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MP Board Class 10th Hindi Vasanti Solution Chapter 10 मजदूरी और प्रेम (सरदार पूर्ण सिंह)

मजदूरी और प्रेम पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

मजदूरी और प्रेम लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्वभाव से साधु कौन होते हैं?
उत्तर-
हल चलाने और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं।

प्रश्न 2.
किसान को ब्रह्मा के समान क्यों माना है?
उत्तर-
किसान अन्न में, फूल में, फल में आहुति-सा दिखाई देता है। यह कहा जाता है कि ब्रह्माहुति से संसार पैदा हुआ है। इसलिए किसान को ब्रह्मा के समान माना है।

प्रश्न 3.
घर आए मेहमान का स्वागत किसान किस प्रकार करता है?
उत्तर-
घर आए मेहमान का स्वागत किसान अपनी मीठी बोली, मीठे जल और अन्न से तृप्त करके करता है।

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प्रश्न 4.
किसी भेड़ के अस्वस्थ होने पर गड़ेरिया कैसा अनुभव करता है?
उत्तर-
किसी भेड़ के अस्वस्थ होने पर गड़ेरिया दुख का अनुभव करता है। यह इसलिए कि भेड़ों की सेवा ही इनकी पूजा है। जरा एक भेड़ बीमार हुई, सब परिवार पर विपत्ति आई। दिन-रात उसके पास बैठे काट देते हैं। उसे अधिक पीड़ा हुई तो इन सब की आँखें शून्य आकाश में किसी को देखने लग गईं। पता नहीं ये किसे बुलाती हैं। हाथ जोड़ने तक की इन्हें फुरसत नहीं। पर हाँ, इन सबकी आँखें किसी के आगे शब्द-रहित संकल्प-रहित मौन प्रार्थना में खुली हैं। दो रातें इसी तरह गुजर गईं। इनकी भेड़ अब अच्छी है। इनके घर मंगल हो रहा है। सारा परिवार मिलकर गा रहा है।

प्रश्न 5.
सच्चा आनंद किसमें छिपा रहता है?
उत्तर-
सच्चा आनंद श्रम में छिपा रहता है।

मजदूरी और प्रेम दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गुरुनानक ने किसान के संबंध में क्या-क्या कहा है?
उत्तर-
गुरुनानक ने किसान के संबंध में कहा-“भोले भाव मिलें रघुराई” भोले-भाले किसानों को ईश्वर अपने खुले दीदार का दर्शन देता है। उनकी फूस की छतों में से सूर्य और चन्द्रमा छन-छनकर उनके बिस्तरों पर पड़ते हैं। ये प्रकृति के जवान साधु हैं। जब कभी मैं इन बे-मुकुट के गोपालों के दर्शन करता हूँ, मेरा सिर स्वयं ही झुक जाता है। जब मुझे किसी फकीर के दर्शन होते हैं तब मुझे मालूम होता है कि नंगे सिर, नंगे पाँव, एक टोपी सिर पर, एक लँगोटी कमर में, एक काली कमली कंधे पर, एक लंबी लाठी हाथ में लिये हुए गौवों का मित्र, बैलों का हमजोली, पक्षियों का हमराज, महाराजाओं का अन्नदाता, बादशाहों को ताज पहनाने और सिंहासन पर बिठाने वाला, भूखों और नंगों को पालने वाला, समाज के पुष्पोद्यान का माली और खेतों का वाली जा रहा है।”

प्रश्न 2. किसान को हितैषी क्यों कहा गया है?
उत्तर-
दया, वीरता और प्रेम जैसा किसान में दिखाई देता है, वैसा और कहीं नहीं मिलता है। इसलिए किसान को हितैषी कहा गया है।

प्रश्न 3.
गड़रिया आनंद का अनुभव कब करता है?
उत्तर-
गड़रिया आनंद का अनुभव तब करता है, जब उसकी बीमार भेड़. (भेड़ें) अच्छी हो जाती है (है)।

प्रश्न 4.
‘हाथ की बनी चीज में रस भर आता है।’ समझाइए।
उत्तर-
‘हाथ की बनी चीजें सरस होती हैं। यह इसलिए उसमें प्रेम की सच्चाई और हृदय की पवित्रता का योग होता है। इसलिए सच्चा आनंद तो हाथ की बनी हुई चीजों से आता है। यही जीवन का वास्तविक आनंद है। इस आनंद के सामने स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा नहीं रह जाती है।

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प्रश्न 5.
मनुष्य का साधारण जीवन कब श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है?
उत्तर-
मनुष्य का साधारण जीवन तब श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है, जब वह मजदूरी और हाथ के कला-कौशल में लग जाता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) हल चलाने वाले अपने जीवन का हवन किया करते हैं।
(ख) ये प्रकृति के जवान साधु हैं।
उत्तर-
(क) हल चलाने वाले अपने जीवन का हवन किया करते हैं।
उपर्युक्त वाक्यांश के द्वारा लेखक ने यह भाव प्रकट करना चाहा है कि हल चलाने वाले किसान घोर परिश्रम करते हैं। वे अपना पूरा जीवन इसी में हवन की तरह करके दूसरों को सुख-आनंद देते रहते हैं।

(ख) ये प्रकृति के जवान साधु हैं।
उपर्युक्त वाक्य के द्वारा लेखक ने यह भाव प्रकट करना चाहा है कि किसान अपने घोर परिश्रम से स्वस्थ और तगड़ा रहता है। वह निरोग रहता है। उससे सरलता और पवित्रता टपकती रहती है।

मजदूरी और प्रेम भाषा-अनुशीलन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्द अलग-अलग लिखिए-
भाती, पृथ्वी, फूल, प्रायः, मिट्टी, दिन, नहाना, दीदार, ताज, संकल्प, नेत्र, आर्ट, टीन, दाम, गऊएं।
उत्तर-
तत्सम शब्द – पृथ्वी, संकल्प, नेत्र,
तद्भव शब्द – फूल, मिट्टी, दिन।
देशज शब्द – भाती, प्रायः नहाना, टीन, गऊएं
विदेशी शब्द – दीदार, आर्ट, दाम

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी शुद्ध कीजिए-
आहूति, ब्रम्हा, केंद्र, अध्यात्मिक, कौशल, निरजीव, ईश्वर।
उत्तर-
आहुति, ब्रह्मा, केंद्र, आध्यात्मिक, कौशल, निर्जीव, ईश्वर।।

प्रश्न 3.
पाठ में सामासिक पद हरी-भरी आया है, जो द्वंद्व समास है। इसी प्रकार के अन्य सामासिक शब्द पाठ से छाँटकर लिखिए।
उत्तर-
हवनशाला, रग-रग, घास-पात, इर्द-गिर्द, प्रेम-धर्म, आनंद-मंगल।

मजदूरी और प्रेम योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
किसान और श्रमिक के जीवन में क्या अंतर आया है? लिखिए।

प्रश्न 2.
हाथ से बनी और मशीन से बनी चीजों में श्रेष्ठ कौन-सी है? इस विषय पर वाद-विवद प्रतियोगिता का आयोजन कीजिए।

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प्रश्न 3.
आप अपने घर में कौन-कौन-से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करते हैं, उसकी सूची बनाइए।
उत्तर-
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मजदूरी और प्रेम परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

मजदूरी और प्रेम अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मजदूरी और प्रेम’ पाठ में लेखक ने परिश्रम को महत्त्व क्यों दिया है?
उत्तर-
‘मजदूरी और प्रेम’ पाठ में लेखक ने परिश्रम को इसलिए महत्त्व दिया है कि इससे जो रस निकलता है वह मशीनों से नहीं। लेखक को विश्वास है कि जिस चीज में मनुष्य के प्यारे हाथ लग जाते हैं। उसमें उसके हृदय का प्रेम और मन की पवित्रता सूक्ष्म रूप से मिल जाती है। उत्तम-से-उत्तम और नीच-से-नीच काम सब मजदूर ही करते हैं, इस प्रकार लेखक का यह मानना है कि बिना मजदूरी बिना हाथ के कला-कौशल के विचार और चिंतन किसी काम के नहीं हैं। इसलिए मजदूरों को महत्त्व देने वाले ही देश उन्नति करते हैं, यही कारण है कि लेखक ने भविष्य में मजदूरों के ही प्रभाव से सुखद जीवन की आशाएँ की हैं।

प्रश्न 2.
भेड़ों और गड़रियों के परस्पर क्या संबंध हैं?
उत्तर-
भेड़ों और गड़रियों के संबंध बहुत ही घनिष्ठ हैं, गड़रिया भेड़ों की सेवा को ही अपनी पूजा समझता है, थोड़ी-सी भी एक भेड़ बीमार हुई तो मानो सारे परिवार पर एक विपत्ति आ गई है। दिन-रात उनके पास बैठे काट देते हैं। उन्हें अधिक पीड़ा हुई तो इन सबकी आँखें शून्य आकाश में किसी को देखते-देखते गल गईं, पता नहीं ये किसे बुलाती हैं, इन्हें और किसी की चिन्ता तब नहीं रहती है, भेड़ों के अच्छी होने पर वे खुशी से फूले नहीं समाते हैं। इस प्रकार भेड़ें ही इनके तन-मन-धन आदि सब कुछ होती हैं।

प्रश्न 3.
लेखक ने बूढ़े गड़रिये से क्या कहा?
उत्तर-
लेखक ने बूढ़े गड़रिये से कहा-“भाई, अब मुझे भी भेड़ें लेने दो, ऐसे ही मूक-जीवन से मेरा भी कल्याण होगा, विद्या को भूल जाऊँ, तो अच्छा है। मेरी पुस्तकें खो जाएँ तो उत्तम है, ऐसा होने से कदाचित् इस वनवासी परिवार की तरह मेरे दिल के नेत्र खुल जाएँ और मैं ईश्वरीय झलक देख सकूँ। चंद और सूर्य की विस्तृत ज्योति में जो वेदगान हो रहा है, इस गड़रिये की कन्याओं की तरह मैं सुन तो न स. परन्तु कदाचित् प्रत्यक्ष देख सकूँ।

प्रश्न 4.
यंत्रों और मनुष्य के हाथ से बने हुए कामों में लेखक ने क्या भेद बताया है?
उत्तर-
मनुष्य के हाथ से बने हुए कामों में उसकी प्रेममय पवित्र आत्मा की सगंध आती है। राफल आदि से विचित्र चित्रों में उसकी कला-कुशलता को देख इतनी सदियों के बाद भी उनके अंतःकरण के सारे भावों का अनुभव होने लगता है। केवल चित्र का ही दर्शन नहीं, किन्तु साथ ही उसमें छिपी हुई चित्रकार की आत्मा तक के दर्शन हो जाते हैं, परंतु यंत्रों की सहायता से बने हुए फोटो निर्जीव से मालूम पड़ते हैं। उनमें और हाथ के चित्रों में उतना भेद है जितना कि बस्ती और श्मशान में।

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प्रश्न 5.
लेखक ने मनुष्य के हाथ का महत्त्व क्यों बतलाया है?
उत्तर-
लेखक के अनुसार मनुष्य के हाथ ही तो ईश्वर के दर्शन कराने वाले होते हैं, इसीलिए मनुष्य और मनुष्य की मजदूरी का तिरस्कार करना नास्तिकता है, इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बिना. मजदूरी, बिना हाथ के कला-कौशल के विचार और चिंतन किसी काम के नहीं हैं। यही कारण है कि जिन देशों में हाथ और मुँह पर मजदूरी की धूल नहीं पड़ने पाती, वे धर्म और कला-कौशल में कभी उन्नति नहीं कर सकते। इसके विपरीत उन्नति वे ही करते हैं जिनसे जोतने वाले, काटने और मजदूरी का काम लिया जाता है।

प्रश्न 6.
रिक्त स्थानों की पूर्ति दिए गए विकल्पों में से उचित शब्दों के चयन से कीजिए।
1. आचरण की सभ्यता के लेखक हैं-(रामचन्द्र शुक्ल, अध्यापक पूर्णसिंह)
2. हल चलाने वाले स्वभाव से ……………………………… होते हैं। (सीधे, साधु)
3. पशुओं के अज्ञान में गंभीर ………………………… छिपा हुआ है। (ज्ञान, प्राण)
4. आदमियों की तिजारत करना मूों का …………………….. है। (नाम, काम)
5. धन की पूजा करना ……………………………… है।(आस्तिकता, नास्तिकता)
उत्तर-
1. अध्यापक पूर्णसिंह,
2. साधु,
3. ज्ञान,
4. काम,
5. नास्तिकता।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित विकल्पों में से सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प चुनकर लिखिए?
1. मजदूरी और प्रेम पाठ में स्पष्ट किया गया है
(क) गड़रिये का महत्त्व
(ख) मजदूरी और श्रम का महत्त्व
(ग) लेखक का महत्त्व
(घ) भेड़ों का महत्त्व।
उत्तर-
(ख) मजदूरी और श्रम का महत्त्व,

2. मजदूरी और प्रेम के लेखक हैं
(क) विनोवा भावे
(ख) अध्यापक पूर्णसिंह
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) प्रताप नारायण मिश्र।
उत्तर-
(ख) अध्यापक पूर्णसिंह,

3. अध्यापक पूर्णसिंह का जन्म हुआ था
(क) सन् 1881 ई. में
(ख) सन् 1890 ई में.
(ग) सन् 1882 ई. में
(घ) सन् 1888 ई. में।
उत्तर-
(क) सन् 1881 ई. में,

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4. अध्यापक पूर्णसिंह का निधन हुआ था
(क) 31. जनवरी, 1931 ई. को
(ख) 31 अक्तूबर 1931. ई. को
(ग) 31 मई, 1931 ई. को
(घ) 31 मार्च, 1931 ई. को।
उत्तर-
(घ) 31 मार्च, 1931 ई. को,

5. ‘मजदूरी और प्रेम’ पाठ है-
(क) कहानी
(ख) संस्मरण
(ग) निबन्ध
(घ) आत्मकथा।
उत्तर-
(ग) निबंध।

प्रश्न 4.
सही जोड़ी मिलाकर लिखिए-
विनय पत्रिका – जैनेन्द्र कुमार
काकी – तुलसीदास
मुक्ति गमन – अध्यापक पूर्णसिंह
मजदूरी और प्रेम – पंडित माखन लाल चतुर्वेदी
विज्ञान और साहित्य – सियाराम शरण गुप्त।
उत्तर-
विनय पत्रिका – तुलसीदास
काकी – सियाराम शरण गुप्त
मुक्ति गमन – पंडित माखन लाल चतुर्वेदी
मजदूरी और प्रेम – अध्यापक पूर्णसिंह
विज्ञान और साहित्य – जैनेन्द्र कुमार।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्य सत्य हैं या असत्य? वाक्य के आगे लिखिए।
1. किसान के खेत उनकी हवनशाला है।
2. वृक्षों की तरह उसका भी जीवन एक प्रकार का मौन जीवन है।
3. मजदूरी करने से हृदय-परिवर्तन होता है।
4. मनुष्य के विकास के लिए फकीरी आवश्यक है।
5. जिस चीज में मनुष्य के प्यारे हाथ लगते हैं, उसमें मुर्दे को जिंदा करने की शक्ति आ जाती है।
उत्तर-
1. सत्य,
2. सत्य,
3. असत्य,
4. असत्य,
5. सत्य।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों का उत्तर एक शब्द में दीजिए
1. लेखक को कौन अन्न में, फूल में, फल में आहुति-सा दिखाई देता है?
2. ‘भोले भाव मिलें रघुराई’ किसने कहा?
3. भेड़ों की सेवा किसकी पूजा है?
4. होटल में बने हुए भोजन कैसे होते हैं?
5. गुरुनानक जिस बढ़ई के पास ठहरे, उसका क्या नाम था?
उत्तर-
1. किसान,
2. गुरुनानक ने,
3. गड़रिये की,
4. नीरस,
5. भाई लालो।

मजदूरी और प्रेम लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने बूढ़े गड़रिये को किस रूप में देखा?
उत्तर-
लेखक ने बूढ़े गड़रिये को हरे-हरे वृक्षों के नीचे देखा, उसकी भेड़ों के ऊन सफेद थे, ये कोमल-कोमल पत्तियों को खा रही थी। गड़रिया बैठा हुआ आकाशवाणी की ओर देख रहा था। वह ऊन कात रहा था। उसके बाल सफेद थे, उसकी प्यारी स्त्री उसके पास रोटी पका रही थी, उसकी दो जवान कन्याएँ उसके साथ जंगल में भेड़ चरा रही थीं।

प्रश्न 2.
गड़रियों के परिवार को कुटी की आवश्यकता क्यों नहीं होती है?
उत्तर-
गड़रियों के परिवार को कुटी की आवश्यकता नहीं होती है, यह इसलिए कि ये जहाँ जाते हैं एक घास की झोपड़ी बना लेते हैं। दिन को सूर्य और रात को तारागण इनके मित्र-साथी होते हैं।

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प्रश्न 3.
श्रम के संबंध में लेखक के क्या विचार हैं?
उत्तर-
श्रम के संबंध में लेखक ने कहा है कि श्रम से ही सच्चे आनंद की प्राप्ति होती हैं। इसी से ईश्वर के दर्शन होते हैं। श्रम का तिरस्कार करना नास्तिकता है। श्रम से ही किसी देश की कला-कौशल की उन्नति होती है।

प्रश्न 4.
प्रेम शरीर के कौन-कौन से अंग हैं?
उत्तर-
लकड़ी, ईंट और पत्थर को मूर्तिमान करने वाले लुहार, बढ़ई, चमार तथा किसान आदि वैसे ही पुरुष हैं। जैसे कि कवि, महात्मा और योगी उत्तम-से-उत्तग और नीच-से-नीच काम, सबके सब प्रेम-शरीर के अंग हैं।

प्रश्न 5.
मजदूरों की यथार्थ पूजा होने पर क्या होगा?
उत्तर-
मजदूरों की यथार्थ पूजा होने पर कला-रूपी धर्म की वृद्धि होगी, तभी नए कवि पैदा होंगे, तभी नये औलियों का उदय होगा, ये सबके सब मजदूरों के दूध से पलेंगे। धर्म, योग, शुद्धाचरण, सभ्यता और कविता आदि के फूल इन्हीं मजदूर ऋषियों के उद्यान में खिलेंगे।

प्रश्न 6.
गड़रिये का सखा कौन है और उसका जीवन कैसे बीतता है?
उत्तर-
गड़रिये का सच्चा सखा उसकी भेड़ें ही हैं। गड़रिये का जीवन अपनी भेड़ों को चराने और उनकी सेवा करने में बीतता है। वह उनकी सेवा में ही अपनी पूरी जिंदगी काट लेते हैं भेड़ों का सुख-दुख ही इनकी जिंदगी का समूचा सुख-दुःख है। इस प्रकार गड़रिये की एक-एक जिंदगी बीत जाती है।

मजदूरी और प्रेम लिखक-परिचय

सरदार ‘पूर्णसिंह’ का भारतेन्दु युगीन गद्य लेखकों में विशिष्ट स्थान है। विचारात्मक निबंधकारों में आपका स्थान अत्यधिक चर्चित और सम्मानित है।

जीवन-परिचय- अध्यापक ‘पूर्णसिंह’ का जन्म सन् 1881 ई. में उत्तर-प्रदेश के एबटाबाद जिले के एक गाँव में हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा रावलपिंडी में हुई। आप इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उच्च-शिक्षा प्राप्त करने के लिए जापान गए; जहाँ आपने, व्यावहारिक रसायनशास्त्र की उच्च शिक्षा प्राप्त की। यहीं पर आपातकालीन महान् संत व दार्शनिक स्वामी रामतीर्थ से आपकी भेंट हुई। फलतः आप इनके विचारों से तुरंत ही प्रभावित हुए और इसके परिणामस्वरूप आप उनके शिष्य होकर सुप्रसिद्ध वेदांती बन गए। जापान से लौटकर आप देहरादून के इम्पीरियल फारेस्ट इन्स्टीट्यूट (फारेस्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट) में इम्पीरियल केमिस्ट के पद पर कार्य करने लगे। कुछ समय के बाद विभागीय अधिकारियों से अनबन और मतभेद होने के कारण आपने यहाँ से इस्तीफा दे दिया।

रचनाएँ-अध्यापक ‘पूर्णसिंह’ गद्य-क्षेत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। आपके द्वारा लिखे हुए केवल पाँच ही लेख मिलते हैं। आपके लेख भारतीय संस्कृति और सभ्यता के पोषक और प्रतीक हैं। ‘मजदूरी और प्रेम’ आपका लोकप्रिय लेख है।

भाषा-शैली-अध्यापक ‘पूर्णसिंह’ की भाषा मुख्य रूप से हिंदी है। आपकी मातृभाषा पंजाबी का इस पर अधिक प्रभाव है। हिंदी की प्रकृति की आपको सही पहचान थी। इसकी अभिव्यक्ति को आपने जिस कुशलता और क्षमता के द्वारा प्रकट किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। आपकी शैली प्रौढ़ और सजीव होते हुए अत्यंत प्रभावशाली है। आपकी भाषा में उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों की प्रमुखता है।

साहित्यिक महत्त्व-अध्यापक पूर्णसिंह जी का हिंदी-साहित्य में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। आप भारतीय संस्कृति और सभ्यता के कुशल चित्रकार होने के कारण अपने साहित्यिक-व्यक्तित्व के द्वारा अत्यंत लोकप्रिय हैं। आपके विचारोत्तेजक साहित्य आपके व्यक्तित्व की पूरी पहचान प्रस्तुत करते हैं।

मजदूरी और प्रेम निबंध का सारांश

‘मजदूरी और प्रेम’ अध्यापक ‘पूर्णसिंह’ द्वारा लिखित एक विचारात्मक निबंध है। इस निबंध के द्वारा अध्यापक पूर्णसिंह ने मानवीय-श्रम और उसके महत्त्व को स्पष्ट किया है।

लेखक कह रहा है कि उसने जिस गड़रिये को श्रम करते हुए देखा है, उससे उसकी श्रमशक्ति का महत्त्व स्पष्ट होता है। वह ऊन कातता हुआ प्रेम-भरी आँखों से अपनी निरोगता का परिचय देते हुए दिखाई देता है। उसकी प्यारी स्त्री उसके पास ही रोटी पका रही है। उसकी दो जवान कन्याएँ जंगल-जंगल भेड़ चरा रही हैं। इस दिव्य-परिवार को किसी की जरूरत नहीं। सर्य और तारे ही उसके साथी हैं भेडों की सेवा ही उसकी एकमात्र सेवा है। भेड़ों की बीमारी से पूरा परिवार विपत्ति में पड़ जाता है। अपनी मौन भाषा के द्वारा ही ये इसके लिए प्रार्थना करते हैं। भेड़ों के अच्छा होने पर पूरा परिवार मंगलगान गाने लगता है। वर्षा के बादल के रिमझिम बरसने और पिता की खुशी से दोनों कन्याएँ खुशी से झूम उठती हैं। वे फूले नहीं समाती हैं।

इस दृश्य को देखकर लेखक अपने पास में खड़े अपने भाई से भेड़ें खरीदने के लिए कहता है कि ऐसे ही सुखी जीवन से उसका कल्याण होगा। इसी से उसके दिल के नेत्र खुल जाएँगे और सूर्य और चंद्रमा की विस्तृत ज्योति के वेदगान को इस गड़रिये की कन्याओं की तरह वह सुन तो न सकेगा परंतु कदाचित् देख सकेगा। इन लोगों के जीवन में अद्भुत आत्मानुभव का भाव भरा हुआ है। वास्तव में गड़रिये की प्रेम-मजदूरी के जीवन में अद्भुत आत्मानुभव का भाव भरा हुआ है। वास्तव में गडरिये की प्रेम-मजदूरी का मूल्य कौन दे सकता है? लेखक मानता है कि उसे मानव के हाथ से बने हुए कामों में उसकी प्रेममय पवित्र आत्मा की सुगंध आती है। यंत्रों से बने हुए फोटो निर्जीव प्रतीत होते हैं। अपने हाथों के चित्रों में उतना ही भेद है, जितना कि बस्ती और श्मशान में। हाथों की चीजों में लोहों की चीजों से अधिक रसानंद प्राप्त होता है। होटल के बने हुए भोजन से कहीं अधिक रसानंद अपनी प्रियतम के हाथों से बने हुए रूखे-सूखे भोजन में प्राप्त होता है। सोने और चाँदी की प्राप्ति से उतना सुखानंद नहीं व्याप्त होता है, जितना अपने काम से मिलता है। मनुष्य की पूजा ही ईश्वर की पूजा है; क्योंकि मनुष्य के हाथ तो ईश्वर के दर्शन कराने वाले होते हैं। इसलिए धर्म और कला-कौशल से किसी देश की उन्नति नहीं होती है अपितु मजदूरों की मजदूरी से ही होती है।

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संसार में जो नया साहित्य निकलेगा, वह मजदूरों के हृदय से निकलेगा। जब ये हाथ में कुल्हाड़ी, सिर पर टोकरी, नंगे सिर और नंगे पाँव धूल से लिपटे और कीचड़ से रंगे हुए जंगल में लकड़ी काटेंगे, तब उनके शब्द वायुयान पर चढ़े हुए चारों दिशाओं में भविष्य के कलाकारों को महान् प्रेरणा देंगे। तब मजदूरों की ही वास्तविक पूजा होगी। तभी धर्म, योग, शुद्धाचरण, सभ्यता, कविता आदि सब कुछ इन्हीं मजदूरों के उद्यान में खिल उठेंगे।

मजदूरी और प्रेम संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

हाथ की मेहनत से चीज में जो रस भर जाता है वह भला लोहे के द्वारा बनाई हुई चीज में कहाँ! जिस आलू को मैं स्वयं बोता हूँ, मैं स्वयं पानी देता हूँ, जिसके इर्द-गिर्द की घास-पात खोदकर मैं साफ करता हूँ, उस आलू में जो रस मुझे आता है वह टीन में बंद किए हुए अचार मुरब्बे में नहीं आता। मेरा विश्वास है कि जिस चीज में मनुष्य के प्यारे हाथ लगते हैं, उसमें उसके हृदय का प्रेम और मन की पवित्रता सूक्ष्म रूप से मिल जाती है और उसमें मुर्दे को जिंदा करने की शक्ति आ जाती है। होटल में बने हुए भोजन यहाँ नीरस होते हैं क्योंकि वहाँ मनुष्य मशीन बना दिया जाता है।

शब्दार्थ-इर्द-गिर्द-आस-पास। मुर्दे-निर्जीव।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी सामान्य’ में संकलित लेखक सरदार पूर्ण सिंह लिखित निबंध ‘मजदूरी और प्रेम’ से है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने हाथ से बनी हुई चीजों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-जो वस्तुएँ हाथ से तैयार होती हैं, उनमें अत्यंत जीवन-रस प्राप्त होता है। इसलिए हाथ के अतिरिक्त लोहे से बनी हुई वस्तुओं में ऐसा आनंद नहीं मिलता है। इसको स्पष्ट करने के लिए लेखक एक उदाहरण देकर कह रहा है कि वह जिस आलू को तैयार करता है और जिसे पानी, निराई और जरूरी बातों से अच्छे रूप में तैयार करता है, उसको खाने में उसे जो अत्यंत आनंद प्राप्त होता है, टीन में बंद किए हुए आचार-मुरब्बे में वह आनंद नहीं मिलता है। लेखक का विश्वास है कि उसमें जिस वस्तु को तैयार करने में मनुष्य अपने हाथों को प्रेमपूर्वक लगा देता है उससे उसके हृदय का प्रेम और मन की पवित्रता झलकती है। यही कारण है कि होटल के बने हुए भोजन नीरस होते हैं। क्योंकि उसमें मनुष्य के हाथ स्वतंत्र काम नहीं करते हैं, अपितु उसे तो एक मशीन की तरह लगा देते हैं। लेकिन जब किसी की प्रियतमा के द्वारा कोई रूखा-सूखा भी भोजन बना दिया जाता है, तब उसमें अत्यधिक आनंद-रस प्राप्त होता है।

विशेष-
1. हाथ की बनी हुई वस्तुओं में मशीन से बनी वस्तुओं से अधिक आनंद रस की प्राप्ति होती है।
2. सम्पूर्ण कथन को सरस और भाषा-शैली के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हाथ की मेहनत से बनी वस्तु को क्यों महत्त्व दिया है?
उत्तर-
हाथ की मेहनत से बनी वस्तु का महत्त्व है। इसलिए कि वह सरस होती है। उसमें स्वयं की मेहनत होती है। उसमें किसी प्रकार का बेगानापन नहीं होता है।

प्रश्न 2. मनुष्य कहाँ मशीन बना दिया जाता है और क्यों?
उत्तर-
मनुष्य वहाँ मशीन बना दिया जाता है, वह स्वयं अपने-आप कोई काम नहीं कर पाता है। उसे नियंत्रित करके काम कराया जाता है। यह इसलिए उसमें प्रेम और मन की पवित्रता नहीं रह जाता है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने हाथ से बनी हुई चीजों का महत्त्व मशीन से बनी हुई चीजों से बढ़कर दिया है। यह इसलिए हाथ से बनी हुई चीजों में प्रेम. और पवित्रता होती है। सरसता और अपनापन होता है। उसमें मुर्दे को जिंदा करने की शक्ति आ जाती है। इसके विपरीत मशीन से बनी हुई चीजें नीरस होती हैं।

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2. आदमियों की तिजारत करना मूखों का काम है। सोने और लोहे के बदले मनुष्य को बेचना मना है। आजकल भाप की कलों का दाम तो हजारों रुपया है, परंतु मनुष्य कौड़ी के सौ-सौ बिकते हैं! सोने और चाँदी की प्राप्ति से जीवन का आनंद नहीं मिल सकता। सच्चा आनंद तो मुझे मेरे काम से मिलता है। मुझे अपना काम मिल जाए तो फिर स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा नहीं, मनुष्य-पूजा ही सच्ची ईश्वर-पूजा है।

शब्दार्थ-तिजारत-मूर्खतापूर्ण या व्यर्थपूर्ण बातें।

संदर्भ-पूर्ववत्।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने मनुष्य के महत्त्व को समझने के लिए प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-मनुष्यों के विषय में व्यर्थ की बातें करना मूर्खता की पहचान है। सोना और लोहे के बदले मनुष्य की कीमत नहीं आँकनी चाहिए अर्थात् सोना और लोहे जैसी कोई भी धातु मनुष्य का महत्त्व नहीं रख सकती है, लेकिन इसे लोग भूल चुके हैं। सोने चाँदी तो बहुमूल्य धातुएँ अवश्य हैं। लेकिन यही मनुष्यता नहीं है। इसलिए इस मनुष्य को मोल नहीं मिल सकता। आजकल समय बहुत बदल गया है। अब तो आपकी कलाओं का दाम हजारों रुपए हो गए हैं लेकिन मनुष्य की कीमत तो एक-एक कौड़ी में सौ-सौ हो गई है। अतएव सोना, चाँदी, पैसे, रुपये, कौड़ी आदि से सच्चा जीवनानंद नहीं मिल सकता है। मनुष्य को जीवन का सच्चा आनंद तो केवल इसके अपने काम से ही मिलता है। लेखक भी इसे स्वयं का अनुभव मानते हुए इसे ही सच्ची ईश्वर-पूजा स्वीकार है।

विशेष-
1. मनुष्य का महत्त्व मनुष्यता से ही है, जो उसके अपने कामों से संभव है। यही ईश्वर-पूजा भी है।
2. भाषा-शैली में प्रवाह है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आदमियों की तिजारत करना क्यों मूों का काम है?
उत्तर-
आदमियों की तिजारत करना मूरों का काम है। यह इसलिए कि इससे किसी प्रकार की समझदारी प्रकट नहीं होती है।

प्रश्न 2. सच्चा आनंद किससे मिलता है?
उत्तर-
सच्चा आनंद अपने काम से मिलता है। इसके सामने स्वर्ग-प्राप्ति की भी इच्छा नहीं रह जाती है।

विषय-वस्तु पर आधारित बोध प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने मानवता का महत्त्वांकन करते हुए मनुष्य कौड़ी के सौ-सौ बिकते हुए इसका विरोध किया है। उसका यह मानना है कि सोना-चाँदी से नहीं, अपितु अपने काम से ही जीवन का सच्चा आनंद मिलता है। इस प्रकार मनुष्य मनुष्य की पूजा करे तो यह उसके लिए ईश्वरीय पूजा से कम नहीं है।

3. मजदूरी और फकीरी का महत्त्व थोड़ा नहीं। मजदूरी और फकीरी मनुष्य के विकास के लिए परमावश्यक है। बिना मजदूरी किये फकीरी का उच्च भाव शिथिल हो जाता है, फकीरी भी अपने आसन से गिर जाती है, बुद्धि बासी पड़ जाती है। बासी चीजें अच्छी नहीं होती। कितने ही, उम्र भर बासी बुद्धि और बासी फकीरी में मग्न रहते हैं, परंतु इस तरह मग्न होना किस काम का? हवा चल रही है, जल बह रहा है, बादल बरस रहा है, पक्षी नहा रहे हैं, फूल खिल रहे हैं, घास नई, पेड़ · नये, पत्ते नये-मनुष्य की बुद्धि और फकीरी ही बासी! ऐसा दृश्य तभी तक रहता है जब तक बिस्तर पर पड़े-पड़े मनुष्य प्रभात का आलस्य सुख मनाता है।

शब्दार्थ-शिथिल-ढीला। प्रभात-सबेरा। अंतःकरण-हृदय

संदर्भ-पूर्ववत।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने मजदूरी और फकीरी का महत्त्वांकन करते हुए कहा है कि

व्याख्या-मजदूरी और फकीरी का महत्त्व सर्वाधिक है। अगर मनुष्य अपना परम विकास करना है, तो उसे मजदूरी-फकीरी करनी ही पड़ेगी। यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि फकीरी की ऊँचाई मजदूरी की नींव पर ही खड़ी होती है। इस प्रकार मजदूरी के बिना फकीरी का कोई महत्त्व नहीं है। उसके बिना बुद्धि भी मंद पड़ जाती है, जो किसी प्रकार सुखद नहीं है। बासी फकीरी का बने रहना बिल्कुल ही निरर्थक है। चारों ओर से प्रकृति आनंदमग्न हो रही है। हवा मचल रही है, जलतरंगित हो रहा है। पक्षी जल में डूबकी लगा रहे हैं। बादल गरज-बरस रहे हैं। फूल हँस रहे हैं। नई-नई घास लहलहा रही है। पेड़-पौधे नए-नए पत्तों से लद रहे हैं। इसके बावजूद केवल फकीरी ही मंद हो, तो यह चिंता की बात है। इस प्रकार की चिंता की बात तभी होती है, जब मनुष्य बिस्तर पर पड़े-पड़े सवेरे का सुख आलस्य में बीता देता है।

विशेष-
1. मजदूरी और फकीरी के महत्त्व को समझाया गया है।
2. शैली चित्रात्मक है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मजदूरी और फकीरी का महत्त्व क्यों है?
उत्तर-
मजदूरी और फकीरी का महत्त्व है। यह इसलिए कि इसके बिना मनुष्य का पूरा विकास नहीं हो सकता है।

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प्रश्न 2. मजदूरी और फकीरी में श्रेष्ठ कौन है और क्यों?
उत्तर-
मजदूरी और फकीरी में मजदूरी श्रेष्ठ है। यह इसलिए कि बिना मजदूरी किए फकीरी का उच्च भाव शिथिल हो जाता है। फकीरी अपने आसन से गिर जाती है। बुद्धि बासी पड़ जाती हैं।

प्रश्न 3.
बासी बुद्धि का क्या कुपरिणाम होता है?
उत्तर-
बासी बुद्धि का यह कुपरिणाम होता है कि उससे बिस्तर पड़ा हुआ मनुष्य प्रभात का आलस्य सुख मनाता है।

विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने मजदूरी और फकीरी को मानव जीवन के विकास के लिए परमावश्यक बतलाया है। इन दोनों में मजदूरी को फकीरी से बेहतर माना है। इसलिए कि मजदूरी की बुनियाद पर ही फकीरी का झंडा लहराता है। दूसरी बात यह कि बिना मजदूरी के फकीरी अपने आसन से गिर जाती है। उसकी बुद्धि बासी पड़ जाती है। फिर बासी बुद्धि बिस्तर पर पड़े-पड़े प्रभात का सुख अपने आलस्य के कारण नहीं मना पाती है।

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