MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Chapter 7 ऐक्यबलम्

MP Board Class 8th Sanskrit Solutions Surbhi Chapter 7 ऐक्यबलम्

MP Board Class 8th Sanskrit Chapter 7 अभ्यासः

Mp Board Class 8 Sanskrit Solution Chapter 7 प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत(शब्द में उत्तर लिखो-)
(क) चटकायुगलं कुत्र निवसति स्म? (चिड़ियों का जोड़ा कहाँ रहता था।)
उत्तर:
निम्बवृक्षे। (नीम के पेड़ पर)

(ख) गजः कां नाशितवान्? (हाथी ने किसको नष्ट किया?)
उत्तर:
अण्डानि। (अण्डों को)

(ग) चटकायुगलस्य रोदनं श्रुत्वा कः आगतः? (चिड़ियों के जोड़े का रोना सुनकर कौन आया ?)
उत्तर:
काष्ठभेदकः। (कठफोड़वा)

(घ) काष्ठभेदकः काम् आनीतवान्? (कठफोड़वा किसको लाया?)
उत्तर-मक्षिकाम्। (मक्खी को)

(ङ) जलं पातुं गजं कः आकर्षितवान्? (पानी पीने के लिए हाथी को किसने आकर्षित किया?)
उत्तर:
मण्डूकः। (मेंढक ने)

Mp Board Class 8 Sanskrit Chapter 7 प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत(एक वाक्य में उत्तर लिखो-)
(क) बुद्धिमान् कः अस्ति? (बुद्धिमान् कौन है?)
उत्तर:
यः मृतं गतं च न चिन्तयति। (जो मरे हुए और गये हुए की नहीं सोचता है।)

(ख) मित्रस्य कार्य कः साधयति? (मित्र के कार्य को कौन पूरा करता है?)
उत्तर:
मित्रस्य कार्यं मित्रं साधयति। (मित्र के काम को मित्र पूरा करता है।)

(ग) मण्डूकः मक्षिकां किम् उपायम् उक्तवान्? (मेंढक ने मक्खी को क्या उपाय कहा?)
उत्तर:
मण्डूकः मक्षिका एकीभूता दुर्बलाः अपि सबलं शत्रु हन्तुं शक्नुवन्ति इति उपायम् उक्तवान्। (मेंढक ने मक्खी से एक होकर दुर्बल भी सबल शत्रु को मार सकते हैं, इस उपाय को कहा।)

(घ) मक्षिका गजस्य कर्णयोः किं कृतवती? (मक्खी ने हाथी के कानों में क्या किया?)
उत्तर:
मक्षिका गजस्य कर्णयों वीणावादनं कृतवती। (मक्खी ने हाथी के कानों में वीणा वादन किया।)

(ङ) तैः मत्तगजं केन बलेन मारितः? (उन्होंने मतवाले हाथी को किस शक्ति से मारा?)
उत्तर:
तैः मत्तगजं ऐक्यबलेन मारितः। (उन्होंने मतवाले हाथी को एकता की शक्ति से मारा।)

Class 8 Sanskrit Chapter 7 Mp Board प्रश्न 3.
युग्मनिर्माणं कुरुत(जोड़े बनाओ-)
Class 8 Sanskrit Mp Board Solution
उत्तर:
(क) → (iv)
(ख) → (v)
(ग) → (i)
(घ) → (ii)
(ङ) → (iii)

Mp Board Class 8 Sanskrit Solution प्रश्न 4.
रिक्तस्थानानि पूरयत(रिक्त स्थान भरो-)
(क) निम्बवृक्षे एकं ……… प्रतिवसति स्म।
(ख) चटकायुगलं ………….. आरब्धवत्।
(ग) मक्षिका स्वमित्रम् ……….. पृष्टवती।
(घ) मत्तगजः ………….. पतितः।
(ङ) ते ………….. मत्तगजं मारितवन्तः।
उत्तर:
(क) चटकायुगलम्
(ख) कातरक्रन्दनम्
(ग) उपायम्
(घ) पङ्के
(ङ) ऐक्येन।

Mp Board Solution Class 8 Sanskrit प्रश्न 5.
एकताविषये पञ्चवाक्यानि लिखत(एकता के विषय पर पाँच वाक्य लिखो-)
उत्तर:
(क) ऐक्यबलेन दुर्बलाः अपि सबलं शत्रु हन्तुं शक्नुवन्ति।
(ख) एकतया सर्वाणि कार्याणि सिद्धयन्ति।
(ग) एकतया तैः मत्तगजः मारितः।
(घ) वर्तमानसमये एकतायाः महती आवश्यकता अस्ति।
(ङ) मानवजीवने एकतायाः विशेषमहत्वं वर्तते।

Mp Board Class 8th Sanskrit Solution प्रश्न 6.
पाठे आगतानां जीवानां नामानि परस्परं सम्बन्धं च लिखत (पाठ में आये हुए जीवों के नाम और आपस में सम्बन्ध लिखो-)
उत्तर:
Sanskrit Class 8 Mp Board

ऐक्यबलम् हिन्दी अनुवाद

कस्मिञ्चित् वने निम्बवृक्षे एकं चटकायुगलं प्रतिवसति स्म। समये चटकया अण्डानि दत्तानि, युगलम् अति प्रसन्नम् आसीत्। एकस्मिन् दिने आतपपीडितः एकः मदमत्त: गजः तत्र आगतः। मदेन सः तस्य वृक्षस्य तां शाखां नाशितवान् यस्यां शाखायां चटकायाः अण्डानि आसन्। अतः अण्डानि अपि नष्टानि। चटकायुगलं कातरक्रन्दनम् आरब्धवत्। रोदनं श्रुत्वा तयोः मित्रं काष्ठभेदकः पक्षी आगतः। सः उक्तवान् रोदनेन अलम्। तेन उक्तं सः एव बुद्धिमान् यः मृतं गतं च न चिन्तयति। चटका तम् अवदत्, “एषः मत्तगजः हन्तव्यः अन्यथा एषः सर्वान् पशुपक्षिपादपान् नाशयिष्यति।” काष्ठभेदकः अवदत्-अहं स्वमित्रम् मक्षिकाम् आनयामि कदाचित् सा गजं हन्तुम् उपायं चिन्तयेत्।

अनुवाद:
किसी वन में नीम के पेड़ पर एक चिड़ियों का जोड़ा (नर-मादा) रहता था। समय पर चिड़िया द्वारा अण्डे दिये गये, जोड़ा बहुत प्रसन्न था। एक दिन धूप से दुःखी एक मतवाला हाथी वहाँ आया। मस्ती में उसने उस पेड़ की उस डाल को तोड़ दिया जिसमें चिड़िया के अण्डे थे। इसलिए अण्डे भी नष्ट हो गये। चिड़ियों के जोड़े ने करुण रोदन प्रारम्भ कर दिया। रोना सुनकर उन दोनों का मित्र कठफोड़वा नामक पक्षी आ गया। उसने कहा रोना बस करो। उसने कहा वह ही बुद्धिमान है जो मरे हुए और गये हुए की चिन्ता नहीं करता। चिड़िया ने उससे कहा, “यह मतवाला हाथी मारा जाना चाहिए अन्यथा यह सभी पशु-पक्षी और पेड़ों को नष्ट कर देगा।” कठफोड़वा बोला-मैं अपनी मित्र मक्खी को लाता हूँ शायद वह हाथी को मारने के लिए उपाय सोचे।

सः गत्वा मक्षिकां न्यवेदयत् यत्-मम चटकामित्रस्य गृहम् एकेन मत्तगजेन विनष्टम्। तस्य वधाय सहायतां करोतु। मक्षिका अवदत-“यत् मित्रम् एव मित्रस्य कार्य साधयति।” मक्षिका तदा स्वमित्रं चतुरमण्डूकम् उपायं पृष्टवती। मण्डूकः उक्तवान्-‘एकीभूता दुर्बलाः अपि सबलं शत्रु हन्तुं शक्नुवन्ति।’ तैः सर्वेः मिलित्वा एका योजना निश्चिता। सर्वेषां दायित्वं वितरितम्। तदनुसारं मध्याह्ने मक्षिकया गजस्य कर्णयोः वीणावादनं कृत्रम्। एतेन गजः नयने निमील्य वीणावादनेनमुग्धः अभवत्। तावत् एव काष्ठभेदकः तस्य नयने च प्रहारेण व्यनाशयत्। अनन्तरं यत्र महान् पङ्कः आसीत् तत्र मण्डूकः ध्वनिना तं जलं पातुम् आकर्षितवान्। अन्ध: गजः तस्मिन् पङ्के पतितः मृतश्च। एवं तैः तीक्ष्णबुद्धया ऐक्येन सः मत्तगजः मारितः। आत्मनो वनस्य च रक्षणं कृतम्।

अनुवाद :
उसने जाकर मक्खी से कहा कि-मेरी चिड़िया। मित्र का घर एक मतवाले हाथी ने नष्ट कर दिया है। उसके वध। (मारने) करने में सहायता करो। मक्खी ने कहा कि “मित्र ही। मित्र का कार्य पूरा करता है।” मक्खी ने तब अपने मित्र मेंढक से उपाय पूछा। मेंढक ने कहा-‘एकत्र होकर कमजोर भी बलशाली। शत्रु को मार सकते हैं।’ उन सबने मिलकर एक योजना निश्चित। की। सभी का दायित्व बाँट दिया गया। उसके अनुसार मध्यान्ह। में मक्खी ने हाथी के कानों में वीणा वादन किया। इससे हाथी। आँखें बन्द कर वीणा वादन से मोहित हो गया। तभी कठफोड़वे ने उसकी आँखें चोंच के प्रहार से फोड़ दी। इसके बाद जहाँ बहुत दलदल था वहाँ मेंढक ने आवाज से उसको पानी पीने केलिए आकर्षित किया। अन्धा हाथी उस दलदल में गिर गया और मर गया।

इस प्रकार, उन सबके द्वारा तेज बुद्धि के द्वारा एकता से वह मतवाला हाथी मारा गया। उन्होंने अपनी और वन की रक्षा की।

ऐक्यबलम् शब्दार्थाः

आतपपीडितः = धूप से दुःखित। निम्बवृक्षे = नीम के पेड़ पर। चटकायुगलम् = चिड़ियों का जोड़ा (नर-मादा)। काष्ठभेदकः = कठफोड़वा नाम का पक्षी। मत्तगजः = मतवाला हाथी। चतुरमण्डूकम् = होशियार मेंढक। कातरक्रन्दनम् = करुण रोदन। मक्षिका = मक्खी। एकीभूताः = एकत्र होकर। सबलम् = बलशाली को। निमील्य = बन्दकर। तीक्ष्णबुद्धया = तेज बुद्धि के द्वारा। वीणावादनमुग्धः = वीणा वादन से मोहित हुआ।

MP Board Class 8th Sanskrit Solutions

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश (निबन्ध, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

मैं और मेरा देश अभ्यास

बोध प्रश्न

मैं और मेरा देश अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

मैं और मेरा देश MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 1.
पंजाब केसरी के नाम से कौन जाना जाता है?
उत्तर:
पंजाब केसरी के नाम से लाला लाजपत राय को जाना जाता है।

Main Aur Mera Desh MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 2.
‘दीवार में दरार पड़ गई’ का आशय किससे है?
उत्तर:
‘दीवार में दरार पड़ गई’ से लेखक का आशय उनके मन में जो पूर्णता का आनन्द भाव था उसमें उनको कमी का अनुभव होने से है।

मैं और मेरा देश पाठ के प्रश्न उत्तर MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 3.
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिये गये फल के मूल्य के रूप में क्या माँगा?
उत्तर:
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिये गये फल के मूल्य के रूप में यह माँगा कि यदि आप मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहियेगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

मैं और मेरा देश के प्रश्न उत्तर MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 4.
बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति को कौन-सा उपहार दिया?
उत्तर:
बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति कमाल पाशा को मिट्टी की छोटी हंडिया में अपने हाथ से तोड़ा गया पाव भर शहद दिया था।

मैं और मेरा देश लघु उत्तरीय प्रश्न

Main Aur Mera Desh Question Answer MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 1.
तेजस्वी पुरुष लाला लाजपत राय की दो विशेषताएँ कौन-सी थीं?
उत्तर:
तेजस्वी पुरुष लाला लाजपत राय की दो विशेषताएँ थीं-एक तो वे अपनी लेखनी द्वारा देश के लोगों में ओज का संचार करते थे, दूसरे वे जन सभाओं में अपनी तेजस्वी वाणी द्वारा लोगों में उत्साह का संचार किया करते थे।

Mai Aur Mera Desh MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 2.
देहाती बूढ़ा कमाल पाशा के पास क्यों गया था?
उत्तर:
देहाती बूढ़ा राष्ट्रपति कमाल पाशा के जन्मदिन पर उन्हें उपहार देने गया था। उपहार में वह एक हंडिया में पाव भर शहद लेकर आया था। कमाल पाशा ने उस उपहार को सराहते हुए कहा, “दादा आज सर्वोत्तम उपहार तुमने ही भेंट किया क्योंकि इसमें तुम्हारे हृदय का शुद्ध प्यार है।”

Main Aur Mera Desh Ke Question Answer MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 3.
स्वामी रामतीर्थ जापानी युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए, क्यों?
उत्तर:
स्वामी रामतीर्थ जापानी युवक का उत्तर सुनकर इसलिए मुग्ध हो गए क्योंकि उस युवक ने अपने कार्य से अपने देश के गौरव को बहुत ऊँचा उठा दिया था।

प्रश्न 4.
लेखक के अनुसार हमारे देश को किन दो बातों की सर्वाधिक आवश्यकता है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार हमारे देश को दो बातों की सर्वाधिक आवश्यकता है-एक शक्ति बोध की और दूसरी सौन्दर्य बोध की। हम यह समझ लें कि हमारा कोई भी काम ऐसा न हो जो देश में कमजोरी की भावना को बल दे या कुरुचि की भावना को। हम कभी भी अपने देश के अभावों एवं कमजोरियों की सार्वजनिक स्थलों पर चर्चा न करें और न तो गन्दगी फैलायें और न गन्दे विचार व्यक्त करें।

प्रश्न 5.
देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास कैसे हो रहा है?
उत्तर:
यदि आप चलती रेलों में, मुसाफिर खानों में, चौपालों पर और मोटर-बसों में बैठकर देश की कमियों और बुराइयों की चर्चा करना अपना धर्म समझते हैं और यदि दूसरे देशों की तुलना में अपने देश को नीचा या छोटा मानते हैं, तो आप देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास कर रहे हैं।

मैं और मेरा देश दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जय’ बोलने वालों का महत्त्व प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर:
‘जय’ बोलने वालों का बहुत महत्त्व है। किसी भी मैच में जब कोई वर्ग खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन पर तालियाँ बजाता है या उनका जय-जयकार करता है तो खिलाड़ियों में आत्म संचार एवं उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। गिरता हुआ खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर जाता है। कवि-सम्मेलनों और मुशायरों में तो तालियाँ बजाने या जयकारा बोलने से कवियों एवं शायरों में दो गुना जोश आ जाता है और वे मंचों पर छा जाते हैं।

प्रश्न 2.
जापान में शिक्षा लेने आये विद्यार्थी की कौन-सी गलती से उसके देश के माथे पर कलंक का टीका लग गया?
उत्तर:
जापान में किसी अन्य देश से शिक्षा लेने आये विद्यार्थी ने सरकारी पुस्तकालय से उधार ली गयी पुस्तक में से कुछ दुर्लभ चित्रों को फाड़ लिया था। उसकी इस हरकत को एक अन्य जापानी लड़के ने देख लिया था। अतः उसने चोर लड़के की शिकायत कर दी। पुलिस ने उसे पकड़ लिया और उसके कब्जे से चोरी किये गये चित्र बरामद कर लिये। फिर उस लड़के को देश से निकाल दिया गया तथा पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस देश का (जिसका वह चोर विद्यार्थी था) कोई निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता। इस प्रकार इस विद्यार्थी ने अपने नीच कार्य से अपने देश के माथे पर कलंक का टीका लगा दिया था।

प्रश्न 3.
देश के शक्तिबोध को चोट कैसे पहुँचती है?
उत्तर:
यदि आप बात-बात में सार्वजनिक स्थानों पर, चलती रेलों में, क्लबों में, मुसाफिरखानों, चौपालों पर या मोटर बसों में बैठकर अपने देश की कमियों को उजागर करते रहते हैं या देश की निन्दा करते रहते हैं या फिर दूसरे देशों से तुलना करते हुए अपने देश को हेय या तुच्छ बताते रहते हैं, तो निश्चय ही आप अपने इन कार्यों से देश के शक्तिबोध को चोट पहुंचा रहे हैं।

प्रश्न 4.
‘देश के सौन्दर्य बोध को आघात लगता है तो – संस्कृति को गहरी चोट लगती है’-इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
यदि समाज में सामान्य शिष्टाचार नहीं है, आप में। खान-पान और उठने-बैठने में शिष्टता नहीं है, फूहड़पन है। यदि आप केला खाकर छिलका रास्ते में फेंक देते हैं, घर का कूड़ा निर्धारित स्थान पर न फेंककर इधर-उधर फेंक देते हैं, दफ्तर, घर, गली, होटल, धर्मशालाओं में रहते हुए आप अपनी पीक या थूक इधर-उधर कर देते हैं या फिर अपने मुँह से गन्दी गालियाँ निकालते हैं, तो निश्चय ही आपके द्वारा किये गये इन कार्यों से देश के सौन्दर्य बोध को आघात लगता है तथा इससे देश की संस्कृति को गहरी चोट लगती है।

प्रश्न 5.
देश के लाभ और सम्मान के लिए नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
देश के लाभ और सम्मान के लिए नागरिकों को कभी भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे देश की प्रतिष्ठा पर आँच आये। हमें अपने आपको सभ्य एवं संस्कारवान बनाना चाहिए। हमेशा दूसरों का आदर करें, सत्य बोलें एवं देश से प्रेम करें। हम भूलकर भी ऐसा कोई काम न करें जिससे देश की बदनामी हो। अपने उठने-बैठने एवं बात करने में हमें शिष्टता का पालन करना चाहिए। घर, दफ्तर, धर्मशाला, होटल आदि स्थान पर गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए। जरूरत मन्दों एवं गरीबों की सदैव सहायता करनी चाहिए।

मैं और मेरा देश भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह करके समास का नाम बताइए-
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का संधि-विच्छेद कीजिए-
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम लिखिए-
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-3

मैं और मेरा देश महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मैं और मेरा देश बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक भूकम्प आया था जिससे दीवार में दरार पड़ गयी। वह भूकम्प कहाँ आया था?
(क) प्रान्त में
(ख) विदेश में
(ग) प्रदेश में
(घ) मन-मानस में।
उत्तर:
(घ) मन-मानस में।

प्रश्न 2.
तेजस्वी पुरुष कौन थे जिन्हें ‘पंजाब केसरी’ कहा जाता है?
(क) लाला लाजपत राय
(ख) वल्लभभाई पटेल
(ग) चन्द्रशेखर आजाद
(घ) सुभाषचन्द्र बोस।
उत्तर:
(क) लाला लाजपत राय

प्रश्न 3.
हमारे देश के कौन-से सन्त जापान गये?
(क) दयानन्द
(ख) रामानन्द
(ग) विवेकानन्द
(घ) स्वामी रामतीर्थ।
उत्तर:
(घ) स्वामी रामतीर्थ।

प्रश्न 4.
बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति को उपहार में भेंट किया (2015)
(क) फल
(ख) मिठाई
(ग) रुपया
(घ) शहद।
उत्तर:
(घ) शहद।

प्रश्न 5.
शल्य कौन था?
(क) अर्जुन का सारथी
(ख) कर्ण का सारथी
(ग) कृष्ण का सारथी
(घ) कोचवान।
उत्तर:
(ख) कर्ण का सारथी

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. स्वामी रामतीर्थ ………… गये थे। (2009)
  2. जीवन एक युद्ध स्थल है और युद्ध में ………… ही तो काम नहीं होता।
  3. एक दिन वह सरकारी पुस्तकालय से एक पुस्तक पढ़ने को लाया जिसमें कुछ ………… चित्र थे।
  4. राजधानी में अपनी …………. का उत्सव समाप्त कर वे अपने भवन में ऊपर चले गये।
  5. क्या आप कभी केला खाकर ………… रास्ते में फेकते हैं?

उत्तर:

  1. जापान
  2. लड़ना
  3. दुर्लभ
  4. वर्षगाँठ
  5. छिलका।

सत्य/असत्य

  1. स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान गए थे। (2016, 17)
  2. कमालपाशा उन दिनों मलेशिया के राष्ट्रपति थे।
  3. क्या कभी अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है,मुहावरा है।।
  4. लाला लाजपत राय की कलम और वाणी दोनों तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश img-4
उत्तर:
1. → (ङ)
2. → (घ)
3. → (ग)
4. → (ख)
5. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. श्री कन्हैया लाल मिश्र जी ने किन पत्रों का सम्पादन किया?
  2. हमारे देश को कौन-सी दो बातों की सबसे अधिक जरूरत है?
  3. हमारे देश के कौन-से सन्त जापान गये?
  4. यह निबन्ध किस शैली में रचा गया है?

उत्तर:

  1. ज्ञानोदय, नया जीवन और विकास
  2. एक शक्तिबोध दूसरा सौन्दर्यबोध
  3. स्वामी रामतीर्थ
  4. दृष्टान्त शैली।

मैं और मेरा देश पाठ सारांश

प्रस्तुत निबन्ध में निबन्धकार ने व्यक्ति के जीवन-विकास में घर,नगर, समाज की भूमिका का उल्लेख करते हुए देश के प्रति उसके कर्त्तव्यबोध को जाग्रत करने की चेष्टा की है। निबन्धकार के अनुसार यदि हम अपना सम्मान चाहते हैं, तो हमें अपने साथ-साथ अपने देश का सम्मान भी करना चाहिए और अपने देश का गौरव बढ़ाने के लिए ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे अन्य देशों में भी हमारे देश का नाम ऊँचा हो तथा सभी देश हमारा और हमारे देश का सम्मान करें।

व्यक्ति और देश के सम्बन्धों की व्याख्या करते हुए निबन्धकार ने देश के गौरव और प्रतिष्ठा के लिए प्रत्येक व्यक्ति की देशनिष्ठा को रेखांकित किया है। हमें भी उन महापुरुषों की तरह कार्य करने चाहिए जिनके प्रयास से हमारा देश स्वतन्त्र हुआ, हमारे देश का गौरव बढ़ा। ऐसा ही एक उदाहरण स्वर्गीय पंजाब केसरी लाला लाजपत राय का निबन्धकार ने दिया है, जिन्होंने अपनी कलम और वाणी से हमारे देश को एक अलग पहचान दी। लाला जी के अनुसार भारतवर्ष की गुलामी उनके लिए एक कलंक थी जिसे उन्होंने अपनी कलम से भारतवासियों के समक्ष रखा था, क्योंकि यह गुलामी उनके लिए एक मानसिक भूकम्प के समान थी।

दर्शनशास्त्रियों के अनुसार जीवन बहुमुखी है। यदि हम कुछ नहीं कर सकते तो हमें उनका उत्साहवर्धन करना चाहिए जो अपने देश,समाज,नगर के लिए कुछ कार्य करना चाहते हैं। हमारे राष्ट्र के महान् सन्त स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान जा रहे थे। वह भोजन के रूप में फल ही ग्रहण करते थे। गाड़ी स्टेशन पर रुकी। किसी ने बताया कि यहाँ अच्छे फल प्राप्त नहीं होते। एक जापानी युवक प्लेटफार्म पर खड़ा था, उसने स्वामी जी को फल दिये, साथ ही उसने स्वामी जी से प्रार्थना की कि इस घटना को किसी को न बतायें, यह उस युवक की देशभक्ति का उदाहरण है।

पुस्तकालय में चोरी करते हुए विदेशी नागरिक को बाहर निकाल दिया गया, यह देश के प्रति उसकी अपूर्ण निष्ठा है। तुर्की के राष्ट्रपति कमाल पाशा ने विश्राम त्यागकर तीन कोस से पैदल आये हुए वृद्ध से भेंट की। रेल का सफर भी हमारे देश में अन्य देशों की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद है। अन्त में लेखक का कथन है कि चुनाव के समय योग्य व्यक्ति को मत देना ही अधिक श्रेयस्कर है। इसी से देश और समाज की उन्नति में चार चाँद लगेंगे।

मैं और मेरा देश संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) अपने महान् राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाये और जो घोर अन्धकार और भयंकर बवण्डरों के झकझोरों में जीवन भर खेले, उन दीपकों को बुझने से बचाते रहे, उन्हीं में एक थे वे लालाजी। उनकी कलम और वाणी दोनों में तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं।

कठिन शब्दार्थ :
पराधीनता = गुलामी। दीन दिनों = बुरे दिनों में। गौरव के दीपक = देश की प्रतिष्ठा को जीवित रखा। तेजस्विता = तेज, प्रताप की आभा।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘मैं और मेरा देश’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इसके लेखक श्री कन्हैया लाल मिश्र। ‘प्रभाकर’ हैं।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक ने लाला लाजपत राय की देश भक्ति एवं तेजस्विता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि अपने महान् देश की गुलामी के उन दुर्दिनों में जब देश को कदम-कदम पर अपमान का घूट पीना पड़ता था, लाला लाजपत राय ने अपने रक्त से गौरव के दीपक को जलाये रखा। उन पर अनेक भयंकर बवण्डर एवं झोंके आये पर वे अपने लक्ष्य से बिल्कुल भी हटे नहीं। उनकी कलम में तेजस्विता थी जिसको वे अपने लेखों में लिखकर विदेशी सत्ता के विरुद्ध आग उगला करते थे और समय-समय पर जनता जनार्दन को अपनी तेजस्वी एवं ओजस्वी वाणी से प्रोत्साहन देते रहते थे।

विशेष :

  1. लालाजी की अनुपम देशभक्ति पर प्रकाश डाला गया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) हाँ जी, युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्व है। कभी मैच देखने का अवसर मिला ही होगा, आपको। देखा नहीं आपने कि दर्शकों की तालियों से खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है और गिरते खिलाड़ी उभर जाते हैं। कविसम्मेलनों और मुशायरों की सफलता दाद देने वालों पर निर्भर करती है। इसलिए मैं अपने देश का कितना भी साधारण नागरिक क्यों न हूँ, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

कठिन शब्दार्थ :
पैरों में बिजली= चुस्ती-फुर्ती, उत्तेजना। दाद = तारीफ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस गद्यांश में लेखक जय बोलने के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कह रहा है।

व्याख्या :
लेखक प्रभाकर जी कहते हैं कि हाँ जी, युद्ध में जय बोलने वालों का बड़ा महत्त्व होता है। लेखक पाठकों से प्रश्न करता है कि आपको जीवन में कभी किसी मैच को देखने का मौका मिला होगा। उस समय दर्शक गण जब तालियाँ बजाते हैं तो खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ जाता है, उनके पैरों में बिजली जैसी गति आ जाती है। इतना ही नहीं जो खिलाड़ी निराशा में डूब जाते हैं, उनमें भी इस जय-जयकार से जोश आ जाता है और उनकी पराजय जय में बदल जाती है। यही बात कवि-सम्मेलनों एवं मुशायरों पर भी लागू होती है। यदि श्रोताओं की ओर से सुनाने वालों को बार-बार दाद मिलने लगेगी, तो सुनाने वालों .का उत्साह कई गुना बढ़ जायेगा। अतः यह हमारा पवित्र कर्तव्य है कि हम अपने देश के सम्मान की रक्षा हर प्रकार से करें। चाहे हम साधारण नागरिक हों या महत्त्वपूर्ण। देश सम्मान हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

विशेष :

  1. लेखक ने जय के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(3) जहाँ एक युवक ने अपने काम से अपने देश का सिर ऊंचा किया था, वहीं एक युवक ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का ऐसा टीका लगाया, जो जाने कितने वर्षों तक संसार की आँखों में उसे लांछित करता रहा।

कठिन शब्दार्थ :
सिर ऊँचा किया = देश का सम्मान बढ़ाया। मस्तक पर कलंक का टीकादेश को नीचा दिखाया।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मत है कि हम अच्छे कामों से देश का सम्मान बढ़ा सकते हैं और बुरे कार्यों से देश को नीचा गिरा सकते हैं।

व्याख्या :
लेखक प्रभाकर जी ने देश के दो युवकों के उदाहरण देकर यह बताना चाहा है कि अच्छे कार्यों से देश का सम्मान बढ़ता है। इसके लिए उन्होंने जापान के उस युवक का उदाहरण दिया है जिसने स्वामी रामतीर्थ की इस टिप्पणी पर कि ‘जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते’ उस जापानी युवक ने अपने देश की बेइज्जती होते देख दौड़कर ताजे और अच्छे फल लाकर स्वामी जी को दे दिए। जब स्वामी जी ने उस बालक को फलों का मूल्य देना चाहा तो उसने मूल्य लेने से मना कर दिया और कहा कि यदि आप इसका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि अपने देश में जाकर किसी से यह मत कहना कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

लेखक ने दूसरा उदाहरण उस युवक का दिया जो अपने देश से जापान में शिक्षा लेने आया था। उस बालक ने सरकारी पुस्तकालय से उधार ली हुई एक पुस्तक में से कुछ दुर्लभ चित्र चुरा लिए। उसकी इस हरकत को एक जापानी विद्यार्थी ने देख लिया था। फलतः उसने इसकी सूचना पुस्तकालय को दे दी। पुलिस ने तलाशी लेकर उस विद्यार्थी से वे चित्र बरामद कर लिए फिर उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया। इस दूसरे युवक ने अपने बुरे काम से अपने देश के माथे पर कलंक का टीका लगाया। अतः लेखक का मानना है कि अच्छे काम करने वालों की सदा प्रशंसा होती है और बुरे काम करने वालों की निन्दा।

विशेष :

  1. लेखक ने अच्छे गुण अपनाने का युवकों को सन्देश दिया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(4) जैसा मैं अपने लाभ और सम्मान के लिए हरेक छोटी-छोटी बात पर ध्यान देता हूँ, वैसा ही मैं अपने देश के लाभ और सम्मान के लिए भी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दै। यह मेरा कर्तव्य है और जैसे मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ-यह मेरा अधिकार है। बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं।

कठिन शब्दार्थ :
सम्मान = आदर, इज्जत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि व्यक्ति विशेष को जैसा मान-सम्मान पाने की इच्छा होती है, वैसा ही देश के लिए भी किया जाना चाहिए।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जिस तरह मैं अपने व्यक्तिगत लाभ एवं आदर के लिए छोटी से छोटी बात पर भी ध्यान देता हूँ, उसी तरह मुझे अपने देश का भी ध्यान रखना चाहिए। मेरा यह कर्त्तव्य है। जिस प्रकार मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ-यह मेरा अधिकार है। लेखक यह बताना चाहता है कि मैं और मेरा देश दोनों एक ही हैं, इनमें कहीं भेद नहीं होना चाहिए।

विशेष :

  1. लेखक अपने को देश से अलग नहीं मानता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(5) मैंने जो कुछ जीवन में अध्ययन और अनुभव सीखा है, वह यही है कि महत्त्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है। बड़े से बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है और छोटे से छोटा कार्य भी महान है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना है।

कठिन शब्दार्थ :
विशालता= व्यापकता, बड़ा होना। हीन = छोटा, तुच्छ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक कहता है कि भावना से ही कोई कार्य अच्छा या बुरा, बड़ा या छोटा होता है।

व्याख्या :
लेखक प्रभाकर जी कहते हैं कि मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में जो कुछ भी अध्ययन और अनुभव किया है, उससे मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि जीवन में महत्त्व कार्य के छोटे-बड़े से नहीं होता है, उसका महत्त्व तो काम करने की भावना से होता है। बड़े से बड़ा कार्य भी तुच्छ श्रेणी का बन जायेगा, यदि उसके पीछे कर्ता की भावना पवित्र एवं महान नहीं है।

विशेष :

  1. लेखक भावना को महान् मानता है, कार्य को नहीं।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(6) आपके द्वारा देश के सौन्दर्य बोध को भंयकर आघात पहुँच रहा है और आपके द्वारा देश की संस्कृति को गहरी चोट पहुंच रही है।

कठिन शब्दार्थ :
आघात = चोट।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक यह बताना चाहता है कि यदि आपका जीवन साफ-सफाई से दूर रहने वाला एवं गन्दगी प्रिय है तो इससे आप देश के सौन्दर्य बोध एवं संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि यदि आप अपने घर की गन्दगी सड़क पर फेंकते हैं और उसे उसके स्थान पर नहीं फेंकते हैं या अपने मुँह से अपशब्द निकालते हैं, या अपने आस-पास की जगह को थूक या पीक से गन्दा किये रहते हैं तो निश्चय ही इस प्रकार के व्यवहार से आप देश के सौन्दर्य बोध को चोट पहुँचा रहे हैं और आपके इन कारनामों से देश की संस्कृति को बहुत हानि पहुँच रही है।

विशेष :

  1. लेखक ने व्यावहारिक जीवन में सफाई एवं स्वच्छता रखने का उपदेश दिया है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

MP Board Class 10th Hindi Solutions

MP Board Class 8th Special English Solutions Chapter 6 How Mowgli Joined the Pack

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MP Board Class 8th Special English Solutions Chapter 6 How Mowgli Joined the Pack

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How Mowgli Joined the Pack Textual Exercise

Word Power

(A) Match the words in column A with their meanings column B.
Class 8 English Chapter 6 How Mowgli Joined The Pack
Answers:

  1. c
  2. a
  3. d
  4. b.

(B) Fill in the blanks with correct words given below :
stretched, handover, scoured, snarled, roared

  1. He ______ and yawned lazily.
  2. The dog ______ at us.
  3. We ______ the area for somewhere to pitch our tent.
  4. She put her foot down and the car ______ away.
  5. The old woman wanted to ______ the documents to the police.

Answer:

  1. stretched
  2. snarled
  3. scoured
  4. roared
  5. handover.

Comprehension

(A) Answer the following questions.

Class 8 English Chapter 6 How Mowgli Joined The Pack Question 1.
Where did the pair of wolves live?
Answer:
The pair of wolves lived in a cave in the Seeonee Hills.

Mp Board Class 8 English Chapter 6 Question 2.
Father wolf says,” It is time to hunt again.” What time was it actually ?
Answer:
It was evening.

Class 8 English Chapter 6 Mp Board Question 3.
What did the ‘Law of the Jungle’ forbid ? Why?
Answer:
The ‘Law of the Jungle’ forbade the animals to change their quarters without due warning

Question 4.
What news did Tabaqui bring ?
Ans.
Tabaqui, the jackal, brought the news that. Shere Khan, the tiger, had shifted his hunting grounds to the hills.

Question 5.
Why was Father wolf annoyed ?
Ans.
Father wolf was annoyed because Shere Khan, the tiger, had broken the ‘Law of the Jungle.’

Question 6.
Where was the Pack Council meeting held ?
Answer:
The Pack Council meeting was held on a hilltop.

Question 7.
What was the price at which the cub was bought to the Wolves Pack ?
Answer:
The cub was bought to the Wolves Pack for the price of a newly killed bull.

(B) Who says to whom?

(i) Good luck be with you !
Answer:
Tabaqui, the jackal, to Father wolf.

(ii) The fool ! To begin a night’s work with that noise !
Answer:
Father wolf to mother wolf.

(iii) have never seen one, bring it here.
Answer:
Mother wolf to father wolf.

(iv) He may be a help in time.
Answer:
Akela, the lone wolf, to Bagheera.

(v) The cub is mine and to my teeth he will come in the end.
Answer:
Shere Khan, the tiger, to mother wolf.

(c) Say true of false.

  1. The couple of wolves have three cubs.
  2. Tabaqui teases mother and father wolves.
  3. Mother wolf was not delighted to see the man’s cub.
  4. Shere Khan was a lame tiger.
  5. Mother and father wolves were attracted to Mowgli.

Answer:

  1. false
  2. false
  3. false
  4. true
  5. true.

Let’s Learn

Read the short story and learn the use of articles.

(A) Once there was a doctor. He was a greedy man. One day an ailing old man came to him. The doctor treated him carelessly. After some days the old man died. The sons of the man seized the doctor. They put him in a dark room and tied him with a long rope. In the night the doctor got loose from the rope. He escaped from the room. On the way he swam across the river also. When he reached home he found his son studying some medical books. He said “Listen my son, the first and the most important thing for a doctor to do is to learn to swim.”:

Now insert suitable articles in the following story and complete it.

______ man decided to rob ______ bank in another town. He went to ______ Town and walked into ______ bank. He handed ______ note to one of cashiers
______ cashier read ______ note, which told him to give ______ man five lakh rupees.

Afraid that he might have ______ gun, he did as he was told ______ man then walked out of ______ bank. How ______ ever, he had no time to spend ______ money because he was arrested ______ same day. He had made ______ mistake. He had written ______ note on ______ back of ______ envelope. And on ______ other side of ______ envelope was his name and address. The clue was quite enough for ______ police.
Answer:
A, a, the, a, the, a, the, the, the, the, a, the, the, the, the, a, the, the, an, the, the, the,

(B) Go through the table carefully. Then write complete sentences using the appropriate articles as given in the example :
MP Board Class 8th Special English Chapter 6 How Mowgli Joined the Pack 2
eg.

  1. Mrs. Nagma teaches students. She is teacher.
  2. Mr. Ashok works in fields. He is a farmer.
  3. Mr. Ramesh sings songs. He is a singer.
  4. Mr. Pawan treats sick people. He is a doctor.
  5. Mr. Kasanya signals the train. He is a station master.
  6. Mrs. Kalpana looks after patientsShe is a nurse.
  7. Mrs. Khalida draws pictures-She is a painter
  8. Mr. Malvia brings letters. He is a postman.
  9. Mr. Sharma makes pots. he is a potter.
  10. Mrs. Alka acts in films. She is an acters.

Let’s talk

Rinku the rabbit and Matru, the monkey are talking to each other about the Van Mela which is going to be held very soon. Complete the dialogues between the two with the help of the following clues:

(stalls, eatables, swings, other animals, ice-cream, toys, carrots, bananas)

Begin like this:
Rinku: Hello, Matru!
Matru : Hello Rinku !
Rinku : Have you heard about the Van Mela?
Answer:
Mantru : Yes, I am very excited about it. I will visit it and enjoy swings there.
Rinku : There will be other ani mals too. We will visit all the stalls one by one.
Mantru: It will be a nice time for us. We will enjoy bananas.
Rinku : Why only bananas? I am very fond of ice-cream.
Mantru: OK! We all enjoy in our own way. We’ll buy toys and some eatables.
Rinku : Carrots also taste delicious We’ll buy them too.

Let’s Read

Here is the menu card of the Jungle Restaurant. On the basis of your reading of this menu card, answer the questions given below.

Jungle Restaurant Menu

Appetizers:

Bhelpuri – Rs. 15.00
Aloo Chat spiced with coriander & tomatoes – Rs. 25.00
Crisp samosas – Rs. 15.00
Lassi with strawberry flavour – Rs. 20.00
Lassi with peach flavour – Rs. 26.00
Lassi with mango flavour – Rs. 24.00

Vegetarian Dishes:

Palak Paneer – Rs. 30.00
Fragrant curry – Rs. 31.00
Mushrooms with tomato – Rs. 45.00
Curd Sauce – Rs. 20.00

Chutneys:

Mango chutney – Rs. 10.00
Coconut chutney – Rs. 12.00

Desserts:

Kesar badaam – Rs. 80.00
Kheer – Rs. 28.00
Rasmalai – Rs. 38.00
Pine apple sherbet – Rs. 21.00

All dishes are accompanied with (1) Fragrant Basmati raisin pulao (2) Raita (3) Green salad
Seeonne Hills, Pench Dist. Seeonee

Question 1.
Where is the Jungle Restaurant situated ?
Answer:
The Jungle Restaurant is situated on Seeonne Hills, Pench Dist. Seeonee.

Question 2.
Which item is moderately priced at the Jungle Restaurant?
Answer:
Mango chutney is moderately priced at the Jungle Restaurant.

Question 3.
Which things are supplied free with all the dishes?
Answer:
Fragrant Basmati raisin pulao, raita and green salad.

Question 4.
How many varieties of “Lassi” are available in the restaurant? Write their names.
Answer:
There are three varieties of “Lassi” available in the restaurant.
Their names are –

  1. Lassi with strawberry flavour
  2. Lassi with peach flavour
  3. Lassi with mango flavour.

Question 5.
Which are your favourite items? What is their price ?
Answer:
My Favourite items are kesar badaam and kheer. Their prices are –
Kesar badaam – Rs. 80.00
Kheer. – Rs. 28.00

Let’s Write

Maniya’s mother had to make all the arrangements for the trip to the Pench National Park. She has made a list of things to do. Complete the list.
Things to do
Answer:

  1. Ticket booking
  2. luggage packing
  3. taking raw materials for food
  4. arranging a video camera
  5. a music system.

(B) Look at the picture carefully.
MP Board Class 8th Special English Chapter 6 How Mowgli Joined the Pack 3
Write a paragraph with the help of the following clues:

Park, parents, sister, girls, hawker, mangoes, balloon, trees, newspaper, ball, icecream, children, skip, buy, eat etc.
Answer:
In the morning I go to a nearby park for morning walk with my parents. Even in the early morning it is a very busy place. Hawkers begin to set their thelas outside the park. Girls skip. Children play different games and sports. My sister swings and my little brother flies kites. Some persons read newspaper sitting on the bench in the open air. Some persons do yogas and run along the ground. I like to walk and jog. It is nice and pleasant to be there enjoying nature in full.

How Mowgli Joined the Pack Word Meanings

MP Board Class 8th Special English Chapter 6 How Mowgli Joined the Pack 4
MP Board Class 8th Special English Chapter 6 How Mowgli Joined the Pack 5

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 4 नीति-धारा

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 4 नीति-धारा

नीति-धारा अभ्यास

बोध प्रश्न

नीति-धारा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गिरिधर के अनुसार हमें क्या भूल जाना चाहिए?
उत्तर:
गिरिधर के अनुसार हमें बीती हुई बातों को भूल जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
कोयल को उसके किस गुण के कारण पसन्द किया जाता है?
उत्तर:
कोयल को उसकी मीठी वाणी के गुण के कारण पसन्द किया जाता है।

प्रश्न 3.
गिरिधर द्वारा प्रयुक्त छन्द का नाम लिखिए।
उत्तर:
गिरिधर द्वारा प्रयुक्त छन्द का नाम ‘कुण्डलियाँ’ है।

प्रश्न 4.
व्यक्ति सम्मान योग्य कब बन जाता है?
उत्तर:
व्यक्ति जब परोपकार की भावना से कार्य करता है तो वह सम्मान के योग्य बन जाता है।

प्रश्न 5.
भारतेन्दु के अनुसार भारत की दुर्दशा का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
भारतेन्दु के अनुसार भारत की दुर्दशा का प्रमुख कारण आपस में बैर और फूट की भावना का होना है।

नीति-धारा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि गिरिधर के अनुसार मन की बात को कब तक प्रकट नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
कवि गिरिधर के अनुसार मन की बात को तब तक प्रकट नहीं करना चाहिए जब तक कि किसी कार्य में सफलता न मिल जाए।

प्रश्न 2.
धन-दौलत का अभिमान क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
धन-दौलत का अभिमान इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि यह धन-दौलत सदा एक के साथ नहीं रहती है, अपितु यह चंचल एवं स्थान बदलने वाली है।

प्रश्न 3.
कवि ने गुणवान के महत्व को किस प्रकार रेखांकित किया है?
उत्तर:
कवि ने गुणवान के महत्त्व को इस प्रकार रेखांकित किया है कि गणी व्यक्ति के चाहने वाले हजारों व्यक्ति मिल जाते हैं पर निर्गुण का साथ तो घरवाले भी नहीं दे पाते।

प्रश्न 4.
भारतेन्दु ने कोरे ज्ञान का परित्याग करने की सलाह क्यों दी है?
उत्तर:
भारतेन्दु ने कोरे ज्ञान का परित्याग करने की सलाह है इसलिए दी है कि कोरे ज्ञान से कोई काम या व्यापार चल नहीं सकता है। इनको चलाने के लिए उनमें डूबना पड़ता है।

प्रश्न 5.
सम्माननीय होने के लिए किन गुणों का होना आवश्यक है?
उत्तर:
सम्माननीय होने के लिए व्यक्ति को परोपकारी होना चाहिए; कोरे पद से काम नहीं चलता है।

प्रश्न 6.
‘उठहु छोड़ि विसराम’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘उठहु छोड़ि विसराम’ का आशय यह कि तुम विश्राम त्यागकर उस निर्गुण निराकर ईश्वर को पूरी तरह अपना लो।

नीति-धारा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बिना विचारे काम करने में क्या हानि होती है? समझाइए।
उत्तर:
जो व्यक्ति बिना विचारे अपना कोई काम करता है, तो उस काम में उसे सफलता नहीं मिलती है। इससे जहाँ उसका काम बिगड़ जाता है वहीं संसार में उसकी हँसी भी उड़ती है।

प्रश्न 2.
कौआ और कोयल के उदाहरण से कवि जो सन्देश देना चाहता है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
कौआ और कोयल के उदाहरण द्वारा कवि यह सन्देश देना चाहता है कि संसार में व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके रूप-रंग से नहीं अपितु गुणों से होती है।

प्रश्न 3.
पाठ में संकलित भाषा सम्बन्धी दोहों के माध्यम से भारतेन्दु जी क्या सन्देश देना चाहते हैं?
उत्तर:
पाठ में संकलित भाषा सम्बन्धी दोहों के माध्यम से भारतेन्दु जी यह सन्देश देना चाहते हैं कि किसी भी देश की उन्नति उसकी मातृ भाषा के विकास द्वारा ही सम्भव है।

प्रश्न 4.
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की काव्य प्रतिभा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र बहु आयामी रचनाकार हैं। उन्होंने नाटक, काव्य, निबन्ध आदि सभी विधाओं पर लेखनी चलाई है। वे समाजोन्मुखी चिन्तक कवि हैं, इसलिए उनकी कविताओं में नीति कथन सर्वत्र मिलते हैं। आपने परोपकार एवं एकता को विशेष महत्त्व प्रदान किया है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
(अ) बिना विचारे जो करे सो पाछे पछिताय।
………………………….          ……………………..
…………………………..         ………………………
खटकत है जिय माँहि, कियौ जो बिना विचारे॥
उत्तर:
गिरिधर कवि जी कहते हैं कि बिना सोच और – विचार के जो कोई भी व्यक्ति काम करता है, वह बाद में पछताता है। ऐसा करने से एक तो उसका काम बिगड़ जाता है, दूसरे संसार में उसकी हँसी होती है अर्थात् सब लोग उसका मजाक उड़ाते हैं। संसार में हँसी होने के साथ ही साथ उसके स्वयं के मन में शान्ति नहीं रहती है, वह परेशान हो जाता है। खाना-पीना, सम्मान, राग-रंग आदि कोई भी बात उसे अच्छी नहीं लगती है।

गिरिधर कवि जी कहते हैं कि इससे उत्पन्न दुःख टालने पर भी टलता नहीं है अर्थात् भगाने पर भी भागता नहीं है और सदा ही यह बात मन में खटकती रहती है कि बिना सोच-विचार के करने से मुझे यह मुसीबत झेलनी पड़ रही है।

(ब) गुन के गाहक सहस नर, बिनु गुन लहै न कोय।
……………………          ……………………..
……………………         ……………………….
बिन गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के॥
उत्तर:
कविवर गिरिधर कहते हैं कि इस संसार में गुणों के ग्राहक तो हजारों लोग हैं, लेकिन बिना गुणों के किसी भी व्यक्ति को कोई नहीं चाहता है। उदाहरण देकर कवि समझाता है कि कौआ और कोयल दोनों का रंग एक जैसा होता है पर दोनों की वोशी में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। जब संसारी लोग इन दोनों की वाणी को सुनते हैं तो कोयल की वाणी सबको प्रिय लगती है और कौए की नहीं। इस कारण कोयल को सब प्यार करते हैं और कौओं से परहेज करते हैं।

गिरिधर कवि जी कहते हैं कि हे मनुष्यो! कान लगाकर सुन लो इस संसार में बिना गुणों के कोई किसी को पूछता तक नहीं है। इस संसार में गुणों के ग्राहक तो हजारों होते हैं, निर्गुण का ग्राहक कोई नहीं।

(स) मान्य योग्य नहिं होत, कोऊ कोरो पद पाए।
मान्य योग्य नर ते, जे केवल परहित जाए॥
उत्तर:
कवि श्री भारतेन्दु जी कहते हैं कि इस संसार में कोरा पद पाकर ही कोई व्यक्ति समाज में माननीय नहीं हो सकता। समाज में माननीय वही व्यक्ति होता है, जो परोपकार की भावना से कार्य करता है।

(द) बैर फूट ही सों भयो, सब भारत को नास।
तबहुँन छाड़त याहि सब, बँधे मोह के फाँस॥
उत्तर:
कविवर भारतेन्दु जी कहते हैं कि इस देश, भारत का पूरी तरह से नाश आपसी बैर एवं फूट के कारण ही हुआ है। यह सच्चाई मानते हुए भी आज भी भारतवासी लोग मोह के फन्दे में ऐसे बँधे हुए हैं कि इस बुरी भावना का त्याग नहीं करते हैं।

नीति-धारा काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
‘उल्लाला’ को परिभाषित करते हुए उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
‘उल्लाला’-परिभाषा-उल्लाला एक मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 15-15 मात्राएँ और दूसरे एवं चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। कुल 28 मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण :
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

नीति-धारा महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

नीति-धारा बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गिरिधर के अनुसार हमें क्या भूल जाना चाहिए?
(क) कल की बात
(ख) बरसों की बातें
(ग) आज की बात
(घ) बीती हुई बातें।
उत्तर:
(घ) बीती हुई बातें।

प्रश्न 2.
कोयल को उसके किस गुण के कारण पसन्द किया जाता है?
(क) रंग
(ख) आकृति
(ग) नृत्य
(घ) मधुर बोली।
उत्तर:
(घ) बीती हुई बातें।

प्रश्न 3.
भारतेन्दु के अनुसार भारत की दुर्दशा का प्रमुख कारण क्या है?
(क) अन्धविश्वास
(ख) अज्ञानता
(ग) विद्या की कमी
(घ) बैर-फूट।
उत्तर:
(घ) बीती हुई बातें।

प्रश्न 4.
बिना विचारे काम करने में क्या हानि होती है?
(क) धन की
(ख) मर्यादा की
(ग) मान की
(घ) पछताना पड़ता है।
उत्तर:
(घ) बीती हुई बातें।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. सम्पत्ति के बढ़ने पर …………. नहीं करना चाहिए।
  2. गिरिधर कवि ने कहा है कि हमें अपने किये …………. ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए।
  3. भारतेन्दु जी ने भारत के विकास के लिए भारतवासियों को ………… छोड़ने को कहा।
  4. ‘बैर-फूट ही सों भयो सब भारत को ……….. ।
  5. नीतिकाव्य जीवन-व्यवहार को ………. बनाने का आधार है। (2016)

उत्तर:

  1. अभिमान
  2. कामों का
  3. बैर-भाव
  4. नाश
  5. सुगम

सत्य/असत्य

  1. गिरिधर के अनुसार हमें बीती बातें भूल जानी चाहिए।
  2. दौलत पाकर व्यक्ति को सदैव अभिमान करना चाहिए।
  3. ‘कोकिल वायस एक सम पण्डित मूरख एक।’ यह पंक्ति गिरिधर कवि की कुण्डलियों में
  4. भारतेन्दु जी ने भाषा के द्वारा राष्ट्र की उन्नति व एकता बतायी है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 4 नीति-धारा img-1
उत्तर:
1. → (घ)
2. → (ग)
3. → (ख)
4. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. बिना विचारे कार्य करने से क्या होता है? (2009, 17)
  2. काग और कोकिल में से किसका शब्द सुहावना लगता है?
  3. “कोरी बातन काम कछु चलिहैं नाहिन मीत।
    तासों उठि मिलि के करहु बेग परस्पर प्रीत॥” दोहा किस कवि का है?
  4. गिरिधर कवि किस प्रकार के रचनाकारों की श्रेणी में आते हैं? (2009)

उत्तर:

  1. पछताना पड़ता है
  2. कोकिल का
  3. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
  4. नीतिकाव्य के रचनाकार।

गिरिधर की कुण्डलियाँ भाव सारांश

गिरिधर की कुण्डलियों में नीति के उपदेश देते हुए कहा गया है कि मनुष्य को बीती बातें भुलाकर भविष्य के विषय में विचार करना चाहिए। मनुष्य को अपना कार्य सम्पन्न होने से पूर्व किसी को नहीं बतलाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना सोच-विचार के कार्य करता है उसके पास पछताने के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। धन पाकर मनुष्य को गर्व नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अपने अन्दर गुणों का संग्रह करना चाहिए। इस संसार में गुणवान को सम्मान मिलता है और गुणहीन व्यक्ति उपेक्षा और तिरस्कार का पात्र बनता है।

गिरिधर की कुण्डलियाँ संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) बीती ताहि विसार दे, आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित्त देइ॥
ताही में चित्त देइ, बात जोई बनि आवै।
दुर्जन हँसे न कोइ, चित्त में खता न पावै॥
कह गिरिधर कविराय, यहै करु मन-परतीती।
आगे की सुख समुझि, हो बीती सो बीती॥

शब्दार्थ :
बीती = जो बात हो गयी है। ताहि = उसी को। विसारि दे = भूल जाओ। सुधि लेइ = ध्यान में रखो। सहज = सरल रूप में। चित्त देइ = मन लगाओ। दुर्जन = दुष्ट लोग। खता = गलती, भूल। परतीती = प्रतीति, विश्वास। बीती सो बीती = जो बीत गई सो बीत गई।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कुण्डली कविवर गिरिधर द्वारा रचित ‘गिरिधर की कुण्डलियाँ’ से ली गई है।

प्रसंग :
इसमें कवि ने व्यावहारिक जीवन की यह बात बताई है कि बुद्धिमान व्यक्ति वही होता है जो बीती हुई बात को भुलाकर आगे के लिए सचेत रहता है।

व्याख्या :
गिरिधर कवि जी कहते हैं हे मनुष्यो! जो बात घटित हो चुकी है उसके बारे में व्यर्थ में सोच-विचार कर समय को बर्बाद मत करो। तुम आगे होनी वाली बातों या घटनाओं की चिन्ता करो जो कुछ भी तुमसे सहज, सरल रूप में बन जाये उसी में अपना मन लगाओ। ऐसा करने पर कोई भी दुष्ट व्यक्ति तुम्हारी बातों की हँसी नहीं उड़ाएगा और न ही तुम्हारे मन में कोई खोट रहेगा।

गिरिधर कवि जी कहते हैं कि हे मनुष्यो! तुम अपने मन में यह विश्वास रखो कि आने वाली बातों या घटनाओं में तुम पूरी सावधानी बरतो और जो हो गई, सो हो गई।

विशेष :

  1. कवि ने व्यावहारिक जीवन की बात बताई है।
  2. अवधी भाषा का प्रयोग।
  3. कुण्डलियाँ-छन्द।

(2) साईं अपने चित्त की, भूलि न कहिए कोई।
तब लग मन में राखिए, जब लग कराज होइ॥
जब लम कारज होइ, भूलि कबहूँ नहिं कहिए।
दुरजन हँसे न कोई, आप सियरे है रहिए॥
कह गिरिधर कविराय, बात चतुरन की ताईं।
करतूती कहि देत, आप कहिए नहिं साईं॥

शब्दार्थ :
साईं = मित्र। तब लग = तब तक। जब लग = जब तक। कारज न होइ = काम में सफलता प्राप्त न हो जाए। दुरजन = दुष्ट लोग। सियरे = शीतल, प्रसन्न। खै रहिए = होकर – रहिए। करतूती = काम।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि ने मनुष्यों को शिक्षा दी है कि यदि आप कोई काम करने की योजना बनाते हैं तो उसे प्रारम्भ करने से पूर्व जग जाहिर मत करो। नहीं तो दुष्ट लोग तुम्हारे उस – शुभ कार्य में बाधा डालेंगे।

व्याख्या :
कविवर गिरिधर कहते हैं कि हे मित्र! अपने मन की बात भूलकर भी किसी दूसरे से मत कहो। उस बात को अपने – मन में तब तक दाब कर रखो जब तक कि आपका काम न हो जाए। जब तक आपका काम नहीं होता, भूल कर भी किसी से मत कहो। यह ऐसी नीति है कि इसमें दुर्जन लोगों को हँसी उड़ाने – का अवसर नहीं मिलेगा और स्वयं आपके चित्त को शान्ति एवं आनन्द मिलेगा।

गिरिधर कवि जी कहते हैं कि यह बात मैंने चतुर लोगों के लिए कही है। हे मित्र! तुम अपने मुँह से कोई बात मत कहो। तुम्हारे काम स्वयं तुम्हारी बात को सबसे कह देंगे।

विशेष :

  1. कवि ने व्यावहारिक जीवन की बात बताई है।
  2. भाषा-अवधी।
  3. छन्द-कुण्डलियाँ।

(3) बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।
काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय॥
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै।
खान-पान सनमान, राग-रंग मनहिं न भावै॥
कह गिरिधर कविराय, दुःख कछु टरत न टारे।
खटकत है जिय माँहि, कियो जो बिना बिचारे।

शब्दार्थ :
बिना विचारे = बिना सोचे-समझे। बिगारे = बिगाड़ना। जग = संसार में। होत हँसाय = हँसी उड़ती है। चैन = शान्ति। टरत नटारे = टालने पर भी नहीं टलता है, भागता है। माँहि = में।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि कहता है कि मनुष्य को बिना सोचे-समझे कोई काम नहीं करना चाहिए।

व्याख्या :
गिरिधर कवि जी कहते हैं कि बिना सोच और – विचार के जो कोई भी व्यक्ति काम करता है, वह बाद में पछताता है। ऐसा करने से एक तो उसका काम बिगड़ जाता है, दूसरे संसार में उसकी हँसी होती है अर्थात् सब लोग उसका मजाक उड़ाते हैं। संसार में हँसी होने के साथ ही साथ उसके स्वयं के मन में शान्ति नहीं रहती है, वह परेशान हो जाता है। खाना-पीना, सम्मान, राग-रंग आदि कोई भी बात उसे अच्छी नहीं लगती है।

गिरिधर कवि जी कहते हैं कि इससे उत्पन्न दुःख टालने पर भी टलता नहीं है अर्थात् भगाने पर भी भागता नहीं है और सदा ही यह बात मन में खटकती रहती है कि बिना सोच-विचार के करने से मुझे यह मुसीबत झेलनी पड़ रही है।

विशेष :

  1. ‘टरत न टारे’ मुहावरे का सुन्दर प्रयोग।
  2. अवधी-भाषा।
  3. कुण्डलियाँ-छन्द।

(4) दौलत पाय न कीजिए, सपने में अभिमान।
चंचल जल दिन चारि को, ठाउँ न रहत निदान॥
ठाउँ न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै।
मीठे बचन सुनाय, विनय सबही की कीजै॥
कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत।
पाहुन निसि दिन चारि, रहत सबही के दौलत॥

शब्दार्थ :
दौलत = धन सम्पत्ति। अभिमान = घमण्ड। चंचल जल = बहते हुए पानी के समान। दिन चारि को = चार दिन को अर्थात् बहुत थोड़े समय के लिए। ठाउँ न रहत निदान = एक स्थान पर सदा रुकी नहीं रहती है। जियत = जब तक जीवित हो। जस = यश। विनय = विनम्रता। घट तौलत = घट-घट को तौलने वाली, हर मनुष्य को परखने वाली। पाहुन = अतिथि, मेहमान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने धन के ऊपर गर्व न करने की मनुष्य को सलाह दी है।

व्याख्या :
कविवर गिरिधर कहते हैं कि हे संसार के मनुष्यो! धन-दौलत पाकर सपने में भी घमण्ड मत करो। यह धन-दौलत जल के समान चंचल है अर्थात् यह कभी भी एक स्थान पर टिककर नहीं रहती है। चार दिन के लिए अर्थात् बहुत थोड़े समय के लिए यह किसी व्यक्ति के पास रहती है। स्थायी रूप से यह किसी व्यक्ति के पास नहीं रहती है। इसीलिए विद्वानों ने इसे चंचला कहा है। हे मनुष्यो! संसार में आये हो तो ऐसे काम करो जिससे जीवन में यश मिले। सभी से मीठे वचन बोलो तथा सभी के साथ विनम्रता से मिलो।
गिरिधर कवि जी कहते हैं कि दौलत मनुष्यों को तौलती फिरती है। यह केवल चार दिन के लिए अर्थात् थोड़े समय के लिए ही किसी के घर मेहमान बनकर आती है।

विशेष :

  1. धन पर मनुष्य को गर्व नहीं करना चाहिए।
  2. दिन चारि, ठाउँ न रहत निदान, सब घट तौलत आदि मुहावरों का सुन्दर प्रयोग।
  3. भाषा-अवधी।

(5) गुन के गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा कोकिला, शब्द सुनै सब कोय॥
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सहावन।
दोऊ को इक रंग, काग सब भए अपावन॥
कह गिरिधर कविराय, सुनो हो ठाकुर मन के।
बिन गुन लहै न कोय, सहस नर ग्राहक गुन के॥

शब्दार्थ :
गुण = गुणों के। सहस नर = हजारों आदमी। लहै = प्राप्त करना। अपावन = अपवित्र।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि संसार में गुणों का ही महत्त्व है; बिना गुण के कोई किसी को नहीं पूछता है।

व्याख्या :
कविवर गिरिधर कहते हैं कि इस संसार में गुणों के ग्राहक तो हजारों लोग हैं, लेकिन बिना गुणों के किसी भी व्यक्ति को कोई नहीं चाहता है। उदाहरण देकर कवि समझाता है कि कौआ और कोयल दोनों का रंग एक जैसा होता है पर दोनों की वोशी में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। जब संसारी लोग इन दोनों की वाणी को सुनते हैं तो कोयल की वाणी सबको प्रिय लगती है और कौए की नहीं। इस कारण कोयल को सब प्यार करते हैं और कौओं से परहेज करते हैं।

गिरिधर कवि जी कहते हैं कि हे मनुष्यो! कान लगाकर सुन लो इस संसार में बिना गुणों के कोई किसी को पूछता तक नहीं है। इस संसार में गुणों के ग्राहक तो हजारों होते हैं, निर्गुण का ग्राहक कोई नहीं।

विशेष :

  1. कवि ने मनुष्यों को गुणों को ग्रहण करने का सन्देश दिया है।
  2. भाषा-अवधी।
  3. छन्द-कुण्डलियाँ।

नीति अष्टक भाव सारांश

नीति अष्टक दोहों में बतलाया गया है कि वही व्यक्ति इस संसार में माननीय है जो दूसरों के कल्याण के लिए जीवन जीता है। भारत देश का विनाश लोगों की बैर भावना के कारण ही हुआ। इसलिए इसे मन से निकाल देना चाहिए। अपनी भाषा, अपने धर्म,अपने कर्म पर हमें गर्व होना चाहिए। उस बुरे देश में किसी को निवास नहीं करना चाहिए जहाँ मूर्ख और विद्वान सबको एक ही भाँति का समझा जाता हो।

नीति अष्टक संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र मान्य योग्य नहीं होत, कोऊ कोरो पद पाए।
मान्य योग्य नर ते, जे केवल परहित जाए॥ (1)

शब्दार्थ :
मान्य योग्य = सम्मान के योग्य। होत = होता है। कोरो पद = केवल पद पाने से। परहित = परोपकार में।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्य भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘नीति’ अष्टक’ शीर्षक से लिया गया है।

प्रसंग :
इसमें कवि ने बताया है कि जो व्यक्ति परोपकार में रत रहते हैं, समाज उन्हीं का आदर करता है।

व्याख्या :
कवि श्री भारतेन्दु जी कहते हैं कि इस संसार में कोरा पद पाकर ही कोई व्यक्ति समाज में माननीय नहीं हो सकता। समाज में माननीय वही व्यक्ति होता है, जो परोपकार की भावना से कार्य करता है।

विशेष :

  1. कवि की दृष्टि में केवल परोपकार भावना में रत व्यक्ति ही समाज में सम्मान पाता है, न कि पद से।
  2. दोहा-छन्द।

बिना एक जिय के भए, चलिहैं अब नहिं काम।
तासों कोरो ज्ञान तजि, उठहु छोड़ि बिसराम॥ (2)

शब्दार्थ :
एक जिय = एक रूप हुए। कोरो ज्ञान = केवल ज्ञान, समर्पण नहीं। विसराम = आराम।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि जब तक ईश्वर के प्रति पूर्ण सेमर्पण नहीं होगा, जीव का उद्धार नहीं होगा।

व्याख्या :
कविवर भारतेन्द जी कहते हैं कि भगवान के प्रति पूर्ण भाव से समर्पण किए बिना अब काम चलने वाला नहीं है। अतः कोरे ज्ञान को त्यागकर, विश्राम त्यागकर उठ खड़े हो
और ईश्वर में पूर्ण समर्पण कर दो।

विशेष :

  1. कवि ने ईश्वर भक्ति की सफलता, पूर्ण समर्पण में मानी है।
  2. दोहा-छन्द।

बैर फूट ही सों भयो, सब भारत को नास।
तबहुँ न छाड़त याहि सब, बँधे मोह के फाँस॥ (3)

शब्दार्थ :
बैर फूट = परस्पर शत्रुता और भेद की भावना। नास = नाश। फाँस = फन्दे में।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कवि ने भारतवासियों से आपसी बैर तथा फूट को छोड़ने का उपदेश दिया है।

व्याख्या :
कविवर भारतेन्दु जी कहते हैं कि इस देश, भारत का पूरी तरह से नाश आपसी बैर एवं फूट के कारण ही हुआ है। यह सच्चाई मानते हुए भी आज भी भारतवासी लोग मोह के फन्दे में ऐसे बँधे हुए हैं कि इस बुरी भावना का त्याग नहीं करते हैं।

विशेष :

  1. कवि ने बैर, फूट आदि बुराइयों को दूर कर आपसी मेल-मिलाप की बात कही है।
  2. दोहा-छन्द।

कोरी बातन काम कछु चलिहैं नाहिन मीत।
तासों उठि मिलि के करहु बेग परस्पर प्रीत॥ (4)

शब्दार्थ :
कोरी बातन = व्यर्थ की बातों से। नाहिन = नहीं। मीत = मित्र। बेग = जल्दी। परस्पर = आपस में। प्रीत = प्रेम।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि परस्पर प्रेम की शिक्षा देता है।

व्याख्या :
कविवर भारतेन्दु जी कहते हैं कि हे मित्र! केवल व्यर्थ की बातों में अब काम नहीं बनेगा। इस कारण से उठो और आपस में प्रेम का व्यवहार करो।

विशेष :

  1. कवि ने परस्पर प्रेम बढ़ाने की बात कही है।
  2. दोहा-छन्द।

निज भाषा, निज धरम, निज मान करम ब्यौहार।
सबै बढ़ावहु वेगि मिलि, कहत पुकार-पुकार॥ (5)

शब्दार्थ :
निज = अपनी। धरम = धर्म। मान = इज्जत। करम = कर्म। ब्यौहार = व्यवहार। बेगि = जल्दी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने अपनी भाषा, धर्म, मान, कर्म और व्यवहार को परस्पर बढ़ाने का उपदेश दिया है।

व्याख्या :
कविवर भारतेन्दु जी कहते हैं कि अपनी भाषा, धर्म, मान, कर्म और व्यवहार से सब काम बनता है। अतः मैं बार-बार पुकार कर कहता हूँ कि आप लोग इन्हीं सब बातों को परस्पर मिलकर बढ़ाओ।

विशेष :

  1. कवि ने अपनी भाषा, धर्म, कर्म और व्यवहार अपनाने का सन्देश दिया है।
  2. दोहा-छन्द।

करहँ विलम्ब न भ्रात अब, उठहु मिटावहु सूल।
निज भाषा उन्नति करहु प्रथम जो सबको मूल।। (6)

शब्दार्थ :
विलम्ब = देरी। भ्रात = भाई। सूल = कष्ट, दुःख, बाधाएँ। मूल = आधार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
निज भाषा हिन्दी की उन्नति के लिए कवि ने भारतीयों को जगाया है।

व्याख्या :
कविवर भारतेन्दु जी कहते हैं कि हे भारतवासी भाइयो! अब देर मत करो और अपनी भाषा की उन्नति में आने वाली सभी बाधाओं को मिटा दो। तुम सब मिलकर अपनी हिन्दी भाषा की उन्नति का प्रयास करो, जो कि सबका मूल आधार है।

विशेष :

  1. भारतेन्दु जी का निज भाषा अर्थात् हिन्दी की उन्नति के प्रति विशेष प्रयास रहा है।
  2. दोहा-छन्द।

सेत-सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास।
ऐसे देश कुदेस में, कबहुँ न कीजै बास।। (7)

शब्दार्थ :
सेत-सेत = सफेद-सफेद। कुदेस = बुरे देश में। बास = निवास।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इसमें कवि ने मूों के देश में न रहने का उपदेश दिया है।

व्याख्या :
कविवर भारतेन्दु जी कहते हैं कि जिस देश में रहने वाले नागरिकों में बुद्धि विवेक नहीं होता है और जो सफेद रंग की सभी वस्तुओं को एक जैसा ही समझते हैं; चाहे सफेद कपूर हो या फिर सफेद कपास। कवि कहता है कि ऐसे मूल् के देश में बुद्धिमान आदमी को कभी निवास नहीं करना चाहिए।

विशेष :

  1. कवि अज्ञानी एवं मूों के देश में रहने को बुरा बताता है।
  2. दोहा-छन्द।

कोकिल वायस एक सम, पण्डित मूरख एक।
इन्द्रायन दाडिम विषय, जहाँ न नेक विवेक॥ (8)

शब्दार्थ :
कोकिल = कोयल। वायस = कौआ।, एक सम = एक जैसे। इन्द्रायन = एक प्रकार का कड़वा फल। दाडिम = अनार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस दोहे में कवि मूर्ख एवं अज्ञानी लोगों के देश में रहने को बुरा बता रहा है।

व्याख्या :
कविवर भारतेन्दु जी कहते हैं कि जिस देश में कोयल और कौवे में, पण्डित और मूर्ख में, अनार (मीठे फल) और इन्द्रायन (कड़वे फल) में अन्तर नहीं जाना जाता है और जहाँ पर न नेक (उचित बात) और ज्ञान की बात कही जाती है, उस देश में भूलकर भी नहीं रहना चाहिए।

विशेष :

  1. मूर्ख एवं अज्ञानी लोगों के देश में रहना कवि उचित नहीं मानता है।
  2. दोहा-छन्द

MP Board Class 10th Hindi Solutions

MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 1 भक्ति काव्य

MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 1 भक्ति काव्य

भक्ति काव्य अभ्यास

भक्ति काव्य अति लघु उत्तरीय प्रश्न

स्वाति (हिन्दी विशिष्ट), कक्षा-12 Solution Mp Board प्रश्न 1.
मीरा की भक्ति किस भाव की थी? (2014)
उत्तर:
मीरा की भक्ति दाम्पत्य (प्रेम) भाव की थी। उनके आराध्य श्रीकृष्ण हैं।

Mp Board Class 12th Hindi Swati Solution प्रश्न 2.
मीराबाई कैसा वेश रखना चाहती हैं? (2015)
उत्तर:
मीराबाई अपने स्वामी श्रीकृष्ण के लिए बैरागिन का वेश धारण करना चाहती हैं। इसके अलावा वह वही वेश धारण करना चाहती हैं, जिससे श्रीकृष्ण प्रसन्न हों।

Bani Jagrani Ki Udarta Barwani Jaaye MP Board Class 12th प्रश्न 3.
‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता केशवदास हैं।

प्रश्न 4.
गजमुख का मुख कौन देखता है? (2010, 15)
उत्तर:
गजमुख का मुख दसमुख (रावण) देखता है।

भक्ति काव्य लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मीरा के अनुसार देह का गर्व क्यों नहीं करना चाहिए? (2014)
उत्तर:
मीरा के अनुसार देह का गर्व नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शरीर मृत्यु के बाद मिट्टी में मिल जाता है। यह शरीर पाँच तत्वों से निर्मित बताया जाता है-आकाश, वायु, पृथ्वी, अग्नि और जल। यह शरीर मृत्यु के पश्चात् इन्हीं तत्वों में मिल जाता है।

प्रश्न 2.
मीरा को हरि से मिलने में क्या-क्या कठिनाइयाँ हैं? (2010, 17)
उत्तर:
मीरा को हरि से मिलने में निम्नलिखित कठिनाइयाँ हैं-

  1. मीरा के चारों मार्ग (कर्म, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य) बन्द हैं अर्थात् इनमें से कोई भी मार्ग मीरा के लिए खुला नहीं है।
  2. हरि का महल इतना ऊँचा है कि मीरा वहाँ तक चढ़ने में असमर्थ है।
  3. मीरा का मार्ग इतना सँकरा है कि चलते हुए डगमगाती है अर्थात् गिरने का डर लगा रहता है।
  4. विधाता ने मीरा का गाँव हरि से बहुत दूर बना दिया है।

प्रश्न 3.
भगवान गणेश भक्तों की विपत्तियों को किस प्रकार हर लेते हैं?
उत्तर:
जिस प्रकार एक बालक कमल की डंडी को आसानी से तोड़ देता है उसी प्रकार गणेश जी भक्त के विघ्नों को हर लेते हैं। जिस प्रकार कमलिनी कीचड़ से अलग रहती है उसी प्रकार गणेश जी के भक्त संसार के विघ्नों से दूर रहते हैं। शंकर जी जैसे चन्द्रमा को निष्कलंक कर अपने शीश पर धारण करते हैं उसी प्रकार गणेश जी अपने भक्त को निष्कलंक कर देते हैं।

प्रश्न 4.
माँ सरस्वती की वन्दना कौन-कौन करता है? (2015, 16)
उत्तर:
माँ सरस्वती की वन्दना देवगण, ऋषिगण,श्रेष्ठ तपस्वी, भूत, भविष्य और वर्तमान को जानने वाले,उनके पति ब्रह्मा जी,शंकर जी और कार्तिकेय करते हैं।

भक्ति काव्य दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“मीरा का सम्पूर्ण काव्य भाव-विह्वलता के गुणों से पूरित है।” सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
मीरा के काव्य में भाव-विह्वलता’ कूट-कूटकर भरी है।
(i) विरह-वेदना :
मीराबाई भगवान कृष्ण के प्रेम की दीवानी थीं। उन्होंने आँसुओं के जल से सींच-सींच कर प्रेम की बेल बोई थी। मीरा ने अपने प्रियतम (श्रीकृष्ण) के विरह में जो कुछ लिखा उसकी तुलना कहीं पर भी नहीं की जा सकती।

(ii) रस और माधुर्य भाव :
मीरा के साहित्य में माधुर्य भाव को बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। उनकी रचनाओं में माधुर्य भाव प्रधान है। उसमें शान्त रस और श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति है।

(iii) रहस्यवाद :
मीरा के अधिकतर पदों में उनका रहस्यवाद स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस रहस्यवाद में प्रियतम के प्रति उत्सुकता, मिलन और वियोग के सजीव चित्र हैं।

प्रश्न 2.
मीरा अपने मन को ईश्वर के चरण कमलों में ही क्यों लीन रखना चाहती हैं?
उत्तर:
मीरा श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में ही अपने मन को लगाना चाहती हैं। जिस किसी को उनके चरण कमलों के अपनी भृकुटि के मध्य दर्शन हो गए वह संसार से ऊपर उठ गया अर्थात् उसका उद्धार हो गया। तीर्थ एवं व्रत करने, काशी में रहकर मृत्यु प्राप्त करने की इच्छा करने से कुछ नहीं होता और न ही संसार को त्याग करके संन्यासी होने से कुछ होगा। मीरा के अनुसार तो श्रीकृष्ण के चरणों में ध्यान लगाने से ही जीवन सफल होगा। मीरा के प्रभु ही जन्म-मरण के बन्धन को काटने वाले हैं। इसलिए वह श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में ही अपने मन को लगाना चाहती हैं।

प्रश्न 3.
‘कठिन क्रूर अक्रूर आयो’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मथुरा का राजा कंस श्रीकृष्ण का वध करना चाहता था इसलिए उसने नन्दबाबा के मित्र अक्रूर को श्रीकृष्ण को मथुरा लाने के लिए भेजा। उसे विश्वास था कि अक्रूर के साथ नन्दबाबा कृष्ण को मथुरा अवश्य भेज देंगे। अत: वह रथ लेकर श्रीकृष्ण को लेने आया था। अक्रूर का अर्थ यद्यपि दयालु होता है, लेकिन वह कठोर बनकर इस कार्य को करने आया था। श्रीकृष्ण को मथुरा ले जाकर उसने क्रूरता दिखाई है।

प्रश्न 4.
‘बानी जगरानी की उदारता’ का बखान करना क्यों सम्भव नहीं है?
उत्तर:
जगत वन्दनीया सरस्वती की उदारता (दया) का वर्णन संसार में कोई नहीं कर सकता है। देव, सिद्ध मुनि,श्रेष्ठ तपस्वी सभी उनकी उदारता का वर्णन करते-करते थक गए पर उनकी उदारता का वर्णन नहीं कर सके। भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता भी इस बारे में असमर्थ रहे। उनके पति ब्रह्मा जी, पुत्र शिवजी और नाती कार्तिकेय ने भी उनकी उदारता का बखान किया, पर हर बार उन्हें उनमें कुछ नवीनता ही दिखाई दी।

प्रश्न 5.
श्रीराम वन्दना में राम के नाम की क्या महिमा बताई गई है?
उत्तर:
श्रीराम परिपूर्ण परमात्मा हैं। ये पुराण पुरुषोत्तम हैं। भक्त उनका दर्शन पाकर भी उनको नहीं समझ पाता है क्योंकि वेदों में ‘न इति’, ‘न इति’ कहकर उस भेद को वहीं छोड़ दिया है। केशवदास कवि श्रीराम नाम का निरन्तर जाप करते हैं इसलिए उन्हें जन्म-मरण से डर नहीं लगता अर्थात् जन्म-मरण के बन्धन से वह छूट जाएँगे। श्रीराम का रूप अणिमा सिद्धि (सूक्ष्मता) प्रदान करता है,उनका गुण गरिमा सिद्धि प्रदान करता है,उनकी भक्ति महिमा नामक सिद्धि प्रदान करती है और उनका पावन नाम मुक्ति प्रदान करता है।

प्रश्न 6.
केशवदास की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
केशव की भाषा के दो रूप हैं-संस्कृतनिष्ठ भाषा और हिन्दी में प्रचलित शब्दों को लिए हुए हिन्दी भाषा। संस्कृत के अतिरिक्त इन्होंने बुन्देलखण्डी,अवधी और अरबी-फारसी के शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग किया है। केशव के काव्य में अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है। इन्होंने जितनी अधिक संख्या में ‘छन्दों का प्रयोग किया है,उतना आज तक किसी भी हिन्दी कवि ने नहीं किया है।

केशव हिन्दी साहित्य के प्रथम एवं सर्वाधिक प्रौढ़ आचार्य हैं। काव्यशास्त्र का जितना व्यापक और प्रौढ़ विवेचन इन्होंने किया है उतना परवर्ती कोई भी आचार्य नहीं कर सका है। केशव की रचनाओं में परिस्थिति और क्रियान्विति के आधार पर सभी रसों की निष्पत्ति हुई है। इन्होंने दोहा, कवित्त, सवैया, चौपाई, सोरठा आदि का प्रयोग किया है। केशव हिन्दी के प्रमुख आचार्य हैं। उच्चकोटि के रसिक होने पर भी वे पूरे आस्तिक थे।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) बाल्हा मैं बैरागिण………..साधाँ संग रहूँगी हो॥
(ब) भज मन चरण………..जनम की फाँसी।
(स) बालक मृणालनि……….गजमुख-मुख को।
(द) भावी भूत वर्तमान…………..नई-नई॥
उत्तर:
(अ) सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘भक्ति काव्य’ के शीर्षक ‘मीरा के पद’ से अवतरित है। इसकी रचयिता मीराबाई हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में भक्त कवयित्री मीरा ने अपने स्वामी श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए वैरागिण होने और शील, सन्तोष आदि गुणों को धारण करके अपनी अनन्य भक्ति का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि हे स्वामी मैं बैरागिन (संन्यासी) होकर संसार को त्याग दूंगी और जिस भेष (स्वरूप) से मेरे स्वामी कृष्ण प्रसन्न होंगे वैसा ही वेष मैं धारण करूँगी। अपने हृदय में शील और सन्तोष धारण करके सब लोगों के साथ समान व्यवहार करूँगी अर्थात् समता की राह पर चलूँगी। जिसका नाम निरंजन (पवित्र) है,उसी प्रभु का ध्यान मैं हमेशा अपने हृदय में धारण करूंगी। मैं अपने शरीर रूपी वस्त्र को गुरु के ज्ञान रूपी रंग से रंग लूँगी और मन रूपी मुद्रिका (अंगूठी) पहनूंगी। मैं प्रेम से प्रभु के गुणों का वर्णन करूँगी और उन्हीं के चरणों में लिपट कर पड़ी रहूँगी अर्थात् श्रीकृष्ण के चरणों का आश्रय ग्रहण करूँगी। अपने इस शरीर को तन्तु वाद्य बनाकर अपनी जिह्वा से राम नाम को रटती रहूँगी। मेरा शरीर और जिह्वा श्रीकृष्ण के नाम लेने के काम में ही आवे मीरा कहती हैं कि मेरे प्रभु गिरधर गोपाल हैं। मैं उन्हें प्रसन्न करने के लिए और उनका गुणगान करने के लिए साधुओं के साथ रहकर अपना जीवन सफल बनाऊँगी।

(ब) सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद में मीरा श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का भजन करने के लिए अपने आपको प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित कर रही है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती है कि हे मन ! तू श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का भजन कर। जिसने भी गिरधर के चरणों के दर्शन अपनी भृकुटि के बीच में कर लिए उसको तो संसार फीका लगता है। जब तक प्रभु श्रीकृष्ण के चरणों के दर्शन नहीं हुए तो तीर्थ करने,व्रत करने और काशी में शरीर त्यागने से भी कोई लाभ नहीं होता। मनुष्य को इस शरीर का गर्व नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। इस संसार का आनन्द तो हार जीत की शर्त के समान है जो शाम होते ही उठ जाता है। जैसे बाजार की चहल-पहल दिन में ही रहती है,शाम होते ही समाप्त हो जाती है। गेरुए वस्त्र धारण कर और घर त्याग कर संन्यासी होकर यदि ईश्वर को प्राप्त करने की युक्ति नहीं जानी तो फिर यह सब व्यर्थ है। फिर दोबारा संसार के जन्म-मरण के चक्कर में फंसना पड़ता है। मीरा के प्रभु तो गिरधर गोपाल हैं,वही उनके जन्म-मरण की रस्सी को काटकर उसे जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त करेंगे।

(स) सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश केशवदास द्वारा रचित ‘वन्दना’ के शीर्षक ‘गणेश वन्दना’ से उद्धृत है।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि केशवदास ने विघ्नहारी गणेश जी की वन्दना की है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जैसे बालक कमल की डाल को किसी भी समय आसानी से तोड़ डालता है। उसी प्रकार गणेश असमय में आए विकराल दुःख को भी दूर कर देते हैं। जैसे कमल के पत्ते पानी में फैली कीचड़ को नीचे भेज देते हैं और स्वयं स्वच्छ होकर ऊपर रहते हैं, उसी प्रकार गणेश हर विपत्ति को दूर कर देते हैं। जिस प्रकार चन्द्रमा को निष्कलंक कर शिवजी ने अपने शीश पर धारण किया उसी प्रकार गणेश जी अपने दास को कलंक रहित कर पवित्र कर देते हैं। गणेश जी बन्धन से अपने दास को मुक्त कर देते हैं। रावण भी गणेश जी के मुख की तरफ देखकर अपनी बाधाओं को दूर करने की आशा रखता है।

(द) सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद ‘केशवदास’ द्वारा रचित ‘वन्दना’ के शीर्षक ‘सरस्वती वन्दना’ से उद्धृत है।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने सरस्वती की उदारता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जगत में पूज्य सरस्वती की उदारता का वर्णन नहीं किया जा सकता। संसार में ऐसी श्रेष्ठ बुद्धि किसी में नहीं है जो उनकी उदारता का वर्णन कर सके देवता, सिद्ध मुनि,श्रेष्ठ तपस्वी सभी कह-कह कर हार गये, लेकिन कोई भी उनकी उदारता का वर्णन नहीं कर सका। भूत, वर्तमान और भविष्य बताने वाले सभी ने वर्णन किया, लेकिन केशवदास कहते हैं कि कोई भी सरस्वती की दया (उदारता) का वर्णन नहीं कर सका। उनके पति ब्रह्माजी ने, पुत्र शंकर जी ने और उनके नाती कार्तिकेय ने भी सरस्वती की उदारता का वर्णन किया लेकिन वे भी उनकी उदारता का पार नहीं पा सके। (शंकर जी का जन्म ब्रह्माजी की भौंहों से होने के कारण उनको पुत्र कहा गया है और कार्तिकेय शिवजी के पुत्र होने के नाते सरस्वती के नाती हुए।)

भक्ति काव्य काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 1 भक्ति काव्य img-1

प्रश्न 2.
‘म्हारों’, ‘सूँ’ आदि राजस्थानी शब्दों का प्रयोग मीरा के पदों में हुआ है। ऐसे ही अन्य शब्दों का चयन कर उनका अर्थ लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 12th Hindi Swati Solutions पद्य Chapter 1 भक्ति काव्य img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:
रसना – जिह्वा,जीभ,रसना।
पथ – मार्ग,पथ,राह।
गगन – नभ, आकाश, व्योम।
देह – तन,बदन,शरीर।
जगत – संसार,जग, दुनिया।
मुख – मुँह, वदन, आनन।
भव – जन्म,उत्पत्ति,संसार।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार पहचान कर लिखिए
(क) ‘सोच सोच पग धरूँ जतन से, बार-बार डिग जाइ।’
(ख) भज मन चरण कँवल अविनासी।’
(ग) ‘बालक मृणालनि ज्यों तोरि डारै सब काल।’
(घ) विपति हरत हठि पद्मिनी के पात सम।’
(ङ) पूरण पुराण अरु पुरुष पुराण परिपूरण ‘
(च) ‘दरसन देत जिन्हें दरसन सुमुझै न।’
उत्तर:
(क) अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार
(ख) रूपक अलंकार
(ग) उत्प्रेक्षा अलंकार
(घ) उपमा अलंकार
(ङ) अनुप्रास अलंकार
(च) यमक अलंकार।

प्रश्न 5.
रस की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
विभाव, अनुभाव और संचारी भावों की सहायता से पुष्ट होकर स्थायी भाव जब परिपक्व अवस्था को प्राप्त होता है, तो रस कहलाता है।

प्रश्न 6.
‘केशवदास’ की संकलित वन्दनाओं में कौन-सा रस है?
उत्तर:
शान्त रस।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित रस तथा उसके विभिन्न अंगों को समझाइए-
बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ,
ऐसी मति उदित उदार कौन की भई।
देवता प्रसिद्ध सिद्ध रिषिराज तपबृद्ध,
कहि कहि हारे सब कहि न काहू लई।
उत्तर:
उक्त पंक्तियों में शान्त रस है। इसका स्थायी भाव निर्वेद है। यहाँ आलम्बन विभाव सरस्वती जी हैं तथा आश्रय भक्त, गुणों का गान, अनुभव, धृति, मति आदि संचारी भाव हैं।

मीरा के पद भाव सारांश

‘मीरा के पद’ नामक कविता की रचयिता ‘मीराबाई हैं। उन्होंने इन पदों में श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर प्रेमभाव से समन्वित भक्ति को ही अपनी साधना का आधार बनाया।

भक्तिकाल में भक्ति का लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति के साथ-साथ समाज कल्याण की भावना की परिपुष्टि भी रही है। संकलित पदों में मीरा का दृढ़ संकल्प,उनकी सत्संग की प्रबल-चाह, उनकी भक्ति-यात्रा में आने वाले विघ्न, उन पर सद्गुरु की असीम कृपा तथा कृष्ण-कृपा की एकनिष्ठ आकांक्षा का उल्लेख है। मीरा के अनुसार, वह अपने प्रभु को प्रसन्न करने के लिए कोई भी वेष धारण कर सकती हैं। पिय से मिलने में कठिनाई है। संसार के काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि बाधाएँ प्रभु के पास जाने से रोकते हैं। मीरा के सतगुरु ने गिरधर नागर को ही उनका प्रभु बताया है। लाज के कारण मीरा कृष्ण के साथ मथुरा नहीं जा सकीं। श्याम के बिछड़ने से हृदय में पीड़ा हुई। संसार से उद्धार पाने के लिए देह का गर्व छोड़कर श्रीकृष्ण के चरण कमलों की वन्दना करनी चाहिए। श्रीकृष्ण से मीराबाई की यही प्रार्थना है कि वे उनका जन्म-मरण के बन्धन से उद्धार कर दें।’

मीरा के पद संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) बाल्हा मैं बैरागिण हूँगी हो।
जो-जो भेष म्हाँरो साहिब रीझै, सोइ-सोइ भेष धरूँगी, हो।
सील सन्तोष धरूँ घट भीतर, समता पकड़ रहूँगी, हो।
जाको नाम निरजण कहिये, ताको ध्यान धरूँगी, हो।
गुरु ज्ञान रंगू, तन कपड़ा, मन मुद्रा पेरूँगी, हो।
प्रेम प्रीत सँ हरि गुण गाऊँ चरणन लिपट रहँगी, हो।
या तन की मैं करूँ कीगरी, रसना नाम रदूँगी, हो।
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, साधाँ संग रहूँगी, हो।

शब्दार्थ :
बाल्हा = स्वामी; म्हाँरो = मेरे; साहिब = आराध्य (कृष्ण); सील = शील, लज्जा; घट = हृदय; समता = बराबरी; निरजण = निरंजन (दोष रहित); या तन = यह शरीर; कीगरी = तंतु वाद्य; रसना = जिह्वा (जीभ); गिरधर नागर = गिरिराज पर्वत को धारण करने वाले श्रीकृष्ण; साधौँ = साधुओं के।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘भक्ति काव्य’ के शीर्षक ‘मीरा के पद’ से अवतरित है। इसकी रचयिता मीराबाई हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में भक्त कवयित्री मीरा ने अपने स्वामी श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए वैरागिण होने और शील, सन्तोष आदि गुणों को धारण करके अपनी अनन्य भक्ति का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि हे स्वामी मैं बैरागिन (संन्यासी) होकर संसार को त्याग दूंगी और जिस भेष (स्वरूप) से मेरे स्वामी कृष्ण प्रसन्न होंगे वैसा ही वेष मैं धारण करूँगी। अपने हृदय में शील और सन्तोष धारण करके सब लोगों के साथ समान व्यवहार करूँगी अर्थात् समता की राह पर चलूँगी। जिसका नाम निरंजन (पवित्र) है,उसी प्रभु का ध्यान मैं हमेशा अपने हृदय में धारण करूंगी। मैं अपने शरीर रूपी वस्त्र को गुरु के ज्ञान रूपी रंग से रंग लूँगी और मन रूपी मुद्रिका (अंगूठी) पहनूंगी। मैं प्रेम से प्रभु के गुणों का वर्णन करूँगी और उन्हीं के चरणों में लिपट कर पड़ी रहूँगी अर्थात् श्रीकृष्ण के चरणों का आश्रय ग्रहण करूँगी। अपने इस शरीर को तन्तु वाद्य बनाकर अपनी जिह्वा से राम नाम को रटती रहूँगी। मेरा शरीर और जिह्वा श्रीकृष्ण के नाम लेने के काम में ही आवे मीरा कहती हैं कि मेरे प्रभु गिरधर गोपाल हैं। मैं उन्हें प्रसन्न करने के लिए और उनका गुणगान करने के लिए साधुओं के साथ रहकर अपना जीवन सफल बनाऊँगी।

काव्य सौन्दर्य :

  1. भगवान श्रीकृष्ण के प्रति मीरा की भक्ति भावना और श्रद्धा व्यक्त हुई है।
  2. अनुप्रास, रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. दास्य भाव की प्रधानता है।
  4. राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।
  5. शान्त रस का प्रयोग।

(2) गली तो चारों बन्द हुई, मैं हरि से मिलूँ कैसे जाइ।
ऊँची नीची राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराइ।
सोच-सोच पग धरूँ जतन से, बार-बार डिग जाइ।
ऊँचा नीचा महल पिया का, हमसे चढ्या न जाइ।
पिया दूर पथ म्हारो झीणों, सूरत झकोला खाइ।
कोस कोस पर पहरा बैठ्या, पैड़ पैड़ बटमार।
हे विधना कैसी रच दीन्हीं, दूर बस्यौ म्हाँरो गाँव।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सतगुरु दई बताय।
जुगन जुगन से बिछड़ी मीरा, घर में लीन्हीं लाय॥

शब्दार्थ :
गली = रास्ता; राह = मार्ग; रपटीली = चिकनी;जतन से = प्रयास से; डिग जाय = फिसल जाता है; झीणों = पतला, सँकरा; सूरत = शरीर;झकोला = हिल जाना; कोस = दो मील की दूरी;पैड़ = जगह; बटमार = राह का कर लेने वाले विधना = विधाता; बस्यौ = स्थित; म्हाँरो = मेरा; जुगन-जुगन = युग-युग से (युग चार होते हैं-सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग); बिछड़ी = बिछड़ गई है; लाय = अग्नि।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में मीराबाई ने अपने स्वामी श्रीकृष्ण से मिलने में संसार में आने वाली कठिनाइयों का वर्णन किया है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि प्रभु से मिलने के चारों रास्ते (कर्म, भक्ति,ज्ञान, वैराग्य) बन्द हैं तो फिर वह कैसे प्रभु से मिलें अर्थात् न तो कर्म अच्छा है,न भक्ति है,न ज्ञान है और न ही वैराग्य है जिससे कि प्रभु के पास जाया जा सकता है। उनसे मिलने का मार्ग ऊँचा-नीचा और रपटीला है जिस पर पैर ठहर नहीं पाते हैं अर्थात् चलने के लिए खड़े होते ही गिर जाते हैं। यहाँ पर प्रभु-मार्ग में आने वाली कठिनाइयों की ओर संकेत किया गया है। मन में बार-बार सोच-विचार कर आगे बढ़ने का प्रयत्न करती हूँ फिर भी पैर आगे नहीं बढ़ पाते। मेरे प्रिय श्रीकृष्ण का महल बहुत ऊँचा है जिसमें चढ़ने में मैं अपने को असमर्थ पाती हूँ। मेरे प्रियतम दूर बसे हैं और उन्हें प्राप्त करने का मार्ग बहुत सँकरा है जिस पर चलते ही शरीर डगमगाता है और नीचे गिरने का भय बना रहता है। हर कोस पर पहरेदार बैठे हैं और जगह-जगह पर कर वसूल करने वाले (लूटने वाले लुटेरे-काम, क्रोध,लोभ,मोह) बैठे हुए हैं जो हमारे आगे बढ़ने में बाधा उत्पन्न करते हैं। विधाता ने कुछ ऐसा नियम बनाया है जिसके कारण मेरा गाँव मेरे पिया से बहुत दूर है। मीरा को उसके सद्गुरु ने यह बताया है कि उसके प्रभु (स्वामी) तो गिरधर नागर श्रीकृष्ण हैं। उनसे बिछड़े हुए कई युग बीत गये हैं। मीरा के घर में आग लगी हुई है जिसके कारण न तो घर में रह सकती है और बाहरी संसार उसे रहने नहीं देता। ऐसे में प्रभु श्रीकृष्ण ही उसे अपना कर उसकी रक्षा कर सकते हैं।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ब्रजभाषा, पद गेय एवं लालित्यपूर्ण है।
  2. अनुप्रास अलंकार।
  3. गुण माधुर्य।
  4. शान्त रस है।

3. सखी री लाज बैरन भई।
श्री लाल गोपाल के संग काहे नाहिं गई।।
कठिन क्रूर अक्रूर आयो, साजि रथ कह नई।
रथ चढ़ाय गोपाल लैगो, हाथ मीजत रही।।
कठिन छाती स्याम बिछुरत, बिरह में तन तई।
दासी मीरा लाल गिरधर, बिखर क्यों न गई।

शब्दार्थ :
लाज = लज्जा; बैरन = दुश्मन; काहे = क्यों; क्रूर = कठोर; साजि = सजाकर; हाथ मीजत रही = पछता कर रह गई; बिरह = वियोग; तन = शरीर;तई = कढ़ाई; बिखर = नष्ट होना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में मीराबाई ने विरह जनित पीड़ा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। लोकलाजवश वह श्रीकृष्ण के साथ नहीं जा पाईं और उनके मथुरा चले जाने पर पछता कर रह गई।

व्याख्या :
मीराबाई कहती हैं कि हे सखी ! मेरी लाज ही मेरी दुश्मन हो गई। उसने मुझे गोपाल श्रीकृष्ण के साथ नहीं जाने दिया। मथुरा से कठोर हृदय वाला अक्रूर आया और अपने साथ सुन्दर रथ सजाकर लाया जिसमें कि श्रीकृष्ण को बिठाकर मथुरा ले गया और मैं अपने मन में पश्चाताप करती हुई रह गई। श्रीकृष्ण के वियोग में मेरा हृदय कठोरता का अनुभव करने लगा और मेरा शरीर उनके विरह में कढ़ाई के समान जलने लगा। मीरा तो गोपाल श्रीकृष्ण की दासी है। उन्होंने ही भक्तों के हित में गोवर्धन पर्वत उठाया था। मीरा को इस बात का दुःख है कि वह श्रीकृष्ण के विरह में नष्ट क्यों नहीं हो गई।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ब्रजभाषा,पद गेय है एवं लालित्यपूर्ण है।
  2. रस वियोग शृंगार।
  3. अनुप्रास व उपमा अलंकार।
  4. विरह का अनूठा वर्णन।

4. भज मन चरण कँवल अविनासी।
जे ताई दीसे धरण गगन बिच, ते ताइ सब उठि जासी।
कहा भयो तीरथ ब्रत कीन्हें, कहा लिए करवत कासी।
इस देही का गरब न करणा, माटी में मिल जासी।।
यो संसार चहर की बाजी, साँझ पड्यो उठ जासी।
कहा भयो है भगवा पहरयाँ, घर तज भये संन्यासी।।
जोगी होइ जुगत नहि जाणी, उलटि जनम फिर आसी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटो जनम की फाँसी।। (2009)

शब्दार्थ :
कँवल = कमल; अविनासी = जिसका नाश न हो; करवत कासी = काशी में मृत्यु होने पर; देही = शरीर; गरब = घमण्ड; चहर = रौनक; बाजी = हार जीत पर कुछ लेन-देन की शर्त; भगवा = गेरुए कपड़े; जुगत = युक्ति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद में मीरा श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का भजन करने के लिए अपने आपको प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित कर रही है।

व्याख्या :
मीराबाई कहती है कि हे मन ! तू श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का भजन कर। जिसने भी गिरधर के चरणों के दर्शन अपनी भृकुटि के बीच में कर लिए उसको तो संसार फीका लगता है। जब तक प्रभु श्रीकृष्ण के चरणों के दर्शन नहीं हुए तो तीर्थ करने,व्रत करने और काशी में शरीर त्यागने से भी कोई लाभ नहीं होता। मनुष्य को इस शरीर का गर्व नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। इस संसार का आनन्द तो हार जीत की शर्त के समान है जो शाम होते ही उठ जाता है। जैसे बाजार की चहल-पहल दिन में ही रहती है,शाम होते ही समाप्त हो जाती है। गेरुए वस्त्र धारण कर और घर त्याग कर संन्यासी होकर यदि ईश्वर को प्राप्त करने की युक्ति नहीं जानी तो फिर यह सब व्यर्थ है। फिर दोबारा संसार के जन्म-मरण के चक्कर में फंसना पड़ता है। मीरा के प्रभु तो गिरधर गोपाल हैं,वही उनके जन्म-मरण की रस्सी को काटकर उसे जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त करेंगे।

काव्य सौन्दर्य :

  1. ब्रजभाषा है,पद गेय एवं लालित्यपूर्ण है।
  2. अनुप्रास एवं उपमा अलंकार है।
  3. गुण-माधुर्य
  4. शान्त रस है।

वन्दना भाव सारांश

‘वन्दना’ नामक कविता के रचयिता नीतिनिपुण एवं स्पष्टवादी ‘केशवदास’ हैं। इसमें उन्होंने प्रथम पूज्य गणेश, विद्या की देवी सरस्वती एवं मर्यादा पुरुषोत्तम राम की वन्दना की है।

भक्ति केवल भक्तिकाल तक सीमित भाव नहीं है, यह काव्य के लिए एक शाश्वत-भाव भी है। इसलिए अन्य काल के कवियों में भी भक्ति-तत्व के दर्शन होते हैं; जैसे’केशवदास’-वे रीतिकाल के कवि माने जाते हैं, किन्तु उनकी कविता में भी भक्ति-भावना का निदर्शन हुआ है। प्रस्तुत काव्यांश में केशवदास द्वारा की गई देव वन्दना परक पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं। भक्ति’ के अन्तर्गत ‘इष्ट’ के वन्दन-अर्चन की प्रक्रिया है। वे गणेश, सरस्वती और श्रीराम की वन्दना करते हुए इनकी महिमा का वर्णन करते हैं। वे गणेश की कष्ट निवारक क्षमता,सरस्वती की उदारता और श्रीराम की मुक्ति प्रदायिनी क्षमता का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं।

वन्दना संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

1. गणेश वन्दना
बालक मृणालनि ज्यों तोरि डारै सब काल,
कठिन कराल त्यों अकाल दीह दुःख को।
बिपति हरत हठि पद्मिनी के पात सम,
पंक ज्यों पताल पेलि पठवै कलुष को।
दूरि कै कलंक-अंक भव-सीस-ससि सम,
राखत है केशोदास दास के बपुष को।
साँकरे की साँकरनि सनमुख होत तोरै,
दसमुख मुख जोवै गजमुख-मुख को।।

शब्दार्थ :
मृणालनि = कमल की नाल; कराल = विकराल; अकाल = असमय; दीह = बड़ा,लम्बा; पद्मिनी = कमलनी; पात = पत्ता;पंक = कीचड़; पेलि = हठपूर्वक; पठवै = भेज देता है; कलुष = पाप; अंक = गोद; वपुष = देह; सनमुख = सामने दसमुख = रावण; गजमुख = गणेश।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश केशवदास द्वारा रचित ‘वन्दना’ के शीर्षक ‘गणेश वन्दना’ से उद्धृत है।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि केशवदास ने विघ्नहारी गणेश जी की वन्दना की है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जैसे बालक कमल की डाल को किसी भी समय आसानी से तोड़ डालता है। उसी प्रकार गणेश असमय में आए विकराल दुःख को भी दूर कर देते हैं। जैसे कमल के पत्ते पानी में फैली कीचड़ को नीचे भेज देते हैं और स्वयं स्वच्छ होकर ऊपर रहते हैं, उसी प्रकार गणेश हर विपत्ति को दूर कर देते हैं। जिस प्रकार चन्द्रमा को निष्कलंक कर शिवजी ने अपने शीश पर धारण किया उसी प्रकार गणेश जी अपने दास को कलंक रहित कर पवित्र कर देते हैं। गणेश जी बन्धन से अपने दास को मुक्त कर देते हैं। रावण भी गणेश जी के मुख की तरफ देखकर अपनी बाधाओं को दूर करने की आशा रखता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. भक्ति रस का प्रयोग हुआ है।
  2. अनुप्रास, उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग।
  3. गुण-माधुर्य।

2. सरस्वती वन्दना
बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ
ऐसी मति उदित उदार कौन की भई।
देवता प्रसिद्ध सिद्ध रिषिराज तपवृद्ध
कहि-कहि हारे सब कहि न काहू लई।
भावी भूत वर्तमान जगत बखानत है,
केशोदास क्योंहू ना बखानी काहू पै गई।
पति बनें चार मुख पूत बर्ने पाँच मुख,
नाती बनें घटमुख तदपि नई-नई। (2009)

शब्दार्थ :
बानी = सरस्वती;जगरानी = जगत् की पूज्य; उदारता = दयालुता; बखानी = वर्णन करना;मति = बुद्धि; उदित = उदय होना; तपवृद्ध = श्रेष्ठ तपस्वी; भावी भूत वर्तमान = भूत, वर्तमान और भविष्य; चारमुख = ब्रह्मा; पाँच मुख = शिवजी; षटमुख = कार्तिकेय; तदपि = फिर भी।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद ‘केशवदास’ द्वारा रचित ‘वन्दना’ के शीर्षक ‘सरस्वती वन्दना’ से उद्धृत है।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने सरस्वती की उदारता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जगत में पूज्य सरस्वती की उदारता का वर्णन नहीं किया जा सकता। संसार में ऐसी श्रेष्ठ बुद्धि किसी में नहीं है जो उनकी उदारता का वर्णन कर सके देवता, सिद्ध मुनि,श्रेष्ठ तपस्वी सभी कह-कह कर हार गये, लेकिन कोई भी उनकी उदारता का वर्णन नहीं कर सका। भूत, वर्तमान और भविष्य बताने वाले सभी ने वर्णन किया, लेकिन केशवदास कहते हैं कि कोई भी सरस्वती की दया (उदारता) का वर्णन नहीं कर सका। उनके पति ब्रह्माजी ने, पुत्र शंकर जी ने और उनके नाती कार्तिकेय ने भी सरस्वती की उदारता का वर्णन किया लेकिन वे भी उनकी उदारता का पार नहीं पा सके। (शंकर जी का जन्म ब्रह्माजी की भौंहों से होने के कारण उनको पुत्र कहा गया है और कार्तिकेय शिवजी के पुत्र होने के नाते सरस्वती के नाती हुए।)

काव्य सौन्दर्य :

  1. सरस्वती वन्दना में उनके प्रति आस्था का निष्पादन हुआ है।
  2. ब्रजभाषा में रचना है।
  3. अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।
  4. भाषा में मधुरता का गुण है।
  5. शान्त रस का प्रयोग।

3. श्रीराम वन्दना
पूरण पुराण अरु पुरुष पुराण परिपूरण,
बतावै न बतावै और उक्ति को।
दरसन देत जिन्हें दरसन सुमुझैं न,
नेति-नेति कहैं वेद छाँड़ि भेद जुक्ति को।
जानि यह केशोदास अनुदिन राम-राम,
स्टत रहत न डरत पुनरुक्ति को।
रूप देहि अणिमाहि गुन देई गरिमाहि
भक्ति देई महिमाहि नाम देई मुक्ति को।

शब्दार्थ :
पूरण पुराण = पूर्ण ब्रह्म; परिपूरण = पूरे; पुरुष पुराण = पुरुषोत्तम; उक्ति = उपाय; दरसन = दर्शन; नेति-नेति = इतना ही नहीं; वेद = वेद चार हैं-सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, ऋग्वेद, भेद जुक्ति = भेद करने की युक्ति; अनुदिन = प्रतिदिन; पुनरुक्ति = बार-बार संसार में आना; अणिमाहि = सूक्ष्मता, अणिमा सिद्धि; गुन = गुण; गरिमा = अष्ट सिद्धियों में से एक; गुरुत्व,महिमा = आठ सिद्धियों में से एक (महिमा); मुक्ति = जन्म मृत्यु से छुटकारा।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश ‘केशवदास’ द्वारा रचित ‘वन्दना’ के शीर्षक ‘श्रीराम वन्दना’ से लिया गया है।

प्रसंग :
यहाँ पर कवि ने श्रीराम की वन्दना का वर्णन किया है।

व्याख्या :
केशवदास कहते हैं कि और कोई उक्ति बताये या न बताये श्रीराम पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तम हैं। उनका दर्शन पाकर भी कोई उन्हें समझ नहीं पाता है क्योंकि वेद भी ‘न इति’ ‘न इति’ कहकर उस भेद को वहीं छोड़ देते हैं। यह जानकर केशवदास प्रतिदिन राम-राम रटते रहते हैं जिसके कारण उन्हें जन्म-मरण का डर नहीं रहता,क्योंकि राम-राम रटने से जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है। श्रीराम का रूप अणिमा सिद्धि (सूक्ष्मता) प्रदान करता है, उनका गुण गरिमा सिद्धि (गुरुत्व) प्रदान करता है, उनकी भक्ति महिमा (बड़प्पन) सिद्धि प्रदान करती है और उनका नाम मुक्ति प्रदान करता है।

काव्य सौन्दर्य :

  1. श्रीराम की महानता का बड़ा विशद वर्णन है।
  2. भक्ति रस समाया हुआ है।
  3. अनुप्रास, श्लेष, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकारों का प्रयोग।
  4. ब्रजभाषा में मधुरता का गुण है।

MP Board Class 12th Hindi Solutions

MP Board Class 6th Sanskrit Solutions Chapter 13 चतुरः वानरः

MP Board Class 6th Sanskrit Solutions Surbhi Chapter 13 चतुरः वानरः

MP Board Class 6th Sanskrit Chapter 13 अभ्यासः

Chatur Vanar Ka Saransh MP Board Class 6th Sanskrit प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) जम्बूवृक्षेः कुत्र आसीत्? (जामुन का वृक्ष कहाँ था?)
उत्तर:
नदीतीरे (नदी के किनारे)

(ख) कः प्रतिदिनं जम्बूफलानि खादति स्म? (प्रतिदिन कौन जामुन के फल खाया करता था?)
उत्तर:
वानरः (बन्दर)

(ग) वानरस्य मित्रं कः आसीत्? (बन्दर का मित्र कौन था?)
उत्तर:
मकरः (मगरमच्छ)

(घ) का वानरस्य हृदयं खादितम् इच्छति? (बन्दर के हृदय को कौन खाना चाहती थी?)
उत्तर:
मकरस्य पत्नी (मगरमच्छ की पत्नी)।

Bandar Aur Magarmach Ki Kahani In Sanskrit प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत (एक वाक्य में उत्तर लिखो)
(क) वानरः कस्मै जम्बूफलानि ददाति स्म? (बन्दर किसे जामुन के फल दिया करता था?)
उत्तर:
वानरः मकराय जम्बूफलानि ददाति स्म। (बन्दर मगरमच्छ को जामुन के फल दिया करता था।)

(ख) मकरः कस्यै जम्बूफलानि अयच्छत्? (मगरमच्छ किसको जामुन के फल देता था?)
उत्तर:
मकरः स्वपत्न्यै जम्बूफलानि अयच्छत्। (मगरमच्छ ने अपनी पत्नी को जामुन के फल दिये।)

(ग) वानरः कीदृशानि फलानि खादति स्म? (बन्दर कैसे फल खाया करता था?)
उत्तर:
वानरः मधुराणि फलानि खादति स्म। (बन्दर मीठे फल खाया करता था।)

(घ) नद्याः मध्ये मकरः वानरं किम् अवदत्? (नदी के बीच मगरमच्छ ने बन्दर को क्या बतलाया?)
उत्तर:
नद्याः मध्ये मकरः वानरं अवदत्, “मम पत्नी तव हृदयं खादितुं इच्छति।” (नदी के बीच मगरमच्छ ने बन्दर को बतलाया, “मेरी पत्नी तुम्हारे हृदय को खाना चाहती है।”)

Chatur Vanar Sanskrit MP Board Class 6th Sanskrit प्रश्न 3.
रिक्तस्थानानि पूरयत (खाली स्थानों को भरो)
(क) शुष्कं पत्रं (1) ………… (2) ………..
(ख) रक्तं कमलं (3) ………. (4) …………
(ग) निर्मलं हृदयं (5) ………. (6) ………..
(घ) स्वस्थं शरीरं (7) ………… (8) ……….
(ङ) सुन्दरं गृहम् (9) ………… (10) ………..
उत्तर:

  1. शुष्के पत्रे
  2. शुष्कानि पत्राणि।
  3. रक्ते कमले
  4. रक्तानि कमलानि।
  5. निर्मले हृदये
  6. निर्मलानि हृदयानि
  7. स्वस्थ शरीरे
  8. स्वस्थानि शरीराणि।
  9. सुन्दरे गृहे
  10. सुन्दराणि गृहाणि ।

चतुर वानर का सारांश MP Board Class 6th Sanskrit प्रश्न 4.
ध्यानेन वाक्यं पठित्वा पुनः लिखत (ध्यान से वाक्य को पढ़कर फिर से लिखो)
(क) निखिलः गृहं अगच्छत्।
(ख) रामः वने अवसत्।
(ग) पिता पुत्रं अवदत्।
(घ) सा उच्चैः अहसत्।
उत्तर:
(क) निखिलः गृहं गच्छति स्म।
(ख) रामः वने वसति स्म।
(ग) पिता पुत्रं वदति स्म।
(घ) सा उच्चैः हसति स्म।

Mp Board Class 6 Sanskrit Chapter 13 प्रश्न 5.
उदाहरणम् अनुसृत्य लिखत (उदाहरण के अनुसार लिखो)
यथा-खाद् + क्त्वा = खादित्वा
मकरः जम्बूफलानि खादित्वा प्रसन्नः अभवत्।
(क) बालकः विद्यालयं ……… पाठं पठति। गम् + क्त्वा
(ख) बालिका उच्चैः ……….. वदति। हस् + क्त्वा
(ग) वानरः वृक्षे ………. तिष्ठति। कूर्द + क्त्वा
(घ) बालकः पाठं ………. खेलति। पठ् + क्त्वा
उत्तर:
(क) बालक: विद्यालयं गत्वा पाठं पठति।
(ख) बालिका उच्चैः हँसित्वा वदति।
(ग) वानरः वृक्षे कूर्दित्वा तिष्ठति।
(घ) बालकः पाठं पठित्वा खेलति।

Class 6 Sanskrit Chapter 13 Mp Board प्रश्न 6.
उचितक्रियापदं योजयत (उचित क्रियापद से जोड़ो)
(क) त्वं कुत्र ………..। (गमिष्यसि/गमिष्यति)
(ख) अहं पत्रं ………..। (लेखिष्यामि/लेखिष्यन्ति)
(ग) वयं पुष्पाणि …………। (आनेष्यन्ति/आनेष्यामः)
(घ) यूयं कदा ………..। (वदिष्यसि/वदिष्यथ)
(ङ) सः फलं ………….। (खादिष्यति/आगमिष्यति)
(च) ते उच्चैः …………। (हसिष्यावः/हसिष्यन्ति)
(छ) किं युवा भोपालनगरे ………..? (वसिष्यथ:/वसिष्यथ)
(ज) आवां पाठं …………..। (पठिष्यावः/पठिष्यथ:)
(झ) तौ विद्यालयं …………..। (आगमिष्यतः/आगमिष्यन्ति)
उत्तर:
(क) गमिष्यसि
(ख) लेखिष्यामि
(ग) आनेष्यामः
(घ) वदिष्यथ
(ङ) खादिष्यति
(च) हसिष्यन्ति
(छ) वसिष्यथः
(ज) पठिष्यावः
(झ) आगमिष्यतः।

अयच्छत् Meaning MP Board Class 6th Sanskrit योग्यताविस्तारः

कथां आधृत्य क्रमानुसारं पुनः लिखत (कथा के आधार पर क्रमानुसार पुनः लिखो)
(क) त्वं तु जले वससि, कथम् अहं तत्र गन्तुं शक्नोमि।
(ख) परं सा दृढनिश्चया आसीत्।
(ग) एकस्मिन् नदीतीरे एकः जम्बूवृक्षः आसीत्।
(घ) अद्य त्वं मम गृहमागच्छ।।
(ङ) रे मित्र! मम हृदयं तु वृक्षस्य कोटरे निहितम्।
(च) तस्मिन् एकः वानरः प्रतिवसति स्म।
(छ) इतः परं त्वया सह मम मैत्री समाप्ता।
(ज) त्वं मूर्खः असि।
(झ) कश्चित् मकरः तस्य मित्रम् आसीत्।
उत्तर:
(ग) → (च) → (झ) → (ख) → (घ) → (क) → (ङ) → (ज) → (छ)।

चतुरः वानरः हिन्दी अनुवाद

एकस्मिन् नदीतीरे एकः जम्बूवृक्षः आसीत्। तस्मिन् एकः वानरः प्रतिवसति स्म। सः नित्यं जम्बूफलानि खादति स्म। कश्चित् मकरः तस्य मित्रम् आसीत्। सः वानरः प्रतिदिनं तस्मै जम्बूफलानि ददाति स्म। अतः सः मकरः तस्य वानरस्य प्रिय मित्रम् अभवत्।

अनुवाद :
एक नदी के किनारे एक जामुन का पेड़ था। उस पर एक वानर रहा करता था। वह प्रतिदिन जामुन के फल खाया करता था। कोई मगरमच्छ उसका मित्र था। वह बन्दर प्रतिदिन उसको जामुन के फल दिया करता था। अत: वह मगरमच्छ उस बन्दर का प्रिय मित्र बन गया।

एकदा मकरः कानिचित् जम्बूफलानि स्वपत्न्यै अयच्छत्। तानि खादित्वा तस्य पत्नी अचिन्तयत्, “अहो! सः वानरः प्रतिदिनं मधुराणि जम्बूफलानि खादति। अतः नूनं तस्य हृदयमपि अतिमधुरं भविष्यति” इति। सा स्वपतिम् अवदत्, “भो प्रतिदिनं मधुराणि जम्बूफलानि खादित्वा त्वं वानरमित्रस्य हृदयं कियत् मधुरं स्यात्? तस्य हृदयं खादित्वा मम हृदयमपि अतिमधुरं भविष्यति। तत् यदि माम् जीवितां दुष्टम् इच्छसि तर्हि आनय शीघ्रं तस्य वानरस्य हृदयम्।”

मकरः स्वपत्नी बहुविधैः निवारितवान्। परं सा दृढ़निश्चया आसीत्। विवशः मकरः स्वमित्रं वानरं प्रति गत्वा अवदत, “मित्र प्रतिदिनम् अहम् एव अन्नं आगच्छामि। अद्य त्वं मम गृहमागच्छ।”

वानरः प्रत्युवाच, “त्वं तु जले वससि, कथम् अहं तत्र गन्तुं शक्नोमि?”

Khaga Kutra Basanti MP Board Class 6th Sanskrit अनुवाद :
एक दिन मगरमच्छ ने कुछ जामुन के फल अपनी पत्नी को दिये। उन्हें खाकर उसकी पत्नी ने सोचा, “अहो! वह बन्दर प्रतिदिन मीठे जामुन के फल खाता है। अतः अवश्य ही उसका हृदय भी अति मधुर होगा।” वह अपने पति से बोली, “अरे, प्रतिदिन मधुर जामुन के फल खाकर आपके वानर-मित्र का हृदय कितना मधुर होगा ? उसके हृदय को खाकर मेरा हृदय भी अति मधुर हो जायेगा। इसलिए यदि मुझे जीवित देखना चाहते हो, तो शीघ्र ही उस बन्दर के हृदय को लाओ।”

मगरमच्छ ने अपनी पत्नी को अनेक प्रकार से रोका (इन्कार किया) परन्तु वह पक्के निश्चय वाली थी। विवश हुआ मगरमच्छ अपने मित्र बन्दर के पास जाकर बोला, “हे मित्र, प्रतिदिन मैं ही यहाँ आया करता हूँ। आज तुम मेरे घर आओ।”

बन्दर ने उत्तर दिया, “तुम तो जल में रहते हो, मैं वहाँ किस तरह जा सकता हूँ?”

मकरः अवदत्, “अलं चिन्तया। त्वं मम पृष्ठोपरि उपविश। अहं त्वां नेष्यामि।”

यदा तौ नद्याः मध्यभागे स्थितौ तदा मकरः वानरम् अवदत्, “मम पत्नी तव हृदयं खादितुंइच्छति। अतः त्वां मम गृहं नयामि।”

मकरस्य वचनेन वानरः भीतः। किन्तुः चतुरः वानरः शीघ्रम् अवदत्, “रे मित्र! मम हृदयं तु वृक्षस्य कोटरे निहितम्। अतः त्वं शीघ्र मां तत्र नय। अहं प्रमुदितमना मम हृदयं तुभ्यं दास्यामि। मकरः वानरं पुनः तास्यावासं आनीतवान्। चतुरः वानरः शीघ्रं कूर्दित्वा वृक्षोपरि आरुहत्।”

अनुवाद :
मगरमच्छ बोला, “चिन्ता मत करो। तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें ले जाऊँगा।”

जब वे दोनों नदी के मध्य भाग ठहर गये, तब मगरमच्छ बन्दर से बोला, “मेरी पत्नी तुम्हारे हृदय को खाना चाहती है। अतः तुमको घर ले चलता हूँ।”

मगरमच्छ के वचन से बन्दर भयभीत हो गया। किन्तु चतुर बन्दर शीघ्र बोला, “अरे मित्र ! मेरा हृदय तो वृक्ष के कोटर में रखा हुआ है। अतः तुम शीघ्र मुझे वहाँ ले चलो। मैं प्रसन्न मन से अपने हृदय को तुम्हें दे दूंगा। मगरमच्छ बन्दर को फिर से उसके निवास पर लेकर आया। चतुर बन्दर शीघ्र ही कूदकर वृक्ष के ऊपर चढ़ गया।”

वानरः उच्चैः हसित्वा मकरम् अवदत्, “रे मूर्ख! किं हृदयं कदापि शरीरात् पृथक् भवति? त्वं मूर्खः असि। इति परं त्वया सह मम मैत्री समाप्ता।”

इति उक्त्वा वानरः पुनः मधुराणि जम्बूफलानि अभक्षयत्।

“विश्वासो हि ययोर्मध्ये तयोर्मध्येऽस्ति सौहृदम्।
यस्मिन्नवास्ति विश्वासः तस्मिन् मैत्री क्व सम्भवा॥”

अनुवाद :
बन्दर ऊँचे स्वर में हँसकर मगरमच्छ से बोला, “अरे मूर्ख! क्या हृदय कभी शरीर से अलग होता है? तुम मूर्ख हो। इससे आगे तुम्हारे साथ मेरी मित्रता समाप्त हो गई।”

ऐसा कहकर, बन्दर ने फिर मधुर (मीठे) जामुन के फल खाये।

“जिनके मध्य विश्वास है, उनके साथ ही मित्रता होती है। जिसमें विश्वास नहीं होता है, वहाँ (उसमें) मित्रता कैसे सम्भव है।”

चतुरः वानरः शब्दार्थाः

जम्बूवृक्षः = जामुन का पेड़। प्रतिवसति स्म = रहता था। कानिचित् = कुछ। खादित्वा = खाकर। चिन्तयित्वा = सोचकर। कियत् = कितना। स्यात् = होना चाहिए। तर्हि = तो। आनय = लाओ। बहुविधैः = अनेक प्रकार से। निवारितवान् = रोका। अद्य = आज। प्रत्युवाच = उत्तर दिया। शक्नोमि= सकता हूँ। अलं चिन्तया = चिन्ता मत करो। नेष्यामि = ले जाऊँगा। नद्याः = नदी के। खादितुम् इच्छति = खाने के लिए इच्छा करती है/करता है। कोटरे = खोखले में। प्रमुदितमना = प्रसन्न मन से। आरुहत् = चढ़ गया। इतः परम् = इसके बाद। अभक्षयत् = खाए। सौहृदम् = मित्रता। कूर्दित्वा = कूदकर। कश्चित = कोई। निहितम् = रखा है। नूनं = निश्चित। दृष्टुम् = देखना।

MP Board Class 6th Sanskrit Solutions

MP Board Class 6th Special English Solutions Chapter 12 Columbus Discovers America-I

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Columbus Discovers America-I Text Book Exercise

Word Power

(a) Fill in the blanks with the words given below:
Class 6 Chapter 12 English MP Board

  1. The workers have gone on strike. They are …………… higher wages.
  2. My brother has failed six times in the Intermediate examination. He won’t take the examination again. He has lost all …………. of passing it.
  3. Chennai can be attacked by ships because it is on the sea ……………
  4. A crowd had collected at the scene of the accident. A policeman came up and asked one of the men in the crowd, “Can you …………… how the accident happened?”
  5. “I want to sew these buttons on this coat. Can you get me a …………… and some thread?”
  6. Marco Polo first went to China by land ………….. across Central Asia, but he returned home by sea.
  7. Drinking too much brought about the …………… of Mr. Bharti’s health.
  8. Iron is hard, but silk is ……………….
  9. You must ……………. a thing carefully before you describe it.

Answer:

  1. demanding
  2. hope
  3. coast
  4. describe
  5. needle
  6. route
  7. ruin
  8. soft
  9. observe.

(b) Fill in the blanks with suitable words given below.

Class 6 English Book Lesson 12 MP Board

  1. The bite of snake is often ……………… It kills a man within a few minutes.
  2. The boy was …………… when a big dog rushed at him barking.
  3. My son left for Delhi ten days ago. I am worried because I have not heard from him …………… .
  4. “What you read in this book is a true story. It is not an …………….. one.”
  5. Our school football team this year is strong. It is sure to win the inter school cup this year. Its defeat is …………..
  6. Our school football team was playing against the Town Club. By half time the Town Club had scored two goals and our players were beginning to lose heart. “Don’t give up,” we all shouted “Fight on!” Our players ………….. again, played well, and won the match.
  7. Mr. Sampath was unwilling to become the Chief Minister. But all the M.L.A.s met him in a body and tried to …………… him to take up the office. At first they did not …………. , but they did not give up. They met him again and again. They …………. to give him every cooperation and to act according to his wishes ………….. , Mr. Sampath agreed to become the Chief Minister.
  8. The people …………… against the king only when his rule became unbearable.
  9. No one was able to recognise the policeman who was disguised as a sanyasi. He wore a ………….. beard and yellow clothes.

Answer:

  1. deadly
  2. terrified
  3. so far
  4. imaginary
  5. unthinkable
  6. took heart
  7. persuade, succeed, undertook, at last
  8. rebelled
  9. false.

(c) Match the words under A with the meaning under B.

Class 6th English Chapter 12 MP Board
Answer:
1. → (c)
2. → (f)
3. → (e)
4. → (a)
5. → (g)
6. → (h)
7. → (d)
8. → (b)

Comprehension

(a) Say true (T) or false (F) in the given box.

  1. The Sargasso Sea was covered with seaweed.
  2. People were eager to travel with Columbus
  3. The Spanish King and Queen gave two ships to Columbus.
  4. Columbus’s first destination was the Canary Islands.
  5. The ship, Pinta lost its sail.
  6. Columbus set sail on Friday, the 3rd of August 1492.

Answer:

  1. (T)
  2. (F)
  3. (F)
  4. (T)
  5. (T)
  6. (T)

(b) Answer the following questions:

Class 6 English Chapter 12 MP Board Question 1.
What was the plan of Vaso-de-Gama?
Answer:
The plan of Vasco-de-Gama was to find a sea-route to India with the help of the Portuguese sailors.

Class 6 English Chapter 12 Question Answer MP Board Question 2.
Why did Columbus think that one could find a sea route to India by sailing west from Europe?
Answer:
The scientists had told that the earth was spherical in shape. Hence, Columbus thought that he could reach India by sailing west from Europe.

Class 6th English Chapter 12 MP Board Question 3.
What stopped Columbus from sailing at once after getting the ships?
Answer:
Columbus got the ships from the king and queen of Spain. He could not start his voyage immediately, because the sailors were not ready for-it. They were afraid of various dangers of the unknown sea, especially the deadly snakes.

Class 6 English Book Lesson 12 MP Board Question 4.
What kind of people made up Columbus’s crew?
Answer:
Columbus had to train the beggars and prisoners as the members of his crew.

Class 6 Chapter 12 English MP Board  Question 5.
What dangers did people imagine in the seas beyond the Canary Island?
Answer:
The people had mis-beliefs like the presence of doorway to hell in and beyond the Canary Islands, sea snakes of the dangerous sea and many other things. So they did not accept the offer of Columbus.

Chapter 12 English Class 6 MP Board Question 6.
Why did Columbus stop for some time at the Canary Islands?
Answer:
One of the ships of Columbus had lost her rudder on the way to the Canary Islands. It was due to the mischief of the unwilling crew. Columbus could not sail forward. Therefore, he had to stop there for some time to get the ship repaired.

Class 6 English Chapter 12 Questions And Answers MP Board Question 7.
“This hope turned out to be false.”
(a) What was the hope?
(b) How did the sailors come to have the hope?
Answer:
(a) Their hope was that the land was quite near to them.
(b) The sailors hoped so, because they had seen two birds flying in the air over the sea. The sight of birds made the presence of the land nearby sure.

English Chapter 12 Class 6 MP Board  Question 8.
At what point during the voyage did the sailors demand that the ships should turn back home?
Answer:
When the compass started pointing to the North-West, instead of the North, the sailors were confused. Being terribly afraid they demanded that they should drop the idea of going and return to their homeland.

Grammar in Use

1. Read these sentences.

Columbus promised his sailors rich rewards, Yet not many came forward to sail with him.
The meaning can also be expressed thus:
Though Columbus promised his sailors rich rewards, not many came forward to sail with him.
The clause beginning with though is an Adverbial clause of Concession. You can use although in place of though.

Rewrite the sentences given below using though/although and underline the Adverbial Clause.

  1. He is only thirteen years old yet he has passed the matriculation examination
  2. My watch is a cheap one; yet it has been keeping good time for the last ten years.
  3. My servant is lazy; yet I keep him because of his honesty.
  4. She was very tired; yet she kept working.
  5. I have read this poem several times; yet I can’t under stand it.
  6. Some people are very rich; yet they are not happy.
  7. There was no sign of land; yet they sailed on and on.

Answer:

  1. Though he is only thirteen years old, he has passed the matriculation examination.
  2. Though my watch is a cheap one, it has been keeping good time for the last ten years.
  3. Although my servant is lazy, I keep him because of his honesty.
  4. Although she was tired, she kept working.
  5. Though I have read this poem several times, I can’t understand it.
  6. Though some people are very rich, they are not happy.
  7. Though there was no sign of land, they sailed on and on.

Let’s Talk

1. You want to go on a trip of Pachmarhi. Talk to your partner and prepare the list of items you need for the trip.

Talk like this
Monu : Sonu, I’ll take a blanket and a torch. What are you taking?
Sonu : I’ll take a raincoat, few fruits and a knife.
Monu :
Answer:
Do yourself.

Let’s Write

1. From the table below make six sentences referring to events in the stories you have read. Here is one of the sentences given as an example: Columbus expected to reach India by sailing west.

Class 6 English Chapter 12 Question Answer MP Board
Answer:

  1. He decided to ask the Jew.
  2. Akbar agreed to send Birbal to heaven.
  3. The courtiers wished to bring about Birbal’s death.
  4. Kassim promised to give Ali ten marbles.
  5. Columbus expected to reach India by sailing west.
  6. Columbus tried to discover a new sea route to india.

Columbus Discovers America-I Word Meanings

Class 6 English Chapter 12 MP Board

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 8 मातृभूमि का मान

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 8 मातृभूमि का मान (एकांकी, हरिकृष्ण प्रेमी)

मातृभूमि का मान अभ्यास

बोध प्रश्न

मातृभूमि का मान अति लघु उत्तरीय प्रश्न

Mathrubhumi Ka Maan Kisne Rakha MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 1.
बूंदी के राव मेवाड़ के अधीन क्यों नहीं रहना चाहते?
उत्तर:
बूंदी के राव मेवाड़ के अधीन नहीं रहना चाहते थे क्योंकि वे स्वतन्त्रता में विश्वास करते थे और किसी की भी गुलामी स्वीकार नहीं करते थे।

मातृभूमि का मान प्रश्न उत्तर MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 2.
मुट्ठी भर हाड़ाओं ने किसे पराजित किया था?
उत्तर:
मुट्ठी भर हाड़ाओं ने महाराणा लाखा तथा उनकी सेना को पराजित किया था।

Mathrubhumi Ka Maan Questions And Answers MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 3.
वीर सिंह का प्राणान्त कैसे हुआ?
उत्तर:
वीर सिंह का प्राणान्त गोले के वार से हुआ।

Mathrubhumi Ka Naam Kisne Rakha MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 4.
“अनुशासन का अभाव हमारे देश के टुकड़े किये हुए है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन महाराणा लाखा के विश्वास पात्र दरबारी अभयसिंह का है।

Matra Bhumi Ka Maan Question Answer MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 5.
महाराणा लाखा वीर सिंह के किस गुण से प्रसन्न हुए?
उत्तर:
महाराणा लाखा वीर सिंह की वीरता के गुण से प्रसन्न हुए।

मातृभूमि का मान लघु उत्तरीय प्रश्न

मातृभूमि पाठ का सारांश MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 1.
महाराणा लाखा ने कौन-सी प्रतिज्ञा की थी?
उत्तर:
महाराणा लाखा ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक बूंदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।

मातृभूमि का मान किसने रखा उत्तर MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 2.
चारणीने राजपूत शक्तियों के विषय में महाराणा से क्या कहा था?
उत्तर:
चारणी ने महाराणा से कहा था कि आप हाड़ा वंशजों की धृष्टता को भूल जायें और राजपूत शक्तियों में स्नेह का सम्बन्ध बना रहने दें।

मातृभूमि का मान किसने रखा एक वाक्य में उत्तर MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 3.
वीर सिंह ने जन्मभूमि की रक्षा के विषय में अपने साथियों से क्या कहा था?
उत्तर:
वीर सिंह ने कहा कि जिस जन्मभूमि की गोद में खेलकर हम बड़े हुए हैं, उसके अपमान को हम किसी भी कीमत पर सहन नहीं कर सकते। वीर सिंह ने अपने साथियों से कहा कि तुम अग्नि कुल के अंगारे हो। अपने वंश की शान को कमजोर मत होने देना। प्रतिज्ञा करो कि जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं, तब तक इस दुर्ग (बूंदी का नकली दुर्ग) पर हम मेवाड़ राज्य पताका को स्थापित नहीं होने देंगे।

Mathrubhumi Ka Maan Question Answer MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 4.
महाराणा अपनी विजय को पराजय क्यों कहते
उत्तर:
महाराणा अपनी विजय को पराजय इसलिए कहते हैं क्योंकि उनके व्यर्थ के अभिमान और विवेकहीन प्रतिज्ञा ने कितने ही निर्दोष प्राणों की बलि ले लीं थी। महाराणा को वीर सिंह जैसे देशभक्त और बहादुर युवक की मृत्यु का भी बहुत अफसोस था।

मातृभूमि का मान दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

Matra Bhumi Ka Maan Kisne Rakha MP Board Class 10th Hindi प्रश्न 1.
‘वीर सिंह का चरित्र मातृभूमि के सम्मान की शिक्षा देता है’ इस कथन को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
वीर सिंह मेवाड़ के महाराणा लाखा के यहाँ नौकर था और बूंदी राज्य उसकी जन्मभूमि था। जब उसे पता लगता है कि महाराणा लाखा ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने हेतु बूंदी का नकली दुर्ग बनवाया है तथा उस पर चढ़ाई करके उसे मिट्टी में मिला देना चाहते हैं तो वह इस बात को सहन नहीं कर पाया। उसने अपने साथियों से कहा कि नकली बूंदी भी हमें प्राणों से अधिक प्रिय है और हम लोग अपनी मातृभूमि का अपमान नहीं होने देंगे। लेकिन जब उसके साथियों ने उससे कहा कि हम महाराणा के नौकर हैं, हमारा शरीर महाराणा के नमक से बना है, अत: हमें उनके साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। इस पर वीर सिंह कहता है कि जब कभी मेवाड़ की स्वतन्त्रता पर आक्रमण हुआ है, हमारी तलवार ने उनके नमक का बदला दिया है। परन्तु जब मेवाड़ और बूंदी के मान का प्रश्न आयेगा तो हम मेवाड़ की दी हुई तलवारें महाराणा के चरणों में चुपचाप रख कर विदा लेंगे और बूंदी की ओर से अपने प्राणों का बलिदान देंगे। अन्ततः वीर सिंह ने अपनी मातृभूमि के सम्मान की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

प्रश्न 2.
महाराणा और अभयसिंह के चरित्र की दो-दो। विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
मेवाड़ के महाराणा लाखा की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) स्वाभिमानी वीर :
चित्तौड़ के महाराणा लाखा में स्वाभिमान का भाव कूट-कूटकर भरा है। बूंदी के हाड़ा द्वारा पराजित होने पर वे अपने वंश को कलंकित अनुभव करते हैं। उस कलंक से छुटकारा पाने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं कि जब। तक मैं बूंदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।

(2) सहृदय मानव :
महाराणा लाखा बड़े सहृदय व्यक्तित्व के धनी हैं। वे अपनी प्रतिज्ञा रखने के लिए बूंदी का नकली दुर्ग बनाकर उस पर विजय प्राप्त तो करते हैं परन्तु उस किले की। रक्षा में मारे गये वीरसिंह और सिपाहियों के रक्तपात से वे द्रवित। हो उठते हैं।

मेवाड़ के सेनापति अभयसिंह के चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) कुशल सेनानायक :
अभयसिंह अपने पद के अनुरूप। कार्य सम्भालने में निपुण हैं। वे महाराणा की प्रतिज्ञा रक्षा के लिए बूंदी के नकली दुर्ग की व्यवस्था तुरन्त करते हैं और सैनिकों को उस पर विजय प्राप्त करने के लिए युद्ध करने को भेजते हैं। वे युद्ध का संचालन करने में भी समझदारी से काम लेते हैं।

(2) राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत :
अभयसिंह में राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूटकर भरी है। वे मेवाड़ के सेनापति हैं। मेवाड़ के सम्मान को बढ़ाने का वे हर प्रयास करते हैं। वे बूंदी के राव हेमू को मेवाड़ की अधीनता स्वीकार करने को प्रेरित करते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अवतरणों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(1) ये सागर से रत्न निकाले …………….. ।
………………. तोड़ मोतियों की मत माला।
उत्तर:
चारणी गीत गाते हुए महाराणा को कुछ सन्देश देते हुए कहती है कि आज राजस्थान की भूमि पर जितने भी राजा हैं, वे सब. सागर से निकाले गये श्रेष्ठ रत्न हैं और युगों से इन्हें सँभालकर रखा गया है। इनकी शक्ति एवं पराक्रम का उजाला सब ओर छाया हुआ है। अतः किसी को भी मोतियों की माला को तोड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आगे चारणी कहती है कि अनेक कष्टों एवं विपत्तियों को झेलकर बड़ी मुश्किल से ये एक हुए हैं। अतः इनमें अब फूट मत डालो। इस सुन्दर मोतियों की माला को मत तोड़ो। भाव यह है कि राजस्थान के वीर राजाओं में बड़ी मुश्किल से एकता बनी है। अतः किसी भी राजा को उस एकता को तोड़ने का अधिकार नहीं है।

(2) “नकली बूंदी भी प्राणों से अधिक प्रिय है …………….
…………. हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगी।”
उत्तर:
महाराणा की सेना में कुछ सैनिकं बूंदी के भी थे। बूंदी के नागरिक अपने देश की आन-बान के कट्टर पुजारी थे। जब उनको महाराणा को नकली बूंदी के किले को जीतने की योजना की जानकारी हुई तो वे लोग विद्रोह पर उतारू हो गये। उन्हीं लोगों में से एक देश भक्त वीर सिंह था। वीर सिंह ने ऐलान कर दिया कि नकली बूंदी भी बूंदी वासियों को प्राणों से अधिक प्यारी है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं होने दिया जायेगा। वह आगे कहता है कि महाराणा आज आश्चर्य के साथ देखेंगे कि नकली बूंदी को जीतने का यह कोई साधारण खेल नहीं है। यहाँ की भूमि का कण-कण आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगा। कहने का अर्थ यह है कि इस नकली बूंदी को फतह करना महाराणा के लिए आसान नहीं है। आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं में घमासान युद्ध होगा और खून की नदियाँ बह जायेंगी।

(3) हम युग-युग से एक हैं और एक रहेंगे …………… वीर सिंह के बलिदान ने हमें जन्मभूमि का मान करना सिखाया है।
उत्तर:
महाराणा द्वारा नकली बूंदी के युद्ध का खेल खेले जाने पर जब वीर सिंह की मृत्यु हो गयी तो महाराणा पश्चाताप करने लगा। इसी पर राव हेमू भी राजपूतों की एकता की बात कहते हैं कि हम सभी राजपूत युगों-युगों से एक हैं और आगे भी एक रहेंगे। राव हेमू आगे कहता है कि राजपूतों में न कोई राजा है और न महाराजा। हम सब राजपूत तो देश, जाति और वंश की मान-रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारी तलवारें अपने ही लोगों पर न उठे। बूंदी के हाड़ा सुख और दुःख में चित्तौड़ के सिसोदियों के साथ रहे हैं और आगे भी रहेंगे। हम सभी राजपूत सूर्य के वंशज हैं, हम सबके हृदय में एक ज्वाला जल रही है। हम कैसे एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं। वीर सिंह के त्याग ने हमें जन्मभूमि का सम्मान करना सिखाया है।

मातृभूमि का मान भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
सामासिक पदों का विग्रह कर समास लिखिए
उत्तर:

  1. राजपूत = राजा का पूत = तत्पुरुष समास।
  2. जन्मभूमि = जन्म की भूमि = तत्पुरुष समास।
  3. महाराजा = महान् राजा = कर्मधारय समास।
  4. सेनापति = सेना का पति = तत्पुरुष समास।
  5. बाण-वर्षा = वाणों की वर्षा = तत्पुरुष समास।
  6. आदर भाव = आदर का भाव = तत्पुरुष समास।

प्रश्न 2.
बहुब्रीहि समास उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
बहुब्रीहि समास-जिस समास में पूर्व एवं उत्तर पद के अतिरिक्त कोई अन्य पद प्रधान होता है, उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं।
जैसे-
पंचानन-पाँच मुख वाला = शिव, लम्बोदर-लम्बा है उदर जिसका = गणेश।

मातृभूमि का मान महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मातृभूमि का मान बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मातृभूमि का मान’ कौन-सी विधा है?
(क) कहानी
(ख) निबन्ध
(ग) एकांकी
(घ) रेखाचित्र।
उत्तर:
(ग) एकांकी

प्रश्न 2.
‘मातृभूमि का मान’ एकांकी का नायक है-
(क) लाखासिंह
(ख) हेमूराव
(ग) अभयसिंह
(घ) वीरसिंह।
उत्तर:
(घ) वीरसिंह।

प्रश्न 3.
यह कथन किसका है-“जब तक बूंदी दुर्ग पर ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।”?
(क) वीरसिंह
(ख) अभयसिंह
(ग) महाराणा लाखा
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) महाराणा लाखा

प्रश्न 4.
‘मातृभूमि का मान’ एकांकी प्रेरणा देता है
(क) मातृभूमि की सेवा की
(ख) देश के लिए प्राणों को न्योछावर करने की
(ग) आन-बान की रक्षा की
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
‘मातृभूमि का मान’ में बूंदी शब्द का प्रयोग किसके लिये किया है?
(क) शहर
(ख) महल
(ग) तीर्थ स्थान
(घ) दुर्ग।
उत्तर:
(घ) दुर्ग।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. बूंदी स्वतन्त्र रहकर महाराणाओं का आदर कर सकता है, परन्तु ………….. होकर किसी की सेवा नहीं कर सकता।
  2. राणा लाखा नीमरा के मैदान में बूंदी से पराजित होने के ……………. को धोने की प्रतिज्ञा करते
  3. ये सागर से रत्न निकाले। युग-युग से हैं गये …………. ।
  4. ………….. भी मुझे प्राणों से प्रिय है।
  5. हम प्रतिज्ञा करते हैं कि प्राणों के रहते इस दुर्ग पर ………….. का ध्वज न फहरने देंगे।

उत्तर:

  1. अधीन
  2. कलंक
  3. सँभाले
  4. नकली बूंदी
  5. मेवाड़।

सत्य/असत्य

  1. वीरसिंह का चरित्र मातृभूमि के सम्मान की शिक्षा देता है। (2009)
  2. वीरसिंह ने महाराणा लाखा की अधीनता स्वीकार कर ली।
  3. “बूंदी का अपमान सरलता से नहीं किया जा सकता।” यह कथन वीरसिंह का है।
  4. “व्यर्थ के दम्भ ने आज कितने निर्दोष प्राणों की बलि ले ली।”-कथन महाराणा लाखा का है।
  5. बूंदी पर महाराणा लाखा ने असली कीर्ति-पताका फहरायी।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

Mathrubhumi Ka Maan Kisne Rakha MP Board Class 10th Hindi
उत्तर:
1. → (घ)
2. → (क)
3. → (ङ)
4. → (ग)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी का प्रमुख पात्र कौन है?
  2. मेवाड़ के सेनापति कौन थे?
  3. मुट्ठी भर हाड़ाओं ने किसे पराजित किया था? (2010)
  4. वीरसिंह की मातृभूमि का क्या नाम था? (2009)
  5. ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी के लेखक कौन हैं?
  6. मातृभूमि का मान किसने रखा? (2016)

उत्तर:

  1. वीरसिंह
  2. अभय सिंह
  3. महाराणा लाखा
  4. बूंदी
  5. हरिकृष्ण ‘प्रेमी’
  6. वीरसिंह ने।

मातृभूमि का मान पाठ सारांश

‘मातृभूमि का मान’ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का एकांकी है। यह एकांकी देशप्रेम की प्रेरणा देता है। मातृभूमि की सेवा के लिए आन-बान-शान से प्राणों को न्योछावर करने की भावना जाग्रत करता है।

इस एकांकी में हाड़ा राजपूत वीरसिंह के बलिदान का शौर्यपूर्ण वर्णन है। मेवाड़ के नरेश महाराणा लाखा ने सेनापति अभयसिंह से बूंदी के राव हेमू के पास यह सन्देश भेजा कि वह मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर ले। ऐसा न करने से राजपूतों की संगठन शक्ति छिन्न-भिन्न हो जायेगी।

लेकिन हेमू राव को महाराणा लाखा का यह प्रस्ताव पसन्द नहीं आया। उन्होंने कहा कि बूंदी स्वतन्त्र रहकर महाराणाओं का सम्मान तो कर सकता है लेकिन वह किसी के अधीन रहकर सेवा कदापि नहीं कर सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि हाड़ा प्रेम एवं अनुशासन के पुजारी हैं, शक्ति के नहीं। वे उनका प्रस्ताव नहीं मानते हैं। तभी महाराणा लाखा ने यह प्रतिज्ञा कर ली “जबतिक मैं बूंदी से पराजित होने के कलंक को धो नहीं दूंगा तथा सेना सहित बूंदी के दुर्ग में प्रवेश नहीं करूँगा तब तक मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।”

महाराणा लाखा की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए नकली बूंदी का दुर्ग बनाकर उस पर विजय पताका फहरा दी गयी। वीरसिंह को अपनी मातृभूमि का अपमान अच्छा नहीं लगा और उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए चाहे वह नकली दुर्ग ही था। इस प्रकार वीरसिंह ने नकली बूंदी के दुर्ग की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया तथा मातृभूमि का मान बढ़ाया।

वास्तव में यह एक शिक्षाप्रद एवं ऐतिहासिक एकांकी है। यह एकांकी मान-मर्यादा तथा . देशप्रेम का ज्वलन्त उदाहरण है। इसके अतिरिक्त राजपूतों की एकता की शक्ति व मान-मर्यादा एवं प्रतिष्ठा का भी परिचायक है।

मातृभूमि का मान संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) प्रेम का अनुशासन मानने को हाड़ा-वंश सदा तैयार है, शक्ति का नहीं। मेवाड़ के महाराणा को यदि अपने ही जाति भाइयों पर अपनी तलवार आजमाने की इच्छा हुई है, तो उससे उन्हें कोई नहीं रोक सकता है। बूंदी स्वतन्त्र राज्य है और स्वतन्त्र रहकर वह महाराणाओं का आदर करता रह सकता है। अधीन होकर किसी की सेवा करना वह पसन्द नहीं करता।

कठिन शब्दार्थ :
अनुशासन = आज्ञा, नियन्त्रण। अधीन = गुलाम।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी से लिया गया है। इसके लेखक हरिकृष्ण प्रेमी हैं।

प्रसंग-इस अंश में हाड़ा वंश का राजा राव हेमू अपनी स्वाधीनता की रक्षा की प्रतिज्ञा करता है।

व्याख्या :
अभयसिंह के मेवाड़ के अधीन होने के प्रस्ताव पर राव हेमू अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहता है कि हम हाड़ा वंशज प्रेम का अनुशासन तो मानने को तैयार हैं, पर किसी की दाब-धौंस या शक्ति को मानने को तैयार नहीं हैं। मेवाड़ के महाराणा को यदि अपने भाइयों पर ही तलवार चलाने की इच्छा है तो उससे उन्हें कौन रोक सकता है ? वे चलायें लेकिन यह बात अच्छी तरह सोच लें कि बूंदी एक स्वतन्त्र राज्य है और वह स्वतन्त्र रहकर ही महाराणाओं का आदर कर सकता है। वह गुलाम बनकर किसी की सेवा करना पसन्द नहीं करता।

विशेष :

  1. हेमू अपने स्वाभिमान की बात करता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

(2) जिनकी खाल मोटी होती है, उनके लिए किसी भी बात में कोई भी अपयश, कलंक या अपमान का कारण नहीं होता किन्तु जो आन को प्राणों से बढ़कर समझते आये हैं, वे पराजय का मुख देखकर भी जीवित रहें, यह कैसी उपहासजनक बात है।

कठिन शब्दार्थ :
अपयश = बदनामी। आन = इज्जत, मान-सम्मान।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस अंश में महाराणा का प्रायश्चित व्यक्त हुआ है।

व्याख्या :
महाराणा अभय सिंह से कहते हैं कि जिनकी खाल मोटी होती है अर्थात् जो अपनी आन मर्यादा पर नहीं डटते हैं उनके लिए किसी भी बात में कोई भी अपयश, कलंक या अपमान का कोई महत्त्व नहीं होता है परन्तु जो आन या मर्यादा को अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते आये हैं, अर्थात् हमारे वंश की यह परम्परा रही है कि हमने अपनी आन और मर्यादा के लिए सब कुछ त्याग दिया है और आज उन्हीं के वंशज हाड़ा वंशियों से पराजित होकर जीवित रहें, यह निश्चय ही उपहास की बात है।

विशेष :

  1. महाराणा में अपने पूर्वजों की आन-मान को बनाये रखने की चिन्ता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

(3) ये सागर से रत्न निकाले। युग-युग से हैं गये सँभाले।
इनसे दुनिया में उजियाला। तोड़ मोतियों की मत माला।
ये छाती में छेद कराकर। एक हुए हैं हृदय मिलाकर।
इनमें व्यर्थ भेद क्यों डाला। तोड़ मोतियों की मत माला।

कठिन शब्दार्थ :
सँभाले = सँजोकर रखे गये हैं। व्यर्थ = बेकार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यह चारणी द्वारा गाया हुआ गीत है जिसमें वह सम्पूर्ण राजस्थान की एकता की बात कहती है।

व्याख्या :
चारणी गीत गाते हुए महाराणा को कुछ सन्देश देते हुए कहती है कि आज राजस्थान की भूमि पर जितने भी राजा हैं, वे सब. सागर से निकाले गये श्रेष्ठ रत्न हैं और युगों से इन्हें सँभालकर रखा गया है। इनकी शक्ति एवं पराक्रम का उजाला सब ओर छाया हुआ है। अतः किसी को भी मोतियों की माला को तोड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आगे चारणी कहती है कि अनेक कष्टों एवं विपत्तियों को झेलकर बड़ी मुश्किल से ये एक हुए हैं। अतः इनमें अब फूट मत डालो। इस सुन्दर मोतियों की माला को मत तोड़ो। भाव यह है कि राजस्थान के वीर राजाओं में बड़ी मुश्किल से एकता बनी है। अतः किसी भी राजा को उस एकता को तोड़ने का अधिकार नहीं है।

विशेष :

  1. चारणी अपने गीत में राजपूतों को एकता का पाठ पढ़ाना चाहती है।
  2. लाक्षणिक भाषा का प्रयोग है।

(4) नकली बूंदी भी प्राणों से अधिक प्रिय है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं किया जा सकता। आज महाराणा आश्चर्य के साथ देखेंगे कि यह खेल केवल खेल ही नहीं रहेगा, यहाँ की चप्पा-चप्पा भूमि सिसोदियों और हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगी।

कठिन शब्दार्थ :
सरल है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
महाराणा द्वारा यह प्रतिज्ञा करने पर कि जब तक मैं बूंदी पर सिसोदिया का झण्डा नहीं फहरा लूँगा तब तक अन्न, जल ग्रहण नहीं करूंगा। महाराणा की यह प्रतिज्ञा असम्भव थी। अतः अभयसिंह जैसे चापलूसों ने नकली बूंदी का किला बनवाकर उस पर मेवाड़ का ध्वज फहराने की योजना बना ली, पर हाड़ा राजपूत इस पर बिदक गये, उसी का वर्णन है।

व्याख्या :
महाराणा की सेना में कुछ सैनिकं बूंदी के भी थे। बूंदी के नागरिक अपने देश की आन-बान के कट्टर पुजारी थे। जब उनको महाराणा को नकली बूंदी के किले को जीतने की योजना की जानकारी हुई तो वे लोग विद्रोह पर उतारू हो गये। उन्हीं लोगों में से एक देश भक्त वीर सिंह था। वीर सिंह ने ऐलान कर दिया कि नकली बूंदी भी बूंदी वासियों को प्राणों से अधिक प्यारी है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं होने दिया जायेगा। वह आगे कहता है कि महाराणा आज आश्चर्य के साथ देखेंगे कि नकली बूंदी को जीतने का यह कोई साधारण खेल नहीं है। यहाँ की भूमि का कण-कण आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगा। कहने का अर्थ यह है कि इस नकली बूंदी को फतह करना महाराणा के लिए आसान नहीं है। आज सिसोदियों एवं हाड़ाओं में घमासान युद्ध होगा और खून की नदियाँ बह जायेंगी।

विशेष :

  1. वीर सिंह सच्चा देशभक्त है।
  2. भाषा भावानुकूल है।

(5) हम युग-युग से एक हैं और एक रहेंगे। आपको यह जानने की आवश्यकता थी कि राजपूतों में न कोई राजा है, न कोई महाराजा। सब देश, जाति और वंश की मान-रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं। हमारी तलवार अपने ही स्वजनों पर न उठनी चाहिए। बूंदी के हाड़ा सुख और दुःख में चित्तौड़ के सिसोदियों के साथ रहे हैं और रहेंगे। हम सब राजपूत अग्नि के पुत्र हैं, हम सबके हृदय में एक ज्वाला जल रही है। हम कैसे एक-दूसरे से पृथक् हो सकते हैं। वीर सिंह के बलिदान ने हमें जन्म-भूमि का मान करना सिखाया है।

कठिन शब्दार्थ :
स्वजनों = अपने ही लोगों। अग्नि के पुत्र = सूर्यवंशी हैं। पृथक् = अलग। बलिदान = त्याग।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अवतरण में बूंदी के शासक राव हेमू का समस्त राजपूत राजाओं को एकता का पाठ पढ़ाने का सन्देश है।

व्याख्या :
महाराणा द्वारा नकली बूंदी के युद्ध का खेल खेले जाने पर जब वीर सिंह की मृत्यु हो गयी तो महाराणा पश्चाताप करने लगा। इसी पर राव हेमू भी राजपूतों की एकता की बात कहते हैं कि हम सभी राजपूत युगों-युगों से एक हैं और आगे भी एक रहेंगे। राव हेमू आगे कहता है कि राजपूतों में न कोई राजा है और न महाराजा। हम सब राजपूत तो देश, जाति और वंश की मान-रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारी तलवारें अपने ही लोगों पर न उठे। बूंदी के हाड़ा सुख और दुःख में चित्तौड़ के सिसोदियों के साथ रहे हैं और आगे भी रहेंगे। हम सभी राजपूत सूर्य के वंशज हैं, हम सबके हृदय में एक ज्वाला जल रही है। हम कैसे एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं। वीर सिंह के त्याग ने हमें जन्मभूमि का सम्मान करना सिखाया है।

विशेष :

  1. राव हेमू उदारवादी शासक है तथा वह सभी को साथ लेकर चलना चाहता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

MP Board Class 10th Hindi Solutions

MP Board Class 8th Special English Solutions Chapter 4 The Narmada: The Lifeline of Madhya Pradesh

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MP Board Class 8th Special English Solutions Chapter 4 The Narmada: The Lifeline of Madhya Pradesh

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The Narmada: The Lifeline of Madhya Pradesh Textual Exercise

Word Power

(A) Make words by adding suffixes as given in the example.

(i) grace – gracefully
furious – furiously
anxious – anxiously

(ii) pure – purity
serene – serenity
rare – rarity

(iii) meditate – meditation
create – creation
generate – generation

(iv) consider – consideration
specific – specification
limit – limitation

(b) Rearrange the jumbled letters to form words:

dorna a _ _ _ _
slebs _ _ _ _
hylo _ _ _ _
wob _ _ _ _
girion _ _ _ _

Answers:

adorn
bless
holy
bow
origin.

Comprehension

(A) Answer the following questions :

The Narmada The Lifeline Of Madhya Pradesh MP Board Class 8th Question 1.
Name some of the holy rivers of the country mentioned in the lesson.
Answer:
The Ganga, the Yamuna, the Brahmaputra, the Sindhu, the Godawari, the Kavari, the Krishna, the Satluj.

Class 8 English Chapter 4 The Narmada The Lifeline Of Madhya Pradesh Question 2.
Why does the Narmada say that she feels proud ?
Answer:
The Narmada say that she feels proud because she flows in India where a river is considered as a living being and is worshipped as goddess.

Mp Board Class 8 English Chapter 4 Question 3.
Why do we call the Narmada the lifeline of Madhya Pradesh ?
Answer:
The Narmada irrigates the major part of the state with her abundant water. Hence we call her the lifeline of Madhya Pradesh.

The Lifeline Of Madhya Pradesh MP Board Class 8th Question 4.
What is the meaning of ‘Narmada’?
Answer:
The word ‘Narmada’ means one who soothes and gives pleasures to all.

Class 8 English Chapter 4 Mp Board Question 5.
What blessing did Lord Shiva give to Narmada?
Answer:
Lord Shiva granted Narmada’s wishes. He blessed her that she would remain maiden and would flow free and pure forever.

Class 8 English Chapter 4 The Narmada Mp Board Question 6.
What are the places the Narmada flows through ?
Answer:
Narsinghpur, Raisen, Hoshangabad, Handia and Nemawar.

Narmada The Lifeline Of Madhya Pradesh MP Board Class 8th Question 7.
What is Maheshwar famous for ?
Answer:
The humble palace of Devi Ahilya Bai is located at the ghat of Maheshwar.

The Narmada: The Lifeline Of Madhya Pradesh Class 8 Question 8.
What do people from all over the world, come to see at Bheraghat near Jabalpur ?
Answer:
People from all over the world come to see how the Narmada flows gracefully through the colourful marble rocks at Bheraghat near Jabalpur.

(B) Match the columns :
The Narmada The Lifeline Of Madhya Pradesh MP Board Class 8th
Answers:

  1. c
  2. d
  3. b
  4. e
  5. a.

Let’s Learn

(A) See the use of ‘among’ and ‘between’ in the following sentences:

  1. I am one among the main rivers of Madhya Pradesh.
  2. I flow between the Vindhyachal and the Satpura mountains.
  • among is used when three or more people or things are involved.
  • between is used for: two on either side of something.
  • when two people or things are involved.

Now fill in the blanks with between or among:

  1. We distributed sweets ________ the children.
  2. Rani is standing ________ Shreya and Sonal.
  3. Everest is one ________ the mountains of the Himalayas.
  4. Nepal lies ________ India and China.
  5. Wild animals live ________ the words.

Answer:

  1. among
  2. between
  3. among
  4. between
  5. among.

(B) See the picture given below carefully and fill in the blanks in the paragraph given below with appropriate prepositions given in the box. Some prepositions may need to be repeated.

into, in, on, for, from, of, to, with
Class 8 English Chapter 4 The Narmada The Lifeline Of Madhya Pradesh
This is the scene ____ 1 ____ a bus station. There is a dustbin ____ 2 ____ the corner ____ 3 ____ the bus station. The passengers who went to go ____ 4 ____ Mhow ____ 5 ____ Pithampur can catch the bus ____ 6 ____ here. The passengers are waiting ____ 7 ____ their turn to board the bus. Some passengers are already ____ 8 ____ the bus. There is some luggage ____ 9 ____the roof ____ 10 ____ the bus Some Passengers are carrying small bags, lunch boxes tec. ___ 11 ___ their hands. No one should break the queue to get ___ 12 ___ the bus. Travelling ____ 13 ____ a lot of luggage may cause trouble.

Answer:

  1. of
  2. in
  3. to
  4. of
  5. from
  6. from
  7. for
  8. in
  9. on
  10. of
  11. in
  12. into
  13. with

Let’s Talk

Choose any one river and talk about it in your group, with the help of the following clues :

Name of the river of your choice
The ______
It originates from ______
It is about kms long. ______
It flows through ______
There are ______
(important places on its banks)
There are ______
dams built across it.
It flows/does not flow ______
It’s ________
Answer:
The Ganga
It originates from Gangotri.
It is about 1560 miles long
It flows through Kanpur, Allahabad, Varanasi, Patna and Kolkata.
There are places like Haridwar, Varanasi, etc. on its banks.
There are two major (e.g. Farakka) dams built across it.
It flows into the Bay of Bengal.
It’s a holy river.

Let’s Read

Read the passage carefully.

According to Indian mythology, King Sagar, an ancestor of Lord Ram decided to perform a hundred Ashwamedha Yagnas. He completed ninetynine Yagnas and it was the hundredth when the horse of the Yagna got stolen by Devraja Indra. A great search for the horse was made. Ultimately Indra left the horse in the ashram of Kapil Muni. It was found by the sones of King Sagar. They insulted the Muni, thinking that it was he who had brought the horse there. Kapil Muni rose from his deep meditation and his anger soon turned down the sons of Sagar into ashes.

King Sagar had one more son Anshuman from his second queen. After his father, King Anshuman decided to make the Ganga descend on earth and immerse in it the ashes of his brothers so that their souls could rest in heaven. He started great Tapa, (severe penance) for this. After his death, his son King Dilip did similar Tapa to please the Ganga but could not succeed. After king Dilip his King Bhagirath continued the Tapa. Thus it was the third generation undergoing penance to please the Ganga.

The fierce penance of King Bhagirath pleased the Ganga. She appeared before him, and, blessing him, asked who would bear her force and current. King Bhagirath prayed to Lord Shiva to come for his help. Lord Shiva caught the powerful current of the Ganga in the locks of hair on his head. He tied her too tight to come out Again Bhagirath prayed to him to release the holy current. When she was released, she violently flowed after the chariot of Bhagirath. On her way came the ashram of Janhu Muni, and it too was swept away in the strong current. The Muni got furious and drank the whole of its water and dried the river up. Once again King Bhagirath had to pray to the Muni, and he released the Ganga from his thigh. Thus she was called Janhavi, the daughter of Janhu Muni.

Onward she continued her journey to the Gangasagar and ultimately reached the ashes of the sons of King Sagar.

Answer the following questions.

The Narmada The Lifeline Of Madhya Pradesh In Hindi Question 1.
Who was king Sagar ?
Answer:
King Sagar was an ancestor of Lord Ram who decided to perform a hundred Ashwamedha Yagnas.

Question 2.
What happened when Kapil Muni was insulted by the sons of King Sagar ?
Answer:
The sons of King Sagar were turned down into ashes.

Question 3.
Why did King Anshuman, King Dilip and King Bhagirath want to bring the Ganga on earth?
Answer:
They wanted to bring the Ganga on earth and immerse in it the ashes of King Sagar’s sons so that their souls could rest in heaven.

Question 4.
What happened when the Ganga descended ?
Answer:
The Ganga descended and began to flow with powerful current

Question 5.
Why do we call it the Janhavi ?
Answer:
We call it the Janhavi because it was released from the thigh of Janhu Muni.

Question 6.
Give another title to the above passage.
Answer:
The Ganga and the sons of King Sagar.

Let’s Write

You know that the rivers are very much polluted these days. Even the Ganga needs to be cleaned. Suggest how we can keep the rivers clean. Use the following clues :

  • People throw garbage, wastes and other things in the river.
  • Some orthodox people leave the dead bodies of the members of their families in the water of the river to perform the last rites.
  • Factories leave their chemical wastes in the river.
  • Drainage is merged in the river in most of the cities, towns and villages. Some people in the villages excrete near the river.
  • People, while bathing in the rivers, wash clothes and make the water dirty. They even make their cattle bathe in the rivers.
  • People immerse the idols made of clay and plaster of paris in the river. Now write in your own words

Answer:

People pollute the rivers by throwing, garbage, wastes and other things in them Some orthodox people immerse the dead bodies of their family members into the river water to perform the last rites. The chemical wastes of the factories are also thrown into the river water. Village people excrete near the river. People, make the river water dirty by washing their clothes on the bank. They also let their cattle bathe in the rivers.

At times idols of clay and plaster of paris are immersed in the river, which make the water dirty.

Let’s Do It

Question.
See the map of Madhya Pradesh. Find out the names of the rivers shown in it and list them below.
Answer:
Narmada Tapi Chambal.

The Narmada: The Lifeline of Madhya Pradesh Word Meanings

Mp Board Class 8 English Chapter 4The Lifeline Of Madhya Pradesh MP Board Class 8th

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MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 10 आह्वानम्

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Durva Chapter 10 आह्वानम् (गीतम्) (सङ्कलितम्)

MP Board Class 10th Sanskrit Chapter 10 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

Mp Board Class 10 Sanskrit Chapter 10 प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक पद में उत्तर लिखिए)।
(क) भारतस्य पुरातनः सखा कः विद्यते? (भारत का पुराना मित्र कौन है?)
उत्तर:
चीनः (चीन)

(ख) कस्मिन् प्रवर्तितुं कदापि न खिद्यते? (किसमें प्रवृत्त होने के लिए दुख नहीं होता?)
उत्तर:
स्वकर्मणि (अपने कर्म में)

(ग) पापसिन्धवः शत्रवः का प्रयान्तु? (पापरूपी समुद्र/शत्रु किसको प्राप्त हो?)
उत्तर:
अशेषताम् (समाप्ति को)

(घ) वयं कया स्वदेशरक्षणोद्यताः? (हम किससे अपने देश की रक्षा के लिए तैयार हों?)
उत्तर:
सत्यनिष्ठया (सत्य निष्ठा से)

(ङ) भारतीयकेतवः कां वृत्तिं स्फुरन्तु? (भारतीय झण्डे किस वृत्ति को स्फुरित करें?)
उत्तर:
अरातिनीवृतिम् (शत्रु को सब ओर से पकड़कर मारने के भाव को)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 10 MP Board प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तर लिखत-(एक वाक्य में उत्तर लिखिए-)
(क) कृषीबलैः काः समेधिताः भवन्तु? (किसानों के द्वारा वया वृद्धि को प्राप्त हो?
उत्तर:
कृषीबलैः धान्यवृद्धयः समेधिताः भवन्तु। (किसानों के द्वारा धानअदि वृद्धि को प्राप्त हों।)

(ख) ऊर्जितं यशः कैः अर्जितम्? (तेजस्वितापूर्ण यश किसके द्वारा अर्जित किया गया?)
उत्तर:
ऊर्जितं यशः पूर्वपुरुषैः अर्जितम्। (तेजस्वितापूर्ण यश पूर्वजों द्वारा अर्जित किया गया।)

(ग) अखर्वगर्ववृत्तिना केन वीक्षितम्? (बड़े घमण्डी आचरण वाले किराको देखा गया?)
उत्तर:
अखर्वगर्ववृत्तिना अरिणा वीक्षितम्।
(बड़े धमण्डी आचरण वाले शत्रु के द्वारा देखा गया।)

(घ) भारतीयाः केषां वंशजाः सन्ति? (भारतीय किसके वंशज हैं?)
उत्तर:
भारतीयाः वसिष्ठ-याज्ञवल्क्य-गौतम-अत्रि एतेषाम् वंशजाः सन्ति। (भारतीय वसिष्ठ-याज्ञवल्क्य-गौतम व अत्रि के वंशज हैं।)

(ङ) शत्रवः द्रुतं किं फलं प्राप्नुवन्तु? (शत्रु शीघ्र किस फल को प्राप्त हों?)
उत्तर:
शत्रवः द्रुतं निजप्रवञ्चनाफलं प्राप्नुवन्तु। (शत्रु शीघ्र अपने उगी रूपी कर्म के फल को प्राप्त हों।)

Class 10 Sanskrit Chapter 10 MP Board प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए)
(क) वीरबन्धवः किं कुर्वन्तु? (वीर बन्धु क्या करें?)
उत्तर:
वीरबन्धवः पापसिन्धवः शत्रवः अशेषतां प्रयान्तु।। (वीरबन्धु पाप रूपी समुद्र जैसे शत्रुओं को समाप्त करें।)

(ख) अद्य कं स्मरन्तु? (आज किसको याद करें?)
उत्तर:
अद्य पूर्वपुरुषैः समस्तदिक्षुविश्रुतं अर्जितम् ऊर्जितम् यशः स्मरन्तु। (आज पूर्वजों के द्वारा, सारी दिशाओं में विख्यात, अर्जित तेजस्वीपूर्ण यश को स्मरण करें।)

(ग) भवत्सु जीवितेषु के नदन्ति? (आप सब में जीवित रहते हुए कौन अस्पष्ट बोल रहे हैं?)
उत्तर:
भवत्सु जीवितेषु दस्यवः नदन्ति। (आप सब में जीवित रहते हुए लुटेरे अस्पष्ट बोल रहे हैं।)

Sanskrit Class 10 Chapter 10 Mp Board प्रश्न 4.
उचितशब्देन रिक्तस्थानानि पूरयत (उचित शब्दों से रिक्त स्थान भरिए-)
(क) स्वकर्मणि प्रवर्तितुं ………………. नैव खिद्यते। (अद्यापि/कदापि)
(ख) पुरातनं स्वपौरुष ………………. वीरबन्धवः। (विस्मरन्तु/स्मरन्तु)
(ग) यथा विहाय ………………. आचरन्तु तेऽद्भुतम् ।(कूटनीतिम्/राजनीतिम्)
(घ) समस्तदिक्षु ………………. तदद्य यावदूर्जितम्। (श्रुतं/विश्रुत)
(ङ) कदा प्रदर्शयिष्यते द्विषां ………………. बलस्य वः। (बलं/फल)
उत्तर:
(क) कदापि
(ख) स्मरन्तु
(ग) कूटनीतिम्
(घ) विश्रुतं
(ङ) फलं

Class 10th Sanskrit Chapter 10 प्रश्न 5.
यथायोग्यं योजयत-(उचित क्रम से जोड़िए)
Mp Board Class 10 Sanskrit Chapter 10
उत्तर:
(क) 2
(ख) 1
(ग) 4
(घ) 5
(ङ) 3

Mp Board Class 10th Sanskrit Chapter 10 प्रश्न 6.
अधोलिखितपदानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनञ्च लिखत (नीचे लिखे पदों के मूलशब्द विभक्ति और वचन लिखिए)
कक्षा 10 संस्कृत पाठ 10 MP Board
उत्तर:
Class 10 Sanskrit Chapter 10 MP Board

Chapter 10 Sanskrit Class 10 MP Board प्रश्न 7.
अघोलिखितक्रियापदानां धातुं लकारं पुरुषं वचनञ्च लिखत (नीचे लिखे क्रियापदों के धातु, लकार, पुरुष व वचन लिखिए-)
Sanskrit Class 10 Chapter 10 Mp Board
उत्तर:
Class 10th Sanskrit Chapter 10

Sanskrit Chapter 10 Class 10 Mp Board प्रश्न 8.
विलोमशब्दान् लिखत-(विलोम शब्द लिखिए)
यथा – स्वदेशः – विदेशः
(क) स्मरन्तु
(ख) पुरातनम्
(ग) अशेषताम्
(घ) सत्यनिष्ठया
उत्तर:
(क) स्मरन्तु – विस्मरन्तु
(ख) पुरातनम् – नवीनम्
(ग) अशेषताम् – शेषताम्
(घ) सत्यनिष्ठया – असत्यनिष्ठया

Class 10 Sanskrit Chapter 10 Solutions MP Board प्रश्न 9.
पर्यायशब्दान् लिखत-(पर्यायशब्द लिखिए)
यथा – सूर्य दिवाकरः, भास्करः
(क) कालः
(ख) क्षितौ
(ग) शत्रवः
(घ) जगत्सु
उत्तर:
(क) कालः – समयः
(ख) क्षितौ – पृथिव्याम्, धरायाम्
(ग) शत्रवः – रिपवः, अरयः
(घ) जगत्सु – संसारेषु, विश्वेषु

Class 10 Sanskrit Chapter 10 Question Answer MP Board प्रश्न 10.
रेखाङ्कितपदान्याधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (रखाङ्कित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए)
(क) दस्यवः नदन्ति
(लुटेरे अस्पष्ट बोल रहे हैं।)
उत्तर:
के नदन्ति? (कौन अस्पष्ट बोल रहे हैं?)

(ख) वयं हिमालयस्य रक्षणे समुद्यताः। (हम सब हिमालय की रक्षा के लिए तैयार हों।)
उत्तर:
वयं कस्य रक्षणे समुद्यताः? (हम किसकी रक्षा के लिए तैयार हों?)

(ग) पापसिन्धवः शत्रवः अशेषतां प्रयान्तु। (पाप रूपी समुद्र शत्रु समाप्ति को प्राप्त हों।)
उत्तर:
के शत्रवः अशेषतां प्रयान्तु? (कौन से शत्रु समाप्ति को प्राप्त हों?)

(घ) ते कूटनीतिं विहाय आचरन्तु। (वे कुटनीति को छोड़कर आचरण करें।)
उत्तर:
ते किं विहाय आचरन्तु? (वे किसको छोड़कर आचरण करें?)

(ङ) नदीषु यन्त्रयानलौहमार्गसेतवः सन्तु। (नदियों पर मशीनों द्वारा चलने वाले वाहन, लोहे की पटरी वाले रास्ते तथा पुल हों।)
उत्तर:
केषु यन्त्रयान लौह मार्ग सेतवः सन्तु?
(किन पर मशीनों द्वारा चलने वाले वाहन, लौहे की पटरी वाले रास्ते तथा पुल हों।)

योग्यताविस्तार –

पाठे आगतं गीतं लयबद्धं गायत।
(पाठ में आए गीत को लयबद्ध करके गाओ।)

अन्यदेशभक्तिविषयकं संस्कृतगीतम् अन्विष्य गायत।
(अन्य देश भक्ति के संस्कृत गीत ढूंट कर गाओ।)

आह्वानम् पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ एक गीत है जो श्री दयाशङ्कर वाजपेयी के द्वारा रचा गया है, जिसमें भारत और चीन के मध्य हुए युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों के साथ प्रत्यक्ष चर्चा करके लिखा गया है।

आह्वानम् पाठ का अनुवाद

1. युवान एष वः परीक्षणस्य काल आगतः हिमालयस्य रक्षणे समुद्यताः स्थ सर्वतः।
अयं सखा पुरातनोऽस्य भातरस्य विद्यते स्वकर्मणि प्रवर्तितुं कदापि नैव खिद्यते॥1॥

अन्वयः :
युवान! एषः कालः वः परीक्षणस्य आगतः (अस्ति), सर्वतः, हिमालयस्य रक्षणे समुद्यताः स्थ। अयम् अस्य भारतस्थ पुरातनः सखा विद्यते स्वकर्मणि प्रवर्तितुं कदापि न एव खिद्यते।

शब्दार्थाः :
युवान!-हे युवको!-oh young men; वः-तुम्हारा-yours; समुद्यताःतैयार-ready; स्थ-हों-be; खिद्यते-दुखी होता है-is aggrieved.

अनुवाद :
हे युवको! यह समय तुम्हारी परीक्षा का है, सब ओर से हिमालय की रक्षा के लिए तैयार हो। यह इस भारत का पुराना मित्र है। अपने कर्म में प्रवृत्त होने के लिए कभी भी दुखी नहीं होता है।

English :
Young men, be ready to defend Himalaya-India’s oldest friend never aggrieved in getting inclined to self duties.

2. अखर्वगर्ववृत्तिनारिणात्र येन वीक्षितं सहेक्षणेन तत्क्षणन्तु तच्छिरः क्षितौ धृतम्।
यथा क्षमावशा वयं तथैव रोषपूरिताः यथैव शीलसंस्कृतास्तथा प्रसिद्धशूरताः॥2॥

अन्वयः :
अत्र येन अखर्वगर्ववृत्तिना अरिणा वीक्षितम् (तदा) तत् क्षणं तु ईक्षणेन सह तच्छिरः क्षितौ धृतम्, वयं यथा क्षमावशाः (स्मः) तथैव वयं रोषपूरिता (अपि स्मः), (एवमेव) यथा शील-संस्कृता एव तथा प्रसिद्धशूरताः (स्मः)।

शब्दार्थाः :
अखर्वगर्ववृत्तिना-बड़े घमण्डी आचरण वाले के द्वारा-of proud conduct (arrogant);अरिणा-शत्रु के द्वारा-by enemy; वीक्षितम्-देखा गया-seen; सहेक्षणेन-देखने के साथ ही-at the very sight; धृतम्-रख दिया-placed.

अनुवाद :
यहाँ जिस, बड़े घमण्डी आचरण वाले शत्रु के द्वारा देखा गया, तब उस क्षण तो देखने के साथ ही पृथ्वी पर गिरा दिया, हम जितने क्षमाशील हैं, उतने ही क्रोध से भरे हुए भी हैं। इस प्रकार जैसे हमारी शील संस्कृति प्रसिद्ध है वैसे ही वीरता भी।

English :
We beheaded the proud enemy for his evil intentions-We are both forgiving and equally brave.

3.पुरातनं स्वपौरुषं स्मरन्तु वीरबन्धवः अशेषतां प्रयान्तु शत्रवोऽद्य पापसिन्धव। – निजप्रवञ्चनाफलं समाप्नुवन्तु ते द्रुतं यथा विहाय कूटनीतिमाचरन्तु तेऽद्भुतम्॥3॥

अन्वयः :
वीरबन्धवः! पुरातनं स्वपौरुषं स्मरन्तु अद्य पापसिन्धवः शत्रवः अशेषतां प्रयान्तु। ते द्रुतं निजप्रवञ्चनाफलं समाप्नुवन्तु, यथा ते अद्भुतं कूटनीतिं विहाय आचरन्तु।।

शब्दार्थाः :
स्वपौरुषम्-अपने पुरुषत्व को-own valour; पापसिन्धवः-पापरूपी समुद्र-ocean in the form of sin; अशेषताम्-समाप्ति का-completion; निजप्रवञ्चनाफलम्-अपने ठगी रूपी कर्म के फल को-fruitof their trickery;समाप्नुवन्तु-प्राप्त करें-obtain; विहाय-छोड़कर-leaving.

अनुवाद :
हे वीर बन्धुओ! अपने पुराने पुरुषत्व को याद करो, आज पापरूपी समुद्र से शत्रु समाप्ति को प्राप्त हो। वे शीघ्र अपने ठगी रूपी कर्म के फल को प्राप्त करें, जिससे वे अपनी अजीब सी कूटनीति को छोड़कर अच्छा आचरण करें।

English :
Remember your chivalry-Bring an end to sinful enemies-tell them suffer the fruit of their trickery and leave diplomacy.

4. कृषीबलैः समेधिता भवन्तु धान्यवृद्धयः श्रमेण सन्तु साधितास्तु वीरसाहसर्द्धयः।
स्मरन्तु पूर्वपूरुषैर्जगत्सु यद् यशोऽर्जितम् समस्तदिक्षु विश्रुतं तदद्य यावदूर्जितम्॥4॥

अन्वयः :
कृषीबलैः धान्यवृद्धयः समेधिताः भवन्तु श्रमेण साधिताः तु वीरसहासर्द्धयः सन्तु। पूर्वपुरुषैः जगत्सु, समस्तदिक्षुविश्रुतं यावद् ऊर्जितं यशः अर्जितं, तद् अद्य स्मरन्तु।

शब्दार्थाः :
कृषीवलैः-किसानों के द्वारा-By farmers; समेधिताः-वृद्धि को प्राप्त-attain propserity; वीरसाहसर्द्धय-पराक्रम-उत्साह की वृद्धि-increase invalour and courage; दिक्षु-दिशाओं में-indirections; विश्रुतम्-विख्यात-famous; अर्जितम्-तेजस्विता पूर्ण-full of bu’stre; स्मरन्तु-स्मरण करें-remember.

अनुवाद :
किसानों के द्वारा धान्य-वृद्धि से वृद्धि को प्राप्त हो, परिश्रम से प्राप्त । पराक्रम व उत्साह की वृद्धि हो। संसार में पूर्वजों के द्वारा समस्त दिशाओं में विख्यात, जो तेजस्वितापूर्ण यश प्राप्त किया है, उसे आज याद करो।

English :
Let farmers flourish-let there be advancement in courage-remember the renown of your ancestors through the world.

5. वयं तु सत्यनिष्ठया स्वदेशरक्षणोधताः प्रवञ्चनैकदक्षशत्रुपक्षतक्षणव्रताः।
नदीषु सन्तु यन्त्रयानलौहमार्गसेतवः अरातिनीवृतिं स्फुरन्तु भारतीयकेतवः॥5॥

अन्वयः :
वयं तु सत्यनिष्ठया स्वदेशरक्षणोद्यताः प्रवञ्चनैकदक्षशत्रुपक्षतक्षणव्रताः (स्मः), नदीषु यन्त्रयानलौहमार्गसेतवः भारतीय केतवः अरातिनीवृत्तिं स्फुरन्तु।

शब्दार्थाः :
सत्यनिष्ठया-सत्यनिष्ठा से-with sincere loyalty; उद्यताः-तैयार -ready; केतवः-झण्डे-flags; अरातिनीवृत्तिम्-शत्रु को सब ओर से पकड़कर मारने के भाव को-enemies by grabbing them all over.

अनुवाद :
हम सब तो सत्यनिष्ठा से अपने देश की रक्षा के लिए तैयार हैं, एकमात्र छल-कपट में निपुण शत्रुओं के पक्ष को काटने का वृत धारण करने वाले हैं, नदियों पर मशीनों द्वारा चलने वाले वाहन, लोहे की पटरी वाले रास्ते तथा पुल हों, भारतीय पताकाएँ शत्रु को सब ओर से पकड़कर मारने के भाव को स्फुरित करें।

English :
We are ready to serve our country honestly. We will sever the heads of deceitful enemies-let there be machines and iron rails. Let the Indian flags be unfurled around the enemies.

6. अये वशिष्ठ-याज्ञवल्क्य-गौतमात्रिवंशजाः तथैव सूर्यचन्द्रपावकान्ववायतल्लजाः। – भवत्सु जीवितेषु हन्त! किं नदन्ति दस्यवः? कदा प्रदर्शयिष्यते द्विषां फलं बलस्य वः॥6॥

अन्वयः :
हन्त! अये वसिष्ठ-याज्ञवल्क्य-गौतम-अत्रि वंशजा (सन्ति), तथैव सूर्यचन्द्रपावकान्ववायतल्लजाः भवत्सु जीवितेषु दस्यवः किंनदन्ति? वः बलस्य फलं द्विषां (कृते) कदा प्रदर्शयिष्यते।

शब्दार्थाः :
हन्त!-खेद है-Alas! fie; अन्ववायतल्लजाः-कुल में सर्वश्रेष्ठ-of noblest family; भवत्सु-आप सब में-in you all; जीवितेषु-जीवित रहते हुए-while living; दस्यवः-लुटेरे-robbers; नदन्ति-अस्पष्ट बोल रहे हैं -speaking vaguely; वः-तुम्हारे-yours; द्विषाभ्-शत्रुओं के-of enemies.

अनुवाद :
खेद है। अरे, वसिष्ठ, याज्ञवल्क्य, गौतम अत्रि के वंश में आप उत्पन्न हुए हैं। वैसे ही, सूर्य और चन्द्र से पवित्र, कुल में सर्वश्रेष्ठ आप सब के जीवित रहते हुए लुटेरे अस्पष्ट बोल रहे हैं। तुम्हारे बल का फल शत्रुओं को कब दिखाओगे।

English :
You are the descendants of rishis and of noble birth show your valour to let down robberr.

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