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MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 9 स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित घटनाएँ

MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 पाठान्त अभ्यास

MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
बंगाल विभाजन का मूल उद्देश्य था (2011)
(i) बंगाल में प्रशासनिक व्यवस्था लागू करना
(ii) राष्ट्रवादी भावनाओं को दबाना
(iii) राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ाना
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ii) राष्ट्रवादी भावनाओं को दबाना

प्रश्न 2.
कांग्रेस का विभाजन हुआ (2011)
(i) नागपुर अधिवेशन में
(ii) सूरत अधिवेशन में
(iii) लाहौर अधिवेशन में
(iv) बम्बई अधिवेशन में
उत्तर:
(ii) सूरत अधिवेशन में

प्रश्न 3.
गांधीजी ने ‘खिलाफत आन्दोलन’ का समर्थन क्यों किया ?
(i) क्योंकि खलीफा भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष का समर्थक था
(ii) क्योंकि गाँधीजी अंग्रेजों के विरुद्ध मुसलमानों का समर्थन चाहते थे
(iii) क्योंकि खलीफा भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रेमी थे
(iv) क्योंकि टर्की ने भारतीय स्वतन्त्रता का समर्थन किया।
उत्तर:
(ii) क्योंकि गाँधीजी अंग्रेजों के विरुद्ध मुसलमानों का समर्थन चाहते थे

प्रश्न 4.
रॉलेट एक्ट का उद्देश्य था (2011)
(i) सभी हड़तालों को गैर-कानूनी घोषित करना
(ii) आन्दोलनकारियों का दमन करना
(iii) सभी के मध्य समानता स्थापित करना
(iv) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(ii) आन्दोलनकारियों का दमन करना

प्रश्न 5.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कार्यक्रम में निम्नलिखित में से कौन शामिल नहीं है ?
(i) देशवासियों को नमक बनाना चाहिए
(ii) विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जाए
(iii) हिंसात्मक साधनों से कानूनों का उल्लंघन किया जाए
(iv) शराब की दुकानों पर ध्यान दिया जाए।
उत्तर:
(iii) हिंसात्मक साधनों से कानूनों का उल्लंघन किया जाए

प्रश्न 6.
फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना किसने की ? (2009,11)
(i) भगतसिंह
(ii) रास बिहारी बोस
(iii) चन्द्रशेखर आजाद
(iv) सुभाष चन्द्र बोस।
उत्तर:
(iv) सुभाष चन्द्र बोस।

प्रश्न 7.
जुलाई 1947 में ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम पारित किया जिसके अनुसार दो निम्न स्वतन्त्र देशों का निर्माण हुआ (2011, 12)
(i) भारत-बांग्लादेश
(ii) भारत-पाकिस्तान
(iii) भारत-श्रीलंका
(iv) भारत-नेपाल।
उत्तर:
(ii) भारत-पाकिस्तान

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. 1905 में बंगाल प्रान्त में बंगाल, ………………., उड़ीसा सम्मिलित थे।
  2. ‘करो या मरो’ का नारा ………………. आन्दोलन में दिया गया।
  3. 1928 में क्रान्तिकारियों ने ………………. का गठन किया।
  4. भारत की स्वाधीनता के समय ………………. भारत के वाइसराय थे। (2009, 10)
  5. ………………. के नेतृत्व में भारत की रियासतों के विलीनीकरण का कार्य सम्पन्न हुआ।

उत्तर:

  1. बिहार, असम
  2. भारत छोड़ो
  3. हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना
  4. माउण्टबेटन
  5. सरदार बल्लभभाई पटेल।

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल विभाजन कब और क्यों किया गया था ?
उत्तर:
बंगाल विभाजन 16 अक्टूबर, 1905 को प्रभावी रूप से लागू किया गया। लार्ड कर्जन का विचार था कि प्रशासनिक दृष्टि से एक लैफ्टीनेंट गवर्नर द्वारा इतने विशाल प्रान्त पर कुशलतापूर्वक शासन करना सम्भव ‘नहीं है, अतः कर्जन ने बंगाल को दो भागों में विभाजित करने की योजना बनाई। परन्तु बंगाल का यह विभाजन प्रशासनिक कारणों से नहीं बल्कि राजनैतिक कारणों से किया गया था। लार्ड कर्जन राष्ट्रीय चेतना के केन्द्र बंगाल पर आघात कर इसे कमजोर बनाना चाहता था। लार्ड कर्जन का एक उद्देश्य हिन्दू और मुसलमानों की संगठित शक्ति को तोड़कर उसे बाँटना था।

प्रश्न 2.
असहयोग आन्दोलन अचानक क्यों स्थगित हो गया ?
उत्तर:
असहयोग आन्दोलन का स्थगन-5 फरवरी, सन् 1922 को गोरखपुर के निकट चौरी-चौरा गाँव में पुलिस ने भीड़ पर गोली चलायी। जब उसका गोला-बारूद समाप्त हो गया तो पुलिसजनों ने अपने को थाने में बन्द कर लिया। भीड़ ने थाने में आग लगा दी, जिससे 22 सिपाही जलकर मर गये। गांधीजी अहिंसात्मक आन्दोलन में विश्वास करते थे। अतः इस हिंसात्मक घटना से उन्हें आघात लगा तो उन्होंने असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर दिया।

प्रश्न 3.
खिलाफत और असहयोग आन्दोलन के क्या लक्ष्य थे ?
उत्तर:
खिलाफत आन्दोलन – प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद टर्की के साथ जो अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया था, उस पर वहाँ खिलाफत आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। इसके समर्थन में भारत के अली भाइयों (मोहम्मद अली और शौकत अली) ने खिलाफत आन्दोलन आरम्भ किया।

असहयोग आन्दोलन – कांग्रेस ने 1920 में गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग का नया कार्यक्रम अपनाया। जलियाँवाला बाग का हत्याकाण्ड, रॉलेट एक्ट का विरोध, ब्रिटिश सरकार की वादा खिलाफी का विरोध और स्वराज की प्राप्ति, ये असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य थे।

प्रश्न 4.
आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर किन स्थानों को अंग्रेजों से मुक्त कराया ?
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस ने भारत-बर्मा सीमा पर युद्ध आरम्भ किया। फरवरी 1944 में आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर रामू, कोहिया, पलेम, तिद्विम आदि को अंग्रजों से मुक्त कराया। अप्रैल 1944 में आजाद हिन्द फौज ने इम्फाल को घेर लिया परन्तु वर्षा के आधिक्य और रसद की कमी के कारण उन्हें लौटना पड़ा।

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल विभाजन के पीछे ब्रिटिश शासन के क्या उद्देश्य थे ?
अथवा
बंगाल विभाजन का क्या उद्देश्य था ? लिखिए। (2009)
उत्तर:
बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजों के निम्नलिखित उद्देश्य थे –

  1. ब्रिटिश सरकार के अनुसार बंगाल विभाजन का प्रमुख उद्देश्य बंगाल के प्रशासन को सुधारना था। लार्ड कर्जन के मत में बंगाल एक विशाल प्रान्त था, अतः समुचित प्रशासनिक संचालन के लिए उसका विभाजन करना आवश्यक था।
  2. बंगाल विभाजन का अन्य उद्देश्य बंगाल की संगठित राजनीतिक भावना को समाप्त करना तथा राष्ट्रीयता के वेग को कम करना था।
  3. इतिहासकारों के अनुसार बंगाल विभाजन का प्रमुख उद्देश्य जनता में फूट डालना था। पूर्वी बंगाल में मुसलमानों का बहुमत तथा पश्चिमी भाग में हिन्दुओं का बहुमत रखना जिससे हिन्दू-मुस्लिम एकता समाप्त हो जाए।

प्रश्न 2.
कांग्रेस का विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की दृष्टि से विनाशकारी सिद्ध हुआ। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1907 ई. में सूरत में कांग्रेस के अधिवेशन में कांग्रेस के उग्रराष्ट्रवादियों तथा उदारवादियों के मध्य खुलकर संघर्ष हुआ। उग्रराष्ट्रवादियों ने लाला लाजपतराय को अध्यक्ष पद पर खड़ा किया जिसका उदारवादियों ने विरोध किया। उदारवादी डॉ. रासबिहारी को अध्यक्ष बनाना चाहते थे।

सूरत अधिवेशन की घटना ने कांग्रेस के उदार और उग्रराष्ट्रवादी नेताओं को सोचने पर विवश किया किन्तु दोनों पक्षों के कुछ नेता मतभेदों को समाप्त करने पर एकमत नहीं हुए जिसके कारण अन्ततः कांग्रेस में विभाजन हो गया, जिसे ‘सूरत की फूट’ कहा जाता है। कांग्रेस का यह विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की दृष्टि से विनाशकारी सिद्ध हुआ। ब्रिटिश सरकार ने इसे अपनी जीत के रूप में लिया। वस्तुतः सूरत अधिवेशन से स्वाधीनता का नया अध्याय आरम्भ होता है।

प्रश्न 3.
स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में 1929 के लाहौर अधिवेशन का क्या महत्त्व है ? (2014)
उत्तर:
कांग्रेस का 44वाँ अधिवेशन 1929 में लाहौर में हुआ। इस अधिवेशन के अध्यक्ष पं. जवाहर लाल नेहरू थे। अपने इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की माँग का प्रस्ताव पास किया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करने का निर्णय भी लिया गया। यह भी निर्णय लिया गया कि हर वर्ष 26 जनवरी का दिन सम्पूर्ण भारत में स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जाए। इस प्रकार 26 जनवरी, 1930 को स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया गया। इसके मनाये जाने से जन-साधारण में एक बड़ा जोश पैदा हो गया और पूर्ण स्वराज्य का सन्देश घर-घर पहुँच गया। इसी कारण लाहौर अधिवेशन का भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न 4.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाए जाने के क्या कारण थे? (2009, 10, 14, 15, 18)
उत्तर:
दिसम्बर 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस कार्यसमिति को सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ करने की स्वीकृति दी गई थी। वायसराय लार्ड इरविन ने लाहौर अधिवेशन के पूर्ण स्वाधीनता प्रस्ताव को मानने से इन्कार कर दिया था परन्तु गांधीजी अभी भी समझौते की आशा रखते थे। अतः उन्होंने 30 जनवरी, 1930 को लार्ड इरविन के समक्ष 11 माँगें प्रस्तुत की। गांधीजी ने यह भी घोषित किया कि माँगें स्वीकार न होने की स्थिति में सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया जायेगा।

गांधीजी चाहते थे कि सरकार विनिमय की दर घटाए, भू-स्वराज कम करे, पूर्ण नशाबन्दी लागू हो, बन्दूकों को रखने का लाइसेंस दिया जाये, नमक पर कर समाप्त हो, हिंसा से दूर रहने वाले राजनीतिक बन्दी छोड़े जाएँ, गुप्तचर विभाग पर नियन्त्रण स्थापित हो, सैनिक व्यय में पचास प्रतिशत कमी हो, कपड़ों का आयात कम हो आदि। वायसराय ने इन माँगों को अस्वीकार कर दिया। अत: गांधीजी ने योजनानुसार सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया।

प्रश्न 5.
गांधीजी के आरम्भिक आन्दोलनों की तुलना में भारत छोड़ो आन्दोलन किस प्रकार भिन्न है ? स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर:
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 8 अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव मुम्बई में पारित किया। गांधीजी ने इस अवसर पर कहा कि “प्रत्येक भारतवासी को चाहिए कि वह अपने आपको स्वाधीन मनुष्य समझे। उसे स्वाधीनता की यथार्थतापूर्ण प्राप्ति या उसके हेतु किए गए प्रयत्न में मर मिटने को तत्पर रहना चाहिए।”

महाजन दम्पत्ति के अनुसार, “1942 का राष्ट्रीय आन्दोलन 1921 और 1930 के आन्दोलनों से अनेक बातों में भिन्न तथा विशेष था। पहले आन्दोलन इसलिए किये गये थे, ताकि भारत के लोगों को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अन्तिम संग्राम के लिए तैयार किया जाए। उनका ध्येय देश में जागृति उत्पन्न करना था। वे लोग जो शताब्दियों से विदेशियों के नीचे पिस रहे थे उनके हृदय से भय दूर करना था और देश-प्रेम को भरना था। उनके सम्मुख स्वराज्य की स्थापना का ध्येय तो था परन्तु बहुत दूर था। 1942 के आन्दोलन करने वालों का यह निश्चय था कि यह आन्दोलन आजादी के लिए अन्तिम संग्राम है और इसलिए वे अपने ध्येय की पूर्ति के लिए सब कुछ बलिदान करने के लिए उद्यत थे।”

प्रश्न 6.
स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गांधीजी ने किन तरीकों को अपनाने के लिए कहा ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गांधीजी ने निम्न तरीकों को अपनाने को कहा –

(1) आन्दोलन में अहिंसा को अपनाना – प्रारम्भ से ही महात्मा गांधी के राजनीतिक विचारों का आधारभूत सिद्धान्त अहिंसा था। उन्होंने यह समझ लिया था कि भारत में शस्त्र की शक्ति अथवा हिंसा द्वारा अंग्रेजी राज्य को नहीं हटाया जा सकता। अत: उन्होंने कांग्रेस के क्रान्तिकारी विचार के कार्यकर्ताओं को समझाया कि वे अपने हिंसा के मार्ग के छोड़कर जनजागृति एवं संगठन को महत्त्व देकर ही संघर्ष करें। गांधीजी अहिंसा को कायरों का नहीं वरन् शक्तिशाली लोगों का हथियार मानते थे। गांधीजी के अनुसार, “अहिंसा एक ऐसा सच्चा हथियार है जिसमें सभी को जीतने की शक्ति होती है।”

(2) आन्दोलन में नैतिक साधनों के प्रयोग पर बल देना – अहिंसा के अतिरिक्त गांधीजी ने सत्य, नैतिकता, न्याय, पवित्रता तथा निर्भयता पर भी बल दिया। उनके अनुसार, “सत्य तथा अहिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।” उनके मत में आदर्श आन्दोलनकारी वह है जो सत्य में भी निष्ठा रखता है। वे नैतिकता पर भी बल देते थे। उनके अनुसार नैतिकता से ही मनुष्य में आत्मबल का विकास होता है तथा आत्मबल वाला व्यक्ति निहत्था होकर भी बड़ी-से-बड़ी शक्ति को अपने अनुकूल बना सकता है। वे राजनीति तथा नैतिकता को अलग-अलग नहीं मानते थे।

(3) महात्मा गांधी द्वारा चलाये आन्दोलनों के साधन – महात्मा गांधी के आन्दोलन पूर्णतया अहिंसात्मक थे तथा उनके प्रमुख साधन थे-व्यक्तिगत सत्याग्रह, सामूहिक सत्याग्रह, विदेशी माल का बहिष्कार, शराब की दुकानों पर धरना तथा सरकारी नौकरियों का बहिष्कार।

ये विधियाँ अहिंसक तो थीं, पर कुछ कम क्रान्तिकारी न थीं, इनके कारण समाज के सभी वर्गों के लाखों लोग प्रभावित हुए। उनके अन्दर वीरता और आत्मविश्वास की भावना जागी। लाखों लोग निर्भय होकर सरकार का दमन झेलने लगे, जेल जाने लगे तथा लाठी-गोली का सामना करने लगे।

प्रश्न 7.
क्रान्तिकारी आन्दोलन का भारत के इतिहास में महत्त्व स्पष्ट कीजिए। (2010, 17)
उत्तर:
क्रान्तिकारियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा प्रदान की। अब ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोग की नीति से हटकर विरोध की नीति अपनाई गई। इसके लिए उन्हें पुलिस की लाठियों का शिकार होना पड़ा और अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। इससे जन-आन्दोलन भड़क उठा और कई क्रान्तिकारी युवकों ने बदला लेने की कसम खाई। भगतसिंह, खुदीराम बोस, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, बटुकेश्वर दत्त, वीर सावरकर जैसे अनेक क्रान्तिकारी युवकों ने ब्रिटिश अफसरों की हत्या करने तथा हथियारों को प्राप्त करने के लिए सरकारी खजाने एवं मालगोदामों को लूटने तक में भी संकोच नहीं किया। इन सबका उद्देश्य था, हर सम्भव प्रयत्न से अंग्रेजों को देश के बाहर खदेड़ना तथा देश को गुलामी की बेड़ियों से छुटकारा दिलाना। भगतसिंह ने फाँसी के तख्ते को चूमा, राम प्रसाद बिस्मिल तथा खुदीराम बोस ने यह कहते हुए हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा अपने गले में डाल दिया –

“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है।”

इसी तरह पुलिस के साथ मुठभेड़ में चन्द्रशेखर आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हो गये।

इन क्रान्तिकारियों का बलिदान निष्फल नहीं गया। ब्रिटिश शासन डगमगाने लगा और उन्होंने सोच लिया कि भारत की धरती पर रहने के उनके कुछ ही दिन बाकी रह गये हैं।

प्रश्न 8.
कैबिनेट मिशन का क्या उद्देश्य था ? वह उन उद्देश्यों में कहाँ तक सफल रहा ?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन – शिमला सम्मेलन की असफलता के बाद इंग्लैण्ड की नयी मजदूर दल की सरकार ने भारत की स्थिति की जानकारी लेने के लिए एक शिष्टमण्डल भारत भेजा। ब्रिटिश संसदीय शिष्टमण्डल ने अपनी रिपोर्ट में भारत में सत्ता को तुरन्त हस्तान्तरित किये जाने की अनुशंसा की। इस स्थिति में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री लार्ड एटली ने कैबिनेट मिशन भारत भेजा।

कैबिनेट मिशन ने भारत के भावी स्वरूप को निश्चित करने वाली एक योजना 16 मई, 1946 को प्रस्तुत की। योजना के दो मुख्य भाग थे – अन्तरिम सरकार की स्थापना की तात्कालिक योजना तथा संविधान निर्माण की दीर्घकालीन योजना।

यह सत्य है कि कैबिनेट मिशन योजना में अनेक दोष थे फिर भी यह योजना अब तक प्रस्तुत की गयी योजनाओं से कहीं अधिक सारगर्भित तथा पर्याप्त सीमा तक व्यावहारिक थी। महात्मा गांधी के अनुसार, “यह उन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत की जा सकने वाली सर्वश्रेष्ठ योजना थी।”

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत छोड़ो आन्दोलन का क्या अर्थ है एवं यह कब शुरू हुआ ? भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में इसके महत्त्व को लिखिए।
अथवा
भारत छोड़ो आन्दोलन कब शुरू हुआ था ? भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में इसका महत्व लिखिए। (2018)
उत्तर:
भारत छोड़ो आन्दोलन

1942 के वर्ष में देश के राजनीतिक मंच पर एक ऐसा ऐतिहासिक आन्दोलन आरम्भ हुआ, जिसे ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के नाम से जाना जाता है। यह यथार्थत: जन-आन्दोलन था। यह एक ऐसा अन्त:प्रेरित और स्वेच्छासूचक सामूहिक आन्दोलन था, जिसका जन्म राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए स्व-प्रेरणा के फलस्वरूप हुआ था। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 8 अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो’ का प्रसिद्ध प्रस्ताव पास किया।

भारत छोड़ो आन्दोलन के अवसर पर महात्मा गांधी ने अपने उत्साहपूर्ण तथा जोशीले भाषण में भारतवासियों को ‘करो या मरो’ का ऐतिहासिक सन्देश दिया। इस सन्देश का आशय था कि स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए भारतवासियों को अहिंसक ढंग से हर सम्भव उपाय करना चाहिए।

आन्दोलन का प्रारम्भ – भारत छोड़ो प्रस्ताव के पारित होने के दूसरे दिन ही ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया। परिणामस्वरूप ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन की आग सारे देश में फैल गयी। . प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं को गिरफ्तार कर लेने के कारण इस आन्दोलन ने हिंसात्मक रूप ले लिया। जगह-जगह पर उग्र प्रदर्शन हुए। नगरों तथा गाँवों में विशाल जुलूस निकाले गये। स्थान-स्थान पर रेलवे स्टेशन, डाकखाने, तारघर तथा थानों को जला दिया गया।

बलिया, सतारा, बंगात तथा बिहार के कुछ स्थानों पर तो कुछ काल के लिए ब्रिटिश शासन का नामोनिशान ही मिटा दिया गया। इन स्थानों पर आन्दोलनकारियों ने स्वतन्त्र शासन की स्थापना कर दी, परन्तु ब्रिटिश सरकार ने भी कठोरता से अपना दमन चक्र चलाया। यह आन्दोलन 1945 तक किसी-न-किसी रूप में चलता रहा। यह सत्य है कि ब्रिटिश सरकार ने इस आन्दोलन का दमन कर दिया था, परन्तु इस जनजागृति ने ऐसे वातावरण का निर्माण किया कि कुछ वर्षों के बाद ही ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़कर जाना पड़ा।

भारत छोड़ो आन्दोलन का महत्त्व – भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में भारत छोड़ो आन्दोलन’ का अपना विशेष महत्त्व है। यह सत्य है कि जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आन्दोलन को प्रारम्भ किया गया था, वह तुरन्त प्राप्त नहीं हो सका, परन्तु इसके प्रभाव व्यापक रहे। इस आन्दोलन के कारण अमेरिका, चीन आदि विशाल राष्ट्रों को भारत के जन असन्तोष का ध्यान हुआ जिससे उन्होंने ब्रिटेन पर दबाव डाला कि वह भारत को स्वतन्त्र कर दे। साथ ही ब्रिटेन को भी यह ज्ञात हो गया कि वह अधिक दिनों तक भारत को पराधीन नहीं रख सकता। अन्य शब्दों में, इस आन्दोलन ने भारत की स्वतन्त्रता की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी।

प्रश्न 2.
क्रान्तिकारियों के बारे में आप क्या जानते हैं ? ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उन्होंने कौनसे तरीके अपनाए ? (2011, 13)
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रियावादी नीति के फलस्वरूप 19वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में भारत में क्रान्तिकारी राष्ट्रीयता का विकास हुआ। बंगाल विभाजन के बाद भारतीयों में क्रान्तिकारी भावना का तेजी से प्रसार हुआ। क्रान्तिकारी विचारधारा के अनुयायियों का विश्वास था कि अहिंसा और वैधानिक साधनों द्वारा राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं किये जा सकते हैं। क्रान्तिकारी मानते थे कि हिंसा और भय दिखाकर स्वराज व स्वशासन प्राप्त किया जा सकता है। वे मातृभूमि को तत्काल विदेशी बन्धन से मुक्त करना चाहते थे। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्रान्तिकारियों ने गुप्त समितियों का गठन किया, युवकों को सैनिक प्रशिक्षण दिया, अस्त्र-शस्त्र एकत्र किये तथा समाचार-पत्रों और अन्य माध्यमों से क्रान्तिकारी विचारों का प्रसार किया। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्रान्तिकारियों ने बंगाल में अनुशीलन समितियों की स्थापना की। ये समितियाँ युवकों को भारतीय इतिहास और संस्कृति से अवगत कराती थीं तथा उनमें स्वतन्त्रता की भावना जागृत करती थीं। वे युवकों में त्याग और बलिदान की भावना उत्पन्न कर उन्हें मातृभूमि को विदेशी बन्धनों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए तैयार करती थीं। इस कार्य के लिए क्रान्तिकारियों ने पिस्तौल, बन्दूक और गोला-बारूद का रास्ता चुना।

प्रमुख क्रान्तिकारी व घटनाएँ – इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक थे-चापेकर बन्धु, रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, अशफाक उल्ला खाँ, सावरकर बन्धु, चन्द्रशेखर आजाद तथा सरदार भगतसिंह ये सभी क्रान्तिकारी भीख माँगकर स्वराज्य प्राप्त करने में विश्वास नहीं करते थे। 1928 में दिल्ली में क्रान्तिकारियों की बैठक आयोजित की गई और ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’ का गठन किया गया। पंजाब में भगवती चरण व भगतसिंह ने ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन किया।

ब्रिटिश सरकार ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ पास कराना चाहती थी। क्रान्तिकारियों ने इस बिल को रुकवाने के लिए केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई। इस कार्य को सरकार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को सौंपा गया। जब 9 अप्रैल, 1929 को इस बिल पर असेम्बली में चर्चा चल रही थी, भगतसिंह ने असेम्बली में बम फेंक दिया। क्रान्तिकारियों का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था अपितु वे अपनी आवाज सरकार तक पहुँचाना चाहते थे। बाद में भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त पर मुकदमा चलाया गया। 23 मार्च, 1931 को ब्रिटिश सरकार द्वारा भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी के तख्ते पर लटका दिया गया।

1928 में लाहौर में ‘साइमन वापस जाओ’ आन्दोलन लाला लाजपतराय के नेतृत्व में शुरू हुआ। पुलिस में हुई झड़प के दौरान लाजपतराय की मृत्यु हो गई जिससे क्रान्तिकारियों भड़क उठे और पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या कर दी गई।

जतीन्द्रनाथ दास द्वारा भगतसिंह व अन्य क्रान्तिकारियों को जेल में सुविधाएँ दिए जाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल की गयी और अन्ततः उन्होंने प्राणों की आहुति दे दी।

इधर ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के कारण और अनेक क्रान्तिकारियों नेताओं की मृत्यु से क्रान्तिकारी आन्दोलन को बहुत हानि हुई। चन्द्रशेखर आजाद ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में क्रान्ति की योजना बनाने के लिए 27 फरवरी, 1931 में क्रान्तिकारियों की एक बैठक बुलाई किन्तु दुर्भाग्य से ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें घेर लिया। आजाद ने अन्तिम क्षण तक ब्रिटिश सिपाहियों से लोहा लिया किन्तु जब उन्हें लगा कि वे बच नहीं पाएंगे तो उन्होंने स्वयं को गोली मार ली और अन्तत: वे वीरगति को प्राप्त हुए। क्रान्तिकारी आन्दोलन में भारतीय वीरांगनाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। श्रीमती सुशीला देवी, श्रीमती दुर्गा देवी, प्रेमवती आदि महिलाओं ने आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

प्रश्न 3.
आजाद हिन्द फौज की स्थापना क्यों की गई थी एवं भारत की स्वतन्त्रता के लिए उसके योगदान को लिखिए। (2009, 18)
अथवा
आजाद हिन्द फौज का स्वतन्त्रता आन्दोलन में क्या योगदान था ? (2009)
उत्तर:
आजाद हिन्द फौज

जापानियों द्वारा ब्रिटिश सेना के अनेक सैनिक युद्धबन्दी बना लिये गये थे। उनमें एक सैनिक अधिकारी कैप्टन मोहन सिंह थे जिन्होंने भारतीय युद्धबन्दियों को संगठित करके फरवरी 1942 ई. में आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। इस फौज की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य भारत की मुक्ति के लिए संघर्ष करना था। सुभाष चन्द्र बोस 1943 ई. में जापान पहुँचे तो रास बिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज के संचालन का कार्य उनको सौंपा। सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सँभालने के पश्चात् घोषणा की कि, “ईश्वर के नाम पर मैं पवित्र शपथ लेता हूँ कि मैं भारत और उसके 38 करोड़ लोगों को स्वतन्त्र कराऊँगा और मैं इस पवित्र युद्ध को अपने जीवन की अन्तिम साँस तक जारी रखेंगा।” इसके अतिरिक्त सुभाष चन्द्र बोस ने “दिल्ली चलो” का नारा भी लगाया।

1944 ई. को रंगून (यंगून) से प्रस्थान कर बर्मा (म्यांमार) में अंग्रेजों को पराजित करने के पश्चात् भारत में प्रवेश किया। भारत की भूमि पर आजाद हिन्द फौज ने युद्ध किये तथा अनेक बार ब्रिटिश सेनाओं को परास्त किया। बर्मा (म्यांमार) भारत सीमा पार कर प्रथम बार 1944 ई. में आजाद हिन्द फौज ने भारत की स्वतन्त्र भूमि पर तिरंगा झण्डा फहराया। इसके पश्चात् नागालैण्ड तथा कोहिमा पर भी अधिकार कर लिया, परन्तु आगे उसे पराजय का मुख देखना पड़ा। 1945 ई. में एक वायुयान दुर्घटना में सुभाषचन्द्र बोस का स्वर्गवास हो गया। इसी वर्ष अंग्रेजी सरकार ने आजाद हिन्द फौज के सैनिकों पर जिनमें प्रमुख थे-सहगल, ढिल्लन तथा शाहनवाज खाँ आदि पर मुकदमा चलाया। देश भर में उनकी रक्षा के लिए आवाज उठी, अतः ब्रिटिश सरकार को मजबूर होकर आजाद हिन्द के सभी सैनिकों को मुक्त करना पड़ा जिससे भारतीय जनता में आजाद हिन्द फौज के प्रति एक अपार निष्ठा की भावना बढ़ी तथा भारत की नौ-सेना तथा वायुसेना को शासन के विरुद्ध विद्रोह करने की प्रेरणा मिली। वास्तव में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की क्रिया को और अधिक तीव्र कर दिया।

प्रश्न 4.
मुस्लिम लीग के कार्यों ने पाकिस्तान के निर्माण की पृष्ठभूमि कैसे तैयार की ? समझाइए।
उत्तर:
मुस्लिम लीग

20वीं शताब्दी के आरम्भ में साम्प्रदायिकता की भावना ने जोर पकड़ा। मुसलमानों का एक वर्ग कांग्रेस को मुस्लिम विरोधी मानने लगा था। अंग्रेज शासक भी कांग्रेस के आन्दोलनों को विद्रोह के रूप में देखते थे। इसलिए वे कांग्रेस की एक प्रतिद्वन्द्वी संस्था की स्थापना करना चाहते थे। ब्रिटिश सरकार के संकेतों को देखते हुए मुसलमानों का एक शिष्टमण्डल अक्टूबर. 1906 में आगा खाँ के नेतृत्व में भारत में भारत के वायसराय लार्ड मिण्टो से मिला और एक माँग-पत्र प्रस्तुत किया। माँगों में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र, विधानमण्डलों में मुसलमानों को अधिक स्थान, सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालयों की स्थापना में रियायतें और गवर्नर जनरल की परिषद् में मुसलमान प्रतिनिधि की नियुक्ति का आग्रह था।

अन्ततः लार्ड मिण्टो भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जनक बना। इस प्रकार अंग्रेज सरकार से प्रोत्साहन प्राप्त करके आगा खाँ तथा अन्य मुस्लिम नेताओं ने 30 दिसम्बर, 1906 ई. में मुस्लिम लीग की स्थापना की। उन्होंने 1907 के लखनऊ अधिवेशन में लीग के संविधान को लागू किया।

मुस्लिम लीग के उद्देश्य –

  1. भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश राज के प्रति भक्ति भावना उत्पन्न करना।
  2. ब्रिटिश शासन के समक्ष मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए माँग करना।
  3. लीग के उद्देश्यों को हानि पहुँचाये बिना मुसलमानों एवं अन्य जातियों में यथासम्भव मेल-जोल रखना।

लीग के उद्देश्यों से स्पष्ट हो जाता है कि वह एक साम्प्रदायिक संस्था थी अतः राष्ट्रवादी मुसलमानों ने लीग की स्थापना का विरोध किया और वे कांग्रेस में ही बने रहे।

लीग द्वारा पाकिस्तान निर्माण की पृष्ठभूमि – मुस्लिम नेताओं के मन में पाकिस्तान की स्थापना का विचार अचानक नहीं हुआ अपितु यह धीरे-धीरे विकसित हुआ। 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में डॉ. मोहम्मद इकबाल ने ‘सर्व इस्लाम’ की भावना से प्रेरित होकर पाकिस्तान की स्थापना के विचार को प्रस्तुत किया। अंग्रेजी विश्वकोष के अनुसार पाकिस्तान की सबसे पहली परिकल्पना एक पंजाबी मुसलमान रहमतअली के दिमाग की उपज थी। पूर्व में राष्ट्रवादी मुसलमान रहे मोहम्मद अली जिन्ना भी अन्ततः साम्प्रदायिक बन गये और अक्टूबर 1938 में उन्होंने द्विराष्ट्र सिद्धान्त’ की माँग की। 1941 में मुस्लिम लीग ने मद्रास अधिवेशन में पाकिस्तान के निर्माण को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया। 1942 में क्रिप्स मिशन ने आग में घी का काम करते हुए पाकिस्तान की माँग को प्रोत्साहित किया और इस तरह अन्ततः भारत विभाजन पर कांग्रेस को आम सहमति बनानी पड़ी।

प्रश्न 5.
किन परिस्थितियों में भारत का विभाजन किया गया ? कांग्रेस ने भारत विभाजन क्यों स्वीकार किया ? (2011)
उत्तर:
माउण्टबेटन योजना और भारत का विभाजन

23 मार्च, 1947 को लार्ड वैवेल के स्थान पर लार्ड माउण्टबेटन नया गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पूर्ण अधिकार देकर भारत भेजा था, जिससे वे कैबिनेट योजना के अनुसार गठित . संविधान सभा के माध्यम से भारतीयों को शासन सत्ता सौंप सकें। माण्उटबेटन ने भारतीय राजनीति का गहनता से अध्ययन किया। अनेक विभिन्न दलों के नेताओं से विचार-विमर्श करने के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत में स्थायी शान्ति के लिए पाकिस्तान की योजना को स्वीकार करना आवश्यक है।

कांग्रेस के नेता विभाजन नहीं चाहते थे परन्तु लीग विभाजन के अलावा और कोई बात करने को तैयार नहीं थी। अन्ततः साम्प्रदायिकता पागलपन के ज्वार के समक्ष विवश होकर कांग्रेस को भारत विभाजन की सहमति देनी पड़ी। अन्तरिम सरकार की अपंगता, साम्प्रदायिक हिंसा का ज्वार, मुस्लिम लीग की हठधर्मिता, कांग्रेस नेताओं की विवशता तथा ब्रिटिश कूटनीति के परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हुआ। माण्उटबेटन ने जो योजना प्रस्तुत की उसके अनुसार भारत को दो भागों, भारत तथा पाकिस्तान में विभाजित किये जाने तथा सत्ता का हस्तान्तरण 15 अगस्त, 1947 को करने सम्बन्धी प्रावधान किया गया। योजना में पंजाब, बंगाल, सिन्ध, असम, बलूचिस्तान के विषय में स्पष्ट नीति निर्धारित की गयी।

माउण्टबेटन की योजना को कांग्रेस ने स्वीकृति प्रदान की। मुस्लिम लीग समस्त बंगाल, असम, पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त तथा बलूचिस्तान को पाकिस्तान में मिलाना चाहती थी परन्तु माउण्टबेटन के दबाव के आगे उसे योजना को स्वीकार करना पड़ा।

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 वस्तुनिष्ट प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न 1.
बंगाल विभाजन किसने किया? (2012)
(i) विलियम बैंटिंक
(ii) लार्ड रिपन
(iii) लॉर्ड कर्जन
(iv) महारानी विक्टोरिया।
उत्तर:
(iii)

प्रश्न 2.
साइमन कमीशन का विरोध करते हुए लाहौर में किस नेता का स्वर्गवास हो गया था ?
(i) विपिनचन्द्र पाल
(ii) लाला लाजपतराय
(iii) बाल गंगाधर तिलक
(iv) केशवदेव।
उत्तर:
(ii)

प्रश्न 3.
गांधीवादी के नेतृत्व में असहयोग का कार्यक्रम अपनाया गया
(i) 1908 में
(ii) 1912 में
(iii) 1918 में
(iv) 1920 में
उत्तर:
(iv)

प्रश्न 4.
दिसम्बर 1929 में हुए लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष थे
(i) मोतीलाल नेहरू
(ii) पं. जवाहरलाल नेहरू
(iii) महात्मा गांधी
(iv) मौलाना आजाद
उत्तर:
(ii)

प्रश्न 5.
स्वराज्य दल की स्थापना की
(i) चितरंजनदास ने
(ii) ऊधमसिंह ने
(iii) चन्द्रशेखर आजाद ने
(iv) अरविन्द घोष ने।
उत्तर:
(ii)

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. 1942 में …………….. मिशन भारत आया। (2009)
  2. बंगाल विभाजन का विरोध लोगों ने सड़कों पर …………….. गीत गाते हुए किया। (2012)
  3. ‘जय हिन्द’ का नारा …………….. ने दिया था। (2009, 17)
  4. 9 अगस्त, 1925 को क्रान्तिकारियों ने लखनऊ के निकट …………….. नामक स्थान पर गाड़ी रोककर सरकारी खजाना लूट लिया था। (2012)

उत्तर:

  1. क्रिप्स
  2. वंदेमातरम्
  3. सुभाष चन्द्र बोस
  4. काकोरी।

सत्य/असत्य

प्रश्न 1.
1938 में सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने। (2009)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 2.
1929 के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव किया गया। (2009)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 3.
‘करो या मरो’ का नारा असहयोग आन्दोलन में दिया गया। (2013)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 4.
कांग्रेस का विभाजन सूरत अधिवेशन में हुआ। (2010, 18)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 5.
भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद नहीं हुआ। (2009)
उत्तर:
असत्य

जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 9 स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित घटनाएँ 1
उत्तर:

  1. → (ख)
  2. → (क)
  3. → (घ)
  4. → (ङ)
  5. → (ग)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
रोलेट अधिनियम कब लागू हुआ ? (2009)
उत्तर:
मार्च 1919 में
उत्तर:

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय आन्दोलन में पूर्ण स्वाधीनता दिवस किस दिन मनाया गया था ?
उत्तर:
26 जनवरी, 1930

प्रश्न 3.
‘साइमन कमीशन’ के अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर:
सर जॉन साइमन

प्रश्न 4.
किस क्रान्तिकारी ने पंजाब के पूर्व गवर्नर की गोली मारकर हत्या कर दी थी ? (2009)
उत्तर:
ऊधम सिंह

प्रश्न 5.
मोहम्मडन एंग्लो-ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना किसने की थी ? (2009)
उत्तर:
सर सैयद अहमद खाँ

प्रश्न 6.
क्रिप्स मिशन भारत कब आया ? (2012)
उत्तर:
22 मार्च, 1942

प्रश्न 7.
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना किसने की ? (2013)
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस

प्रश्न 8.
भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम कब पारित हुआ था ?
उत्तर:
4 जुलाई, 1947.

प्रश्न 9.
रोलेट एक्ट का कोई एक उद्देश्य लिखिए। (2010)
उत्तर:
आन्दोलनकारियों का दमन करना।

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साइमन कमीशन का बहिष्कार क्यों किया गया ?
उत्तर:
साइमन कमीशन का बहिष्कार इसलिए किया गया, क्योंकि इसमें सभी सदस्य अंग्रेज थे और भारतीयों का इसमें कोई प्रतिनिधि नहीं था।

प्रश्न 2.
पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य को कब और कहाँ स्वीकार किया गया ?
अथवा
1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की थी ? इसमें कौन-सा महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया ?
उत्तर:
दिसम्बर, 1929 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन में जो कि लाहौर में हुआ। इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। यहाँ कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य स्वीकार किया और इसकी प्राप्ति के लिए गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने का फैसला किया।

प्रश्न 3.
रॉलेट एक्ट क्या था ? समझाइए। (2014, 16)
उत्तर:
यह एक ऐसा कानून था जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना अभियोग चलाये अनिश्चित समय तक जेल में डाला जा सकता था। यह सन् 1919 में पारित हुआ था। रॉलेट एक्ट का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय आन्दोलनों को कुचलना था। अत: गांधीजी ने इस एक्ट का व्यापक विरोध किया।

प्रश्न 4.
“गांधीजी साधारण नागरिक थे। फिर भी सारी दुनिया उन्हें सम्मान देती है,” क्यों ? समझाइए।
उत्तर:
गांधी जी जनसाधारण के प्रतीक थे। वे सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखते थे तथा जनता से उसी भाषा में बात करते थे जो भ्वह समझती थी। इसी कारण दुनिया उन्हें सम्मान देती है।

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की घटना को लिखिए। (2012, 14)
अथवा
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड क्यों हुआ? इसके क्या परिणाम हुए ?
उत्तर:
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड-रॉलेट अधिनियम मार्च 1919 में लागू किया गया। विरोध में पूरे देश से आवाज उठी। पंजाब में भी रॉलेट अधिनियम का विरोध हुआ। पंजाब में ब्रिटिश सरकार ने अनेक जगहों पर लाठी-गोली चलवाई। 10 अप्रैल को कांग्रेस के दो प्रभावशाली नेता डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू गिरफ्तार किए गए और उन्हें जेल भेज दिया गया। इन गिरफ्तारियों के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल बैशाखी के दिन विरोध सभा हुई। जैसे ही सभा प्रारम्भ हुई जनरल डायर नामक एक सैनिक अधिकारी ने सभा को किसी भी प्रकार की चेतावनी दिये बिना अपने सैनिकों को सभा की भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया। सैनिकों ने भीड़ पर गोली चलायी जिसके परिणामस्वरूप लगभग 800 से अधिक व्यक्ति मारे गये तथा 2000 के लगभग घायल हो गये। जलियाँवाला काण्ड से जनता में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक असन्तोष की भावना जागृत हुई। इसके बाद असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हो गया।

प्रश्न 2.
गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन क्यों प्रारम्भ किया ? इसके क्या सिद्धान्त थे ?
अथवा
असहयोग आन्दोलन का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
गांधीजी के नेतृत्व में 1920 में असहयोग आन्दोलन का नया कार्यक्रम अपनाया गया। जलियाँवाला बाग का हत्याकाण्ड एवं रॉलेट एक्ट का विरोध, अंग्रेजी सरकार की वादाखिलाफी का विरोध और स्वराज्य की प्राप्ति असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य थे। असहयोग आन्दोलन के तीन आधारभूत सूत्र थे-कौंसिलों का बहिष्कार, न्यायालयों का बहिष्कार और विद्यालयों का बहिष्कार। इस आन्दोलन के निम्नलिखित कार्यक्रम थे –

  1. सरकारी उपाधियों का त्याग व अवैतनिक पदों का बहिष्कार।
  2. वकीलों और बैरिस्टरों द्वारा न्यायालयों का बहिष्कार।
  3. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
  4. स्थानीय संस्थाओं के मनोनीत सदस्यों द्वारा अपने पदों का त्याग।
  5. सरकारी उत्सवों का बहिष्कार।

प्रश्न 3.
असहयोग आन्दोलन के परिणाम बताइए।
उत्तर:
असहयोग आन्दोलन के परिणाम-इस आन्दोलन के निम्नलिखित परिणाम सामने आये –

  1. देश-भर में एक-सी विचारधारा व राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार हुआ व विभिन्न सम्प्रदायों और प्रान्तों के लोग कांग्रेस के झण्डे के नीचे आ गये।
  2. हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित हुई। गांधीजी ने सभी वर्गों के लोगों पर जादू-सा कर दिया था और सबको एक दिशा में चलने वाला एक पचरंगी दल बना लिया था।
  3. इस आन्दोलन ने ब्रिटिश शासन-व्यवस्था के ढाँचे को झकझोर दिया। अंग्रेजों को लगने लगा कि बिना उदारवादियों के सहयोग के वे आगे नहीं बढ़ पायेंगे।
  4. लोगों में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्तुओं के प्रति लगाव की प्रवृत्ति जाग्रत हुई। परिणामस्वरूप कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन मिला।
  5. अंग्रेजी भाषा का महत्त्व जाता रहा और कांग्रेस ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 4.
साइमन कमीशन कब और क्यों भेजा गया था ? इसका भारतीयों द्वारा विरोध क्यों किया गया? (2016)
उत्तर:
साइमन कमीशन-1927 में ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में 7 सदस्यों का एक कमीशन नियुक्त किया जिसका काम सरकार ने सामने यह रिपोर्ट प्रस्तुत करना था कि 1919 ई. का एक्ट कहाँ तक सफल रहा है। इस कमीशन का बहिष्कार इसलिए किया गया, क्योंकि इसमें सभी सदस्य अंग्रेज थे और भारतीयों का इसमें कोई प्रतिनिधि नहीं था। जहाँ यह कमीशन जाता था वहाँ हड़तालें होती थीं, काली झण्डियाँ दिखायी जाती थीं और ‘साइमन लौट जाओ’ का नारा लगाया जाता था। इसी आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए पुलिस की लाठियों के प्रहार से लाला लाजपतराय का निधन हो गया।

प्रश्न 5.
‘स्वराज्य दल’ की स्थापना कब व किसने की थी ? इसके मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
कांग्रेस के कुछ नेताओं, जिनमें प्रमुख थे-चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, ने मार्च 1923 ई. में ‘स्वराज्य दल’ की स्थापना की। स्वराज्य दल के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे –

  1. असहयोग की नीति का त्याग कर नवीन नीतियों पर चलना।
  2. नौकरशाही के कार्यों में कौंसिल में प्रवेश करके रुकावट डालना।
  3. विधान परिषद् का चुनाव लड़कर उसमें अपना पक्ष रखना।
  4. सरकारी अनुचित कार्यवाहियों के साथ असहयोग की भावना रखना।
  5. विधान परिषद् के चुनाव जीतकर संविधान को असफल तथा खोखला सिद्ध करना।

प्रश्न 6.
खिलाफत आन्दोलन क्या था ? इसके महत्त्व को बताइए।
उत्तर:
खिलाफत आन्दोलन असहयोग की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस आन्दोलन का प्रारम्भ प्रथम विश्व-युद्ध के बाद हुआ। खिलाफत आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य इस्लाम के खलीफा सुल्तान को फिर से शक्ति दिलाना था। इसके समर्थन में भारत से अली बन्धुओं (मुहम्मद अली और शौकत अली) ने खिलाफत आन्दोलन प्रारम्भ किया। खिलाफत आन्दोलन में कांग्रेस के नेता भी सम्मिलित हुए और आन्दोलन को पूरे भारत में फैलाने में उन्होंने सहायता दी। किन्तु टर्की में इस आन्दोलन के समाप्त होते ही भारत के मुसलमानों ने भी इसे समाप्त कर दिया। खिलाफत आन्दोलन का महत्त्व-भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में खिलाफ तथा असहयोग आन्दोलन का विशेष महत्व रहा है। इसके कारण हिन्दू और मुस्लिम एकता को बल मिला जिससे स्वतन्त्रता आन्दोलन सबल बना।

प्रश्न 7.
क्रिप्स प्रस्ताव क्या थे ? सरकार ने इन प्रस्तावों को वापस क्यों लिया ??
उत्तर:
क्रिप्स 22 मार्च, 1942 को भारत आया। उसने पर्याप्त काल तक भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों तथा सम्प्रदायों के नेताओं से वार्ता की तथा अपनी योजना प्रस्तुत की, परन्तु उसकी योजना को सभी राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया। कांग्रेस ने इसे निम्नलिखित कारणों से अस्वीकृत कर दिया था –

  1. कांग्रेस मुख्यतया क्रिप्स योजना से इस कारण असन्तुष्ट थी, क्योंकि इसमें उसकी पूर्ण स्वाधीनता की माँग को स्वीकार नहीं किया गया था।
  2. क्रिप्स योजना में मुस्लिम लीग की भारत विभाजन की माँग को स्वीकार कर लिया गया था जिसके कांग्रेस पूर्णतया विरुद्ध थी।
  3. सम्पूर्ण प्रशासनिक शक्ति देशी नरेशों को प्रदान करके राज्यों की प्रजा के हितों की अवहेलना की गयी थी।
  4. कांग्रेस चाहती थी कि युद्धकाल में ही भारत में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना हो, परन्तु युद्धकाल में ब्रिटेन तनिक भी शक्ति का परित्याग नहीं करना चाहता था।

प्रश्न 8.
शिमला सम्मेलन क्यों बुलाया गया था ? यह क्यों असफल रहा ?
उत्तर:
शिमला सम्मेलन-लार्ड वैवेल ने घोषणा की कि 25 जन, 1945 को शिमला में एक सम्मेलन होगा। सम्मेलन में तय हुआ कि केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल मिला-जुला होगा तथा उसमें 14 मन्त्री होंगे। इसमें 5 कांग्रेस, 5 लीग तथा 4 वायसराय द्वारा मनोनीत होंगे। वायसराय ने कांग्रेस तथा लीग को 8 से 12 नाम देने को कहा। कांग्रेस ने जो सूची वायसराय को भेजी, उसमें दो सदस्य मुस्लिम थे। परन्तु जिन्ना चाहते थे कि मुसलमान प्रतिनिधि लीग के सदस्यों में से ही लिये जायें। इसका कारण यह था कि जिन्ना कांग्रेस को हिन्दू संस्था सिद्ध करके, लीग को भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था होने का दावा करना था।

लीग के असहयोग के कारण शिमला सम्मेलन असफल हुआ। सम्मेलन की असफलता का कारण जिन्ना का हठधर्मी होना था।

प्रश्न 9.
भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता के कारण-भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता के कारण निम्नलिखित थे –

  1. ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रीय नेताओं को अचानक गिरफ्तार कर लिया था।
  2. भारत छोड़ो आन्दोलन में योजना तथा संगठन का भी अभाव था।
  3. इस आन्दोलन की रूपरेखा तथा स्वरूप भी स्पष्ट नहीं था।
  4. ब्रिटिश सरकार की दमन नीति अत्यधिक कठोर थी।
  5. आन्दोलनकारियों के पास समुचित हथियारों तथा धन का भी अभाव था।

प्रश्न 10.
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस एक निर्भीक योद्धा थे और उनका स्थान विश्व के महानतम देश भक्तों में है। दिसम्बर 1940 में वे गुप्त रूप से देश छोड़कर निकल गये। वे मार्च 1941 में वायुयान द्वारा काबुल से बर्लिन पहुँच गये। देश से भाग निकलने तथा पेशावर और काबुल होकर जर्मनी जा पहुँचने की कहानी उनके साहसपूर्ण कार्य की वीरगाथा है। जून 1943 में बोस जापान जा पहुँचे। 5 जुलाई, 1943 को उन्होंने आजाद हिन्द फौज के गठन की घोषणा की। उस समय उसमें 60 हजार से कुछ अधिक भारतीय शामिल थे। उनका युद्ध-घोष था ‘दिल्ली चलो’। 21 अक्टूबर, 1943 को बोस ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की। सुभाषचन्द्र बोस ने ही हिन्दुस्तान को ‘जय हिन्द’ का जयघोष दिया। उनके राजनीतिक जीवन में यह कथन अत्यधिक रोचक है, ‘जो व्यक्ति एक समय स्वराज दल का सक्रिय सदस्य था वह देश की स्वाधीनता के लिए आजाद हिन्द फौज का महासेनानायक बन गया।

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय स्वाधीनता अधिनियम क्या है ? इसके प्रमुख प्रावधानों को लिखिए। (2009, 17)
उत्तर:
भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम, 1947

माउण्टबेटन की योजनानुसार सरकार ने हस्तान्तरण की कार्यवाही को पूर्ण करने के लिए भारतीय स्वाधीनता अधिनियम’ का प्रारूप तैयार किया। प्रारूप को कांग्रेस और लीग के अनुमोदन के लिए भेजा गया। अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात् विधेयक को ब्रिटिश संसद ने पारित किया गया। 18 जुलाई, 1947 को इसने अधिनियम का रूप लिया।

प्रमुख प्रावधान – भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम में कुल 20 धाराएँ तथा दो परिशिष्ट थे। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे –

  1. 15 अगस्त, 1947 ई. को भारत तथा पाकिस्तान नामक दो स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना की जायेगी। ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें सत्ता भी सौंप दी जायेगी।
  2. सिन्ध, उत्तर-पूर्वी सीमा प्रान्त, पश्चिमी पंजाब, बलूचिस्तान तथा असम का सिलहट जिला पाकिस्तान में तथा शेष भाग भारत में रहेगा।
  3. दोनों राज्यों की विधान सभाएँ अपने-अपने संविधानों का निर्माण करेंगी।
  4. दोनों राज्यों में नवीन संविधानों के निर्माण तक शासन 1935 ई. के अधिनियम के अनुसार चलता रहेगा।
  5. भारत तथा पाकिस्तान दोनों को राष्ट्र-मण्डल के सदस्य बने रहने या छोड़ने की भी स्वतन्त्रता होगी।
  6. 15 अगस्त, 1947 ई. से भारत सचिव का पद समाप्त कर दिया जायेगा।
  7. 15 अगस्त, 1947 ई. के पश्चात् ब्रिटिश शासन का दोनों राज्यों पर कोई अधिकार तथा नियन्त्रण नहीं रहेगा।
  8. भारतीय रियासतों को भारत अथवा पाकिस्तान दोनों में से किसी भी देश में सम्मिलित होने का अधिकार होगा।
  9. भारत तथा पाकिस्तान दोनों के लिए एक-एक गवर्नर जनरल होगा। गवर्नर जनरल की नियुक्ति उनके मन्त्रिमण्डल के परामर्श से की जायेगी।

प्रश्न 2.
बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजों के क्या उद्देश्य थे? बंगाल विभाजन का राष्ट्रीय आन्दोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
‘बंग-भंग’ आन्दोलन के प्रभाव लिखिए। (2009)
उत्तर:

बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजों के निम्नलिखित उद्देश्य थे –

  1. ब्रिटिश सरकार के अनुसार बंगाल विभाजन का प्रमुख उद्देश्य बंगाल के प्रशासन को सुधारना था। लार्ड कर्जन के मत में बंगाल एक विशाल प्रान्त था, अतः समुचित प्रशासनिक संचालन के लिए उसका विभाजन करना आवश्यक था।
  2. बंगाल विभाजन का अन्य उद्देश्य बंगाल की संगठित राजनीतिक भावना को समाप्त करना तथा राष्ट्रीयता के वेग को कम करना था।
  3. इतिहासकारों के अनुसार बंगाल विभाजन का प्रमुख उद्देश्य जनता में फूट डालना था। पूर्वी बंगाल में मुसलमानों का बहुमत तथा पश्चिमी भाग में हिन्दुओं का बहुमत रखना जिससे हिन्दू-मुस्लिम एकता समाप्त हो जाए।

बंग-भंग और स्वदेशी आन्दोलन के प्रभाव

1905 के बंगाल विभाजन के दूरगामी परिणाम सामने आये जिनके कारण भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक नई दिशा मिली। इसक प्रमुख प्रभाव इस प्रकार थे –
(1) बंगाल विभाजन से न केवल बंगालियों में रोष उत्पन्न हुआ वरन् सम्पूर्ण राष्ट्र ने इसे अपना अपमान समझा। 16 अक्टूबर, 1905 ई. में बंगाल का विभाजन जब सरकारी रूप में मनाया गया तो राष्ट्रीय नेताओं ने सशक्त शब्दों में इसका विरोध किया। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कहा, “बंगाल का विभाजन हमारे ऊपर बम की तरह गिरा। हमने समझा कि हमारा घोर अपमान किया गया है।”

(2) भारतीय जनता ने बंगाल के विभाजन के विरोध में देश भर में अनेक सभाओं का आयोजन किया। सरकार ने भी क्रूरतापूर्वक दमन चक्र चलाया जिसका उत्तर जनता ने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करके तथा स्वदेशी आन्दोलन चलाकर दिया। स्थान-स्थान पर विदेशी कपड़ों की होली जलायी गयी।

(3) राष्ट्रीय शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया तथा सरकारी शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार किया गया। इसके अतिरिक्त स्वतन्त्र राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की गयी।

(4) बंगला विरोधी आन्दोलन ने शिक्षा संस्थाओं के अतिरिक्त शिक्षा स्वदेशी उद्योगों की स्थापना के भी प्रयत्न किये जिससे व्यापारिक जनता तथा श्रमिकों में भी राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ।

(5) बंगाल के विभाजन से बौद्धिक वर्ग में जागृति उत्पन्न हुई। कांग्रेस के बुद्धिजीवियों में उग्रता की भावना तीव्र हुई तथा वे पूर्णतया सरकार विरोधी हो गये। लाल-बाल-पाल राष्ट्रीय जन-नेता के रूप में उभरे।

(6) बंगाल के विभाजन के पश्चात् ही कांग्रेस उदारवादियों तथा उग्रराष्ट्रवादियों में विभाजित हो गयी। इसके अतिरिक्त देश में उग्रराष्ट्रवादी आन्दोलन भी प्रारम्भ हो गये। ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के विरोध में देश के नवयुवकों ने संगठित होकर क्रांतिकारी गतिविधियाँ प्रारम्भ कर दी।

(7) बंग-भंग विरोधी आन्दोलन को मिले व्यापक जन-समर्थन से ब्रिटिश सरकार घबरा गयी, अतः हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने के लिए मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन देना आरम्भ कर दिया। अन्य शब्दों में, “फूट डालो तथा राज्य करो” की नीति को प्रारम्भ किया।

(8) बंगाल-विभाजन के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया होने के कारण ब्रिटिश सरकार को इसे 1911 ई. में रद्द करना पड़ा जिससे कांग्रेस के उग्रराष्ट्रवादियों की प्रतिष्ठा बढ़ी।

कर्जन के छ: वर्ष के लम्बे शासनकाल में स्वाधीनता आन्दोलन की दिशा वास्तविक रूप में बदल दी।

स्वदेशी आन्दोलन उपनिवेशवाद के विरुद्ध भारतीयों का पहला सशक्त राष्ट्रीय आन्दोलन था। इसी के साथ भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की नई चेतना का विकास हुआ।

प्रश्न 3.
‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ का वर्णन कीजिए।
अथवा
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का क्या अभिप्राय है ? इसके कार्यक्रम एवं महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सन् 1930 ई. में लाहौर में हुए अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता को अपना लक्ष्य घोषित किया और गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का निश्चय किया गया। गांधीजी ने इस आन्दोलन में निम्न प्रमुख कार्यक्रम रखे –

  1. जगह-जगह नमक कानून तोड़कर नमक बनाया जाए।
  2. सरकारी कर्मचारी सरकारी नौकरियाँ को त्याग दें और छात्र सरकारी स्कूल-कॉलेजों का बहिष्कार करें।
  3. विदेशी वस्त्रों को त्याग कर उनकी होली जलायी जाए।
  4. स्त्रियाँ शराब, अफीम और विदेशी कपड़े की दुकानों पर धरना दें।
  5. जनता सरकार को कर न दे।

गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का शुभारम्भ कानून का उल्लंघन कर किया। 12 मार्च, 1930 को गांधीजी ने डाण्डी के लिए प्रस्थान किया और वहाँ 5 अप्रैल को पहँचे। यह घटना ‘डाण्डी-यात्रा’ के नाम से प्रसिद्ध है। मार्ग में जनता ने सत्याग्रहियों का अभूतपूर्व स्वागत किया। वहाँ उन्होंने नमक कानून तोड़ा। इस प्रकार देश में नमक कानून भंग करने का आन्दोलन चल पड़ा। आम जनता ने भी नमक कानून का उल्लंघन किया। यह सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ था। हिन्दुस्तान के सभी भागों में लोगों ने सरकारी कानूनों को भंग करना शुरू किया। स्त्रियों ने भी पर्दा छोड़कर इस आन्दोलन में भाग लिया। किसानों में भी सरकार को कर देने से इन्कार कर दिया। विदेशी कपड़े का बहिष्कार हुआ।

5 मार्च, 1931 को गांधीजी का वायसराय इरविन से समझौता हो गया और गांधीजी ने आन्दोलन स्थगित कर दिया। नवम्बर, 1931 ई. में गांधीजी ने कांग्रेस की ओर से लन्दन में द्वितीय गोलमेल सम्मेलन में भाग लिया और भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता की माँग की, परन्तु ब्रिटिश शासन ने उनकी माँग को स्वीकार नहीं किया। अत: 1932 ई. में कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में पुनः सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू किया। सरकार ने दमन-चक्र तेज किया। एक लाख से अधिक व्यक्ति गिरफ्तार हुए। 1934 ई. में गांधीजी ने आन्दोलन को समाप्त कर दिया।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन का महत्त्व

यह सत्य है कि असहयोग आन्दोलन की तरह सविनय अवज्ञा आन्दोलन भी बीच में ही स्थगित कर दिया गया था जिससे जनता में कुछ निराशा फैली, परन्तु इस आन्दोलन ने कांग्रेस की शक्ति को भी बढ़ाया। जनता ने गांधीजी के नेतृत्व में अपार कष्टों को सहन किया तथा उनके आदेशों का पालन आँख मींचकर किया। ब्रिटिश सरकार को भी इस बार गांधीजी के व्यक्तित्व ने प्रभावित किया और वह समझ गयी कि उनके पीछे एक अपार जन बल है। इस आन्दोलन ने गांधीजी को एक विश्वविख्यात राजनीतिज्ञ बना दिया।

प्रश्न 4.
भारत छोड़ो आन्दोलन क्यों प्रारम्भ हुआ ? यह असफल क्यों हुआ ?
अथवा
भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता के क्या कारण थे? कोई पाँच कारण लिखिए। (2017)
उत्तर:
क्रिप्स मिशन के असफल हो जाने से तथा क्रिप्स के द्वारा कांग्रेस को असफलता के लिए उत्तरदायी ठहराये जाने के कारण भारतीय जनता में अत्यन्त असन्तोष तथा निराशा की भावना उत्पन्न हुई। क्रिप्स मिशन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार साम्प्रदायिकता के पक्ष को लेकर भारत को स्वतन्त्रता प्रदान नहीं करेगी। अन्य शब्दों में क्रिप्स मिशन का उद्देश्य भारत को स्वतन्त्रता प्रदान करना नहीं था, अत: भारत की स्वतन्त्रता के लिए भारत छोड़ो आन्दोलन चलाना आवश्यक हो गया।

आन्दोलन की असफलता के कारण

भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता के निम्न कारण थे –

  1. संगठन तथा निश्चित योजना का अभाव-भारत छोड़ो आन्दोलन आरम्भ करने से पूर्व महात्मा गांधी ने इसकी कोई स्पष्ट योजना नहीं बनायी थी कि इसे किस प्रकार संचालित किया जायेगा। अन्य शब्दों में किसी भी आन्दोलनकारी को यह ज्ञात नहीं था कि उन्हें क्या करना है ?
  2. ब्रिटिश शासन का शक्तिशाली होना-भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता का अन्य प्रमुख कारण ब्रिटिश शासन का आन्दोलनकारियों की अपेक्षा अत्यधिक शक्तिशाली होना था। आन्दोलनकारियों के पास धन तथा अस्त्र-शस्त्रों का अभाव था, अतः उन्हें बिन अस्त्र-शस्त्र के पुलिस तथा सेना का सामना करना पड़ता था।
  3. राष्ट्रीय नेताओं को बन्दी बनाया जाना–भारत छोड़ो आन्दोलन के प्रारम्भ होते ही ब्रिटिश सरकार ने प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं को अचानक गिरफ्तार कर लिया था जिससे जनता समुचित मार्ग-दर्शन प्राप्त नहीं कर सकी तथा आन्दोलन को गहरा आघात लगा।
  4. मुस्लिम लीग की राजनीति-मुस्लिम लीग ने मुसलमानों को आन्दोलन से पृथक् रहने का परामर्श दिया जिससे मुसलमानों ने आन्दोलन में भाग नहीं लिया। इससे भी आन्दोलन पर गहरा आघात लगा।
  5. कठोर दमन चक्र-ब्रिटिश शासन ने भारत छोड़ो आन्दोलन का अत्यन्त क्रूरता तथा कठोरता के साथ दमन किया। पुलिस तथा सेना ने लाखों व्यक्तियों को बन्दी बनाया तथा हजारों व्यक्तियों को गोली से भून दिया। महिलाओं को अपमानित किया गया तथा सामूहिक जुर्माने का कर कठोरतापूर्वक वसूल किया गया।
  6. साम्यवादी दल का अलग रहना-साम्यवादी दल ने इस आन्दोलन से अपने को पूर्णतया पृथक् रखा क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड तथा रूस दोनों ने मिलकर जर्मनी तथा जापान की फासिस्ट शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष किया था। ऐसी दशा में भारतीय कम्युनिस्ट रूस के मित्र ब्रिटेन का विरोध नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन से अपने को दूर रखा।
  7. राजकीय सेवाओं तथा उच्च वर्गका ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठावान होना-भारत छोड़ो आन्दोलन के समय ब्रिटिश शासन के राजकीय कर्मचारियों तथा पदाधिकारियों ने पूर्णतया वफादारी के साथ इस आन्दोलन को कुचलने में सहयोग दिया था। देशी राजाओं तथा जमींदार वर्ग ने भी इस आन्दोलन का विरोध किया था।

प्रश्न 5.
स्वतन्त्रता आन्दोलन में गांधीजी के योगदान का वर्णन कीजिए।
अथवा
महात्मा गांधी का राष्ट्रीय आन्दोलन में क्या योगदान था ?
उत्तर:
भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गांधी का योगदान भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में महात्मा गांधी का स्थान सर्वोच्च है। गांधीजी ने भारत के स्वाधीनता संघर्ष को अहिंसा व सत्याग्रह के आधार पर चलाया। उनका कहना था कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही स्वराज हासिल किया जा सकता है। अंग्रेजों के प्रति असन्तोष प्रकट करने के लिए उन्होंने असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आन्दोलन आदि शुरू किये। इन आन्दोलनों ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी।

1914 में गांधीजी भारत लौटे और आते ही भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में कूद पड़े। अहमदाबाद में साबरमती के किनारे एक आश्रम की स्थापना की और बिहार के चम्पारन जिले से किसानों की रक्षा के लिए गोरे कोठीवालों के अत्याचारों के विरुद्ध छोटे पैमाने पर सत्याग्रह किया। इसमें उन्हें पर्याप्त सफलता मिली। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों के सामने पराधीन भारत की करुणावस्था का चित्र खींचा और देश के उत्थान हेतु कमर कसने के लिए लोगों को प्रेरित किया। भयभीत जनता को उन्होंने निर्भय बनाया। उन्हीं के प्रयासों से राष्ट्रीय आन्दोलन एक जन-आन्दोलन बन सका।

प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् 1919 ई. में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पास किया जिसका उद्देश्य भारतीयों को दबाना था। गांधीजी के आह्वान पर हिन्दू-मुसलमान इस एक्ट के विरोध में एकजुट हो गये। गांधीजी ने खिलाफत आन्दोलन में पूर्ण सहयोग दिया। खिलाफत कमेटी ने भी 31 अगस्त, 1920 को असहयोग आन्दोलन छेड़ दिया। इसके नेतृत्व की बागडोर गांधीजी के हाथों में दे दी गयी। साइमन कमीशन के विरोध में 1930 ई. में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ किया गया। 12 मार्च, 1930 को डाण्डी यात्रा से गांधीजी ने दूसरे सविनय अवज्ञा आन्दोलन का सूत्रपात किया। दूसरी गोलमेज परिषद में गांधीजी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया और वहाँ यह दावा किया कि कांग्रेस सम्पूर्ण देश और समस्त हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है।

कांग्रेस ने गांधी के नेतृत्व में बम्बई में 8 अगस्त को ‘भारत छोड़ो’ के ऐतिहासिक प्रस्ताव को पारित किया। गांधीजी ने इस प्रस्ताव पर बोलते हुए भारतीय जनता को ‘करो या मरो’ का सन्देश दिया। 9 अगस्त, 1942 को गांधीजी तथा कार्य-समिति के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया। इन आन्दोलनों ने भारत में अंग्रेजी राज्य की नींव हिला दी और अन्त में 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हो गया।

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