MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 13 बालिका का परिचय (सुभद्रा कुमारी चौहान)

बालिका का परिचय अभ्यास-प्रश्न

बालिका का परिचय लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इस कविता में जीवन-ज्योति का क्या आशय है? स्पष्ट करें।
उत्तर
इस कविता में जीवन-ज्योति का आशय है-जीवन का आधार । बिटिया के प्रति माँ का वात्सल्य प्रेम अनन्य होता है। वह उसके लिए अतुल्य होता है।

प्रश्न 2.
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है’ यह भाव किस पंक्ति में है? चुनकर लिखिये।
उत्तर
‘बेटी अंधकार में दीप-शिखा की तरह है। यह भाव निम्नलिखित पंक्ति में हैं-‘दीपशिखा है अंधकार की।’

बालिका का परिचय सही उत्तर चुनिये

प्रश्न 1.
बेटी का परिचय कौन सबसे अच्छा दे सकता है?
(क) पिता
(ख) माता
(ग) दादा
उत्तर
(ख) माता।

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प्रश्न 2.
इस कविता में कौन-सा भाव है?
(क) श्रृंगार
(ख) वीरता
(ग) वात्सल्य
उत्तर
(ग) वात्सल्य।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालिका परिचय कविता का सारांश लिखिये।
उत्तर
देखें-‘कविता का सारांश’।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा क्यों कहा है स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
कवयित्री ने बालिका को गोदी की शोभा कहा है। यह इसलिए कि किसी भी माँ की गोद में उसकी बालिका का मचलना एक न केवल अपूर्व आनन्द देता है, अपितु मन को मोह भी लेता है। इससे माँ का हृदय बाग-बाग हो उठता है। उस समय की शोभा देखते ही बनती है।

प्रश्न 3.
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का क्या आशय है?
उत्तर
बाल-सुलभ क्रियाओं को हँसती हुई नाटिका मानने का आशय है-बाल-सुलभ क्रियाएँ मन को भाने वाली और गुदगुदाने वाली होती है। अतएव उसे देखकर सभी आनन्द से झूम उठते हैं।

प्रश्न 4.
निम्न पंक्तियों का भावार्थ लिखो।
(क) मेरा मन्दिर …………………….. मेरी।
उत्तर
उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि किसी माँ के लिए उसकी बालिका सब कुछ होती है। माँ अपनी बालिका को किसी मन्दिर, मस्जिद, काबा, काशी, पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप से कम नहीं समझती है। इस प्रकार वह अपने हृदय में बसाए रहती है।

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(ख) प्रभु ईशा ………………………….. पास ॥
उत्तर
(ख) उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ यह है कि बालिका में महान आत्माओं के गुण होते हैं। उसमें ईसामसीह की क्षमाशीलता, नबी-मुहम्मद का विश्वास और महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीव-दया के भाव भरे होते हैं।

प्रश्न 5.
वही जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥
इन पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिये।
उत्तर
इन पंक्तियों का भाव यह है कि बालिका के महान और उच्च गुणों का वर्णन करना सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कि बालिका की महानता और श्रेष्ठता को कह-सुनकर नहीं, अपितु अनुभव करके ही जाना-समझा जा सकता है।

प्रश्न 6.
बेटी की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर
बेटी की तुलना राम, कृष्ण, ईसामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से की गई है।

बालिका का परिचय भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

क. कविता में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है। जैसे जीवन-ज्योति नष्ट नयनों की पंक्ति में ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति हुई है। कविता में से अनुप्रास अलंकार छाँटकर लिखिए।
ख. निम्नलिखित उदाहरण में ‘पतझड़ के साथ हरियाली का प्रयोग कर काव्य में विरोधाभास के सौन्दर्य को प्रस्तुत किया गया है। कविता में से इस प्रकार की अन्य पंक्तियाँ छाँटिए।
उदाहरण-
है पतझड़ की हरियाली
पतझड़ की हरियाली है।
उत्तर-(क) ‘सुख-सुहाग, शाही शान, मनोकामना मतवाली, घनी घटा. मस्ती मगन. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद, काबा-काशी, पूजा-पाठ, जप-तप, अपने आँगन और मात्र मोदे।

1. शाहीशान भिखारिन की है।
भिखारिन की शाही शान है।

2. दीपशिखा है अंधकार की।
अंधकार की दीपशिखा है

3. सुधा-धार यह नीरस दिल की।
नीरस दिल की यह सुधा-धार।

बालिका का परिचय योग्यता-विस्तार

प्रश्न
1. भारतीय संस्कृति में ‘कन्या’ के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए दो अनुच्छेद लिखिए।
2. धर्म अनेक परन्तु सन्देश एक है। हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई, धर्मों के मूल आदर्श जानिए, उनकी और शिक्षाओं और मूल्यों के चार्ट तैयार कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

बालिका का परिचय परीक्षोपयोग अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘सुधा-धार यह नीरस दिल की’ का आशय है-बालिका का अद्भुत प्रभाव। किसी माँ के लिए उसकी बालिका अमृत की धारा के समान होती है। अर्थात् बालिका अपनी माँ के सूनेपन को दूर कर उसमें चंचलता और सजीवता ला देती है।

प्रश्न 2.
इस कविता में किसके परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है?
उत्तर
इस कविता में माँ और बेटी के परस्पर संबंध को चित्रित किया गया है।

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प्रश्न 3.
इस कविता में कवयित्री की कौन-सी भावना प्रकट हुई है?
उत्तर
इस कविता में कवयित्री की ‘बेटी माँ के भविष्य की निर्मात्री है’ यह भावना प्रकट हुई है।

बालिका का परिचय दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इस कविता में रूपक अलंकार की छटा है। आप उन्हें छाँटकर लिखिए।
उत्तर
सुख-सुहाग की लाली, सुधा-धार और जीवन-ज्योति।

प्रश्न 2.
कवयित्री ने बालिका के लिए कौन-कौन से उदाहरण प्रस्तुत किए हैं?
उत्तर
कवयित्री ने बालिका के लिए.अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, आँखों की ज्योति. ईशामसीह की क्षमा, नबी मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध की दया को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

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प्रश्न 3.
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत कविता ‘बालिका का परिचय’ कवयित्री श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की भाववर्द्धक कविता है। सुभद्राकुमारी चौहान ने इसमें वात्सल्य रस को उड़ेल दिया है। इसे लक्ष्य कर लिखी गई यह रचना ‘बालिका का परिचय’ आज भी मील का पत्थर कही जा सकती है। प्रस्तुत कविता में कवयित्री का मानो उनका मातृ हदय ही साकार हो उठा है। वे नन्हीं बालिका को अधिक प्रभावशाली रूप में अनुभव करती हैं। इसके लिए वे बालिका को अँधेरे में दीपक, घटा का उजाला, नयनों की ज्योति, ईशा की क्षमा, मुहम्मद का विश्वास तथा गौतम की दया जैसे अनेक यशस्वी प्रतीकों के रूप में देखती हैं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि उन्होंने माँ और शिशु के बीच के रागात्मक सम्बन्ध का नैसर्गिक चित्रण किया है। “बेटियाँ भविष्य की निर्माता हैं।” कवयित्री की यही भावना उनकी इस कविता में दिखाई देती है।

बालिका का परिचय कवयित्री-परिचय

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान वीर रस की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री हैं। जीवन परिचय-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयाग के निहालपुर महसे में श्री रामनाथ सिक नामक एक सुशिक्षित परिवार में हुआ था। आपके पिता सम्पन्न, ईश्वरभक्त, उदार, विद्यानुरागी एवं राष्ट्रीय-विचारधारा वाले व्यक्ति थे। आपकी प्रतिभा बचपन से ही विलक्षण थी। इससे प्रभावित होकर आपकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था हुई थी। आप प्रयाग के क्राइस्ट कालेज में अध्ययन करते समय काव्य-रचना किया करती थीं। उस समय भी आपकी कविताएँ राष्ट्रीय-भावों से ओत-प्रेत हुआ करती थीं। उसमें तत्कालीन राष्ट्रीय-आन्दोलनों की झलक, स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीयता की बलवती भावना मुखरित होती थी। ये ही भावनाएँ आपकी आगामी कविता की प्रेरणा-शक्ति बनकर आयीं। ‘कर्मवीर’ पत्र में प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से आपकी ख्याति अमर हो गई। आपका विवाह सन् 1919 में खण्डवा निवासी ठाकुर लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ। पति की स्वीकृति लेकर आपने अपने अध्ययन का क्रम नहीं छोड़ा। बनारस के थियोसोफिकल स्कूल में प्रवेश लेकर अध्ययन जारी रखा। महात्मा गाँधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आन्दोलन में आपने जमकर भाग लिया। फलतः आपको कई बार जेल जीवन बिताना पड़ा। इस स्थिति में भी आपने अपनी पारिवारिक व्यवस्था को अव्यवस्थित नहीं होने दिया। सन् 1934 ई. में आप विधान-परिषद् की सदस्या बनीं। सन् 1948 ई. में एक मोटर दुर्घटना में आपकी असामयिक मृत्यु हो गई।

कृतियाँ-आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. काव्य-संग्रह-

  • ‘मुकुल’
  • ‘नक्षत्र’
  • त्रिधारा’

2. कहानी-संग्रह

  • ‘सीधे-साधे चित्र’
  • ‘बिखरे मोती’
  • ‘उन्मादिनी’।

3. बाल-साहित्य-‘सभा के खेल’। भाषा-शैली-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान की भाषा सरल और प्रवाहमयी है। वह रोचक और हृदयस्पर्शी है। उसमें ओज और वेग है। वीर रस, करुण रस, वात्सल्य, शान्त रस आदि आपके प्रिय रस हैं। उपमा, अनुप्रास, मानवीकरण, उत्प्रेक्षा आदि आपके रुचिप्रद अलंकार हैं। बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग आपने यथावत् किए हैं। श्रीमती सुभ्रदा कुमारी चौहान की शैली चित्रात्मक, काव्यात्मक और भावात्मक गरसमें प्रवाहमयता और बोधगम्यता नामक शैलीगत विशेषताएँ अधिक रूप में दिखाई देती हैं। मूल रूप से आपकी शैली उपदेशात्मक और प्रेरणादायक है। वह सहज होकर भी कठिन दिखाई देती है।

साहित्यिक महत्त्व-श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का साहित्यिक महत्त्व वीर रस काव्य-क्षेत्र में सर्वोच्च है। आपने राजनीति और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में अपनी बहुत बड़ी पहचान बनाई है। यही नहीं आपने ग़द्य-पद्य दोनों ही साहित्यिक विधाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है। एक ओर जहाँ ‘झाँसी की रानी’ कविता हर युवक की जबान पर है, वहीं दूसरी ओर बचपन सम्बन्धी कविताएँ प्रत्येक को मधुर बचपन की याद दिलाती हैं। यही नहीं आप एक सफल कहानी लेखिका भी हैं। आपकी कहानियों में नारी-जीवन, शोषित-समाज और पारिवारिक-जीवन का मार्मिक चित्रण है। आपका साहित्यिक-महत्त्व रखने के लिए आपके काव्य-संग्रह ‘मुकुल’ पर सन् 1931 ई. में आपको सेक्सरिया पुरस्कार मिला था।

बालिका का परिचय कविता का सारांश

प्रश्न
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान-विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ माता के हृदय के भावों को प्रकट करने वाली एक ज्ञानवर्द्धक कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवयित्री अपनी बेटी के प्रति अपने वात्सल्य भावों को उडेलती हई कह रही है कि वह उनकी गोदी की शोभा और सुख-सुहाग की लालिमा है। वह अंधकार की दीपशिखा, घनी घटाओं की चमक, उषा काल में कमल-भंगों (भौरी) की तरह सुखदायक है,तो पतझड़ की हरियाली है। नीरस और उदास हदय में अमत की धारा बहाने वाली है तो मस्त मगन तपस्वी के समान है। ज्योति खोई आँखों की जीवन-ज्योति और मनस्वी की सच्ची लगन है। बीते हुए बचपन की क्रीड़ामयी वाटिका है। यह तो मेरे लिए मन्दिर-मस्जिद, काबा-काशी के समान है। यह तो मेरी पूजा-पाठ, ध्यान, जप-तप है। उसने अपने आँगन में बालक कृष्ण की क्रीड़ाओं को देखा है। माता कौशल्या की प्रसन्नता को अपने मन के भीतर देखा। आओ सभी ईशामसीह की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद के विश्वास, और गौतम बुद्ध का जीवों के प्रति दया की भावना को बालिका के पास आकर देख लें। अगर कोई उससे परिचय पूछ रहा है, तो वह उसका किस प्रकार परिचय दे सकती है। उसे तो वही अच्छी तरह से जान सकता है, जिसमें माता का दिल है।

बालिका का परिचय संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. यह मेरी गोदी की शोभा,
सुख सुहाग की है लाली।
शाही शान भिखारिन की है,
मनोकामना मतवाली ॥1॥

दीपशिखा है अंधकार की,
घनी घटा की उजियाली।
उषा है यह कमल-भंग की,
है पतझड़ की हरियाली ॥2॥

शब्दार्थ-सुहाग-सौभाग्य। शाही-सम्पन्नता, वैभव। शान-स्वाभिमान। दीप शिखा-दीपक की लौ। भृग-मौंरा।

प्रसंग-यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिन्दी सामान्य’ में संकलित तथा श्रीमती सुभद्रा कुमारी विरचित कविता ‘बालिका का परिचय’ से है। इसमें कवयित्री ने अपनी बेटी को अपनी गोद की शोभा और सुख-सौभाग्य की लालिमा मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-यह मेरी बिटिया मेरी गोद की शोभा और मेरे सुख-सौभाग्य की लालिमा है। यह मेरे लिए भिखारिन की शाही शान और मेरी स्वच्छन्द मनोकामना को पूरी करने के लिए मानो मतवाली बनी रहती है। यह मेरे दुख-अभाव रूपी अंधकार की दीपशिखा और कठिनाइयों की उमड़ती घटाओं के बीच उत्पन्न आशा रूपी उजियाली है। यही नहीं, यह तो मेरे लिए वैसे ही सुखकर और आनन्द है, जैसे उषा के होने पर कमलों-भौरों को आनन्द और सुख मिलता है। इसी प्रकार यह मेरे जीवन में आए पतझड़ के लिए हरियाली स्वरूप है। कहने का भाव यह कि मेरी बिटिया मेरे जीवन के लिए हर प्रकार से सुखद और आनन्ददायक है।

विशेष-

  1. कवयित्री का वात्सल्य भाव सच्चे रूप में है।
  2. वात्सल्य रस का संचार है।
  3. भाषा सरल और सुबोध है।
  4. रूपक अलंकार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-विधान वात्सल्य रस से लबालब है। उसे रूपक अलंकार से आकर्षक बनाकर सरल और सुबोध शब्दावली से रोचक बनाने का प्रयास सचमुच में सराहनीय है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना में सरलता और स्वाभाविकता है, तो रोचकता और प्रवाहमयता भी है। इस तरह यह पद्यांश भाववर्द्धक रूप में है। यह कहा जा सकता है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने क्या किया है?
(ii) बालिका का चरित्र कैसा है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने बालिका का परिचय दिया है।
(ii) बालिका का चरित्र अत्यधिक विशुद्ध और स्वाभाविक है।

2. सुपा-धार यह नीरस दिल की मस्ती मगन तपस्वी की।
जीवन ज्योति नष्ट नयनों की सच्ची लगन मनस्वी की॥3॥

बीते हुए बालपन की यह क्रीड़ा पूर्ण वाटिका है।
वही मचलना, वही किलकना हँसती हुई नाटिका है।।4।।

शब्दार्च
सुधा-धार-अमृत की धार। नयनों-आँखों। मनस्वी-बुद्धिमान। बालपन-बचपन। नाटिका-नाटक करने वाली।

प्रसंग-पूर्ववत । इसमें कवयित्री ने अपनी बिटिया को नीरस दिल में अमृत धारा प्रवाहित करने वाली मानते हुए कहा है।

व्याख्या-मेरी बिटिया मेरे नीरस हृदय के लिए अमृत की धारा है। इसकी मस्ती और प्रसन्नता किसी तपस्वी से कम नहीं है। आँखों की गयी हुई रोशनी को वापस लाने वाली यह जीवन की ज्योति के समान है। इसमें बुद्धिमानों की तरह सच्ची लगन है। यह मेरे बीते हुए बचपन को लौटाने वाली क्रीड़ामयी वाटिका की तरह है। इसका मचलना और किलकना किसी हँसती हुई नाटिका से किसी प्रकार कम नहीं है।

विशेष-

  1. भाषा की शब्दावली सरल और सुबोध है।
  2. शैली चित्रात्मक है।
  3. रूपक अलंकार है।
  4. वात्सल्य रस का संचार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न(i) प्रस्तुत पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-स्वरूप सरल और सुबोध शब्दावली से होकर वात्सल्य रस में प्रवाहित हुआ है। इसमें चमत्कार लाने के लिए किया गया रूपक अलंकार का प्रयोग मन को और लुभा रहा है।
(ii) प्रस्तुत पयांश की भाव-योजना हृदय को बड़ी आसानी से छू रही है। बालिका के प्रति वात्सल्य भावना की सच्चाई की रोचकता निश्चर्य ही आकर्षक है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) बालिका को किन-किन रूपों में प्रस्तुत किया गया है?
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से क्या अनुभूति होती है?
उत्तर
(i) बालिका को अमृत की धारा, मस्त मगन तपस्वी, जीवन-ज्योति, मनस्वी की सच्ची लगन, क्रीड़ामयी वाटिका और हँसती हुई नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) बालिका के चरित्रोल्लेख से बीते हुए बचपन की अनुभूति होती है।

3. मेरा मन्दिर, मेरी मस्जिद
काबा-काशी यह मेरी।
पूजा-पाठ, ध्यान-जप-तप है
घट-घट वासी यह मेरी ॥5॥

कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को
अपने आँगन में देखो।
कौशल्या के मात्र-मोदे को।
अपने ही मन में लेखो ॥6॥

शब्दार्थ-काबा-मुसलमानों का धार्मिक स्थान । घट-घट बासी-अन्दर निवास करने वाला परमात्मा। कृष्णचन्द्र-बालक श्रीकृष्ण। लेखो-देखो।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवयित्री ने बालिका को धर्मस्वरूप मानते हुए कहा है कि

व्याख्या-मेरे लिए यह मेरी बेटी मन्दिर-मस्जिद, काबा, काशी के समान अत्यन्त पवित्र है। यह मेरे लिए पूजा-पाठ और ध्यान, जप-तप के समान है। यह मेरे घट-घट में निवास करती है। इस प्रकार मैंने अपनी बालिका को अपने आँगन में अनेक प्रकार के खेल-खेलते हुए देखा, तो मुझे ऐसा लगा मानो बालक श्रीकृष्ण ही मेरे ऑगन में बाल-क्रीड़ा कर रहे हैं। इसे आप लोग भी अपनी-अपनी बालिकाओं में देख सकते हैं। इस प्रकार माता कौशल्या के आनन्द को अपने मन में अनुभव कर सकते हैं।

विशेष-

  1.  भाषा में सजीवता है।
  2. शैली भावात्मक है।
  3. वात्सल्य रस का प्रवाह है।
  4. सामाजिक शब्दावली है।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश वात्सल्य रस की सहज धारा से प्रवाहित है, जो सरल शब्दावली से पुष्ट हुआ है। अनुप्रास अलंकार (कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं की, अपने आँगन, मात्र मोदे और मन में) के आकर्षक प्रयोग से यह पद्यांश प्रभावशाली बन गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरल, स्वाभाविक और भाववर्द्धक है। यह पूरी तरह से बोधगम्य और हृदय को छू लेने वाला है। बालक के चरित्र की पवित्रता का उल्लेख सचमुच में बड़ा ही अनूठा है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर प्रश्न-10 बालिका की पवित्रता कैसी है?

(i) बालिका की बाल-लीला कैसी होती है? उत्तर-0 बालिका की पवित्रता मन्दिर, मस्जिद, काबा और काशी जैसी है।
(ii) बालिका की बाललीला बालक राम-कृष्ण जैसी होती है।

4. प्रभु ईशा की क्षमाशीलता
नवी मुहम्मद का विश्वास।
जीव दया जिनवर गौतम की
आओ देखो इसके पास ॥7॥

परिचय पूछ रहे हो मुझसे
कैसे परिचय हूँ इसका।
वहीं जान सकता है इसको
माता का दिल है जिसका ॥8॥

शब्दार्थ-ईशा-ईशामसीह। नबी-इस्लाम धर्म के महापुरुष। जिनवर-तीर्थकर/ महावीर स्वीमी।

प्रसंग-पूर्ववत्। उसमें कवयित्री ने बालिका को संसार के महापुरुष के समान बतलाने का प्रयास किया है। इसके लिए कवयित्री का कहना है कि

व्याख्या-चूँकि बालिका का तन-मन स्वच्छंद और पवित्र भावों से भरा होता है।

इसलिए उसमें ईशामसीह की क्षमाशीलता और नबी-मुहम्मद के अटूट विश्वास को समझा जा सकता है। यही नहीं, उसमें महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति अपार दया की भावना जैसे अद्भुत और अनोखे उच्च गुणों को देखा-परखा जा सकता है। कवयित्री का पुनः कहना है कि अगर कोई उससे बालिका का परिचय पूछे तो वह क्या दे सकती है। उसका तो यही कहना है कि बालिका को एक माता का दिल ही सचमुच में जान सकता है।

विशेष-

  1. बालिका के उदार और विशाल हृदय को अत्यधिक श्रेष्ठ कहा गया है।
  2. ईशामसीह, नबी, मुहम्मद, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध से बालिका की तुलना की गई है। इसलिए इसमें उपमा अलंकार है।
  3. उदाहरण शैली है।
  4. सम्पूर्ण कथन अत्यधिक रोचक है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश को उपमा अलंकार की झड़ी लगाकर अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास सचमुच में प्रशंसनीय है। इसे और रोचक बनाने के लिए भाषा को धारदार बनाकर कथन की सच्चाई का सामने लाया गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-विधान स्वाभाविक, यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय और हदयस्पर्शी है। बालिका की अद्भुत विशेषता को महानतम रूप में लाने का कवयित्री का प्रयास न केवल अनूठा है, अपितु प्रेरक भी है।

2. पयांश पर आधारित विषय-वस्तु से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बालिका के असाधारण गुण कौन-कौन से हैं?
(ii) बालिका की सच्चाई को कौन बता सकता है?
उत्तर
(i) बालिका के असाधारण गुण हैं-ईशामसीह की क्षमाशीलता, नवी-मुहम्मद का विश्वास, महावीर स्वामी और महात्मा गौतम बुद्ध के जीवों के प्रति दया-भावना।
(ii) बालिका की सच्चाई माता ही बता सकती है।

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MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध

MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध

1. सन्धि

दो वर्णों के मेल को सन्धि कहते हैं;

जैसे-

विद्या + आलय = विद्यालय, रमा + ईश = रमेश आदि।

सन्धि के भेद-सन्धि तीन प्रकार की होती हैं-

  1. स्वर सन्धि,
  2. व्यंजन सन्धि,
  3. विसर्ग सन्धि।

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(1) स्वर सन्धि
स्वर वर्ण के साथ स्वर वर्ण के मेल में जो परिवर्तन होता है, वह स्वर सन्धि कहलाता है;

जैसे-

पुस्तक + आलय = पुस्तकालय, विद्या + अर्थी = विद्यार्थी। स्वर सन्धि के पाँच प्रकार होते हैं

(अ) दीर्घ सन्धि-हस्व या दीर्घ अ,इ, उ, ऋ के बाद ह्रस्व या दीर्घ समान स्वर आये तो दोनों के मेल से दीर्घ स्वर हो जाता है।

जैसे-

हत + आश = हताश, कपि + ईश = कपीश, भानु + उदय = भानूदय आदि।

(आ) गुण सन्धि-अ या आ के बाद इ या ई आये तो दोनों के स्थान पर ए हो जाता है। अ या आ के बाद उ या ऊ आये तो ओ हो जाता है और अ या आ के बाद ऋ आये तो अर् हो जाता है।

जैसे-

देव + ईश = देवेश, वीर + उचित = वीरोचित,महा + ऋषि = महर्षि।

(इ) वृद्धि सन्धि–यदि अ या आ के बाद ए या ऐ हो तो दोनों के स्थान पर ऐ हो जाते हैं और अ या आ के बाद ओ या औ हो तो दोनों मिलकर औ हो जाते हैं;

जैसे-

सदा + एव = सदैव,महा + औषध = महौषध।

(ई) यण सन्धि–यदि हस्व या दीर्घ इ.उ.ऋके बाद कोई असमान स्वर आये तो इ का य,उ का व् एवं ऋ का र् हो जाता है;

जैसे-

  • प्रति + एक = प्रत्येक,
  • सु + आगत = स्वागत,
  • पित्र + आदेश = पित्रादेश।

(3) अयादि सन्धि–यदि ए.ऐ ओ औ के बाद कोई स्वर आये तो ए का अय.ऐ का आय, ओ का अव् और औ का आव् हो जाता है;

जैसे-

  • ने + अन = नयन,
  • नै + अक = नायक,
  • पो + अन = पवन,
  • पौ + अक = पावक।

(2) व्यंजन सन्धि
व्यंजन वर्ण के बाद व्यंजन या स्वर वर्ण के आने पर जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन सन्धि कहते हैं;

जैसे-

  • जगत + ईश = जगदीश,
  • जगत + नाथ = जगन्नाथ।

(i) श्चुत्व सन्धि–यदि ‘स’ तथा त वर्ग के योग में (आगे या पीछे) ‘श’ या च वर्ग आये, तो ‘स’ के स्थान पर ‘श’ और त वर्ग के स्थान पर च वर्ग हो जाता है;

जैसे-

  • हरिस् + शेते = हरिश्शेते
  • सत् + चयन = सच्चयन
  • सत् + चरित = सच्चरित
  • श्यामस + शेते = श्यामश्शेते

(ii) ष्टनाष्ट सन्धि-यदि ‘स’ तथा त वर्ग के योग में (आगे या पीछे) ‘स’ और त वर्ग कोई भी हो तो स् का और त वर्ग का ट वर्ग (ट,ठ, ड, ढ, ण) हो जाता है;

जैसे-

  • रामस् + टीकते = रामष्टीकते
  • पेष् + ता = पेष्टा
  • तत् + टीका = तट्टीका
  • उद् + डयन = उड्डयन

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(iii) अपदान्त सन्धि-झल् अर्थात् अन्तःस्थ य र ल व् और अनुनासिक व्यंजन को छोड़कर और किसी व्यंजन के पश्चात् झश् आवे तो पहले वाले व्यंजन जश् (ज, व, ग, ड,द) में बदल जाते हैं;

जैसे-

  • योध् + धा = योद्धा
  • एतत् + दुष्टम् = एतदुष्टम्
  • बुध् + धिः = बुद्धिः
  • दुध् + धम् = दुग्धम्

(iv) चरत्व सन्धि–यदि जल् (अनुनासिक व्यंजन) ड,ज,ण, न,म् तथा अन्तःस्थ-य् र् ल् व् को छोड़कर किसी भी व्यंजन के बाद ख्र (वर्ग का प्रथम, द्वितीय व्यंजन) क् च् त् प् तथा श् ष् स् में से कोई आये, तो झल् के स्थान चर् (उसी वर्ग का प्रथम अक्षर) हो जाता है;

जैसे-

  • वृक्षात् + पतति = वृक्षात्पतति
  • विपद् + कालः = विपत्काल
  • सद् + कारः = सत्कार
  • तज् + शिवः = तत्छिव

(v) अनुस्वार सन्धि-यदि पद के अन्त में ‘म्’ आये और उसके बाद कोई व्यंजन आवे तो ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार (-) हो जाता है। यथा

  • हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
  • गृहम् + चलति = गृहं
  • चलति गृहम् + गच्छति = गृहं गच्छति
  • सत्यम् + वद = सत्यं वद
  • कार्यन् + कुरु = कार्यं कुरु

(vi) लत्व सन्धि–यदि त वर्ग (त् थ् द् ध् न्) के बाद ल आये तो त वर्ग के स्थान पर ल हो जाता है;

जैसे-

  • तत् + लीन = तल्लीन
  • उद् + लेख = उल्लेख

(vii) परसवर्ण सन्धि–यदि अनुस्वार (-) के बाद श, ष,स, ह को छोड़कर कोई अन्य व्यंजन आए तो अनुस्वार के स्थान पर अगले वर्ग का पंचम वर्ण हो जाता है;

जैसे-

  • शां + त = शान्त
  • अं + क = अंक

(3) विसर्ग सन्धि
विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन के मिलने से जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं;

जैसे-

  • निः + आशा = निराशा,
  • मनः + ताप = मनस्ताप।

विग्रह-शब्द के वर्गों को अलग-अलग करना विग्रह या विच्छेद कहलाता है;

जैसे-

  • रमेश = रमा + ईश,
  • वस्त्रालय = वस्त्र + आलय।

(i) विसर्ग सन्धि–विसर्ग के बाद यदि ‘खर्’ प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्ग का प्रथम, द्वितीय तथा श् ष स) रहे, तो विसर्ग के स्थान पर ‘स्’ हो जाता है;

जैसे-

  • विष्णुः + माता = विष्णुस्माता
  • रामः + मायते = रामस्मायते
  • निः + छलः = निश्छल = निश्छल

(ii) रुत्व सन्धि-पदान्त ‘स्’ तथा सजुष् शब्द के ष् के स्थान में (र) हो जाता है। इस पदान्तर के बाद र द् प्रत्याहार (वर्गों के प्रथम, द्वितीय और स्) का कोई अक्षर हो अथवा कोई भी वर्ण न हो,तो र के स्थान में विसर्ग हो जाता है;

जैसे-

  • हरिस् + अवदत् = हरिरवदत्
  • वधूस + एषा = बधूरेषा
  • पुनस् + आगत = पुनरागत
  • पुनस् + अन्तरे = पुनरन्तरे

(iii) उत्व सन्धि-स् के स्थान में जो र् आदेश होता है, उसके पूर्व यदि ह्रस्व अ आवे और बाद में ह्रस्व अ अथवा हश् प्रत्याहार का कोई अक्षर आवे,तो र के स्थान में उ हो जाता है;

जैसे-
शिवस् + अर्घ्यः = शिवर् + अर्घ्यः = शिव + उ + अर्घ्यः = शिवो + अर्ध्यः = शिवोऽर्यः . रामस् + अस्तिरामर् + अस्ति = राम + उ + अस्ति = रामोऽस्ति सः + अपि = सस् + अपि = सर् + अपि = स + उ + अपि = सोऽपि। बालस् + वदति = बालर् + वदति = बाल + उ + वदति = बालो वदति

(iv) र लोप सन्धि-यदि ‘र’ के बाद ” आए तो पहले ‘र’ का लोप हो जाता है और यदि लुप्त होने वाले ‘र’ से पूर्व अ, इ, उ में से कोई हो, तो वह स्वर दीर्घ हो जाता है; जैसे-

  • हरिर् + रम्यः = हरीरम्यः
  • शम्भुर् + राजते = शम्भूराजते।

सन्धि-विग्रह-सन्धि के जोड़े गये वर्गों को अलग-अलग करना विच्छेद कहा जाता है। जैसे-‘पुस्तकालय’ का सन्धि-विच्छेद ‘पुस्तक + आलय’, ‘महेश’ का सन्धि-विच्छेद ‘महा + ईश’ होगा।

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अन्य उदाहरण-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-1
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-2

2. समास

दो या दो से अधिक पदों के योग से बने शब्द को समास कहते हैं। समास छ: प्रकार के होते हैं

(1) अव्ययीभाव समास-जिस समास में प्रथम पद अव्यय हो तथा वह पद ही प्रधान हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है।
जैसे-
प्रतिदिन–प्रत्येक दिन, यथाशक्ति-शक्ति के अनुसार, आजीवन-जीवनपर्यन्त या जीवनभर।

(2) तत्पुरुष समास-जिस समास में उत्तर पद प्रधान होता है तथा पूर्व पद के कारक (विभक्ति) का लोप करके दोनों पदों को मिला दिया जाता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।
जैसे-
मन्त्रीपुत्र-मन्त्री का पुत्र,समुद्रयात्रा-समुद्र की यात्रा, विद्यालय [2009] विद्या का आलय, व्यायामशाला व्यायाम की शाला,पर्वतमाला-पर्वतों की माला,दुर्गपति-दुर्ग का पति।

विभक्तियों के भेद के आधार पर इसके कर्म तत्पुरुष, करण तत्पुरुष, सम्प्रदान तत्पुरुष, अपादान तत्पुरुष, सम्बन्ध तत्पुरुष तथा अधिकरण तत्पुरुष छ: प्रकार के होते हैं।

(3) कर्मधारय समास-विशेषण और विशेष्य अथवा उपमान और उपमेय के मिलने पर कर्मधारय समास होता है।
जैसे-
श्वेताम्बर-श्वेत है जो अम्बर, मधुरस-मधुर रस, घनश्याम-घन के समान श्याम।

(4) द्वन्द्व समास-इस समास में दोनों पद प्रधान होते हैं, परन्तु उसके संयोजक शब्द ‘और’ का लोप रहता है। [2010]
जैसे-
आदान-प्रदान-आदान और प्रदान, भाई-बहिन-भाई और बहिन, राम-कृष्ण-राम और कृष्ण,शत्रु-मित्र-शत्रु और मित्र, पिता-पुत्र-पिता और पुत्र।

(5) द्विगु समास-जिस समास में पूर्व पद- संख्यावाचक हो वह द्विगु समास कहलाता है। [2009]
जैसे-
सप्तद्वीप-सात द्वीपों का समूह, त्रिभुवन-तीन भुवनों का समूह, अष्टकोण-आठ कोण, षडानन—षट् मुख।

(6) बहुब्रीहि समास-जिस समास में पूर्व एवं उत्तर पद के अतिरिक्त कोई अन्य पद प्रधान होता है, उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं। [2009]
जैसे-
पंचानन—पाँच मुख वाला = शिव,लम्बोदर-लम्बा है उदर जिसका = गणेश।

विग्रह सहित समास के कुछ उदाहरण-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-3
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-4
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-5

3. वाक्य के प्रकार

शब्दों का वह समूह जिसका कुछ अर्थ निकलता हो, उसे वाक्य कहते हैं। अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ प्रकार होते हैं—

  1. विधानार्थ वाक्य-साधारणतः जिस वाक्य में किसी बात का उल्लेख किया जाए, वह विधानार्थक वाक्य कहलाता है।
    जैसे- श्याम नित्यप्रति घूमने जाता है।
  2. निषेधात्मक वाक्य-जिन वाक्यों में ना या निषेध का भाव हो, वे निषेधात्मक वाक्य कहलाते हैं।
    जैसे- राम आज पढ़ने नहीं आयेगा।
  3. प्रश्नवाचक वाक्य-जिन वाक्यों में प्रश्न किया जाये,वे प्रश्नवाचक वाक्य कहलाते हैं।
    जैसे- क्या आप मेला देखने जायेंगे।
  4. आज्ञार्थक वाक्य-जिन वाक्यों में आज्ञा देने का भाव पाया जाता है, वे आज्ञार्थक वाक्य कहलाते हैं।
    जैसे-तुम विद्यालय जाओ।
  5. उपदेशात्मक वाक्य-उपदेश या परामर्श देने वाले वाक्य उपदेशात्मक वाक्य कहलाते हैं।
    जैसे- गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए।
  6. इच्छासूचक वाक्य-इच्छा, आशीष या निवेदन प्रकट करने वाले वाक्य इच्छा सूचक वाक्य कहलाते हैं।
    जैसे- ईश्वर करे, तुम्हारी नौकरी लग जाये।
  7. विस्मयादिबोधक वाक्य-हर्ष, शोक, दर्द, भय, क्रोध, घृणा आदि प्रकट करने वाले वाक्य विस्मयादिबोधक वाक्य कहलाते हैं।
    जैसे- आह ! कितना भयानक दृश्य है।
  8. सन्देहसूचक वाक्य-सन्देह या सम्भावना प्रकट करने वाले वाक्य सन्देहसूचक वाक्य कहलाते हैं।
    जैसे- सम्भवतः वह लौट नहीं पायेगा।

4. वाक्य परिवर्तन

एक प्रकार के वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्य में बदलना वाक्य परिवर्तन कहलाता है। वाक्य परिवर्तन में अर्थ या भाव का ध्यान रखना आवश्यक होता है।

विधानार्थ वाक्य से निषेधवाचक वाक्य में परिवर्तन

विधानार्थ वाक्य – निषेधवाचक वाक्य
1. राम घर में सबसे बड़ा है। – घर में राम से बड़ा कोई नहीं है।
2. ताज सबसे सुन्दर इमारत है। – ताज से सुन्दर इमारत कोई नहीं है।
3. रहीम निर्धन है। – रहीम धनवान नहीं है।

विधानार्थक वाक्य से प्रश्नवाचक वाक्य में परिवर्तन
विधानार्थक वाक्य – प्रश्नवाचक वाक्य
1. श्याम मेरा भाई है। – क्या श्याम मेरा भाई है?
2. विवेक धनवान है। – क्या विवेक धनवान है?
3. चिन्मय सो रहा है। – क्या चिन्मय सो रहा है?

विधानार्थक वाक्य से आज्ञावाचक वाक्य में परिवर्तन
विधानार्थक वाक्य – आज्ञावाचक वाक्य
1. पिता का आदर करते हैं। – पिता का आदर करो।
2. विभोर दूध पीता है। – विभोर,दूध पिओ।
3. सुभाष समाज की सेवा करता है। – सुभाष,समाज की सेवा करो। .

विधानार्थक वाक्य से उपदेशात्मक वाक्य में परिवर्तन
विधानार्थक वाक्य – उपदेशात्मक वाक्य
1. राजीव खाना खाता है। – ‘राजीव को खाना खाना चाहिए।
2. मोहन पानी पीता है। – मोहन को पानी पीना चाहिए।
3. सिद्धार्थ सोता है। – सिद्धार्थ को सोना चाहिए।

विधानार्थक वाक्य से विस्मयादिबोधक वाक्य में परिवर्तन
विधानार्थक वाक्य – विस्मयादिबोधक वाक्य
1. वह दृश्य बड़ा सुन्दर है। – वाह ! वह दृश्य कितना सुन्दर है।
2. यह झील बहुत गहरी है। – ओ ! यह झील कितनी गहरी है।
3. रमन बहुत कमजोर हो गया है। – अरे ! रमन कितना कमजोर हो गया है।

5. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

संक्षेप में बात कहना एक विशेषता मानी गई है। अनेक शब्दों के लिए एक शब्द बोलने से ही संक्षिप्तता आती है। सूत्र रूप में बात कहने की परम्परा श्रेष्ठ मानी गई है। अनेक शब्दों के लिए एक शब्द की तालिका में कुछ शब्द यहाँ प्रस्तुत हैं-

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अनेक शब्द – एक शब्द

  • हाथी को हाँकने का हुक – अंकुश
  • जो जीता न जा सके – अजेय
  • वह बच्चा जिसके माता-पिता न हों – अनाथ [2017]
  • बिना वेतन के काम करने वाला – अवैतनिक
  • जिसका कोई शत्रु न हो – अजातशत्रु
  • जिसके समान दूसरा न हो – अद्वितीय [2010, 17]
  • जो कभी मरता न हो – अमर [2009]
  • जिसकी कोई सीमा न हो – असीम
  • दोपहर के बाद का समय – अपराह्न
  • जो ईश्वर में विश्वास करता है। – आस्तिक [2009, 17]
  • आदि से अन्त तक – आद्योपरान्त
  • इन्द्रियों को जीतने वाला – इन्द्रियजित
  • जिसका हृदय उदार हो – उदार हृदय
  • जिसका उल्लेख करना आवश्यक हो – उल्लेखनीय
  • जिस भूमि में कुछ पैदा न होता हो – ऊसर
  • विद्या पढ़ने वाला – विद्यार्थी
  • सदैव रहने वाला – शाश्वत
  • श्रद्धा करने योग्य – श्रद्धेय
  • जो सब कुछ आनता हो – सर्वज्ञ
  • जो सबसे श्रेष्ठ हो – सर्वश्रेष्ठ
  • जो सबका प्यारा हो – सर्वप्रिय
  • अपने ही बल पर निर्भर रहने वाला। – स्वावलम्बी
  • अपना ही हित चाहने वाला – स्वार्थी
  • हाथ से लिखा हुआ – हस्तलिखित
  • भलाई चाहने वाला – हितैषी
  • क्षण भर में नष्ट होने वाला – क्षणभंगुर
  • जिसकी एक आँख फूटी हो – काणा, काना
  • उपकार मानने वाला – कृतज्ञ
  • किये गये उपकार को न मानने वाला। – कृतघ्न
  • जो छिपाने योग्य हो – गोपनीय
  • जो घृणा के योग्य हो – घृणित
  • जिसके चार भुजाएँ हों – चतुर्भुज
  • इन्द्रियों को जीत लेने वाला – जितेन्द्रिय
  • जानने की इच्छा रखने वाला – जिज्ञासु
  • तीनों लोकों में होने वाला – त्रिलोकी
  • पति-पत्नी का जोड़ा – दम्पत्ति
  • जिसकी आयु लम्बी हो – दीर्घायु
  • दूर की बात जान लेने वाला – दूरदर्शी [2009]
  • कठिनाई से प्राप्त होने वाला – दुर्लभ
  • धर्म में रुचि रखने वाला – धर्मात्मा
  • जो नष्ट होने वाला हो – नश्वर
  • जिसका आकार न हो – निराकार
  • जिसे ईश्वर पर विश्वास न हो – नास्तिक
  • जो एक अक्षर भी न जानता हो – निरक्षर
  • वह स्त्री जिसे पति ने छोड़ दिया हो – परित्यक्ता
  • अपने पति के प्रति ही प्रेम रखने वाली – पतिव्रता स्त्री
  • दूसरों का उपकार करने वाला – परोपकारी
  • मन्दिर में पूजा करने वाला – पुजारी
  • फल खाकर जीने वाला – फलाहारी
  • बहुत से रूप धारण करने वाला – बहरूपिया
  • जिसके जोड़ का कोई और न हो – बेजोड़
  • कम बोलने वाला – मितभाषी
  • कम खर्च (व्यय) करने वाला – मितव्ययी
  • जो मीठा बोलता हो – मृदुभाषी
  • बहत अधिक बोलने वाला – वाचाल
  • जिसका पति मर गया हो – विधवा
  • जिसकी पत्नी मर गई हो – विधुर
  • जो जानने योग्य हो – ज्ञातव्य
  • जो ज्ञान से युक्त हो – ज्ञानी
  • ठेका लेने वाला – ठेकेदार [2016]
  • नीति का बोध कराने वाला – नीतिबोधक [2016]
  • उपासना करने वाला – उपासक [2018]
  • पूजा करने वाला – पुजारी [2018]

प्रश्नोत्तर

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

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बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. ‘वागीश’ किस सन्धि का उदाहरण है? [2009]
(i) स्वर सन्धि
(ii) दीर्घ सन्धि
(iii) विसर्ग सन्धि .
(iv) व्यंजन सन्धि।
उत्तर-
(ii) दीर्घ सन्धि

2. ‘महा + ओजस्वी = महौजस्वी’ में सन्धि है [2011]
(i) गुण सन्धि
(ii) वृद्धि स्वर सन्धि
(iii) यण सन्धि
(iv) दीर्घ सन्धि।
उत्तर-
(ii) वृद्धि स्वर सन्धि

3. ‘नि: + चय = निश्चय’ कौन-सी सन्धि का उदाहरण है? [2016]
(i) विसर्ग
(ii) स्वर
(iii) व्यंजन
(iv) दीर्घ स्वर।
उत्तर-
(i) विसर्ग

4. ‘पथ भ्रष्ट’ में समास है [2011]
(i) सम्प्रदान तत्पुरुष
(ii) करण तत्पुरुष
(iii) अपादान तत्पुरुष
(iv) सम्बन्ध तत्पुरुष।
उत्तर-
(ii) करण तत्पुरुष

5. ‘चौराहा’ में समास है [2015]
(i) द्वन्द्व
(ii) तत्पुरुष
(iii) द्विगु
(iv) अव्ययी भाव।
उत्तर-
(iii) द्विगु

6. किस समास में दोनों पद प्रधान होते हैं? [2013]
(i) द्वन्द्व
(ii) द्विगु
(iii) बहुब्रीहि
(iv) तत्पुरुष।
उत्तर-
(i) द्वन्द्व

7. ‘पावक’ शब्द उदाहरण है
(i) दीर्घ स्वर सन्धि
(ii) गुण स्वर सन्धि
(iii) वृद्धि स्वर सन्धि
(iv) अयादि स्वर सन्धि।
उत्तर-
(iv) अयादि स्वर सन्धि।

8. सब कुछ जानने वाले को क्या कहा जाता है? [2017]
(i) जानकार
(ii) ज्ञानी
(iii) बहुज्ञानी
(iv) सर्वज्ञ।।
उत्तर-
(iv) सर्वज्ञ।।

9. ईश्वर पर विश्वास रखने वाले को कहा जाता है [2018]
(i) ईश्वरीय
(ii) सेवक
(iii) आस्तिक
(iv) नास्तिक।
उत्तर-
(iii) आस्तिक

10. ‘जिसका कोई आकार हो’ के लिए एक शब्द है-
(i) आकार रहित
(ii) साकार
(iii) पूर्वाकार
(iv) आकार सहित।
उत्तर-
(iv) आकार सहित।

11. ‘नीरस’ का सन्धि-विच्छेद होगा [2014]
(i) निरा + रस,
(ii) निः + रस,
(iii) नि + अरस
(iv) नि + रस।
उत्तर-
(ii) निः + रस,

रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. दो वर्णों के मेल को …………… कहते हैं।
2. सन्धि …………….” प्रकार की होती है। [2015]
3. स्वर सन्धि के ………… भेद होते हैं।
4. द्वन्द्व समास में . .. शब्द का लोप होता है।
5. भोजन करके पढ़ाई करो …………… वाक्य है।
6. ‘रमेश को पढ़ना चाहिए।’ …………. वाक्य है।
7. अर्थ के आधार पर वाक्य के प्रकार ………… हैं। [2013]
8. ‘दर्शन शास्त्र को जानने वाला’ …………….” कहलाता है।
9. ‘ईश्वर में …….रखने वाला’ आस्तिक कहलाता है।
10. ‘यात्रा करने वाला’ ………… कहलाता है।
11. रसोईघर ……… समास का उदाहरण है। [2014]
12. द्विगु समास का उदाहरण ……..” है। [2016]
उत्तर-
1. सन्धि,
2. तीन,
3. पाँच,
4. और,
5. सरल,
6. उपदेशात्मक,
7. आठ,
8. दर्शनशास्त्री,
9. आस्था,
10. यात्री,
11. तत्पुरुष,
12. पंचवटी।

सत्य/असत्य

1. दो पदों के मेल को सन्धि कहते हैं।
2. ‘जगदीश’ शब्द में विसर्ग सन्धि है। [2009]
3. पुनर्जन्म में व्यंजन सन्धि है। [2013]
4. मनोहर शब्द में व्यंजन संधि है। [2017]
5. ‘निराला’ शब्द में व्यंजन संधि है। [2018]
6. शुद्ध वाक्य के तीन गुण होते हैं।
7. ‘अरे ! वह मर गया।’ वाक्य विस्मयादिबोधक है।
8. ‘वह देश की रक्षा करता है।’ प्रश्नवाचक वाक्य है।
9. जो कभी नहीं मरता वह अमर कहलाता है। [2015]
10. ‘जानने की इच्छा रखने वाला’ जिज्ञासु कहलाता है।
11. ‘जिसकी एक आँख हो’ अन्धा कहलाता है। [2014]
12. ‘यथाशक्ति’ अव्ययीभाव समास का उदाहरण है। [2012]
13. ‘पुष्प’ का पर्यायवाची शब्द ‘कमल’ है। [2016]
14. ‘पुरुषों में उत्तम’ पुरुषोत्तम कहलाता है। [2016]
उत्तर-
1. असत्य,
2. असत्य,
3. असत्य,
4. सत्य,
5. असत्य,
6. सत्य,
7. सत्य,
8. असत्य,
9. सत्य,
10. सत्य,
11. असत्य,
12. सत्य,
13. असत्य,
14. सत्य।

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सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-6
उत्तर-
1. → (ग), 2. → (क), 3. → (ख), 4. → (ङ), 5. → (घ)।

MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-7
उत्तर-
1. → (ग), 2. → (ङ), 3. → (घ), 4. → (क), 5. → (ख)।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. सन्धि के कितने प्रकार हैं?
2. हरेऽव में कौन-सी सन्धि है?
3. किस समास में विभक्तियों के चिह्नों का लोप होता है?
4. जगन्नाथ का सन्धि-विच्छेद लिखिए। [2018]
5. पुस्तकालय शब्द का सन्धि विग्रह है। [2010]
6. सच्चरित्र का सन्धि विच्छेद कर सन्धि का नाम बताइए। [2017]
7. “राम ! तुम नगर में रहो” यह किस प्रकार का वाक्य है? [2014]
8. ‘हमें पढ़ाई करनी चाहिए’ कैसा वाक्य है?
9. निन्दा करने वाला क्या कहलाता है? [2016]
10. जिसके समान कोई दूसरा न हो। [2012]
11. गागर में सागर भरने का क्या अर्थ है? [2012]
12. उपासना करने वाला क्या कहलाता है? [2014]
13. ‘ईश्वर के अनेकों नाम हैं।’ वाक्य को शुद्ध कीजिए। [2015]
उत्तर-
1. तीन,
2. पूर्वरूप,
3. तत्पुरुष,
4. जगत + नाथ,
5. रमा + ईश,
6. सत् + चरित्र (व्यंजन सन्धि),
7. आज्ञावाचक वाक्य,
8. इच्छात्मक,
9. निन्दक,
10. अद्वितीय,
11. कम शब्दों में बड़ी बात करना,
12. उपासक,
13. ईश्वर के अनेक नाम हैं।

(ख) लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों की सन्धि-विच्छेद कीजिए तथा सन्धि का नाम लिखिएरामावतार, परोपकार, विद्यालय, रमेश, धनादेश, गायक।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-8

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम बताइएमनोरथ, उच्चारण, सदाचार, शिवालय,महोत्सव।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-9

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों की सन्धि-विच्छेद कर सन्धि का नाम लिखिएतथैव, अत्यन्त, जगन्नाथ, नरेश।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-10

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों की सन्धि-विच्छेद कर सन्धि का नाम लिखिएहिमालय, परमार्थ,मनोरम, निस्सार।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-11

प्रश्न 5.
स्वर-सन्धि की क्या पहचान है? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर-
स्वर के साथ स्वर का मेल होने पर स्वर सन्धि होती है, जैसे-देवालयः।

प्रश्न 6.
दीर्घ सन्धि किसे कहते हैं?
उत्तर-
जब दो शब्दों ह्रस्व या दीर्घ परस्पर मिलने से जो परिवर्तन होता है,उसे दीर्घ सन्धि कहते हैं।
यथा-विद्यालय।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों में कौन-सी सन्धि हैकश्चित्, नायक, हिमालय।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-12

प्रश्न 8.
विसर्ग सन्धि की परिभाषा लिखिए।।
उत्तर-
विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन के मिलने से जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं;

जैसे-
मनोरथः = मनः + रथ।

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प्रश्न 9.
समास किसे कहते हैं?
उत्तर-‘
समास शब्द का आशय है-संक्षेप। दो या दो से अधिक शब्दों का अपने विभक्ति चिह्नों को छोड़कर मिलना ही समास कहलाता है।

प्रश्न 10.
सामासिक पद का क्या आशय है?
उत्तर-
जिन शब्दों में समास होता है उनके योग से एक नया ही शब्द बन जाता है, ऐसे पद को सामासिक पद कहते हैं।
जैसे-राजपुत्र = राजा का पुत्र।

प्रश्न 11.
तत्पुरुष समास में कौन-सा पद प्रधान होता है?
उत्तर-
तत्पुरुष समास में अन्तिम पद प्रधान होता है।

प्रश्न 12.
कर्मधारय समास एवं द्विगु समास के दो-दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
कृष्णसर्प,श्वेत अश्व – कर्मधारय समास।
पंचवटी,त्रिलोक – द्विगु समास

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से किन्हीं दो पदों का समास-विग्रह कर समास का नाम बताइएराजपुरुष, दशानन, भाई-बहिन, चन्द्रमुख।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-13

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से किन्हीं दो पदों का समास-विग्रह करके समास का नाम लिखिए
सुख-दुःख, नवग्रह, नीलकमल,प्रतिदिन,प्रत्येक।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi भाषा बोध img-14
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प्रश्न 15.
सन्धि और समास में कोई तीन अन्तर लिखिए। [2010, 14]
उत्तर-

  1. सन्धि दो वर्गों के मेल को कहते हैं जबकि दो या दो से अधिक पदों के योग से बनने वाले शब्द को समास कहते हैं।
  2. सन्धि तीन प्रकार की होती हैं जबकि समास छ: प्रकार के होते हैं।
  3. सन्धि को तोड़ना विच्छेद कहलाता है,जबकि समास को तोड़ना विग्रह कहलाता है।

प्रश्न 16.
वाक्य रूपान्तरण से क्या तात्पर्य है? हिन्दी में वाक्य रूपान्तरण कितने प्रकार से किया जाता है? [2014]
उत्तर-
एक प्रकार के वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्य में बदलना,वाक्य परिवर्तन अथवा वाक्य रूपान्तरण कहलाता है। वाक्य रूपान्तरण करते समय अर्थ या भाव का ध्यान रखना आवश्यक होता है।

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जैसा कि हमें ज्ञात है कि अर्थ की दृष्टि से वाक्य आठ प्रकार के होते हैं। इनमें से विधानवाचक वाक्य को मूल आधार माना जाता है। अन्य वाक्य भेदों में विधानवाचक वाक्य का मूलभाव ही विभिन्न रूपों में परिलक्षित होता है। किसी भी विधानवाचक वाक्य को सभी प्रकार के भावार्थों में प्रयुक्त किया जा सकता है।

जैसे-

  1. विधानवाचक वाक्य-राम भोपाल में रहता है।
  2. विस्मयादिवाचक वाक्य-अरे ! राम भोपाल में रहता है।
  3. प्रश्नवाचक वाक्य-क्या राम भोपाल में रहता है?
  4. निषेधवाचक वाक्य-राम भोपाल में नहीं रहता है।
  5. संदेशवाहक वाक्य-शायद राम भोपाल में रहता है।
  6. आज्ञावाचक वाक्य-राम, तुम भोपाल में रहो।
  7. इच्छावाचक वाक्य-काश,राम भोपाल में रहता।
  8. संकेतवाचक वाक्य-यदि राम भोपाल में रहना चाहता है, तो रह सकता है।

प्रश्न 17.
निर्देशानुसार वाक्य परिवर्तन कीजिए [2009]
(क) मोहित फूल लाता है। (प्रश्नवाचक)
(ख) तुम वाराणसी में रहते हो। (प्रश्नवाचक)
(ग) माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। (आज्ञावाचक)
(घ) गौरव पुस्तक पढ़ता है। (आज्ञावाचक)
उत्तर-
(क) क्या मोहित फूल लाता है?
(ख) क्या तुम वाराणसी में रहते हो?
(ग) माता-पिता की सेवा करो।
(घ) गौरव पुस्तक पढ़ो।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए-
1. गुरु का सम्मान करना चाहिए। (आज्ञावाचक)
2. सीता रो रही है। (प्रश्नवाचक)
3. गुड्ड कक्षा में सबसे छोटा है। (निषेधवाचक)
4. बाढ़ का दृश्य बड़ा भयानक था। (विस्मयादिबोधक)
5. मैं खेती के बारे में अधिक जानता हूँ। [2013] (निषेधात्मक)
6. बादल समय पर पानी नहीं देते हैं। [2013] (विधानवाचक)
7. दीपक बाजार जा रहा है। [2015] (प्रश्नवाचक वाक्य)
8. गणित का प्रश्न-पत्र कठिन है। [2015] (निषेधात्मक वाक्य)
9. तुम्हें अपना गृह कार्य करना चाहिए। [2015] (आदेशात्मक वाक्य)
10. मोहन दिल्ली में रहता है। [2016] (निषेधवाचक)
11. सीता गाना गाती है। [2016] (विस्मयादिसूचक)
12. वह आस्तिक है। [2018] (निषेधवाचक)
13. अशेक रामनगर में रहता है। [2018] (विस्मयादिबोधक)
उत्तर-
1. गुरु का सम्मान करो।
2. क्या सीता रो रही है?
3. कक्षा में गुड़ से छोटा कोई नहीं है।
4. आह ! बाढ़ का दृश्य कितना भयानक था।
5. मैं खेती के बारे में कम नहीं जानता हूँ।
6. बादल असमय पानी देते हैं।
7. क्या दीपक बाजार जा रहा है?
8. गणित का प्रश्न-पत्र सरल नहीं है।
9. तुम अपना गृहकार्य करो।
10. मोहन दिल्ली में नहीं रहता है।
11. वाह ! सीता गाना गाती है।
12. वह नास्तिक नहीं है।
13. अरे ! अशोक रामनगर में रहता है।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित वाक्यों को पहचानकर वाक्य के भेद लिखो- [2009]
(क) तुम विद्यालय जाओ।
(ख) मैं चाय नहीं पीता हूँ।
(ग) मैं आज भोजन नहीं करूंगा।
(घ) भगवान तुम्हें स्वस्थ रखे।
उत्तर-
(क) आज्ञार्थक वाक्य।
(ख) निषेधात्मक वाक्य।
(ग) निषेधात्मक वाक्य।।
(घ) इच्छासूचक वाक्य।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित वाक्यों के लिए एक शब्द लिखिए [2009]
(1) जो ईश्वर में विश्वास रखता हो।
(2) बिना वेतन के काम करने वाला।
(3) जिसे क्षमा न किया जा सके।
(4) लकड़ी काटने वाला।
उत्तर-
(1) आस्तिक,
(2) अवैतनिक,
(3) अक्षम्य,
(4) लकड़हारा।

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प्रश्न 21.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध रूप में लिखिए-
(क) गरम गाय का दूध पिओ।
(ख) मैं आपको मिलकर प्रसन्न हुआ।
(ग) खरगोश को काटकर गाजर खिलाओ। [2015]
(घ) बाढ़ में कई लोगों के डूबने की आशा है।
(ङ) में आपकी श्रद्धा करता हूँ।
(च) नेताजी को एक फूल की माला पहनाओ।
(छ) अपराधी को मृत्युदण्ड की सजा मिली।
(ज) छात्र कक्षा के अन्दर गया। [2011]
(झ) मैंने गाते हुए लता मंगेशकर को देखा। [2011]
(ज) मुझसे अनेकों भूलें हुईं। [2011]
उत्तर-
(क) गाय का गरम दूध पिओ।
(ख) मैं आपसे मिलकर प्रसन्न हुआ।
(ग) गाजर काटकर खरगोश को खिलाओ।
(घ) बाढ़ में कई लोगों के डूबने की आशंका है।
(ङ) में आप में श्रद्धा रखता हूँ।
(च) फूलों की एक माला नेताजी को पहनाओ।
(छ) अपराधी को मृत्युदण्ड मिला।
(ज) छात्र कक्षा में गया।
(झ) मैंने लता मंगेशकर को गाते हुए देखा।
(ज) मुझसे अनेक भूलें हुईं।

प्रश्न 22.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों का शुद्ध रूप लिखिए [2010]
(i) सेठ ज्वालाप्रसाद अच्छा महाजन थे।
(ii) स्त्री शिक्षा पर निवेदिता का विचार स्पष्ट कीजिए।
(iii) राम पुस्तक पढ़ती है।
(iv) अमित को अनुत्तीर्ण होने की आशा है। [2015]
(v) हर्षित शुद्ध गाय का दूध पीता है। [2015]
उत्तर-
(i) सेठ ज्वालाप्रसाद अच्छे महाजन थे।
(ii) स्त्री शिक्षा पर निवेदिता के विचार स्पष्ट कीजिए।
(iii) राम पुस्तक पढ़ता है।
(iv) अमित को अनुत्तीर्ण होने की आशंका है।
(v) हर्षित गाय का शुद्ध दूध पीता है।

प्रश्न 23.
निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों का शुद्ध रूप लिखिए। [2012]
(i) श्याम ने सत्यता को पहचान लिया।
(ii) मैं आपको मिलकर प्रसन्न हुआ।
(iii) बाढ़ में कई लोगों के बह जाने की आशा है।
उत्तर-
(i) श्याम ने सत्य को पहचान लिया।
(ii) मैं आपसे मिलकर प्रसन्न हुआ।
(iii) बाढ़ में कई लोगों के बह जाने की आशंका है।

प्रश्न 24. निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए- [2009]
(1) श्रीगणेश करना। [2013, 17]
(2) गढ़े मुर्दे उखाड़ना।
(3) फूला न समाना। [2013]
(4) आँख का तारा होना। [2014]
(5) रंग में भंग होना।
(6) काला अक्षर भैंस बराबर।
(7) हथेली पर सरसों जमाना।
(8) कलेजे पर साँप लोटना।
(9) बाल की खाल खींचना।
(10) तूती बोलना।
(11) दिन-रात एक करना। [2017]
(12) गज भर की छाती होना।
(13) गागर में सागर भरना। [2017]
(14) मान न मान में तेरा मेहमान। [2011]
(15) आग बबूला होना। [2013]
(16) चकमा देना। [2013]
(17) हाथ मारना। [2014]
उत्तर-
(1) श्रीगणेश करना किसी कार्य को प्रारम्भ करना।
प्रयोग-आज बिग बाजार का श्रीगणेश हुआ।

(2) गढ़े मुर्दे उखाड़ना-पुरानी बातें करना।
प्रयोग रमेश तो गढ़े मुर्दे उखाड़ता रहता है। इसके कारण झगड़े होते हैं।

(3) फूला न समाना-प्रसन्न होना।
प्रयोग-प्रथम आने पर रोहित फूला न समाया।

(4) आँख का तारा होना बहुत प्यारा होना।
प्रयोग-श्रीकृष्ण जी अपने माँ-बाप के आँख के तारे थे।

(5) रंग में भंग होना किसी काम में विघ्न पड़ना।
प्रयोग-विवाह समारोह में बारिश पड़ने के कारण लोगों के रंग में भंग पड़ गया।

(6) काला अक्षर भैंस बराबर-अनपढ़ होना।
प्रयोग काजल के लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है।

(7) हथेली पर सरसों जमाना-जल्दबाजी करना।
प्रयोग-रवीन्द्र ने सोहन से कहा, तुम तो हथेली पर सरसों जमाना चाहते हो। इस प्रकार मुझसे काम न होगा।

(8) कलेजे पर साँप लोटना-ईर्ष्या करना।
प्रयोग–मेरी लॉटरी निकलने पर रिश्तेदारों के कलेजे पर साँप लोट गया।

(9) बाल की खाल निकालना-कानून निकालना या बारीकी से जाँच-पड़ताल करना।
प्रयोग-सोहन का स्वभाव तो बाल की खाल निकालना है।

(10) तूती बोलना-धाक होना।
प्रयोग-आजकल तो शक्तिशाली लोगों की समाज में तूती बोलती है।

(11) दिन-रात एक करना कठिन परिश्रम करना।
प्रयोग-दिन-रात एक करके मैंने जिले में प्रथम स्थान पाया।

(12) गज भर की छाती होना-प्रसन्न होना।
प्रयोग-अच्छी नौकरी मिल जाने के कारण रोहित के माता-पिता की छाती गज भर की हो गयी।

(13) गागर में सागर भरना-कम शब्दों में बड़ी बात करना।
प्रयोग-बिहारी ने अपने दोहों में गागर में सागर भरा है।

(14) मान न मान मैं तेरा मेहमान-अनाधिकार चेष्टा करना।
प्रयोग कुछ लोग दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप करके इस कहावत को चरितार्थ करते हैं कि मान न मान मैं तेरा मेहमान।

(15) आग बबूला होना अत्यधिक क्रोधित होना।
प्रयोग-श्याम को देखकर महेश आग बबूला हो गया।

(16) चकमा देना-झाँसा देना।
प्रयोग-चोर पुलिस को चकमा देकर भाग गया।

(17) हाथ मारना-प्राप्त करना।
प्रयोग-सुरेश ने अपनी मेहनत के बल पर अल्प समय में ही नौकरी में उच्च पद प्राप्त करके एक बड़ा हाथ मारा है।

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प्रश्न 25.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखिए [2010]
(i) आँख लगना।
(ii) घड़ों पानी पड़ना।
(iii) अक्ल का दुश्मन।
(iv) आँख का काँटा।
उत्तर-
(i) आँख लगना सो जाना।
प्रयोग-अभी मेरी आँख लगी थी कि चोर चोरी करके सारा सामान ले गये।
(ii) घड़ों पानी पड़ना-लज्जित होना।
प्रयोग नकल करते समय पकड़े जाने पर रोहित पर घड़ों पानी पड़ गया क्योंकि सभी छात्रों ने देख लिया था।
(iii) अक्ल का दुश्मन-मूर्ख।
प्रयोग-तुम तो निरे अक्ल के दुश्मन हो, पन्द्रह हजार का टेलीविजन दस हजार में ही बेच आये।
(iv) आँख का काँटा-शत्रु। प्रयोग-विनोद अपने सौतले भाई को आँख का काँटा समझता है।

प्रश्न 26.
लोकोक्ति किसे कहते हैं? एक उदाहरण सहित लिखिए। [2014]
उत्तर-
लोक प्रचलित कथन (उक्ति) को लोकोक्ति कहते हैं। यह विशेष अर्थ व्यक्त करती है। उदाहरण-नाच न जाने आँगन टेढ़ा,न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी आदि।

प्रश्न 27.
निम्नलिखित लोकोक्तियों का अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए- [2011]
(क) भूत मरे पलीत जागे।
(ख) गुदड़ी का लाल।
(ग) आ बैल मुझे मार।
उत्तर-
(क) भूत मरे पलीत जागे-एक दुष्ट के उपरान्त अन्य दुष्ट का उत्पन्न होना।
प्रयोग–पाकिस्तान की धरती पर आतंकवाद का कहर इस प्रकार जमा जैसे भूत मरे पलीत जागे।

(ख) गुदड़ी का लाल-साधारण परिवार में असाधारण व्यक्ति।
प्रयोग-भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री गुदड़ी के लाल थे।

(ग) आ बैल मुझे मार-स्वयं ही मुसीबत मोल लेना।
प्रयोग-घर के बाहर दुश्मन घूम रहे हैं लेकिन मोहन फिर भी रात में बाहर आ गया। यह तो वही बात हुई कि आ बैल मुझे मार।

प्रश्न 28.
निम्नलिखित लोकोक्तियों का अर्थ लिखकर वाक्य प्रयोग कीजिए-[2012]
(क) थोथा चना बाजे घना।
(ख) दूर के ढोल सुहावने लगते हैं।
(ग) हाथ कंगन को आरसी क्या।
उत्तर-
(क) थोथा चना बाजे घना-अकर्मण्य बात बहुत करता है।
प्रयोग-आतंकवादियों को बढ़ावा देने वाला पाकिस्तान विश्व मंच पर आतंकवाद मुक्त विश्व की बात करता है। इसे कहते हैं थोथा चना बाजे घना।

(ख) दूर के ढोल सुहावने होते हैं दूर की वस्तु भली लगती है, असलियत का पता पास से चलता है।
प्रयोग-जी. आई.सी. के अनुशासन और उत्तम परीक्षाफल से प्रभावित होकर मैंने इसमें प्रवेश पा लिया था लेकिन यहाँ के वातावरण को देखकर यही लगता है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

(ग) हाथ कंगन को आरसी क्या प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
प्रयोग-रिश्वत लेते कैमरे पर पकड़े गये नेताजी के लिए जाँच बैठाने की क्या आवश्यकता है। यह तो हाथ कंगन को आरसी क्या वाली बात है।

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प्रश्न 29. आज्ञावाचक वाक्य किसे कहते हैं? उदाहरण सहित लिखिए। [2013]
उत्तर-
जिन वाक्यों में आज्ञा देने का भाव पाया जाता है,वे आज्ञावाचक वाक्य कहलाते हैं।
उदाहरण-
तुम विद्यालय जाओ।

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MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.1

MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.1

प्रश्न 1.
हल कीजिए 24x < 100, जब
(i) x एक प्राकृत संख्या है।
(ii) x एक पूर्णांक है।
हल:
24x < 100
24 से दोनों पक्षों में भाग करने पर
x < \(\frac{30}{-12}\) अर्थात x < \(-\frac{5}{2}\) (i) यदि x एक प्राकृत संख्या है तो हल {1, 2, 3, 4} है। (ii) यदि x एक पूर्णांक संख्या है तो हल {……. – 3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, 4}. प्रश्न 2. हल कीजिए : 12x > 30, जब
(i) x एक प्राकृत संख्या है।
(ii)x एक पूर्णांक है।
हल:
– 12x > 30
– 12 से दोनों पक्षों में भाग करने पर,
\(x<\frac{100}{24}\) अर्थात \(x<\frac{25}{6}\)
(i) यदि x प्राकृत संख्या है तो कोई हल नहीं है।
(ii) यदि x पूर्णाक संख्या है तो हल {…..-5, -4 ,-3} है।

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प्रश्न 3.
हल कीजिए : 5x – 3 < 7, जब
(i) x एक पूर्णांक है।
(ii) x एक वास्तविक संख्या है।
हल:
5x – 3 < 7
दोनों पक्षों में 3 जोड़ने पर,
5x < 10
5 से भाग देने पर .
x < \(\frac{10}{5}\) अर्थात x < 2 (i) यदि x एक पूर्णांक संख्या है तो हल {….-2, –1, 0, 1}. (ii) यदि x एक वास्तविक संख्या है तो हल x ϵ (- ∞, 2). प्रश्न 4. हल कीजिए : 3x + 8 > 2, जब
(i) x एक पूर्णांक है।
(ii) x एक वास्तविक संख्या है।
हल:
3x + 8 > 2
3x > 2 – 8 या 3x > – 6
3 से भाग करने पर
x > – \(\frac{6}{3}\) या x> – 2
(i) यदि x एक पूर्णांक संख्या है तो हल {-1, 0, 1, 2 ,….}.
(ii) यदि x एक वास्तविक संख्या है तो हल x ϵ (-2, ∞).

प्रश्न 5.
हल कीजिए : 4x + 3 < 6x + 7.
हल :
4x + 3 < 6x + 7
6x को बाएँ पक्ष में तथा 3 को दाएँ पक्ष में रखने पर,
4x – 6x < 7 – 3
या – 2x < 4 – 2 से भाग देने पर, \(x>\frac{4}{-2}\) या x > – 2
दी हुई असमिका का हल है : x ϵ (- 2, ∞).

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प्रश्न 6.
हल कीजिए :
3x – 7 > 5x – 1.
हल:
3x – 7 > 5x – 1
5x का बाएँ पक्ष में और 7 को दाएँ पक्ष मे रखने पर,
3x – 5x > – 1 + 7
– 2x > 6
– 2 से भाग देने पर
x < – 3
∴ दी हुई असमिका का हल है x ϵ (- ∞, – 3).

प्रश्न 7.
हल कीजिए : 3(x – 1) ≤ 2 (x – 3).
हल:
असमिका
3(x – 1) ≤ 2 (x – 3)
3x – 3 ≤ 2x – 6
2x को बाएँ पक्ष में और 3 को दाएँ पक्ष में रखने पर,
3x – 2x ≤ 3 – 6
या x ≤ – 3
∴ हल है : x ϵ (- ∞, – 3].

प्रश्न 8.
हल कीजिए:
3(2 –x) ≥ 2 (1 –x).
हल:
दी हुई असमिका
3(2 – x) ≥ 2 (1 – x)
6 – 3x ≥ 2 – 2x
2x को बायीं ओर तथा 6 को दायीं ओर रखने पर,
2x – 3x ≥ 2 – 6.
या – x ≥ – 4 या x ≤ 4
∴ हल है : x ϵ (- ∞, 4].

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प्रश्न 9.
हल कीजिए : x + \(\frac{x}{2}+\frac{x}{3}\) < 11
हल:
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.1 img-1

प्रश्न 10. हल कीजिए: \(\frac{x}{3}>\frac{x}{2}+1\)
हल:
दी हुई असमिका \(\frac{x}{3}>\frac{x}{2}+1\)
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.1 img-2

प्रश्न 11.
हल कीजिए: \(\frac{3(x-2)}{5} \leq \frac{5(2-x)}{3}\)
हल:
दी हुई असमिका है : \(\frac{3(x-2)}{5} \leq \frac{5(2-x)}{3}\)
दोनों ओर 15 से गुणा करने पर
9(x – 2) ≤ 5 (2 –x)
या 9x – 18 ≤ 50 – 25x
25x को बायीं ओर तथा 18 को दायीं ओर रखने पर,
9x + 25x ≤ 50 + 18
या 34x ≤ 68
या x ≤ 2
∴ दी हुई असमिका का हल है x ϵ (- ∞, 2].

प्रश्न 12 .
हल कीजिए: \(\frac{1}{2}\left(\frac{3 x}{5}+4\right) \geq \frac{1}{3}(x-6)\)
हल:
दी हुई असमिका
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.1 img-3

प्रश्न 13.
हल कीजिए :
2(2x + 3) – 10 < 6 (x – 2).
हल:
दी हुई असमिका
2(2x + 3) – 10 < 6(x – 2)
4x + 6 – 10 < 6x – 12
6x को बायीं ओर तथा — 4 को दायीं ओर रखने पर,
4x – 6x < – 12 +4
या – 2x < – 8 (- 1) से गुणा करने पर, x > 4
∴ हल है : x ϵ (4, ∞)

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प्रश्न 14.
हल कीजिए: 37 – (3x + 5) ≥ 9x – 8(x – 3).
हल:
दी हुई असमिका
37 – (3x + 5) ≥ 9x – 8(x – 3)
37 – 3x-5 ≥ 9x – 8x + 24
– 3x + 32 ≥ x + 24
x को बायीं ओर तथा 32 को दायीं ओर रखने पर
– 3x – x ≥ 24 – 32
या – 4x ≥ – 8
(- 1) से गुणा करने पर तथा 4 से भाग देने पर
x ≤ \(\frac{8}{4}\) या x ≤ 2
∴ हल है : x ϵ (- ∞, 2].

प्रश्न 15.
हल कीजिए : \(\frac{x}{4}<\frac{5 x-2}{3}-\frac{7 x-3}{5}\)
हल : दी हुई असमिका \(\frac{x}{4}<\frac{5 x-2}{3}-\frac{7 x-3}{5}\)
60 से दोनों पक्षों में गुणा करने पर ।
15x < 20(5x – 2) – 12 (7x – 3)
या 15x < 100x – 40 – 84x + 36
या 15x < 16x – 4
16x को बायीं ओर लाने पर,
15x – 16x < – 4
या – X < – 4 – 1 से गुणा करने पर x > 4
∴ हल है :
x ϵ (4, ∞)

प्रश्न 16.
हल कीजिए : \(\frac{2 x-1}{3} \geq \frac{3 x-2}{4}-\frac{2-x}{5}\)
हल:
दी हुई असमिका \(\frac{2 x-1}{3} \geq \frac{3 x-2}{4}-\frac{2-x}{5}\)
60 से गुणा करने पर,
20(2x – 1 ) ≥ 15(3x – 2) – 12(2 –x)
या 40x – 20 ≥ 45x – 30 – 24 + 12x
या 40x – 20 ≥ 57x – 54
57x को बायीं ओर तथा 20 को दायीं ओर रखने पर,
40x – 57x ≥ – 54 + 20
– 17x ≥ – 34
– 17 से भाग देने पर
x ≤ 2
∴ हल है :
x ϵ (- ∞, 2].

प्रश्न 17.
से 20 तक की असमिकाओं का हल ज्ञात कीजिए तथा उन्हें संख्या रेखा पर आलेखित कीजिए।
प्रश्न 17.
3x – 2 < 2x + 1.
हल:
दी हुई असमिका 3x – 2 < 2x + 1
2x को बायीं ओर तथा 2 को दायीं ओर रखने पर,
3x – 2x < 1 + 2
या x <3
∴ हल है :
x ϵ (- ∞, 3].
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प्रश्न 18.
5x – 3 ≥ 3x -5.
हल:
दी हुई असमिका 5x – 3 ≥ 3x – 5
3x को बायीं ओर तथा 3 को दायीं ओर रखने पर,
5x – 3x ≥ – 5 +3
या 2x ≥ – 2
2 से भाग देने पर
x ≥ – 1
∴ हल है x = [- 1, ∞).
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प्रश्न 19.
3(1 – x) < 2 (x + 4)
हल:
दी हुई असमिका
3(1 – x) < 2 (x + 4)
3 – 3x < 2x +8
2x को बायीं ओर तथा 3 को दायीं ओर रखने पर,
– 3x – 2x < 8 – 3
या – 5x < 5 – 5 से भाग देने पर x > – 1
∴ हल है :
x ϵ (- 1, ∞)
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.1 img-6

प्रश्न 20.
\(\frac{x}{2}<\frac{(5 x-2)}{3}-\frac{(7 x-3)}{5}\)
हल:
दी हुई असमिका \(\frac{x}{2}<\frac{(5 x-2)}{3}-\frac{(7 x-3)}{5}\)
30 से दोनों पक्षों में गुणा करने पर
15x < 10 (5x – 2) – 6(7x – 3)
या 15x < 50x – 20 – 42x + 18
या 15x < 8x – 2
8x को बायीं ओर रखने पर,
15x – 8x < – 2
या 7x < – 2
∴ x < – \(\frac{2}{7}\)
∴ हल है : \(\left(-\infty,-\frac{2}{7}\right)\)
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प्रश्न 21.
रवि ने पहली दो एकक परीक्षा में 70 और 75 अंक प्राप्त किए हैं। वह न्यूनतम अंक ज्ञात कीजिए, जिसे वह तीसरी एकक परीक्षा में पाकर 60 अंक का न्यूनतम औसत प्राप्त कर सके।
हल:
मान लीजिए तीसरे एकक परीक्षा में x अंक प्राप्त किए।
रवि द्वारा प्राप्त अंकों का औसत = \(\frac{70+75+x}{3}\)
MP Board Class 11th Maths Solutions Chapter 6 सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण Ex 6.1 img-8
3 से दोनों पक्षों में गुणा करने पर,
145 + x ≥ 180
या x ≥ 180 – 145
या x ≥ 35
अतः रवि को तीसरी परीक्षा में 35 से अधिक या उसके बराबर अंक प्राप्त करने हैं।

प्रश्न 22.
किसी पाठ्यक्रम में ग्रेड A पाने के लिए एक व्यक्ति को सभी पाँच परीक्षाओं (प्रत्येक 100 अंकों में से) में 90 अंक या अधिक अंक का औसत प्राप्त करना चाहिए यदि सुनीता के प्रथम चार परीक्षाओं के प्राप्तांक 87,92, 94 और 95 हों तो वह न्यूनतम अंक ज्ञात कीजिए जिसे पांचवीं परीक्षा में प्राप्त करके सुनीता उस पाठ्यक्रम में ग्रेड A पाएगी।
हल:
मान लीजिए सुनीता ने पांचवीं परीक्षा में x अंक प्राप्त किए।
पाँच परीक्षाओं के प्राप्त अंकों का औसत = \(\frac{87+92+94+95+x}{5}\)
= \(\frac{368+x}{5}\)
प्रश्नानुसार
∴ \(\frac{368+x}{5}\) ≥ 90
5 से दोनों पक्षों में गुणा करने पर
368 + x ≥ 5 x 90
या 368 + x ≥ 450
या x ≥ 450 – 368
∴ x ≥ 82
अतः सुनीता को पाँचवीं परीक्षा में 82 से अधिक या उसके बराबर अंक प्राप्त करने चाहिए।

प्रश्न 23.
10 से कम क्रमागत विषम संख्याओं के ऐसे युग्म ज्ञात कीजिए जिनके योगफल 11 से अधिक हों।
हल:
मान लीजिए x और x + 2 दो विषम परिमेय संख्याएँ हैं।
x तथा x + 2 दोनों ही 10 से कम हैं।
⇒ x < 10 और x + 2 < 10 या x < 8 दोनों का योग 11 से अधिक है। ∴ x + (x + 2) > 11
या 2x + 2 > 11 या 2x > 11 – 2
∴ 2x > 9 या x > \(\frac{9}{2}\), या x > 4 \(\frac{1}{2}\)
अर्थात् यदि x = 5 हो, तब दूसरी संख्या = x + 2 = 7
इसी प्रकार यदि x = 7, तो x + 2 = 9
∴ दूसरा युग्म (7, 9)
x = 9 नहीं हो सकता क्योंकि x + 2 = 11 > 10
अत: वांछित युग्म है (5, 7), (7, 9).

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प्रश्न 24.
क्रमागत सम संख्याओं के ऐसे युग्म ज्ञात कीजिए जिनमें से प्रत्येक 5 से बड़े हों, तथा उनका योगफल 23 से कम हो।
हल:
मान लीजिए x और x + 2 दो सम संख्याएँ हैं।
x और x + 2 दोनों ही 5 से बड़ी है।
⇒ x > 5
और x + (x + 2) < 23
∴ 2x + 2 < 23
या 2x < 23 – 2 = 21
∴ 2x < 21 या x < \(\frac{21}{2}\)
यदि x = 10, x + 2 = 12 ⇒ x + (x + 2) < 23
इसी प्रकार (6, 8), (8, 10) युग्म भी दी हुई शर्त पूरी करते हैं।
वांछित युग्म (6, 8), (8, 10), (10, 12).

प्रश्न 25.
एक त्रिभुज की सबसे बड़ी भुजा सबसे छोटी भुजा की तीन गुनी है तथा त्रिभुज की तीसरी भुजा सबसे बड़ी भुजा से 2 सेमी कम है। तीसरी भुजा की न्यूनतम लंबाई ज्ञात कीजिए जबकि त्रिभुज का परिमाप न्यूनतम 61 सेमी है।
हल:
मान लीजिए त्रिभुज की सबसे छोटी भुजा = x सेमी
सबसे बड़ी भुजा = 3x सेमी
तीसरी भुजा = 3x – 2 सेमी
प्रश्नानुसार
x + 3x + (3x – 2) ≥ 61
7x – 2 ≥ 61
7x ≥ 61 + 2 = 63
⇒ x ≥ 9
∴ सबसे छोटी भुजा 9 सेमी है।

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प्रश्न 26.
एक व्यक्ति 91 सेमी लंबे बोर्ड में से तीन लंबाईयाँ काटना चाहता है। दूसरी लंबाई सबसे छोटो लंबाई से 3 सेमी अधिक और तीसरी लंबाई सबसे छोटी लंबाई की दूनी है। सबसे छोटे बोर्ड की संभावित लंबाई क्या है, यदि तीसरा टुकड़ा दूसरे टुकड़े से कम से कम 5 सेमी अधिक लंबा हो ?
हल:
मान लीजिए कटे हुए सबसे छोटे बोर्ड की लंबाई = x सेमी.
दूसरे कटे हुए बोर्ड की लम्बाई = x + 3
तीसरे कटे हुए बोर्ड की लम्बाई = 2x सेमी
दिया है कि
x + (x + 3) + 2x ≤ 91
या 4x + 3 ≤ 91
या 4x + 3 ≤ 91 – 3
या 4x ≤ 88
x ≤ 22 …(1)
∴ यह भी दिया गया है कि 2x ≥ (x + 3) +5
2x ≥ x +8
x ≥ 8
∴ सबसे छोटे बोर्ड की लम्बाई कम से कम 8 सेमी हो और अधिक से अधिक 22 सेमी हो। …(2)

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 12 जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 12 जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया (संकलित)

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया अभ्यास-प्रश्न

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया लबूतरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सैल्यूकस कहाँ का राजा वा? वह भारत क्यों आया था?
उत्तर
सैल्यूकस सीरिया का राजा था। वह भारत, भारत भ्रमण के लिए आया था।

प्रश्न 2.
मैगस्थनीज कौन था? उसने चाणक्य से मिलने का समय कब निश्चित किया?
उत्तर
मैगस्थनीज चन्द्रगुप्त के दरबार में नियुक्त राजदूत था। वह चाणक्य का प्रशंसक था। उसने चाणक्य से मिलने का समय सायंकाल निश्चित किया।

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प्रश्न 3.
जब चन्द्रगुप्त और सैल्यूकस कुटिया में पहुँचे, तब आचार्य चाणक्य किस कार्य में व्यस्त थे?
उत्तर
जब चन्द्रगुप्त और सैल्यूकस कुटिया में पहुँचे तब आचार्य चाणक्य राजकार्य से सम्बन्धित कुछ जरूरी दस्तावेजों की जाँच कर रहे थे।

प्रश्न 4.
सैल्यूकस के चकित होने का क्या कारण था?
उत्तर
सैल्यूकस के चकित होने का कारण यह था कि इतने बड़े साम्राज्य के प्रधानमन्त्री चाणक्य किसी भव्य और विशाल भवन में नहीं, अपितु एक कुटिया में रह रहे हैं।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य चाणक्य के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
आचार्य चाणक्य का व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की अदभत विशेषताओं का भण्डार है। उनका व्यक्तित्व अनोखे गुणों से भरा हुआ था। वे एक साथ प्रतिभाशाली, चरित्रवान, सुस्पष्ट, दूरदर्शी, कुशल राजनीतिज्ञ, राष्ट्रभक्त, त्यागशील, ईमानदार, बुद्धिमान और उदार प्रकृति के थे। उनमें किसी प्रकार का न तो अभिमान था और न ही पद-लोलुपता थी। वे कर्तव्यपरायण और अतिथि सम्मानकर्ता थे। इस प्रकार आचार्य चाणक्य की अद्भुत विशेषताओं से दूसरे देश के शासक भी अधिक प्रभावित थे।

प्रश्न 2.
सैल्यूकस ने कुटिया में क्या-क्या देखा? ।
उत्तर
सैल्यूकस ने कुटिया में निम्नलिखित समानों को देखा कटिया के अन्दर एक ओर जल का घड़ा रखा था। दूसरे कोने में उपलों और समिधाओं का ढेर था। एक चटाई बिछी थी। नमक आदि पीसने के लिए सील-बट्टा भी रखा था। एक बाँस लटका हुआ था जिस पर कपड़े रखे हुए थे। एक चौकी, जिस पर पढ़ने-लिखने की सामग्री थी। पास ही दो दीपाधार भी रखे हुए थे। उस समय चाणक्य गम्भीर और एकाग्रचित्त विचार मग्न होकर लेखन के काम में व्यस्त थे।

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प्रश्न 3.
एक दीपक बुझाकर दूसरे दीपक को जलाने के पीछे चाणक्य का क्या तर्क था?
उत्तर
एक दीपक बुझाकर दूसरे दीपक को जलाने के पीछे चाणक्य का तर्क था-पहले दीपक में राजकोष के पैसों से तेल डाला गया था। इसलिए उससे राजकार्य से सम्बन्धित जरूरी दस्तावेजों की जाँच की जा रही थी। जाँच का काम समाप्त होने पर उसे बुझा दिया गया। दूसरा दीपक निजी पैसे से खरीदा हुआ जल रहा है। इससे होने वाली बात भी निजी है।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया भाषा-अध्ययन

(क) नीचे लिखे अपठित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए:
स्वार्थ और परणाई मानव की दो प्रवृत्तियाँ हैं। हम अधिकतर सभी कार्य अपने लिए करते हैं ‘पर’ के लिए सर्वस्व बलिदान करना ही सच्ची मानक्ता है। यही धर्म है, यही पुण्य है। इसे ही परोपकार कहते हैं। प्रकृति हमें निरन्तर परोपकार का सन्देश देती है। नदी दूसरों के लिए बहती है। वृत मनुष्यों को छाया तथा फल देने के लिए ही घूप, आँधी, वर्षा और तूफानों के जल के रूप में अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं।

प्रश्न 1. सच्ची मानवता क्या है?
प्रश्न 2. वृक्ष हमें परोपकार का सन्देश कैसे देते हैं?
प्रश्न 3. मनुष्य की कौन-सी दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं?
प्रश्न 4. गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) वर्तनी सुधारियेचरीत्रवान, नियूक्त, आर्चाय, कुटीया, विशीष्ट, आशिर्वाद, सामराज्य, चटायी, चाडक्य।
उत्तर
1. परार्थ काम करना ही सच्ची मानवता है।
2. वृक्ष हमें छाया तथा फल देकर परोकार का सन्देश देते हैं।
3. स्वार्थ और परमार्थ मनुष्य की दो प्रमुख प्रवृत्तियों हैं।
4. शीर्षक-‘परोपकार’।
(ख) चरित्रवान्, नियुक्त, आचार्य, कुटिया, विशिष्ट, आशीर्वाद, साम्राज्य, चटाई, चाणक्य।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया योग्यता-विस्तार

(क) आचार्य चाणक्य की तरह प्रतिभाशाली और सूझबूझ रखने वाले राष्ट्र-भक्तों के बारे में साथियों से जानकारी प्राप्त कीजिए और उनके चित्रों को एकत्रित करिए। पुस्तकालय में जाकर जीवन-मूल्यों पर आधारित कहानियाँ पढ़िए और स्वयं इस प्रकार की कहानी लिखिए। चाणक्य से सम्बन्धित अन्य कहानियाँ जानिए और लिखिए।
‘सैल्यूकस की जन्म-भूमि अर्वात् ग्रीस के बारे में जानकारी एकत्रित कर लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य चाणक्य कौन ?
उत्तर
आचार्य चाणक्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री थे। वे महान प्रतिभाशाली, दूरदर्शी और कुशल राजनीतिज्ञ थे।

प्रश्न 2.
सैल्यूकस कौन था? वह आचार्य चाणक्य से क्यों मिलने गया?
उत्तर
सैल्यूकस सिरिया का राजा था। उसने आचार्य चाणक्य की प्रशंसा सुन रखी थी। इसलिए वह उनसे मिलने गया।

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प्रश्न 3.
सम्राट चन्द्रगुप्त सैल्यूकस को लेकर कहाँ गये?
उत्तर
सम्राट चन्द्रगुप्त सैल्यूकस को लेकर एक पुरानी टूटी-फूटी कुटिया में रह रहे आचार्य चाणक्य के पास गये।

प्रश्न 4.
राजकोष के तेल से जलने वाले दीपक को बुझाकर निजी कोष के तेल से दूसरा दीपक जलाने से आचार्य चाणक्य के किस दृष्टिकोण का पता चलता है?
उत्तर
राजकोष के तेल से जलने वाले दीपक को बुझाकर निजी कोष के तेल से दूसरा दीपक जलाने से आचार्य चाणक्य की राष्ट्रभक्ति और ईमानदारी के दृष्टिकोण का पता चलता है।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य चाणक्य ने सैल्यूकस की शंका का समाधान करते हुए क्या कहा?
उत्तर
आचार्य चाणक्य ने सैल्यूकस की शंका का समाधान करते हुए कहा-“दूसरे दीपक को जलाने और पहले दीपक को बुझाने के पीछे कोई सनक या उन्माद की भावना काम नहीं कर रही थी। सच्चाई तो यह है कि जब आप यहाँ आये तो मैं राजकार्य से सम्बन्धित कुछ जरूरी दस्तावेजों की जाँच कर रहा था। उस समय जो दीपक जल रहा था उसमें राजकोष के पैसों से तेल डाला गया था, इस समय आपसे बातचीत करेंगे, वह हमारी निजी होगी। इस कारण मैंने राजकीय दीपक को बुझाकर अपने कमाये हुए धन से खरीदा हुआ दीपक जलाया है। ऐसा करके मैंने कोई विचित्र काम नहीं किया है।”

प्रश्न 2.
इस प्रेरक प्रसंग से क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर
इस प्रेरक प्रसंग से हमें कई प्रकार की प्रेरणा मिलती है

  1. हमें अपने कर्तव्य का पालन सच्चाई से करना चाहिए।
  2. हमें अपने निजी स्वार्थ को देश और समाज के लिए न्यौछावर कर देना चाहिए।
  3. अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और भक्ति की भावना को प्रकट करते रहना चाहिए।
  4. हमें अपने पद और कार्यभार के दायित्व को सच्ची भावना से निभाना चाहिए।
  5. हमें पद-प्रतिष्ठा पाकर अहंकार नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 3.
‘जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया’ प्रेरक प्रसंग के मुख्य भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत प्रेरक प्रसंग का आधार एक ऐतिहासिक घटना है। इस घटना को आधार बनाकर यह दिखलाने का प्रयास किया गया है कि जहाँ एक ओर ‘त्याग’ . व्यक्ति के जीवन को उदात्त बनाता है। वहीं दूसरी ओर सामाजिक जीवन के एक विशिष्ट मूल्य के रूप में व्यवस्थाओं को लोकहितकारी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करता है। राजनीति और त्याग पर आधारित इस प्रेरक प्रसंग के माध्यम से महान सम्राट चन्द्रगुप्त के महामन्त्री चाणक्य की राष्ट्र-भक्ति को चित्रित किया गया है। राज्य के सभी प्रकार के सुख-वैभव को छोड़कर महामन्त्री चाणक्य का झोपड़ी। में रहना, के उल्लेख से जहाँ उनके अद्भुत त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। वहीं सैल्यूकस की निजी भेंट के समय राजकोष के तेल से जलने वाले दीपक को बुझाकर निजी कोष के तेल से दूसरा दीपक प्रज्ज्वलित करने के उल्लेख के द्वारा रनके राष्ट्रीय संचेतक एवं राजनीति के भोगवादी दृष्टिकोण के निषेध की भूमिका को भी बड़े अनूठे ढंग से सामने लाने का प्रयास किया गया है प्रस्तुत करता है।

जब चाणक्य ने दूसरा दीपक जलाया प्रेरक प्रसंग का सारांश

प्रश्न
‘जब चाणक्य ने दीपक जलाया’ प्रेरक प्रसंग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
प्रस्तुत प्रसंग प्रेरक रूप में है। सम्राट चन्द्रगुप्त के महामन्त्री चाणक्य की ईमानदारी को इस प्रसंग में लाकर शिक्षाप्रद बनाने का प्रयास किया गया है। इस प्रेरक प्रसंग का सारांश इस प्रकार है सम्राट चन्द्रगुप्त के महामन्त्री आचार्य चाणक्य अत्यधिक प्रतिभाशाली, दूरदर्शी, कुशल राजनीतिक और महान चरित्रवान् थे। उनकी इस अद्भूत विशेषता को सुनकर सीरिया का राजा सिल्यूकस ने भारत आने पर उनसे मिलने की इच्छा सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में नियुक्त राजदूत मैगस्थनीज से प्रकट की। चाणक्य से मिलने के लिए सूर्यास्त के बाद का समय निश्चित किया गया। एक विशाल साम्राज्य के महामन्त्री को एक पुरानी कुटिया में देखकर सिल्यूकस हैरान हो गये। चन्द्रगुप्त-सिल्यूकस ने उस कुटिया के भीतर जाकर देखा कि एक ओर पानी का घड़ा है तो दूसरी ओर उपले, सिल बट्टा, बाँस पर कपड़े और चौकी पर पढ़ने-लिखने की सामग्री थी।

पास में दो दीपाधार थे। उस समय चाणक्य गम्भीर मुद्रा में कुछ लिख रहे थे। लिखने का काम समाप्त करके उन्होंने चन्द्रगुप्त को आशीर्वाद और सिल्यूकस को सम्मान देते हुए दीपक बुझा दिया और दूसरा दीपक जला दिया। इसे देखकर सिल्यूकस हैरान हो गया। पूछने पर चाणक्य ने कहा कि जब वे वहाँ आये तो वे राजकार्य से सम्बन्धित जरूरी दस्तावेजों की जाँच कर रहे थे। उस समय जलते हुए उस दीपक में राजकोष के पैसों से तेल डाला गया था। इस समय उन दोनों की बात उनकी निजी होगी। इसलिए उन्होंने राजकीय दीपक को बुझाकर अपने कमाए हुए धन से खरीदा हुआ दीपक जलाया है। यह सुनकर सिल्यूकस और हैरान होकर सोचने लगे कि शायद ही ऐसे महान आदर्श महामन्त्री और किसी देश या राज्य में होगा।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 जागरण गीत

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 11 जागरण गीत (सोहनलाल द्विवेदी)

जागरण गीत अभ्यास-प्रश्न

जागरण गीत लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि गीत गाकर ही लोगों को क्यों जगाना चाहता है?
उत्तर
कवि गीत गाकर ही लोगों को जगाना चाहता है। यह इसलिए कि साधारण रूप से कही गई बातों की अपेक्षा गीत के माध्यम से कही बातें अधिक प्रभावशाली होती हैं।

प्रश्न 2.
इस गीत में किस रास्ते को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है?
उत्तर
इस गीत में उदयाचल को सर्वश्रेष्ठ रास्ता बताया गया है।

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प्रश्न 3.
कवि किस रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए आतुर है?
उत्तर
कवि प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए आतुर है।

प्रश्न 4.
संकीर्णताएँ तोड़ने के लिए कवि क्या करना चाहता है?
उत्तर
संकीर्णताएँ तोड़ने के लिए कवि सोए हुए दृढ़ भावों को जगाना चाहता है।

जागरण गीत दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि आकाश में उड़ने के लिए क्यों रोक रहा है? कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कवि आकाश में उड़ने के लिए रोक रहा है। यह इसलिए कि इससे जीवन की वास्तविकता का ज्ञान नहीं हो पाता है। फलस्वरूप जीवन दुखद और निरर्थक बना रहता है।

प्रश्न 2.
शूल को फूल बनाने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर
शूल को फूल बनाने से कवि का आशय है-जीवन में आने वाली कठिनाइयों, रुकावटों और कष्टों को अपनी क्षमता, शक्ति आर बुद्धिबल से दूर करके जीवन को हर प्रकार से सुखद और सुन्दर बना लेना। इसके द्वारा कवि ने आलसी और निराश लोगों को प्रेरित और उत्साहित करना चाहा है।

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प्रश्न 3.
‘अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूँगा। अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ।’ उपरोक्त पंक्तियों का भावार्य लिखिए।
उत्तर
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा। अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ।’ उपरोक्त पंक्तियों के द्वारा कवि ने यह भाव दर्शाना चाहा है कि गहरी नींद में पड़े रहना, जीवन की सच्चाई को नकारना है। इस प्रकार का जीवन डूबते हुए सूरज के समान है, जिसमें न कोई आशा, विश्वास, आकर्षण, समुल्लास आदि जीवन-स्वरूप दिखाई देते हैं। इस प्रकार का जीवन न स्वयं के लिए अपितु दूसरे के लिए भी दुखद और कष्टकर होता है। इसलिए इस प्रकार के जीवन का परित्याग करके अरुण उदयाचल अर्थात् प्रगति के पथ पर बढ़ने के लिए हर प्रकार से कदम बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 4.
विपथ होकर मुड़ने का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विपथ होकर मुड़ने का आशय है-सन्मार्ग से हटकर कुमार्ग पर चलना। दूसरे शब्दों में अच्छाई और सुन्दरता को छोड़कर बुराई और कुरूपता को अपनाना।

जागरण गीत भाषा-अध्ययन/काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं उन्हें दूर कर पुनः लिखिए।
अरूण, सीस, सूल, मंझदार, श्रृंखलाएँ, पातवार, पृगति, संकीणताएँ, विपथ, झनझनाये।
उत्तर
अशुद्धियाँ – शुद्धियाँ
अरूण – अरुण
शीस – शीश
सूल – शूल
मंझदार – मैंनधार
श्रृंखलाएँ – श्रृंखलाएँ
पातवार – पतवार
पृगति – प्रगति
संकीणताएँ – संकीर्णताएँ
विपथ – बिपथ
झनझनाये – झनझनाए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखकर पुनः वाक्य लिखिए
1. अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूंगा।
2. फूल मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।
3. विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा।
4. मैं किनारे पर तुम्हें बकने न दूंगा।
5. सिंधु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।
उत्तर

  1. अब तुम्हें आसमान में उड़ने न दूंगा।
  2. पुष्प मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।
  3. कुपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा।
  4. मैं तट पर तुम्हें थकने न दूँगा।
  5. समुद्र बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों को पढ़िए और पाठ में आए शब्दों में से स्वर मैत्री समझकर लिखिए
अस्ताचल – उदयाचल
साधना – ……………..
मैंनदार – ………………..
उठाए – ……………….
गति – ………………..
शूल – ……………
उत्तर
अस्ताचल – उदयाचल
साधना – कल्पना
मँझदार – पतवार
उठाए – झनझजाए
गति – गति
शूल – फूल

जागरण गीत योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
जीवन में प्रगति तभी सम्भव है जब हम निराशा के क्षणों में तथा विरोधी परिस्थितियों में संघर्षरत रहकर आशावादी दृष्टिकोण रखकर आगे बढ़ें। इस सन्दर्भ की अन्य कविताएँ संकलित कीजिए तवा विभिन्न अवसरों पर अपने मित्रों/साथियों को सुलेख में लिखकर भेंट करें।

प्रश्न 2.
कक्षा में एक डिब्बा रखिए। अपने साथियों के किस गुण से किस परिस्थिति से आप प्रभावित हुए एक कागज पर लिखकर डिब्बे में डालिए। कुछ दिनों के उपरांत अपने शिक्षक एवं कक्षा के सम्मुख उन्हें खोलकर सबको सुनाएँ।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

जागरण गीत परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गहरी नींद में सोने वाले अब सो न सकेंगे। क्यों?
उत्तर
गहरी नींद में सोने वाले अब सो न सकेंगे। यह इसलिए कि कवि उन्हें गीत गाकर जगाने आ रहा है।

प्रश्न 2.
कवि अस्ताचल जाने के बजाय कहा जाने की बात कह रहा है? उत्तर-कवि अस्ताचल जाने के बजाय उदयाचल जाने की बात कह रहा है। प्रश्न 3. कवि के अनुसार क्या दुख-सुख है?
उत्तर
कवि के अनुसार नींद में सपने संजोना दुख है और इससे हटकर परिश्रम पूर्वक जीवन जीना सुख है।

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प्रश्न 4.
मैंनधार से किनारे पर आने के लिए कवि ने क्या कहा है?
उत्तर
मँझधार से किनारे पर आने के लिए कवि ने कहा है कि मैंझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। हिम्मत करके विश्वासपूर्वक हाथ में पतवार लेकर किनारे की ओर आने का लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।

जागरण गीत दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि गीत किसके लिए गा रहा है?
उत्तर
कवि गहरी नींद में सोने वालों, अतल अस्ताचल की ओर जाने वालों, कल्पना के पंख लगाकर आकाश में उड़ने वालों, जीवन को काँटा समझने वालों, जीवन के मँझधार में पड़कर घबड़ाने और थकने वालों, मन में तुच्छ विचारों को रखने वालों और विपथ होकर जीवन की सच्चाई को नकारने वालों के लिए गीत गा रहा है।

प्रश्न 2.
‘आ रहा हूँ। ऐसा कवि ने बार-बार क्यों कहा है?
उत्तर
‘आ रहा हूँ।’ ऐसा कवि ने बार-बार कहा है। यह इसलिए कि इसके द्वारा वह अपना जागरण सन्देश देना चाहा है। उसने अपना यह जागरण सन्देश उन लोगों को ही देना चाहा है, जो जीवन की सच्चाई को नकारते रहे हैं और संकीर्ण मनोवृत्तियों जैसे-आलस्य, निराशा आदि को स्वीकारते रहे हैं। कवि इस प्रकार की संकीर्ण मनोवृत्तियों को त्यागकर कर्मरत होते हुए जीवन की वास्तविकता को स्वीकारने के लिए ही बार-बार ‘आ रहा हूँ। कहकर आत्मीयता प्रकट करना चाहता है।

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प्रश्न 3.
‘जागरण गीत’ का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री सोहनलाल द्विवेदी-विरचित कविता ‘जागरण गीत’ एक प्रेरक कविता है। इस गीत के द्वारा द्विवेदी जी ने बड़े ही नपे-तुले शब्दों में जीवन की सार्थकता को बतलाने का प्रयास किया है। द्विवेदी जी इस जागरण गीत के माध्यम से जीवन की वास्तविकता का चित्रण किया है। उन्होंने यह बतलाना चाहा है कि जीवन में आलस्य, निराशा तथा संकीर्ण मनोवृत्ति को नकारते हुए मनोवृत्ति कर्मरत जीवन को ही प्रगति का मूलमंत्र बताया है। इस प्रकार उन्होंने पुराने मिथक तोड़ते हुए नव-जीवन के संचार का सन्देश इस गीत माध्यम से दिया है।

जागरण गीत कवि-परिचय

प्रश्न
श्री सोहनलाल द्विवेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परचिय-श्री सोहनलाल द्विवेदी का राष्ट्रीय विचारधारा के कवियों में प्रमुख स्थान है। उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता का अधिक स्वर सुनाई पड़ता है। उनका जन्म सन् 1905 ई. में हुआ था। उन्होंने छोटी-सी आयु में ही काव्य-रचना आरम्भ किया, जो क्रमशः देश-प्रेम और भक्ति के स्वर से गुंजित होता गया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय विचारधारा का प्रवाह है, तो गाँधीवादी चिन्तन और दृष्टिकोण भी है।

रचनाएँ-द्विवेजी जी की निम्नलिखत-रचनाएँ हैं-भैरवी-पूजा, ‘गीत’, ‘सेवाग्राम’, ‘दूध बतासा’, ‘चेतना’,’बाल भारती’ आदि।

भाषा-शैली-द्विवेदी जी की भाषा सहज और ऐसे प्रचलित शब्दों की है, जिसमें विविधता और अनेकरूपता है। तत्सम शब्दों की अधिकता है। जिसकी सहजता के लिए तभव और देशज शब्द बड़े ही उपयुक्त और सटीक रूप में प्रस्तुत हुए हैं। कहीं-कहीं मुहावरों-कहावतों को प्रयुक्त किया गया है। उनसे भाषा में और सजीवता आ गई है। बोधगम्यता और प्रवाहमयता उनकी शैली की पहली विशेषता है।

महत्त्व-द्विवेदी जी भारतीय संस्कृति को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के प्रबल समर्थक थे चूँकि गाँधी की विचारधारा से वे पूरी तरह प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने उसका न केवल समर्थन किया, अपितु उसे अपनी रचनाओं के माध्यम से जन-जन तक प्रेरित भी किया। गाँधीवादी विचारधारा में आस्था रखने के कारण उनकी रचनाओं में प्रेम, अहिंसा और समता के भाव दिखाई देते हैं। इस प्रकार वे अपने विशिष्ट योगदानों के लिए सदैव याद किए जाते रहेंगे।

जागरण गीत कविता का सारांश

प्रश्न
सोहन लात द्विवेदी विरचित कविता ‘जागरण गीत’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री सोहनलाल द्विवेदी-विरचित कविता ‘जागरण गीत’ एक भाववर्द्धक और सन्देशवाहक कविता है। इसमें कवि ने यथार्थ जीवन जीने का सन्देश दिया है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवि गहरी नींद में सोने वालों से कह रहा है कि वह गीत गाकर उसे जगाने के लिए आ रहा है। वह अब नींद की गहराई से ऊपर निकालकर उसे आकर्षक उदयाचल की तरह उत्साह प्रदान करने का जागरण गीत गा रहा है। कवि गहरी नींद में सोने वाले को फटकारते हुए कह रहा है कि वह आज तक नींद में पड़े-पड़े मीठी-मीठी कल्पना का उड़ान भरता रहा है। परिश्रम करने से कतराता रहा है।

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लेकिन वह ऐसा नहीं कर पायेगा। ऐसा इसलिए कि वह अपने जागरण गीत से उसे यथार्थ जमीन पर ला देगा। उसमें यह चेतना ला देगा कि नींद में सपने देखना सुखदायक नहीं है। उसके दुःखों को सुखों में वह अपने जागरण गीत से फूल में बदल देगा। गहरी नींद में सोने वाले को कवि की सीख है कि उसे जीवन के दुखों के मझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। ऐसा इसलिए कि वह अपने जागरण गीत से उसे पार लगा देगा। इसलिए उसे अपने मन में उठने वाली छोटी-छोटी बातों को भूल जाना चाहिए। उसे यह विश्वास होना चाहिए कि वह अपने जागरण गीत से उसकी हीनता को समाप्त कर देगा। यह सोच-समझकर अपने जीवन-पथ पर निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। वह अपने जागरण गीत से उसे उसके प्रगति के पथ से पीछे नहीं मुड़ने देगा।

जागरण गीत संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पद की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौन्दर्य व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे,
गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूँ।
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा,
अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ॥

कल्पना में आज तक उड़ते रहे तुम,
साधना से सिहरकर मुड़ते रहे तुम।
अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूँगा,
आज धरती पर बसाने आ रहा हूँ॥

शब्दार्च-अतल-गहराई। अस्ताचल-पश्चिम का वह कल्पित पर्वत जिसके पीछे सूर्य का अस्त होना माना जाता है। उदयाचल-पूर्व का वह कल्पित पर्वत जहाँ से सूर्य उदित होता है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासन्ती’ हिन्दी सामान्य में संकलित तथा श्री सोहनलाल द्विवेदी विरचित कविता ‘जागरण गीत’ से है। इसमें कवि ने आलसी मनुष्यों को सावधान करते हुए कहा है कि

व्याख्या-अब मैं तुम्हें गहरी नींद में नहीं सोने दूंगा। मैं तुम्हें जगाने के लिए जागरण गीत तुम्हें सुनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ। अस्ताचल की गहराई अर्थात् जीवन की बर्बादी की ओर तुम्हें जाने से रोकने के लिए मैं आकर्षक उदयाचल को सजाने के लिए अर्थात् तुम्हारे जीवन को आनन्दित बनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ। तुम्हें अपने-आपके विषय में यह अच्छी तरह से जानकारी होनी चाहिए कि तुम आज तक कल्पना की ऊँची उड़ान उड़ते रहे हो। परिश्रम से मुँह मोड़ते रहे हो। लेकिन अब मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगा। अब तो मैं आकाश की उड़ान से नीचे धरती पर लाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हैं। दूसरे शब्दों में तम्हें जीवन की वास्तविकता बतलाने-समझाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. कवि का जागरण-सन्देश भाववर्द्धक है।
  2. शब्द-चयन लाक्षणिक है।
  3. तत्सम शब्दों एवं तदभव शब्दों के प्रयोग सटीक हैं।
  4. शैली उपदेशात्मक-भावात्मक है।
  5. वीर रस का संचार है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौन्दर्य लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य काव्यांग के स्वरूपों से पष्ट है। अनप्रास अलंकार की छटा (गीत गाकार व अतल अस्ताचल) इस पद्यांश में जहाँ है, वहीं मुहावरेदार शैली (गहरी नींद में सोना, आकाश में उड़ना और धरती पर बसाना) का प्रयोग आकर्षक है। वीर रस से यह अंश अधिक गतिशील होकर ओजपूर्ण बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौन्दर्य सरस और सहज शब्दों का है गहरी नींद में गीत गाकर जगाने का भाव न केवल अनूठा है अपित आत्मीयता से परिपूर्ण है।
गहरी नींद की सच्चाई को विश्वसनीयता के साथ बतलाने का ढंग रोचक होने के । साथ प्रेरक भी है। इससे कथन की सफलता को नकारा नहीं जा सकता है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कवि गीत गाकर किसे जगाना चाहता है?
(ii) आकाश में उड़ने के लिए कवि क्यों मना करता है?
उत्तर
(i) कवि गीत गाकर गहरी नींद में सोने वाले को जगाना चाहता है।
(ii) आकाश में उड़ने के लिए कवि मना करता है। यह इसलिए कि इससे जीवन की निरर्थकता सिद्ध होती है।

2. सुख नहीं यह, नींद में सपने संजोना,
दुख नहीं यह, शीश पर गुरू भार ढोना।
शूल तुम जिसको समझते वे अभी तक,
फूल में उसको बनाने आ रहा हूँ।
देखकर मँझधार को घबरा न जाना,
हाथ ले पतवार को घबरा न जाना।
मैं किनारे पर तुम्हें चकने न दूंगा,
पार में तुमको लगाने आ रहा हूँ।

शब्दार्थ-गुरूभार-भारीभार। शूल-काँटा (कठिनाई)। मझधार-बीच धारा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इस पद्यांश में कवि ने कायर और आलसी मनुष्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहा है कि

व्याख्या-हे आलसी, कायर मनुष्य! तुम्हें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि गहरी नींद में पड़े रहना किसी प्रकार से सुखद नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह हर प्रकार से दुखद और हानिकर ही होगा। इस प्रकार दुःखद होगा कि यह सिर का एक बहुत बड़ा बोझ बन जायेगा। उसे ढो पाना निश्चय ही असम्भव होगा। अब तक तुमने जिसे फूल अर्थात् जीवन की कठिनता समझते आ रहे हो। उसे ही मैं फूल बनाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

कवि का पुनः गहरी नींद में सोने वाले अर्थात् जीवन-संघर्ष से भागने वाले मनुष्य को समुत्साहित करते हुए कहना है कि तुम स्वयं को जीवन-सागर के मँझधार में पाकर घबड़ाओ नहीं, अपितु धैर्य और हिम्मत से काम लो। जीवन-सागर के मँझधार से निकलकर किनारे पर आने के लिए तुम धैर्य रूपी पतवार को अपने हाथ में संभाल लो। इस प्रकार जब तुम साहस करोगे तो मैं तुम्हें किनारे पर आने तक उत्साहित करते हुए किसी प्रकार से निराश नहीं होने दूंगा। इस प्रकार मैं तुम्हें तुम्हारे जीवन-सागर से पार लगाने के लिए ही तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. वीर रस का प्रवाह है।
  2. तुकान्त शब्दावली है।
  3. शैली उपदेशात्मक है।
  4. ‘नींद में सपने संजोना’, ‘फूल बनाना’, हाथ में पतवार लेना और पार लगाना मुहावरों के सटीक और सार्थक प्रयोग हैं।

1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पयांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाक्-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश को काव्य:विधान-स्वरूप शब्द-भाव-योजना से निखारने का प्रयास प्रशंसनीय कहा जा सकता है। ‘घबरा न जाना’ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से अलंकृत यह पद्यांश कई मुहावरों के एकजुट आने से अधिक भावपूर्ण होकर सार्थकता में बदल गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना अपनी प्रभावमयता के फलस्वरूप रोचक और आकर्षक है। निराश और जीवन-संघर्ष के सामने घुटना टेकने वालों को सत्प्रेरित करने के विविध प्रयास प्रभावशाली रूप में हैं।

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2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) नींद में सपने संजोना क्यों नहीं सुखद है?
(ii) मँझधार में पड़ने पर क्या नहीं करना चाहिए और क्या करना चाहिए?
उत्तर-
(i) नींद में सपने संजोना सुखद नहीं है। यह इसलिए कि इससे दुखों का बोझ कम न होकर बहुत भारी हो जाता है। फिर उसे ढोना असम्भव-सा हो जाता है।
(ii) मँझधार में पड़ने पर घबड़ाना नहीं चाहिए। हाथ में पतवार लेकर किनारे पर आने के लिए पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए।

3. तोड़ दो मन में कसी सब शृंखलाएँ
तोड़ दो मन में बसी संकीर्णताएँ।
बिन्दु बनकर मैं तुम्हें ढलने न दूंगा
सिन्धु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ॥
तुम उठो, धरती उठे, नभ शिर उठाए,
तुम चलो गति में नई गति झनझनाए।
विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा,
प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ॥

शब्दार्व-संकीर्णताएँ-तुच्छ विचार । श्रृंखलाएँ-कड़ियाँ। नभ-आकाश । शिर-मस्तक, सिर। विपथ-बुरा रास्ता। प्रगति-उन्नति।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने आलसी और निराश व्यक्ति को समुत्साहित करते हुए कहा है कि

व्याख्या-तुम अपने मन को हीन करने वाली विचारों की कड़ियों को खण्ड-खण्ड कर डालो। इसी प्रकार तुम अपने अन्दर के तुच्छ विचारों और हीन भावों का परित्याग कर दो। तुम्हें स्वयं को कम न समझते हुए समुद्र की तरह विशाल और असीमित शक्ति से भरपूर समझना चाहिए। अगर तुम ऐसा नहीं समझते हो तो मैं तुम्हें ऐसा समझने के भावों को तुम्हारे अन्दर से जगाऊँगा।

इस प्रकार तुम्हें एक बिन्दु के समान जीवन जीने की स्थिति में नहीं रहने देगा। मैं तो तुम्हें समुद्र की तरह जीने देने के लिए तुम्हारे अन्दर सोई हुई भावनाओं को जगाने के लिए तुम्हारे ही पास आ रहा हूँ। कवि का पुनः जीवन में हारे हुए और निराश व्यक्ति को समुत्साहित करते हुए कहना है कि तुम अब अपनी गहरी नींद से जग जाओ। तुम्हारी जागृति और चेतना से इस संसार में जागृति और चेतना आ जाएगी। सारा आसमान अपना मस्तक ऊंचा कर लेगा। तुम्हारे गतिशील होने से सब ओर गतिशीलता आ जाएगी। तुम्हें विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के उद्देश्य से मैं तुम्हारे जीवन में हारने नहीं दूंगा। इस प्रकार मैं तुम्हें विकास के रास्ते पर निरंतर बढ़ाने के उद्देश्य से तुम्हारे पास ही आ रहा हूँ।

विशेष-

  1. भाषा में ओज और गति है।
  2. मुहावरों के प्रयोग सटीक हैं।
  3. शब्द-चयन प्रचलित रूप में है।
  4. वीर रस का प्रवाह है।

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1. पद्यांश पर आधारित काव्य-सौन्दर्य सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-स्वरूप प्रचलित तत्सम शब्दावली से परिपुष्ट है। उसे रोचक और आकर्षक बनाने के लिए तुकान्त शब्दावली की योजना ने लय
और संगीत को प्रस्तुत करके भाववर्द्धक बना दिया है। वीर रस के प्रवाह-संचार से यह पद्यांश प्रेरक रूप में है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौन्दर्य वीरता के भावों से प्रेरक रूप में है। निराश मनों को वीर रस से संचारित करने का प्रयास प्रशंसनीय है। भाव और अर्थ का सुन्दर मेल है।

2. पद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘शृंखलाओं’ से कवि का क्या आशय है?
(ii) ‘विपव’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) शृंखलाओं से कवि का आशय है हीन भावनाएँ।
(ii) ‘विपथ’ से कवि का तात्पर्य है-कुपथ। सन्मार्ग को छोड़कर दुखद रास्ते पर चलना।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 10 न्यायमंत्री

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 10 न्यायमंत्री (सुदर्शन)

न्यायमंत्री अभ्यास प्रश्न

न्यायमंत्री लघुत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशुपाल के घर आने वाला अतिथि कौन था? उसकी बातों से शिशुपाल क्यों नाराज हो गये?
उत्तर
शिशुपाल के घर आने वाला अतिथि एक परदेशी था। उसकी बातों से शिशुपाल नाराज हो गए, क्योंकि उसने उनके पुत्र को सेवक कहा था।

प्रश्न 2.
‘गोबर में फूल खिला हुआ है।’ यह वाक्य किसके लिए कहा गया है और क्यों ?
उत्तर
‘गोबर में फूल खिला हुआ है।’ यह वाक्य उस परदेशी अतिथि द्वारा शिशुपाल के लिए कहा गया है। यह इसलिए कि उसके युक्तियुक्त और शासन पद्धति का इतना विशाल ज्ञान उस छोटे-से गाँव के ऐसे व्यक्ति में होने की उसने कल्पना भी नहीं की थी।

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प्रश्न 3.
शिशुपाल महाराज अशोक के दरबार में जाने से क्यों घबरा रहे थे?
उत्तर
शिशुपाल महाराज अशोक के दरबार में जाने से घबरा रहे थे। यह इसलिए कि उनके मन में यह आशंका हो रही थी कि उनके शत्रओं ने महाराज से कोई शिकायत कर दी है। उन्हें हो सकता है कि प्राणदंड मिल जाए।

प्रश्न 4.
न्यायमंत्री को प्रहरी के हत्यारे का पता कैसे चला?
उत्तर
न्यायमंत्री को प्रहरी के हत्यारे का पता एक स्त्री के द्वारा गुप्त रूप से चला।

प्रश्न 5.
न्यायमंत्री ने महाराज को दंड किस तरह दिया?
उत्तर
न्यायमंत्री ने महाराज की सोने की मुर्ति को फाँसी पर लटकवाया और उनको चेतावनी देकर छोड़ दिया। इस प्रकार न्यायमंत्री ने महाराज को दंड दिया।

न्यायमंत्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“शिशुपाल का न्याय अंपा और बहरा है।’ यह उक्ति किन संदर्भो में कही गई है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शिशुपाल का न्याय अंधा और बहरा है। यह उक्ति उन संदर्भो में कही गई है कि शिशुपाल ने न्यायमंत्री के अधिकार से पूरे पाटलीपुत्र नगर में न्याय और सप्रबंध की धूम मचा दी। उन्होंने चोर-डाकुओं को इस प्रकार वश में कर लिया था, जिस प्रकार बीन बजाकर सपेरा साँप को वश में कर लेता है। उन दिनों लोगबाग दरवाजे खुले छोड़ देते थे, फिर भी किसी की हानि नहीं होती थी। इस प्रकार शिशपाल का न्याय अंधा और बहरा था। जो न सूरत देखता था, न कोई सिफारिश सुनता था। वह तो केवल शिक्षाप्रद दंड ही देना जानता था।

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प्रश्न 2.
पाठ के आधार पर शिशुपाल के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
शिशुपाल के चरित्र में हमें निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं
1. आतिथ्य सत्कार की भावना-शिशुपाल अपने गाँव का घोर दरिद्र ब्राह्मण था। उसकी जीविका थोड़ी-सी भूमि पर चलती थी। फिर भी एक परदेशी को द्वार पर खड़ा देखकर उसका मुख खिल गया। वह मुस्कुर.कर कहता है कि यह मेरा सौभाग्य है। आइए, पधारिए अतिथि के चरणों से मेरा चौका पवित्र हो जाएगा। इस प्रकार उसमें अतिथि-सत्कार की भावना दिखाई देती है।

2. सच्चा न्यायप्रिय-शिशुपाल ब्राह्मण को शासन-पद्धति का पूरा-पूरा ज्ञान था। सम्राट अशोक ने उसे न्यायमंत्री बना दिया। शिशुपाल का न्याय अंधा और बहरा था जो न सूरत देखता था और न सिफारिश मानता था। वह तो केवल दंड देना जानता था। उसने प्रहरी की हत्या के अपराध में सम्राट अशोक को भी दंडित किया। वह एक सच्चा न्यायी था।

3. निर्भीक और साहसी-शिशुपाल पाटलिपुत्र का न्यायमंत्री था। वह सम्राट अशोक से भी भयभीत नहीं होता था। जब सम्राट अशोक प्रहरी की हत्या के अपराध में पकड़े जाते हैं तो शिशुपाल उनके हाथ में बड़े साहस के साथ हथकड़ी डलवा देता है और निर्भीकता से सम्राट को दंडित करता है।

4. कर्तब्ध-परायण-शिशुपाल ने एक बार कहा था कि अवसर मिले तो दिखा हूँ कि न्याय किसे कहते हैं। मुझसे कोई अपराधी दंड से नहीं बचेगा। मैं न्याय का डंका बजाकर बता दूंगा। और शिशुपाल ने ऐसा ही करके दिखा दिया। प्रहरी की हत्या का पता उसने तीन दिन में निकाल लिया ! उसके न्याय के आगे न राजा बड़ा है और न रंक। वह राजा अशोक को प्रहरी की हत्या के अपराध में बंदी बनाता है और उसे दंडित भी करता है।

प्रश्न 3.
आपकी दृष्टि में न्यायमंत्री कैसा होना चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
हमारी दृष्टि में न्यायमंत्री सच्चा और निष्पक्ष होना चाहिए। उसमें अपने कर्तव्य का बोध होना चाहिए और उसका पालन करने की दृढ़ता होनी चाहिए। उसका न्याय दोषी और अपराधी के प्रति कठोर और सीधा होना चाहिए। उसे दंड-विधान का ज्ञान होना चाहिए। उसका दंड शिक्षाप्रद और सुधारप्रद होना चाहिए।

प्रश्न 4.
अपराधी घोषित होने पर भी महाराज अशोक का हृदय क्यों प्रफुल्लित वा?
उत्तर
अपराधी घोषित होने पर भी महाराज अशोक का हदय प्रफुल्लित था। यह इसलिए कि उन्होंने अपने गुप्त वेश में शिशुपाल की जो दृढ़ता सुनी थी, उसने उसे कर दिखाया। इस प्रकार शिशुपाल के न्याय को सुनकर उन्होंने प्रफुल्लित हदय से यह विचार किया कि यह मनुष्य सोना है, जो अग्नि में पड़कर कुंदन हो गया। ऐसे मनुष्यों पर जातियाँ अभिमान करती हुई अपने तन-मन को निछावर करने के लिए तैयार हो जाती हैं।

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प्रश्न 5.
न्यायमंत्री की जगह यदि आप होते, तो किसी प्रकार का न्याय करते? लिखिए।
उत्तर
न्यायमंत्री की जगह यदि हम होते तो उचित-अनुचित का ध्यान रखकर न्याय करते। ‘राजा को ईश्वर माना गया है। ईश्वर ही दंड दे सकता है।’ इसे हम ध्यान में रखकर महाराज अशोक की मूर्ति को फाँसी पर लटकाए जाने का आदेश तो अवश्य देते, लेकिन उन्हें सम्मान देते, उन्हें सार्वजनिक रूप से चेतावनी नहीं देते।

प्रश्न 6.
आशय स्पष्ट कीजिए

(क) जिसका अंतःकरण कुढ़ रहा हो जिसके नेत्र आँसू बहा रहे हों, जिसका मस्तिष्क अपने आपे में नहीं, उसके होंठों पर हँसी ऐसी भयानक प्रतीत होती है, जैसे श्मशान में चाँदनी वरन् उससे भी अधिक।
(ख) उन्होंने चोर-डाकुओं को इस प्रकार वश में कर लिया था जिस प्रकार बीन बजाकर सपेरा सर्प को वश में कर लेता है।
उत्तर
उपर्युक्त कथन का आशय है कि शुष्क हृदय, शुष्क आँखों और अव्यवस्थित मन और मस्तिष्क में अचानक आशाओं को जगा देने से क्षणिक सुख का अनुभव अवश्य होता है। वह सुखद होकर भी भयानकता से बाहर नहीं दिखाई देता है। भाव यह है कि दुखमय जीवन में आने वाले सुखद क्षणों से पूरा जीवन हरा-भरा नहीं दिखाई देता है।

(ख) उपर्युक्त वाक्य का आशय यह है कि सुशासन और सुप्रबंध से अपराधियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। जनता में प्रशासन के प्रति विश्वास बढ़ जाता है। भय और आतंक के पादल छंटने लगते हैं। चारों ओर अमन-चैन का माहौल बनने लगता है।

न्यायमंत्री भाषा-अध्ययन

1. वाक्य शुद्ध कीजिए
(क) मेरे को आपकी परीक्षा करना है।
(ख) मैं तुमही को जानमा हूँ।
(ग) हम लोग आपस में परस्पर हमेशा विचार विमर्श करने हैं।
(घ) मैं सोती नींद से उठ बैठा।
(ङ) कृपया उनका कार्य करने की कृपा करें।

2. दिए हुए शब्दों में से तत्सम, तद्भव शब्दों को छाँटकर लिखिए
सर्प, चरण, आँखें, रक्त, कठिन, अश्रु, अंधा, मृत्यु, आग, कदाचित, बातचीत, सफल, नींद, ग्राम।

3. निम्नलिखित शब्दों को पढ़कर उनका सही उच्चारण कीजिए
दृढ़-संकल्प, निर्विवाद, हतोत्साह, निस्तब्धता, आत्मोत्सर्ग।
उत्तर
1. शुद्ध वाक्य
(क) मुझे आपकी परीक्षा करनी है।
(ख) मैं तुम्हें जानता हूँ।
(ग) हम लोग आपस में हमेशा विचार-विमर्श करते हैं।
(घ) मैं नींद से उठ बैठा।
(ङ) उनका कार्य करने की कृपा करें।

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2. तत्सम शब्द तद्भव शब्द
सर्प – आँखें
चरण – कठिन
रक्त – अंधा
अश्रु – आग
मृत्यु – बातचीत
कदाचित – नींद
ग्राम – सफल।

3. निम्नलिखित शब्दों को पढ़कर उनका सही उच्चारण छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से करें
दृढ़-संकल्प, निर्विवाद, हतोत्साह, निस्तब्धता, आत्मोत्सर्ग।

न्यायमंत्री योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
बदलते परिवेश में शिशुपाल का चरित्र कितना प्रासंगिक है? इस संबंध में अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों के बारे में जानकारी एकत्रित करें जिससे आप प्रभावित हैं।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

2. पाठ में आए शिशुपाल के संवार्दो को अभिनय के साथ कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

3. सम्राट अशोक से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं को एकत्र करें तश नाटिका या कहानी लिखें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

न्यायमंत्री परीक्षापयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशुपाल कौन था?
उत्तर
शिशुपाल बुद्ध गया नामक गाँव का सबसे अधिक निर्धन ब्राह्मण था। बाद में महाराज अशोक के दरबार में न्यायमंत्री बना।

प्रश्न 2.
अशोक कैसा था?
उत्तर
अशोक बहुत ही निष्ठुर और निर्दयी था। वह ब्राह्मणों और स्त्रियों को भी फाँसी पर चढ़ा दिया करता था।

प्रश्न 3.
अशोक ने शिशुपाल के न्याय की परीक्षा लेने के लिए क्या कहा?
उत्तर
अशोक ने शिशुपाल के न्याय की परीक्षा लेने के लिए कहा, “यह राजमुद्रा है, तुम कल प्रातःकाल से सूर्य की पहली किरण के साथ न्यायमंत्री समझे जाओगे। मैं देखूगा, तुम अपने-आपको किस प्रकार सफल शासक सिद्ध कर सकते हो?

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प्रश्न 4.
न्यायमंत्री निरुत्तर क्यों हो गए?
उत्तर
न्यायमंत्री ने जब अशोक को उसकी मुद्रा लौटाते हुए कहा कि वे यह अपनी वस्तु सँभाले। वह अपने गाँव वापिस जाएगा, तब अशोक ने कहा, “आपका साहस मैं कभी नहीं भूलूँगा। यह बोझ आप ही उठा सकते हैं। मुझे कोई दूसरा इस पद के योग्य दिखाई नहीं देता।” अशोक की इन बातों को सुनकर न्यायमंत्री निरुत्तर हो गए।

न्यायमंत्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने राज्य में क्या व्यवस्था की थी?
उत्तर
न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने राज्य में व्यवस्था के लिए पुलिस और पहरेदारों को संगठित किया। पहरेदारों के कारण पहले तो अपराध होते ही नहीं थे। यदि अपराध हो जाए तो अपराधी को कठोर सजा मिलती थी। कुछ दिनों में सारे राज्य में शिशुपाल के न्याय की पताका फहरा उठी थी।

प्रश्न 2.
न्यायमंत्री ने अपनी कार्यकुशलता का परिचय किस प्रकार दिया?
उत्तर
सम्राट अशोक के बुलाने पर शिशुपाल सामने आए। महाराज ने पूछा-“घातक का पता लगा?” न्यायमंत्री ने कहा, “हाँ, लग गया।” न्यायमंत्री ने थोड़ी देर कुछ सोचा फिर दृढ़ संकल्प के साथ कहा, “मेरी आज्ञा है, सम्राट अशोक को गिरफ्तार कर लो।” इस पर अशोक क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने ब्राह्मण से कहा-“ब्राह्मण! तुममें इतनी शक्ति है कि जो तुम मुझ तक बढ़ आए” किंतु शिशुपाल ने सम्राट अशोक की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। शिशुपाल ने फिर दोहराया, “मैं आज्ञा देता हूँ गिरफ्तार कर लो। यह घातक है। इसे मेरी अदालत में पेश करो।”

धनवीर ने अशोक को हथकड़ी लगा दी और शिशुपाल की अदालत में सम्राट अशोक को बंदी के रूप में पेश किया। शिशपाल ने धीरे से कहा, “सम्राट तुम पर एक पहरेदार की हत्या का अपराध है। तुम इसका क्या उत्तर देते हो?” सम्राट अशोक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। परंतु उन्होंने उसे उद्दण्डता के कारण मारा था। शिशुपाल ने कहा, “अशोक! तुमने एक राजकर्मचारी की हत्या की है। मैं तुम्हारे वध की आज्ञा देता हूँ।”

प्रश्न 3.
लोग शिशुपाल के किस न्याय पर मुग्ध हो गए?
उत्तर
जब न्यायमंत्री ने खड़े होकर कहा, “महाशय! यह सच है कि एक राजकर्मचारी की हत्या की गई है। उसका दंड अवश्यंभावी है। परंतु शास्त्रों में राजा को ईश्वर माना गया है। उसे ईश्वर ही दंड दे सकता है। यह काम न्यायमंत्री की शक्ति के बाहर है, अतएव मैं आज्ञा देता हूँ कि महाराज को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए और उनकी मूर्ति फाँसी पर लटकाई जाए जिससे लोगों को शिक्षा मिले।”न्यायमंत्री का जय-जयकार हुआ। लोग इस न्याय पर मुग्ध हो गए।

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प्रश्न 4.
शिशुपाल और महाराज अशोक में तुम किसे श्रेष्ठ समझते हो और क्यों?
उत्तर
शिशुपाल और महाराज अशोक में हम शिशुपाल को श्रेष्ठ समझते हैं। यह इसलिए कि उसमें निष्पक्ष न्याय करने की योग्यता थी। वह अपराधी सिद्ध होने पर सम्राट अशोक को भी फाँसी की सजा देने से नहीं हिचकता है। वह परम न्यायी है। उसे न्याय के सिवाय और कुछ नहीं दिखाई देता है जबकि सम्राट अशोक न्याय के नाम पर क्रोधित हो जाते हैं। लेकिन वह निडर होकर अपने न्याय पर ही डटा रहता है।

प्रश्न 5.
सुदर्शन-लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’ का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
न्यायमंत्री’ शीर्षक कहानी महान कथाकार सुदर्शन की एक श्रेष्ठ और चर्चित कहानी है। इस कहानी में यह बतलाने का प्रयास किया गया है कि सम्राट अशोक के शासनकाल में शिशुपाल एक निर्धन ब्राह्मण था। इसके साथ ही वह एक न्यायप्रिय, निर्भीक तथा लोकप्रिय व्यक्ति भी था। शिशुपाल के यहाँ अतिथि के रूप में रहकर सम्राट अशोक ने उसकी उस अद्भुत योग्यता को परखा। उससे प्रभावित होकर उसे न्यायमंत्री के पद पर नियुक्त किया। उसने न्यायमंत्री बनते ही राज्य में सुख-शांति का वातावरण फैला दिया। अपने न्याय के बल पर उसने एक परिवार की रक्षा करते पहरेदार की हत्या के आरोप में सम्राट अशोक को ही दोषी सिद्ध कर दिया। फिर उन्हें मृत्युदंड के रूप में सजा सुना दिया। उसकी न्यायप्रियता और राज्यभक्ति वर्तमान समय में भी अनुकरणीय है।

न्यायमंत्री लेखक-परिचय

प्रश्न
श्री तुदर्शन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश झलिए।
उत्तर
श्री सुदर्शन प्रेमचंदकालीन कहानीकारों में एक प्रमुख कहानीकार हैं।

जीवन-परिचय-श्री सुदर्शन जी का असली नाम पंडित बदरीनाथ था। आपका जन्म सन् 1896 ई. में स्यालकोट में हुआ था। आपने हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू जादि भाषाओं का सम्यक अध्ययन किया। आपकी प्रवृत्ति लेखन की ओर आरंभ से ही थी। प्रेमचंद की तरह आपने उर्दू के बाद हिंदी में कच्ची उम्र में ही लिखना शुरू किया था।

रचनाएँ-‘तीर्थ-यात्रा’, ‘पनघट’, ‘फूलवती’, ‘भाग्यचक्र’, ‘सिकंदर’ आदि आपकी लोकचर्चित रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त आपने नाटक और बाल-साहित्य भी रचा है।

भाषा-शैली-श्री सुदर्शन जी की भाषा-शैली सरस और प्रवाहमयी है, आपकी भाषा शैली संबंधित निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

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1. भाषा-श्री सुदर्शनजी की भाषा में उर्दू-फारसी और अरबी के प्रचलित शब्द स्थान-स्थान पर दिखाई देते हैं। उसमें जगह-जगह कहावतों और मुहावरों के भी प्रयोग हुए हैं। इससे आपकी भाषा सुबोध भाषा कही जा सकती है।

2. शैली-श्री सुदर्शन जी की शैली में बोधगम्यता नामक विशिष्ट गुण है। वह सर्वत्र रोचक और हदयस्पर्शी है। मार्मिकता उसकी प्रमुख पहचान है। स्थान-स्थान पर उद्धरणों और कथा-सूत्रों को प्रयुक्त करके विषय को स्पष्ट करने के प्रयास अधिक आकर्षक लगते हैं। महत्त्व-श्री सुदर्शनजी का स्थान मुंशी प्रेमचंद के बाद है ये उनके अनुवर्ती हैं, उर्दू से हिंदी में लिखने वाले आप मुंशी प्रेमचंद के बाद सर्वप्रमुख हैं। कथा-साहित्य में आपने प्रेमचंद के बाद अत्यधिक भूमिका निभाई है।

न्यायमंत्री कहानी का सारांश

प्रश्न
श्री सुदर्शन लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’ का तारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री सुदर्शन लिखित कहानी न्यायमंत्री एक शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक कहानी है। इस कहानी का सारांश इस प्रकार है आज से 2500 साल पहले बुद्ध गया नामक गाँव में एक बहुत गरीब शिशुपाल नामक ब्राह्मण रहता था। उसके यहाँ एक परदेशी रहा। उस परदेशी की शिशुपाल ने यथाशक्ति आदर-सत्कार किया। उससे वह परदेशी बहुत खुश था। उसने उसकी खूब प्रशंसा की। उससे उसने यह भी कहा-“मुझे ख्याल भी न था कि गोबर में फूल खिलाहुआ है। महाराज अशोक को पता लग जाए तो कोई बड़ी-सी ऊँची पदवी पर नियुक्त कर दें।”

शिशुपाल ने उस परदेशी की बातें सुनकर मुस्कुरा दिया। कुछ देर बाद उसने उस परदेशी से कहा, “आजकल के बढ़ रहे अन्याय को देखकर मेरा रक्त उबलने लगता है। अगर मुझे अवसर मिले तो कोई अन्याय नहीं होने दूंगा और कोई अपराधी दंड से नहीं बचेगा।” परदेशी ने हँसते हुए कहा, “यदि मैं अशोक होता तो आपकी इच्छा पूरी कर देता।” . दूसरे दिन महाराज अशोक ने जब शिशुपाल को दरबार में बुलाया तो लोगों ने अशोक की कठोरता-निर्दयता को याद कर यह समझ लिया कि अब शिशुपाल जीवित नहीं लौटेगा।

शिशुपाल अपने पुत्र-स्त्री को समझाकर पाटलीपुत्र पहुँचा तो उसके मन में तरह-तरह की आशका होने लगी। उसे यह भी आशंका हुई कि कहीं वह परदेशी ही हो, यह उसी की लगाई हुई हो। इस प्रकार की आशंकाओं से उसका कलेजा धड़कने लगा। उसी समय महाराज अशोक ने राजकीय ठाठ से कमरे में आकर उससे पूछा कि क्या उसने उसे पहचान लिया? उसने कहा कि उसे पता होता कि वही महाराज हैं, तो वह उतनी स्वतंत्रता से बात नहीं करता। महाराज ने उससे कहा कि उसने कहा था कि उसे अवसर दिया जाए तो वह न्याय का डंका बजा देगा। महाराज ने उससे आगे कहा कि इसके लिए अब उसे एक परीक्षा देनी होगी। कल प्रातः से वह न्यायमंत्री के रूप में कार्य करेगा। उसके अधीन पुलिस अधिकारी होंगे। उसका उत्तरदायित्व पाटलीपुत्र में शांति रखने का होगा। यह देखा जाएगा कि वह स्वयं को किस प्रकार सफल शासक सिद्ध करता है। एक माह बीतते ही न्यायमंत्री के रूप में शिशुपाल ने अपने कड़े शासन की चारों ओर धूम मचा दी। इससे नगर की दशा में आकाश-पाताल का अंतर पड़ गया।

एक रात को एक अमीर ने एक विशाल भवन के द्वार को खटखटाकर खुलवाना चाहा, लेकिन उसके अंदर से किसी स्त्री ने खोलने से मना कर दिया। उसने उस स्त्री को धमकाया तो उसने उससे कहा कि शिशुपाल का राज्य है। कोई किसी को तंग नहीं कर सकता। लेकिन उस अमीर ने उसकी एक न सुनी और तलवार निकालकर दरवाजे पर आक्रमण कर दिया। अचानक आकर एक पहरेदार ने उसका हाथ थामकर उसे फटकारा। पूछने पर उस पहरेदार ने उसे बताया कि उसे न्यायमंत्री ने नियुक्त किया है। उसने यह प्रण किया है कि उसके तन में जब तक प्राण और खून की अंतिम बूँद है, वह अपने कर्त्तव्य से पीछे नहीं हटेगा। इसलिए अगर इस समय महाराज अशोक भी आ जाएँ तो भी वह नहीं टलेगा। उस अमीर ने उसकी बातों को अनसुना कर उस पर तलवार लेकर झपटा। उसका सामना करते हुए वह पहरेदार मारा गया। उसकी लाश को एक ओर करके वह अमीर वहाँ से भाग निकला।

इस घटना को सुनकर सब हैरान थे कि शिशुपाल के शासन में ऐसी घटना! शिशु की नींद हराम हो गई। वे खाना-पीना सब भूलकर उस घातक का पता न लगा सके। महाराज उनसे बार-बार पूछते-“घातक पकड़ा गया…कब तक पकड़ा जाएगा।” न्यायमंत्री उन्हें तसल्ली देते-“जल्दी ही पकड़ लिया जाएगा।” एक दिन महाराज ने क्रोध में आकर यह चेतावनी दे दी, “तुम्हें तीन दिन की अवधि दी जाती है। यदि इस बीच घातक न पकड़ा गया तो तुम्हें फाँसी दे दी जाएगी।” इस समचार से पूरे नगर में

हलचल मच गई। तीसरे दिन आने पर शिशुपाल नगर के घने बाजार में घूम रहे थे। एक स्त्री ने उन्हें खिड़की से देख लिया। उसने उन्हें अंदर बलाकर उस बीती घटना के बारे में सब कुछ बता दिया। दूसरे दिन दरबार में आते ही महाराज अशोक के पछने पर शिशुपाल ने कहा कि घातक का पता लग गया है और वह घातक तुम हो। तुम पर पहरेदार की हत्या का अपराध है। तुम इसका क्या उत्तर देते हो? महाराज अशोक ने कहा कि वह उइंड था। इसलिए उन्होंने उसको मार डाला। न्यायमंत्री शिशुपाल ने उन्हें एक राजकर्मचारी का वध करने के अपराध में उनके वध की आज्ञा दी।

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उसे सुनकर लोगों ने शिशुपाल को गाली दी। लेकिन अशोक ने उन्हें शांत रहने का संकेत किया। अशोक ने उपेक्षापूर्वक कहा कि वे इस आज्ञा के विरुद्ध कछ नहीं बोल सकते। न्यायमंत्री के आदेश पर एक मनुष्य अशोक की सोने की मूर्ति लेकर उपस्थित हुआ। न्यायमंत्री ने खड़े होकर कहा, “महाशय! यह सच है कि राजकर्मचारी की हत्या की गई है। उसका दंड अवश्यंभावी है। परंतु शास्त्रों में राजा को ईश्वर माना गया है। ईश्वर ही दंड दे सकता है। यह काम न्यायमंत्री की शक्ति से बाहर है। अतएव मैं आज्ञा देता हूँ कि महाराज को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए और उनकी मूर्ति को फाँसी दे दी जाए, जिससे लोगों को शिक्षा मिले।” इसे सुनकर सभी ने न्यायमंत्री की जय-जयकार की।

रात को न्यायमंत्री ने राजमहल में जाकर अशोक को उसकी अंगठी और मद्रा देते हुए अपने गाँव वापिस जाने की बात कही। अशोक ने उसे सम्मानभरी आँखों से देखते हुए कहा कि अब यह संभव नहीं है। वह उसके साहस को नहीं भूल सकता है। दूसरा. इस पद के योग्य उसे कोई नहीं दिखाई देता।

न्यायमंत्री संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या, अर्थ-ग्रहण संबंधी व विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. महाराज ने सिर झुका दिया। इस समय उनके हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें मार रहा था। सोचते थे, यह मनुष्य स्वर्ण है, जो अग्नि में पड़कर कुंदन हो गया। कहता था मेरा न्याय अपनी पूम मचा देगा, यह वचन झूठा न था। इसने अपने कहने की लाज रख ली है। ऐसे ही मनुष्य होते हैं जिन पर जातियाँ अभिमान करती हैं और जिन पर अपना तन-मन निष्ठावर करने को उद्धृत हो जाती हैं।

शब्दार्थ-ब्रह्मानंद-ब्रह्म का आनंद । लाज-इज्जत। निछावर-बलिदान।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश महाकथाकार श्री सुदर्शन द्वारा लिखित कहानी ‘न्यायमंत्री’

प्रसंग-इस गद्यांश में कहानीकार ने इस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहा है कि जब शिशुपाल ने अपराधी का पता लगा लिया और यह पाया कि अपराधी स्वयं सम्राट अशोक ही हैं तो शिशुपाल ने अपराधी होने के कारण उन्हें फाँसी की सजा दे दी। इस पर सम्राट अशोक की क्या प्रतिक्रिया हुई।

व्याख्या-जब फाँसी की सजा को न्यायमंत्री शिशुपाल ने सुनाया तब सम्राट अशोक का सिर झुक गया। उस समय उनके हृदय में स्वर्ग के आनंद की लहर उठ रही थी। ऐसा इसलिए कि उन्हें अपने एक सच्चे और निर्भीक न्यायमंत्री का न्याय देखकर आनंद आ रहा था। वे मन-ही-मन सोच रहे थे कि शिशुपाल वास्तव में सच्चा स्वर्ण-मानव था जो कत्र्तव्यरूपी अग्नि में पड़कर शुद्ध हो गया था। वह कहा करता था कि उसके न्याय की धूम मचेगी यह बात निःसंदेह सच ही निकली। उसने जो कुछ कहा था उसको पूरा कर दिया। शिशुपाल जैसे मनुष्य जो सच्चे और साहसी होते हैं उन पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व करती हैं और ऐसे ही लोगों पर अपना तन-मन-धन न्यौछावर करने के लिए वे तत्पर भी हो उठती हैं।

विशेष-

  1. सत्य और निष्पक्ष न्याय के महत्त्व को प्रदर्शित किया गया है।
  2. भाषा सरल और स्पष्ट है।
  3. ‘धूम मचाना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।
  4.  शैली सुबोध है।
  5. संपूर्ण अंश प्रेरणादायक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) महाराज ने सिर क्यों झुका लिया?
(ii) महाराज के हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें क्यों मार रहा था? .
उत्तर
(i) महाराज ने सिर झुका लिया। यह इसलिए कि उन्हें न्यायमंत्री शिशुपाल ने अपराधी सिद्ध कर दिया था। उसे सिर झुकाकर स्वीकार कर लेना उन्होंने अपना कर्तव्य समझ लिया था।
(ii) महाराज के हृदय में ब्रह्मानंद का समुद्र लहरें मार रहा था। यह इसलिए कि उनसे शिशुपाल ने कहा था कि उसका न्याय धूम मचा देगा तो उसने आज सचमुच यह कर दिखाया है। इस प्रकार उसने उनको झूठे वचन न देकर उनके विश्वास को कायम रखा था।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) जातियाँ किन पर अभिमान कर अपना तन-मन निछावर करने को उद्यत हो जाती हैं?
(ii) उपर्युक्त गयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) जातियाँ कथनी-करनी में अंतर न रखने वालों पर अपना तन-मन निछावर करने को उद्यत हो जाती हैं।
(ii) उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव है-किसी को दिए गए वचन को झूठा न होने देना। किसी भी परिस्थिति में अपने कहने की लाज रखना।

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MP Board Class 10th Special Hindi काव्य बोध

MP Board Class 10th Special Hindi काव्य बोध

1. काव्य की परिभाषा

‘छन्दबद्ध’ रचना काव्य कहलाती है। आचार्य विश्वनाथ ने काव्य को परिभाषित करते हुए लिखा है—’वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, “कविता शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक सम्बन्धों की रक्षा और निवास का साधन है। वह इस जगत के अनन्त रूपों, अनन्त व्यापारों और अनन्त चेष्टाओं के साथ हमारे मन की भावनाओं को जोड़ने का कार्य करती है।”

काव्य के भेद-काव्य के दो भेद माने गये हैं-

  1. श्रव्य काव्य,
  2. दृश्य काव्य

(1) श्रव्य काव्य
जिस काव्य को पढ़कर या सुनकर आनन्द प्राप्त किया जाये,वह श्रव्य काव्य कहलाता है। श्रव्य काव्य के दो भेद माने गये हैं-

  1. प्रबन्ध काव्य,
  2. मुक्तक काव्य।

(क) प्रबन्ध काव्य-प्रबन्ध काव्य वह काव्य रचना कहलाती है जिसकी कथा शृंखलाबद्ध होती है। इसके छन्दों का सम्बन्ध पूर्वापर होता है। प्रबन्ध काव्य के दो प्रकार माने गये हैं-
(i) महाकाव्य,
(ii) खण्डकाव्य।

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(i) महाकाव्य-महाकाव्य में किसी महापुरुष के समस्त जीवन की कथा होती है। इसमें कई सर्ग होते हैं। मूल कथा के साथ प्रासंगिक कथाएँ भी होती हैं। महाकाव्य का प्रधान रस श्रृंगार, वीर अथवा शान्त होता है।

हिन्दी के प्रमुख महाकाव्य एवं उनके रचयिता-
MP Board Class 10th Special Hindi काव्य बोध img-1

(ii) खण्डकाव्य-खण्डकाव्य में जीवन का खण्ड चित्रण होता है। इसका नायक यशस्वी होता है। सीमित कलेवर में इसकी कथा अपने आप में पूर्ण होती है।

हिन्दी के प्रमुख खण्डकाव्य एवं उनके रचयिता-
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(ख) मुक्तक काव्य-मुक्तक काव्य में प्रत्येक छन्द स्वयं में पूर्ण होता है तथा पूर्वापर सम्बन्ध से मुक्त होता है। बिहारी सतसई के दोहे,कबीर की साखी मुक्तक काव्य हैं।

2. रस

रस की परिभाषा
जिसका आस्वादन किया जाये वही रस है। रस का अर्थ आनन्द है अर्थात् काव्य को पढ़ने, सुनने या देखने से मिलने वाला आनन्द ही रस है। रस की निष्पत्ति विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से होती है। रस काव्य की आत्मा माना गया है। रस के अंग

रस के चार अंग-
(i) स्थायी भाव,
(ii) विभाव,
(iii) अनुभाव,
(iv) संचारी भाव-माने गये हैं।

(i) स्थायी भाव-मानव हृदय में स्थायी रूप से विद्यमान रहने वाले भाव स्थायी भाव कहलाते हैं। स्थायी भावों की संख्या नौ-रति,हास,शोक,उत्साह,क्रोध, भय, घृणा, विस्मय एवं निर्वेद मानी गई है। कुछ विद्वान देव विषयक प्रेम और वात्सल्य भाव को स्थायी भाव मानते हैं।
(ii) विभाव-स्थायी भाव को जगाने वाले और उद्दीप्त करने वाले कारण विभाव कहलाते हैं। विभाव दो प्रकार के होते हैं—
(क) आलम्बन,
(ख) उद्दीपन।

(क) आलम्बन विभाव-जिस कारण से स्थायी भाव जाग्रत हो. उसे आलम्बन विभाव कहते हैं। जैसे-वन में शेर को देखकर डरने का आलम्बन विभाव शेर होगा।
(ख) उद्दीपन विभाव-जाग्रत स्थायी भाव को उद्दीप्त करने वाले कारण उद्दीपक विभाव कहे जाते हैं। जैसे वन में शेर देखकर भयभीत व्यक्ति के सामने ही शेर जोर से दहाड़ मार दे,तो दहाड़ भय को उद्दीप्त करेगी। अतः यह उद्दीपन विभाव होगी।

(iii) अनुभाव-स्थायी भाव के जाग्रत होने तथा उद्दीप्त होने पर आश्रय की शारीरिक चेष्टाएँ अनुभाव कहलाती हैं। जैसे वन में शेर को देखकर डर के मारे काँपने लगना, भागना आदि।

अनुभाव-

  1. कायिक,
  2. वाचिक,
  3. मानसिक,
  4. सात्विक तथा
  5. आहार्य-पाँच प्रकार के होते हैं।

(iv) संचारी भाव-जाग्रत स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए कुछ समय के लिए जगकर लुप्त हो जाने वाले भाव संचारी या व्यभिचारी भाव कहलाते हैं। जैसे वन में शेर को देखकर भयभीत व्यक्ति को ध्यान आ जाये कि आठ दिन पूर्व शेर ने एक व्यक्ति को मार दिया था। यह स्मृति संचारी भाव होगा। संचारी भावों की संख्या 33 मानी गई है।

रस नौ प्रकार के माने गये हैं-

  • शृंगार,
  • वीर,
  • शान्त,
  • करुण,
  • हास्य,
  • रौद्र,
  • भयानक,
  • वीभत्स एवं
  • अद्भुत।

कुछ विद्वान भक्ति एवं वात्सल्य को भी रस मानते हैं।
(1) श्रृंगार रस [2011]-श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति है। नर और नारी का प्रेम पुष्ट होकर श्रृंगार रस रूप में परिणत होता है। श्रृंगार रस के दो भेद हैं-
(i) संयोग शृंगार,
(ii) वियोग शृंगार।

(i) संयोग शृंगार–जहाँ नायक-नायिका के मिलन,वार्तालाप, स्पर्श आदि का वर्णन है। वहाँ संयोग श्रृंगार होता है; जैसे-

“दूलह श्री रघुनाथ बने, दुलही सिय सुन्दर मन्दिर माहीं।
गावत गीत सबै मिलि सुन्दरि, वेद तहाँ जुरि विप्र पढ़ाहीं॥
राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नंग की परछाहीं।
याते सबै सुधि भूल गयी, कर टेकि रही पल टारत नाहीं॥”

यहाँ राम और सीता का प्रेम (रति) स्थायी भाव है। राम आलम्बन और सीता आश्रय हैं। नग में राम का निहारना, गीत आदि उद्दीपन हैं। कर टेकना,पलक न गिराना अनुभाव हैं। जड़ता, हर्ष,मति आदि संचारी भाव हैं।

(ii) वियोग शृंगार–जहाँ नायक-नायिका के वियोग का वर्णन हो वहाँ वियोग शृंगार होता है; जैसे-

“भूषन वसन विलोकत सिय के
प्रेम विवस मन कम्प, पुलक तनु नीरज-नयन नीर भये पिय के।”

यहाँ आलम्बन सीता तथा आश्रय राम हैं। सीता के आभूषण, वस्त्र आदि उद्दीपन हैं। कम्पन, पुलक,आँख में आँसू अनुभाव हैं। दर्द,स्मृति संचारी भाव हैं।

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(2) वीर रस युद्ध या कठिन कार्य करने के लिए जगा उत्साह भाव विभावादि से पुष्ट होकर वीर रस बन जाता है। इसका आलम्बन विरोधी होता है, शत्रु की गर्जना, रणभेरी आदि उद्दीपन हैं। हाथ उठाना, वीरता की बातें करना आदि अनुभाव और गर्व,उत्सुकता आदि संचारी भाव हैं; जैसे-

“सौमित्र से घनानन्द का, रव अल्प भी न सहा गया,
निज शत्रु को देखे बिना, तनिक उनसे न रहा गया।
रघुवीर का आदेश ले, युद्धार्थ वे सजने लगे,
रण वाद्य भी निर्घोष करके, धूम से बजने लगे।”

यहाँ मेघनाद आलम्बन तथा लक्ष्मण आश्रय हैं। मेघनाद का रव,रण वाद्य आदि उद्दीपन हैं। लक्ष्मण का युद्ध हेतु तैयार होना आदि अनुभाव और औत्सुक्य,अमर्ष आदि संचारी भाव हैं।

(3) शान्त रस-संसार की असारता, वस्तुओं से विरक्ति के कारण उत्पन्न निर्वेद भाव विभावादि से पुष्ट होकर शान्त रस के रूप में परिणत होता है; जैसे-

“मो सम कौन कुटिल खल कामी।
तुम सों कहा छिपी करुनामय सबके अंतरजामी।
जो तन दियौ ताहि बिसरायौ ऐसौ नोन हरामी।
भरि-भरि द्रोह विषयों को धावत, जैसे सूकर ग्रामी।
सुनि सतसंग होत जिय आलस, विषयनि संग बिसरामी।
श्री हरि-चरन छाँड़ि बिमुखनि की; निसदिन करत गुलामी।
पापी परम, अधम अपराधी, सब पतितनि मैं नामी।
सूरदास प्रभु अधम-उधारना सुनियै श्रीपति स्वामी॥”

यहाँ भक्त आश्रय तथा विषय वासना, संसार की असारता आलम्बन है। शरीर विस्मृत कर देना,सत्संग में आलस्य आदि उद्दीपन विभाव हैं। द्रोह भरकर विषय को धाना, गुलामी करना आदि अनुभाव और मति, वितर्क, विवोध आदि संचारी भाव हैं।

(4) करुण रस-प्रिय व्यक्ति वस्तु के विनाश या अनिष्ट की आशंका से जागे शोक स्थायी भाव का विभावादि से पुष्ट होने पर करुण रस का परिपाक होता है; जैसे- [2012]

“करि विलाप सब रोबहिं रानी।
महाविपति किमि जाइ बखानी।।
सुनि विलाप दुखद दुख लागा।
धीरज छूकर धीरज भागा॥”

इसमें रानियाँ आश्रय, राजा दशरथ की मृत्यु आलम्बन है। मृत्यु की सूचना उद्दीपन है। आँसू बहाना, रोना, विलाप करना, अनुभाव और विषाद, दैन्य, बेहोशी आदि संचारी भाव हैं।

(5) हास्य रस-विचित्र वेश-भूषा, विकृत आकार, चेष्टा आदि के कारण जाग्रत हास स्थायी भाव विभावादि से पुष्ट होकर हास्य रस में परिणत होता है; जैसे [2017]

“हँसि हँसि भजे देखि दूलह दिगम्बर को,
पाहुनी जे आवै हिमाचल के उछाह में।
कहै पद्माकर सु काहु सों कहै को कहा,
जोई जहाँ देखे सो हँसोई तहाँ राह में।।
मगन भएई हँसे नगन महेश ठाड़े,
और हँसे वेऊ हँसि-हँसि के उमाह में।
सीस पर गंगा हँसे भुजनि भुजंगा हँसे।
हास ही को दंगा भयो नंगा के विवाह में।”

यहाँ दर्शक आश्रय हैं तथा शिवजी आलम्बन हैं। उनकी विचित्र आकृति, नग्न स्वरूप आदि उद्दीपन हैं। लोगों का हँसना, भागना आदि अनुभाव तथा हर्ष, उत्सुकता, चपलता आदि संचारी भाव हैं।

(6) रौद्र रस-दुष्ट के अत्याचारों, अपने अपमान आदि के कारण जाग्रत क्रोध स्थायी भाव का विभावादि में पुष्ट होकर रौद्र रस रूप में परिपाक होता है; जैसे-

“श्रीकृष्ण के सुन वचन, अर्जन क्रोध से जलने लगा।
सब शोक अपना भूलकर, करतल युगल मलने लगा || [2009]
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा, वे हो गए उठकर खड़े॥”

यहाँ अर्जुन आश्रय, अभिमन्यु के वध पर कौरवों का हर्ष आलम्बन है। श्रीकृष्ण के वचन उद्दीपन विभाव हैं। हाथ मलना, कठोर बोल,उठकर खड़ा होना, अनुभाव तथा अमर्ष,उग्रता, गर्व आदि संचारी भाव हैं।

(7) भयानक रस-किसी भयंकर व्यक्ति, वस्तु के कारण जाग्रत भय स्थायी भाव विभावादि के संयोग से भयानक रस रूप में परिणत होता है; जैसे-

“एक ओर अजगर सिंह लखि, एक ओर मृगराय।
विकल वटोही बीच ही, पर्यो मूरछा खाय।।”

यहाँ आश्रय वटोही तथा आलम्बन अजगर और सिंह हैं। अजगर एवं सिंह की डरावनी चेष्टाएँ उद्दीपन हैं। बटोही (राहगीर) का मूच्छित होना अनुभाव तथा स्वेद, कम्पन, रोमांच आदि संचारी भाव हैं।

(8) वीभत्स रस-घृणापूर्ण वस्तुओं के देखने या अनुभव करने के कारण जगने वाला जुगुप्सा (घृणा) स्थायी भाव का विभावादि के संयोग से वीभत्स रस रूप में परिपाक होता है; जैसे-

“सिर पर बैठो काग आँखि दोऊ खात निकारत।
खींचति जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द उर धारत।।
गिद्ध जाँघ कहँ खोदि-खोदि के मांस उपारत।
स्वान अंगुरिन काटि के खात विरारत।।”

यहाँ युद्ध क्षेत्र या श्मशान आलम्बन तथा दर्शक आश्रय हैं। कौओं का आँख निकालना, स्यार का जीभ खींचना, गिद्ध का मांस नोंचना आदि उद्दीपन हैं। इन्हें देखने पर हृदय की व्याकुलता,शरीर का कम्पन आदि अनुभाव तथा मोह,स्मृति, मूर्छा आदि संचारी भाव हैं।

(9) अद्भुत रस-किसी असाधारण या अलौकिक वस्तु के देखने में जाग्रत विस्मय स्थायी भाव विभावादि के संयोग से अद्भुत रस में परिणत होता है; जैसे-

“अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।
चकित भई गद्-गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु।।”

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यहाँ माँ यशोदा आश्रय तथा श्रीकृष्ण के मुख में विद्यमान सब लोक आलम्बन हैं। चर-अचर आदि उद्दीपन हैं। आँख फाड़ना,गद-गद स्वर,रोमांच अनुभाव तथा दैन्य,त्रास आदि संचारी भाव हैं।

(10) वात्सल्य रस-सन्तान के प्रति वात्सल्य भाव उपयुक्त विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के सम्मिश्रण के परिणामस्वरूप जब आनन्द में परिणत हो जाता है, तब वहाँ वात्सल्य रस होता है। [2009, 10, 18]

उदाहरण-

“जसोदा हरि पालने झलावै।
हलरावै दुलराय मल्हावें, जोइ सोइ कछु गावै।।”

3. अलंकार

परिभाषा-काव्य में भाव तथा कला के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले उपकरण अलंकार कहलाते हैं।

भेद-जिन अलंकारों के प्रयोग से शब्द में चमत्कार उत्पन्न होता है, वे शब्दालंकार तथा जिनसे अर्थ में चमत्कार पैदा होता है,वे अर्थालंकार कहलाते हैं। शब्दालंकारों में प्रमुख अनुप्रास, यमक और श्लेष तथा अर्थालंकारों में उपमा, रूपक एवं उत्प्रेक्षा प्रमुख हैं।

अलंकार परिचय

1. वक्रोक्ति अलंकार [2009, 16]

लक्षण-जहाँ किसी उक्ति का अर्थ जानते हुए कहने वाले के आशय से भिन्न लिया जाए, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है; जैसे

“कौन तुम? हैं घनश्याम हम, तो बरसो कित जाई।”

यहाँ राधा ने ‘घनश्याम’ का अर्थ जानते हुए भी श्रीकृष्ण न लगाकर बादल लिया है। अतः यहाँ वक्रोक्ति अलंकार है।

2. अतिश्योक्ति अलंकार [2009, 10, 12, 13, 15, 17]
लक्षण–जहाँ कोई बात आवश्यकता से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर कही जाय, वहाँ अतिश्योक्ति अलंकार होता है; जैसे

“हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सारी जरि गई, गये निसाचर भाग ॥”

यहाँ बात को बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन हुआ है। अतः अतिश्योक्ति अलंकार है।

3. अन्योक्ति अलंकार [2009, 11, 18]
लक्षण-जहाँ अप्रस्तुत कथन के द्वारा प्रस्तुत अर्थ का बोध कराया जाये वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है; जैसे

“माली आवत देखकर, कलियन करी पुकार।
फूले-फूले चुनि लिए, कालि हमारी बार।”

यहाँ पर बात तो अप्रस्तुत माली,कलियाँ, फूलों की कही गई है परन्तु बोध प्रस्तुत वृद्धजनों और प्रौढ़जनों का कराया गया है।

4. छन्द

(क) परिभाषा-छन्द का शब्दार्थ बन्धन है। वर्ण,मात्रा, गति, यति,तुक आदि नियमों से नियोजित शब्द-रचना छन्द कहलाती है।

(ख) छन्द के अंग-
(1) वर्ण-वर्ण अक्षर को कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-
(अ) लघु (ह्रस्व) वर्णों के बोलने में बहुत कम समय लगता है; जैसे-क, उ, नि, ह आदि।
(आ) दीर्घ (गुरु) वर्णों के बोलने में कुछ अधिक समय लगता है; जैसे-तू, आ,पौ आदि।

(2) मात्रा-वर्ण के बोलने में जो समय लगता है, उसे मात्रा कहते हैं। मात्रा दो प्रकार की होती हैं-
(अ) लघु,
(आ) दीर्घ। लघु वर्ण की एक तथा दीर्घ वर्ण की दो मात्राएँ होती हैं। लघु का चिह्न (l) और दीर्घ का चिह्न (s) होता है।

(3) यति–विराम या रुकने को यति कहते हैं। छन्द पढ़ते समय जहाँ कुछ समय रुकते हैं,वही यति है। इसके संकेत के लिए विराम चिह्न प्रयोग किये जाते हैं।

(4) चरण या पाद-छन्द के एक भाग को चरण या पाद कहते हैं। प्रत्येक छन्द में चरणों की संख्या निश्चित होती है; जैसे–चार पद,छ: पद आदि।

(5) तुक-छन्द की प्रत्येक पंक्ति के अन्तिम भाग की समान ध्वनि तुक कहलाती है।
(ग) छन्द के भेद-छन्द दो प्रकार के होते हैं-
(i) मात्रिक एवं
(ii) वर्णिक।

(i) मात्रिक छन्द-जिन छन्दों में मात्रा की गणना की जाती है, वे मात्रिक छन्द कहलाते हैं।
(ii) वर्णिक छन्द-जिन छन्दों में वर्गों की गणना की जाती है, वे वर्णित छन्द होते हैं।

छन्दों का परिचय

1. गीतिका [2009, 11, 13, 14, 17]
लक्षण-गीतिका मात्रिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 14 तथा 12 पर यति होती हैं; कुल मात्राएँ 26 होती हैं। अन्त में लघु-गुरु होता है; जैसे-

हे प्रभो आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए।

2. हरिगीतिका [2009, 14, 16, 18]
लक्षण-इसमें कुल 28 मात्राएँ होती हैं तथा 16 एवं 12 पर यति होती है। अन्त में लघु-गुरु होता है; जैसे-

संसार की समर स्थली में, वीरता धारण करो।
चलते हुए निज इष्ट पथ पर, संकटों से मत डरो॥
जीते हुए भी मृतक सम रहकर न केवल दिन भरो।
वीर वीर बनकर आप, अपनी विघ्न बाधाएँ हरो॥

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3. उल्लाला [2015]
लक्षण-उल्लाला छन्द के प्रथम तथा तृतीय चरण में 15 मात्राएँ होती हैं; जैसे-

करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की। [2009]

4. रोला
लक्षण-रोला के प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। 11 एवं 13 पर यति होती है। अन्त में प्रायः दो गुरु होते हैं; जैसे

नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है।
सूर्य चन्द्र, युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मण्डल हैं।
बन्दीजन खग-वृन्द, शेष प्राय सिंहासन हैं।

प्रश्नोत्तर

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. ‘छन्दबद्ध रचना कहलाती है
(i) काव्य
(ii) छन्द
(iii) मुक्तक
(iv) गेय मुक्तक।
उत्तर-
(i) काव्य

2. ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ परिभाषा दी है.
(i) भामह
(ii) दण्डी
(iii) विश्वनाथ
(iv) पण्डितराज जगन्नाथ।
उत्तर-
(ii) दण्डी

3. सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य है [2013]
(i) कामायनी
(ii) रामचरितमानस
(ii) साकेत
(iv) पद्मावत।
उत्तर-
(ii) रामचरितमानस

4. काव्य की आत्मा है-
(i) अलंकार
(ii) रस
(iii) छन्द
(iv) दोहा।
उत्तर-
(ii) रस

5. स्थायी भाव को जगाने वाले और उद्दीप्त करने वाले कारण कहलाते हैं-
(i) आलम्बन
(ii) उद्दीपन
(iii) विभाव
(iv) अनुभाव।
उत्तर-
(iii) विभाव

6. काव्य में भाव तथा कला के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले तत्त्व कहलाते हैं-
(i) रस
(ii) छन्द
(iii) चौपाई
(iv) अलंकार।
उत्तर-
(iv) अलंकार।

7. हरिगीतिका के प्रत्येक चरण में मात्राएँ होती हैं-
(i) 26 मात्राएँ
(ii) 28 मात्राएँ
(iii) 24 मात्राएँ
(iv) 16 मात्राएँ।
उत्तर-
(ii) 28 मात्राएँ

8. जहाँ अप्रस्तुत कथन के द्वारा प्रस्तुत का बोध हो, वहाँ अलंकार होता है-
(i) वक्रोक्ति
(ii) अतिश्योक्ति
(iii) विशेषोक्ति
(iv) अन्योक्ति।
उत्तर-
(iv) अन्योक्ति।

9. वर्ण के बोलने में जो समय लगता है, उसे कहते हैं-
(i) यति
(ii) मात्रा
(iii) चरण
(iv) तुक।
उत्तर-
(ii) मात्रा

10. उल्लाला छन्द में मात्राएँ होती हैं [2009]
(i) 26.
(ii) 28
(iii) 14
(iv) 18.
उत्तर-
(ii) 28

11. ‘श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे’ में कौन-सा रस विद्यमान है? [2012]
(i) हास्य रस
(ii) रौद्र रस
(iii) वीर रस
(iv) करुण रस।
उत्तर-
(ii) रौद्र रस

12. ‘चौपाई छन्द में मात्राएँ होती हैं [2012, 15]
(i) 12
(ii) 15
(iii) 16
(iv) 24.
उत्तर-
(ii) 15

13. ‘रौद्र रस का स्थायी भाव’ है [2014]
(i) उत्साह
(ii) हँसी
(iii) क्रोध
(iv) विस्मय।
उत्तर-
(ii) हँसी

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14. ‘अद्भुत रस का स्थायी भाव’ है [2016]
(i) रति
(ii) निर्वेद
(iii) विस्मय
(iv) शोक।
उत्तर-
(i) रति

रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. महाकाव्य में जीवन का ………………………………. चित्रण होता है।
2. कामायनी एक ………………………………. है। [2009, 13]
3. लोक सीमा से परे बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन ………………………………. में होता है।
4. गीतिका छन्द ………………………………. छन्द है।
5. ‘चरण-सरोज पखावन लागा’ ………………………………. अलंकार का उदाहरण है। [2009]
6. गेय मुक्तक को ………………………………. भी कहते हैं।
7. श्रृंगार रस का स्थायी भाव ……………………………….” है। [2010, 15]
8. रस के ………………………………. अंग होते हैं।
9. जहाँ शब्द सम्बन्धी चमत्कार हो, उसे ………………………………. कहते हैं।
10. करुण रस का स्थायी भाव ……………………………….” है। [2009]
11. जिसके प्रति स्थायी भाव उत्पन्न हो, वह ………………………………. कहलाता है। [2014, 17]
12. दोहा और रोला छंद से मिलकर ………………………………. छंद बनता है। [2018]
उत्तर-
1. समग्र,
2. महाकाव्य,
3. अतिश्योक्ति,
4. मात्रिक,
5. रूपक,
6. प्रगीति,
7. रति,
8. चार,
9. शब्दालंकार,
10. शोक,
11. आलम्बन,
12. कुण्डलियाँ।

सत्य/असत्य
1. खण्डकाव्य मुक्तक काव्य का एक भेद है। [2014]
2. अस्थिर मनोविकारों को स्थायी भाव कहते हैं। [2013]
3. करुण रस का स्थायी भाव शोक है। [2017]
4. शान्त रस का स्थायी भाव निर्वेद है। [2009]
5. वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है। [2018]
6. रोला वर्णिक छन्द है।
7. रस को काव्य की आत्मा माना गया है।
8. काव्य का प्रत्येक छंद अपने आप में स्वतंत्र, पूर्ण तथा रस की अनुभूति कराने में असमर्थ होता है। [2011]
9. सवैया वर्ण वृत्त है। [2011]
10. ‘उद्धव शतक’ रत्नाकर रचित महाकाव्य है। [2011]
11. प्रबन्ध काव्य में पूर्वापर सम्बन्ध नहीं होता है। [2011, 15]
12. ‘अनुराग तड़ाग में भानु उदै’ में उपमा अलंकार है। [2011]
13. माली आवत देखकर कलियन करी पुकार। फूले-फूले चुन लिये काल्हि हमार बार ॥ में अन्योक्ति अलंकार है। [2012]
14. रामचरितमानस का प्रमुख छंद चौपाई है। [2017]
उत्तर-
1. असत्य,
2. असत्य,
3. सत्य,
4. सत्य,
5. सत्य,
6. असत्य,
7. सत्य,
8. असत्य,
9. सत्य,
10. असत्य,
11. असत्य,
12. असत्य,
13. सत्य,
14. सत्य।

सही जोड़ी बनाइए

MP Board Class 10th Special Hindi काव्य बोध img-4
उत्तर-
1. → (ग), 2. → (क), 3. → (ख), 4. → (ङ), 5. → (घ)।

MP Board Class 10th Special Hindi काव्य बोध img-5
उत्तर-
1. → (घ), 2. → (ङ), 3. → (क), 4. → (ख), 5.→ (ग)।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर
1. हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य का नाम लिखिए।
2. नायक के सम्पूर्ण जीवन का चित्रण किस काव्य में होता है? (2013, 15)
3. जिस काव्य में एक ही सर्ग होता है, उसे क्या कहते हैं? [2009]
4. जहाँ नायक-नायिका के विरह का वर्णन हो, वहाँ कौन-सा रस होगा?
5. स्थायी भाव कितने माने गये हैं?
6. संचारी भावों की संख्या कितनी है? [2013]
7. स्थायी भावों के उत्पन्न होने के कारणों को क्या कहते हैं? [2018]
8. छन्दोबद्ध एवं लयात्मक रचना को क्या कहते हैं?।
9. अनुभाव कितने प्रकार के होते हैं?
10. जिनसे अर्थ में चमत्कार पैदा होता है,वो क्या कहलाते हैं?
11. गीतिका किस प्रकार का छन्द है?
12. वात्सल्य रस के अलावा रसों की संख्या कितनी मानी गयी है? [2016]
13. आश्रय के चित्त में उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को क्या कहते हैं? [2017]
उत्तर-
1. रामचरितमानस,
2. महाकाव्य,
3. खण्डकाव्य,
4. वियोग श्रृंगार,
5. नौ,
6. तैंतीस,
7. विभाव,
8. काव्य,
9. पाँच,
10. अर्थालंकार,
11. मात्रिक,
12. नौ,
13. संचारी भाव।

(ख) लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. कविता से क्या तात्पर्य है?
अथवा
काव्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
(1) रसयुक्त वाक्य को काव्य की संज्ञा से विभूषित किया जाता है।
अथवा
(2) छन्द में बँधी रचना को काव्य कहते हैं।
(3) पंडितराज जगन्नाथ के मतानुसार-“रमणीय अर्थ को व्यक्त करने वाली शब्दावली काव्य है।”

प्रश्न 2.
कविता के बाह्य स्वरूप सम्बन्धी तत्त्वों का विवरण दीजिए।
उत्तर-
कविता के बाह्य तत्त्व निम्नवत् हैं
(1) भाषा,
(2) छन्द,
(3) अलंकार,
(4) गेयता,
(5) चित्रात्मकता,
(6) शब्द-गुण,
(7) शब्द शक्ति।

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प्रश्न 3.
कविता के आन्तरिक तत्त्व बताइए।
उत्तर-
कविता के आन्तरिक तत्त्व निम्नलिखित हैं
(1) भावों एवं विचारों की उत्कृष्टता,
(2) रसानुभूति,
(3) अनुभूति की तीव्रता,
(4) हृदयस्पर्शी होना,
(5) अनुभूतियों का मर्मस्पर्शी होना।

प्रश्न 4.
दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य का अर्थ बताइए।
उत्तर-
काव्य के दो भेद स्वीकारे गये हैं, ये क्रमशः दृश्य-काव्य एवं श्रव्य-काव्य के नाम से जाने जाते हैं। नाटक एवं एकांकी आदि दृश्य-काव्य के अन्तर्गत आते हैं। दृश्य-काव्य रंगमंच पर अभिनीत किये जाते हैं। इसका रसास्वादन देखकर ग्रहण किया जा सकता है। इस हेतु इन्हें दृश्य-काव्य कहा जाता है। दूसरी तरह के काव्य श्रव्य-काव्य के नाम से सम्बोधित किये जाते हैं। इनका रसास्वादन प्रमुखतः श्रवण करके (सुनकर) ग्रहण किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
श्रव्य काव्य एवं दृश्य काव्य में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
‘दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य’ में क्या अन्तर है?
उत्तर-

  1. श्रव्य-काव्य का रसास्वादन श्रवण करके अथवा पढ़कर प्राप्त किया जाता है; यथा-उपन्यास, कविता एवं कहानी।
  2. दृश्य काव्य का रसास्वादन अथवा आनन्द रंगमंच पर अभिनीत होते हुए देखकर प्राप्त किया जा सकता है; यथा-नाटक एवं एकांकी।

प्रश्न 6.
शब्द गुण (काव्य गुण) के प्रमुख प्रकारों को परिभाषित कीजिए। [2014]
उत्तर-
शब्द गुण (काव्य गुण) निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं
(1) माधुर्य गुण-जिस काव्य के सुनने से आत्मा द्रवित हो जाये, मन आप्लावित और कानों में मधु घुल जाये वही माधुर्य गुणयुक्त है।

उदाहरण-

छाया करती रहे सदा, तुझ पर सुहाग की छाँह।
सुख-दुख में ग्रीवा के नीचे हो, प्रियतम की बाँह ॥

(2) प्रसाद गुण-जब किसी कविता का अर्थ आसानी से समझ में आ जाये तब वहाँ प्रसाद गुण होता है।

उदाहरण-

“अब हरिनाम सुमिरि सुखधाम,
जगत में जीवन दो दिन का ॥”

(3) ओज गुण [2012] -जिस काव्य के सुनने या पढ़ने से चित्त की उत्तेजना वृत्ति जाग्रत हो,वह रचना ओज गुण सम्पन्न होती है।

उदाहरण-

“बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।”

प्रश्न 7.
मुक्तक काव्य किसे कहते हैं? इसकी दो विशेषताएँ लिखिए। [2009]
उत्तर-
मुक्तक रचना में हर पद स्वतः पूर्ण होता है। इसकी रचना में कथा नहीं होती। प्रत्येक छन्द पूर्व पद के प्रसंग से सर्वथा अछूता अथवा मुक्त होता है, अतः मुक्तक काव्य पुकारा जाता है। सूर एवं मीरा के पद तथा गिरिधर की कुंडलियाँ मुक्तक काव्य के अन्तर्गत आते हैं।

विशेषताएँ-

  • हर छन्द अपने आप में पूर्ण होता है।
  • एक प्रकार का जीवन दर्शन छिपा रहता है।

प्रश्न 8.
पाठ्य मुक्तक एवं गेय मुक्तक में अन्तर लिखिए। [2018]
उत्तर-
पाठ्य मुक्तक-पाठ्य मुक्तक पढ़े जाते हैं। इनमें किसी एक भाव या अनुभूति की गहनता होती है। बिहारी,कबीर, रहीम, तुलसी के दोहे इस कोटि में आते हैं। गेय मुक्तक-गेय मुक्तक गाये जाते हैं। इनमें संगीतात्मकता अथवा गेयता विद्यमान रहती है। सूर, मीरा,तुलसी के पद इसके जीवन्त उदाहरण हैं।

प्रश्न 9.
खण्डकाव्य किसे कहते हैं? हिन्दी के चार खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।
अथवा [2009]
खण्डकाव्य की परिभाषा एवं एक खण्डकाव्य का नाम लिखिए। [2015]
उत्तर-
खण्डकाव्य में जीवन के किसी एक पक्ष का अंकन होता है। एक घटना अथवा व्यवहार का ही चित्रण किया जाता है।
हिन्दी के चार खण्डकाव्य निम्नवत् अवलोकनीय हैं-

  • जानकी मंगल-तुलसीदास।
  • सिद्धराज-मैथिलीशरण गुप्त।
  • सुदामा-चरित-नरोत्तमदास।
  • गंगावतरण-जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’।

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प्रश्न 10.
महाकाव्य किसे कहते हैं? दो प्रमुख महाकाव्यों एवं उनके रचनाकारों के नाम लिखिए। [2012]
अथवा
महाकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।
अथवा
महाकाव्य की परिभाषा देते हुए दो महाकाव्यों के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर-
महाकाव्य में किसी महापुरुष के समस्त जीवन की कथा होती है। इसमें कई सर्ग होते हैं। मूल कथा के साथ प्रासंगिक कथाएँ भी होती हैं। महाकाव्य का प्रधान रस श्रृंगार, वीर अथवा शान्त होता है।

इसकी विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

  • महाकाव्य के कथानक में क्रमबद्धता होती है।
  • नायक उदात्त एवं धीरोदात्त होता है।
  • हृदयस्पर्शी मार्मिक प्रसंगों का वर्णन होता है।
  • विषय विस्तृत एवं कथा इतिहास सम्मत होती है।
  • सम्पूर्ण महाकाव्य में एक छन्द प्रयुक्त होता है। भावी कथा के आयोजन हेतु छन्द बदला जाता है।
  • शान्त, शृंगार एवं वीर रस में से किसी एक रस का उद्रेक होता है।
  • जीवन के सम्पूर्ण रूप का चित्रण होता है।

दो प्रमुख महाकाव्यों के नाम-

  • रामचरितमानस (तुलसीदास),
  • कामायनी (जयशंकर प्रसाद)।

प्रश्न 11.
महाकाव्य और खण्डकाव्य में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2009, 14, 16, 17]
उत्तर-

  • महाकाव्य में जीवन के समग्र रूप का उल्लेख होता है। खण्डकाव्य में जीवन के एक पक्ष का उद्घाटन किया जाता है।
  • महाकाव्य विस्तृत होता है तथा खण्डकाव्य संक्षिप्त होता है।
  • महाकाव्य में प्रकृति चित्रण विशद् रूप में किया जाता है जबकि खण्डकाव्य में प्रकृति चित्रण संक्षिप्त रूप में किया जाता है।
  • महाकाव्य में पात्रों की संख्या अधिक होती है। खण्डकाव्य में पात्र कम तथा सीमित होते हैं।

प्रश्न 12.
प्रबन्ध काव्य किसे कहते हैं? [2009]
अथवा
प्रबन्ध काव्य किसे कहते हैं? इसके भेद बताइए तथा उदाहरण लिखिए। [2011]
अथवा
प्रबन्ध काव्य का अर्थ लिखते हुए उसके भेदों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए। [2012]
उत्तर-
प्रबन्ध काव्य काव्य का एक प्रमुख भेद है। प्रबन्ध काव्य में छन्द किसी एक कथासूत्र में पिरोये रहते हैं। छन्दों के क्रम में कोई परिवर्तन नहीं होता है. इसका क्षेत्र विस्तृत होता है। इसमें किसी व्यक्ति के जीवन चरित्र की विभिन्न झाँकियाँ होती हैं।

प्रबन्ध काव्य के दो प्रकार माने गये हैं-

  • महाकाव्य,
  • खण्डकाव्य।

उदाहरण-

महाकाव्य-रामचरितमानस, साकेत, कामायनी।
खण्डकाव्य-सुदामाचरित्र,पंचवटी, हल्दीघाटी।

प्रश्न 13.
रस के अंगों के नाम लिखिए और विभाव को समझाइए।
उत्तर-
रस के अंग-स्थायी भाव, आलम्बन विभाव, अनुभाव,संचारी भाव होते हैं। विभाव-स्थायी भाव को जाग्रत तथा उद्दीपन करने वाले कारक विभाव कहलाते हैं।

प्रश्न 14.
रसों के नाम बताइए।
उत्तर-
हिन्दी साहित्य में रसों की संख्या 9 (नौ) मानी गई है। ये निम्नवत् हैं-

  • शृंगार,
  • वीर,
  • अद्भुत,
  • रौद्र,
  • करुण,
  • भयानक,
  • हास्य,
  • वीभत्स,
  • शान्त।

प्रश्न 15.
रसों के स्थायी भावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
MP Board Class 10th Special Hindi काव्य बोध img-6

प्रश्न 16.
“बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ” पंक्ति में कौन-सा रस है? पहचान कर उसके भेद बताइए।
उत्तर-
शृंगार रस। शृंगार रस के दो भेद होते हैं-संयोग एवं वियोग। उपर्युक्त दोहे में संयोग रस की छटा है।

प्रश्न 17.
“अब मैं नाच्यो बहुत मोपाल” पंक्ति में कौन-सा रस है? [2009]
उत्तर-
शान्त रस की छटा है।

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प्रश्न 18.
रस की निष्पत्ति कैसे होती है?
उत्तर-
“विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव के संयोग से स्थायी भाव परिपक्व होते हैं तभी रस की निष्पत्ति होती है।”

प्रश्न 19.
वीर रस का स्थायी भाव लिखते हुए एक उदाहरण दीजिए। [2016]
उत्तर-
वीर रस का स्थायी भाव ‘उत्साह’ है।

उदाहरण-

“बुंदेले हर बोलो के मुख हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।”

प्रश्न 20.
स्थायी भाव एवं संचारी भाव में अन्तर बताइये।। [2012, 15]
उत्तर-
स्थायी भाव एवं संचारी भाव में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं-

  1. मानव हृदय में सुषुप्त रूप में रहने वाले मनोभाव स्थायी भाव कहलाते हैं, जबकि हृदय में अन्य अनन्त भाव जाग्रत तथा विलीन होते रहते हैं,उनको संचारी भाव कहा जाता है।
  2. स्थायी भाव स्थायी रूप से हृदय में विद्यमान रहते हैं, जबकि संचारी भाव कुछ समय रहकर समाप्त हो जाते हैं।
  3. स्थायी भाव उद्दीपन के प्रभाव से उद्दीप्त होते हैं, जबकि संचारी भाव स्थायी भाव के विकास में सहायक होते हैं। .
  4. स्थायी भावों की कुल संख्या 10 है, जबकि संचारी भाव तैंतीस माने गये हैं।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित में कौन-सा अलंकार है? [2009, 10]
पड़ी अचानक नदी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस बार, तब तक चेतक था उस पार।।
उत्तर-
इस पंक्ति में ‘अतिश्योक्ति’ अलंकार है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 9 मैं अमर शहीदों का चारण

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 9 मैं अमर शहीदों का चारण (श्री कृष्ण सरल)

मैं अमर शहीदों का चारण अभ्यास-प्रश्न

मैं अमर शहीदों का चारण लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि चारण बनने की कामना क्यों करता है।
उत्तर
कवि चारण बनने की कामना करता है, क्योंकि वह अमर शहीदों के अद्भुत त्याग-बलिदान से बहुत अधिक प्रभावित है।

प्रश्न 2.
इस कविता में कवि किसका कर्ज चुकाना चाहता है?
उत्तर
इस कविता में कवि अपने राष्ट्र का कर्ज चुकाना चाहता है?

प्रश्न 3.
आजादी प्राप्त करने में शहीदों का क्या योगदान रहा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आजादी प्राप्त करने में शहीदों का विशेष ही नहीं, अपितु सर्वाधिक योगदान रहा। उन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया।

मैं अमर शहीदों का चारण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शहीदों का नाम गौरव के साथ क्यों लिया जाता है?
उत्तर
शहीदों का नाम गौरव के साथ लिया जाता है। यह इसलिए कि उन्होंने स्वतंत्रता-संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। उन्होंने अपने जीवन में आने वाली अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं को त्याग कर अपनी मातृभूमि के आँसुओं को पोंछने के लिए अनेक तरह के कष्टों को सहा। अंत में उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगा दी।

प्रश्न 2.
धरती में मस्तक बोने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर
धरती में मस्तक बोने का तात्पर्य है-अपने-आपको निछावर कर देना। हमारे देश के अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए अपने तन-मन-धन आदि सब कुछ को न्यौछावर कर दिया।

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प्रश्न 3.
माँ के आँसू देखकर शहीदों ने किस पब को अपनाया?
उत्तर
माँ के आँसू देखकर शहीदों ने अपने जीवन में आई हुई सरस फुहारों को लौटा दिया। उन्होंने काँटों को चुन लिया। इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन की रंगीन बहारों को लौटाकर स्वतंत्रता-संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

प्रश्न 4.
‘जो कर्ज राष्ट्र ने……………है’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जो ‘कर्ज राष्ट्र ने….है’ इस पक्ति का आशय है-कवि अपने राष्ट्र के प्रति वफादार है। इसलिए वह राष्ट्र की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वालों अमर शहीदों का चारण बनकर उनकी यशस्वी गौरव-गाथा का गान करते हुए नहीं थकता है। इसे वह अपनी मातृभूमि के प्रति पवित्र कर्त्तव्य समझता-मानता है।

प्रश्न 5.
कवि ने किस जीवन को श्रेष्ठ माना है और क्यों?
उत्तर
कवि ने देश के लिए समर्पित जीवन को श्रेष्ठ माना है। यह इसलिए कि किसी भी देश के निवासियों का यह पवित्र कर्त्तव्य है। इसका निर्वाह करके ही कोई देशवासी अपने देश के इस ऋण-भार से मुक्त हो सकता है।

मैं अमर शहीदों का चारण भाषा-अध्ययन/काव्य-सौंदर्य

प्रश्न 1.
‘उनने धरती में मस्तक बोए हैं’ इस पंक्ति में प्रतीकात्मकता है। प्रतीक के माध्यम से शहीदों की वीरता का यशोगान किया गया है। इसी तरह की अन्य प्रतीकात्मक पंक्तियाँ लिखिए।
2. यह कविता वीर रस से ओत-प्रोत है। इसी तरह वीर रस की कोई अन्य पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर

  1. उनकी लाशों पर चलकर आजादी आई है।
  2. हिंदुस्तान आज जिंदा उनकी कुर्बानी से।
  3. वे अगर न होते, तो भारत मुर्दो का देश कहा जाता।
  4. दाग गुलामी के उनके लोहू से धोए हैं।
  5. माँ के अर्जन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े।
  6. भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहाकर दिखा गए।
  7. इस प्रश्न को छात्र/छात्रा स्वयं हल करें।

मैं अमर शहीदों का चारण योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
चंद्रशेखर आजाद की जन्म शताब्दी कब मनाई गई? अपने शिक्षक से जानकारी प्राप्त करें तवा आजादी पर केंद्रित कविता याद करें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

2. श्रीकृष्ण ‘सरल’ के जीवन की घटनाओं को एकत्र कर एक संक्षिप्त जीवनी लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मैं अमर शहीदों का चारण परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि’चारण बनकर क्या करता है?
उत्तर
कवि चारण बनकर अमर शहीदों का यशगान करता है।

प्रश्न 2.
अगर अमर शहीद न होते तो क्या होता?
उत्तर
अगर अमीर शहीद न होते तो हमारा देश मुर्दो का देश कहा जाता। इससे हमारा जीवन न सहने योग्य एक बोझ बनकर रह जाता।

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प्रश्न 3.
अपनी मातृभूमि की अर्चना अमर शहीदों ने किससे की?
उत्तर
अपनी मातृभूमि की अर्चना अमर शहीदों ने फूल से नहीं की, अपितु अपने मस्तक को देकर की, अर्थात् अपने प्राणों की आहुति देकर की।

मैं अमर शहीदों का चारण दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि के अनुसार क्या सच है?
उत्तर
कवि के अनुसार सच है

  1. हम लोगों ने शहीदों की यादों को दफना दिया है, अर्थात् शहीदों को भुला दिया है।
  2. उनके ही त्याग-बलिदानों से हमने आजादी हासिल की है।
  3. आज हिंदुस्तान उन्हीं की कुर्बानी से जिंदा है।
  4. आज हम उनके ही बलिदान से अपना मस्तक ऊँचा किए हुए हैं।
  5. हम गुलामी के दाग उनके ही प्राण निछावर से मिटा सके हैं।

प्रश्न 2.
अमर शहीदों के जीवन में क्या-क्या सुख-आनंद आए थे? उनको उन्होंने क्या किया?
उत्तर
अमर शहीदों के जीवन में रंगीन-बहारें, सपने के समान निधियाँ, सरस फुहारें आदि सुख-आनंद आए थे। उनको उन्होंने अपनी मातृभूमि के आँसुओं को देखकर वापस कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने सभी प्रकार के सुखों को अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए न्यौछावर कर दिए।

प्रश्न 3.
‘मैं अमर शहीदों का चारण’ कविता का प्रतिपाय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ विरचित कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण’ एक प्रेरणादायक कविता है। इसमें श्री ‘सरल’ ने अपनी ओजपूर्ण भावधारा को भक्तिरस से भर दिया है। इस कविता में उन्होंने स्वयं को ‘अमर शहीदों का चारण’ कहा है। फिर देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर शहीदों के गौरवपूर्ण अतीत का चित्रण कर उनका यशोगान किया है। उन्होंने यह सुस्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता संग्राम में इन वीरों ने फूलों के मार्ग को त्यागकर काँटों से भरे रास्ते का वरण किया, यही नहीं उन्होंने भारत माँ की अर्चना में सहर्ष अपना मस्तक समर्पित कर दिया। फलस्वरूप ऐसे वीर शहीद इतिहास में अमर होकर जन-जन के लिए प्रेरणादायी हो गए।

मैं अमर शहीदों का चारण कवि-परिचय

प्रश्न
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
भारतीय स्वाधीनता सेनानियों और क्रांतिकारियों का यशगान करने वाले कवियों में श्रीकृष्ण ‘सरल’ का नाम अत्यंत लोकप्रिय है। शहीदों के प्रति श्रद्धा-भाव रखने और प्राचीन भारतीय सभ्यता के अमर-गायक श्रीकृष्ण ‘सरल’ अत्यधिक प्रसिद्ध कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

जीवन-परिचय-कविवर श्रीकृष्ण ‘सरल’ का जन्म मध्य प्रदेश के गुना जिलान्तर्गत अशोक नगर में 1 जनवरी 1919 को हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में ही हुई। आपका बालस्वरूप अत्यंत स्वाभिमानी और स्वाध्यायी था। आपने अपने स्वाध्याय के द्वारा कई परीक्षाओं को अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर लिया। शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत आपने अध्यापन क्षेत्र में प्रवेश लिया। इस अध्यापन-वृत्ति से आप आजीवन संबद्ध रहे। इसे आपने अत्यंत सफलतापूर्वक निभाया। सन् 1976 में आप शिक्षा महाविद्यालय उज्जैन से सेवा-निवृत्त हुए। तब से लेकर आज तक आप स्वतंत्र रूप से लेखन-कार्य में व्यस्त हैं
रचनाएँ-श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने काव्य और गद्य दोनों पर ही अपना समानाधिकार दिखाया है। आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. महाकाव्य-

  • भगत सिंह
  • चन्द्रशेखर आजाद
  • सुभाष चन्द्र बोस

2. काव्य-संकलन-

  • मुक्तिगान
  • स्मृति-पूजा।

3. बाल-साहित्य-बच्चों की फुलवारी।
4. गय-ग्रंथ-संसार की प्राचीन समस्याएँ, सभाष-दर्शन आदि।

भाषा-शैली-श्रीकृष्ण ‘सरल’ की भाषा उसके नाम के अनुरूप ही है। दूसरे शब्दों में उनकी भाषा सरल, सुबोध और सुस्पष्ट भाषा है। उसमें तद्भव और देशज शब्दावली की प्रधानता है। इस प्रकार की भाषा से भावाभिव्यक्ति को स्पष्ट होने में कोई कठिनाई नहीं दिखाई देती। श्रीकृष्ण ‘सरल’ की शैली ओजमयी और प्रौढ़मयी है। वह अधिक सशक्त, पुष्ट और सबल है। गंभीर-से गंभीर विषयों को अलंकृत शैली में प्रस्तुत करने की विशेषता प्रकट करने वाले श्रीकृष्ण ‘सरल’ में भाषा-शैली की प्रचुर क्षमता और योग्यता है।

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व्यक्तित्व-श्रीकृष्ण ‘सरल’ का व्यक्तित्व देशभक्त और क्रांतिकारी व्यक्तित्व है। उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष है भारतीय अतीत के प्रति आस्थावान और श्रद्धावान व्यक्तित्व । इन दोनों प्रकार के व्यक्तित्त्व को जोड़कर एक पूरा और सफल व्यक्तित्व बना है-सफल और परिपक्व रचनाशील व्यक्तित्व । इस तरह से श्रीकृष्ण ‘सरल’ का व्यक्तित्व एक युगीन व्यक्तित्व सिद्ध होता है।

महत्त्व-श्रीकृष्ण ‘सरल’ का राष्ट्रीय विचार प्रधान रचनाकारों में विशिष्ट स्थान है। अतीत को सरेरक रूप में प्रस्तुत करने वाले साहित्यकारों में भी उनका स्थान सर्वोच्च है। भारतीय संस्कृति का महत्त्वांकन करने में जितनी बड़ी सफलता आपको मिली है। यह अन्यत्र कम ही दिखाई देती है।

मैं अमर शहीदों का चारण कविता का सारांश

प्रश्न
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’-विरचित कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ विरचित कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण’ एक प्रेरक और भावों को जगाने वाली कविता है। इस कविता का सारांश इस प्रकार है कवि अमर शहीदों के प्रति अपना श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए कहता है कि वह अमर शहीदों के यश का गायन करता है। इससे वह अपने राष्ट्र के कर्ज-पार से मुक्त’ हुआ करता है। इस सच्चाई को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता है कि हमने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देने वाले वीर बलिदानों को मुला दिया है। लेकिन आज देश उन्हीं के प्राण न्यौछावर से स्वतंत्र है। अगर वे नहीं होते तो हम आजाद नहीं होते और गुलामी के बंधनों में पड़े-पड़े छटपटाते रहते। इसलिए वह (कवि) आज की पीढ़ी के अंदर उन अमर शहीदों के प्रति सच्चे श्रद्धाभावों को जगाने का प्रयत्न किया करता है। उन्हें याद करते हुए हमें यह अच्छी तरह से जानना चाहिए कि उन अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि के आँसुओं को देख करके अपने सुखों का परित्याग कर दिया और उसके लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। ऐसा करते हुए उन्होंने कोई लम्बे-चौड़े वादे नहीं किए। वे अपनी मातृभूमि की पूजा-अर्चना के लिए फूलों के स्थान पर अपने मस्तक ही लेकर आगे बढ़े थे।

मैं अमर शहीदों का चारण संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पदों की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौंदर्य व विषय-वस्त पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता है
जो कर्ज राष्ट्र से खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।
यह सच है, बाद शहीदों की, हम लोगों ने दफनाई है,
यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आजादी आई है।
यह सच है, हिंदुस्तान आज जिंदा उनकी कुर्बानी से,
यह सच, अपना मस्तक ऊँचा उनकी बलिदान कहानी से

शब्दार्च-चारण-भाट, यश गान करने वाला। दफनाई-भुला दी। लाश-पलिदानों। कुर्बानी-बलिदान।

प्रसंग-यह पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिंदी सामान्य’ में संकलित तथा श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’-विरिचत कविता ‘मैं अमर शहीदों का चारण से है। इसमें कवि ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वालों के प्रति अपने श्रद्धा-भावों को प्रकट करते हुए कहा है कि

व्याख्या-वह अपने देश की आजादी के लिए मर-मिटने वाले अमर शहीदों का चारण है। वह उनके यश का गीत हमेशा गाया करता है। इससे वह अपने सष्ट्र के ऋण-भार से मुक्त हुआ करता है।

कवि का पुनः कहना है कि इस सच्चाई को कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता है कि जिन अमर शहीद के बदौलत हमारे देश को एक लंबी गुलामी के बाद आजादी मिली है, उन्हें आज हम देशवासी लगभग भुला दिए हैं। यह भी एक सच्चाई है कि उन शहीदों के सब कुछ न्यौछावर कर देने और उनके बलिदानों से ही हम आजादी को हासिल किए हैं। यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि उन अमर शहीदों के बलिदानों के बदौलत ही आज हमारा देश अपनी पहचान बढ़ा रहा है और अपनी शक्ति-संपन्नता का परिचय दे रहा है। यह भी अपने आप में बहुत बड़ी सच्चाई है कि उन अमर शहीदों के त्याग और बलिदान के कारण ही हमारा यह भारत देशबड़े गर्व से अपना सिर उठाए हुआ अपना महत्त्व क्तला रहा है।

विशेष-

  1. भाषा हिन्दी-उर्दू के सरल शब्दों की है।
  2. शैली वर्णनात्मक है।
  3. वीर रस का प्रवाह है।
  4. यह पद्यांश प्रेरक रूप में है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में यह सच है कि पुनरावृत्ति से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का चमत्कार भक्ति रस के प्रवाह से गतिशील बनाकर भाववर्द्धक है। तुकांत शब्दावली की योजना से प्रस्तुत पद्यांश का सौंदर्य बढ़ गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य मिश्रित भाव और भाषा के प्रयोग से और कथन की स्वाभाविकता-सरलता रोचक रूप में प्रस्तुत हुआ है। इस प्रकार यह प्रेरक और मर्मस्पर्शी होने के साथ-साथ अनूठा भी कहा जा सकता है।

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2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) आज देशवासियों ने शहीदों के प्रति क्या अपराध किया है?
(ii) शहीदों की कुर्बानी का क्या फल मिला?
उत्तर
(i) आज देशवासियों ने शहीदों के प्रति यह अपराध किया है कि उन्होंने शहीदों की यादों को भुला दिया है।
(ii) शहीदों की कुर्बानी का फल यह मिला कि उससे ही हमने आजादी पाई है। उनकी ही कुर्बानी से आज यह हमारा देश
आत्मनिर्भरता का मस्तक ऊँचा किया है।

2. ये अगर न होते, तो भारत मुदों का देश कहा जाता,
जीवन ऐसा बोझा होता, जो हमसे नहीं सहा जाता।
यह सच है दाग गुलामी के उनके लोहू से धोए हैं,
हम लोग बीज बोते, उनने घरती में मस्तक बोए हैं।

शब्दार्थ-मुर्दो-बेजानों। बोझा-वजन, भार। दाग-दोष, कलंक। लोहू-खून।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने देश के अमर शहीदों का महत्त्वांकन करते हुए कहा है कि

व्याख्या-अगर हमारे देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ त्याग-बलिदान करने वाले हमारे अमर शहीद न होते, तो देश गुलामी के बंधन में बँधा रहता। उसे मुर्दा समझकर उस पर बाहरी शासक अर्थात् अंग्रेजी सत्ता अपना शासन करती। फलस्वरूप प्रत्येक देशवासी की जिंदगी एक ऐसा बोझ बनकर रह जाती, जिसे सहना बड़ा ही असंभव-सा हो जाता। अगर हम अपने देश के अमर शहीदों को गहराई से समझने की कोशिश करेंगे, तो हम यह अवश्य पाएँगे कि हमारे देश के ऊपर गुलामी का जो दाग लगा था, उसे उन्होंने अपना सब कुछ परित्याग-न्यौछावर करके बिल्कुल धो दिया है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हम लोग तो साधारण बीज बोते हैं, लेकिन उन्होंने तो इस देश की धरती पर अपने मस्तक रूपी बीज को बोकर हमें अमन-चैन की जिंदगी दी है।

विशेष-

  1. अमर शहीदों की असाधारण देन का उल्लेख किया गया है।
  2. इस पयांश से देश-भक्ति की भावना जग रही है।
  3. मुहावरेदार शैली है।
  4. तुकांत शब्दावली है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा सरल शब्दों से प्रस्तत होकर महावरेदार शैली से प्रभावशाली बन गई है। बिंब-प्रतीक यथास्थान है। काव्य-स्वरूप की योजना आकर्षक रूप में है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य शहीदों के त्याग-बलिदान की वीरता को सरलता से बतलाकर भावों को बढ़ाने वाला है। अमर शहीदों की एक-एक विशेषताओं को रोचक रूप में प्रस्तुत करने का भाव सचमुच में अनूठा है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) अमर शहीद न होते क्या होता और क्यों?
(ii) ‘दाग गुलामी के लोहू से घोए हैं’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) अमर शहीद न होते तो देश आजाद नहीं होता। यह इसलिए गुलामी की बेड़ी नहीं टूटती और यह देश न जाने कब तक गुलाम बना रहता।
(ii) ‘दाग गुलामी के लोहू से धोए हैं, से तात्पर्य है, अमर शहीदों ने अपने प्राणों का बलिदान करके, इस गुलाम देश को आजाद करवाया है।

3. इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के, में भाव जगाया करता हूँ,
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।
यह सच, उनके जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं,
जीवन की स्वप्निल निधियाँ भी उनने जीवन में पाई थीं।

शब्दार्थ-भाव-उत्साह। रंगीन-आकर्षक, सुखद। स्वप्निल-स्वप्न के समान। निधियाँ-खजाने।

प्रसंग-पूर्ववत। इसमें कवि ने देश के अमर शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धा और कर्तव्य-भाव को प्रकट करते हुए कहा है कि

व्याख्या-वह अपने देश के वर्तमान युवा पीढ़ी के अंदर बार-बार अपने देश के अमर शहीदों के त्याग-बलिदान को उत्साहवर्द्धक और प्रेरक रूप में रखने का प्रयास किया करता है। इस प्रकार वह उन अमर शहीदों का चारण है। उनके अमर यशगान को गाया करता है। यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि उन अमर शहीदों के भी जीवन में सबकी तरह आकर्षक और सुखद अवसर प्राप्त हुए थे। इस प्रकार स्वप्न के समान उन्होंने अपने जीवन में अनेक प्रकार के सुख-सुविधाओं के खजाने (अवसर) प्राप्त किए थे।

विशेष-

  1. कवि का आत्मकर्तव्य-बोध सराहनीय है।
  2. तुकांत शब्दावली आकर्षक है।
  3. लय और संगीत की सुंदर योजना है।
  4. यह अंश ज्ञानवर्द्धक और भाववर्द्धक है।
  5. भक्ति रस का प्रवाह है।

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1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पयांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौंदर्य सरल शब्दों और सरल काव्य-स्वरूपों से निखरकर आया है। भक्ति रस का प्रवाह और तुकांत शब्दावली से प्रस्तुत लयात्मकता से काव्याकर्षण बढ़ गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना सहज रूप में है। कवि-धर्म देश-भक्तों का गुणगान करना भी होता है, इसे कवि ने अपने भावों के द्वारा व्यक्त कर दिया है। शहीदों के त्याग-बलिदान के संकेत से भाव-योजना में और स्वाभाविकता आ गई है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) ‘इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के’ कवन का तात्पर्य क्या है?
(ii) ‘अमर शहीदों के जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं’ और ‘उन्होंने अपने जीवन में स्वप्निल निधियाँ पाई वी’ कहकर कवि ने क्या प्रकट करना चाहता है?
उत्तर
(i) इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के कथन का तात्पर्य है. वर्तमान युवा पीढ़ी को अमर शहीदों के युग-प्रभाव’ को बतलाना।
(ii) अमर शहीदों के जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं और उन्होंने अपने जीवन में स्वप्निल निधियाँ पाई थीं’ कहकर कवि यह प्रकट करना चाहता है कि अमर शहीदों ने अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह न करके देश की आजादी को प्राप्त करने को ही महत्त्व दिया।

4. पर, माँ के आँसू लख उनने सब सरस फुहारें लौटा दी,
काँटों के पथ का वरण किया, रंगीन बहारें लौटा दी।
उनने धरती की सेक के वादे न किए लंबे-चौड़े
माँ के अर्चन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े।

शब्दार्थ-लख-देखकर। फुहारें-बहारें। बरण-स्वागत। अर्चन-पूजा। हित-के लिए। निज-अपने।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने अमर शहीदों के अद्भुत देश-भक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-देश के अमर शहीदों ने अपने जीवन में आई हई सरसता भरी फहारों की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और न उन्होंने उसे और को महत्त्व ही दिया। उन्होंने तो अपनी मातृभूमि को गुलामी की बेड़ियों में कसे हुए देखा। उसे आँसू बहाते हुए देखा तो अपने जीवन की ‘सरस फुहारों’ को अनदेखा कर दिया। इस तरह उन्होंने अपने सुखमय जीवन को छोड़कर दुखमय जीवन को चुना। फूलों को छोड़कर काँटों को अपनाया। ऐसा करके उन्होंने अपने जीवन में आई रंगीन बहारें लौटा दीं। इस प्रकार उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा, उसकी आजादी और सेवा के लिए किसी भी प्रकार की बड़ी-बड़ी खोखली बातें नहीं की। आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने अपनी मातृभूमि की अर्चना-पूजा के लिए फूल नहीं, अपने शीश (मस्तक) को ही अर्पित-समर्पित कर दिया।

विशेष-

  1. अमर शहीदों की देशभक्ति के प्रति किए गए त्याग-बलिदान का उल्लेख है।
  2. प्रतीकात्मक शब्दों के प्रयोग हैं-सरस फुहारें, रंगीन बहार, काँटों का पथ, लंबे-चौड़े वादे आदि।
  3. मुहावरेदार शैली है।
  4. यह अंश उत्साहवर्द्धक है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश में मुहावरेदार शैली के द्वारा कथ्य को आकर्षक बनाने का प्रयास किया गया है। फुहारें लौटाना, काँटों के पथ का वरण करना, रंगीन बहारें लौटाना, लंबे-चौड़े वादे करना और मस्तक लेकर दौड़ना मुहावरे प्रचलित रूप में हैं। इनसे काव्य-सौंदर्य में अच्छा निखार आ गया है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश की भाव-योजना सरस और सरल शब्दों से पुष्ट हुई है। अमर शहीदों के असाधारण और बेजोड़ त्यागपूर्ण देश-भक्ति की भावना को अनूठे रूप में रखने का प्रयास काबिलेतारीफ है।

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2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए क्या-क्या किया?
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए अपने जीवन में आई हुई सरस फुहारें और रंगीन बहारें लौटा दीं। उन्होंने काँटों के पथ का वरण किया। कोई लंबे-चौड़े वादे नहीं किए। इस प्रकार उन्होंने अपनी मातृभूमि की अर्चना के लिए फूल नहीं, अपितु अपने शीश ही चढ़ाए।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का मुख्य भाव है-अमर शहीदों की बेजोड देशभक्ति को प्रेरक रूप में प्रस्तुत करना।

5. भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहाकर दिखा गए,
जग के इतिहासों में अपनी, वे गौरव-गाथा लिखा गए।
उन गाथाओं से सर्द खून को मैं गरमाया करता हूँ।
में अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।

शब्दार्थ-जग-संसार । गौरव-प्रतिष्ठा, महत्त्व, बड़प्पन । गाथा-गीत-कथा, कथा।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें कवि ने अमर शहीदों के अमर त्याग-बलिदान का यशगान करते हुए कहा है कि

व्याख्या-हमारा देश अमर शहीदों का देश है। इसलिए यहाँ के प्रत्येक देशवासी को इसे अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि हमारे अमर शहीदों ने अपने त्याग-बलिदान से यह सिद्ध कर दिया है कि हमारे देश भारत का खून पतला नहीं है, अर्थात् बेअसर और निरर्थक नहीं है। इससे वे पूरे संसार के इतिहास में अपनी यशस्वी गौरव-गाथा को अंकित कर गए। अर्थात् संसार में एक नया इतिहास बना गए। कवि अपने देश के इस प्रकार की अद्भुत वीरता और त्याग-बलिदान का गुणगान करते हुए पुनः कह रहा है कि वह उन अमर शहीदों की अमर जीवन गाथा की चर्चा के फीकी पड़ने को सहन नहीं कर सकता है। उन्हें फिर से अधिक चर्चित करने के लिए वह उनका चारण है। इस प्रकार वह उनके यश का हमेशा गुणगान करता है।

विशेष-

  1. भारतीय अमर शहीदों के बेजोड़ त्याग-बलिदान का उल्लेख है।
  2. कवि की सच्ची देशभक्ति प्रकट हुई है।
  3. ‘पतला खून’ और ‘सर्द खून’ प्रतीकात्मक शब्द से भाषा सजीव हो उठी है।
  4. ‘खून बहाना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) उपर्युक्त पयांश के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) उपर्युक्त पयांश के भाव-सौंदर्य को लिखिए।
उत्तर-
(i) उपर्युक्त पद्यांश में अमर शहीदों के अद्भुत त्याग-बलिदान को प्रतीकात्मक शब्दावली में पिरोकर भक्ति रस से हृदयस्पर्शी बनाने का प्रयास किया गया है। लय और संगीत के मिश्रित प्रयास से प्रस्तुत पद्यांश का सौंदर्य बढ़ गया है।
(ii) उपर्युक्त पद्यांश का भाव-सौंदर्य सुस्पष्ट है। अमर शहीदों के त्याग-बलिदान को ओजस्वी और सजीव भावों के द्वारा प्रस्तुत कर कवि ने इस पद्यांश के भाव-सौंदर्य में अधिक चमत्कार ला दिया है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश में अमर शहीदों की किन विशेषताओं को बतलाया गया है?
(ii) कवि ने शहीदों के प्रति अपनी कौन-सी भावना व्यक्त की है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद्यांश में अमर शहीदों की त्याग-बलिदान और गौरवमयी ऐतिहासिक गाथा प्रस्तुत करने वाली विशेषताओं को बतलाया गया है।
(ii) कवि ने शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धाभावना व्यक्त किया है।

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MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 8 देवताओं के अंचल में

MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 8 देवताओं के अंचल में (अज्ञेय)

देवताओं के अंचल में अभ्यास-प्रश्न

देवताओं के अंचल में लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कुलू में भारी मेला कब लगता है? वहाँ कौन-कौन-सी चीजें विकने आती
उत्तर
कुलू में दशहरे के अवसर पर बड़ा भारी मेला लगता है। रंग-बिरंगे कम्बल, पटू-पट्टियाँ, पश्मीना, ‘चरू’ और अन्य प्रकार की खालें-रीछ की, मग की, बाघ की, कभी-कभी बर्फ के बाघ (स्नो-लेपड) की तरह-तरह के जूते, मोजे, सिली-सिलाई पोशाकें, टोपियाँ, बाँसुरी, बर्तन, पीतल और चाँदी के आभूषण, लकड़ी, हड़ी और सींग की कंधियाँ, देशी और विदेशी काँच, बिल्लौर और पत्थर के मनकों के हार-न जाने क्या-क्या चीजें वहाँ बिकने आती हैं।

प्रश्न 2.
‘हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ किसके द्वारा स्थापित किया गया और यह संस्था किस संबंध में कार्य करती है?
उत्तर
रूसी कलाकार रोयरिक द्वारा स्थापित हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट है। यह संस्था रोयरिक के भाई डॉक्टर जॉर्ज रोयरिक की देखरेख में हिमालय की भाषाओं, जातियों, लोक-साहित्य और वनस्पतियों के संबंध में अनुसंधान करती है। स्वयं रोयरिक भी अक्सर यहीं रहते हैं।

प्रश्न 3.
लेखक ने ऊनी कपड़ों के लिए बढ़िया लांड्री किसे कहा है?
उत्तर
कट्राई से आगे कलाथ है। उसमें गर्म पानी का कुंड है। उसमें गंधक और अन्य रसायन काफी मात्रा में होते हैं। इसे ही लेखक ने ऊनी कपड़ों के लिए बढ़िया लाँड्री कहा है।

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प्रश्न 4.
कुलू प्रदेश को ‘देवताओं का अंचल’ कहा है, क्यों? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कुलू प्रदेश को ‘देवताओं का अंचल’ कहा है। यह इसलिए कि यहाँ सैकड़ों देवी-देवताओं और उनके मंदिर हैं। और साल में एक बार वे अपने-अपने रथों में बैठकर कुलू के रघुनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित राम की उपासना के लिए जाते हैं। इस विराट देव सम्मेलन के कारण भी लेखक ने कुल प्रदेश को देवताओं का अंचल कहा

प्रश्न 5.
लेखक ने ‘मनाली’ के नामकरण के पीछे क्या कारण बताया है?
उत्तर
लेखक ने ‘मनाली’ का नाम यहाँ अधिक संख्या में पाया जाने वाला मुनाल नामक पक्षी से सम्बन्धित बताया है। लेखक ने यह भी कहा है कि कुछ लोग मनाली को वहाँ के सेबों और नाशपाती के कारण ही जानते हैं।

देवताओं के अंचल में दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पाठ के आधार पर ‘कुलू’ व ‘मनाली’ के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर
कुलू को प्राचीन हिंदू-सभ्यता का हिण्डोला (झूला) कहा जा सकता है। यहाँ के हरेक कस्बे और गाँव के अपने-अपने देवता हैं। उनके अपने-अपने मंदिर और भक्त हैं। साल में एक बार वे सभी अपने-अपने रथों में बैठकर कुलू के रखनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित राम की उपासना के लिए जाते हैं। इसलिए कल प्रदेश को ‘देवताओं का अंचल’ (बली ऑफ दि गॉङ्स) कहते हैं। दशहरे के अवसर पर यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है। उसमें अनेक प्रकार की जीवनोपयोगी वस्तुएँ बेची जाती हैं। कुलू-प्रांत में व्यास कुंड तथा व्यास मुनि, बशिष्ठ आदि ऋषि-मुनियों के स्थान हैं, पांडवों के मंदिर हैं. भीम की पत्नी हिडिंबा देवी भी पूजा पाती है, और सबसे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वहाँ पर ‘मनु रिखि’ या मन भगवान का भी एक मंदिर है। शायद भारत में एकमात्र स्थान है, जहाँ मानवता का यह स्वयंभू आदिम प्रवर्तक मंदिर में प्रतिष्ठित हो और पूजा पाता हो।

मनाली का नामकरण यहाँ अधिक संख्या में पाया जानेवाला मुनाल नामक पक्षी के नाम पर हुआ है। कुछ लोग यहाँ के सेब और नाशपाती की श्रेष्ठता के कारण इसे जानते हैं। मनाली की दो बस्तियाँ हैं-एक तो बाहर से आकर बसे हुए लोगों द्वारा बनाए हए बंगलों और बाजार वाली चस्ती, जो दाना कहलाती है, और दूसरी उससे करीब मील भर ऊपर चलकर खास मनाली गाँव की। मोटर दाना तक जाती है। दाना से सड़क फिर व्यास नदी पार करके रोहतंग की जोत से होकर लाहौर को चली जाती है। इसी मार्ग पर मनाली से दो मील की दूरी पर वशिष्ठ नाम का गाँव है, जहाँ गरम पानी के कंड है। और वशिष्ठ मंदिर भी हैं। कहते हैं कि वशिष्ठ ऋषि यहीं तपस्या करते-करते पाषाण हो गए थे, पाषाण-मूर्ति वहाँ पूजी भी जाती हैं। यहाँ पानी में गंधक की मात्रा काफी है, और यह स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है।

प्रश्न 2.
‘कुलू’ प्राचीन हिंदू सभ्यता का गहबारा है।’ लेखक के इस कवन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘कुलू’ प्राचीन हिंदू सभ्यता का गहवारा है। लेखक के इस कथन का आशय यह है कि यहाँ के हरेक कस्बे और गाँव के अपने-अपने देवताओं के मंदिर हैं। वे साल में एक बार अपने रथ में बैठकर कुलू के रघुनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित राम की उपासना के लिए जाते हैं। इससे हिन्दू सभ्यता की अच्छी झलक मिलती है।

प्रश्न 3.
कोकसर के मार्ग में बर्फानी सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर
कोकसर के मार्ग में पड़ने वाले बर्फीले सौंदर्य अद्भुत और बेजोड़ हैं। कुछ मीलों के क्षेत्रफल एक प्याला के समान बना हुआ दृश्य है। उसके चारों ओर बर्फ की ऊँची-ऊँची चोटियाँ हैं। उनके नीचे पहाड़ के खुले रूप हैं, जो काले दिखाई देते हैं। उस प्याले के बीच में बर्फ से ढका हुआ बहुत बड़ा मैदान है। उसे देखकर ऐसा लगता है, मानो अभिमान में आकर पहाड़ की इन ऊँची-ऊँची चोटियों ने अपने सिर और कटि-प्रदेश को ढक लिया है।

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प्रश्न 4.
कुलू और मनाली में कौन-कौन से दर्शनीय स्थल हैं तथा उनका क्या महत्त्व है?
उत्तर
कुलू में प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत रूप में दिखाई देता है। यहाँ अनेक देवी-देवताओं के मंदिर हैं। वे बड़े ही मनोरम हैं। यहाँ कट्राई सबसे सुंदर स्थान है। फैले हए धान के खेतों के बीच-बीच में सेब, नाशपाती, खुबानी, आड़ और आलचे के पेड़ मन को मोह लेते हैं। यहाँ के पुराने राजाओं के महल आदि अनेक दर्शनीय इमारतें और कुछ प्राचीन मंदिर हैं। मनाली का मुनाली पक्षी बहुत ही सुंदर होता है। मनाली से दो मील की दूरी पर वशिष्ठ गाँव में गरम पानी के कुंड हैं और वशिष्ठ मंदिर भी है। यहाँ के पानी में गंधक की मात्रा अधिक है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक है।

प्रश्न 5.
कट्राई के सौंदर्य को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कट्राई के सौंदर्य उसकी सड़क के हर मोड़ पर दिखाई देते हैं। एक ओर ऊँचे-ऊँचे चीड़ के जंगल हैं, तो दूसरी ओर फैली तराई में धान के खेत लहराते हुए दिखाई देते हैं। वे मानों मखमली आँगन हैं। इसी सड़क पर जगत सुख एक ऐसा गाँव है, जहाँ अनेक दर्शनीय पुराने मंदिर हैं।

देवताओं के अंचल में भाषा-अध्ययन

1. पाठ में कई ऐसे शब्द भी आए हैं जिनके एक से अधिक अर्थ मिल जाते हैं। जैसे-सोते (स्रोत, झरना) सोना (क्रिया) हार (पराजय, माला)।
निम्नलिखित शब्दों के एक से अधिक अर्थ बताइए
सोना, तीर, मत, अंबर, श्री, हरि।
उत्तर
शब्द – एक से अधिक अर्व
सोना – नींद में होना, स्वर्ण (एक बहुमूल्य धातु)
तीर – बाण, किनारा
मत – विचार, नहीं
अंबर – वस्त्र, आकाश
श्री. – शोभा, यश
हरि – विष्णु, सिंह।

2. वर्तनी शुद्ध कीजिए
स्रष्टि – सृष्टि
अनूमति – ………….
प्रवतर्क – …………..
प्रतीष्ठीत – ………….
दरशनीय – …………….
अभीमानी – …………..
पोषाक – ………….
सैलानि – …………….
उत्तर
अशुद्ध शब्द – शुद्ध शब्द
स्रष्टि – सृष्टि
अनुमति – अनुमति
प्रर्वतक – प्रवर्तक
प्रतीष्ठीत – प्रतिष्ठित
दरशनीय – दर्शनीय
अभीमानी – अभिमानी
पोषाक – पोशाक
सैलानि – सैलानी।

3. नीचे लिखे शब्दों में से मूल शब्द और प्रत्यय छाँटकर अलग-अलग कीजिए।
साहसिक, दर्शनीय, लड़कपन, सुंदरता, अभिमानी, दुकानदार, प्रतिष्ठित ।
उत्तर
मूल शब्द – प्रत्यय
साहस – ईक
दर्शन – ईय
लड़का – पन
सुन्दर – ता
अभिमान – ई
दुकान – दार
प्रतिष्ठा – इत

4. दिए हुए वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए :
1. जिसके बराबर कोई दूसरा न हो-अद्वितीय ……………….
2. जिसका वर्णन न किया जा सके………..
3. आकाश को छूने वाला………….
4. जिसका कोई आकार न हो….
5. दूसरों पर आश्रित रहने वाला…………
उत्तर

  1. जिसके बराबर कोई दूसरा न हो – अद्वितीय
  2. जिसका वर्णन न किया जा सके – अवर्णनीय
  3. आकाश को छूने वाला – गगनचुम्बी
  4. जिसका कोई आकार न हो – निराकार
  5. दूसरों पर आश्रित रहने वाला – पराश्रित

देवताओं के अंचल में योग्यता-विस्तार

1. इस लेखक के अतिरिक्त किसी अन्य हिन्दी के साहित्यकार द्वारा लिखे गए यात्रा-वृत्तांतों की सूची बनाइए।
2. आप भी किसी स्थान को देखने गए होंगे, उसका यात्रा-वृत्तांत अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

देवताओं के अंचल में परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कहाँ से देवताओं का अंचल आरंभ होता है?
उत्तर
मंडी से कुलू-प्रदेश तक देवताओं का अँचल आरंभ होता है।

प्रश्न 2.
मणिकर्ण क्या है?
उत्तर
मणिकर्ण तीर्थ-स्थान है। यहाँ गरम पानी के कई सोते हैं। उसकी उष्णता अलग-अलग है। कोई नहाने के लिए ठीक है, तो किसी में चावल उबाले जा सकते हैं।

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प्रश्न 3.
कुलू-प्रांत की सबसे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बात क्या है?
उत्तर
कुलू-प्रांत की सबसे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वहाँ पर ‘मनु रिखि’ या मनु भगवान का भी एक मंदिर है। यह शायद भारत में एकमात्र ऐसा स्थान है, जहाँ मानवता यह स्वयंभू आदिम प्रवर्तक मंदिर में प्रतिष्ठित होकर पूजा पाता है।

देवताओं के अंचल में दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मंडी से कुलू-प्रदेश में कैसे जाना पड़ता है?
उत्तर
मंडी से कुलू-प्रदेश में जाने के लिए व्यास नदी को पार करना पड़ता है। व्यास नदी पर रस्सी के झूलना पुल है। उस पर लारी से जाना पड़ता है जो बहुत खतरनाक है। कोई अप्रिय घटना न घटे, इसके लिए यह प्रबंध किया गया है कि पुल का चौकीदार अपनी पीठ पर बड़े-बड़े अक्षरों में यह लिखी हई एक तख्ती टाँगे रहता है-‘चार मील रफ्तार। उसके पीछे-पीछे लारी चलती है। पुल के दोनों ओर चौकीदार पहरा देता रहता है। उसकी अनुमति के बिना कोई आर-पार नहीं जा सकता है।

प्रश्न 2.
रोहतंग मार्ग की क्या विशेषता है?
उत्तर
रोहतंग की जोत पर ही व्यास-कंड है। यहाँ से कुछ मील हटकर व्यास मुनि का स्थान है, जहाँ से व्यास नदी का उद्गम है। रोहतंग का मार्ग बहुत रमणीक है। व्यास नदी के वेग से किस तरह पहाड़ के पहाड़ कट गए हैं, वे भी देखने की चीज है। कहीं-कहीं तो नदी आठ-दस फुट चौड़ी दरार में चार-पाँच सौ फुट नीचे जाकर अदृश्य हो गई है, केवल स्वर सुनाई पड़ता है। इसका कारण यह है कि व्यास नदी तीव्र गति से नीचे उतरती है-अपने मार्ग के पहले पाँच मील में जितना नीचे उतर आती है, वह उतना अगले पचास मील में नहीं, और उसके बाद में पाँच सौ मील में नहीं।

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प्रश्न 3.
मनाली लौटकर आने पर लेखक ने क्या सोचा?
उत्तर
मनाली लौटकर आने पर लेखक ने एकांत में रहकर एक बड़ा-सा उपन्यास लिखने को सोचा। इससे पहले उसने अंग्रेजी में एक पूरा उपन्यास लिख भी डाला था, लेकिन जेल के चार वर्षों के अनुभवों ने उसे यह बता दिया था कि उसमें अभी लड़कपन है। अब उसने अपने नए अनुभवों के आधार पर परिवर्तन और परिष्कार कर उसे हिन्दी में लिखने को सोचा।

प्रश्न 4.
देवताओं के अंचल में’ यात्रा-वृत्तांत के मुख्य भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तांत प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक है। यह भारत के प्रमुख पर्यटन क्षेत्र ‘कुलू’ व मनाली की रचना ‘अरे यायावर रहेगा याद’ से उधत है। इसमें लेखक ने शहरी कोलाहल से दूर प्रकृति की गोद में बैठकर स्वास्थ्य लाभ लिया है। इसके साथ-साथ उपन्यास लेखन की इच्छा से वह देवभूमि ‘कुलू’ आता है। इस लेख में कुलू-मनाली के निवासियों की सहज धार्मिक आस्थाओं, रीति-रिवाजों और विभिन्न मनमोहक स्थलों के सौंदर्य एवं महत्त्व को लेखक ने चित्रित किया है। प्राकृतिक संपदा तथा स्थानीय उत्पादों का सजीव चित्रण इस यात्रा-वृत्तांत में अलौकिक अनुभूति कराता है। फलस्वरूप यह यात्रा-वृत्तांत न केवल हृदयस्पर्शी बन गया है, अपितु भाववर्द्धक भी। .

देवताओं के अंचल में लेखक-परिचय

प्रश्न
श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर-प्रदेश के देवरिया जिले के कसिया नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता पंडित हीरानंद शास्त्री पुरातत्त्व विभाग में थे। उनका तबादला एक स्थान से दूसरे स्थान पर होता रहा। उससे अज्ञेय की शिक्षा भी एक स्थान से दूसरे पर होती रही। आरंभिक शिक्षा समाप्त करके उन्होंने लाहौर के फॉरसन कॉलेज से बी-एस.सी की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद अंग्रेजी विषय लेकर एम.ए. में प्रवेश लिया, लेकिन उसी समय क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही लटककर रह गई। क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के कारण वे कई बार गिरफ्तार होकर जेल गए और रिहा हुए। वे 1936 में ‘सैनिक’ के संपादक मंडल में काम करने लगे। इसके बाद ‘विशाल भारत’ के संपादक मंडल में कलकत्ता रहे। 1943 से 1946 तक वे सेना में रहे। 1947 में ‘प्रतीक’ नामक पत्र निकाला। 1950 में आकाशवाणी दिल्ली में नौकरी की। 1955 से 1960 तक अनेक देशों की यात्रा की। 1987 में उनका निधन हो गया।

रचनाएँ-‘अज्ञेय’ की निम्नलिखित रचनाएँ हैंकाव्य-संग्रह-‘आँगन के पार द्वार’,’कितनी नावों में कितनी बार’, ‘सागर-मुद्रा’ आदि।

उपन्यास-‘शेखर एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’ और ‘अपने-अपने अजनबी।’ कहानी-संग्रह-‘शरणार्थी’, ‘कोठरी की बात’ आदि।

निबंध-डायरी और यात्रा-‘एक बूँद सहसा उछली’, ‘अरे यायावर रहेगा याद’, ‘लिखी कागज कोरे’, ‘भवन्ती’ आदि।

महत्त्व-चूँकि ‘अज्ञेय’ बहुमुखी प्रतिभासंपन्न रचनाकार रहे। इसलिए उनका रचना-संसार भी विविध है। वे गद्य और काव्य दोनों ही क्षेत्र में युग-प्रवर्तक के रूप में याद किए जाते रहेंगे। ‘तार-सप्तक’ कविता संकलनों के संपादक के रूप में वे युग-युग तक अविस्मरणीय रहेंगे।

देवताओं के अंचल में यात्रा-वृत्तांत का सारांश

प्रश्न
‘अज्ञेय’ द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तांत ‘देवताओं के आँचल में’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
‘अज्ञेय’ द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तांत ‘देवताओं के आँचल में एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है। इसमें कुलू से मनाली तक की यात्रा का उल्लेख किया गया है। इस यात्रा-वृत्तांत का सारांश इस प्रकार है मंडी से कुलू में प्रवेश को देवताओं का आँचल कहा जाता है। इसमें जाने के लिए व्यास नदी को रस्सी के झूलन पुल से पार करने के लिए लारी से जाना वास्तव में बहत खतरनाक होता है। इसलिए चार मील की ही रफ्तार से लारी को चलाने के लिए, का संकेत लिखा हुआ एक आदमी लारी से आगे-आगे चलता है। पुल के चौकीदार की अनुमति से कोई आर-पार आ-जा सकता है।

अपने लोगों के साथ लेखक दस बजे के आस-पास लोट पहुँचकर मोटर में बैठकर शिमला के लिए रवाना हो जाता है। वह व्यास नदी के किनारे-किनारे होते हुए कुलू बारह बजे पहुँच गया। कुलू में अनेक प्राचीन हिन्द-सभ्यता का झला है। यहाँ के हरेक कस्बे और गाँव के अपने-अपने देवता हैं। इस प्रकार के सैकड़ों देवी-देवताओं के मंदिरों और इस विराट देव-सम्मेलन के कारण ही कुलू प्रदेश का नाम ‘देवताओं का अंचल’ (वैली ऑफ दि गाइस) पड़ा है। दशहरे के दिन आस-पास के लगभग हजारों देवी-देवताओं को रथ में बैठाकर यहाँ लाया जाता है। उस दिन विजयी राम का उत्सव होता है। कुलू प्रदेश में व्यास-कुंड, व्यास मुनि, वशिष्ठ आदि ऋषि-मुनियों के स्थान और पाण्डवों के मंदिर हैं। यहाँ भीम की पत्नी हिडिंबा देवी की भी पूजा होती है। सबसे रोचक बात यह है कि यहाँ मानवता का आदिम प्रवर्तक स्वयंभ (मन) की भी पूजा की जाती है।

दशहरे के अवसर पर यहाँ बहुत बड़ा मेले का आयोजन किया जाता है। फलस्वरूप तरह-तरह की दुकानें और खरीददार यहाँ आते हैं। इस तरह यहाँ एक से एक महँगी वस्तुओं की खरीद-बिक्री होती है। इसके साथ ही यहाँ अनेक प्रकार के खेल-तमाशे, गाने-बजाने और सजावट होती है। लेखक यहाँ अपने साथियों के साथ दो घंटे ठहरकर और भोजन करके लारी में बैठकर आगे चला गया। व्यास नदी के कटाव से कट्राई सबसे सुन्दर स्थान है। यहाँ की घाटी अधिक चौड़ी है। ऊपर चढ़कर देखने से धान के खेतों के बीच-बीच में सेब, नाशपाती, खूबानी, आड़ और आलूचे के पेड़ मन को मोह लेते हैं। यहाँ मछली का शिकार बहुत अच्छा होता है। कट्राई से दो मील की ऊँचाई पर कुलू राज्य की पुरानी राजधानी है।

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यहाँ अनेक दर्शनीय इमारतें-मंदिर हैं। यहाँ रूसी कलाकार रोपरिक द्वारा स्थापित ‘हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ है, जहाँ पर हिमालय की भाषाओं. जातियों. लोक-साहित्य और वनस्पतियों से संबंधित रिसर्च होते हैं। कट्राई से मनाली तक का पुराना रास्ता नगर और जगत सुख होकर जाता था लेकिन अब नगर उससे अलग हो गया है। मनाली से नगर वाली सड़क कच्ची है, लेकिन लम्बी है। इस पर फैला प्राकृतिक दृश्य मन को मोह लेता है। इसी सड़क पर जगत सुख गाँव में अनेक दर्शनीय हिन्दू युग के कलाकारों से निर्मित प्राचीन मंदिर हैं। कटाई से आगे कलाथ में गर्म पानी का एक ऐसा कुंड है, जिसमें गंधक और अन्य रसायन की अधिक मात्रा होती है। यहाँ पर पहाड़ी औरतें खासतौर पर अपने कपड़े धोती हैं।

ऊनी कपड़ों के लिए यहाँ बहुत अच्छी लांडी है। मनाली या मुनाली का नाम यहाँ पर अधिक संख्या में पाया जाने वाला ‘मुनाल’ नामक अधिक सुन्दर पक्षी के नाम पर रखा गया है। यहाँ के कुछ सेबों और नाशपाती के अधिकता के कारण मनाली को जानते हैं। मनाली की दो बस्तियाँ हैं-एक बाहर से आकर बसे हुए लोगों के बंगलों और बाजारवाली बस्ती और दूसरी-उससे मील भर ऊपर बसी खास मनाली गौण की बस्ती जो मोटर दाना तक जाती है। फिर वहाँ से व्यास नदी को पार करके रोहतंग की जोत से लाहौर को चली जाती है। इसी मार्ग पर मनाली से दो मील दूर वसिष्ठ नामक गाँव और मंदिर है। रोहतंग की जोत पर व्यास कुंड है। यहीं से व्यास नदी निकलती है। रोहतंग की जोत के दूसरी पार कोकसर नामक बर्फ की सुन्दरता में बेजोड़ है। मनाली से आकर लेखक की स्वास्थ्य-लाभ करने के बाद सबसे बड़ी आकांक्षा एक बड़ा-सा उपन्यास लिखने की थी। दूसरे दिन सुबह उसने स्वयं को पाया कि वह भी देवताओं का समकक्षी होकर स्रष्टा हो गया है। वह लिखने लगा।

देवताओं के अंचल में संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण व विषय-वस्त से संबंधी प्रश्नोत्तर

1. सुभीते के लिहाज से चाहे जैसा हो, सौंदर्य-रक्षा के लिए एक बहुत अच्छा हुआ है। मनाली से नगरवाली कच्ची सड़क उस तरफ की सबसे लंबी सैर है। ऊँच-नीच भी बहुत अधिक नहीं है और दृश्य तो हर एक मोड़ पर ऐसा सुंदर दिखता है कि कहा नहीं जा सकता। एक ओर उठते हुए चीड़ के जंगल की गजियाँ, दूसरी ओर खुली हुई तराई में लहराते हुए धन-खेतों के मखमली आँगन-न जाने किस रहस्यमय की नीरव पद-चाप हर समय उसमें एक हिलोस्-सी उठाती रहती हैं।

शब्दार्थ-सुभीते-सुविधा। लिहाज-दृष्टिकोण। सैर-दूरी, भ्रमण। नीरव-शान्त। पद-चाप-पैर की ध्वनि। हिलोर-उमंग।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती-हिंदी सामान्य’ में संकलित तथा सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यावन’ ‘अज्ञेय’ लिखित यात्रा-वृत्तांत ‘देवताओं के आँचल में से है। इसमें लेखक ने कट्राई से मनाली तक की सुंदरता का उल्लेख करते हुए कहा है कि

व्याख्या-कट्राई से मनाली तक का प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोह लेता है। यहाँ तक आने के लिए पूर्वापेक्षा यातायात की बहुत बड़ी सुविधा हो गई है। जो कुछ सुविधा इस समय है, और जैसे भी हो, कोई यहाँ पहुँचता है, तो वह यही पाता है कि इस सुविधा से प्राकृतिक सुंदरता की बहुत बड़ी रक्षा हुई है। इस दृष्टि से यह प्रशंसनीय कदम कहा जा सकता है। यहाँ तक आने का यह पता लग जाता है। कट्राई से मनाली और फिर मनाली से नगर जानेवाली सड़क पक्की नहीं है, अपितु वह कच्ची है। उस ओर जानेवाली वही सबसे लंबी सड़क है। अधिकतर वह समतल है। कहीं-कहीं वह ऊँची-नीची अवश्य है। उसका हरेक मोड़ अपनी सुंदरता से आने-जानेवालों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। सचमुच उसका वर्णन करना असंभव-सा लगता है। उस पर एक ओर ऊँचे-ऊँचे चीड़ के जंगल हैं तो दूसरी ओर तराई है। उसमें धान के खेत ऐसे दिखाई देते हैं, मानो वे मखमल के आँगन की तरह फैले हुए हैं। उन पर फैली हुई शांति एक रहस्यमयी-लगती है। उस पर पैरों की ध्वनि मानों रह-रहकर लहरों से उठ रहो है और गिर रही है।

विशेष-

  1. प्राकृतिक सौंदर्य का आकर्षक चित्र है।
  2. शैली चित्रमयी है।
  3. भाषा काव्यात्मक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) सौंदर्य-रक्षा के लिए क्या बहुत अच्छा हुआ है?
(ii) मनाली से नगरवाली सड़क कैसी है?
उत्तर
(i) सौंदर्य-रक्षा के लिए कटाई से मनाली तक का पुराना रास्ता नया हो गया है। अब इस पर मोटर चलने लगी है।
(ii) मनाली से नगरवाली सड़क कच्ची है। उस ओर की वह सबसे लंबी सड़क है। वह बहुत ऊँची नहीं है और बहुत नीची भी नहीं है।

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2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) किसके मोड़ पर सुंदर-सुंदर द्रश्य दिखाई देते हैं?
(ii) धान के खेत कैसे लगते हैं?
उत्तर
(i) मनाली से नगरवाली सड़क के हर मोड़ पर सुंदर-सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं।
(ii) धान के खेत मखमली आँगन की तरह एक रहस्यमयी ऐसी शांति जैसे दिखाई देते हैं। उनसे होने वाली धीमी ध्वनि लहरों के उठने-गिरने की तरह सुनाई देती

2. रोहतंग की जोत के दूसरी पार कोकसर पड़ाव है। यहाँ जाते हुए बर्फ के सौंदर्य का जो दृश्य दिखता है, मैंने दूसरा नहीं देखा। उसका न वर्णन हो सकता है, न चित्र खिंच सकता है। कुछ मीलों के दायरे का एक प्याला-सा बना हुआ है, जिसके सब ओर ऊँची-ऊँची हिमावृत्त चोटियाँ, उससे कुछ नीचे पहाड़ों के नंगे काले अंग, और प्याले के बीच में फिर बर्फ से छाया हुआ मैदान मानो अभिमानी पर्वत सरदारों ने. अपना शीश और कटि प्रदेश को ढक लिया है, लेकिन छाती दर्प से खोल रखी है… इस स्थान से तीन नदियों का उद्गम है, ऊपर से व्यास, मध्य से चन्द्रा और भागा, जो आगे चलकर मिल जाती हैं। लेकिन रोहतंग की यात्रा का और कुलू प्रदेश के अपने दूसरे विचित्र अनुभवों का वर्णन अलग लेख माँगता है।

शब्दार्च-हिमावृत्त-बर्फ से ढकी हुई। कटि-प्रदेश-नीचे का भाग। दर्प-गर्व, अहंकार । उद्गम-उत्पत्ति स्थान ।

प्रसंग-पूर्ववत् । इसमें लेखक ने कोकसर पड़ाव से आगे बर्फीले सौंदर्य का चित्रण करते हुए कहा है कि

व्याख्या-रोहतंग की जोत के दूसरी तरफ कोकसर का पड़ाव पड़ता है, जो अपनी खास विशेषता रखता है। यहाँ से आगे बढ़ने पर बर्फ का फैला हुआ रूप अपनी सुंदरता से आने-जाने वालों के मन को मोह लेता है। लेखक का यह मानना उसने ऐसा कोई और मोहक दृश्य और कहीं नहीं देखा है। यही नहीं वह उसका वर्णन भी नहीं कर सकता है। शायद वह उसका पूरा-पूरा चित्र भी नहीं खींच सकता है। उसने बड़े ध्यान से देखा कि एक प्याले की कोई आकृति लगभग कुछ मीलों का विस्तार लिए हुए है। उसके चारों ओर केवल बर्फ से ढकी हुई चोटियाँ हैं। उन चोटियों के नीचे काले रंग का फैले हुए पहाड़ के छोटे-बड़े रूप हैं। मीलों तक फैले हुएय उस प्याले-सी आकृति के बीच में और कुछ नहीं है। केवल बर्फ-ही-बर्फ है। वह बहुत बड़ा विस्तार लिए हुए है। उसे देखने से ऐसा लगता है मानो अपने बड़प्पन और उच्चता के अभिमान को लिए हुए पर्वतों का एक एक ऊँचे-ऊँचे भाग स्वयं को छिपा लिये हैं। फिर भी वे अपने विस्तार रूपी छाती को दर्पपूर्वक फैला रखने में अपने-आपको बडा दिखाने का प्रदर्शन कर रहे हैं। इस स्थान के बारे में यह कहा जाता है कि इससे व्यास, चन्द्रा और भागा ये तीन नदियाँ निकलती हैं। वे इसके क्रमशः ऊपर और मध्य भाग से निकलती तो हैं, लेकिन आगे चलकर परस्पर मिल भी जाती हैं। लेखक के अनुसार यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि अगर रोहतंग और कुलू प्रदेश की यात्रा के अनुभवों का उल्लेख अपेक्षित और समुचित रूप में करना है, तो उसके लिए अलग से लेख लिखना पड़ेगा।

विशेष

  1. लेखक की कोकसर पड़ाव से आगे के प्राकृतिक सुन्दरता के प्रति दृष्टि आकर्षक है।
  2. संपूर्ण उल्लेख रोचक और ज्ञानवर्द्धक है।
  3. तत्सम शब्दों की प्रधानता है।
  4. शैली चित्रमयी है।

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1. गद्यांश पर आधारित अर्यग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कोकसर पड़ाव से आगे कौन-सा अद्भुत दृश्य दिखाई देता है?
(ii) प्याला-सा बने दृश्य की क्या विशेषता है?
उत्तर
(i) कोकसर पड़ाव से आगे बर्फ का अत्यधिक आकर्षक दृश्य दिखाई देता
(ii) प्याला-सा बने दृश्य की विशेषता है कि वह कुछ मीलों के दायरे में फैला हुआ है। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची बर्फीली चोटियाँ हैं।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बर्फ के मैदान से कौन-कौन नदियाँ निकलती हैं?
(ii) लेखक ने किसके लिए अलग लेख लिखने का सुझाव दिया है?
उत्तर
(i) बर्फ के मैदान से व्यास, चन्द्रा, और भागा नदियाँ निकलती हैं।
(ii) लेखक ने रोहतंग और कुलू प्रदेश की यात्रा के विचित्र अनुभवों के लिए अलग लेख लिखने का सुझाव दिया है।

MP Board Class 9th Hindi Solutions

MP Board Class 10th Special Hindi निबन्ध-लेखन

MP Board Class 10th Special Hindi निबन्ध-लेखन

निबन्ध-रचना विषयक महत्त्वपूर्ण बातें-

  1. जो निबन्ध परीक्षा में पूछा गया हो, उस पर चिन्तन-मनन करके ही लेखनी चलानी चाहिए।
  2. निबन्ध में यत्र-तत्र कविता,सूक्ति तथा विद्वानों के उद्धरण प्रस्तुत करना परमावश्यक है। इससे निबन्ध के सौन्दर्य में वृद्धि होती है।
  3. प्रस्तावना तथा उपसंहार का प्रभावोत्पादक एवं रोचक होना नितान्त आवश्यक है।
  4. निबन्ध में विचार-श्रृंखला क्रमबद्ध होनी चाहिए।
  5. विस्तार के लोभ का संवरण करना चाहिए। एक सुव्यवस्थित ढंग से लिखा गया निबन्ध ही आदर्श होता है।
  6. विषय से सम्बन्धित सामग्री सँजोकर ही निबन्ध लिखना चाहिए।
  7. पत्र-पत्रिकाओं तथा ग्रन्थों में से नवीन विचारों को एकत्र करना चाहिए।
  8. समग्र विषय को पैराग्राफों (अनुच्छेदों) में विभक्त कर लेना चाहिए।
  9. भाषा शुद्ध तथा शैली आकर्षक एवं लेख सुन्दर होना चाहिए।
  10. विराम-चिह्नों का यथा-स्थान समुचित प्रयोग करना चाहिए।

1. विज्ञान के बढ़ते चरण [2016]
अथवा
विज्ञान अभिशाप अथवा वरदान
अथवा
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी [2011, 17]
अथवा
विज्ञान और मानव [2012]
अथवा
विज्ञान का जीवन पर प्रभाव [2015]
अथवा
विज्ञान की देन [2018]

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एमसन नामक विद्वान के शब्दों में-
“आज हम विज्ञान के युग में रह रहे हैं और विज्ञान के बिना मानव के अस्तित्व की कल्पना असम्भव प्रतीत होती है।”

“दर तारों से किया सम्पर्क हमने।
पर पड़ोसी से न हम हँस-बोल पाये।
सरल जीवन से रहा न वास्ता
दुश्वारियों को दौड़कर हम मोल लाए॥”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • विज्ञान वरदान के रूप में,
  • विज्ञान अभिशाप के रूप में,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-आज विज्ञान का युग है। चहुंओर विज्ञान की दुन्दभी बज रही है। मानव-जीवन से सम्बन्धित ऐसा कोई भी पहलू नहीं है,जहाँ विज्ञान का प्रवेश न हो। यह विज्ञान की प्रगति विगत् दो सौ वर्षों में हुई है। पुरातन काल में भी वैज्ञानिक उपलब्धियों का उल्लेख है, परन्तु इस सन्दर्भ में अभी तक प्रामाणिक जानकारी नहीं है।

विज्ञान के क्षेत्र में नित्य नवीन आविष्कार हो रहे हैं। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप दुनिया का मानचित्र ही बदल गया है। आज मानव ने प्रकृति को अपनी क्रीत दासी बना लिया है। वह समय अतीत के गर्भ में विलीन हो गया जब मानव दुनिया की हर वस्तु को अचम्भे भरी दृष्टि से निहारकर उसकी उपासना किया करता था। आज वे ही सम्पूर्ण वस्तुएँ उसके जीवन में पानी में नमक की भाँति घुल-मिल गई हैं।

विज्ञान वरदान के रूप में विज्ञान ने मानव जीवन को सुखी तथा सम्पन्न बना दिया है।

उदाहरणार्थ-
चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान एक वरदान है। एक्स-रे द्वारा आन्तरिक फोटो लिया जाता है। इससे घातक बीमारियों का आसानी से पता लगाया जा सकता है। टी.बी. की बीमारी को अतीत की बात बना दिया है। कैंसर पर भी नित नये शोध चल रहे हैं। अब मानव की आयु में भी औसतन वृद्धि हुई है। आपरेशन के द्वारा न जाने कितने इन्सानों को नई जिन्दगी जीने का मौका मिला है।

उद्योग एवं विज्ञान-प्राचीनकाल में जिन कार्यों को सौ आदमी सम्पन्न कर पाते थे, आज विज्ञान द्वारा आविष्कृत मशीनों के माध्यम से उन्हें एक व्यक्ति ही पूरा कर लेता है। मशीनों से उत्पादन की क्षमता कई गुनी बढ़ गई है।

आवागमन के क्षेत्र में विज्ञान ने आवागमन के साधनों को भी सुलभ बना दिया है। प्राचीनकाल में यात्राएँ कष्ट तथा भय का प्रतीक थीं लेकिन आज,रेल,मोटर तथा वायुयानों द्वारा मनुष्य दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक आसानी से पहुँच सकता है।

खाद्यान्न एवं विज्ञान-खाद्यान्न के क्षेत्र में भी विज्ञान ने अभूतपूर्व क्रान्ति-सी उपस्थित कर दी है। अब किसानों को वर्षा-ऋतु पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। ट्यूबवैल खेतों को हरा-भरा कर रहे हैं। वैज्ञानिक खाद तथा बीजों से कई गुना अन्न उत्पादन किया जा रहा है। ट्रैक्टर खेतों को जोतने में प्रयुक्त हो रहे हैं। रासायनिक खाद उत्पादन में बहुत सहायक है। कीटनाशक दवाएँ फसलों को नष्ट होने से बचा रही हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान कम्प्यूटर द्वारा आज शिक्षा दी जा रही है। इससे अनेक स्थानों पर एक ही समय में आसानी से शिक्षा दी जा सकती है। चित्रपट पर प्रदर्शित प्राकृतिक दृश्य, राजनीतिक वार्ता तथा शैक्षणिक कार्यक्रम शिक्षा जगत में बहुत लाभदायी सिद्ध हो रहे हैं।

भवन निर्माण के क्षेत्र में बहुमंजिली इमारतें आज विज्ञान के बल पर ही बन रही हैं। बुलडोजर, क्रेन एवं खनन यन्त्र इस क्षेत्र में बहुत सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

संचार के क्षेत्र में संचार क्षेत्र में भी विज्ञान की अभूतपूर्व देन है। टेलीविजन, टेलीफोन तथा टेलीग्राम इस क्षेत्र में विशेष रूप में उल्लेखनीय हैं।

कपड़ों के क्षेत्र में आज के मानव का पुराने वस्त्रों से मोह भंग हो चुका है। अब वह रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों के स्थान पर टेरालीन,टेरीवूल तथा नायलॉन के वस्त्र धारण करने में गौरव का अनुभव कर रहा है। वस्त्र निर्माण के लिए मिलें स्थापित हैं। सिलाई के लिए मशीनें आविष्कृत हैं।

मनोरंजन के क्षेत्र में विज्ञान ने मनोरंजन के क्षेत्र में टेलीविजन, रेडियो, चलचित्र एवं ग्रामोफोन आदि साधन प्रदान किये हैं।

विज्ञान अभिशाप के रूप में विज्ञान ने जहाँ मानव को अपरिमित सुख साधन जुटाये हैं, वहाँ उससे मानव को हानि भी पहुंची है। आज मानव विज्ञान के द्वारा आविष्कृत साधनों से लाभ उठाकर आलसी बन गया है। जिस काम को सौ मनुष्य करते थे, आज वैज्ञानिक मशीनों के माध्यम से एक आदमी पूरा कर लेता है। इस प्रकार विज्ञान ने एक आदमी को रोटी देकर निन्यानवे इन्सानों के पेट पर लात मार दी है। हाइड्रोजन बम तथा जहरीली गैसें मानव को मौत की गोद में सलाने के लिए आतर हैं।

आज वैज्ञानिक आविष्कारों की विनाशलीला की गाथा जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी नगरों के खण्डहर दुहरा रहे हैं। विज्ञान के बसन्त के पीछे पतझड़ की काली छाया भी मँडरा रही है। आज मानव विलासी हो गया है। विज्ञान ने वातावरण को प्रदूषण युक्त कर दिया है। वायुयान, मोटर तथा स्कूटर उसे बहरा बना रहे हैं। कारखानों से निकलने वाला गंदा जल पानी को विषैला बना रहा है। आज इन्सान की जिन्दगी बहुत ही सस्ती हो गई है।

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उपसंहार-परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है कि विज्ञान स्वयं में शक्ति नहीं है। वह मानव के हाथ में आकर शक्ति प्राप्त करता है। अब यह मानव पर निर्भर करता है कि वह विज्ञान का दुरुपयोग करे अथवा सदुपयोग। विष डॉक्टर के हाथ में पहुँचकर जीवनदायक बनता है। हत्यारे के हाथ में पहुँचकर जानलेवा बनता है। यही बात विज्ञान पर लागू होती है। महत्त्वाकांक्षी तथा नरपिशाच उस विज्ञान का दुरुपयोग करते हैं। मानवतावादी उससे जन-जीवन को उल्लासमय बनाते हैं। हमें अपनी महत्त्वाकांक्षा पर अंकुश लगाना होगा। विज्ञान को स्वामी न मानकर दास मानना होगा तभी मानव विश्व सुख तथा आनन्द के झूले में बैठकर अपरिमित सुख तथा शान्ति का अनुभव करेगा-

“विध्वंस की सोचे नहीं निर्माण की गति और दें
विज्ञान के उत्पाद से सुख स्वयं लें, औरों को दें।”

2. वन-महोत्सव
अथवा
वन संरक्षण [2016]
अथवा
वृक्षारोपण एवं मानव [2013]

यदि वृक्ष हैं तो जीवन है, जीवन है तो इन्सान है।
आने वाली सन्तति की, वृक्षों से ही पहचान है।।

“वृक्ष मानव के लगभग सबसे अधिक विश्वस्त मित्र हैं और जो देश अपने भविष्य को सँवारना सुधारना चाहता है, उसे चाहिए कि वह अपने वनों का अच्छी प्रकार ध्यान रखे।”

-इन्दिरा गाँधी

रूपरेखा [2015, 17, 18]-

  • प्रस्तावना,
  • भारतीय संस्कृति एवं वन,
  • वनों के विनाश का दुष्परिणाम,
  • वृक्षों से लाभ,
  • वन संरक्षण की जरूरत,
  • वन-महोत्सव आयोजन,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-भारत प्रकृति का पालना है। यहाँ के हरे-भरे वृक्ष धरती की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। दुर्भाग्यवश आज के वातावरण में लाभ अर्जित करने तथा भवन निर्माण करने के नाम तथा अतिवृष्टि वनों के संरक्षण से ही रुक सकती है। वन नदियों को सीमा में बाँधे रहते हैं। जंगली जीव-जन्तुओं तथा पक्षियों को अभयदान देकर मातृवत् पालन-पोषण करते हैं। अपनी हरियाली से मानव मन को भी हरा-भरा तथा प्रफुल्लित करते हैं।

वन-महोत्सव आयोजन-वृक्षों की इसी उपादेयता को देखकर वन-महोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया गया। सन् 1950 में अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाने का आयोजन प्रारम्भ किया गया। जनता इसमें अधिक-से-अधिक सहभागी बने, इस उद्देश्य से इसका नाम वन-महोत्सव निर्धारित किया गया। वन-महोत्सव जुलाई मास में सम्पन्न किया जाता है। इसके पीछे यही भावना जुड़ी है कि इन्सान वृक्षों की महत्ता से परिचित होकर उनका अधिक-से-अधिक रोपण करे। साथ ही जन-मानस इतना जाग्रत हो जाय कि वह वृक्षों की अपने पुत्रवत् देखभाल करे।

महाभारत में तो वृक्षों को जीवन नाम से सम्बोधित किया गया है। मानव जीवन के समस्त सुख वनों में ही निहित हैं। इसी भावना से ही प्रेरित होकर मनीषी वनों की कन्दराओं तथा गुफाओं में जाकर तप करते थे।

आज हमारी राष्ट्रीय सरकार भी इस दिशा में सकारात्मक कदम उठा रही है। समस्त देश में वृक्षारोपण का कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है।

उपसंहार-यह बात अपने स्थान पर सही है कि वन-महोत्सव के फलस्वरूप वृक्ष लगाने के सम्बन्ध में लोगों के मन-मानस में नई चेतना का संचार हुआ है, परन्तु अभी हमें इस आयोजन पर विराम नहीं लगाना है। वन-महोत्सव के द्वारा अभी जितने वृक्ष लगाये गये हैं, वे भारत के विशाल भू-भाग को देखते हुए अपेक्षाकृत कम हैं। अभी इस दिशा में निरन्तर प्रयास की महती आवश्यकता है। वृक्ष हमसे कुछ चाहते नहीं हैं। वह प्रतिपल हमें छाया, फल, पुष्प प्रदान कर जीवन में सरसता तथा आनन्द का संचार करते हैं। हमें उनका आभारी होना चाहिए। वृक्षों से परोपकार की शिक्षा ग्रहण करके उसे स्वयं के जीवन में उतारना चाहिए। इसी में हमारा तथा जन-सामान्य का कल्याण निहित है

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“धुंध प्रदूषण की छायी है, उसको दूर भगाओ।
पर्यावरण शुद्ध करने को दस-दस वृक्ष लगाओ।”

3. जीवन में खेलों का महत्त्व [2009, 12, 15, 17, 18]
अथवा
खेल : जीवन के लिए आवश्यक [2016]

“खेल जीवन खेल उसमें जीत जाना चाहता हूँ।
मीत मैं तो सिन्धु के उस पार जाना चाहता हूँ॥”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • व्यस्त जीवन एवं खेल,
  • मन तथा दिमाग पर खेल का प्रभाव,
  • खेलों की महत्ता,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-जीवन संघर्षमय है, इस संघर्ष में उसको ही मुक्ति मिल सकती है, जो सक्षम एवं सशक्त हो। सशक्त, पुष्ट तथा बलवान बनने का एकमात्र साधन खेल ही है। खेलों से रक्त परिभ्रमण उचित मात्रा में होता है। शरीर में स्फूर्ति जाग्रत होती है। अतः शरीर एवं मस्तिष्क के विकास के लिए खेल नितान्त आवश्यक है।

व्यस्त जीवन एवं खेल-आज मानव का जीवन इतना व्यस्त है कि वह सुबह से लेकर शाम तक किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहता है। रोजी-रोटी की समस्या उसे प्रतिपल विकल बनाये रहती है। वह इसी उधेड़-बुन में रात-दिन घुलता रहता है। चिन्ता तथा आवश्यकता से अधिक श्रम उसे कमजोर बना देता है। ऐसी दशा में पुनः शक्ति प्राप्त करने के लिए किसी न किसी प्रकार का खेल अथवा व्यायाम अपेक्षित है।

पर इन हरे-भरे वृक्षों को निर्दयतापूर्वक काटा जा रहा है। इन सभी बातों को दृष्टि में रखकर वृक्षारोपण कार्यक्रम या वन-महोत्सव चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य धरती की हरियाली को पुनः लौटाना है। वृक्षों के लाभ अनगिनत हैं। ये धरती की शोभा हैं। वृक्ष मानव के चिर सहचर हैं। देवताओं के निवास-स्थल हैं तथा प्राणवायु के दाता हैं।

भारतीय संस्कृति एवं वन भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता वनों से गहरे रूप में जुड़ी हुई है। हमारे ऋषियों.दार्शनिकों तथा चिन्तकों ने शहर एवं ग्रामों के कोलाहल से दर जाकर वनों की गोद में ही अनेक अमूल्य जीवन नियमों की खोज की। ज्ञान-विज्ञान के नये सिद्धान्त खोजे। सरिताओं के किनारे बैठकर तपस्या की। वेद-मन्त्रों से वातावरण को गुंजित एवं मुखरित किया। तत्कालिक युग में शिक्षा के केन्द्र गुरुकुल विद्यालय वनों की गोद में ही स्थित थे। वृक्षों की छाया के नीचे बैठकर लोग एक अनिर्वचनीय शान्ति का अनुभव करते थे। वृक्ष हमें मूक रूप में परोपकार का पाठ पढ़ाते हैं। उत्सर्ग की शिक्षा देते हैं। नैतिक शिक्षा के रूप में आशा एवं धीरज का पाठ पढ़ाते हैं।

वनों के विनाश का दुष्परिणाम-आज जनसंख्या सुरसा के मुँह की तरह बढ़ रही है। मानवों को आवास की सुविधा प्रदान करने के लिए वनों को बेरहमी से उजाड़ा जा रहा है। कलकारखानों को बनाने.रेल-मार्गों को बनाने के लिए जगह की जरूरत पडी। इसको पूरा करने के लिए वनों पर ही कुठाराघात हुआ। कल-कारखानों को कच्चे माल की आपूर्ति के लिए भी वन-सम्पदा का बुरी तरह से विनाश किया गया।

वृक्षों के काटने से भूमि का कटाव बढ़ रहा है। वर्षा भी समय पर नहीं हो रही है। रेगिस्तानों में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी अवलोकनीय है। जलवायु भी गर्म तथा पीड़ादायक हो गई है। धरती की उपजाऊ शक्ति में ह्रास हुआ है। भूकम्प आये दिन आते रहते हैं। गर्मी के प्रकोप से मानव का जीना भी दूभर हो गया है।

वृक्षों से लाभ-

  • वृक्ष हरियाली के भण्डार हैं। धरती की शोभा हैं।
  • स्वास्थ्य-वर्द्धक फल प्रदान करते हैं।
  • गोंद, कत्था, सुपाड़ी,नारियल तथा अन्य जीवनोपयोगी सामग्री प्रदान करते हैं।
  • वर्षा को नियन्त्रित करते हैं।
  • उद्योगों के हेतु कच्चा माल वृक्षों से ही प्राप्त होता है।
  • धरती को उपजाऊ बनाते हैं।
  • उपासना के लिए फल तथा फूल देते हैं।
  • भवन-निर्माण की लकड़ी प्रदान करते हैं।
  • वायुमण्डल को संतुलित करते हैं।
  • पशुओं को चारा प्रदान करते हैं।
  • भूमि-कटाव को रोकते हैं।
  • शान्ति तथा मन बहलाने के साधन भी हैं।
  • आध्यात्मिक विकास के सोपान हैं।
  • देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने वाले हैं।
  • हमारी सभ्यता एवं संस्कृति की अमूल्य धरोहर को सहेज कर रखने वाले हैं।
  • प्राणियों के लिए शुद्ध वायु देते हैं।
  • औषधियों के स्रोत हैं।

वन संरक्षण की जरूरत-आज प्राकृतिक, दैवीय एवं अन्य संकटों से बचने के लिए वन-संरक्षण की महती आवश्यकता है। वन संरक्षण से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। बाढ़,अकाल

मन तथा दिमाग पर खेल का प्रभाव-खेल का मन तथा दिमाग से घनिष्ठ सम्बन्ध है। खेल के मैदान में उतरने पर मन प्रसन्नता से भर उठता है। दिमाग सक्रिय तथा प्रभा सम्पन्न होता है। मानव यदि खेल के मैदान में नहीं उतरे तो वह दैनिक क्रियाकलापों को पूरा करने के पश्चात् प्रमाद में चारपाई पर पड़ा रहता है। जो इन्सान खेल के प्रति अरुचि रखता है, उसका जीवन उत्साह रहित हो जाता है। सुस्ती,प्रमाद तथा रोग उस पर अपना अधिकार जमा लेते हैं। सच्चा खिलाडी खेल के मैदान से ही समता का पाठ पढ़ता है। वह गीता के इस दृष्टान्त को सच्चे अर्थों में प्रमाणित करता है कि मानव को सुख-दुःख और हार-जीत में एक-सा रहना चाहिए।

खेलों की महत्ता-खेल को केवल मन बहलाव का साधन-मात्र ठहराना कोरी मूर्खता है। खेल से मन बहलाव होने के साथ ही हमारे समय का भी अच्छा उपयोग होता है। अगर इन्सान खेल के मैदान में नहीं उतरे,तो वह व्यर्थ की गप-शप में ही अपने समय को नष्ट कर देता है।

खेल से मनुष्य की थकावट दूर हो जाती है। वह नई स्फूर्ति तथा शक्ति का स्वयं में अनुभव करने लगता है। खेल मानव की थकान को मिटाता है। खेल हमें सहयोग तथा मित्रता का पाठ पढ़ाते हैं। खेल के मैदान में उतरने पर हर टीम हार जीत के प्रश्न को लेकर ऐसी सहयोगी भावना से खेलती है कि देखते ही बनता है। यहाँ शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। आपस के बैर-भाव को भुलाकर ऐसी एकता का प्रदर्शन करते हैं,जो देखते ही बनती है।

खेल हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं। खेल के मैदान जैसा अनुशासन अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। जो खिलाड़ी खेल के नियमों की अवहेलना करते हैं, उन्हें खेल के मैदान से बाहर कर दिया जाता है। संगठन तथा एकता का विकास भी खेलों के माध्यम से होता है।

खिलाड़ी सबकी श्रद्धा तथा प्रेम का पात्र बनता है। जन-सामान्य उसे आदर की दृष्टि से निहारते हैं। जब वह बाहर निकलता है तो लोग उसे निहार कर गर्व का अनुभव करते हैं। खिलाड़ी हमारे देश का नाम विदेशों में रोशन करते हैं।

खेल इन्सान की रोजी-रोटी में भी सहायक हैं। जब छात्र अपनी शिक्षा पूर्ण कर लेता है, तो वह नौकरी की तलाश करता है। साक्षात्कार के समय अच्छे खिलाड़ी को खेल की वजह से ही अच्छे अंक मिल जाते हैं। उससे उसका चयनित होना अनिवार्य हो जाता है।

खिलाड़ी प्रतिपल चुस्ती तथा स्फूर्ति का अनुभव करता है। वह प्रत्येक कार्य को चाहे वह शरीर से सम्बन्धित हो अथवा मस्तिष्क से,उसे तुरन्त पूरा कर लेता है। निराशा उसके पास नहीं फटकती। उदासीनता उससे कोसों दूर रहती है।

उपसंहार-हर्ष का विषय है कि आज हमारी राष्ट्रीय सरकार खिलाड़ियों को विविध प्रकार की सुविधाएँ देकर उनके उत्साह को बढ़ावा दे रही है। सरकारी नौकरियों में उन्हें वरीयता प्रदान की जा रही है।

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हमारी जिन्दगी शरीर पर निर्भर है। शरीर समाप्त हुआ तो जिन्दगी बीत गई। स्वस्थ शरीर हमारे जीवन की आधारशिला है। जीवन का रस अच्छे स्वास्थ्य में निहित है। शरीर नहीं होगा तो अन्य कार्य कैसे सम्पन्न होंगे ? हमारे ऋषियों का कहना था कि “जीवेम् शरदः शतम्” अर्थात् हम सौ साल तक जीवित रहें। यह तभी सम्भव है,जब शरीर वेगमय तथा गतिशील हो। खेल इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। अत: वीर,पुष्ट,प्रसन्न तथा स्वस्थ बनने के लिए खेल परमावश्यक है। कहा भी गया है मृतप्राय जीवन में संजीवन फँकते प्राणों की जो तमिस्र के गर्त से खींच ज्योति भर दे हृदय में जो वो खेल जीवन को नया आयाम देते हैं। वो खेल जीवन में नया उत्साह भरते हैं।

4. जल मानव जीवन के प्राणों का आधार है [2009]
अथवा
जल ही जीवन है [2009]
अथवा
बिन पानी सब सून [2013]

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • जल के विभिन्न कार्य,
  • जल के प्रमुख स्रोत,
  • उपसंहार॥

प्रस्तावना प्रत्येक जीवधारी के जीवन के लिए जल एवं वायु आवश्यक हैं। जल ही मानव के जीवन का प्रमुख आधार है। जल के बिना मानव जीवन की कल्पना असम्भव है। अतः जल के महत्त्व को प्रदर्शित करते हुए रहीम कवि ने उचित ही कहा है

“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती मानुष चून ॥”

जल के विभिन्न कार्य-जैसा कि पूर्व में कहा गया है जल ही जीवन का आधार है। जीवन के लिए आवश्यक रोटी भी है। इसके लिए उत्तम फसल का होना लाभदायक है। जल के बिना उत्तम खेती व खुशहाली असम्भव है। वास्तव में,जल ही ऐसा प्रमुख स्रोत है जिसके द्वारा उत्तम खेती हो सकती है।

यदि समय पर वर्षा होगी तो जुताई, बुवाई भी समय से हो जायेगी। यदि वर्षा न हो तो पेड़-पौधे नष्ट हो जायेंगे। अतः वर्षा का समय से होना शुभ संकेत है। किसानों को तो बादलों को देखकर ही अनुमान हो जाता है कि वर्षा किस समय होगी।

यदि पृथ्वी पर जलाभाव हो जाये तो अकाल व सूखा पड़ जायेगा। हजारों लाखों लोग काल के मुख में समा जायेंगे।

जिस प्रकार मानव के लिए जल आवश्यक है, उसी प्रकार पशु-पक्षी व जलीय जन्तुओं के लिए भी जल आवश्यक है। जल के अभाव में इन प्राणियों का जीवन भी असम्भव है।

जल के प्रमुख स्रोत-जल का सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक स्रोत वर्षा है लेकिन आज के वैज्ञानिक युग में मानव ने जल प्राप्ति के कृत्रिम स्रोतों की खोज कर ली है। इसीलिए उसने नहर एवं बाँधों का निर्माण किया है।

जल के अन्य स्रोत कुएँ,तालाब व झरने हैं। इसके अतिरिक्त जल संचय करने हेतु मानव ने एक नवीन विधि का आविष्कार किया है। इस विधि में बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर जल संचय किया जाने लगा है। इससे जल की कमी को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है।

उपसंहार-जल ही जीवन का आधार है लेकिन खेद का विषय है कि जल का प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। जल के स्तर में भी निरन्तर कमी होती जा रही है। मानवता को खुशहाल रखने के लिए जल आवश्यक है। इसके लिए जल के देवता इन्द्र को प्रसन्न करना पड़ेगा। वास्तव में, जल ही प्राणदायिनी शक्ति है।

5. राष्ट्रीय एकता और अखण्डता [2009, 10, 14]
अथवा
भारत की राष्ट्रीय एकता
अथवा
राष्ट्रीय एकता [2012]

“क्या बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे जहाँ हमारा ॥”

रूपरेखा [2017, 18]-

  • प्रस्तावना,
  • राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य,
  • राष्ट्रीय एकता की जरूरत,
  • देश की वर्तमान स्थिति,
  • राष्ट्रीय एकता को खंडित करने वाले तत्त्व,
  • राष्ट्रीय एकता तथा हमारा उत्तरदायित्व,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-राष्ट्रीय एकता का गम्भीर प्रश्न आज देश के समक्ष चुनौती के रूप में उपस्थित है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इस देश की धरती पर विभिन्न धर्म,जाति,सम्प्रदाय तथा वर्ग के लोग निवास करते हैं। भिन्नता होने पर यदा-कदा संघर्षों का भी सूत्रपात हो जाता है। एकता के स्थान पर भेद-भाव पनप जाता है। इससे राष्ट्रीय एकता को खतरा उत्पन्न हो गया है।

देश को आजाद करने में न जाने कितने लोग शहीद हुए। अनेक लोगों ने कारागार की कठोर यातनाओं को सहर्ष स्वीकार किया। गोली,डण्डे तथा लाठियों के प्रहार को सहन किया। आज इसी स्वतन्त्र भारत के वायुमण्डल में विद्रोह तथा हिंसा के स्वर गूंज रहे हैं। मानवता पर दानवता हावी है।

राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य राष्ट्र एवं उसके स्वरूप के प्रति निष्ठा एवं श्रद्धा का भाव राष्ट्रीयता के नाम से सम्बोधित किया जाता है। राष्ट्र की रक्षा का भाव राष्ट्रीय एकता का सूचक है। विभिन्न धर्मों तथा सम्प्रदाय के लोगों में भाषा, धर्म तथा जाति के आधार पर भेद पाये जाते हैं। आचार-विचार तथा खान-पान में भी भिन्नता होती है। इस अनेकता के मध्य एकता का पाया जाना ही राष्ट्रीय एकता है। विचारों में सामंजस्य तथा राजनीतिक एकता, राष्ट्रीय एकता का प्रतिरूप है। समस्त देश की राजनीतिक, वैचारिक, आर्थिक तथा सामाजिक एकता ही राष्ट्रीय एकता का प्रतिरूप है।

राष्ट्रीय एकता की जरूरत-देश की बाह्य एवं आन्तरिक सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता अति जरूरी है। यदि हमने देश को जोड़ने के स्थान पर तोड़ने का प्रयास किया तो इसका लाभ शत्रु-पक्ष उठायेगा। आज भारतवर्ष की उन्नति को पड़ोसी देश फूटी आँख भी नहीं देखना चाहते। हमें उन तथ्यों का सावधानीपूर्वक पता लगाना है जो कि राष्ट्रीय एकता के मार्ग में रोड़ा बनकर खड़े हुए हैं। बिना तथ्यों की खोज के प्रयास करना बालू में तेल निकालने के समान व्यर्थ सिद्ध होगा। राष्ट्र के हित में सम्पूर्ण देश का हित है। देश के प्रति समर्पण भाव ही राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है। राष्ट्र पर किसी एक जाति, धर्म,वर्ग तथा सम्प्रदाय की बपौती नहीं है। राष्ट्र पर सबका समानाधिकार है।

देश की वर्तमान स्थिति आज भारत देश अनेक परिस्थितियों के जाल में फंसा हुआ है। सम्प्रदाय, धर्म एवं जाति को लेकर संकुचित मनोवृत्ति वाले घृणित अलगाववादी भावना का विषैला बीज बो रहे हैं। आन्दोलन, तोड़-फोड़ तथा हड़ताल राष्ट्र की एकता के तार को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत परतन्त्रता के पाश में भी अलगाववादी भावना के कारण ही बँधा।

राष्ट्रीय एकता को खंडित करने वाले तत्त्व-आज आजादी प्राप्त करने के पश्चात् भारत एक प्रभुता-सम्पन्न गणराज्य है। यदि हम राष्ट्रीय एकता के सन्दर्भ में भारत पर दृष्टिपात करें तो इसे एक कमजोर राष्ट्र ही समझा जायेगा।

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आज भारत भूमि पर अनेक प्रकार की ऐसी शक्तियाँ विद्यमान हैं, जो इसकी एकता के तारों को छिन्न-भिन्न करने के लिए सक्रिय हैं।

क्षेत्रीयता, भाषा, धार्मिक उन्माद तथा साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकता में सेंध लगाने वाले तत्त्व हैं। इनमें सबसे बुरा तत्त्व साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता मानव मन में फूट के विषैले बीजों का वमन करती है। मित्रों के मध्य द्वेष तथा जलन पैदा करती है। भाई से भाई को सदा के लिए विलग कर देती है।

भाषागत विवाद भी देश की एकता के लिए एक समस्या है। भारत में अनेक प्रान्त हैं। उन प्रान्तों की अलग-अलग बोलियाँ हैं। अपनी भाषा के मोह में दूसरी भाषा का निरादर किया जाता है।

प्रान्तीयता की भावना भी राष्ट्रीय एकता के पथ में रोड़ा बनी हुई है। आज अलग-अलग अँचल में निवास करने वाले लोग अपने स्वतन्त्र अस्तित्व की माँग दुहरा रहे हैं। ऐसी स्थिति में एकता किस प्रकार स्थापित की जा सकती है।

सुमित्रानन्दन पन्त की एक पंक्ति राष्ट्रीय एकता के महत्त्व को प्रतिपादित करने के लिए पर्याप्त है, देखिए-

“राजनीति और अर्थशास्त्र के बिना भले ही जी लें,
जन-राष्ट्रीय ऐक्य के बिना असम्भव।”

राष्ट्रीय एकता तथा हमारा उत्तरदायित्व-राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने के लिए आज देश के प्रत्येक नागरिक का पावन कर्त्तव्य है। आज देश के लेखक, कवि, दार्शनिक सभी देश की एकता को बनाये रखने के लिए प्रयासरत् हैं। सभी समझदार चाहते हैं कि राष्ट्रीय एकता खंडित न हो। देश में प्रेम तथा सौहार्द्र का वातावरण बने। भेद तथा अलगाव की लौह दीवारें धराशायी हों। ईर्ष्या,द्वेष तथा तनाव का अन्त हो, परन्तु दुःख का विषय यह है कि विद्वेष की ज्वाला आज भी देश में अनेक स्थानों पर यदा-कदा भड़क उठती है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है

“मर्ज बढ़ता गया,ज्यों ज्यों दवा की” समय-समय पर जो अनहोनी घटनाएँ घट जाती हैं, उससे यह सिद्ध होता है कि हम अभी विघटनकारी तत्त्वों को पूरी तरह से कुचल नहीं पाये हैं। यह कार्य सरकार अथवा राष्ट्रीय नेताओं के बल पर पूरा नहीं किया जा सकता है। इसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक को कमर कसकर मैदान में उतरना होगा।

राष्ट्र की सेवा एवं एकता के लिए हमें प्रतिपल तत्पर रहना चाहिए। इकबाल के शब्दों में-

“पत्थरों की मूरतों ने समझा है तू खुदा है।
खाके वतन का मुझको हर जर्रा देखता है।”

उपसंहार-राष्ट्रीय एकता का सामूहिक प्रयास ही फलदायी सिद्ध हो सकता है। साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी वर्ग,समाज-सेवी तथा देश-प्रेमी प्रत्येक व्यक्ति को इसके लिए जी-जान से कोशिश करनी पड़ेगी। परिवार तथा नारियों की भी इस सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। बालकों के मन-मानस से बचपन से ही बन्धुत्व की भावना का बीजारोपण करना परमावश्यक है। सभी परम-पिता की संतान हैं। आबाल वृद्ध सबको ही राष्ट्रीय एकता के तार को दृढ़ बनाने में अपना योगदान देना चाहिए, तभी राष्ट्र में एकता के स्वर गुंजित होंगे। सभी नागरिक प्रेम तथा बन्धुत्व के सम सूत्र में आबद्ध होकर सुख तथा शान्ति का अनुभव करेंगे।

(6) स्वच्छ भारत अभियान
अथवा
स्वच्छ भारत, श्रेष्ठ भारत

“स्वच्छ भारत का यह अभियान,
आज करता सबका आह्वान।
देश हित उठो सफाई करो,
बढ़ाओ जग में निज सम्मान॥”

रूपरेखा [2018]-

  • प्रस्तावना,
  • स्वच्छ भारत का स्वप्न,
  • स्वच्छ भारत अभियान का प्रारम्भ,
  • गन्दगी के दुष्परिणाम,
  • स्वच्छ भारत अभियान का प्रचार-प्रसार,
  • सभी वर्गों का सहयोग अपेक्षित,
  • शुभ परिणाम,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-सदाचारी, सहृदय, मृदुभाषी,स्पष्टवक्ता आदि की तरह ही सफाई पसन्द होना श्रेष्ठ मानव की विशेष पहचान है। स्वच्छ तन में निर्मल मन विकसित होता है। घर-बाहर का स्वच्छ परिवेश उल्लास,स्फूर्ति,कर्मण्यता को बढ़ाता है। जीवन मंगल मार्ग की ओर अग्रसर होता है। इसके विपरीत गन्दगी व फूहड़ परिवेश पतन के कारण बनते हैं। सफाई पसन्द व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ अपने परिवेश को भी सुवासित करता है,वह सभी को अपनी ओर आकर्षित करता . है। स्वच्छता गुण की महिमा अकथनीय है।

स्वच्छ भारत का स्वप्न स्वच्छता के महत्त्व को ध्यान में रखकर ही महात्मा गाँधीजी ने ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का आह्वान करने के साथ ही स्वच्छ भारत का स्वप्न संजोया था। वे भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने में तो सफल हो गये किन्तु स्वच्छ भारत का स्वप्न उनके लिए सपना ही बनकर रह गया।

स्वच्छ भारत अभियान का प्रारम्भ-भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने महात्मा गाँधी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर, 2014 को ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की उद्घोषणा की। उन्होंने स्वच्छता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए इसे अपनाने पर बल दिया। उन्होंने बताया कि स्वयं स्वच्छ रहने के साथ-साथ अन्य को सफाई के प्रति जागरूक करना हर भारतीय की नैतिक जिम्मेदारी है। सफाई के सन्दर्भ में भारत संसार के अनेक देशों से पिछड़ा हुआ है। कई देश ऐसे हैं जहाँ गन्दगी का नामोनिशान भी नहीं है, किन्तु भारत में गन्दगी का भयंकर प्रकोप है।

गन्दगी के दष्परिणाम-भारत के नगरों, महानगरों व गाँवों में भयंकर गन्दगी फैली है। नगरों में बजबजाती नालियाँ, उफनते सीवर,खुले नाले, गलियों, चौराहों पर कूड़े-करकट के ढेर, उन पर भिनभिनाते मक्खी-मच्छर सामान्य बात है। ऐसी स्थिति के मध्य भारत की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा जीवनयापन करता है। इस गन्दगी के कारण विभिन्न बीमारियाँ फैलती हैं। बीमारी के कारण उनके काम-धन्धे रुक जाते हैं। इलाज का अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता है। परिवार के सदस्यों पर संकट छा जाता है। गरीब और गरीब होता जाता है।

गाँवों की स्थिति और भी दयनीय है। वहाँ की अधिकांश आबादी खले में शौच के लिए जाती है। सर्वाधिक दुःखद बात यह है कि माँ-बहनें भी खुले में शौच को जाती हैं। गन्दगी के सन्दर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़े बताते हैं कि भारत में गरीबी के कारण प्रत्येक व्यक्ति को 6,500 रुपये का नुकसान प्रतिवर्ष झेलना पड़ता है। इस कलंक को मिटाना आवश्यक है।

स्वच्छ भारत अभियान का प्रचार-प्रसार–’स्वच्छ भारत अभियान’ को जन आन्दोलन का रूप देना होगा। यह राष्ट्र भक्ति से जुड़ा कार्य है जिसके प्रति प्रत्येक भारतवासी का समर्पण अपेक्षित है। किसी सरकार,संगठन, संस्था या व्यक्ति द्वारा यह कार्य पूरा नहीं किया जा सकता है। इसे सफल बनाने के लिए दूरदर्शन, रेडियो, समाचार-पत्र आदि के माध्यम से प्रचार-प्रसार, परिचर्चा आदि की आवश्यकता है। भारत की सवा सौ करोड़ आबादी को सफाई के प्रति जागरूक करना अनिवार्य है।

सभी वर्गों का सहयोग अपेक्षित स्वच्छता अभियान में जब तक सभी वर्गों का सहयोग नहीं मिलेगा। तब तक सफलता सम्भव नहीं है। इसमें प्रभावशाली नेताओं, अभिनेताओं, कलाकारों, खिलाड़ियों, उद्योगपतियों, समाज सेवियों का सक्रिय सहयोग अपेक्षित है। ये सभी अपने-अपने ढंग से स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा दे सकते हैं। ये चाहेंगे तो प्रत्येक भारतवासी अपनी जन्मभूमि को स्वच्छ रखने के प्रति सजग हो जायेगा। गाँव के स्तर पर प्रधान-सरपंच,नगर के स्तर पर नगर प्रमुख,महानगर के स्तर पर महापौर इस अभियान को सफल बनाने में मददगार होंगे। नगरों में सफाई व्यवस्था दुरुस्त की जाय। गाँवों में सफाई व्यवस्था के साथ-साथ शौचालयों का भी निर्माण कराया जाय। तभी सफाई को गति मिल सकेगी।

शुभ परिणाम–’स्वच्छ भारत अभियान’ की सफलता भारत के मंगलकारी भविष्य की निर्माता सिद्ध होगी। स्वच्छता रहेगी तो तन स्वस्थ होगा, मन उल्लसित रहेगा, कार्यकुशलता बढ़ेगी। इससे आय में वृद्धि होगी,तो गरीबी मिटेगी। बीमारियों पर होने वाला व्यय बचेगा तथा देश के निवासी स्वस्थ एवं स्वावलम्बी बनेंगे। भारत सतत् विकास पथ पर अग्रसर होगा।

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उपसंहार-महात्मा गाँधी के स्वच्छ भारत के स्वप्न को साकार करने में प्रत्येक भारतवासी को सहयोग करना चाहिए। उसे अपने घर एवं बाहर सफाई रखनी चाहिए तथा दूसरों को सफाई के प्रति प्रेरित करना चाहिए। यदि सभी स्वच्छता को अपनी आदत बना लेंगे तो भारत में गन्दगी का नामोनिशां नहीं होगा। फलस्वरूप भारत का सम्मान उत्तरोत्तर शिखर की ओर बढ़ता जायेगा।

7. जीवन में अनुशासन का महत्त्व
अथवा
अनुशासित छात्र जीवन [2009]
अथवा
विद्यार्थी एवं अनुशासन [2009, 13, 15]
अथवा
विद्यार्थी जीवन [2018]

“सूर्य, चन्द्रमा, तारे सारे प्रकृति से अनुशासित होते।
समय बद्ध हो चलते रहते,
कभी न पथ से विचलित होते ॥”

रूपरेखा [2016]-

  • प्रस्तावना,
  • अनुशासित जिन्दगी,
  • अनुशासन का महत्त्व,
  • अनुशासन के प्रकार,
  • अनुशासन का तात्पर्य,
  • अनुशासनहीनता के कारण,
  • विद्यार्थी एवं अनुशासन,
  • उपसंहार।।

“अनुशासन दो शब्दों अनु + शासन के योग से बना है। इसका तात्पर्य है-शासन के पीछे चलना या नियमानुकूल कार्य करना। इस प्रकार नियमों का पालन ही अनुशासन कहलाता है।” बिना अनुशासन के जीवन अटपटा एवं सारहीन है।

प्रस्तावना-समस्त सृष्टि नियमबद्ध तरीके से संचालित हो रही है। सूर्य एवं चन्द्र नियमित रूप से उदय होकर दुनिया को प्रकाश लुटाते हैं। जिस प्रकार प्रकृति के नियम हैं, उसी भाँति समाज, देश तथा धर्म की भी कुछ मर्यादाएँ होती हैं। कुछ नियम होते हैं, कुछ आदर्श निर्धारित होते हैं। इन आदर्शों के अनुरूप जीवन ढालना अनुशासन की परिधि में आता है।

अनुशासित जिन्दगी–वास्तव में अनुशासित जिन्दगी बहुत ही मनोहर तथा आकर्षक होती है। इससे जीवन दिन-प्रतिदिन प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है। अनुशासन के पालन से जीवन में मान-मर्यादा मिलती है। जो जीवन अनुशासित नहीं होता, वह धिक्कार तथा तिरस्कार का पात्र बनता है।

अनुशासन का महत्त्व-अनुशासन का जीवन से गहरा लगाव है। जो समाज अथवा राष्ट्र अनुशासन में बँधा होता है,उसकी उन्नति अवश्यम्भावी है। दुनिया की कोई भी ताकत उसे बढ़ने से रोक नहीं पाती। यदि अनुशासन का उल्लंघन किया जाय तो राष्ट्र तथा समाज अधोगति गर्त में गिरता चला जाता है।

अनुशासन के प्रकार-अनुशासन के अनेक प्रकार हैं। नैतिक अनुशासन, सामाजिक अनुशासन तथा धार्मिक अनुशासन। अनुशासन बाह्य तथा आन्तरिक दो प्रकार का होता है। जब भय तथा डंडे के बल पर अनुशासन स्थापित किया जाता है, तो इस प्रकार के अनुशासन को बाहरी अनुशासन कहकर पुकारा जाता है। जब व्यक्ति अथवा बालक स्वेच्छा से प्रसन्न मन से नियमों का पालन करता है, तो इस प्रकार का अनुशासन आन्तरिक अनुशासन की श्रेणी में आता है।

अनुशासन का तात्पर्य-अनुशासन शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। पहला ‘अनु’ जिसका अर्थ है पीछे, दूसरा ‘शासन’ अर्थात् शासन के पीछे अनुगमन करना।

अनुशासनहीनता के कारण आज छात्र वर्ग में असंतोष तथा निराशा है। यही निराशा तथा असंतोष अनुशासनहीनता का जनक है। आज छात्र-वर्ग अनुशासन को भंग करने में अपनी शान समझता है।

इसका प्रमुख कारण यह है कि आज जीवन मूल्यों में निरन्तर गिरावट आ रही है। शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि छात्रों को अपना भविष्य अन्धकारमय नजर आता है। सिनेमा के अश्लील तथा संघर्षमय चित्र आग में घी का काम कर रहे हैं। वातावरण दूषित है। धन को ही सर्वस्व स्वीकारा जा रहा है। आज के नेता अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए छात्र-वर्ग को गुमराह कर रहे हैं। इन सब कारणों से अनुशासनहीनता पनपती जा रही है।

विद्यार्थी एवं अनुशासन-वैसे हर मानव के लिए अनुशासन का पालन करना आवश्यक है, लेकिन छात्रों के लिए तो अनुशासन में रहना अमृत-तुल्य है। छात्र जीवन मानव जीवन की आधारशिला है।

आज छात्रों द्वारा परीक्षा का बहिष्कार, सार्वजनिक स्थानों में तोड़-फोड़ तथा पुलिस के साथ संघर्ष एक आम बात हो गई है। समाचार-पत्र छात्रों की अनुशासनहीनता तथा हिंसक घटनाओं की खबर नित्य-प्रति प्रकाशित करते रहते हैं। हम इन्हें पढ़कर मात्र इतना कह देते हैं कि यह बहुत बुरी बात है,लेकिन हमारे इतना कहने मात्र से इसका निराकरण नहीं होता। क्या कभी हमने शान्त-मन से यह सोचा है कि यदि यह बीमारी बढ़ती गई तो इसका निराकरण करना हमारे वश की बात नहीं रहेगी।

छात्र एवं अनुशासन एक सिक्के के दो पहलू हैं। प्राचीन काल में छात्रों को आश्रमों तथा गुरुकुलों में गुरु के समीप रहकर शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती थी। उनको अनुशासन के कठोर नियमों में बँधकर जीवनयापन करना पड़ता था। वर्तमान समय के छात्रों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे आज अनुशासनहीनता के जिस पथ पर अग्रसर हो रहे हैं,वह उनके भविष्य के लिए घातक तथा अमंगलकारी है।

इसके निराकरण के लिए नियमित रूप से नैतिक शिक्षा, धार्मिक उपदेश तथा जीवनोपयोगी चर्चायें, प्रार्थना स्थल तथा कक्षाओं में होनी चाहिए जिससे छात्र सद्मार्ग के अनुगामी बन सकें। अभिभावकों, शिक्षाविदों तथा अध्यापकों को भी स्वयं के आदर्श प्रस्तुत करके छात्रों को देश का उत्तम नागरिक बनाने में यथाशक्ति सहयोग देना चाहिए।

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उपसंहार-छात्र देश के भाग्य विधाता हैं। शक्ति के पुंज हैं। देश उनकी ओर आशा भरी दृष्टि से निहार रहा है। यदि वे सुधरे तो देश सुधरेगा। उनके न सुधरने पर देश रसातलगामी बनेगा।

8. बेकारी की समस्या
अथवा
बेरोजगारी एक समस्या: कारण एवं निवारण [2009]

“अकुलाती है प्यास धरा की
घिरती जब दारिद्र्य दुपहरी।
छलनी हो जाता नभ का उर,
छाती जब अँधियारी गहरी॥”

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. भारत में बेरोजगारी की समस्या,
  3. बेरोजगारी के कारण,
  4. बेकारी निराकरण के उपाय,
  5. उपसंहार।।

प्रस्तावना-आज प्रत्येक साल विद्या-मन्दिरों से उपाधि का बोझ धारण किये लाखों की संख्या में नौजवान निकल रहे हैं। शिक्षा समापन के बाद वे दर-दर नौकरी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। नौकरी सीमित हैं। नौकरी चाहने वालों की संख्या असीमित है। किसी शायर ने इसे देखकर कहा देखिए

“कॉलेजों से सदा आ रही है, पास-पास की।
ओहदों से सदा आ रही है, दूर-दूर की ॥”

कैसी विडम्बना है कि भविष्य की आशालता नौजवान आज बेकार है। उनकी रुचि का कार्य उन्हें नहीं मिल पा रहा है।

भारत में बेरोजगारी की समस्या जब हम अपने देश भारत पर दृष्टिपात करते हैं, तो यहाँ बेरोजगार व्यक्ति सीमा से अधिक हैं। काम सीमित है तथा काम करने वाले हाथ अधिक हैं। मशीनीकरण के कारण भी बेकारी बढ़ी है। भूमि भी कम है। कल-कारखाने भी आदमी के अनुपात में कम हैं।

बेरोजगारी के कारण बेरोजगारी के प्रमुख कारण निम्नवत हैं

  1. शारीरिक श्रम से बचने का प्रयास-आज़ देश के अधिकांश नवयुवक शारीरिक श्रम से बचने का प्रयास करते हैं।
  2. प्रत्येक नौकरी का आकांक्षी-आज हर छात्र शिक्षा समाप्त करके नौकरी प्राप्त करना चाहता है। नौकरी कम तथा नौकरी पाने के इच्छुक नौजवानों की संख्या अधिक है। इस दशा में बेकारी का बढ़ना स्वाभाविक है।
  3. जनसंख्या में वृद्धि-आज भारत में जनसंख्या द्रुत गति से बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में सबके लिए रोजी-रोटी की समस्या आज प्रश्न रूप में उपस्थित है।
  4. दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली-वर्तमान शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है। लार्ड मैकाले के सपने को यह आज भी साकार कर रही है। आज किसी व्यवसाय विशेष को अपनाने के स्थान पर नौजवान बाबू बनने को तत्पर है। शिक्षा रोजगारपरक नहीं है।
  5. कुटीर उद्योग-धन्धों का समापन-आज प्रायः कुटीर उद्योग-धन्धों का समापन-सा ही हो गया है। मशीनी युग आ गया है। इस दशा में कुटीर उद्योग-धन्धों को करने वाले हाथ बेकार हो गये हैं।
  6. उद्योग-धन्धों का उचित विकास न होना–भारत की जनसंख्या के अनुपात में उद्योग-धन्धों का जितना विकास होना चाहिए था, उतना नहीं हो पा रहा है, फलतः बेकारी फैलेगी ही।
  7. सामाजिक कुरीतियाँ-सामाजिक कुरीतियाँ भी बेकारी के लिए उत्तरदायी हैं। जाति विशेष के लोग किसी व्यवसाय विशेष को सम्पन्न करने में अपना अपमान समझते हैं। चाहे वे बेकार भले ही बैठे रहें, परन्तु काम नहीं करते।

बेकारी निराकरण के उपाय-बेकारी की समस्या का निराकरण होना परमावश्यक है। इस सम्बन्ध में देश के नौजवानों में श्रम करने की भावना जाग्रत होनी चाहिए। शारीरिक श्रम के प्रति उनमें सर्वदा सच्चा भाव होना चाहिए। इसे असम्मान के स्थान पर सम्मान समझना चाहिए।

बढ़ती हुई जनसंख्या पर तत्क्षण रोक लगाना जरूरी है। शिक्षा रोजगारपरक हो, योजनाएँ मंगलकारी तथा सुविचारित होनी चाहिए। शिक्षा प्रणाली में समय के अनुरूप परिवर्तन अपेक्षित है।

लघु कुटीर उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन देना नितान्त आवश्यक है। इन धन्धों के माध्यम से निम्न तथा निर्धन वर्ग अपनी रोजी-रोटी की समस्या का समाधान करने में स्वयं ही सक्षम हो जायेगा।

भारत एक कृषि-प्रधान देश है। यहाँ की अधिकांश जनता कृषि पर आश्रित है। इस हेतु यह परमावश्यक है कि हर योजना में कृषि को प्रमुखता दी जाय। तरुण पीढ़ी को कृषि कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाय। दुःख का विषय तो यह है कि आज का नवयुवक नगरों की रंग-बिरंगी शोभा पर कुर्बान है। गाँव की प्राकृतिक सुषमा को भुला बैठा है। युवकों के मन मानस में अनाज की बालियों को प्राप्त करने की ललक होनी चाहिए।

देश के नौजवानों को जापान से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, जहाँ पर हर एक की उँगली काम पर थिरकती रहती है। सब कर्म-यज्ञ के आराधक हैं।

उपसंहार-बेरोजगारी की समस्या का निदान राष्ट्र का सर्वोपरि लक्ष्य होना चाहिए। जब तक देश की जनसंख्या पेट की ज्वाला से दग्ध होती रहेगी, तब तक देश की शक्ति का प्रयोग रचनात्मक कार्यों में कदापि नहीं हो सकता। उस समय तक गाँधी तथा नेहरू के सपनों का भारत केवल काल्पनिक वस्तु बनकर ही रह जायेगा।

9. पर्यावरण-प्रदूषण [2011, 12, 14, 17]
अथवा
पर्यावरण प्रदूषण-कारण और निदान [2015]

“अपनी हालत का कुछ अहसास नहीं मुझको,
मैंने औरों से सना है कि परेशाँ हँ मैं।”
“दुनिया में कुछ इस कदर छाया है प्रदूषण,
कि देखकर ये हाल हैराँ हूँ मैं।”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • प्रदूषण का अभिप्राय,
  • प्रदूषण के प्रकार,
  • प्रदूषण की रोकथाम,
  • उपसंहार।।

प्रस्तावना-पर्यावरण प्रदूषण आज समस्त विश्व के लिए गम्भीर चुनौती बना हुआ है। इस समस्या का अविलम्ब निराकरण होना परमावश्यक है। आज आकाश विषाक्त हो गया है। धरती दूषित हो गई है। जल जानलेवा बन गया है। आज का इन्सान भोग-विलास तथा आमोद-प्रमोद में मस्त है। अपनी सुख-सुविधाओं की वृद्धि की सनक में प्राकृतिक सम्पदाओं का निरन्तर दोहन करता हुआ चला जा रहा है। वृक्ष काटे जा रहे हैं। हरियाली नष्ट की जा रही है। पुष्पों को कुचला जा रहा है। प्राकृतिक छटा स्वप्नवत् हो गई है। यही वजह है कि आज मानव

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स्वच्छ वायु का सेवन करने के लिए भी तरस रहा है। पर्यावरण-प्रदूषण के फलस्वरूप जिन्दगी की गुणात्मकता में प्रतिपल हास हो रहा है। प्रदूषण का अभिप्राय-साधारण रूप से वे समग्र कारण जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इन्सान के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं, संसाधनों पर विपरीत प्रभाव डालते हैं, प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। प्रदूषण से हमारा अभिप्राय यह है-वायु, जल एवं धरती की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक विशेषताओं में अवांछनीय परिवर्तन द्वारा दोष पैदा हो जाना। सरिता, पर्वत,पानी, वायु तथा वन आदि की स्वाभाविक स्थिति में विकार (दोष) का समावेश हो जाता है, तब प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

प्रदूषण के प्रकार-

  • वायु प्रदूषण,
  • जल प्रदूषण,
  • रेडियोधर्मी प्रदूषण,
  • ध्वनि-प्रदूषण,
  • रासायनिक प्रदूषण।।

(1) वायु प्रदूषण-आजकल फैक्टरी तथा कारखानों की चिमनियाँ रात-दिन काला धुआँ उगल रही हैं। सड़क पर दौड़ते हुए वाहन एवं कोयले के प्रयोग से घर से निकलने वाला धुआँ वातावरण में जहर घोल रहा है। सड़क पर चलना तथा घर में रहना भी दुश्वार हो गया है। हर स्थल पर धुएँ की घुटन विद्यमान है। मानव इनसे त्राण पाना चाहता है,परन्तु स्वयं को लाचार तथा असहाय अनुभव कर रहा है। इन्सान स्वयं की साँस में वायु से ऑक्सीजन ग्रहण करता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड नामक गैस को छोड़ता है। यह अत्यधिक विषाक्त गैस है। पृथ्वी पर वृक्ष तथा पौधे इसे सोख लेते हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आज कार्बन डाइ-ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों का प्रतिदिन विस्तार हो रहा है। इन गैसों से धरती का तापमान अनुपात से अधिक बढ़ रहा है।

(2) जल प्रदूषण जब जल दूषित तथा दुर्गन्धयुक्त हो जाता है तब उसे जल प्रदूषण पुकारते हैं। आज फैक्ट्री तथा कारखानों द्वारा छोड़ा गया रासायनिक पदार्थ जल को दूषित बना रहा है। मल-मूत्र जल में मिलकर कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। ये रासायनिक पदार्थ नदियों के माध्यम से सागर तक पहुँचते हैं, फलतः सागर जल भी दूषित हो जाता है। जीव-जन्तु व्याकुल होकर मरणोन्मुख हो जाते हैं। आज का जल इतना विषाक्त तथा दूषित हो गया है, जो मानव को मौत तथा बीमारियों की ओर अग्रसर कर रहा है।

(3) रेडियोधर्मी प्रदूषण-आज विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र परमाणु शक्ति के विस्तार में संलग्न हैं। परमाणु विस्फोट आज आम बात हो गई है। विस्फोटों से ढेर के रूप में रेडियोधर्मी कणों का विसर्जन होता है। इससे स्थान विशेष की वायु दूषित हो जाती है।

(4) ध्वनि प्रदूषण-आज औद्योगीकरण की वजह से मशीनों का अम्बार लगा हुआ है। मशीनों तथा वाहनों के कर्ण-भेदी शोर के मध्य में ही जैसे-तैसे करके हमको जीना पड़ रहा है। इससे स्नायुमंडल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। मानव प्रत्येक क्षण तनाव में जीता है। शान्ति आज उससे कोसों दूर है। दिनभर श्रम करने के पश्चात् आदमी सोना चाहता है, परन्तु शोर के कारण वह गहरी निद्रा की गोदी में समाकर तनिक भी विश्राम नहीं कर पाता है।

(5) रासायनिक प्रदूषण-खेती के कीड़ों को मारने के लिए अनेक कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है। इससे पृथ्वी बंजर भूमि में परिवर्तित हो सकती है। आज इनके प्रयोग से अन्न दूषित तथा स्वाद-रहित हो गया है। ये मानव के स्वास्थ्य को भी चौपट किये डाल रहा है।

प्रदूषण की रोकथाम-समय की महती आवश्यकता है कि प्रदूषणकारी तत्त्वों पर पूरी तरह से अंकुश लगाया जाये। इस सन्दर्भ में समस्त दुनिया में एक नवीन विचारधारा जाग्रत हुई है। चेतना का नव संचार हुआ है। प्रदूषण की समस्या का मूल कारण उद्योगों का विकास है।

इस विकास से पूर्व किसी ने भी नहीं सोचा था कि प्रदूषण इतना जानलेवा बन जायेगा। एक तरह से द्रौपदी की चीर की तरह प्रदूषण की समस्या निरन्तर बढ़ती जा रही है।

प्रदूषण पर नियन्त्रण लगाने के लिए व्यक्तिगत प्रयास का कोई मूल्य नहीं है। इसके लिए संगठित होकर प्रयास करना होगा। जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए “जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण अधिनियम” पहले ही लागू किया जा चुका है। प्रदूषण बोर्डों का गठन हो चुका है।

उद्योगों से सम्बन्धित उनके स्वामियों से शर्त रखी गई है कि वे कचरे के निस्तारण की समुचित व्यवस्था करें। गन्दे पानी की निकासी की भी समुचित व्यवस्था करें। इससे पूर्व उन्हें उद्योगों की सुविधा उपलब्ध नहीं होगी। पर्यावरण विशेषज्ञों की राय लेना भी आवश्यक है।

जंगलों तथा वनों को काटने पर भी रोक लगायी गई है। वन-महोत्सव सम्पन्न किये जा रहे हैं। वृक्षों को आरोपित करने का अभियान भी तीव्र गति से चलाया जा रहा है लेकिन इस दिशा में जितना सार्थक कार्य होना चाहिए, वह अभी तक नहीं हो पाया है।

उपसंहार-आज विज्ञान का युग है। मानव की सुख-सुविधाओं में निरन्तर विस्तार हो रहा है लेकिन इसका दुःखद पहलू यह है कि इससे प्रदूषण निरन्तर बढ़ रहा है। प्रदूषण की समस्या किसी राष्ट्र विशेष की न होकर सम्पूर्ण विश्व की समस्या है। इसमें विश्व के समस्त देशों को समवेत रूप से प्रयास करना होगा। मानव-मानव में कोई भी भेद नहीं है। सब परमपिता की सन्तान हैं। सबके हित में ही अपना हित है। किसी कवि ने ठीक ही कहा है

“कोई नहीं पराया मेरा, घर सारा संसार है।
मैं कहता हूँ जिओ, और जीने दो संसार को॥”

10. किसी खेल का आँखों देखा वर्णन-क्रिकेट मैच [2011]
अथवा
आकर्षक मैच का वर्णन [2009, 14]

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • मैच का अर्थ,
  • मैच खेलने का निश्चय,
  • क्रीड़ा स्थल पर,
  • मैच का शुरू होना,
  • हार-जीत की होड़,
  • खेल का समापन,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-दुनिया प्रकृति का रंगमंच है। प्रकृति विविध प्रकार की क्रीड़ाओं में निरन्तर संलग्न रहती है। भ्रमर प्रसूनों से गुनगुना कर बात करते हैं। तितलियाँ फूलों के ऊपर मँडराकर नृत्य करती,खेलती तथा इठलाती हैं। जब छोटे-से-छोटे कीड़े भी निश्चित क्रीड़ा करते रहते हैं, तो मानव भला इनसे कैसे उदासीन रह सकता है। छात्र तथा छात्राओं के मन-मानस में खेल के प्रति उत्कंठा तथा ललक होती है।

मैच का अर्थ-खेल व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है। इसी हेतु विभिन्न प्रकार के खेलों का अस्तित्व मानव के समक्ष प्रकट हुआ। खेलों के माध्यम से खिलाड़ियों को एक उत्साह मिलता है। इसी बात को दृष्टिपथ में रखकर प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। खेल की प्रतियोगिता को ही मैच के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

मैच खेलने का निश्चय-हर विद्यालय में प्रत्येक साल खेलों का आयोजन होता है। हमारा विद्यालय फिर इसका अपवाद कैसे हो सकता है ? विगत वर्ष जनवरी का प्रथम सप्ताह था। प्रिंसिपल महोदय ने क्रीडाध्यक्ष के माध्यम से यह आदेश प्रसारित किया कि 20 जनवरी को हमारे कॉलेज की टीम स्थानीय विक्टोरिया इण्टर कॉलेज की टीम से मैच खेलेगी। आदेश को सुनते ही छात्र एवं खिलाड़ी फूले नहीं समा रहे थे।

क्रीड़ा-स्थल पर-20 जनवरी को करीब 9 बजे मैं क्रीड़ा-स्थल जा पहुँचा। नगर के बहुत से कॉलेजों के विद्यार्थी इस मैच को देखने के लिए एकत्रित हुए थे, अतः भीड़ का कोई अन्त नहीं था। सुप्रसिद्ध टीमों का नाम सुनकर बहुत से खेल-प्रेमी तथा नागरिक भी आ गये थे। मैच शुरू होने में अभी एक घण्टा शेष था। मैं शनैःशनैः अग्रिम पंक्ति में अपने सहपाठियों के निकट पहुँचने में सफल हुआ।

इसी अन्तराल में दो निर्णायक क्रीड़ा-स्थल पर पधारे। इसी मध्य दोनों कॉलेजों की टीमें अपनी साज-सज्जा के साथ उपस्थित हुईं। ,

मैच का शुरू होना-दोनों टीमों के कप्तान तथा मैच निर्णायक मैदान के मध्य में स्थित खेल पट्टी के पास खड़े होकर ‘टॉस’ करने लगे। हमारे विद्यालय के कप्तान ने ‘टॉस’ जीता और पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया। हमारे दल के प्रारम्भिक बल्लेबाज अपने खेल का प्रदर्शन करने के लिए तैयार थे।

हार-जीत की होड़-क्रिकेट खेल का तो रोमांच ही निराला है। गेंद-बल्ले के इस खेल के सभी आयुवर्ग के लोग दीवाने होते हैं। हमारे बल्लेबाजों ने शुरू से ही तेज गति से रन बनाने प्रारम्भ कर दिये। दोनों ने मिलकर बिना आउट हुए 10 ओवरों में 60 रन कूट डाले,लेकिन तभी विपक्षी दल के गेंदबाज राकेश ने घातक गेंदबाजी करते हुए अपने दो लगातार ओवरों में हमारे तीन बल्लेबाजों को आउट कर दिया। अब हमारा स्कोर हो गया 72 रन पर तीन विकेट। अब खेलने के लिए हमारे दल का कप्तान मैदान में आया और आते ही पहली गेंद पर उसने शानदार छक्का जड़ा। धीरे-धीरे मैच के रोमांच के साथ-साथ हमारे विद्यालय की पारी भी आगे बढ़ने लगी। खेल का दौर निरन्तर गतिमान रहा। कुल मिलाकर हमारे विद्यालय के दल ने अपने कोटे के 30 ओवरों में 150 रन बनाये और विपक्षी दल को जीत के लिए 151 रन बनाने की चुनौती दी।

दर्शक बहुत ही आनन्द का अनुभव कर रहे थे। आधा घण्टे का विश्राम एवं अल्पाहार के पश्चात् विक्टोरिया इण्टर कॉलेज की टीम खेलने आयी। उन्होंने खेल का प्रारम्भ बहुत ही अच्छे तरीके से किया। प्रथम 9 ओवरों में उनके 40 रन बने।

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यद्यपि हमारी टीम के गेंदबाज बहुत ही चतुर तथा जाने-माने थे, लेकिन इस समय वह लाचार से दृष्टिगोचर हो रहे थे। अब हमारे स्पिनरों ने अपने गुरुतर भार को उठाया। उन्होंने तेजी से विपक्ष के तीन खिलाड़ी जल्दी-जल्दी आउट कर डाले। वे अब तक मात्र 96 रन बना पाये थे। चौथे तथा पाँचवें खिलाड़ी भी स्पिनर अजय ने आउट कर दिये। विपक्षी हताश हो गये और मात्र 25 ओवरों में ही उनकी टीम कुल 117 रन बनाकर आउट हो गयी। सौभाग्यवश विजयश्री ने हमारे कॉलेज की टीम का वरण किया।

खेल का समापन-खेल समाप्त हुआ। मैदान में पण्डाल के अन्तर्गत अल्पाहार का आयोजन किया गया था। दोनों दलों के समस्त खिलाड़ी तथा उपस्थित शिक्षक अल्पाहार के लिए टेबिलों पर उपस्थित हुए।

चाय-पान के पश्चात् पुरस्कार वितरण का आयोजन किया गया। हमारे कॉलेज के खिलाड़ी क्रम से उत्साहित होकर पुरस्कार ग्रहण करने के लिए जा रहे थे। हमारे दल के कप्तान ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला-विद्यालय निरीक्षक से हाथ मिलाकर चल बैजयन्ती ग्रहण की। समस्त खिलाड़ियों तथा उपस्थित जन-समूह ने ताली बजाकर प्रसन्नता व्यक्त की। उत्साहवर्धन के लिए विपक्ष के खिलाड़ियों को भी सान्त्वना पुरस्कार प्रदत्त किये गये।

उपसंहार-खेल का महत्त्व इसलिए भी है कि इससे खेल की भावना का विकास होता है। आज हमें अपने मन-मानस में इस भावना को पल्लवित करके देश के माहौल को उन्नत करना होगा। यह भावना हमें खुशी के साथ जीने का सम्बल देगी। सहयोग, मैत्री तथा सद्भाव का पाठ इन खेलों के माध्यम से ही प्राप्त होगा। यह आज के युग की महती आवश्यकता है।

11.समाचार-पत्रों की उपयोगिता [2013, 16]
अथवा
प्रजातन्त्र के सजग प्रहरी समाचार-पत्र [2009]

“न तोप निकालो,
न तलवार निकालो।
मुकाबिल है तो,
एक अखबार निकालो।”

रूपरेखा [2015]-

  • प्रस्तावना,
  • समाचार-पत्रों के प्रकार,
  • जन्म तथा विकास,
  • समाचार-पत्रों की आवश्यकता,
  • समाचार-पत्रों का महत्त्व,
  • समाचार-पत्रों की शक्ति,
  • समाचार-पत्रों का उत्तरदायित्व,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-आज विज्ञान का युग है। विज्ञान ने सम्पूर्ण संसार को एक कुटुम्बवत् बना दिया है। संचार का विस्तार सिमटता हुआ चला जा रहा है। आज हर इन्सान इस बात का इच्छुक है कि उसे संसार की अधिकाधिक जानकारी मिले। इस बात को जानने का सबसे सशक्त साधन समाचार-पत्र ही हैं। समाचार-पत्र जीवन से इस प्रकार जुड़ गया है कि इसके बिना जीवन अधूरा लगता है। शिक्षित व्यक्तियों के लिए तो समाचार-पत्र चाय तथा जलपान की तरह जिन्दगी का अविभाज्य अंग बन गया है।

समाचार-पत्रों के प्रकार-समाचार-पत्रों की कई श्रेणियाँ होती हैं। कतिपय समाचार-पत्र रोजाना छपते हैं। कुछ साप्ताहिक होते हैं। कुछ समाचार-पत्र प्रातः एवं संध्या के रूप में ही छपते हैं। चाहे समाचार-पत्र किसी भी प्रकार का क्यों न हो, जनसामान्य को विश्व की गतिविधियों का अधिकाधिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करना ही उसका लक्ष्य होता है।

जन्म तथा विकास समाचार-पत्रों का जन्म सोलहवीं शताब्दी में ठहराया जाता है। इंग्लैण्ड में प्रथम बार सत्रहवीं शताब्दी में समाचार-पत्र का प्रकाशन स्वीकारा गया है। भारतवर्ष में अंग्रेजों के पदार्पण से पूर्व किसी भी समाचार-पत्र का उल्लेख नहीं मिलता। ‘इण्डिया गजट’ नामक ‘सरकारी पत्र’ सबसे पहली बार भारत में प्रकाशित हुआ। ईसाइयों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए समाचार-पत्र छापने प्रारम्भ कर दिये। ‘दर्पण’ नामक समाचार-पत्र इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। ईश्वर चन्द्र ने ‘प्रभाकर’ तथा राजा राममोहन राय ने ‘कौमुदी’ नामक समाचार-पत्र प्रकाशित किये। मुद्रण कला के आविष्कार के साथ तो आज समाचार-पत्रों की बाढ़-सी आ गई है। ये समाचार-पत्र देश-विदेश की दैनिक खबर प्रकाशित करके जनसामान्य को प्रबुद्ध तथा जागरूक बना रहे हैं।

समाचार-पत्रों की आवश्यकता-इन्सान एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में जन्म लेता है। समाज में ही उसका पालन-पोषण होता है। वह समाज के सुख एवं दुःख को जानने के लिए प्रतिपल उत्सुक रहता है। वह चाहता है कि उसकी बात को कोई सुने तथा दूसरों की भावना को भी वह जाने। इस सबको जानने का एकमात्र साधन समाचार-पत्र है।

समाचार-पत्रों का महत्त्व–इस बात में कोई भी विरोध नहीं हो सकता कि समाचार-पत्रों का मानव जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। विभिन्न प्रकार के राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक विषयक समाचार दिन-प्रतिदिन प्रकाशित होते हैं। जनसामान्य इन्हें बड़े शौक से पढ़ता है। दुनियाभर के समाचार इन पत्रों में प्रकाशित होते हैं। विश्व के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक के समाचार इन पत्रों में पढ़ने को मिल जाते हैं। चन्द पैसों में हम दुनिया के समाचार पढ़ लेते हैं। यदि कोई घटना हमारे लिए हानिप्रद अथवा लाभप्रद हो तो हम चैतन्य तथा जाग्रत होकर

उससे लाभ ग्रहण कर सकते हैं। व्यापारी व्यापार के विज्ञापन पढ़कर अपनी बिक्री में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं। काम की तलाश में बेकार बैठे नवयुवक रिक्त स्थानों के विज्ञापन पढ़कर आवेदन-पत्र प्रस्तुत करके नौकरी प्राप्त कर सकते हैं। विवाह के इच्छुक वैवाहिक विज्ञापन को पढ़कर मनवांछित जीवन साथी का चयन कर सकते हैं।

महत्त्वपूर्ण विषय के सन्दर्भ में सम्पादक महोदय जिस स्तम्भ को लिखते हैं, वह बहुत ही उपयोगी होता है। सम्पादक जनसामान्य की अपेक्षा अधिक प्रबुद्ध तथा जानकार होता है। उसकी सम्मति बहुत ही सारपूर्ण तथा उपयोगी होती है। पाठकों के स्तम्भ के अन्तर्गत पाठकों के विचार छपते हैं। ये विचार भी सारगर्भित होते हैं। . आज प्रजातन्त्र का युग है। आधुनिक समय में समाचार-पत्रों का महत्त्व और भी बढ़ गया है। ये जनमत को बनाने तथा बिगाड़ने के प्रबल साधन हैं। चुनाव के समय किसी भी दल को जिताने तथा हराने में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

सरकार तथा जनता के मध्य की कड़ी समाचार-पत्र ही होते हैं। सरकार की नीति तथा विचारों का खुलासा जनता के समक्ष समाचार-पत्र ही करते हैं। जनता के आक्रोश को भी सरकार के कानों तक समाचार-पत्र ही पहुँचाते हैं।

समाचार-पत्रों की शक्ति-समाचार-पत्रों की बहुत शक्ति होती है। वे किसी भी समस्या को लेकर आन्दोलन का सूत्रपात कर सकते हैं। जनता को प्रबुद्ध तथा जागरूक बनाकर सरकार को उसकी बात को स्वीकार करने के लिए विवश कर सकते हैं।

समाचार-पत्रों का उत्तरदायित्व-समाचार-पत्रों पर बहुत बड़ा उत्तरदायित्व होता है। समाचार-पत्रों को शक्ति-सम्पन्न होने पर भी सन्तुलित एवं मर्यादित होना चाहिए। समाचार-पत्रों को जनसामान्य का ठीक दिशा निर्देश करना चाहिए। उत्तेजक तथा सनसनीपूर्ण खबरें जनमानस में गलत धारणा का बीजारोपण करती हैं। अश्लील तथा हत्या की खबरें जनमानस को विकृत करती हैं। इनका प्रकाशन घटिया किस्म का है, अतः इसे रोकना चाहिए।

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उपसंहार-समाचार-पत्रों की प्रत्येक उन्नत राष्ट्र को महती आवश्यकता है। समाचार-पत्रं सभ्यता तथा संस्कृति के सजग प्रहरी होते हैं। ये क्रान्ति के अग्रदूत तथा सुधार तथा अलख जगाने वाले होते हैं। देश की आन्तरिक शान्ति स्थापना में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे देश में समाचार-पत्रों का भविष्य स्वर्णिम तथा मंगलमय है। राष्ट्र को ये नया स्वर देते हैं, नवीन प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। ये उन्नति के संदेशवाहक हैं।

12. किसी त्योहार का वर्णन-दीपावली

“दीपावली कह रही है,
दीप-सा युग-युग जलो।
घोर तम को पाट कर,
आलोक बनकर तुम चलो।।”

रूपरेखा-
(1) प्रस्तावना,
(2) दीपावली का तात्पर्य,
(3) दीपावली मनाने के कारण,
(4) लक्ष्मी पूजा पर्व,
(5) दीपावली की तैयारियाँ,
(6) बुराइयाँ,
(7) उपसंहार।

प्रस्तावना-अमावस की घनघोर काली रात में झिलमिल करती एवं जगमगाती मिट्टी के दीपकों की पंक्तियाँ तथा आसमान को चूमती हुई रंग-बिरंगी पटाखे तथा फुलझड़ियाँ जन-सामान्य के हृदय में खुशी की लहर पैदा कर देती हैं। दीपावली भारतवर्ष का प्रमुख त्योहार है। यह पर्व छोटे-छोटे नगर तथा ग्राम से लेकर बड़े-से-बड़े नगरों तथा कस्बों में सोत्साह मनाया जाता है। यह पर्व तिमिर नाशक है। सफाई तथा वैभव का प्रकाश विकीर्ण करने वाला है। कवि नीरज की निम्न पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं

“जलाओ दिए, पर ध्यान रहे इतना। धरा पर अँधेरा कहीं रह न जाये ?”

दीपावली का तात्पर्य-दीपावली को दीपोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। दीपक विवेक तथा प्रसन्नता का द्योतक है। दीपक प्रकाश विकीर्ण करते हैं। दीपावली का तात्पर्य रोलनी के पर्व से व्यक्त किया जाता है।

दीपावली मनाने के कारण यह ज्योति पर्व हर साल कार्तिक मास की अमावस्या के दिन उल्लासमय वातावरण में सम्पन्न किया जाता है। इसके मनाने के अनेक कारण हैं। कुछ लोगों की यह धारणा है कि भगवान राम चौदह साल के वनवास के पश्चात् अयोध्या लौटे, तो दीप जलाकर जनता द्वारा प्रसन्नता व्यक्त की गई,तभी से यह पर्व मनाया जाता है।

इसके अलावा भी दीपावली मनाने के अनेक कारण हैं। भारत एक कृषि-प्रधान देश है। यहाँ फसलों के तैयार होने पर कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। जब फसल (खरीफ) पककर तैयार हो जाती है, तब दीपावली का पर्व मनाया जाता है।

अन्य कारण बरसात के महीने में सर्वत्र गन्दगी तथा सीलन हो जाती है। कीचड़ की दुर्गन्ध राह चलना भी दुश्वार कर देती है। वर्षा के समाप्त होने पर सफाई करना अपेक्षित हो जाता है। दीपावली पर मकानों की सफाई की जाती है तथा उन पर सफेदी की जाती है। रात्रि में दीपक जलाये जाते हैं। इससे हानिप्रद-कीट-पतंगों का नाश हो जाता है।

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लक्ष्मी पूजा पर्व–दीपावली लक्ष्मी पूजा का पर्व है। व्यापारी वर्ग इस अवसर पर विशेष रूप से लक्ष्मी की उपासना करते हैं। पुराने बहीखातों के स्थान पर नवीन बहीखाते खोलते हैं।

दीपावली की तैयारियाँ-दीपावली को मनाने के लिए कई दिन पूर्व से ही तैयारी की जाने लगती है। मकान साफ-सुथरे करके उन पर सफेदी की जाती है। दरवाजों तथा खिड़कियों पर रंग किया जाता है।

प्रातःकाल से ही बाजारों का दृश्य लुभावना तथा चित्ताकर्षक होता है। हलवाई की दुकानें अनेक स्वादिष्ट तथा रुचिकर मिठाइयों से सजी रहती हैं। चित्र, खिलौने तथा बर्तन दुकानों पर पंक्तिबद्ध लगे रहते हैं।

रात को लोग अपने घरों पर दीपक,मोमबत्ती तथा बिजली के बल्ब जलाते हैं। रोशनी के निमित्त बल्बों की झालरें घर के बाहरी भाग पर लटका देते हैं।

बालक आतिशबाजी, फुलझड़ी तथा पटाखे चलाते हैं। इस अवसर पर लोग तनाव तथा चिन्ता से मुक्त होकर हर्षपूर्वक त्योहार मनाने की खुशी में तिरोहित से हो जाते हैं।

इस दिन बताशे तथा खील का विशेष रूप से सेवन किया जाता है। बालक इनको प्रसन्नतापूर्वक खाते हैं। चीनी के खिलौनों का भी प्रचलन है।

त्योहार की शुरुआत नवरात्रि से ही हो जाती है। त्योहार वैसे धनतेरस से प्रारम्भ होता है। इसी दिन निर्धन एवं सम्पन्न बाजार से छोटा या बड़ा बर्तन खरीदते हैं। अगले दिन नरक-चौदस मनाते हैं। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर राक्षस को मारा था। प्रतीक रूप में इस दिन यम का दीया प्रज्ज्वलित किया जाता है। कार्तिक अमावस्या को दीपावली विशेष रूप से मनाई जाती है। रात को धन की देवी लक्ष्मी की उपासना की जाती है। गणेश पूजा होती है। रात को दीपक जलाये जाते हैं। प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा होती है। इस दिन अन्नकूट तैयार किया जाता है। कार्तिक शुक्ला द्वितीया को भैयादूज के पर्व का आगमन होता है। इस अवसर पर बहिन अपने भाई के मस्तक पर रोली का टीका लगाती है। भाई उनको पुण्य के रूप में उपहार देता है।

बुराइयाँ-दीपावली के पर्व में अच्छाइयों के साथ बुराइयाँ भी प्रवेश कर गई हैं। आतिशबाजी तथा पटाखे असावधानीपूर्वक छोड़ने से आग लगने का कारण बनते हैं। इससे जान तथा माल का नुकसान होता है।

दीपावली की रात्रि में लोगों में जुआ खेलने का प्रचलन बढ़ गया है। उनकी यह गलत मान्यता है कि इस दिन जुआ में पैसा जीतने पर वह धन-सम्पन्न हो जायेंगे। उनके घरों पर लक्ष्मी का वास हो जायेगा, लेकिन जुआ की यह प्रथा निन्दनीय है।

चोर भी यह सोचते हैं कि हमें दीपावली के दिन रात को चोरी करके अपनी भाग्य की आजमाइश करनी चाहिए। यदि इस दिन वे चोरी करने में सफल हुए तो मालामाल हो जायेंगे।

अन्ध-विश्वास में जकड़े कुछ लोग रात को घर के मुख्य प्रवेश द्वार को खुला छोड़ देते हैं। इस प्रकार द्वार को खुला छोड़ना चोरों को चोरी करने का खुला निमन्त्रण है।

उपसंहार-दीपावली उल्लास तथा रोशनी का पर्व है। भारत की संस्कृति तथा सभ्यता का प्रतीक है। यह अन्धकार पर प्रकाश की विजय का परिचायक है। हमें स्वयं उल्लास में डूबकर दूसरों को भी प्रफुल्लित करना चाहिए तभी इस पर्व का मनाना सार्थक होगा-मिलकर करें हम कोशिश यहीं कि हृदय में अँधेरा कहीं रह न जाये।

13. साक्षरता के बढ़ते चरण [2009]
अथवा
साक्षरता अभियान

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • साक्षरता का अर्थ,
  • शिक्षा और साक्षरता,
  • असाक्षरता के कारण,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना शिक्षा का मानव जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। आज के समाज में अशिक्षित व्यक्ति मृतक के समान है, क्योंकि शिक्षा ही एकमात्र ऐसा साधन है जिसके द्वारा व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है। व्यक्ति अपनी जन्मजात शक्तियों को शिक्षा के द्वारा विकसित करके प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है। अशिक्षित व्यक्ति को प्रत्येक कर्म के लिए दूसरों का मुँह ताकना पड़ता है। अशिक्षित व्यक्ति एक अपाहिज की भाँति होता है, उसे प्रतिक्षण दूसरों की वैसाखी की आवश्यकता पड़ती है। अतः पराधीन रहकर व्यक्ति सफल नहीं हो सकता है। किसी कवि ने उचित ही कहा है

“पराधीन सपनेऊ सुख नाहीं।”

अतः प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित होना चाहिए तभी देश व समाज का उत्थान सम्भव है अन्यथा देश की उन्नति अवरुद्ध हो जायेगी।

साक्षरता का अर्थ-साक्षरता से तात्पर्य सा + अक्षर अर्थात् अक्षरों को पढ़ने-लिखने और शब्दों-वाक्यों आदि के अर्थ को समझने की क्षमता से है।

साक्षर व्यक्ति ही भाषा के लिखित रूप को पढ़-लिख और समझ सकता है। निरक्षर व्यक्ति को साक्षर व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती है। इस प्रकार वह व्यक्ति दूसरों पर निर्भर रहता है। निरक्षर व्यक्ति समाज के लिए अभिशाप है। निरक्षर व्यक्तियों का सरलता से शोषण कर लिया जाता है। वे अन्धविश्वासों व परम्पराओं में जकड़े रहते हैं।

शिक्षा और साक्षरता शिक्षा जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। व्यक्ति जीवन-पर्यन्त कुछ न कुछ सीखता रहता है। यह प्रक्रिया किसी न किसी रूप में चलती रहती है। शिक्षा के लिए कोई उम्र नहीं होती,प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित होने का अधिकार है। शिक्षित व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से अपने मार्ग की बाधाओं को सरलता से दूर कर लेते हैं।

भारतीय संविधान के नीति-निदेशक सिद्धान्तों में 14 वर्ष तक की आयु के बालक-बालिकाओं के लिए निःशुल्क अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को भी शामिल किया गया।

इसके लिए राष्ट्रीय चेतना उपसंहार को जाग्रत करना अत्यधिक आवश्यक है। साक्षरता के प्रसार के लिए मिशनरी भावना का होना अपेक्षित है।

सरकारी अधिकारी, कर्मचारियों एवं सम्पूर्ण समाज को निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

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अतः साक्षरता को जन आन्दोलन बनाने की महती आवश्यकता है। मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-

“सबसे प्रथम कर्त्तव्य है, शिक्षा बनाना देश में
शिक्षा बिना ही पड़ रहे हैं, आज हम सब क्लेश में।”

सन् 1986 में जब संसद ने शिक्षा की राष्ट्रीय नीति स्वीकृत की तब देश में साक्षरता का प्रतिशत 36.2 प्रतिशत था। इसके अन्तर्गत नारी साक्षरता का प्रतिशत पुरुष साक्षरता के प्रतिशत से न्यून था।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के लम्बे अन्तराल के पश्चात् भी अनेक कानून बने। इसके लिए भरसक प्रयास हुआ परन्तु फिर भी अधिक सुधार दृष्टिगोचर नहीं हुआ। जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप मूल स्थिति में सुधार नहीं हुआ है।

असाक्षरता के कारण

  1. आर्थिक तथा कुछ सामाजिक कारण थे। 6 से 14 वर्ष की उम्र के बालक आज भी पाठशाला नहीं जा रहे हैं। ऐसे अशिक्षितों की संख्या करोड़ों से भी ऊपर है।
  2. प्रौढ़ शिक्षा मात्र कागजी है। इसके अन्तर्गत मिले हुए अनुदान का दुरुपयोग हो रहा है।
  3. प्रौढ़ शिक्षा एवं साक्षरता के अनेक आन्दोलन भी हुए। फलस्वरूप पर्याप्त भाग में साक्षर बनाये गये। अनेक जनपद साक्षर घोषित भी कर दिये गये लेकिन सत्य इसके विपरीत है।

नव साक्षरों के पठन-पाठन की भी सुव्यवस्था नहीं है। प्रौढ़ शिक्षा के लिए मिशनरी भावना का समावेश अपेक्षित है।

उपसंहार–प्रत्येक साक्षर कम-से-कम एक निरक्षर को साक्षर बनाने का प्रयास करे। – साक्षरता के अभाव में सुराज की कल्पना दुराशा मात्र है। साक्षरता को आन्दोलन बनाने की आवश्यकता है।

14. आतंकवाद [2017]

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • आतंकवाद का समाज पर प्रभाव,
  • आतंकवाद राजनीति के क्षेत्र में,
  • आतंकवाद का मूल कारण आर्थिक समस्या,
  • पंजाब विभाजन की माँग,
  • उत्तर भारत आतंकवाद का प्रमुख केन्द्र,
  • उपसंहार।।

प्रस्तावना हमारे देश में अनेक समस्यायें हैं, उनमें से आतंकवाद एक प्रमुख समस्या है। आज यह समस्या भारत के समक्ष एक विकट चुनौती के रूप में उपस्थित है, विशेषकर इस कारण क्योंकि उसका पड़ोसी देश पाकिस्तान आतंकवाद को सामरिक एवं राजनीतिक रूप प्रदान कर चुका है, वह आतंकवाद द्वारा सम्प्रति कश्मीर की ओर अन्ततः भारत को अपने अधीन करने का दुःस्वप्न देखता है। विश्व मंच पर यह प्रश्न उपस्थित है, क्या पाकिस्तान को एक आतंकवादी राष्ट्र घोषित कर दिया जाए?

आतंकवाद का समाज पर प्रभाव-आतंकवाद विश्व के क्षितिज पर बादलों की भाँति छाया हुआ है। आतंकवाद परमाणु बम से भी अधिक भयावह बन गया है,क्योंकि इसने विश्व मानव को संत्रास्त बना रखा है और मानव समाज को विनाश के घेरे में स्थित कर दिया है। आज आतंकवाद अपनी बात को मनवाने का एक सामान्य नियम बन गया है, तोड़-फोड़, लूट-खसोट, अपहरण, हत्या, आत्महत्या आदि इसके रूप हैं।

आतंकवाद राजनीति के क्षेत्र में आज आतंकवाद साधारण व्यक्ति से लेकर राजनीति तक अपने पाँव पसारे हुए है। इसकी जड़ें दिनों-दिन गहरी होती जा रही हैं। भारत में राजनीतिक क्षेत्र में क्षेत्रवाद एक बहुत ही महत्वपूर्ण विभाजक तत्व बन गया है, सांस्कृतिक टकराव, आर्थिक विषमता,मतभेद,न्यायपालिका की दुर्बलता सर्वव्यापी भ्रष्टाचार आदि अनेक तत्व आतंकवाद का पोषण करते हैं। भारत में आतंकवाद का बीजारोपण भाषायी राज्यों के गठन ने किया। भाषायी प्रदेशों के नाम पर खून-खराबा हुआ, राजभाषा का हिन्दी के नाम पर दक्षिण भारत में कितने

आतंकवादियों को जन्म दिया है, इन सब बातों का हिसाब किसके पास है ? खालिस्तान की माँग, मिजोरम समस्या, गोरखालैण्ड आन्दोलन, पृथक् उत्तराखण्ड की माँग आदि क्षेत्रवाद की उपज हैं, श्रीलंका में तमिल समस्या, इसी कोटि के क्षेत्रवादी आतंकवाद का ज्वलंत उदाहरण है। बंगाल में इस प्रकार की विचारधारा बंगाल में बाहर से जाकर बसने वालों के लिए सिरदर्द रही है।।

आतंकवाद का मूल कारण आर्थिक समस्या-आज आतंकवाद का मूल कारण लोगों की आर्थिक समस्या है। इस समस्या ने सामान्य जन को विशेष कर युवावर्ग को विद्रोही एवं असंतोषी बना दिया है। इनमें साहसी व्यक्ति दुस्साहसपूर्ण आतंकवाद का रास्ता अपनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

पंजाब विभाजन की माँग-आतंकवाद का जन्म स्व. श्रीमती इन्दिरा गाँधी के कार्यकाल में हो गया था। राजनीति की रोटियाँ सेकने की दृष्टि से स्व.श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने भिंडरवाला की पीठ थपथपा दी,फलतःस्थिति बेकाबू हो गयी,इसके बाद अमृतसर का स्वर्ण मन्दिर आतंकवादियों का गढ़ बन गया। इस पर विजय प्राप्त करने के लिए सैनिक कार्यवाही की गयी, अंगरक्षक सिक्ख सैनिकों द्वारा इन्दिरा गाँधी की हत्या की गयी। इसके अतिरिक्त अनेक निर्दोष सिक्खों की हत्याएँ की गयीं। इसके बाद आतंकवादी गतिविधियाँ दिन पर दिन शक्तिशाली होती गयीं।

उत्तर भारत आतंकवाद का प्रमुख केन्द्र-इन्दिरा गाँधी की हत्या के पश्चात् उत्तर भारत आतंकवाद का प्रमुख केन्द्र बन गया। रेलों में लूटपाट,बलात्कार,रेलमार्ग की तोड़-फोड़,रेलों की टक्करें, बसों में लूटपाट आदि आतंकवाद के परिवार में जन्मे हैं। संक्षेप में उत्तर भारत में जन-जीवन सर्वथा अनिश्चित बन गया है। कश्मीर में आतंकवाद की समस्या का जन्म हुआ फलतः कारगिल की समस्या उसकी परिणति के रूप में सामने आयी।

उपसंहार-अब स्थिति यह बन गयी है कि प्रायःप्रत्येक राष्ट्र में आतंकवाद संत्रास का हेतु बन गया है। कुछ ऐसी हवा चलने लगी है कि भारत को समर्थन देने के नाम पर विश्व के अनेक देश आतंकवाद के विरुद्ध लामबन्द होने की बातें करने लगे हैं। पाकिस्तान का प्रबल समर्थक अमरीका भी अब पाकिस्तानी आतंकवाद से परेशान है और वह भी उसे आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने का मन बनाने लगा है। आतंकवाद पर विजय प्राप्त करने के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक सभी स्तरों पर निष्ठा के साथ प्रयत्न उपेक्षित हैं।

15.विद्यालय का वार्षिकोत्सव [2009]

“गा उठी हैं कन्दराएँ,
बह उठे हैं स्रोत रस के।
हर्ष और उल्लास का,
नव पर्व सा छाया हुआ है।”

रूपरेखा [2016]-

  • प्रस्तावना,
  • समय,
  • उत्सव का शुभारम्भ,
  • अनेक आयोजन,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना प्रत्येक विद्यालय में वार्षिकोत्सव सम्पन्न किया जाता है। वार्षिकोत्सव विद्यालय की प्रगति तथा उल्लास का प्रतीक है। छात्रों, अध्यापकों तथा अभिभावकों के मिलने का एक शुभ अवसर है। इस अवसर पर विद्यालय खूब सजाया जाता है। विद्यालय के भवन पर रोशनी की जाती है। रोशनी के प्रकाश से विद्यालय की शोभा में चार चाँद लग जाते हैं। वार्षिकोत्सव का नाम कर्ण कुहरों में पड़ते ही छात्रों के मन प्रसन्नता से हिलोरें लेने लगते हैं।

समय-हमारे विद्यालय में वार्षिकोत्सव प्रतिवर्ष शिवरात्रि के पर्व पर सम्पन्न किया जाता है। इसी दिन महर्षि दयानन्द सरस्वती को बोध प्राप्त हुआ था। हर साल की तरह हमारे विद्यालय का वार्षिक उत्सव महान् समाज सेविका डॉ. आर. के. वर्मा की अध्यक्षता में सम्पन्न किया गया। वार्षिकोत्सव मनाने का समय सायंकाल चार बजे का निर्धारित किया गया। नगर के प्रतिष्ठित महानुभाव, शिक्षा शास्त्री, प्रधानाचार्य तथा विद्यालय के छात्र तथा अध्यापक निश्चित समय से पूर्व ही आकर नियत स्थानों पर आसीन हुए। सबके चेहरों में हर्ष तथा उमंग के भाव नजर आ रहे थे।

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उत्सव का शुभारम्भ-विद्यालय के प्रवेश द्वार पर प्रधानाचार्य तथा कतिपय अध्यापक गण उस उत्सव के लिए मनोनीत अध्यक्ष का स्वागत करने के लिए पलक पाँवड़े बिछाए हुए थे। ठीक 3.50 बजे अध्यक्ष का वाहन प्रवेश द्वार पर आकर रुका। प्रधानाचार्य तथा अध्यापकों ने उनका भव्य तथा सोत्साह स्वागत किया। जैसे ही अध्यक्ष ने पंडाल में कदम बढ़ाये,छात्रों तथा अध्यापकों ने खड़े होकर तथा ताली बजाकर उनके प्रति आदर भाव व्यक्त किया। विद्यालय के प्रधानाचार्य ने अध्यक्ष से आसन ग्रहण करने की प्रार्थना की। अध्यक्ष के आसन पर आसीन होने पर पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो गया। विद्यालय के एक छात्र ने अध्यक्ष को माला पहनाकर स्वागत गान गाया। जिसके बोल निम्नवत् हैं-

“स्वागत समादर आपका,
आये कृपा कर आप हैं।
दर्शन सुमग देने हमें,
हरने हमारे ताप हैं ॥”

ईश वन्दना से इस उत्सव का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। कार्यक्रम की एक प्रति संयोजक के पास थी तथा दूसरी अध्यक्ष की मेज पर रख दी गई। विद्यालय के प्रधानाचार्य ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया। उसके बाद आये हुए गणमान्य लोगों के प्रति भी आभार प्रदर्शित किया। विद्यालय के छात्रों ने महान् कहानीकार प्रेमचन्द द्वारा लिखित पंच परमेश्वर कहानी का नाट्य रूपान्तर बड़े ही सफल ढंग से अभिनीत किया था। पात्र अलगू तथा जुम्मन चौधरी के यह कथन सुनकर-“पंच न किसी का दोस्त होता है तथा न दुश्मन,पंच खुदा का स्थान होता है।”

इन शब्दों को सुनकर दर्शक भाव-विभोर हो गए। एक छात्र ने डॉ.श्याम नारायण पांडेय की वीर रस की कविता सुनाकर सबको वीर रस का ही कर दिया। देश-प्रेम तथा कारगिल युद्ध से सम्बन्धित भारतीय सैनिकों के शौर्य तथा बलिदान की कविता दर्शकों के मन-मानव को झकझोरने वाली थी। एक छात्र का मूक अभिनय भी प्रशंसनीय था।

अनेक आयोजन-इस भाँति छात्रों ने अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रस्तुत किये। इन कार्यक्रमों की दर्शकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रधानाचार्य ने विद्यालय की वार्षिक प्रगति का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। विद्यालय में जो छात्र हाईस्कूल तथा इण्टर की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे, उनके नाम पढ़कर सुनाये। नामों को सुनकर सम्बन्धित छात्र मित्र तथा अभिभावक प्रसन्नता का अनुभव करने लगे। प्रधानाचार्य ने इस अवधि में विद्यालय में आये उतार-चढ़ावों का भी उल्लेख किया तथा सबके सहयोग की आकांक्षा भी की क्योंकि बिना सहयोग के अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।

इसके पश्चात् डॉ. आर. के. वर्मा ने छात्रों को चरित्र निर्माण विषयक बहुत ही शिक्षाप्रद भाषण दिया। उन्होंने छात्रों से कहा

“उद्यम ही बस सुख की निधि है।
बनता जो मानव का विधि है ॥”

इसके पश्चात् अध्यक्ष महोदय ने विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजयी हुए छात्रों को पुरस्कार प्रदान किये।

प्रधानाचार्य ने आगन्तुकों, अभिभावकों, अध्यापकों तथा छात्रों के प्रति आभार व्यक्त किया क्योंकि सबके सहयोग के फलस्वरूप ही उत्सव की शोभा में चार चाँद लग सके। मिष्ठान्न वितरण के साथ ही प्रधानाचार्य ने एक दिन के अवकाश की घोषणा की। इसे सुनकर छात्र प्रसन्नता से फूले नहीं समा रहे थे।

उपसंहार-वार्षिकोत्सव विद्यालय का एक आवश्यक पहलू है। छात्र, अभिभावकों तथा अध्यापकों के मिलने का एक पावन अवसर है। विद्यालय की उन्नति तथा उतार-चढ़ावों का परिचायक है। छात्रों के मन-मानस में एक नवीन उत्साह तथा उल्लास को भरने वाला है। मन तथा मस्तिष्क को तरोताजा बनाने का सर्वोत्तम साधन है।

16. समाज में नारी का स्थान
अथवा
स्वतन्त्र भारत में नारी का स्थान [2009]
अथवा
आधुनिक भारत में नारी [2010, 15]
अथवा
भारतीय समाज में नारी का स्थान [2012]

रूपरेखा [2018]-

  • प्रस्तावना,
  • प्राचीन काल में नारी,
  • मध्य युग में नारी,
  • वर्तमान युग में नारी,
  • पाश्चात्य प्रभाव,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-आधुनिक नारी जीर्ण-शीर्ण मान्यताओं एवं गुलामी की जंजीर को छिन्न-भिन्न करके उन्नति की दौड़ में पुरुष के साथ कदम मिलाकर प्रतिपल आगे बढ़ रही है। उच्च शिक्षा प्राप्त करके कार्यालयों, विश्वविद्यालयों, रक्षा एवं वैज्ञानिक क्षेत्रों में सक्रिय सहयोग देकर महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही है। अनेक साहित्यिक एवं वैज्ञानिक विषयक पुस्तकों की भी रचना कर रही है। उनके दिशा निर्देशन के फलस्वरूप शिक्षा जगत् में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है

“पहले भारत में नारी को, देवी सा पूजा जाता था।
फिर उसको पददलित मानकर, घर में ही रौंदा जाता था।
पुनः जागरण का युग आया, नारी का सम्मान बढ़ा।
अपने श्रम पौरुष से उसको, फिर ऊँचा स्थान मिला।”

नारी के अभाव में मानवता की कल्पना करना आकाश कुसुम के समान है। वह जननी, बेटी,पत्नी, देवी एवं प्रेयसी आदि रूपों से विभूषित है। नारी के बिना मानव अपूर्ण है। मानव पर उसका अमूल्य उपकार है। वह पुरुष की सहभागिनी है, जीवन संगिनी है।

प्राचीन काल में नारी-वैदिक काल में नारी का महत्त्वपूर्ण स्थान था। आध्यात्मिक एवं धार्मिक क्षेत्र में भी नारी की भूमिका अग्रणी थी। सीता, अनसूया,गार्गी,सावित्री एवं सुलभा इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इनके नाम इतिहास में स्वर्णांकित हैं।

मध्य युग में नारी-मध्य युग में नारी के गौरव का ह्रास हुआ। कबीर,तुलसी आदि सन्तों ने भी नारी को विकार एवं ताड़ना का पात्र ठहराया। मुसलमानों के अत्याचारों के फलस्वरूप उसे मकान की चहारदीवारी में कैद कर दिया गया।

वर्तमान युग में नारी-राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना जाग्रत होने के कारण वर्तमान में नारी की दशा में आशातीत सुधार हुआ है। राजा राममोहन राय एवं दयानन्द ने नारी को पुरुष के समकक्ष होने के अधिकार से सम्पन्न कराया। शिक्षा के द्वार खोले।।

आज नारी उन्मुक्त होकर पुरुष के साथ कदम मिलाकर प्रतिपल उन्नति की मंजिल की ओर अग्रसर है। इन्दिरा गाँधी, कमला नेहरू, सरोजनी नायडू, महादेवी वर्मा एवं विजय लक्ष्मी पंडित इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं।

पाश्चात्य प्रभाव-पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के फलस्वरूप आज भारतीय नारी अपने प्राचीन आदर्शों और मान्यताओं को तिलांजलि दे रही है। भोग-विलास, मौज-मस्ती एवं ‘खाओ पीओ मौज उड़ाओ’ के कुपथ का अनुगमन कर रही है। करुणा, ममता, कोमलता एवं स्नेह को त्याग कर अपनी छवि को धूमिल कर रही है। आर्थिक दृष्टि से स्वतन्त्र होने की वजह से नारी आज विलासिता की ओर उन्मुख है।

उपसंहार-अतः आज इस बात की परम आवश्यकता है कि भारतीय नारी को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण न करके प्राचीन उत्तम आदर्शों एवं मान्यताओं को स्वीकार करना चाहिए। ऐसा होने पर वह ऐसा स्थान प्राप्त कर सकेगी, जो देवों के लिए भी दुर्लभ है।

17. दहेज प्रथा
अथवा
दहेज एक सामाजिक अभिशाप है [2009, 16]
अथवा
दहेज एक सामाजिक समस्या [2010]

“पढ़-लिख स्वावलम्बिनी बनकर, जग को आज दिखा दो।
जिसने तुम्हें जलाया उसको, जड़ से आज मिटा दो।”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • प्राचीन काल में दहेज का स्वरूप,
  • मध्यकाल में नारी की दयनीय स्थिति,
  • आधुनिक काल में दहेज का स्वरूप,
  • निराकरण के उपाय,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-आज भारतीय समाज में दहेज एक अभिशाप के रूप में व्याप्त है। दहेज के अभाव में निर्धन अभिभावक अपनी बेटी के हाथ पीले करने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। दहेज उन्मूलन के जितने प्रयास किये जाते हैं, उतना ही वह सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता जा रहा है। किसी शायर के शब्दों में-

“मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।”

प्राचीन काल में दहेज का स्वरूप-प्राचीन काल में कन्या को ही सबसे बड़ा धन समझा जाता था। माता-पिता वर-पक्ष को अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ देते थे, उन्हें वे सहर्ष स्वीकार कर लेते थे और जो धन कन्या को दिया जाता था, वह स्त्री धन समझा जाता था।

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मध्यकाल में नारी की दयनीय स्थिति-मध्यकाल में नारी के प्राचीन आदर्श ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ को झुठलाकर भोग एवं विलासिता का साधन बना दी गई। उसका स्वयं का अस्तित्व घर की चारदीवारी में सन्तानोत्पत्ति करने में ही सिमट कर रह गया। इस समय पर पुरुष समाज द्वारा उसे धन के समान भोग्य वस्तु समझा जाता था। उसके धन को और माता-पिता द्वारा दिये गये धन को वह अपनी वस्तु समझने लगा।

आधुनिक काल में दहेज का स्वरूप-आधुनिक काल में दहेज का लेना वर पक्ष का जन्म सिद्ध अधिकार-सा बन गया है। दहेज के बिना सद्गुणी कन्या का विवाह होना भी एक जटिल समस्या बन गया है। इस दहेज की बलिवेदी पर न जाने कितनी कन्याएँ आत्महत्या करने के लिए विवश हो रही हैं। इतने पर भी दहेज लोभियों का हृदय तनिक भी द्रवीभूत नहीं होता। .

निराकरण के उपाय

  • युवक और युवतियाँ दहेज रहित विवाह के लिए कृतसंकल्प हों।
  • अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया जाये।
  • दहेज लोलुपों का सामाजिक बहिष्कार हो।
  • सरकार को इस विषय में सक्रिय एवं कठोर कदम उठाने चाहिए।
  • सामूहिक विवाहों का प्रचलन हो।
  • दहेज रहित विवाह करने वालों को सामाजिक संगठनों द्वारा पुरस्कृत किया जाय।

उपसंहार-दहेज का उन्मूलन अकेले सरकार के द्वारा नहीं किया जा सकता। इसके लिए देश के कर्णधारों, मनीषियों एवं समाज सुधारकों को भगीरथ प्रयास करना होगा। प्राचीन भारतीय आदर्शों की पुनः प्रतिष्ठा करनी होगी जिसमें नारी को गृहस्थी रूपी रथ का एक पहिया समझा जाता था। वह गृहलक्ष्मी की गरिमा से मंडित थी। उसकी छाया में घर-घर स्वर्ग बना हुआ था तथा घर आँगन फुलवारी के रूप में सुवासित था।

18. मेरा देश महान्
अथवा
मेरा भारत महान्

“सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।
हम बुलबुले हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा॥”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • भौगोलिक स्थिति,
  • गौरवपूर्ण संस्कृति,
  • विशेषताएँ,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना हमारे देश की गिनती दुनिया के प्राचीनतम देशों में होती है। सभ्यता एवं ज्ञान का आलोक भारत की धरती से ही समस्त संसार में प्रसारित हुआ था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, गौतम बुद्ध एवं महावीर स्वामी ने यहाँ की भूमि पर ही अपने शैशव की आँखें खोली थीं। सज्जनों की रक्षा तथा दुष्टों का दमन करने के लिए भगवान भारत की धरती पर ही अवतार लेते हैं तथा मानव मात्र को एक दिव्य संदेश देते हैं। यह कितने गौरव की बात है।

भौगोलिक स्थिति-भारत की उत्तर दिशा में पर्वत राज हिमालय इसके मुकुट के समान सुशोभित है। दक्षिण में विशाल सागर इसके चरणों को निरन्तर धो रहा है। पूर्व में बांग्लादेश एवं पश्चिम में पाकिस्तान देश स्थित हैं। हम अपने पड़ोसी देशों से बन्धुत्व एवं मानवीय व्यवहार के पक्षधर हैं; जिओ और जीने दो’ के सिद्धान्त के अनुयायी हैं।

गौरवपूर्ण संस्कृति-विभिन्न प्रान्तों,समुदायों एवं भाषाओं के मेल से हमारी संस्कृति का निर्माण हुआ है। हमारी संस्कृति समन्वय की भावना से आपूरित है। हम सम्मान देकर सम्मान पाने की कामना करते हैं। हमारे हृदय के द्वार सभी के लिए खुले हुए हैं। मेरे देश का हृदय उदार तथा मानवीय गुणों से भरा है।

विशेषताएँ–

  • अनेकता में एकता,
  • धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र,
  • आपसी भाईचारे की भावना सुदृढ़ है,
  • विशाल एवं उदार दृष्टिकोण है,
  • महान् विभूतियों की जन्मस्थली है।

उपसंहार-यह बड़े गर्व एवं सौभाग्य का विषय है कि हमने इस देश की धरती में जन्म लिया है। प्रकृति ने इस देश की सुषमा को स्वयं सजाया है। लहराती एवं इठलाती हुई नदियाँ एवं सरोवर इसकी शोभा को बढ़ा रहे हैं। वास्तव में इस देश का वैभव अवर्णनीय है। हम भाग्यशाली हैं क्योंकि हमने ऐसे देश में जन्म लिया है, जहाँ देवता भी जन्म लेने के लिए लालायित रहते हैं।

“सम्पूर्ण देशों से अधिक जिस देश का उत्कर्ष है
वह देश मेरा देश है, वह देश भारतवर्ष है।”

19. देश में कम्प्यूटर की प्रगति
अथवा
भारत में कम्प्यूटर के बढ़ते चरण
अथवा
कम्प्यूटर और उसका महत्त्व [2009, 10, 11, 13]
अथवा
कम्प्यूटर आज की आवश्यकता [2009]

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • भारत में कम्प्यूटर का विकास,
  • शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर,
  • चिकित्सा के क्षेत्र में कम्प्यूटर,
  • विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटर,
  • रोजगार के क्षेत्र में कम्प्यूटर,
  • समाज के अन्य क्षेत्रों में कम्प्यूटर,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-आधुनिक युग में विज्ञान ने चमत्कारिक उन्नति की है। विज्ञान ने मानव को वे चमत्कार दिये हैं कि आज पूरी दुनिया उसकी मुट्ठी में कैद हो गई है। विश्व-पटल की कोई भी घटना से अब वह अनभिज्ञ नहीं रह गया है। विज्ञान के द्वारा उसने प्रकृति को भी अपने नियन्त्रण में कर लिया। बाहर चाहे भीषण गर्मी का प्रकोप बरस रहा हो, अन्दर एयर कंडीशनर (वातानुकूलन-यन्त्र) शीत का आनन्द प्रदान कर रहा है। रेफ्रीजरेटर शीतल पेय और भोज्य पदार्थों का आस्वादन करा रहा है। एयर कंडीशन्ड गाड़ियाँ पलक झपकते इधर से उधर पहँचा रही हैं। टेलीविजन सारी दुनिया की आँखों देखी घटना आँखों को दिखा रहा है। अब इस क्षेत्र में यदि कोई कमी रह गई, तो वह है संगणक अथवा कम्प्यूटर की। इतने सारे आविष्कारों में वैज्ञानिक इसे कैसे भूल सकते हैं। पलक झपकते सारी समस्याओं के हल चाहिए, पृथ्वी और अन्तरिक्ष का ज्ञान चाहिए,गणित के बड़े-बड़े सवालों के हल चाहिए,तो उपस्थित है कम्प्यूटर-ज्ञान का बक्सा। खोलो और अपनी-अपनी मन-वांछित जानकारियाँ लो।

भारत में कम्प्यूटर का विकास-भारत में कम्प्यूटर का विकास, सन् 1984 ई. से सरकार द्वारा कम्प्यूटर नीति की घोषणा के उपरान्त प्रारम्भ हुआ। भारत का सर्वश्रेष्ठ कम्प्यूटर है-सुपर कम्प्यूटर। कम्प्यूटर के क्षेत्र में विश्व में हमारे देश का पाँचवाँ स्थान है। इस समय कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में हम निर्यातक भी हो चुके हैं।

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शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर का अत्यन्त महत्त्व है। इस समय यह एक अपरिहार्य आवश्यकता बन चुका है। कम्प्यूटर के विद्यावाहिनी एवं ज्ञानवाहिनी कार्यक्रमों द्वारा शिक्षण कार्य सरल और रोचक बनाया जा रहा है। भारत ने शिक्षा में कम्प्यूटर को सर्वसुलभ बनाने हेतु एजुसैट नामक उपग्रह भी स्थापित किया है। इस कारण आज छात्र तकनीकी ज्ञान,गणितीय ज्ञान, वैज्ञानिक ज्ञान आदि सभी का भरपूर लाभ ले सकते हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में कम्प्यूटर-कम्प्यूटर से दूरस्थ चिकित्सा प्रणाली विकसित की गई है। साथ ही शरीर के अन्दर की गतिविधियाँ, बीमारियाँ आदि कम्प्यूटर के जरिए बड़ी आसानी से जानी जा रही हैं। इससे मरीज का इलाज करने में बहुत सुविधा रहती है।

विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटर-कम्प्यूटर का वैज्ञानिक जगत में अत्यन्त महत्त्व है। सुदूर, अन्तरिक्ष में होने वाली गतिविधियाँ अथवा अतल सागर की गहराई में होने वाली हलचल, मौसम, ग्रहों, उपग्रहों,उल्कापिंडों आदि की जानकारी कम्प्यूटर द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

रोजगार के क्षेत्र में कम्प्यूटर-रोजगार के क्षेत्र में कम्प्यूटर की बहुत अहमियत है। कम्प्यूटर पर ई-मेल, ई-रेल, ई-कॉमर्स, इलैक्ट्रॉनिक गवर्नेन्स, इण्टरनेट आदि के द्वारा रोजगारों के नये अवसर उपलब्ध रहते हैं। समाज के अन्य क्षेत्रों में कम्प्यूटर-आधुनिक युग में कम्प्यूटर एक अनिवार्य आवश्यकता है। सिनेमा,मनोरंजन,संगीत,खेल आदि के क्षेत्र में कम्प्यूटर ने क्रान्ति उत्पन्न कर दी है।

उपसंहार-इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वर्तमान समय में भारत के शहरी और ग्रामीण, सभी क्षेत्रों में कम्प्यूटर का बोलबाला है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कम्प्यूटर ने अत्यन्त उन्नति की है।

20. देश में भ्रष्टाचार की समस्या

“भ्रष्टाचार नहीं मिटता है
फैली जड़ किस वन में ?
कहीं न ढूँढ़ो यारो, यह तो
रहती अपने मन में॥”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • भ्रष्टाचार के विविध रूप,
  • राजनीति के क्षेत्र में भ्रष्टाचार,
  • शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार,
  • चिकित्सा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार,
  • धर्म के क्षेत्र में भ्रष्टाचार,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-आज देश में भ्रष्टाचार की विकराल समस्या व्याप्त है। संसार को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले जगद्गुरु भारत की यह दुर्दशा। आखिर कौन है जिम्मेदार इस मर्ज का ? भ्रष्टाचार रूपी मर्ज का आज तो यह हाल है कि ‘मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की’ अर्थात इस रोग का कोई उपचार क्यों नहीं है ? इसका कारण है कि यह रोग दूसरों से नहीं फैलता,बल्कि स्वयं अपने से फैलता है। हम सभी स्वयं में झाँककर देखें,क्या इसे पल्लवित और पुष्पित करने में हमारा योगदान नहीं है ? समाज में हम रहते हैं और समाज में ही भ्रष्टाचार व्याप्त है।

भ्रष्टाचार के विविध रूप-आज हमारे समाज का कोई भी क्षेत्र भ्रष्टाचार से अछूता नहीं है। राजनीति का क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, चिकित्सा का क्षेत्र हो, धर्म का क्षेत्र हो, सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का बोलबाला है।

राजनीति के क्षेत्र में भ्रष्टाचार-आज शुद्ध और सात्विक राजनीति की तो कल्पना करना भी दुष्कर है। राजनीति में आते ही नेता अपनी-अपनी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था करने लगते हैं। जनता की परिश्रम की कमाई उनके बैंक-बैलेंस का वजन बढ़ाती है। राजनेता देश के दलाल हो गये हैं। उनका वश चले तो वे अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए देश को ही. बेच डालें। बोफोर्स काण्ड, किट्स काण्ड, चारा घोटाला, यूरिया घोटाला, हवाला काण्ड आदि तो अत्यन्त छोटे उदाहरण हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार-शिक्षार्थी हो या शिक्षक; आज सभी शिक्षा माफियाओं के शिकार हो रहे हैं। शिक्षा माफिया ‘पैसे दो और डिग्री लो’, पैसे दो और एडमिशन लो’, ‘पैसे दो और नौकरी लो’ आदि के व्यवसाय में लगा हुआ है। उसे न देश के भविष्य की चिन्ता है,न छात्र के जीवन की। नकल की व्यवस्था कराकर अनपढ़ पीढ़ी की उपज बढ़ाने वाले ये लोग देश के सबसे खतरनाक दुश्मन हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार-आज का डॉक्टर या चिकित्सक जिसे लोग भगवान कहकर पूजते हैं, अपना ईमान-धर्म खोकर येन-केन प्रकारेण मोटी कमाई के चक्कर में फंस गया है। दवा बनाने वाली कम्पनियाँ नकली दवा बनाकर मरीजों के प्राणों से खेल रही हैं, तो कहीं नर्सिंग होम से नवजात शिशुओं का व्यापार हो रहा है। आये दिन नवजात शिशुओं को अपहरण कर दूसरों को बेच देने का धंधा जोरों पर है। इतना ही नहीं मानव अंगों की तस्करी भी आज एक बड़े व्यापार के रूप में फल-फूल रही है।

धर्म के क्षेत्र में भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार के दल-दल में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा है,जो डूबा न हो। कथित धर्म-गुरुओं ने तो दूसरों के कष्ट, क्लेशों को दूर करने का लाइसेंस ले लिया है। धर्मभीरू जनता इनकी सेवा में लाखों रुपये लुटाती है। ये धर्म की आड़ में लूटते हैं और जनता पुण्य कमाने के लिए लुटती है। आज कथित गुरुओं के आश्रम कई-कई एकड़ जमीन में फैले हुए हैं। जैसे राजसिक वैभव इनके यहाँ उपलब्ध हैं,वह सामान्य जनता के नसीब में कहाँ ?

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उपसंहार-विहंगम दृष्टि डालकर हम यही पाते हैं कि समाज का कोई कोना भी तो ऐसा नहीं दिखाई देता जहाँ भ्रष्टाचार रूपी राक्षस ने अपना पंजा न फैला रखा हो। इतना होने पर भी इसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। यदि हम अपने विवेक चक्षुओं को खोलकर, कानून का सहारा लेकर इसका मुकाबला करें तो ऐसी बात नहीं है कि यह राक्षस समाप्त नहीं किया जा सके। इसके लिए आवश्यक है कि हम इसके विरुद्ध आवाज उठाएँ,संगठित हों और किसी कार्य को अनैतिक रूप से न करें। यदि हम किसी को रिश्वत देना न चाहें, तो कोई हमसे ले नहीं सकता, यदि हम बिना परिश्रम अपने बच्चे को डिग्री न खरीदवाएँ तो भी हमें कोई रोक नहीं सकता। सच तो यह है कि बेचने वाले वे हैं और खरीदने वाले हम, तो इस प्रकार भ्रष्टाचार में हम सभी तो सम्मिलित हो गये। यदि हम खरीदें ही नहीं, तो वे बेचेंगे किसे ? इसलिए भ्रष्टाचार की जड़ को समाप्त करने के लिए पहले हमें स्वयं संयम रखना होगा, तभी इसे दूर किया जा सकता है। कहा भी गया है कि

“अपना-अपना करो सुधार।
तभी मिटेगा भ्रष्टाचार॥”

21.साहित्य और समाज [2014]
अथवा
साहित्य समाज का दर्पण है

“अन्धकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है,
मुर्दा है वह देश, जहाँ साहित्य नहीं है।”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • साहित्य तथा समाज का सम्बन्ध,
  • साहित्य का समाज पर प्रभाव,
  • समाज का साहित्य पर प्रभाव,
  • हिन्दी साहित्य और समाज,
  • समाज के उत्थान में साहित्य का योगदान,
  • उपसंहार।।

प्रस्तावना-मानव अपनी जीवन-यात्रा को सुखद तथा आनन्दमय बनाने का प्रारम्भ से ही आकांक्षी रहा है। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु उसने वीणा के तारों को झंकृत किया है। कोर पाषाण को तराश कर आकर्षक तथा भव्य मूर्तियों का निर्माण किया है। शब्दों को साकार रूप प्रदान करके भाषा का सृजन किया है। कलाएँ मानव की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं। साहित्य भी कला की श्रेणी में आता है।

जिस प्रकार सूर्य की किरणों से जगत में प्रकाश फैलता है उसी प्रकार साहित्य के आलोक से समाज में चेतना का संचार होता है। साहित्य ही अज्ञान के अन्धकार को मिटाकर समाज का मार्गदर्शन करता है। डॉ. श्यामसुन्दर दास का कथन सत्य है कि, “सामाजिक मस्तिष्क अपने पोषण के लिए जो भाव-सामग्री निकालकर समाज को सौंपता है, उसी के संचित भण्डार का नाम
साहित्य है।”

साहित्य तथा समाज का सम्बन्ध–साहित्य और समाज एक-दूसरे के अत्यन्त निकट हैं। साहित्य में मानव समाज के भाव निहित होते हैं। इसी आधार पर कुछ विद्वानों ने साहित्य को ‘समाज का दीपक’, कुछ ने साहित्य को ‘समाज का मस्तिष्क’ और कुछ ने साहित्य को ‘समाज का दर्पण’ माना है। वास्तव में, समाज की प्रबल एवं वेगवती मनोवृत्तियों की झलक साहित्य में दिखायी पड़ती है। विश्व के महान् साहित्यकारों ने अपने-अपने समाज का सच्चा स्वरूप अंकित किया है। यूरोप के गोर्की और भारत के प्रेमचन्द का साहित्य इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इन साहित्यकारों की रचनाएँ अपने समय के समाज का सच्चा प्रतिनिधित्व करती हैं।

साहित्य का समाज पर प्रभाव-किसी भी काल का समाज साहित्य के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। समाज को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साहित्य पर आश्रित रहना पड़ता है। श्रेष्ठ साहित्य समाज के स्वरूप में परिवर्तन कर देता है। मुगल शासकों के अत्याचारों से पीड़ित हिन्दू जनता को भक्त कवियों के साहित्य ने ही सद्मार्ग का अवलोकन कराया। शिवाजी की तलवार भूषण के छन्दों को सुनकर झनझना उठती थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही लिखा है कि “साहित्य में जो शक्ति छिपी है वह तोप, तलवार और बम के गोले में नहीं पायी जाती।”

समाज का साहित्य पर प्रभाव-समाज का प्रभाव ग्रहण किये बिना सच्चे साहित्य की रचना असम्भव है। साहित्यकार त्रिकालदर्शी होता है इसीलिए वह अतीत के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान का अंकन भविष्य के दिशा-निर्देश के लिए करता है। साहित्य मे समाज की समस्याएँ और उनके समाधान निहित रहते हैं। अतः साहित्य और समाज दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। सामाजिक परम्पराएँ, घटनाएँ, परिस्थितियाँ आदि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती हैं। साहित्यकार भी समाज का प्राणी है, अतः वह इस प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता है ! वह अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील होने के कारण समाज की परिस्थितियों से अधिक प्रभावित होता है। वह जो कुछ समाज में देखता है, उसी को अपने साहित्य में अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार साहित्य समाज से प्रभावित होता ही है।

हिन्दी साहित्य और समाज-हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर दृष्टिपात करने से यह बात स्वयं पुष्ट हो जाती है। वीरगाथा काल का वातावरण युद्ध एवं अशान्ति का था। वीरता प्रदर्शन में ही जीवन का महत्व था। उक्ति प्रसिद्ध है ‘जा घर देखी सुघढ़ महरिया ता घर धरयो बरौगा जाइ’ उस युग के वातावरण के अनुकूल ही उस समय के चारण कवियों ने काव्य रचना की है। भक्तिकाल में विदेशी शासन में दबे भारतीय समाज को शान्ति तथा प्रगति का रास्ता दिखाने का प्रयास सन्त तथा भक्त कवियों ने किया। उन्होंने समाज में चेतना का संचार किया। रीतिकाल में दरबारों की विलासिता का प्रभाव साहित्य पर पड़ा। कवियों ने नायक-नायिकाओं की विविध क्रीड़ा-कलापों का चमत्कारपूर्ण वर्णन किया।

आधुनिक काल में नव-चेतना संचार हुआ। राष्ट्रीयता की लहर व्याप्त हुई। स्वदेश प्रेम का भाव उमड़ पड़ा। समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप मार्ग-दर्शन का कार्य साहित्य ने किया। मैथिलीशरण गुप्त ने भविष्य का निर्देश देते हुए लिखा-

“हो रहा है जो जहाँ, वह हो रहा, यदि वही हमने कहा तो क्या कहा?
किन्तु होना चाहिए कब क्या, कहाँ व्यक्त करती है कला ही वह, यहाँ।”

समाज के उत्थान में साहित्य का योगदान-जीवन में साहित्य की उपयोगिता अनिवार्य है। साहित्य मानव जीवन को वाणी देने के साथ-साथ समाज का पथ-प्रदर्शन भी करता है। साहित्य मानव-जीवन के अतीत का ज्ञान कराता है, वर्तमान का चित्रण करता है और भविष्य निर्माण की प्रेरणा देता है। साहित्यिक रचना का महत्त्व स्थायी होता है। वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास, शेक्सपीयर आदि की साहित्यिक कृतियों से आज भी मानव जीवन प्रेरणा ले रहा है और भविष्य में भी लेता रहेगा। विभिन्न जातियों के आगमन से मानव के धर्म एवं संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभाव भी साहित्य के माध्यम से जाने जा सकते हैं।

उपसंहार-निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि साहित्य और समाज का अटूट सम्बन्ध है जो साहित्य धरती से जुड़ा हुआ नहीं होता है वह सनातन तथा लोक मंगलकारी नहीं हो सकता है। साहित्यकार किसी देश विशेष की सीमा से आबद्ध नहीं होता वह सम्पूर्ण मानव-मात्र का हित-साधक होता है। आदर्श साहित्य मानव-मन को आलोकित करता है। सद्गुणों का विकास करके असत् वृत्तियों का उच्छेदन करता है। साहित्य मानव की रुचि का पूर्णतः परिष्कार करके उसमें निरन्तर उदात्त मनोवृत्तियों को जाग्रत करता है। जब साहित्य का पतन होने लगता है तब समाज भी रसातल को चला जाता है। इस प्रकार साहित्य समाज के लिए प्रकाश स्तम्भ का कार्य करता है।

22. इण्टरनेट : आधुनिक जीवन की आवश्यकता [2017]

“विज्ञान का एक और विलक्षण, वरदान है ‘इण्टरनेट’।
खोजिए जानकारी, पाइए ज्ञान और कीजिए ‘चैट’।”

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • आखिर क्या है इण्टरनेट?,
  • इण्टरनेट के लाभ,
  • वर्तमान युग और इण्टरनेट,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-एक समय था जब न तो यातायात के पर्याप्त साधन थे और न ही संचार की उन्नत सुविधाएँ ही मौजूद थीं। तब व्यक्ति को पड़ोसी नगर अथवा गाँव तक के समाचार प्राप्त नहीं हो पाते थे, देश-विदेश के सम्बन्ध में जानकारी तो दूर की कौड़ी थी। परन्तु जैसे-जैसे सभ्यता का विकास और प्रसार होता गया, वैसे-वैसे विभिन्न जादुई वैज्ञानिक उपादानों ने ईश्वर की बनाई इस दुनिया को बहुत छोटा कर दिया। रेल, हवाई जहाज,रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन, कम्प्यूटर इत्यादि उपकरणों की सहायता से पूरा विश्व घर के ‘ड्राइंग रूम’ में सिमट गया। कम्प्यूटर के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक उसकी उपयोगिता में सर्वाधिक वृद्धि तब हुई जब उस पर ‘इण्टरनेट’ सेवा बहाल की गई।

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आखिर क्या है इण्टरनेट-इण्टरनेट पूरे विश्व में फैले कम्प्यूटरों का नेटवर्क है। इण्टरनेट पर कम्प्यूटर के माध्यम से सारे संसार की जानकारी पलक झपकते ही प्राप्त की जा सकती है। वास्तव में, इण्टरनेट एक ऐसी अत्याधुनिक संचार प्रौद्योगिकी है जिसमें अनगिनत कम्प्यूटर एक नेटवर्क से जुड़े होते हैं। इण्टरनेट न कोई सॉफ्टवेयर है,न कोई प्रोग्राम अपितु यह तो एक ऐसी युक्ति है जहाँ अनेक सूचनाएँ तथा जानकारियाँ उपकरणों की सहायता से मिलती हैं। इण्टरनेट के माध्यम से मिलने वाली सूचनाओं में विश्वभर के व्यक्तियों और संगठनों का सहयोग रहता है। उन्हें ‘नेटवर्क ऑफ सर्वर्स’ (सेवकों का नेटवर्क) कहा जाता है। यह एक वर्ल्ड वाइड वेव (w.w.w.) है जो हजारों सर्वर्स को जोड़ता है।

इण्टरनेट के लाभ-इण्टरनेट के द्वारा विभिन्न प्रकार के दस्तावेज, सूची, विज्ञापन, समाचार,सूचनाएँ आदि सरलता से उपलब्ध हो जाती हैं। ये सूचनाएँ संसार में कहीं पर भी प्राप्त की जा सकती हैं। पुस्तकों में लिखे विषय, समाचार-पत्र,संगीत आदि सभी इण्टरनेट के माध्यम से प्राप्त किये जाते हैं। संसार के किसी भी कोने से कहीं पर भी सूचना प्राप्त की जा सकती है और भेजी जा सकती है। हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, औद्योगिक, शिक्षा, संस्कृति, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में इण्टरनेट उपयोगी है।

वर्ततान युग और इण्टरनेट त्वरित सूचना के इस युग में इण्टरनेट अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षा,स्वास्थ्य, यात्रा,पंजीकरण,आवेदन आदि सभी कार्यों में इण्टरनेट सहयोगी है। पढ़ने वाली दुर्लभ पुस्तकों को संसार के किसी भी कोने में पढ़ा जा सकता है। स्वास्थ्य सम्बन्धी विस्तृत जानकारियाँ इण्टरनेट पर उपलब्ध हैं। इण्टरनेट के द्वारा संसार के किसी भी विशिष्ट व्यक्ति के विषय में जाना जा सकता है। सभी प्रकार के टिकट घर बैठे इण्टरनेट से प्राप्त किये जा सकते हैं। दैनिक जीवन की समस्याओं को हल करने वाला इण्टरनेट आज के जीवन की अनिवार्यता बन गया है।

उपसंहार-समाज के प्रत्येक वर्ग में इण्टरनेट की बढ़ती स्वीकार्यता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इस युक्ति ने मानव-जीवन में चमत्कार-सा कर दिया है। किन्तु जैसा कि हम जानते हैं हर अच्छी बात में कोई-न-कोई बुरी बात भी छुपी होती है। वह बुरा पक्ष व्यक्ति विशेष द्वारा उपलब्ध युक्ति का दुरुपयोग करने पर सामने आता है। इण्टरनेट का दुरुपयोग करने वालों ने इस अनूठी सुविधा का भी स्याह पक्ष सामने ला खड़ा किया है। आज इण्टरनेट पर अश्लील वेबसाइट्स की बाढ़-सी आ गई है। सबसे खतरनाक तथ्य है कि ऐसी ‘साइट्स’ अब किशोरों तक की पहुँच में आ गई हैं। इससे भावी पीढ़ी के नैतिक एवं शारीरिक पतन का खतरा मँडराने लगा है। हमें इस समस्या से मुक्ति के लिए तत्काल प्रभावी उपाय करने होंगे ताकि बहुपयोगी ‘इण्टरनेट’ का श्वेत पक्ष मानव कल्याण में सहायक सिद्ध हो सके।

23. जनसंख्या वृद्धि [2018]

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ,
  • अभाव की स्थिति,
  • जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव,
  • समस्या का समाधान,
  • उपसंहार।

प्रस्तावना-आज विश्व के सामने अनेक छोटी-छोटी समस्याएँ हैं। प्रत्येक देश उनके समाधान के लिए अपने-अपने ढंग से प्रयासरत है। भारत में तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हमारी उन्नति और प्रगति की सारी योजनाएँ विफल होती जा रही हैं, परन्तु विडम्बना है कि कोई इतनी गम्भीर समस्या को समस्या मानने को तैयार नहीं वरन् उसे सम्पन्नता का प्रतीक मान बैठे हैं और ईश्वर द्वारा प्रदत्त उपहार मान बैठे हैं।

जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ-जनसंख्या वृद्धि की एक समस्या अनेक अन्य समस्याओं को जन्म देती है। हर किसी की मुख्य आवश्यकताएँ हैं-रोटी, कपड़ा एवं मकान। आज हमारे देश में लाखों लोगों को भरपेट रोटी नहीं मिलती, तन ढकने को. कपड़े नहीं मिलते और वे बिना घर-बार के खुले आसमान के नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं।

अभाव की स्थिति स्वतन्त्रता मिलने के बाद भारत तीव्र गति से कृषि, उद्योग तथा व्यवसाय के क्षेत्र में विकास के पथ पर अग्रसर हुआ। हर क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई। आज कृषि योग्य देश की लगभग सारी भूमि पर खेती हो रही है। हम अपनी दैनिक आवश्यकता की सभी वस्तुओं का उत्पादन अपने देश में प्रचुर मात्रा में करने लगे हैं। फिर भी हम अपने देश में आवश्यक वस्तुओं की कमी पूरी नहीं कर सके। जीवन के लिए परम आवश्यक वस्तुओं की खरीद एवं बिक्री पर भी सरकार को प्रतिबन्ध लगाना पड़ता है। आज हम पहले की तुलना में कई गुना अधिक निर्यात कर रहे हैं, फिर भी हमारे देश की गिनती अविकसित देशों में की जाती है। हमें अपने विकास कार्यों के लिए दूसरों से कर्ज लेना पड़ रहा है।

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