतजावै, उनहूँ खुदा न जाना।।
हिन्दु की दया मेहर तुरकन की, दोनों घर से भागी।
वे करैं जिबह वे झटका मारे, आग दोऊ घर लागी।
या विधि हँसत चलत है हमको, आपु कहावै स्याना।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दीवाना ।।3।।

शब्दार्थ :
जग = संसार; बौराना = पागल हो गया है; धावै = दौड़ता है; पतियाना = विश्वास करता है; मरम = रहस्य, वास्तविकता; नेमी = नियमों का पालन करने वाले आतम = आत्मा; पषाने = पाषाण, पत्थर; तिनका = उनका; थोथा = खोखला, निरर्थक; मुरीद = शिष्य; उनहूँ = उन्हें भी; मेहर = अनुकम्पा; तुरकन = मुसलमानों; जिबह = हलाल करना, पशु को धीरेधीरे काटना; झटका = एक ही बार में पशु का वध करना; स्याना = चतुर, होशियार; दीवाना = पागल।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद में धार्मिक पाखण्डों की निन्दा कर समरसता का सन्देश दिया है।

व्याख्या :
सन्त कबीर कहते हैं कि हे सज्जनो! देख लो संसार कैसा पागल हो गया है। पागलपन की यह स्थिति है कि यदि कोई व्यक्ति सत्य बात कहे तो उसे मारने दौड़ता है। यह संसार झूठे पाखण्डियों का विश्वास करता है। हिन्दू कहते हैं कि हमारे तो राम सब कुछ हैं और मुसलमान कहते हैं कि रहीम ही सब कुछ है। इस तरह ये आपस में लड़ते-मरते रहते हैं। उनमें इस रहस्य को कोई नहीं जानता है कि राम और रहीम दोनों एक ही हैं। कवि कहते हैं कि मुझे बहुत से नियमों का पालन करने वाले धार्मिक व्यक्ति मिले हैं। वे प्रात:काल ही स्नान-ध्यान करते हैं। आत्मा की आवाज की अवहेलना करके पत्थर की पूजा करने वाले उन लोगों का ज्ञान खोखला (दिखावटी) है।

मैंने बहुत से पीर और औलिया भी देखे हैं जो कुरान आदि पुस्तकें पढ़ते हैं। वे लोगों को अपने शिष्य बनाते हैं, बड़े-बड़े व्याख्यान देते हैं किन्तु उन्हें भी खुदा की जानकारी नहीं होती है। हिन्दुओं की दया तथा मुसलमानों की मेहर (कृपा)दोनों ही मनुष्यों के हृदय से पलायन कर गयी हैं। दोनों ही निर्दयी, हिंसक हो गये हैं। उनमें से एक हलाल करते हैं तो दूसरे झटका मारते हैं। इस तरह दोनों ही ओर हिंसा की आग लगी है। वे हम सब का उपहास करते हैं तथा स्वयं बहुत चतुर कहलाते हैं। कबीर कहते हैं कि ऐसी स्थिति में इनमें से किसे पागल कहा जाय। दोनों ही उन्मत्त हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. धार्मिक पाखण्ड जनित विद्वेष का तिरस्कार कर सामंजस्य एवं सहभाव का सन्देश दिया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा में समझाया गया है।

MP Board Solutions

राधा की समाज सेवा भाव सारांश

पौराणिक प्रसंगों का अपने काव्य का आधार बनाने वाले अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का प्रिय प्रवास कृष्ण काव्य परम्परा में आता है। ‘राधा की समाज सेवा’ अंश ‘प्रिय प्रवास’ महाकाव्य से लिया गया है।

परमप्रिय श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर चले जाने पर समस्त ब्रजवासियों में विरह-वेदना व्याप्त हो जाती है। राधा श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल हैं किन्तु वे अपने दुःख को भुला देने का सबसे उत्तम उपाय खोजती हैं और स्वयं को समाज सेवा में लगा देती हैं। वे नित्यप्रति यशोदा के पास जाकर उनको समझाती हैं। उनके पैर सहलाकर तथा आँसू पोंछकर सांत्वना देती हैं। उन्हें आश्वासन देती हैं कि दुःखी ब्रज को श्रीकृष्ण कैसे छोड़ सकते हैं, वे अवश्य लौटकर आयेंगे। नन्द की पीड़ा को मिटाने के लिए वे विभिन्न शास्त्रों को सुनाकर सांसारिक वैभव की हीनता का प्रतिपादन करती हैं। दुःखी ग्वालों को समझाकर श्रीकृष्ण के प्रिय कार्यों में लगाती हैं। ग्वालों के बालकों को दुःखी देखकर वे उन्हें फूलों के विभिन्न प्रकार के खिलौने लाकर देती हैं। उनसे श्रीकृष्ण की लीलाएँ कराती हैं और स्वयं ध्यानमग्न होकर उन्हें देखती रहती हैं। विरहिणी गोपियों को वे विधिपूर्वक सुखी करती हैं।

उन्हें श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर सुनाती हैं, वंशी तथा वीणा बजाती हैं। वृद्धों, रोगियों की वे सेवा करती हैं तथा दवा आदि देती हैं। निर्बल, दीन-हीन, अनाथ तथा विधवाओं को वे सम्मान सहित सहारा देती हैं। उनके मन में जो भी विकार हैं उनको अपने सद्व्यवहार से धो देती हैं। चींटी, पक्षी, कीड़ों आदि को अन्न-जल आदि देती हैं। वे वृक्षों के पत्तों को भी व्यर्थ में नहीं तोड़ती हैं। वे सज्जनों की संरक्षक तथा दुष्टों की प्रशासक बनी हैं। वे सभी प्राणियों की समृद्धि के कार्यों में लगी रहती हैं, कुमारी बालिकाएँ भी ब्रज में शान्ति का विस्तार करने में लगी हैं। कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण के ब्रज छोड़कर जाने पर जो महाकाली संकट देने वाली रात्रि अब आयी थी उसमें राधा चाँदनी के समान सुशोभित थीं। श्रीकृष्ण के संयोग से ब्रज में आनन्द वर्षा हुई थी, वह पुनः-पुनः आये। राधा और श्रीकृष्ण इस भूमि पर आयें किन्तु इस प्रकार की वियोग की घटना फिर न हो।

राधा की समाज सेवा संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] राधा जाती प्रति- दिवस थीं पास नन्दांगना के।
नाना बातें कथन करके थीं उन्हें बोध देती।
जो वे होती परम- व्यथिता मूर्छिता या विपन्ना।
तो वे आठों पहर उनकी सेवना में बितातीं॥1॥ (2014)

घण्टे ले के हरि-जननि को गोद में बैठती थी।
वे थी नाना जतन करती पा उन्हें शोक मग्ना।
धीरे-धीरे चरण सहला औ मिटा चित्त-पीड़ा।
हाथों से थी दृग-युगल के वारि को पोंछ देती ॥2॥

शब्दार्थ :
प्रति-दिवस = रोजाना, प्रतिदिन; नन्दांगना = यशोदा, नन्द की पत्नी; नाना = तरह-तरह की; कथन = कहकर; बोध = ज्ञान समझाना; परम = बहुत; व्यथिता = पीड़ित; मूछिता = बेहोश; विपन्न = दु:खी; सेवना = सेवा; जननि = माँ; जतन = प्रयत्न, उपाय; शोक = दुख; चित्त-पीड़ा = हृदय का कष्ट; दृग-युगल = दोनों आँखें; वारि = जल, आँसू।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘सामाजिक समरसता’ के ‘राधा की समाज सेवा’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा की गयी यशोदा की सेवा का अंकन किया गया है।

व्याख्या :
श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होते हुए भी राधा प्रतिदिन नन्द की पत्नी यशोदा के पास जाती और तरह-तरह की बातें करके उन्हें समझाती थीं। यदि वे बहुत पीड़ित बेहोश या दुःखी होती तो राधा दिन-रात उनकी सेवा में ही बिताती थी अर्थात् हर समय उनकी देखभाल में ही लगी रहती थीं।

राधा श्रीकृष्ण की माँ यशोदा को अपनी गोद में लेकर घण्टों तक बैठी रहती थीं। उनको श्रीकृष्ण के चले जाने के दुःख से दुखी पाकर वे विभिन्न प्रकार के उपाय करती थीं। धीरे-धीरे उनके पैरों को सहलाती थीं और उनकी समस्त पीड़ा को मिटा देती थीं। वे अपने हाथों से यशोदा की दोनों आँखों के आँसू पोंछ देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभावी रूप का सजीव चित्रण किया गया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

MP Board Solutions

[2] हो उद्विग्ना बिलख जब यों पूछती थीं यशोदा।
क्या आवेंगे न अब ब्रज में जीवनाधार मेरे।
तो वे धीरे मधुर-स्वर से हो विनीता बतातीं।
हाँ आवेंगे, व्यथित बृज को श्याम कैसे तजेंगे ॥ 3 ॥

आता ऐसा कथन करते वारि राधा-दृगों में।
बूंदों-बूंदों टपक पड़ता गाल पै जो कभी था।
जो आँखों से सदुख उसको देख पातीं यशोदा।
तो धीरे यों कथन करतीं खिन्न हो तू न बेटी ॥ 4॥

शब्दार्थ :
उद्विग्ना = परेशान; बिलख = व्याकुल; जीवनाधार = जीवन के आधार, श्रीकृष्ण; विनीता = विनम्र; व्यथित = पीड़ित; तजेंगे = छोड़ेंगे; सदुःख = दुःख युक्त; खिन्न = परेशान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांशों में राधा द्वारा यशोदा की सेवा एवं यशोदा द्वारा राधा को धीरज बँधाने का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जब यशोदा परेशान एवं व्याकुल होकर राधा से पूछती थीं कि मेरे जीवन के आधार श्रीकृष्ण क्या कभी भी ब्रज लौटकर नहीं आयेंगे तब वे धीरे से मीठे स्वर में विनम्र होकर बताती थीं कि हाँ श्रीकृष्ण अवश्य लौटेंगे। वे दुःखी ब्रजवासियों को इस तरह कैसे छोड़ सकेंगे?

इस प्रकार की बात कहते हुए विरह से व्याकुल राधा के नेत्रों में भी आँसू छलक आते थे। जो कभी-कभी आँसुओं की बूंदें यशोदा के गाल पर टपक पड़ती थीं तो वे कहती थीं कि बेटी राधा तू परेशान मत हो, सब ठीक होगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा द्वारा व्याकुल यशोदा की सेवा तथा यशोदा द्वारा राधा को सांत्वना देने का वर्णन है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  4. तत्सम प्रधान खड़ी बोली अपनायी गयी है।

[3] हो के राधा विनत कहतीं मैं नहीं रो रही हूँ।
आता मेरे दृग युगल में नीर आनन्द का है।
जो होता है पुलक कर के आप की चारु सेवा।
हो जाता है प्रगटित वही वारि द्वारा दृगों में ॥5॥

वे थीं प्रायः ब्रज नृपति के पास उत्कण्ठ जातीं।
सेवायें थीं पुलक करतीं क्लान्तियाँ थीं मिटाती।
बातों ही में जग विभव की तुच्छता थी दिखाती।
जो वे होते विकल पढ़ के शास्त्र नाना सुनातीं ॥6॥

शब्दार्थ :
विनत = विनम्र; दृग युगल = दोनों नेत्र; पुलक = रोमांच, हर्ष; चारु = सुन्दर; ब्रज-नृपति = ब्रज के राजा, नन्द; उत्कण्ठ उद्यत; क्लांतियाँ = दु:ख; जग-विभव = सांसारिक वैभव; तुच्छता = दीनता।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में सेवा भावी राधा के ज्ञानपरक प्रबोध को प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या :
राधा की आँखों में छलके आँसुओं की बूंद कभी यशोदा के गाल पर पड़ जाती थीं तो वे उसे सांत्वना देती तब राधा विनम्र होकर कहती कि मैं रो नहीं रही हूँ। मेरे दोनों नेत्रों में तो अति आनन्द के आँसू हैं। आपकी सुखद सेवा करके मुझे जो हर्ष होता है, वही आँखों से जल के रूप में प्रकट हो जाता है।

राधा प्रायः उद्यत होकर ब्रज के राजा के पास जाती और प्रसन्नतापूर्वक उनकी सेवा करती तथा उनके समस्त दुःखों को मिटाती थीं। बातों ही बातों में वे सांसारिक वैभव की दीनता प्रदर्शित करती और यदि वे अधिक व्याकुल होते थे तो राधा विभिन्न शास्त्र पढ़कर सुनाती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. प्रबुद्ध राधा के सेवा भावी रूप का अंकन हुआ है।
  2. तत्सम प्रधान सानुप्रासिक भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दक्रान्ता छन्द है।

MP Board Solutions

[4] होती मारे मन यदि कहीं गोप की पंक्ति बैठी।
किम्वा होता विकल उनको गोप कोई दिखाता।
तो कार्यों में सविधि उनको यत्नतः वे लगाती।
औ ए बातें कथन करती भूरि गंभीरता से।। 7॥

जी से जो आप सब करते प्यार प्राणेश को हैं।
तो पा भू में पुरुष तन को, खिन्न हो के न बैठे।
उद्योगी हो परम रुचि से कीजिए कार्य ऐसे।
जो प्यारे हैं परम प्रिय के विश्व के प्रेमिकों के ॥8॥

शब्दार्थ :
किम्वा = अथवा; गोप = ग्वाला; सविधि = विधि से; यत्नतः = प्रयत्नपूर्वक; भूरि = बहुत अधिक; रुचि = लगन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा ने गोपों को कर्म में लीन होने का उद्बोधन दिया है।

व्याख्या :
यदि कहीं पर कोई मलिन मन वाले ग्वालाओं की कोई पंक्ति होती अथवा राधा को कोई ग्वाला व्याकुल होता हुआ दिखाई पड़ता तो वे विधि से प्रयत्नपूर्वक उनको अपने-अपने काम में लगा देतीं। वे बहुत गम्भीरता से यह बात कही कि यदि आप सभी प्राणप्रिय श्रीकृष्ण को हृदय से प्यार करते हो तो पृथ्वी पर दुर्लभ मनुष्य का शरीर पाकर दुःखी होकर न बैठे। पूरी लगन के साथ ऐसे कामों को करें जो परमप्रिय श्रीकृष्ण के प्रेमियों को अच्छे लगते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहने का उद्बोधन दिया गया है।
  2. कर्म के प्रति निष्ठा भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। उसी का प्रतिपादन यहाँ हुआ है।
  3. संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली में विषय की अभिव्यक्ति हुई है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[5] जो वे होता मलिन लखतीं गोप के बालकों को।
देती पुष्पों रचित उनको मुग्धकारी-खिलौने।
दे शिक्षाएँ विविध उनसे कृष्ण लीला करातीं।
घंटों बैठी परम रुचि से देखतीं तद्गता हो ॥9॥

पाई जातीं यदि दुखित जितनी अन्य गोपांगनाएँ।
राधा द्वारा सुखित वह भी थीं यथा रीति होती।
गा के लीला स्व प्रियतम की वेणु, वीणा बजा के।
प्यारी-बातें कथन कर के वे उन्हें बोध देतीं ॥10॥

शब्दार्थ :
मलिन = उदास; लखती = देखती; मुग्धकारी = मोहित करने वाले तद्गता = तन्मय; गोपांगनाएँ = गोपियाँ, ग्वालों की पत्नियाँ; वेणु = वंशी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा ग्वालों के बच्चों तथा उनकी पत्नियों (गोपियों) की उदासी दूर करने का वर्णन है।

व्याख्या :
वे राधा यदि ग्वालों के बच्चों को उदास देखतीं तो वे उन्हें फूलों से बने मन को मोहित करने वाले खिलौने देतीं। वे उन्हें नाना प्रकार की शिक्षाएँ देकर कृष्ण लीला कराती । घण्टों तक बैठी रहतीं और उस लीला को तन्मय होकर देखती रहती थीं।

यदि ग्वालों की पत्नियाँ दु:खी पाई जाती तो वे भी राधा द्वारा इसी तरह सुखी होती थीं। अपने प्रियतम श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाकर, वंशी एवं वीणा बजाकर और प्यारी-प्यारी बातें कहकर उनको उद्बोधन देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ग्वालों के बच्चों तथा पत्नियों की सेवा का वर्णन किया गया है।
  2. मन्दाक्रान्ता छन्द है। तत्सम युक्त सरल सुबोध भाषा का प्रयोग किया गया है।

MP Board Solutions

[6] संलग्ना हो विविध कितने सान्त्वना कार्य में भी।
वे सेवा थीं सतत करती वृद्ध-रोगी जनों की।
दीनों, हीनों, निबल विधवा आदि को मानती थीं।
पूजी जाती बृज-अवनि में देवियों सी अतः थी ॥11॥

खो देती थीं कलह जनि, आधि के दुर्गुणों को।
धो देती थीं मलिन मन की व्यापनी कालिमायें।
बो देती थी हृदय तल में बीज भावज्ञता का।
वे थी चिन्ता-विजित गृह में शांति धारा बहाती ॥12॥

शब्दार्थ :
संलग्ना हो = लगकर; निबल = निर्बल; बृज-अवनि = ब्रज भूमि; आधि = मानसिक चिन्ता; व्यापिनी = प्रभावित करने वाली; कालिमाएँ = दोषों को; भावज्ञता = मनोभाव समझने; चिन्ता-विजित-गृह = चिन्ता को जीत लेने वाला घर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा द्वारा किए गए सद्भावपूर्ण सेवा कार्यों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा नाना प्रकार के कितने ही सान्त्वना देने वाले कार्यों में लगी रहती थी। वे वृद्ध और रोगी जनों की निरन्तर सेवा करती रहती थीं। वे दीन-हीनों, निर्बलों, विधवाओं आदि का सम्मान करती थीं, उनकी सेवा करती थीं। इसीलिए ब्रजभूमि में वे देवियों की तरह पूजी जाती थीं।

राधा पारस्परिक कलह तथा मानसिक दुःखों को दूर कर देती थीं। वे दुःखी मन को प्रभावित करने वाले सभी दोषों को धो डालती थीं। वे मनुष्यों के तन-मन के सभी कष्टों को दूर करके उनके हृदय में सहृदयता भर देती थीं। वे चिन्ता को जीत लेने वाले घर में शान्ति की धारा प्रवाहित कर देती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के जन सेवी रूप का वर्णन हुआ है।
  2. सानुप्रासिक भाषा तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  3. समास प्रधान तत्सम शब्दावली में विषय-का प्रतिपादन किया गया है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

[7] आटा चींटी विह्या गण थे वारि ओ अन्न पाते।
देखी जाती सदय उनकी दृष्टि कीटादि में भी।
पत्तों को भी न तरुवर के वे वृथा तोड़ती थी।
जी से भी निरस्त रहती भूत सम्बर्द्धना में ॥13॥

वे छाया थी सुजन शिर की शासिका थी खलों में।
कंगालों की परम निधि थी औषधि पीड़ितों की।
दोनों की थी बहिन, जननी थी अनाथाश्रितों की।
आराध्य थी ब्रज-अवधि की प्रेमिका विश्व की थीं ॥14॥

शब्दार्थ :
विा = पक्षी; कीटादि = कीड़े आदि; वृथा = व्यर्थ में; निरत = संलग्न; भूत सम्बर्द्धना = प्राणियों के उत्थान में; अनाथ = सहारे हीन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा की पशु-पक्षियों, अनाथों आदि की व्यापक सेवा का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
राधा की सेवा का क्षेत्र व्यापक था। चींटी, पक्षी राधा से अन्न एवं जल पाते थे। कीड़े आदि के प्रति भी उनकी दयापूर्ण दृष्टि थी। श्रेष्ठ वृक्षों के पत्तों को भी वे व्यर्थ में नहीं तोड़ती थीं। वे अपने हृदय से स्वाभाविक रूप में प्रेमियों के उत्थान के कार्यों में लगी रहती थीं।

वे (राधा) सज्जनों के सिर की छाया थीं तथा दुष्टजनों पर शासन करने वाली थीं। वे निर्धनों के लिए महान् सम्पत्ति का भण्डार थीं और पीड़ितों (रोगियों) के लिए सही उपचार करने वाली दवा थीं। वे दीन-हीनों की बहन थीं और जो अनाथ और आश्रयहीन थे उनके लिए माँ थीं। वे ब्रज भूमि के निवासियों की पूज्य थीं तथा समस्त संसार की प्रेमिका थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राधा के सेवाभाव का व्यापक रूप अंकित किया गया है।
  2. समास प्रधान संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

MP Board Solutions

[8] जैसा व्यापी विरह दुख था गोप गोपांगनाका।
वैसी ही थी सदै हृदया स्नेह की मूर्तिराधा।
जैसी मोहावरित ब्रज में तामसी रात आयी।
वैसी ही वे लसित उसमें कौमुदी के समा थी॥15॥

जो थी कौमार-व्रत निरता बालिकायें अनेकों।
वे भी पा के समय ब्रज में शान्ति विस्तारती थीं।
राधा के हृदय बल से दिव्य शिक्षा गुणों से।
वे भी छाया सृदृश उनकी वस्तुतः हो गई थीं॥16॥

शब्दार्थ :
सदै = दयामय; मोहावरित = मोह से जकड़ी; तामसी रात = महाकाली अंधेरी रात; निरता = संलग्न; विस्तारती = बढ़ाती; दिव्य = अलौकिक; छाया-सदृश = परछाईं के समान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राधा के स्नेहपूर्ण व्यापक सेवा भाव का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
जिस प्रकार की व्यापक विरह वेदना ग्वालों और ग्वालों की पत्नियों में थी, उसी प्रकार की दयामय हृदय वाली राधा साक्षात् स्नेह की प्रतिमा थीं। श्रीकृष्ण के ब्रज से चले जाने पर जिस प्रकार की मोह से जकड़ी महाकाली अन्धेरी रात ब्रज में आयी थी उसी तरह से वे (राधा) उस रात में चाँदनी के समान सुशोभित थीं अर्थात् श्रीकृष्ण के विरह से व्यथित ब्रजवासियों में वे सुख का संचार कर रही थीं।

जो कौमार्य व्रत में संलग्न अनेक बालिकाएँ थीं वे भी कुछ समय पाकर ब्रज में शान्ति का विकास करती थीं। राधा के हृदय में विद्यमान सद्भावनाओं के प्रभाव से और उनकी शिक्षा के अलौकिक गुणों के कारण वे उनकी परछाईं के समान हो गई थीं अर्थात् वे उनके हर कार्य में सहयोग करती थीं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सहृदय राधा के सेवा भाव की प्रभावशीलता का अंकन हुआ है।
  2. सामाजिक एवं सानुप्रासिक भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है।
  3. मन्दाक्रान्ता छन्द है। उपमा, अनुप्रास, रूपक अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है।

[9] तो भी आई न वह घटिका और न वे बार आये।
वैसी सच्ची सुखद ब्रज में वायु भी आ न डोली।
वैसे छाये न घन रस की सोत सी जो बहाते।
वैसे उन्माद कर-स्वर से कोकिला भी न बोली ॥17॥

जीते भूले न ब्रज महि के नित्य उकण्ठ प्राणी।
जी से प्यारे जलद तनको, केलि क्रीड़ादिकों को।
पीछे छाया विरह दुख की वंशजों-बीच व्यापी।
सच्ची यों है ब्रज अवनि में आज भी अंकिता है ॥18॥

सच्चे स्नेही अवनिजन के देश के श्याम जैसे।
गधा जैसी सद्य हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता।
हे विश्वात्मा ! भरत भुव के अंक में और आवें।
‘ऐसी व्यापी विरह घटना किन्तु कोई न होवे ॥19॥

शब्दार्थ :
घटिका = घड़ी, 24 मिनट का समय; सोत = स्रोत; महि = भूमि। जलद-तन = बादल के समान श्याम शरीर वाले, श्रीकृष्ण; विश्व प्रेमानुरक्ता = संसार भर से प्रेम करने वाली; भरत भुव = भारत भूमि; अंक = गोद।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सुखद क्रिया-कलापों का स्मरण करते हुए भारत भूमि पर राधा-कृष्ण के बार-बार अवतरण की कामना की गई है।

व्याख्या :
ब्रज में राधा की सेवा के प्रभाव स्वरूप पर्याप्त अच्छा वातावरण था किन्तु जो आनन्द श्रीकृष्ण के ब्रज में होने पर था वे घड़ी या दिन आये ही नहीं। श्रीकृष्ण के समय जैसी सच्चा सुख देने वाली वायु भी ब्रज में फिर नहीं बही। आनन्द का स्रोत सा बहाने वाले वैसे बादल भी फिर नहीं छाए और न उस प्रकार के मस्ती भरे स्वर में कोयल ही कुहकी।

नित्य प्रति श्रीकृष्ण पुनः मिलन की उत्कण्ठा से भरे रहने वाले ब्रजभूमि के निवासी प्राणों से प्यारे श्रीकृष्ण और उनके क्रीड़ा-विहार आदि से मिलने वाले आनन्द को जीते जी नहीं भूल पाए। श्रीकृष्ण के वियोग जनित दुःख ने उनके वंशजों को भी प्रभावित किया। वास्तविक सत्य यह है कि ब्रजभूमि में आज भी उस विरह का प्रभाव अंकित है।

कवि कामना करते हैं कि हे परमात्मा ! ब्रजभूमि के निवासियों के श्रीकृष्ण जैसे सच्चे प्रेमी और राधा जैसी दयालु सहृदया संसार भर को प्रेम करने वाली नारी इस भारत भूमि पर पुनः पुनः आयें, किन्तु इस प्रकार बुरी तरह प्रभावित करने वाली कोई विरह की घटना कभी न हो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. श्रीकृष्ण के संयोग काल के सुख और विरह काल के दुःख का स्मरण किया गया है।
  2. परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि श्रीकृष्ण जैसी विभूतियाँ पुनः-पुनः अवतरित हों किन्तु विरह का व्यापक कष्ट न दें।
  3. उपमा एवं अनुप्रास अलंकार तथा सामाजिक भाषा का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  4. मन्दाक्रान्ता छन्द है।

MP Board Solutions

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2

विविधा-2 अभ्यास

विविधा-2 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि के लिए कब तक विराम नहीं है?
उत्तर:
कवि को जीवन की अन्तिम साँस तक विराम नहीं है।

प्रश्न 2.
जीवन को अपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर:
मानव जीवन में कोई न कोई अभाव रहता ही है। इसलिए जीवन को अपूर्ण कहा गया है।

प्रश्न 3.
कजरी कब गाई जाती है?
उत्तर:
कजरी वर्षा ऋतु में गाई जाती है।

प्रश्न 4.
बादलों से मिलने के लिए कौन-कौन से प्राणी आतुर रहते हैं?
उत्तर:
बादलों से मिलने के लिए मानव, कोयल, मयूर, दादुर आदि समस्त प्राणीमात्र आतुर रहते हैं।

MP Board Solutions

विविधा-2 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘विशद विश्व प्रवाह में बहने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
मानव इस विशाल संसार में जन्म लेता है। वह यहाँ के रहन-सहन, चाल-चलन, कार्य-व्यवहार आदि के क्रम में बचपन से ही सक्रिय होने लगता है। धीरे-धीरे वह इस जगत में पूरी तरह फंस जाता है। वह अन्यान्य कार्य अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर करता है, जिनमें उसे विभिन्न प्रकार की स्थितियों से गुजरना पड़ता है। कार्य में सफलता मिलते जाने पर उसे सुख होता है और जब काम में बाधाएँ आती हैं तो वह दुखी होता है। यह सुख-दुःख की अनुभूति करते हुए हर मानव जीवनयापन करता है। यही इस विशद संसार के प्रवाह का आशय है।

प्रश्न 2.
सफलता प्राप्त करने का मूल मंत्र क्या है? (2011)
उत्तर:
संसार में अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य प्रयास करता है। उसे विविध बाधाओं को पार करना पड़ता है। कुछ व्यक्ति बाधाएँ आने पर निराश हो जाते हैं, और कार्य को त्याग देते हैं। किन्तु कुछ ऐसे होते हैं जो अन्यान्य संकटों का सामना करते हैं उन संकटों से छुटकारा पाते हैं और लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। अन्त में सफलता उन्हीं को मिलती है जो निरन्तर चलते ही रहते हैं। जो रुक जाते हैं वे असफल रहते हैं। अतः सफलता प्राप्त करने का मूल मंत्र निरन्तर काम करते रहना है।

प्रश्न 3.
कवि मेघों से पृथ्वी पर उतरने के लिए आह्वान क्यों कर रहा है? (2008)
उत्तर:
कवि आकाश की चोटियों पर विराजमान बादलों से धरती पर उतरने का आह्वान इसलिए करता है कि वे जीवन की प्रत्येक राह से जल की धारा बहाकर जीवन के प्रवाह को जीवंत बना दें। वे गागर से लेकर सागर तक को पानी से सराबोर कर दें। वर्षा आने से पुरवाई हवा का मान बढ़ेगा तथा उल्लास से भर कर लोग कजरी की तान छेड़ेंगे। आकाश में बादलों के छा जाने से काम नहीं चलता। जब वे जल वर्षा करते हैं, तभी जीवन में आनन्द का संचार होता है। इसीलिए कवि मेघों से पृथ्वी पर उतरने के लिए आह्वान करता है।

प्रश्न 4.
‘कवि ने सूरज के रथ को धीमा-धीमा’ क्यों बताया है? (2014, 16)
उत्तर:
यह सत्य है कि सूर्य अपने रथ पर सवार होकर निरन्तर गतिमान रहता है। किन्तु जब वर्षा ऋतु में आकाश में बादल छाए रहते हैं तब वह ढक जाता है तथा दिखाई नहीं पड़ता है। उसका तीव्र ताप भी कम हो जाता है। जब तेज हवा चलती है तो आकाश में बादल भी बड़ी तेजी से दौड़ते हैं। उनकी तेज गति की तुलना से सूर्य की गति बहुत धीमी प्रतीत होती है। इसीलिए कवि ने तीव्र गति वाले बादलों का हौसला बढ़ाते हुए शीघ्र पृथ्वी पर जल वर्षा करने का आग्रह किया है।

विविधा-2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘गति-मति न हो अवरुद्ध’ इसके लिए कवि ने क्या-क्या प्रयास किए हैं?
उत्तर:
कवि मानते हैं कि मनुष्य का काम निरन्तर सफलता की ओर चलते रहना है। संभव है मार्ग में बाधाएँ आएँ, चलते हुए कभी कुछ मिल सकता तो कभी कुछ गँवाना भी पड़ सकता है। सफलता-असफलता के फलस्वरूप आशा-निराशा के भाव भी हो सकते हैं। परन्तु सुख-दुःखात्मक स्थितियों में मनुष्य को अपने बढ़ते कदम नहीं रोकने चाहिए और न अपने चिन्तन को सही बात सोचने से हटाना चाहिए। जीवन नाम चलते रहना है। यदि गति और मति अवरुद्ध हो जाएगी, तो मानव मृतवत् हो जाएगा। चलते रहने पर यह निश्चित है कि सही प्रयास रहे तो एक न एक दिन अवश्य सफलता मिलेगी। इसलिए कवि हर स्थिति में गति-मति को सचल रखने हेतु प्रयासरत हैं। वे हर प्रकार का सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि मानव जीवन पथ पर निरन्तर बढ़ता ही रहे।

प्रश्न 2.
‘चलना हमारा काम है’ कविता के मूलभाव का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। (2008, 09, 13)
अथवा
‘चलना हमारा काम है।’ शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की इस कविता के मूलभाव का चार बिन्दुओं में विस्तार कीजिए। (2012)
उत्तर:
इसका उत्तर ‘चलना हमारा काम है’ कविता के भाव-सारांश से पढ़िए।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
कवि बादलों को हँसते-गाते आने के लिए क्यों कहता है? (2009)
उत्तर:
वर्षा जनमानस में हर्ष और उल्लास का भाव पैदा करती है। मनुष्य ही नहीं जानवर, पक्षी, वनस्पतियों में भी एक स्फूर्ति की लहर वर्षा से दौड़ जाती है। वर्षा में बड़े-छोटे, ऊँच-नीच, धनी-निर्धन का भेद भी नहीं होता है। वह तो गागर से लेकर सागर तक को जल से सराबोर कर देती है। यह तभी सम्भव है जब बादल हँसते-गाते, उल्लास भरे होकर वर्षा करें। छुट-पुट वर्षा से काम नहीं चलेगा। बादल प्रसन्न होकर झूम के बरसेंगे, तभी आनन्द का भाव व्याप्त होगा। इसीलिए कवि बादलों को हँसते-गाते अठखेलियाँ करते हुए आने तथा मुक्त भाव से वर्षा करने की आग्रह करते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) ऊँची नीची जीवन घाटी ……………..”बाहों में।
(आ) आओ तुम ……………..अफवाहों में।
(इ) जीवन अपूर्ण ………………काम है।
(ई) मैं पूर्णतः ………………..काम है।
उत्तर:
(अ) शब्दार्थ :
अम्बर = आकाश; शिखरों = चोटियों; जीवन = जल, जिन्दगी; राहों = रास्तों; प्रतिध्वनि = अनुगूंज।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘विविधा-2’ पाठ के ‘बरसो रे’ गीत से अवतरित है। इसके रचयिता वीरेन्द्र मिश्र हैं।

प्रसंग :
भावों के कुशल चितेरे वीरेन्द्र मिश्र ने आकाश में छाए बादलों से बिना भेदभाव के सर्वत्र वर्षा करने का आग्रह किया है।

व्याख्या :
बादलों को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादल ! तुम जगत भर में जल की वर्षा कर दो। तुम आकाश की चोटियों से उतरकर मानव-जीवन के रास्तों पर उतरकर तीव्र वर्षा कर दो। जीवन की विकट-गहन, ऊँची-नीची घाटियों से तथा धरती की मिट्टी से यही अनुगूंज आ रही है कि तुम बिना भेदभाव के गागर से लेकर सागर तक को जल से परिपूर्ण कर दो अर्थात् सभी के प्रति समान व्यवहार करते हुए जीवन का दान करके हर्ष व्याप्त कर दो।

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में बादलों के घिरने तथा वर्षा की मदमस्त फुहारों के मध्य गाये जाने वाले गीतों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
वर्षा होते ही जो उल्लासमय वातावरण हो जाता है उसकी ओर इंगित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादलो! तुम वर्षा कर दो ताकि आनन्दोल्लास के गीत कजरी की तान छिड़ जाय। तुम्हारे वर्षा के जल से वाणी की मधुरता का वरदान मिल जायेगा अर्थात् मधुर स्वर में कजरी गीतों का गायन प्रारम्भ हो जायेगा। हे बादलो! अभी कल तक तो तुम घिर करके आकाश में चारों ओर छाए हुए थे और कुछ दिन पूर्व तो तुम वर्षा आई-वर्षा आई; इस प्रकार अफवाहों में आये थे अर्थात् तुम्हारे आने की चर्चा आकाश में आच्छादित होने से ही होने लगी थी। किन्तु आज तुम वास्तव में वर्षा कर दो ताकि वह अफवाह सत्य सिद्ध हो जाय।

(इ) शब्दार्थ :
अपूर्ण = अधूरा; अवरुद्ध = बाधित, रुके आठों याम= हर समय (दिन और रात दोनों आठ याम (प्रहर) के होते हैं)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि व्यक्ति अधूरा जीवन जीते हुए कभी कुछ प्राप्त कर लेता है, तो कभी कुछ खो भी देता है।

व्याख्या :
मानव के अधूरे जीवन की पूर्णता के प्रयास में कभी कुछ मिल जाता है तो कभी कुछ खो भी जाता है अर्थात् इस जीवन में लाभ-हानि, उत्थान-पतन, ऊँच-नीच चलती ही रहती है। इसी के अनुसार आशा-निराशा के भाव जगते ही रहते हैं। सफलता से आशा और असफलता से कुछ निराशा होती ही है। फलस्वरूप व्यक्ति हँसता-रोता हुआ जीवन पथ पर चलता ही जाता है। उसका ध्यान दिन-रात इस बात पर रहता है कि उसके जीवन की चाल कहीं बाधित न हो जाय। क्योंकि व्यक्ति का काम निरन्तर चलते रहना ही है।

(ई) शब्दार्थ :
दर-दर = द्वार-द्वार; पग = कदम; रोड़ा अटकता = बाधा आती रही; निराश = हताश।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन में आने वाली बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए।

व्याख्या :
मनुष्य जीवन में समग्र सफलता पाने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयास करता है। उसे द्वार-द्वार चक्कर काटने पड़ते हैं। जहाँ भी वहे प्रयास करता है वहाँ कुछ न कुछ बाधाएँ भी आती रहती हैं। व्यक्ति को उन बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए। आशा-निराशा तो जीवन में अपरिहार्य हैं। उनसे डरकर रुकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जीवन पथ पर चलते रहना ही व्यक्ति का कार्य है।

विविधा-2 काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिएसागर, आकाश, सूर्य, पानी, बादल, हाथी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2 img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिएछाँह, बरखा, नैया, माटी, बानी, अचम्भा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 10 विविधा-2 img-2

बरसो रे भाव सारांश

वर्तमान हिन्दी कविता को नवीन संवेदनाएँ प्रदान करने वाले गीतकार वीरेन्द्र मिश्र के गीतों ने विशेष पहचान बनाई है। ‘बरसो रे’ गीत में कवि ने वर्षा ऋतु के बादलों का आह्वान किया है। गीत आधुनिक जीवन के संदर्भ को भी व्यंजित करता है। कवि बादलों से वर्षा करने का आग्रह करते हुए कहते हैं कि तुम आकाश के शिखरों से उतरकर जगत की राहों में जल वर्षा कर जीवंतता का संचार कर दो। जीवन की ऊँची-नीची घाटियों से धरती के कोने-कोने से आवाज आ रही है कि तुम अपनी गागर से सागर के समान जल वर्षा कर गागर से सागर तक परिपूर्ण जल व्याप्त कर दो।

हे बादलो! तुम हँसते-गाते हुए खुशी से मदमस्त होकर आओ और मिलने को आतुर धरती की बाहों में समा जाओ। तुम्हारे आने से पुरवाई की मानवृद्धि होगी तथा आनन्द व्याप्त करने वाली कजरी की तान छिड़ जायेगी। तुम सघन रूप से आकाश में छा जाओगे तो सूर्य का रथ भी धीमा प्रतीत होगा और मन में विविध कल्पनाएँ उमड़ पड़ेंगी। तुम आम के बागों को वर्षा की बौछारों से जलमग्न कर दो ताकि वनस्पतियों में जीवंतता आ जाए। कल जब तुम आकाश में छाए हुए थे तो वर्षा के आगमन की अफवाहें प्रारम्भ हो गयी थीं। किन्तु आज तुम वर्षा करके जीवन में हर्ष व्याप्त कर दो।

MP Board Solutions

बरसो रे संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] बरसो रे, बरसो रे, बरसो रे,
अम्बर के शिखरों से उतरो रे
जीवन देने राहों में
ऊँची नीची जीवन घाटी से
प्रतिध्वनियाँ आती हैं माटी से
गागर से सागर दुलकाओ, धन! (2012)

शब्दार्थ :
अम्बर = आकाश; शिखरों = चोटियों; जीवन = जल, जिन्दगी; राहों = रास्तों; प्रतिध्वनि = अनुगूंज।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘विविधा-2’ पाठ के ‘बरसो रे’ गीत से अवतरित है। इसके रचयिता वीरेन्द्र मिश्र हैं।

प्रसंग :
भावों के कुशल चितेरे वीरेन्द्र मिश्र ने आकाश में छाए बादलों से बिना भेदभाव के सर्वत्र वर्षा करने का आग्रह किया है।

व्याख्या :
बादलों को सम्बोधित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादल ! तुम जगत भर में जल की वर्षा कर दो। तुम आकाश की चोटियों से उतरकर मानव-जीवन के रास्तों पर उतरकर तीव्र वर्षा कर दो। जीवन की विकट-गहन, ऊँची-नीची घाटियों से तथा धरती की मिट्टी से यही अनुगूंज आ रही है कि तुम बिना भेदभाव के गागर से लेकर सागर तक को जल से परिपूर्ण कर दो अर्थात् सभी के प्रति समान व्यवहार करते हुए जीवन का दान करके हर्ष व्याप्त कर दो।

काव्य सौन्दर्य :

  1. वर्षा ऋतु के बादलों से बरसने का आग्रह किया गया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. शुद्ध-साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

[2] अब तो हँसते गाते आओ, घन।
इन मिलनातुर बाहों में
पुरवैया नैया के पालों में
नभ के नारंगी रुमालों में
सूरज का रथ धीमा धीमा है।
सपनों की क्या कोई सीमा है
अमराई की छाँओ में।

शब्दार्थ :
मिलनातुर = मिलने के लिए बैचेन; नैया = नाव; पाल = नाव के मस्तूल के सहारे ताना जाने वाला एक कपड़ा जिसमें हवा भरने पर नाव चलती है; नभ = आकाश; अमराई = आम का बाग, उद्यान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में वर्षा ऋतु के बादलों से मुस्कराते हुए वर्षा करने के लिए आने का आग्रह किया गया है।

व्याख्या :
कवि बादलों को आमन्त्रित करते हुए कहते हैं कि हे बादलो ! तुम अब मुस्कराते और गायन करते हुए मिलन के लिए बेचैन धरती की इन बाँहों में आ जाओ, तुम पुरवाई पवन के पालों में आकर सम्मान बढ़ा दो तथा आकाश में रंगीन रुमालों (बदलियों) के रूप में छा जाओ। तुम्हारी गति इतनी तीव्र है कि सूर्य का रथ भी धीमा हो गया है। पुरवाई हवा के तेज झोंकों से बादल इतनी तीव्र गति से उड़ रहे हैं तथा सूर्य को ढक रहे हैं तो ऐसा लगता है कि सूर्य के रथ की गति धीमी हो गयी है। बादलों से होने वाली वर्षा के वातावरण में जो कल्पनाएँ उठती हैं, उनकी कोई सीमा नहीं है अर्थात् नाना प्रकार के मनोरम स्वप्न इस समय जागते हैं। इसलिए हे बादल! तुम आम के बागों की छाया में वर्षा करने आ जाओ ताकि वनस्पतियों को जल रूपी जीवन मिल जाए।

काव्य सौन्दर्य :

  1. आनन्द व्याप्त करने वाले बादलों से हर्षपूर्वक बरसने को कहा गया है।
  2. रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार। शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[3] आओ तुम कजरी को स्वर देने
वाणी को पानी के वर देने।
कल तक तुम घिर-घिर कर छाए थे
कल तक तो तुम केवल आए थे।
बरखा की अफवाहों में।

शब्दार्थ :
कजरी वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला गीत; वर = वरदान; बरखा = वर्षा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में बादलों के घिरने तथा वर्षा की मदमस्त फुहारों के मध्य गाये जाने वाले गीतों का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
वर्षा होते ही जो उल्लासमय वातावरण हो जाता है उसकी ओर इंगित करते हुए कवि कहते हैं कि हे बादलो! तुम वर्षा कर दो ताकि आनन्दोल्लास के गीत कजरी की तान छिड़ जाय। तुम्हारे वर्षा के जल से वाणी की मधुरता का वरदान मिल जायेगा अर्थात् मधुर स्वर में कजरी गीतों का गायन प्रारम्भ हो जायेगा। हे बादलो! अभी कल तक तो तुम घिर करके आकाश में चारों ओर छाए हुए थे और कुछ दिन पूर्व तो तुम वर्षा आई-वर्षा आई; इस प्रकार अफवाहों में आये थे अर्थात् तुम्हारे आने की चर्चा आकाश में आच्छादित होने से ही होने लगी थी। किन्तु आज तुम वास्तव में वर्षा कर दो ताकि वह अफवाह सत्य सिद्ध हो जाय।

काव्य सौन्दर्य :

  1. उल्लास फैलाने वाली वर्षा के आगमन से पूर्व की उत्सुकता का वर्णन हुआ है।
  2. वर्षा काल में कजरी गीत गाये जाते हैं।
  3. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा दर्शनीय है।
  4. भावानुरूप भाषा का प्रयोग हुआ है।

चलना हमारा काम है भाव सारांश

अथक ऊर्जा, तेज और प्रेरणा के कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ द्वारा रचित ‘चलना हमारा काम है’ कविता मानव को जीवन पथ पर गतिशील रहने के प्रति सचेष्ट करती है। जब जीवन का विस्तृत विकास मार्ग खुला पड़ा है और मेरे पग अपार शक्ति तथा गति से परिपूर्ण हैं, तो मुझे लक्ष्य प्राप्ति तक विश्राम नहीं करना है। सांसारिक सम्पर्कों में कुछ कहना-सुनना होने से परस्पर का दुःख-सुख बँट जाता है और मन हल्का हो जाता है। साथ ही जीवन भी सरल बन जाता है। जब जीवन पथ पर बढ़ते हैं तो सफलता-असफलता जन्य सुख-दुःख, आशा-निराशा का आना स्वाभाविक है। उसको हँसते-रोते हुए पार करके आगे चलते रहना ही मानव का मन्तव्य होना चाहिए। उसे हर पल आगे बढ़ने के प्रति जागरूक रहना चाहिए।

संसार के इस विशाल प्रवाह में सभी को किसी न किसी रूप में सुख-दुःख तो सहने ही होते हैं, इसको भाग्य का दोष या गुण मानना संगत नहीं है। जब मनुष्य लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास करता है तो बाधाओं का आना भी निश्चित है। किन्तु इन बाधाओं से विचलित होने की आवश्यकता नहीं क्योंकि इन बाधाओं को पार करते हुए आगे का मार्ग प्रशस्त करना ही जीवन है। संसार में बढ़ते हुए अन्यान्य साथी मिलते हैं, उनमें से कुछ छूट जाते हैं और कुछ चलते रहते हैं। जो सतत् गतिशील रहते हैं, उनको सफलता का मिलना निश्चित है। लक्ष्य के प्रति सजग रहकर हर स्थिति में चलते रहना ही मानव की जीवन्तता का लक्षण है। इसलिए उसकी गति कभी भी अवरुद्ध नहीं होने देनी चाहिए।

MP Board Solutions

चलना हमारा काम है संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है। (2015, 16)

शब्दार्थ :
गति = चाल; प्रबल = तीव्र; दर-दर = द्वार-द्वार; मंजिल = लक्ष्य; विराम = आगम, रुकना।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित विविधा-2′ के ‘चलना हमारा काम है’ कविता से अवतरित है। इसके रचयिता शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हैं।

प्रसंग :
यहाँ कवि ने प्रेरित किया है कि क्षमता के रहते हुए व्यक्ति को लक्ष्य की ओर अविराम कदम बढ़ाने चाहिए।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि मेरे कदमों में चलने की तीव्र सामर्थ्य भरी हुई है इसलिए मैं द्वार-द्वार पर क्यों रुककर खड़ा रहूँ। जब आज मेरे सामने बहुत बड़ा प्रगति का मार्ग खुला पड़ा है तब मुझे खड़ा होने की क्या आवश्यकता है। मैं जब तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचता हूँ, तब तक मुझे रुकना स्वीकार नहीं है। क्योंकि हमारा वास्तविक कार्य तो जीवन में गतिशील रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत् सचेष्ट रहने की प्रेरणा दी गई है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है।
  3. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है।

[2] कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ तुम मिल गए
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है। (2010)

शब्दार्थ :
बोझ = भार; राह = मार्ग; राही = राहगीर, पंथी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि हिल-मिलकर चलने से जीवन की राह बड़ी सरलता से कट जाती है।

व्याख्या :
संसार में जीवन की राह पर जब साथ-साथ चलते हैं तो कुछ कहन-सुनन होना स्वाभाविक है। आपस में दुःख-दर्द की बातें कहने-सुनने से मानव के हृदय का भार तो कम हो ही जाता है। यह भी अच्छा रहा कि साथी मिल जाने से बातों ही बातों में जीवन का कुछ रास्ता कट गया। अब मैं अपने नाम आदि का क्या परिचय बताऊँ वास्तव में तो हम सभी इस जीवन पथ के पंथी हैं क्योंकि हमारा काम चलते रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. साथी से दुःख-दर्द बाँटकर जीवन की राह कुछ सहज कट जाती है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री का सुन्दर संयोग देखा जा सकता है।
  3. सरल, सुबोध तथा साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[3] जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी,
आशा निराशा से घिरा
हँसता कभी रोता कभी,
गति मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
अपूर्ण = अधूरा; अवरुद्ध = बाधित, रुके आठों याम= हर समय (दिन और रात दोनों आठ याम (प्रहर) के होते हैं)।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि व्यक्ति अधूरा जीवन जीते हुए कभी कुछ प्राप्त कर लेता है, तो कभी कुछ खो भी देता है।

व्याख्या :
मानव के अधूरे जीवन की पूर्णता के प्रयास में कभी कुछ मिल जाता है तो कभी कुछ खो भी जाता है अर्थात् इस जीवन में लाभ-हानि, उत्थान-पतन, ऊँच-नीच चलती ही रहती है। इसी के अनुसार आशा-निराशा के भाव जगते ही रहते हैं। सफलता से आशा और असफलता से कुछ निराशा होती ही है। फलस्वरूप व्यक्ति हँसता-रोता हुआ जीवन पथ पर चलता ही जाता है। उसका ध्यान दिन-रात इस बात पर रहता है कि उसके जीवन की चाल कहीं बाधित न हो जाय। क्योंकि व्यक्ति का काम निरन्तर चलते रहना ही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. सुख-दुःखमय जीवन की गति निरन्तर सचल रहनी चाहिए।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार।
  3. शुद्ध, साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

[4] इस विशद विश्व प्रवाह में
किसको नहीं बहना पड़ा,
सुख दुःख हमारी ही तरह
किसको नहीं सहना पड़ा,
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है। (2009)

शब्दार्थ :
विशद विशाल; विश्व-प्रवाह संसार का श्रम; व्यर्थ = बेकार, अनावश्यक रूप से; विधाता = भाग्य, ब्रह्मा; वाम = विपरीत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि संसार में सुख-दुःख तो सभी को सहने होते हैं। उनका बखान करना अनावश्यक है।

व्याख्या :
ऐसा कौन है जिसे संसार के इस विशाल क्रम की धारा में प्रवाहित न होना पड़ा हो अर्थात् सभी को इस संसार रूपी सरिता में बहना ही पड़ता है। संसार में सभी को जीवन में सुख और दुःख सहन करने ही पड़ते हैं। इनसे कोई नहीं बच पाता है। फिर दुःख आने पर यह कहना अनावश्यक है कि भाग्य मेरे विपरीत है। हमें तो दुःख की चिन्ता छोड़कर जीवन की राह पर चलते रहना चाहिए क्योंकि चलना ही हमारा कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. दु:ख आने पर भाग्य को दोष देना उचित नहीं है।
  2. सुख-दुःख तो आते-जाते ही रहते हैं।
  3. रूपक, अनुप्रास अलंकार।
  4. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[5] मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
दर-दर = द्वार-द्वार; पग = कदम; रोड़ा अटकता = बाधा आती रही; निराश = हताश।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन में आने वाली बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए।

व्याख्या :
मनुष्य जीवन में समग्र सफलता पाने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयास करता है। उसे द्वार-द्वार चक्कर काटने पड़ते हैं। जहाँ भी वहे प्रयास करता है वहाँ कुछ न कुछ बाधाएँ भी आती रहती हैं। व्यक्ति को उन बाधाओं से निराश नहीं होना चाहिए। आशा-निराशा तो जीवन में अपरिहार्य हैं। उनसे डरकर रुकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जीवन पथ पर चलते रहना ही व्यक्ति का कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन पथ में आने वाली बाधाओं से निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री।
  3. शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है।

[6] कुछ साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
पर गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए,
चलता रहे हमदम, उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ :
फिर गए = वापस लौट गए; हमदम = साथी; अभिराम = सुन्दर, श्रेष्ठ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि जीवन के क्रम में कुछ साथ चलते रहते हैं, कुछ छूट जीते हैं किन्तु जो चलता रहता है उसे सफलता अवश्य मिलती है।

व्याख्या :
इस जीवन की राह के कुछ साथी तो साथ चलते ही रहे परन्तु कुछ मध्य मार्ग से ही लौट गये; किन्तु जीवन की चाल में ठहराव नहीं आया। वह तो चलता ही रहा, जो लौट गये सौ लौट गये। किन्तु जो साथी अथक रूप से निरन्तर साथ चलते रहते हैं, उन्हें श्रेष्ठ सफलता प्राप्त होती है। अतः मानव को निरन्तर चलते ही रहना चाहिए क्योंकि चलना ही हमारा कार्य है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन में श्रेष्ठ सफलता उसे मिलती है जो निरन्तर चलता ही रहता है।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार।
  3. सरल सुबोध तथा भाव के अनुरूप भाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 9 विविधा-1

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 9 विविधा-1

विविधा-1 अभ्यास

विविधा-1 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कौआ और कोयल में क्या समानता है?
उत्तर:
कौआ और कोयल दोनों में काले रंग की समानता है।

प्रश्न 2.
‘घर अन्धेरा’ से कवि का संकेत किस ओर है?
उत्तर:
‘घर अन्धेरा’ से कवि का संकेत है कि घर में निर्धनता जनित दुःखों का अन्धकार छाया है।

प्रश्न 3.
‘यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे बसते हैं।’ से कवि क्या कहना चाहते हैं? (2010)
उत्तर:
‘यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे बसते हैं।’ से कवि कहना चाहता है समाज इतना संवेदनहीन हो गया है कि किसी के दुःख-दर्द में न बोलना चाहता है और न सुनना चाहता है।

प्रश्न 4.
कवियों ने किसकी बोली का बखान किया है?
उत्तर:
कवियों ने मधुर स्वर वाली कोयल का बखान किया है।

MP Board Solutions

विविधा-1 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केले के पौधे को देखकर कवि को क्या अचम्भा होता है? (2016)
उत्तर:
दीनदयाल गिरि कवि को यह अचम्भा होता है कि रंभा मात्र एक जन्म के लिए रूप के गर्व से भर कर झूमती फिरती है। एक जीवन बहुत छोटा होता है, उसमें भी रूप का चमत्कार यौवन में ही रहता है। इस प्रकार यह बहुत अस्थायी तथा अल्पकालिक है। कवि मानते हैं कि रूप, धन आदि तो आते-जाते रहते हैं, ये स्थिर नहीं है। अतः इनके कारण व्यक्ति को गर्व नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 2.
‘यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।’ का आशय लिखिए।
उत्तर:
कवि दुष्यन्त कुमार ने संघर्ष भरे जीवन की यातनाओं को सटीक अभिव्यक्ति दी है। ‘यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।’ के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं कि निर्धनता और निर्बलता के दीन-हीन जीवन में दिन-रात यातनाएँ ही भरी रहती हैं। निर्धन का जीवन कष्टों के अन्धेरे में घिरा रहता है, क्योंकि यह पंक्ति रात्रि के बारह बजे के सन्दर्भ में कही है। अत: आशय यह है कि रात में नींद में आने वाले स्वप्नों में भी यातनाओं के मध्य से गुजरना होता है अर्थात् स्वप्न भी दुःख भरे ही आते हैं।

प्रश्न 3.
‘मिट्टी का भी घर होता है।’ इसका क्या अर्थ है? (2014)
उत्तर:
सामान्यतः घर ईंट, सीमेंट, चूना आदि से बनाये जाते हैं किन्तु अति निर्धन वर्ग मिट्टी के घर बनाकर रहता है। यद्यपि यह घर इतना मजबूत और टिकाऊ नहीं होता है जितना ईंट-सीमेंट का बना घर किन्तु घर तो होता ही है। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में एक घर का स्वप्न देखता है। निर्धनता के कारण वह अच्छा नहीं बना सकता है, तो घरौंदा ही सही रहने का सहारा तो होता ही है।

प्रश्न 4.
कौआ और कोयल का भेद कब ज्ञात होता है? (2017)
उत्तर:
सामान्यतः रंग, आकार, प्रकार की दृष्टि से कौआ और कोयल समान प्रकार के प्रतीत होते हैं। इनमें इतनी समानता होती है कि यदि कौआ कोयलों के बीच बैठ जाय तो उसे पहचानना कठिन होगा। दोनों का रंग काला होता है। बनावट, पंख आदि भी एक ही तरह के होते हैं किन्तु जब बोलते हैं तो दोनों का भेद स्पष्ट पता लग जाता है। कोयल की पीऊ-पीऊ बड़ी मधुर और कर्णप्रिय होती है, जबकि कौए की काँऊ-काँऊ बड़ी तीखी और कर्ण कट होती है।

विविधा-1 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुष्यन्त कुमार की गजलों के आधार पर कवि के विचार अधिकतम तीन बिन्दुओं में व्यक्त करें। (2012)
अथवा
“दुष्यन्त कुमार की गजलें आम आदमी की पीड़ा को जनमानस तक पहुँचाने में सफल हुई हैं।” विवेचना कीजिए। (2008, 09)
उत्तर:
इसके उत्तर के लिए ‘दुष्यन्त की गजलें’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

प्रश्न 2.
दीनदयाल गिरि की कुण्डलियों का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
इसके उत्तर के लिए ‘कुण्डलियाँ’ शीर्षक का सारांश पढ़िए।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए
(अ) करनी विधि …………….. अधीने।
(आ) वायस …………… बखानी।
(इ) कोई रहने …………….. घर होता है।
(ई) वे सहारे …………… प्यारे न देख।
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में भाग्य के विधान की महिमा को उजागर किया गया है।

व्याख्या :
दीनदयाल कवि कहते हैं कि देखिए, ब्रह्मा के द्वारा रचित भाग्य के कार्य बड़े अद्भुत हैं, उनका वर्णन करना सम्भव नहीं है। हिरणी के बड़े सुन्दर नेत्र होते हैं, वह बड़ी आकर्षक होती है फिर भी वह दिन-रात जंगलों में मारी-मारी फिरती है। वह वन में रहते हुए अनेक बच्चों को जन्म देती है। दूसरी ओर कोयल काले रंग वाली होती है फिर भी सारे कौए उसके वशीभूत होते हैं। कवि बताते हैं कि दिनों की टेक को देखकर धैर्य धारण करना चाहिए। भाग्य के विधान से प्रिय के मध्य रहते हुए भी विरह की अवस्था बनी रहती है। भाग्य बहुत बलवान होता है।

(आ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि नीच व्यक्ति भले ही सज्जनों के मध्य पहुँच जाय किन्तु वह अपने नीच स्वभाव को नहीं छोड़ता है।

व्याख्या :
कवि दीनदयाल कहते हैं कि हे कौए ! तू कोयलों के बीच बैठकर स्वयं पर क्यों गर्व करता है। वंश के स्वभाव से तुम्हारे बोलते ही पहचान हो जाएगी कि तुम मृदुभाषी कोयल नहीं, कौए हो। तुम्हारी वाणी तीखी, कर्ण कटु है जबकि जिनके बीच तुम बैठे हो वे कोयल पंचम स्वर में बड़ी मधुर ध्वनि करती हैं जिसकी प्रशंसा बड़े-बड़े कवियों ने की है। कवि स्पष्ट करते हैं ‘कि कौए के सामने कोई दूध की बनी स्वादिष्ट खीर ही क्यों न परोस दे, पर स्वभाव से नीच ये कौए उसे छोड़कर गन्दी चीजें खाये बिना नहीं मानेंगे। आशय यह है कि नीच स्वभाव का व्यक्ति अपनी स्वाभाविक नीचता को नहीं छोड़ पाता है।

(इ) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इन गजलों में यथार्थ जीवन की यातनाओं का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
दिन तो सांसारिक संघर्ष में कटता ही है किन्तु रात भी कष्ट में ही गुजरती है। नित्य प्रति जब रात को बारह बजने के घण्टे बजते हैं। उस समय भी व्यक्ति कष्टों के अन्धकार से गुजर रहा होता है अर्थात् रात में आने वाले स्वप्न भी उसे यातनाएँ ही देते हैं।

मेरे जीवन के जो स्वप्न हैं उनके लिए इस संसार में नया कोई स्थान उपलब्ध है क्या? अर्थात् कोई जगह नहीं है। इसलिए स्वप्नों के लिए घरौंदा ही ठीक है। चाहे वह मिट्टी का ही सही, घर तो है।

जीवन की यातनाओं ने ये हालत कर दी है कि कभी सिर से लेकर छाती तक, कभी पेट से लेकर पाँव तक पीड़ा होती है और वास्तविकता यह है कि एक जगह होता हो तो बताया जाय कि इस स्थान पर दर्द होता है। नीचे से ऊपर तक बाहर से भीतर तक, सब जगह दर्द ही दर्द है।

(ई) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में व्यक्ति को संघर्षशील संसार में अकेले ही सामना करने के लिए प्रेरित किया गया है।

व्याख्या :
कवि व्यक्ति को हिम्मत बँधाते हुए कहते हैं कि अब तक जिन सहारों से इस जगत का सामना कर रहे थे, अब वे भी नहीं रहे हैं। अब तो तुम्हें स्वयं के बल पर जीवन का युद्ध लड़ना है। जो हाथ कट चुके हैं अर्थात् जो सम्बन्ध समाप्त हो चुके हैं अब उन सहारों के सहयोग की अपेक्षा करना व्यर्थ है। अब तो अपने आप ही परिस्थितियों का सामना करना होगा।

संघर्षशील जीवन में मनोरंजन भी आवश्यक है किन्तु इतना मनोरंजन नहीं कि कठोर जगत को भूल कल्पना की उड़ानें भरनी प्रारम्भ कर दी जायें। विकास के लिए भविष्य के स्वप्न देखना आवश्यक है, किन्तु इतने प्यारे स्वप्न नहीं कि उन्हीं में डूबकर रह जायें। स्वप्न को साकार करने के लिए प्रत्यक्ष यथार्थ का सामना करने की क्षमता भी आवश्यक है।

विविधा-1 काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिएकोयल, कौआ, मोर, बादल।
उत्तर:
कोयल – पिक, कोकिला
कौआ – काक, वायस
मोर – मयूर, केकी
बादल – मेघ, जलद।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए
हकीकत, खौफ, इजाजत, सफर, जिस्म, जलसा।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 9 विविधा-1 img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित मुहावरों और लोकोक्तियों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
गागर में सागर भरना, का वर्षा जब कृषि सुखाने, टेढ़ी खीर होना, ऊँट के मुँह में जीरा, दाँत खट्टे करना, अधजल गगरी छलकत जाय।
उत्तर:
गागर में सागर भरना – बिहारी ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया है।
का वर्षा जब कृषि सुखाने – मरीज की मृत्यु हो गई तब डॉक्टर आने लगा, तो घर वालों ने कह दिया का वर्षा जब कृषि सुखाने।
टेढ़ी खीर होना – पाकिस्तान के अड़ियल रवैये के कारण कश्मीर समस्या को हल करना टेढ़ी खीर हो गया है।
ऊँट के मुँह में जीरा – दारासिंह के लिए दो सौ ग्राम दूध ऊँट के मुँह में जीरे की तरह है।
दाँत खट्टे करना – 1962 के युद्ध में भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सैनिकों के दाँत खट्टे कर दिये थे।
अधजल गगरी छलकत जाय – राजेश शहर से पढ़कर गाँव में आया तो बड़ी-बड़ी बातें करने लगा। उसकी बातों को सुनकर एक वृद्ध ने कह ही दिया कि अधजल गगरी छलकत जाय।

प्रश्न 4.
‘कुण्डलियाँ’ छन्द किन मात्रिक छन्दों के योग से बनता है? उदाहरण देकर समझाइये।
उत्तर:
कुण्डलियाँ’ छन्द दोहा और रोला मात्रिक छन्दों के योग से बनता है।
करनी विधि की देखिये, अहो न बरनी जाति।
हरनी के नीके नयन बसै बिपिन दिन राति।।
बसै बिपिन दिनराति, बराबर बरही कीने। कारी
छवि कलकंठ किये फिर काक अधीने।।
बरनै दीनदयाल धीर धरते दिन धरनी।
बल्लभ बीच वियोग, विलोकहु विधि की करनी।।

प्रश्न 5.
सही विकल्प छाँटिए
(अ) कोकिला शब्द है-(तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी)
(ब) वायस का अर्थ है-(तोता, कौआ, बाज, कबूतर)
उत्तर:
(अ) तद्भव
(ब) कौआ।

प्रश्न 6.
दुष्यन्त कुमार की गजलों की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान समय के सामाजिक यथार्थ को सशक्त अभिव्यक्ति देने वाले दुष्यन्त कुमार की गजलों में भाव एवं कला पक्ष की विभिन्न विशेषताएँ उपलब्ध हैं।

सामाजिक यथार्थ का चित्रण :
दुष्यन्त कुमार का समाज की विषमताजन्य समस्याओं से पूरा परिचय है। अर्थ, कार्य, भोजन, आवास आदि की भिन्नताएँ उन्हें बैचेन करती हैं। वे कह उठते हैं-
रोज जब रात को बारह बजे का गजर होता है
यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।।

दीन-हीन की पीड़ा का वर्णन :
निम्न वर्ग के प्रति सहानुभूति रखने वाले दुष्यन्त कुमार की गजलों में विविध प्रकार की यातनाओं का सजीव अंकन हुआ है। यातनाओं के कारण दर्द की यह स्थिति होती है-
सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी।
एक जगह हो तो कहें, दर्द इधर होता है।।

संघर्षशील होने की प्रेरणा-दुष्यन्त पलायनवादी नहीं हैं। वे मानते हैं कि समस्याओं का डटकर सामना करना चाहिए। वे कहते हैं-
अब यकीनन ठोस है धरती, हकीकत की तरह।
वह हकीकत देख, लेकिन खौफ के मारे न देख।।

स्वाभाविक अभिव्यक्ति :
दुष्यन्त कुमार सीधी, सरल, सपाट भाषा में प्रभावी ढंग से अपनी बात कहते हैं। चमत्कार या आडम्बरों के लिए उनकी गजलों में कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार दुष्यन्त कुमार का काव्य भाव एवं कला दोनों दृष्टियों से सशक्त अभिव्यक्ति की क्षमता रखता है।

MP Board Solutions

कुण्डलियाँ भाव सारांश

विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहने में कुशल दीनदयाल गिरि की कुण्डलियों में जीवन के अनुभव का सार समाहित है। उन्होंने नीति पर बड़ी सटीक बातें कही हैं। थोड़े ही दिन के रूप सौन्दर्य पर गर्व न करने की नीति बताते हुए वे कहते हैं कि रूप तथा सौन्दर्य तो अस्थायी तथा क्षणिक है। गुणों के महत्त्व को उजागर करते हुए वे बताते हैं कि कौए का कोयलों के बीच बैठकर गर्व करना व्यर्थ है क्योंकि जैसे ही वह बोलेगा, उसकी पहचान कर्णकटु वाणी से हो जायेगी। कोयल सुमधुर स्वर में पीऊ-पीऊ करेगी तो वह तीखी ध्वनि में काँऊ-काँऊ करेगा। उसे कितनी ही स्वादिष्ट खीर क्यों न खिलाई जाय, वह गन्दी चीज खाये बिना नहीं मानेगा। इसी प्रकार अवगुणी गुणवानों के मध्य अपने दुर्गुणों से शीघ्र प्रकट हो जायेगा। भाग्य की महिमा को उजागर करते हुए कवि ने कहा है कि विधि का विधान बड़ा विचित्र है उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है।

हिरणी बहुत सुन्दर नेत्रों वाली होकर दिन-रात वनों में घूमती-फिरती है। वह वहाँ प्रसूता होकर कष्ट भोगती रहती है जबकि कोयल श्याम वर्ण की होते हुए भी सभी कौओं को अपने वश में रखती है। इस प्रकार कवि ने इन पद्यों से व्यावहारिक अनुभव के आधार पर नीतिपरक ज्ञान बढ़ाने का सफल प्रयास किया है।

कुण्डलियाँ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] रंभा ! झूमत हौं कहा थोरे ही दिन हेत।
तुमसे केते है गए अरु कै हैं इहि खेत।।
अरु कै हैं इहि खेत मूल लघु साखा हीने।
ताहू पै गज रहे दीठि तुमरे प्रति दीने।।
बरनै दीनदयाल हमें लखि होत अचंभा।
एक जन्म के लागि कहा झुकि झूमत रंभा।।

शब्दार्थ :
रंभा – सुन्दरी, रूप सौन्दर्य के लिए विख्यात एक अप्सरा; हेत = प्रेम; केते = कितने; 8 गए = हो गये; इहि = इस; खेत = क्षेत्र, संसार; मूल = जड़; साखा = टहनियाँ; हीने = रहित; दीठिगज = हाथी दिखाई दे रहे; लखि = देखकर; अचम्भा = आश्चर्य; लागि = लिए।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक के विविधा भाग-1′ के ‘कुण्डलियाँ’ शीर्षक से उद्धृत है। इसके रचयिता दीनदयाल गिरि हैं।

प्रसंग :
इस पद्य में अल्पकालीन रूप सौन्दर्य पर गर्व न करने का परामर्श दिया गया है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि रंभा समान रूपवान हे सुन्दरी ! तुम गर्व से युक्त होकर मदमस्त होकर क्यों घूम रही हो? यह प्रेम थोड़े दिन का ही है। रूप स्थायी नहीं होता है। तुम कोई अकेली रूपवान नहीं हो। इस संसार में तुम जैसे पता नहीं कितने हो चुके हैं और भविष्य में कितने ही होंगे। इस संसार में होने वाले ये रूपवान अस्थिर होते हैं। न इनकी जड़ें होतीं न शाखाएँ अर्थात् ये तो अल्पकालीन हैं, स्थिर रहने वाले नहीं हैं। इस पर भी मोहित होने वाले युवक रूपी हाथी भी तुम्हारे प्रति उदास ही दिखाई दे रहे हैं। दीनदयाल कवि बताते हैं कि हमें यह जानकर आश्चर्य होता है कि मात्र एक जन्म के अल्पकाल के लिए प्राप्त रूप सौन्दर्य पर सुन्दरी गर्व से भरकर झूमती हुई घूम रही है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. अस्थायी रूप सौन्दर्य पर गर्व न करने का वर्णन है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है।
  3. सरल, सुबोध एवं भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[2] वायस ! तू पिक मध्य खै कहा करै अभिमान।
है हैं बस सुभाव की बोलत ही पहिचान।।
बोलत ही पहिचान कानकटु तेरी बानी।
वे पंचम धुनि मंजु करैं जिहिं कविन बखानी।।
बरनै दीनदयाल कोऊ जौ परसौ पायस।
तऊन न तजै मलीन मलिन खाये बिन वायस।।

शब्दार्थ :
वायस = कौआ; पिक = कोयल; मध्य = बीच; बंस = वंश, कुल; कानकटु = कर्ण कटु, कठोर; बानी = वाणी; मंजु = मनोहर; जिहिं = जिसका; बखानी = प्रशंसा, वर्णन किया है; परसो = परोस दो; पायस = खीर, दूध का बना स्वादिष्ट पदार्थ; तऊन = तो भी; तजै = छोड़ता है; मलीन = नीच; मलिन = गन्दा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि नीच व्यक्ति भले ही सज्जनों के मध्य पहुँच जाय किन्तु वह अपने नीच स्वभाव को नहीं छोड़ता है।

व्याख्या :
कवि दीनदयाल कहते हैं कि हे कौए ! तू कोयलों के बीच बैठकर स्वयं पर क्यों गर्व करता है। वंश के स्वभाव से तुम्हारे बोलते ही पहचान हो जाएगी कि तुम मृदुभाषी कोयल नहीं, कौए हो। तुम्हारी वाणी तीखी, कर्ण कटु है जबकि जिनके बीच तुम बैठे हो वे कोयल पंचम स्वर में बड़ी मधुर ध्वनि करती हैं जिसकी प्रशंसा बड़े-बड़े कवियों ने की है। कवि स्पष्ट करते हैं ‘कि कौए के सामने कोई दूध की बनी स्वादिष्ट खीर ही क्यों न परोस दे, पर स्वभाव से नीच ये कौए उसे छोड़कर गन्दी चीजें खाये बिना नहीं मानेंगे। आशय यह है कि नीच स्वभाव का व्यक्ति अपनी स्वाभाविक नीचता को नहीं छोड़ पाता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. नीच व्यक्ति कितना ही अच्छे लोगों के पास पहुँच जाय, पर स्वाभाविक नीचता उसमें बनी ही रहती है।
  2. कौआ नीच व्यक्तियों का तथा कोयल श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रतीक हैं।
  3. निनोक्ति, अनुप्रास अलंकार।
  4. सरल, सुस्पष्ट ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[3] करनी विधि की देखिये, अहो न बरनी जाति।
हरनी के नीके नयन बसै बिपिन दिनराति।।
बसै बिपिन दिनराति बराबर बरही कीने।
कारी छवि कलकण्ठ किये फिर काक अधीने।।
बरनै दीनदयाल धीर धरते दिन धरनी।
बल्लभ बीच वियोग, विलोकहु विधि की करनी।। (2009)

शब्दार्थ :
विधि = भाग्य; बानी = वर्णित करना; हरनी = हिरणी; नीके = सुन्दर, भले; करनी = कार्य; नयन = नेत्र; बिपिन = वन, जंगल; बरही = प्रसूता, बच्चों को जन्म देने वाली; छवि = शोभा; कलकण्ठ= सुन्दर गला, कोयल; काक = कौए; अधीने = वश में; धीर = धैर्य; बल्लभ = प्रिय; विलोकहु = देखिए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में भाग्य के विधान की महिमा को उजागर किया गया है।

व्याख्या :
दीनदयाल कवि कहते हैं कि देखिए, ब्रह्मा के द्वारा रचित भाग्य के कार्य बड़े अद्भुत हैं, उनका वर्णन करना सम्भव नहीं है। हिरणी के बड़े सुन्दर नेत्र होते हैं, वह बड़ी आकर्षक होती है फिर भी वह दिन-रात जंगलों में मारी-मारी फिरती है। वह वन में रहते हुए अनेक बच्चों को जन्म देती है। दूसरी ओर कोयल काले रंग वाली होती है फिर भी सारे कौए उसके वशीभूत होते हैं। कवि बताते हैं कि दिनों की टेक को देखकर धैर्य धारण करना चाहिए। भाग्य के विधान से प्रिय के मध्य रहते हुए भी विरह की अवस्था बनी रहती है। भाग्य बहुत बलवान होता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. विधि के विधान की महिमा का वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रभावी प्रयोग हुआ है।

दुष्यन्त की गजलें भाव सारांश

दुष्यन्त कुमार को हिन्दी में गजल को प्रतिष्ठित कराने का श्रेय प्राप्त है। वे सामाजिक यथार्थ के कुशल चितेरे हैं। अपने समय के समाज की विषमताओं पर करारे प्रहार करते हुए उन्होंने संघर्ष की प्रेरणा दी है।

(1) सामान्य जन को सजग करते हुए वे बताते हैं कि विविध प्रकार के प्रचार-प्रसार आज समाज में चल रहे हैं, तुझे उन सबके झमेले में फंसने से पहले अपने स्वयं के घर-परिवार की कठिनाइयों का समाधान करना है। संसार विशाल है। उसमें स्वयं में करने की जो क्षमता है, उसी अनुसार सचेष्ट होना है। जीवन के यथार्थ संघर्षों से बिना घबराये स्वयं की शक्ति से जूझना है कोरी कल्पनाओं में विचरण नहीं करना है-
दिल को बहला ले इजाजत है, मगर इतना न उड़।
आज सपने देख लेकिन, इस कदर प्यारे न देख।।

(2) संघर्षशील निम्न तबके को दिन-रात कष्टों से ही गुजरना होता है। उनके नींद में आने वाले स्वप्न भी संकटों से भरे होते हैं। जीवन में व्यक्ति की कामना होती है कि उसका भी एक निवास हो, चाहे वह मिट्टी का ही क्यों न हो। यातनाओं की पीड़ा सिर से पाँव तक एक-एक अंश में व्याप्त रहती है। कवि कहते हैं-
सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी।
एक जगह हो तो, कहें दर्द उधर होता है।।

जब किसी हताश व्यक्ति से मिलन हो जाता है तो लगने लगता है कि जीवन में सफल होना सम्भव नहीं । आज तो स्थितियाँ ही भयावह हो गयी हैं। घूमने निकलने पर भी पथराव के शिकार हो सकते हैं।

(3) निर्धनता कमर तोड़ देती है और व्यक्ति नमन की तरह झुक जाता है। विषम व्यवस्था में बँटवारा उचित न होने से एक वर्ग कष्ट ही पाता रहता है। निर्धनता से ग्रस्त को अपने मरण का भी बोध नहीं होता है। जबकि अन्य उसके विषय में जानने के लिए परेशान रहते हैं। शहरों के शोर-शराबे पशुओं के हाँके की तरह लगते हैं। आज की स्वार्थपरता ने मनुष्य को जड़ बना दिया है। उसकी संवेदनाएँ मर चुकी हैं।

MP Board Solutions

दुष्यन्त की गजलें संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
घर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख, पतवारें न देख
अब यकीनन ठोस है धरती, हकीकत की तरह
वह हकीकत देख, लेकिन खौफ के मारे न देख

शब्दार्थ :
आकाश के तारे देखना = कल्पनाजीवी होना; दरिया = नदी, सागर; बाजुओं = भुजाओं; पतवारें = नाव में पीछे की ओर लगी डण्डी; यकीनन = निःसन्देह; हकीकत = वास्तविकता; खौफ = भय।।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘विविधा भाग-1’ के ‘दुष्यन्त की गजलें’ शीर्षक से अवतरित है। इसके रचयिता दुष्यन्त कुमार हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में व्यक्ति को यथार्थ का सामना करते हुए सचेष्ट होने की प्रेरणा दी गयी है।

व्याख्या :
दुष्यन्त कुमार ने यथार्थपरक होने का उद्बोधन देते हुए कहा कि आज सड़कों पर अनेक प्रकार के नारे लिखे हैं। व्यक्ति को सड़क के नारों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। उसके लिए यह आवश्यक कि वह अपने घर के कष्टों के अन्धकार को दूर करने पर ध्यान दे। वह कल्पनाजीवी न होकर यथार्थवादी बने।

जगत का सागर बड़ा विस्तृत और विशाल है। वह बहुत दूर तक फैला है। उसे पार करने के लिए व्यक्ति को अपनी भुजाओं के बल को देखना है, न कि नाव की पतवारों को अर्थात् व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से संसार रूपी सागर को पार कर पायेगा, पतवारों से नहीं।

प्रत्यक्ष सत्य है कि जगत बहुत ही कठोर है। यहाँ जीवनयापन करना सरल नहीं है। इस सत्य को जानकर संसार से भयभीत न होकर उसका सामना करना है अर्थात् संघर्षशील जगत में घबराने से काम नहीं चलेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ यथार्थ से सामना करने की प्रेरणा दी गयी है।
  2. उपमा, अनुप्रास अलंकार।
  3. विषय के अनुरूप लाक्षणिक भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शैली बहुत प्रभावशाली है।

[2] वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख
दिल को बहला ले, इजाजत है, मगर इतना न उड़
आज सपने देख, लेकिन इस कदर प्यारे न देख

शब्दार्थ :
जंग = युद्ध; इजाजत = अनुमति; मगर = परन्तु; कदर = तरह।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में व्यक्ति को संघर्षशील संसार में अकेले ही सामना करने के लिए प्रेरित किया गया है।

व्याख्या :
कवि व्यक्ति को हिम्मत बँधाते हुए कहते हैं कि अब तक जिन सहारों से इस जगत का सामना कर रहे थे, अब वे भी नहीं रहे हैं। अब तो तुम्हें स्वयं के बल पर जीवन का युद्ध लड़ना है। जो हाथ कट चुके हैं अर्थात् जो सम्बन्ध समाप्त हो चुके हैं अब उन सहारों के सहयोग की अपेक्षा करना व्यर्थ है। अब तो अपने आप ही परिस्थितियों का सामना करना होगा।

संघर्षशील जीवन में मनोरंजन भी आवश्यक है किन्तु इतना मनोरंजन नहीं कि कठोर जगत को भूल कल्पना की उड़ानें भरनी प्रारम्भ कर दी जायें। विकास के लिए भविष्य के स्वप्न देखना आवश्यक है, किन्तु इतने प्यारे स्वप्न नहीं कि उन्हीं में डूबकर रह जायें। स्वप्न को साकार करने के लिए प्रत्यक्ष यथार्थ का सामना करने की क्षमता भी आवश्यक है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यथार्थ जगत में विकास के लिए व्यक्ति को स्वयं की क्षमता का विस्तार करना आवश्यक है।
  2. लाक्षणिकता से युक्त खड़ी बोली में बड़े प्यारे ढंग से विषय को प्रस्तुत किया गया है।

MP Board Solutions

[3] रोज जब रात को बारह का गजर होता है
यातनाओं के अन्धेरे में सफर होता है।
कोई रहने की जगह है मेरे सपनों के लिए
वो घरौंदा सही, मिट्टी का भी घर होता है।
सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी
एक जगह हो तो कहें, दर्द इधर होता है।

शब्दार्थ :
रोज = प्रतिदिन; गजर = हर घण्टे पर बजने वाले घण्टे; यातनाओं = मुसीबतों, कष्टों; सफर = यात्रा; घरौंदा = बच्चों के द्वारा खेलने को बनाया गया मिट्टी का छोटा घर; दर्द = पीड़ा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इन गजलों में यथार्थ जीवन की यातनाओं का वर्णन हुआ है।

व्याख्या :
दिन तो सांसारिक संघर्ष में कटता ही है किन्तु रात भी कष्ट में ही गुजरती है। नित्य प्रति जब रात को बारह बजने के घण्टे बजते हैं। उस समय भी व्यक्ति कष्टों के अन्धकार से गुजर रहा होता है अर्थात् रात में आने वाले स्वप्न भी उसे यातनाएँ ही देते हैं।

मेरे जीवन के जो स्वप्न हैं उनके लिए इस संसार में नया कोई स्थान उपलब्ध है क्या? अर्थात् कोई जगह नहीं है। इसलिए स्वप्नों के लिए घरौंदा ही ठीक है। चाहे वह मिट्टी का ही सही, घर तो है।

जीवन की यातनाओं ने ये हालत कर दी है कि कभी सिर से लेकर छाती तक, कभी पेट से लेकर पाँव तक पीड़ा होती है और वास्तविकता यह है कि एक जगह होता हो तो बताया जाय कि इस स्थान पर दर्द होता है। नीचे से ऊपर तक बाहर से भीतर तक, सब जगह दर्द ही दर्द है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. विपरीत परिस्थितिजन्य यथार्थ यातनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई हैं।
  2. रूपक, अनुप्रास अलंकार।
  3. सशक्त खड़ी बोली में किये गये सटीक कथन सहज ही प्रभावित करते हैं।

[4] ऐसा लगता है कि उड़कर भी कहाँ पहुँचेंगे,
हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है।
सैर के वास्ते सड़कों पे निकलते थे,
अब तो आकाश से पथराव का डर होता है।

शब्दार्थ :
पर = पंख; सैर = भ्रमण; वास्ते = लिए। सन्दर्भ-पूर्ववत्। प्रसंग-इन गजलों में वर्तमान की यथार्थ परिस्थितियों का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जीवन के उत्थान के लिए कल्पना की उड़ानें भी आवश्यक हैं। किन्तु उनका पूरा होना आवश्यक नहीं है। इसलिए कवि कहते हैं कि जब हमारे हाथ कोई टूटा हुआ पंख होता है तो प्रतीत होने लगता है कि हम कल्पना की उड़ान भरकर भी वहाँ पहुँच पायेंगे? टूटा हुआ पंख उड़ान की असफलता का द्योतक है। अत: उड़ान पूरा हो पाना आवश्यक नहीं है।

अराजकतापूर्ण स्थिति की विषमता को उजागर करते हुए कवि कहते हैं कि पहले भ्रमण के लिए सड़कों पर निकला करते थे परन्तु अब तो इतनी भयानक स्थिति हो गयी है कि भ्रमण के लिए निकलें और आसमान से पत्थरों की वर्षा प्रारम्भ हो जाये। अतः भ्रमण को निकलना भी खतरनाक है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. विषम स्थिति का अंकन हुआ है।
  2. विषय को उजागर करने में सक्षम लाक्षणिक एवं व्यंजक भाषा का प्रयोग हुआ है।

[5] ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।
यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशां हैं, वहाँ पर क्या हुआ होगा। (2008)

शब्दार्थ :
जिस्म = शरीर; सजदे = झुककर नमन करना; गजब = परेशानी। सन्दर्भ-पूर्ववत्। प्रसंग-यथार्थ जगत के कष्टों का सटीक अंकन इन गजलों में हुआ है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि आपको धोखा हो गया होगा कि मैं झुककर नमन कर रहा हूँ। मैं सजदे में नहीं था। हो सकता है यथार्थ जगत की नाना प्रकार की यातनाओं के भार के कारण मेरा शरीर झुककर दोहरा हो गया हो।
जगत की विषम व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए कवि कहते हैं कि यहाँ तक पहुँचते-पहुंचते अनेक नदियाँ सूख जाती हैं अर्थात् विभिन्न साधन यहाँ नहीं आ पाते हैं। मुझे पता है कि इन नदियों का पानी अर्थात् दिए गये साधन-सुविधाओं को कहाँ पर रोक लिया गया होगा। आशय यह है कि अव्यवस्था के कारण जहाँ तक कुछ पहुँचना चाहिए वहाँ तक कुछ पहुँचता ही नहीं है, बीच में ही झपट लिया जाता है।

दीन-हीन निर्बल वर्ग निरन्तर मरता जाता है किन्तु परेशानी यह है कि यह वर्ग अपने मरने की आहट को सुन भी नहीं पाता है अर्थात् इस वर्ग के साथ जो अन्याय, अत्याचार हो रहे हैं उनका आभास उन्हें नहीं हो पाता है। दूसरे जो उनके हितों पर आघात करते हैं, उनको मारने के काम करते हैं वे यह जानने को परेशान हैं कि निर्बल वर्ग में क्या प्रतिक्रिया हो रही होगी?

काव्य सौन्दर्य :

  1. यथार्थ जगत की विषमता से उत्पन्न यातनाओं का व्यंग्यात्मक अंकन हुआ है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास अलंकार।
  3. उर्दू मिश्रित खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[6] तुम्हारे शहर में ये शोर सुन सुन कर तो लगता है
कि इन्सानों के, जंगल में कोई हाँका हुआ होगा।
कई फाके बिताकर मर गया, जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा।
यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा। (2008)

शब्दार्थ :
इन्सानों = आदमियों; हाँका = जोर से पुकारना, हुँकार; फाके = भूखे रहकर; गूंगे = बोल न पाने वाले, मूक; बहरे = सुन न पाने वाले; जलसा = अधिवेशन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद्यांश में यथार्थ जीवन की संवेदनहीनता का सटीक अंकन हुआ है।

व्याख्या :
आज के कौलाहल से पूर्ण नगरीय जीवन पर व्यंग्य करते हुए कवि कहते हैं कि तुम्हारे नगर में हो रहे शोर-शराबे को सुनकर तो यह लगता है कि जैसे जंगल में पशुओं का हाँका होता है, ऐसे ही मनुष्यों के जंगल में कोई चिल्ल-पुकार हो रही होगी।

विषम अर्थव्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए कवि ने कहा है कि कई दिनों तक बिना भोजन के रहने के कारण भूख से उसकी मृत्यु हो गयी और लोग उसके बारे में अन्यान्य बातें कह रहे हैं कि इस प्रकार न होकर इस प्रकार उसकी मौत हुई होगी।

संवेदनहीनता पर कटाक्ष करते हुए कवि ने कहा है कि यहाँ पर रहने वाले सभी गूंगे और बहरे हैं। किसी के दुःख-दर्द में न कोई बोलता है न कोई सुनता है। इस प्रकार के माहौल में ईश्वर ही जाने कि किस प्रकार समाज का संचालन हो रहा होगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. आधुनिक जीवन की विविध जड़तामय स्थितियों का सटीक अंकन हुआ है।
  2. उर्दू मिश्रित खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति हुई है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 8 जीवन दर्शन

MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 8 जीवन दर्शन

जीवन दर्शन अभ्यास

जीवन दर्शन अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर कोष्ठक में दिए विकल्पों में हैं। सही विकल्प छाँटकर लिखिए
(अ) अंगद किसका पुत्र था? (राम, सुग्रीव, बालि)
(आ) बालि ने काँख में किसे छिपा लिया था? (सुग्रीव, रावण, अंगद)
(इ) ‘भृगुनन्दन’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? (परशुराम, राम, रावण)
(ई) ‘तुम पै धनु रेख गई न तरी’ किसके लिए कहा गया है? (राम, हनुमान, रावण)
(उ) ‘कवच-कुंडल’ दान किसने किए थे? (कर्ण, इन्द्र, अर्जुन)
उत्तर:
(अ) बालि
(आ) रावण
(इ) परशुराम
(ई) रावण
(उ) कर्ण

MP Board Solutions

जीवन दर्शन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कुछ न पाया जिन्दगी में-किसने, किस कारण कहा है? (2010, 14, 17)
उत्तर:
‘कुछ न पाया जिन्दगी में यह कथन कवि गिरिजा कुमार माथुर का है। वे समस्त जीवन भर दौड़-भाग करते रहे, किन्तु उन्हें ऐसा कुछ प्राप्त नहीं हुआ जिससे कह सकें कि उनके जीवन की यह उपलब्धि है। आशय यह है कि सारा जीवन जिस विश्वास के लिए खपा दिया, वह सब व्यर्थ गया। अब जीवन की अन्तिम अवस्था में खाली हाथ ही रह गये। कोई आश्रय भी नहीं है। अनाथ होकर भटकने को विवश है। विश्वास भी साथ छोड़ रहा है।

प्रश्न 2.
‘विश्वास की साँझ’ कविता के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
अथवा
‘विश्वास की साँझ’ कविता का मुख्य कथ्य क्या है? (2016)
उत्तर:
‘विश्वास की साँझ’ कविता में कवि कहना चाहता है कि व्यक्ति इस विश्वास के सहारे समस्त जीवन में अति सक्रिय रहकर दौड़-भाग करता रहता है कि उसे कुछ विशेष उपलब्धि होगी। वह कुछ ऐसा करेगा जो उल्लेखनीय होगा। यह लालसा ही उसे दिन-रात नाना प्रकार के कार्यों में व्यस्त रखती है। लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध के आते-आते उसके पास मात्र अपने होने का विश्वास मात्र रह जाता है और कुछ शेष नहीं बचता है। जिस संसार के लिए व्यक्ति भला-बुरा सब करता है, वह भी अलग हो जाता है। अन्तिम वास्तविकता अर्थात् मृत्यु से व्यक्ति को निहत्थे ही सामना करना पड़ता है। कोई साथ नहीं होता है, हाथ भी खाली होते हैं।

प्रश्न 3.
केशव की ‘रामचन्द्रिका’ में अंगद-रावण संवाद अधिक सुन्दर, स्वाभाविक और प्रभावशाली है। उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हिन्दी काव्य में जितने अच्छे संवाद केशव ने रचे हैं, उतने अन्यत्र दुर्लभ हैं। उनके संवादों में सजीवता, नाटकीयता तथा प्रति उत्पन्न मतित्व का सौन्दर्य सर्वत्र दिखाई पड़ता है। वाक्-चातुर्य, उत्साह, तत्परता, राजनीतिक सूझबूझ, शिष्टाचार आदि की सफलता ने संवादों को बहुत सुन्दर बना दिया है। व्यंग्य, संक्षिप्तता, स्वाभाविकता, पात्रानुकूलता आदि के संयोग से केशव के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हो गए हैं। केशव दरबारी कवि थे, उन्हें राज दरबार का पूरा ज्ञान था इसीलिए उनके संवादों में सभी प्रकार का कौशल स्पष्ट दृष्टिगत होता है। केशव के संवाद अनूठे हैं।

जीवन दर्शन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘अंगद-रावण संवाद’ शीर्षक में सभी संवाद पात्रों के अनुकूल हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कथोपकथन में पात्र का विशेष महत्त्व होता है। अत: यह आवश्यक है कि संवाद पात्र के स्तर के अनुरूप हों। केशव ने इन सभी बातों को ध्यान में रखकर संवाद-योजना की है। उनके संवाद पात्रों के मनोभावों एवं परिस्थितियों को स्पष्ट परिलक्षित करते हैं। उनके संवाद से पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का ज्ञान सहज ही हो जाता है। प्रस्तुत अंश में जहाँ अंगद का शिष्टाचार, वीरत्व, वाक्चातुर्य तथा भक्ति भाव व्यक्त होता है, वहीं रावण के कथन उसके अहंकारी चरित्र का स्पष्ट आभास कराते हैं। अंगद अपनी या अपने सहयोगियों की प्रशंसा न करके अपने स्वामी राम की महिमा को आधार बनाकर अपनी बात सशक्त रूप में रखता है, जबकि रावण कुण्ठाग्रस्त होकर अपनी प्रशंसा स्वयं ही करता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
“कौन के सुत” ‘बालि के’, ‘वह कौन बालि’, ‘नजानिए?’
काँख चापि तुम्हें जो सागर सात न्हात बखानिए।”
“है कहाँ वह बीर? अंगद “देवलोक बताइयो”
‘क्यों गयो? रघुनाथ बान बिमान बैठि सिधाइयो।’
इस तरह केशव के संवादों में पात्रानुकूलता की विशेषता सर्वत्र विद्यमान है।

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
क्या विश्वास की साँझ’ कविता में निराशावाद है? तर्क सहित समझाइए।
उत्तर:
‘विश्वास की साँझ’ कविता में जीवन पर्यन्त सक्रिय एवं सचेष्ट रहने वाले व्यक्ति के विश्वास को जीवन के उत्तरार्द्ध में डगमगाते दिखाया गया है। आस्था एवं विश्वास के साथ कार्यशील रहने वाला कवि अब जीवन के आखिरी पड़ाव में पूर्व अनुभव करता है कि मैंने भाग-दौड़, हाय-हाय, काम-धाम करते-करते जीवन गँवा दिया और कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाया। मात्र एक विश्वास बचा था। नियति ने यह कहकर कि “जिन्दगी में साथ देता है कभी कोई बशर, असलियत से युद्ध होता है निहत्था जान ले।” उस विश्वास को भी छीन लिया और नियति ने स्पष्ट कर दिया कि तू अपने आस्था और विश्वास सभी कवच-कुण्डल का दान कर दे।

जब जीवन में आस्था और विश्वास ही नहीं रहेगा तो जीवन की क्या सार्थकता होगी। व्यक्ति को हताशा आकर घेर लेगी। इससे स्पष्ट होता है कि इस कविता में निराशावाद का निरूपण हुआ है।

प्रश्न 3.
सन्दर्भ सहित व्याख्या लिखिए
(अ) नियति बोली, आस्था वाले
अरे ओ होश कर
जिन्दगी में साथ देता है
कभी. कोई बशर।
असलियत से युद्ध होता है
निहत्था जान ले।

(आ) सिन्धु तर्यो उनको वनरा तुम पै धनु रेख गई न तरी।
बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यो, उन बारिधि बाँधिकै बाट करी
अजहूँ रघुनाथ प्रताप की बात तुम्हें दसकंठ न जानि परी।
तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराइ जरी।।
उत्तर:
इन पद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या पाठ के ‘सन्दर्भ-प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग में पढ़िए।

जीवन दर्शन काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिएसाँझ, न्हात, जित्यो, जरी।
उत्तर:
MP Board Class 11th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 8 जीवन दर्शन img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित काव्यांशों में अलंकार पहचान कर लिखिए
(अ) कौन के सुत? बालि के, वह कौन बालि? न जानिए?
(आ) बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यों, उन वारिधि बाँधि के बाट करी।
(इ) तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराइ जरी।
उत्तर:
(अ) अनुप्रास
(आ) अनुप्रास
(इ) यमक।

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्यांशों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
(क) असलियत से युद्ध होता है निहत्था जान ले।
इसलिए तू पूर्व इसके कवच कुंडल दान दे।
(ख) आज तक मानी नहीं, वह आज मानी हार।
(ग) हैहय कौन? वहै बिसर्यो जिन खेलत ही तोहि बाँधि लियो।
उत्तर:
इन काव्यांशों का काव्य-सौन्दर्य पाठ के सन्दर्भ प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या’ भाग से सम्बन्धित काव्यांश की व्याख्या के काव्य सौन्दर्य से पढ़िए।

प्रश्न 4.
‘अंगद-रावण संवाद’ काव्यांश में से उन पंक्तियों को लिखिए जिनमें रौद्र और वीर रस है।
उत्तर:
‘अंगद-रावण संवाद’ काव्यांश में से कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं जिनमें वीर एवं रौद्र रस है-
(क) काँख चापि तुम्हें जो सागर सात न्हात बखानिए।
(ख) ‘हैहय कौन?’ वहै विसर्यो जिन खेलत ही तोहि बाँधि लियो।
(ग) तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराई जरी।
(घ) छत्र विहीन करी छन में छिति गर्व हर्यो तिनके बल कौ रे।

प्रश्न 5.
‘विश्वास की साँझ’ कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए कि जीवन में आस्था और विश्वास जैसे भाव मानव को त्याग की ओर प्रेरित करते हैं।
उत्तर:
व्यक्ति को जीवन में कार्य करने की शक्ति आस्था और विश्वास प्रदान करते हैं। ये ही विषम से विषम स्थिति में भी मनुष्य को संघर्ष का साहस देते हैं। किन्तु जीवन के उत्तरार्द्ध में एक ऐसी स्थिति भी आती है, जब आस्था और विश्वास जैसे भाव मानव को त्याग की ओर प्रेरित करते हैं। आखिरी समय में अनाथ होने पर आस्था और विश्वास भी डगमगाने लगते हैं और जीवन से पलायन की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों में निहित शब्द शक्ति का नाम लिखिए
(क) कौन के सुत? बालि के
(ख) ‘है कहाँ वह वीर? अंगद ‘देवलोक बताइयो।’
(ग) ‘बालि बली’, ‘छल सों’।
‘भृगुनन्दन गर्व हर्यो’, ‘द्विज दीन महा’।
(घ) ‘सिन्धु तरयो उनको वनरा, तुम पै धनु रेख गई न तरी।’
उत्तर:
(क) अभिधा
(ख) लक्षणा
(ग) लक्षणा
(घ) व्यंजना।

अंगद-रावण संवाद भाव सारांश

रीतिकाल के आचार्य केशवदास की ‘रामचन्द्रिका’ में मानवीय व्यवहारों का सुन्दर समायोजन हुआ है। ‘रावण अंगद संवाद’ शीर्षक इसी श्रेष्ठ महाकाव्य से संकलित है।

प्रस्तुत अंश में रावण-अंगद के सटीक संवादों का सौन्दर्य अवलोकनीय है। जहाँ रावण का अहंकारी रूप प्रतिध्वनित है वहीं अंगद नैतिक व्यक्तित्व वाले राम भक्त सिद्ध होते हैं। जैसे ही अंगद रावण के दरबार में पहुँचते हैं तो रावण उनसे परिचय पूछता है। वे उसी परिचयात्मक वार्तालाप में ही रावण की हीनताओं को व्यंजित कर देते हैं। जब अंगद ने अपना नाम बताते हुए कहा कि मैं बालि का पुत्र हूँ तो रावण पूछ बैठे कौन बालि तो अंगद उसे बताते हैं कि तुम बालि को नहीं जानते? ये वहीं हैं जिन्होंने तुम्हें अपनी बगल में दबाकर सप्त सागरों का स्नान किया था। राम के बाण से उनका वध हो गया है।

जब रावण ने पूछा लंका स्वामी कौन है तो अंगद ने कहा विभीषण। तुम्हें जीवित कौन कहता है? तुम अपनी सुबुद्धि से काम लो और राजाधिराज राम के पैरों पड़कर क्षमा माँग लो वे तुम्हें राज्य, कोष आदि सब देकर सीता को लेकर शीघ्र अपने घर चले जायेंगे।

यह सुनकर रावण अहं से भरकर कहता है कि संसार तथा लोकपाल आदि की सीमाएँ हैं। ये सब विष्णु भगवान की रक्षा में रहते हैं किन्तु देव, देवेश आदि का संहार शिवजी मात्र भ्रू भ्रंग द्वारा कर देते हैं। अतः मैं पैर पढूंगा तो शिव के पढूंगा अन्य के नहीं। वह कहता है राम में शत्रु पर विजय पाने की क्षमता ही नहीं है। अंगद बताते हैं राम ने परशुराम, सहस्रार्जुन आदि वीरों को पराजित किया है। सहस्रार्जुन ने तो खेल में तुमको बाँध लिया था।

राम महाप्रतापी हैं उनका बन्दर तुम्हारी लंका जला गया, उन्होंने पत्थरों का पुल बनाकर सागर पर रास्ता बना लिया। यह सुनते रावण बताता है-मृत्यु मेरी दासी है, सूर्य द्वारपाल है, चन्द्रमा मेरा छत्र लिए रहता है, यमराज कोतवाली करता है। अतः मुझे राम, सुग्रीव आदि कैसे हरा पायेंगे। अंगद के बार-बार समझाने पर भी रावण अपनी गर्वोक्तियों से बाज नहीं आता है। फिर भी अंगद राम के महान् प्रभाव को सिद्ध करने में समर्थ होता है। ये संवाद अनूठे हैं।

MP Board Solutions

अंगद-रावण संवाद संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] अंगद कूदि गए जहाँ, आसनगत लंकेस।
मनु मधुकर करहट पर, सोभित श्यामल बेस॥
रावण-कौन हो, पठाए सो कौने, ह्याँ तुम्हें कह काम है?
अंगद-जाति वानर, लंकनायक ! दूत अंगद नाम है।
“कौन है वह बाँधि कै हम देह छि सबै दही”?
“लंक जारि संहारि अच्छ गयो सो बात बृथा कही।

शब्दार्थ :
आसनगत = आसन पर; लंकेस = लंका का स्वामी; मधुकर = भौंरा; करहट = कमल की छतरी; ह्याँ = यहाँ; दही = जला दिया; बृथा = व्यर्थ।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘जीवन दर्शन’ के ‘रावण अंगद संवाद’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता केशवदास हैं।

प्रसंग :
इस पद्यांश में राम द्वारा युद्ध से पहले अंगद को दूत के रूप में लंका भेजने पर रावण-अंगद का परिचयात्मक संवाद है।

व्याख्या :
लंका का राजा रावण जहाँ सिंहासन पर बैठा था अंगद कूदकर वहीं पहुंच गए। वे ऐसे लग रहे हैं मानो कलम की छतरी पर श्याम वेष वाला भौंरा बैठा हो। रावण अंगद से पूछता है कि तुम कौन हो, तुम्हें किसने भेजा है और यहाँ तुमको क्या काम है? तब अंगद उत्तर देते हुए कहता है कि मेरी जाति वानर है, मैं श्रीराम का दूत हूँ और मेरा नाम अंगद है। तब रावण कहता है कि वह कौन है जिसे हमने बाँध लिया तथा उसकी पूँछ, शरीर आदि सब जला दिया। तब अंगद उत्तर देते हैं कि वे (हनुमान) लंका को जलाकर और तुम्हारे बेटे अक्षय कुमार को मारकर गये। वह बात व्यर्थ रही।

काव्य सौन्दर्य :

  1. अंगद का रावण के दरबार में पहुँचकर वार्ता को प्रारम्भ किया गया है।
  2. उत्प्रेक्षा, अनुप्रास अलंकार । सरल, सुबोध एवं लाक्षणिकता से परिपूर्ण ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[2] “कौन के सुत?” ‘बालि के’, ‘वह कौन बालि’, न जानिए?
काँख चापि तुम्हें जो सागर सात न्हात बखानिए।”
“है कहाँ वह बीर?” अंगद “देवलोक बताइयो।” ‘क्यों गयो’?
रघुनाथ बान बिमान बैठि सिधाइयो। ‘लंका नायक को’?
विभीषण, देव दूषण को दहै? ‘मोहि जीवन होहिं क्यों?
जग तोहि जीबत को कहै। ‘मोहि को जग मारि है’?
दुर्बुद्धि तेरिय जानिए? ‘कौन बात पठाइयो कहि वीर बेगि बखानिए।’

शब्दार्थ :
सुत = पुत्र; काँख = बगल; चापि = दबाकर; बान-बिमान = बाण रूपी विमान; सिधाइयो = सिधार गये; देवदूषण = देवताओं के शत्रु; दहै = दग्ध करता है, जलाता है; दुर्बुद्धि = कुबुद्धि; पठाइयो = भेजा है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में रावण और अंगद के प्रश्नोत्तर हैं।

व्याख्या:
रावण अंगद से पूछता है कि तुम किसके पुत्र हो? अंगद बताता है कि मैं बालि का पुत्र हूँ। रावण ने पूछा कि यह बालि कौन है? अंगद ने पूछा कि क्या तुम बालि को नहीं जानते हो? जिसने तुम्हें अपनी बगल में दबाकर सप्त सागरों में स्नान किया था। आशय है कि दीर्घकाल तक तुम्हें अपनी बगल में दबाए रखा था। रावण ने पूछा कि वह पराक्रमी वीर अब कहाँ है? उत्तर में अंगद ने कहा कि वे देवलोक (स्वर्ग) सिधार गये हैं। रावण ने प्रश्न किया कि वे देवलोक क्यों गये हैं आशय है कि उनका निधन कैसे हुआ? अंगद ने बताया कि रघुकुल के स्वामी श्रीराम के बाण रूपी विमान पर बैठकर वे देवलोक सिधार गये हैं।

आशय यह है कि श्रीराम के बाण से उनका वध हो गया है। पुनः रावण पूछता है कि लंका का स्वामी कौन है? अंगद ने उत्तर दिया कि देवताओं के शत्रु को दग्ध करने वाले विभीषण लंका के स्वामी हैं। रावण बोला मेरे जीते जी वह लंका का स्वामी कैसे है? अंगद ने कहा कि तुम्हें संसार में जीवित कहता ही कौन है? आशय यह है कि तुम तो मरे के समान हो। रावण ने कहा कि मुझे संसार में कौन मार सकता है? अंगद ने बताया कि तेरी कुबुद्धि ही तेरा वध कराएगी। रावण ने अंगद से पूछा कि हे वीर ! शीघ्र बताइए कि तुमको यहाँ किस काम के लिए भेजा है?

काव्य सौन्दर्य :

  1. रावण और अंगद के संवाद से आभास मिलता है कि रावण की कुबुद्धि ही उसका विनाश कर देगी और विभीषण लंका का नायक बनेगा।
  2. श्लेष एवं अनुप्रास अलंकार।
  3. सरल, सुबोध ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[3] राम राजान के राज आये इहाँ
धाम तेरे महाभाग जागे अबै।
देवि मंदोदरी कुम्भकर्णादि दै
मित्र मंत्री जिते पूछि देखो सबै।
राखिजै जाति को, पांति को वंश को
साधिजै लोक में पर्लोक को।
आनि कै पाँ परौ देस लै, कोस लै
आसुहीं ईश सीताहि लै ओक को।

शब्दार्थ :
धाम = नगर; देवि = पटरानी; पांति = सम्मान; कोस लै = खजाना ले; आसुही = शीघ्र ही; ओक = घर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद्यांश में अंगद रावण को सत्परामर्श दे रहे हैं।

व्याख्या :
अंगद कहते हैं कि हे रावण ! यह तेरे महाभाग्य जाग्रत हो गये हैं कि राजाधिराज राम यहाँ तेरे घर पर आए हैं। मैं जो श्रेष्ठ परामर्श देने जा रहा हूँ, उसके बारे में तुम अपनी पटरानी मंदोदरी, अपने बन्धु कुम्भकर्ण आदि से और जितने भी तुम्हारे मित्र और मन्त्री हैं उन सभी से पूछकर देख लो कि मेरी सलाह उत्तम है या नहीं। तुम अपनी जाति, अपनी प्रतिष्ठा और वंश की रक्षा कर लो, अपने इस लोक में ही परलोक की साधना कर लो। श्रीराम को सादर महल में लाकर उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँग लो और सीता जी को लौटा दो। तुम्हारे द्वारा ऐसा किए जाने पर परम उदार श्रीराम तुमको यह देश, यहाँ का खजाना आदि देकर अपनी पत्नी सीता को साथ लेकर शीघ्र ही अपने घर चले जायेंगे।

काव्य सौन्दर्य :

  1. अंगद ने रावण की भूल के लिए क्षमा याचना का परामर्श दिया है।
  2. अनुप्रास अलंकार एवं पद-मैत्री का सौन्दर्य दृष्टव्य है।
  3. सरल, सुबोध ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है।

[4] रावण-लोक लोकेस स्यौं सोचि ब्रह्मा रचे
आपनी आपनी सीव सो सो रहे।
चारि बाहें धरे विष्णु रच्छा करें
बान साँची यहै वेदवाणी कहै।।
ताहि भ्रूभग ही देस देवेस स्यों
विष्णु ब्रह्मादि दै रुद्रजू संहरै।
ताहि सौं छाँड़ि कै पायँ काके परों
आजु संसार तो पायँ मेरे परै।।

शब्दार्थ :
लोकेश = लोक के स्वामी; रचे = बनाए हैं; स्यौं = से, सहित; भ्रूभग = भौंह टेढ़ी होने से, क्रुद्ध होने से; सींव = सीमा; रुद्रजू = शंकर जी; काके = किसके।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में अहंकारी रावण अंगद का परामर्श सुनकर क्रोध से भर उठता है तथा शिव के अतिरिक्त किसी के भी सामने न झुकने की गर्वोकित करता है।

व्याख्या :
रावण कहता है कि ब्रह्मा ने विचार करके जितने भी लोक और लोकों के स्वामी रचे हैं वे सभी अपनी-अपनी सीमाओं में रहते हैं। चार भुजा वाले विष्णु उस सृष्टि की रक्षा करते हैं। वेदवाणी इस सत्य को कहती है कि उस सृष्टि का देवताओं, देवराज इन्द्र सहित विष्णु और ब्रह्मा के होते हुए भी शिवजी भृकुटि मात्र से संहार कर देते हैं। इस प्रकार के सर्वशक्तिमान शिव को छोड़कर मैं किसके पैरों में पढूं। आज तो मेरे प्रताप की यह स्थिति है कि सारा संसार मेरे पैरों में पड़ता है। अतः मैं किसी के पैरों में नहीं पड़ सकता हूँ।

काव्य सौन्दर्य :

  1. इसमें अभिमानी रावण की गर्वोक्ति है।
  2. अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, यमक, श्लेष अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है।
  3. भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[5] ‘राम को काम कहा’? ‘रिपु जीतहिं’
‘कौन कबै रिपु जीत्यौ कहा’?
‘बालि बली’, ‘छल सों, भृगुनंदन
‘गर्व हर्यो’, ‘द्विज दीन महा।।
‘दीन सो क्यों? छिति छत्र हत्यो’
‘बिन प्राणनि हैहयराज कियो’
“हैहय कौन? “वहै विसरयो जिन’
खेलत ही तोहि बाँधि लियो।।

शब्दार्थ :
रिपु = शत्रु; छल सों = धोखे से; भृगुनन्दन = परशुराम; छिति छत्र हत्यो = पृथ्वी के क्षत्रिय मारे; हैहयराज = सहस्रार्जुन; विसर्यो = भूल गये।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश के संवादों में रावण की गर्वोक्तियों और अंगद के व्यंग्यों का सुन्दर संयोजन है।

व्याख्या :
रावण अंगद से पूछता है कि राम का उल्लेखनीय कार्य क्या है? अंगद ने उत्तर दिया कि श्रीराम अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। रावण ने पलटकर प्रश्न किया कि राम ने कब, कौन-से शत्रु पर विजय पाई है? तो अंगद ने बताया कि उन्होंने वीरवर बालि पर विजय प्राप्त की। रावण ने तुरन्त कहा बालि को तो छलपूर्वक मारा गया था अर्थात् छिपकर मारने में कौन सी वीरता है ? फिर अंगद दूसरा नाम बताते हैं कि राम ने भृगु के पराक्रमी पुत्र परशुराम का मान मर्दन किया है। इस पर रावण ने कहा कि वह (परशुराम) तो महादीन ब्राह्मण था। उसमें युद्ध की शक्ति ही कहाँ थी? अंगद इसकी काट करते हुए कहते हैं कि वह दीन क्यों हैं ? उन्होंने अनेक बार पृथ्वी भर के क्षत्रियों को मार डाला था। इतना ही नहीं उन्होंने ही प्रसिद्ध योद्धा सहस्रार्जुन (हैहयराज) का वध कर प्राण लिए थे। तब रावण पूछता है कि हैहय कौन है? अंगद ने बताया कि तुम उस बलशाली हैहयराज को भूल गये जिन्होंने तुम्हें खेल-खेल में ही बाँध लिया था और अपनी घुड़साल में रखा था।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ रावण की गर्वोक्तियों का मुंहतोड़ जवाब अंगद ने दिया है।
  2. परशुराम तथा सहस्रार्जुन का बल विख्यात रहा है।
  3. अनुप्रास अलंकार।
  4. विषयानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[6] अंगद-सिंधु तर्यो उनको वनरा तुम पै धनुरेख गई न तरी।
बाँध्योई बाँधत सो न बँध्यो उन वारिधि बाँधि कै बाट करी।।
अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हें दसकंठ न जानि परी।
तेलनि तूलनि पूँछ जरी न जरी, जरी लंक जराई जरी।। (2009,14)

शब्दार्थ :
वनरा = बन्दर (हनुमान); धनुरेख = धनुष की रेखा लक्ष्मण ने सीता की सुरक्षा के लिए पर्णकुटी के सामने धनुष की नोंक से जो रेखा खींची थी उसे रावण पार नहीं कर पाया था; तरी = पार की गई; वारिधि = समुद्र; बाट = मार्ग; दसकंठ = रावण; तूलनिक रुई; जराई जरी = रत्नों से जड़ी हुई।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में राम की महिमा तथा रावण की दीनता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
अंगद राम की महिमा का बखान करते हुए अहंकारी रावण से कहता है कि उन श्रीराम का छोटा बन्दर (हनुमान) विशाल सागर को पार कर गया और स्वयं को बहुत बलशाली कहने वाले तुम लक्ष्मण द्वारा खींची गई एक धनुष की रेखा को भी लाँघ नहीं पाए। उन श्रीराम ने विशालकाय सागर को सेतुबन्ध द्वारा बाँधकर रास्ता बना लिया किन्तु तुम छोटे से बन्दर को बाँधने का प्रयास करते हुए भी नहीं बाँध सके। अंगद कहते हैं कि हे दशकंठ रावण ! आज भी तुम्हें रघुकुल के स्वामी श्रीराम के प्रताप का बात बोध नहीं हुआ है। वे महाप्रतापी हैं और तुम बहुत हीन हो क्योंकि तुम पूरा प्रयास करके तेल और रूई के सहारे भी छोटे से बन्दर की पूँछ को नहीं जला पाये। इसके विपरीत वह बन्दर रत्नों से जड़ी तुम्हारी लंका को जला गया।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ राम की महिमा तथा रावण के हीनत्व का अंकन हुआ है।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री की छटा दर्शनीय है।
  3. विषय के अनुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

[7] रावण- महामीचु दासी सदा पाइँ धोवै
प्रतीहार हैं कै कृपा सूर जोवै।
क्षमानाथ लीन्हें रहै छत्र जाको।
करैगो कहा सत्रु सुग्रीव ताकौ”
सका मेघमाला, सिखी पाककारी
करें कोतवाली महादंडधारी।
पढ़े, वेद ब्रह्मा सदा द्वार जाके,
कहा बापुरो, सत्रु सुग्रीव ताके।

शब्दार्थ :
महामीचु = मृत्यु; प्रतीहार = द्वारपाल; सूर = सूर्य; जोवै= देखता है; क्षमानाथ = चन्द्रमा; ताकौ = उसका; सका = भिश्ती; मेघमाला = बादल; सिखी = अग्नि; पाककारी = रसोइया; बापुरो = बेचारा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस पद्यांश में रावण ने अपनी महिमा का स्वयं बखान किया है।

व्याख्या :
रावण कहता है कि हे अंगद ! महामृत्यु जिसकी (रावण की) दासी बनकर सदैव पैर धोती रहती है, सूर्य द्वारपाल होकर जिसकी कृपा की बाट जोहता रहता है, चन्द्रमा जिसका छत्र लिए रहता है। उस रावण का शत्रु सुग्रीव क्या बिगाड़ पायेगा।

मेघमालाएँ जिसके यहाँ भिश्ती का काम करती हैं, स्वयं अग्नि जिसकी रसोइया है, यमराज जिसके यहाँ कोतवाल का दायित्व निभाता है, जिसके दरवाजे पर ब्रह्मा सदैव वेदों का पाठ करते हैं उस रावण का शत्रु बेचारा सुग्रीव क्या कर लेगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. रावण की महिमा का वर्णन हुआ है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री। भावों के अनुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है।

[8] डरै गाय बि, अनाथै जो भाजै।
परद्रव्य छाँई, परस्त्रीहि लाजै
परद्रोह जासौं न होवै रती को
सु कैसे लरै वेष कीन्हें यती को।।
तपी गयी विप्रनि छिप ही हरौं।
अवेद-द्वेषी सब देव संहरौ।
सिया न दैहों, यह नेम जी धरौं
अमानुषी भूमि अवानरी करौं।

शब्दार्थ :
विप्र = ब्राह्मण; परद्रव्य = दूसरे का धन; परद्रोह = विरोध; रती = कामदेव की स्त्री; यती = संन्यासी; छिप्र= शीघ्र; अवानरी= बानरों से हीन; अमानुषी = मनुष्यों से हीन।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में रावण ने राम के गुणों को कमजोरी तथा अपने दोषों को गुणों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

व्याख्या :
जो गाय और ब्राह्मण से डरता है अर्थात् गाय और ब्रह्म के समक्ष भीरू बन जाता है, दूसरे के धन को छोड़ देता है, दूसरे की स्त्री के सामने लज्जित हो उठता है, जिससे एक रत्तीभर परद्रोह (विरोध). नहीं होता है, संन्यासी का वेष धारण करने वाला वह राम कैसे युद्ध कर सकता है। अर्थात् वह युद्ध नहीं कर पायेगा।

तपस्या में लीन ब्राह्मणों का शीघ्र ही हरण कर लूँगा, जो वेदों को न मानने वालों (राक्षसों) के शत्रु देवता हैं उनका संहार कर दूंगा, मैंने अपने हृदय में यह दृढ़ कर लिया है कि सीता को नहीं दूंगा और समस्त भूमि को नर व वानरों से रहित कर दूंगा।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ रावण ने राम के गुणों को कमजोरियों तथा अपने अवगुणों को वीरता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा पद मैत्री।
  3. भावानुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

MP Board Solutions

[9] अंगद-पाहन तै पतिनी करि पावन, टूक कियौ हर को धनु को रे?
छत्र विहीन करी छन में छिति गर्व हर्यो तिनके बल को रे।।
पर्वत पुंज पुरैनि के पात समान तरे, अजहूँ धरको रे।
होइँ नरायन हूँ पै न ये गुन, कौन इहाँ नर वानर को रे?

शब्दार्थ :
पाहन = पत्थर; पावन = पवित्र; हर = शिव; छिति = पृथ्वी; विहीन = रहित; पुंज = समूह; पुरैनि = कमल; धरको = धड़का; नरवानर को = मनुष्य और बन्दरों की तो बात ही क्या।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर अंगद द्वारा श्रीराम की महिमा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
अंगद कहता है कि हे रावण तुमको राम की महिमा का ज्ञान नहीं है। जिन्होंने पत्थर रूपी अहिल्या को स्पर्शमात्र से पवित्र (उद्धार) कर दिया, जिस शिव के धनुष को कोई भी वीर हिला नहीं पाया था उसके टुकड़े कर दिए, जिन्होंने समस्त पृथ्वी को क्षण भर में छत्र रहिल कर दिया उनकी शक्ति का कौन पार पा सकता है। राम के अलावा ऐसा कौन कर सकता है। जिस राम के स्पर्श से पर्वत समूह कमल पत्तों की तरह सागर के पानी पर तैर गये जिसका धमाका तुम्हारे हृदय पर आज भी है। ये गुण तो नारायण में भी नहीं हैं। यहाँ मनुष्य या बन्दर कौन है? अर्थात् यहाँ राम के साथ होने वाले महान् गुणवान हैं। राम में नारायण से अधिक बल प्रभाव है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. राम की परम शक्ति का वर्णन हुआ है।
  2. यमक, अनुप्रास अलंकार तथा पदमैत्री की सुन्दरता दर्शनीय है।
  3. प्रवाहमयी ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

विश्वास की साँझ भाव सारांश

आधुनिक हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि गिरिजा कुमार माथुर ने अपने काव्य में जीवन-संवेदना के विविध रूप अंकित किए हैं। आपका काव्य विषम स्थितियों में भी उत्प्रेरणा देने की क्षमता से युक्त है। विश्वास की साँझ कविता में आस्था और विश्वास की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। ये जीवन मूल्य जीवन के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं उसका संकेत यह कविता करती है। कवि कहते हैं कि जीवन भर संघर्ष करने के बाद भी जिन्दगी में कुछ उपलब्धि न मिल सकी।

आज तक आस्था और विश्वास के सहारे जो संघर्ष करता रहा, आज वे भी डगमगा रहे हैं। मेरी दयनीय दशा हो गयी है। मैंने नियति से आस्था और विश्वास के अतिरिक्त सब कुछ लूट लेने को कहा किन्तु उसने स्पष्ट कर दिया कि जीवन में कुछ भी साथ नहीं होता है। वस्तुतः आस्था और विश्वास के कवच-कुंडल दान करने के बाद ही निहत्थे होकर मृत्यु से संघर्ष करना होता है। इस प्रकार इस कविता में आस्था और विश्वास त्याग के प्रेरक बनकर प्रस्तुत हुए हैं।

विश्वास की साँझ संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

[1] कुछ न पाया जिन्दगी में
रही साँझ अनाथ
लौट आये युद्ध से हम
हाय खाली हाथ
आज तक मानी नहीं
वह आज मानी हार
एक था विश्वास
वह भी छोड़ता है साथ।

शब्दार्थ :
जिन्दगी = जीवन; अनाथ = बिना संरक्षक, असहाय; साँझ = संध्या; साथ छोड़ना = दूर होना।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘विश्वास की साँझ’ पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता गिरिजा कुमार माथुर हैं।

प्रसंग :
कवि ने इन पंक्तियों के माध्यम से जीवन की व्यस्तता एवं संघर्ष का हृदयस्पर्शी चित्रण किया है।

व्याख्या :
जीवन संवेदनाओं में विभिन्न रूपों का अंकन करने की सामर्थ्य रखने वाले कवि कहते हैं कि समस्त जीवन भर संघर्ष करने के बाद भी जीवन की संध्या अनाथ, असहाय रह . गई। हम जीवन युद्ध में संघर्ष करते-करते खाली हाथ लौट आए हैं। कुछ भी उल्लेखनीय प्राप्त नहीं कर सके हैं। संघर्षशील जीवन जीते हुए मैंने जो हार स्वीकार नहीं की थी आज स्वीकार कर ली है। मेरे पास मात्र एक विश्वास था जो संघर्ष की प्रेरणा देता था। आज वह भी साथ छोड़ रहा है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण का अंकन हुआ है।
  2. सरल सुबोध किन्तु प्रभावी भाषा में विषय का प्रतिपादन हुआ है।

MP Board Solutions

[2] अब अकेला हूँ झुका है माथ
सरल होगा आखिरी आघात
कहा मैंने नियति से
सब खत्म कर दे
लूट ले
एक मेरी आस्था,
विश्वास रहने दे।

शब्दार्थ :
माथ = मस्तक; आघात = प्रहार; नियति = भाग्य; खत्म = समाप्त; आखिरी = अन्तिम।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में जीवन के उत्तरार्द्ध की असहाय अवस्था (वृद्धावस्था) में होने वाली निराशाजन्य स्थिति का अंकन हुआ है।

व्याख्या :
जीवन में हार मानने पर असहाय हुए कवि कहते हैं कि मैं आज अकेला रह गया हूँ, कोई संगी-साथी नहीं है। इसलिए निराशा से आज मेरा मस्तक झुक गया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि मृत्यु का अन्तिम प्रहार अधिक कष्टप्रद नहीं होगा। मैंने नियति से प्रार्थना की कि मेरे पास जो भी है उस सब को तू समाप्त कर दे और लूटकर ले जा; किन्तु मेरी आस्था और विश्वास को मेरे ही पास रहने दे। मैं इनसे रहित नहीं होना चाहता हूँ।

काव्य सौन्दर्य :

  1. जीवन-निराशा का स्वाभाविक अंकन हुआ है।
  2. अनुप्रास अलंकार तथा सरल, सुस्पष्ट भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

[3] नियति बोली
आस्था वाले
अरे ओ होश कर
जिन्दगी में साथ देता है
कभी कोई बशर
असलियत से युद्ध होता है निहत्था
जान ले
इसलिए तू
पूर्व इसके
कवच कुण्डल दान दे।

शब्दार्थ :
नियति = भाग्य, अदृष्ट; होश = भली प्रकार जान ले; असलियत = वास्तविकता; निहत्था = खाली हाथ; कवच-कुण्डल = कवच और कुण्डल कर्ण के पास थे; जिनके रहते उसे कोई पराजित नहीं कर सकता था किन्तु इन्द्र ने वे कर्ण से दान में माँग लिए और दानवीर कर्ण मना नहीं कर पाए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस पद्यांश में स्पष्ट किया गया है कि जब तक आस्था तथा विश्वास का त्याग नहीं होगा, जीवन समापन असंभव है।

व्याख्या :
जब नियति से सब कुछ लेने पर भी आस्था एवं विश्वास को छोड़ देने की बात कही तो नियति ने कहा कि हे आस्था चाहने वाले मानव? तू भली प्रकार जान ले कि जीवन में कोई किसी का साथ नहीं देता है। जीवन की वास्तविकता तो मृत्यु है, उससे खाली हाथ ही संघर्ष करना होता है अर्थात् मृत्यु के समय मानव के साथ कुछ नहीं होता है। इसलिए हे मानव ! तू आस्था और विश्वास रूपी कवच-कुण्डल का दान कर दे।

काव्य सौन्दर्य :

  1. यहाँ पर आस्था और विश्वास त्याग की भावना को परिपुष्ट करते हैं।
  2. सरल, सुबोध एवं स्पष्ट भाषा में गम्भीर विषय को समझाया गया है।

MP Board Solutions

MP Board Class 11th Hindi Solutions