MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री (कहानी, सियाराम शरण गुप्त)

बैल की बिक्री अभ्यास

बोध प्रश्न

बैल की बिक्री अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
खेतों के पौधे असमय में ही क्यों मुरझा रहे थे?
उत्तर:
खेतों के पौधे समय पर वर्षा न होने के कारण असमय में ही मुरझा रहे थे।

प्रश्न 2.
महाजन का नाम क्या था?
उत्तर:
महाजन का नाम ज्वाला प्रसाद था।

प्रश्न 3.
किसान के हाथ-पैर किसे कहा गया है?
उत्तर:
बैलों को किसान के हाथ-पैर कहा गया है।

प्रश्न 4.
शिबू अपना बैल बेचने कहाँ जाता है?
उत्तर:
शिबू अपना बैल रामपुर की हाट में बेचने जाता है।

प्रश्न 5.
डाकुओं की कुल संख्या कितनी थी?
उत्तर:
डाकुओं की कुल संख्या पाँच थी।

प्रश्न 6.
मोहन रामधन के साथ कहाँ गया?
उत्तर:
मोहन रामधन के साथ ज्वाला प्रसाद महाजन के यहाँ गया था।

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बैल की बिक्री लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मोहन शिबू के विषय में क्यों चिन्तित था?
उत्तर:
मोहन को शिबू के विषय में इसलिए चिन्ता थी कि वह जवान हो चुका था और उसे घर के काम-काज से कोई सरोकार न था।

प्रश्न 2.
मोहन को अपने स्वर्गीय पिता का स्मरण क्यों हुआ?
उत्तर:
जब भी शिबू के उद्दण्ड व्यवहार से मोहन दुःखी होता था, तब उसे अपने मृत पिता की याद आ जाती क्योंकि उसने भी अपने पिता को कम नहीं खिझाया था। पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे बड़ा साधन कदाचित् बच्चे को प्यार करना ही है।

प्रश्न 3.
शिबू द्वारा बैल का अपमान करने पर मोहन की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
मोहन को अपने पुत्र शिबू के बैल के प्रति किये व्यवहार से बहुत दुःख हुआ। उसने बैल की सार की अच्छी तरह सफाई की, बैल को पानी पिलाने ले गया, उसको नहलाया, फिर भूसा डाला, इसके बाद घर से रोटी लाकर उसके टुकड़े-टुकड़े करके खिलाया।

प्रश्न 4.
बैल को बेचने के लिए जाते हुए मोहन ने शिबू से क्या कहा?
उत्तर:
बैल को बेचने के लिए जाते हुए मोहन ने शिबू से कहा-एक बात बेटा, मेरी मानना। बैल किसी भले आदमी को देना जो उसे अच्छी तरह रखे। दो-चार रुपये कम मिलें तो ख्याल न करना।

प्रश्न 5.
शिबू ने डाकुओं का प्रतिकार किस प्रकार किया?
उत्तर:
पहले तो शिबू छाती तानकर खड़ा हो गया। बोला। मैं रुपये नहीं दूंगा। इसके बाद दूसरे डाकू के बन्दूक के कुन्दे को मारने पर उसने कुन्दे को इस तरह पकड़ लिया जिस तरह सपेरे साँप का फन पकड़ लेते हैं। अपने को आगे ठेलता हुआ वह बोला-तुम मुझे मार सकते हो, परन्तु रुपये नहीं छीन सकते। शिबू के साहस को देखकर डाकुओं से लुटे-पिटे व्यक्ति भी एक साथ आ गये, जिन्हें देखकर डाकू भाग खड़े हुए।

प्रश्न 6.
ज्वाला प्रसाद ने मोहन से क्या कहा?
उत्तरे:
ज्वाला प्रसाद ने मोहन से कहा कि वायदे बहुत हो चुके। अब हमारे रुपये अदा कर दो, नहीं तो अच्छा न होगा।

बैल की बिक्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मोहन शिबू को बैल बेचने से क्यों मना करता है?
उत्तर:
बैल बेचने के बचाव में मोहन ने शिबू को डाँटते हुए कहा-“चुप रह! घर में जोड़ी न होती तो इतनी बातें बनाना न आता। बैल किसान के हाथ-पैर होते हैं। एक हाथ टूट जाने पर कोई दूसरा भी कटा नहीं डालता। मैं इसका जोड़ मिलाने की फ्रिक में हूँ, तू कहता है-बेच दो। दूर हो, जहाँ जाना हो चला जा। मैं सब कर लूँगा।” वह दोगुने प्यार से उसका ख्याल रखता है।

प्रश्न 2.
दद्दा के दोपहर में न आने पर शिबू ने क्या किया?
उत्तर:
सबेरे ज्वाला प्रसाद के आदमी के साथ गए दद्दा दोपहर तक रोटी खाने भी नहीं आए हैं। यह जानकर शिबू झपाटे के साथ घर से निकलकर ज्वाला प्रसाद के यहाँ जा पहुँचा। वहाँ उसने पिता को मुँह सुखाए, पसीने-पसीने एक जगह बैठा देखा। ज्वाला प्रसाद द्वारा रुपये की कहने पर उसने कहा-अपनी रुपहट्टी लोगे या किसी की जान? अरे, कुछ तो दया होती! बूढ़े ने सवेरे से पानी तक नहीं पिया। तुम कम-से-कम चार दफे दूंस चुके होंगे। अपने पिता से यह कहकर कि मैं तुम्हें कसाई की गाय की तरह मरने न दूंगा और रामपुर की हाट में सोमवार को बैल बेचकर उनकी कौड़ी पाई चुका दूँगा, उनका हाथ पकड़कर झकझोरता हुआ साथ ले गया। साहूकार चुपचाप देखता रह गया, एक शब्द भी उसके मुँह से नहीं निकला।

प्रश्न 3.
शिबू द्वारा किये गये व्यवहार की ज्वाला प्रसाद पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
शिबू के व्यवहार से ज्वाला प्रसाद हतबुद्धि होकर ज्यों के त्यों बैठे रहे। उन्होंने शिबू के जैसा निर्भय आदमी न देखा था। उनके मुँह पर ही उन्हें कसाई बनाया गया। गुस्सा की अपेक्षा उन्हें डर ही अधिक मालूम हुआ।

प्रश्न 4.
बैल के बेचने का निश्चय होते ही मोहन की हालत कैसी हो गई?
उत्तर:
बैल के बेचने का निश्चय होते ही दो दिन में ही ऐसा जान पड़ने लगा-मानो मोहन बहुत दिन का बीमार हो। दिनभर वह बैल के विषय में ही सोचा करता। रात को उठकर कई बार बैल के पास जाता। रात के एकान्त में जब उसे अवसर मिलता, बैल के गले से लिपटकर प्रायः आँसू बहाने लगता।

प्रश्न 5.
बैल को बेचने के पश्चात् शिबू की मानसिक स्थिति का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
बैल बेचने के पश्चात् शिबू घर लौट रहा था। रुपये उसकी अण्ढी में थे तो भी आज उसकी चाल में बहुत तेजी नहीं थी, जो जाते समय थी। न जाने, कितनी बातें उसके भीतर आ-जा रही थीं। बैल के बिना उसे सूना-सूना मालूम हो रहा था। आज के पहले वह यह बात किसी तरह न मानता कि उसके मन में भी उस क्षुद्र प्राणी के लिए इतना प्रेम था। बार-बार उसे बैल की सूरत याद आती। उसके ध्यान में आता मानो विदा होते समय बैल भी उदास हो गया था। उसकी आँखों में आँसू छलक आये थे। बैल का विचार दूर करता तो पिता का सूखा बेहरा सामने आ जाता। बैल और पिता मानो एक ही चित्र के दो ख थे। लौट फिर कर एक के बाद दूसरा उसके सामने आ जाता था।

प्रश्न 6.
शिबू का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
शिबू किसान मोहन का लड़का था। वह उद्दण्ड स्वभाव का था। उसे घर के काम-काज से कोई सरोकार नहीं था। खाना-पीना और इधर-उधर आवारागर्दी में घूमना ही उसका काम था।

इसके अतिरिक्त वह महाजन तथा साहूकारों से घृणा करता था। वह किसी से दबता नहीं था। वह साहसी था। जब डाकुओं ने उसे पकड़ लिया तब वह उनसे भी लड़ने-मरने को आमादा हो जाता है। उसके साहस से ही डाकू भाग जाते हैं और वह लुटे हुए लोगों को स्वतन्त्र करा देता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
“भीड़ में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आया। …………. अब लुट जाए तो मैं जिम्मेदार नहीं।”।
उत्तर:
लेखक कहता है कि डाकुओं द्वारा पकड़े हुए व्यापारियों में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आता है और कहता है अरे भैया तुम कौन, शिबू माते? आज तुमने इतने आदमियों को डाकुओं के चंगुल से बचा दिया, तुम धन्य हो।

शिबू ने कहा यह वही ज्वाला प्रसाद है जिसने अपने कर्ज के रुपये के लिए मेरे पिता को बन्धक बना लिया था। उस समय उसके शरीर पर धोती के अलावा और कोई वस्त्र नहीं था। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से भर गया था। शिबू ने बैल बेचने से मिले हुए रुपयों को अपनी अण्टी से निकालकर उसके सामने रखते हुए कहा कि यह आज एक बहुत बड़ी बात हुई कि शिबू माते अर्थात् मैं तुम्हें यहीं मिल गया। लो अपने कर्ज के रुपये चुकता कर लो। आगे तुम लुट जाओ तो मैं इसका जिम्मेदार नहीं हूँ।

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बैल की बिक्री भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद कीजिए
उत्तर:

  1. अन्तस्तल = अन्तः + स्तल (स्थल)।
  2. प्रेमातुर = प्रेम + आतुर।
  3. सज्जन = सत् + जन।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रहकीजिए
उत्तर:

  1. स्त्री-पुरुष = स्त्री और पुरुष।
  2. यथासमय = समय के अनुसार।
  3. क्षतिपूर्ति = क्षति की पूर्ति।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के लिए एक-एक शब्द लिखिए-

  1. जो किसी से भयभीत न हो।
  2. जिसे ज्ञान न हो।
  3. जिसके पास धन नहीं है।
  4. जो क्षय न हो।

उत्तर:

  1. निर्भय
  2. अज्ञानी
  3. निर्धन
  4. अक्षय।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए-

  1. बादल समय पर पानी नहीं देते थे। (विधानवाचक)
  2. सेठ ज्वाला प्रसाद अच्छे महाजन थे। (निषेधवाचक)
  3. शिबू बाबू बनकर डाकखाने में टिकट बेचेगा। (प्रश्नवाचक)
  4. मोहन बैल को बहुत प्यार करता है। (विस्मयादिवाचक)

उत्तर:

  1. बादल समय पर पानी देते थे।
  2. सेठ ज्वाला प्रसाद अच्छे महाजन नहीं थे।
  3. क्या शिबू बाबू बनकर डाकखाने में टिकट बेचेगा?
  4. ओहो! मोहन बैल को बहुत प्यार करता है।

प्रश्न 5.
आज्ञावाचक वाक्य किसे कहते हैं? उदाहरण देकर बताइए।
उत्तर:
आज्ञावाचक वाक्य में आज्ञा देकर कोई कार्य करवाया जाता है।
उदाहरण :
आप जाइये, और वहाँ से सामान लेकर आइये।

बैल की बिक्री महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बैल की बिक्री बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बैल की बिक्री’ कहानी में किस समस्या को प्रमुख रूप से उठाया गया है?
(क) साहूकारों की
(ख) ऋणग्रस्त लोगों की
(ग) नौजवानों की
(घ) ऋणग्रस्त किसानों की
उत्तर:
(घ) ऋणग्रस्त किसानों की

प्रश्न 2.
‘बैल की बिक्री’ कहानी का केन्द्रीय चरित्र है- (2017)
(क) मोहन
(ख) शिबू
(ग) साहूकार
(घ) मुनीम।
उत्तर:
(ख) शिबू

प्रश्न 3.
किसान के हाथ-पैर किसे कहा गया है? (2013)
(क) गाय
(ख) भैंस
(ग) बैल
(घ) बकरी।
उत्तर:
(ग) बैल

प्रश्न 4.
मोहन ने ऋण चुकाने के लिए क्या किया?
(क) अनाज बेच दिया
(ख) घर बेच दिया
(ग) बैल बेच दिया
(घ) खेत बेच दिया।
उत्तर:
(ग) बैल बेच दिया

प्रश्न 5.
शिबू ने बैल को कहाँ बेच दिया?
(क) मित्र को
(ख) साहूकार को
(ग) पड़ोसी को
(घ) रामपुर की हाट में
उत्तर:
(घ) रामपुर की हाट में

प्रश्न 6.
महाजन का नाम था (2016)
(क) अम्बिका प्रसाद
(ख) शिबू
(ग) मोहन
(घ) ज्वाला प्रसाद
उत्तर:
(घ) ज्वाला प्रसाद

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ‘बैल की बिक्री’ कहानी में लेखक ने ………… किसानों की समस्या को उठाया है।
  2. मेरे जीते जी इन रुपयों को ………….. के सिवा अन्य कोई नहीं ले सकता।
  3. ‘बैल की बिक्री’ एक ………….. कहानी है।
  4. महाजन का नाम …………. था। (2009)
  5. बादल चाहे जैसी शत्रुता रखें मगर खेती के लिए उनसे ………… वस्तु नहीं है।

उत्तर:

  1. ऋणग्रस्त
  2. महाजन
  3. मनोवैज्ञानिक
  4. ज्वालाप्रसाद
  5. प्यारी

सत्य/असत्य

  1. महाजन का नाम ज्वालाप्रसाद था। (2013)
  2. मोहन रामधन के साथ डाकू से मिलने गया। (2009)
  3. शिबू मोहन का लड़का है। (2018)
  4. शिबू डाकुओं को देखकर भाग गया क्योंकि वे संख्या में दो सौ के लगभग थे।
  5. सेठ ज्वालाप्रसाद उन्हीं महाजनों में से थे। विधाता के वर से उनका धन अक्षय था।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री img-1
उत्तर:
1. → (ङ)
2. → (ग)
3. → (घ)
4. → (क)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘बैल की विक्री’ कहानी में लेखक ने किसानों की किस समस्या का चित्रण किया है?
  2. शिबू बैल बेचने कहाँ गया था?
  3. मोहन किसका कर्जदार है?
  4. किसान के हाथ-पैर किसको कहा गया है?
  5. ‘बैल की बिक्री’ कहानी के लेखक कौन हैं?

उत्तर:

  1. ऋणग्रस्तता
  2. रामपुर की हाट में
  3. ज्वालाप्रसाद
  4. बैल को
  5. सियाराम शरण गुप्त।

बैल की बिक्री पाठ सारांश

‘बैल की बिक्री’ कहानी के लेखक सियारामशरण गुप्त हैं। प्रस्तुत कहानी ग्रामीण जीवन तथा कृषकों की विभिन्न समस्याओं पर आधारित है। इस कहानी के माध्यम से गुप्त जी ने किसानों पर साहूकारों के द्वारा जो अत्याचार होते हैं उनका वर्णन किया है।

इस कहानी का प्रमुख पात्र मोहन एक ऋणग्रस्त किसान है। शिबू उसका इकलौता और निकम्मा लाडला बेटा है। मोहन ने ज्वालाप्रसाद नामक महाजन से कर्ज लिया है। यह परिवार एक बैलगाड़ी के सहारे से अपने परिवार का भरण-पोषण करता है लेकिन एक दिन बैलों की जोड़ी में से एक बैल की मृत्यु हो जाती है।

एक दिन साहूकार के द्वारा जब शिबू के पिता को बन्दी बना लिया गया तब शिबू को क्रोध आया और उसने सेठ ज्वालाप्रसाद का कर्ज चुकाने के लिए अपना बैल हाट में ले जाकर बेच दिया।

जब शिबू बैल बेचकर लौट रहा था तो रास्ते में उसे डाकू मिले वह डाकुओं का डटकर मुकाबला करता है और डाकू भाग जाते हैं। वहीं पर सेठ ज्वालाप्रसाद को शिबू उन्हें बैल की बिक्री के रुपये दे देता है और कहता है कि मैंने अपना कर्जा चुका दिया है। अब चाहे तुम लुट जाओ इसके जिम्मेदार तुम स्वयं ही होगे।

शिबू जब बैल को बेचने जा रहा था तब उसके पिता को बहुत दुःख हुआ क्योंकि बैल के प्रति उनके हृदय में ममता थी और उससे अलग होने की वेदना भी। शिबू का चरित्र भी लेखक ने मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया है। पिता के प्रति होने वाले अत्याचार को देख शिबू ने सेठ ज्वालाप्रसाद को मुँहतोड़ जवाब दिया। अपने पिता को उसके चंगुल से छुड़ा लाया। यह एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। परिस्थितियों के अनुरूप ही शिबू के व्यवहार में परिवर्तन हुआ है।

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बैल की बिक्री संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) कई साल से फसल बिगड़ रही थी। बादल समय पर पानी नहीं देते थे। खेती के पौधे अकाल वृद्ध होकर असमय में ही मुरझा रहे थे, परन्तु महाजनों की फसल का हाल ऐसा न था। बादल ज्यों-ज्यों अपना हाथ खींचते, उनकी खेती में त्यों-त्यों नये अंकुर निकलते थे। सेठ ज्वाला प्रसाद उन्हीं महाजनों में से थे। विधाता के वर से उनका धन अक्षय था। जिस किसान के पास पहुँच जाता, जीवन-भर उसका साथ न छोड़ता। अपने स्वामी की तिजोरी में निरन्तर जाकर भी दरिद्र की झोंपड़ी की माया उससे छोड़ी न जाती थी।

कठिन शब्दार्थ :
अकाल = बिना समय आये। वृद्ध = बूढ़ा, यहाँ नष्ट। विधाता = ईश्वर। वर = आशीर्वाद। अक्षय = कभी नष्ट न होने वाला।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘बैल की बिक्री’ कहानी से लिया गया है। इसके लेखक श्री सियारामशरण गुप्त हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि सूदखोर लोगों का धन जिसे एक बार चंगुल में ले लेता है उसका उस सरलता से पीछा नहीं छूटता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि अनेक वर्षों से फसल बिगड़ रही थी। उसका कारण यह था कि समय पर वर्षा नहीं हो रही थी। खेती के पौधे वर्षा के न होने के कारण असमय ही सूख रहे थे लेकिन दूसरी ओर महाजनों (सूदखोरों) की फसल ऐसी नहीं थी। कहने का भाव यह है कि जैसे-जैसे वर्षा कम होती थी, फसल खराब होती थी, गरीब किसान अपना खर्च चलाने के लिए ऋणदाताओं के द्वार जाता था और उनसे ब्याज पर अधिक धन उधार लेता था।

इस प्रकार सूखा पड़ने पर महाजनों की फसल और अधिक हरी-भरी होती थी। बादल जैसे-जैसे अपना हाथ खींचते अर्थात् वर्षा कम होती थी, वैसे ही वैसे सूदखोरों की खेती में नये-नये अंकुर निकल आते थे। सेठ ज्वाला प्रसाद भी इसी वर्ग के महाजन थे। ईश्वर की उन पर ऐसी कृपा थी कि उनका धन कभी भी नष्ट नहीं होता था। उनका कर्ज का धन जिस किसान के पास भी पहुँच जाता, वह जीवन भर उस किसान का साथ नहीं छोड़ता था। वह तो उनकी तिजोरी में जाकर सुरक्षित हो जाता और वह कर्जदाताओं का कभी भी साथ नहीं छोड़ता था।

विशेष :

  1. कर्ज का धन कर्जदाताओं को उन्नति देता है, जबकि किसानों का वह खून पीता था।
  2. भाषा भावानुकूल।

(2) उस दिन मोहन ने सार की सफाई और अच्छी तरह की। बैल को पानी पिलाने ले गया तो सोचा इसे नहला हूँ। उजड्ड लड़के ने बैल का जो अपमान किया था, उसे वह उसके अन्तस्तल तक धो देना चाहता था। नहला चुकने पर अपने अंगोछे से पानी अंगोछा, बाँधने की रस्सी को भी पानी से धोना न भूला। सार में बाँधकर भूसा डाला। तब भी मन की ग्लानि दूर न हई, तो भीतर जाकर रोटी ले आया और टुकड़े-टुकड़े करके उसे खिलाने लगा। वह कहा करता था कि जानवर अपनी बात समझा नहीं सकते, परन्तु बहुत-सी बातें आदमियों से अधिक समझते हैं। इसलिए वह अनुभव कर रहा था कि बैल उसके प्रेम को अच्छी तरह हृदयंगम कर रहा है।

कठिन शब्दार्थ :
सार = पशुओं का चारा खिलाने की नौद। उजड्ड = असभ्य। अंतस्तल = हृदय तक। अंगोछा = पौंछा। ग्लानि = मन का पछतावा। हृदयंगम = हृदय में धारण कर लेना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
शिबू द्वारा बैल का अपमान किये जाने पर मोहन बहुत दुःखी होता है और अपने पुत्र की करनी का प्रायश्चित करते हुए बैल को नहलाता, धुलाता और उसकी सेवा करता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जब शिबू ने बैल का अपमान किया तो मोहन को इससे बड़ा दुःख हुआ। अतः उस दिन मोहन ने बैल के चारे खाने के स्थानकी अच्छी तरह सफाई की। बैल को पानी पिलाने वह स्वयं लेया। वहाँ जाकर उसने बैल को नहला भी दिया। अपने उजड्ड पुत्र शिबू के बैल के साथ किये गये अपमान को वह उसके हृदय तक से धो देना चाहता था। बैल को नहला चुकने के बाद अपने अंगोछे से उसके शरीर को पौंछा, बाँधने की रस्सी को भी पानी से खूब धोया। सार में बाँधकर भूसा डाला। इतना करने पर भी उसके मन की ग्लानि दूर नहीं हुई तो वह घर के भीतर जाकर रोटी ले आया और टुकड़े-टुकड़े करके उसे खिलाने लगा। मोहन कहा करता था कि पशु अपनी बात मनुष्य को समझा तो नहीं सकते पर वे बहुत-सी बातें मनुष्यों से अधिक समझते हैं। अतः मोहन यह अनुभव कर रहा था कि बैल उसके प्रेम को अच्छी तरह अपने हृदय में धारण कर रहा है।

विशेष :

  1. मोहन बैलों के साथ घुल-मिलकर रहता था, खेती आदि करता था। अत: वह बैलों के स्वभाव को जानता था, तभी तो वह उस बैल का मान-सम्मान कर रहा था।
  2. भाषा भावानुकूल।

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(3) भीड़ में एक आदमी निकलकर शिबू के पास आया। बोला-कौन है, शिब माते? तुमने आज इतने आदमियों को…………।
शिबू ने कहा-ज्वाला प्रसाद है। शरीर पर धोती के सिवा कोई वस्त्र नहीं। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से विकृत हो उठा। अण्टी से रुपये निकालकर उसने कहा-बड़ी बात, शिबू माते तुम्हें आज यहीं मिल गये। लो, अपने रुपये चुकते कर लो। अब लुट जाएँ तो मैं जिम्मेदार नहीं।

कठिन शब्दार्थ :
विकृत = विकार युक्त, खराब। घृणा = नफरत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जब डाकुओं के चंगुल में से सभी व्यापारियों की शिबू अपने साहस से छुड़ा लेता है तो उन्हीं में से एक ज्वाला प्रसाद (जो शिबू के पिता का कर्जदाता था) गिड़गिड़ाते हुए शिबू की तारीफ करता है, तो शिबू उसको फटकार लगाते हुए कर्ज के रुपये दे देता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि डाकुओं द्वारा पकड़े हुए व्यापारियों में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आता है और कहता है अरे भैया तुम कौन, शिबू माते? आज तुमने इतने आदमियों को डाकुओं के चंगुल से बचा दिया, तुम धन्य हो।

शिबू ने कहा यह वही ज्वाला प्रसाद है जिसने अपने कर्ज के रुपये के लिए मेरे पिता को बन्धक बना लिया था। उस समय उसके शरीर पर धोती के अलावा और कोई वस्त्र नहीं था। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से भर गया था। शिबू ने बैल बेचने से मिले हुए रुपयों को अपनी अण्टी से निकालकर उसके सामने रखते हुए कहा कि यह आज एक बहुत बड़ी बात हुई कि शिबू माते अर्थात् मैं तुम्हें यहीं मिल गया। लो अपने कर्ज के रुपये चुकता कर लो। आगे तुम लुट जाओ तो मैं इसका जिम्मेदार नहीं हूँ।

विशेष :

  1. शिबू के साहस की प्रशंसा ज्वाला प्रसाद भी करता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा (कहानी, प्रेमचन्द)

परीक्षा अभ्यास

बोध प्रश्न

परीक्षा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सुजान सिंह कौन थे?
उत्तर:
सुजान सिंह देवगढ़ रियासत के दीवान थे।

प्रश्न 2.
देश के प्रसिद्ध पत्रों में विज्ञापन क्यों निकाला गया?
उत्तर:
देश के प्रसिद्ध पत्रों में देवगढ़ के लिए एक सुयोग्य दीवान खोजने के लिए विज्ञापन निकाला गया था।

प्रश्न 3.
रियासत देवगढ़ में आये हुए उम्मीदवारों ने कौन-सा खेल खेलने की योजना बनाई?
उत्तर:
रियासत देवगढ़ में आये हुए उम्मीदवारों ने हॉकी का खेल खेलने की योजना बनाई।

प्रश्न 4.
किसान की गाड़ी कहाँ फंस गई थी?
उत्तर:
किसान की अनाज से भरी हुई गाड़ी नाले में फंस गई थी।

प्रश्न 5.
‘अच्छा तुम गाड़ी पर जाकर बैलों को साधो, मैं पहियों को ढकेलता हूँ ………….. “यह बात किसने किससे कही?
उत्तर:
यह बात हॉकी के खेल में चोट खाये हुए युवक ने किसान से कही है।

प्रश्न 6.
गाड़ी पर किसान के वेश में कौन था?
उत्तर:
गाड़ी पर किसान के वेश में स्वयं सरदार सुजान सिंह थे।

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परीक्षा  लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजा दीवान सुजान सिंह का आदर क्यों करते थे?
उत्तर:
राजा दीवान सुजान सिंह का आदर उनकी अनुभवेशीलता एवं नीति कुशलता के कारण करते थे।

प्रश्न 2.
बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा क्या देख रहा था?
उत्तर:
बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है।

प्रश्न 3.
खिलाड़ियों ने निराश और असफल किसान को किस भाव से देखा?
उत्तर:
खिलाड़ियों ने निराश और असफल किसान को बन्द आँखों से देखा जिनमें न सहानुभूति थी और न ही उनमें उदारता और वात्सल्य था।

प्रश्न 4.
परेशान किसान की सहायता किसने की?
उत्तर:
नाले में गाड़ी फंसने पर किसान अत्यधिक परेशान था। ऐसे में परेशान किसान की सहायता चुटैल खिलाड़ी पण्डित जानकीनाथ ने की।

प्रश्न 5.
युवक को किसान की तरफ देखकर क्या सन्देह हुआ?
उत्तरः
युवक को किसान की तरफ देखकर उसके सुजान। सिंह होने का सन्देह हुआ।

परीक्षा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जिससे बात कीजिए, वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम होता था’, इस उक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
देवगढ़ के दीवान के पद हेतु जो-जो उम्मीदवार . आये थे, उनसे बात करने पर ऐसा लगता था मानो वे सभी व्यक्ति नम्रता और सदाचार के देवता हों।

प्रश्न 2.
दीवान सुजान सिंह ने अपने उत्तराधिकारी का चयन किस प्रकार किया?
उत्तर:
दीवान सुजान सिंह अपने उत्तराधिकारी के चयन के लिए एक अनाज से भरी हुई गाड़ी को लेकर ऐसी जगह आ गया जहाँ से हॉकी के खिलाड़ी आ जा रहे थे। गाड़ी नाले में फंस गयी थी और बैलों ने जवाब दें दिया था। वह किसान बनकर बड़ी आपत्ति में फंसा हुआ था। खिलाड़ी उसकी तरफ देखते थे और यों ही चले जाते थे। उनमें उदारता और मदद करने का भाव नहीं था, पर उन लोगों में एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसमें दया भी थी ओर साहस भी, और अन्त में वही व्यक्ति दीवान पद पर चुना गया।

प्रश्न 3.
देवगढ़ रियासत के ‘दीवान’ पद के लिए जानकी नाथ का चयन क्यों किया गया?
उत्तर:
देवगढ़ रियासत के ‘दीवान’ पद के लिए जानकी नाथ का चयन इसलिए किया गया क्योंकि उसके हृदय में साहस, आत्मबल और उदारता का वास था।

प्रश्न 4.
परीक्षा’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
कहानी का ‘परीक्षा’ शीर्षक सटीक सारगर्भित एवं उपयुक्त है क्योंकि देवगढ़ के दीवान के लिए एक योग्य, साहसी एवं दयावान दीवान का चयन करना था। अतः उसकी अनेक प्रकार से परीक्षा ली गयी और परीक्षा में सटीक उतरने पर ही उसे दीवान पद पर चुना गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश की व्याख्या कीजिए-
(1) इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी ……….. उन तक हमारी पहुँच नहीं है।
उत्तर:
सरदार सुजान सिंह के स्थान पर जिस व्यक्ति का चयन हुआ उसकी घोषणा करते हुए सुजान सिंह ने कहा-इस पद के लिए ऐसे पुरुष की हमें आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ ही साथ आत्मबल। उसका हृदय उदार होना चाहिए, उसमें ऐसा आत्मबल हो जो किसी भी आपत्ति का वीरता के साथ सामना कर सके। इस देवगढ़ रियासत का यह सौभाग्य रहा कि उसे एक योग्य व्यक्ति मिल गया। ऐसे गुण वाले संसार में कम ही होते हैं और जो थोड़े से हैं भी वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमारी पहुँच नहीं है।

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परीक्षा भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पदों का समास-विग्रह कर समास का नाम लिखिए
उत्तर:

  1. नीति-कुशल = नीति में कुशल है जो = बहुब्रीहि समास।
  2. धर्मनिष्ठ = धर्म में निष्ठ = तत्पुरुष समास।
  3. आत्मबली = आत्मा से बल वाला = कर्मधारय समास।
  4. वेद-मन्त्र = वेद का मन्त्र = तत्पुरुष समास।
  5. कृपा दृष्टि = कृपा की दृष्टि = तत्पुरुष समास।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम लिखिए
उत्तर:

  1. परीक्षा = परि + ईक्षा = दीर्घ सन्धि।
  2. मन्दाग्नि = मन्द + अग्नि = दीर्घ सन्धि।
  3. सहानुभूति = सह + अनुभूति = दीर्घ सन्धि।
  4. निराशा = निः + आशा = विसर्ग सन्धि।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्द समूह के लिए एक शब्द लिखिए

  1. जो धर्म को न मानता हो।
  2. जो धर्म को मानता हो।
  3. उपासना करने वाला।
  4. पुत्र के प्रति स्नेह का भाव।
  5. पूजा करने वाला।

उत्तर:

  1. अधर्मी
  2. धर्मात्मा
  3. उपासक
  4. वात्सल्य
  5. पुजारी।

परीक्षा महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

परीक्षा बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘परीक्षा’ कहानी के लेखक हैं-
(क) यशपाल
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) शिवानी
(घ) प्रेमचन्द।
उत्तर:
(घ) प्रेमचन्द।

प्रश्न 2.
‘परीक्षा’ कहानी में किस स्थान की रियासत का वर्णन है?
(क) देवगढ़
(ख) जोधपुर
(ग) आनन्दपुर
(घ) रामपुर।
उत्तर:
(क) देवगढ़

प्रश्न 3.
हॉकी खेलते समय जिस नौजवान के चोट लगी उसका नाम था
(क) सुजान सिंह
(ख) रामधन
(ग) मोहन
(घ) जानकीनाथ।
उत्तर:
(घ) जानकीनाथ।

प्रश्न 4.
देवगढ़ रियासत में आये उम्मीदवारों ने कौन-सा खेल खेलने की योजना बनाई? (2009)
(क) फुटबॉल
(ख) शतरंज
(ग) हॉकी
(घ) गुल्ली डण्डा।
उत्तर:
(ग) हॉकी

प्रश्न 5.
देवगढ़ के पुराने दीवान थे (2014)
(क) शिव सिंह
(ख) अभय सिंह
(ग) सुजान सिंह
(घ) मोहन सिंह।
उत्तर:
(ग) सुजान सिंह

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. हाँफते-हाँफते बेदम हो गये लेकिन ………….. का निर्णय न हो सका।
  2. कहीं भूल-चूक हो जाये तो ……………. में दाग लगे।
  3. जो महाशय इस परीक्षा में पूरे उतरेंगे, वे इस उच्च पद पर ……………. होंगे।
  4. किसान ने सहमी आँखों से देखा परन्तु किसी से मदद माँगने का ………….. न हुआ।
  5. परीक्षा कहानी के लेखक …………. हैं। (2010)

उत्तर:

  1. हार-जीत
  2. बुढ़ापे
  3. सुशोभित
  4. साहस
  5. प्रेमचन्द।

सत्य/असत्य

  1. राजा साहब अनुभवहीन दीवान की इच्छा रखते थे।
  2. किसान ने उनकी तरफ सहमी आँखों से देख और उनसे मदद माँगी।
  3. गाड़ीवान के रूप में स्वयं सरदार सुजान सिंह थे।
  4. दीवान पद के विज्ञापन ने सारे मुल्क में तहलका मचा दिया।
  5. जिस पुरुष ने स्वयं जख्मी होकर एक गरीब किसान की भरी हुई गाड़ी को दलदल से निकाल दिया, वह दूसरों की सहायता अवश्य करेगा।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा img-1
उत्तर:
1. → (ङ)
2. → (घ)
3. → (क)
4. → (ख)
5. → (ग)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘परीक्षा’ कहानी के लेखक कौन हैं?
  2. दीवान पद की परीक्षा हेतु कितने दिन का समय निश्चित किया गया था?
  3. देवगढ़ रियासत में आये हुए उम्मीदवारों ने कौन-सा खेल खेलने की योजना बनाई?
  4. देवगढ़ रियासत के दीवान पद हेतु किस युवक का चयन किया गया?
  5. गाड़ी पर किसान के वेश में कौन बैठा था? (2009)

उत्तर:

  1. प्रेमचन्द
  2. एक महीना
  3. हॉकी
  4. पण्डित जानकीनाथ
  5. सुजान सिंह।

परीक्षा पाठ सारांश

‘परीक्षा’ कहानी प्रेमचन्द द्वारा रचित उत्तम श्रेणी की सामाजिक कहानी है। यह कहानी नैतिकता एवं मानव के आदर्श मूल्यों पर आधारित है। देवगढ़ रियासत के दीवान सुजानसिंह जब बूढ़े हो गये तब उन्होंने राजा से आज्ञा लेकर अपना पद त्याग करने का निश्चय किया, क्योंकि वे अपने जीवन के शेष दिन ईश्वर की पूजा में व्यतीत करना चाहते थे लेकिन राजा ने उन्हें ऐसा करने से पूर्व उपयुक्त नया दीवान चुनने का कार्य सौंप दिया। राजा की प्रबल इच्छा थी कि सुजानसिंह के पश्चात् जो भी नया दीवान बने वह सुजानसिंह की भाँति कर्त्तव्यनिष्ठ व ईमानदार हो।

अतः दीवान पद की नियुक्ति हेतु सुजानसिंह ने अगले दिन अखबार में विज्ञापन निकलवा दिया कि देवगढ़ के लिए एक योग्य दीवान की आवश्यकता है। जो व्यक्ति स्वयं को इस पद के योग्य समझता हो, वह स्वयं दीवान सुजानसिंह से मिले। दीवान पद का प्रत्याशी अधिक पढ़ा-लिखा न हो,लेकिन स्वस्थ व व्यवहार कुशल होना आवश्यक है। प्रत्याशी को एक माह तक दीवान सुजानसिंह के समक्ष अपने आचार-व्यवहार की परीक्षा देनी होगी। परीक्षा में सफल होने पर ही उसे दीवान पद पर नियुक्त किया जायेगा।

विज्ञापन के पश्चात् दीवान पद के उम्मीदवारों का तांता लग गया। कुछ प्रत्याशी पढ़े-लिखे व सम्भ्रान्त परिवारों के थे। कुछ पण्डित व मुल्ला भी थे। सभी इच्छुक व्यक्ति अपनी-अपनी किस्मत का परीक्षण कर रहे थे। इस पद के लिए ग्रेजुएट प्रत्याशी बहुत अधिक संख्या में आये थे। उन्होंने अपने आपको सफल उम्मीदवार दर्शाने का प्रयत्न किया। इसके लिए अपनी गलतियों को छिपाते रहे। कुछ उम्मीदवार ईश्वर में आस्था रखते थे, कुछ बिल्कुल नास्तिक थे। सुजानसिंह एक जौहरी की भाँति उम्मीदवार का चयन करने हेतु परीक्षण कर रहे थे। एक दिन नई उम्र के उम्मीदवारों ने हॉकी का खेल खेलने का निश्चय किया। देवगढ़ में यह खेल बिल्कुल नया था। सायंकाल तक खेल चलता रहा परन्तु हार-जीत का निर्णय नहीं हो पाया।

जहाँ खेल का मैदान था उसी के पास एक नाला था। चारों ओर अँधेरा छाया था। इसी समय एक किसान अनाज से भरी बैलगाड़ी लेकर आ रहा था। उसकी बैलगाड़ी नाले की कीचड़ में फँस गयी। निरन्तर प्रयत्न करने पर भी किसान अपनी गाड़ी को कीचड़ से नहीं निकाल पा रहा था। सभी खिलाड़ी खेल के बाद एक-एक करके चले गये। किसी ने किसान की ओर ध्यान नहीं दिया लेकिन उसी समय एक सुन्दर-सा नवयुवक आया। उसके पैर में चोट थी लेकिन उसने लँगड़ाते हुए किसान से कहा,“क्या मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूँ। तुम बैलों को गाड़ी में बैठकर हाँको, मैं पीछे से धक्का लगाता हूँ।” उस नवयुवक के प्रयास से बैलगाड़ी कीचड़ से बाहर आ गयी। उस युवक के पैर कीचड़ में सन गये थे। किसान ने उसे आशीर्वाद दिया कि भगवान चाहेगा तो तुम्ही देवगढ़ के दीवान बनोगे।

एक माह पूरा हो गया था। दीवान के पद का चुनाव का दिन आ गया था। सभी अपना-अपना परिणाम जानने के उत्सुक थे। सुजानसिंह ने जानकीनाथ को देवगढ़ का दीवान चुनकर घोषणा कर दी कि जानकीनाथ में दीवान बनने के सभी गुण निहित हैं। वह सभी प्रकार से उपयुक्त है।

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परीक्षा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजान सिंह बूढ़े हुए तो परमात्मा की याद आई। जाकर महाराज से विनय की कि दीनबन्धु! दास ने श्रीमान् की सेवा चालीस साल तक की, अब मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाये तो बुढ़ापे में दाग लगे। सारी जिन्दगी की नेकनामी मिट्टी में मिल जाये।

कठिन शब्दार्थ :
दीनबन्धु = गरीबों के भाई, गरीबों पर कृपा करने वाले। भूल-चूक = गलती। नेकनामी = अच्छे काम करने से मिलने वाला यश। मिट्टी में मिल जाये = नष्ट हो जाये।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘परीक्षा’ नामक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक श्री प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग :
देवगढ़ रियासत के दीवान सुजान सिंह ने राजा से उन्हें कार्यभार से मुक्त करने की प्रार्थना की है।

व्याख्या :
देवगढ़ रियासत के दीवान सरदार सुजान सिंह जब वृद्ध हो गये तो उन्हें परमात्मा का स्मरण हुआ। वे जाकर महाराज से बोले कि हे दीनबन्धु! मैंने आपकी चालीस साल तक पूर्ण निष्ठा से सेवा की है। अब मेरी अवस्था अधिक हो गई है, मुझमें अब राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं है। कहीं मुझसे भूल-चूक हो जाये, तो मेरे बुढ़ापे में दाग लग जायेगा। मेरी जिन्दगी की सब अच्छाइयाँ मिट्टी में मिलकर नष्ट हो जायेंगी।

विशेष :

  1. दीवान सरदार सुजान सिंह ने अपने को राजकीय कार्यभार से मुक्त करने की प्रार्थना राजा से की है।
  2. भाषा भावानुकूल है।

(2) लेकिन उसी समूह में एक ऐसा मनुष्य था जिसके। हृदय में दया थी और साहस था। आज हॉकी खेलते हुए उसके पैरों में चोट लग गई थी। लँगड़ाता हुआ धीरे-धीरे चला आता था। अकस्मात् उसकी निगाह गाड़ी पर पड़ी। ठिठक गया। उसे किसान की सूरत देखते ही सब बातें ज्ञात हो गईं। डंडा एक किनारे रख दिया। कोट उतार डाला और किसान के पास जाकर बोला-मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूं।

कठिन शब्दार्थ :
अकस्मात् = अचानक। निगाह = दृष्टि। ठिठक गया = रुक गया।

प्रसंग :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
दीवान पद की उम्मीदवारी के लिए यों तो अनेक। लोग आये थे। सबके निराले ठाट-बाट एवं शौक थे, पर उसी समूह में एक दयावान और साहसी व्यक्ति भी था। उसी का यहाँ वर्णन है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि दीवान पद की उम्मीदवारी के लिए देश के कोने-कोने से अनेक आदमी आये थे पर उस समूह में एक ऐसा भी व्यक्ति था जिसके हृदय में दया और साहस था। हॉकी का खेल खेलते समय उसके पैर में चोट लग गयी थी, अतः वह लँगड़ाता हुआ धीरे-धीरे चला आ रहा था। अचानक उसकी दृष्टि गाड़ी पर पड़ी। वह वहीं रुक गया। जब उसने किसान की सूरत देखी तो उसे किसान की परेशानी मालूम हो गई। उसने अपना खेल का डण्डा एक तरफ रख दिया। कोट उतार लिया और किसान के पास जाकर कहने लगा कि-‘मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूं।

विशेष :

  1. लेखक ने इस व्यक्ति के हृदय में दया और साहस का दर्शन कराया है।
  2. भाषा भावानुकूल है।

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(3) इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ-साथ आत्मबल। हृदय वह जो उदार हो, आत्मबल वह जो आपत्ति का वीरता के साथ सामना करे और रियासत के सौभाग्य से हमें ऐसा पुरुष मिल गया। ऐसे गुण वाले संसार में कम हैं और जो हैं, वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमारी पहुँच नहीं है।

कठिन शब्दार्थ :
कीर्ति = यश। मान = सम्मान।

सन्दर्भ:
पूर्ववत्।

प्रसंग :
देवगढ़ के नये दीवान की खोज में नया दीवान मिल जाता है, उसी का वर्णन है।

व्याख्या :
सरदार सुजान सिंह के स्थान पर जिस व्यक्ति का चयन हुआ उसकी घोषणा करते हुए सुजान सिंह ने कहा-इस पद के लिए ऐसे पुरुष की हमें आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ ही साथ आत्मबल। उसका हृदय उदार होना चाहिए, उसमें ऐसा आत्मबल हो जो किसी भी आपत्ति का वीरता के साथ सामना कर सके। इस देवगढ़ रियासत का यह सौभाग्य रहा कि उसे एक योग्य व्यक्ति मिल गया। ऐसे गुण वाले संसार में कम ही होते हैं और जो थोड़े से हैं भी वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमारी पहुँच नहीं है।

विशेष :

  1. देवगढ़ के दीवान पद की खोज में एक आत्मविश्वासी एवं कर्मठ व्यक्ति की प्राप्ति हो गयी।
  2. भाषा भावानुकूल, सहज।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म (एकांकी, सेठ गोविन्ददास)

सच्चा धर्म अभ्यास

बोध प्रश्न

सच्चा धर्म अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुरुषोत्तम कौन है?
उत्तर:
पुरुषोत्तम दिल्ली में रहने वाला एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण है।

प्रश्न 2.
शिवाजी के पुत्र का क्या नाम था?
उत्तर:
शिवाजी के पुत्र का नाम संभाजी था।

प्रश्न 3.
शास्त्रों में किसकी व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है?
उत्तर:
शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है।

प्रश्न 4.
पुरुषोत्तम किस कार्य को दुष्कर्म की संज्ञा देते हैं?
उत्तर:
पुरुषोत्तम शरणागत के बलिदान को दुष्कर्म की संज्ञा देते हैं।

प्रश्न 5.
सत्य का आश्रय छोड़ने का क्या दुष्परिणाम होता है?
उत्तर:
सत्य का आश्रय छोड़ने का यह दुष्परिणाम होता है कि सारा कुल भ्रष्ट हो जाता है। लड़कियाँ कुँआरी रह जाती हैं। लड़कों के शादी-विवाह नहीं होते हैं।

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सच्चा धर्म लघु उत्तरीय प्रश्न खालसराव प्रश्न

प्रश्न 1.
सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कब करता है?
उत्तर:
सत्य का आश्रय लेने पर जीवन में आने वाले सभी प्रश्नों का निराकरण हो जाता है और जब मनुष्य सत्य का आश्रय छोड़ मिथ्या का आसरा लेता है, तभी तरह-तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

प्रश्न 2.
असत्य किन परिस्थितियों में सत्य से बड़ा हो जाता है?
उत्तर:
धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

प्रश्न 3.
पुरुषोत्तम अपने किन गुणों के कारण सबके सम्मान-पात्र थे?
उत्तर:
पुरुषोत्तम जीवन भर सत्यवादी रहे। इसी गुण के कारण औरंगजेब के सदृश यवन बादशाह के राज्य में उनका पूरा सम्मान था।

प्रश्न 4.
सम्भाजी पुरुषोत्तम के आश्रय में कैसे पहुँचे?
उत्तर:
सम्भाजी शिवाजी का पुत्र था। दिल्ली से भागते समय शिवाजी मिठाई की टोकरी में सम्भाजी को पुरुषोत्तम के आश्रय में छोड़ गये थे।

प्रश्न 5.
पुरुषोत्तम की दृष्टि में सबसे बड़ा पातक क्या है?
उत्तर:
पुरुषोत्तम की दृष्टि में सबसे बड़ा पातक विश्वासघात है। शिवाजी अपने पुत्र सम्भाजी को पुरुषोत्तम को सौंपकर गये थे। यदि पुरुषोत्तम सम्भाजी के प्राणों की रक्षा न करता तो यह सबसे बड़ा पातक होता।

प्रश्न 6.
पुरुषोत्तम ने अहिल्या से सत्य और असत्य की क्या व्याख्या की?
उत्तर:
पुरुषोत्तम ने अहिल्या से सत्य और असत्य की व्याख्या करते हुए कहा कि अनेक बार सत्य के स्थान पर मिथ्या भाषण सत्य से भी बड़ी वस्तु होती है। जीवन में धर्म से बड़ी कोई चीज नहीं है, धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

सच्चा धर्म दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुरुषोत्तम के चरित्र की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
पुरुषोत्तम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनका सत्यवादी होना था। उनकी सत्यप्रियता दिल्ली में प्रसिद्ध थी। इसी कारण यवन तक उनका बहुत आदर करते थे।

प्रश्न 2.
पुरुषोत्तम के समक्ष कौन-सा धर्म संकट उपस्थित हुआ?
उत्तर:
पुरुषोत्तम के समक्ष यह धर्म संकट था कि उन्होंने शिवाजी के कहने पर उनके पुत्र सम्भाजी को अपने घर में रख लिया था। जब औरंगजेब को यह बात पता लगी तो पुरुषोत्तम शरणागत की रक्षा के लिए सम्भाजी को अपना भांजा बताकर उसके प्राणों की रक्षा करने लगे लेकिन सम्भाजी के प्राणों की रक्षा तभी हो सकती थी जब जीवन भर सत्य बोलने वाला पुरुषोत्तम मिथ्या बात (सम्भाजी को अपना भांजा बताना) कहे। अतः पुरुषोत्तम के सामने सत्य बोलना या असत्य बोलना यह धर्म संकट था।

प्रश्न 3.
“दिन भर का भूला-भटका यदि रात को भी घर लौट आये, तो वह भूला नहीं कहलाता”-इस कथन का भाव विस्तार कीजिए।
उत्तर:
अहिल्या अपने पति से बार-बार यह आग्रह करती है कि वह जब जीवनभर मिथ्या नहीं बोले तो शिवाजी के पुत्र सम्भाजी को अपना भांजा बताकर झूठ क्यों बोलना चाहते हैं? फिर वह कहती है कि दिन भर का भूला-भटका कोई आदमी यदि रात को घर लौट आये, तो वह भूला नहीं कहलाता। कहने का भाव यह है कि अहिल्या यह मान लेती है कि पुरुषोत्तम औरंगजेब के दूत दिलावर खाँ के सामने यह बात कह देगा कि सम्भाजी उसका भांजा नहीं है।

प्रश्न 4.
‘सच्चा धर्म’ एकांकी का केन्द्रीय भाव समझाइए।
उत्तर:
‘सच्चा धर्म’ एकांकी का केन्द्रीय भाव इस प्रकार है-
शिवाजी अपने कौशल से औरंगजेब की कारागार से मुक्त होते हैं, तब वे अपने पुत्र सम्भाजी को दिल्ली के एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण पुरुषोत्तम के घर में छिपा देते हैं। इस घटना की भनक औरंगजेब को लगती है, वह इसकी सत्यता के प्रतिपादन हेतु अपने दो सैनिकों को पुरुषोत्तम के पास भेजता है। पुरुषोत्तम की सत्यनिष्ठा के सभी दिल्लीवासी कायल थे। साथ ही उनकी यह प्रतिष्ठा भी थी कि वे किसी अन्य व्यक्ति के साथ बैठकर भोजन नहीं करते हैं।

औरंगजेब के सैनिक पुरुषोत्तम से वचनबद्ध होते हैं कि यदि वे अपने भांजे के साथ एक थाली में भोजन कर लेते हैं तो सैनिक स्वीकार कर लेंगे कि पुरुषोत्तम के यहाँ रहने वाला लड़का सम्भाजी नहीं है।-पुरुषोत्तम की पत्नी अहिल्या अपने पति को सत्य के मार्ग पर चलने की ही प्रेरणा देती पर पुरुषोत्तम की दृष्टि में सम्भाजी शरणागत हैं और उनकी रक्षा का उद्देश्य राष्ट्रीय भावना से अनुप्रेरित है। अतः पुरुषोत्तम इन महान् उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु वैयक्तिक आचार निष्ठा को खण्डित कर युग-धर्म की महत्ता स्थापित करते हैं।

प्रश्न 5.
एकांकी के तत्त्वों के नाम लिखकर ‘सच्चा धर्म’ के संवादों पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
विद्वानों ने एकांकी के निम्नलिखित तत्त्व माने हैं-कथानक, कथोपकथन, पात्र तथा चरित्र-चित्रण, देशकाल एवं वातावरण, उद्देश्य, शीर्षक।

‘सच्चा धर्म’ एकांकी के कथोपकथन या संवाद सारगर्भित तार्किक एवं महत् उद्देश्य के प्रचारक हैं। संवादों से पात्रों के चरित्र-चित्रण पर विशेष प्रभाव पड़ा है। ये संवाद सार्थक एवं कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं।

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सच्चा धर्म भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए
उत्तर:

  1. सत्यवादी-पुरुषोत्तम की पूरी दिल्ली में सत्यवादी के रूप में प्रतिष्ठा थी।
  2. बलिदान-पुरुषोत्तम सत्य बात कहकर सम्भाजी का बलिदान नहीं करना चाहता था।
  3. दुष्कर्म-शरणागत की रक्षा न करना सबसे बड़ा दुष्कर्म है।
  4. निस्तब्धता-अहिल्या द्वारा बार-बार पुरुषोत्तम से सत्य कहने की जिद पर पुरुषोत्तम शान्त हो जाता है, फिर चारों ओर निस्तब्धता छा जाती है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करके सन्धि का नाम लिखिए
उत्तर:

  1. शरणागत = शरण + आगत = दीर्घ सन्धि।
  2. पुरुषोत्तम = पुरुष + उत्तम = गुण सन्धि।
  3. यज्ञोपवीत = यज्ञ + उपवीत = गुण सन्धि।

प्रश्न 3.
‘क’ स्तम्भ में दिये गये शब्दों का’ख’स्तम्भ में दिये गये शब्दों से सही सम्बन्ध स्थापित कीजिए
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म img-1
उत्तर:
1. → (ii)
2. → (i)
3. → (v)
4. → (iii)
5. → (vi)
6. → (iv)

सच्चा धर्म महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सच्चा धर्म बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिवाजी शम्भाजी को किसके घर में छिपा देते हैं?
(क) रहमान बेग के
(ख) औरंगजेब के
(ग) दिलावर के
(घ) पुरुषोत्तम के।
उत्तर:
(घ) पुरुषोत्तम के।

प्रश्न 2.
‘सच्चा धर्म’ एकांकी का प्रमुख पात्र है
(क) पुरुषोत्तम
(ख) अहिल्या
(ग) शम्भाजी
(घ) विनायक।
उत्तर:
(क) पुरुषोत्तम

प्रश्न 3.
“दिन भर का भूला-भटका यदि रात को भी घर लौट आये तो वह भूला नहीं कहलाता।” यह कथन किसने कहा है?
(क) औरंगजेब ने
(ख) अहिल्या ने
(ग) रहमान बेग ने
(घ) शिवाजी ने।
उत्तर:
(ख) अहिल्या ने

प्रश्न 4.
‘सच्चा धर्म’ एकांकी में लेखक ने अपनी भावना को किन मूल्यों के आधार पर व्यक्त किया है?
(क) व्यक्तिगत मूल्य
(ख) राष्ट्रीय चेतना
(ग) सामाजिक मूल्य
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
“धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है, तो असत्य सत्य से भी बड़ा हो जाता है।” यह कथन किसका है?
(क) पुरुषोत्तम
(ख) शिवाजी
(ग) अहिल्या
(घ) विनायक।
उत्तर:
(क) पुरुषोत्तम

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. पुरुषोत्तम राव किसी अन्य के साथ बैठकर …………….. में भोजन नहीं कर सकता।
  2. वह लड़का पुरुषोत्तम का ……………… जैसा नहीं दिखता।
  3. ठीक है, उचित समय पर ……………… ने तुम्हें सुबुद्धि दी।
  4. अपने कर्तव्य का पालन ही सबसे ………….. है।
  5. अब आपको विश्वास हुआ या नहीं कि …………… मेरा भांजा है।

उत्तर:

  1. एक ही थाली
  2. भांजा
  3. भगवान
  4. बड़ा धर्म
  5. विनायक।

सत्य/असत्य

  1. ‘सच्चा धर्म’ एकांकी के लेखक सेठ गोविन्ददास हैं।
  2. पुरुषोत्तम व्यक्तिगत धर्म को महत्त्व प्रदान करता है, अतः उसी का पालन करता है।
  3. यदि धर्म की रक्षा असत्य से होती है,तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।
  4. पुरुषोत्तम अपनी पत्नी अहिल्या की बात मानता है।
  5. पुरुषोत्तम औरंगजेब से उपहार पाने की प्रबल इच्छा रखता है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म img-2
उत्तर:
1.→ (घ)
2. → (क)
3. → (ङ)
4. → (ग)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘सच्चा धर्म’ एकांकी के मुख्य पात्र का नाम लिखिए।
  2. शिवाजी के पुत्र का क्या नाम था? (2011)
  3. पुरुषोत्तम के घर पर शम्भाजी किस नाम से रहते हैं?
  4. ‘सच्चा धर्म’ एकांकी में पुरुषोत्तम की पत्नी का क्या नाम था?(2011)
  5. शास्त्रों में किसकी व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है?

उत्तर:

  1. पुरुषोत्तम
  2. शम्भाजी
  3. विनायक
  4. अहिल्या
  5. सत्य और असत्य की।

सच्चा धर्म पाठ सारांश

‘सच्चा धर्म’ एकांकी सेठ गोविन्ददास द्वारा रचित एक ऐतिहासिक एकांकी है। यह एकांकी मुगलकालीन इतिहास की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस एकांकी में तीन दृश्य हैं।

एकांकी का प्रारम्भ एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण पुरुषोत्तम के घर से होता है। पुरुषोत्तम सत्यवादी एवं कर्त्तव्यशील ब्राह्मण हैं लेकिन आज वे असमंजस की स्थिति में हैं क्योंकि शम्भाजी पुरुषोत्तम के घर उनके भांजे बनकर ‘विनायक’ नाम से रह रहे हैं लेकिन वे वास्तव में शिवाजी के पुत्र हैं।

औरंगजेब के गुप्तचर उन्हें ढूँढ़ते हुए घूम रहे हैं। उनकी पत्नी अहिल्या उनसे कहती है कि तुम औरंगजेब को सच बता दो लेकिन पुरुषोत्तम का कथन है कि शरण में आये व्यक्ति की रक्षा करना उनका परम धर्म है। मैं विश्वासघात नहीं कर सकता।

दिलावर खाँ जो कि गुप्तचर विभाग का सरदार है.वह उनके समक्ष यह शर्त रखता है कि यदि विनायक और पुरुषोत्तम एक ही थाली में भोजन कर लें तब ही वह उसे पुरुषोत्तम का भांजा मानेगा। अहिल्या पुरुषोत्तम से कहती है कि एक अब्राह्मण के साथ यदि भोजन करोगे तो तुम्हारा धर्म संकट में पड़ जायेगा। पुरुषोत्तम बड़ी उलझन में है कि क्या करे।

तभी दिलावर खाँ और रहमान बेग आपस में बात करते हुए आते हैं। वे पुरुषोत्तम की सत्यवादिता एवं कर्मनिष्ठा की प्रशंसा करते हैं और कहते हैं कि यदि पुरुषोत्तम ने विनायक के साथ भोजन कर लिया तो वह शम्भाजी को उनका भांजा मान लेगा।

जब दिलावर खाँ पण्डित जी को लेकर पुरुषोत्तम के घर पहुँचते हैं तब वे बहुत परेशान होते हैं कि क्या करें ? उनकी पत्नी बार-बार सच बोलने को प्रेरित करती है परन्तु पुरुषोत्तम को कर्तव्यपालन की भावना पहले दिखायी देती है। अतः वे विनायक के साथ एक ही थाली में भोजन परोसकर लाते हैं। इसके बाद पुरुषोत्तम विनायक के साथ भोजन करके सिद्ध कर देते हैं कि वह उनका भांजा है।

इस प्रकार दिलावर खाँ का शक दूर हो जाता है और वह बहुत शर्मिन्दा होता है। अन्त में,लेखक ने यह बता दिया कि व्यक्तिगत धर्म की अपेक्षा राष्ट्र धर्म ही सच्चा धर्म है। अतः राष्ट्र के हित के लिए यदि धर्म त्यागना भी पड़े तो अनुचित नहीं है।

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सच्चा धर्म संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) कम-से-कम तुम सदृश सत्यवादी-व्यक्ति के लिए तो ऐसे प्रश्नों में असाधारणता नहीं होनी चाहिए। जन्म भर तुम्हारा सत्यव्रत अटल रहा। तुम सदा कहते रहे हो कि जीवन में यदि मनुष्य एक सत्य का आश्रय लिये रहे तो वह सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कर देता है। पर जब मनुष्य सत्य का आश्रय छोड़ मिथ्या का आसरा लेता है, तभी तरह-तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

कठिन शब्दार्थ :
सदृश = समान। अटल = न टलने वाला। आश्रय = सहारा। निराकरण = समाधान।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘सच्चा धर्म’ एकांकी से लिया गया है। इसके लेखक सेठ गोविन्द दास जी हैं।

प्रसंग :
इसमें पुरुषोत्तम पण्डित की पत्नी अहिल्या अपने। पति को सत्य व्रत की याद दिलाते हुए उसको न त्यागने की बात कहती है।

व्याख्या :
पुरुषोत्तम की पत्नी अहिल्या अपने पति से कहती है कि कम-से-कम तुम जैसे सत्यवादी व्यक्ति को तो इस प्रकार के प्रश्नों ‘कि मैं सत्य बोलें या धर्म की रक्षा करूँ’ पर विशेष चिन्तित नहीं होना चाहिए। जीवन भर तुमने सत्य के व्रत को पाला है। तुम्ही यह कहा करते थे कि यदि मनुष्य सत्य का आश्रय लिए रहे तो वह सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का समाधान कर देता है। लेकिन जब मनुष्य सत्य का सहारा छोड़कर झूठ का सहारा लेता है, तभी उसके सामने तरह-तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

विशेष :

  1. अहिल्या अपने पति को सत्य का मार्ग न त्यागने की सलाह देती है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) तुम्हारी सत्यप्रियता अधिकांश दिल्ली में प्रसिद्ध है। इसी कारण यवन तक तुम्हारा आदर करते हैं। हमारे विवाह को चालीस वर्ष हो चुके परन्तु आज तक मैंने तुम्हारे मुख से कोई मिथ्या वाक्य क्या, मिथ्या शब्द ही नहीं, मिथ्या अक्षर तक नही सुना। वहीं आज तुम बड़ी मिथ्या बात कहकर उसे साधारण सत्य भाषण से बड़ा कह रहे हो।

कठिन शब्दार्थ :
अधिकांश = अधिक भाग में। यवन = मुस्लिम, मुगल। मिथ्या = झूठ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
पुरुषोत्तम की पत्नी अहिल्या पुरुषोत्तम की सत्यनिष्ठा से प्राप्त हुई प्रतिष्ठा की याद दिलाते हुए कहती है।

व्याख्या :
अहिल्या पुरुषोत्तम से कहती है कि आपकी सत्य-प्रियता दिल्ली के अधिकतर भागों में जानी-पहचानी जाती है और सम्भवतः इसी कारण सब लोग आपका आदर भी करते हैं। मेरे और तुम्हारे विवाह को चालीस वर्ष का समय बीत चुका है पर मैंने आज तक तुम्हारे मुँह से कोई वाक्य, कोई शब्द और यहाँ तक कि कोई मिथ्या अक्षर भी नहीं सुना है और तुम्ही आज एक झूठी बात कहकर कि सम्भाजी तुम्हारा भांजा है, उसे साधारण सत्य भाषण से बड़ा बता रहे हो।

विशेष :

  1. अहिल्या अपने पति को सत्यव्रत पर ही डटे रहने की सलाह देती है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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(3) अहिल्या, शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है। अनेक बार सत्य के स्थान पर मिथ्या भाषण सत्य से भी बड़ी वस्तु होती है। जीवन में धर्म से बड़ी कोई चीज नहीं है। धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है, तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

कठिन शब्दार्थ :
बारीकी से = सूक्ष्मता से, गहराई से। मिथ्या = झूठा, असत्य।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस अवतरण में पुरुषोत्तम अपनी पत्नी को समझाते हुए कह रहे हैं कि धर्म की रक्षा हेतु यदि असत्य भी बोला जाये तो वह सत्य से भी बड़ा होता है।

व्याख्या :
पुरुषोत्तम अहिल्या से कह रहे हैं कि शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से अर्थात् सूक्ष्मता से की गई है। अनेक बार सत्य के स्थान पर मिथ्या भाषण करना पड़ता है पर यह मिथ्या भाषण सत्य से भी बढ़कर होता है। मनुष्य के जीवन में धर्म ही सबसे बढ़कर है उसके सामने अन्य चीजें तुच्छ हैं। धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है तो वह असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है।

विशेष :

  1. लेखक की मान्यता है पुरुषोत्तम के शब्दों में कि धर्म की रक्षा हेतु असत्य भाषण भी सत्य से बड़ा होता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली?

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? (संस्मरण रामनारायण उपाध्याय)

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? अभ्यास

बोध प्रश्न

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गाँधी द्वारा स्थापित आश्रम का नाम लिखिए।
उत्तर:
गाँधी द्वारा ‘सेवा ग्राम’ आश्रम की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 2.
लोक संस्कृति का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर:
लोक संस्कृति का जन्म गाँवों में हुआ।

प्रश्न 3.
लेखक ने संगीत का जन्म किससे माना है?
उत्तर:
लेखक ने संगीत का जन्म श्रम से माना है।

प्रश्न 4.
ललित कलाओं का स्वभाव कैसा होता है?
उत्तर:
ललित कलाओं का स्वभाव फूल जैसा होता है।

प्रश्न 5.
ग्रामीण समूचे गाँव को किस रूप में मानता आया है?
उत्तर :
ग्रामीण समूचे गाँव को एक परिवार मानता आया है।

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मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक समाज से किन प्रश्नों को पूछना चाहता है?
उत्तर:
लेखक समाज से ये प्रश्न पूछना चाहता है कि मेरे गाँवों की सुख और शान्ति को किसने छीन लिया। गाँवों की अन्न-धन और लक्ष्मी कहाँ चली गई?

प्रश्न 2.
लोक की जीवन्त रसधारा को किसने, कहाँ सुरक्षित रखा है?
उत्तर:
लोक की जीवन्त रसधारा को गाँवों ने अपने हृदय-में सुरक्षित रखा है।

प्रश्न 3.
अँधेरे को सुहावने प्रभात में कौन, कैसे परिवर्तित करता है?
उत्तर:
गाँव की स्त्रियाँ भोर में उठकर आटे के साथ घने अँधेरे को पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देती थीं।

प्रश्न 4.
गाँव के समृद्ध किसान की स्थिति अब कैसी हो गई है?
उत्तर:
गाँव के समृद्ध किसान की स्थिति बढ़ती हुई महँगाई और शोषणकारी समाज व्यवस्था के चलते मज़दूर के रूप में बदल गई है।

प्रश्न 5.
श्रम से किसका जन्म होना प्रतीत होता था?
उत्तर:
श्रम से संगीत का जन्म होना प्रतीत होता था और यही संगीत लोरी बनकर श्रम को हल्का करने में योगदान देता था।

प्रश्न 6.
माटी कुम्हार की हथेली के स्पर्श से किन नवीन रूपों को धारण करती थी?
उत्तर;
माटी कुंम्हार की हथेली का स्पर्श पाकर नये-नये रूप धारण करती थी। कभी वह गागर बनती, कभी खपरैल तो कभी माटी का दीप बनकर आशा की किरण जगाया करती थी।

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ललित कलाओं का ग्राम्य जीवन में क्या महत्त्व था?
उत्तर:
ललित कलाओं का ग्राम्य जीवन में बड़ा महत्त्व था। ये ललित कलाएँ उनमें जीवन का रस घोलती थीं। तीज-त्यौहार, मेले-ठेले तथा चौपालों पर इनके रूप देखने को मिलते थे।

प्रश्न 2.
लोकगीत ग्रामीण जीवन में किस प्रकार रचे-बसे थे?
उत्तर:
लोकगीत ग्रामीण जीवन की रग-रग में बसे और रचे थे। ग्रामीण जनों का सम्पूर्ण जीवन इन्हीं लोकगीतों के ताने-बाने से बुना हुआ था। उनकी श्वास-प्रश्वास में ये ही गीत समाये हुए थे।

प्रश्न 3.
लेखक के अनुसार “गोकुल के सहज-सरल गाँव” का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की मान्यता है कि ब्रजमण्डल के गोकुल के गाँव जिस प्रकार सहज एवं सरल थे वैसे ही इस क्षेत्र के सभी गाँव सहज और सरल थे। बनावट एवं कृत्रिमता का उनमें कोई स्थान नहीं था। वहाँ के निवासी सरल एवं भोले-भाले व्यक्ति हुआ करते थे।

प्रश्न 4.
गाँब के सुसंस्कृत आदमी की पाँच विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
गाँव का आदमी निरक्षर भले हो लेकिन वह सुसंस्कृत रहा है। उसकी पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. वह विश्वास पर बिक जाता है
  2. वह धर्म पर झुक जाता है
  3. वह थककर बैठता नहीं हैं
  4. झुककर नहीं चलता है और
  5. वह दुःख में भी मुस्कुराता रहता है।

प्रश्न 5.
गाँव के कुटीर उद्योगों पर आधुनिकता का क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
गाँव के कुटीर उद्योगों पर आधुनिकता का यह प्रभाव पड़ा है कि गाँव के कुटीर उद्योग नष्ट हो गये हैं। फ्लोर मिल खुल जाने से चक्कियों का चलना बन्द हो गया है, ट्रैक्टर एवं अन्य कृषि यन्त्रों के प्रयोग से किसानों का हल आदि चलाना बन्द हो गया है।

प्रश्न 6.
गाँव का आदमी अपने समग्र जीवन से क्या-क्या देने की क्षमता रखता है?
उत्तर:
गाँव के आदमी का समग्र जीवन एक अनपढ़ी खुली किताब जैसा है। उसका रहन-सहन, खान-पान, वस्त्राभूषण, आचार-विचार, रीति-रिवाज, गीत और कथाएँ, नृत्य संगीत आदि सभी कुछ हमें कुछ न कुछ देने की क्षमता रखते हैं।

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मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद कीजिए और नाम लिखिए
उत्तर:

  1. रवीन्द्र = रवि + इन्द्र = दीर्घ सन्धि।
  2. निरक्षर = निः + अक्षर = विसर्ग सन्धि।
  3. संग्रहालय = संग्रह + आलय = दीर्घ सन्धि।
  4. सज्जन = सत् + जन = व्यंजन सन्धि।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रह कीजिए
उत्तर:

  1. कार्य स्थल= कार्य का स्थल = तत्पुरुष समास।
  2. रसधारा = रस की धारा = तत्पुरुष समास।
  3. श्वास-प्रश्वास = श्वास और प्रश्वास = द्वन्द्व समास।
  4. लोक संस्कृति = लोक की संस्कृति = तत्पुरुष समास।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों की सन्धि कीजिए
उत्तर:

  1. पर + उपकार = परोपकार।
  2. देव + ऋषि = देवर्षि।
  3. अति + आचार = अत्याचार।
  4. प्रति + एक = प्रत्येक।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द लिखिए.

  1. ठेका लेने वाला।
  2. खेती करने वाला।
  3. मिट्टी के बर्तन बनाने वाला।
  4. पानी भरने वाली।

उत्तर:

  1. ठेकेदार
  2. खेतिहर
  3. कुम्हार
  4. पनहारिन।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों को पहचान कर अर्थ के आधार पर वाक्य प्रकार का नाम लिखिए

  1. किसान के कंठ से गीत कहाँ लुप्त हो गये?
  2. गाँवों में लोक संस्कृति का जन्म हुआ।
  3. मेरे गाँव की शान्ति मन छीनो।
  4. निर्मल चाँदनी, रात को नहीं फैली थी।
  5. मैं चाहता हूँ कि आप एक बार गाँव अवश्य जायें।

उत्तर:

  1. प्रश्नवाचक
  2. स्वीकारात्मक
  3. आदेशात्मक
  4. निषेधात्मक
  5. आदेशात्मक।

मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली? महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? बहु-विकल्पीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
‘मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली?’ निबन्ध के लेखक हैं-
(क) रामनारायण उपाध्याय
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) बालकृष्ण भट्ट
(घ) अज्ञेय।
उत्तर:
(क) रामनारायण उपाध्याय

प्रश्न 2.
गाँधीजी ने गाँवों को आदर्श मानकर किस गाँव की स्थापना की?
(क) सेवाग्राम
(ख) रामपुर
(ग) शान्ति निकेतन
(घ) साबरमती आश्रम।
उत्तर:
(क) सेवाग्राम

प्रश्न 3.
लोकगीतों के स्वर गलों से लुप्त होकर कहाँ कैद किये गये हैं?
(क) पुस्तकों में
(ख) कैसिटों में
(ग) संग्रहालयों में
(घ) कहीं नहीं।
उत्तर:
(ख) कैसिटों में

प्रश्न 4.
मिट्टी को नवीन आकृति प्रदान करता है
(क) मनुष्य
(ख) बढ़ई
(ग) रंगरेज
(घ) कुम्हार।
उत्तर:
(घ) कुम्हार।

प्रश्न 5.
लोक संस्कृति का जन्म हुआ (2016)
(क) शहरों में
(ख) गाँवों में
(ग) कस्बों में
(घ) विद्यालयों में।
उत्तर:
(ख) गाँवों में

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ………….. की स्थापना की।
  2. ……….. में लोकसंस्कृति का जन्म हुआ। (2013)
  3. पहले गाँव का किसान …………. माना जाता था।
  4. गाँव का आदमी निरक्षर भले हो, लेकिन ………… रहा है।
  5. आज गाँव में बेरोजगारी है, गाँव में नीरसता है, गाँव . हैं।

उत्तर:

  1. शान्ति निकेतन
  2. ग्रामों
  3. समृद्ध
  4. सुसंस्कृत
  5. गरीब।

सत्य/असत्य

  1. गाँव का आदमी निरक्षर भले ही हो लेकिन सुसंस्कृत होता है।
  2. गाँव में रहने के लिए साधारण नागरिक ही नहीं कवियों का मन भी ललचाया था।
  3. गाँधीजी द्वारा स्थापित आश्रम का नाम ‘सेवाग्राम’ है। (2009)
  4. आज गाँव में मजदूर प्रसन्नता से गाता गुनगुनाता मिलेगा।
  5. गाँव वालों का जीवन एक बिना पढ़ी खुली पुस्तक की तरह सामने बिछा है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (घ)
3. → (ङ)
4. → (क)
5. → (ग)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. लोक संस्कृति का जन्म कहाँ हुआ? (2014, 18)
  2. ‘मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली?’ के लेखक कौन हैं?
  3. ललित कलाओं का स्वभाव कैसा होता है? (2017)
  4. कहाँ के सरल और सहज गाँव धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं?
  5. अमराई में अब किसकी कूक नहीं गूंजती है?

उत्तर:

  1. ग्रामों में
  2. पण्डित रामनारायण उपाध्याय
  3. फूल की तरह
  4. गोकुल के
  5. कोयल।

मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली? पाठ सारांश

इस संस्मरण में पं.रामनारायण उपाध्याय जी ने भारत के गाँव की संस्कृति का अवलोकन किया है लेकिन निबन्धकार भारत के गाँव के वर्तमान को लेकर व्यथित हैं। उसका प्रमुख कारण है कि गाँव अपनी पहचान को नष्ट करते जा रहे हैं। गाँव की पहचान के साथ-साथ भारतमाता की पहचान भी धुंधली पड़ती जा रही है।

गाँधीजी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत के गाँवों को ही आदर्श मानकर सेवाग्राम और शान्ति निकेतन की स्थापना की। हमारे देश के गाँवों की प्राकृतिक छटा अलौकिक व दर्शनीय थी लेकिन अब वही गाँव आधुनिकता के दबाव के कारण इस अनुपम सुख से पृथक् होते जा रहे हैं।

अब न तो कहीं लोकगीतों की मधुर ध्वनि सुनाई देती है न ही ढोलक की थाप। ये लोकगीत मानव जीवन का अभिन्न अंग थे तथा मानव को भरपूर स्फूर्ति प्रदान करते थे। अब इन गीतों के समाप्त होने के कारण मानव की संवेदना भी समाप्त हो गयी है।

जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था वही भारतवासी जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, आर्थिक रूप से विपन्न हैं। आत्मनिर्भर गाँव अब छिन्न-भिन्न हो गये हैं। मजदूर व शिल्पकार रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से पलायन कर शहर की ओर भाग रहे हैं।

पूर्व में गाँव के लोग अनपढ़ होते थे लेकिन उनमें परस्पर स्नेह. आस्था. विश्वास और परिश्रम की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वे श्रम और संघर्ष करके भी प्रसन्नतापूर्वक जीवन बिताते थे क्योंकि वे आत्मनिर्भर थे। आज भी इतिहास इस बात का प्रमाण है कि भारत के गाँव खुशहाल थे लेकिन आज गाँव में नीरसता,निर्धनता और अशान्ति है। निबन्धकार का इस निबन्ध को लिखने का उद्देश्य है कि लोकचेतना जाग्रत हो।

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मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली? संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) जिन गाँवों ने हिन्दी साहित्य को ‘हीरो’ और ‘गोबर’ जैसे पात्र दिये, जिन गाँवों के लिए गाँधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शहरों की समस्त सुविधाओं को त्यागकर ‘शान्ति निकेतन’ और ‘सेवाग्राम’ को अपना कार्यस्थल बनाया, जिन गाँवों में रहने के लिए साधारण नागरिक ही नहीं कवियों का मन भी ललचाया था, वे ही गाँव आज अशान्ति के घर हुए जा रहे हैं और जैसे किसी भी आँख से आँसू गिरे, ऐसे गाँवों के आँचल से एक-एक घर टूटते ही चले जा रहे हैं।

कठिन शब्दार्थ :
कार्यस्थल = कामकाज करने का स्थान। आँचल = परिवेश, वातावरण।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्री रामनारायण उपाध्याय हैं।

प्रसंग :
इसमें लेखक की चिन्ता यह है कि पहले तो गाँव सुख शान्ति के भण्डार हुआ करते थे और सभी लोग गाँवों की ओर देखा करते थे; पर आज तो वे समस्याओं के घर बनते चले जा रहे हैं।

व्याख्या :
लेखक श्री रामनारायण उपाध्याय कहते हैं कि जिन गाँवों ने प्रेमचन्द के प्रसिद्ध उपन्यास, ‘गोदान’ में ‘होरी’ और ‘गोबर’ का चित्रण किया है तथा जिन गाँवों में गाँधी और टैगोर को शहरों की सभी सुख-सुविधाएँ त्याग कर ‘सेवा ग्राम’ और ‘शान्ति निकेतन’ भाया तथा इन्हीं को इन लोगों ने अपनी कर्म भूमि बनाया। इन गाँवों के प्रति साधारण नागरिक ही नहीं अपितु पन्त जैसे महान् कवियों का मन भी ललचाया करता था, वे ही गाँव आज सुख शान्ति से रहित होकर अशान्ति के घर क्यों बनते जा रहे हैं? जिस प्रकार किसी आँख से आँसू टप-टप गिरते जाते हैं, उसी प्रकार गाँव के आँचल के एक-एक घर टूटते जा रहे हैं।

विशेष :

  1. लेखक को गाँवों की वर्तमान दशा से हार्दिक दुःख होता है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

(2) जिन गाँवों में लोक-संस्कृति का जन्म हुआ, जिसने लोक की जीवन्त रसधारा को, अपने हृदय में सुरक्षित रखा, वे ही गाँव आज टूटते जा रहे हैं, गाँव की वह पुरानी पीढ़ी भी समाप्त होती जा रही है जिसका सम्पूर्ण जीवन श्वास-प्रश्वास की तरह गीतों के ताने-बाने पर आधारित था। अब तो वे गोकुल से सहज-सरल गाँव नष्ट होते जा रहे हैं, जहाँ स्त्रियाँ भोर में उठकर आटे के साथ घने अँधेरे को भी पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देती थीं। जहाँ चक्की के हर फेरे के साथ गीत की नई पंक्तियाँ उठती थीं। लगता था जैसे श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा हो और संगीत लोरी बनकर श्रम को हल्का करने में अपना योगदान दे रहा हो।

कठिन शब्दार्थ :
लोकसंसार। जीवन्त रसधारा = ऐसी धारा जो जीवन प्रदान करती हो। श्वास-प्रश्वास = साँस लेना और छोड़ना। लोक-संस्कृति = गाँव की संस्कृति।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मानना है कि लोक संस्कृति का जन्म गाँवों से ही हुआ था और आज वह टूटती जा रही है।

व्याख्या :
लेखक श्री रामनारायण उपाध्याय कहते हैं कि जिन गाँवों में लोक-संस्कृति का जन्म हुआ था और जिसने वहाँ के जन-जीवन में एक जीवन्त जीवन प्रवाहित किया था, वे ही गाँव आज टूटते और बिखरते जा रहे हैं। गाँव की वह पुरानी पीढ़ी आज नाश के कगार पर है जिसका सारा जीवन श्वास-प्रश्वास की तरह लोक गीतों के ताने-बाने पर टिका हुआ था। गोकुल के सहज एवं सरल गाँव जहाँ स्त्रियाँ प्रात:काल की बेला में उठकर घर की चक्की पर बैठकर लोकगीत गाते-गाते रात्रि के घने अँधेरे को पीसकर सुहावने प्रात:काल में बदल देती थीं, आज वे गाँव भी नष्ट होते जा रहे हैं। उस समय गाँव की स्त्रियाँ चक्की चलाते वक्त गीत की नई-नई पंक्तियाँ गाकर वातावरण को मधुर बना दिया करती थीं। उस समय ऐसा लगता था मानो श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा हो और संगीत लोरी बनकर श्रम को हल्का कर दिया करता था।

विशेष :

  1. पहले गाँवों में स्त्रियाँ चक्की चलाते समय, पानी भरते समय लोकगीत गाया करती थीं।।
  2. भाषा सहज, सरल में भावानुकूल है।

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(3) पहले जो आदमी गाँव का समृद्ध किसान माना जाता था, वही अब बढ़ती महँगाई और शोषणकारी समाज व्यवस्था के चलते अपनी जमीन से हाथ धोकर खेतिहर मजदूर में बदलता जा रहा है और सचमुच जो मजदूर था वह जमीन पर से किसान का आधिपत्य कम हो जाने से शहरों में मजदूरी करता नजर आता है।

कठिन शब्दार्थ-समृद्ध = सम्पन्न, खाता-पीता। शोषणकारी = सताने वाला, अनुचित लाभ लेने वाला। खेतिहर = मजदूरी पर खेत में काम करने वाला। आधिपत्य = अधिकार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक यह बताना चाहता है कि गाँव के लोग पलायन कर शहरों की ओर भाग रहे हैं।

व्याख्या :
लेखक रामनारायण उपाध्याय कहते हैं कि पहले जो गाँव का सम्पन्न किसान माना जाता था वह बढ़ती महँगाई के कारण तथा शोषण करने वाली सामाजिक व्यवस्था के कारण अपनी जमीन से हाथ धोकर खेत में काम करने वाला मजदूर बनता जा रहा है और जो वास्तव में मजदूर था वह जमीन पर से किसान का अधिकार समाप्त हो जाने पर शहर में मजदूरी करता दिखाई देता है।

विशेष :

  1. बढ़ती महँगाई और शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था ने किसानों को मजदूर बना डाला है।
  2. भाषा सहज एवं सरल है।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 5 पहली चूक

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 5 पहली चूक (व्यंग्य निबन्ध, श्रीलाल शुक्ल)

पहली चूक अभ्यास

बोध प्रश्न

पहली चूक अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘आपका नाम बाजरा तो नहीं है’ यह कथन किसने किससे पूछा?
उत्तर:
यह कथन लेखक ने रामचरन से पूछा।

प्रश्न 2.
रामचरन ने किसानों को पुकारते हुए क्या कहा?
उत्तर:
रामचरन ने किसानों को पुकारते हुए कहा-“यह देखो, ये भैया तो बाजरे को आदमी समझ रहे हैं।”

प्रश्न 3.
लेखक ने भाषायी चूक से बचने के लिए कौन-कौनसी तैयारी की ?
उत्तर:
लेखक ने भाषायी चूक से बचने के लिए कृषि शास्त्र की मोटी-मोटी किताबें मँगवाकर उनका अध्ययन आरम्भ कर दिया।

प्रश्न 4.
लेखक को बीज गोदाम क्यों जाना पड़ा?
उत्तर:
लेखक को बीज और खाद खरीदने के लिए बीज गोदाम जाना पड़ा।

प्रश्न 5.
लेखक के अनुसार कंद-मूल-फल खाने के कारण ऋषियों की दिलचस्पी किस व्यवसाय में थी?
उत्तर:
कंद-मंद-फल खाने के कारण ऋषियों की दिलचस्पी हॉर्टिकल्चर में थी।

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पहली चूक लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चाचा ने लेखक को खेती के बारे में क्या समझाया?
उत्तर:
चाचा ने लेखक को खेती के बारे में समझाया कि खेती का काम है तो बड़ा उत्तम, पर फारसी पढ़कर जिस प्रकार तेल नहीं बेचा जा सकता, वैसे ही अंग्रेजी पढ़कर खेत नहीं जोता जा सकता।

प्रश्न 2.
लेखक ने रामचरन के कन्धे पर हाथ रखते हुए मित्र भाव से क्या-क्या प्रश्न किये?
उत्तर:
लेखक ने रामचरन के कन्धे पर हाथ रखते हुए मित्र भाव से कहा-“तो भाई रामचरन, मुझे बताओ यह बाजरा कौन है? कहाँ रहता है? यह खड़ा कहाँ है? इसे क्यों खड़ा किया गया है?”

प्रश्न 3.
पंचभूत और पंचगव्य में क्या अन्तर है?
उत्तर:
मानव शरीर का पंचभूतों अर्थात्-पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से मिलकर निर्माण होता है। पंचगव्य से आशय है-गाय से मिलने वाली पाँच वस्तुएँ-दूध, दही, घी, गोबर और गौ मूत्र।

प्रश्न 4.
“शरीर ही मिट्टी का बना हुआ है”-किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है?
उत्तर:
मानव शरीर के निर्माण में पंचभूतों का योग होता है और ये पंच भूत हैं-पृथ्वी (मिट्टी), जल, अग्नि, आकाश और वायु। अतः जब शरीर के निर्माण में मिट्टी की प्रमुख भूमिका है तब फिर हमें मिट्टी से क्यों परहेज करना चाहिए?

प्रश्न 5.
लेखक ने अन्तिम बार शहर जाने का फैसला क्यों किया?
उत्तर:
लेखक ने अन्तिम बार शहर जाने का फैसला इसलिए किया कि वह शहर में रहकर बाजरे के विषय में अपनी रिसर्च कर सकेगा तथा वह बता पायेगा कि खाद के प्रयोग से बाजरे की लताओं में मीठे और बड़े-बड़े फल लाये जा सकते हैं।

पहली चूक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘पहली चूक’ पाठ का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
‘पहली चूक’ शीर्षक पाठ में लेखक ने उन शिक्षित जनों को अपनी रचना का केन्द्र बिन्दु बनाया हैं जो शहर में निवास करते हैं और ग्रामीण वातावरण से पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं। वे पुस्तकों और सिनेमाओं से प्राप्त जानकारी के आधार पर अपने मन में काल्पनिक ग्राम का निर्माण किया करते हैं। उनकी यह कल्पना उस समय खण्ड-खण्ड होकर बिखर जाती है, जब वे ग्रामीण परिवेश में जाकर वास्तविक बातों को जान पाते हैं।

प्रश्न 2.
‘सिनेमा से खेती की शिक्षा’ पर लेखक के विचार लिखिए।
उत्तर:
सिनेमा खेती की उन्नति का एक अच्छा साधन है। सिनेमा द्वारा खेती का बड़ा प्रचार हुआ है। बड़े-बड़े हीरो खेत जोतते जाते हैं और गाते जाते हैं। हीरोइन खेत पर टोकरी में रोटी लेकर आती है। हरी-भरी फसल में आँख-मिचौली का खेल होता है। फसल काटते समय हीरोइन के साथ बहुत-सी लड़कियाँ नाचती हैं और गाती भी हैं। वे नाचती जाती हैं और फसल अपने आप कटती जाती है। ऐसे ही मधुर दृश्यों को देखकर, पढ़े-लिखे आदमी गाँवों में आने लगते हैं और खेतों के चक्कर काटने लगते हैं। इस प्रकार सिनेमा द्वारा खेती की शिक्षा मिलती है।

प्रश्न 3.
‘फारस में तेल बेचने वाले संस्कृत नहीं बोलते’ इस कथन का भाव विस्तार कीजिए।
उत्तर:
लेखक का चाचा लेखक को समझाता है कि जिस प्रकार फारस में तेल बेचने वाले संस्कृत नहीं बोलते, खेत जोतते हैं। उसी प्रकार भारत में फारसी पढ़कर तेल नहीं बेचा जाता है। उसी प्रकार अंग्रेजी पढ़कर भी खेती नहीं की जा सकती।

पहली चूक भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम बताइए
उत्तर:

  1. वागीश = वाक् + ईश = व्यंजन सन्धि।
  2. कीटाणु = कीट + अणु = दीर्घ सन्धि।
  3. ग्रन्थालय = ग्रन्थ + आलय = दीर्घ सन्धि।
  4. महेश = महा + ईश = गुण सन्धि।
  5. उन्नति = उत् + नति = व्यंजन सन्धि।।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों में संकेत के अनुसार परिवर्तन कीजिए-

  1. खेत के पूरब में गन्ने का एक खेत है। (प्रश्न वाचक)
  2. मैं खेती के बारे में अधिक जानता हूँ। (निषेधात्मक वाक्य)
  3. यह आप क्यों पूछ रहे हो ? (विस्मयबोधक वाक्य)

उत्तर:

  1. क्या खेत के पूरब में गन्ने का एक खेत है?
  2. मैं खेती के बारे में अधिक नहीं जानता हूँ।
  3. अरे! यह आप क्यों पूछ रहे हो?

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पहली चूक महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

पहली चूक बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘पहली चूक’ पाठ में लेखक ने किसे केन्द्र-बिन्दु बनाया है? (2009)
(क) ग्रामीणों को
(ख) शिक्षितों को
(ग) मूरों को
(घ) अज्ञानियों को।
उत्तर:
(क) ग्रामीणों को

प्रश्न 2.
गोबर पवित्र वस्तु है, उसका स्थान है
(क) पंचभूत में
(ख) मिट्टी में
(ग) पंचगव्य में
(घ) किसी में नहीं।
उत्तर:
(ग) पंचगव्य में

प्रश्न 3.
“बेटा! यह खेती का पेशा तुमसे नहीं होगा।” किसने कहा है?
(क) चाचा ने
(ख) लेखक ने
(ग) किसान ने
(घ) रामचरन ने।
उत्तर:
(क) चाचा ने

प्रश्न 4.
खेती करने वाला कहलाता है (2009)
(क) मजदूर
(ख) मुनीम
(ग) माली
(घ) कृषक।
उत्तर:
(घ) कृषक।

प्रश्न 5.
‘पहली चूक’ किस विधा में लिखी गई रचना है? (2018)
(क) कहानी
(ख) एकांकी
(ग) निबन्ध
(घ) व्यंग्य निबन्ध।
उत्तर:
(घ) कृषक।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. मिट्टी का स्थान यदि पंचभूत में है तो गोबर का स्थान …………. में है।
  2. क्योंकि फारस में तेल बेचने वाले …………. नहीं बोलते,खेत जोतते हैं।
  3. हरी-भरी फसल में ……….. का खेल होता है।
  4. गाँव की पुरानी पीढ़ी भी ……….. होती जा रही है।
  5. पहली चूक …………. विधा की रचना है। (2012, 17)

उत्तर:

  1. पंचगव्य
  2. संस्कृत
  3. आँख मिचौली
  4. समाप्त
  5. व्यंग्य

सत्य/असत्य

  1. ‘पहली चूक’ का शीर्षक सटीक एवं सार्थक नहीं है।
  2. लेखक ने खेत में खड़े बाजरे को आदमी समझा।
  3. बीज खरीदने के लिए बीजगोदाम जाना पड़ता है।
  4. ‘मैं वैज्ञानिक ढंग से खेती करूँगा।’ अन्त में लेखक ने यही निर्णय लिया।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. सत्य

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सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 5 पहली चूक img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (ङ)
3. → (क)
4. → (घ)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. पहली चूक किसके द्वारा हुई थी?
  2. “फारसी पढ़कर तेल नहीं बेचा जा सकता।” यह कथन किसका है?
  3. लेखक ने खेत की मेंड़ पर खड़े किस किसान से पूछा-“आपका नाम बाजा तो नहीं है?
  4. अन्त में लेखक ने किस व्यवसाय को श्रेष्ठ माना?
  5. खेती के प्रचार व प्रसार का जीता-जागता उदाहरण क्या है?

उत्तर:

  1. लेखक के द्वारा
  2. लेखक के चाचा का
  3. रामचरन से
  4. खेती
  5. सिनेमा।

पहली चूक पाठ सारांश

‘पहली चूक’ श्रीलाल शुक्ल द्वारा रचित उच्चकोटि का व्यंग्यात्मक निबन्ध है। इस निबन्ध में श्रीलाल शुक्ल जी ने शहर में रहने वालों पर तीखा प्रहार किया है क्योंकि शहर में रहने वाले व्यक्तियों का ग्रामीण वस्तुओं से तथा ग्राम के वातावरण से तनिक भी परिचय नहीं होता है। शहर में रहने वाले लोगों को गाँव की जानकारी केवल पुस्तकों के द्वारा होती है या वे सिनेमा के द्वारा ग्रामीण व्यवस्था से परिचित होते हैं।

लेखक को जब बी.ए. करने के बाद नौकरी नहीं मिली तो उसने अपने गाँव जाकर खेती करने का निर्णय किया। लेकिन उनके चाचा ने कहा कि किसी भी कार्य को करने से पूर्व उसका अनुभव आवश्यक है,अंग्रेजी पढ़ लेने मात्र से वह खेती नहीं कर सकता है। खेती के लिए अथक परिश्रम की आवश्यकता होती है। दिन-रात,मिट्टी,गोबर तथा धूप,सर्दी व बरसात में परेशानियों से जूझना पड़ता है।

लेखक को उसके चाचा ने यह भी बताया यह शरीर मिट्टी से बना है तथा गोबर का पंचगव्य में स्थान है। अतः पवित्र है। लेखक अपने चाचा की बातों से प्रभावित हुआ और बोला कि खेती जाहिलों का पेशा नहीं है। टालस्टॉय किसान था,वाल्टेयर ने भी स्वयं खेती की थी। अतः खेती को सर्वोत्तम व्यवसाय मानकर लेखक ने खेती करने का निर्णय किया। लेखक ग्रामीण वस्तुओं से अपरिचित था अतः उसे यह नहीं मालूम था कि गन्ना क्या होता है अथवा बाजरा क्या होता है।

लेखक चाचा द्वारा बताये स्थान पर पहुँचकर वहाँ पर बैठे एक किसान से पूछने लगा, “क्या तुम बाजरा हो?” वह बोला, “मेरा नाम रामचरण है।”

बाद में उसे छायादार वृक्ष समझने लगा। लेखक ने निश्चय किया कि मैं अब शहर में रहकर रिसर्च करूँगा तथा समझने की चेष्टा करूँगा कि खाद बाजरे को हरा-भरा करने का अचूक साधन है।

पहली चूक संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) “उत्तम खेती मध्यम बान,
अधम चाकरी भीख निदान।”

कठिन शब्दार्थ :
उत्तम = सबसे अच्छा। मध्यम = बीच का। बान = व्यवसाय, धन्धा। अधम = गिरा हुआ, ओछा। चाकरी = नौकरी।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत अंश ‘पहली चूक’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इसके लेखक श्रीलाल शुक्ल हैं।

प्रसंग :
इसमें लेखक ने अन्य सभी व्यापारों से कृषि को सबसे अच्छा बताया है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि उपर्युक्त कहावत प्रायः सुनने को मिल जाती है और इसका अर्थ यह है. कि संसार में अन्य सभी व्यापारों में खेती करना सबसे उत्तम काम है, मध्यम काम व्यापार करना है, चाकरी अर्थात् नौकरी अधम है और भीख माँगना सबसे तुच्छ है।

विशेष :
भाषा सहज एवं सरल है।

(2) शरीर ही मिट्टी का बना हुआ है और यह गोबर तो परम पवित्र वस्तु है। मिट्टी का स्थान यदि पंचभूत में है तो गोबर का स्थान पंचगण्य में है।

कठिन शब्दार्थ :
पंचभूत = मानव शरीर का निर्माण पाँच भूतों से होता है और वे हैं-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पंचगण्य = गाय के पाँच उपादान होते हैं-दूध, दही, घी, गोबर और गौ मूत्र।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक ने बी. ए. करने के पश्चात् गाँव जाकर अपने चाचा से खेती का व्यवसाय करने की इच्छा व्यक्त की तो चाचा लेखक को खेती की बुराइयाँ एवं परेशानियाँ बताते हुए कहते हैं कि इसमें दिन-रात पानी और पसीना. मिट्टी और गोबर से खेलना पड़ता है। चाचा के इस तर्क का उत्तर देते हुए लेखक कहता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि चाचाजी मनुष्य का यह शरीर ही मिट्टी का बना हुआ है और यह गोबर तो परम पवित्र वस्तु है। मिट्टी का स्थान मानव शरीर का निर्माण करने वाले पंच भूतों अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में से एक है तथा उसी प्रकार गोबर का स्थान पंचगण्य अर्थात् दूध, दही, घी, गोबर और मूत्र में है। अतः मुझे मिट्टी और गोबर से कोई परेशानी नहीं होगी।

विशेष :

  1. लेखक ने मिट्टी और गोबर का महत्त्व बताया
  2. भाषा सरल एवं सहज है।

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(3) सिनेमा खेती की उन्नति का एक अच्छा साधन है। सिनेमा द्वारा खेती का बड़ा प्रचार हुआ है। बड़े-बड़े हीरो खेत जोतते जाते हैं और गाते जाते हैं। हीरोइन खेत पर टोकरी में रोटी लेकर आती है। हरी-भरी फसल में आँख-मिचौंली का खेल होता है। फसल काटते समय हीरोइन के साथ बहुत-सी लड़कियाँ नाचती हैं और गाती भी हैं। वे नाचती जाती हैं और फसल अपने आप कटती जाती है। ऐसे ही मधुर दृश्यों को देखकर, पढ़े-लिखे आदमी गाँवों में आने लगते हैं और खेतों के चक्कर काटने लगते हैं। इस प्रकार सिनेमा द्वारा खेती की शिक्षा मिलती है। सच पूछिए तो खेती करने की सच्ची शिक्षा मुझे सिनेमा से ही मिली थी।

कठिन शब्दार्थ :
आँख मिचौली = लुकाछिपी का खेल। मधुर = सुन्दर, मोहक।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक बताता है कि सिनेमा देखकर ही उसे इतना पढ़-लिख जाने के बाद भी खेती करने की शिक्षा मिली है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि आजकल सिनेमा खेती की उन्नति का अच्छा साधन बन गया है। इन सिनेमाओं ने खेती के प्रचार में बहुत बड़ा योगदान किया है। बड़े-बड़े प्रसिद्ध हीरो खेत जोतते जाते हैं और मस्ती में गाने गाते जाते हैं। हीरोइन खेत पर टोकरी में रोटी खाने के लिए लेकर आती है। हीरो और हीरोइन हरी-भरी फसल में आँख-मिचौली का खेल खेलते हैं। फसल जब कटने को होती है तो उस समय हीरोइन के साथ अनेक सुन्दर लडकियाँ नाचती और गाती हैं। वे एक ओर नाचती जाती हैं और दूसरी ओर फसल अपने आप कटती जाती है। इसी प्रकार के मनमोहक दृश्यों को देखकर पढ़े-लिखे लोग गाँवों की ओर जाने लगते हैं तथा वे खेतों के चक्कर काटते रहते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सिनेमा द्वारा खेती की शिक्षा प्राप्त होती है। सच मानो तो खेती करने की सच्ची शिक्षा मुझे सिनेमा से ही मिली थी।

विशेष :

  1. लेखक ने सिनेमाओं को खेती सिखाने का उचित साधन माना है।
  2. भाषा सहज, सरल है।

(4) जैसे खूटे से छूटी हुई घोड़ी भूसे के ढेर पर मुँह मारती है, जैसे धूप में बँधी हुई भैंस तालाब की ओर दौड़ती है, वैसे ही तुम्हारा शहर की ओर जाना बड़ा स्वाभाविक और उचित है।

कठिन शब्दार्थ :
स्वाभाविक = स्वभावगत। सन्दर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग :
लेखक का मत है कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति शहर की ओर ही भागता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जैसे छूटे से बँधी हुई घोड़ी भूसे के ढेर को देखकर उसी पर टूट पड़ती है और धूप में बँधी हुई भैंस तालाब की ओर भागती है, उसी प्रकार पढ़ा-लिखा व्यक्ति शहर की ओर भागता हुआ दिखाई देता है और उसका यह कार्य स्वाभाविक और उचित ही है।

विशेष :

  1. लेखक ने पढ़े-लिखे व्यक्ति की स्वाभाविक भावना को बताया है।
  2. भाषा सहज और सरल है।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा

विविधा अभ्यास

बोध प्रश्न

विविधा अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
आसमान में किस तरह के बादल उड़ रहे थे?
उत्तर:
आसमान में झीने-झीने, कजरारे एवं चंचल बादल उड़ रहे थे।

प्रश्न 2.
रिमझिम-रिमझिम पानी बरसने के बाद क्या हुआ?
उत्तर:
रिमझिम-रिमझिम पानी बरसने के बाद आकाश खुल गया और धूप-निकल आयी।

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार हवा बार-बार क्या कर रही है?
उत्तर:
कवि के अनुसार हवा बार-बार उनकी पत्नी का आँचल खींच रही है।

प्रश्न 4.
कवि ने नई सभ्यता का स्वरूप कैसा बतलाया
उत्तर:
कवि ने नई सभ्यता का स्वरूप इस प्रकार बतलाया है कि पूर्व में तो हमारी कुटियों में तूफान बिना पूछे ही घुस जाया करते थे, लेकिन नई सभ्यता में वे बिना दरवाजे खटखटाए ही घरों में चले आते हैं।

प्रश्न 5.
आक्रोश में आकर मजदूरों ने क्या किया?
उत्तर:
आक्रोश में आकर मजदूरों ने सूरज को निगल लिया।

प्रश्न 6.
‘खाली पेट’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
‘खाली पेट’ से कवि का आशय भूखे-नंगे लोगों से है।

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विविधा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बादलों के हटने पर तारे कैसे दिखलाई पड़ते हैं?
उत्तर:
बादलों के हटने पर तारे जब-तब उज्ज्वल एवं झलमल दिखाई पड़ते हैं।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार सम्पूर्ण दिन में किस तरह के बादल दिखाई पड़ रहे थे?
उत्तर:
कवि के अनुसार सम्पूर्ण दिन में कपसीले, ऊदे, लाल, पीले और मटमैले बादल दिखाई पड़ रहे थे।

प्रश्न 3.
कवि ने हरे खेतों के बारे में क्या कल्पना की हैं?
उत्तर:
कवि ने हरे खेतों के बारे में यह कल्पना की है कि हम दोनों ने इनको जोता और बोया है; अब इनमें धीरे-धीरे अंकुर निकल आये हैं और इनकी हरियाली ने धरती माता का रूप सजा दिया है।

प्रश्न 4.
कवि के अनुसार मेहनत से कमाई हुई फसल का वास्तविक लाभ किसे प्राप्त होता है?
उत्तर:
कवि के अनुसार मेहनत से कमाई हुई फसल का वास्तविक लाभ बिचौलियों को प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 5.
कवि नियति से क्या प्रश्न करते हैं?
उत्तर:
कवि नियति से एक प्रश्न करता है कि तुमने खाली पेट वालों को घुटने क्यों दिए।

प्रश्न 6.
‘बुनियाद चरमराने’ से कवि का क्या तात्पर्य। है?
उत्तर:
बुनियाद चरमराने से कवि का तात्पर्य यह है कि नयी सभ्यता ने हमारे प्राचीन ढंग एवं आदर्शों को पूरी तरह नकार दिया है।

विविधा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘त्रिलोचन’ की कविता में प्रस्तुत शरद ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शरद ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कविवर त्रिलोचन कहते हैं कि नवमी की तिथि है और इस समय रात बड़ी ही मधुरं एवं शीतल है। अभी पूरी तरह जाड़ा नहीं पड़ा है। हाँ, हल्का गुलाबी जाड़ा अवश्य शुरू हो गया। इस गुलाबी जाड़े में कभी-कभी शरीर के रोएँ काँप जाया करते हैं। कभी-कभी रिमझिम पानी की बरसात होती है तो कभी आकाश साफ खुल जाता है। कभी-कभी कपसीले, ऊदे, लाल और पीले तथा मटमैले बादल आकाश में घूमते दिखाई दे जाते हैं।

प्रश्न 2.
पठित पाठ के आधार पर ‘त्रिलोचन’ की कविता के कलापक्ष पर अपना मन्तव्य दीजिए।
उत्तर:
पठित पाठ के आधार पर हम देखते हैं कि त्रिलोचन की कविता में भावपक्ष के साथ ही साथ कलापक्ष भी सुन्दर बन पड़ा है। कवि ने धीरे-धीरे, सीरी-सीरी, झीने-झीने, रिमझिम-रिमझिम, उजला-उजला, बार-बार, धीरे-धीरे आदि शब्दों का प्रयोग से काव्य में पुनरूक्तिप्रकाश अलंकार के द्वारा काव्य के सौन्दर्य को कई गुना बढ़ा दिया है। इसी प्रकार कवि ने जब-तब, तन-मन, काला-हल्का, सुनती हो-गुनती हो आदि में पद मैत्री का सुन्दर प्रयोग किया है। यह पवन आज ……….. छोटा देवर’ में उदाहरण अलंकार ‘जिनको नहलाते हैं बादल, जिनको बहलाती है बयार’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ। सम्पूर्ण कविता में अनुप्रास की छटा। भाषा कोमलकान्त पदावली है। कहीं-कहीं भाषा में लाक्षणिकता भी आ गयी है।

प्रश्न 3.
त्रिलोचन शास्त्री ने पवन के माध्यम से क्या संकेत किया है, भाव व्यंजना कीजिए।
उत्तर:
त्रिलोचन शास्त्री ने पवन के माध्यम से यह संकेत किया है कि यह पवन आज बार-बार तुम्हारे आँचल को वैसे ही खींच रहा है जैसे कोई देवर अपनी भाभी के आँचल को खींचता हो।

प्रश्न 4.
नई और पुरानी सभ्यता में कवि ने क्या अन्तर बतलाया है?
उत्तर:
नई और पुरानी सभ्यता में कवि ने यह अन्तर बताया है कि प्राचीन समय में तो हमारी कुटियों में बिना पूछे ही तूफान प्रवेश पा जाते थे, पर इस नई सभ्यता में तो सब कुछ बदल गया है। आज तो लोग हमारे घरों में बिना दरवाजा खटखटाए ही घुस आते हैं। शिष्टाचार, शालीनता का कहीं कोई पता नहीं है। इस परिवर्तन ने हमारी बुनियाद की चूलें ही हिला दी हैं।

प्रश्न 5.
‘खाली पेट’ कविता में निहित व्यंग्य को समझाइए।
उत्तर:
‘खाली पेट’ कविता में निहित व्यंग्य यह है कि नियति ने किसी को कष्ट देने के लिए भोजन की व्यवस्था न की हो, यह बात तो ठीक है पर खाली पेट के साथ उसको चलने-फिरने के लिए घुटने क्यों दिए? कहने का भाव यह है कि नियति ने जिसको खाली पेट रखा है उसे वह घुटने भी प्रदान न करे तो अच्छा है क्योंकि बिना घुटने के वह चल फिर नहीं सकेगा और न वह समाज को अपना खाली पेट दिखा सकेगा।

प्रश्न 6.
‘तृप्ति’ कविता के माध्यम से कवि ने किस विसंगति को उजागर किया है?
उत्तर:
‘तृप्ति’ कविता के माध्यम से कवि ने समाज की उस विसंगति को उजागर किया है जिसमें मेहनतकश तो दो जून की रोटी भी प्राप्त नहीं कर पाता है और उसकी मेहनत का फल बिचौलिए या मध्यस्थ ले जाते हैं। वह बेचारा श्रमिक या मजदूर भूखा का भूखा रह जाता है। लेकिन जब मजदूर से ये अत्याचार सहन नहीं होते हैं तो उसका गुस्सा लावा बनकर फूट पड़ता है और तब वह सूरज तक को निगल जाता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखितं काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) हाँ दिन भी अजीब रहा ………….. आए बादल।
उत्तर:
कविवर त्रिलोचन कहते हैं कि यह शरद ऋतु की नवमी तिथि का दिन है। ये रात कितनी मधुर है, यह कहते नहीं बनता। इन रातों में हमारे मन में शीतलता बस जाती है। यद्यपि अभी कोई जाड़ा नहीं आया है। हाँ, कभी-कभी थोड़े-थोड़े रोएँ काँप जाया करते हैं। ऐसे सुन्दर वातावरण को देखकर तन और मन में उत्साह भर आया। इस समय का दिन भी बड़ा विचित्र रहा। आज रिमझिम-रिमझिम करता हुआ पानी बरसा, इसके बाद आकाश खुल गया और चारों ओर धूप छा गयी। पूरे दिन इसी प्रकार का क्रम बना रहा। आकाश में भिन्न-भिन्न रंगों के बादल यथा-कपसीले, ऊदे, लाल, पीले, मटमैले झुण्ड के रूप में तैर रहे थे। फिर रात आ गयी लेकिन उस रात में पहले जैसा न तो काला, हल्का या गहरा या धुएँ जैसा रंग दिखाई देता था। फिर आकाश कुछ उजला-उजला सा दिखाई दिया। न मालूम इस रम्य वातावरण को किसके प्यासे नेत्र देख पायेंगे। चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती जा रही है।

(ख) यह पवन आज यों ………… जिधर वे हरे खेत।
उत्तर:
कविवर त्रिलोचन अपनी पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि क्या तुम कुछ सुन रही हो, या कुछ गुनगुना रही हो। यह हवा आज तुम्हारे आँचल को वैसे ही बार-बार खींच रही है जैसे तुम्हारा देवर जब कभी हठ करके तुमसे कोई बात कहना चाह रहा हो।

आगे कवि अपनी पत्नी से कहता है कि तुम उधर चलो जहाँ हरे खेत खड़े हुए हैं। फिर वह कहता है कि शायद तुम्हें यह बात याद है या नहीं, इन खेतों को हम दोनों ने एक साथ मिलकर जोता तथा बोया था। समय के अनुसार इन खेतों में बीज से नये अंकुर निकल आये और बड़े होते गये। इसके बाद हम दोनों ने उन्हें मिलकर सींचा था। आज हमारे परिश्रम के फलस्वरूप ही मनमोहन हरियाली चारों ओर फैल रही है। इस हरियाली से धरती माता का रूप सज गया है। खेत के इन परम सलौने पौधों को हम दोनों ने मिलकर ही बड़ा किया है। आज उन पौधों को बादल नहला रहे हैं और बयार (हवा) उनको बहला रही है। वे हरे खेत कैसे लग रहे हैं और इस समय उनकी दशा क्या होगी? वे इस समय सचेत होंगे या खोये हुए से होंगे।

(ग) कल हमारी कुटियों ………… चरमरा रही है।
उत्तर:
कवि श्री अभिमन्यु कहते हैं कि कल तक तो हमारी कुटियों में बिना पूछे ही तूफान चले आते थे, किन्तु नयी सभ्यता की चकाचौंध में आज हमारे मेहमान हमारे ही घरों में बिना दरवाजा खटखटाए घुसे चले आ रहे हैं। उनके इस बदले हुए व्यवहार से हमारे घर की दीवारें और छतें ही नहीं, अपितु उनसे तो हमारी बुनियाद ही चरमरा रही है।

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विविधा काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(अ) “इसलिए आक्रोश में आकर, मजदूर सूरज को निगल गया” में निहित अलंकार को पहचानकर उसके लक्षण लिखिए।
उत्तर:
इसमें रूपकातिशयोक्ति अलंकार है जिसका लक्षण इस प्रकार है-
रूपकातिशयोक्ति :
जहाँ उपमान द्वारा उपमेय का वर्णन किया जाये वहाँ रूपकातिशयोक्ति अलंकार होता है।

(ब) “माथे की श्रम बूंदों को खेत में पहुँचाकर बो दिया” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव है कि मजदूर ने परिश्रम करके खेत की जुताई, गुड़ाई की। उसने अपना पसीना बहाकर फसल के लिए खेत तैयार किये। खेत तैयार होने पर उसने श्रम के द्वारा बीज बो दिए ताकि अच्छी पैदावार हो सके।

प्रश्न 2.
“खाली पेट वालों को तुमने घुटने क्यों दिए? फैलाने वाले हाथ क्यों दिए?” इन पंक्तियों के प्रश्नों का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब व्यक्ति का पेट खाली होता है तो वह अपने घुटनों से पेट को दबा लेता है ताकि भूख का दबाव कम हो जाय या फिर अपनी भूख शान्त करने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाता है। ये दोनों ही स्थितियाँ हीनता की परिचायक हैं। इन प्रश्नों का भाव है कि घुटने और हाथ न होते तो खाली पेट व्यक्ति अपनी हीनता नहीं दर्शा पाता, भले वह भूख के कारण मर जाता।

प्रश्न 3.
भयानक रस को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
भयानक रस :
किसी भयंकर व्यक्ति, वस्तु के कारण जाग्रत भय स्थायी भाव विभावादि के संयोग से भयानक रस रूप में परिणत होता है। जैसे-
“एक ओर अजगर सिंह लखि,एक ओर मृगराय।
विकल वटोही बीच ही, पर्यो मूरछा खाय॥”

यहाँ आश्रय वटोही तथा आलम्बन अजगर और सिंह हैं। अजगर एवं सिंह की डरावनी चेष्टाएँ उद्दीपन हैं। बटोही (राहगीर) का मूच्छित होना अनुभाव तथा स्वेद, कम्पन, रोमांच आदि संचारी भाव हैं।

प्रश्न 4.
वीभत्स रस और भयानक रस में अन्तर बताइए।
उत्तर :
वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) होता है, जबकि भयानक रस का स्थायी भाव भय होता है। विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में भिन्नता होती है। स्पष्ट है कि वीभत्स में घृणा का भाव जाग्रत होता है परन्तु भयानक में भय उत्पन्न होता है।

प्रश्न 5.
अद्भुत रस की परिभाषा एवं उदाहरण, रस के विभिन्न अंगों सहित दीजिए।
उत्तर:
अद्भुत रस-किसी असाधारण या अलौकिक वस्तु के देखने में जाग्रत विस्मय स्थायी भाव विभावादि के संयोग से अद्भुत रस में परिणत होता है। जैसे-
“अखिल भुवनचर-अचरसब, हरिमुख मेंलखि मातु।
चकित भई गद्-गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु ॥”

यहाँ माँ यशोदा आश्रय तथा श्रीकृष्ण के मुख में विद्यमान सब लोक आलम्बन हैं। चर-अचर आदि उद्दीपन हैं। आँख फाड़ना, गद-गद स्वर, रोमांच अनुभाव तथा दैन्य, त्रास आदि संचारी भाव हैं।

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विविधा महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न विविधा

प्रश्न 1.
आसमान में किस तरह के बादल उड़ रहे थे?
(क) लाल
(ख) मटमैले
(ग) पीले
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 2.
त्रिलोचन कवि ने शरद ऋतु की किस तिथि का वर्णन किया है?
(क) द्वितीया
(ख) चतुर्थी
(ग) नवमी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) नवमी

प्रश्न 3.
बादलों के हटने पर तारे कैसे दिखलाई पड़ते हैं?
(क) नहीं दिखाई दे रहे हैं
(ख) उज्ज्वल झलमल
(ग) जगमगा रहे हैं
(घ) छिपते-छिपते।
उत्तर:
(ख) उज्ज्वल झलमल

प्रश्न 4.
‘बुनियाद चरमराने’ से कवि का क्या आशय है?
(क) छत टूटना
(ख) जमीन टूटना
(ग) जड़ से नष्ट होना
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(ग) जड़ से नष्ट होना

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है’ कविता के रचयिता ………….. हैं।
  2. यह पवन आज यों बार-बार खींचता तुम्हारा …………… है।
  3. इसीलिए आक्रोश में आकर मजदूर ……………. को निगल गया।
  4. उनसे हमारी दीवारें और छतें नहीं हमारी ………… चरमरा रही है।

उत्तर:

  1. त्रिलोचन शास्त्री
  2. आँचल
  3. सूरज
  4. बुनियाद।

सत्य/असत्य

  1. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती है’ कविता के रचयिता अप्रवासी भारतीय अभिमन्यु ‘अनन्त’ हैं।
  2. कवि त्रिलोचन ने हरी-भरी धरती को माता के सदृश सम्मान दिया है।
  3. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती है’ कविता ने कृषकों की दयनीय दशा का वर्णन किया है।
  4. कवि अभिमन्यु अनंत नियति से प्रश्न करते हैं। (2016)

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (घ)
3. → (क)
4. → (ख)

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एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती है’ कविता में कवि ने मानवीय व्यवहार का चित्रण किस माध्यम से किया है?
  2. ‘दिनभर ऐसा ही रहा तार कपसीले,ऊदे लाल और पीले मटमैले दल के दल’ पंक्ति का प्रयोग किसके लिये किया है?
  3. ‘कल हमारी कुटियों में बिन पूछे तूफान दाखिल हो जाते थे’ कविता का शीर्षक लिखिए।
  4. ‘तुमने खाली पेट दिया ठीक किया’ यह पंक्ति किसकी ओर संकेत करती है?
  5. आक्रोश में आकर मजदूरों ने क्या किया? (2014)

उत्तर:

  1. हवा
  2. बादलों के लिए
  3. नयी सभ्यता
  4. निर्धनता एवं भुखमरी
  5. सूरज को निगल लिया।

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है भाव सारांश 

‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है’ कविता में त्रिलोचन कवि ने गंगा नदी के किनारे चाँदनी रात का वर्णन किया है।

कवि का कथन है कि गंगा नदी के किनारे चाँदनी रात का वातावरण अत्यन्त सुन्दर दिखाई देता है। इस समय आकाश में काले-काले बादल काजल की भाँति इधर-उधर घूम रहे हैं। बादलों में छिपते और चमकते तारे शोभा को बढ़ा रहे हैं। चाँदनी रात्रि में गंगा की लहरें तरंगित होती हुई सुशोभित हो रही हैं।

शरद काल का समय है और नवमी तिथि की मनोहर रात है। शीतल ठंडी रात मन में रोमांच का अनुभव कराती है। शीत ऋतु यद्यपि अभी नहीं है,किन्तु शरदकालीन शीतलता से तन के रोंये कम्पन कर रहे हैं अर्थात् शरीर रोमांचित हो रहा है।

रात में आसमान स्वच्छ था लेकिन यकायक वर्षा होने लगी है। इसके बाद आकाश स्वच्छ हो गया और पुनः धूप खिल उठी। देखते-देखते बादल इकट्ठे हो गये हैं। कवि अपनी पत्नी से कहता है कि यह हवा बार-बार तुम्हारा आँचल इस प्रकार खींच रही है जैसे तुम्हारा देवर बचपन में आँचल खींचता और हठ करता था।

कवि पत्नी से कहता है कि खेतों की ओर चलो और देखो हम दोनों ने जो बीज बोये थे वे अब अंकुरित तथा बड़े होकर वायु वेग से लहलहा रहे हैं। वास्तव में खेतों की हरियाली के कारण गंगा तट का सौन्दर्य दुगना हो गया है।

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) चल रही हवा
धीरे-धीरे
सीरी-सीरी;
उड़ रहे गगन में
झीने-झीने
कजरारे
चंचल बादल!
छिपते-छिपते
जब-तब
तारे,
उज्ज्वल, झलमल
चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ :
सीरी-सीरी= ठण्डी-ठण्डी। गगन = आकाश। झीने-झीने = पतले-पतले। कजरारे = काले।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कविता ‘चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि श्री त्रिलोचन हैं।

प्रसंग :
इस कविता में कवि ने प्रकृति के मादक रूप का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कवि त्रिलोचन कहते हैं कि ठण्डी-ठण्डी हवा धीरे-धीरे बह रही है और आकाश में झीने-झीने तथा काले एवं चंचल बादल उमड़ रहे हैं। इसी समय आकाश में उज्ज्वल एवं झिलमिलाते हुए जब कभी तारे भी छिपते-छिपते दिखाई दे जाते हैं। चाँदनी चमक रही है और गंगा की धारा बहती जा रही है।

विशेष :

  1. प्रकृति की सुन्दरता का चाँदनी रात में कवि ने वर्णन किया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास अलंकार।

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(2) ऋतु शरद और
नवमी तिथि है
है कितनी, कितनी मधुर रात
मन में बस जाती शीतलता है
अभी नहीं जाड़ा कोई
बस जरा-जरा रोएँ काँपे
तन-मन में भर आया उछाह
हाँ, दिन भी आज अजीब रहा
रिमझिम रिमझिम पानी बरसा
फिर खुला गगन
हो गयी धूप
दिन भर ऐसा ही रहा तार
कपसीले, ऊदे, लाल और
पहले, मटमैले-दल के दल
आये बादल
अब रात
न उतना रंग रहा
काला-हलका या गहरा
या धुएँ-सा
कुछ उजला-उजला
किसके अतृप्त दृग देखेंगे
चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ :
उछाह = उत्साह। तार = क्रम। दल के दल = झुण्ड के झुण्ड। अतृप्त = प्यार से। दृग = नेत्र।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर त्रिलोचन कहते हैं कि यह शरद ऋतु की नवमी तिथि का दिन है। ये रात कितनी मधुर है, यह कहते नहीं बनता। इन रातों में हमारे मन में शीतलता बस जाती है। यद्यपि अभी कोई जाड़ा नहीं आया है। हाँ, कभी-कभी थोड़े-थोड़े रोएँ काँप जाया करते हैं। ऐसे सुन्दर वातावरण को देखकर तन और मन में उत्साह भर आया। इस समय का दिन भी बड़ा विचित्र रहा। आज रिमझिम-रिमझिम करता हुआ पानी बरसा, इसके बाद आकाश खुल गया और चारों ओर धूप छा गयी। पूरे दिन इसी प्रकार का क्रम बना रहा। आकाश में भिन्न-भिन्न रंगों के बादल यथा-कपसीले, ऊदे, लाल, पीले, मटमैले झुण्ड के रूप में तैर रहे थे। फिर रात आ गयी लेकिन उस रात में पहले जैसा न तो काला, हल्का या गहरा या धुएँ जैसा रंग दिखाई देता था। फिर आकाश कुछ उजला-उजला सा दिखाई दिया। न मालूम इस रम्य वातावरण को किसके प्यासे नेत्र देख पायेंगे। चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती जा रही है।

विशेष :

  1. शरद ऋतु का कवि ने मनोरम वर्णन किया है।
  2. पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास की छटा।

(3) कुछ सुनती हो
कुछ गुनती हो
यह पवन, आज यों बार-बार
खींचता तुम्हारा आँचल है
जैसे जब तब छोटा देवर
तुमसे हठ करता है जैसे
तुम चलो जिधर वे हरे खेत
वे हरे खेत
हैं याद तुम्हें?
मैंने जोता तुमने बोया
धीरे-धीरे अंकुर आये
फिर और बढ़े
हमने तुमने मिलकर सींचा
फैली मनमोहन हरियाली
धरती माता का रूप सजा
उन परम सलौने पौधों को
हम दोनों ने मिल बड़ा किया
जिनको नहलाते हैं बादल
जिनको बहलाती है बयार
वे हरे खेत कैसे होंगे
कैसा होगा इस समय ढंग
होंगे सचेत या सोये से
वे हरे खेत
चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ :
मनमोहन = मन को मोहने वाली। ढंग = रूप, स्थिति। सचेत = जागते हुए से।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर त्रिलोचन अपनी पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि क्या तुम कुछ सुन रही हो, या कुछ गुनगुना रही हो। यह हवा आज तुम्हारे आँचल को वैसे ही बार-बार खींच रही है जैसे तुम्हारा देवर जब कभी हठ करके तुमसे कोई बात कहना चाह रहा हो।

आगे कवि अपनी पत्नी से कहता है कि तुम उधर चलो जहाँ हरे खेत खड़े हुए हैं। फिर वह कहता है कि शायद तुम्हें यह बात याद है या नहीं, इन खेतों को हम दोनों ने एक साथ मिलकर जोता तथा बोया था। समय के अनुसार इन खेतों में बीज से नये अंकुर निकल आये और बड़े होते गये। इसके बाद हम दोनों ने उन्हें मिलकर सींचा था। आज हमारे परिश्रम के फलस्वरूप ही मनमोहन हरियाली चारों ओर फैल रही है। इस हरियाली से धरती माता का रूप सज गया है। खेत के इन परम सलौने पौधों को हम दोनों ने मिलकर ही बड़ा किया है। आज उन पौधों को बादल नहला रहे हैं और बयार (हवा) उनको बहला रही है। वे हरे खेत कैसे लग रहे हैं और इस समय उनकी दशा क्या होगी? वे इस समय सचेत होंगे या खोये हुए से होंगे। चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती जा रही है।

विशेष :

  1. ‘जैसे जब तब …………. छोटा देवर’-में उदाहरण अलंकार।
  2. अन्यत्र उपमा और अनुप्रास की छटा।

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भाव सारांश कुछ कविताएँ

नयी सभ्यता-अभिमन्यु ‘अनन्त’ अप्रवासी भारतीय हैं। उन्हें भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम है। वे अपनी सभ्यता की बुनियाद को चरमराते हुए देखकर अत्यन्त व्यथित होते हैं।

उनका कथन है कि आज पाश्चात्य सभ्यता अनजाने अतिथि की भाँति बिना दरवाजा खटखटाये हमारे घरों में प्रवेश कर रही है। इसके परिणामस्वरूप हम अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से पृथक् होते जा रहे हैं।

तृप्ति इन पंक्तियों में कवि ने मजदूरों की दयनीय दशा का वर्णन किया है। शोषणवादी नीति के विरुद्ध अपना आक्रोश व्यक्त किया है।

मजदूर दिन-रात खून-पसीना बहाकर खेतों में लहलहाती फसल उगाते हैं लेकिन फसल तैयार होने पर उससे प्राप्त धन से पूँजीपति अपनी तिजोरी से भर लेते हैं। इसी कारण मजदूर ने सूरज को निगलने अथवा विद्रोह करने का झंडा गाढ़ दिया।

‘खाली पेट’ – कवि ने नियति से प्रश्न किया है कि तुम्हें खाली पेट क्यों दिया? यदि पेट दिया तो उसमें टेकने के लिए घुटने भी दिये हैं जिसकी सहायता से श्रमिक अपनी क्षुधा को शान्त करने का कोरा प्रयास करता है। हाथ भी व्यर्थ ही दिये क्योंकि वे दूसरों के समक्ष हाथ फैलाकर याचना करते हैं।

कुछ कविताएँ संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) नयी सभ्यता
कल हमारी कुटियों में बिन पूछे
तूफान दाखिल हो जाते थे
आज हमारे घरों में बिन दरवाजे खटखटाये
जो चले आ रहे हैं।
उनसे हमारी दीवारें और छतें नहीं
हमारी बुनियाद चरमरा रही है।

शब्दार्थ :
दाखिल = प्रवेश। बुनियाद = नींव, मूल।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कविता ‘कुछ कविताएँ’ शीर्षक के अन्तर्गत ‘नयी सभ्यता’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि अभिमन्यु अनन्त हैं।

प्रसंग :
इस कविता में कवि ने नयी सभ्यता के रूपक को प्रस्तुत किया है।

व्याख्या :
कवि श्री अभिमन्यु कहते हैं कि कल तक तो हमारी कुटियों में बिना पूछे ही तूफान चले आते थे, किन्तु नयी सभ्यता की चकाचौंध में आज हमारे मेहमान हमारे ही घरों में बिना दरवाजा खटखटाए घुसे चले आ रहे हैं। उनके इस बदले हुए व्यवहार से हमारे घर की दीवारें और छतें ही नहीं, अपितु उनसे तो हमारी बुनियाद ही चरमरा रही है।

विशेष :

  1. कवि ने नयी सभ्यता पर व्यंग्य कसा है।
  2. अनुप्रास की छटा।
  3. भाषा लाक्षणिक।

(2) तृप्ति
माथे की श्रम बूंदों को
खेत में पहुँचाकर मजदूर ने बो दिया।
लहलहाती फसल जब तैयार हुई
उन हरे-भरे दानों को किसी और ने
तिजोरी के लिए बटोर लिया
इसीलिए आक्रोश में आकर
मजदूर सूरज को निगल गया।

शब्दार्थ :
आक्रोश = क्रोध में।

सन्दर्भ :
यह कतिवा ‘तृप्ति’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि ‘अभिमन्यु अनन्त’ हैं।

प्रसंग :
इस कविता में बिचौलियों (व्यापारियों) पर सटीक व्यंग्य किया गया है।

व्याख्या :
कवि श्री अभिमन्यु अनन्त कहते हैं कि मजदूर ने अपने खून-पसीने को एक करके खेतों में बीज को बो दिया। कुछ अन्तराल के बाद जब खेत में लहलहाती फसल पक कर तैयार हुई तो मध्यस्थ व्यापारियों या बिचौलिओं ने उस सम्पूर्ण फसल को इकट्ठा करके अपने कब्जे में ले लिया और उसे बाजार में बेचकर अपनी तिजोरियों को भर लिया। बिचौलियों के इस व्यवहार से दु:खी होकर किसान क्रोधित हो उठा और उसने सूरज को निगल लिया। कहने का भाव यह है कि जब किसी व्यक्ति को उसका वाजिब हक (उचित अधिकार) नहीं मिलता है तब वह विद्रोह कर उठता है और उस विद्रोह के फलस्वरूप वह होनी-अनहोनी सभी कर डालता है।

विशेष :

  1. मध्यस्थों एवं बिचौलियों पर व्यंग्य।
  2. मजदूर किसान की बेवसी का वर्णन।
  3. भाषा लाक्षणिक शैली में।

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(3) खाली पेट
तुमने आदमी को खाली पेट दिया
ठीक किया।
पर एक प्रश्न है रे नियति!
खाली पेट वालों को
तुमने घुटने क्यों दिए?
फैलने वाला हाथ क्यों दिया?

शब्दार्थ :
नियति = प्रकृति, भाग्य।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत कविता ‘खाली पेट’ शीर्षक से ली गयी है। इसके कवि अभिमन्यु अनन्त हैं।

प्रसंग :
कवि ने भूखे लोगों की नियति का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कविवर श्री अभिमन्यु अनन्त कहते हैं कि हे भाग्य! तेरी लीला बड़ी विचित्र है। तुमने आदमी को खाली पेट दिया यह तो ठीक है पर प्रश्न यह है कि खाली पेट वालों को तुमने चलने के लिए घुटने क्यों दिये, साथ ही इन्हें भीख माँगने के लिए फैलाने वाले हाथ क्यों दिये।

विशेष :

  1. कवि ने नियति (भाग्य) पर व्यंग्य किया है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

जीवन दर्शन अभ्यास

बोध प्रश्न

जीवन दर्शन अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
कवि नाश पथ पर कौन-से चिह्न छोड़ जाना चाहता है?
उत्तर:
कवि नाश पथ पर अपने पग चिह्न छोड़ जाना चाहता

प्रश्न 2.
मधुप की मधुर गुनगुन विश्व पर क्या प्रभाव डालेगी?
उत्तर:
मधुप की मधुर गुनगुन सम्पूर्ण संसार के क्रन्दन को भुला देगी।

प्रश्न 3.
तितलियों के रंग से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तितलियों के रंग से कवि का तात्पर्य सांसारिक सुख-भोग एवं सुविधाओं से है।

प्रश्न 4.
कवि के अनुसार काँटे की मर्यादा क्या है?
उत्तर:
कवि के अनुसार काँटे की मर्यादा है उसका कठोर होना तथा तीखा होना।

प्रश्न 5.
कवि ने ‘मर्दे होंगे’ किसे कहा है?
उत्तर:
कवि ने ‘मुर्दे होंगे’ उन प्रेमियों के लिए कहा है जिन्होंने प्रेम के नाम पर सम्मोहन करने वाली मदिरा पी रखी है।

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जीवन दर्शन लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि की आँखें उनींदी क्यों हैं?
उत्तर:
कवि की आँखें उनींदी इसलिए हैं कि आज हमको समाज में अनुकूल वातावरण नहीं मिल रहा है।

प्रश्न 2.
‘मोम के बन्धन सजीले’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
‘मोम के बन्धन सजीले’ से कवि का आशय सांसारिक आकर्षणों से है।

प्रश्न 3.
‘चिर सजग’ का क्या आशय है?
उत्तर:
‘चिर सजग’ का आशय है कि हमें हमेशा सचेत रहना चाहिए और सांसारिक बाधाओं से संघर्ष करते रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
कवि ने अन्तिम रहस्य के रूप में क्या पहचान लिया?
उत्तर:
कवि ने अन्तिम रहस्य के रूप में यह जान लिया कि यह संसार एक यज्ञशाला है और इसमें व्यक्ति को स्वाहा होना है।

प्रश्न 5.
कुचला जाकर भी कवि किस रूप में उभरता
उत्तर:
कुचला जाकर भी कवि आँधी की धूल बनकर उमड़ना चाहता है।

प्रश्न 6.
‘निर्मम रण में पग-पग पर रुकना’ किस प्रकार प्रतिफलित होता है?
उत्तर:
निर्मम रण में पग-पग पर रुकना वार बनकर प्रतिफलित होता है।

जीवन दर्शन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जाग तुझको दूर जाना’ में क्या आशय छिपा है? लिखिए।
उत्तर:
‘जाग तुझको दूर जाना’ में यह आशय छिपा है कि मनुष्य का जीवन एक निश्चित अवधि का होता है, जबकि जीवन क्षेत्र में उसे अनगिनत कार्य करने पड़ते हैं। अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उसे अनेकानेक विघ्न-बाधाओं से टकराना होता है।

प्रश्न 2.
‘पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले’ में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य जब अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए चलता है तो सांसारिक भौतिक आकर्षण तथा सुख-सुविधाएँ उसे विचलित करने की चेष्टा करती हैं। मनुष्य जब तक इनसे सचेत नहीं रहेगा, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकेगा।

प्रश्न 3.
‘तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना’ द्वारा कवि क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
छाँह चाहने के लिए अर्थात् जीवन में सुख-सुविधाएँ जुटाने के लिए व्यक्ति उचित एवं अनुचित सभी प्रकार के कार्य करता रहता है। कभी-कभी मनुष्य के स्वयं किये गये कारनामे ही उसे कारागार की हवा खिला देते हैं। अतः कवि जीवन के अनुचित कार्यों से बचने की सलाह देता है।

प्रश्न 4.
‘मैंने आहुति बनकर देखा’ कविता का मूल भाव लिखिए।
उत्तर:
‘मैंने आहुति बनकर देखा’ कविता का मूलभाव यह है कि यद्यपि जीवन मरणशील है; इसमें जय और पराजय दोनों हैं। इसमें गति को रोकने वाली अनेक विघ्न-बाधाएँ भी हैं किन्तु इन्हीं सबके चलते हुए हमें जीवन को निरन्तर आगे चलाते रहना चाहिए। संसार एक यज्ञ वेदिका जैसा है इसमें सब कुछ होम करके ही जीवन को श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। तप करके ही जीवन में ललकार देने की शक्ति आती है। कवि ने इसमें त्याग और तपस्या का महत्व बताया है।

प्रश्न 5.
प्रस्तुत कविताओं से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर:
प्रस्तुत कविताओं से हमें यह सीख मिलती है कि मानव का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। यह संसार नाशवान् है पर महान् मनुष्य वे होते हैं जो आने वाली पीढ़ी के लिए अपने चरण चिह्न छोड़ जाया करते हैं। अपनी पहचान बनाने के लिए हमें भौतिक सुख-सुविधाओं को त्यागना होगा। संसार एक यज्ञ की वेदी के समान है। इसमें जो सब कुछ स्वाहा कर देता है, उसी का जीवन सार्थक बन जाता है। त्याग और तपस्या से मानव का संसार में महत्व आँका जाता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या लिखिए
(क) मैं कब कहता हूँ …………. ओछा फूल बने?
उत्तर:
कविवर अज्ञेय जी संसार के मनुष्यों से कहते हैं कि मैं संसार के लोगों से कब कहता हूँ कि वे मेरे समान संघर्षों का सामना करने वाली शक्ति को धारण करें। मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि संसार के मनुष्य अपने रेगिस्तान जैसे शुष्क जीविन को देवताओं के सुन्दर उपवन के समान हरा-भरा या सुख-सुविधाओं में सम्पन्न बना लें। काँटा देखने में कठोर और तीखा अवश्य लगता है, पर उसकी भी इस सृष्टि में अपनी मर्यादा है। मैं उससे भी यह नहीं कहता कि वह अपने इस कठोर रूप को कम करके किसी भाग का एक ओछा फूल बन जाये। कहने का भाव यह है कि सबका अपना-अपना भाग्य होता है। अतः सभी को अपनी सामर्थ्य के अनुसार जीवन में काम करना चाहिए।

(ख) विश्व का क्रन्दन …………… तुझको दूर जाना।
उत्तर:
कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे मानव! क्या ये मोम के गीले बन्धन तझे अपने जाल में बाँध लेंगे? क्या रंग-बिरंगी तितलियों के पंख तुम्हारे मार्ग की रुकावट बनेंगे? क्या भौरों की मधुर गुनगुनाहट संसार के दुःखों को भुला देंगी या ओस से गीले फूल की पंखुड़ियाँ तुझे डूबो देंगी? तू व्यर्थ में ही अपनी ही परछाईं को अपना जेलखाना बना रहा है। इन निराशा की भावनाओं को छोड़! तेरा जो लक्ष्य है, उसे पाने के लिए तू सतत् प्रयत्न कर तुझे अभी बहुत दूर तक जाना है।

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जीवन दर्शन काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
हास्यरसकी परिभाषा किसी अन्य उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर:
हास्य रस-विचित्र वेश-भूषा, विकृत आकार, चेष्टा आदि के कारण जाग्रत हास स्थायी भाव विभावादि से पुष्ट होकर हास्य रस में परिणत होता है। जैसे-

“हँसि हँसि भजे देखि दूलह दिगम्बर को,
पाहुनी जे आवै हिमाचल के उछाह में।
कहै पद्माकर सु काहु सों कहै को कहा,
जोई जहाँ देखे सो हँसोई तहाँ राह में।
मगन भएई हँसे नगन महेश ठाढ़े,
और हँसे वेऊ हँसि-हँसि के उमाह में।
सीस पर गंगा हँसे भुजनि भुजंगा हँसे,
हास ही को दंगा भयो नंगा के विवाह में ॥”

यहाँ दर्शक आश्रय हैं तथा शिवजी आलम्बन हैं। उनकी विचित्र आकृति, नग्न स्वरूप आदि उद्दीपन हैं। लोगों का हँसना, भागना आदि अनुभाव तथा हर्ष, उत्सुकता, चपलता आदि संचारी भाव हैं।

जीवन दर्शन महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

जीवन दर्शन बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि की आँखें उन्नींदी क्यों हैं?
(क) शीघ्र जगने के कारण
(ख) नींद पूरी न होने से
(ग) आलस्य के कारण
(घ) बिना किसी कारण।
उत्तर:
(ग) आलस्य के कारण

प्रश्न 2.
‘जाग तुझको दूर जाना अचल के हृदय में चाहे कम्प हो ले’ ‘अचल’ शब्द का प्रयोग किसके लिये है?
(क) हिमालय
(ख) गंगा
(ग) आकाश
(घ) आँखों।
उत्तर:
(क) हिमालय

प्रश्न 3.
कवयित्री ने ‘मोम के बन्धन’ किसको कहा है?
(क) माया-मोह
(ख) विषय-वासनादि
(ग) साधना मार्ग की बाधाएँ
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
‘मैने आहुति बनकर देखा है’ कविता के रचयिता हैं
(क) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ख) रामनरेश त्रिपाठी
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) नरेश मेहता।
उत्तर:
(क) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. महादेवी वर्मा के काव्य में वेदना की प्रचुरता थी। इसी कारण उन्हें आधुनिक ………. कहा जाता है।
  2. महादेवी वर्मा साधना मार्ग में ………… नहीं आने देना चाहती थीं।
  3. बाँध लेंगे क्या तुझे मोम के ……….. सजीले।
  4. “धूल पैरों से कुचली जाती है किन्तु वह कुचलने वाले के सिर पर सवार हो जाती है।” उसी प्रकार मैंने ……….. से हार नहीं मानी है।

उत्तर:

  1. मीरा
  2. आलस्य
  3. बन्धन
  4. बाधाओं।

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सत्य/असत्य

  1. महादेवी वर्मा छायावादी युग की प्रमुख कवयित्री हैं। इन्होंने छायावाद के अन्तर्गत जीवन के दोनों पक्षों का वर्णन किया है।
  2. महादेवी वर्मा का वैवाहिक जीवन सुखमय था। इसी कारण उन्होंने विरह गीत लिखे हैं।
  3. “हरी घास पर क्षण भर” कविता महादेवी वर्मा की है?
  4. हिन्दी साहित्य में अज्ञेय की ख्याति केवल भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (घ)
3. → (क)
4. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. महादेवी वर्मा ने कबीर की भाँति अपने काव्य में वर्णन किया है।
  2. ‘तु न अपनी छाँह को अपने लिए काटा बनाना’ यह पंक्ति किस रचनाकार की है। (2011)
  3. अज्ञेय की रचनाएँ नई पीढ़ी के लेखकों के लिए हैं।
  4. अज्ञेय ने अपनी कविता द्वारा स्पष्ट किया है कि जीवन मरणशील है। इसमें पराजय भी है और आगे बढ़ने में हैं।
  5. काँटे की मर्यादा क्या है? (2016)

उत्तर:

  1. रहस्यवाद का
  2. महादेवी वर्मा
  3. मानक स्वरूप
  4. अनेक व्यवधान
  5. काँटे की मर्यादा उसके कठोर एवं तीखे होने में है।

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चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! भाव सारांश

‘चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना’ नामक कविता में महादेवी वर्मा ने अपने मन को साधना मार्ग का राहगीर समझकर उसे जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया है।

कवयित्री कहती हैं हे मन! तू आलस्य को त्याग, क्योंकि ये जीवन पथ बहुत लम्बा है और तुझे यह दूरी तय करनी है। चाहे हिमालय पर्वत अपने स्थान से हिल जाये अथवा आसमान में प्रलय के बादल छा जाये। चाहे तेज आँधी और तूफान आयें या घनघोर वर्षा हो। बिजली भी चाहे कड़के, तुम्हें आगे बढ़ते ही जाना है।

कवयित्री का कथन है कि मेरे मन तुम वज्र के सदृश कठोर थे लेकिन आँसुओं ने उन्हें गीला करके गला दिया। सांसारिक माया-मोह में डूबकर तुमने अपने जीवन के मूल्यवान क्षणों को खो दिया है।

कवयित्री कहती है कि हे प्राण! तुम आलस्य और प्रमाद को त्यागकर अपने मन में उत्साह उत्पन्न करो जिससे कि तुम्हें विषय-वासनाओं से मुक्ति मिलेगी और तुम्हारी साधना का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। अत: हे मानव! आलस्य को त्याग दे। यही तेरे लिये उचित और उत्तम है।

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!
अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले,
आज पी आलोक को डोले तिमित की घोर छाया,
जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले
पर तुझे है नाश-पथ पर चिन्ह अपने छोड़ जाना!
जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ :
चिर = पुराना। सजग = जाग्रत। उनींदी = अलसाई हुई। व्यस्त = काम में लगा हुआ। बाना = व्यवहार। अचल = पर्वत। हिमगिरि = बर्फ से ढंकी हुई पहाड़ियाँ। कम्प = कम्पन, थरथराहट। अलसित = आलस्य से भरा हुआ। व्योम = आकाश। आलोक = प्रकाश। तिमिर = अन्धकार। विद्युत = बिजली। निठुर = निष्ठुर, कड़े स्वभाव वाला।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द “चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!” शीर्षक कविता से लिया गया है। इसकी रचयिता श्रीमती महादेवी वर्मा हैं।

प्रसंग :
कवयित्री मानव को सचेत करते हुए कह रही हैं कि हे संसार के पथिक! तेरी सदैव सजग रहने वाली आँखें आज अलसाई हुई सी क्यों हो रही हैं, तुझे तो अभी बहुत दूर तक जाना है।

व्याख्या :
कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे संसार के पथिक! तू तो सदैव सजग रहकर इस मार्ग पर चलता रहता था पर आज तेरी ये सजग आँखें उनींदी सी क्यों हो रही हैं, तूने ये कैसा बाना (ढर्रा) बना लिया है। तुझे तो अभी बहुत दूर तक जाना है।

चाहे हिमालय पर्वत की ऊँची चोटियों में आज कम्पन पैदा हो जाये या फिर प्रलय के आँसुओं को लेकर ऊलसाया हुआ आकाश। रुदन करने लग जाये, या फिर अन्धकार की घोर छाया प्रकाश को। पीकर डोल जाये, या फिर बिजली की जाग्रत शिखाओं में निष्ठुर तूफान हुँकार भरने लग जाये लेकिन तेरा लक्ष्य तो यह है कि इस नाश के पथ पर तू अपने चरणों के चिह्नों को छोड़ दे। कहने का भाव यह है कि चाहे कैसी भी विषम परिस्थितियाँ क्यों न हों, तुझे तो अपने निर्धारित लक्ष्य पर निरन्तर बढ़ते चले जाना है ताकि नाश। की अवस्था आने पर भी तेरे चरणों के चिह्न आने वाले समय में लोगों का मार्गदर्शन कर सकें। जाग जा, तुझे तो अभी बहुत दूर जाना है, इन विषम परिस्थितियों से अपने लक्ष्य को मत भूल जाना।

विशेष :

  1. कवयित्री विषम परिस्थितियों में भी संसार के पथिक को अपने मार्ग पर निरन्तर चलते रहने की प्रेरणा दे रही हैं।
  2. लाक्षणिक भाषा।

(2) बाँधे लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?
विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ :
सजीले = गीले। पंथ = रास्ते की। रँगीले = रंग-बिरंगे। क्रन्दन= रोना-धोना। मधुप = भौंरों की। मधुर = मीठी। कारा = जेलखाना।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे मानव! क्या ये मोम के गीले बन्धन तझे अपने जाल में बाँध लेंगे? क्या रंग-बिरंगी तितलियों के पंख तुम्हारे मार्ग की रुकावट बनेंगे? क्या भौरों की मधुर गुनगुनाहट संसार के दुःखों को भुला देंगी या ओस से गीले फूल की पंखुड़ियाँ तुझे डूबो देंगी? तू व्यर्थ में ही अपनी ही परछाईं को अपना जेलखाना बना रहा है। इन निराशा की भावनाओं को छोड़! तेरा जो लक्ष्य है, उसे पाने के लिए तू सतत् प्रयत्न कर तुझे अभी बहुत दूर तक जाना है।

विशेष :

  1. कवयित्री सांसारिक प्राणियों से कल्पना लोक में न विचर कर जीवन की यथार्थता का ज्ञान कराना चाहती हैं। साथ ही उसे जीवन पथ पर निन्तर बढ़ते रहने की प्रेरणा देती हैं।
  2. लाक्षणिक भाषा।

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मैंने आहुति बनकर देखा भाव सारांश 

‘मैंने आहुति बनकर देखा’ कविता के द्वारा ‘अज्ञेय’ कवि ने कर्म करते हुए स्वयं को बलिदान करने की इच्छा को सर्वोत्तम बताया है। त्याग द्वारा ही व्यक्ति को आत्मिक सुख प्राप्त होता है। कवि का कथन है कि वह संसार की प्रत्येक वस्तु को उसके वास्तविक रूप में देखने का इच्छुक है। वह यह कदापि नहीं चाहता कि वृद्धावस्था की तुलना युवावस्था से की जाये। अतः उसकी तुलना शक्तिशाली व्यक्ति से नहीं करनी चाहिए।

जीवन में यदि दःखों का सागर उमडे तो मानव में उसे भी सहन करने की शक्ति होनी चाहिए। कवि कहता है कि मैं नन्दन वन के फूलों की चाहत की भाँति धनवानों के धन की चाहत में अपनी इच्छा और सुखों को गँवा देने का इच्छुक हूँ। काँटों की शोभा काँटा बना रहने में है, फूल बनने में नहीं।

योद्धा की शोभा युद्धभूमि में प्राप्त हुए घावों से ही होती है। यह आवश्यक नहीं कि यदि मैं किसी से प्रेम करूँ तो वह व्यक्ति भी मुझसे प्रेम करे। मैं तो स्वार्थ रहित प्रेम की इच्छा रखता हूँ और चाहता हूँ कि आस्था और विश्वास महल बनाकर कर्तव्य पथ पर बढ़ता रहूँ।

प्रेम में त्याग आवश्यक है। जो लोग प्रेम में कटुता का अनुभव करते हैं, उन्हें स्वयं को रोगी मान लेना चाहिए। जो व्यक्ति प्रेम को सम्मोहन वाली मदिरा मानते हैं उन्हें यह मान लेना चाहिए कि उनमें जीवन ही नहीं है, जिन्होंने प्रेम के रहस्य को जान लिया है।

कवि का कथन है कि मैंने प्रेम को आहुति बनकर देख लिया है। प्रेम यज्ञ की अग्नि है। जिस प्रकार अग्नि में आहुति डाली जाती है और वह सामग्री जल जाती है उसी प्रकार मैंने भी अपने आप को आहुति बनाकर जल जाने की बात सोच ली है। व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए विषम आँधी और तूफानों का सामना करना पड़ता है परन्तु मानव को सफलता पाने के लिए निरन्तर बढ़ते रहना चाहिए। जीवन एक रणक्षेत्र है जहाँ पर अनेक बाधाएँ आती हैं। ईश्वर ने जो जीवन दिया है उसे हम ईश्वर के लिए समर्पित कर दें। तब ही जीवन सफल और सार्थक होगा।

मैंने आहुति बनकर देखा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँजीवन-मरुनन्दन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ, वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?

शब्दार्थ :
जग = संसार। दुर्धर = कठिनाइयों को पार करने में समर्थ। अनुकूल = उसी के अनुरूप। जीवन-मरु = जीवन रूपी रेगिस्तान। नन्दन-कानन = देवताओं का उपवन। प्रांतर = छोटे से प्रदेश का। ओछा = छोटा, पद में नीचा।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके कवि अज्ञेय हैं।

प्रसंग :
कवि का सन्देश है कि मैं किसी भी व्यक्ति को अपने पथ पर चलने को बाध्य नहीं करता हूँ, लेकिन सबको अपनी मर्यादा का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय जी संसार के मनुष्यों से कहते हैं कि मैं संसार के लोगों से कब कहता हूँ कि वे मेरे समान संघर्षों का सामना करने वाली शक्ति को धारण करें। मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि संसार के मनुष्य अपने रेगिस्तान जैसे शुष्क जीविन को देवताओं के सुन्दर उपवन के समान हरा-भरा या सुख-सुविधाओं में सम्पन्न बना लें। काँटा देखने में कठोर और तीखा अवश्य लगता है, पर उसकी भी इस सृष्टि में अपनी मर्यादा है। मैं उससे भी यह नहीं कहता कि वह अपने इस कठोर रूप को कम करके किसी भाग का एक ओछा फूल बन जाये। कहने का भाव यह है कि सबका अपना-अपना भाग्य होता है। अतः सभी को अपनी सामर्थ्य के अनुसार जीवन में काम करना चाहिए।

विशेष :

  1. कवि संसार के मनुष्यों को निरन्तर कर्म करने की प्रेरणा दे रहा है।
  2. लाक्षणिक भाषा।

(2) मैं कब कहता हूँ, मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?
मैंकबकहताहूँ, प्यार करुतो मुझे प्राप्तिकीओटमिले?
मैं कब कहता हूँ विजय करूँ-मेरा ऊँचा प्रासाद बने?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली सी याद बने?

शब्दार्थ :
प्रासाद = महल। धुंधली सी = अस्पष्ट सी।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय जी कहते हैं कि मैं यह कब कहता हूँ कि युद्ध क्षेत्र में जाने पर मुझे कोई चोट न लगे; मैं कब कहता हूँ कि यदि मैं किसी से प्यार करूँ तो मुझे उसका प्रतिफल भी मिले; मैं कब कहता हूँ कि युद्ध क्षेत्र में मुझे विजय प्राप्त हो और मेरा एक भव्य महल निर्मित हो। या फिर संसार रूपी रंगमंच पर अभिनय करने वाले पात्र के रूप में मेरी धुंधली-सी याद मनुष्यों के मानस-पटल पर अंकित हो जाये।

विशेष :

  1. कवि संसार में निरन्तर कार्य में लगे रहने की प्रेरणा दे रहा है।
  2. भाषा लाक्षणिक है।

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(3) पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे, क्यों इसकी हो परवाह मुझे?
मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने।

शब्दार्थ :
प्रशस्त = चौड़ा। विकल = बेचैन। नेतृत्व = नेतागीरी। प्रस्तुत = तैयार। गति-रोधक = चाल को रोकने वाला। शूल = काँटा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मेरे मन में इस प्रकार चाह या इच्छा क्यों उत्पन्न हो कि मार्ग सदैव चौड़ा एवं निर्विघ्न हो। मुझे इस बात की भी परवाह नहीं करनी चाहिए कि कहीं मेरी नेतागीरी तो खत्म नहीं हो रही है। मैं इसके लिए तैयार हूँ कि मेरे मरने के पश्चात् मेरे शरीर की मिट्टी इसी भूमि की धूल में मिल जाये; फिर चाहे उसी धूल का एक-एक कण मेरे रास्ते को रोकने वाले काँटे ही क्यों न बन जायें।

विशेष :

  1. कवि को अपनी सामर्थ्य पर विश्वास है। अतः वह हर विषम स्थिति को स्वीकार करने को तैयार है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

(4) अपने जीवन को रस देकर जिसको यत्नों से पाला है
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसूकी माला है?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है।

शब्दार्थ :
यत्नों = प्रयत्नों से। अवसाद मलिन = दुःख से सना हुआ। कटु = कड़वा। सम्मोहनकारी = वश में करने वाली। हाला = मदिरा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मैंने अपने जीवन को रस देकर तथा यत्नपूर्वक पाला-पोसा है; क्या ऐसा मेरा जीवन केवल दुःख से सने हुए आँसुओं की माला भर है? जिन प्रेमियों ने अनुभव रस के कड़वे प्याले को पिया है, वे रोगी होंगे अर्थात् स्वस्थ नहीं होंगे और जिन प्रेमियों ने मोह पाश में डालने वाली मदिरा का पान कर लिया है वे मुर्दे होंगे, जीवन्त मनुष्य नहीं होंगे।

विशेष :

  1. कवि मनुष्यों को सतत् जागरूक बने रहने का सन्देश दे रहा है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

(5) मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।
मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, नभ की चोटी चढ़ता हूँ,
कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी और उमड़ता हूँ।

शब्दार्थ :
विदग्ध = जानकार होते हुए भी। आहुति = यज्ञ में दी जाने वाली समिधा। नभ = आकाश। धूली-सा = धूल जैसा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मैंने जानकार बनकर यह भली-भाँति जान लिया है और जीवन के अन्तिम रहस्य को पहचान लिया है। मैंने आहुति बनकर देख लिया है कि यह प्रेम एक यज्ञ की ज्वाला.के समान है। मैं इस बात को डंके की चोट पर कहता हूँ कि मैं निरन्तर आगे बढ़ता जाता हूँ और नभ की चोटी पर चढ़ता जाता हूँ। यद्यपि विषम परिस्थितियों में धूल जैसा कुचला जाता हूँ, लेकिन उस अवस्था में भी मैं आँधी बनकर उमड़ता रहता हूँ।

विशेष :

  1. कवि हर स्थिति में अपनी पहचान बनाये रखता है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

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(6) मेरा जीवन ललकार बने, असफलता की असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने।
भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तपकर अंगार बने।
तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने।

शब्दार्थ :
ललकार = चुनौती। असि-धार = तलवार की धार। निर्मम = निर्दयी, क्रूर। वार = प्रहार। भव = संसार। दुर्निवार = जिसका निवारण करना कठिन हो। नीरव = शान्त।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कविवर अज्ञेय कहते हैं कि मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन दूसरों के लिए एक चुनौती बने तथा मेरी असफलताएँ तलवार की धार के समान तेज बन जाएँ। मेरे जीवन के इस निर्दयी रण-क्षेत्र में कदम-कदम पर रुकना ही मेरा प्रहार बन जाये। मैं तेरे लिए सारे संसार को स्वाहा कर सकता हूँ और इस यज्ञ में सभी कुछ तपकर अंगार बन जायें। तुम्हारी पुकार जैसा तथा कठिनता से निवारण किया जाने वाला मेरा यह प्यार नीरव बन जाये।

विशेष :

  1. कवि अपने को बलिदान कर देना चाहता है।
  2. भाषा लाक्षणिक।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अभ्यास

बोध प्रश्न

सामाजिक समरसता अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
लोहा किसकी श्वांस से भस्म हो जाता है?
उत्तर:
लोहा मरे हुए जानवर की खाल से बनी हुई मसक की श्वांस (हवा) से भस्म हो जाता है।

प्रश्न 2.
भक्ति किस प्रकार के प्राणियों से नहीं हो सकती?
उत्तर:
कामी, क्रोधी और लालची प्रकृति के प्राणियों से भक्ति नहीं हो सकती।

प्रश्न 3.
गुण लाख रुपये में कब बिकता है?
उत्तर:
गुण लाख रुपये में तब बिकता है जब उसे गुण का ग्राहक मिल जाता है।

प्रश्न 4.
संसार में विद्यमान सचर-अचर प्राणी क्या कर रहे हैं?
उत्तर:
संसार में विद्यमान जितने भी सचर या अचर प्राणी हैं, वे सभी अपने-अपने कर्मों में लगे हुए हैं।

प्रश्न 5.
दयामयी माता के तुल्य किसे माना गया है?
उत्तर:
दयामयी माता के तुल्य पृथ्वी को माना गया है।

प्रश्न 6.
जीवन को सफल बनाने के लिए कवि क्या निर्देश देते हैं?
उत्तर:
जीवन को सफल बनाने के लिए कवि ने मनुष्यों को अपने-अपने उद्देश्य में लगे रहने का निर्देश दिया है।

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सामाजिक समरसता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर ईश्वर से क्या माँगते हैं?
उत्तर:
कबीर ईश्वर से यह माँगते हैं कि हे भगवान तुम कृपा करके मुझे इतना दे देना जिससे मैं अपने परिवार को पाल लूँ, मैं खुद भी भूखा न रहूँ और कोई साधु भी मेरे घर से खाली हाथ न जाये।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार किस प्रकार के वृक्ष के नीचे विश्राम करना चाहिए?
उत्तर:
कवि के अनुसार उस वृक्ष के नीचे विश्राम करना चाहिए जिसमें बारह महीने फल लगते हों, जिसमें शीतल छाया हो और घने फल हों तथा जिस पर पक्षी गण क्रीड़ा करते हों।

प्रश्न 3.
साधु से किस प्रकार के प्रश्न नहीं करने चाहिए?
उत्तर:
साधु से उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए, उससे तो केवल ज्ञान की बातें पूछनी चाहिए।

प्रश्न 4.
‘लोक कल्याण कामना’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
लोक कल्याण कामना से कवि का आशय है कि हमें संसार में रहकर ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे अधिक-से-अधिक लोगों का कल्याण हो। स्वार्थ के लिए हमें कार्य नहीं करने चाहिए।

प्रश्न 5.
कवि जग की विषम आँधियों के सम्मुख किस प्रकार के स्वभाव की अपेक्षा कर रहा है?
उत्तर:
कवि जग की विषम आँधियों के सम्मुख हिम्मत से डटे रहने के स्वभाव की अपेक्षा कर रहा है।

प्रश्न 6.
कर्मच्युत होने से क्या परिणाम होगा?
उत्तर:
कर्मच्युत होने से यह परिणाम निकलेगा कि तुम धोखे में पड़कर इस अलभ्य (अनमोल) अवसर से हाथ धो बैठोगे।

सामाजिक समरसता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुर्बल को सताने का क्या दुष्परिणाम होता है?
उत्तर:
दुर्बल व्यक्ति को सताने का यह परिणाम होता है कि उसकी मोटी आहों से कोई बच नहीं पायेगा।

प्रश्न 2.
अवगुण का निवास कहाँ है?
उत्तर:
अवगुण का निवास मनुष्यों के हृदय में होता है।

प्रश्न 3.
किन विशेषताओं को खोकर भक्ति की जा सकती है?
उत्तर:
जाति एवं वर्ण जैसी विशेषताओं को खोकर ही भक्ति की जा सकती है।

प्रश्न 4.
मनुष्य किन-किन शक्तियों से सम्पन्न है? संसार में जीने का उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य अमित बुद्धि एवं बल से युक्त है, अतः उसका संसार में जीने का भी निश्चित उद्देश्य है; और वह है जीवन में प्रतिक्षण अपने उद्देश्य को पाने के लिए कर्म में जुटे रहना।

प्रश्न 5.
‘जीवन सन्देश’ कविता का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
‘जीवन सन्देश’ कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य एक कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति है, किन्तु कभी-कभी वह कर्तव्य से विमुख होकर भी काम करने लगता है और जीवन के उच्च उद्देश्यों से भटक जाता है। इस प्रकार के कार्यों से वह समाज की कोई भलाई नहीं कर सकता। अपने समाज और अपनी जन्म-भूमि के प्रति भी मनुष्य में कर्त्तव्य भावना होनी चाहिए, तभी उसकी जीवन यात्रा सार्थक है।

प्रश्न 6.
संसार मनुष्य के लिए एक परीक्षा स्थल है, ऐसा कवि ने क्यों कहा है ?
उत्तर:
संसार में अनेकानेक विषम परिस्थितियाँ और विपदाएँ आती रहती हैं, इसलिए कवि ने संसार को एक परीक्षा स्थल कहा है। इन विषम परिस्थितियों और आपदाओं से मनुष्य को घबड़ाना नहीं चाहिए बल्कि उनका डटकर सामना करना। चाहिए तथा अपने उद्देश्य को पाने के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहना चाहिए।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) ऊँचै कुल का ………. निंद्या सोई॥
उत्तर:
कबीरदास जी कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने भर से कोई व्यक्ति ऊँचा नहीं हो जाता। यदि उसके कार्य ऊँचे नहीं हैं, तो वह कभी ऊँचा नहीं हो सकता है। ऊँचे अर्थात् श्रेष्ठ कार्य करने वाला व्यक्ति ही.ऊँचा होता है। वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यदि सोने के कलश में मदिरा भरी हुई है, तो साधु लोग उस कलश की प्रशंसा न करके निन्दा ही करेंगे।

(ख) जब गुण ………… बदलै जाइ॥
उत्तर:
कबीरदास जी कहते हैं कि जब गुण के ग्राहक मिल जाते हैं तो गुण लाख रुपये में बिकता है और यदि गुण के ग्राहक न मिलें तो वह गुण कौड़ियों में बिक जाता है।

(ग) तुम मनुष्य हो ………….. निज जीवन में?
उत्तर:
कविवर त्रिपाठी जी कहते हैं कि तुम मनुष्य हो और तुम्हारा जन्म इस संसार में अत्यधिक बुद्धि एवं बल से युक्त है। ऐसी दशा में क्या तुमने अपने मन में कभी इस बात पर विचार किया है कि तुम्हारा जीवन क्या उद्देश्य रहित है? अर्थात् नहीं। कवि पुनः कहता है कि हे मनुष्यो! तुम बुरा मत मानना। तुम अपने मन में एक बार सोचो तो कि क्या तुमने अपने जीवन के सभी कर्त्तव्य पूरे कर लिये हैं अर्थात् अभी नहीं किये हैं।

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सामाजिक समरसता काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
करुण रस को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
करुण रस-किसी प्रिय वस्तु अथवा व्यक्ति की अनिष्ट की आशंका या विनाश से हृदय में उत्पन्न क्षोभ या दुःख को करुण रस कहते हैं। इसका स्थायी भाव शोक’ है।

उदाहरण :
अभी तो मुकुट बँधा था माथ हुए कल ही हल्दी के हाथ।
खुले भी न थे लाज के बोल, खिले भी चुंबन शून्य कपोल। हाय रुक गया यहीं संसार,बना सिन्दूर अंगार।
बातहत लतिका वह सुकुमार पड़ी है छिन्न धार।
स्पष्टीकरण स्थायी भाव-शोक।
विभाव :
(क) आलम्बन विनष्ट पति।
(ख) आश्रय-पत्नी।
(ग) उद्दीपन-मुकुट का बाँधना, हल्दी के हाथ होना,लाज के बोल न खलना।
अनुभाव :
वातहत लतिका के समान नायिका का बेहाल पड़े रहना। संचारी भाव-जड़ता,स्मृति, दैन्य और विषाद आदि।

प्रश्न 2.
गीतिका छन्द को अन्य उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
गीतिका छन्द में 26 मात्रा, 14-12 पर यति तथा प्रत्येक चरण के अन्त में ‘लघु-गुरु’ (15) होता है।

उदाहरण :
हे प्रभो! आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए।
शीघ्र सारे दुर्गुणों कों दूर हमसे कीजिए।
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक, वीर व्रत धारी बनें।।

प्रश्न 3.
हरिगीतिका छन्द के लक्षण देते हुए एक अन्य उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
हरिगीतिका सममात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 16 एवं 12 पर यति के साथ कुल 28 मात्राएँ होती हैं। चरण के अन्त में लघु-गुरु होता है।

उदाहरण :
‘गाते प्रियाओं के सहित रस राग यक्ष जहाँ तहाँ। प्रत्यक्ष दो उत्तर दिशा की दीखती लक्ष्मी यहाँ। कहते हुए यों पार्श्व में सहसा उदासी छा गई। उत्तर दिशा से याद सहसा उत्तरा की आ गई।’

सामाजिक समरसता महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सामाजिक समरसता बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोहा किसकी श्वांस से भस्म हो जाता है?
(क) कोयले की
(ख) सोने की
(ग) लकड़ी की
(घ) मरी हुई खाल की।
उत्तर:
(ग) लकड़ी की

प्रश्न 2.
दयामयी माता के तुल्य किसे माना गया है?
(क) माँ
(ख) भारत की धरती को
(ग) भारत
(घ) प्रान्त को।
उत्तर:
(ख) भारत की धरती को

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार किस प्रकार के वृक्ष के नीचे विश्राम करना चाहिए?
(क) छायादार
(ख) घना
(ग) फलयुक्त
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
सज्जन व्यक्ति से क्या पूछना चाहिए? (2009)
(क) जाति
(ख) नाम
(ग) ज्ञान
(घ) काम।
उत्तर:
(ग) ज्ञान

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. जाति न पूछो साधु की पूछि लीजिए ………..
  2. कबीर ने बाह्य आडम्बरों तथा ………… का व मूर्तिपूजा का विरोध किया।
  3. ऊँचे कुल में जन्म लिया हो पर करनी ऊँची न हो, ऐसा व्यक्ति ……….. स्वर्ण कलश के समान है।
  4. लोक कल्याण की कामना ही सच्ची ……….. है।

उत्तर:

  1. ज्ञान
  2. अन्ध विश्वास
  3. मदिरा से भरे
  4. लोक सेवा।

सत्य/असत्य

  1. कबीर की भाषा को खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है।
  2. कबीर ने बाहरी आडम्बरों का समर्थन किया। (2009)
  3. ‘सबसे अधिक अवगुण औरों में ही होते हैं’ कबीर का यह कथन है।
  4. रामनरेश त्रिपाठी स्वच्छन्दतावादी काव्यधारा के प्रतिष्ठित कवि हैं। इन्होंने स्वच्छन्दतावादी परम्परा को बढ़ाया।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता img-1
उत्तर:
1. → (घ)
2. → (ग)
3. → (क)
4. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. कबीर सच्चे अर्थों में कवि होते हुए भी क्या थे?
  2. साधु से क्या नहीं पूछना चाहिए? (2012)
  3. कवि ने जीवन सन्देश में अपने कर्म में कैसी तत्परता बतायी है?
  4. अटल निश्चय व भय रहित संसार में कौन है?
  5. जीवन संदेश कविता का मूल स्वर क्या है? (2012)
  6. गुण कब लाख रुपये में बिकता है? (2018)

उत्तर:

  1. समाज सुधारक
  2. जाति
  3. तुच्छ पत्र जैसी
  4. ध्रुव जैसा
  5. कर्म में रत रहना
  6. जब गुणों को समझने वाला ग्राहक मिलता है।

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कबीर की साखियाँ भाव सारांश

कबीर ने अपनी साखियों में जीवन से सम्बन्धित अनेक उपयोगी सीखें दी हैं। मानव को भगवान से उतनी ही याचना करनी चाहिए जितनी आवश्यकता हो। दुर्बल को सताना अपने लिए काँटे बोना है। साधु की जाति नहीं पूछनी चाहिए अपितु उसके गुणों पर दृष्टिपात करना चाहिए। भक्ति के मार्ग में काम,क्रोध तथा लोभ बाधक हैं, अत: इनका त्याज्य अनिवार्य है। उच्च कुल में जन्म लेने वाले मानव का आचरण भी पवित्र होना आवश्यक है। फलदायी वृक्ष का आश्रय सुखद होता है। गुणी मानव हीं गुणों की परख कर सकता है। हीरा की परख जौहरी ही जानता है। भगवान गुणों के अक्षय कोष हैं, अवगुण तो हमारे मन-मानस में पल्लवित हैं। कबीर की साखियों में उच्चादर्शों से सम्बन्धित उत्कृष्ट काव्य सृष्टि है।

कबीर की साखियाँ संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

साईं इतना दीजिए, जामैं कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥ (1)

शब्दार्थ :
साईं = स्वामी, भगवान। कुटुम = कुटुम्ब। समाय = भरण-पोषण हो जाए। साधु = अतिथि।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचित ‘कबीर की साखियाँ’ शीर्षक से ली गयी है।

प्रसंग :
इसमें कवि ने भगवान से प्रार्थना की है कि हे भगवान! हमें इतना दे दो कि हमारा भली-भाँति गुजारा हो जाए।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि हे भगवान! आप हमें इतना भर दे दें जिसमें हमारे कुटुम्ब का भली-भाँति भरण-पोषण हो जाए। मैं भी भूखा न रहूँ और मेरे घर पर जो भी साधु-संन्यासी आएँ, वे भी खाली हाथ न लौटें।

विशेष :

  1. कवि ने मात्र कुटुम्ब भरण तक की सुविधा ही भगवान से माँगी है।
  2. दोहा छन्द।

दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
मरी चाम की स्वांस से, लौह भसम है जाय॥ (2)

शब्दार्थ :
दुर्बल = कमजोर व्यक्ति। चाम = चमड़े।

सदर्भ :
पूर्ववत।

प्रसंग :
कबीर ने दुर्बल व्यक्ति को न सताने का उपदेश दिया है।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि दुर्बल व्यक्तियों को मत सताओ। इनकी आहे बड़ी मोटी अर्थात् भारी होती हैं। एक उदाहरण देकर वे कहते हैं कि जब मरे हुए चमड़े से बनाई गई मसक की श्वांस से लोहा भी भस्म हो जाता है तो जीवित व्यक्ति की आहों से कितना अहित हो जायेगा, इसे अच्छी तरह सोच लो और दुर्बलों को मत सताओ।

विशेष :

  1. कवि ने दुर्बलों को न सताने का उपदेश दिया।
  2. दोहा छन्द।

जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥ (3)

शब्दार्थ :
मोल = मोल-भाव।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कबीरदास जी साधु संन्यासी की जाति न पूछने और ज्ञान जानने की बात कहते हैं।

व्याख्या :
कबीरदास जी संसारी मनुष्यों से कहते हैं कि हे मनुष्यो! तुम कभी भी किसी साधु-संन्यासी की जाति के बारे में मत पूछो। यदि तुम्हें पूछना ही है तो उससे उसके ज्ञान के बारे में जानकारी लो। एक उदाहरण देकर कबीर बताते हैं कि मोल-भाव तो तलवार का किया जाता है, म्यान को कौन पूछता है।

विशेष :

  1. गुणों को जानना चाहिए, जाति को नहीं।
  2. दोहा छन्द।

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जाति हमारी आतमा, प्रान हमारा नाम।
अलख हमारा इष्ट है, गगन हमारा ग्राम॥ (4)

शब्दार्थ :
अलख = अदृश्य। इष्ट = भगवान। गगन = आकाश।

सन्दर्भ ;
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस साखी में कबीरदास जी अपना परिचय देते हुए कह रहे हैं।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि हमारी आत्मा ही हमारी जाति है, हमारा नाम ही हमारे प्राण हैं। अदृश्य अर्थात् न दिखाई देने वाला निर्गुण निराकार ईश्वर ही हमारा इष्ट है और आकाश हमारा ग्राम है।
विशेष :

  1. कवि ने अपनी व्यापकता का परिचय दिया है।
  2. दोहा छन्द है।

कामी क्रोधी लालची, इन पै भक्ति न होय।
भक्ति करै कोई शूरमाँ, जाति वरण कुल खोय॥ (5)

शब्दार्थ :
कामी = काम वासना में रत रहने वाला। जाति = जाति, कुल। वर्ण = वर्ण व्यवस्था। खोय = खोकर।

सन्दर्भ-:
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस छन्द में कबीरदास जी ने बताया है कि कामी-क्रोधी व्यक्तियों से ईश्वर की भक्ति नहीं हो सकती है।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि कामी, क्रोधी और लालची स्वभाव के व्यक्तियों से भगवान की भक्ति नहीं हो सकती है जो व्यक्ति जाति एवं वर्ण भूल जाता है, वही शूरमाँ होता है और वही भगवान की भक्ति कर सकता है।

विशेष :

  1. विषय-वासनाओं से मुक्त होकर ही भक्ति की जा सकती है।
  2. दोहा छन्द।

ऊँचै कुल का जनमियाँ, जे करणी ऊँच न होइ।।
सोवन कलस सुरै भऱ्या, साधू निंद्या सोई॥ (6)

शब्दार्थ :
जनमियाँ = जन्म लेने वाला। करणी = कार्य। सोवन = सोने के। सुरै = मदिरा। भऱ्या = भरी हुई है। निंद्या = निंदा करता है। सोइ = उसकी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कबीरदास जी कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने से कोई व्यक्ति ऊँचा नहीं होता है।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने भर से कोई व्यक्ति ऊँचा नहीं हो जाता। यदि उसके कार्य ऊँचे नहीं हैं, तो वह कभी ऊँचा नहीं हो सकता है। ऊँचे अर्थात् श्रेष्ठ कार्य करने वाला व्यक्ति ही.ऊँचा होता है। वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यदि सोने के कलश में मदिरा भरी हुई है, तो साधु लोग उस कलश की प्रशंसा न करके निन्दा ही करेंगे।

विशेष :

  1. व्यक्ति अच्छे कामों से ऊँचा होता है, ऊँचे कुल में जन्म लेने से नहीं।
  2. दोहा छन्द।

तरवर तास बिलंबिए, बारह मास फलंत।
सीतल छाया गहर फल, पंधी केलि करत॥ (7)

शब्दार्थ :
तरवर = श्रेष्ठ वृक्ष। तास = उसी का। बिलंबिए = सहारा लीजिए। फलंत = फलता है। गहर = घने। पंषी = पक्षी। केलि = क्रीड़ाएँ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कबीरदास जी ने ऐसे व्यक्ति का आश्रय लेने का उपदेश दिया है, जिससे हर व्यक्ति सुखी हो।

व्याख्या :
कबीरदास जी तरुवर के माध्यम से उस श्रेष्ठ व्यक्ति का आश्रयं ग्रहण करने का उपदेश देते हैं कि उसी श्रेष्ठ वृक्ष का आश्रय लेना चाहिए जो बारह महीने फल देता हो, जिसकी छाया शीतल हो, जिसमें घने फल लगते हों और जिस पर बैठकर पक्षीगण अपनी क्रीड़ाएँ करते हों।

विशेष :

  1. सज्जन लोगों का आश्रय लेने की बात कही है।
  2. दोहा छन्द।

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जब गुण कँगाहक मिलै, तब गुण लाख बिकाइ।
जब गुण कौं गाहक नहीं, कौड़ी बदले जाइ॥ (8)

शब्दार्थ :
गाहक = ग्रहण करने वाला, जानकार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि गुणों का महत्त्व तभी तक है जब तक उसके ग्राहक मिलते हैं।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि जब गुण के ग्राहक मिल जाते हैं तो गुण लाख रुपये में बिकता है और यदि गुण के ग्राहक न मिलें तो वह गुण कौड़ियों में बिक जाता है।

विशेष :

  1. गुण के ग्राहक का महत्व है।
  2. दोहा छन्द।

सरपहि दूध पिलाइये, दूधैं विष है जाइ।
ऐसा कोई नां मिलै, सौं सरपैं विष खाइ॥ (9)

शब्दार्थ :
सरपहि = साँप को। लै जाइ = हो जायेगा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि सर्प को दूध पिलाने से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि वह दूध भी विष बन जायेगा।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि सर्प को दूध पिलाने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि सर्प के गले में जाकर दूध भी विष बन जायेगा। कबीर कहते हैं कि मुझे आज तक ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला, जो सर्प के विष को खा जाये।

विशेष :

  1. साँप से आशय दुष्ट लोग हैं।
  2. दोहा छन्द।

करता करे बहुत गुण, आगुण कोई नांहि।
जे दिल खोजौं आपणौं, तो सब औगुण मुझ माहि॥ (10)

शब्दार्थ :
करता = कर्ता, सृष्टि का निर्माणकर्ता। केरे = तेरे। आगुण = अवगुण। आपणौ = अपना। मांहि = अन्दर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कर्ता (भगवान) में गुण ही गुण होते हैं, अवगुण नहीं।

व्याख्या :
कबीरदास जी कहते हैं कि कर्ता अर्थात् भगवान में केवल गुण ही गुण हैं, उनमें कोई भी अवगुण नहीं है। कबीर दास जी कहते हैं कि जब मैंने अपना दिल खोजा तो मैंने पाया कि सभी अवगुण मेरे अन्दर हैं।

विशेष :

  1. ईश्वर (कर्ता) की महत्ता का वर्णन तथा अपने अवगुणों का वर्णन कवि ने किया है।
  2. दोहा छन्द।

जीवन संदेश भाव सारांश

प्रस्तुत कविता ‘जीवन संदेश’ में श्री रामनरेश त्रिपाठी ने मानव को कर्म में रत रहने का संदेश दिया है। संसार में जड़,चेतन सभी पदार्थ अपने-अपने कर्म में लगे रहते हैं। सूर्य संसार में नवीन शोभा विकीर्ण करता है। चन्द्रमा रात्रि में अमृत की वर्षा करता है।

तुच्छ तिनका भी कर्म में रत रहकर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है। कवि मनुष्य को सचेत करता हुआ कहता है कि तुम मनुष्य हो, तुम्हारे पास बुद्धि,बल है। तुम्हें भी सोद्देश्य जीवन बिताना चाहिए।

मातृभूमि के प्रति भी अपने कर्तव्य का दृढ़ता से पालन करना चाहिए। जीवन में लोक कल्याण व लोक सेवा आवश्यक है। संसार में मानव को विषम परिस्थितियों का दृढ़ता से सामना करना चाहए, चाहे कितनी ही विषम आँधियाँ आयें। व्यक्ति को चन्द्रमा सा शान्त व ध्रुव तारे की भाँति अचल भावना रखनी चाहिए।

यह संसार ईश्वर के द्वारा निर्मित है। उसी के द्वारा समस्त सृष्टि का संचालन होता है। अतः कवि का कथन है कि जिस भूमि पर तुमने जन्म लिया है उसके प्रति अपने कर्तव्य का पालन अन्तिम श्वांस तक करना चाहिए। यही मानव का परम धर्म है।

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जीवन संदेश संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) जग में सचर अचर जितने हैं सारे कर्म निरत हैं।
धुन है एक न एक सभी को सबके निश्चित व्रत हैं।
जीवनभर आतप सह वसुधा पर छाया करता है।
तुच्छ पत्र की भी स्वकर्म में कैसी तत्परता है।

शब्दार्थ :
सचर = चलने-फिरने वाले प्राणी। अचर = न चलने-फिरने वाली जड़ वस्तुएँ। कर्म निरत हैं अपने-अपने आप में लगे हुए हैं। व्रत = उद्देश्य, निश्चय। आतप = धूप। वसुधा = पृथ्वी। पत्र = पत्ता। स्वकर्म= अपने काम में। तत्परता = लगन।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द ‘जीवन सन्देश’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके रचयिता श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं।

प्रसंग :
कवि ने यहाँ बताने का प्रयास किया है कि संसार में जड़ एवं चेतन सभी अपने-अपने काम में लगे हुए हैं।

व्याख्या :
श्री रामनरेश त्रिपाठी कहते हैं कि इस संसार। में जितने भी जड़ और चेतन हैं, वे सभी अपने-अपने कामों में लगे हुए हैं। सभी को कोई-न-कोई धुन होती है और उनका कोई-न-कोई व्रत (उद्देश्य) होता है। कवि पत्ते का उदाहरण देते हुए कहता है कि वह तुच्छ पत्ता जीवन भर धूप को सहता हुआ पृथ्वी पर छाया करता रहता है। देखिए उस तुच्छ पत्ते की भी अपने काम में कितनी तत्परता है।

विशेष :

  1. कवि का मानना है कि जड़ और चेतन सभी अपने कामों में लगे हुए हैं।
  2. अनुप्रास की छटा।

(2) रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता।
सब हैं लगे कर्म में कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता॥
हैं उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का।
उसी पूर्ति में वह करता है अन्त कर्ममय तन का॥

शब्दार्थ :
रवि = सूर्य। सोम = चन्द्रमा। सुधा = अमृत। निष्क्रिय = बिना काम के। नितान्त = पूरी तरह से। तुच्छ = छोटे। तृण = घास। कर्ममय = काम में लगते हुए।

सन्दर्भ-:
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि सूर्य, चन्द्रमा आदि सभी अपने-अपने कर्म में लगे हुए हैं।

व्याख्या :
कविवर त्रिपाठी जी कहते हैं कि सूर्य संसार में शोभा का विस्तार करता है तो चन्द्रमा पृथ्वी पर अमृत बरसाता है। इस संसार में सभी जड़, चेतन अपने-अपने कामों में लगे हुए हैं। कोई भी व्यक्ति हमें बिना काम के नजर नहीं आता है। तुच्छ तिनके के लघु जीवन का भी उद्देश्य है और उसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह अपने शरीर का अन्त कर देता है।

विशेष :

  1. सभी संसार में कार्यरत हैं, बिना काम के कोई नहीं है।
  2. अनुप्रास की छटा।

(3) तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धिबल-विलसित जन्म तुम्हारा।
क्या उद्देश्य रहित है जग में तुमने कभी विचारा?
बुरा न मानो, एक बार सोचो तुम अपने मन में।
क्या कर्त्तव्य समाप्त कर लिए तुमने निज जीवन में॥

शब्दार्थ :
अमित = अत्यधिक। बुद्धि-बल विलसित = बुद्धि और बल से सुशोभित।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि मनुष्यों को सचेत करते हुए कहता है कि तुम्हें भी अपने जीवन को काम करते हुए सार्थक बनाना है।

व्याख्या :
कविवर त्रिपाठी जी कहते हैं कि तुम मनुष्य हो और तुम्हारा जन्म इस संसार में अत्यधिक बुद्धि एवं बल से युक्त है। ऐसी दशा में क्या तुमने अपने मन में कभी इस बात पर विचार किया है कि तुम्हारा जीवन क्या उद्देश्य रहित है? अर्थात् नहीं।

कवि पुनः कहता है कि हे मनुष्यो ! तुम बुरा मत मानना। तुम अपने मन में एक बार सोचो तो कि क्या तुमने अपने जीवन के सभी कर्त्तव्य पूरे कर लिये हैं अर्थात् अभी नहीं किये हैं।

विशेष :

  1. कवि मनुष्य का कर्म क्षेत्र में निरन्तर लगे रहने की प्रेरणा देता है।
  2. अनुप्रास की छटा।

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(4) वह सनेह की मूर्ति दयामयि माता-तुल्य मही है।
उसके प्रति कर्त्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है।
हाथ पकड़कर प्रथम जिन्होंने चलना तुम्हें सिखाया।
भाषा सिखा हृदय का अद्भुत रूप स्वरूप दिखाया।

शब्दार्थ :
सनेह = स्नेह, प्रेम। दयामयि = दया करने वाली। मही = पृथ्वी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि तुमने जन्म तो ले लिया पर जन्म देने वालों के प्रति तुम्हारे जो कर्त्तव्य हैं, उन्हें पूरा करो।

व्याख्या :
कविवर त्रिपाठी कहते हैं कि वह प्रेम की मूर्ति। और दयामयी पृथ्वी माता के समान है। क्या उसके प्रति तुम्हारा। कोई कर्त्तव्य नहीं है? अर्थात् निश्चय ही उसके प्रति हमारा कर्तव्य है? हाथ पकड़कर जिन्होंने सर्वप्रथम तुम्हें पृथ्वी पर चलना सिखाया है, बाद में भाषा का ज्ञान देकर हृदय के अद्भुत रूप। एवं स्वरूप को दिखाया है; क्या उनके प्रति तुम्हारा कर्त्तव्य नहीं? हाँ अवश्य है।

विशेष :

  1. कवि का सन्देश है कि जिन्होंने हमारे साथ कुछ भी उपकार किया है, उनके प्रति हमें कर्त्तव्य पूरा करना चाहिए।
  2. अनुप्रास की छटा।

(5) जिनकी कठिन कमाई का फल खाकर बड़े हुए हो।
दीर्घ देह की बाधाओं में निर्भय खड़े हुए हो॥
जिनके पैदा किए, बुने वस्त्रों से देह ढके हो।
आतप-वर्षा-शीत-काल में पीडित हो न सके हो॥

शब्दार्थ :
बाधाओं = रुकावटों। निर्भय = निडर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि पृथ्वी ने तुम्हें जो विभिन्न उपहार। प्रदान किये हैं उनके प्रति तुम्हें पूर्ण रूप से समर्पित होना चाहिए।

व्याख्या :
कविवर त्रिपाठी कहते हैं कि जिन माता-पिता की कमाई खाकर तुम बड़े हुए हो और अनेकानेक शारीरिक कष्टों से तुम्हें उबार कर जिन्होंने निर्भय बनाकर तुम्हें खड़ा कर दिया है। जिनके पैदा किए हुए तथा बुने हुए वस्त्रों से तुम अपना शरीर ढके हुए हो तथा जिनकी कृपा से धूप, वर्षा, शीत आदि की मुसीबतों से बचे रहे हो, क्या उनके प्रति तुम्हारा कोई कर्त्तव्य नहीं है? भाव यह है कि उनके प्रति तुम्हारा पूर्ण समर्पण होना चाहिए।

विशेष :

  1. कवि ने मनुष्यों को अपने कर्तव्य के प्रति सचेत करना चाहा है।
  2. अनुप्रास की छटा।

(6) क्या उनका उपकार-भार तुम पर लवलेश नहीं है।
उनके प्रति कर्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है।
सतत् ज्वलित दुःख दावानल में जग केदारुण रन में।
छोड़ उन्हें कायर बनकर तुम भाग बसे निर्जन में।

शब्दार्थ :
उपकार = कृपा। लवलेश = जरा भी। सतत् = निरन्तर। ज्वलित = जलते हुए। दावानल = जंगल की आग। दारुण = भयंकर। निर्जन = एकान्त।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि उन लोगों को फटकार लगाता है, जो संसारिक मुसीबतों से घबड़ाकर जंगल में चले जाते हैं।

व्याख्या :
कविवर त्रिपाठी कहते हैं कि क्या जिन लोगों ने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोस कर बड़ा किया, उनके प्रति तुम्हारा कोई कर्त्तव्य नहीं है। निरन्तर जलते हुए दुःख के दावानल में तथा संसार के भयानक रण-क्षेत्र में उन सबको छोड़कर और कायर बनकर तुम निर्जन स्थान में भाग कर बस गए हो, क्या यह तुम्हें उचित लगता है? अर्थात् बिल्कुल नहीं।

विशेष :

  1. कवि ने कृतघ्न लोगों को फटकारा है।
  2. अनुप्रास की छटा।

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(7) यही लोक-कल्याण-कामना यही लोक-सेवा है।
यही अमर करने वाले यश-सुरतरु की मेवा है।
जाओ पुत्र! जगत् में जाओ, व्यर्थ न समय गँवाओ।
सदालोक-कल्याण-निरतहोजीवनसफलबनाओ।

शब्दार्थ :
यश-सुरतरु = शयरूपी कल्प वृक्ष। निरत = लगे रहो।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि मनुष्यों को व्यर्थ में ही समय न गँवाकर लोक कल्याण में लग जाने का उपदेश देता है।

व्याख्या :
श्री त्रिपाठी जी कहते हैं कि लोक कल्याण की भावना से जो व्यक्ति लोक सेवा करता है, इससे भी अमर होता है तथा इसी से उसे यशरूपी कल्पतरु से मिलने वाली मेवा प्राप्त होती है। इसलिए हे मानवी पुत्रो! तुम व्यर्थ में अपना समय मत गँवाओं और सदैव लोक कल्याण में रत रहकर अपने जीवन को सफल बनाओ।

विशेष :

  1. कवि ने मनुष्यों को लोक कल्याणकारी कार्यों में लगे रहने का महत्व बताया है।
  2. अनुप्रास की छटा।

(8) जनता के विश्वास कर्म मन ध्यान श्रवण भाषण में।
वास करो, आदर्श बनो, विजयी हो जीवन-रण में।
अति अशांत दुखपूर्ण विश्रृंखल क्रान्ति उपासक जग में।
रखना अपनी आत्म शक्ति पर दृढ़निश्चय प्रति पग में।

शब्दार्थ :
वास करो = निवास करो। जीवन-रण = जीवन रूपी रण में। विशृंखल = बिखरे हुए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का संदेश है कि अपने कर्मों, मन में, ध्यान में, श्रवण में और भाषण में सदैव ऐसी बातें रखना जिससे तुम। जनता के हृदय में वास कर सको, उनके आदर्श बन सको। इस प्रकार के क्रिया-कलाप करते हुए तुम जीवन रूपी रण में सदैव विजयी होगे। आज संसार का वातावरण अति अशान्त, दुःखपूर्ण बिखरा हुआ, क्रान्ति की उपासना करने वाला बना हुआ है। इन परिस्थितियों में भी तुम अपनी आत्म शक्ति पर प्रत्येक पग में दृढ़ निश्चय रखना अर्थात् कभी विचलित मत। हो जाना।

विशेष :

  1. कवि ने जनता के कल्याण में रत रहने का उपदेश दिया है।
  2. रूपक एवं अनुप्रास की छटा।

(9) जग की विषम आँधियों के झोंके सम्मुख हो सहना।
स्थिर उद्देश्य-समान और विश्वास सदृश दृढ़ रहना।
जाग्रत नित रहना उदारता-तुल्य असीम हृदय में।
अन्धकार में शान्त, चन्द्रसा, ध्रुव-सा निश्चय भय में।

शब्दार्थ :
विषय आँधियों = विपरीत परिस्थितियों। – सम्मुख = सामने से। जाग्रत = जागना। तुल्य = समान। असीम = सीमा रहित।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि उपदेश देता है कि चाहे संसार में कैसी भी विषम परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएँ, तुम ध्रुव तारे के समान डटे रहना।

व्याख्या :
कविवर त्रिपाठी कहते हैं कि संसार में आने वाली विषम परिस्थितियों के झोंकों से तुम विचलित मत होना, अपितु उनका डटकर सामना करना। समान उद्देश्य में स्थिर तथा विश्वास के समान दृढ़ बने रहना। उदारता करते समय नित्य जागते रहना और अपने असीम हृदय में यह गुण धरते रहना। अन्धकार अर्थात् निराशा के समय चन्द्रमा के समान शान्त रहना और भय तथा विपत्ति में ध्रुव के समान निश्चल (अडिग) बने रहना।

विशेष :

  1. कवि ने किसी भी स्थिति में विचलित न होने। का सन्देश दिया है।
  2. उपमा और अनुप्रास की छटा।

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(10) जगन्नियंता की इच्छा से यह संसार बना है।
उसकी ही क्रीड़ा का रूपक यह समस्त रचना है।
है यह कर्म-भूमि जीवों की यहाँ कर्मच्युत होना।
धोखे में पड़ना अलभ्य अवसर से है कर धोना॥
पैदा कर जिस देश जाति ने तुमको पाला पोसा।
किए हुए वह निजहित का तुमसे बड़ा भरोसा।
उससे होना उऋण प्रथम है सत्कर्त्तव्य तुम्हारा।
फिर दे सकते हो वसुधा को शेष स्वजीवन सारा॥

शब्दार्थ :
जगन्नियंता = ईश्वर। कर्मच्युत = काम से भागना। अलभ्य = जो सरलता से प्राप्त न हो सके। उऋण = ऋण मुक्त।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने सन्देश दिया है कि जिस देश जाति ने तुमको पैदा कर तुम्हारा भरण-पोषण किया है, उसके प्रति नि:स्वार्थ भाव से सेवा करके तुम उऋण हो सकते हो।

व्याख्या :
कविवर त्रिपाठी जी कहते हैं कि परम सत्ता की इच्छा से ही इस संसार का निर्माण हुआ है तथा उसकी ही क्रीड़ा का रूपक यह संसार है। यह देश जीवों की कर्मभूमि है अतः यहाँ कभी भी कर्म से पीछे मत हटना। यदि किसी धोखे में पड़कर तुमने कर्त्तव्य को त्याग दिया, तो तुम्हारे हाथ से अलभ्य (अनमोल) अवसर निकल जायेगा। जिस देश और जाति ने तुम्हें पैदा कर तुम्हें पाला-पोसा है, वह अपने हित का तुम परं बहुत बड़ा भरोसा किए हुए है। तुम्हारा यह सत्कर्म तथा प्रथम कर्त्तव्य है कि तुम देश और जाति के ऋण से ऋण-मुक्त हो जाओ। इस प्रकार तुम अपना शेष (बचा हुआ) जीवन अपनी पृथ्वी को दे सकते हो।

विशेष :

  1. कवि ने कर्म क्षेत्र से भागने वालों की निन्दा सकते हो। की है।
  2. कवि का उपदेश है कि जिस देश और जाति में तुमने जन्म पाया है, उनके प्रति भी तुम्हारे कुछ कर्त्तव्य हैं।
  3. अनुप्रास की छटा।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम

शौर्य और देश प्रेम अभ्यास

बोध प्रश्न

शौर्य और देश प्रेम अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
सभी दिशाएँ क्या पूछ रही हैं?
उत्तर:
सभी दिशाएँ यह पूछ रही हैं कि वीरों का वसन्त कैसा हो।

प्रश्न 2.
किसके अंग-अंग पुलकित हो रहे है?
उत्तर:
पृथ्वी रूपी वधू के अंग-अंग पुलकित हो रहे हैं।

प्रश्न 3.
वसन्त के आने पर कौन तान भरने लगता है?
उत्तर:
वसन्त के आने पर कोयल अपनी तान भरने लगती हैं।

प्रश्न 4.
कवि चट्टानों की छाती से क्या निकालने के लिए कह रहा है?
उत्तर:
कवि चट्टानों की छाती से दूध निकालने के लिए कह रहा है।

प्रश्न 5.
क के अनुसार मनुष्य का भीतरी गुण क्या
उत्तर:
कवि के अनुसार मनुष्य का भीतरी गुण स्वातन्त्र्य जाति की लगन है।

प्रश्न 6.
भ्रामरी किसका अभिनन्दन करती है?
उत्तर:
जो व्यक्ति युद्ध क्षेत्र में जाकर तलवार की चोट खाकर माथे पर रक्त का चन्दन लगाता है, भ्रामरी उसी का अभिनन्दन करती है।

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शौर्य और देश प्रेम लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐ कुरुक्षेत्र! अब जाग-जाग’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
‘ऐ कुरुक्षेत्र! अब जाग-जाग’ से कवि का आशय यह है कि जिस प्रकार द्वापर में कुरुक्षेत्र में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया गया था, आज पुनः उसी की आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
सिंहगढ़ का दुर्ग एवं हल्दी घाटी में किसकी याद छिपी है?
उत्तर:
सिंहगढ़ के दुर्ग में अद्वितीय वीर शिवाजी की तथा हल्दी घाटी में राणा प्रताप की याद छिपी है।

प्रश्न 3.
विजयी के सदृश बनने के लिए कवि क्या-क्या करने को कह रहा है?
उत्तर:
विजयी के सदृश बनने के लिए कवि मनुष्यों से वैराग्य छोड़ने, युद्ध में लड़ने, चट्टानों की छाती से दूध निकालने, चन्द्रमा को निचोड़ कर अमृत निकालने और ऊँची चट्टटानों पर सोमरस पीने के लिए कहता है।

प्रश्न 4.
स्वाधीन जगत में कौन जीवित रह सकता है?
उत्तर:
जो व्यक्ति अपनी आन-बान पर डटा रहता है तथा जो किसी के सामने झुकता नहीं है साथ ही जो अपने शरीर पर वज्रों का आघात सहता है, वही जाति स्वाधीन जगत में जीवित रह सकता है।

प्रश्न 5.
जीवन की परिभाषा क्या है? कवि के विचारों को लिखिए।
उत्तर:
कवि के शब्दों में जीवन गति है, जो विघ्न-बाधाओं को पार करता हुआ निरन्तर चलता रहता है। जीवन एक तरंग है, एक गर्जन है और एक चंचलता है।

प्रश्न 6.
कवि ने वीरता के कौन से दो लक्षण बताये हैं?
उत्तर:
कवि ने वीरता के दो लक्षण इस प्रकार बताये हैं-स्वर में पावक जैसी उष्णता या तीव्रता होनी चाहिए, दूसरे वीर के सिर पर तलवार की चोट का चन्दन लगा होना चाहिए।

शौर्य और देश प्रेम दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवयित्री वीरों के लिए किस तरह वसन्त का का आयोजन करना चाहती है?
उत्तर:
कवयित्री वीरों के लिए इस तरह के वसन्त का आयोजन करना चाहती हैं, जिसमें इधर तो कोयल अपनी तान सुना रही हो और उधर मारू बाजा बज रहा हो। इस प्रकार रंग (आनन्द) और रण (युद्ध) का वातावरण बन रहा हो।

प्रश्न 2.
वसन्त उत्सव के लिए प्रेरक पंक्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वसन्त उत्सव के लिए प्रेरक पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं-
फूली सरसों ने दिया रंग,
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग,
वधू-वसुधा, पुलकितअंग-अंग
हैं वीर-देश में, किन्तु कंत।
वीरों का कैसा हो वसन्त?

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार जब अहं पर चोट पड़ती है तब उसकी प्रतिक्रिया क्या होती है?
उत्तर:
कवि के अनुसार जब अहं पर चोट पड़ती है, तब उसकी प्रतिक्रियास्वरूप अहं से बड़ी कोई चीज जन्म ले लेती है।

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता प्रेमी जाति के गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्रेमी जाति में लगन होती है, वह जाति धुन की पक्की होती है। चाहे कितनी भी विपत्तियाँ क्यों न आ जायें वे उनसे हार नहीं मानती है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पद्यांशों की व्याख्या कीजिए-
(अ) गलबाहें हो या हो कृपाण ……………. कैसा हो वसन्त?
उत्तर:
कवयित्री कहती हैं कि चाहे तो प्रेमालाप के समय कोई परस्पर गले में बाँहें डाले हो अथवा रणक्षेत्र आने पर हाथ में कृपाण (तलवार) उठी हो। चाहे आनन्द का रस विलास। हो अथवा दलित नागरिकों की रक्षा की बात हो। आज मेरे सामने यही सबसे बड़ी समस्या है कि वीरों का वसन्त कैसा हो।

(ब) स्वर में पावक …………… मनुष्यता के पथ भी खुलते हैं।
उत्तर:
कवि कहता है कि यदि तुम्हारी वाणी में आग जैसी गर्मी नहीं है तो फिर तुम्हारा क्रन्दन करना वृथा है। यदि तुममें वीरता नहीं है तो फिर सभी प्रकार की विनम्रता केवल रोना है। जिस व्यक्ति के सिर पर तलवार की चोट से रक्त और चन्दन लगा होता है, दुर्गा या काली माँ उसी व्यक्ति का अभिनन्दन किया करती हैं। – कवि कहता है कि राक्षसी रक्त से सभी पाप धुल जाया करते हैं। साथ ही ऐसी वीरता से ऊँची मनुष्यता का मार्ग खुल जाया करता है।

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शौर्य और देश प्रेम काव्य सौन्दर्य

प्रश्न 1.
संकलित कविता में से ‘वीर रस’ की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए वीर रस को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
वीर रस-जहाँ उत्साह नामक स्थायी भाव जाग्रत होकर विभाग, अनुभाव एवं संचारी के संयोग से पुष्ट होकर रस दशा में पहुँचता है, वहाँ वीर रस होता है।

उदाहरण :
वैराग्य छोड़कर बाँहों की विभा सँभालो।
चट्टानों की छाती से दूध निकालो।
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएँ तोड़ो।
पीयूष चन्द्रमाओं को पकड़ निचोड़ो॥

प्रश्न 2.
रौद्र रस को समझाते हुए वीर एवं रौद्र रस में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शत्रु या दुष्ट जन द्वारा किए गए अत्याचारों या गुरुजन की निन्दा आदि से उत्पन्न क्रोध स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी के संयोग से पुष्ट होकर रौद्र रस के रूप में परिणत होता है।

वीर एवं रौद्र रस में अन्तर :
वीर एवं रौद्र दो भिन्न-भिन्न रूप हैं। वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है जबकि रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है। दोनों के आलम्बन, अनुभाव, संचारी आदि में अन्तर होता है।

प्रश्न 3.
अन्योक्ति अलंकार की उदाहरण सहित परिभाषा कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कथन के द्वारा अप्रस्तुत का बोध हो वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण :
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास एहि काल।
अली कली ही सौ बिंध्यौ; आगे कौन हवाल॥

शौर्य और देश प्रेम महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

शौर्य और देश प्रेम बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हिमालय से क्या आ रही है? (2016)
(क) पुकार
(ख) हुंकार
(ग) दुत्कार
(घ) चीत्कार।
उत्तर:
(क) पुकार

प्रश्न 2.
वसन्त के आने पर कौन तान भरने लगता है?
(क) कौआ
(ख) मोर
(ग) कोयल
(घ) मेंढक
उत्तर:
(ग) कोयल

प्रश्न 3.
“जीवन गति है, वह नित अरुद्ध चलता है” पंक्ति पाठ्य-पुस्तक की किस कविता से ली (2009)
(क) सोये हुए बच्चे से
(ख) श्रद्धा से
(ग) उद्बोधन से
(घ) शौर्य और देश-प्रेम से।
उत्तर:
(ग) उद्बोधन से

प्रश्न 4.
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने जीवन की गति को कैसा बतलाया है?
(क) रुक-रुक कर चलने वाला
(ख) निर्मल
(ग) नित अरुद्ध
(घ) चंचल।
उत्तर:
(ग) नित अरुद्ध

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रिक्त स्थानों की पर्ति

  1. ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ कविता की रचयिता ………….. चौहान हैं।
  2. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता में ………….. है। (2009)
  3. महाराणा प्रताप ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए ……………. की अधीनता स्वीकार नहीं की।
  4. कवि के अनुसार चलते रहने का नाम ………… है।

उत्तर:

  1. सुभद्राकुमारी
  2. ओज गुण
  3. मुगलों
  4. जीवन

सत्य/असत्य

  1. ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ में केवल वसन्त की प्राकृतिक शोभा का वर्णन है।
  2. ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ में कवि ने सिंहगढ़ का किला,राणा प्रताप के शौर्य एवं वीरता की याद दिलवाई है।
  3. वसन्त ऋतु में कोयल का मधुर स्वर सुनायी पड़ता है।
  4. ‘स्वाधीन जगत में वही जाति रहती है ।’ पंक्ति ‘वीरों का कैसा हो’ वसन्त कविता की है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम img-1
उत्तर:
1. → (घ)
2. → (ग)
3. → (ख)
4. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ कविता में कवयित्री ने किस पर्व का आयोजन किया है?
  2. वीरों की पुकार किस स्थान से आ रही है?
  3. वसन्त ऋतु में सरसों में किसके द्वारा पीलिमा छा जाती है?
  4. नर पर जब विपत्ति आती है तब वह विपत्ति मानव को किस प्रकार की शक्ति देती है?

उत्तर:

  1. वीरों के वसन्त का
  2. हिमालय पर्वत से
  3. फूलों द्वारा
  4. संघर्षों से जूझने की।

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वीरों का कैसा हो वसन्त? भाव सारांश

प्रस्तुत कविता में कवयित्री ने राष्ट्र को परतन्त्रता से मुक्ति की अपेक्षा राग-रंग को श्रेष्ठ ठहराया है। जैसे प्रकृति अपने फूलों के माध्यम से केसरिया वस्त्र पहनती है,उसी भाँति वीरों को भी वसंत का आह्वान करना चाहिए। संपूर्ण दिशाएँ भी यह पूछ रही हैं कि वीरों का वसंत कैसा होना चाहिए? हिमालय की पुकार में भी यही स्वर गुंजायमान है। वीरों को कोकिला की तान सुनने के साथ ही रणभूमि में जाने के लिए उद्यत रहना चाहिए। कवयित्री पुनः जागृति का सन्देश देते हुए कहती है कि हे वीरो! तुम्हें भली प्रकार विदित है कि लंका में क्यों आग लगायी गयी थी, कुरुक्षेत्र में महासंग्राम क्यों हुआ था। अन्त में कवयित्री का कथन है कि मेरी कविता भूषण अथवा कवि चन्दवरदायी की कविता के समान क्रान्ति की ज्वाला धधकाने में सक्षम नहीं है क्योंकि परतन्त्रता के वातावरण में कलम पर भी बन्धन है। वह अपनी भावनाओं को ब्रिटिश शासन के उत्पीड़न के फलस्वरूप व्यक्त करने में प्तक्षम नहीं है।

वीरों का कैसा हो वसन्त? संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) वीरों का कैसा हो वसन्त?
आ रही हिमालय से पुकार,
है उदधि गरजतां बार-बार
प्राची,पश्चिम,भू,नभ,अपार,
सम पूछ रहे हैं, दिग् दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसन्त?

शब्दार्थ :
उदधि = समुद्र। प्राची = पूर्व दिशा। दिग = दिशाएँ।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द वीरों का कैसा हो वसन्त?’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसकी रचयिता सुश्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं।

प्रसंग :
इस छन्द में कवयित्री ने वीरों का वसन्त कैसा होना चाहिए के बारे में बतलाया है।

व्याख्या :
कवयित्री जी कहती हैं कि वीरों का वसन्त कैसा हो? आज हिमालय की चोटियों से यही पुकार आ रही है, समुद्र बार-बार गर्जन कर पूछ रहा है। पूर्व दिशा, पश्चिम दिशा, पृथ्वी, आकाश एवं दिग-दिगन्त सभी पूछ रहे हैं कि वीरों का वसन्त कैसा हो।

विशेष :

  1. वीरों का सम्मान हिमालय, समुद्र एवं दिशाएँ सभी करते हैं।
  2. अनुप्रास अलंकार।

(2) फूली सरसों ने दिया रंग,
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग,
वधू-वसुधा पुलकित अंग-अंग
हैं वीर देश में, किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसन्त?

शब्दार्थ :
अनंग = कामदेव। वधू-वसुधा = पृथ्वी रूपी दुल्हन। कंत = पति।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कवयित्री जी कहती हैं कि वसन्त ऋतु में सरसों ने फूलकर अपना वसन्ती रंग सम्पूर्ण पृथ्वी पर बिखेर दिया है। कामदेव मधु लेकर स्वयं उपस्थित हो गया है। इस ऋतु में पृथ्वी रूपी वधू का अंग प्रत्यंग खुशी से पुलकित हो रहा है। आज हमारे देश में वीर तो हैं परन्तु हमारा वसन्त (पति) हमारे पास नहीं है। वीरों का वसन्त कैसा हो।

विशेष :

  1. बसन्त ऋतु की मादकता प्रकृति में छा गई है।
  2. वधू वसुधा में रूपक, अंग-अंग में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।

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(3) भर रही कोकिला इधर तान,
मारू बाजे पर उधर गान,
है रंग और रण का विधान,
मिलने आए हैं आदि-अंत
वीरों का कैसा हो वसंत?

शब्दार्थ :
कोकिला = कोयल। मारू = युद्ध का बाजा। रण = युद्ध।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कवयित्री कहती हैं कि एक ओर तो कोयल अपनी मीठी धुन गा-गाकर सुना रही है और दूसरी ओर युद्ध का बाजा मारू बज रहा है। ऐसा लग रहा है कि आज आनन्द और युद्ध दोनों का विधान है। ऐसा लग रहा है कि आज; आदि और अन्त दोनों मिलने के लिए आये हों। वीरों का वसन्त कैसा हो।

विशेष :

  1. चाहे वसन्त की मादकता हो या फिर कोई दूसरा आकर्षण, वीरों को अपने रण क्षेत्र से हटा नहीं सकता है।
  2. अनुप्रास अलंकार।

(4) गलबाँहे हों या कृपाण,
चल चितवन हो या धनुष बाण,
हो रस-विलास, या दलित त्राण,
अब यही समस्या है, दुरन्त,
वीरों का कैसा हो वसन्त?

शब्दार्थ :
गलबाँहें = प्रेम में प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे के गले में अपनी बाँहे डाल देते हैं। कृपाण = तलवार। चल-चितवन = प्रेम में चंचल दृष्टि। रस-विलास = आनन्द का वातावरण। दलित = दबे हुए। त्राण = रक्षा। दुरन्त = मुश्किल से नष्ट होने वाली।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जब समाज में एक ओर बलिदान की बात हो तो प्रेम की बात अच्छी नहीं लगती।

व्याख्या :
कवयित्री कहती हैं कि चाहे तो प्रेमालाप के समय कोई परस्पर गले में बाँहें डाले हो अथवा रणक्षेत्र आने पर हाथ में कृपाण (तलवार) उठी हो। चाहे आनन्द का रस विलास। हो अथवा दलित नागरिकों की रक्षा की बात हो। आज मेरे सामने यही सबसे बड़ी समस्या है कि वीरों का वसन्त कैसा हो।

विशेष :
अनुप्रास की छटा।

(5) कह दे अतीत! अब मौन त्याग,
लंके! तुझमें क्यों लगी आग?
ऐ कुरुक्षेत्र! अब जाग, जाग,
बतला अपने अनुभव अनंत,
वीरों का कैसा हो वसंत?

शब्दार्थ :
लंके = रावण की लंका। मौन = खामोशी, चुप्पी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इसमें कवयित्री अतीत की वीर गाथाओं का सन्दर्भ लेते हुए कह रही हैं।

व्याख्या :
कवयित्री कहती है कि हे अतीत! तुम अब अपना मौन त्याग दो और विगंत की घटनाओं को बतला दो। हे लंके! तू बता तुझमें क्यों आग लगी? हे कुरुक्षेत्र! तुम अब जाग जाओ और अपने अनन्त अनुभवों को हमें बता दो। वीरों का वसन्त कैसा हो।

विशेष :

  1. कवयित्री ने लंका और कुरुक्षेत्र का मानवीकरण किया है।
  2. अतीत काल की वीर गाथाओं का स्मरण किया है।

(6) हल्दी घाटी के शिला खण्ड,
ऐ दुर्ग! सिंहगढ़ के प्रचंड,
राणा-ताना का कर घमण्ड,
दो जगा आज स्मृतियों ज्वलन्त,
वीरों का कैसा हो वसन्त?

शब्दार्थ :
शिला खण्ड = चट्टानें। ज्वलन्त = प्रखर, तेज। सन्दर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।

व्याख्या :
कवयित्री कहती हैं कि हे हल्दी घाटी के शिलाखण्डों तथा हे सिंहगढ़ के दुर्ग! तुम राणा प्रताप तथा शिवाजी की वीरता का बखान करके आज तेजी के साथ उन अतीत की स्मृतियों को जगा दो। वीरों का वसन्त कैसा हो।

विशेष :

  1. हल्दी घाटी में राणा प्रताप के शौर्य की गाथा की ओर कवयित्री ने संकेत किया है तो सिंहगढ़ के दुर्ग के माध्यम से वीर शिवाजी की वीरता का बखान किया है।
  2. मानवीकरण अलंकार।
  3. वीर रस।

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(7) भूषण अथवा कवि चन्द नहीं,
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बँधी, स्वच्छन्द नहीं
फिर हमें बतावै कौन? हंत!
वीरों का कैसा हो वसन्त?

शब्दार्थ :
बिजली भर दे = वीरता का संचार कर दे। हंत = दुर्भाग्य है।

सन्दर्भ एवं प्रसंग :
पूर्ववत्।

व्याख्या :
कवयित्री अतीत का स्मरण करती हुई कहती है कि अतीत काल में हमारे देश में भूषण और चन्दवरदाई जैसे वीर रस का संचार करने वाले दो महाकवि थे। भूषण ने शिवाजी के शौर्य का वर्णन कर उस समय समाज में वीरता का संचार किया था और उससे पूर्व चन्दवरदाई ने पृथ्वीराज के शौर्य का वर्णन कर तत्कालीन समाज में वीरता का संचार किया लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे महान कवि आज नहीं हैं। इतना ही नहीं वर्तमान शासकों ने इस प्रकार के कवियों की रचना धर्मता को कैद कर लिया है उनको बोलने की आज्ञा नहीं दी है। फिर। हमें कौन मार्गदर्शन देगा, यह हमारा दुर्भाग्य है। वीरों का वसन्त कैसा हो।

विशेष :

  1. कवयित्री अंग्रेजी शासन के उन आदेशों की ओर संकेत कर रही हैं, जब अंग्रेज शासकों ने यहाँ के कवियों द्वारा वीरता के गान पर पाबन्दी लगा दी थी।
  2. वीर रस।

उद्बोधन भाव सारांश

प्रस्तुत कविता में कवि ने मनुष्य का उद्बोधन करते हुए उसे मृत्यु से भयभीत न होने का संदेश दिया है। कवि का आग्रह है कि विषम परिस्थितियों में भी व्यक्ति को स्वाभिमान नहीं छोड़ना चाहिए। इसके लिए चाहे उसे अपना सिर कटाकर भले ही मूल्य चुकाना पड़े। व्यक्ति को अन्याय का डटकर सामना करना चाहिए।

विपत्ति के भयानक बादल छा जाने पर मानव के हृदय में संघर्ष करने की भावना जाग्रत होती है। आघात सहने के साथ ही एक छोटी सी चिंगारी अंगारे का रूप धारण कर लेती है। यदि वाणी में ज्वाला के सदृश तेज नहीं तो वह वन्दना निरर्थक है।

जीवन का नाम ही गति है। पावक के सदृश जलना ही जीवन गति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। धरती पर आगे बढ़ने में राह में अनेक बाधायें आती हैं तब भी निरन्तर गतिमान रहना चाहिए।

उद्बोधन संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) वैराग्य छोड़कर बाँहों की विभा सँभालो,
चट्टानों की छाती से दूध निकालो।
है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो,
पीयूष चन्द्रमाओं को पकड़ निचोड़ो।
चढ़ तुंग शैल-शिखरों पर सोम पियो रे!
योगियों नहीं, विजयी की सदृश जियो रे!

शब्दार्थ :
बाँहों की विभा सँभालो = अपने पौरुष। (शक्ति) पर विश्वास करो। पीयूष = अमृत। तुंग = ऊँचे। शैल = चट्टान। सदश = समान।।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत छन्द ‘उद्बोधन’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके रचनाकार श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।

प्रसंग :
कवि ने मनुष्यों को वैराग्य छोड़ने और शूरता का पथ अपनाने का सन्देश दिया है।

व्याख्या :
कविवर दिनकर जी कहते हैं कि हे भारतवासियो! तुम वैराग्य की बातों को त्याग दो और अपनी भुजाओं के बल। पर विश्वास करो। तुम ऐसी चेष्टा करो कि आवश्यकता पड़ने पर चट्टानों की छाती से दूध निकाल लो। यदि तुम्हारे मार्ग में, लक्ष्य प्राप्त करने में कोई बाधाएँ आती हैं, तुम्हारी गति की धार को यदि बीच में शिलाएँ रोक देती हैं तो तुम अपने बल पर उन शिलाओं को तोड़कर अपना मार्ग स्वयं बना डालो। अमृतधारी चन्द्रमाओं को पकड़कर उन्हें निचोड़ डालो। हे वीर! तुम ऊँचे पर्वत शिखरों पर चढ़कर सोम का पान करो। अतः योगियों जैसा नहीं अपितु वीर विजेता के समान जीवन जीओ।

विशेष :

  1. समय के अनुरूप कवि ने भारतीयों को शक्ति संचित करने का उपदेश दिया है।
  2. कवि वैरागियों से घृणा करता है।
  3. लाक्षणिक शैली।

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(2) छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,
मत झुको अनय पर, भले व्योम फट जाए।
दो बार नहीं यमराज कंठ धरता है,
मरता है जो, एक ही बार मरता है।
तुम स्वयं मरण के मुख पर चरण धरो रे!
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!

शब्दार्थ :
आन = मान-मर्यादा। अनय = अनीति। व्योम = आकाश। यमराज = मृत्यु का देवता। कंठ धरता है = मनुष्य को मृत्यु देता है।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने हर स्थिति में अन्याय का विरोध करने और अपनी आन-बान-शान की रक्षा का सन्देश दिया है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि अपनी आन (मान-मर्यादा) को मत छोड़ो, चाहे इसकी रक्षा के लिए तुम्हें अपना सिर भी क्यों ने कटाना पड़े। कभी भी अनीति के सामने झुको मत, चाहे फिर आकाश ही क्यों न फट जाए। कवि मनुष्यों को सचेत करते हुए कहता है कि मृत्यु का देवता यमराज किसी भी व्यक्ति के प्राणों को दो बार नहीं लेता है। जिसे भी मरना होता है, वह एक ही बार मरता है। अतः भय छोड़कर अनीति का डटकर विरोध करो। कवि कहता है कि तुममें इतना साहस होना चाहिए कि तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चढ़ बैठो। यदि तुममें जीने की इच्छा है तो फिर मौत से भी डरो मत।

विशेष :

  1. आन-बान-शान की रक्षा का उपदेश दिया है।
  2. भाषा लाक्षणिक है।
  3. वीर रस।

(3) स्वातन्त्र्य जाति की लगन, व्यक्ति की धुन है,
बाहरी वस्तु यह नहीं, भीतरी गुण है।
नत हुए बिना जो अशनि-घात सहती है,
स्वाधीन जगत् में वही जाति रहती है।
वीरत्व छोड़, पर-का मत चरण गहो रे!
जो पड़े आन, खुद ही सब आग सहो रे!

शब्दार्थ :
स्वातन्त्र्य = स्वतन्त्रता की। नत = झुकना। अशनिघात = वज्राघात। वीरत्व = वीरता को।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि स्वाधीन जगत में वही जाति जीवित रहती है जो अपनी रक्षा के लिए कठोर से कठोर एवं भीषण विपत्तियों का मुकाबला करती है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि स्वतन्त्रता की लगन व्यक्ति – विशेष की धुन हुआ करती है। यह कोई बाहरी वस्तु नहीं अपितु यह तो भीतरी गुण है। बिना झुके हुए जो जाति वज्रों का आघात सहती है, वही जाति स्वाधीन संसार में जीवित रह सकती है।

अतः हे वीर पुरुषो! वीरता का बाना छोड़कर अन्य किसी का चरण मत पकड़ो। जो कोई भी परिस्थिति आ जाये, उसका सामना बिना संकोच के तुम्हें स्वयं करना होगा।

विशेष :

  1. अपनी जाति एवं आन की रक्षा के लिए हमें बड़ी से बड़ी विपत्ति को सहन करना होगा।
  2. लाक्षणिक शैली।
  3. वीर रस।

(4) जब कभी अहं पर नियति चोट देती है.
कुछ चीज अहं से बड़ी जन्म लेती है।
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है,
वह उसे और दुर्घर्ष बना जाती है।
चोटें खाकर विफरो, कुछ अधिक तनो रे!
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!

शब्दार्थ :
नियति = भाग्य, ईश्वरीय सत्ता। भीषण = भयानक। दुर्घर्ष = कठिन। स्फुलिंग = ज्योति-कण।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि विपत्तियों से मानव और अधिक ताकतवर बन जाता है।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि जब कभी भी अहं (आत्म सम्मान) पर भाग्य चोट देता है, तब अहं से बड़ी वस्तु का जन्म – हुआ करता है। मनुष्य पर जब भी भीषण विपत्ति आती है, तो वह उसे और कठोर बना देती है।

अतः हे वीर पुरुषो! चोटें खाकर बिफर पड़ो तथा कुछ। अधिक तन जाओ। तुम अपनी वीरता के क्रोध से धधक पड़ो और ज्योति-कण से बढ़कर अंगार बन जाओ।

विशेष :

  1. कवि ने मनुष्यों को विपत्ति में न घबड़ाने का उपदेश दिया है।
  2. लाक्षणिक शैली।
  3. वीर रस।

(5) स्वर में पावक नहीं; वृथा वन्दन है।
वीरता नहीं, तो सभी विनय क्रन्दन है;
सिर जिसके असिंघात रक्त चन्दन है।
भ्रामरी उसी का करती अभिनन्दन है।
दानवी रक्त से सभी पाप धुलते हैं।
ऊँची मनुष्यता के पथ भी खुलते हैं।

शब्दार्थ :
पावक = अग्नि। वृथा = बेकार का। क्रन्दन = रोना। असिंघात = तलवार की चोट। भ्रामरी =दुर्गा। दानवी = राक्षसी। पथ = रास्ते।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि मनुष्यों में वीरता का संचार करने का उपदेश देता है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि यदि तुम्हारी वाणी में आग जैसी गर्मी नहीं है तो फिर तुम्हारा क्रन्दन करना वृथा है। यदि तुममें वीरता नहीं है तो फिर सभी प्रकार की विनम्रता केवल रोना है। जिस व्यक्ति के सिर पर तलवार की चोट से रक्त और चन्दन लगा होता है, दुर्गा या काली माँ उसी व्यक्ति का अभिनन्दन किया करती हैं। – कवि कहता है कि राक्षसी रक्त से सभी पाप धुल जाया करते हैं। साथ ही ऐसी वीरता से ऊँची मनुष्यता का मार्ग खुल जाया करता है।

विशेष :

  1. कवि मनुष्यों में वीरता के संचार का उपदेश देता है।
  2. लाक्षणिक शैली।
  3. वीर रस।

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(6) जीवन गति है, वह नित अरुद्ध चलता है,
पहला प्रमाण पावक का, वह जलता है।
सिखला निरोध-निज्वलन धर्म छलता है।
जीवन तरंग गर्जन है, चंचलता है।
धधको अभंग, पाल-पिवल अरुण जलो रे!
धरा रोके यदि राह, विरुद्ध चलो रे!

शब्दार्थ :
अरुद्ध = बिना रुके। पावक = अग्नि। निरोध = रुकना। निर्व्वलन = जिसमें जलने की क्षमता न हो। अभंग = बिना रुकावट के। अरुण = सूर्य। धरा = पृथ्वी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।।

प्रसंग :
कवि कहता है कि जीवन की सार्थकता निरन्तर चलते रहने में है। यदि हमारे सत्कार्य में कोई भी बाधा डाले, तो हमें उसका विरोध करना चाहिए।

व्याख्या :
कवि कहता है कि जीवन उसे ही कहते हैं जिसमें गति होती है और वह जीवन बिना किसी के रोके निरन्तर चलता रहता है। अग्नि का पहला प्रमाण ही उसमें जलने का गुण होता है। जो धर्म हमें रुकने तथा न जलने का उपदेश देता है, वह वास्तव में धर्म न होकर छलावा है। जीवन तो चंचलता एवं गर्जन में ही निवास करता है।

हे वीरो! बिना किसी रुकावट के तुम सूर्य के समान निरन्तर धधकते रहो। यदि पृथ्वी भी तुम्हारी राह रोकती है, तो तुम उसके विरुद्ध भी चल पड़ो।

विशेष :

  1. जीवन की सार्थकता चलते रहने में है।
  2. लाक्षणिक शैली।
  3. वीर रस।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet लेखक परिचय

MP Board Class 10th Hindi Navneet लेखक परिचय

1. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (2009, 14, 16)

जीवन परिचय देश के प्रति विशेष अनुराग रखने वाले प्रभाकर जी का जन्म सन् 1906 ई. में सहारनपुर जिले के देवबन्द नामक कस्बे में हुआ था। उनके पिता श्री रमादत्त मिश्र एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण थे। उनके परिवार का जीविकोपार्जन पंडिताई के द्वारा होता था। अतः पारिवारिक परिस्थितियों के अनुकूल न होने के कारण इनकी प्रारम्भिक शिक्षा का प्रबन्ध घर पर ही हुआ। इसके बाद इन्होंने खुर्जा के संस्कृत विद्यालय में प्रवेश लिया।

लेकिन वे मौलाना आसफ अली के सम्पर्क में आने पर उनसे प्रभावित होकर स्वतन्त्रता संग्राम के आन्दोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रसेवा और साहित्य सेवा हेतु समर्पित कर दिया।

आपने अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष जेल में बिताये,परन्तु देश के स्वतन्त्र होने के उपरान्त प्रभाकर जी ने अपना समय साहित्य-सेवा और पत्रकारिता में लगा दिया।

माँ भारती का यह वरद् पुत्र अन्तकाल तक मानव तथा साहित्य की साधना करता हुआ सन् 1995 ई. में चिरनिद्रा में लीन हो गया।

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रचनाएँ–

  • ललित निबन्ध संग्रह-बाजे पायलिया के घुघरू।
  • संस्मरण-दीप जले-शंख बजे।
  • लघु कहानी-धरती के फूल, आकाश के तारे।
  • रेखाचित्र-माटी हो गई सोना, नयी पीढ़ी नये विचार, जिन्दगी मुस्कराई।
  • अन्य रचनाएँ-क्षण बोले कण मुस्कराये, भूले बिसरे चेहरे,महके आँगन चहके द्वार।
  • पत्र-सम्पादन-विकास, नया जीवन।
  • पत्रिका-ज्ञानोदय।

भाषा-प्रभाकर जी की भाषा सरल, सुबोध एवं प्रसादयुक्त, स्वाभाविक है। आपकी भाषा भावानुकूल है। इसमें आपने यथास्थान मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग किया है।

भाषा में यथास्थान तत्सम शब्दों का भी प्रयोग है। आपके साहित्य में वाक्य छोटे-छोटे तथा सरल हैं। इन्होंने जहाँ-तहाँ बड़े-बड़े वाक्यांशों का प्रयोग किया परन्तु शब्दों को कहीं भी जटिल नहीं होने दिया। इनकी भाषा शुद्ध व साहित्यिक खड़ी बोली है।

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शैली-प्रभाकर जी की शैली में काव्यात्मकता और चित्रात्मक दिखाई देती है। आपकी शैली भी तीन प्रकार की है

  1. वर्णनात्मक शैली-लेखक ने जहाँ विषयवस्तु का सटीक वर्णन किया है, वहाँ इस शैली का प्रयोग किया है। इस शैली का प्रयोग अधिकतर लघु कथाओं में किया है।
  2. नाटकीय शैली-इस शैली के प्रयोग से गद्य में सजीवता और रोचकता आ गयी है। इस शैली का प्रयोग रिपोर्ताज में किया गया है।
  3. भावात्मक और चित्रात्मक शैली-इस शैली का प्रयोग रिपोर्ताज और संस्मरण लिखते समय किया है। शब्दों के द्वारा इतना सुन्दर चित्रांकन अन्य किसी लेखक ने आज तक नहीं किया है।

साहित्य में स्थान-प्रभाकर जी यद्यपि आज हमारे मध्य नहीं हैं,लेकिन फिर भी हम उन्हें राष्ट्रसेवी, देशप्रेमी और पत्रकार के रूप में सदैव याद करते रहेंगे।
पत्रकारिता एवं रिपोर्ताज के क्षेत्र में इनका अद्वितीय स्थान है। सच्चे अर्थों में वे एक उच्चकोटि के साहित्यकार थे। उनके निधन से जो क्षति हुई है वह सदैव अविस्मरणीय रहेगी।

2. वासुदेवशरण अग्रवाल (2009, 12, 13, 18)

जीवन परिचय-डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का नाम भारतीय संस्कृति, सभ्यता तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन विषयों पर उनकी विचार तथा भावों की श्रृंखला गहन चिन्तन तथा उद्गार समन्वित है।

आपका जन्म सन् 1904 ई. में मेरठ जनपद के खेड़ा ग्राम में हुआ था। आपके माता-पिता का निवास स्थल लखनऊ था, वहीं रहकर आपने प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की। काशी विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। लखनऊ विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि से सम्मानित हुए।

इन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी तथा पाली विषयों का गहन अध्ययन किया। हिन्दी काव्य का यह महारथी सन् 1966 ई.में सदा-सदा के लिए देवलोक को चला गया।

रचनाएँ-वासुदेवशरण अग्रवाल की प्रमुख कृतियाँ निम्न हैं-

  • निबन्ध संग्रह–’उर ज्योति’, ‘माता भूमि’, ‘पृथ्वी पुत्र’, ‘वेद विद्या’, ‘कला और संस्कृति’, ‘कल्पवृक्ष’,’वाग्धारा’।
  • समीक्षा—जायसी के ‘पद्मावत’ तथा कालिदास के ‘मेघदूत’ की संजीवनी व्याख्या।
  • सांस्कृतिक-‘पाणिनिकालीन भारतवर्ष’, ‘भारत की मौलिक एकता’, ‘हर्ष चरित’, ‘एक सांस्कृतिक अध्ययन’।
  • अनुवाद–’हिन्दू सभ्यता’।
  • सम्पादन–’पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ’।

भाषा-डॉ. अग्रवाल ने अपनी रचना में शुद्ध एवं परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया है।

यत्र-तत्र प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग है। जहाँ आपने गहन विचारों तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति की है, वहाँ भाषा का रूप जटिल हो गया है। भाषा में प्रचलित अंग्रेजी व उर्दू शब्दों का प्रयोग है। अनेक देशज शब्दों का भी प्रयोग है।

शैली-डॉ. अग्रवाल ने गवेषणात्मक शैली का प्रयोग किया है। यह शैली पुरातत्त्व विभाग के अन्वेषण से सम्बन्धित है।

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विचार प्रधान शैली-विचार प्रधान शैली का प्रयोग विषयों के विश्लेषण में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त व्याख्यात्मक तथा उद्धरण शैली का प्रयोग भी मिलता है। समग्र रूप से भाषा-शैली उन्नत तथा प्रशंसनीय है।

साहित्य में स्थान–डॉ. अग्रवाल की विचार विश्लेषण तथा अभिव्यक्ति की शैली अपूर्व तथा सरस है, आप कुशल सम्पादक तथा टीकाकार भी हैं।

शब्दों के कुशल शिल्पी और जीवन सत्य के स्पष्ट जागरूक द्रष्टा वासुदेवशरण अग्रवाल हमारे आधुनिक साहित्य के गौरव हैं।

3. हजारीप्रसाद द्विवेदी (2009, 10, 12, 15, 17)

परिचय-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जाने-माने श्रेष्ठ समालोचक, निबन्धकार, उपन्यासकार, निष्ठावान तथा आदर्श अध्यापक थे।

डॉ. शम्भूनाथ सिंह के कथनानुसार, “आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य को बड़ी देन हैं। उन्होंने हिन्दी समीक्षा की एक नई उदार और वैज्ञानिक दृष्टि दी है।”

जीवन परिचय-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 में बलिया जिले के अन्तर्गत दुबे के छपरा नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योति कली देवी था।

पिता की प्रेरणा एवं दिशा-निर्देशन के फलस्वरूप संस्कृत एवं ज्योतिष का गहन अध्ययन किया। शान्ति-निकेतन काशी विश्वविद्यालय एवं पंजाब विश्वविद्यालय जैसी विख्यात संस्थाओं में हिन्दी के विभागाध्यक्ष के पद पर प्रतिष्ठित रहे। शान्ति-निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिज मोहन के सम्पर्क के कारण साहित्य साधना में प्राण-पण से जुट गये।

लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की उपाधि से आपको विभूषित किया गया। सन् 1957 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया। 19 मई,सन् 1979 ई.को हिन्दी का . यह महान साहित्यकार सदा-सदा के लिए मृत्यु के रथ पर सवार हो गया।

रचनाएँ-आचार्य द्विवेदी जी ने साहित्य की विविध विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। उनकी रचनाएँ निम्न हैं

  1. आलोचना—सूर साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’, ‘कबीर’, ‘सूरदास और उनका काव्य’, ‘हमारी साहित्यिक समस्याएँ’, साहित्य का साथी’, ‘साहित्य का धर्म’, ‘नख दर्पण में हिन्दी कविता’, ‘हिन्दी साहित्य’, समीक्षा साहित्य’।
  2. उपन्यास–’चारुचन्द्र लेख’, ‘अनामदास का पोथा’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा ‘पुनर्नवा’।
  3. सम्पादन-सन्देश रासक संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो।
  4. अनूदित रचनाएँ-प्रबन्ध कोष,प्रबन्ध-चिन्तामणि, विश्व परिचय आदि।

भाषा-द्विवेदी जी की भाषा-शैली की अपनी विशेषता है। आपने अपनी रचनाओं में प्रसंगानुकूल उपयुक्त तथा सटीक भाषा का प्रयोग किया है।

भाषा के अन्तर्गत सरल, तद्भव प्रधान तथा उर्दू संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है। वे अपनी बात को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करने में सक्षम थे। बोल-चाल की भाषा सरल तथा स्पष्ट है। इसी भाषा को द्विवेदी जी ने अपनी कृतियों में वरीयता प्रदान की है।

भाषा में गति तथा प्रवाह विद्यमान है। मुहावरों के प्रयोग से भाषा में सुधार आ गया है। संस्कृत के शब्दों के प्रयोग से भाषा जटिल और दुरूह हो गयी है। भाषा की चित्रोपमता तथा अलंकारिता के कारण हृदयस्पर्शी और मनोरम बन गई है।

शैली-

  1. गवेषणात्मक शैली-शोध तथा पुरातत्त्व से सम्बन्धित निबन्धों में इस शैली का प्रयोग है।
  2. आत्मपरक शैली-इस शैली का प्रयोग द्विवेदी जी ने प्रसंग के साथ-साथ स्वयं को समाहित करने के लिए किया है।
  3. सूत्रात्मक शैली–बौद्धिकता के कारण अनेक स्थान पर सूत्रात्मक शैली का प्रयोग किया है।
  4. विचारात्मक शैली-अधिकांश निबन्धों में इस शैली का प्रयोग है।
  5. वर्णनात्मक शैली-द्विवेदी जी की वर्णनात्मक शैली इतनी स्पष्ट, सरस तथा सरल है कि वह वर्णित विशेष स्थलों का मानव पटल के समक्ष चित्र सा उपस्थित कर देती है।
  6. व्यंग्यात्मक शैली-इस शैली के अन्तर्गत द्विवेदी जी ने कोरे व्यंग्य किये हैं।
  7. भावात्मक शैली-द्विवेदीजी जहाँ भावावेश में आते हैं वहाँ उनकी इस शैली की सरसता दर्शनीय है।

साहित्य में स्थान द्विवेदीयुगीन साहित्यकारों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का शीर्ष स्थान है। ललित निबन्ध के सूत्रधार एवं प्रणेता हैं। निबन्धकार,उपन्यासकार, आलोचक के रूप में आपका योगदान अविस्मरणीय हैं। आपने अपनी पारस प्रतिभा से साहित्य के जिस क्षेत्र को भी स्पर्श किया उसे कंचन बना दिया।

4. रामवृक्ष बेनीपुरी (2011, 14, 16)

जीवन परिचय–विचारों से क्रान्तिकारी तथा राष्ट्रसेवा के साथ-साथ साहित्य सेवा में संलग्न श्री बेनीपुरी जी हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म सन् 1902 ई. में बिहार के अन्तर्गत मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था। राष्ट्र के प्रति अनन्य निष्ठा रखने वाले बेनीपुरी ने अध्ययन पर विराम लगाकर राष्ट्रसेवा का व्रत लिया।

उन्होंने गाँधीजी के साथ असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे अनेक बार जेल गये और वहाँ की यातनाओं को भी सहन किया।

17 सितम्बर, सन् 1968 ई.को ये मृत्यु के रथ पर सवार हो गये।

रचनाएँ-पैरों में पंख बाँधकर (यात्रा साहित्य), माटी की मूरतें (रेखाचित्र), जंजीर और दीवारें (संस्मरण), गेहूँ बनाम गुलाब (निबन्ध)।

भाषा-इनकी भाषा प्रवाहपूर्ण, सरस तथा ओजमयी है। संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग भाषा में किया है। भाषा शुद्ध साहित्यिक हिन्दी है।

शैली-बेनीपुरी जी की शैली सरल, सरस तथा हृदयस्पर्शी है। शैली कहीं-कहीं विश्लेषणात्मक तो कहीं अन्वय व्याख्यात्मक रूप भी लिए हुए है। शैली में लालित्य का भी समन्वय है। वाक्य दीर्घ न होकर लघु हैं, जिससे भाषा में चार चाँद लग गये हैं। बेनीपुरी जी के निबन्धों में जीवन के प्रति अगाध निष्ठा व आशा के स्वर मुखरित हैं। शब्द शिल्पी रामवृक्ष बेनीपुरी की शैली का चमत्कार एवं प्रभाव उनकी कृतियों में विद्यमान है।

साहित्य में स्थान-बेनीपुरी जी हिन्दी साहित्य की अपूर्व निधि हैं। उनके साहित्य में आदर्श कल्पना एवं गहन चिन्तन का समन्वय है। सम्पादक के रूप में भी आपका विशिष्ट योगदान है।

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आपकी शैली काव्यात्मक तथा मनभावन है। प्रसाद तथा माधुर्य गुण से सम्पन्न हैं। आप ऐसे साहित्यकार थे जिनके कण्ठ में कोमल तथा माधुर्य पूर्ण स्वर,मस्तिष्क में अपूर्व कल्पना शक्ति तथा हृदय में भावना का समुद्र हिलोरें ले रहा था। उनकी कविताएँ नेत्रों के समक्ष चित्र प्रस्तुत करने में सक्षम हैं।

5. श्रीलाल शुक्ल (2010, 11, 15)

जीवन परिचय-हिन्दी साहित्य के दैदीप्यमान व्यंग्य साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का जन्म 31 दिसम्बर,सन् 1925 को लखनऊ के समीप अतरौली नामक गाँव में हुआ था।

इनकी शिक्षा लखनऊ एवं इलाहाबाद में हुई थी। सन् 1950 में इनको (आई. ए. एस) प्रशासनिक सेवा के लिये चुन लिया। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में इन्होंने उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर भी कार्य किया व अपने कर्तव्यों का उचित पालन भी किया। आप एक उच्चकोटि के व्यंग्यकार के रूप में प्रसिद्ध हुए। आज भी वे साहित्य सृजन कर हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे

रचनाएँ—आपकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

  • सूनी घाटी का सूरज,
  • अज्ञातवास,
  • मकान,
  • अंगद का पाँव तथा
  • आदमी का जहर।

भाषा-श्रीलाल शुक्ल जी की भाषा सरल, सहज व सजीव है। भाषा में शुक्लजी ने यथा-स्थान मुहावरे लोकोक्तियों का प्रयोग किया है। उन्होंने अपनी भाषा में साधारण बोल-चाल के अतिरिक्त उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में व्यंग्य का अनोखा पुट है। वह शब्दों में चार चाँद लगा देता है।

शैली-शुक्लजी ने अपने साहित्य में भाषा की भाँति अनेक प्रकार की शैली का चयन किया है।

  1. वर्णनात्मक शैली-शुक्लजी ने वर्णन शैली का प्रयोग छोटे-छोटे प्रसंगों में किया है। वाक्य छोटे व संयत व सहज हैं।
  2. भावात्मक शैली इस प्रकार की शैली में शुक्लजी ने कोमल पदावली का प्रयोग किया है।
  3. व्यंग्यात्मक शैली-शुक्लजी ने अपने साहित्य में व्यंग्यात्मक शैली का खुलकर प्रयोग किया है। उन्होंने व्यंग्य शैली का प्रयोग करके राजनीति, शिक्षा,गाँव,समाज और घर जहाँ भी अन्याय व अत्याचार दिखायी दिया उसी पर तीखा प्रहार करके समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने का प्रयास किया है। उनकी रचनाओं में शिक्षाप्रद प्रेरक प्रसंग भी हैं।
  4. संवाद शैली-श्रीलाल शुक्लजी की रचनाओं में संवाद शैली का प्रयोग है। उनके संवाद सरल और सहज होते हैं। संवादों में स्वाभाविक शैली का प्रयोग है।
  5. विवरणात्मक शैली-इस प्रकार की शैली में घटनाओं व तथ्यों का वर्णन होता है। इस प्रकार की शैली की भाषा प्रवाहयुक्त होती है।

साहित्य में स्थान-श्रीलाल शुक्ल जी एक उच्चकोटि के व्यंग्य निबन्धकार हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में रहस्यात्मक एवं रोमांचक कथाओं के द्वारा साहित्य जगत में ख्याति प्राप्त की। उनके कई प्रसिद्ध उपन्यास हैं लेकिन ‘राग दरबारी’ उनका विशेष व्यंग्यपूर्ण आंचलिक उपन्यास है। इस उपन्यास पर उन्हें साहित्य अकादमी से पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। उन्होंने समाज की विसंगतियों पर प्रहार करके उन्हें दूर करने का सफल प्रयास किया है।

6. प्रेमचन्द (2009, 13, 17)

जीवन परिचय-प्रेमचन्द सच्चे अर्थों में हिन्दी उपन्यासों के जन्मदाता तथा मौलिक एवं सर्वश्रेष्ठ कहानीकार भी हैं।

इसी कारण वे जनता के मध्य उपन्यास सम्राट के रूप में विख्यात हैं।

प्रेमचन्द का जन्म सन् 1880 में बनारस के निकट लमही नामक ग्राम में हुआ। एण्ट्रेन्स की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् एक स्कूल में आठ रुपये मासिक पर अध्यापक नियुक्त हुए। इसके बाद व्यक्तिगत रूप से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सौभाग्यवश आप स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर पद पर प्रतिष्ठित हुए।

गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन में आपने सक्रिय भाग लिया। इसके बाद नौकरी से त्याग-पत्र देकर आप जीवन-पर्यन्त साहित्य साधना में संलग्न रहे। सन् 1936 ई. में आप सदा के लिए मृत्यु की गोद में सो गये।

रचनाएँ-प्रेमचन्द ने हिन्दी गद्य की विविध विधाओं पर अपनी लेखनी के द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। प्रेमचन्द उपन्यास सम्राट के नाम से विख्यात थे। इनकी कहानियाँ भी पाठकों को मन्त्रमुग्ध कर देती हैं। इनकी कृतियाँ निम्न प्रकार हैं

  1. कहानियाँ-‘मानसरोवर’ तथा ‘गुप्तधन’ में आपकी तीन सौ से अधिक कहानियाँ संकलित हैं। पूस की रात, कफन, ईदगाह, पंचपरमेश्वर, परीक्षा, बूढ़ी काकी, बड़े घर की बेटी, सुजान भगत आदि प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
  2. उपन्यास-वरदान, प्रतिज्ञा, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, गबन, कर्मभूमि, निर्मला, कायाकल्प, गोदान और मंगलसूत्र (अपूर्ण)।
  3. नाटक-कर्बला, संग्रमा और प्रेम की वेदी।
  4. निबन्ध संग्रह-स्वराज्य के फायदे,कुछ विचार, साहित्य का उद्देश्य।
  5. जीवनियाँ-महात्मा शेखसाथी, दुर्गादास,कलम-तलवार और त्याग।

भाषा-इन्होंने संस्कृत, अरबी एवं फारसी के प्रभाव से मुक्त भाषा का प्रयोग किया, जिससे जनसाधारण भाषा को समझ सकें। आपने हिन्दी,उर्दू का मिश्रण करके हिन्दुस्तानी भाषा का साहित्य में प्रयोग किया जो कि जनसामान्य की भाषा थी। . हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु जी के समान प्रेमचन्द ने ही ऐसी भाषा का प्रयोग किया जो

आज भी आदर्श रूप में प्रतिष्ठित हैं। प्रेमचन्द ने प्रारम्भ में उर्दू में साहित्य सृजन किया, बाद में हिन्दी में लेखन कार्य प्रारम्भ किया। शैली-उनकी भाषा-शैली सरस,प्रवाहमय तथा सरल है जिसे हिन्दू, मुसलमान शिक्षित, अशिक्षित भली प्रकार पढ़ तथा लिख सकते हैं। मुहावरों तथा कहावतों के प्रयोग से भाषा में चार चाँद लग गये हैं।

भाषा शैली का एक उदाहरण देखिए
“अँधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।”

“अनुराग स्फूर्ति का भण्डार है।”
साहित्य में स्थान प्रेमचन्द अपने युग के लोकप्रिय उपन्यासकार हैं। उनकी लोकप्रियता का कारण यह है कि उन्होंने जनसामान्य की आशा, आकांक्षाओं तथा यथार्थता का सजीव चित्रण किया है।
वे उपन्यास सम्राट के रूप में प्रसिद्ध हैं। ग्रामीण जीवन के कुशल शिल्पी हैं।

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उनके पथ का अनुसरण करते हुए समकालीन उपन्यासकार भी अपने उपन्यासों में आदर्श के सुनहरे चित्र उभारने लगे।

वास्तव में प्रेमचन्द एक उच्चकोटि के श्रेष्ठ साहित्यकार थे। उनकी कहानियाँ कला के चिरन्तन पृष्ठों पर इस कहानी सम्राट की अक्षय कीर्ति को अंकित कर रही हैं। उनकी मृत्यु पर कविन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था—“तुझे एक रत्न मिला था, वही तूने खो दिया।”

7. पं. रामनारायण उपाध्याय (2018)

जीवन परिचय-लोक संस्कृति पुरुष पण्डित रामनारायण उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले के कालमुखी नामक ग्राम में 20 मई,सन् 1918 को हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती दर्गा देवी तथा पिता का नाम श्री सिद्धनाथ उपाध्याय था। गाँव के किसान परिवेश में रचे बसे उपाध्याय जी के व्यक्तित्व में भावुकता,सहृदयता एवं कर्मठता के स्पष्ट दर्शन होते हैं। उपाध्याय जी के व्यक्तित्व में गाँव और गाँव की संस्कृति साकार हो उठी है। रामनारायण उपाध्याय ‘राष्ट्रभाषा परिषद, भोपाल’ तथा मध्य प्रदेश आदिवासी लोककला परिषद, भोपाल के संस्थापकों में से हैं। आप जीवनपर्यन्त कई संस्थाओं से जुड़कर कार्य करते रहे। 20 जून, सन् 2001 ई. को आप इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गए।

कृतियाँ-रामनारायण उपाध्याय अपने आंचलिक परिवेश में रम कर साहित्य सृजन करते हैं। इनकी रचनाओं में लोक कल्याण का भाव तथा प्राकृतिक सहजता का सर्वत्र समावेश रहा है ! उपाध्याय जी ने निमाडी लोक साहित्य का शोधपरक अध्ययन कर विस्तृत लेखन कार्य किया है। आपने निमाड़ी लोक साहित्य के विविध रूपों की खोज कर लोक साहित्य का संकलन किया है। इसके अतिरिक्त आपने व्यंग्य,ललित निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि की रचना की है।

भाषा-शैली–श्री रामनारायण उपाध्याय की भाषा एवं शैली में सुबोधता एवं सरसता का भाव सर्वत्र विद्यमान है।

भाषा-लोक भाषाओं के मर्मज्ञ पण्डित रामनारायण उपाध्याय की साहित्यिक भाषा शुद्ध खड़ी बोली है। आपकी भाषा भाव-विचार के अनुकूल परिवर्तित होती रहती है। भाषा में प्रवाह एवं प्रभावशीलता के गुण सर्वत्र विद्यमान हैं। आवश्यकता के अनुसार उर्दू, अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी आपने किया है। उक्तियों,मुहावरों का वे सटीक प्रयोग करते हैं। भाषा में बनावटीपन या क्लिष्टता नहीं मिलती है।

शैली-श्री रामनारायण उपाध्याय की शैली विविध रूपिणी है। प्रमुख शैली रूप इस प्रकार हैं

  1. व्यंग्यात्मक शैली-उपाध्याय जी ने व्यंग्य रचनाओं में इस शैली का प्रयोग किया है। विविध प्रकार के संदर्भो को इंगित करते हुए अपने करारे प्रहार करने में यह शैली सफल सिद्ध हुई है। आपकी अन्य रचनाओं में भी यत्र-तत्र यह शैली देखी जा सकती है।
  2. संस्मरण शैली-संस्मरण साहित्य के लेखन में इस शैली का प्रयोग पण्डित रामनारायण उपाध्याय करते हैं। आपकी यह शैली सहृदयता, भावात्मकता तथा सरसता से पूर्ण है। आपके संस्मरणों में आत्मीयता और सत्य का सुन्दर समन्वय हुआ है।
  3. वर्णनात्मक शैली-किसी वस्तु,व्यक्ति या घटना को प्रस्तुत करते समय उपाध्याय जी वर्णनात्मक शैली का प्रयोग करते हैं। इसमें सरल भाषा तथा छोटे-छोटे वाक्यों को अपनाया गया
  4. भावात्मक शैली–पण्डित रामनारायण उपाध्याय,सहृदय,सरल एवं सरस साहित्य के रचनाकार हैं। उनके लेखन में भावात्मक शैली का पर्याप्त प्रयोग हुआ है। ललित निबन्धों के साथ-साथ संस्मरण, रिपोर्ताज, रूपक आदि में इस शैली की प्रभावशीलता अवलोकनीय है।

इसके अतिरिक्त गवेषणात्मक विचारात्मक विवेचनात्मक आदि शैली रूपों का प्रयोग उपाध्याय जी ने किया है। उनके लेखन में सम्प्रेषण की अनूठी क्षमता है।

साहित्य में स्थान-सादा जीवन उच्च विचार की प्रतिमूर्ति रहे श्री रामनारायण उपाध्याय ने लोक जीवन तथा लोक संस्कृति के लिए जो कार्य किया है वह सराहनीय है। आप अन्वेषक के साथ नवीन विधाओं के रचनाकार के रूप में विशेष स्थान रखते हैं।

महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने लिखे हैं-
(i) निबन्ध
(ii) नाटक
(iii) उपन्यास
(iv) ऐतिहासिक घटनाक्रम।
उत्तर-
(i) निबन्ध

2. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने अध्यक्ष पद बड़ी निष्ठा और लगन से निभाया-
(i) हिन्दी विभाग का
(ii) भूगोल विभाग का
(iii) भारतीय पुरातत्त्व विभाग का
(iv) मनोविज्ञान विभाग का।
उत्तर-
(iii) भारतीय पुरातत्त्व विभाग का

3. हजारीप्रसाद द्विवेदी को अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए मिला
(i) भारत रत्न
(ii) साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं पद्म भूषण
(iii) ज्ञानपीठ पुरस्कार
(iv) भारत भूषण।
उत्तर-
(ii) साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं पद्म भूषण

4. रामवृक्ष बेनीपुरी के जीवन का महत्त्वपूर्ण समय जेल यात्राओं में बीता
(i) 1930 से 1942 तक
(ii) 1925 से 1928 तक
(ii) 1940 से 1943 तक
(iv) 1920 से 1925 तक।
उत्तर-
(i) 1930 से 1942 तक

5. व्यंग्यकार एवं कथाकार श्रीलाल शुक्ल की रचना है
(i) भारत की मौलिक एकता
(ii) अंगद का पाँव
(iii) कुटज
(iv) चिता के फूल।
उत्तर-
(ii) अंगद का पाँव

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6. पं. रामनारायण उपाध्याय का जन्म हुआ
(i) 27 नवम्बर,1929
(ii) 20 मई,1918
(iii)2 अगस्त,1919
(iv) 19 मार्च,1908।
उत्तर-
(ii) 20 मई,1918

7. सेठ गोविन्ददास का जन्म कहाँ हुआ ?
(i) जबलपुर
(ii) भोपाल
(iii) ग्वालियर
(iv) इन्दौर।
उत्तर-
(i) जबलपुर

8. हरिकृष्ण प्रेमी ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत किसके साथ की ?
(i) प्रेमचन्द
(i) मैथिलीशरण गुप्त
(iii) महादेवी वर्मा
(iv) माखनलाल चतुर्वेदी।
उत्तर-
(iv) माखनलाल चतुर्वेदी।

9. प्रेमचन्द का वास्तविक नाम था
(i) रासबिहारी
(ii) बाबूलाल
(iii) धनपतराय
(iv) अजायबराय।
उत्तर-
(iii) धनपतराय

10. सियारामशरण गुप्त के प्रेरणा स्रोत थे
(i) मैथिलीशरण गुप्त
(ii) जयशंकर प्रसाद
(iii) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(iv) माखनलाल चतुर्वेदी।
उत्तर-
(i) मैथिलीशरण गुप्त

रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. रामनारायण उपाध्याय का जन्म जिला खण्डवा के …………………… नामक ग्राम में हुआ था।
2. सेठ गोविन्ददास ने बारह वर्ष की अवस्था में तिलिस्मी उपन्यास …………………… की रचना की।
3. सियारामशरण गुप्त के कहानी संग्रह का नाम …………………… है।
4. सुप्रसिद्ध नाटककार हरिकृष्ण प्रेमी के पौराणिक नाटक का नाम है ……………………
5. श्रीलाल शुक्ल का जन्म लखनऊ के पास …………………… नामक ग्राम में हुआ।
6. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ …………………… लेखन में सिद्धहस्त थे।
7. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल भारतीय पुरातत्त्व विभाग के …………………… पद पर रहे।
8. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से …………………… की उच्च शिक्षा प्राप्त की।
9. रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म एक …………………… परिवार में हुआ था।
10. कहानी सम्राट …………………… को कहा जाता है। [2018]
उत्तर-
1. कालमुखी,
2. चम्पावती,
3. मानुषी,
4. पाताल विजय,
5. अतरौली,
6. रिपोर्ताज,
7. अध्यक्ष,
8. ज्योतिष एवं संस्कृत,
9. साधारण किसान,
10. मुंशी प्रेमचंद।

सत्य/असत्य

1. कन्हैयालाल मिश्र ने ‘त्यागभूमि’ में पत्रकार के रूप में अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत की।
2. हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक गाँव में हुआ।
3. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ इण्डोलॉजी में प्रोफेसर नियुक्त हुए।
4. सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण रामवृक्ष बेनीपुरी को स्कूली शिक्षा अधूरी रह गई।
5. श्रीलाल शुक्ल द्वारा लिखित ‘अज्ञातवास’ धारावाहिक दूरदर्शन पर बहुत लोकप्रिय हुआ।
6. पं. रामनारायण उपाध्याय ‘राष्ट्रभाषा परिषद-भोपाल’ के संस्थापक सदस्य रहे।
7. सेठ गोविन्ददास का जन्म एक निर्धन परिवार में हुआ था।
8. हरिकृष्ण प्रेमी एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे।
9. प्रेमचन्द ने ‘माधुरी’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन किया।
10. सियारामशरण गुप्त अपने अन्तिम दिनों में दिल्ली में रहे।
उत्तर-
1. असत्य,
2. असत्य,
3. सत्य,
4. सत्य,
5. असत्य,
6. सत्य,
7. असत्य,
8. असत्य,
9. सत्य,
10. सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

‘अ’ – ‘आ’
1. श्रीलाल शुक्ल की रचना – (क) कुंकुम-कलश
2. पण्डित रामशरण उपाध्याय द्वारा लिखित रचना – (ख) रक्षाबन्धन
3. सेठ गोविन्ददास द्वारा लिखित नाटक – (ग) प्रेम की वेदी
4. हरिकृष्ण प्रेमी का नाटक – (घ) सीमाएँ टूटती हैं
5. प्रेमचन्द द्वारा लिखित नाटक – (ङ) कर्त्तव्य
उत्तर-
1. →(घ),
2. → (क),
3. → (ङ),
4. → (ख),
5. → (ग)।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

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1. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ किस नेता के भाषण से प्रभावित होकर स्वतन्त्रता आन्दोलन ___में कूद पड़े ?
2. सियारामशरण गुप्त के बड़े भाई कौन थे ?
3. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म किस सन् में हुआ ?।
4. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के पिता का क्या नाम था ?
5. रामवृक्ष बेनीपुरी ने ‘विशारद’ की परीक्षा कहाँ से उत्तीर्ण की ?
6. श्रीलाल शुक्ल सन् 1950 में कौन-सी सरकारी सेवा के लिए चुने गये ?
7. रामनारायण उपाध्याय ने अपनी पत्नी शकुन्तला देवी की स्मृति में किस न्यास की स्थापना की ?
8. सेठ गोविन्ददास ने सन् 1919 में कौन-सा नाटक लिखा ?
9. हरिकृष्ण प्रेमी की प्रथम रचना कौन-सी है ?।
10. प्रेमचन्द द्वारा लिखित एक उपन्यास का नाम लिखिए।
उत्तर-
1. मौलाना आसिफ अली,
2. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त,
3. सन् 1904 में,
4. अनमोल दुबे,
5. हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयोग,
6. भारतीय प्रशासनिक सेवा,
7. लोक-संस्कृति,
8. विश्वप्रेम,
9. स्वर्ण विधान,
10. निर्मला।

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