MP Board Class 6th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 21 मेरी माँ

MP Board Class 6th Hindi Bhasha Bharti Chapter 21 पाठ का अभ्यास

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर लिखिए

(क) बिस्मिल के गुरु का नाम था
(i) मेजिनी
(ii) गोविन्दसिंह
(iii) महादेव
(iv) सोमदेव
उत्तर
(iv) सोमदेव

(ख) महान से महान संकट में भी तुमने मुझे नहीं होने दिया
(i) निराश
(ii) परेशान
(iii) अधीर
(iv) विचलित।
उत्तर
(iii) अधीर

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

(क) घर का सब काम कर चुकने के बाद जो समय मिलता उसमें …………….. करती।
(ख) जब मैंने ……………. में प्रवेश किया, तब से माताजी से खूब वार्तालाप होता।
(ग) जन्म-जन्मान्तर परमात्मा ऐसी ही ……………दे।
(घ) गुरु गोविन्दसिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु की खबर सुनी तो ………… हुई थीं।
(ङ) माताजी ……………….”पा चुकने के बाद ही विवाह को उचित मानती थीं।
उत्तर
(क) पढ़ना-लिखना
(ख) आर्यसमाज
(ग) माता
(घ) बहुत प्रसन्न
(ङ) शिक्षा।

प्रश्न 3.
एक या दो वाक्यों में उत्तर लिखिए

(क) बिस्मिल का सेवा समिति में सहयोग देना किसे पसन्द नहीं था ?
उत्तर
शाहजहाँपुर में हाल ही में सेवा समिति प्रारम्भ हुई थी। बिस्मिल बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देते थे, किन्तु उनके पिताजी और उनकी दादीजी को बिस्मिल का सेवा समिति में सहयोग देना बिल्कुल पसन्द नहीं था।

(ख) रामप्रसाद बिस्मिल’ में जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह किसकी कृपा का फल था ?
उत्तर
रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ में जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह उनकी माताजी एवं गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपा का फल था।

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(ग) बिस्मिल की माताजी ने गृहकार्य की शिक्षा किससे प्राप्त की?
उत्तर
मात्र ग्यारह वर्ष की अल्पायु में बिस्मिल की माताजी का विवाह हो गया था। तब वह नितान्त अशिक्षित एवं ग्रामीण कन्या थीं। ऐसे में दादीजी ने अपनी छोटी बहन को शाहजहाँपुर बुला लिया था। उन्हीं ने माताजी को गृहकार्य आदि की शिक्षा प्रदान की थी।

(घ) बिस्मिल की बहनों को छोटी आयु में शिक्षा कौन दिया करता था ?
उत्तर
बिस्मिल की बहनों को छोटी आयु में उनकी माताजी ही शिक्षा दिया करती थीं।

(ङ) शिक्षादि के अतिरिक्त माताजी ने कहाँ बिस्मिल की सहायता की?
उत्तर
बिस्मिल की माताजी उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती रहती थीं। शिक्षादि के अतिरिक्त वे बिस्मिल को देश सेवा हेतु विभिन्न सम्मेलनों में भाग लेने में उनकी सहायता करती थीं। वे संकटों में भी बिस्मिल को अधीर नहीं होने देती थीं।

प्रश्न 4.
तीन से पाँच वाक्यों में उत्तर लिखिए

(क) बिस्मिल ने वकालतनामे पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए ?
उत्तर
एक बार बिस्मिल के पिताजी दीवानी मुकदमे में वकील से कह गए कि जो काम हो वह उनकी अनुपस्थिति में बिस्मिल से करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने बिस्मिल को बुलवाकर उनसे वकालतनामे पर अपने पिताजी के हस्ताक्षर करने को कहा। बिस्मिल ने यह कहते हुए कि वकालतनामे पर पिताजी के हस्ताक्षर करने से मना कर दिया कि यह तो धर्म के विरुद्ध होगा। सदैव सत्य के मार्ग पर चलने वाले बिस्मिल ने वकील साहब के यह समझाने पर भी हस्ताक्षर नहीं किये कि हस्ताक्षर न करने पर मुकदमा खारिज हो जायेगा।

(ख) बिस्मिल की माताजी का सबसे बड़ा आदेश क्या था ?
उत्तर
बिस्मिल के जीवन और चरित्र-निर्माण में उनकी माताजी का बहुत बड़ा योगदान था। उनकी माताजी का उनके लिए सबसे बड़ा आदेश यह था कि उनके द्वारा किसी के भी प्राणों की हानि न हो। उनका कहना था कि वह कभी अपने शत्रु को भी प्राणदण्ड न दे। माताजी के इस आदेश के पालनार्थ कई बार बिस्मिल को मजबूरी में अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी थी।

(ग) बिस्मिल की एकमात्र इच्छा क्या थी ? उन्हें यह इच्छा क्यों पूरी होती दिखाई नहीं दे रही थी?
उत्तर
इस संसार में बिस्मिल की किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं थी। उनकी एकमात्र इच्छा बस यह थी कि वह एक बार श्रद्धापूर्वक अपने माताजी के चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना सकते। किन्तु उनकी यह इच्छा उन्हें पूरी होती दिखाई नहीं दे रही थी क्योंकि काकोरी कांड में उनके साथियों के साथ उन्हें भी फाँसी की सजा सुनाई गई थी जिसके चलते माताजी की सेवा करने की उनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती थी।

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(घ) गुरु गोविन्दसिंह की पत्नी ने अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई क्यों बाँटी?
उत्तर
देशहित के लिए जब गुरु गोविन्दसिंह के पुत्रों को जीवित दीवार में चिनवा दिया गया तब इस स्तब्धकारी घटना की सूचना पाकर भी उनकी पत्नी तनिक भी विचलित नहीं हुई बल्कि अपने पुत्रों की खबर सुनकर वह प्रसन्न हुई और गुरु के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर उन्होंने मिठाई बाँटी।

(क) बिस्मिल ने अन्तिम समय में अपनी माँ से क्या वर माँगा?
उत्तर
बिस्मिल ने अन्तिम समय में अपनी माँ से यह वर माँगा कि वह उन्हें आशीष दें कि मृत्यु को निकट देखकर भी उनका हृदय विचलित न हो। वह यह भी चाहते थे कि वह अन्तिम समय में अपनी माँ के चरण-कमलों को प्रणाम कर व परमात्मा को स्मरण करते हुए मातृभूमि की रक्षार्थ अपने प्राण त्याग सकें।

प्रश्न 5.
सोचिए और बताइए

(क) यदि बिस्मिल का दादीजी और पिताजी की इच्छानुसार विवाह कर दिया गया होता तो क्या होता?
उत्तर
देश के स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की दादीजी और पिताजी को उनका इस प्रकार क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लेना पसन्द न था। वे नहीं चाहते थे कि उनका लाड़ला सामान्य जीवन जीने के स्थान पर अंग्रेजों का विरोध करे। वे चाहते थे कि समय पर बिस्मिल का विवाह कर दिया जाये ताकि वह अपने परिवार की जिम्मेदारियों को महत्व दे। यदि बिस्मिल की दादीजी और पिताजी की इच्छानुसार उनका विवाह कर दिया जाता तो वह भी एक सामान्य गृहस्थ की तरह अपने घर-परिवार में उलझ कर रह जाते।

परिणाम यह होता कि उन्हें देश सेवा करने का अवसर तक प्राप्त नहीं होता। साथ ही, माँ भारती को अपने एक ऐसे यशस्वी पुत्र के साहसिक कारनामों के लाभ से वंचित होना पड़ता जिन्हें देख-सुनकर अंग्रेजी सरकार कॉपा करती थी। विवाह होने पर बिस्मिल चाहकर भी माँ भारती को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति नहीं दिला पाते और न ही अपने लिए वह ख्याति अर्जित कर पाते जो उन्हें एक सच्चे देशभक्त के रूप में सम्मान प्राप्त है।

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(ख) यदि बिस्मिल के प्रति माताजी का व्यवहार भी पिताजी की तरह कठोर होता तो वे क्या बन सकते थे ?
उत्तर
यदि बिस्मिल के प्रति उनकी माताजी का व्यवहार भी पिताजी की तरह कठोर होता तो वे साहसी एवं दृढ़ संकल्पवान कभी नहीं बन सकते थे। साथ ही, उनके व्यक्तित्व में वीरता, शौर्य, पराक्रम, दूरदर्शिता, देशप्रेम, सत्य, दया, करुणा और ओज जैसे श्रेष्ठ मानवीय गुण भी विकसित नहीं हो पाते। यह सम्भव था कि पिताजी की इच्छानुसार विवाह करके वह एक श्रेष्ठ गृहस्थ बन पाते अथवा उनके मार्गदर्शन में बहुत बड़े व्यापारी बनकर अपार धन अर्जित कर पाते किन्तु एक महान देशभक्त और स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में जो अमरत्व उन्हें प्राप्त हुआ उसे वे कभी भी प्राप्त नहीं कर पाते।

प्रश्न 6.
अनुमान और कल्पना कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए

(क) अपने गाँव को पर्यावरण की सुरक्षा और प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए आप क्या करेंगे?
उत्तर
अपने गाँव को पर्यावरण की सुरक्षा और प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए मैं निम्नलिखित उपाय करूँगा

  • सभी गाँव वालों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करूंगा।
  • हरे-भरे पेड़ों के काटने पर प्रतिबन्ध लगवाऊँगा।
  • साथी बच्चों के सहयोग से एक दल बनाकर जगह-जगह नये पौधे लगाऊँगा तथा उनके पेड़ बनने तक उनकी देखभाल करूँगा
  • जल के सभी उपलब्ध स्रोतों को साफ रखने के लिए उनके आस-पास जानवरों को नहलाने, कपड़े धोने, गन्दगी फैलाने, कूड़ा-करकट डालने पर रोक का आग्रह करूंगा।
  • पॉलीथीन के प्रयोग को पूर्णत: प्रतिबन्धित करूंगा।

(ख) यदि आपको विद्यालय के छात्र संघ का अध्यक्ष बना दिया जाए तो आप विद्यालय में क्या-क्या सुधार लाना चाहेंगे?
उत्तर
यदि मुझे विद्यालय के छात्र संघ का अध्यक्ष बनने का अवसर मिले तो मैं सर्वप्रथम विद्यालय में उच्च एवं अनुकूल शैक्षिक वातावरण बनाना चाहूँगा। इसके अतिरिक्त मेरा जोर नियमित पूरी कक्षा लगवाने, विद्यार्थियों द्वारा पूर्ण गणवेश में विद्यालय आने, सभी कालांशों में उपस्थित होने, उनकी जायज समस्याओं का निदान ढूँढ़ने, अनुशासन बनाये रखने इत्यादि पर होगा। इसके अतिरिक्त मैं यह भी चाहूँगा कि मेरे विद्यालय में खेलकूद एवं पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ भी समय-समय पर होती रहें।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का उच्चारण कीजिए
शिक्षा, क्षमा, अक्षर, अपेक्षा, इच्छा, छत, मच्छर, तुच्छ।
उत्तर
उपरोक्त सभी शब्दों को त्रुटिरहित उच्चारित कीजिए।

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प्रश्न 2.
निम्नांकित तालिका में ‘क्ष’,’छ’ और ‘च्छ’ के प्रयोग वाले तीन-तीन शब्द लिखिए
उत्तर
MP Board Class 6th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 21 मेरी माँ 2

प्रश्न 3.
पाठ में कई ऐसे शब्द हैं जिनके अन्त में प्रत्यय लगे हैं। ऐसे शब्दों को छाँटकर लिखिए
उत्तर
सहयोग, जीवन, दृढ़ता, कदापि, भोजनादि, शिक्षादि, अवर्णनीय, कलंकित, धार्मिक, आत्मिक, सामाजिक।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय छाँटकर उनके सामने लिखिए
उत्तर
MP Board Class 6th Hindi Bhasha Bharti Solutions Chapter 21 मेरी माँ 1

मेरी माँ परीक्षोपयोगी गद्यांशों की व्याख्या 

(1) एक समय मेरे पिताजी दीवानी मुकदमे में किसी पर दावा करके वकील से कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे पर कर दूं। मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म विरुद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत समझाया कि मुकदमा खारिज हो जाएगा। किंतु मुझ पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए। मैं अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक भाषा-भारती’ के ‘मेरी माँ’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी और महान देशभक्त
रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ हैं।

प्रसंग-इस गद्यांश में लेखक ने सत्य के प्रति अपने दृढ़ विश्वास का वर्णन किया है।

व्याख्या-लेखक रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के पिताजी को बेटे का स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन में भाग लेना पसन्द न था। वह उसका ध्यान क्रान्तिकारी गतिविधियों से हटाकर अन्यत्र लगाते रहते थे। एक बार वह उसे अपने साथ दीवानी में एक मुकदमे के दौरान ले गये। वहाँ वह वकील से यह कहकर वापस चले गये कि उनकी अनुपस्थिति में जो भी काम हो वह रामप्रसाद से करा ले। थोड़ी ही देर बाद वकील साहब ने उसे बुलवाया और वकालतनामे पर पिताजी के हस्ताक्षर करने को कहा। सत्य के अनुयायी रामप्रसाद ने इसे धर्म विरुद्ध पाप बताते हुए पिताजी के हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। वकील साहब के यह समझाने पर भी कि यदि उसने पिताजी के हस्ताक्षर नहीं किये तो मुकदमा खारिज हो जायेगा, रामप्रसाद पर इसका तनिक भी प्रभाव नहीं हुआ और उन्होंने पिताजी के हस्ताक्षर करने से स्पष्ट मना कर दिया। सत्य को उच्च आदर्श मानकर उसका अनुसरण करने वाले रामप्रसाद ने जीवन भर सत्य का आचरण किया और बिना परिणाम की चिन्ता किये सदा सत्य बात कही।

(2) जन्मदात्री जननी ! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने का प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या, यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन, प्रयत्न करूँ तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम और दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुमने किस प्रकार अपनी देववाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही मैं देश सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका भी श्रेय तुम्हीं को है।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-इस गद्यांश में लेखक ने अपनी माँ द्वारा समय-समय पर प्रदत्त अतुलनीय सम्बल व सहयोग का वर्णन करते हुए उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की है।

व्याख्या-माँ का प्रत्येक बालक के जीवन में विशिष्ट स्थान होता है। वह जन्मदात्री तो है ही, साथ ही जीवन निर्मात्री भी है। लेखक रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ अपनी उसी जन्मदात्री और जीवनदात्री माँ को स्मरण करते हुए लिखते हैं कि माँ ने जो कृपा उन पर की है उसे चुकाने का अवसर इस जन्म में तो नहीं मिल पाया क्योंकि शीघ्र ही अंग्रेजी हुकूमत उन्हें फाँसी के तख्ते पर चढ़ाने वाली है। वह कहते हैं कि इस जन्म तो क्या अनेक जन्म मिलें तो भी तमाम कोशिशों के बावजूद वह माँ के ऋण से उऋण नहीं हो सकते क्योंकि माँ के उपकार हैं ही इतने। वह कहते हैं कि उनके जैसे एक सामान्य से बालक में देशभक्ति के जो भाव प्रेम और दृढ़ता के साथ उनकी माँ ने भरे हैं, उनका वर्णन करना असम्भव है। बीते जीवन की प्रत्येक घटना को याद करते हुए वह कहते हैं कि किस प्रकार माँ तुमने अपनी ममतारूपी वाणी से उनके जीवन मूल्यों में सुधार किया है। ये तुम्हारे आशीर्वाद और परम कृपा का ही फल था कि वह देश सेवा हेतु अपना जीवन होम कर सके। माँ के प्रोत्साहन और सहयोग का ही परिणाम था कि रामप्रसाद धर्म के मार्ग पर चलकर उत्तम शिक्षा ग्रहण कर सके।

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(3) महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सांत्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक इच्छा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-इस गद्यांश में लेखक अपने जीवन के अन्तिम समय में अपनी माँ द्वारा उसके लिए किए गये त्याग का स्मरण कर भावुक हो उठता है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि माँ तुम्हारी शिक्षा इतनी | महान थी कि तुमने संकटों में भी मुझे अधीर नहीं होने दिया
और अपनी प्रेमपूर्ण वाणी व व्यवहार से सदैव सांत्वना देती रहीं। लेखक आगे लिखता है कि अपनी माँ की कृपा के कारण जीवन भर उन्हें कभी किसी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ। लेखक को यह ज्ञात है कि अब उसके जीवन का अंतिम समय निकट है और ऐसे में उसकी अंतिम इच्छा किसी वस्तु के भोग-विलास अथवा ऐश्वर्य की नहीं है बल्कि वह चाहता है कि काश, यह सम्भव हो पाता कि वह अपनी माताजी के श्रीचरणों में बैठकर उनकी कुछ सेवा कर अपने इस जीवन को सफल बना पाता।

(4) माँ ! विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता भारत माता की सेवा में अपने जीवन को बलिवेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कोख कलंकित न की। अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा।

सन्दर्भ-पूर्व की तरह।

प्रसंग-इस गद्यांश में लेखक अपने बलिदान पर अपनी माँ से धैर्य धारण करने और उन्हें गौरवान्वित महसूस करने की बात कह रहा है।

व्याख्या-जीवन भर अपनी माँ द्वारा बताये गये कर्तव्य मार्ग पर चलने वाला लेखक, देश पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को दृढ़ संकल्पित हो, अपनी माँ से विनती कर रहा है कि वह उसके बलिदान पर धैर्य धारण करेगी। लेखक अपनी माँ को सम्बोधित करते हुए आगे कहता है कि उसे इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उसका पुत्र माताओं की माता अर्थात् भारतमाता की आन-मान-सम्मान की रक्षा की खातिर अपने इस तुच्छ जीवन को हँसते-हँसते न्यौछावर कर रहा है और इससे उसकी कोख की सार्थकता सिद्ध हो जायेगी। वह आगे कहता है कि उसके जैसे हजारों-लाखों के संघर्षों एवं बलिदानों के पश्चात् जब भारत स्वतन्त्र होगा और उसका स्वाधीनता इतिहास लिखा जायेगा तब उसके किसी-न-किसी पृष्ठ पर सुनहरे अक्षरों में उसकी माँ का नाम भी अवश्य ही अंकित होगा।

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