MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण समय ज्ञान-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण समय ज्ञान-प्रकरण

घड़ी के चित्र की सहायता से अंकों के स्थान पर संस्कृत में शब्दों में समय लिखना

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण संख्या बोध प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण संख्या बोध प्रकरण

♦ १ से १०० तक संस्कृत में संख्याएँ

१. एकम्
२. द्वे
३. त्रीणि
४. चत्वारि
५. पञ्च
६. षट्
७. सप्त
८. अष्ट, अष्टौ
९. नव
१०. दश्
११. एकादश
१२. द्वादश
१३. त्रयोदश
१४. चतुर्दश
१५. पञ्चदश
१६. षोडश
१७. सप्तदश
१८. अष्टादश
१९. नवदश, एकोनविंशतिः, ऊनविंशतिः, एकान्नविंशतिः
२०. विंशतिः
२१. एकविंशतिः
२२. द्वाविंशतिः
२३. त्रयोविंशतिः
२४. चतुर्विंशतिः
२५: पञ्चविंशतिः
२६. षड्विंशतिः
२७. सप्तविंशतिः
२८. अष्टाविंशतिः
२९. नवविंशति, एकोनत्रिंशत्, ऊनत्रिंशत्, एकान्नत्रिंशत
३०. त्रिंशत्
३१. एकत्रिंशत्
३२. द्वात्रिंशत्
३३. जयास्त्रशत्
३४. चतुस्त्रिंशत्
३५. पञ्चत्रिंशत्
३६. षट्त्रिंशत्
३७. सप्तत्रिंशत्
३८. अष्टात्रिंशत्
३९. नवत्रिंशत्, एकोनचत्वारिंशत्, ऊनचत्वारिंशत्, एकान्नचत्वारिंशत्
४०. चत्वारिंशत्
४१. एकचत्वारिंशत्
४२. द्विचत्वारिंशत्, द्वाचत्वारिंशत्
४३. त्रिचत्वारिंशत्, त्रयश्चत्वारिंशत्
४४. चतुश्चत्वारिंशत्
४५. पञ्चत्वारिंशत्
४६. षट्चत्वारिंशत्
४७. सप्तचत्वारिंशत्
४६. अष्टचत्वारिंशत्, अष्टाचत्वारिंशत्
४९. नवचत्वारिंशत्, एकोनपंचाशत्, ऊनपञ्चाशत्, एकान्नपञ्चाशत्
५०. पञ्चाशत्
५१. एकपञ्चाशत्
५२. द्विपञ्चाशत, द्वापञ्चाशत्
५३. त्रिपञ्चाशत्, त्रय:पञ्चाशत्
५४. चतुश्पञ्चाशत्
५५. पञ्चपञ्चाशत्
५६. षट्पञ्चाशत्
५७. सप्तपञ्चाशत्
५८. अष्टपञ्चाशत्, अष्टापञ्चाशत्
५९. नवपञ्चाशत्, एकोनषष्टिः, ऊनषष्टिः, एकान्नषष्टिः
६०. षष्टिः
६१. एकषष्टिः
६२. द्विषष्टिः, द्वाषष्टिः
६३. त्रिषष्टिः, त्रयःषष्टिः
६४. चतुःषष्टिः
६५. पञ्चषष्टिः
६६. षट्षष्टिः
६७. सप्तषष्टिः
६८. अष्टषष्टिः, अष्टाषष्टिः
६९. नवषष्टि, एकोनसप्ततिः, ऊनसप्ततिः, एकान्नसप्तपिः
७०. सप्ततिः
७१. एकसप्ततिः
७२. द्विसप्ततिः, द्वासप्ततिः
७३. त्रिसप्ततिः, त्रयसप्ततिः
७४. चतुस्सप्ततिः
७५. पञ्चसप्ततिः
७६. षट्सप्ततिः
७७. सप्तसप्ततिः
७८. अष्टसप्ततिः, अष्टासप्ततिः
७९. नवसप्ततिः, एकोनाशीतिः, ऊनाशीतिः, एकान्नाशीतिः
८०. अशीतिः
८१. एकाशीतिः
८२. द्वयशीतिः
८३. त्रयशीतिः
८४. चतुरशीतिः
८५. पञ्चाशीतिः
८६. षड्शीतिः
८७. सप्ताशीतिः
८८. अष्टाशीतिः
८९. नवशीतिः, एकोननवतिः, ऊननवतिः, एकान्नवतिः
९०. नवतिः
९१. एकनवतिः
९२. द्विनवतिः, द्वानवतिः
९३. त्रिनवतिः, त्रयोनवतिः
९४. चतुर्नवतिः
९५. पञ्चनवतिः
९६. षण्णवतिः
९७. सप्तनवतिः
९८. अष्टनवतिः, अष्टानवतिः
९९. नवनवतिः, एकोनशत्
१००. शतम्

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संख्यावाचक विशेषण
संख्यावाचक विशेषण अपने विशेष्य के लिंग, वचन और कारक के अनुसार प्रयुक्त होते हैं। अतः संख्यावाचक विशेषणों (संख्याओं) के रूप भी तीनों लिंगों में अलग-अलग चलते एक से चार तक (एकद्व, द्वि, त्रि, चतुर) संख्या शब्दों के रूप तीनों लिंगों में अलग-अलग चलते हैं। ‘एक’ शब्द के रूप केवल एकवचन में और ‘द्वि’ शब्द के रूप केवल द्विवचन में ही चलते हैं। तीन से अठारह तक सभी संख्यावाची शब्दों के रूप केवल बहुवचन में ही चलते हैं।

संख्यावाचक शब्दरूप “एक” शब्द
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निर्देश-‘एक’ शब्द के रूप तीनों लिगों में केवल एकवचन – में ही होते हैं।
“द्वि” (दो) शब्द
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निर्देश-‘द्वि’ शब्द के रूप तीनों लिंगों में द्विवचन ही होते है हैं तथा इसके रूप स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग में समान होते हैं।
“त्रि” (तीन) शब्द
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निर्देश-‘त्रि’ शब्द के रूप केवल बहुवचन में ही होते हैं।
“चतुर” (चार) शब्द
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निर्देश-‘चतुर’ शब्द के रूप केवल बहुवचन में ही होते हैं।
“पञ्चन्” (पाँच) शब्द
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निर्देश-एक से चार संख्या तक रूप तीनों लिंगों में होते हैं परन्तु पाँच से लेकर आगे के रूप लिंगों में एक समान ही होते हैं।

वाक्य प्रयोग

हिन्दी – संस्कृत
१. एक बालक पढ़ता है। – एकः बालकः पठति।
२. एक पुस्तक है। – एकम् पुस्तकम् अस्ति।
३. दो बालिकाएँ पढ़ती हैं। – द्वे बालिके पठतः।
४. तीन बच्चे पढ़ते हैं। – त्रयः बालकाः पठिन्तः।
५. तीन पुस्तकें हैं। – त्रीणि पुस्तकानि सन्ति।
६. चार बालिकाएँ पढ़ती हैं। – चतस्त्रः बालिकाः पठन्ति।
७. चार पुस्तकें हैं। – चत्वारि पुस्तकानि सन्ति।
८. पाँच पुस्तकें हैं। – पञ्च पुस्तकानि सन्ति।

विशेष-उपयुक्त उदाहरणों को देखने पर यह स्पष्ट है कि एक से चार तक संख्यावाचक शब्दों के रूप तीनों लिंगों (पुल्लिग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग) में बनते हैं तथा पाँच से आगे के रूपों में लिंग का कोई परिवर्तन नहीं है। उनके रूप तीनों लिंगों में एक समान ही रहते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न १.
‘एकः बालकः क्रीडति’ वाक्य में एक किस लिंग का है?
(अ) पुल्लिग,
(ब) स्त्रीलिंग,
(स) नपुंसकलिंग,
(द) कोई नहीं।
उत्तर-
(अ) पुल्लिग,

२. ‘द्वि’ शब्द का स्त्रीलिंग प्रथमा विभिक्त में रूप होगा
(अ) द्वौ,
(ब) द्वे,
(स) द्वाभ्याम्,
(द) द्वयोः
उत्तर-
(ब) द्वे,

३. ‘त्रि’ शब्द नपुंसकलिंग प्रथमा विर्भाक्त में होगा
(अ) त्रीणि
(ब) त्रयः,
(स) तिस्रः,
(द) त्रिभिः
उत्तर-
(अ) त्रीणि

४. ‘चतुर्’ पुल्लिंग प्रथमा विभक्ति में है(अ) चत्वारि,
(ब) चतस्रः,
(स) चतुर्भिः
(द) चत्वारः
उत्तर-
(द) चत्वारः

५. ‘पञ्च’ प्रथमा विभक्ति का रूप होगा-
(अ) पञ्च,
(ब) पञ्चभिः
(स) पञ्चभ्यः,
(द) पञ्चानाम्।
उत्तर-
(अ) पञ्च,

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रिक्त स्थान पूर्ति
१. …………………………………. बालकः।
२. …………………………………. पुस्तकम्।
३. …………………………………. “बालिके।
४. …………………………………. “बालिकाः।
५. …………………………………. पुस्तकानि।
उत्तर-
१. एकः,
२. एकम्,
३. द्वे,
४. चतस्रः,
५. पञ्च।

सत्य/असत्य
१. एकः बालिकाः।
२. द्वौ रामौ।
३. त्रीणि कमलानि।
४. पञ्च बालकाः।
५. एका पुस्तकम्।
उत्तर-
१. असत्य,
२. सत्य,
३. सत्य,
४. सत्य,
५. असत्य।

जोड़ी मिलाइए
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उत्तर-
१. → (v)
२. → (i)
३. → (ii)
४. → (iii)
५. → (iv)

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण अव्यय-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण अव्यय-प्रकरण

अव्यय (अविकारी शब्द) की परिभाषा संस्कृत में निम्न प्रकार से दी गयी है

सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु व विभक्तिषु।
वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम्॥

अर्थात् जिन शब्दों में लिंग, कारक और वचन के कारण किसी प्रकार का परिवर्तन (विकार) नहीं होता और जो प्रत्येक दशा में एक समान रहते हैं, उन्हें अव्यय शब्द कहते हैं।

अव्ययों के भेद-
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१. उपसर्ग
प्र, परा, अप इत्यादि २२ शब्दांशों को उपसर्ग कहते हैं। इनका वर्णन आगे के प्रकरण में किया जायेगा।

२. क्रिया विशेषण
जिन शब्दों से क्रिया के काल, स्थान आदि विशेषताओं का बोध होता है, उन्हें क्रिया विशेषण कहते हैं।
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३. चादि
च, वा, भूयः, खलु, तु, वै, मा, न इत्यादि।
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४. समुच्चय बोधक
अथ, उत, चेत्, नोचेत् इत्यादि।
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५. विस्मयादि बोधक
अहह, अहो, बत, हा, अरे, रे इत्यादि।
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण अव्यय-प्रकरण img 5

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न १.
‘अहम् अपि आपणं गच्छामि’ में अव्यय है
(अ) अहम्,
(ब) अपि,
(स) आपणं,
(द) गच्छामि।

२. ‘इव’ अव्यय का उचित वाक्य-प्रयोग होगा
(अ) अहम् इव करोमि,
(ब) बालक: व्याघ्र इव अस्ति,
(स) सः विद्यालयः इव धावति,
(द) रामेशः कन्दुकेन इव क्रीडति।

३. ‘त्वं कदा गृहम् आगमिष्यसि?’ में अव्यय पद है
(अ) त्वं,
(ब) कदा,
(स) गृहम्,
(द) आगमिष्यसि।

४. ‘अद्य’ अव्यय का हिन्दी अर्थ होता है
(अ) आज,
(ब) कल,
(स) परसों,
(द) तरसों।

५. ‘कुतः’ अव्यय का उचित वाक्य प्रयोग होगा
(अ) तत् पुस्तकं कुतः अस्ति,
(ब) यथा कुतः राजा तथा प्रजा,
(स) त्वं कुतः आगच्छसि?
(द) रामः कुतः पुरुषोत्तमः आसीत्।
उत्तर-
१. (ब),
२. (ब),
३. (ब),
४. (अ),
५. (स)

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रिक्त स्थान पूर्ति
१. यथा राजा ………………. प्रजा।
२. रामेण सह सीता ……………..”” अगच्छत्।
३. विद्यालये………………” उत्सवः भविष्यति।
४ सदाचारः ……………….. परमोधर्म।
५. कच्छपः …. चलति।
उत्तर-
१. तथा,
२. अपि,
३. श्वः,
४. एव,
५. शनैः

सत्य/असत्य
१. अपि का अर्थ कहाँ।
२. च का अर्थ है और।
३. कुतः का अर्थ है कहाँ से।
४. इव का अर्थ है कौन।
५. एव का अर्थ है ही।
उत्तर-
१. असत्य,
२. सत्य,
३. सत्य,
४. असत्य,
५. सत्य

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जोड़ी मिलाइए ‘क’
उत्तर-
१. → (iii)
२. → (i)
३. → (v)
४. → (ii)
५. → (iv)

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण कारक एवं उपपद विभक्ति प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण कारक एवं उपपद विभक्ति प्रकरण

कारक-“साक्षात् क्रियान्वयित्वं कारकम्” अर्थात् जिस शब्द का क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध होता है, वह कारक कहलाता है।

हिन्दी में विभक्तियाँ (कारक) आठ होती हैं। संस्कृत में सम्बोधन को प्रथमा विभक्ति के अंतर्गत ही मानते हैं। इसलिए संस्कृत में विभक्तियाँ सात हुईं। संस्कृत में कारकों की संख्या छ: मानी गई है। षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक) को कारकों की संख्या में नहीं रखते हैं क्योंकि षष्ठी विभक्ति का क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं होता है।

जैसे-
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इस वाक्य में ‘जाता है’ (क्रिया) से सीधा सम्बन्ध भाई। (कर्ता) का है न कि राम का। राम का सम्बन्ध तो भाई से है, ‘जाता है’ (क्रिया) से उसका सीधा सम्बन्ध नहीं है। इसलिए राम (सम्बन्ध) को ‘कारक’ नहीं कहेंगे। अतः संस्कृत में कारक छ: ही होते हैं तथा विभक्तियाँ सात होती हैं। कारक और विभक्ति में यही अन्तर होता है।

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कर्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च।
अपादानाधिकरणमित्साहुः कारकाणि षट्॥

हम कारकों को सरल रूप में निम्न चित्र के माध्यम से समझ सकते हैं-
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♦ कारक चिह्न

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१. कर्ता कारक (प्रथमा विभक्ति)
क्रिया के करने वाले को कर्ता कहते हैं अर्थात् वाक्य में जिस संज्ञा का सर्वनाम शब्द को कार्य करने वाला या होने वाला समझा जाए, उसे कर्ता कहते हैं। कर्ता में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।

जैसे-

  • रामः पठति। राम पढ़ता है।
  • गीता नृत्यति। गीता नाचती है।

२. कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)
जिस पर क्रिया का फल पड़ता हो, उसे ‘कर्म’ कहते हैं। अथवा कर्ता जिसको सबसे अधिक चाहता है, उसे ‘कर्म’ कहते हैं। ‘कर्म कारक’ में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।

जैसे-

  • सुरेशः जलं पिबति। सुरेश पानी पीता है।
  • बालकः चित्रं पश्यति। बच्चा चित्र देखता है।

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उपपद विभक्ति
अभितः, परितः, समया, निकषा, हा, प्रति, विना इत्यादि शब्दों का प्रयोग होने पर द्वितीया विभक्ति होती है-

जैसे-

  • ग्रामं अभितः वनम् अस्ति। गाँव के चारों ओर वन है।।
  • कृष्णं परितः भक्ताः सन्ति। कृष्ण के चारों ओर भक्त हैं।
  • नगरं समया नदी अस्ति। नगर के पास नदी है।

विशेष-‘विना’ इस उपपद के साथ में द्वितीया, तृतीया और पंचमी तीनों विभक्तियों में से कोई भी लगा सकते हैं।

उभयतः, सर्वतः, धिक्, उपर्युपरि, अधोऽधः इत्यादि के साथ भी द्वितीया विभक्ति होती है।

  • कृष्णम् उभयतः गोपाः सन्ति। कृष्ण के दोनों ओर ग्वाले
  • धिक् ! ज्ञानहीनम्। ज्ञानहीन को धिक्कार है।

३. करण कारक (तृतीया विभक्ति) –
कर्ता जिस वस्तु की सहायता से अपना कार्य पूरा करता है उसे ‘करण कारक’ कहते हैं। करण कारक में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।

जैसे-

  • प्रधानमंत्री विमानेन गच्छति। – प्रधानमंत्री विमान से जाते हैं।
  • अध्यापकः सुधाखण्डेन। – अध्यापक चॉकसे लिखता लिखति।
  • वृद्धः दण्डेन चलति। – बूढ़ा दण्डे से चलता है।

उपपद विभक्ति
सह, साकम्, सार्धम्, समम्-इन चारों शब्दों के योग में जिसके साथ कोई काम किया जाए, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।

जैसे-

  • पुत्रः जनकेन सह गच्छति। पुत्र पिता के साथ जाता है।
  • सीता गीतया साक्म/सार्धम्/ सीता गीता के साथ समम्/सह क्रीडति। खेलती है।

अलम् (बस), हीनः (रहित) इत्यादि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है।

जैसे-

  • अलम् विवादेन। विवाद से बस करो।
  • धनेनः हीनः नृपः न धन से रहित राजा सुशोभित नहीं शोभते। होता।

जिस अंग के कारण शरीर में कोई विकार आया हो, – उस अंगवादी शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।

जैसे-

  • भिक्षुकः पादेन खञ्जः भिखारी पैर से लंगड़ा है। अस्ति।
  • सः कर्णेन बधिरः वह कान से बहरा है। अस्ति।

पृथक् (अलग), विना (बिना), नाना (बिना) के योग में द्वितीया, तृतीया और पंचमी विभक्ति होती है।

जैसे-

  • रामेण (रामं रामात् वा) राम के बिना दशरथ विना दशरथः न अजीवत्। जीवित नहीं रहे।
  • सः मित्रेण (मित्रं मित्रात् वह मित्र से अलग वा) पृथक् स्थातुं न , नहीं रह सकता। – शक्नोति।

जिस चिह्न से कोई व्यक्ति पहचाना जाता हो उस चिह्नवाची शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।

जैसे-

  • स: जटाभिः साधुः अस्ति। वह जटाओं से साधु है।
  • भिक्षुकः नेत्रेण काणः भिखारी आँख से काना – अस्ति।

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४. सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति) : जिसके लिए कोई वस्तु दी जाए या जिसके लिए कोई कार्य। किया जाय वह सम्प्रदान कारक कहलाता है। सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।

जैसे-

  • शिक्षकः छात्राय पुस्तकं शिक्षक छात्र के लिए ददाति। पुस्तक देता है।
  • नृपः निर्धनाय धनं यच्छति। राजा निर्धन के लिए धन देता है। उपपद विभक्ति

नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण हो) स्वाहा (बलि है- देवता के लिए), स्वधा (बलि है-पितरों के लिए),। अलम् (पर्याप्त) आदि, अव्यय शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।

जैसे-

  • श्री गणेशाय नमः। श्रीगणेश को नमस्कार।
  • सर्वेभ्यः स्वस्ति। सभी का कल्याण हो।

क्रुध्यति (क्रोध करता है), द्रुह्यति (द्रोह करता है), ईय॑ति (ईर्ष्या करता है), असूयति (डाह करता है) के योग में जिसके प्रति क्रोध आदि किया जाए जिसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • दुष्टः सज्जनाय क्रुध्यति। दुष्ट सज्जन पर क्रोध करता है।
  • रामः मोहनाय द्रुह्यति। राम मोहन से द्रोह करता है।

रुच् (अच्छा लगना) के योग में जिसको अच्छा लगे, – उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • सुरेशाय मोदकं रोचते। सुरेश को लड्डू अच्छा लगता है।

स्पृहयति (चाहता है, ललचाता है) के योग में जिस वस्तु या व्यक्ति के प्रति चाह या लालच हो उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • कृपणः धनाय स्पृह्यति। कंजूस धन को चाहता है।

५. अपादान कारक (पंचमी विभक्ति)
जिस वस्तु से किसी का अलग होना पाया जाता है, उस वस्तु को अपादन संज्ञा होती है और अपादान कारक में पंचमी विभक्ति होती है।

जैसे-

  • वृक्षात् पत्रं पतति। पेड़ से पत्ता गिरता है।
  • गङ्गा हिमालयात् प्रभवति। गंगा हिमालय से निकलती उपपद विभक्ति

भय, रक्षा, प्रसाद, जुगुप्सा, विराम इत्यादि धातुओं के साथ पंचमी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • शिशुः कुक्कुरात् विभेति। बच्चा कुत्ते से डरता है।
  • धर्मः पापात् रक्षति। . धर्म पाप से रक्षा करता

६. सम्बन्ध (षष्ठी विभक्ति)
जहाँ पर दो शब्द (संज्ञा या सर्वनाम) एक-दूसरे से। (स्वामी-विवेक, जन्य-जनक,कार्य-कारक आदि) सम्बन्ध रखते हों, वहाँ पर जिस वस्तु का सम्बन्ध होता है, उसमें षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे

  • मोहनः रामस्य पुत्रः अस्ति। मोहन राम का पुत्र है।
  • देवकीः कृष्णस्य माता देवकी कृष्ण की माता थीं। – आसीत्।
  • गणेशः शिवस्य पुत्रः गणेश शिव का पुत्र है। – अस्ति।
  • लवस्य पिता रामः। लव के पिता राम थे।

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७. अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति)
जो शब्द क्रिया का आधार हो, उसे अधिकरण कारक कहते। हैं। अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है।

जैसे-

  • सिंहः वने अस्ति। सिंह वन में रहता है।
  • पक्षी वृक्षे अस्ति। पक्षी वृक्ष पर है।

८. सम्बोधन
किसी को पुकारने या सावधान करने हेतु जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है, उसे सम्बोधन कहते हैं। सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।

जैसे-

  • हे राम! तत्र गच्छ। हरे राम! वहाँ जाओ।
  • भो छात्रा:! ध्यानेन अरे छात्रो! ध्यान से सुनो। – शृणुथ।
  • हे सीते! कुत्र अस्ति ? हे सीता! कहाँ हो?

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MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण सन्धि-प्रकरण

MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण सन्धि-प्रकरण

दो या दो से अधिक वर्गों का मेल सन्धि है। दो या बहुत-से वर्णों को मिलाने से जो परिवर्तन होता है उसे सन्धि कहते हैं,

जैसे-
विद्या + अलायः = विद्यालयः। सन्धि के भेद-सन्धि के तीन भेद होते हैं
(I) स्वरः (अच्) सन्धि
(II) व्यञ्जन (हल्) सन्धि,
(III) विसर्ग सन्धि।

(I) स्वर (अच्) सन्धि
स्वर का स्वर से मेल होने पर जब स्वर में परिवर्तन होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं।
स्वर सन्धि के भेद-
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१. दीर्घ सन्धि (सूत्र-अकः सवर्णे दीर्घः)
जब हृस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ स्वरों का मेल सवर्णों से अर्थात् क्रमशः ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ के साथ होता है तो दोनों वर्गों के स्थान पर दीर्घ (आ, ई, ऊ, ऋ) स्वर हो जाता है।

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२. गुण सन्धि (सूत्र-आद्गुणः)
जब अ/आ आगे इ/ई आये तो दोनों मिलकर ए, उ/ऊ आये तो दोनों मिलकर ओ, ऋ/ऋ आये तो दोनों मिलकर अर् तथा लु आये तो अल् हो जाता है।

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३. वृद्धि-सन्धि (सूत्र-वृद्धिरेचि)
जब अ या आ के आगे ए या ऐ आये तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ हो जाता है और ओ या औ आये तो दोनों मिलकर ‘औ’ हो जाता है।

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४. यण् सन्धि (सूत्र-इकोयणचि)
जब ह्रस्व या दीर्घ इ, उ, ऋ,ल के आगे कोई असमान स्वर आ जाता है तो इ-ई को य्, उ-ऊ को व्, ऋ-ऋ को र् और लु को ल हो जाता है।
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५. अयादि सन्धि (सूत्र-एचोऽयवायाव:) 1 जब ए, ऐ, ओ, औ के आगे कोई भी स्वर आता है, तो ‘ए’ को ‘अय्’, ‘ऐ’ को ‘आय’, ‘ओ’ को ‘अव्’ और ‘औ’ को ‘आव्’ हो जाता है।
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६. पूर्वरूप सन्धि (सूत्र-एङः पदान्तादति)
जब पद के अन्त में ‘ए’ अथवा ‘ओ’ आये और उसके आगे ह्रस्व ‘अ’ आये तो वह ‘अ’ अपने पूर्व आये स्वर (ए या ओ) का ही रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार ‘अ’ का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) हो जाता है।

  • वने + अस्मिन् = वनेऽस्मिन्
  • रामो + अपि रामोऽपि
  • हरे + अव = हरेऽव
  • विष्णो + अव = विष्णोऽव

(II) व्यञ्जन (हल) सन्धिः
जो वर्ण स्वर की सहायता से उच्चारित किया जाता है वह व्यञ्जन वर्ण होता है। स्वर के बिना व्यञ्जन वर्ण का उच्चारण कठिन होता है। दो व्यञ्जन वर्ण या व्यञ्जन और स्वर के बीच में जो सन्धि होती है वह व्यञ्जन सन्धि होती है। व्यञ्जन सन्धि के अनेक भेद होते हैं, उनमें से प्रमुख निम्न हैं-

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१. श्चुत्व सन्धि (सूत्र-स्तोः श्चुनाश्चुः)
‘स्’ अथवा ‘त’ वर्ग ( त् थ् द् ध् न्) के पहले या बाद में ‘श’ अथवा ‘च’ वर्ग (च् छ् ज् झ् ञ्) के वर्ण आते हैं तो ‘स्’ को ‘श्’ तथा ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) को क्रमशः ‘च’ वर्ग (च छ् ज् झ् ञ्) हो जाता है।

  • (स् को श्) → हरिस् + शेते = हरिश्शेते
  • (त् को च्) → सत् + चरित्रम् = सच्चरित्रम्
  • (स् को श्) → दुस् + चरित्रः = दुश्चरित्रः
  • (त् को च्) → उत् + चारणम् = उच्चारणम्

२. ष्टुत्व सन्धि (सूत्र-ष्टुना ष्टुः)
‘स्’ अथवा ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) के पहले या बाद में ‘ष्’ अथवा ‘ट’ वर्ग (ट् ठ् ड् ढ् ण) के वर्ण आते हैं तो ‘स्’ को ‘ष्’ तथा ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) को क्रमशः ‘ट’ वर्ग (ट् ठ्। ड् ढ् ण्) हो जाता है।

  • (स् को ष्) → रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः
  • (स् को ) → रामस् + टीकते = रामष्टीकते
  • (द् को ड्) → उद् + डयनम् = उड्डयनम्
  • (त् को ट्) → नष् + तः = नष्टः
  • (न् को ण्) → चक्रिन् + ढौकसे = चक्रिण्ढौकसे

३. जश्त्व सन्धि
(अ) पदान्त (सूत्र-झलां जशोऽन्ते)- पद (शब्द) के अन्त में झल् वर्णों (वर्ग के प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ वर्णों) के स्थान पर अपने वर्ग का तृतीय वर्ण (जश्-ज, ब्, ग्, ड्, द्) हो जाता है।

  • [ प्रथम वर्ण (त्) को तृतीय (द्) वर्ण ] वाक् + ईशः = वागीशः
  • [ प्रथम वर्ण (च्) को तृतीय (ज्) वर्ण ] अच् + अन्तः = अजन्तः
  • [ प्रथम वर्ण (त्) को तृतीय (द्) वर्ण] चित् + आनन्द = चिदानन्दः
  • [ प्रथम वर्ण (ट्) को तृतीय (ड्) वर्ण ] षट् + एव = षडेव

(ब) अपदान्त (सूत्र-झलां जश् झशि)- अपदान्त वर्ग के प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ वर्णों के आगे यदि कोई तृतीय
या चतुर्थ वर्ण आये तो पूर्व आये वर्ण के स्थान पर अपने वर्ग का। तृतीय वर्ण हो जाता है।

  • [चतुर्थ वर्ण (ध्) को तृतीय वर्ण (द्)] वृध् + धः = वृद्धः।
  • [चतुर्थ वर्ण (घ्) को तृतीय वर्ण (ग्) ] दुध् + धम् = दुग्धम्
  • [चतुर्थ वर्ण (भ्) को तृतीय वर्ण (ब्) ] आरभ् + धम् = आरब्धम्।
  • [चतुर्थ वर्ण (ध्) को तृतीय वर्ण (द्)] समृध् + धः = समृद्धः।

४. लत्व या परसवर्ण सन्धि (सूत्र-तोलि) ‘त’ वर्ग (त् थ् द् ध् न्) के बाद ‘ल’ आने पर ‘त’ वर्ग के स्थान पर (ल) हो जाता है।।

  • (त् को ल्) तत् + लयः = तल्लयः।
  • (त् को ल्) उत् + लासः = उल्लासः
  • (त् को ल्) तत् + लीनः = तल्लीनः
  • (न् को ल) विद्वान् + लिखति = विद्वाँल्लिखित

५. छत्व सन्धि (सूत्र-शश्छोऽटि)-
यदि शब्द के अन्त में ‘त’ वर्ग के बाद ‘श्’ हो और ‘श्’। के बाद कोई स्वर अथवा य, र व् ह हो तो ‘श्’ के स्थान पर। विकल्प से ‘छ्’ हो जाता है। ‘त’ वर्ग का ‘च’ वर्ग (श्चुत्व सन्धि के अनुसार हो जाता है।

  • तत् + शिवः = तच्छिवः।
  • सत् + शीलः = सच्छीलः
  • तत् + शिला = तच्छिला
  • श्रीमत् + शंकरः = श्रीमच्छंकरः

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६. अनुस्वार सन्धि (सूत्र-मोऽनुस्वारः)
शब्द के अंत में स्थित ‘म्’ के बाद कोई व्यंजन आए, तो ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार् (-) हो जाता है किन्तु अन्त में स्वर होता है तब यह नियम नहीं लगता।

  • (म् को अनुस्वार) धर्मम् + चर = धर्मं चर
  • (म् को अनुस्वार) हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
  • (म् को अनुस्वार) कृष्णम् + वन्दे = कृष्णं वन्दे
  • (म् को अनुस्वार) , सत्यम् + वद = सत्यं वद

७. अनुनासिक सन्धि
(सूत्र-यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा)-पद के अन्त में स्पर्श व्यञ्जन (किसी वर्ग का कोई वर्ण) के बाद किसी वर्ग का पंचम वर्ग आने पर पहले वाले वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का पंचम वर्ण विकल्प से हो जाता है।

  • (क् को ङ्) दिक् + नागः = दिङ्नागः
  • (त् को न्) एतत् + मुरारिः = एतन्मुरारिः
  • (ट् को ण्) षट् + मुखः = षण्मखः

(III) विसर्ग सन्धि विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन का मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं।
नियम १. यदि विसर्ग के पश्चात् ‘च’ अथवा ‘छ’ हो तो विसर्ग के स्थान पर ‘श्’ हो जाता है।

जैसे-

  • रामः + चलति = रामश्चलति (विसर्ग को श्)
  • निः + छलः = निश्छलः (विसर्ग को श्)

नियम २. यदि विसर्ग के पश्चात् ‘न्’ अथवा ‘थ्’ हो तो विसर्ग के स्थान पर ‘स्’ हो जाता है।

जैसे-

  • नमः + ते = नमस्ते (विसर्ग को स्)
  • निः + तारः = निस्तारः (विसर्ग को स्)

नियम ३. यदि विसर्ग के पहले तथा बाद में ‘अ’ हो तो विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ हो जाता है एवं जो ‘अ’ वर्ण होता है उसका पूर्वरूप ‘5’ हो जाता है।

जैसे-

  • सः + अपि = सोऽपि (विसर्ग को ओ तथा अ को 5)
  • सः + अस्ति = सोऽस्ति (विसर्ग को ओ तथा अ को 5)

४. नियम ४. यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ हो तथा बाद में अ’ को छोड़कर कोई भी स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है।

जैसे-

  • रामः + आगतः = राम आगतः (विसर्ग का लोप)
  • सूर्यः + उदेति = सूर्य उदेति (विसर्ग का लोप)

नियम ५. यदि विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और बाद में किसी वर्ग का तृतीय, चतुर्थ या पंचम वर्ण हो, तो ‘अ’ और विसर्ग के। स्थान पर ‘ओ’ हो जाता है।

जैसे-

  • वयः + वृद्धः = वयोवृद्धः (अ और विसर्ग को ओ)
  • पुरः + हितः = पुरोहितः (अ और विसर्ग को ओ)

नियम ६. यदि विसर्ग से पहले ‘आ’ हो और विसर्ग के आगे किसी वर्ग का तृतीय, चतुर्थ, पंचम वर्ण अथवा य् र् ल् व् ह हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है।

जैसे-

  • देवाः + गच्छन्ति = देवा गच्छन्ति (विसर्ग का लोप)
  • नराः + हसन्ति = नरा हसन्ति (विसर्ग का लोप)

नियम ७. यदि अ-आ को छोड़कर अन्य किसी स्वर के आगे विसर्ग हो और विसर्ग के आगे कोई भी स्वर या वर्ग का तृतीय,। चतुर्थ, पंचम वर्ण अथवा य व र ल ह में से कोई भी अक्षर हो तोविसर्ग के स्थान पर ‘र’ हो जाता है। यदि ‘र’ के पश्चात् कोई स्वर होता है तो ‘र’ स्वर में मिल जाता है एवं व्यंजन होता है तो।  ‘र’ का ऊर्ध्वगमन (रेफ) हो जाता है।

जैसे-

  • भानुः + उदेति = भानुरुदेति (विसर्ग को र)
  • निः + जनः = निर्जनः (विसर्ग को र्)
  • दुः + आत्मा = दुरात्मा (विसर्ग को र्)
  • गुरोः + आदेशः = गुरोरादेशः. (विसर्ग को र)

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न १.
‘दीर्घ’ सन्धि है-
(अ) गणेश,
(ब) एकैकः
(स) विद्यालय,
(द) नायकः
उत्तर-
(स) विद्यालय,

प्रश्न २.
‘रमा + ईशः’ = ………………………………. होगा।
(अ) राजेश,
(ब) रामेशः
(स) रोमेशः,
(द) रमेशः
उत्तर-
(द) रमेशः

प्रश्न ३.
‘यण’ सन्धि का सूत्र है
(अ) अकः सवर्णे दीर्घः
(ब) इकोयणचि,
(स) आद्गुणः
(द) वृद्धिरेचि
उत्तर-
(ब) इकोयणचि,

प्रश्न ४.
‘उल्लासः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(अ) उल् + लासः,
(ब) उत् + लासः,
(स) उल्ला + सः,
(द) उ+ ल्लासः।।
उत्तर-
(ब) उत् + लासः,

प्रश्न ५.
‘नमस्ते’ का सन्धि-विच्छेद है
(अ) नम + ते,
(ब) नमः + ते,
(स) नम + स्ते,
(द) न + मस्ते।
उत्तर-
(ब) नमः + ते,

रिक्त स्थान पूर्ति
१. पुस्तक + आलय : = ……………………………….
२. गण + ईश : = ……………………………….
३. सदा + एव : = ……………………………….
४. सु + अस्ति = ……………………………….।
५. पवनः = ……………………………….
उत्तर-
१. पुस्तकालयः,
२. गणेशः,
३. सदैव,
४, स्वस्ति,
५. पो + अनः।

सत्य/असत्य
१. नमः + ते = नमस्ते
२. कपि + ईशः = कवीशः
३. आद्गुणः = दीर्घ सन्धि
४. एचोऽयवायावः = पूर्वरूप सन्धि
५. गिरि + ईशः = गिरीशः
उत्तर-
१. सत्य,
२. असत्य,
३. असत्य,
४. असत्य,
५. सत्य।

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♦ जोड़ी मिलाइए
MP Board Class 10th Sanskrit व्याकरण सन्धि-प्रकरण img 10
उत्तर-
१. → (iii)
२. → (iv)
३. → (i)
४. → (ii)

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MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 19 गुरुदक्षिणा

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Durva Chapter 19 गुरुदक्षिणा (पद्यम्) (रघुवंशात्)

MP Board Class 10th Sanskrit Chapter 19 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक पद में उत्तर लिखिए)।
(क) वरन्तन्तुशिष्यः कः आसीत्? (वरतन्तु का शिष्य कौन था?)
उत्तर:
कौत्सः (कौत्स)

(ख) अनर्घशीलः कः? (निश्छल व्यवहार किसका था?)
उत्तर:
रघुः (रघु का)

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(ग) वरतन्तुशिष्यः स्वार्थोपपत्तिं प्रति कीदृशः सञ्जातः? (वरतन्तु शिष्य अपने कार्य की सिद्धि के लिए कैसा हो गया?)
उत्तर:
दुर्बलाशः (निराश)

(घ) गुरुणा किम् अचिन्तयित्वा उक्तः? (गुरु ने क्या विचार न करके कहा?)
उत्तर:
अर्थकार्यम् (गरीबी को)

(ङ) रघुः कस्मात् धनं प्राप्तुम् इष्टवान्? (रघु ने किससे धन लेने की इच्छा की?)
उत्तर:
कुबेरात् (कुबेर से)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत-(एक वाक्य में उत्तर लिखिए-)
(क) रघुः कस्मात् हेमराशिम् लब्धवान्? (रघु ने किससे सुवर्ण राशि प्राप्त की?)
उत्तर:
रघुः कुबेरात् हेमराशिम् लब्धवान्। (ग्घु ने कुबेर से स्वर्ण राशि प्राप्त की।)

(ख) वरतन्तुः कौत्सं कियत् धनं याचितवान्? (वरतन्तु ने कौत्स से कितना धन माँगा?)
उत्तर:
वरतन्तुः कौत्सं चतुर्दशः कोटीः धनं याचितवान्। (वरतन्तु ने कौत्स से 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं माँगी।)

(ग) विश्वजिति अध्वरे रघुः कीदृशः सञ्जातः? (विश्वजित् यज्ञ में रघु कैसा हो गया?)
उत्तर:
विश्वजिति अध्वरे रघुः निःशेषविश्राणितकोष जातम्। (विश्वजित् यज्ञ की दक्षिणा में रघु रिक्त खजाने वाला हो गया।)

(घ) रघुः गां कीदृशीम् अमन्यत्? (रघु ने पृथ्वी को कैसा माना?)
उत्तर:
रघुः गाम् आन्तसाराम् अमन्यत्। (रघु ने पृथ्वी को सारहीन माना।)

(ङ) तौ द्वौ कस्य अभिनन्द्यसत्वौ अभूताम्? (वे दोनों किसके अभिनन्दन के पात्र हुए?)
उत्तर:
तौ द्वौ साकेतनिवासिनः जनस्य अभिनन्धसत्वौ अभूताम्। (वे दोनों साकेत (अयोध्या) में रहने वाले लोगों के अभिनन्दन का पात्र बने।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत। (नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए)
(क) रघोः समीपं कः किमर्थम् आगतः? (रघु के पास कौन और क्यों आया?)
उत्तर:
रघोः समीपं कौत्सः गुरुदक्षिणाय चतुदर्शः कोटीः सुवर्णराशिः ग्रहीतुम् आगतः। (रघु के पास कौत्स गुरु दक्षिणा के लिए 14 करोड़ स्वर्ण राशि लेने के लिए आया था।)

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(ख) कीदृशः रघुः कस्मिन् पात्रे अर्घ्यं निघाय अतिथिं प्रत्युज्जगाम? (कैसा रघु किस पात्र में अर्घ्य लेकर अतिथि के पास आया?)
उत्तर:
अनर्घशीलः यशस्वी आतिथेयः च रघुः मृण्मये पात्रे अर्घ्य निधाय अतिथिं प्रत्युजंगाम। (निश्छल व्यवहार वाला, यशस्वी और अतिथि सेवी रघु मिट्टी के पात्र में अर्घ्य लेकर अतिथि के पास गया।)

(ग) वारं-वारं प्रार्थयन्तं कौत्सं गुरुः किमुक्तवान्? (बार-बार प्रार्थना करने पर कौत्स को गुरु ने क्या कहा?)
उत्तर:
वारं-वारं प्रार्थयन्तं कौत्सं गुरुः उक्तवान् यत्-‘वित्तस्य चतस्रः दश च कोटीः मे आहर’ इति। (वार-बार प्रार्थना करने पर कौत्स को गुरु ने कहा-’14 करोड़ (स्वर्ण राशि) का धन मुझे दो।’)

प्रश्न 4.
प्रदत्तशब्दैः रिक्तस्थानानि पूरयत-(दिए गए शब्दों से रिक्त स्थान भरिए-)
(मनः, द्वावपि, मा, अर्थम्, मृण्मये)
(क) रघुः ………….. पाने अर्घ्य दत्तवान्।
(ख) तव अभिगमेन मे…………..न तृप्तम्।
(ग) ………….. अभूताम् अभिनन्यसत्वौ।
(घ) मे परिवादनवावतारः ………….. भूत्।
(ङ) रघुः कुबेरात् ………….. निष्कष्टुम् चकमे।
उत्तर:
(क) मृण्मये
(ख) मनः
(ग) द्वावपि
(घ) मा
(ङ) अर्थम्

प्रश्न 5.
यथायोग्यं योजयत्-(उचित क्रम से जोडिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 19 गुरुदक्षिणा img 1
उत्तर:
(क) 4
(ख) 5
(ग) 1
(घ) 3
(ङ) 2

प्रश्न 6.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् ‘आम्’ अशुद्धवाक्यानां समक्षम् ‘न’ इति लिखत
(शुद्ध वाक्यों के सामने ‘आम्’ तथा अशुद्ध वाक्यों के सामने ‘त्र’ लिखिए-)
(क) कुबेरः रघु धनं दत्तवान्।
(ख) रघुः हिरण्मयपात्रे कौत्साय अर्घ्यं दत्तवान्।
(ग) कौत्सः धनं स्बीकर्तुं गुरुसमीपं गतवान्।
(घ) कौत्सः गुरुदक्षिणार्थी आसीत्।
(ङ) रघुः वरतन्तुशिष्यः आसीत्।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) न
(घ) आम्
(ङ) न।

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प्रश्न 7.
अधोलिखितशब्दानां विभक्तिं वचनं च लिखत
(नीचे लिखे शब्दों के मूलशब्द, विभक्ति और वचन लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 19 गुरुदक्षिणा img 2
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 19 गुरुदक्षिणा img 3

प्रश्न 8.
अधोलिखितशब्दानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धिनाम लिखत।
(नीचे लिखे शब्दों के सन्धि-विच्छेद कर सन्धि का नाम लिखिए।)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 19 गुरुदक्षिणा img 4
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 19 गुरुदक्षिणा img 5

प्रश्न 9.
अधोलिखितशब्दानां पर्यायशब्दान् लिखत
(नीचे लिखे शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए-)
यथा- वित्तम् – धनम्
(क) अध्वरः
(ख) क्षितीशः
(ग) गुरुः
(घ) याचकः
उत्तर:
(क) अध्वरः – यज्ञः
(ख) क्षितीशः – भूपतिः
(ग) गुरुः – आचर्थ
(घ) याचकः – दक्षिणार्थी

प्रश्न 10.
अव्ययः वाक्यनिर्माणं कुरुत (अव्ययों से वाक्य बनाइए-)
यथा- अपि – अहम् अपि पठामि।
(क) इति
(ख) न
(ग) प्रति
(घ) इव
उत्तर:
(क) इति – सः कथयति-‘अहं न गच्छामि’ इति। (वह कहता है-मैं नहीं जा रहा हूँ।)
(ख) न – रामः भेजनं न खादति। (राम भोजन नहीं खाता है।)
(ग) प्रति – विद्यार्थी ग्रहं प्रति गच्छति। (विद्यार्थी घर की ओर जाता है।)
(घ) इव – सा मयूरः इव नृत्यति। (वह मोर की तरह नाचती है।)

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प्रश्न 11.
प्रदत्तश्लोकान्वयस्य पूर्ति कुरुत-(दिए श्लोक का अन्वय पूरा कीजिए)
निर्बन्धसञ्जातरुषा ………..अर्थकार्यम्………….अहं वित्तस्य चतस्रः
दश च कोटीः मे………….इति……….उक्तः
उत्तर:
निर्बन्धसञ्जातरुषा गुरुणा अर्थकाय॑म् अचिन्तयित्वा अहं वित्तस्य चतस्रः
दश च कोटीः मे आहर इति विद्यापरिसङ्खयया उक्तः। योग्यताविस्तारः

पाठे आगतानां श्लोकानां सस्वरगायनं कुरुत।
(पाठ में आए श्लोकों को सस्वर गाइए।)

रघोः अन्यान् आदर्शगुणान् अन्विष्य लिखत।
(रघु के अन्य आदर्श गुणों को ढूंढ़ कर लिखो।)

गुरुदक्षिणा पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ में ‘गुरुदक्षिणा’ पर आधारित कछ श्लोक दिए गए हैं, जिन्हें महाकवि कालिदास जी द्वारा रचित महाकाव्य ‘रघुवंश’ से लिया गया है। इनमें गुरु दक्षिणा के लिए आए कौत्स और देने वाले महाराज रघु के उदात्तभाव को दर्शाया गया। याचक आवश्यकता से अधिक नहीं लेना चाहता, पर दातां सब कुछ देना चाहता है। न लेने वाले का उदात्त भाव महाकवि द्वारा इन श्लोकों में सुन्दरता से वर्णित किया गया है।

गुरुदक्षिणा पाठ का अनुवाद

1. तमध्वरे विश्वनिति क्षितीशं निःशेषविश्राणितकोष जातम्।
उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः॥२॥

अन्वयः :
विश्वजिति अध्वरे निःशेषविश्राणितकोषजातम् तं क्षितीशम् उपात्तविधिः गुरुदक्षिणार्थी वरतन्तुशिष्यः कौत्स प्रपेदे।

शब्दार्थाः :
विश्वजिति अध्वरे-विश्वजित् यज्ञ की दक्षिणा में-as offerings in world winning sacrifice; निःशेषविश्राणितकोषजातम्-दान में दिए जाने के कारण जिसका खजाना रिक्त हो गया है।-exchequer empty on being given in charity; तं क्षितीशम्-उस रघु के पास-to that lord of earth Raghu; उपात्तविद्यः-विद्या पढ़करhaving sought education; वरतन्तुशिष्यः कौत्सः-वरतन्तु के शिष्य कौत्स-Kautsa, the disciple of Vartantu; प्रपेदे-आए-approached.

अनुवाद :
विश्वजित् यज्ञ की दक्षिणा में दिए जाने के कारण जिसका खजाना रिक्त हो गया है, उस रघु के पास विद्या पढ़कर गुरुदक्षिणा के लिए वरतन्तुशिष्य कौत्स आए।

English : Kautsa, the son of Vartantu approached Raghu who had offered every thing in charity.

2. स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात्पात्रे निधायार्थ्यमनर्घशीलः।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः प्रत्युज्जगामातिथिमातिथेयः॥२॥

अन्वययः :
अनर्घशीलः यशसा प्रकाशः आतिथेयः सः वीतहिरण्मयत्वात् मृण्मये पात्रे अर्ध्यम् निधाय श्रुतप्रकाशम् अतिथिम् प्रत्युज्जगाम्।।

शब्दार्थाः :
अनर्घशीलः-निश्छल व्यवहार/असाधारण स्वभाव वाला- fraudless conduct of extra-ordinary nature; यशसा प्रकाशः-यशस्वी-illustrious, reputed; सः-वह (रघु)-he (Raghu) वीतहिरण्मयत्वात्-सुवर्ण पात्रों के अभाव में-in the absence of golden utensils; मृण्मये पात्रे-मिट्टी के पात्र में-in earthen-wares; श्रुतप्रकाशम्-वेदाध्ययन से देदीप्यमान (कौत्स के)-illumined with the studyofvedas of Kautsa; प्रत्युज्जगाम-पास आए-approached.

अनुवाद :
निश्छल व्यवहार वाले, यशस्वी और अतिथिसेवी वह सुवर्ण पात्रों के अभाव में मिट्टी के पात्र में अर्ध्य लेकर वेदाध्ययन से देदीप्यमान् अतिथि के पास आए।

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English :
The deceitless, illustrious and hospitable king offered ‘Arghya’ in earthenwares and approached the learned guest.

3. तवाहतो नाभिगमेन तृप्तं मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे।।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा प्राप्तोऽसि सम्भावयितुं वनान्माम्॥३॥

अन्वयः :
अर्हतः तव अभिगमेन मे मनः न, तृप्तम्, किन्तु नियोगक्रियया उत्सुकम् शासितुः आज्ञया अपि आत्मना वा माम् सम्भावयितुम् वनात् प्राप्तोऽसि।

शब्दार्थाः :
अर्हतः -पूज्य के (आपके)-worthy of worship; अभिगमेन-आगमन मात्र से-by merevisit; तृप्तम्-सन्तुष्ट-satisfied; नियोगक्रियया-दान की क्रिया से-by the action of charity; उत्सुकम्-उत्सुक को (मुझ रघु को)-me who am curious, शासितुः-गुरु को-of the guru, आत्मना-स्वेच्छा से-with own desire (of your own will), सम्भावयितुम्-कृतार्थ करने के लिए-to oblige.

अनुवाद :
आप जैसे पूज्य के आने मात्र से मेरा मन सन्तुष्ट नहीं हुआ है। मैं दान का काम करने के लिए उत्सुक हूँ। क्या आप वन से अपने गुरु की आज्ञा से मुझे कृतार्थ करने आए हैं या स्वयं अपनी इच्छा से?

English :
Your visit alone has not gratified me. I have a desire to serve you with an act of charity. Have you came to oblige with your preceptors permission or of your own free will?

4. इत्यर्थ्यपात्रानुमितव्ययस्य रघोरुदारामपि गां निशम्य।
स्वार्थोपपत्ति प्रति दुर्बलाशस्तमित्यवोचद्वरतन्तुशिष्यः॥4॥

अन्वयः :
अर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य रघोः इति उदारम् अपि गाम् निशम्य वरतन्तुशिष्यः स्वार्थोपपत्तिम् प्रति दुर्बलाशः सन् तम् इति अवोचत्।

शब्दार्थाः :
अर्घ्यपात्रानुभितव्ययस्य–अर्घ्यपात्र से (यज्ञ में हुए) व्यय को व्यक्त करने act-expressing the expenditure incurred on sacrifice through Arghya vessels.; गाम्-वाणी को-speech, voice; स्वार्थोपपत्तिम्-अपनी कार्य सिद्धि में-in fulfilment of own desire. दुर्बलाशः सन्-निराश होते हुए-getting desperate, तम्-उस रघु से-him (Raghu), अवोचत्-कहा-said.

अनुवाद :
इस प्रकार अर्घ्य पात्र से (यज्ञ में हुए) खर्च का अनुमान लगाए हुए तथा रघु की उदार वाणी को सुनने पर भी अपने मनोरथ की सिद्धि की दुर्बल आशा रखते हुए, वरतन्तु का शिष्य (कौत्स) उनसे इस प्रकार बोला।

English :
Kautsa calculated the expenditure on sacrifice but heard Raghu’s generous talk-Got desperate about the fulfilment of his wish.

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5. समाप्तविद्येन मया महर्षिवैिज्ञापितोऽभूद्गुरुदक्षिणायै।
स मे चिरायस्खलितोपचारां तां भक्तिमेवागणयत्पुरस्तात्॥5॥

अन्वय :
समाप्तविद्येन मया महर्षिः गुरुदक्षिणायै विज्ञापितः अभूद् स च चिराय अस्खलितोपचारां ताम् भक्तिम् एव पुरस्तात् अगणयत्।

शब्दार्थाः :
समाप्तविद्येन मया-समस्त विद्याओं को पढ़ने के बाद मैंने-after learning all education,गुरुदक्षिणायैः-गुरुदक्षिणा के लिए-for fee topreceptor; विज्ञापितः-प्रार्थना की-requested; चिराय-बहुत दिनों तक-foralong time; अस्खलितोपचाराम्-नियमपूर्वक की गई-done regularly, तां भक्तिम्-उस गुरु सेवा को-that service to guru, पुरस्तात्-श्रेष्ठ दक्षिणा-spureme (excellent) fee. अगणयत्-गिना/माना-considered.

अनुवाद :
समस्त विद्याओं को पढ़ने के बाद मैंने महर्षि से गुरुदक्षिणा देने के लिए प्रार्थना की और उन्होंने (गुरु ने) बहुत दिनों तक नियमपूर्वक की गई उनकी भक्ति को ही श्रेष्ठ दक्षिणा माना।

English :
Kausta finished his education-requested the Maharishi to name the fee. The Maharishi considered his (Kautsa’s) services with devotion as supreme fee.

6. निर्बन्धसञ्जातरुषाऽर्थकाय॑मचिन्तयित्वा गुरुणाऽहमुक्तः।
वित्तस्य विद्यापरिसङ्घयया मे कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति।।6।

अन्वय :
निर्बन्धसञ्जातरुषा गुरुणा अर्थकार्यम् अचिन्तयित्वा अहम् ‘वित्तस्य चतस्रः दश च कोटीः मे आहर’ इति विद्यापरिसङ्ख्यया उक्तः।

शब्दार्थाः :
निर्बन्धसञ्जातरुषा-वार-बार (गुरुदक्षिणा के लिए) आग्रह करने पर क्रोध #-on account of anger aroused by repeated insistence for offer of fee, अर्थकार्यम्-दरिद्रता/गरीबी को-poverty; अचिन्तयित्वा-विचार न करके-not considering; वित्तस्य-धन की/मुद्रा की-of money; चतस्रः दश च कोटी:-चौदह करोड़-fourteen crores, आहर-दो-bring, विद्यापरिसङ्ख्यया-चौदह विद्याओं की सङ्ख्या के मान से-in exchange of fourteen types of education.

अनुवाद :
बार-बार आग्रह करने पर क्रोध से गुरु के द्वारा मेरी गरीबी का विचार न करके मुझे कहा गया कि चौदह विद्याओं की सङ्ख्या के मान (हिसाब) से ’14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ मुझे दो।’

English :
Kautssa’s repeated insistence for fee aroused guru’s anger. Asked him to bring fourteen crores.

7. गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा रघोः सकाशादनवाप्य कामम्।
गतो वदान्यान्तरमित्ययं मे मा भूत्परिवादनवावतारः॥7॥

अन्वय :
‘श्रुतपारदृश्वा गुर्वर्थम् अर्थी रघोः सकाशात् कामम् अनवाप्य वदान्यान्तरम् गतः’ इति अयम् मे परिवादनवावतारः मा भूत्।

शब्दार्थाः :
श्रुतपारदृश्वा-शास्त्रों में पारङ्गत-learned in seriptures, गुर्वर्थम्-गुरु के लिए-for his guru; अर्थी-गुरुदक्षिणायाचक-asking for offering fee to guru; सकाशात्-पास से-from; कामम्-मनोरथ को-heart’s desire, longing, अनवाप्य-पूर्ण न होने पर-not getting fulfilled, वदान्यान्तरम्-अधिक दान देने वाले दूसरे दानी के पास-to another more generous fellow, परिवादनवावतारः-निन्दा का नया अवतार-object of censure.

अनुवाद :
शास्त्रों में पारंगत एक विद्यार्थी की गुरु के लिए दक्षिणा देने की इच्छा रघु के पास पूरी नहीं होने के कारण उसे किसी दूसरे अधिक दानवीर के पास जाना पड़ा। इस प्रकार की निन्दा का मैं पात्र नहीं बनूं।

English :
A learned scholar was asking from Raghu about fee for his teacher. He had to go to another generous fellow when his desire was not fulfilled there. It was a matter of censure for Raghu.

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8. तथेति तस्थावितथं प्रतीतः प्रत्यग्रहीत्सङ्गरमग्रजन्मा।
गामान्तसारां रघुरप्यवेक्ष्य निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्॥8॥

अन्वय :
अग्रजन्मा प्रतीतः सन् तस्य अवितथम् सङ्गरम् इति प्रत्यग्रहीता, तथा रघु अपि गाम् आन्तसाराम् अवेक्ष्य कुबेरात् अर्थम् निष्क्रष्टुम चकमे।

शब्दार्थाः :
अग्रजन्मा-ब्राह्मण (कौत्स)-Brahman (Kautsa), प्रतीतः सन्-प्रसन्न होते हुए-being pleased; अवितथम्-सत्य-true; सङ्गरम्-प्रतिज्ञा को-promise; गाम्-पृथिवी को-earth, आन्तसाराम्-सारहीन-meaningless, अवेक्ष्य-समझकर-thinking, अर्थम्-धन-money, निष्क्रष्टुम-लेने की इच्छा-desire to take, चकमे-किया-showed.

अनुवाद :
ब्राह्मण ने प्रसन्न होते हुए उसकी सत्य प्रतिज्ञा को स्वीकार किया और रघु ने भी पृथ्वी को सारहीन समझकर कुबेर से धन लेने की इच्छा की।

English :
The brahmin (Kautsa) got pleased, accepted his promise-Raghu desired to get money from Kuber.

9. तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं लब्धं कुबेरादभियास्यमानात्।
दिदेश कौत्साय समस्तमेव पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम्॥9॥

अन्वय :
भूपतिः अभियास्यमानात् कुबेरात् लब्धम् वज्रभिन्नम् सुमेरोः पादम् इव स्थितम् तम् भासुरहेमराशिम् समस्तम् एव कौत्साय दिदेश।

शब्दार्थाः :
भूपतिः-रघुः-king, अभियास्यमानात्-युद्ध के लिए चढ़ाई किए जाने वाले (से)-from object of invasion for battle; कुबेरात्-कुबेर से (धन के देवता)-from kuber (god of wealth); वज्रभिन्नम्-वज्र से काटकर गिराये हुए-being severed and felled; सुमेरोः-सुमेरु के-of sumeru, पादम् इव-टुकड़े के समान-like a piece, भासुरहेमराशिम्-चमकती हुई सुवर्ण राशि (को)-shining heap of gold, दिदेश-दे दी-gave.

अनुवाद :
रघु ने युद्ध के लिए चढ़ाई किए जाने वाले (से) अर्थात् युद्ध कर के कुबेर से प्राप्त वज्र से काटकर गिराये हुए सुमेरु के टुकड़े के समान चमकती हुई सुवर्ण राशि पूरी ही कौत्स को दे दी।

English :
Raghu got money from Kuber like a piece of Sumeru mountain severed with the trident gave all to Kautsa.

10. जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामाभिनन्द्यसत्त्वौ
गुरुप्रदेयाधिकनिःस्पृहोऽर्थी नृपोऽत्रिकामादधिकप्रदश्च॥10॥

अन्वय :
तौ द्वौ अपि साकेतनिवासिनः जनस्य अभिनन्धसत्वौ अभूताम्। गुरुप्रदेयाधिकनिःस्पृहः अर्थी, अर्थिकामात् अधिकप्रदः नृपः च।

शब्दार्थाः :
तौ द्वौ-वे दोनों (दाता और याचक)-Both the donor and the aspirant, साकेतनिवासिनः जनस्य-अयोध्या निवासी लोगों का-of residents of Ayodhya; अभिनन्धसत्वौ-अभिनन्दन के पात्र-object of praise (felicitation); अभूताम्-हो गए -became; गुरुप्रदेयाधिकनिः स्पृहः-गुरुदक्षिणा से अधिक न लेने का इच्छुक-not desiring to accept more than fee for guru, अर्थी-याचक (कौत्स)-aspirant (Kautsa), अर्थिकामात्-याचक की कामना से-the desire of aspirant, अधिकप्रदः-अधिक देने वाला-donor of more, नृपः-राजा (रघु)-King (Raghu).

अनुवाद :
वे दोनों (दाता और याचक) ही अयोध्या निवासी लोगों के अभिनन्दन के पात्र बन गए। गुरुदक्षिणा से अधिक न लेने का इच्छुक (संतोषी) याचक कौत्स और याचक की कामना से अधिक देने वाला (दाता) राजा रघु।।

English :
Raghu desired to give more than what Kautsa had desired. Kautsa was not willing to accept more than fee for Guru. Both became praiseworthy in the eyes of residents of Ayodhya.

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MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Durva Chapter 17 चाणक्यनीतिः (पद्यम्) (चाणक्यनीतितः)

MP Board Class 10th Sanskrit Chapter 17 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक पद में उत्तर लिखिए)।
(क) रविः केन तपते? (सूर्य को कौन तपाता है?)
उत्तर:
सत्येन (सत्य के द्वारा)

(ख) दरिद्रता कया विरानंते? (दरिद्रता किससे सुशोभित होती हैं?)
उत्तर:
धीरतया (धैर्य धारण करने के द्वारा)

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(ग) कर्मानुसारिणी का? (कर्म का अनुसरण कौन करती है?)
उत्तर:
बुद्धिः (बुद्धि)

(घ) केन शर्वरी आह्लादिता? (किससे रात खुश होती है?)
उत्तर:
चन्द्रेण (चन्द्रमा से)

(ङ) कुरूपता कया विराजते? (कुरूपता किससे सुशोभित होती है?)
उत्तर:
शीलतया (सदाचरण से)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत-(एक वाक्य में उत्तर लिखिए)
(क) वाचा किं न प्रकाशयेत्? (वाणी से क्या प्रकट नहीं करना चाहिए?)
उत्तर:
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा न प्रकाशयेत्। (मन से सोचे हुए काम को वाणी से प्रकट नहीं करना चाहिए।)

(ख) कैः पुत्राः विविधैः शीलैः नियोज्याः? (किसके द्वारा पुत्रों को विभिन्न सदाचरणों द्वारा लगाना चाहिए?)
उत्तर:
बुधैः पुत्राः विविधैः शीलैः नियोज्याः।। (विद्वानों के द्वारा पुत्र को विभिन्न सदाचरणों द्वारा लगाना चाहिए!)

(ग) कः सर्ववस्तुषु हीनः? (कौन सब वस्तुओं में हीन है?)
उत्तर:
विद्यारत्नेन हीनः सर्ववस्तुषु हीनः। (विद्या रूपी रत्न से हीन सब वस्तुओं में हीन है।)

(घ) कुलीनः दीनोऽपि कान् न त्यजति? (दीन होते हुए भी कुलीन क्या नहीं छोड़ता है?)
उत्तर:
कुलीनः दीनोऽपि शीलगुणान् न त्यजति। (दीन होते हुए भी कुलीन शीलगुणों को नहीं छोड़ते।)

(ङ) छिन्नोऽपि चन्दनतरुः किं न जहाति? (कटने पर भी चन्दन का पेड़ क्या नहीं छोड़ता?)
उत्तर:
छिन्नोऽपि चन्दनतरुः गन्धं न जहाति। (कटने पर भी चन्दन का पेड़ खुशबू नहीं छोड़ता है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिर-)
(क) सत्येन सर्वं कथं प्रतिष्ठितम् ? (सत्य से सब कैसे स्थित है?)
उत्तर:
पृथ्वी सत्येन धार्यते, रविः सत्येन तपते, वायुः सत्येन वाति। अनेन प्रकारेण सर्वं सत्येन प्रतिष्ठितम्। (सत्य के द्वारा पृथ्वी धारण की जाती है, सूर्य उष्णता प्रदान करता है, वायु बहती है। इस प्रकार सब सत्य के द्वारा ही स्थित है।)

(ख) किमर्थं बुधैः पुत्राः विविधैः शीलैः नियोज्याः? (किसलिए विद्वानों के द्वारा पुत्रों को शील आचरण में लगाना चाहिए?)
उत्तर:
बुधैः पुत्राः विविधैः शीलैः नियोज्या यतो हि शीलसम्पन्नाः नीतिज्ञाः कुलपूजिताः भवन्ति। (विद्वानों के द्वारा पुत्रों को विभिन्न सदाचरणों द्वारा लगाना चाहिए क्योंकि सदाचार से युक्त नीतिशास्त्र के ज्ञाता कुल में पूजे जाते हैं।)

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(ग) पदे-पदे केषां सम्पदः सुः? (कदम-कदम पर किन को खुशियाँ होती हैं?)
उत्तर:
येषां सतां हृदये परोपकरणं जागति, तेषां पदे-पदे सम्पदः स्युः। (जिन सज्जनों के मन में परोपकार की भावना जागृत रहती है, उनके कदम-कदम पर खुशियाँ होती हैं।)

प्रश्न 4.
प्रदत्तशब्दैः रिक्तस्थानानि पूरयत (दिए गए शब्दों से रिक्त स्थान भरिए-)
(गूढम्, सत्ये, धनहीनो, लीलाम्, सविद्यानाम्)
(क) सर्वं …………….. प्रतिष्ठितम्।
मन्त्रेण रक्षयेद् ……………..।
(ग) को विदेशः ……………..।
(घ) …………….. न हीनश्च।
(ङ) वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति ………….
उत्तर:
(क) सत्ये
(ख) गूढम्
(ग) सविद्यानाम्
(घ) धनहीनो
(ङ) लीलाम्

प्रश्न 5.
यथायोग्यं योजयत-(उचित क्रम से जोडिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 1
उत्तर:
(क) 3
(ख) 4
(ग) 2
(ड) 1

प्रश्न 6.
शुन्द्रवाक्यानां समक्षम् जाम् अशुद्धवाक्यानां समक्षम् “न” इति तिखत-)
(शुद्ध वाक्यों के सामने ‘आम्’ और अशुद्ध वाक्यों के सामने ‘न’ लिखिए)
(क) सत्येन वायुः वाति।
(ख) प्रियवादिना कोऽपि न परः।
(ग) कदन्नता उष्णतया न विराजते।
(घ) कर्मायत्तं पुंसां फलम्।
(ड) छिन्नः चन्दनतरुः गन्धं जहाति।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) आम्
(ग) न
(घ) आम्
(ङ) न।

प्रश्न 7.
अधोलिखितशब्दानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनञ्च लिखत
(नीचे लिखे शब्दों के मूलशब्द, विभक्ति और वचन लिखिए)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 2
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 9

प्रश्न 8.
निम्नलिखितक्रियापदानां धातुं लकारं पुरुषं ववनं च लिखत
(नीचे लिखे क्रियापदों के धातु, लकार, पुरुष और वचन लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 3
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 4

प्रश्न 9.
अधोलिखितपदानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धिनाम लिखत
(नीचे लिखे पदों के सन्धि-विच्छेद करके सन्धि का नाम लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 5
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 6

प्रश्न 10.
अधोलिखितसमासानां विग्रहं कृत्वा समासनाम लिखत
(नीचे लिखे समासों को विग्रह कर समास का नाम लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 7
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 17 चाणक्यनीतिः img 8

प्रश्न 11.
प्रदत्तश्लोकान्वयस्य पूर्तिं कुरुत
(दिए गए श्लोक का अन्वय पूरा कीजिए-)
बुधैः …………….. विविधैः शीलैः
(यतो हि) …………….. नीतिज्ञाः ……………..भवन्ति।
उत्तर:
बुधैः पुत्रा. विविधैः शीलैः सततं नियोज्याः।
(यतो हि) शीलसम्पन्नाः नीतिज्ञाः कुलपूजिताः भवन्ति।

योग्यताविस्तार –

पाटे समागतान् श्लोकान् कण्ठस्थं कुरुत।
पाठ में आए श्लोकों को कण्ठस्थ करो।

“चाणक्यनीति” इत्यस्मात् पुस्तकात् चित्वा (पाठे समागतान् श्लोकान् विहाय) अन्यान् दशश्लोकान् लिखत।
‘चाणक्यनीति’ पुस्तक से चुनकर अन्य दस श्लोक लिखो।

चाणक्येन विरचितानि अन्यानि पुस्तकानि पठत।
चाणक्य द्वारा रचित अन्य पुस्तकें पढ़ो।

चाणक्येतरदशनीतिश्लोकान् लिखत।।
चाणक्य से अलग दस नीति श्लोक लिखो।

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चाणक्यनीतिः पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ में ‘चाणक्य’ द्वारा रचित नीति से सम्बन्धित कुछ श्लोक दिए गए हैं, जिससे छात्रों को नीति का सम्यक् ज्ञान हो सके। ये श्लोक चाणक्य द्वारा रचित ‘चाणक्यनीतिः’ नामक ग्रन्थ से लिए गए हैं।

चाणक्यनीतिः पाठ का अनुवाद

1. सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्टितम्॥1॥

अन्वयः :
पृथ्वी सत्येन धार्यते, रविः सत्येन तपते, वायुः सत्येन वाति, सर्वं च सत्ये प्रतिष्ठितम् (अस्ति)।

शब्दार्थाः :
धार्यते-धारण की जाती है-is born (propped); तपते-उष्णता प्रदान करता है-gives heat; वाति-बहता है-blows; प्रतष्ठितम्-स्थित है-is established.

अनुवाद :
धरती सत्य से धारण की जाती है। सूर्य सत्य से तपता है, वायु सत्य से बहती है, सब सत्य में स्थित है। Englisit-The earth, the sun, the wind-all of their props in truth.

2. मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्थे चाऽपि नियोजयेत्॥2॥

अन्वयः :
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा न एव प्रकाशयेत्, गूढं मन्त्रेण रक्षयेत्। कार्ये च अपि नियोजयेत्।

शब्दार्थाः :
वाचा-वाणी के द्वारा-through speech; प्रकाशयेत्-प्रकट करना चाहिए-should beexpressed;गूढम्-गोपनीय-secret;मन्त्रेण-विचारपूर्वक- thoughtfully; नियोजयेत्-लगाना चाहिए-put.

अनुवाद :
मन से सोचे हुए कार्य को वाणी से प्रकट नहीं करना चाहिए। गुप्त को विचारपूर्वक रखना चाहिए। और कार्य में भी लगाना चाहिए।

English :
Don’t express your thoughts with speech. A secret must be preserved and put into action.

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3. पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥3॥

अन्वयः :
बुधैः पुत्राः विविधैः शीलैः सततं नियोज्याः। (यतो हि) शीलसम्पन्नाः नीतिज्ञाः कुलपूजिताः भवन्ति।

शब्दार्थाः :
बुधैः-विद्वानों के द्वारा-by the learned; शीलैः-सदाचरणों के द्वारा-through good conduct; कुलपूजिताः-कुल में सम्मानित/जनसाह में पूजित-honoured in family and society.

अनुवाद :
विद्वानों के द्वारा पुत्रों को विभिन्न सदाचरणों के द्वारा निरंतर लगाना चाहिए। क्योंकि सदाचार युक्त नीतिशास्त्र के ज्ञाता कुल में पूजे जाते हैं।

English :
Engage sons in noble conduct. A man of good moral conduct earns respect in family.

4. को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्।
को विदेशः सविद्यानांकः परः प्रियवादिनाम्।।4॥

अन्वयः :
हि समर्थानां कः भारः? व्यवसायिनां कि दूरम्? सविद्यानां कः विदेशः? प्रियवादिनां कः पारः? (अर्थात् कोऽपि नास्ति ।)

शब्दार्थाः :
समर्थानाम्-सक्षम लोगों के लिए-for the capable; व्यवसायिनाम्-उद्यमशील लोगों के लिए-for the industrious; परः-शत्रु पराया-enemy.

अनुवाद :
सक्षम लोगों के लिए भार क्या है? उद्यमशील (परिश्रमी) लोगों के लिए दूर क्या है? विद्या से युक्त लोगों के लिए विदेश क्या है ? प्रिय बोलने वालों के लिए कौन पराया है? (अर्थात् कोई भी नहीं।)

English :
The capable, industrious, learned and sweet talkers know no burden, distance, foreign country or enemy respectively.

5. दरिद्रता धीरतया विराजते, कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते, कुरूपता शीलतया विराजते।।5॥

अन्वयः :
दरिद्रता धीरतया विराजते, कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते, कदन्नता उष्णतया विराजते, कुरुपता च शीलतया विराजते।

शब्दार्थाः :
धीरतया-धैर्य धारण करने से-through patience, forbearance; कदन्नता-निम्न कोटी का अन्न-third-rate foodstuff; विराजते-सुशोभित होता होती है-is adorned.

अनुवाद :
दरिद्रता धैर्य धारण करने से सुशोभित होती है, बुरे वस्त्र स्वच्छता से सुशोभित होते हैं, निम्न कोटि का अन्न ताप से सुशोभित होता है और कुरुपता शील स्वभाव से सुशोभित होती है।

English :
Misery, poverty, cheap clothes, third-rate food items and vulgarity are adorned by forbearance, cleanliness, heat (warmth) and noble conduct respectively.

6. धनहीनो न हीनश्च धनिकः सः सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेन यो हीनः सः हीनः सर्ववस्तुषु॥6॥

अन्वयः :
यः धनहीनः सः हीनः न, (अपितु) सः सुनिश्चयः धनिकः, विद्यारत्नेन हीनः सः सर्ववस्तुषु हीनः (अस्ति)।

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शब्दार्था: :
धनहीनः-धन से रहित – one who lacks money; सुनिश्चयः-निश्चयपूर्वक-definitely-by all means; सर्ववस्तुषु-सभी वस्तुओं में-in everything.

अनुवाद :
जो धन से रहित है, वह हीन नहीं है, बल्कि वह निश्चयपूर्वक धनी है। विद्या रूपी रत्न से जो हीन है वह सब वस्तुओं से हीन होता है।

English :
One who is without money is not a destitute. He is otherwise wealthy. He alone is a pauper who is deprived of learning.

7. कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
तथापि सुधियश्चार्याः सुविचार्यैव कुर्वते॥7॥

अन्वयः :
पुंसां कर्मायत्तं फलम्, बुद्धि, कर्मानुसारिणी, तथापि सुधियः आर्याः च सुविचार्य एव कुर्वते।

शब्दार्थाः :
पुंसाम्-मनुष्यों का-of men; कर्मायत्तम्-कर्म के अनुसार-according to action; सुधियः-विद्वान् लोग-learned people; आर्याः-श्रेष्ठ लोग-noble persons; कुर्वते-करते हैं-do.

अनुवाद :
मनुष्यों को कर्म के अनुसार फल मिलता है, बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है। इसीलिए विद्वान और श्रेष्ठ लोग अच्छी प्रकार से विचार करके ही कार्य करते हैं।

English :
Actions are result-oriented-wisdom follows actionwise and noble persons should act thoughtfully.

8. छिन्नोऽपि चन्दनतरुन जहाति गन्धं, वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम् ।
यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः, दीनोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः॥8॥

अन्वयः :
छिन्नः चन्दनतरुः अपि गन्धं न जहाति, वृद्धः वारणपतिः अपि लीलां न जहाति, यन्त्रार्पितः इक्षुः मधुरतां न जहाति, कुलीनः च दीनः अपि शीलगुणान् न त्यजति।

शब्दार्थाः :
छिन्नः-कटा हुआ-which is cut; जहाति-छोड़ता है-leaves, deserts; यन्त्रार्पितः-यन्त्र (कोल्ह) में डाला गया-put insugar crasher; इक्षुः-गन्ना-sugarcane; शीलगुणान्-सच्चरित्रादि गुणों को-qualities like noble conduct; त्यजति-छोड़ता है-leaves, quits.

अनुवाद :
कटा हुआ चन्दन का वृक्ष भी अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता है। बूढ़ा हाथियों का स्वामी भी खेल नहीं छोड़ता है, यन्त्र (कोल्हू) में डाला गया गन्ना अपनी मधुरता को नहीं छोड़ता। कुलीन और दीन भी अपने सच्चरित्रादि गुणों को नहीं छोड़ता है।

English :
Acut out sandal tree, an old lord of elephants-a sugarcanea noble born and poor fellow do not forsake their fragrance, sportive nature, sweetness and noble qualities respectively.

9. एकेनाऽपि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥9॥

अन्वयः :
एकेन सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना अपि सर्वं कुलम् आह्लादितं, यथा चन्द्रेण शर्वरी (आहलाद्यते)।

शब्दार्थाः :
सुपुत्रेण-सद्गुणी पुत्र के द्वारा-by son of noble qualities; आहुलादितम्-प्रसन्न किया गया-delighted; शर्वरी-रात्रि-night.

अनुवाद :
एक सुपुत्र के द्वारा, विद्या से युक्त के द्वारा तथा सज्जन के द्वारा भी पूरा कुल आनन्दिा किया जाता है, जैसे चन्द्रमा के द्वारा रात को।

English :
A worthy, educated and noble son delights the entire family-The moon also does the same by lighting the night.

10. परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम्।
नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे।।10॥

अन्वयः :
येषां सतां हृदये परोपकरणं जागर्ति तेषां विपदः नश्यन्ति, पदे पदे सम्पदः स्युः।

शब्दार्थाः :
परोपकरणम्-दूसरों का भला करना-doing good to others; विपदः-विपत्तियाँ-difficulties; पदे-पदे-कदम-कदम पर-at every step; स्युः-हों-be.

अनुवाद :
जिन सज्जनों के हृदय में दूसरों का भला करने की भावना जागृत रहती है, उनकी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और कदम-कदम पर खुशियाँ होती हैं।

English :
The gentlemen who have a feeling of others’ welfare are rid of difficulties and seek pleasure at every step.

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MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम्

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Durva Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् (गद्यम्) (सङ्कलितम्)

MP Board Class 10th Sanskrit Chapter 13 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक पद में उत्तर लिखिए)।
(क) महाभारतस्य प्रणयनं केन कृतम्? (महाभारत की रचना किसने की?)
उत्तर:
वेदव्यासेन (वेदव्यास के द्वारा)

(ख) जलं बिना किं न सम्भवम्? (जल के बिना क्या सम्भव नहीं?)
उत्तर:
जीवनम् (जीवन)

(ग) खगोलशास्त्रं कस्मिन् क्षेत्र प्रसिद्धम्? (खगोलशास्त्र किस क्षेत्र में प्रसिद्ध है?)
उत्तर:
कालगणनाक्षेत्रे (कालगणना के क्षेत्र में)

(घ) राजप्रासादादीनां निर्माणे कस्य उपयोगः भवति स्म? (राजमहल आदि के निर्माण में किसका उपयोग होता था?)
उत्तर:
अयसः (लोहे का)

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(ङ) केन दर्शनेन सूक्ष्मवस्तु बृहद् इव भासते? (किसके द्वारा देखने से छोटी वस्तु बड़ी लगती थी?)
उत्तर:
काचकेन (शीशे से)

प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत-(एक वाक्य में उत्तर लिखिए-)
(क) शिष्यान् कथं परीक्षेत? (शियों की कैसे परीक्षा ली जानी चाहिए?)
उत्तर:
यथा शुद्धं कनकं तापच्छेदनिघर्षणैः परीक्ष्येत तथा शिष्यान् परीक्षेत।

(जैसे शुद्ध सोने को तपाकर, काटकर और घिसकर परखा जाता है वैसे ही शिष्यों की परीक्षा ली जानी चाहिए।)

(ख) आभरणस्वरूपेण कयोः उपयोगिता महाभारते वर्णितम्? (आभूषण रूप में किन की उपयोगिता महाभारत में वर्णित है?)
उत्तर:
आभरणस्वरूपेण सुवर्णरजतयोः उपयोगिता महाभारते वर्णितम्। (आभूषण के रूप में सोने और चाँदी का उपयोग महाभारत में वर्णित है।)

(ग) जनाः सुगन्धद्रव्याणां निर्माणार्थं कस्य उपयोगः कुर्वन्ति स्म? (लोग सुगन्ध द्रव्यों को बनाने के लिए किसका उपयोग करते थे?)
उत्तर:
जनाः सुगन्ध द्रव्याणां निर्माणार्थं पुष्पाणां तैलस्य उपयोगः कुर्वन्ति स्म। (लोग सुगन्धित द्रव्यों को बनाने के लिए फूलों के तेल का उपयोग करते थे।)

(घ) वेदव्यासेन महाभारतस्य प्रणयनं किमर्थं कृतम्? (वेदव्यास के द्वारा महाभारत को रचना किस लिए की गई?)
उत्तर:
वेदव्यासेन महाभारतस्य प्रणयनं लोकोपकाराय कृतम्। (वेदव्यास ने महाभारत की रचना लोकोपकार के लिए की।)

(ङ) महाभारतं कस्याः परिचायकग्रन्थः? (महाभारत किसका परिचायक ग्रन्थ है?)
उत्तर:
महाभारतं भारतीयसनातन वैदिक संस्कृतेः परिचायक ग्रन्थः। (महाभारत भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति का परिचायक ग्रन्थ है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए-)
(क) मानवस्य स्वभावः कः? (मानव का स्वभाव क्या है?)
उत्तर:
मानवस्य स्वभावः अयम् अस्ति यत् सः लज्जया स्वकीयं नश्वरम् अपि शरीरम् वस्त्रेण आच्छादितुम् इच्छति। (मानव का स्वभाव है कि वह लज्जा ने अपने नश्वर शरीर को भी वस्त्र से ढंकना चाहता है।)

(ख) रसायनशास्त्रविषये व्यासदेवः किं कथयति? (रसायनशास्त्र के विषय में व्यासदेव क्या कहते हैं?)
उत्तर:
रसायन शास्त्र विषये व्यासदेवः कथयति यत्-रसायन विदः सुप्रयुक्त रसायनाः च एव जरया भग्नाः दृश्यन्ते, उतमैः नागैः नगा इव।

(रसायन शास्त्र के विषय में व्यासदेव कहते हैं कि रसायन शास्त्र के जानकारों को उत्तम सापों द्वारा पर्वत के सभान ठीक प्रकार से प्रयुक्त रसायन पुराने होने के कारण व्यर्थ दिखाई देते हैं।)

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(ग) भौतिकशास्त्रे अतीव प्रसिद्धः कः विचारः? (भौतिकशास्त्र में बहुत प्रसिद्ध विचार क्या है?)
उत्तर:
भौतिकशास्त्रे अतीव प्रसिद्धः विचारः यत् “वस्तूनाम् अन्यसापेक्षं चलनम्” इति। (भौतिकशास्त्र का अधिक प्रसिद्ध विचार है कि ‘वस्तुएँ अन्यों के साथ चलती हैं।”)

प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत-(उचित क्रम से जोडिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् img 1
उत्तर:
(क) 2
(ख) 3
(ग) 1
(घ) 5
(ङ) 4

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
(शुद्ध वाक्यों के सामने ‘आम्’ और अशुद्ध वाक्यों के सामने ‘न’ लिखिए-)
(क) महाभारते सर्षपतैलस्य बहुशः उल्लेखो वर्तते।
(ख) राजरोगाणां शमनाय पञ्चसप्तविविधा चिकित्सा करणीया।
(ग) महाभारतं लक्षैकपद्यात्मकं महाकाव्यम् अस्ति।
(घ) यत् महाभारते अस्ति तदन्यत्र नास्ति।
(ङ) वस्तूनाम् अन्यसापेक्षं चलनम् भौतिकशास्त्रस्य सिद्धान्तः।।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) न
(ग) आम्
(घ) न
(ङ) आम्।

प्रश्न 6.
अधोलिखितशब्दानां विभक्तिं वचनञ्च लिखत
(नीचे लिखे शब्दों की विभक्ति और वचन लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् img 2
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् img 3

प्रश्न 7.
अधोलिखतपदानां धातुं लकारं वचनं च लिखत
(नीचे लिखे पदों के धातु, लकार और वचन लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् img 4
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् img 5

प्रश्न 8.
अधोलिखितशब्दानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धिनाम लिखत
(नीचे लिखे पदों के सन्धि-विच्छेद करके सन्धि का नाम लिखिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् img 6
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 13 महाभारते विज्ञानम् img 7

प्रश्न 9.
अधोलिखितपदानां पर्यायवाचिशब्दान् लिखत
(नीचे लिखे शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए-)
यथा- जलम् – वारि
(क) वेदव्यासः
(ख) कालः
(ग) सुवर्णम्
(घ) मनुष्यः
उत्तर:
(क) वेदव्यासः – कृष्णद्वैपायनः
(ख) कालः – समयः
(ग) सुवर्णम् – कनकम्
(घ) मनुष्यः – मानवः

प्रश्न 10.
अधोलिखितव्ययानां वाक्यप्रयोगं कुरुत
(नीचे लिखे अव्ययों के वाक्य बनाइए)
यथा- अत्र – अहम् अत्र अस्मि
(क) अपि
(ख) इदानीम्
(ग) बिना
(घ) यथा
(ङ) एव
उत्तर:
(क) अपि – अहम् अपि गच्छामि ।(मैं भी जाती हूँ।)
(ख) इदानीम् – इदानीम् शयनं कुरु। (अब सो जाओ।)
(ग) बिना – त्वाम् विना अहम् न गमिष्यामि। (तुम्हारे बिना मैं नहीं जाऊँगी।)
(घ) यथा – यथा करिष्यति तथा प्राप्तं करिष्यति। (जैसा करोगे वैसा पाओगे।)
(ङ) एव – रामः एव प्रथमम् आगमिष्यति। (राम ही प्रथम आएगा।)

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योग्यताविस्तार –

कृष्णद्वैपायनवेदव्यासविषये निबन्धो लिखत।
कृष्णद्वैपायनवेदव्यास जी के विषय पर निबन्ध लिखो।

महाभारते कति पर्वाणि सन्ति तेषां नामानि लिखत।
महाभारत में कितने पर्व है, नाम लिखो।

महाभारते विज्ञानम् पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ में श्री वेदव्यास जी द्वारा रचित ‘महाभारत’ के विषय पर चर्चा की गई है तथा इस ग्रन्थ की वैज्ञानिक दृष्टि से व्याख्या की गई है, जिससे यह पता चलता है कि महाभारत में विज्ञान के सभी विषय-भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, खगोलशास्त्र, कृषि सम्बन्धी व्यवस्था, वैद्यशास्त्र, लौहशास्त्र आदि अनेक विषय सम्मिलित हैं।

महाभारते विज्ञानम् पाठ का अनुवाद

1. भारतीयसनातनवैदिकसंस्कृतेः परिचायकः, आकरग्रन्थः ‘श्रीमन्महाभारतम्। यस्य प्रणयनं भगवता वेदव्यासेन लोकोपकाराय कृतम् अस्ति। एतस्य महत्ताविषये स्वयमेव कृष्णद्वैपायनोमुनिः प्रकाशयति –
“धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्।।”

‘महाभारतम्’ न केवलं विश्वकोशत्वेन विद्यते पुराणेतिहासादीनाम् अपित्वत्र वैज्ञानिकदृष्टया भौतिकशास्त्र-खगोलशास्त्र-कृषि-जलबन्ध-जलसेचनादिव्यवस्था-रसायनशास्त्र वैद्यकशास्त्र-लौहशास्त्र-वस्त्रनिर्माण-शस्त्रास्त्रनिर्माणञ्चालन-विधिरित्यादयः बहवः विषयाः ज्ञान-विज्ञानोपेताः वर्णिताः सन्ति। तेषु केचनविषयाः अत्र उदाह्रियन्ते

अन्वयः :
(धर्मे चार्थे …………… तत् वचित्) हे भरतर्षभ! धर्मे च, अर्थे च, कामे च, मोक्षे च यद् इह अस्ति, तद् अन्यत्र (अस्ति), यद् इह न अस्ति, तत् क्वचित् न (अस्ति)

शब्दार्थाः :
परिचायकः-परिचय कराने वाला-Introducer; आकरग्रन्थः-खान रूपी ग्रन्ध-Storehouse; प्रणयनम्-लिखना-writing, composition; इह-यहाँ (इस संसार में)-here (in this world); क्वचित्-कहीं-somewhere; न क्वचित्-कहीं नहीं-nowhere

अनुवाद :
भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति का परिचय कराने वाला खान रूपी ग्रन्थ ‘श्रीमन्महाभारत’ है। जिसकी रचना भगवान वेदव्यास के द्वारा लोकोपकार के लिए की गई है। इसकी महानता के विषय में स्वयं ही कृष्णद्वैपायन मुनि प्रकाशित करते हैं। हे भरतर्षभ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में जो यहाँ है, वह सब जगह है, जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।

‘महाभारत’ न केवल विश्वकोश के रूप में पुराण-इतिहास आदि है, बल्कि यहाँ वैज्ञानिक दृष्टि से भौतिकशास्त्र, खगोलशास्त्र, कृषि, जलबन्ध, जलसेचन आदि व्यवस्थाएँ, रसायनशास्त्र, वैद्यकशास्त्र, लौहशास्त्र, वस्त्रनिर्माण, अस्त्र-शस्त्र निर्माण तथा सञ्चालन की विधि आदि बहुत से विषय ज्ञान और विज्ञान से युक्त वर्णित हैं। उनमें से कुछ पियों के यहाँ उदाहरण दिए जा रहे हैं –

English :
Mahabharat-introducer of vedic culture-Enshrines knowledge of religion, wealth, love and redemption-encyclopediafull of scientific knowledge-full of knowledge and wisdom.

2. भौतिकशास्त्रम्-‘वस्तूनाम् अन्यसापेक्षं चलनम्’ इत्येषः विचारः भौतिकशास्त्रे अतीव प्रसिद्धः। महतः आश्चर्यस्य विषयोऽयम् अस्ति यत् इमं मतं भगवान बादरायणः संस्थापयति महाभारते –
“चलं यथा दृष्टिपथं परैति सूक्ष्म महद्पमिवाभिभाति।
स्वपमालोचयते च रूपं परं तथा बुद्धिपथं परैति॥”

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अस्य पद्यस्य प्रथमे पादे तेन स एव विचारः प्रकटितः अस्ति। अत्रैव अन्यौ अपि द्वौ भौतिकशास्त्रसम्बद्धौ विचारौ कथितौ स्तः। तौ च-‘काचकेन दर्शनेन सूक्ष्मम् अपि वस्तु बृहद् इव भासते’ इति स्वच्छे दर्पणे वस्तुनः रूपस्य तादृशमेव प्रतिबिम्बं दृश्यते’ इति च।

अन्वयः :
(चलं यथा दृष्टि …………. बुद्धिपथं परैति॥’)
यथा चलं दृष्टिपथं परैति, सूक्ष्म महद् रूपम् इव अभिभाति, रूपं स्वरूपं च आलोचयते, तथा परं बुद्धिपथं परैति॥

शब्दार्थाः :
संस्थापयति-स्थापित करता है-establishes-sets up; अभिभाति-दिखाई देता है-Appears;आलोचयते-दिखलाता है-shows, displays; परैति-आती है-comes.
अनुवाद-भौतिकशास्त्रम्-‘वस्तुएं दूसरों पर निर्भर होकर चलती हैं’ यह विचार भौतिक शास्त्र में बहुत प्रसिद्ध है। अधिक आश्चर्य की बात यह है कि यही मत भगवान बादरायण ने महाभारत में स्थापित किया है-

जिस प्रकार चलते हुए दृष्टिपथ पर आती हुई, छोटी वस्तु बड़े के समान दिखाई देती है, वैसे ही दूसरे की बुद्धिपथ पर आई हुई वस्तु का रूप और स्वरूप दिखाई पड़ता है। इस पद्य के प्रथम पाद में उसके द्वारा वही विचार प्रकट किया गया है। यहीं और भी दो भौतिक शास्त्र संबंधी विचारों को कहा गया है। वे हैं-“शीशे में देखने से छोटी सी वस्तु भी बहुत बड़ी लगती है” और “साफ शीशे में वस्तु के रूप की वैसी ही परछाई दिखाई देती है’।

English :
Physics: Material depends on other items for motionsame principle found in Mahabharata-Lens enlarge the size of an object-Clear glass reflects the original shape of the objects.

3. खगोलशास्त्रम्-कालगणनाक्षेत्रे भारतीयं खगोलशास्त्रं विश्वस्मिन् प्रसिद्धम् अस्ति। खगोलस्य भावार्थः भवति यद् आकाशः अपि पृथिवीव गोलः अस्ति। महाभारते तु, विपलं ‘सेकेण्ड’ इति आङ्ग्लीयनाम्ना प्रसिद्धम्, इत्यस्यापि विभागः कृतः दृश्यते।
यथा –
“काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव त्रिशत्तु काष्ठा गणयेत् कलां ताम्।
त्रिंशत्कलाश्चापि भवेन्मुहूर्तो भागः कतायाः दशमश्च यः स्यात्॥

एवमेव सूर्यचन्द्रग्रहणविषयिण्याः खगोलीयघटनायाः वर्णनम् अपि महाभारतकारः करोति।

अन्वयः :
(काष्ठा निमेषा ……………….. यः स्यात्।)

दशः काष्ठाः निमेषाः पञ्च च एव त्रिंशत् तु काष्ठा तां कलां गणयेत् मूहूर्तो भागः त्रिंशत् कलाः च अपि भवेत् यः कलायाः दशमः च स्यात्।

शब्दार्थाः :
विपलम्-क्षण-Moment; आङ्ग्लीयनाम्ना-अंग्रेजी नाम से-by English name; काष्ठा-18 निमेष की संख्या-number of 18 moments; निमेषा-नेत्रों की पलक गिरने का समय-blinking (winking) time of eyes.

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अनुवाद :
खगोलशास्त्रम्-कालगणना के क्षेत्र में भारतीय खगोल शास्त्र इस विश्व में प्रसिद्ध है। खगोल का भावार्थ होता है कि आकाश भी पृथिवी की तरह गोल है। महाभारत में तो, क्षण ‘सैकेण्ड’ इस अंग्रेजी नाम से प्रसिद्ध है, इसके भी छोटे-छोटे भाग किए हुए दिखते हैं। जैसे

दस काष्ठा (18 निमेष का एक काष्ठा), निमेष पाँच ही है, तो 30 काष्ठा, उसको एक कला (खण्ड) गिनते हैं। और एक क्षण का भाग भी 30 कलाएँ होती हैं, जो कला का दसवां भाग होती हैं।

इस प्रकार ही सूर्य और चन्द्र ग्रहण के विषयों का, तथा खगोलीय घटनाओं का वर्णन भी महाभारत लिखने वाला करता है।

English :
Geography-Measurement of time-sky also round like earth-parts of seconds mentioned in Mahabharata. Kashtha, Kala and Muharta are mentioned in Mahabharata. Divisions of Kala.

Solar and lunar eclipses also mentioned in Mahabharata.

4. कृषि-जलबन्ध-जलसेचनादिव्यवस्था-‘जलमेव जीवनम्’ इत्युक्त्या सिद्धयति यत् जलं बिना जीवनं कथमपि न सम्भवम्। जलं न भविष्यति चेत्तदा धान्योत्पत्तिः कथं भविष्यति? अतः जलबन्धपूर्वकं विशालजलराशिं सकलय्य तस्य सम्यक् रूपेण सेचनादि व्यवस्था करणीया। एतदर्थं सत्यवतीसुतः महाभारते उल्लिखति –
“क्षेत्रं हि रसवत् शुद्धं कर्षकेणोपपादितम्।
ऋते वर्ष न कौन्तेय!, जातु निर्वतयेत् फलम्।

तत्र वै पौरुषं ब्रूयुः आसेकं यत्नकारितम्। सस्यानां जलसेचनाय नदीषु जलबन्धाः स्थापयितुम अपि निर्दिशति।।

श्लोक का अन्वयः :
(क्षेत्रं हि रसवत् …………. निर्वर्तयेत् फलम्।।)
हि कर्षकेण उपपादितं क्षेत्रं रसवत् शुद्धम् कौन्तेय। वर्षम् ऋते न जातु फलं निवर्तयेत्।

शब्दार्थाः :
सङ्कलय्य-एकत्रित करके-storing; कर्षकेण-किसान के द्वारा-by the farmer; उपपादितम्-उत्पादित-produce; ऋते-बिना-without; आसेकम्-गीला करना-to nmoisten; सस्यानाम्-फसलों की-of crops/foodgrains;

अनुवाद :
कृषि-जलबन्ध (बाँध)-जल सेचन सिंचाई आदि की व्यवस्था-‘जल ही जीवन है’ यह कहकर सिद्ध होता है कि जल के बिना जीवन किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं है। यदि जल नहीं होगा तो धान आदि की उत्पत्ति कैसे होगी? इसलिए बाँध बनाने से पहले बहुत सारा जल एकत्रित कर उसकी ठीक प्रकार से सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए। इसलिए सत्यवती पुत्र ने महाभारत में उल्लेख किया है कि हे कौन्तेय किसानों के द्वारा उत्पादित क्षेत्र रसवान् और शुद्ध है। पर वर्षा के बिना उनके फल नहीं हो पाएँगे।

तब उनके द्वारा मेहनत के साथ जल देने का (गीला रखने का प्रयत्न करने को भी कहना चाहिए। फसलों की जल से सिंचाई के लिए नदियों पर बाँध बनाने का भी निर्देश दिया है।

English :
Agriculture, dams and irrigation-water is life-source of agricultural produce-dams or rivers for irrigation-rain water a must for irrigation.

5. रसायनशास्त्रम्-महाभारतकाले रसायनशास्त्रस्य पर्याप्तः विकासः अभवत्। तस्माद् एव औषधिविज्ञानं, धातुशास्त्रं च विकसितम्। व्यासदेवः कथयति –
‘रसायनविदश्चैव सुप्रयुक्तरसायनाः।
दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमैः॥’

नानाविधानां सुगन्धद्रव्याणां निर्माणार्थं पुष्पाणां तैलस्य च उपयोगः तदानीन्तनाः जनाः कुर्वन्ति स्म। तिल-सर्षपतैलस्य बहुशः उल्लेखो वर्तते।

अन्वयः :
(रसायनविदश्चैव ………… इवोत्तमैः) रसानविदः, सप्रयक्तरसायनाः च एव जरया भग्ना दृश्यन्ते, उतमैः नागैः नगा इव।

शब्दार्थाः :
पर्याप्तः-काफी-enough, sufficient; सुप्रयुक्त-ठीक प्रकार प्रयोग किए गए-well utilised ; भग्ना-टूटा हुआ, व्यर्थ-broken, useless; दृश्यन्ते-दिखाई देते हैं-appear; तदानीन्तनाः-उस समय के-of those times; सर्षप-सरसों-mustard.

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अनुवाद :
रसायनशास्त्र-महाभारत के समय में रसायनशास्त्र का काफी विकास हुआ। वहीं से औषध विज्ञान और धातु शास्त्र का विकास हुआ। व्यासदेव कहते हैं

‘रसायनशास्त्र के जानकार को उत्तम साँपों के द्वारा पर्वत के समान अच्छे प्रकार से प्रयोग किए गए रसायन पुराने होने के कारण व्यर्थ दिखाई देते हैं।

अनेक प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों को बनाने के लिए फूलों के तेल का उपयोग उस समय के लोग करते थे। तिल और सरसों के तेल का बहुत उल्लेख है।

English :
Chemistry, medical service and metallurgy are offshoot of Chemistry.

Sap of plants was used to produce scent. Sesamum and mustard oil is widely mentioned.

6. वैद्यकशास्त्रम्-मनुष्य सदा नीरोगः भवेत्। अत एव स्वस्थशरीरार्थं बहवः उपायाः वर्णिताः सन्ति। वैद्यकशास्त्रम् आरोग्यशास्त्रम् अपि कथ्यते। स्वास्थ्यघातकाः ये राजरोगादयः सन्ति। तेषां सर्वथा शमनाय द्विसप्ततिविधाः चिकित्साः करणीयाः। उल्लेख एवं विधः विद्यते –
‘द्वासप्ततिविधा चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया।
देशजातिकुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः ॥7॥

शान्तिपर्वणि59’ श्लोक का अन्वयः-(द्वासप्तति ………… समानुवर्णिताः॥)

शरीरस्य प्रतिक्रिया द्वासप्ततिविधा च एव। देश, जाति, कुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः (सन्ति)

शब्दार्थाः :
घातका-नष्ट करने वाले-destroyers;शमनाय-शान्ति/रोकने के लिए-to pacify; द्विसप्ततिविधाः-72 प्रकार की-of 72 types.

अनुवाद :
वैद्यशास्त्र-मनुष्य सदा नीरोगी रहे। इसलिए स्वस्थ शरीर के लिए बहुत से उपायों का वर्णन है। वैद्यशास्त्र को आरोग्यशास्त्र भी कहते हैं। जो स्वास्थ्य को नष्ट करने वाले राजरोग आदि है। उनकी हमेशा की शान्ति के लिए 72 इलाज करने चाहिएं। उनका उल्लेख इस प्रकार है-

‘शरीर की प्रतिक्रिया बहत्तर (72) प्रकार की ही है। देश, जाति और कुलों के धर्म का इसमें वर्णन हैं।’

English :
Medical science-Science of healthy living-72 treatments are known to cure diseases. Physical process-of 72 types-according to location (climate) race, and nature of families.

7. लौहशास्त्रम्-वयं जानीमः यत् सुवर्ण, रजतं, ताळं, सीसं, नपुः, अयः इति नाम्ना धातवः प्रसिद्धाः सन्ति। आभग्णस्वरूपेण, क्रयविक्रयव्यवहारसाधनत्वेन च सुवर्णरजतयोः उपयोगिता महाभारते वर्णिता अस्ति। राजप्रासादादीनां निर्माणे अयसः उपयोगः भवति स्म। सुवर्णस्य अग्नौ तापनेन शुद्धीकरणक्रमः तदानीन्तनस्य व्यवहारस्य प्रमाणम् उपस्थापयति –
‘यथा हि कनकं शुद्धं तापच्छेदनिघर्षणैः।
परीक्ष्येत तथा शिष्यान ईक्षेत्शीलगुणदिभिः॥४६॥शान्तिपर्वणि329

श्लोक का अन्वयः :
(यथा हि कनकं ………… शीतगुणादिभिः।।)
यथा हि शुद्धं कनकं तापच्छेद निघर्षणैः परीक्ष्येत तथा शिष्यान् शीलगुणादिभिः ईक्षेत्॥

शब्दार्थाः :
त्रपुः-रांगा-tin pewter; आभरण-आभूषण-ornament; अयः-लोहा -iron; राजप्रासादादिनाम्-राजमहल आदि के-of royal palaces etc; तापनेन-तपाने से-heating; तापच्छेदनिघर्षणैः-तपाकर, काटकर; घिसकर-heating, cutting and rubbing; परीक्ष्येत-परीक्षा करनी चाहिए-to be tested; ईक्षेत्-देखना चाहिए-to be seen.

अनुवाद :
लोहशास्त्र-हम जानते हैं कि सोना, चाँदी, ताँबा, सीसा, राँगा, लोहा आदि धातुएं संसार में प्रसिद्ध हैं। आभूषण बनाने में तथा खरीदने-बेचने के व्यवहार के साधन में सोना और चाँदी का उपयंग महाभारत में वर्णित है। राजमहल आदि के निर्माण में लोहे का प्रयोग होता था। सोने को अग्नि में तपा कर शुद्धीकरण का क्रम उस समय के व्यवहार का प्रमाण स्थापित करता है

‘जैसे शुद्ध सोना तपा कर, काट कर और घिसकर परखा जाता है, वैसे ही शिष्यों के शीलगुण आदि भी देखने चाहिएं।’

English :
Various metals-Silver and Gold were used in making ornaments and as means of exchange-Iron was very useful as building material. Gold was purified by heating in fire-It was tested in fire, by cutting and rubbing

8. वस्त्रनिर्माणम्-मानवस्य स्वभावोऽयम् अस्ति, यत् सा लज्जया चकीयं नश्वरम् अपि शरीरं वस्त्रेण आच्छादितुम् इच्छति। वैदिककालाद् एव वस्त्रनिर्माण-परम्परा वर्तते। महाभारते ऊर्ण-कापसि-कौशेयादिवस्त्राणां निर्माणस्य, तत्र तु स्वापेक्षितस्य वर्णस्य संयोजनस्प च वर्णनं मिलति।
यथा –
“यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्बरम्।
तादृशं कुरुते रुपम् एतदेवमवेहि में॥५॥ शान्तिपर्वणणि २६३”

अनेन ज्ञायते यद् इदं लक्षैकपद्यात्मकं महाकाव्यं महाभारतं एकतः पुरुषार्थचतुष्टयप्रकाशकं वर्तते, ततो अपि अधिकं ज्ञानविज्ञानयोः वैशा च समुपदिशति।

श्लोक का अन्वयः :
(यादृशेन हि ………… एतदेवमवेहि मे॥) हि यादृशेन वर्णेन शुक्लम् अम्बरं भाव्यते तादृशं रूपं कुरुते, एतद् एवम् एव मे (मतम्) अवेहि।

शब्दार्थाः :
आच्छादितुम्-ढंकने के लिए-to cover, to hide;कौशेयम्-रेशमी-silken; संयोजनस्य-मिलाने का-mixing; स्वापेक्षितस्य-अपनी अपेक्षा, इच्छा के-at sweet will; अम्बरम्-वस्त्र-clothes; वैशधम्-विस्तार पूर्वक-in detail; समुपदिशति-ठीक प्रकार सेinstruct; अवेहि-उपदेश करता है- advises.

अनुवाद :
वस्त्रनिर्माण-मानव का यह स्वभाव है कि वह लज्जा से अपने नश्वर शरीर को वस्त्र से ढंकने की इच्छा करता है। वैदिक काल से ही वस्त्र बनाने की परम्परा है। महाभारत में ऊन, कपास, रेशम आदि के वस्त्रों के निर्माण का और उनमें अपनी इच्छा के रंग मिलाने का वर्णन मिलता है। जैसे –

‘जैसे रंग से सफेद वस्त्र सुन्दर लगता है, वैसे ही रूप हो जाता है। यह ऐसे ही मेरा ‘विचार’ है।

इससे ज्ञात होता है कि यह एक लाख पद्यों वाला महाकाव्य ‘महाभारत’ एक ओर चार प्रकार के पुरुषार्थों का प्रकाशक है, इससे भी अधिक ज्ञान और विज्ञान, के विषयों का ठीक प्रकार से उपदेश करता है।

English :
Cloth manufacturing (texturing cloth manufacturing prevalent through the ages-coloured woollen, cotton and silken clothes were manufactured in the period of Mahabharata.

Mahabharata deals with four types of manliness. It also deals with topics of knowledge and science.

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MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 मदपरिणामः

MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Durva Chapter 9 मदपरिणामः (कथा) (पञ्चतन्त्रात्)

MP Board Class 10th Sanskrit Chapter 9 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक पद में उत्तर लिखिए)।
(क) रथकारस्य नाम किम् आसीत्? (रथकार का क्या नाम था?)
उत्तर:
उज्ज्वलकः (उज्जवलक)

(ख) रथकारः वने काम् अपश्यत्? (रथकार ने वन में किसे देखा?)
उत्तर:
उष्ट्रीम् (ऊँटनी को)

(ग) महतीघण्टा केन प्रतिबद्धा? (बड़ा घण्टा किसके बँधा था?)
उत्तर:
दासेरकेन (ऊँट के बच्चे के)

(घ) कः महानुष्ट्राः सञ्जातः? (कौन बड़ा ऊँट बन गया?)
उत्तर:
दासेरकः (ऊँट का बच्चा)

(ङ) रक्षापुरुषस्य प्रतिवर्ष का वृत्तिः? (रक्षा पुरुष का प्रतिवर्ष क्या वेतन था?)
उत्तर:
करभमेकम् (एक ऊँट)

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प्रश्न 2.
एकवाक्येन उत्तरं लिखत-(एक वाक्य में उत्तर लिखिए-)
(क) उज्ज्वलकः कां गृहीत्वा स्वस्थानाभिमुखः प्रस्थितः? (उज्ज्वलक किसे लेकर अपने घर की ओर चला था?)
उत्तर:
उज्ज्वलकः दासेरकयुक्तामुष्ट्रीं गृहीत्वा स्वस्थानाभिमुखः प्रस्थितः। (उज्ज्वलक ऊँट के बच्चे के साथ ऊँटनी को लेकर अपने घर की ओर चला था)

(ख) रथकारः पर्वतदेशे किमर्थं गतः? (रथकार पर्वतदेश में किसलिए गया?)
उत्तर:
रथकारः पल्लवानयनार्थं पर्वतदेशे गतः। (रथकार पत्तियाँ लाने के लिए पर्वतदेश में गया था।)

(ग) दासेरकाः आहारार्थं कुत्र गच्छन्ति? (ऊँट के बच्चे भोजन के लिए कहाँ जाते थे?)
उत्तर:
दासेरकाः आहारार्थं अधिष्ठानोपवनम् गच्छन्ति। (ऊँट के बच्चे भोजन के लिए नगर के बगीचे में जाते थे।)

(घ) दासेरकाः कस्मिन् समये गहमागच्छन्ति? (ऊँट के बच्चे किस समय घर आते थे?)
उत्तर:
दासरेकाः सायंतनसमये गृहमागच्छन्ति। (ऊँट के बच्चे शाम के समय घर आते थे।)

(ङ) उष्ट्रकथायाः सारः कः? (ऊँट की कथा का सार क्या है?)
उत्तर:
उष्ट्रकथायाः सारः अस्ति यत्-“यः सतां वचनादिष्टं मदेन न करोति सः घण्टोष्ट्र इव सत्वरम् विनश्यति।”

(ऊँट की कथा का सार यह है कि जो सज्जनों के वचनों को घमण्ड के कारण नहीं मानता है वह इस ऊँट के समान शीघ्र नष्ट हो जाता है।)

प्रश्न 3.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए-)
(क) उष्ट्री पीवरतनुः कथं सजाता? (ऊँटनी स्थूलशरीर वाली कैसे हुई?)
उत्तर:
उष्ट्री पल्लव भक्षणप्रभावाद् अहर्निशं पीवरतनुः सञ्जाता। (ऊँटनी पत्ते खाने के प्रभाव से दिन रात स्थूल शरीर वाली हो गई।)

(ख) रथकारः किमर्थं गुर्जरदेशं गतवान्? (रथकार किसलिए गुर्जरदेश में गया?)
उत्तर:
रथकारः कलभग्रहणाय गुर्जरदेशं गतवान्। (रथकार ऊँटनी लेने के लिए गुर्जर देश में गया।)

(ग) कः व्यापारः समीचीनः? (कौन सा व्यापार ठीक था?)
उत्तर:
उष्ट्रपरिपालनः व्यापारः समीचीनः। (ऊँट पालने का व्यापार ठीक था।)

प्रश्न 4.
यथायोग्यं योजयत- (उचित क्रम से जोडिए-)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 मदपरिणामः img 1
उत्तर:
(क) 5
(ख) 1
(ग) 2
(घ) 3
(ङ) 4

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प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् “आम्” अशुद्धवाक्यानां समक्षं “न” इति लिखत
(शुद्ध वाक्यों के सामने ‘आम्’ और अशुद्ध वाक्यों के सामाने ‘न’ लिखिए-)
(क) पल्लवभक्षणप्रभावात् पीवरतनुरुष्ट्री सजाता।
(ख) उज्ज्वलकः नित्यमेव दुग्धं गृहीत्वा स्वकुटुम्बं परिपालयति।
(ग) उज्ज्वलकेन महदुष्ट्रयूथं कृत्वा रक्षापुरुषो धृतः।
(घ) यूथाद् भ्रष्टः दासेरकः घण्टां वादयन्नागच्छति।
(ङ) कश्चित्सिंहो घण्टारवमाकर्ण्य समायातः।
उत्तर:
(क) आम्
(ख) आम्
(ग) आम्
(घ) आम्
(ङ) आम्

प्रश्न 6.
अघोलिखितक्रियापदानां धातुं लकारं पुरुषं वचनञ्च लिखत
(नीचे लिखे क्रियापदों के धातु, लकार, पुरुष व वचन लिखिए)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 मदपरिणामः img 2
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 मदपरिणामः img 3

प्रश्न 7.
अधोलिखितपदानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धिनाम लिखत
(नीचे लिखे पदों के सन्धि-विच्छेद करके सन्धि का नाम लिखिए)
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 मदपरिणामः img 4
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 मदपरिणामः img 5

प्रश्न 8.
समासविग्रहं कृत्वा समासनाम लिखत (समास का विग्रह कर समास का नाम लिखिए)
(क) प्रतिवर्षम्
(ख) दारिद्रयोपहतः
(ग) प्रसववेदनया
(घ) पीवरतनुः
(ङ) रथकारः
उत्तर:
MP Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 मदपरिणामः img 6

प्रश्न 9.
रेखाङ्कितपदान्याधृत्व प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (रेखाङ्कित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए-)
(क) रथकारः प्रतिवसति स्म। (रथकार रहता था।)
उत्तर:
कः प्रतिवसति स्मः? (कौन रहता था?)

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(ख) मम गृहे उष्ट्रः अस्ति। (मेरे घर में ऊँट है।)
उत्तर:
कस्थ गृहे उष्ट्रः अस्ति? (किसके घर में ऊँट है?)

(ग) स दुग्धं गृहीत्वा स्वकुटुम्बं परिपातयति। (वह दूध लेकर अपना परिवार पालता था।)
उत्तर:
सः किं गृहीत्वा स्वकुटुम्बं परिपालयति? (वह क्या लेकर अपना परिवार पालता था?)

(घ) सः यूथाद् भ्रष्टोऽभवत्। (वह झुण्ड से भटक गया।)
उत्तर:
सः कस्मात् भ्रष्टोऽभवत्? (वह किससे भटक गया?)

(ङ) कलभैः अभिहितम्। (ऊँटों के द्वारा कहा गया।)
उत्तर:
कैः अभिहितम्? (किनके द्वारा कहा गया?)

प्रश्न 10.
कथाक्रम संयोजयत-(क्रम से कथा बनाइए)।
(क) उष्ट्रः यूथाद् भ्रष्टोऽभवत्?
उत्तर:
रथकारः दारिद्र्योपहतः देशान्निष्क्रान्तः।

(ख) सिंहेन उष्ट्रः मारितः?
उत्तर:
वने प्रसववेदनया पीड्यमानाम् उष्ट्रीम् अपश्यत्।

(ग) रथकारः गुर्जरदेशं गत्वोष्ट्रीं गृहीत्वा स्वगृहमागतः?
उत्तर:
रथकारः गुर्जरदेशं गत्वोष्ट्रीं गृहीत्वा स्वगृहमागतः।

(घ) तेन प्रचुरा उष्ट्राः करभाश्च सम्मिलिताः?
उत्तर:
तेन प्रचुरा उष्ट्राः करभाश्च सम्मिलिताः।

(ङ) वने प्रसवेदनया पीड्यमानाम् उष्ट्रीम् अपश्यत्?
उत्तर:
उष्ट्रः यूथाद् भ्रष्टोऽभवत्।

(च) रथकारः दारिद्र्योपहतः देशान्निष्क्रान्तः।
उत्तर:
सिंहेन उष्ट्रः मारितः।

योग्यताविस्तार –

“मदपरिणामः” इत्यस्य पाठस्य कलेवरमाधृत्य सरलसंस्कृतसंवादरीत्या पाठविषयकचर्चा कुरुत। (‘मदपरिणामः’ इस पाठ पर आधारित सरल संस्कृत संवाद में पाठ विषयक चर्चा करो।) पञ्चतन्त्रस्य अन्याः कथाः पठत। (पञ्चतंत्र की अन्य कथाएँ पढ़िए।) संस्कृतसाहित्यस्य अन्याः कथाः पठत। (संस्कृतसाहित्य की अन्य कथाएँ पढ़िए।)

मदपरिणामः पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ ‘विष्णुशर्मा’ द्वारा रचित ‘पंचतन्त्र’ से लिया गया है। इस पाठ में घमण्ड के कारण प्राप्त फल का वर्णन किया गया है कि घमण्ड के कारण वह ऊँट सिंह द्वारा मार दिया गया। अतः व्यक्ति को कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए, अन्यथा परिणाम भयङ्कर होता है।

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मदपरिणामः पाठ का अनुवाद

1. कस्मिंश्चिदधिष्ठाने उज्ज्ालको नाम रथकारः प्रतिवसति स्म। स चातीव दारिद्रयोपहतश्चिन्तितवान्-‘अहो! धिगियं दरिद्रता मद्गृहे। यतः सर्वेऽपि जनः स्वकर्मणैव रतस्तिष्ठति। अस्मदीयः पुनापारो नानाधिष्ठानेऽर्हति। यतः सर्वलोकानां चिरन्तनाश्चतुर्भूमिका गृहाः सन्ति। मभ च नात्र। तत्किं मदीयेन रथकारत्वेन प्रयोजनम्।’ इति चिन्तयित्वा देशनिष्क्रान्तः। यात्कञ्चिद्वनं गच्छति तावद्गहराकारवनगहनमध्ये सूर्यास्तपनवेलायां स्वयूद् भ्रष्टां प्रसववेदनया पीड्यमानामुष्ट्रीमपश्यत्। स च दासेरकयुक्तामुष्ट्रीं गृहीत्वा स्वस्थानाभिमुखः प्रस्थितः। गृहमासाद्य रज्जु गृहीत्वा तामुष्ट्रिकां पबन्ध। ततश्य तीक्ष्णं परशुमादाय तस्याः पल्लवानयनार्थ पर्वतैकदेशे गतः। तत्र च नूतनानि कोमलानि बहूनि पल्ल्वानि छित्वा शिरसि समारोप्य तस्याग्रे निचिक्षेप। तया च तानि शनैः शनैर्भक्षितानि। पश्चात्पल्लवभक्षणप्रभावादहर्निशं पीवरतनुरुष्ट्री सजाता। सोऽपि दासेरको महानुष्ट्रः सञ्जातः।

शब्दार्थाः :
अधिष्ठाने-नगर में-town/city; दारिद्रयोपहतः-गरीबी से परेशान होकर-being disgusted with poverty; चतुर्भूमिकाः-चौमंजिला-four storeyed; गहाराकार-गुफा के आकार के-cave-shaped, cavern; स्वयूथाद्-अपने झुण्ड से-from own herd; दासेरक-ऊँट का बच्चा-young one of a camel; आसाद्य-पहुँचकर -reaching; रज्जुम्-रस्सी-rope; परशुमादाय-कुल्हाड़ी लेकर-taking an axe; समारोप्य-उठाकर-picking up; पीवरतनु-स्थूल शरीर-bulky, fatty.

अनुवाद :
किसी नगर में उज्जवलक नाम का रथकार रहता था। और वह बहुत अधिक गरीबी से परेशान होकर सोचने लगा-“आह! मेरे घर की इस गरीबी को धिक्कार है। क्योंकि सभी लोग अपने कर्म में लगे हुए हैं। फिर मेरा काम ही इस नगर के योग्य नहीं है। क्योंकि सब लोगों के बहुत समय से चौमंजिला घर हैं। और मेरा यहाँ नहीं है। तो मेरा रथ बनाने का क्या प्रयोजन? यह सोचकर देश से चला गया। जब वह एक वन में गया तब गुफा के आकार के घने जंगल के बीच में सूर्यास्त के समय अपने झुण्ड से भटकी प्रसव पीड़ा से पीड़ित एक ऊँटनी को देखा। और वह ऊँट के बच्चे से युक्त ऊँटनी को लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँच कर रस्सी लेकर उस ऊँटनी को बाँध दिया। और फिर तीखी कुल्हाड़ी लेकर उसके लिए पत्ते लाने के लिए एक पर्वतीय प्रदेश में गया और वहाँ से बहुत से नये व कोमल पत्ते काटकर सिर पर उठाकर लाकर उसके आगे फेंक दिए। उस ऊँटनी के द्वारा उनको धीरे-धीरे खाया गया। पत्ते खाने के बाद उसके प्रभाव से रात दिन वह ऊँटनी स्थूल शरीर वाली होती गई। उसका बच्चा भी बड़ा ऊँट बन गया।

English :
Ujjwalak-a maker of chariots-fed up with acute poverty-leaves town-reached a forest-saw a she camel in labour pains-delivered a young one-Ujjwalak brought both home-fed them on tender leaves-became fatty-young one alse grew up.

2. ततः स नित्यमेव दुग्धं गृहीत्वा स्वकुटुम्वं परिपालयति। अथ रथकारेण वल्लभत्वाद्दासेरकग्रीवायां महतीघण्टा प्रतिबद्धा। पश्चाद्रथकारो व्यचिन्तयत्- ‘अहो! किमन्यैर्दुष्कृतकर्मभिः, यावन्ममैतस्मादेवोष्ट्रपरिपालनादस्य कुटुम्बस्य भव्यं सजातम् । तत्किमन्येन व्यापारेण ।’ एवं विचिन्त्य गहमागत्य प्रियामाह-‘भद्रे! समीचीनोऽयं व्यापारः। तव सम्मतिश्चेत्कुतोऽपि धनिकात्किञ्चिद् द्रव्यमादाय मया गुर्जरदेशे गन्तव्यं कलभग्रहणाय। तावत्वयैतौ यत्नेन रक्षणीयौ। यावदहमपरामुष्ट्री नीत्वा समागच्छामि।’

शब्दार्थाः :
वल्लभत्वात्-प्रेमवश-outofaffection; ग्रीवायाम्-गर्दन में-ontheneck; दृष्कृत-कठिनाई से करने वाले-difficult, arduous; भव्यम्-समृद्ध-progressive, weil off; कलभग्रहणाय-ऊँटों को लेने के लिए-to fetch camels; समीचीन-ठीक/रचित है-proper.

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अनुवाद :
तब से वह प्रतिदिन दूध लेकर अपने परिवार का पालता है। बाद में रथकार के द्वारा प्रेमवश ऊँट के बच्चे के गले में बड़ा घण्टा बाँध दिया गया। उसके बाद रथकार ने सोचा-“अरे! अन्य दुष्कृत कर्मों से क्या लाभ, जब मेरे इस ऊँट को पालने से ही परिवार समृद्ध हो गया। तब अन्य किसी व्यापार से क्या।’ ऐसा सोचकर घर आकर पत्नी से कहा-‘प्रिय! यह व्यापार/काम ठीक है। यदि तुम्हारी सम्मति हो तो किसी भी धनिक से कुछ धन लेकर मेरे द्वारा गुर्जरप्रदेश में ऊँटों को लाने के लि जाना चाहिए। तब तक तुम इन दोनों की रक्षा करने का प्रयास करो। जब तक मैं दूसरी ऊँटनी लेकर आता हूँ।”

English :
Feeds family on milk-tied bell around young-one of camel-thought of borrowing money and camel rearing as sole profession-went to Gujjar region to bring another she camel.

3. ततश्च गुर्जरदेशं गत्वोष्ट्रीं गृहीत्वा स्वगृहमागतः। किंबहुना? तेन तथा कृतं यथा तस्य प्रचुरा उष्ट्राः करभाश्च सम्मिलिताः। ततस्तेन महदुष्ट्रयूथं कृत्वा रक्षापुरुषो धृतः। तस्य प्रतिवर्षं वृत्या करभमेकं प्रयच्छति। प्रतिवर्षं अन्यच्चाहर्निशं दुग्धपानं तस्य निरूपितम् । एवं रथकारोऽपि नित्यमेवोष्ट्रीकरभव्यापारं कुर्वन्सुखेन तिष्ठति। अथ ते दासेरका अधिष्ठानोपवनाहारार्थ गच्छन्ति। कोमलवल्लीर्यथेच्छया भक्षयित्वा महति सरसि पानीयं पीत्वा सायंतनसमये मन्दं मन्दं लीलया गृहमागच्छन्ति। स च पूर्वदासेरको मदातिरेकात्पृष्ठे आगत्य मिलति।

शब्दार्थ :
किं बहुना-और अधिक क्या-What more; करभाः-बहुत से ऊँट-many youngones of camels; वृत्या-वेतन में-in salary; निरुपितम्-निर्धारित किया-fixed; मदातिरेकात्-अधिक घमण्ड के कारण-due to excessive pride; पृष्ठे-बाद में-afterwards.

अनुवाद :
और वहाँ से गुर्जर देश जाकर ऊँटनी लेकर अपने घर आ गया। और अधिक क्या? उसने ऐसा किया जिससे उसके पास बहुत से ऊँट ऊँटनी इकट्ठे हो गए। तब उसने इतने बड़े ऊँट के झुण्ड बनाकर एक पहरेदार रखा। उसको हर. वर्ष वेतन में एक ऊँट दे देता। हर वर्ष बाकियों से दिन-रात दूध पीना उसने.निर्धारित किया। इस प्रकार रथकार भी सदा ही ऊँट-ऊँटनी के व्यापार को करते हुए सुख से रहने लगा। फिर वे सारे ऊँट के बच्चे नगर के उपवन में आहार के लिए जाते। कोमल पत्तियों को इच्छानुसार खाकर बहुत सारा सरोवर का जल पीकर सांयकाल में धीरे-धीरे खेलते हुए घर आ जाते। और वह पहले वाला ऊँट का बच्चा अत्यधिक घमण्ड से युक्त बाद में आकर मिलता।

English :
Brought a she camel from gujjar region a flock of camels grew up–engaged a guard-sought pleasure in their service-the herd went to graze in the grove of the town-returned after feeding on leaves and drinking of river water-previous young one of camels joined last of all.

4. ततस्तैः कलभैरभिहितम्- ‘अहो मन्दमतिरयं दासेरको यथा यूथाद् भ्रष्टः पृष्ठे स्थित्वा घण्टा वादयन्नागच्छति। यदि कस्यापि दुष्टसत्त्वस्य मुखे पतिष्यति, तन्नूनं मृत्युमवाप्स्यति। अथ तस्य तद्वनं गाहमानस्य कश्चित्सिहो घण्टारवमाकर्ण्य समायातः। यावदवलाकयति, तावदुष्ट्रीदासेरकाणां यूथं गच्छति। एकस्तु पुनः पृष्ठे क्रीड़ां कुर्वन्दल्लरीश्चरन्यावत्तिष्ठति, तावदन्ये दासेरकाः पानीयं पीत्वा स्वगृहे गताः।

सोऽपि वनान्निष्क्रम्य यावद्दिशोऽवलोकयति, तावन्नकञ्चिन्मार्गं पश्यति वेत्ति च। यूथाद् भ्रष्टो मन्दं मन्दं बृहच्छब्दं कुर्वन्यावत्कियदूरं गच्छति तावत्तच्छब्दानुसारी सिंहोऽपि क्रमं कृत्वा निर्भतोऽग्रे व्यवस्थितः। ततो यावदुष्ट्रः समीपमागतः, तावत्सिंहेन लम्भयित्वा ग्रीवायां गृहीतो मारितश्च। अतोऽहं ब्रवीमि –
सतां वचनमादिष्टं मदेन न करोति यः।
स विनाशमवाप्नोति घण्टोष्ट्र इव सत्वरम्॥

शब्दार्था :
अभिहितम्-कहा-said; गाहमानस्य-विचरण करता हुआ-wandering; समायात-आ गया-came; आकर्ण्य-सुनकर-hearing; निभृतः-चुपचाप-silently; लम्भयित्वा-छलाँग लगाकर-jumping; व्यवस्थितः-खड़ा हुआ था-stood; अवाप्नोति-प्राप्त होता है-seeks, is subject to, meets.

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अनुवाद :
तब उन ऊँटों के द्वारा कहा गया-“अरे! यह तो मन्दबुद्धि बच्चा है, जो झुण्ड से अलग होकर पीछे खड़े होकर घण्टा बजाता हुआ आता है। यदि किसी दुष्ट प्राणी के मुँह में पड़ गया तो निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। फिर उस वन में विचरण करते हुए कोई शेर घण्टे की आवाज सुनकर आ गया। जब उसने देखा, तब ऊँटनी के बच्चों का झुण्ड जा रहा था। एक तो फिर पीछे खेलता हुआ पत्तियाँ खाता हुआ वहीं खड़ा हो गया, तब तक बाकी बच्चे पानी पीकर अपने घर चले गए।

वह भी वन से निकलकर जब उस दिशा में देखता है, तब कोई रास्ता न देखता है और न ही पहचानता है। झुण्ड से अलग धीरे-धीरे आवाज करता. हुआ जब कुछ दूर जाता है, तब शब्द का अनुसरण करता हुआ शेर भी पीछा करके चुपचाप आगे खड़ा हो जाता है। तब जैसे ही ऊँट पास आता है, वैसे ही वह शेर के द्वारा छलाँग लगाकर गर्दन से पकड़ा जाता है और मार दिया जाता है। इसलिए मैं कहता हूँ

जो सज्जनों के कहे वचनों का घमण्ड के कारण पालन नहीं करता वह इस घण्टे वाले ऊँट के समान शीघ्र विनाश को प्राप्त हो जाता है।

English :
The flock of camels predicted-dull witted camel will be killed-A lion-heard sound of bell-stands on the way-catches by the neck-killed at once. Moral-Pride hath a fall.

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MP Board Class 10th Science Solutions Chapter 16 प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन

MP Board Class 10th Science Solutions Chapter 16 प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन

MP Board Class 10th Science Chapter 16 पाठान्तर्गत प्रश्नोत्तर

प्रश्न श्रृंखला-1 # पृष्ठ संख्या 302

प्रश्न 1.
पर्यावरण-मित्र बनने के लिए आप अपनी आदतों में कौन-से परिवर्तन ला सकते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण-मित्र बनने के लिए हम अपनी आदतों में निम्न प्रकार परिवर्तन ला सकते हैं –

  1. हम प्राकृतिक संसाधनों (प्राकृतिक सम्पदा) का संरक्षण के लिए कम उपयोग’, ‘पुनः चक्रण’ एवं ‘पुनः उपयोग’ की नीति अपनाकर पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सकते हैं।
  2. हम जल, वायु, मृदा आदि को स्वयं भी प्रदूषित नहीं करेंगे और न औरों को करने देंगे।
  3. पर्यावरण के प्रति जनजागरण (जागरूकता) की अलख जगाएँगे।

प्रश्न 2.
संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि के उद्देश्य से परियोजना के क्या लाभ हो सकते हैं?
उत्तर:
अगर संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि के उद्देश्य से परियोजना वर्तमान पीढ़ी के लिए बहुत लाभदायक होगी क्योंकि आर्थिक विकास की दर तीव्र होगी।

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प्रश्न 3.
यह लाभ लम्बी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई गई परियोजनाओं के लाभ से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
अगर हम संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि के उद्देश्य से परियोजनाएँ तैयार करते तो उसका लाभ वर्तमान पीढ़ी अपनी आवश्यकतानुसार उठा सकती है लेकिन लम्बी अवधि की परियोजनाओं से वर्तमान पीढ़ी भी लाभान्वित होगी साथ ही साथ भावी पीढ़ी भी इसका लाभ उठाएगी।

प्रश्न 4.
क्या आपके विचार में संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए? संसाधनों के समान वितरण के विरुद्ध कौन-कौन ताकतें कार्य कर सकती हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के सभी प्राकृतिक संसाधनों का सम्पूर्ण मानव समुदाय में समान वितरण होना चाहिए जिससे प्रत्येक व्यक्ति उस साधन का उपयोग कर सके। मनुष्य का लालच, भ्रष्टाचार, समृद्धशाली एवं शक्तिशाली लोगों का दल इस समान वितरण के विरुद्ध कार्य कर सकता है।

प्रश्न श्रृंखला-2 # पृष्ठ संख्या 306

प्रश्न 1.
हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण क्यों करना चाहिए?
उत्तर:
हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण करना चाहिए क्योंकि वन एवं वन्य जीव हमारे लिए बहुत उपयोगी होते हैं।

  1. वनों से हमें भोजन, ईंधन, इमारती लकड़ी, औषधियाँ आदि अनगिनत उपयोगी सामग्री प्राप्त होती है।
  2. वन हमारे पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। हमें प्राण वायु ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, भूमि क्षरण रोकते हैं तथा वर्षा को आमंत्रित करते हैं।
  3. वन्य जीवों से हमको बहुकीमती वस्तुएँ एवं औषधियाँ प्राप्त होती हैं; जैसे-हाथी दाँत, कस्तूरी, लाख, चमड़ा आदि।

प्रश्न 2.
संरक्षण के लिए कुछ उपाय सुझाइए।
उत्तर:
वन एवं वन्य जीव संरक्षण के उपाय:

  1. वनों के अतिदोहन पर अंकुश लगाकर तथा वृक्षारोपण के द्वारा वनों का संरक्षण किया जा सकता है।
  2. वन्य जीवों के शिकार (वध) पर रोक लगाकर एवं अभयारण्यों द्वारा उनका संरक्षण किया जा सकता है।

प्रश्न श्रृंखला-3 # पृष्ठ संख्या 310

प्रश्न 1.
अपने निवास क्षेत्र के आस-पास जल संग्रहण की परम्परागत पद्धति का पता लगाइए।
उत्तर:
हमारे क्षेत्र के आस-पास जल संग्रहण की परम्परागत पद्धति तालाब (पोखर) है।

प्रश्न 2.
इस पद्धति की पेय जल व्यवस्था पर्वतीय क्षेत्रों में, मैदानी क्षेत्र अथवा पठार क्षेत्र से तुलना कीजिए।
उत्तर:
मैदानी क्षेत्र अथवा पठार क्षेत्र में निचले स्थानों पर जल का संग्रहण एक तालाब या पोखर या झील के रूप में होता है तथा पर्वतीय क्षेत्र में जल के बहाव को रोकने के लिए छोटे बाँध बनाने पड़ते हैं जिससे जल का संग्रहण किया जा सके।

प्रश्न 3.
अपने क्षेत्र में जल के स्रोत का पता लगाइए। क्या इस स्रोत से प्राप्त जल उस क्षेत्र के सभी निवासियों को उपलब्ध है?
उत्तर:
हमारे क्षेत्र में जल का प्रमुख स्रोत भौम जल है जो कुओं या नलकूपों के माध्यम से उस क्षेत्र के सभी निवासियों को उपलब्ध है।

MP Board Class 10th Science Chapter 16 पाठान्त अभ्यास के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए आप उसमें कौन-कौन से परिवर्तन सुझा सकते हैं?
उत्तर:
अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए हम निम्न परिवर्तन सुझाएँगे:

  1. सौर ऊर्जा उपकरणों का अधिकाधिक प्रयोग करना।
  2. किचन गार्डन बनाना तथा पौधारोपण करना।
  3. घरेलू कचरे को दो अलग-अलग पात्रों में रखना एक में जैव निम्नीकरणीय एवं दूसरे में अजैव निम्नीकरणीय।
  4. फल-सब्जियों के छीलन एवं अवशेषों को किचन गार्डन में पौधों में डालना।
  5. वर्षा जल संग्रहण करना।
  6. पॉलीथीन एवं प्लास्टिक की थैलियाँ एवं बर्तनों के स्थान पर कपड़े, कागज एवं पत्तों से बने थैले एवं बर्तनों को उपयोग में लाना।
  7. घर के अन्दर एवं बाहर की सफाई व्यवस्था बनाए रखना।
  8. संसाधनों का न्यूनतम मितव्ययिता के साथ उपयोग करना।

प्रश्न 2.
क्या आप अपने विद्यालय में कुछ परिवर्तन सुझा सकते हैं जिनसे इसे पर्यानुकूलित बनाया जा सके?
उत्तर:
हाँ, हम अपने विद्यालय को पर्यानुकूलित बनाने हेतु निम्न सुझाव दे सकते हैं –

  1. विद्यालय के रिक्त स्थानों एवं प्रवेश मार्ग के दोनों ओर पौधारोपण करना तथा घास के मैदानों (लॉन) का प्रबन्ध करना।
  2. कूड़ा-करकट इत्यादि कूड़ेदान में डालना।
  3. शौचालय एवं पेशाबघरों की उचित व्यवस्था करना।
  4. शान्ति का वातावरण बनाए रखना।
  5. जल का अपव्यय नहीं करना।
  6. जहाँ आवश्यकता हो वहीं पर पंखे एवं बल्बों को चलाना।
  7. व्यर्थ विद्युत का अपव्यय नहीं करना।
  8. विद्यालय परिसर की स्वच्छता एवं सफाई का ध्यान रखना।

प्रश्न 3.
इस अध्याय में हमने देखा कि हम हम वन एवं वन्य जन्तुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। इनमें से किसे वन उत्पाद प्रबन्धन हेत निर्णय लेने के अधिकार दिए जा सकते हैं? आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
उत्तर:
हमारे विचार से वन उत्पाद प्रबन्धन हेतु निर्णय लेने का अधिकार स्थानीय निवासियों को दिया जा सकता है। इससे खाद्य पदार्थ, चारा, औषधि आदि की आवश्यकताओं की पूर्ति तो होती रहेगी, साथ ही ईंधन भी मिलता रहेगा, लेकिन पेड़ों का निर्ममता के साथ कटान नहीं होगा और अन्य वन उत्पादों का दोहन नहीं होगा तथा वन्य जीवों का अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए वध भी नहीं होगा। इससे वन एवं वन सम्पदा दोनों ही संरक्षित रहेंगे।

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प्रश्न 4.
अकेले व्यक्ति के रूप में आप निम्न के प्रबन्धन में क्या योगदान दे सकते हैं?
(a) वन एवं वन्य जन्तु।
(b) जल संसाधन।
(c) कोयला एवं पेट्रोलियम।
उत्तर:
अकेले व्यक्ति के रूप में हम विभिन्न क्षेत्रों में प्रबन्धन के लिए निम्न योगदान दे सकते हैं –
(a) वन एवं वन्य जन्तु:

  1. अतिदोहन को रोकना।
  2. वन एवं वन्य जन्तुओं का संरक्षण करना।
  3. वृक्षारोपण एवं उनकी देखभाल करना।

(b) जल संसाधन:

  1. जल संसाधनों को प्रदूषण से बचाना।
  2. जल संसाधनों में कचरे, वाहित मलमूत्र आदि को प्रवाहित न करना।
  3. जल के दुरुपयोग को रोकना।
  4. वर्षा जल संग्रहण करना।

(c) कोयला एवं पेट्रोलियम:

  1. ईंधन एवं ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों का अत्याधिक प्रयोग करना।
  2. साइकिल/बस से अथवा पैदल चलना।
  3. घरों में CFL एवं फ्लोरोसेण्ट ट्यूब तथा एल.ई.डी. लाइट का प्रयोग करना।
  4. सर्दियों में हीटर का प्रयोग न करके गर्म कपड़ों के द्वारा ठण्ड से बचना।
  5. मकान में लिफ्ट के स्थान पर सीढ़ियों का प्रयोग करना।

प्रश्न 5.
अकेले व्यक्ति के रूप में आप विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों की खपत कम करने के लिए। क्या कर सकते हैं?
उत्तर:
अकेले व्यक्ति के रूप में हम विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों की खपत कम करने के लिए निम्न कदम उठाएँगे –

  1. उत्पादों को मितव्ययिता के साथ उपयोग करेंगे।
  2. उत्पादों को बर्बादी से रोकेंगे।
  3. इनकी बचत के लिए हम वैकल्पिक मार्ग चुनेंगे।
  4. अपनी आवश्यकताओं को सीमित करेंगे।

प्रश्न 6.
निम्न से सम्बन्धित ऐसे पाँच कार्य लिखिए जो आपने पिछले एक सप्ताह में किए हैं –
(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है।
उत्तर:
[निर्देश- इस प्रश्न का उत्तर छात्र स्वयं लिखें।

प्रश्न 7.
इस अध्याय में उठाई गई समस्याओं के आधार पर आप अपनी जीवन-शैली में क्या परिवर्तन लाना चाहेंगे जिससे हमारे संसाधनों के सम्पोषण को प्रोत्साहन मिल सके?
उत्तर:
अध्याय में दी गई समस्याओं के आधार पर अपने संसाधनों के सम्पोषण के लिए हम अपनी जीवन-शैली निम्न प्रकार बदलेंगे –

  1. ऐसी वस्तुओं के उपयोग कम कर देंगे जिनसे वन एवं वन्य जीवों तथा वन सम्पदा को क्षति पहुँचती है।
  2. अपनी आवश्यकताओं पर नियन्त्रण रखेंगे।
  3. ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग अधिकाधिक करेंगे।
  4. जीवाश्म ईंधन (खनिज तेलों) के उपयोग को कम करने के लिए अधिकतर पैदल, साइकिल या बसों का उपयोग करेंगे।
  5. जल की बचत करेंगे तथा प्रयुक्त जल को दूसरे भागों में उपयोग में लाएँगे।
  6. कम खर्च, पुनःचक्रण एवं पुन:उपयोग के सिद्धान्त को अपनाएँगे।

MP Board Class 10th Science Chapter 16 परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

MP Board Class 10th Science Chapter 16 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में प्राकृतिक स्रोत कौन-सा नहीं है?
(a) मृदा।
(b) जल।
(c) विद्युत्।
(d) वायु (पवन)।
उत्तर:
(c) विद्युत्।

प्रश्न 2.
विश्व में सबसे तेजी से कम होने वाला प्राकृतिक संसाधन है –
(a) जल।
(b) वन।
(c) पवन।
(d) सौर प्रकाश।
उत्तर:
(b) वन।

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प्रश्न 3.
प्राकृतिक स्रोतों की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा है, प्राकृतिक स्रोत वे वस्तुएँ हैं जो –
(a) केवल भूमि पर मौजूद हैं।
(b) प्रकृति का एक उपहार है जो मानव जाति के लिए बहुत लाभदायक होता है।
(c) मानव निर्मित वस्तुएँ हैं जो प्रकृति में रखी गई हैं।
(d) केवल जंगलों में मिलती हैं।
उत्तर:
(b) प्रकृति का एक उपहार है जो मानव जाति के लिए बहुत लाभदायक होता है।

प्रश्न 4.
गंगा नदी में प्रचुर मात्रा में कॉलीफॉर्म बैक्टीरियों के पाये जाने का मुख्य कारण है –
(a) अधजले शवों को जल में प्रवाहित करना।
(b) इलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योग के अपशिष्ट को बहाना।
(c) कपड़े धोना।
(d) भस्म एवं अस्थियाँ का विसर्जन।
उत्तर:
(a) अधजले शवों को जल में प्रवाहित करना।

प्रश्न 5.
एक नदी के जल का नमूना अम्लीय पाया गया जिसकी pH मान का परिसर 3.5 से 4.5 थी। नदी के किनारे बहुत-सी फैक्टरियाँ थीं जो अपने अपशिष्टों को नदी में बहा देती थीं। किन फैक्टरियों में से किसका वाहित अपशिष्ट नदी के जल के pH मान को कम करने का मुख्य कारण है?
(a) साबुन एवं डिटर्जेण्ट बनाने वाली फैक्टरी।
(b) लैड बैटरी बनाने वाली फैक्टरी।
(c) प्लास्टिक के कण बनाने वाली फैक्टरी।
(d) ऐल्कोहॉल बनाने वाली फैक्टरी।
उत्तर:
(b) लैड बैटरी बनाने वाली फैक्टरी।

प्रश्न 6.
फ्रैशवाटर पौधे एवं जन्तुओं के जीवन संचालन के लिए सर्वश्रेष्ठ pH रैंज होगी –
(a) 6.5 – 7.5
(b) 2.0 – 3.5
(c) 3.5 – 5.0
(d) 9.0 – 10.5
उत्तर:
(a) 6.5 – 7.5

प्रश्न 7.
लम्बे समय तक प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिए तीन ‘री’ हैं –
(a) री-साइकिल, री-जेनेरेट, री-यूज।
(b) री-डयूस, री-जेनेरेट, री-यूज।
(c) री-डयूस, री-यूज, री-डिस्ट्रीब्यूट।
(d) री-डयूस, री-साइकिल, री-यूज।
उत्तर:
(d) री-डयूस, री-साइकिल, री-यूज।

प्रश्न 8.
जैव-विविधता के सन्दर्भ में निम्न कुछ कथन दिए गए हैं। उन कथनों का चयन कीजिए जो जैव-विविधता की अवधारणा की सही व्याख्या करते हैं –
(i) जैव-विविधता किसी क्षेत्र में उपस्थिति जन्तु एवं वनस्पतियों की विभिन्न समष्टियों से सम्बन्ध रखती है।
(ii) जैव-विविधता केवल किसी क्षेत्र के पौधों से सम्बन्ध रखती है।
(iii) जैव-विविधता जंगलों में अधिक पायी जाती है।
(iv) जैव-विविधता किसी क्षेत्र में रहने वाले किसी समष्टि के कुल जीवों की संख्या से सम्बन्धित है।
(a) (i) एवं (ii)
(b) (ii) एवं (iv)
(c) (i) एवं (iii)
(d) (ii) एवं (iii)
उत्तर:
(c) (i) एवं (iii)

प्रश्न 9
निम्न दिए गए कथनों में से उन कथनों का चयन कीजिए जो संपोषणीय विकास की सही व्याख्या करते हैं –
(i) पर्यावरण को कम से कम हानि पहुँचाने वाला नियोजित विकास।
(ii) विकास पर्यावरण को चाहे कितनी भी हानि क्यों न पहँचाए।
(iii) पर्यावरण के संरक्षण के लिए सभी विकास कार्यों को रोकना।
(iv) सभी दावेदारों द्वारा स्वीकार्य विकास।
(a) (i) एवं (iv)
(b) (ii) एवं (iii)
(c) (ii) एवं (iv)
(d) केवल (iii)
उत्तर:
(a) (i) एवं (iv)

प्रश्न 10.
हमारे देश में विस्तृत वनों का सफाया कर दिया गया है और केवल एक समष्टि के पौधे उगाए गए हैं। यह आदत प्रोत्साहन देती है-
(a) उस क्षेत्र की जैव-विविधता को।
(b) क्षेत्र में एकल फसल को।
(c) प्राकृतिक वनों के विकास को।
(d) क्षेत्र के पारितन्त्र का संरक्षण करती है।
उत्तर:
(b) क्षेत्र में एकल फसल को।

प्रश्न 11.
सफल वन संरक्षण कूटनीति में सम्मिलित होना चाहिए-
(a) उच्चतम पोषी स्तर के जन्तुओं का संरक्षण।
(b) केवल उपभोक्ताओं का संरक्षण।
(c) केवल शाकाहारी उपभोक्ताओं का संरक्षण।
(d) सभी भौतिक एवं जैवीय घटकों के संरक्षण की विशद् योजना।
उत्तर:
(d) सभी भौतिक एवं जैवीय घटकों के संरक्षण की विशद् योजना।

प्रश्न 12.
चिपको आन्दोलन का प्रमख सन्देश है –
(a) वन संरक्षण के प्रयासों में सामूहिक सामुदायिक भागीदारी।
(b) वन संरक्षण के प्रयासों में सामुदायिक भागीदारी को पृथक रखना।
(c) विकास कार्यों के लिए वनों के वृक्षों को काट डालना।
(d) सरकारी एजेन्सियों को बिना जवाबदेही के वनों को नष्ट करने का आदेश देने का अधिकार।
उत्तर:
(a) वन संरक्षण के प्रयासों में सामूहिक सामुदायिक भागीदारी।

प्रश्न 13.
हमारे देश में अनेक स्थापित बाँधों की ऊँचाई बढ़ाने के प्रयास किए गए जैसे टेहरी एवं अल्मेरी बाँध नर्मदा से होकर। निम्न में से सही कथनों का चयन कीजिए जो बाँधों की ऊँचाई बढ़ाने के दुष्परिणाम होंगे –
(i) क्षेत्र के सभी भू-पादप एवं जन्तुओं का समूह नाश हो जाएगा।
(ii) क्षेत्र में रहने वाले सभी निवासी एवं घरेलू पशु विस्थापित हो जाएँगे।
(iii) कीमती कृषि भूमि का स्थायी नाश हो सकता है।
(iv) यह मनुष्यों के लिए स्थायी रोजगार सृजित होंगे।
(a) (i) एवं (ii)
(b) (i), (ii) एवं (iii)
(c) (ii) एवं (iv)
(d) (i), (iii) एवं (iv)
उत्तर:
(b) (i), (ii) एवं (iii)

प्रश्न 14.
संक्षिप्त शब्द GAP का विस्तृत रूप लिखिए –
(a) Government Agency for Pollution Control
(b) Gross Assimilation by Photosynthesis
(c) Ganga Action Plan
(d) Government Agency for Animal Protection
उत्तर:
(c) Ganga Action Plan

प्रश्न 15.
असत्य कथन का चयन कीजिए –
(a) आर्थिक विकास पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है।
(b) संपोषणीय विकास वर्तमान पीढ़ी के विकास को तो प्रोत्साहित करता ही है साथ ही भावी पीढ़ी के लिए संसाधनों का संरक्षण भी करता है।
(c) संपोषणीय विकास दावेदारों की विचारधारा को महत्व नहीं देता।
(d) संपोषणीय विकास दीर्घकालीन योजना और स्थायी विकास है।
उत्तर:
(c) संपोषणीय विकास दावेदारों की विचारधारा को महत्व नहीं देता।

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प्रश्न 16.
निम्न में कौन प्राकृतिक संसाधन नहीं है?
(a) आम का पेड़।
(b) सर्प (साँप)।
(c) पवन।
(d) लकड़ी का घर।
उत्तर:
(d) लकड़ी का घर।

प्रश्न 17.
असत्य कथन का चयन कीजिए –
(a) वनों से हमको विभिन्न प्रकार के उत्पाद मिलते हैं।
(b) वनों में अधिकतर पादप विविधता मिलती है।
(c) वन मृदा का संरक्षण नहीं करते हैं।
(d) वन जल का संरक्षण करते हैं।
उत्तर:
(c) वन मृदा का संरक्षण नहीं करते हैं।

प्रश्न 18.
बंगाल के अराबाढ़ी वन क्षेत्र में अधिकता है –
(a) टीक वृक्षों की।
(b) साल वृक्षों की।
(c) बाँस वृक्षों की।
(d) मेंग्रूव की।
उत्तर:
(b) साल वृक्षों की।

प्रश्न 19.
भूमि जल स्तर क्षीण नहीं होगा-
(a) वनों के विकास एवं वृद्धि से।
(b) ताप विद्युत घरों से।
(c) वनों की क्षति एवं वर्षा की कमी से।
(d) उच्च जल माँग वाली फसलों के उगाने से।
उत्तर:
(a) वनों के विकास एवं वृद्धि से।

प्रश्न 20.
बड़े बाँध बनाने का विरोध इसलिए है –
(a) सामाजिक कारण।
(b) आर्थिक कारण।
(c) पर्यावरणीय कारण।
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 21.
खादिन, बंधिस, अहार एवं कट्टा आदि प्राचीन परम्परागत संरचनाएँ हैं जो निम्न का उदाहरण –
(a) अन्न भण्डारण।
(b) काष्ट भण्डारण।
(c) जल संग्रहण।
(d) मृदा संरक्षण।
उत्तर:
(c) जल संग्रहण।

प्रश्न 22.
निम्न में से पदों का सही संयोग (युग्म) चुनिए जिसमें जीवाश्म ईंधन नहीं है –
(a) पवन, समुद्र (सागर) एवं कोयला।
(b) कैरोसीन, पवन एवं ज्वार।
(c) पवन, लकड़ी एवं सूर्य।
(d) पेट्रोलियम, लकड़ी, सूर्य।
उत्तर:
(c) पवन, लकड़ी एवं सूर्य।

प्रश्न 23.
निम्न में से पर्यावरण-मित्र क्रियाकलाप का चयन कीजिए –
(a) आवागमन के लिए कार का उपयोग करना।
(b) खरीददारी के लिए पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग।
(c) कपड़ों को रंगने के लिए रासायनिक रंगों (डाई) का इस्तेमाल करना।
(d) सिंचाई के लिए ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु पवनचक्की का उपयोग करना।
उत्तर:
(d) सिंचाई के लिए ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु पवनचक्की का उपयोग करना।

प्रश्न 24.
बाढ़ प्रभावित खड्डों या नालियों में चैकडेम बनाना आवश्यक है क्योंकि वे –
(i) सिंचाई के लिए जल संग्रह करते हैं।
(ii) जल संचय करते हैं तथा मृदा अपरदन को रोकते हैं।
(iii) भू-जल संग्रह करते हैं।
(iv) जूल को स्थायी रूप से संग्रह कर लेते हैं।
(a) (i) एवं (iv)
(b) (ii) एवं (iii)
(c) (iii) एवं (iv)
(d) (ii) एवं (iv)
उत्तर:
(b) (ii) एवं (iii)

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ………. हेतु अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार की व्यवस्था भारत सरकार ने की।
  2. सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में …… आन्दोलन का काफी प्रचार-प्रसार हुआ।
  3. वर्षा के जल को एकत्रित करके भूमि के अन्दर संग्रहण करने की प्रक्रिया …….. कहलाती है।
  4. जल को नष्ट होने या समाप्त होने तथा प्रदूषित होने से बचाने की प्रक्रिया ……. कहलाती है।
  5. कुआँ …….. का स्रोत है।

उत्तर:

  1. जीव संरक्षण।
  2. चिपको।
  3. वर्षा जल संग्रहण (रेनवाटर हार्वेस्टिंग)।
  4. जल संरक्षण।
  5. जल।

जोड़ी बनाइए
MP Board Class 10th Science Solutions Chapter 16 प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन 1
उत्तर:

  1. → (c)
  2. → (d)
  3. → (e)
  4. → (a)
  5. → (b)

सत्य/असत्य कथन

  1. वनों के कटान से आर्थिक लाभ तो होता ही है, लेकिन पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुँचती।
  2. जल जीवन है।
  3. जंगली जन्तुओं का संरक्षण मानव के लिए खतरनाक हो सकता है।
  4. वन वर्षा को आमन्त्रित करते हैं तथा मृदा अपरदन को रोकते हैं।
  5. बाँधो से पर्यावरण को कोई हानि नहीं होती।

उत्तर:

  1. असत्य।
  2. सत्य।
  3. असत्य।
  4. सत्य।
  5. असत्य।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. जीवाश्म ईंधन का उदाहरण दीजिए।
  2. गंगा प्रदूषण का प्रमुख एक कारण बताइए।
  3. बंगाल के उस वन का नाम क्या है जिसको संरक्षित सर्वश्रेष्ठ वन का उदाहरण माना जाता है?
  4. अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार की व्यवस्था किस कार्य के लिए की गई?
  5. वनों को अंधाधुन्ध कटाव से बचाने के लिए चलाए गए आन्दोलन का क्या नाम है?

उत्तर:

  1. कोयला एवं पेट्रोलियम
  2. अधजले शवों का विसर्जन
  3. अराबाड़ी साल वन
  4. जीव संरक्षण हेतु
  5. चिपको आन्दोलन।

MP Board Class 10th Science Chapter 16 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जल संरक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जल संरक्षण: “जल को नष्ट होने या समाप्त होने तथा प्रदूषित होने से बचाने की प्रक्रिया जल संरक्षण कहलाती है।”

प्रश्न 2.
“वर्षा जल संग्रहण” या “रेनवाटर हार्वेस्टिंग” किसे कहते हैं?
उत्तर:
“वर्षा जल संग्रहण” या “रेनवाटर हार्वेस्टिंग”:
“वर्षा के जल को एकत्रित करके भूमि के अन्दर संग्रह करने की प्रक्रिया “वर्षा जल संग्रहण” या “रेनवाटर हार्वेस्टिंग” कहलाती है।”

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प्रश्न 3.
“ग्राउण्ड वाटर रिचार्जिंग” किसे कहते हैं?
उत्तर:
ग्राउण्ड वाटर रिचार्जिंग:
“रेनवाटर हार्वेस्टिग एवं जल संरक्षण” की विधियों द्वारा जल का भूमि में पुनः संग्रहण करना ग्राउण्ड वाटर रिचार्जिंग कहलाता है।

प्रश्न 4.
गंगा नदी के जल प्रदूषण के दो मुख्य कारकों की सूची बनाइए। उल्लेख कीजिए कि किसी नदी के जल का प्रदूषण और संदूषण होना आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक क्यों सिद्ध होता है?
उत्तर:
गंगाजल को प्रदूषित करने वाले दो मुख्य कारक –

  1. अधजले शवों को गंगा में प्रवाहित करना।
  2. औद्योगिक अपशिष्टों एवं घरेलू अपशिष्टों को गंगा में प्रवाहित करना।
  3. किसी नदी के जल का प्रदूषित एवं संदूषित होना आस-पास के निवासियों के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। यह विभिन्न बीमारियों को जन्म देता है।

प्रश्न 5.
चिपको आन्दोलन क्या था? इस आन्दोलन से अन्ततः स्थानीय लोगों और पर्यावरण को किस प्रकार लाभ हुआ?
उत्तर:
चिपको आन्दोलन:
“हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं वाले गढ़वाल के रेनी नामक ग्राम में पुरुषों की अनुपस्थिति में जब ठेकेदार अपने आदमियों को लेकर वृक्षों को काटने आया तो गाँव की स्त्रियाँ वहाँ पहुँचकर वृक्षों के तनों से चिपककर खड़ी हो गयीं। इस कारण ठेकेदार के आदमी वृक्षों को काट नहीं सके।

इस प्रकार उन स्त्रियों ने वन एवं वन्यजीव एवं पर्यावरण की रक्षा की। यह आन्दोलन चिपको आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में खूब फला-फूला।” इस आन्दोलन से वहाँ के निवासियों को अत्यन्त लाभ मिला, वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ईंधन तथा अन्य सामग्री प्राप्त कर सके तथा पर्यावरण संरक्षित हुआ।

प्रश्न 6.
(i) वनों एवं (ii) वन्य जीवन के संरक्षण के दो-दो लाभ लिखिए।
उत्तर:
(i) वनों के संरक्षण के लाभ:

  1. इससे पर्यावरण सन्तुलित एवं प्रदूषण रहित रहता है जो वहाँ के निवासियों के लिए स्वास्थ्यप्रद है।
  2. वनों से विविध खाद्य सामग्री एवं औषधियाँ मिलती हैं।

(ii) वन्य जीवन के संरक्षण के लाभ:

  1. वन्य जीवों से हमें अनेक औषधियाँ तथा अन्य लाभदायक सामग्री मिलती है।
  2. वन्य जीव पर्यावरण सन्तुलन को बनाए रखते हैं।

प्रश्न 7.
कोई पाँच वस्तुओं की एक लिस्ट बनाइए जिनका उपयोग आप प्रतिदिन विद्यालय में करते हैं। उस लिस्ट में से उन वस्तुओं की पहचान कीजिए जिनका पुनर्चक्रण सम्भव है।
उत्तर:
विद्यालय में प्रतिदिन प्रयुक्त पाँच वस्तुएँ –
(1) प्लास्टिक बॉक्स।

  1. रेक्सिन बैग।
  2. प्लास्टिक स्केल।
  3. स्टील चम्मच।
  4. कागज की नोटबुक एवं बुक्स।

निम्न का पुनर्चक्रण सम्भव है –

  1. प्लास्टिक बॉक्स।
  2. प्लास्टिक स्केल।
  3. स्टील चम्मच।
  4. कागज की नोटबुक एवं बुक्स।

प्रश्न 8.
यद्यपि कोयला एवं पेट्रोलियम जैव-मात्रा या जैव अवशेषों के अपघटन (नवीकरण) से उत्पन्न होते हैं, फिर भी हम उनका संरक्षण आवश्यक क्यों समझते हैं?
उत्तर:
दोनों ऊर्जा स्रोत कोयला एवं पेट्रोलियम बनने में लाखों-करोड़ों वर्ष का समय लेते हैं तथा इन स्रोतों के उपयोग (दोहन) की दर उनके उत्पादन की दर से कहीं अधिक है तथा प्रकृति में इनका भण्डारण भी सीमित है तथा इन्हें आसानी से उत्पन्न भी नहीं किया जा सकता। इसलिए जिस तरह इनका उपयोग हो रहा है, ये निकट भविष्य में समाप्त हो जाएँगे। इसलिए इनका संरक्षण आवश्यक है ताकि हमारी भावी पीढ़ी को उपयोग के लिए ये मिल सकें।

प्रश्न 9.
सामुदायिक स्तर पर जल संग्रहण के दो लाभ लिखिए।
उत्तर:
सामुदायिक स्तर पर जल संग्रहण के दो लाभ:

  1. पृथ्वी का भूजल स्तर बढ़ जाता है।
  2. वर्षा ऋतु में संग्रह किया हुआ जल जब आवश्यकता हो तब प्रयोग में लाया जा सकता है।

MP Board Class 10th Science Chapter 16 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वन संरक्षण के लिए किये जाने वाले प्रयासों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वन संरक्षण के लिए प्रयास-वन संरक्षण के लिए राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं। प्रमुख प्रयास अग्रांकित हैं –

  1. वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देना।
  2. आनुवंशिक आधार पर वृक्षों को तैयार करना।
  3. रोग प्रतिरोधी एवं कीट प्रतिरोधी वृक्षों को तैयार करना।
  4. सामाजिक वानिकी को प्रोत्साहित करना।
  5. वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के कार्यों को जन-आन्दोलन का रूप देना।
  6. मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जलाई, 1987 में मुख्य वन संरक्षक के आधीन एक अलग प्रकोष्ठ की स्थापना की गई, जो वन संरक्षण तथा इसके विकास कार्यों की देखरेख करता है।

प्रश्न 2.
भूमिगत जल स्तर गिरने के कारण लिखिए। घर में वर्षा के जल के संग्रहण की विधि लिखिए।
उत्तर:
भूमिगत जल स्तर गिरने के प्रमुख कारण:

  1. हैण्डपम्प या सबमर्सीबल पम्पों की सहायता से भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन।
  2. वर्षा जल की कमी।
  3. स्थानीय स्तर पर जल के अन्य स्रोतों नदी, तालाबों की उपलब्ध में कमी।

घर में वर्षा जल के संग्रहण की विधि:
घर की छतों को इस प्रकार बनाना चाहिए कि उस पर वर्षा के जल का बहाव एक ही दिशा में हो। पाइप लाइन की सहायता से इस पानी को जमीन के अन्दर पहुँचाना चाहिए जहाँ से यह जल कुओं एवं हैण्डपम्प वाले जल-स्रोतों में संग्रहित हो जाये।

प्रश्न 3.
वर्षा जल संग्रहण के मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
वर्षा जल संग्रहण के मुख्य उद्देश्य:

  1. भूमिगत जल के गुणों में सुधार लाना।
  2. अति दोहन के कारण रिक्त हुए जलस्रोतों में जलापूर्ति बनाये रखना।
  3. वाहित मल-जल एवं औद्योगिक अपशिष्ट जल का पुनः चक्रण करना।
  4. जल के अति प्रवाह एवं भूमि क्षरण को रोकना।
  5. आगामी समय (भविष्य) के लिए जल का संग्रहण करना।

प्रश्न 4.
कर्नाटक के एक गाँव में वहाँ के किसानों ने एक झील के चारों ओर फसल उगाना प्रारम्भ कर दिया। वह झील सदैव जल से भरी रहती थी। फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए वे अपने खेतों में उर्वरकों का प्रयोग करते थे। शीघ्र ही उन्होंने देखा कि वह झील पूर्णतया हरे तैरते पौधों से भर गयी है तथा मछलियों ने बड़ी तेजी से मरना प्रारम्भ कर दिया है। स्थिति का विश्लेषण कीजिए तथा झील में हरे पौधों की अत्यधिक वृद्धि एवं मछलियों की मृत्यु के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
चूँकि किसानों ने अपनी फसल के उत्पादन के लिए अत्यधिक मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग किया। वे उर्वरक वर्षा ऋतु में वर्षा के जल के साथ बहकर उस झील में पहुँच गए। चूँकि बहुत से उर्वरकों में फॉस्फेट एवं नाइट्रेटस होते हैं। इसलिए झील इन रसायनों से परिपूर्ण हो गयी। इन रसायनों ने जलीय पौधों की वृद्धि को प्रोत्साहित किया। इसलिए झील की सतह हरे तैरते जलीय पौधों से भर गयी। हरे पौधों से झील के जल की सतह पूर्णतया ढक जाने से जलीय जीवों को सूर्य का प्रकाश नहीं मिल सका तथा जल में घुली ऑक्सीजन की अपर्याप्त मात्रा मछलियों के तेजी से मरने का कारण बनी।

प्रश्न 5.
अपने घरों में विद्युत ऊर्जा के संरक्षण के लिए क्या उपाय करेंगे?
उत्तर:
घरों में विद्युत ऊर्जा के संरक्षण के उपाय –

  1. जब आवश्यकता न हो तो बिजली के पंखे एवं बल्ब आदि को बन्द कर देंगे, उनको तभी प्रयोग में लाएँगे जब आवश्यकता हो।
  2. सौर ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग करेंगे।
  3. प्रकाश के लिए कम शक्ति के फ्लोरोसेण्ट ट्यूब CFL एवं LED बल्बों का उपयोग करेंगे।
  4. जाड़े के दिनों में जल को गर्म करने के लिए सौर तापन युक्तियों को प्रयोग में लाएँगे।

प्रश्न 6.
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को कम करने के लिए कुछ उपाय सुझाइए।
उत्तर:
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर कम करने के उपाय –

  1. जीवाश्म ईंधन (खनिज ईंधन) की स्वचालित वाहनों में खपत कम करके अर्थात् इनका न्यूनतम उपयोग करना तथा साइकिल, बस आदि वैकल्पिक साधनों का अधिकतम उपयोग करना।
  2. स्वचालित वाहनों में पेट्रोल डीजल के स्थान पर CNG एवं अन्य स्वच्छ ईंधन का उपयोग करके।
  3. घरों में ईंधन के रूप में लकड़ी, कोयला आदि का उपयोग न करके LPG सौर ऊर्जा एवं विद्युत ऊर्जा का उपयोग करके।
  4. कचरे (कूड़ा करकट) को जलाने के बजाय उसका खाद बनाकर।
  5. औद्योगिक धुएँ को वायुमण्डल में छोड़ने से पहले उसका उपचार करके।
  6. अधिकाधिक पौधारोपण द्वारा।

प्रश्न 7.
क्या जल संरक्षण आवश्यक है? कारण दीजिए।
उत्तर:
प्रकृति में उपलब्ध शुद्ध एवं ताजा जल मानव जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है। लेकिन इसके असमान वितरण, मौसम में परिवर्तन, वर्षा का कम होना, जल का अपदोहन एवं जल की बर्बादी के कारण विश्व के विभिन्न भागों में जल का अभाव एक गम्भीर समस्या है। इस समस्या के निदान के लिए जल संरक्षण आवश्यक है क्योंकि जल ही जीवन है। जल के बिना जैवजगत (वनस्पति एवं जन्तुओं) का जीवन कठिन हो जायेगा।

प्रश्न 8.
अपशिष्ट जल के उपयोग के कुछ उपाय बताइए।
उत्तर:
अपशिष्ट जल के उपयोग के उपाय:

  1. अपशिष्ट जल का उपयोग भू-गर्म जल का स्तर बढ़ाने में किया जा सकता है।
  2. इसका उपयोग सिंचाई के लिए किया जा सकता है।
  3. प्रदूषित एवं संदूषित जल का उपयोग विभिन्न फसलों के लिए उर्वरक का कार्य कर सकता है।
  4. उपचारित जल का उपयोग वाहनों की सफाई तथा बागवानी में किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
बंगाल के अराबाड़ी जंगल (वन) संरक्षित वनों का एक अच्छा उदाहरण है क्यों?
उत्तर:
वन विभाग के एक दूरदर्शी अधिकारी ने बंगाल के अराबाड़ा के क्षतिग्रस्त साल वन के संरक्षण की एक योजना बनायी। वहाँ ग्रामवासियों को अपनी इस योजना में सम्मिलित किया और उनके सामूहिक प्रयासों से वह साल वन समृद्ध हो गया जो पहले बेकार पड़ा था। इसके बदले में उन ग्रामवासियों को, जिनको उस वन की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी थी, अपने पशुओं को चराने तथा कम मूल्य पर ईंधन के लिए लकड़ी एकत्रित करने की अनुमति दे दी गयी। इससे ग्रामवासियों को रोजगार के साथ-साथ फसल का 25 प्रतिशत के उपयोग का अधिकार मिला।

MP Board Class 10th Science Chapter 16 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वन्य संसाधनों के अनियन्त्रित दोहन से क्या हो रहा है?
उत्तर:
वन्य संसाधनों के अनियन्त्रित दोहन के प्रभाव-वन्य संसाधनों में वन्य जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे आते हैं।

  1. जलवायु में परिवर्तन हो रहा है।
  2. वायुमण्डल में CO2 की मात्रा बढ़ने से वायु प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, अम्ल वर्षा आदि की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है क्योंकि CO2 को पेड़-पौधे
  3. प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा प्राणवायु ऑक्सीजन में बदलते रहते हैं।
  4. वर्षा की कमी, भूमिगत जल स्तर में कमी तथा सतही जल का अभाव हो रहा है।
  5. पशुओं के लिए चारागाहों की कमी हो रही है।
  6. मरुस्थलीय भूमि में वृद्धि हो रही है।
  7. जन्तुओं (पशु एवं पक्षियों) के आवास नष्ट हो रहे हैं।
  8. वन सम्पदा की हानि हो रही है।
  9. भूमि क्षरण बढ़ रहा है।
  10. खाद्य श्रृंखला अव्यवस्थित हो रही है।

प्रश्न 2.
वनों की एक संसाधन के रूप में क्या महत्ता है?
उत्तर:
वन संरक्षण की मानव जीवन में उपयोगिता-वन मानव जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं –

  1. ये पर्यावरण को सन्तुलित एवं प्रदूषण रहित रखते हैं।
  2. पशु-पक्षियों को आवास उपलब्ध कराते हैं।
  3. वर्षा को प्रोत्साहित करते हैं।
  4. वनों से विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री प्राप्त होती है।
  5. वनों से फल, मेवे इत्यादि प्राप्त होते हैं।
  6. वनों से विभिन्न प्रकार की औषधियाँ मिलती हैं।
  7. वनों से उपयोगी इमारती लकड़ी प्राप्त होती है।
  8. वन पशुओं के लिए चारागाह का कार्य करते हैं। इस प्रकार वनों का संरक्षण करना मानव जीवन के लिए लाभदायक है।

प्रश्न 3.
जल प्रबन्धन एवं जल संरक्षण की विधियाँ लिखिए।
अथवा
जल प्रबन्धन एवं जल संरक्षण के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जल प्रबन्धन एवं जल संरक्षण की विधियाँ एवं उपाय:

  1. जलीय चक्र को पूरा करने के लिए वनों के विनाश को रोककर नया वृक्षारोपण करना।
  2. घास की अनेक जातियाँ उगाकर सतही जल को बनाये रखना।
  3. जल को सभी प्रकार के प्रदूषण से बचाना।
  4. घरेलू, नगरीय एवं औद्योगिक वाहित अपशिष्टों को जलाशयों में मिलने से रोकना या उपचारित करना।
  5. जल को मितव्ययिता से व्यय करना।
  6. पक्के जलाशय बनाना।
  7. रेन वाटर हार्वेस्टिंग एवं अण्डरग्राउण्ड वाटर रिचार्जिंग की विधियों का उपयोग करना।
  8. वृक्षारोपण करना।
  9. बाढ़ प्रबन्धन के उपाय द्वारा अतिरिक्त जल का उपयोग करके सतही जल का संरक्षण करना।
  10. बाढ़ के प्रकोप से बचने के लिए नदियों के दोनों ओर पक्के कुओं का निर्माण करके पक्की नालियों द्वारा उन्हें नदी से जोड़ना।

प्रश्न 4.
(A) संलग्न चित्र (a) एवं (b) जल संग्राहकों (जल संग्रहण युक्तियों) की पहचान कीजिए तथा उनके नाम लिखिए।
(B) निम्न में कौन दूसरे से अधिक लाभदायक है और क्यों?
MP Board Class 10th Science Solutions Chapter 16 प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन 2
उत्तर:
(A) चित्र (a) में जल संग्राहक (जल संग्रहण युक्ति) एक तालाब (पोखर) है जबकि (b) में जल संग्राहक (जल संग्रहण युक्ति) भू-गर्भ जल संग्राहक या जल संग्रहण युक्ति (Under ground water reservoir) है।
(B) चित्र (a) की अपेक्षा चित्र (b) का जल संग्रहण अधिक लाभप्रद है क्योंकि भूमि के अन्दर जल संग्रहण के अनेक लाभ हैं जोकि मुख्यतः निम्न प्रकार हैं –

  1. यह ऊर्ध्वपातन द्वारा नष्ट नहीं होता।
  2. यह पृथ्वी के अन्दर सभी जगह बहकर कुओं के जल स्तर को बढ़ाता है।
  3. यह पेड़-पौधों के बड़े क्षेत्र को नमी उपलब्ध कराता है।
  4. यह मानवीय अपशिष्टों एवं पशुओं द्वारा जल को प्रदूषित एवं संदूषित होने से रोकता है।
  5. यह कीड़े-मकोड़ों के प्रजनन एवं संपोषण को रोकता है।

प्रश्न 5.
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के सम्बन्ध में निम्न पदों की व्याख्या कीजिए –
(a) मितव्यय अर्थात् कम उपयोग (Reduced use)।
(b) पुनः चक्रण (Recycle)।
(c) पुनः उपयोग (Reuse)। हमारे दैनिक जीवन में प्रयुक्त पदार्थों में से उपर्युक्त प्रत्येक कोटि के दो पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मितव्यय अर्थात् कम उपयोग (Reduced use):
मितव्यय अर्थात् कम उपयोग का मतलब है कि हम किसी संसाधन का कम से कम उपयोग करें।

उदाहरण:

  1. जल एवं।
  2. विद्युत ऊर्जा।

(b) पुनः चक्रण-पुन:
चक्रण का अर्थ है जिस पदार्थ का हम उपयोग कर चुके हैं उस प्रयुक्त अपशिष्ट पदार्थ को किसी भी प्रक्रिया द्वारा उपयोगी पदार्थ में बदलना।

उदाहरण:

  1. प्लास्टिक या पॉलीथीन से बनी वस्तुएँ।
  2. कागज से बनी वस्तुएँ।

(c) पुनः उपयोग:
किसी वस्तु को उपयोग के बाद फेंकने के बजाय उसका बार-बार उपयोग करना। इसमें किसी भी रूप में पुन:चक्रण न तो छोटे स्तर पर और न ही बड़े स्तर पर सम्मिलित हैं। अर्थात् उस वस्तु को पुनः उसी रूप में प्रयुक्त करना है।

उदाहरण:

  1. प्रयुक्त खाली बोतलें।
  2. प्रयुक्त प्लास्टिक या पॉलीथीन की थैलियाँ।

प्रश्न 6.
अपने प्रतिदिन के क्रियाकलापों की एक लिस्ट बनाइए जिनसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सके अथवा ऊर्जा का उपयोग कम हो सके।
उत्तर:
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं ऊर्जा की बचत हेतु दैनिक क्रियाकलाप:

  1. पानी की बोतल में बचे पानी का उपयोग बागवानी में करना।
  2. पौधों में जल पाइप से न देकर हजारे आदि से देना।
  3. वाहनों को प्रतिदिन धोने के बजाय उन्हें तभी धोना जब वे गन्दे हो अथवा इसकी आवश्यकता हो।
  4. कपड़ों के धोवन से घर की सफाई करना अथवा टॉयलेट को साफ करना।
  5. बिजली के पंखों एवं बल्बों का आवश्यकतानुसार उपयोग करना।
  6. सौर जल ऊष्मक का उपयोग जल गर्म करने के लिए तथा सौर कुकर का उपयोग भोजन पकाने के लिए करना।
  7. परम्परागत बल्बों के स्थान पर CFL एवं LED बल्बों को उपयोग में लाना।
  8. चलने के लिए पैदल या साइकिल का उपयोग तथा यात्रा के लिए यात्री बसों का उपयोग करना।

प्रश्न 7.
(a) जल एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जो जीवन के लिए अमृत है। आपके विज्ञान के शिक्षक यह चाहते हैं कि आप रचनात्मक मूल्यांकन क्रियाकलाप के लिए “प्राणाधार प्राकृतिक सम्पदा-जल को कैसे बचाएँ” विषय पर कोई योजना बनाइए। “जल को कैसे बचाएँ” के बारे में अपने पड़ोस में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए कोई दो उपाय सुझाइए।
(b) किसी एक उपाय का नाम और उसकी व्याख्या कीजिए जिसके द्वारा भौम जल स्तर को नीचे गिरने से रोका जा सके।
उत्तर:
(a) “प्राणाधार प्राकृतिक सम्पदा-जल को कैसे बचाएँ” विषय पर योजना: निर्देश- इस योजना का छात्र अपने विज्ञान शिक्षक के सहयोग से स्वयं तैयार करें।

“जल को कैसे बचाएँ” के बारे में पड़ौस में जागरूकता पैदा करने के उपाय:

  1. जल के अपव्यय एवं दुरुपयोग को रोकने एवं मितव्ययता बरतने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।
  2. वर्षा जल संग्रहण के लिए उन्हें प्रोत्साहित करेंगे।

(b) भौम जल स्तर को नीचे गिरने से रोकने के उपाय – घर में वर्षा जल संग्रहण की विधि – भूमिगत जल स्तर गिरने के प्रमुख कारण:

  1. हैण्डपम्प या सबमर्सीबल पम्पों की सहायता से भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन।
  2. वर्षा जल की कमी।
  3. स्थानीय स्तर पर जल के अन्य स्रोतों नदी, तालाबों की उपलब्ध में कमी।

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