MP Board Class 6th Hindi Bhasha Bharti Solutions महत्त्वपूर्ण पाठों के सारांश

कटक वचन मत बोल

प्रस्तुत पाठ रामेश्वर दयाल दुबे की रचना है। इस पाठ में लेखक ने स्पष्ट किया है कि वाणी अति महत्वपूर्ण है। संसार में वाणी का वरदान केवल मनुष्य को ही प्राप्त है। अतः उसे सदैव विनम्र और मृदुभाषी होना चाहिए। विनम्र व्यक्ति सदैव लम्बी आयु प्राप्त करता है। कटु वचन लोगों को चुभ जाते हैं। श्रोताओं पर कटु वचनों का प्रभाव ऐसा होता है कि इससे बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते हैं।

यद्यपि सत्य आचरण और सत्य कथन दोनों का पालन करना भी कठिन होता है परन्तु दोनों के पालन में मनुष्य को अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखना चाहिए। विनम्रतापूर्वक कटु सत्य को भी लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। उससे दूसरे को ठेस भी नहीं लगती है और सत्य बात भी कह दी जाती है। इसे ही वाणी की चतुराई कहते हैं। इससे ही मनुष्य का व्यक्तित्व निखरकर प्रभावशाली हो जाता है।

लेखक ने अनेक उदाहरण देकर यही तथ्य सामने रखा है कि जीभ में कोमलता है, अतः हमें कोमल और मृदुभाषी होना चाहिए। वाणी के प्रयोग से ही अनेक युद्ध हुए हैं। महाभारत युद्ध वाणी के दुरुपयोग का ही नतीजा था। मीठा वचन औषधि के समान लाभकारी होता है और कटु वचन वाण सदृश जो हृदय को चीर देता है। मृदु वचन अमृत समान प्रभावशाली होता है। वाणी की चतुराई से कटु सत्य को प्रिय और मधुर बनाया जा सकता है। अतः हमें अपने व्यक्तित्व को लोकप्रिय बनाना है, तो हमें मृदुभाषी होना पड़ेगा।

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हार की जीत

प्रस्तुत कहानी ‘हार की जीत’ में सुदर्शन जी ने इस तथ्य को सभी के सामने उजागर कर दिया है कि मनुष्य अपने श्रेष्ठ विचारों और सद्व्यवहार से बड़े से बड़े दुर्दान्त डाकुओं और क्रूर हृदय वाले व्यक्तियों के हृदय को भी परिवर्तित कर सकता है। इस कहानी के पुरुष पात्र दो हैं-एक बाबा भारती और दूसरा डाकू खड्गसिंह। बाबा भारती के पास अमूल्य सम्पत्ति है उनका घोड़ा सुलतान । बाबा भारती अपने घोड़े से बहुत प्यार करते हैं। वह घोड़ा बाबा भारती का परिवारी सदस्य है।

उसी क्षेत्र में डाकू खड्गसिंह रहता है। उसके नाम से सभी काँपते हैं। उसने बाबा भारती के घोड़े की विशेषताओं को सुना। वह आता है, घोड़े को देखकर वह बाबा भारती से कहता है कि मैं इस घोड़े को तुम्हारे पास नहीं रहने दूँगा। बाबा भारती घोड़े की रखवाली के लिए रात-दिन चिन्तित रहने लगे। एक दिन कंगले अपाहित का वेश धारण करके खड्गसिंह ने घोड़े को बाबा भारती से छीन लिया। बाबा भारती ने सोचा कि यदि घोड़े की इस चोरी का लोगों को पता चलेगा कि डाकू खड्गसिंह ने अपाहिज के वेश में बाबा को ठगकर घोड़ा छीन लिया है, तो गरीबों का आगे से कोई विश्वास नहीं करेगा। इसलिए बाबा भारती ने खड्ग सिंह डाकू को आवाज लगाते हुए कहा कि तू मेरी एक विनती सुनं ले कि इस घटना को किसी के सामने मत कहना, नहीं तो लोग गरीबों और अपाहिजों का विश्वास नहीं करेंगे।

बाबा भारती ने घोड़े की ओर से अपनी आँखें फिरा ली और अपनी कुटिया की ओर चल दिए। घोड़े की ओर आसक्ति नाम मात्र भी नहीं रह गई। परन्तु बाबा भारती के वचनों कि ‘गरीबों और अपाहिजों का कोई विश्वास नहीं करेगा,’ की गूंज डाकू खड्गसिंह के कानों में बार-बार उठ रही थी। अन्ततः डाकू खड्गसिंह का हृदय परिवर्तित हुआ। वह बाबा भारती के घोड़े सुलतान को अस्तबल में चुपचाप बाँध कर चला गया। इस कहानी का मूल सन्देश यह है कि मनुष्य का सद्व्यवहार और अच्छे विचार कठोर हृदय निर्दयी लोगों तक के हृदय को बदल देते हैं।

हम बीमार ही क्यों हों ?

प्रस्तुत पाठ ‘हम बीमार ही क्यों हों ?’ में डॉ. आनन्द ने बड़ी तथ्यपरक परक बात बहुत सरल रूप में हमें समझाई है कि हम लोग ऐसा आचरण अपनाएँ जिससे हम कभी बीमार न हों और सदैव स्वस्थ बने रहें। किसी भी बीमारी का उपचार कराने से तो यही अच्छा है कि हम बीमार ही न पड़ें। लेखक ने अपना स्वास्थ्य सामान्य बनाए रखने के लिए नियम बताए हैं, उन नियमों का पालन करते रहने से मनुष्य सदैव स्वस्थ बना रह सकता है क्योंकि बीमारी का निदान कराने की बजाए बीमार न पड़ना ही बुद्धिमानी है।

हमारा शरीर-पाँच तत्वों के योग से निर्मित है।

वे तत्व हैं-

  1. पृथ्वी,
  2. जल,
  3. अग्नि,
  4. गगन (आकाश),
  5. समीर (वायु)।

इन तत्वों में से कोई भी एक या दो तत्व यदि हमारे शरीर में कम हो जाते हैं, तो हम बीमार हो जाते हैं। आरोग्य लाभ के लिए इन सभी तत्वों का उपयोग बुद्धिमानी से करना चाहिए।

इन पाँच तत्वों को सदा से स्वच्छ बनाए रखने का प्रयास किया जाता रहा है। स्वच्छ निर्मल आकाश में सांस लेने से और पवित्र जल से प्राण शक्ति मिलती है। सूर्य का प्रकाश हमें गर्मी देकर हमारे अन्दर विटामिनों को संरक्षित करता है। धरती से हमें अन्न, फल और पेय पदार्थ मिलते हैं जिनसे हमें स्वास्थ्य, बल और तेज की प्राप्ति होती है।

वन-उपवनों की रक्षा करनी है। अणुबमों के परीक्षणों से इन पाँचों तत्वों को सुरक्षित बचाने का प्रयास करना चाहिए। रासायनिक खादों का उपयोग सीमित करना होगा। आकाश तत्व आरोग्य-सम्राट है। साफ-सुथरे स्थान पर टहलना चाहिए। सूर्य नमस्कार से शरीर में लाल रक्तकण उत्पन्न होते हैं। इससे हमारी जीवनी शक्ति बढ़ती है। जल हमारे रक्त में सत्तर प्रतिशत होता है। हम थलचरों को पृथ्वी को विशुद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिए। भोजन में आहार संतुलित होना चाहिए। अत: इस भौतिक शरीर को भौतिक तत्वों के आधार पर ही स्वस्थ रखा जा सकता है।

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डॉ. होमी जहाँगीर भाभा

आजकल विश्व के सर्वाधिक देशों में अणु शक्ति का प्रयोग बहुत अधिक किया जा रहा है। हमारे देश में अणु शक्ति का विकास पर्याप्त रूप से किया जा रहा है। अणुशक्ति का विकास करने वाले सबसे पहले भारतीय वैज्ञानिक का नाम है-डॉ. होमी जहाँगीर भाभा।

इनका जन्म 30 अक्टूबर, सन् 1909 ई. में सुशिक्षित एवं सम्पन्न पारसी परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री जे. एस भाभा मुम्बई के प्रसिद्ध बैरिस्टर थे। होमी जहाँगीर बचपन से कुशाग्र बुद्धि थे। उन्हें बचपन में नींद नहीं आती थी। वे रोते रहते थे, अतः डॉक्टरों की सलाह से उन्हें ग्रामोफोन पर संगीत सुनाया गया। वे चुप होकर सुनने लगे और संगीत की ओर उनका झुकाव हो गया।

बालक होमी ने 15 वर्ष की आयु में सीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा उत्तीर्ण की। मुम्बई विश्वविद्यालय से ई. एम. सी. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इंग्लैण्ड जाकर उन्होंने इंजीनियरिंग की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें गणित और भौतिक विज्ञान के प्रति बहुत झुकाव था। उन्होंने विद्युत एवं चुम्बक के अतिरिक्त कॉस्मिक किरण की मौलिक खोजों पर भाषण दिया। सन् 1941 में पी-एच. डी. की उपाधि मिली। भारत आकर बंगलुरू में भारतीय विज्ञान संस्थान में रीडर नियुक्त हुए। कॉस्मिक किरणों पर खोज करने के कारण लंदन की रॉयल सोसायटी का इन्हें फैलो चुना गया। इन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों से डी. एस-सी. की उपाधि मिली।

सन् 1951 ई. में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। सन् 1954 ई. में इन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण की पदवी से अलंकृत किया। उसी वर्ष अणु शक्ति निर्माणकारी अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस के जिनेवा में अध्यक्ष चुने गए। वे अणु शक्ति से अणुबम बनाना नहीं चाहते थे। शान्तिपूर्ण रचनात्मक कार्यों के लिए इसका प्रयोग करना चाहते थे। इसलिए इनके अनुरोध से मुम्बई के दौराबजी टाटा ट्रस्ट द्वारा ‘टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फण्डामेंटल रिसर्च’ संस्था की स्थापना की गयी। वे इस संस्था के डाइरेक्टर बनकर बंगलुरू से मुम्बई आ गये।

डॉ. भाभा अणुशक्ति कमीशन के अध्यक्ष रहे। ट्रॉम्बे का अणु शक्ति केन्द्र उनकी महान् कृति है। डॉ. भाभा को संगीत, नृत्य और चित्रकला में भी रुचि थी। उनका जीवन सादा, सरल और उदार था। 24 जनवरी, 1966 ई. में डॉ. भाभा जिनेवा की यात्रा पर थे। भारतीय विमान सेवा की ‘कंचनजंघा’ नामक जेट विमान जिनेवा के पास बहुत ऊँचे पहाड़ माउण्ट ब्लॉक’ से टकरा गया। उस दुर्घटना में डॉ. भाभा की मृत्यु हो गई।

नारियल का बगीचा-केरल

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्ताँ हमारा” के अनुसार भारत की प्राकृतिक सौन्दर्य-सम्पदा सर्वोपरि है। चारों ओर नारियल ही नारियल के वृक्ष खड़े देख कर केरल को नारियल का बगीचा कहा जा सकता है। केरल की सीमाएँ-पश्चिम में अरब सागर तक हैं। उसकी पूरी पट्टी पर नरियल के कुंज ही दीख पड़ते हैं। यह भाग नारियल के विशाल बगीचे सदृश लगता है। नारियल का वृक्ष वहाँ पर कल्पवृक्ष कहलाता है। इससे अमृत समान मीठा पानी मिलता है। गिरी का साग-सब्जी और चटनी में प्रयोग किया जाता है। गोले का तेल निकाला जाता है जिसका साबुन बनाने और शरीर में मालिश के लिए प्रयोग करते हैं। नारियल से रस्सी, मोटे रस्से, चटाई, कूँची, पायदान बनते हैं। इसके बड़े छिलके से कटोरे, प्याले तथा चमचे बनाए जाते हैं। इसकी लकड़ी से मकान और पत्तों से छत बनाते हैं।

केरल में 400 से 500 सेंटीमीटर तक वर्षा होती है। पर्वतीय क्षेत्र जंगलों से ढका हुआ है। वनों में सागौन, शीशम, रबर और चन्दन के वृक्ष होते हैं। इन वृक्षों के आधार पर कई उद्योग-धन्धे जन्म लेते हैं। पहाड़ीनुमा जमीन होने के कारण रेलें बहुत कम होती है। सड़कें अच्छी हैं।

यहाँ के लोगों का खान-पान भी स्वास्थ्यवर्द्धक है। चावल मुख्य भोजन है। रसम्, सांभर, इडली और डोसा यहाँ के प्रिय खाद्य पदार्थ हैं। केरल के लोग लुंगी पहनते हैं। उनके कपड़े ढीले- ढाले होते हैं। स्त्रियाँ धोती और ब्लाउज पहनती हैं। कपड़े प्रायः सफेद होते हैं।

यहाँ का मुख्य त्यौहार ओणम है। नौकाओं की प्रतियोगिता प्रसिद्ध है। ओणम के त्यौहार पर लक्ष्मी और नौका की पूजा होती है। यहाँ लोग संगीत और नृत्य के बड़े शौकीन होते हैं। ‘कथकली’ यहाँ की प्रसिद्ध नृत्यकला है। अनेक कथाओं को नृत्य में ढाल कर ‘कथकली’ नृत्य विकसित किया गया है। यहाँ के लोग कॉफी पीने के शौकीन होते हैं।

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दस्तक

लेखक डॉ. शिवभूषण त्रिपाठी ने अपनी ‘दस्तक’ शीर्षक कहानी के माध्यम से यह सन्देश दिया है कि मनुष्यों में परस्पर सहयोग, सहानुभूति एवं सद्भाव रखना बहुत ही अनिवार्य है। इन भावों से मनुष्य एक-दूसरे की मदद करने और सह-भाव रखने से एक-दूसरे के प्रति अपने मनुष्य होने की अवस्था का ज्ञान करा देता है।

लेखक सदैव ही समाज सेवा के लिए तत्पर रहता है। वह अपने अधिकांश समय को पीड़ितों और जरूरतमंदों की सेवा में बिताया करता है। इस तरह की उसकी आदत को लेखक की पत्नी पसन्द नहीं करती है। एक बार ऐसा होता है कि लेखक अपने अन्य मित्र के किसी काम से अपने शहर के बाहर चला जाता है। वहाँ वह कई दिन रहता है। इधर लेखक का पुत्र तीन मंजिल के मकान की छत से गिर कर बेहोश हो जाता है। उसके गिरने की सूचना कानों-कान सुनकर मुहल्ले और आस-पास के लोगों को मिलती है, तो वे अपना काम-धाम छोड़ लेखक के पुत्र सोनू को अस्पताल ले जाते हैं और इसके इलाज पर होने वाले खर्चे को भी वे आपस में मिलकर पूरा कर लेते हैं।

लेखक की पत्नी भी इस सूचना से आहत है। वह भी अस्पताल पहुँचती है लेकिन सोनू की चोट की सहानुभूति में इकट्ठ लोगों की भीड़ देखकर लेखक की पत्नी भी बेहोश हो जाती है। उसे पता नहीं कि यहाँ क्या हो रहा है ? होश में आने पर पता चला कि वे सभी उसके पुत्र और उनके परिवार की सहायता के लिए इकटे हुए हैं। वह दंग रह जाती है।

उधर लेखक भी दूसरे शहर में एक बालक के पैर में आई हुई चोट के लिए उसकी सहायता करता है। घर आने पर सोनू के गिरने की दुर्घटना को सुनकर वह भी आश्चर्य करता है। परन्तु लेखक की पत्नी के हृदय का परिवर्तन हो चुका है। वह अब मानती है कि भलाई का नतीजा भलाई में ही मिलता है। सोनू स्वस्थ हो जाता है। उस दिन से लेखक की पत्नी भी शहर के प्रत्येक मुहल्ले में समाज सेवा और सहायता केन्द्र चलाना प्रारम्भ कर देती है।

श्रम की महिमा

संसार में वे ही व्यक्ति असफलताओं से घिरे हुए रहते हैं जो कार्य को प्रारम्भ करने से पहले उसके विषय में अच्छी तरह सोच-विचार नहीं करते और कार्य को बिना विचारे कर डालते हैं। दूसरे वे व्यक्ति जो कार्य के विषय में सिर्फ सोचते रहते हैं। उसे क्रिया रूप में परिणत नहीं करते। सोचकर न करना और बिना विचार और सोच के कार्य कर बैठना हमारी असफलता का मुख्य कारण है। जीवन में सफलता उन्हें ही मिलती है जो सदैव सोच-विचार कर उसके करने का प्रतिफल क्या होगा, इसे भी विचार करके जो कार्य करते हैं, वे सफल होते हैं।

गाँधीजी ने सफलता का मंत्र यही बताया कि सोच-विचार कर किया गया कार्य सफलता दिलाता है। खुशी मिलती है। गाँधीजी आत्मनिर्भर थे। वे सेवा करने को कोई ईश्वर मानते थे। इसका कारण भी गाँधीजी ने बताया कि सेवाधारी का मन निर्मल होता है। स्वभाव में मिठास और अपनापन होता है। गाँधीजी अपने आश्रम के प्रत्येक कार्य को स्वंय करते थे। चक्की घिसते थे, अनाज में से कंकड़ चुनते थे। वे रुई धुनते थे, सूत कातते थे, वस्त्र बुनते थे। आश्रम के प्रत्येक कार्य को करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। सेवा करने से ही मेवा मिलती है। यह श्रम ही ईश्वर है। दीन हीन की सेवा करने से ईश्वर प्रसन्न होता है। सेवा धर्म कठिन अवश्य है, परन्तु शुभ फलदायक और कल्याणकारी होता है।

गाँधीजी के अनुसार कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। सभी कामों के करने में, दूसरों को अपनी सेवा अर्पित करने में कोई झिझक नहीं होना चाहिए।

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