MP Board Class 8th Special Hindi अपठित गद्यांश(Apathit Gadyansh)

निम्नलिखित अपठित गद्यांश को पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(1) “मेरे स्वराज्य का ध्येय अपनी सभ्यता को अक्षुण्य बनाए रखना है। मैं बहुत-सी नई बातों को लेना चाहता हूँ, पर उन सबको भारतीयता का जामा पहनाना होगा। भारत ने पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त कर ली है। ऐसा तभी कहा जा सकेगा, जब जनता यह अनुभव करने लगेगी कि उसे अपनी उन्नति करने तथा रास्ते पर चलने की आजादी है।”

प्रश्न-
(i) पंक्तियों का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ii) स्वराज्य का ध्येय क्या है?
(iii) ‘पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त कर ली है’, ऐसा कब कहा जा सकेगा?
उत्तर-
(i) स्वराज्य का ध्येय’ उपयुक्त शीर्षक है।
(ii) स्वराज्य का ध्येय है कि हम अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति को निरन्तर बनाए रखें। हम अपनी सभ्यता और संस्कृति में बाहर की बहुत-सी बातों को ग्रहण कर लेना तो चाहते हैं परन्तु उन्हें भारतीयता में बदलकर।
(iii) भारतवर्ष एक स्वतन्त्र देश है। ‘इसने पूर्ण आजादी प्राप्त कर ली है।’ ऐसा तो तभी कहा जा सकेगा जब हम अपनी उन्नति करने में भी आजाद हों। साथ ही, हमें उन उपायों की भी जानकारी होनी चाहिए, जिन पर चलकर हम उन्नति कर सकें और अपनी आजादी की रक्षा कर सकें।

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(2) राष्ट्रीय एकता के अर्थ की विशदता उसकी। गम्भीरता को समझने के लिए सम्पूर्ण भारत की आर्थिक,। सामाजिक, राजनैतिक एवं वैचारिक समानता और एकता की भावभूमि को समझना होगा। हमारे विश्वास, पूजा-पाठ की विधियाँ, खान-पान, रहन-सहन तथा वेशभूषा में अन्तर हो सकता है लेकिन भारतवर्ष की राष्ट्रीय एवं प्रभुसत्ता। सम्बन्धी स्तर पर प्रत्येक नागरिक के एकमत होने की बात। महत्त्व रखती है। यही तो वह हस्ती है जो पराधीनता में भी स्वाधीनता की ज्वाला धधकती रही। प्रत्येक भारतीय के। हृदय में आज स्वाधीन भारत के एकत्व का आधार उसकी अनेकता की शिला है जिसकी गहरी नींव पड़ी है।

प्रश्न-
(i) पंक्तियों का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ii) राष्ट्रीय एकता के लिए किसका समझना जरूरी
(iii) ‘स्वाधीन भारत के एकत्व का आधार’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) उपयुक्त शीर्षक है ‘राष्ट्रीय एकता’।
(ii) राष्ट्रीय एकता के लिए सम्पूर्ण भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं वैचारिक समानता एवं एकता की भावभूमि को समझना जरूरी है।
(iii) स्वाधीन भारत के एकत्व का आधार उसकी अनेकता की शिला है जिसकी गहरी नींव पड़ी हुई है। यहाँ के नागरिक वेशभूषा में अन्तर कर सकते हैं लेकिन वे भारत की एकता और प्रभुसत्ता के स्तर पर एकमत ही रहते हैं।

(3) किसी भी समाज की प्रगति का मापदण्ड उस समाज द्वारा दी गई स्त्रियों की पद-मर्यादा है, क्योंकि स्त्रियाँ प्रत्येक सामाजिक संगठन का आधार और संस्कृति की स्त्रोत मानी जाती हैं। इसलिए कहा जाता है कि नारी शक्ति का अपार भण्डार है। नारी के वास्तविक महत्त्व को पारिवारिक सन्दर्भ में समझा जा सकता है-नारी परिवार की नींव है, परिवार समुदाय की नींव है और समुदाय राष्ट्र की। यह आज की ही सच्चाई नहीं है, यह तो आदिकालीन सच्चाई है, क्योंकि प्रसिद्ध विद्वान रायडन ने कहा था-स्त्रियों ने ही प्रथम सभ्यता की नींव डाली और उन्होंने ही जंगलों में मारे-मारे, भटकते-फिरते पुरुषों का हाथ पकड़कर उन्हें स्थिर जीवन दिया और ‘घर’ में बसाया।

प्रश्न-
(i) पंक्तियों का उपयुक्त शीर्षक दीजिए। .
(ii) नारी के महत्त्व को किस सन्दर्भ में समझा जा सकता है?
(ii) प्रसिद्ध विद्वान रायडन के कथन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
(i) स्त्रियों की पद-मर्यादा’ उपयुक्त शीर्षक है।
(ii) नारी के महत्त्व को पारिवारिक सन्दर्भ में समझा जा सकता है, परिवार समुदाय की नींव है और समुदाय राष्ट्र की।
(iii) प्रसिद्ध विद्वान रायडन का कथन है-“स्त्रियों ने ही प्रथम सभ्यता की नींव डाली और उन्होंने ही जंगलों में मारे-मारे, भटकते-फिरते पुरुषों का हाथ पकड़कर उन्हें स्थिर जीवन दिया और ‘घर’ में बसाया।”

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(4) भारतीय जनता का अधिकांश भाग गाँवों में बसता है। उनका मुख्य उद्योग कृषि है और कृषि कार्य भारतीय जीवन में और भारतीय संस्कृति में सर्वोपरि, महत्त्वपूर्ण और श्रेष्ठ कहा गया है। कृषि कार्य को आध्यात्म और समन्वित श्रेष्ठ स्वरूप में उपस्थित किया गया है, परन्तु आज के वैज्ञानिक युग में कृषि कर्म के महत्त्व को गिरा दिया है और नौकरी को प्राथमिकता दी जा रही है लेकिन अत्यन्त दुःख की बात तो यह है कि कृषक स्वयं ही अपने कर्म को निकृष्ट और निम्नकोटि का मानने लगा है।

प्रश्न-
(i) पंक्तियों का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ii) कृषि कार्य के सन्दर्भ में क्या कहा गया है?
(iii) कृषि कर्म के प्रति कृषक की क्या सोच है?
उत्तर-
(i) इन पंक्तियों का उपयुक्त शीर्षक है-‘मुख्य उद्योग कृषि’।
(ii) कृषि कार्य के सन्दर्भ में कहा गया है कि भारतीय जीवन में तथा भारतीय संस्कृति में कृषि कार्य सर्वोपरि है और महत्त्वपूर्ण है। कृषि कार्य अध्यात्म और श्रम से संयुक्त होने से श्रेष्ठ है।
(iii) आज विज्ञान का युग है। किसान ने ही कृषि कर्म के महत्व को बहुत गिरा दिया है। उसने नौकरी को प्राथमिकता दी है। यह निन्दनीय भी है कि किसान ने ही अपने कर्म को निकृष्ट और पतित बना दिया है।

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