MP Board Class 12th Special Hindi मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ

MP Board Class 12th Special Hindi मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ

1. मुहावरे

ये ऐसे छोटे-छोटे वाक्यांश हैं जिनके प्रयोग से भाषा में सौन्दर्य, प्रभाव, चमत्कार और विलक्षणता आती है। मुहावरा वाक्यांश होता है, अतः इसका स्वतन्त्र प्रयोग न होकर वाक्य के बीच में उपयोग किया जाता है। मुहावरे के वास्तविक अर्थ का ज्ञान होने पर ही इसका सही उपयोग हो सकता है। इसका सामान्य अर्थ न लेकर इसके गूढ़ अर्थ या व्यंजना से अर्थ समझना चाहिए। इसका उपयोग करने में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए-

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(1) मुहावरे को पढ़कर उसमें छिपे अर्थ को समझने का प्रयास करना चाहिए।
(2) उसी के अर्थ से मिलती-जुलती घटना या बात को चुनकर संक्षेप में लिखना चाहिए।
(3) मुहावरे को उसी वाक्य में मिलाकर उसी काल की क्रिया में रख देना चाहिए।
(4) यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मुहावरा प्रयोग करने से अनेक रूप ले सकता है,क्योंकि उसमें थोड़ा परिवर्तन हो जाता है।
(5) मुहावरे के मूल अर्थ में ही उसका प्रयोग नहीं होता। जैसे-अंगारों पर पैर रखना = संकट में पड़ जाना। आई.ए. एस. की परीक्षा में बैठना और सफलता पाना अंगारे पर पैर रखने जैसा है। अंगारे पर पैर रखने में जितना कष्ट होता है,उतना ही प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी और परीक्षा उत्तीर्ण करने में होता है।

यहाँ कुछ मुहावरे,उनके अर्थ और प्रयोग क्रमशः दिये जा रहे हैं-
(1) अपना उल्ल सीधा करना (अपना मतलब सिद्ध करना)-ममता मेरी हिन्दी की कॉपी ले गयी, अपना उल्लू तो सीधा कर लिया, पर मैंने इतिहास की किताब माँगी तो मना कर दिया।
(2) अक्ल पर पत्थर पड़ना (बुद्धि भ्रष्ट हो जाना) परीक्षा के समय वह रोजाना दिन में सो जाती थी,मानो उसकी अक्ल पर पत्थर पड़ गये हों।
(3) अन्धे की लाठी (एकमात्र आश्रय)-राकेश अपने बूढ़े बाप की अन्धे की लाठी है। [2009]
(4) अन्धेरे घर का उजाला (एकमात्र पुत्र) दीपक शर्माजी के अन्धेरे घर का उजाला है।
(5) अक्ल चकराना (विस्मित होना, बात समझ में न आना)-रामबाबू के निधन का समाचार सुनकर तो अक्ल चकरा गयी।
(6) अलग-अलग खिचड़ी पकाना (सबसे अलग-अलग) संगीता और अनुराधा दिन भर न जाने क्या अपनी अलग-अलग खिचड़ी पकाती रहती हैं।
(7) अंगार उगलना (कटु वचन बोलना)-जीजी या तो बोलती नहीं, जब बोलेंगी तो अंगार उगलेंगी।
(8) अगर-मगर करना (टालने का प्रयत्न करना)-भाभी से जब भी कमला की शादी की बात करो, वे अगर-मगर करने लगती हैं।
(9) अंग-अंग ढीला हो जाना (थक जाना) आपरेशन होने के बाद से तो ऐसा लगता है कि अंग-अंग ढीले हो गये।
(10) अंकुश देना (वश में रखना)-पिताजी तीनों लड़कों पर सदैव अंकुश दिये रहते हैं।

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(11) अपने मुँह मियाँ मिट्ट बनना (अपनी प्रशंसा स्वयं करना)-अरुण हमेशा अपने मुँह मियाँ मिट्ट बना रहता है। [2017]
(12) अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना (स्वयं की हानि करना) रश्मि पढ़ाई अधूरी छोड़कर चली गयी, उसने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली।
(13) अपना गला फँसाना (स्वयं को संकट में डालना)-मंजु की सगाई करके मैंने अपना गला फँसा दिया।
(14) अन्धे को दिया दिखाना (मूर्ख को उपदेश देना)-गाँव वालों से प्रौढ़ शिक्षा की बात करना अन्धे को दिया दिखाने जैसा है।
(15) अंगद का पैर होना (दृढ़ निश्चय से जम जाना) राजीव तो अंगद के पैर की तरह जम गये हैं।
(16) अँगूठा दिखाना (साफ मना करना)-रानी से काम करने को कहा तो वह अँगूठा दिखाकर भाग गयी।
(17) अक्ल के घोड़े दौड़ाना (अटकलें लगाना) जब माला से पूछा कि सप्तर्षि कहाँ हैं तो वह अक्ल के घोड़े दौड़ाने लगी।
(18) अक्लमन्द की दुम बनना (मूर्ख होकर बुद्धिमानी की बात करना)-कमल व्यवसाय के बारे में कुछ समझता तो है नहीं, फिर भी अक्लमन्द की दुम बना रहता है।
(19) अपना-सा मुँह लेकर रहना (असफल होकर लज्जित होना) जब मीनू निकी को छोड़कर सिनेमा चली गयी तो निकी अपना-सा मुँह लेकर रह गयी।
(20) अरण्यरोदन करना (निरर्थक बात करना)–नेताओं के वक्तव्य अरण्यरोदन की तरह हो गये हैं।

(21) आँखों का तारा (अत्यन्त प्रिय) रुचि अपनी मम्मी की आँख का तारा है। [2009]
(22) आँख का किरकिरा होना (सदा खटकते रहना)-सुधीर की जब से पदोन्नति हुई है, वह सबकी आँख का किरकिरा हो गया।
(23) आँखों में पानी न रहना (बेशर्म हो जाना)—वह दिन भर व्यर्थ ही घूमता रहता है, उसकी आँखों में पानी ही नहीं रहा।
(24) आँख मूंद लेना (उदासीन होना)-अपना मकान बन जाने के बाद बड़े भैया ने हम सबकी तरफ से आँखें मूंद लीं।
(25) आड़े हाथ लेना (भर्त्सना करना, फटकारना) इस बार जब सन्तोष फिर उपदेश देने लगा तो मैंने उसे आड़े हाथों लिया।
(26) आठ आँसू रोना (अधिक दुःखी होना)-शास्त्रीजी के निधन से देशवासी आठ आँसू रोये।
(27) आपे से बाहर होना (क्रोधित होना)-बिहारी छोटी-सी बात पर भी आपे से बाहर हो जाता है।
(28) आटा-दाल का भाव मालूम होना (विषम परिस्थितियों में यथार्थ ज्ञान मिलना)-सुरेशजी,शादी होने दो, फिर मालूम होगा आटे-दाल का भाव।
(29) आकाश के तारे तोड़ना (असम्भव कार्य करना) वह प्रीति को इतना प्यार करता है कि उसके लिए आकाश के तारे भी तोड़ सकता है।

(30) आसमान सिर पर उठाना (बहुत अधिक शोर) निष्ठा गुड़िया लेकर भागी तो जमाते ने रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लिया।
(31) आकाश से बातें करना (बहुत ऊँचा होना) सौरभ की पतंग आकाश से बातें करने लगी तो वह बहुत खुश हो गया।
(32) आँखें लाल-पीली करना (क्रोध करना) उत्सव के मन की न हो तो वह प्रायः आँखें लाल-पीली करने लगता है।
(33) आँखें बिछाना (प्यार से स्वागत करना)-दीपावली पर सुधा ने लिखा; आओ, हम आँखें बिछाये बैठे हैं। .
(34) आँख का काजल निकालना (ठग लेना) प्रफुल्ल इतना चतुर है कि वह आँख का काजल निकाल ले और पता ही न चले।
(35) आग में घी डालना (क्रोध को और बढ़ाना)-जब माताजी को राजू समझाने लगा तो पिताजी बोले-अरे,क्यों आग में घी डालता है?
(36) आकाश-पाताल का अन्तर (अत्यधिक पार्क होना)-नीता और गीता की आदत में आकाश-पाताल का अन्तर है।
(37) उड़ती चिड़िया पकड़ना (मन की बात जानना)-शास्त्रीजी के पास जाओ, वे उड़ती चिड़िया पकड़ लेते हैं।
(38) कान का कच्चा (अफवाहों पर विश्वास करना) श्रीवास्तवजी कान के कच्चे हैं, तभी तो रावत की बातों को सत्य मान लेते हैं।
(39) कान में तेल डालना (अनसुनी करना) क्यों विमला, आज कान में तेल डालकर बैठी हो क्या?

(40) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना (घबरा जाना) जब जयकुमार से पूछा-कहाँ से आ रहे हो तो उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं।
(41) हाथों के तोते उड़ जाना (होश उड़ना) विष्णु घर से क्या गया, नीलिमा के हाथों के तोते उड़ गये।
(42) न तीन में न तेरह में (अप्रासंगिक होना) विभाग की कार्यवाही में कितनी ही गड़बड़ हुई,पर रमेश को क्या वह न तीन में न तेरह में।
(43) सूरज को दीपक दिखाना (ज्ञानवान को ज्ञान देना) सन्ध्या जब हॉस्टल से घर आई तो नई-नई बातें बताकर सूरज को दीपक दिखा रही थी।
(44) पहाड़ टूट पड़ना (मुसीबत आ जाना)—पेट्रोल के दाम क्या बढ़े, जनता पर पहाड़ टूट पड़ा।
(45) ईद का चाँद होना (बहुत दिनों बाद दिखाई देना) स्वाति जब छुट्टियाँ मनाकर आई तो नीलम बोली, अरे ! वाह तुम तो ईद का चाँद हो गयी।’
(46) हाथ कंगन को आरसी क्या? (प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं) रेखा की चित्रकला के लिए हाथ कंगन को आरसी क्या? पूरा घर चित्रों से भरा है।
(47) चोली-दामन का साथ (घनिष्ठ सम्बन्ध)-प्रूफ रीडर और प्रकाशक का तो चोली दामन का साथ है।
(48) जी चुराना (काम न करना,काम से डरना) काशीराम हमेशा काम से जी चुराता है।
(49) कलम तोड़ना (अच्छी रचना करना)-आकाश जी जब कविता लिखते हैं, कलम तोड़ देते हैं।

(50) धूप में बाल सफेद होना (अनुभवहीन ज्ञान)-दादी ने रोहन को डाँटकर कहा, तुम मेरी बात मानने को तैयार नहीं हो,क्या धूप में मेरे बाल सफेद हुए हैं?
(51) बाल-बाँका न होना (हानि न होना)-विपत्ति में पड़ने पर धैर्य नहीं खोना चाहिये, धैर्यवान व्यक्ति का कभी बाल-बाँका न होगा।
(52) सिर धुनना (पछताना) दीपक ने अपनी सारी आमदनी जुये में गँवा दी अब सिर धुन रहा है।
(53) सिर पर कफन बाँधना (मरने से न डरना)-देश के वीर सिपाही युद्ध के लिये सिर पर कफन बाँधकर चलते हैं। [2012]
(54) आँखों में धूल झोंकना (धोखा देना) आजकल ठग आँखों में धूल झोंककर किसी भी व्यक्ति को आसानी से लूट लेते हैं।
(55) कान खड़े करना (सतर्क रहना) युद्ध स्थल में सैनिकों को सदैव कान खड़े रखना चाहिये।
(56) नाकों चने चबाना (तंग करना)-सीमा ने उधार के रुपये लौटाने में मुझे नाकों चने चबा दिये।
(57) मुँह की खाना (पराजित होना)–भारत को क्रिकेट विश्व कप में मुँह की खानी पड़ी।
(58) दाँत खट्टे करना (हरा देना) भारतीय सैनिकों ने कारगिल के युद्ध में पाकिस्तानी सेना के दाँत खट्टे कर दिये। [2013, 17]
(59) छाती पर मूंग दलना (जान-बूझकर तंग करना)-सुरेश ने रमेश से कहा-तुम अपना काम देखो, व्यर्थ में मेरी छाती पर क्यों मूंग दल रहे हो?

(60) छाती पर साँप लोटना (ईर्ष्या करना) पड़ोसी की सम्पन्नता को देखकर उसकी छाती पर साँप लोट गया।
(61) पेट में चूहे दौड़ना (बहुत भूख लगना) रमेश ने गुरुजी से कहा, अब आप मुझे छुट्टी दे दें, मेरे तो पेट में चूहे दौड़ रहे हैं।
(62) हथेली पर सरसों उगाना (जल्दी करना) देवेन्द्र तुम कुछ देर प्रतीक्षा करो हथेली पर सरसों उगाने से क्या लाभ?
(63) हाथ पीले करना (विवाह सम्पन्न करना)-आधुनिक युग में दहेज प्रथा के कारण बेटी के हाथ पीले करना पिता के लिये कठिन समस्या है।
(64) हाथ धोकर पीछे पड़ना (बुरी तरह पीछे लगना) बहुत से लोगों की आदत होती है कि वे अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये व्यर्थ ही हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं।
(65) होम करते हाथ जलना (अच्छे काम में बदनामी) समाज सेवा ऐसा कार्य है जिसमें होम करते हाथ जलने की सम्भावना बनी रहती है।
(66) मुट्ठी गरम करना (भेंट देना/रिश्वत देना)-आजकल मुट्ठी गर्म किये बिना कोई भी कार्य नहीं होता है।
(67) टेढ़ी अँगुली से घी निकालना (सीधे काम नहीं बनता)-दुष्ट व्यक्ति से कोई भी कार्य टेढी अंगुली से घी निकालने के समान है।
(68) पाँचों अँगुलियाँ घी में (सब प्रकार से सुख)-लॉटरी निकलने के बाद रमेश की पाँचों अँगुलियाँ घी में हैं।
(69) कमर टूटना (थक जाना) श्रमिकों की घोर परिश्रम के कारण कमर टूट जाती है।

(70) फूंक-फूंककर पैर रखना (सावधानी से चलना)-आज की स्पर्धा के युग में व्यापारी को अपनी उन्नति के लिये फूंक-फूंककर पैर रखना चाहिये।
(71) आँख लगना (झपकी आना) टी. वी.देखते-देखते अचानक मेरी आँख लग गयी और चोर चोरी कर ले गये।
(72) आँखें दिखाना (क्रोध करना)-तुम मुझे आँखें दिखाकर भयभीत नहीं कर सकते।
(73) आँखों से गिर जाना (सम्मान खो देना) लोग झूठ बोलने के कारण दूसरों की आँखों से गिर जाते हैं।
(74) आग लगाना (भड़काना) कुछ लोगों की आदत आग लगाकर तमाशा देखने की होती है।
(75) आँसू पीना (दुःख में विवशता का अनुभव करना)-पुत्र की मृत्यु के बाद पिता को आँसू पीकर मौन रहना पड़ा।
(76) आँसू पोंछना (धीरज देना)-हमारा कर्तव्य है कि दुःख पड़ने पर सदैव दूसरों के आँसू पोंछने का प्रयास करें।
(77) आकाश कुसुम (अनहोनी, असम्भव बात) सीमा के लिये पूरे उत्तर प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त करना आकाश कुसुम के समान प्रमाणित हुआ।
(78) आस्तीन का साँप (विश्वासघाती)-आज के युग में प्रत्येक क्षेत्र में आस्तीन के साँप विद्यमान हैं। अतः उनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है। [2013]
(79) आब उतरना (इज्जत चली जाना) चोरी करने के फलस्वरूप मोहन की आब उतर गयी।

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(80) उल्टी गंगा बहना (विपरीत काम करना) यह कार्य मेरे वश के बाहर है, तुम तो सदैव उल्टी गंगा बहाते हो। [2009]
(81) उधेड़-बुन में पड़ना (दुविधा में पड़ना) कार्य का अत्यधिक बोझ होने के कारण दीपक उधेड़-बुन में पड़ा है कि कौन-सा कार्य पहले पूरा करे।
(82) उल्लू बनाना (मूर्ख बनाना)-सोहन ने मोहन से कहा तुम कैसे धोखा खा गये, तुम तो सबको उल्लू बनाने में माहिर हो।
(83) ऊँच-नीच समझना (भले-बुरे का विवेक होना) बुद्धिमान व्यक्ति ऊँच-नीच समझकर अपना कार्य सम्पन्न करते हैं।
(84) एक आँख से देखना (समदर्शी)–माता-पिता को पुत्र एवं पुत्री को एक आँख से देखना चाहिये।
(85) एक लाठी से हाँकना (अच्छे-बुरे का अन्तर न करना)-सज्जन एवं दुर्जन को एक लाठी से हाँकना अनुचित है।
(86) कगार पर खड़े होना (मृत्यु के समीप) व्यक्ति को कगार पर खड़े होने के समय ईश्वर याद आता है।
(87) कचूमर निकालना (अत्यधिक पिटाई करना)-पुलिस ने चोर को इतना प्रताड़ित किया कि उसका कचूमर निकल गया।
(88) कच्चा चिट्टा खोलना (पोल खोलना) हत्यारे को पकड़ लिये जाने पर उसने अपने अपराध का कच्चा चिट्ठा खोल दिया।
(89) कदम चूमना (खुशामद करना) आजकल लोग आगे बढ़ने के लिये अधिकारियों के कदम चूमते हैं।

(90) कलेजा जलना (असन्तोष से दुःख होना)-दूसरों की प्रगति देखकर अपना कलेजा जलना मूर्खता है।
(91) कलेजा फटना (दुःखी होना) पति की मृत्यु के बाद सीमा का कलेजा फट गया।
(92) कलेजे पर पत्थर रखना (दु.ख में धैर्य रखना) व्यापार में घाटा आने पर मोहन ने कलेजे पर पत्थर रखकर नौकरी करना शुरू कर दी।
(93) कान कतरना (किसी से बढ़कर काम दिखाना)-प्रवीण की पुत्र-वधू इतनी निपुण है कि वह अच्छे-अच्छे के कान कतरती है।
(94) कान भरना (चुगली करना)-पड़ोसियों के कान भरना रीमा की पुरानी आदत है।
(95) कानाफूसी करना (आपस में चुपचाप सलाह करना)-विवाह में व्यवधान आने पर रोहित ने अपने सम्बन्धियों से कानाफूसी करना प्रारम्भ कर दी।
(96) कानों कान खबर न लगना (पता न लग पाना) जनता पार्टी के चुनाव में जीत जाने की किसी को कानों कान खबर न थी।
(97) कान पर जूं न रेंगना (तनिक भी प्रभाव न पड़ना) मालिक ने नौकर से कहा कि मैं तुम्हें इतनी देर से बुता रहा हूँ, पर तुम्हारे कान पर जूं नहीं रेंगती।
(98) कुत्ते की मौत मरना (बुरी मौत मरना)-पुलिस मुठभेड़ में दुर्दान्त डाकू कुत्ते की मौत मारा गया।
(99) कोरा जवाब देना (स्पष्ट मना करना) विपत्ति के समय किसी को कोरा जवाब देना अच्छा नहीं है।

(100) काबैल (दिन-रात परिश्रम करना)-पिता ने पुत्र से कहा तुम इस नौकरी को छोड़ दो, दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह पिले रहते हो फिर भी कुछ नहीं मिलता।
(101) कौड़ी का न पूछना (तनिक भी सम्मान न करना)-आजकल के पुत्र वृद्ध होने पर माता-पिता को कौड़ी का भी नहीं पूछते हैं।
(102) कौड़ी-कौड़ी को मुहताज होना (अत्यधिक गरीब) मोहन के घर चोरी हो जाने पर वह कौड़ी-कौड़ी को मुहताज हो गया।
(103) खटाई में पड़ना (काम रुक जाना) चुनाव के कारण सड़क निर्माण का कार्य खटाई में पड़ गया।
(104) खाने को दौड़ना (क्रोध करना) राम ने अपने पड़ोसी से कहा तुम व्यर्थ ही खाने को दौड रहे हो मैंने तुमसे क्या कहा है
(105) खून खौलना (अत्यधिक क्रोधित होना)-पुत्र की शरारत को देखकर पिता का खून खौल गया।
(106) खयाली पुलाव पकाना (मन ही मन कल्पना करना)-खयाली पुलाव पकाने से कोई भी काम नहीं होता, परिश्रम सफलता की कुंजी है।
(107) गरम होना (क्रोध आना) आजकल के नवयुवकों में बात-बात पर गर्म होने की आदत है।
(108) गऊ होना (अत्यन्त सीधा होना)-रोहन का स्वभाव गऊ के समान है।
(109) गागर में सागर भरना (थोड़े में बहुत कहना) बिहारी ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया है।
(110) गाल बजाना (बकवास करना)-परिश्रम करने से फल मिलेगा. गाल बजाने से नहीं।

(111) गाल फुलाना (गुस्से में चुप होना)-सीमा ने गीता से कहा तुम तो हर समय गाल फुलाये रहती हो, तुमसे कौन बात करेगा?
(112) गूलर का फूल होना (दर्शन न होना)-आज के युग में आदर्श व्यक्ति एक प्रकार से गूलर के फूल के समान हो गये हैं।
(113) गुड़ गोबर करना (बना बनाया काम बिगाड़ देना) कार्य पूर्ण होने से पहले ही विनोद ने सब गुड़ गोबर कर दिया।
(114) गुल छर्रे उड़ाना (मौज मस्ती मारना) सोहन अपने पिता की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्ति से गुल छरें उड़ा रहा है।
(115) गोल-माल करना (घपला करना)-आजकल समाचार पत्रों में अधिकांश गोल-माल के समाचार निकलते रहते हैं।
(116) गुल खिलना (रहस्य पता चलना)-पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर पता चला कि देवेन्द्र ने कौन-कौन से गुल खिलाये थे।
(117) घड़ों पानी पड़ना (लज्जित होना)-अपने पुत्र की करतूतों को सुनकर सोहन के पिता पर घड़ों पानी पड़ गया।
(118) घर फँक तमाशा देखना (अपनी परिस्थिति से अधिक व्यय करना)-घर फॅक तमाशा देखने वाले कभी जीवन में सफल नहीं होते।
(119) घाव पर नमक छिड़कना (दुःख में और दुःखी करना)-राम ने मोहन से कहा मैं तो खुद ही परेशान हूँ। तुम मेरे घावों पर नमक क्यों छिड़क रहे हो?
(120) घास खोदना (व्यर्थ समय गँवाना) अध्यापक ने छात्र से कहा कि इतने सरल प्रश्न भी नहीं कर पा रहे हो,साल भर क्या घास खोदते रहे?

(121) चम्पत हो जाना (गायब हो जाना)-पुलिस को देखकर अपराधी चम्पत हो जाते हैं।
(122) चिकना घड़ा होना (किसी बात का असर न होना)–श्याम को कितना ही समझाओ लेकिन वह तो चिकना घड़ा हो गया है। किसी की बात सुनता ही नहीं।
(123) चिकनी-चुपड़ी बातें करना (बनावटी प्रेम दिखाना)-आजकल का युग चिकनी-चुपड़ी बातें करके काम बनाने का हो गया है। [2016]
(124) चित्त कर देना (हराना) हॉकी के खेल में सेन्ट पीटर्स स्कूल के छात्रों ने राधा बल्लभ स्कूल के छात्रों को चित्त कर दिया।
(125) चुल्लू भर पानी में डूब मरना (अत्यन्त लज्जित होना)-परीक्षा में बार-बार अनुत्तीर्ण होने पर पिता ने पुत्र से कहा तुम चुल्लू भर पानी में डूब मरो।।
(126) चेहरे का रंग उतरना (उदास होना)-चोरी पकड़े जाने पर सुरेश के चेहरे का रंग उतर गया।
(127) चैन की बंशी बजाना (सुखपूर्वक रहना) लॉटरी निकल आने पर महेश चैन की बंशी बजा रहा है।
(128) छक्के छूटना (पराजित होना) भारतीय सैनिकों के समक्ष पाकिस्तान की सेना के छक्के छूट गये।
(129) छक्के छुड़ाना (निरुत्साहित कर देना) लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये।
(130) छक्के पंजे करना (मौज मनाना)-पूँजीपति बिना श्रम के छक्के पंजे करते रहते

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(131) छठी का दूध याद आना (अत्यधिक परेशानी का अनुभव करना) पर्वतारोहियों को दुर्गम चढ़ाई चढ़ने में छठी का दूध याद आ गया।
(132) छिद्रान्वेषण करना (दोष ढूँढ़ना)-मित्रों का छिद्रान्वेषण करना उचित नहीं होता है।
(133) छापा मारना (छिपकर आक्रमण करना) विद्युत विभाग ने बड़े-बड़े व्यापारियों पर छापा मारना शुरू कर दिया।
(134) छींटाकशी करना (व्यंग्य करना) बहुत-से लोगों की प्रवृत्ति दूसरों पर छींटाकशी करके प्रसन्न होने की होती है।
(135) छाया करना (संरक्षण देना)-पिता पुत्र के निमित्त सदैव छाया बनकर रहता है।
(136) जबान में लगाम रखना (सम्भल कर बात करना)-बड़ों के समक्ष हमेशा जबान में लगाम रखकर बात करनी चाहिये।
(137) जबान चलाना (जरूरत से ज्यादा बोलना)- तुम चुप क्यों नहीं रहते व्यर्थ में जबान चला रहे हो।
(138) जबानी जमा खर्च (व्यर्थ की बातें विकास कार्य की योजनाएँ आजकल जबानी जमा खर्च तक सीमित रह गयी हैं।
(139) जमीन-आसमान एक करना (सीमा से अधिक कर गुजरना)-परीक्षा के समय विद्यार्थी जमीन-आसमान एक कर देते हैं।
(140) जमीन पर पाँव न रखना (अभिमान करना) अचानक धन प्राप्त होने पर महेश के पाँव जमीन पर नहीं पड़ते।

(141) जली-कटी सुनाना (भली-बुरी कहना) नौकर के उचित प्रकार काम न करने पर मालिक ने उसे जली-कटी सुनाना प्रारम्भ कर दिया।
(142) जड़ खोदना (समूल नष्ट करना) चाणक्य ने अपनी कूटनीति से नन्दवंश की जड़ खोद दी।
(143) जड़ तक पहुँचना (कारण का पता लगा लेना) हमें बात की जड़ तक पहुँचे बिना किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिये।
(144) जहर बोना (दूसरे के लिये संकट उत्पन्न करना) बहुत से लोगों का स्वभाव जहर बोकर दूसरों को कष्ट पहुँचाने का होता है।
(145) जहर उगलना (उग्र बातें करना)-पाकिस्तानी शासक भारत के विरुद्ध जहर उगलते रहते हैं।
(146) जहर का यूंट पीना (क्रोध रोके रहना)-झगड़ा हो जाने पर रमेश जहर का घुट पीकर रह गया।
(147) जान पर खेलना (जोखिम का काम करना)-सुरेश ने अपनी जान पर खेलकर डूबते बच्चे की जान बचायी।
(148) जान में जान आना (भय टल जाना)—भूकम्प समाप्त होने पर लोगों की जान में जान आ गयी।
(149) जान के लाले पड़ना (संकट पड़ना)-अकालग्रस्त क्षेत्र में अन्न के अभाव के कारण जान के लाले पड़ जाते हैं।
(150) आपे से बाहर होना (क्रोध में होश खो बैठना) जगदीश ने श्याम से कहा मेरी जरा-सी भूल पर तुम आपे से बाहर क्यों हो रहे हो?

(151) जी हल्का होना (शान्ति प्राप्त होना)—पुत्र को रोग से मुक्त देखकर माँ का जी हल्का हो गया।
(152) जी छोटा करना (निराश होना)-रमेश ने मोहन से कहा मैं तुम्हारी सहायता के लिये तैयार हूँ, तुम जी छोटा क्यों करते हो?
(153) जी खट्टा होना (स्नेह कम होना)—पैतृक सम्पत्ति में विधिवत् विभाजन न होने पर भाइयों का आपस में जी खट्टा हो गया।
(154) जी का जंजाल (परेशानी का कारण) दुष्ट का संग जी का जंजाल होता है।
(155) जीती बाजी हारना (काम बनते-बनते बिगड़ जाना) सचिन के चोट लगने के कारण भारतीय टीम जीती बाजी हार गयी।
(156) झाँसा देना (धोखा देना)-अपराधी पुलिस वाले को झांसा देकर भाग गया।
(157) टकटकी बाँधना (लगातार देखना)-पपीहा स्वाति नक्षत्र के बादलों को टकटकी लगाकर देखता रहता है।
(158) टस से मस न होना (अड़े रहना)-रावण विभीषण के लाख समझाने पर भी टस से मस नहीं हुआ।
(159) टाँग अडाना (बाधा डालना)-पिता ने पुत्र को समझाते हुए कहा, बड़ों के बीच में टाँग अड़ाना अनुचित है।
(160) टाँग पसार कर सोना (निश्चिन्त होना) बेटी का विवाह सम्पन्न होने पर माता-पिता टॉग पसार कर सोते हैं।

(161) टोपी उछालना/पगड़ी उछालना (अपमान करना) बरात को लौटाकर वर पक्ष ने कन्या के पिता की टोपी उछालकर अच्छा नहीं किया। [2009]
(162) ठोकना बजाना (पूर्णतः परख के देखना)-आधुनिक युग में नौकरों को ठोक बजाकर ही काम पर रखना चाहिये।
(163) डंके की चोट पर कहना (निर्भीकतापूर्वक कहना)-निर्भीक लोग अधिकारियों की काली करतूतों को डंके की चोट पर उजागर करते हैं।
(164) डींग हाँकना (झूठी शेखी बघारना) बहुत से लोगों की व्यर्थ में ही डींग मारने की आदत होती है।
(165) ढिंढोरा पीटना (व्यर्थ प्रचार करना)–नौकरी मिलने से पूर्व ही मोहन ने ढिंढोरा पीटना प्रारम्भ कर दिया कि वह एक उच्च अधिकारी बन गया है।
(166) ढोल में पोल होना (सारहीन सिद्ध होना)-आजकल के नेताओं के कथन ढोल में पोल सिद्ध होते हैं।
(167) ढाल बनना (सहारा बनना)-पत्नी के लिये पति ढाल के समान होता है।
(168) ढुलमुल होना (अनिश्चय) व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त करनी हो तो ढुलमुल नीति से नहीं चलना चाहिये।
(169) ढील देना (छूट देना)-माता-पिता द्वारा बच्चों को अधिक ढील देना हानिकारक
(170) तलवे चाटना (खुशामद करना) आजकल बहुत से लोग दूसरों के तलवे चाटकर अपना काम बना लेते हैं।

(171) तारे गिनना (नींद न आना)-सीताजी राम के विरह में तारे गिन-गिन कर अपना समय व्यतीत करती थीं।
(172) तिल का ताड़ बनाना (छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना) राम ने मोहन से कहा तुमने तिल का ताड़ बनाकर बने बनाये काम को बिगाड़ दिया।
(173) तिलांजलि देना (पूरी तरह त्याग देना) झूठ को तिलांजलि देना सफलता का द्योतक है।
(174) तितर-बितर होना (अलग-अलग होना)-पुलिस को देखकर जुआरी तितर-बितर हो गये।
(175) तीन तेरह होना (तितर-बितर होना)-पिता की मृत्यु के उपरान्त सम्पूर्ण परिवार तीन तेरह हो गया।
(176) तूती बोलना (अधिक प्रभावशाली होना)-आजकल देश में आतंकवादियों की तूती बोल रही है। [2009]
(177) थूक कर चाटना (बात कहकर मुकर जाना)-पाकिस्तानी शासकों का स्वभाव थूक कर चाटने जैसा है।
(178) दम मारना (थोड़ा विश्राम करना)-परीक्षा समाप्त होने के उपरान्त विद्यार्थियों को दम मारने की फुरसत मिली।
(179) माथा ठनकना (पहले से ही विपरीत बात होने की आशंका)-पिता को अत्यधिक रोगग्रस्त देखकर मृत्यु की आशंका से पुत्र का माथा ठनक गया। [2014]
(180) कपाल क्रिया करना (मार डालना)-वीर युद्धभूमि में शत्रुओं की कपाल क्रिया करके ही चैन की साँस लेते हैं।

(181) भाग्य फूटना (दुर्भाग्य का आना)-एकमात्र पुत्र का निधन होने पर उसकी माँ के भाग्य ही फूट गये।
(182) नमक हलाली करना (ईमानदारी बरतना)-स्वामिभक्त सेवक नमक हलाली करके अपनी वफादारी का परिचय देते हैं।
(183) बाल-बाल बचना (परेशानी आने से बचना)-ट्रक की चपेट में आने पर वह बाल-बाल बच गया।
(184) नाक भौं सिकोड़ना (अप्रसन्नता प्रकट करना) जरा-जरा-सी बात पर नाक भौं सिकोड़ना उचित नहीं है।
(185) छोटे मुँह बड़ी बात (सीमा से अधिक कहना)-स्वामी ने नौकर से कहा छोटे मुँह बड़ी बात अच्छी नहीं होती।
(186) दाँतों तले उँगली दबाना (चकित होना) ताजमहल के सौन्दर्य को देखकर विदेशी दाँतों तले उँगली दबाते हैं। [2014]
(187) अँगुली उठाना (दोषारोपण करना) बिना सोचे-समझे दूसरों पर अंगुली उठाकर लोग अपने दोषों पर पर्दा डालते हैं।
(188) ऐड़ी-चोटी का पसीना एक करना (भरपूर परिश्रम करना) परीक्षा के समय छात्र ऐड़ी-चोटी का पसीना एक करके ही दम लेते हैं।
(189) गड़े मुर्दे उखाड़ना (बीती बातें याद करना) बहुत से लोगों का स्वभाव गढ़े मुर्दे उखाड़ना होता है।
(190) अंधेर मचाना (खुला अन्याय करना)-आजकल आतंकवादियों ने अंधेर मचा रखा है। [2009, 14]

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(191) अन्धा धुन्ध (बिना रोक-टोक के) अन्धाधुन्ध वाहन चलाने के कारण दुर्घटनाएँ घटित हो रही हैं।
(192) अपनी पड़ना (अपनी चिन्ता) भूकम्प आने पर सबको अपनी-अपनी पड़ रही थी।
(193) अचकचाना (भ्रमित होना)-मानसिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्ति प्रत्येक कार्य में अचकचाते रहते हैं।
(194) उखाड़-पछाड़ करना (आगे-पीछे की बातों को याद करके संघर्ष करना)-उखाड़-पछाड़ करने से झगड़ा शान्त होने के बजाय और बढ़ जाता है।
(195) उठान रखना (पूर्ण प्रया स करना)-विपत्ति के समय उठान रखकर ही व्यक्ति को विपत्ति से मुक्ति मिलती है।
(196) कलेजा मुँह को आना (अत्यधिक दुःखी होना) श्रवण कुमार की मृत्यु का समाचार सुनकर उसके माँ-बाप का कलेजा मुँह को आ गया।
(197) कलेजे पर हाथ रखना (अपने, आप विचार करना)-विपत्ति पड़ने पर मोहन ने सोहन से कहा कि तुम अपने कलेजे पर हाथ रखकर देखो तब पता चलेगा।
(198) कान खड़े होना (सतर्क होना)—पुलिस के आने पर चोरों के कान खड़े हो गये।
(199) काम आना (युद्ध में वीर गति को प्राप्त होना)-देश के वीर युद्धभूमि में काम आकर अमर हो जाते हैं।
(200) गुदड़ी का लाल (निर्धन परन्तु गुणवान व्यक्ति)–भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री गुदड़ी के लाल थे। [2009]
(201) पलकें बिछाना (आतुर होकर प्रतीक्षा करना) विश्व विजेता भारतीय क्रिकेट दल के सदस्यों की अगवानी हेतु उनके शहरवासी पलकें बिछाये बैठे थे। [2012]
(202) खून का यूंट पीना (चुपचाप अपमान सहन करना) सास द्वारा बहू को गलती न होने के बावजूद डाँटे जाने पर भी वह खून का यूंट पीकर रह गई। [2016]

2. लोकोक्तियाँ (कहावतें)

मनुष्य का जीवन अनुभवों से भरा है। कभी-कभी एक ही अनुभव कई लोगों को होता है और उनके मुँह से जो बातें निकलती हैं वे प्रचलित होकर कहावत बन जाती हैं। लोक + उक्ति = लोकोक्ति, लोगों द्वारा कहा गया कथन है। ये लोकोक्तियाँ प्रायः नीति, व्यंग्य, चेतावनी, उपालम्भ आदि से सम्बन्धित होती हैं। अपनी बात की पुष्टि के लिए लोग लोकोक्ति का सहारा लेते हैं। कभी-कभी बिना असली बात कहे हुए भी लोग लोकोक्ति बोल देते हैं और वास्तविक अर्थ प्रसंग से समझ लिया जाता है।

लोकोक्तियाँ मुहावरे की अपेक्षा विस्तृत होती हैं। ये क्रियार्थक नहीं होतीं। ये अविकारी होती हैं, इन्हें लिंग, वचन के अनुसार बदलते नहीं हैं। इन्हें वाक्यों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। ये वाक्यरूप में ही अपने आप में पूर्ण होती हैं। लोकोक्तियाँ लेखकों के लेखन या भाषणकर्ताओं से निसृत होकर प्रचलित होती हैं। लोकोक्ति साहित्य का गौरव है। इन्हें समझने के लिए इनका सही अर्थ जानना आवश्यक है, तभी इनका प्रयोग सफल होगा।

लोकोक्ति का प्रयोग करते समय इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए
(1) लोकोक्ति पढ़ते-पढ़ते ऐसे विस्तृत अनुभव को पकड़ने का प्रयास करना चाहिए, जिसका प्रतिनिधि बनकर लोकोक्ति का शब्द और अर्थ प्रयोग में लाया जाये।
(2) उस अनुभव वाले अर्थ को संक्षिप्त में एक वाक्य में स्पष्ट कर देना चाहिए।
(3) वर्तमान परिस्थिति में उस अनुभव को घटित करने वाली घटना और लोकोक्ति के अनुभव वाले अर्थ को फिर देख लेना चाहिए कि दोनों समानता रखते हों।।
(4) अब उक्त घटना को एक या दो वाक्यों में लिखकर उसके अन्त में समर्थन रूप में लोकोक्ति लिखनी चाहिए।

कुछ लोकोक्तियाँ,उनके अर्थ और वाक्य प्रयोग इस प्रकार हैं-
(1) अपना हाथ जगन्नाथ (अपने हाथ से किया गया काम सबसे अच्छा होता है। माँ ने कहा इससे अच्छे आपके कपड़े में नहीं धो सकती। बेहतर हो आप स्वयं साफ करें। सुना है न-अपना हाथ जगन्नाथ।
(2) अपने मरे सरग दिखता है (स्वयं कार्य करने से ही काम बनता है)-सेठजी ने नौकर को जरूरी काम से बाजार भेजा परन्तु दो बार जाने के बाद भी वह उस काम को नहीं कर पाया। इस पर सेठजी ने कहा-अपने मरे ही सरग दिखता है।
(3) अपने लड़के को काना कौन कहता है (अपनी वस्तु सभी को सुन्दर लगती है। रोहित अपनी हर चीज की बहुत तारीफ करता है परन्तु दूसरों की चीजों में नुक्स निकालता है। सच ही कहा गया है-अपने लड़के को काना कौन कहता है।
(4) अपना दाम खोटा तो परखैया क्या करे (जब स्वयं में दोष हो तो दूसरे भी बुरा कहेंगे) रीना का छोटा बेटा बड़ा ही उद्दण्ड है, जब पड़ौसी से उसका झगड़ा हुआ तो रीना बोली-अपना दाम खोटा तो परखैया क्या करे।
(5) अपनी करनी पार उतरनी (अपने ही परिश्रम से सफलता मिलती है) नरेश नकल की उम्मीद में रहकर परीक्षा में फेल हो गया तो उसकी माँ ने उसे समझाते हुए कहा-अपनी करनी पार उतरनी। [2009]
(6) अपनी-अपनी ढपली अपना राग (अपनी ही बातों को महत्ता देना)-आजकल तो सभी लोग अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलापते हैं।
(7) अपने ही शालिग्राम डिब्बे में नहीं समाते (जो अपना ही काम पूरी तरह नहीं कर पाता, वह दूसरों की क्या मदद करेगा) नन्दू बड़ा ही कामचोर है,एक बार जब वह पड़ौसी की मदद के लिये गया तो पड़ौसी ने कहा-रहने दो, तुम्हारे तो अपने ही शालिग्राम डिब्बे में नहीं समाते।
(8) अन्या पीसे कुत्ता खाय (नासमझ के कामों का लाभ चतुर उठाते हैं) महेश बहुत ही नासमझ है, हर कोई उसे बेवकूफ बनाकर अपना काम निकाल लेता है, उसका तो वही हिसाब है-अन्धा पीसे कुत्ता खाए।
(9) अतिसय रगर करे जो कोई, अनल प्रकट चन्दन ते होई (अधिक परिश्रम से कठिन काम भी सिद्ध होते हैं या अधिक छेड़ने से शान्त पुरुष भी गरम हो जाता है) विकास ने रात-दिन मेहनत करके आई. ए. एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की तो उसकी दादी ने कहा-अतिशय रगर करे जो कोई, अनल प्रकट चन्दन ते होई।

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(10) अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गईं खेत (हानि होने से पहले रक्षा का प्रबन्ध करना चाहिए)-सेठ करोड़ीमल ने कंजूसी के कारण अपने जर्जर हुए मकान की मरम्मत नहीं कराई। जब बरसात में उनका मकान गिर पड़ा तो उनकी पत्नी ने कहा-अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गईं खेत।
(11) अन्या क्या चाहे दो आँखें (मनचाही वस्तु देने वाले से और कुछ नहीं चाहिए) रामकिशन ने जब भिखारी को भोजन और कपड़ा दिया तो वह खुश हो गया। भई, अन्धा क्या चाहे दो आँखें।
(12) अकल बड़ी कि भैंस (वयस = उम्र) (उम्र के बड़प्पन से बुद्धि की श्रेष्ठता अधिक अच्छी है) घण्टों से साइकिल ठीक करने में जुटे रमेश के पन्द्रह वर्षीय भतीजे ने पलक झपकते ही साइकिल की खराबी दूर कर दी। किसी ने ठीक ही कहा है-अकल बड़ी या भैंस।
(13) आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास (ऊँचे उद्देश्य की तैयारी करके साधारण काम में जुट जाना)-सुरेश गाँव छोड़कर शहर में डॉक्टर बनने के सपने लेकर आया था परन्तु बमुश्किल उसे छोटी सी नौकरी ही मिल सकी। किसी ने ठीक ही कहा है-आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास।
(14) आम के आम गुठलियों के दाम (किसी वस्तु से दुहरा लाभ होना)-ट्रॉली वाले मलबा उठाने तथा मलबा डालने,दोनों के पैसे लेते हैं। उनके तो आम के आम गुठलियों के दाम
(15) आँख का अन्धा गाँठ का पूरा (नासमझ धनी पुरुष जो ठगी में पड़कर हानि उठाता है) जीवन ने परिणाम जानते हुए भी रेल में बेटिकट यात्रा की और पकड़ा गया। इसे कहते हैं-आँख का अन्धा गाँठ का पूरा।
(16) आँख के अन्धे नाम नयनसुख (नाम के विपरीत गुण होना)-ताले ठीक करने वाले से एक साधारण से ताले की चाबी भी न बन सकी तब ऐसा लगा मानो आँख के अन्धे नाम नयनसुख वाली कहावत चरितार्थ हो रही हो।।
(17) आधी रात खाँसी आए, शाम से मुँह फैलाये (काम का समय आने के बहुत पहले ही चिन्ता करने लगना)-मुनिया की शादी में अभी पूरे छः माह पड़े हैं परन्तु रामलाल ने अभी से पूरे घर में हाय-तौबा मचा रखी है। ऐसा लगता है मानो आधी रात खाँसी आये, शाम से मुँह फैलाये।
(18) आधा तेल आधा पानी (ऐसी मिलावट जो अनुपयोगी हो)-दुकानदार ने अधिक मुनाफा कमाने की जुगत में देशी घी में डालडा घी मिलाकर बेचना चाहा परन्तु सफल न हो सका। इसे कहते हैं-आधा तेल आधा पानी।
(19) इधर कआँ उधर खाई (दविधा की स्थिति या दोनों तरफ से हानि की सम्भावना) चोटिल सचिन को फाइनल मैच में खिलाएँ अथवा नहीं, पूरी टीम यह सोचती रही क्योंकि सभी खिलाड़ी जानते थे कि इधर कुआँ है और उधर खाई।।
(20) ईश्वर देता है तो छप्पर फाड़ के (अकस्मात् अत्यधिक लाभ हो जाना)-सब्जी बेचने वाली की लॉटरी क्या लगी उसकी तो किस्मत ही बदल गई। किसी ने ठीक ही कहा है-ईश्वर देता है तो छप्पर फाड़के।

नोट-आगे कुछ लोकोक्तियों के मात्र अर्थ दिये जा रहे हैं। विद्यार्थियों से अपेक्षा है कि वे अर्थ को भली-भाँति समझकर इन लोकोक्तियों को वाक्यों में प्रयोग करने का अभ्यास करेंगे।
(1) उल्टा चोर कोतवाल को डॉट-अनुचित काम करके भी न दबना।
(2) ऊखल में सिर देकर मूसलों का क्या डर–एक बार किसी मार्ग पर चल पड़ो तो फिर संकटों से घबराना नहीं चाहिए।
(3) ऊसर में मसर-व्यर्थ ही बीच में अड़ना।
(4) एक साथै, सब सधै, सब साधै सब जाय-एक हो काम मन लगाकर करना चाहिए, यदि निश्चय डिग गया तो सब नष्ट हो जायेगा।
(5) एक चना क्या भाड़ फोड़ेगा-अकेला व्यक्ति बड़ी योजना सफल नहीं बना पाता।
(6) एक हाथ से ताली नहीं बजती-लड़ाई या मित्रता अकेले सम्भव नहीं।
(7) एक मछली तालाब को गन्दा करती है-एक के दुष्कर्म से सहकर्मी बदनाम होते हैं।
(8) ओछे की प्रीति बालू की भीति-तुच्छ व्यक्ति की मित्रता स्थायी नहीं होती।
(9) आधी छोड़ सबको धावै, आधी जाय न सबरी पावै-लालच व्यक्ति के हाथ छ नहीं आता।
(10) काठ के उल्लू-निकम्मा आदमी। किसी काम का नहीं ;

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(11) कर नहीं तो डर नहीं-बुरा न किया तो किसी से डरना कैसा।।
(12) कड़वा करेला नीम चढ़ा-दुष्ट व्यक्ति को दुष्ट की संगति मिल जाये तो वह और अधिक दुष्ट हो जाता है।
(13) कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा इधर-उधर की वस्तुओं से काम चलाना।
(14) काम परै कछु और है, काम सरै कुछ और-स्वार्थ पूरा होने पर आदमी बदल जाता है।
(15) काजी घर के चूहे सयाने–चतुर लोगों की संगति में छोटे लोग भी चतुराई सीख जाते हैं।
(16) काजर की कोठरी में कैसहू सयानो जाय, एक लीक काजर की लागि है सो लागि है कुसंगति से कुछ न कुछ हानि अवश्य होती है।
(17) कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर सभी को सभी से काम पड़ता है।
(18) खोदा पहाड़ निकली चुहिया–बड़े श्रम से थोड़ा लाभ।
(19) खरगोश के सींग असम्भव बात,जो न देखी न सुनी।
(20) गुरु गुड़ हो रहे चेला शक्कर हो गये जिससे कोई गुण सीखा हो, उसकी अपेक्षा अधिक चतुराई दिखाना।।
(21) घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध-समीप रहने वाले गुणी को लोग महत्त्व नहीं देते, दूर वाले को सम्मान करते हैं।
(22) गिलोय और नीम चढ़ी-दुर्गुणों में और वृद्धि हो जाना,दो-दो दुर्गुण।

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MP Board Class 12th Special Hindi बोली, विभाषा, मातृभाषा, राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा

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1. भाषा

‘भाषा’ शब्द की मूल क्रिया भाष’ है। भाष का अर्थ ‘बोलना’ या ‘कहना’ होता है। जिन ध्वनियों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है,उसकी समष्टि को भाषा कहते हैं। बोलते समय हमारे विचारों की पूर्ण अभिव्यक्ति ध्वनि-चिह्नों से नहीं होती, मदद के लिए हम इंगित का भी प्रयोग करते हैं; जैसे-मुखाकृति, नयनों के भाव, हाथों का संचालन आदि। इंगित की सहायता के बिना वाणी अभिव्यक्ति में अपूर्ण रह जाती है।

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परिभाषा-उच्चरित ध्वनि-संकेतों की सहायता से भाव या विचार की पूर्ण अभिव्यक्ति भाषा है। भाषा के मुख के कण्ठ,तालु आदि उच्चारण अवयवों से बोली गयी वह ध्वनि है जिसके द्वारा किसी समाज के लोग आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। भाषा के तीन पक्ष होते हैं-

(1) व्यक्तिगत,
(2) सामाजिक,
(3) सामान्य या सर्वव्यापक।

भाषा के उपयोग का सबसे व्यापक क्षेत्र व्यक्ति और समाज के सम्पर्क से उत्पन्न होता है। मनुष्य का अपने आप से या किसी दूसरे व्यक्ति से भाषा की दृष्टि से जो सम्बन्ध है, वह अपेक्षाकृत सीमित होता है। जिस प्रकार कोई कार्य करने के लिए अपने अंगों में समन्वय की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार व्यक्ति भी समाज के अंग होते हैं और परस्पर समन्वय तथा संगठन बनाये रखने के लिए भाषा का उपयोग अपेक्षित है। सामाजिक दृष्टि से भाषा के चार उपयोग हैं :
(1) सूचन,
(2) प्रेरण,
(3) रसन,
(4) चिन्तन।

(1) भाषा का बहुलांश सूचनात्मक होता है। तकनीकी विषय, विज्ञान, इतिहास, भूगोल और समाचार-पत्र का उद्देश्य किसी न किसी प्रकार की सूचना देना होता है।
(2) प्रेरण को भाषा का गत्यात्मक उपयोग,कह सकते हैं। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग जनमत के निर्माण या किसी वस्तु के पक्ष-विपक्ष में धारणा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
(3) सामाजिक दृष्टि से भाषा का तीसरा उपयोग रचनात्मक या रसास्वादन है, जिसमें भाषा का रमणीय पक्ष सामने आता है। इसका मुख्य लक्षण भावों को उद्दीपन करना है। जैसे—युद्ध आदि के अवसर पर वीर रस की कविताएँ या चुनाव-प्रचार के समय जोशीले भाषण जन-भावना को जगाने की दृष्टि से होते हैं। इसका प्रधान उद्देश्य सौन्दर्यबोध भी है।
(4) भाषा का अन्यतम सामाजिक उपयोग चिन्तन से सम्बद्ध है। हम अपनी कोई वैयक्तिक समस्या सुलझाने के लिए जो चिन्तन करते हैं, वह समाज-निरपेक्ष होता है। इसके विपरीत धर्म,दर्शन, अर्थनीति, राजनीति आदि का सैद्धान्तिक निरूपण समाज-सापेक्ष चिन्तन के अन्तर्गत आता है।

भाषा के इन उपयोगों में परस्पर संकीर्णता नहीं है, क्योंकि एक की सीमा दूसरे से मिल जाती है।

भाषा का प्रयोग कई अर्थों में होता है। भाषा शब्द का प्रयोग कभी व्यापक अर्थ में होता है तो कभी संकुचित। जैसे—मूक भाषा,पशु-पक्षियों की भाषा आदि। व्यक्त वाणी का अर्थ यह भी है कि स्पष्ट और पूर्ण अभिव्यंजना हो जो वाचिक भाषा के सूक्ष्म अर्थ की बोधक है।

2. बोली

शिक्षा, संस्कार, पालन-पोषण, व्यवसाय, सामाजिक स्थिति, वातावरण आदि के भेद से व्यक्ति की भाषा का निर्धारण होता है। प्रत्येक व्यक्ति की भाषा दूसरे से भिन्न होती है या प्रत्येक व्यक्ति की भाषा स्वतन्त्र बोली जाती है। उसकी अपनी भाषा की विशेषता दूसरों से भिन्न होती है। किन्तु एक व्यक्ति की भाषा सदा एकरूप नहीं होती।

एक भाषा-क्षेत्र में कई उप-बोलियाँ होती हैं। प्रकृति की दृष्टि से भाषा और बोली में अन्तर करना बहुत कठिन है। ‘बोली’ किसी भाषा के एक ऐसे सीमित क्षेत्रीय रूप को कहते हैं जो ध्वनि, रूप, वाक्य-गठन, अर्थ,शब्द-समूह तथा मुहावरों आदि की दृष्टि से उस भाषा के अन्य क्षेत्रीय रूपों से भिन्न होती है।

जब बोली किन्हीं कारणों से महत्त्व प्राप्त कर लेती है तो भाषा कहलाने लगती है।

  • मध्य प्रदेश की मुख्य बोलियाँ –
  • मालवी – देवास,इन्दौर, धार, उज्जैन,रतलाम। [2009]
  • निमाड़ी – खरगौन, बड़वानी, खंडवा,झाबुआ।
  • ब्रज – भिण्ड,मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, गुना।
  • बुन्देली – दतिया, टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, जबलपुर। [2009]
  • छत्तीसगढ़ी – सरगुजा, बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग।
  • बघेली – रीवा, सतना, सीधी, बालाघाट, शहडोल।
  • खड़ी बोली–प्रायः पूरे प्रदेश में पढ़े – लिखे सुसंस्कृत लोगों की बोली है। इसमें संस्कृत के साथ अरबी, फारसी, अंग्रेजी के तद्भव शब्दों के रूप मिलते हैं।

3. विभाषा (उप-भाषा)

इसे उप-भाषा भी कहा जाता है। विभाषा का क्षेत्र भाषा से कम व्यापक एकं बोली से अधिक विस्तृत होता है। एक प्रदेश में अथवा प्रदेश के भाग में सामान्य बोल-चाल, साहित्य आदि के लिए प्रयुक्त होने वाली भाषा को विभाषा कहते हैं। इसे क्षेत्रीय भाषा भी कहते हैं। पूर्वी हिन्दी, पश्चिमी हिन्दी,राजस्थानी, बिहारी एवं गढ़वाली आदि विभाषाएँ हैं।

हिन्दी की पाँच उप-भाषाएँ हैं और प्रत्येक उप-भाषा की निम्नलिखित बोलियाँ हैं
(1) शौरसेनी-पश्चिमी हिन्दी (ब्रजभाषा,खड़ी बोली,बाँगरू, कन्नौजी,बुन्देली)। राजस्थानी (मेवाती,मारवाड़ी,मालवी,जयपुरी)। गुजराती (सौराष्ट्री)।
(2) अर्द्धमागधी-पूर्वी हिन्दी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी) मागधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली,बंगला,असमी,उड़िया।
(3) खस–पहाड़ी (गढ़वाली, कुमाऊँनी, गोरखाली)।
(4) ब्राचड़-पंजाबी, सिन्धी।
(5) महाराष्ट्री-मराठी,कोंकणी।

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4. मातृभाषा

जो जिस प्रान्त का होता है और उसके माता-पिता,विशेषकर माता जो बोली बोलती हैं,वह मातृभाषा कहलाती है। भारत में बोलियों के अलावा 15 भाषाएँ प्रमुख हैं,जो वहाँ के सम्बन्धित निवासियों की मातृभाषा है। हिन्दी,मराठी, गुजराती,बंगला, असमिया,तेलुगू, तमिल,मलयालम, कन्नड़,पंजाबी,सिन्धी,उड़िया,उर्दू-ये प्रमुख मातृभाषाएँ हैं। इनको संविधान में भी स्थान प्राप्त है। प्रायः इन सभी भाषाओं में साहित्य की रचना की गयी है। इसलिए इन्हें भाषा का दर्जा प्राप्त है।

5. राजभाषा

राजभाषा और राष्ट्रभाषा ये दोनों शब्द मिलते-जुलते हैं,पर इनमें सामान्य और पारिभाषिक शब्द भिन्न हैं। अंग्रेजी में इनको ‘ऑफिशियल लेंग्वेज’ और ‘नेशनल लेंग्वेज’ कहते हैं।

राजभाषा यानी सरकारी कामकाज की भाषा अथवा भारतीय संघ की भाषा है। भारत का संविधान बनाते समय हिन्दी को राजभाषा माना गया। सात राज्यों में हिन्दी राजभाषा है, शेष राज्यों में अपनी-अपनी प्रदेशों की भाषाएँ हैं। सिन्धी, संस्कृत, कश्मीरी किसी भी राज्य की राजभाषा नहीं है।

राजभाषा बनाने के लिए सरकारी कामकाज इसी भाषा में होना चाहिए। शिक्षा का माध्यम, कार्य के निर्णय,रेडियो और दूरदर्शन में राजभाषा का प्रयोग होना चाहिए। लेकिन अहिन्दी भाषी राज्यों की सुविधा को ध्यान कर भारतीय संविधान में अंग्रेजी का प्रयोग सीमित समय तक के लिए रखा गया है।

6. राष्ट्रभाषा

प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत राष्ट्रभाषा होती है। राष्ट्रभाषा में राष्ट्र की संस्कृति, साहित्य और इतिहास की प्रेरणाएँ निहित होती हैं,जो जनजीवन को प्रभावित करती हैं। बहुभाषी देशों में सभी भाषाओं को समान सम्मान मिलता है,लेकिन वहाँ सम्पर्क की एक ही भाषा होती है जो राष्ट्रभाषा कहलाती है। देश के विभिन्न प्रदेश अपने प्रदेश में अपनी भाषा का प्रयोग कर सकते हैं, किन्तु जहाँ सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रश्न आता है, वहाँ वे अपनी राष्ट्र भाषा का ही प्रयोग करते हैं। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय संविधान में हिन्दी को राष्ट्र भाषा का पद दिया गया है।

राष्ट्रभाषा उसी तरह महत्त्वपूर्ण होती है,जैसे-राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज अथवा राष्ट्र चिह्नी वह पूरे राष्ट्र की संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी भाषा से उस व्यक्ति,समाज, देश का व्यक्तित्व झलकता है।

राष्ट्रभाषा के लिए सम्पर्क भाषा शब्द भी प्रयुक्त होता है।

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हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रमुख कारण यह है कि देश में इसके बोलने वाले 52 प्रतिशत से अधिक हैं। यही एकमात्र ऐसी भाषा है जो सभी प्रान्तों में किसी न किसी रूप में समझी जा सकती है। देश के सात हिन्दी राज्यों में हिन्दी मातृभाषा के रूप में प्रयुक्त होती है। हिन्दी का उद्भव संस्कृत परम्परा से जुड़े होने के कारण समस्त आर्य-परिवार की प्रान्तीय भाषा-शब्दावली हिन्दी से जुड़ी प्रतीत होती है।

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MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य-परिवर्तन

MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य-परिवर्तन

किसी वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्यों में, अर्थ का परिवर्तन किये बिना परिवर्तित करने की प्रक्रिया को वाक्य-रूपान्तरण या वाक्य-परिवर्तन कहते हैं। किसी भी वाक्य को दूसरे वाक्यों में बदला जा सकता है, किन्तु उसके मूल भाव या अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।

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वाक्य-रूपान्तरण के कुछ उदाहरण यहाँ दिये जा रहे हैं :
1. साधारण या सरल वाक्य से मिश्रित वाक्य में
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2. सरल वाक्य से संयुक्त वाक्य
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3. मिश्रित वाक्य से सरल वाक्य में
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4. मिश्रित वाक्य से संयुक्त वाक्य में
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5. संयुक्त वाक्य से मिश्रित वाक्य में
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6. कर्तृवाचक वाक्य से कर्मवाच्य वाक्य में
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7. विधिवाचक वाक्य से निषेधवाचक वाक्य में
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8. विधिवाचक वाक्य से प्रश्नवाचक वाक्य में
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9. विधिवाचक वाक्य से आज्ञावाचक वाक्य में
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निम्नलिखित वाक्यों को कोष्ठक में दिये गये निर्देश के अनुसार रूपान्तरित कीजिये
1. वह मेरा मित्र है। (बिना भाव बदले निषेधात्मक)
[वह मेरा शत्रु नहीं है।

2. राम घर पर है। (सन्देहवाचक)
[शायद राम घर पर है।

3. आलसी व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता। (मिश्रित वाक्य)
[जो व्यक्ति आलसी होता है,वह उन्नति नहीं कर सकता।]

4. भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता। (प्रश्नवाचक)
क्या भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता?]

5. उसने ताजमहल देखा है। (प्रश्नवाचक) (2012, 14)
क्या उसने ताजमहल देखा है?]

6. मैं यहाँ के प्राचार्य को नहीं जानता हूँ। (मिश्रित वाक्य)
मैं नहीं जानता हूँ कि यहाँ के प्राचार्य कौन हैं?

7. देशभक्त देश की रक्षा करते हैं। (आदेशात्मक)
देशभक्तो ! देश की रक्षा करो।

8. मैंने वह मकान खरीदा, जो मोहन का था। (साधारण वाक्य)
मैंने मोहन का मकान खरीदा।]

9. राम मूर्ख नहीं है। (बिना भाव बदले विधिवाचक वाक्य)
राम चतुर है।

10. मेरा विचार है कि आज घूमने चलें। (साधारण वाक्य)
मेरा आज घूमने जाने का विचार है।]

11. मैं गीता के रचयिता को नहीं जानता। (मिश्रित वाक्य) [2011]
मैं नहीं जानता कि गीता का रचयिता कौन है?]

12. कितना अद्भुत दृश्य है। (विस्मयवाचक) (2010, 11)
[वाह ! कितना अद्भुत दृश्य है।]

13. राम बुद्धिमान है। (बिना भाव बदले नकारात्मक) [2010]
[राम मूर्ख नहीं है।

14. तुम कल जाओगे। (प्रश्नवाचक) [2010]
क्या तुम कल जाओगे?]

15. जो छात्र परिश्रम करेंगे, उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी। (सरल वाक्य) [2009]
[परिश्रमी छात्रों को सफलता अवश्य मिलती है।।

16. मोहन पुस्तक पढ़ रहा है। (प्रश्नवाचक) (2015)
क्या मोहन पुस्तक पढ़ रहा है?]

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17. वर्षा होने पर हम बाहर नहीं जाते। मिश्रित वाक्य) [2009]
(जब वर्षा होती है, तब हम बाहर नहीं जाते हैं।

18. अच्छे विद्यार्थी परिश्रमी होते हैं। (मिश्रित वाक्य) [2009]
जो विद्यार्थी अच्छे होते हैं,वे परिश्रम करते हैं।

19. सूर्योदय होने पर पक्षी चहकने लगते हैं। (मिश्रित वाक्य) [2009]
[जब सूर्योदय होता है, तब पक्षी चहकने लगते हैं।]

20. गरीब (दरिद्र) होने पर भी वह ईमानदार है। (मिश्र वाक्य) [2009]
यद्यपि वह गरीब (दरिद्र) है,किन्तु ईमानदार है।

21. सत्य की सदा जीत होती है। (प्रश्नवाचक वाक्य) [2009]
क्या सत्य की सदा जीत होती है?]

22. यह काम कर दीजिए। (निषेधवाचक वाक्य) [2009]
यह काम मत कीजिए।

23. वह भोजन करके विद्यालय जाता है। (संयुक्त वाक्य) [2016]
वह भोजन करता है और विद्यालय जाता है।

24. कठोर बनकर भी सहदय बनो। (संयुक्त वाक्य) [2017]
कठोर बनें किन्तु सहृदय रहें।।

25. मयूर वन में नाचता है। (संदेहवाचक वाक्य) [2017]
[शायद मयूर वन में नाचता है।।

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MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य-बोध, वाक्य-भेद

MP Board Class 12th Special Hindi वाक्य – बोध, वाक्य – भेद

1. वाक्य – बोध।

मनुष्य के भावों और अर्थों को भाषा के माध्यम से व्यक्त और स्पष्ट करना ही वाक्य का मुख्य प्रयोजन है। भाषा का सौन्दर्य और चमत्कार सुन्दर और सुगठित सुवाक्य रचना में होता है। वाक्य के तीन गुण प्रमुख होते हैं –
(i) आकांक्षा,
(ii) योग्यता और
(iii) सन्निधि।

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(i) आकांक्षा – वाक्य के एक पद को सुनकर आगे जानने की जिज्ञासा आकांक्षा है।
(ii) योग्यता – अन्वय करने के बाद वाक्य के अर्थबोध में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती है,उसे योग्यता कहते हैं।
(iii) सन्निधि – योग्यता और आकांक्षा के साथ ही वाक्य के शब्दों में परस्पर सन्निधि आवश्यक है।

  • शुद्ध वाक्य के गुण
  1. स्पष्टता – वाक्य सरल और स्पष्ट होना चाहिए। उन्हें पढ़ते या सुनते समय बराबर विचारों का उद्रेक हो।
  2. समर्थता – पाठक या श्रोता की भावनाओं को जाग्रत करने में सुगठित वाक्य ठीक माना जाता है।
  3. अति मधुरता – रचना को प्रभावशाली बनाने के लिए उसमें ऐसे वाक्य होने चाहिए जो सुनने में मधुर लगें। ऐसे वाक्यों से युक्त रचना को पढ़ने से पाठक आनन्द का अनुभव करता है।
  • वाक्य – रचना में होने वाली सामान्य अशुद्धियाँ

लिखते और बोलते समय स्पष्ट बात कहने की बड़ी आवश्यकता होती है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि बोला कुछ जाय, लिखा कुछ जाय और समझा कुछ और जाय। इन सब दोषों का मूल कारण होता है – वाक्य में भाषा का निर्वाह न करना। कभी – कभी असावधानी के कारण वाक्य – रचना में भ्रामकता का दोष आ जाता है। कभी – कभी दूसरी भाषा से प्रभावित होने के कारण लेखक शिथिल और अनावश्यक वाक्यों की रचना कर जाते हैं।
इन गुण – दोषों को ध्यान में रखकर बड़ी सावधानी से वाक्यों की शुद्ध रचना करनी चाहिए। वाक्य रचना में होने वाली सामान्य अशुद्धियाँ प्रायः इस प्रकार हैं

1. वचन सम्बन्धी अशुद्धियाँ – आदि, अनेक अथवा बहुवचन संज्ञा की क्रियाओं में प्रायः वचन सम्बन्धी त्रुटियाँ होती हैं। जैसे
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2. लिंग सम्बन्धी अशुद्धियाँ – विशेषण और विशेष्य का लिंग एक जैसा हो,समस्त पदों के सर्वनाम का लिंग एवं क्रिया का लिंग अन्तिम पद के अनुसार होना चाहिए। उदाहरण
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3. अर्थ सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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4. काल सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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5. पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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6. मात्रा सम्बन्धी अशुद्धियाँ
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7. अन्य अशुद्धियाँ
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1. वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध शब्दों का प्रयोग

वर्तनी (Spelling) का तात्पर्य अक्षर – विन्यास से है। पहले इसके लिए ‘हिज्जे’ या ‘अक्षरी’ नाम प्रचलित थे। उच्चारण की शुद्धता के अनुसार एवं व्याकरण की दृष्टि के अनुरूप शब्दों को लिखना ही, वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध शब्दों का प्रयोग कहलाता है।

इन अशुद्धियों के कारण होते हैं—अज्ञान, भ्रान्ति, असावधानी,बनकर बोलने की दुष्प्रवृत्ति और विदेशी प्रभाव।

शुद्ध लेखन के लिए शुद्ध वर्तनी अपेक्षित होती है। वर्तनी ही भाषा की प्रभाव – क्षमता बढ़ाती है। अतः वर्तनी के सुधार या शब्द – शुद्धिकरण के लिए नीचे कुछ अशुद्ध शब्दों के शुद्ध रूप दिये हैं-
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2. अर्थ की दृष्टि से सही शब्दों का चयन

हिन्दी में कतिपय ऐसे शब्द हैं जिन्हें ऊपर से देखने पर कोई अर्थ – भेद नहीं दिखाई देता है,पर सूक्ष्मतः उनमें अन्तर होता है। ऐसे शब्दों का ज्ञान आवश्यक है।
कुछ शब्दों का अर्थ तो एक ही रहता है, पर उनके प्रयोग में कुछ अन्तर रहता है। कभी – कभी सम्बद्ध शब्दों के प्रयोग से भी वाक्य अशुद्ध हो जाता है। जैसे
अशुद्ध वाक्य – शुद्ध वाक्य
(1) उसे व्यापार में हानि होने की आशा है। (1) उसे व्यापार में हानि होने की आशंका
(2) विनय को परीक्षा में उत्तीर्ण होने की आशंका है। (2) विनय को परीक्षा में उत्तीर्ण होने की आशा है।
(3) राम बुरी तरह प्रसिद्ध है। – (3) राम बुरी तरह बदनाम है।
(4) शोक है कि आपने मेरे पत्रों का उत्तर नहीं दिया। – (4) खेद है कि आपने मेरे पत्रों का उत्तर नहीं दिया।
(5) मैंने एक वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा देखी। – (5) मैंने एक वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा की।
(6) रमा एक मोतियों का हार गले में पहने – (6) रमा मोतियों का एक हार गले में पहने
(7) मीना चाचाजी के ऊपर विश्वास करती – (7) मीना चाचाजी पर विश्वास करती है।
(8) शब्द केवल संकेत मात्र होते हैं। – (8) शब्द संकेत मात्र होते हैं।
(9) आपके एक – एक शब्द तुले हुए होते – (9) आपका एक – एक शब्द तुला हुआ होता
(10) उसे अनेकों व्यक्तियों ने आर्शीवाद दिया। – (10) उसे अनेक व्यक्तियों ने आशीर्वाद दिया।

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(11) विंध्याचल पर्वत के दक्खिन में नर्मदा स्थित है। – (11) विंध्याचल के दक्षिण में नर्मदा स्थित
(12) मैं अपनी बात का स्पष्टीकरण करने के लिए तैयार हूँ। – (12) मैं अपनी बात का स्पष्टीकरण देने के लिए तैयार हूँ।
(13) मैं अपने गुरु के ऊपर बहुत श्रद्धा करता – (13) मैं अपने गुरु पर बहुत श्रद्धा रखता हूँ।
(14) सौन्दर्यता सबको मोह लेती है। – (14) सुन्दरता सबको मोह लेती है।
(15) हवा चल रही है। – (15) हवा बह रही है।
(16) महादेवी वर्मा विद्वान महिला थी। – (16) महादेवी वर्मा एक विदुषी महिला थीं।
(17) श्रीकृष्ण के अनेकों नाम हैं। – (17) श्रीकृष्ण के अनेक नाम हैं।
(18) यह घी की शुद्ध दुकान है। – (18) यह शुद्ध घी की दुकान है।
(19) मोहन आटा पिसाकर लाया। – (19) मोहन अनाज पिसाकर लाया।
(20) वे सज्जन पुरुष कौन हैं? – (20) वे सज्जन कौन हैं?
(21) प्रत्येक वृक्ष फल देते हैं। – (21) प्रत्येक वृक्ष फल देता है।

अर्थ की दृष्टि से सही शब्दों का चयन करने के लिए सूक्ष्म अन्तर वाले शब्दों को जान लेना चाहिए जिससे सही अर्थ का ज्ञान हो तो हम सभी जगह उसका उपयोग कर सकें। जैसे

(1) अनुराग = स्त्री – पुरुष के बीच होने वाला स्नेह। प्रेम = स्नेह सम्बन्ध मात्र। वात्सल्य = छोटों के प्रति बड़ों का स्नेह। भक्ति = बड़ों के प्रति छोटों का श्रद्धायुक्त स्नेह।
(2) अस्त्र = जो फेंक कर मारा जाय; जैसे – तीर, भाला, बम। शस्त्र = जिससे काटा जाय; जैसे – तलवार, छुरा। आयुध = लड़ाई के सभी साधन आयुध कहलाते हैं। इसमें अस्त्र – शस्त्र के अतिरिक्त लाठी,गदा,छड़ आदि को भी ले सकते हैं। हथियार = हाथ से चलाये जाने वाले आयुध।
(3) अशुद्धि = अपवित्रता, मिलावट, लिखने अथवा बोलने में कमी, इन सभी को अशुद्धि कहते हैं। भूल = विस्मृति, जिसमें कर्ता की असावधानी प्रकट होती है। त्रुटि = वस्तु में किसी कमी का होना।
(4) अमूल्य = वस्तु जो मूल्य देकर प्राप्त न की जा सके। जैसे – विद्या, ज्ञान, प्रेम, सफलता, सुख, विश्वास। बहुमूल्य = जिसका अधिक मूल्य देना पड़े,जो वस्तु साधारण मूल्य की न हो। जैसे—सोना,प्लेटिनम,हीरा। महँगा = जिस वस्तु को बदलते बाजार भाव के कारण अधिक मूल्य देकर पाया जाये।
(5) अलभ्य = जिसे किसी उपाय से न पाया जाय। दुर्लभ = जिसे अधिक कष्ट उठाकर पाया जाय।
(6) अलौकिक = जो संसार में इन्द्रियों के द्वारा सुलभ न हो। असाधारण = जो सांसारिक होकर भी अधिकता से न मिलता हो। अस्वाभाविक = अप्राकृतिक, जो प्रकृति के नियमों से बाहर का प्रतीत हो।
(7) अर्पण = शरणगति का भाव लिए अर्पण। दान = धार्मिक भावना के साथ दूसरे का स्वत्व स्थापित करना; जैसे – जलदान, दीपदान, विद्यादान, गोदान, अन्नदान। प्रदान = सामान्य रूप से बड़ों के द्वारा छोटों को देना। वितरण = समाज में उत्पादित वस्तुओं के विभाजन की प्रणाली।
(8) अनुग्रह = बड़े की ओर से छोटों के अभीष्ट सम्पादन की स्नेहपूर्ण क्रिया अनुग्रह है। अनुकम्पा = दुःख दूर करने की चेष्टा से युक्त कृपा। दया = दुःख देखकर द्रवित होना। कृपा = दुःख – निवारण के सामर्थ्य से युक्त दया। सहानुभूति = दूसरे के दुःख में समभागी होने का भाव। करुणा = दुःख निवारण की व्याकुलता लिए हुए द्रवित होना। ममता = माता के समान किसी पर वत्सल भाव।
(9) अंग = (अवयव) भौतिक समष्टि का भाग; जैसे – शरीर का अंग, वृक्ष का अंग, शाखा आदि। देह = शरीर। आकृति = रेखाओं से बनी कोई समष्टि, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव।
(10) अमर्ष = द्वेष या दुःख जो तिरस्कार करने वाले के कारण होता है। क्रोध = प्रतिकूल आचरण के बदले में प्रतिकूल आचरण की प्रवत्ति। कलह = क्रोध को जब सक्रिय रूप दिया जाता है तो उससे होने वाला वाचिक या शारीरिक आचरण।

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(11) असुर = दैत्य या दानव – एक जाति विशेष, जो देवों के समकक्ष थी। राक्षस = यह अनुचित आचरण के कारण मनुष्य जाति के लिए आता है।
(12) अनुपम = बेजोड़ – जिसकी तुलना न हो सके। अपूर्व = जिसे पहले अनुभव न किया गया हो। अद्भुत = जो विस्मयजनक हो।
(13) आयु = जीवन के सम्पूर्ण समय को आयु कहते हैं। वयस् = जीवन के शरीर विकास सूचक भाग को वयस् कहा जाता है, जैसे – शैशव। अवस्था = दशा – जीवन के प्रसंग में बीते हुए जीवन का भाग। वयस् के अर्थ में भी चलता है, जैसे—युवावस्था, वृद्धावस्था।
(14) अबला = स्त्री की संज्ञा है जिससे उसकी कोमलता एवं निर्बलता का संकेत मिलता है। नारी = केवल नर जाति की स्त्री या मानवी। कान्ता = प्रिया, किसी पुरुष के स्नेह – सम्बन्ध से दिया हुआ स्त्री का नाम – जो चमक को भी प्रकट करता है। भार्या = वह स्त्री जो किसी पुरुष से अपने भरण – पोषण की प्राप्ति का अधिकार रखती हो। पत्नी = पति से सम्बद्ध धार्मिक कार्यों में पति का साथ देने वाली, जिसका धार्मिक रीति से विवाह सम्पन्न हुआ हो। वधू = विवाह के बाद नारी की संज्ञा। अंगना = अंगों की कोमलता तथा सुन्दरता की सूचक स्त्री की संज्ञा।
(15) आनन्द = समस्त मन, प्राण,शरीर, आत्मा के सम्मिलित सुखानुभूति को आनन्द कहते हैं, हर्षित,प्रसन्न। सुख = मन के अनुकूल किसी भी प्रतीति को सुख कहते हैं। हर्ष = सुख या आनन्द के कारण शरीर की रोमांचमयी अवस्था हर्ष है। उल्लास – उमंग = मन में सुख की वेगयुक्त अल्पकालिक क्रिया।

(16) भिज्ञ = विषय के ज्ञान से सम्पन्न। विज्ञ = विषय का विशेष ज्ञान रखने वाला। बहुज्ञ = अनेक विषयों का ज्ञाता।
(17) अंश = मूर्त, अमूर्त तत्त्व का भाग। खण्ड = मूर्त पदार्थ का विभाजन।
(18) अन्न = मुख्य भोजन का धान्य विशेष। दाना = किसी भी वस्तु का गोलाई लिए छोटी इकाई का नाम। जैसे–माला का दाना,मोती का दाना, अनाज का दाना। शस्य = फसल, जो खेत में काटने हेतु लगी हो। खाद्य = सभी प्रकार का भोजन योग्य पदार्थ। पकवान = पका हुआ भोजन।
(19) आज्ञा = बड़ों द्वारा छोटों के प्रति काम की प्रेरणा। अनुज्ञा = श्रोता की इच्छा के समर्थन में स्वीकृतिसूचक कथन। अनुमति = बड़ों द्वारा सहमति अथवा किसी काम करने की इच्छा का समर्थन। आदेश = प्रायः कार्याधिकारी द्वारा दी हुई आज्ञा।
(20) अनुनय = किसी बात पर सहमत होने की प्रार्थना। विनय = निवेदन, शिष्टता. अनुशासन। प्रार्थना = किसी कार्यसिद्धि या वस्तु प्राप्ति के लिए विनययुक्त कथन। निवेदन = अपनी बात विनयपूर्वक रखना। आवेदन = अपनी योग्यता आदि के कथन द्वारा किसी पद या कार्य हेतु प्रस्तुत होना।
(21) आमन्त्रण – किसी अवसर पर सम्मिलित होने का बुलावा। निमन्त्रण = उत्सव के अवसर पर बुलाना। आह्वान = ललकारना, संघर्ष के लिए बुलाना।
(22) इच्छा = किसी वस्तु के प्रति मन का राग। आशा = इच्छा के साथ प्राप्ति की सम्भावना का सुख। उत्कण्ठा = जिज्ञासा। स्पृहा = उत्कृष्ट इच्छा। मनोरथ = अभिलाषा।
(23) उत्साह = बड़े कार्यों के प्रति प्रेरित करने वाला आनन्ददायक भाव। साहस = सहने की शक्ति को साहस कहते हैं।
(24) तेज = बाहरी प्रकाश। कान्ति = चमक। प्रकाश = किरण समूह।
(25) ईर्ष्या = दूसरे की उन्नति न सह पाना। स्पर्धा = दूसरे को उन्नत देखकर स्वयं उन्नति की होड़। असूया = दूसरे के गुणों में दोष ढूँढ़ना। द्वेष = दूसरे की बुराई की कामना।
बैर = बहुत दिनों का संचित क्रोध का रूप।
(26) खेद = अनिष्ट सूचना। अवसाद = मन – शरीर की निश्चेष्टता। क्लेश = मन – शरीर दोनों का पीड़ित होना। कष्ट = दुःखजनक स्थिति। व्यथा = पीड़ा। वेदना = पीड़ा का मानसिक अनुभव। यातना = दुःख भोगने की मनोदशा। यन्त्रणा = दुःख की दीर्घकालिक जकड़न।
(27) ऋतु = छ: ऋतुएँ होती हैं। मौसम = पारिस्थितिक भेद।

यहाँ पर उदाहरण के लिए कुछ अशुद्ध तथा शुद्ध वाक्य दिये गये हैं, जिनका सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए। (पहला वाक्य अशुद्ध है तथा दूसरा वाक्य शुद्ध है।)
1. अनावृष्टि के कारण आगामी वर्ष पशुओं के आहार में भारी कमी की आशंका है।
[अनावृष्टि के कारण आगामी वर्ष में पशुओं के आहार में भारी कमी की सम्भावना है।]

2. अनुराधा ने अपने पति के गले में एक फूल की माला डाल दी।
[अनुराधा ने अपने पति के गले में फूलों की एक माला डाल दी।]

3. अनेकों विद्यार्थी उपाधि – वितरणोत्सव के समारोह में सम्मिलित नहीं हो सके। ”
[अनेक विद्यार्थी उपाधि – वितरण समारोह में सम्मिलित नहीं हो सके।।

4. अपने से बड़ों के प्रति स्नेह और छोटों के प्रति श्रद्धा का भाव व्यक्त करना चाहिए।
[अपने से बड़ों के प्रति श्रद्धा और छोटों के प्रति स्नेह का भाव व्यक्त करना चाहिए।

5. आज का छात्र पढ़ने से अधिक फैशन को महत्व देते हैं।
[आज के छात्र पढ़ने से अधिक महत्त्व फैशन को देते हैं।]

6. आज शनिवार है और कल रविवार की छुट्टी है।
[आज शनिवार है और कल रविवार की छुट्टी होगी।

7. शीला आज्ञाकारी पत्नी है।
[शीला आज्ञाकारिणी पत्नी है।]

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8. हमारी देश की सरकार ईमानदार है।
[हमारे देश की सरकार ईमानदार है।

9. आपका पत्र धन्यवाद सहित मिला।
[आपका पत्र धन्यवादपूर्वक मिला।

10. आपका भवदीय। [2010]
[आपका या भवदीय ]

11. उसकी आँख से आँसू बह रहा है।
[उसकी आँख से आँसू निकल रहे हैं।]

12. हमें पानी दो।
[मुझे पानी दो।

13. आपका लिखावट बड़ा अच्छा है।
[आपकी लिखावट बड़ी अच्छी

14. आपकी सलाह ग्राह्य योग्य है।
[आपकी सलाह ग्राह्य है।)

15. कश्मीर की सौन्दर्यता दर्शनीय है।
कश्मीर का सौन्दर्य दर्शनीय है।।

16. वह लौटकर वापस आ गया।
[वह वापस आ गया। या वह लौटकर आ गया।

17. आपने वह प्रतिज्ञा न भूले होंगे।
[आप वह प्रतिज्ञा न भूले होंगे।

18. रामचरितमानस सबसे श्रेष्ठतम ग्रन्थ है। [2011]
[रामचरितमानस श्रेष्ठतम ग्रन्थ है।।]

19. यद्यपि वे सज्जन है लिन्तु क्रोधी है।
[यद्याचे वह सज्जन है, किन्तु क्रोधी है।]

20. वह धनी व्यक्ति है। (बिना अर्थ बदले नकारात्मक)
वह निर्धन व्यक्ति नहीं है।

21. उसके पास पाँच भूगोल की पुस्तकें हैं।
[उसके पास भूगोल की पाँच पुस्तकें हैं।]

22. सरोवर के अन्दर पानी भरा है। ,
सरोवर में पानी भरा है।।

23. पिता का पुत्र में विश्वास है।
पिता का पुत्र पर विश्वास है।।

24. कई ऑफिस के अधिकारी छुट्टी लेकर चले गए।
[ऑफिस के कई अधिकारी छुट्टी लेकर चले गए।

25. उनका बहुत भारी सम्मान हुआ।
[उनका बहुत सम्मान हुआ।]

26. उनके पूज्यास्पद पूज्य पिता चल बसे।
[उनके पूज्यास्पद (या पूज्य) पिता चल बसे।

27. उनका वहाँ जाने की इच्छा न थी।
उनकी वहाँ जाने की इच्छा न थी।

28. उसे मृत्यु – दण्ड की सजा मिली है।
[उसे मृत्यु – दण्ड मिला है।]

29. गाँधीजी का देश सदा आभारी रहेगा।
देश गाँधीजी का सदा आभारी रहेगा।

30. यह कार्य आवश्यकीय है।
यह कार्य आवश्यक है।।

31. मैं कल दिल्ली से वापस लौटूंगा।
[मैं कल दिल्ली से लौटूंगा।]

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32. उसने मेरे को कुछ नहीं बोला।
[उसने मुझे कुछ नहीं कहा।]

33. मैं आटा पिसवाने जा रहा हूँ।
मैं गेहूँ पिसवाने जा रहा हूँ।

34. वह गुणवान महिला है।
[वह गुणवती महिला है।

35. बन्दूक एक उपयोगी शस्त्र है।
[बन्दूक एक उपयोगी अस्त्र है।]

36. मेरी अंक सूची गुम हो गई है।
मेरी अंक सूची गुम गयी है।]

37. यदि परिश्रम करोगे तो अच्छे अंक प्राप्त करोगे।
[यदि परिश्रम करेंगे तब अच्छे अंक प्राप्त होंगे। [2010]

38. दोनों में यह उत्तमतर है।
दोनों में यह उत्तम है।]

39. उसके बाद फिर क्या हुआ?
[उसके बाद क्या हुआ?]

40. गाय बोलती है।
गाय रम्भाती है।

41. खरगोश को काटकर गाजर खिलाओ।
(खरगोश को गाजर काटकर खिलाओ।

42. बच्चा दूध को रो रहा है।
[बच्चा दूध के लिये रो रहा है।।

43. महान् व्यक्ति सदा पूज्यनीय होते हैं।
[महान् व्यक्ति सदा पूजनीय होते हैं।

44. धातुओं में सोने से अधिक कीमती कोई धातु नहीं है।
सोना सबसे अधिक कीमती धातु है।।

45. वह बुद्धिमान लड़का है। (बिना अर्थ बदले नकारात्मक)
(वह मूर्ख लड़का नहीं है।।

46. यह एक उपयोगी पुस्तक है.उसे खरीद लो।
[यह एक उपयोगी पुस्तक है,इसे खरीद लो।

47. वह प्रतिदिन सबेरे के समय पढ़ता है।
[वह प्रतिदिन सुबह पढ़ता है।

48. भगवान के अनेकों नाम हैं।
भगवान के अनेक नाम हैं।]

49. उसने ऊपर को देखकर हँसा।
[वह ऊपर देखकर हँसा।]

50. रमेश प्रतिदिन हर रोज स्कूल जाता है।
[रमेश प्रतिदिन स्कूल जाता है।]

51. श्रीमती महादेवी वर्मा विद्वान् महिला हैं।
[श्रीमती महादेवी वर्मा विदुषी हैं।]

52. उसकी टाँग टूट गया।
[उसकी टाँग टूट गई।

53. उसके सामने एक गहरी समस्या है।
[उसके सामने एक गम्भीर समस्या है।

54. लक्ष्मीबाई एक तेजस्वी नारी थीं।
लक्ष्मीबाई एक तेजस्विनी नारी थीं।

55. वह सन्तान को लेकर दुःखी है।
वह सन्तान के कारण दुःखी है।] [2011]

56. जो कल आएगा सो पुरस्कार पाएगा।
जो कल आएगा वह पुरस्कार पाएगा।

57. गाँधी जी पक्के ईश्वर भक्त थे।
गाँधी जी सच्चे ईश्वर भक्त थे।

58. जंगल में शेर चिंघाड़ने लगा।
जंगल में शेर दहाड़ने लगा।

59. वह खाना खाकर के जाएगा।
वह खाना खाकर जाएगा।।

60. वे सज्जन पुरुष कौन हैं?
वे सज्जन कौन हैं?]

61. आप अपने मन से सोचें।
आप अपने मन में सोचें।।

62. भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या वृद्धि के कारण लिखिए।
भारत की जनसंख्या वृद्धि के कारण लिखिए।]

63. राम – श्याम के झगड़े का हेतु क्या हो सकता है?
[राम – श्याम के झगड़े का कारण क्या हो सकता है?]

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  • विराम चिह्नों का उपयोग

बोलना एक विशिष्ट कला है, जिसका आवश्यक गुण यह है कि सुनने वाला या सुनने वाले बोलने वाले के भाव को अच्छी तरह समझ सकें। इसके लिए यह अनिवार्य है कि बोलने वाला बीच – बीच में आवश्यकतानुसार कुछ – कुछ ठहरकर बोले। यही क्रम बोलने में होता भी है। वह किसी पद,वाक्यांश या वाक्य को बोलते समय ठहरता जाता है ! इस विश्राम को व्याकरण में ‘विराम’ कहते हैं। लिखते समय ऐसे स्थानों पर कुछ चिह्न लगा दिये जाते हैं। इन चिह्नों को ‘विराम चिह्न’ कहते हैं। शाब्दिक अर्थ के अनुसार विराम’ का अर्थ है रुकाव, ठहराव अथवा विश्राम। बोलने में कहीं कम समय लगता है और कहीं ज्यादा। इसी दृष्टि से चिह्न भी कम समय और अधिक समय के अनुसार अलग – अलग होते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ और भी चिह्न होते हैं, जिनका अध्ययन साहित्य के विद्यार्थी के लिए अत्यन्त अनिवार्य है।

चिह्नों का महत्त्व इतना अधिक है कि भूल से गलत स्थान पर चिह्न लगा देने से वाक्य का अर्थ बदल जाता है, अत: चिह्न लगाने में पूर्ण सावधानी रखना आवश्यक है,जैसे – –
रुको मत जाओ। (कोई चिह्न नहीं)
रुको मत जाओ। (जाने का निषेध)
रुको मत,जाओ। (रुकने का निषेध)

राष्ट्र भाषा हिन्दी में आजकल उसके विकास के साथ – साथ विराम चिह्नों की संख्या और प्रयोग बढ़ता जा रहा है। प्रमुख विराम चिह्न जिनका आजकल प्रयोग बहुतायत से होता है, निम्नानुसार हैं
1. अल्प विराम ( , )
2. अर्द्ध विराम (;)
3. पूर्ण विराम (।)
4. प्रश्न चिह्न (?)
5. विस्मयादि बोधक (!)
6. संयोजक चिह्न ( – )
7. निर्देशक चिह्न ( – )
8. कोष्ठक () []
9. उद्धरण या अवतरण चिह्न ‘ ‘ ” ”
10. लोप निर्देशक xxx …..
11. आदेश चिह्न : –
12. लाघव चिह्न °
13. हंस पद ^
14. बराबर सूचक चिह्न =
15. पुनरुक्ति बोध चिह्न (,,)
16. समाप्ति सूचक चिह्न – : x : –

(1) अल्प विराम (,)
यह चिह्न उस स्थान पर लगाया जाता है, जहाँ वक्ता बहुत ही थोड़े समय के लिए रुके।
जैसे –
हेमलता,शारदा, वेदश्री और जयश्री उज्जैन, देवास और महू होकर आज ही लौटी हैं। वह आयेगा, परन्तु रुकेगा नहीं।

(2) अर्द्ध विराम ( ; )
अर्द्ध विराम के चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि अल्प विराम से कुछ अधिक समय तक रुकना हो। इसका प्रयोग प्रायःदो स्वतन्त्र उपवाक्यों को अलग करने के लिए किया जाता है।

जैसे
मैंने गोली चलने की आवाज सुनी;
चार पक्षी फड़फड़ाकर जमीन पर गिर पड़े।

(3) पूर्ण विराम (।)
वाक्य पूरा होने पर कुछ अधिक समय के लिए रुकना होता है, इसलिए प्रत्येक वाक्य की पूर्णता पर इस चिह्न का प्रयोग करते हैं। जैसे
बांग्लादेश आजाद हो गया।

संकेत – कुछ लोग इस चिह्न को पूर्ण विराम के स्थान पर केवल ‘विराम’ कहते हैं और पूर्ण विराम के चिह्न दो खड़ी लकीर ( ॥) को मानते हैं। साधारणत: दो खड़ी लकीर वाले इस चिह्न
का प्रयोग पद्य की पूर्णता पर किया जाता है। जैसे

देख्यो रूप अपार, मोहन सुन्दर श्याम को।
वह ब्रज राजकुमार,हिय – जिय नैनन में बस्यो।

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(4) प्रश्न चिह्न (?)
प्रश्नवाचक चिह्न, प्रश्न सूचक वाक्यों के अन्त में पूर्ण विराम के स्थान पर आता है। जैसे
1. यह किसका घर है?
2. वह कहाँ जा रहा है?

(5) विस्मयादिबोधक चिह्न (!)
इस चिह्न का प्रयोग विस्मयादि सूचक शब्दों या वाक्यों के अन्त में किया जाता है। सम्बोधन कारक की संज्ञा के अन्त में भी इसे लगाया जाता है। जैसे
1. अरे ! वहाँ कौन खड़ा है।
2. हाय ! इसका बुरा हुआ।
3. हे ईश्वर ! उसकी रक्षा करो।

(6) संयोजक चिह्न ( – )
इसे सामासिक चिह्न भी कहते हैं। इस चिह्न का प्रयोग सामासिक शब्दों के मध्य में होता है। जैसे
हे ! हर – हार – अहार – सुत,मैं विनवत हूँ तोय।

(7) निर्देशक चिह्न ( – ) (: – )
इस चिह्न का दूसरा नाम विवरण चिह्न भी है। इसका प्रयोग उस स्थिति में किया जाता है, जबकि किसी वाक्य के आगे कई बातें क्रम से लिखी जाती हैं। इसे आदेश चिह्न भी कहते हैं।
निम्नलिखित शब्दों की परिभाषा लिखो संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया। कभी – कभी (: – ) इस चिह्न के स्थान पर डेश ( – ) का भी प्रयोग कर लिया जाता है।

(8) कोष्ठक () [ ]
कोष्ठक का प्रयोग निम्न प्रकार से किया जाता है—
1. किसी विषय के क्रम बतलाने के लिए अक्षरों या अंकों के साथ इसका प्रयोग होता है। जैसे
(क) व्यक्ति वाचक संख्या। (ख) जाति वाचक संख्या।
(1) एशिया
(2) यूरोप

2. वाक्य के मध्य में किसी शब्द के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इसका प्रयोग होता है। जैसे
हे कोन्तेय,(अर्जुन) तू क्लेव्यता (कायरता) को प्राप्त न हो।

3. नाटकों में अभिनय को प्रकट करने के लिए भी कोष्ठकों का प्रयोग किया जाता है। जैसे
महाराणा प्रताप – क्रोध से) नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता।
मानसिंह – (नम्रता से) राणा ! हठ न करो। बात के मान लेने में तुम्हारा हित है।

(9) अधरण या अवतरण चिह्न (‘) (” “)
हिन्दी में इस चिह्न के अन्य नाम भी हैं। जैसे – उल्टा विराम,युगल – पाश,आदि। इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है जबकि किसी व्यक्ति की बात या कथन को उसी के शब्दों में लिखना होता है। यह चिह्न वाक्य के आदि और अन्त में लगाया जाता है। इकहरे और दोहरे चिह्नों में यह अन्तर है कि जब किसी उद्धरण को लिखना होता है तो दोहरे चिह्न लगाये जाते हैं, किन्तु वाक्य के मध्य में यदि आवश्यकता हुई तो इकहरे उद्धरण चिह्न को लगाया जाता है।

अकबर ने उस दिन प्रार्थना के स्वर में कहा, “हे विश्वनियन्ता ! तू सत्य है; तू ही राम; तू ही रहीम है।” उसने आगे कहा,“दुनिया में सच्चा ईमान ‘मानव धर्म’ है।”

(10) लोप निर्देशक चिह्न (xxx) (……)
इन चिह्नों का प्रयोग तब होता है, जबकि कोई लेखक किसी का उद्धरण देते समय कुछ अंश छोड़ना चाहता है। इनका प्रयोग निम्नांनुसार किया जाता है
1. उस स्थिति में जबकि लेखक किसी लम्बे विवरण को छोड़कर आगे की बात लिखना चाहता है,तब वह चार – पाँच ऐसे निशान लगा देता है। जैसे
आग का वह दृश्य क्या था,सर्वस्व नाश की विभीषिका थी। चारों ओर से लोग दौड़ रहे थे। xxx सम्पूर्ण गाँव जलकर स्वाहा हो गया।
2. जब कुछ शब्द या वाक्य छोड़ने होते हैं, तो ‘ इसका प्रयोग करते हैं। जैसे – बम्बई नगर है। रिक्त स्थान की पूर्ति करो।

(11) आदेश चिह्न (: – )
जब प्रश्न न पूछा जाकर आदेश दिया जाये वहाँ आदेश चिह्न लगाया जाता है, जैसे किन्हीं पाँच चीनी यात्रियों का नाम लिखिए :

(12) लाघव चिह्न (०)।
जब किसी प्रसिद्ध शब्द को पूरा न लिखकर संक्षेप में लिखा जाता है,तब उसका प्रारम्भिक अक्षर लिखकर लाघव चिह्न (०) लगा दिया जाता है। जैसे
हिन्दी साहित्य सम्मेलन – हि. सा. स.
मध्य प्रदेश राज्य – म. प्र. राज्य
नागरी प्रचारिणी सभा,काशी – ना० प्र० स० ,काशी

(13) हंस पद (.)
इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि कोई शब्द या बात वाक्य लिखते समय मध्य में छूट जाय। उस स्थिति में नीचे इस चिह्न को लगाकर ऊपर वह शब्द लिख दिया जाता है। जैसे
वह
“मैंने पास जाकर देखा गुलाब का फूल था।”

(14) बराबर सूचक चिह्न (=)
इस चिह्न को तुल्यता सूचक चिह्न भी कहते हैं। इसका प्रयोग समानता दिखलाने के लिए किया जाता है। जैसे –
विद्या + आलय = विद्यालय

(15) पुनरुक्ति बोध चिह्न (,)
उस स्थिति में जबकि ऊपर कही हुई बात अथवा शब्द को नीचे की ओर उसी रूप में लिखना होता है, तो इस चिह्न को लगा देते हैं, जिसका मतलब होता है – यह वही शब्द है जो
ऊपर लिखा हुआ है। जैसे
5 आदमी एक काम 15 दिन में करते हैं
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(16) समाप्ति सूचक चिह्न ( – : x : – )
इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है,जबकि कोई लेख अध्याय,परिच्छेद, पुस्तक आदि समाप्त हो गई हो। जैसे
और इस प्रकार भारत देश आजाद हुआ।
( – : x : – )

वाक्य – भेद

(1) रचना के अनुसार वाक्य के तीन भेद होते हैं :

  1. सरल,
  2. मिश्रित और
  3. संयुक्त वाक्य।

(i) जिस वाक्य में एक ही संज्ञा और क्रिया का प्रयोग होता है, उसे सरल या साधारण वाक्य कहते हैं।
(ii) जन मूल वाक्य के साथ एक या अधिक वाक्य और भी मिले होते हैं,तब वह वाक्य मिश्रित वाक्य कहलाता है।
(ii) जब कई सरल और मिश्रित वाक्य – समूह अव्ययों के द्वारा एक ही वाक्य में जुड़े रहते हैं, तब वह वाक्य संयुक्त वाक्य कहलाता है।

(2) अर्थ के अनुसार वाक्यों के प्रकार

  1. विधिवाचक – मधु मेरे घर आयी।
  2. निषेधवाचक – मधु मेरे घर नहीं आयी।
  3. आज्ञार्थक – मधु मेरे घर आये और मिले।
  4. प्रश्नवाचक क्या मधु आयी थी?
  5. विस्मयादिबोधक – हाय मधु आए तो कितना अच्छा !
  6. इच्छाबोध – अच्छा हो कि मधु मेरे घर आए।
  7. सन्देहसूचक – मधु जरूर मेरे घर आयी होगी।
  8. संकेतार्थक – यदि मधु जानती तो जरूर मेरे घर आती।

(3) क्रिया के अनुसार वाक्यों के भेद

  1. कर्तृ प्रधान,
  2. कर्म प्रधान,
  3. भाव प्रधान।

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MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 6-11)

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 6-11)

6. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’
[2010]

  • जीवन परिचय

साठोत्तरी हिन्दी नाटककारों में डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। आपका जन्म 8 फरवरी,सन् 1936 को उन्नाव (उत्तर प्रदेश) जिले के राजापुर गढ़ेवा ग्राम में हुआ था। आपने एम. ए. और पी-एच.डी. तक शिक्षा ग्रहण की है।

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  • साहित्य सेवा

डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ आधुनिक नाट्यशास्त्र को नई दिशा की ओर मोड़ने वाले एक प्रतिभासम्पन्न नाटककार के रूप में सुविख्यात हैं। आपने अब तक सोलह नाटक, चार एकांकी संग्रह,दो कविता-संग्रह,एक उपन्यास,आत्मकथा तथा समीक्षात्मक ग्रन्थ लिखे हैं। लेखन का यह तीव्र क्रम वर्तमान में भी जारी है।

  • रचनाएँ

इनकी अनेक रचनाएँ हैं, जिनमें ऐतिहासिक तथा समाज की विसंगतियों का सरलता से बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया गया है। इनके द्वारा लिखे गये एकांकियों में ‘स्वप्न का सत्य’, ‘टूटते हुए’,’बहुरुपिए’, ‘मुखौटे बोलते हैं’, ‘गृह कलह’, कायाकल्प’,’समर्पण’,’प्रायश्चित’ आदि प्रमुख।

  • वर्ण्य विषय

इनके नाटक व एकांकी सम-सामायिक समाज की स्थिति तथा ऐतिहासिकता को लेकर रचे गये हैं, जिनके पात्र भी ऐतिहासिक व सत्य हैं। सामाजिक रचनाओं में इन्होंने समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनैतिकता और अन्धविश्वास पर करारा व्यंग्य किया है।

  • भाषा

इनकी भाषा सरल, अभिनेय और मंचीय है। वाक्य छोटे होने के साथ बोधगम्य तथा सरल हैं। भाषा में प्रवाह है तथा वह संवाद तथा कथ्य को आगे बढ़ाने में पूर्णतः समर्थ है। कहीं-कहीं संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। कथ्य को प्रभावशाली बनाने के लिए विदेशी, देशज इत्यादि शब्दों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया गया है। भाषा में महावरों तथा कहावतों का प्रयोग भी देखने को मिलता है; जैसे—आस्तीन का साँप, इज्जत धूल में मिलाना इत्यादि। भाषा पात्रों के अनुकूल है।

  • शैली

जहाँ एक ओर आपने सामाजिक बुराइयों को उजागर कर उन्हें दूर करने के लिए व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया गया है वहीं दूसरी ओर आपने अपने समस्त नाटक नाट्य-शैली में प्रस्तुत किये हैं। संवादों की लघुता, भावों की गहराई का परिचय देती है। एकांकियों की शैली मंचीय है। व्यंग्यात्मक स्थानों में उद्धरण, व्याख्या, व्यास और सूक्ति शैली को अपनाया गया है।

  • साहित्य में स्थान

नई पीढ़ी के नाटककारों में डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ को एक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। आपने नाटक,कहानी,एकांकी, कविता, उपन्यास, आत्मकथा तथा समीक्षात्मक विधाओं में हिन्दी साहित्य को अनुपम कृतियाँ प्रदान की हैं। कृतियों की मौलिकता के कारण डॉ.शक्ल अग्रणी साहित्यकारों में गिने जाते हैं।

7. पं. रामनारायण उपाध्याय
[2009, 11, 14, 17]

घर के विद्वत् वातावरण तथा संस्कृतनिष्ठ संस्कारों से युक्त पं. रामनारायण उपाध्याय ने मध्य प्रदेश की आदिवासी संस्कृति को साहित्य में उतारने का प्रशंसनीय कार्य किया है। उनका साहित्य ग्रामीण को उजागर करने में सफल रहा है। वह अपने पाठकों को अपनी बात बताने में सहजता की डोर पकड़े रहते हैं।

  • जीवन परिचय

पं.रामनारायण उपाध्याय का जन्म 20 मई,सन् 1918 को कालमुखी नामक ग्राम,जिला (खण्डवा) मध्य प्रदेश में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री सिद्धनाथ तथा माता का नाम दुर्गादेवी था। आपने साहित्य वाचस्पति की उपाधि प्राप्त की और पण्डित कहलाने लगे। आपने अंग्रेजी-हिन्दी का विशद अध्ययन किया जिस कारण आपका जीवन दृष्टिकोण भी अति उदार तथा विशाल बना। आप ग्रामीण जीवन व माटी से जुड़े रहे। यही ग्रामीण वातावरण आपके साहित्य में परिलक्षित होता है। आप गाँधीवादी विचारधारा से पूरी तरह प्रभावित थे। आपकी लेखनी सत्य और मानव कल्याण के लिये थी। ग्राम संस्कृति के चितेरे पं.रामनारायण उपाध्याय 20 जून,सन् 2001 को स्वर्गवासी हए।

  • साहित्य सेवा

निमाडी लोक साहित्य के मर्मज्ञ पं. उपाध्यायजी जन्मजात प्रतिभासम्पन्न साहित्यकार थे। ‘ अत: लिखने के लिए एकान्त के अतिरिक्त उन्हें किसी वस्तु व साधन की आवश्यकता नहीं थी। वे ‘मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद्-भोपाल’ तथा ‘राष्ट्र भाषा परिषद भोपाल’ के संस्थापक सदस्य रहे। आपने अपनी पत्नी शकुन्तला देवी की स्मृति में ‘लोक-संस्कृति न्यास की स्थापना 27 नवम्बर, सन् 1989 को की। आपको लोक संस्कृति शोध संस्थान, चुरू (राजस्थान) द्वारा ‘निमाड़ का सांस्कृतिक इतिहास’ पर झवेर चन्द मेधाणी स्वर्णपदक (1982) में, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मान (1986) में, इंडियन फोकलोर सोसायटी, कलकत्ता द्वारा भोजपुरी सम्मेलन, रेणुकूट, वाराणसी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद द्वारा ‘साहित्य वाचस्पति’ (1993) में,तथा मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा 11000 रुपये का भवभूति अलंकरण’ (1996) में प्राप्त हुआ। पंडितजी की प्रकाशित रचनाओं की संख्या चालीस से अधिक है। ‘कुंकुम-कलश और आम्रपल्लव’, ‘हम तो बाबुल तोरे बाग की चिड़िया’, ‘कथाओं की अन्तर्कथाएँ’, ‘चतुर चिडिया’ तथा ‘निमाड़ का लोक-साहित्य और उसका इतिहास’ उनकी पुरस्कृत रचनाएँ हैं।

  • रचनाएँ

पं. उपाध्याय जी ने साहित्य की विविध विधाओं; जैसे-व्यंग्य, निबन्ध, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज,लघु कथाएँ आदि में लिखा।

  1. संस्मरण-कथाओं की अन्तर्कथाएँ’, जिन्हें भूल न सका।
  2. व्यंग्य–’बख्शीश नामा’, ‘घुघराले काँच की दीवार’।
  3. ललित निबन्ध–’जनम-जनम के फेरे’, ‘आओ अब घर चलें’ ‘आस्थाओं की जमीन’।
  4. लोक साहित्य-निमाड़ का सांस्कृतिक इतिहास’, ‘लोक जीवन में राम’।
  5. पत्र-संग्रह–’चिट्ठी-पत्री’।
  6. व्यक्तित्व-कृतित्व-‘मामूली आदमी’, ‘धरती का बेटा’। वर्ण्य विषय बहुमुखी प्रतिभा के धनी पं.उपाध्याय जी को अपने गाँव से ही साहित्य रचने की प्रेरणा मिली। उनकी सम्पर्क-शीलता, जनसाधारण से पत्र-व्यवहार और परिचय की व्यापकता ने

उन्हें साहित्य रचना का वर्ण्य-विषय प्रदान किया। निमाड़ी लोक-जीवन को साहित्य में उतारने का सराहनीय कार्य पंडितजी ने किया। एक सच्चे किसान की भावुकता,सहृदयता और क्रियाशीलता उनके साहित्य में सर्वज्ञ दिखाई देती है। गाँधीवादी जीवन और विचारधारा के साथ ग्राम और ग्राम्य संस्कृति उनकी रचनाओं के आधार हैं।

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  • भाषा

लोक साहित्यविद् पंडितजी की भाषा भी लोकभाषा ही है। लेकिन संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली में विदेशी शब्द, जैसे-ऑर्डर, स्टेशन इत्यादि का प्रयोग है। साथ ही, साधारण बोलचाल के आंचलिक शब्दों का प्रयोग भाषा को मधुरता देता है। पंडितजी को शब्दों से मोह नहीं है। वह तो यन्त्र के पुजों की तरह फिट बैठने वाले शब्दों का प्रयोग करते हैं। कहीं-कहीं वाक्यों में सूत्रता आ जाती है। अधिकतर वाक्य छोटे व विचारपूर्ण हैं। परन्तु लघु गद्यांश रूप में भी वाक्यों का प्रयोग करने में वे नहीं चूकते। इस प्रकार उनकी भाषा प्रवाहपूर्ण तथा बोधगम्यतापूर्ण है।

  • शैली

पं.रामनारायण उपाध्याय जी की शैली में विविधता है। “मैं क्यों लिखता हूँ?” निबन्ध में उन्होंने आत्मपरक शैली को अपनाया। लोक साहित्य में वर्णनात्मक शैली को निभाया। इस शैली की भाषा सरल व प्रवाहपूर्ण है। अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए उन्होंने यत्र-तत्र सूत्रात्मक शैली को अपनाया है। व्यंग्यात्मक निबन्धों में व्यंग्यात्मक शैली को अपनाया तो संस्मरणों में भावात्मक शैली को। इस प्रकार लेखक ने समय के अनुसार विविध शैलियों का प्रयोग करके अपने साहित्य का कलेवर सजाया है।

  • साहित्य में स्थान

लोक-संस्कृति-पुरुष के रूप में पंडित जी ने पर्याप्त ख्याति प्राप्त की है। हिन्दी साहित्य के भण्डार को विविध साहित्यिक विधाओं से भरने के कारण उनका एक विशिष्ट स्थान है। ग्रामीण जीवन की अभिव्यक्ति ने उनके साहित्य को अनुपम बना दिया है। हिन्दी गद्य साहित्य सदैव उनका ऋणी रहेगा।

8. डॉ. रघुवीर सिंह [2009, 11, 12, 13]

इतिहास को साहित्य में पिरोने वाले डॉ.रघुवीर सिंह इतिहास एवं संस्कृति के प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। एक राजघराने में जन्म लेकर भी आप साहित्य-सृजन के कष्टपूर्ण और तपस्या के मार्ग पर बड़ी सफलता से आगे बढ़े। इनके भावात्मक निबन्धों के लिए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं-~-“ये हृदय के मर्मस्थल से निकले हैं और सहृदयों के शिरीष-कोमल अन्तस्तल में सीधे जाकर सुखपूर्वक आसन जमाएँगे।”

  • जीवन परिचय

डॉ. रघुवीर सिंह का जन्म सन् 1908 ई. में मन्दसौर जिले के सीतामऊ के राजघराने में हुआ था। इनके पिता मालवा की सीतामऊ रियासत के महाराज थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर तथा उच्च शिक्षा होल्कर कॉलेज, इन्दौर में हुई। आपने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा एल. एल. बी. की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। ‘मालवा में युगान्तर’ नामक शोधग्रन्थ पर आगरा विश्वविद्यालय ने इन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। सन् 1991 में इनका निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

राजघराने से सम्बन्धित होते हुए भी रघुवीर सिंह ने साहित्य-साधना के कठिन मार्ग को अपनाया। ये प्रमुख रूप से निबन्ध लेखक थे। इनके निबन्धों की शैली सजीव एवं ओजपूर्ण है। ‘शेष स्मृतियाँ’ इनकी सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक है। ‘ताज’, ‘फतेहपुर सीकरी’ पर आलंकारिक शैली में निबन्ध लिखकर इन्होंने पर्याप्त ख्याति अर्जित की।

• रचनाएँ
(1) इतिहास सम्बन्धी रचनाएँ–’पूर्व मध्यकालीन भारत’, ‘मालवा में युगान्तर’, ‘पूर्व आधुनिक राजस्थान’।
(2) साहित्यिक कृतियाँ-‘शेष स्मृतियाँ’, ‘सप्तदीप’,’बिखरे फूल’ तथा ‘जीवन कण’।

• वर्ण्य विषय
रघुवीर सिंह प्रसिद्ध इतिहास लेखक तथा गद्यकाव्य सर्जक हैं। ‘मध्य युग का इतिहास’ उनके साहित्य का विषय था। इतिहास के ज्ञाता होने के साथ-साथ तथा सहृदय सौन्दर्य उपासक होने के कारण वे साहित्य में भी अपनी गहरी पैठ बना सके। आप हिन्दी साहित्य में ऐतिहासिक निबन्धकार के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसी कारण इनके साहित्यिक निबन्धों में भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का आश्रय विद्यमान है, जिसमें तत्कालीन युग-जीवन मुखर है। सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ‘शेष स्मृतियाँ’ ऐतिहासिक आधार पर लिखे गये भावात्मक निबन्धों का संग्रह है।

  • भाषा

डॉ. रघुवीर सिंह की भाषा सरल, स्पष्ट और सुबोध है। यद्यपि भाषा संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से युक्त है तथापि यथावसर उर्दू शब्दों के प्रयोग से भी परहेज नहीं किया गया है। इसी कारण विषय-प्रतिपादन में प्रवाह और प्रभावोत्पादकता आ गई है। भाषा ललित हो गई है जो सहज ही पाठक को भाव-प्रवण और संवेदनशील बना देती है। तत्सम शब्दों की प्रधानता है, जैसे-द्युति, स्मृति, विरक्त, तृप्त आदि। कहावतों,मुहावरों और अलंकारों के प्रयोग ने भाषा को गति प्रदान की है। ‘प्यार की ठण्डी दुलारी बयार’ जैसे शब्द-समूहों के प्रयोग से भाषा सजीव हो उठी है। भावों की अभिव्यक्ति के लिए कहावतों,मुहावरों का सटीक चयन किया गया है।

  • शैली

डॉ. रघुवीर सिंह की शैली की प्रमुख विशेषता-रोचकता, चित्रात्मकता, भावुकता तथा अलंकार योजना है।

  1. भावात्मक शैली–अधिकांश निबन्ध भावात्मक शैली में हैं जिनकी भाषा काव्यात्मक एवं सरस हो गई है; जैसे- “दिवस भर के उत्थान के बाद संध्या समय अपने पतन पर क्षुब्ध मरीत्तिमाली जब प्रतीची के पादप पुंज में अपना मुख छिपाने को दौड़ पड़ते हैं और विदा होने से पूर्व अश्रुपूर्ण नेत्रों से जब वे उस अमर करुण कहानी की ओर एक निराशपूर्ण दृष्टिं डालते हैं तब तो वह पुराना किला रो पड़ता है।”
  2. चित्रात्मक शैली इस शैली का सहारा लेकर एक चित्रकार की भाँति इन्होंने अपने भावों को पाठकों के समक्ष रखा है; जैसे-“सन्दरता में ताज का प्रतियोगी. एत्मादोला का मकबरा, भाग्य की चंचलता का मूर्तिमान रूप है।”
  3. आलंकारिक शैली-आलंकारिक शैली के प्रयोग से इनके निबन्धों में सजीवता तथा प्रभावोत्पादकता आ गई है। उपमा, रूपक, अतिश्योक्ति इत्यादि अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है। विरोधाभास अलंकार का उदाहरण देखिए-यशोधरा कहती है, “हिमालय की छाँह में रहकर भी मेरा यह ताप किसी प्रकार घटता नहीं है।”
  4. विचारात्मक शैली-गम्भीर विषयों की विवेचना में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का सहारा लिया गया है; जैसे-“मानव जीवन एक पहेली है और उससे भी अधिक अनबूझ वस्तु है विधि का विधान।”
  5. वर्णनात्मक शैली इतिहासकार होने के कारण आपकी रचनाओं में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग स्वाभाविक ही है।

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  • साहित्य में स्थान

रघुवीर सिंह मुख्यतः ऐतिहासिक विषयों के निबन्धकार माने जाते हैं। इनके निबन्ध दार्शनिक चिन्तन,शोधपरक अनुसन्धान और सांस्कृतिक आलोचना की छत्र-छाया माने जाते हैं। इनकी इस शोध चिन्तन एवं सांस्कृतिक साहित्यिक अभिरुचि का मूर्तरूप ‘नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ’ है। यहाँ साहित्य, इतिहास एवं संस्कृति में शोध की अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इनके निबन्धों को वर्णन, चित्र एवं भाव-निरूपण की दृष्टि से अमूल्य समझा जाता है। हिन्दी साहित्य में इनकी उत्कृष्ट कृतियों के कारण इन्हें प्रतिभाशाली साहित्यकार के रूप में माना जाता है।

9. जैनेन्द्र कुमार

आधुनिक हिन्दी गद्य साहित्य में उपन्यास एवं कहानियों के लेखन में जैनेन्द्रजी अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। ये प्रेमचन्दोत्तर युग के श्रेष्ठ कथाकार माने जाते हैं। ये हिन्दी साहित्य में मनोविश्लेषणात्मक लेखन के पुरोधा हैं।

  • जीवन परिचय

गहन चिन्तनशील जैनेन्द्र कुमार का जन्म अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज नामक कस्बे में सन् 1905 ई.में हुआ। इनके पिता का नाम श्री प्यारेलाल और माता का नाम श्रीमती रामदेवी था। पिता की मृत्यु के समय ये मात्र दो वर्ष के थे। इनका पालन-पोषण माताजी तथा नानाजी ने किया। इनका बचपन का नाम आनन्दीलाल था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर के जैन गुरुकुल “ऋषि ब्रह्मचर्य आश्रम” में हुई और यहीं इनका नाम जैनेन्द्र कुमार रखा गया। सन् 1912 में गुरुकुल छोड़कर 1919 में पंजाब से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और काशी विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। सन् 1921 में पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन तथा स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन में भाग लेने के कारण इन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। इन्होंने माताजी की सहायता से व्यापार भी किया परन्तु असफल होने पर साहित्य क्षेत्र में प्रवेश किया। दिल्ली में रहकर स्वतन्त्र रूप से साहित्य सेवा करते हुए 24 दिसम्बर, सन् 1988 को इनका देहान्त हो गया।

  • साहित्य सेवा

इनकी प्रथम कहानी ‘खेल’ सन् 1928 ई.में ‘विशाल भारत’ में छपी थी। सन् 1929 में इनका पहला उपन्यास ‘परख’ प्रकाशित हुआ जिस पर साहित्य अकादमी ने 500 रुपये का पुरस्कार प्रदान किया। जीवन-पर्यन्त साहित्य साधना में संलग्न रहकर जैनेन्द्र जी ने हिन्दी साहित्य को उपन्यास,कहानी, निबन्ध,संस्मरण, अनुवाद और विविध विधाओं की रचना से धनी बनाया।

  • रचनाएँ

प्रेमचन्द के बाद जैनेन्द्र ही कथा साहित्य के सरताज हैं। परन्तु यश उन्हें निबन्ध के क्षेत्र में ही मिला।

  1. कहानी-संग्रह–फाँसी’, ‘एक रात’, ‘स्पर्धा’, ‘पाजेब’, ‘वातायण’, ‘नीलम देश की राजकन्या’, ‘ध्रुवयात्रा’, ‘दो चिडिया’ आदि। ‘जैनेन्द्र की कहानियाँ’ नाम से दस भागों में आपकी कहानियाँ संगृहीत हैं।
  2. उपन्यास-परख’, ‘सुनीता’, ‘त्याग-पत्र’, कल्याणी’, ‘विवर्त’, ‘सुखदा’ ‘व्यतीत’, ‘मुक्तिबोध’।
  3. निबन्ध-संग्रह–’प्रस्तुत प्रश्न’, पूर्वोदय’, ‘जड़ की बात’,’साहित्य का श्रेय और प्रेम’, ‘मन्थन’,’गाँधी-नीति’,’काम-प्रेम और परिवार’ आदि।
  4. संस्मरण ‘ये और वे’।
  5. अनुवाद–’मंदालिनी’ (नाटक), पाप और प्रकाश’ (नाटक), प्रेम और भगवान’ (कहानी)।
  • वर्ण्य विषय

बहुमुखी प्रतिभा के धनी जैनेन्द्र जी ने कहानी, उपन्यास, निबन्ध,संस्करण, अनुवाद आदि अनेक गद्य विधाओं को अपना वर्ण्य विषय बनाया। एक ओर उनकी रचनाओं में पात्रों के अन्तर्मन एवं बाह्य रूप की झाँकी में दार्शनिकता मिलती है तो दूसरी ओर मानव जीवन के वर्तमान समय में उपस्थित विविध प्रश्नों के साथ-साथ उसकी शाश्वत समस्याओं का उद्घाटन भी मिलता है। उनके निबन्धों का वर्ण्य विषय साहित्य,समाज,राजनीति, धर्म,संस्कृति आदि है। आपका दृष्टिकोण मानवतावादी है। मनोवैज्ञानिकता आपकी रचनाओं का आधार थी। हाड़-माँस के पात्र जो अच्छाइयों और बुराइयों के समवेत पुंज हैं, इनकी रचनाओं के वर्ण्य विषय हैं। इन पात्रों के चरित्र की आधारशिला बुद्ध की करुणा, महावीर की अहिंसा और महात्मा गाँधी की सहनशीलता है। इसी कारण इनकी कथावस्तु संक्षिप्त और पात्र कम होते हैं। इनकी तुलना प्रेमचन्द से की जाती है। प्रेमचन्द का रचना-क्षेत्र ग्रामीण समाज और उसके शोषण पर केन्द्रित था, परन्तु जैनेन्द्र शहरी समाज की मनोवैज्ञानिक ग्रन्थियों पर कलम चलाते हैं।

  • भाषा

उनकी भाषा के कई रूप हैं—पहला, उनके उपन्यासों और कहानियों में है। जो सरल, सुबोध और संस्कृतनिष्ठ है। दूसरा रूप निबन्धों में है जिसमें गम्भीरता व दुरूहता आ गई है। इनकी भाषा विषय के अनुकूल परिवर्तित हो जाती है। भाषा की गम्भीरता के समय वाक्य बड़े तथा तत्सम शब्दावली से युक्त हैं। वर्णनात्मकता के समय वाक्य छोटे और अन्य भाषाओं के शब्दों से युक्त हैं, जैसे-“वायसरायगिरी करते हैं जो बेहद जिम्मेदारी का काम है।” दूसरी भाषाओं, जैसे-अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत के शब्दों को अपनाने में उदारता है। भाषा में प्रभाव व चमत्कार उत्पन्न करने के लिए मुहावरे और कहावतों का भी प्रयोग है, जैसे-दर-दर भटकना, ठन-ठन गोपाल होना,पूँछ हिलाना आदि।

  • शैली

जैनेन्द्रजी की शैली के निम्नलिखित तीन रूप देखने को मिलते हैं

  1. विचार-प्रधान विवेचनात्मक शैली-इनका रूप निबन्धों में देखने को मिलता है, जिसमें विचारों की गम्भीरता और चिन्तन की दुरूहता है। “पर अहंकार हवा में थोड़े उड़ जाता है। साधना से उसे धीमे-धीमे हल्का और व्यापक बनाना होता है।”
  2. मनोविश्लेषणात्मक शैली कहानी और उपन्यास के पात्रों के अन्तर्द्वन्द्व और बहिर्द्वन्द्व की अनुभूतियों को स्पष्ट करने के लिए इस शैली का प्रयोग किया गया है।
  3. व्यावहारिक शैली कथा में जीवन्तता लाने के लिए इस शैली का प्रयोग किया गया है। वार्तालाप के माधुर्य और सहज व्यंग्यात्मकता के कारण इसमें रोचकता आ गयी है। प्रसादगुण इस शैली की विशेषता है। इसमें वाक्य छोटे व सहज हैं।
  • साहित्य में स्थान

गहन चिन्तनशील जैनेन्द्रजी ने मनोवैज्ञानिकता प्रधान उपन्यास और कहानी की एक विशेष धारा प्रारम्भ की थी। आपके चिन्तन तथा नवीन शैली विधान ने हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की है। आपका सरल, सुबोध अभिव्यक्ति-कौशल, कथा को मार्मिक और प्रभावपूर्ण बनाता है। अपने इसी विशिष्ट रचना-कौशल और सामाजिक सम्बद्धता के बल पर आपने हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान बनाया है।

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10. डॉ. शिवप्रसाद सिंह
[2009]

प्रेमचन्द की परम्परा को पुनः जीवित करके उसे आधुनिक मान देने वाले डॉ. शिवप्रसाद सिंह हिन्दी साहित्य में अपनी बहुमुखी प्रतिभा और लेखन-सामर्थ्य का परिचय देने वाले हैं।

  • जीवन परिचय

डॉ.शिवप्रसाद सिंह का जन्म 19 अगस्त,सन् 1929 ई.में वाराणसी जनपद के एक कृषक परिवार में हुआ। इनकी शिक्षा वाराणसी के उदय प्रताप विद्यालय और हिन्दू विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुई। इन्होंने एम. ए. करने के पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में रीडर पद पर अध्यापन कार्य किया तथा हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे और उसी पद से सेवानिवृत्त हुए।

  • साहित्य सेवा

डॉ. शिवप्रसाद सिंह का लेखन-क्षेत्र बहुत व्यापक है। इन्होंने कहानी, उपन्यास, निबन्ध, नाटक,जीवनी, आलोचना एवं सम्पादन इत्यादि सभी विधाओं में लेखन-कार्य किया है। आपको ‘नीला चाँद’ उपन्यास के लिए 1992 में व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया। ‘अलग-अलग वैतरणी’ उपन्यास ने उन्हें साहित्य जगत् में चर्चा का केन्द्र बनाया। उनकी कहानियाँ चरित्र-प्रधान होने के साथ-साथ अतीत से प्रेरणा ग्रहण करती हैं। उनके ललित निबन्धों में उनकी संवेदनशील आध्यात्मिक व्यक्तित्व की छवि है।

  • रचनाएँ

डॉ.शिवप्रसाद सिंह ने साहित्य की विविध विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी। उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. कहानी-‘आर-पार की माला’, ‘कर्मनाशा की हार’, ‘मुरदा सराय’, इन्हें भी इन्तजार है’, भेड़िया’ तथा ‘अंधेरा हँसता है’ प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
  2. उपन्यास–अलग-अलग वैतरणी’, ‘गली आगे मुड़ती है’, ‘वैश्वानर’, ‘चाँद फिर उगा’, ‘नीला चाँद’ आदि प्रमुख उपन्यास हैं।
  3. नाटक-‘घंटिया गूंजती हैं।
  4. निबन्ध-संग्रह-‘शिखरों के सेतु’,’चतुर्दिक’, कस्तूरी मृग’ इत्यादि निबन्ध-संग्रह हैं।
  5. समीक्षा-‘कीर्तिलता’, विद्यापति’, लेखन और नवालेखन’ आदि आलोचनाएँ हैं।
  6. सम्पादन–आपने ‘शिवालिक’ और ‘कल्पना’ का सम्पादन भी किया।
  • वर्ण्य विषय

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ.शिवप्रसाद सिंह ने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर लेखनी चलाई। कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, समीक्षा, सम्पादन आदि सभी पर लिखा। मनुष्य और मनुष्यता के विविध सन्दर्भ और रूप उनके लेखन को व्यापकता प्रदान करते हैं। मनुष्य और प्रकृति का तादात्म्य उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है। यथार्थ के उद्घाटन में व्यंग्य का धरातल है। कहानियों में ग्राम्य कथानक के साथ सामाजिक समस्याओं का भी समाधान है। डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने अपने साहित्य-सृजन में बदलते मूल्यों को स्वीकार किया है।

  • भाषा

डॉ.शिवप्रसाद सिंह की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है,जिसमें मुहावरों का सटीक प्रयोग विद्यमान है; जैसे-रंग जमता है,रंग उखड़ता है,रंग चढ़ता है,दाल में काला होना,खाक छानना इत्यादि। संस्कृत शब्दावली के प्रयोग से भाव-ग्रहण में कहीं-कहीं क्लिष्टता आ गई है; जैसे-स्निग्धाभिन्नाञ्जनाभा, विद्रुमभंगलोहित, श्वेत-तुषार-मण्डित। उर्दू के भी प्रचलित शब्दों का प्रयोग है; जैसे—मजेदार, चीजें, खूब, सैलाब, हौसला आदि। आंचलिक अथवा ग्रामीण शब्दावली है; जैसे–मानुष,डीह,टेस, बिरबा, चौरा आदि।

इस प्रकार भाषा में विभिन्न शब्दों के प्रयोग से प्रसंगों को जीवन्त और प्रवाहपूर्ण बनाते हुए भाषा को सजीवता प्रदान की गई है।

  • शैली

डॉ.शिवप्रसाद सिंह ने शैली के निम्नलिखित कई रूपों को अपनाया है-

  1. उद्धरण शैली-डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए स्थान-स्थान पर संस्कृत व हिन्दी के लेखकों के अनेकों उदाहरण दिये हैं; जैसे-तुलसी-‘गिरा अनयन नयन बिनु पानी’। इसमें लघु वाक्यों का सुन्दर प्रयोग किया गया है।
  2. सामासिक पद शैली-इनकी शैली में सामासिक पद शैली के द्वारा विचारों को स्पष्ट करने का सफल प्रयास परिलक्षित होता है; जैसे—“रंग-भ्रान्ति और रंग-परिवर्तन विर-वर्णनों में स्वभावतः अधिक दिखाई पड़ते हैं।” इस शैली के माध्यम से वाक्य की संक्षिप्तता सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक है।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली का प्रयोग कहानियों में किया गया है। इस शैली में भाषा अपेक्षाकृत कठिन हो जाती है। ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी में भावात्मक शैली के दर्शन होते हैं।
  • साहित्य में स्थान

कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार, निबन्धकार एवं समीक्षक डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने अपनी प्रबल लेखनी के जाद से हिन्दी गद्य साहित्य को एक नया रूप प्रदान किया है। आपने अब तक अनछुए विषयों पर लिखकर अपनी लेखन कुशलता का परिचय दिया है। रचनाओं की मौलिकता तथा अभिव्यक्ति के कारण डॉ.शिवप्रसाद सिंह वर्तमान युग के अग्रणी साहित्यकार माने जाते हैं।

11. आचार्य विनोबा भावे

  • जीवन परिचय

आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितम्बर,1895 को महाराष्ट्र में कोंकण क्षेत्र के एक छोटे से गाँव नागोदा में हुआ था। आपका मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। माता का नाम रुक्मिणी था जो एक विदुषी तथा धार्मिक महिला थीं तथा पिता नरहरि भावे को गणित एवं विज्ञान के प्रति गहन अनुराग था। माँ उन्हें प्यार से विन्या पुकारती थीं। आपने सन् 1915 में हाईस्कूल पास किया। बम्बई में इण्टर करने गये परन्तु पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। माँ से भक्ति-आध्यात्म चिन्तन मिला,पिता से वैज्ञानिक सूझ-बूझ तो गुरु रामदास,संत ज्ञानेश्वर तथा शंकराचार्य से ब्रह्मचर्य पालन व संन्यास की प्रेरणा मिली और सन्त विनोबा बने। आपने किसानों के लिए एक स्वप्न देखा कि प्रत्येक किसान के पास एक जमीन का टुकड़ा हो। इसके लिए आपने एक ‘भूदान आन्दोलन’ शुरू किया। आप एक आदर्श नेता एवं संगठनकर्ता भी थे। जीवन का संध्याकाल पुनार (महाराष्ट्र) के आश्रम में गुजारते हुए आप 15 नवम्बर,1982 को अनन्त में विलीन हो गए।

  • साहित्य सेवा

विनोबा भावे एक आदर्श छात्र, विचारक, लेखक, दर्शनशास्त्री, प्रवचनकर्ता थे तो एक अनुवादक तथा भाषाविद भी थे। संस्कृत ग्रन्थों के अनुवाद के द्वारा आपने दर्शन को आम आदमी तक पहुँचाया। मराठी, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत एवं कन्नड़ पर उनका पूर्ण अधिकार था। कन्नड़ को वह सभी भाषाओं की रानी कहते थे। उन्होंने भगवद्गीता को अपने जीवन की सास मानते हुए उसकी व्याख्या व आलोचना की तथा उसके दर्शन को जनता तक पहुंचाया। आपने आदिगुरु शंकराचार्य, बाईबिल तथा कुरान पर भी कार्य किया। संत ज्ञानेश्वर की कविताओं पर गहन अध्ययन किया। ‘गीता प्रवचन’ तथा ‘संतप्रसाद’ जैसी पुस्तकें उनकी मौलिकता का परिचय देती हैं। सन् 1931 में माँ के कहने पर आपने गीता का मराठी में अनुवाद किया। आपने वर्धा आश्रम में ‘महाराष्ट्र धर्म’ पत्रिका का सम्पादन किया। आप देवनागरी को सम्पर्क लिपि के रूप में विकसित करने के पक्षधर थे। इस हेतु आपने ‘नागरी लिपि संगम’ की स्थापना की। इस प्रकार साहित्य जगत में मूल रूप से न रहते हुए भी आपने साहित्य की अनुपम सेवा की।

  • रचनाएँ

भगवद्गीता, बाईबिल तथा कुरान जैसे अनेक धार्मिक ग्रन्थों पर कार्य करके उनके दर्शन व रहस्य को बताने वाले विनोबा भावे ने अनेक पुस्तकें लिखीं तथा संस्कृत की अनेक पुस्तकों का मराठी में अनुवाद किया। हिन्दी में निबन्ध लिखे। आपकी रचनाएँ निम्नवत् हैं ‘गीता प्रवचन’, गीता का मराठी में अनुवाद, संतप्रसाद’, ‘गीताई’, ‘महाराष्ट्र धर्म’ पत्रिका का सम्पादन, The Essence of Quran (कुरान का सार), The Essence of Christian Teachings (ईसाई शिक्षाओं का सार), Thoughts of Education (शिक्षा पर विचार), ‘स्वराज्य शास्त्र’।

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  • वर्ण्य विषय

आध्यात्म चेतना के साधक विनोबा भावे का प्रिय विषय दर्शनशास्त्र था। कशाग्र बद्धि विनोबा भावे ने गणित, कविता तथा आध्यात्म को अपना वर्ण्य विषय बनाया। संन्यासी जीवन व्यतीत करते हुए अपरिग्रह, अस्तेय,निस्पृह, निर्लिप्त जीवन की व्याख्या उनके निबन्धों में मिलती है। गीता उन्हें बचपन से कण्ठस्थ थी, अत : गीता का मराठी में अनुवाद, हिन्दी में निबन्ध तथा प्रवचन साधारण मनुष्य को जीवन का संदेश देते हैं। उन्होंने ब्रह्म-जगत-सत्य-संन्यास पर चर्चा की। मात्र 21 वर्ष की अल्पायु में अद्वैतवाद पर बहस की। आदर्श समाज सुधारक के रूप में ‘भूदान आन्दोलन’ चलाया। भारतीय दर्शन की सरल भाषा में व्याख्या करके आपने उसे सामान्य जनता तक पहुँचाया। इसी कारण से आपके निबन्ध, व्याख्या, आलोचना, कविता, अनुवाद, प्रवचन, सम्पादन आदि भारतीय जन को प्रभावित करते हैं।

  • भाषा

एक सरल हृदय विचारक की भाषा भी सरल ही होती है। मराठी, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत तथा कन्नड़ भाषाओं पर आपको अद्भुत अधिकार प्राप्त था। इसी कारण आपको भाषाविद् भी कहा जाता है। आपकी भाषा में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य है। इसकी वजह से भाषा क्लिष्ट तथा गंभीर हो गई है। अनेक स्थानों पर आपकी भाषा काव्यमयी हो गई है। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आपने मुहावरों का प्रयोग कर भाषा को सजीव व चुटीला बनाया है। स्वजनासक्ति जैसे संस्कृत के सामासिक शब्दों के प्रयोग के साथ रूपक व उपमा अलंकार के प्रयोग ने आपके गद्य को भी काव्यमय बना दिया है। लघु वाक्य सूत्र का सा आभास देते हैं। इस प्रकार आपकी भाषा में अपार प्रवाह युक्त आकर्षण है।

  • शैली

कलम के धनी विनोबा जी की शैली व्याख्यात्मक तथा उदाहरण शैली का नमूना है। आपने निबन्धों में विवरणात्मक शैली को अपनाया है। उर्दू आदि के शब्द प्रयोग से शैली में सरलता आ गई है। अति सूक्ष्म रूप में उपदेशात्मक शैली का भी प्रयोग हुआ है। वाक्य भावों के अनुरूप अति लघु व विस्तृत हो गए हैं। दर्शन और आलोचनात्मक निबन्धों में गवेषणात्मक शैली के दर्शन होते हैं। विनोबा भावे चिन्तनशील निबन्धकार हैं। आपकी रचनाओं में विचार प्रधान, पांडित्यपूर्ण, प्रौढ़ एवं परिमार्जित शैली विद्यमान है। चिन्तन की उदात्तता पाठक को प्रभावित किए बिना नहीं रहती।

  • साहित्य में स्थान

आचार्य विनोबा भावे अनेक भाषाओं के विद्वान, कुशल राजनीतिज्ञ, मर्मज्ञ साहित्यकार, भारतीय संस्कृति एवं दर्शन के ज्ञाता, गम्भीर विचारक तथा जागरूक समाज सुधारक के रूप में सामने आते हैं। उनके नाम पर हजारी बाग (झारखण्ड) में विनोबा भावे विश्वविद्यालय स्थापित किया गया है। केरल राज्य में उन्होंने स्वयं 7 ‘विनोबा भावे आश्रम’ तथा 7 ‘विनोबा निकेतन’ स्थापित किए। सम्पादन के क्षेत्र में आपका अद्वितीय स्थान है। आपकी कृतियों में चिन्तन,मनन और अनुशीलता के बिम्ब दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मूलतः साहित्यकार न होते हुए भी विनोबा भावे का साहित्य में उच्च स्थान है

महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म हुआ था
(अ) आगरा में, (ब) अगोना में, (स) अजमेर में, (द) अलीगढ़ में।

2. ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ सर्वप्रथम लिखा
(अ) मोहन राकेश ने, (ब) श्यामसुन्दर दास ने, (स) रामचन्द्र शुक्ल ने. (द) डॉ. रघुवीर सिंह ने।

3. उषा प्रियंवदा ने इस विद्यालय से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की उपाधि अर्जित की है
(अ) सागर विश्वविद्यालय, (ब) अम्बेडकर विश्वविद्यालय, (स) इलाहाबाद विश्वविद्यालय, (द) दिल्ली विश्वविद्यालय।

4. ‘पचपन खम्भे लाल दीवार’ किसकी रचना है [2012]
(अ) महादेवी वर्मा की,
(ब) मृणाल पाण्डे की, (स) शिवानी की, (द) उषा प्रियंवदा की।

5. सन् 1923 में जीविका की तलाश में उदयशंकर भट्ट गये
(अ) लाहौर, (ब) चटगाँव, (स) इस्लामाबाद, (द) शक्करपुर।

6. उदयशंकर भट्ट ने नागपुर और जयपुर रेडियो केन्द्रों पर इस रूप में कार्य किया
(अ) न्यूज रीडर, (ब) प्रोड्यूसर, (स) स्क्रिप्ट राइटर, (द) संवाददाता।

7. शरद जोशी प्रसिद्ध हैं [2011]
(अ) कवि के रूप में, (ब) गजलकार के रूप में, (स) व्यंग्यन लेखक के रूप में, (द) इतिहासकार के रूप में।

8. प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ किस लेखक की रचना है?
(अ) हरिशंकर परसाई, (ब) शरद जोशी, (स) धर्मवीर भारती, (द) निर्मल वर्मा।

9. डॉ. श्यामसुन्दर दुबे की लगभग कितनी पुस्तकें प्रकाशित हैं?
(अ) पाँच, (ब) पच्चीस, (स) पाँच सौ, (द) सौ।

10. डॉ. श्यामसुन्दर दुबे के लेखन का इस संस्कृति से गहरा तादात्म्य था
(अ) नागरीय संस्कृति, (ब)लोकसंस्कृति, (स) पाश्चात्य संस्कृति, (द) पूर्वी संस्कृति।

11. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ ने मूलत: हिन्दी साहित्य की इस विधा को अपनी लेखनी का
विषय बनाया (अ) उपन्यास, (ब) संस्मरण, (स) नाटक, (द) रिपोर्ताज।

12. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ द्वारा लिखित ‘तात्या टोपे’ किस प्रकार का एकांकी है?
(अ) सामाजिक, (ब) ऐतिहासिक, (स) राजनैतिक, (द) आर्थिक।

13. ‘निमाड़ी लोक साहित्य’ के मर्मज्ञ गद्य-लेखक कौन थे?
(अ) प्रेमचन्द, (ब) शिवप्रसाद सिंह, (स) जैनेन्द्र, (द) रामनारायण उपाध्याय।

14. रामनारायण उपाध्याय इस महापुरुष के जीवन व विचारधारा से प्रभावित थे
(अ) गाँधीजी, (ब) कार्ल मार्क्स, (स) हिटलर, (द) विनोबा भावे।

15. प्रसिद्ध गद्यकाव्य लेखक हैं
(अ) जैनेन्द्र, (ब) रामचन्द्र शुक्ल, (स) शरद जोशी, (द)डॉ.रघुवीर सिंह।

16. डॉ. रघुवीर सिंह इस विषय के प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं
(अ) हिन्दी, (ब) इतिहास, (स) गणित, (द) संस्कृत।

17. जैनेन्द्र कुमार की तुलना किस महान् गद्य लेखक से की जाती है?
(अ) प्रेमचन्द, (ब) बाबू गुलाबराय, (स) हजारी प्रसाद द्विवेदी, (द) वियोगी हरि।

18. प्रसिद्ध उपन्यास ‘परख’ के लेखक हैं
(अ) जैनेन्द्र कुमार, (ब) यशपाल, (स) भीष्म साहनी, (द) अमरकान्त।

19. डॉ. शिवप्रसाद सिंह किस विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे?
(अ) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, (ब) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, (स) अम्बेडकर विश्वविद्यालय, (द) दिल्ली विश्वविद्यालय।

20. ललित निबन्ध ‘रंगोली’ के लेखक हैं
(अ) डॉ.शिवप्रसाद सिंह, (ब) हजारी प्रसाद द्विवेदी, (स) महादेवी वर्मा, (द) वासुदेवशरण अग्रवाल।

21. ‘महाराष्ट्र धर्म’ पत्रिका का सम्पादन किया
(अ) विनोबा भावे, (ब)रामचन्द्र शुक्ल, (स) धर्मवीर भारती, (द) डॉ.रघुवीर सिंह।

22. ‘गीता प्रवचन’ के लेखक हैं
(अ) वाल्मीकि, (ब) तुलसीदास, (स) आचार्य विनोबा भावे, (द) महर्षि रमण।
उत्तर-
1.(ब), 2. (ब), 3. (स), 4. (द), 5. (अ), 6. (ब), 7. (स), 8. (ब), 9.(ब), 10. (ब), 11. (स), 12. (ब), 13. (द), 14. (अ), 15. (द), 16. (ब), 17. (अ), 18. (अ), 19. (ब), 20. (अ), 21. (अ), 22. (स)।

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  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की प्रारम्भिक शिक्षा …….. में हुई।
2. सूत्रात्मक शैली के प्रणेता ……. हैं। [2013]
3. ‘रुकोगी नहीं राधिका’ उपन्यास की लेखिका ……… हैं।
4. ‘फिर बसन्त आया’ ……. का कहानी संग्रह है। [2009]
5. रेडियो प्रसारण की दृष्टि से उदयशंकर भट्ट के ……. अत्यधिक सफल हुए हैं।
6. उदयशंकर भट्ट का जन्म उत्तर प्रदेश के ……..” नगर में हुआ।
7. व्यंग्य नाटक ‘एक था गधा’ के लेखक ……. हैं।
8. शरद जोशी हिन्दी के सुप्रसिद्ध ……… लेखक हैं।
9. डॉ.श्यामसुन्दर दुबे शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के पद से सेवानिवृत्त हुए।
10. ‘कालमृगया’ डॉ.श्यामसुन्दर दुबे का …… संकलन है।
11. डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ का जन्म ……… के राजापुर गढ़ेवा गाँव में हुआ था।
12. ‘मुखौटे बोलते हैं’,एकांकी के लेखक …….. हैं।
13. ……… रामनारायण उपाध्याय की पुरस्कृत कृति है।
14. ……… में एक सच्चे किसान की सी भावुकता एवं कर्मठता थी।
15. डॉ.रघुवीर सिंह ……. एवं संस्कृति के प्रवक्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं।
16. …… “डॉ. रघुवीर सिंह का उच्चकोटि का गद्यकाव्य है।
17. जैनेन्द्र कुमार की प्रथम कहानी ….. है।
18. जैनेन्द्र कुमार ने अपनी रचनाएँ …. आधार पर लिखी हैं।
19. आधुनिक प्रेमचंद ………. को कहते हैं। [2014]
20. ‘कस्तूरी मृग’ डॉ.शिवप्रसाद सिंह का प्रसिद्ध ……… है।
21. साहित्य में चर्चा का केन्द्र ……… उपन्यास है।
22. विनोबा भावे का जन्म 11 सितम्बर ……. को हुआ था।
23. गीता का मराठी भाषा में अनुवाद ………….” ने किया।
उत्तर-
1. हमीरपुर, 2. रामचन्द्र शुक्ल, 3. उषा प्रियंवदा, 4. उषा प्रियंवदा, 5. गीतिनाट्य, 6. इटावा, 7. शरद जोशी,
8. हास्य-व्यंग्य, 9. प्राचार्य, 10. ललित निबन्ध, 11. उन्नाव जिले, 12. डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’, 13. चतुर चिड़िया,
14. रामनारायण उपाध्याय, 15. इतिहास, 16. यशोधरा, 17. खेल, 18. मनोवैज्ञानिक, 19. जैनेन्द्र कुमार,
20. निबन्ध संग्रह, 21. अलग-अलग वैतरणी, 22. 1895, 23. आचार्य विनोबा भावे।

  • सत्य/असत्य

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी शब्द सागर का सम्पादन कार्य किया।
2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म सन् 1940 में हुआ।
3. उषा प्रियंवदा का स्वदेश की संस्कृति से तनिक भी लगाव न था।
4. उषा प्रियंवदा के उपन्यासों में निम्न-मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियाँ देखने को मिलती
5. उदयशंकर भट्ट आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।
6. 14 वर्ष की अल्पायु में ही उदयशंकर भट्ट अनाथ हो गये।
7. शरद जोशी प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं। [2009]
8. 1990 में शरद जोशी को पदमश्री से विभूषित किया गया।
9. ललित निबन्ध ‘तिमिर गेह में किरण-आचरण’ में बताया गया है कि आदमी का सदआचरण और श्रम उसे पतन की ओर ले जाता है।
10. मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘वागीश्वरी’ पुरस्कार डॉ. श्यामसुन्दर दुबे को मिला।
11. साठोत्तरी हिन्दी नाटककारों में डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ का अपना विशिष्ट स्थान है।
12. डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ के एकांकी कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टि से नीरस हैं।
13. रामनारायण उपाध्याय ने ‘लोक संस्कृति’ न्यास की स्थापना अपने माता-पिता की मधुर स्मृति में की।
14. उपाध्यायजी की रचनाएँ ग्राम और ग्राम संस्कृति से पूर्ण नहीं थीं।
15. डॉ.रघुवीर सिंह ने इतिहासपरक रचनाएँ लिखीं।
16. ‘मालवा में युगान्तर’ डॉ. रघुवीर सिंह की एक व्यंग्य रचना है।
17. जैनेन्द्र कुमार की शिक्षा-दीक्षा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हुई।
18. ‘फाँसी’ जैनेन्द्र का प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यास है।
19. ‘रंगोली’ डॉ.शिवप्रसाद सिंह का प्रसिद्ध ललित निबन्ध है।
20. ‘कीर्तिलता’ तथा ‘विद्यापति’ डॉ.शिवप्रसाद सिंह की समीक्षात्मक कृतियाँ हैं।
21. आचार्य विनोबा भाबे की शैली व्यंग्यात्मक थी।
22. कुरान का सार (The Essence of Quran) आचार्य विनोबा भावे कृत रचना है।
उत्तर-
1. सत्य, 2. असत्य, 3. असत्य, 4. सत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. सत्य, 8. असत्य, 9. असत्य,10. सत्य,11. सत्य,12. असत्य,13. असत्य,14. असत्य,15. सत्य, 16. असत्य, 17. असत्य, 18. असत्य, 19. सत्य, 20. सत्य, 21. असत्य, 22. सत्य।

  • सही जोड़ी मिलाइए

I. ‘क’
(1) रुकोगी नहीं राधिका – (अ) एकांकी
(2) रामचन्द्र शुक्ल [2011] – (ब) विक्रम और बेताल
(3) समस्या का अन्त – (स) बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ पुरस्कार
(4) शरद जोशी – (द) उपन्यास
(5) डॉ.श्यामसुन्दर दुबे – (इ) चिन्तामणि
उत्तर-
(1) → (द),
(2) → (इ),
(3) → (अ),
(4) → (ब),
(5) → (स)।

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(1) डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ – (अ) लोक-संस्कृति पुरुष
(2) आधुनिक युग का प्रेमचन्द (2012, 15) – (ब) ऐतिहासिक निबन्धकार
(3) रामनारायण उपाध्याय – (स) गृह कलह
(4) डॉ.शिवप्रसाद सिंह – (द) जैनेन्द्र कुमार
(5) डॉ.रघुवीर सिंह – (इ) आदर्श अध्यापक
(6) आचार्य विनोबा भावे – (ई) समाज सुधारक एवं दर्शनशास्त्री
उत्तर-
(1) → (स),
(2) → (द),
(3) → (अ),
(4) → (इ),
(5) → (ब),
(6) → (ई)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल किस विश्वविद्यालय में कार्यरत थे?
उत्तर-
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय।।

प्रश्न 2.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्धों में किन दो निबन्ध शैलियों का समन्वय है?
उत्तर-
भारतीय एवं पाश्चात्य।

प्रश्न 3.
उषा प्रियंवदा लिखित किसी एक कहानी का नाम क्या है?
उत्तर-
वापसी।

प्रश्न 4.
उषा प्रियंवदा के शोध ग्रन्थ का क्या नाम है?
उत्तर-
आधुनिक अमरीकी साहित्य।।

प्रश्न 5.
उदयशंकर भट्ट लाहौर के एक विश्वविद्यालय में कौन-से विषय पढ़ाते थे?
उत्तर-
हिन्दी और संस्कृत।

प्रश्न 6.
उदयशंकर भट्ट ने अपने नाटकों के लिए किस प्रकार के परिवारों की समस्याओं को चुना है?
उत्तर-
निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार।

प्रश्न 7.
शरद जोशी ने मध्य प्रदेश सूचना विभाग में कितने वर्षों तक सेवा की?
उत्तर-
10 वर्षों तक।

प्रश्न 8.
शरद जोशी लिखित नाटक ‘अन्धों का हाथी’ साहित्य की किस विधा के अन्तर्गत आता है?
उत्तर-
व्यंग्य नाटक।

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प्रश्न 9.
डॉ. श्यामसुन्दर दुबे की रचना ‘दाखिल खारिज’ साहित्य की किस विधा को दर्शाती है?
उत्तर-
उपन्यास।

प्रश्न 10.
‘तिमिर गेह में किरण आचरण’ ललित निबन्ध के लेखक कौन हैं? [2009]
उत्तर-
डॉ.श्यामसुन्दर दुबे।।

प्रश्न 11.
‘तात्या टोपे’ रचना लेखन की कौन-सी विधा है?
उत्तर-
एकांकी।

प्रश्न 12.
‘स्वप्न का सत्य’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
डॉ.सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’।

प्रश्न 13.
‘निमाड़ी लोक-साहित्य’ रचना के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
रामनारायण उपाध्याय।

प्रश्न 14.
रामनारायण उपाध्याय की माताजी का नाम क्या था?
उत्तर-
दुर्गावती।

प्रश्न 15.
डॉ. रघुवीर सिंह का जन्म कहाँ हुआ? \
उत्तर-
सीतामऊ।

प्रश्न 16.
डॉ. रघुवीर सिंह की शोध, चिन्तन एवं साहित्यिक अभिरुचि का मूर्त रूप क्या है?
उत्तर-
नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ।

प्रश्न 17.
आधुनिक युग का प्रेमचन्द किसे कहा जाता है? [2011]
उत्तर-
जैनेन्द्र कुमार को।

प्रश्न 18.
जैनेन्द्र कुमार ने किस समाज की ग्रन्थियों को खोला है?
उत्तर-
शहरी समाज।

प्रश्न 19.
‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
डॉ.शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 20.
डॉ. शिवप्रसाद सिंह किस विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे?
उत्तर-
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।

प्रश्न 21.
आचार्य विनोबा भावे के नाम पर स्थापित ‘विनोबा भावे विश्वविद्यालय’ कहाँ स्थित है?
उत्तर-
हज़ारी बाग (झारखण्ड)।

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प्रश्न 22.
‘गीता प्रवचन’ तथा ‘संतप्रसाद’ पुस्तकों के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
आचार्य विनोबा भावे।

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MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 1-5)

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 1-5)

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल [2009, 10, 12, 15, 17]

  • जीवन परिचय

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 11 अक्टूबर,सन् 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के अगोना ग्राम में हुआ था। आपके पिता पं. चन्द्रबलि शुक्ल सुपरवाइजर कानूनगो थे। शुक्लजी ने एफ.ए.(इण्टर) तक की शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा समाप्ति पर जीविकोपार्जन के लिए मिर्जापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग के शिक्षक हो गये। इस समय तक इनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। जब नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी द्वारा ‘हिन्दी शब्द सागर’ नाम से शब्द-कोश के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया गया,तब शुक्लजी मात्र छब्बीस वर्ष की अवस्था में उसके सहायक सम्पादक नियुक्त किये गये। उसके बाद हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी में आप हिन्दी विभाग में प्राध्यापक हो गये। सन 1937 में आप वहाँ हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हो गये। 2 फरवरी,सन् 1940 को आपका निधन हो गया।

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  • साहित्य सेवा

आचार्य शुक्लजी की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे कवि, निबन्धकार, आलोचक, सम्पादक तथा अनुवादक अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैं। आपने ‘हिन्दी शब्द सागर’ और ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का सम्पादन किया। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में हिन्दी को उच्चकोटि के निबन्ध, वैज्ञानिक समालोचनाएँ,साहित्यिक ग्रन्थ एवं सरल कविताएँ प्रदान की। शुक्ल जी ने हिन्दी में समालोचना और निबन्ध कला का उच्च आदर्श स्थापित किया। उनसे पहले की समालोचनाओं में गुण-दोष विवेचन की ही प्रधानता थी। उन्होंने वैज्ञानिक ढंग की व्याख्यात्मक आलोचना-पद्धति की नींव डाली और जायसी,तुलसी तथा सूर के काव्यों पर उत्कृष्ट व्याख्यात्मक आलोचनाएँ लिखीं। आपने करुणा, उत्साह,क्रोध,श्रद्धा और भक्ति आदि मनोविकारों पर सुन्दर निबन्ध लिखे। उनके निबन्ध ‘चिन्तामणि’ नामक पुस्तक में संग्रहीत हैं। ‘चिन्तामणि’ पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से आपको ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्राप्त हुआ। उन्होंने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ नामक गवेषणापूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ लिखा, जिस पर हिन्दुस्तानी एकेडमी, प्रयाग ने पुरस्कार प्रदान किया।

  • रचनाएँ

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएँ अग्र प्रकार हैं
(1) निबन्ध-संग्रह-‘चिन्तामणि, ‘विचार-वीथी’।
(2) आलोचना-‘त्रिवेणी, ‘रस-मीमांसा’।
(3) इतिहास–’हिन्दी साहित्य का इतिहास’।

  • वर्ण्य विषय

साहित्य के समस्त क्षेत्रों को स्पर्श करने वाली शुक्लजी की प्रतिभा समालोचना एवं निबन्ध के क्षेत्र में भी प्रखरता के साथ परिलक्षित होती है। निबन्ध एवं आलोचना दोनों ही क्षेत्रों में शुक्लजी ने लोक मंगल एवं नैतिक आदर्श को प्रमुख स्थान दिया है। निबन्ध-रचना के क्षेत्र में उन्होंने सामाजिक उपयोगिता से सम्बन्धित मानव-मनोभावों पर सुन्दर निबन्ध लिखे। शुक्लजी ने मनोभावों सम्बन्धी निबन्धों के साथ ही समीक्षात्मक एवं सैद्धान्तिक निबन्धों की भी रचना की।

  • भाषा

आचार्य शुक्लजी की भाषा परिष्कृत, प्रौढ़ एवं साहित्यिक खड़ी बोली है। इस भाषा में सौष्ठव है तथा उसमें गम्भीर विवेचन की अपूर्व शक्ति है। शुक्लजी की भाषा में व्यर्थ का शब्दाडम्बर नहीं मिलता। भाव और विषय के अनुकूल होने के कारण वह सर्वथा सजीव और स्वाभाविक है। गूढ़ विषयों के प्रतिपादन में भाषा अपेक्षाकृत क्लिष्ट है। उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता है। वाक्य-विन्यास भी कुछ लम्बे हैं। सामान्य विचारों के विवेचन में भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। कहावतों एवं मुहावरों के प्रयोग से उसमें सरसता आ गयी है। शुक्लजी की भाषा व्यवस्थित तथा पूर्ण व्याकरण सम्मत है तथा उसमें कहीं भी शिथिलता देखने को नहीं मिलती। भाषा की इसी कसावट के कारण उसमें समास शक्ति पायी जाती है तथा कहीं-कहीं तो भाषा सूक्तिमयी बन गयी है; जैसे—“बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।”

  • शैली

शुक्लजी अपनी शैली के स्वयं निर्माता थे। उनकी शैली समास के रूप से प्रारम्भ होकर व्यास शैली के रूप में समाप्त होती है अर्थात् एक विचार को सूत्र रूप में कहकर फिर उसकी व्याख्या कर देते हैं। मुख्य रूप से शुक्लजी की शैली चार प्रकार की है-

  1. समीक्षात्मक शैली-शुक्लजी ने व्यावहारिक, समीक्षात्मक एवं समालोचनात्मक निबन्धों में इस शैली का प्रयोग किया है। इस शैली में वाक्य छोटे,संयत एवं गम्भीर हैं। इसमें विषय का प्रतिपादन सरलता के साथ इस प्रकार किया गया है कि सहज ही हृदयंगम हो जाता है।
  2. गवेषणात्मक-अनुसन्धानपरक तथा सैद्धान्तिक समीक्षा सम्बन्धी तथा तथ्यों के विश्लेषण-निरूपण में शुक्लजी ने इस शैली का प्रयोग किया है। यह शैली गम्भीर तथा कुछ सीमा तक दुरूह है। शब्द-विन्यास क्लिष्ट तथा वाक्य-विन्यास जटिल है। यह शैली सामान्य पाठकों के लिए बोधगम्य नहीं है।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली में वाक्य कहीं छोटे तथा कहीं लम्बे हैं तथा भाषा कुछ-कुछ अलंकारिक हो गयी है। इसमें भावनाओं का धाराप्रवाह रूप मिलता है।
  4. हास्य-विनोद एवं व्यंग्य प्रधान शैली-इस शैली के दर्शन मनोविकारों तथा समीक्षात्मक निबन्धों में यत्र-यत्र ही होते हैं, क्योंकि हास्य तथा व्यंग्य शुक्लजी के निबन्धों का मुख्य विषय नहीं है, फिर भी इस शैली के प्रयोग से निबन्धों में रोचकता आ गयी है।
  • साहित्य में स्थान

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी असाधारण प्रतिभा द्वारा साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन किया। लेकिन उनकी विशेष ख्याति निबन्धकार, समालोचक तथा इतिहासकार के रूप में है। उन्होंने हिन्दी में वैज्ञानिक आलोचना-प्रणाली को जन्म दिया, निबन्ध-साहित्य को समृद्ध किया तथा हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन के लिए एक आधार प्रदान किया। शुक्लजी की भाषा तथा शैली आने वाले साहित्यकारों के लिए आदर्श रूप है। वे युग प्रवर्तक निबन्धकार हैं।

2. उषा प्रियंवदा
[2016]

  • जीवन परिचय

यथार्थ के बेजोड़ अंकन में शीर्षस्थ स्थान रखने वाली कहानीकार उषा प्रियंवदा का जन्म 24 दिसम्बर,सन् 1931 को इलाहाबाद में हुआ। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् पी-एच.डी.करके आपने अपनी योग्यता को और आगे बढ़ाया। अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी से भी आपका अनुराग लगातार बना रहा और आप हिन्दी में भी निरन्तर लिखती रहीं। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू तथा संस्कृत पर आपका समान व पूर्ण अधिकार रहा है। लेखन के साथ-साथ आपका मुख्य कार्यक्षेत्र अध्यापन ही रहा है। आपने ‘आधुनिक अमरीकी साहित्य’ पर इंडियाना विश्वविद्यालय से शोधकार्य किया। आप संयुक्त राज्य अमरीका के विस्कांसिन विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्षा रहीं। हिन्दी की सेवा में आपके उत्कृष्ट योगदान को प्रमाणित करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको सम्मानित किया।

  • साहित्य सेवा

साहित्यिक रुचि सम्पन्न उषा प्रियंवदा ने मुख्यतः उपन्यास और कहानियाँ लिखी हैं। उनके साहित्य में भारतीय और अमरीकी संस्कृति का समन्वय स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी प्रथम कहानी ‘लाल चूनर’ थी। लम्बे समय तक अमरीका में निवास होने के कारण आपके चिन्तन में तुलनात्मक दृष्टि नजर आती है। स्वतन्त्रता के पश्चात् के भारतीय जीवन की विश्रृंखलताएँ आपके साहित्य में स्पष्ट देखी जा सकती हैं।

  • रचनाएँ

उषा प्रियंवदा मूलत: एक कहानीकार एवं उपन्यासकार रही हैं। आपकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

  1. उपन्यास-पचपन खम्भे लाल दीवारें’ [1961]: इस उपन्यास का प्रदर्शन दूरदर्शन पर होने के कारण यह अत्यधिक प्रसिद्ध रहा, ‘रुकोगी नहीं राधिका’ [1968], ‘शेष यात्रा’ [1984]।
  2. कहानी-संग्रह ‘जिन्दगी और गुलाब’ [1961], ‘फिर बसन्त आया’ [1961], ‘एक कोई दूसरा’ [1966], ‘कितना बड़ा झूठ’ [1973], ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ [1974]।
  • वर्ण्य विषय

कथा साहित्य की प्रेमिका उषा प्रियंवदा की कहानियों के पीछे एक बीज जरूर होता है,जो उनके एक विचार, एक इमेज, एक अनुभव या अनुभूति को लेखन के रूप में साकार करता है। चुनौतियाँ उन्हें उत्साहित करती हैं, ‘डेड लाइन्स’ उन्हें प्रेरित करती हैं। इन्हीं चुनौतियों और ‘डेड लाइन्स’ के सम्बन्ध और प्रतिध्वनियाँ उनके वर्ण्य विषय हैं। आधुनिक भौतिकवादी, वैयक्तिक तथा एकान्तिक विचारधारा ने भारतीय समाज व परम्पराओं को तोड़कर विसंगतियों तथा मानसिक कुण्ठाओं के साथ पारिवारिक विघटन की नींव डाली है,यह सब मनोवैज्ञानिक परिवर्तन उनकी कहानियों व उपन्यासों में स्पष्ट झलकता है। नई पीढ़ी की टीस पाठक को व्यथित कर देती है। मानव मूल्यों की अनदेखी करना उनकी कहानियों की मार्मिक पहचान है। उनकी रचनाओं का विषय अधिकतर निम्न मध्यवर्गीय समाज की पीड़ा तथा नारी-पुरुष के आयु भेद रहे है।

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  • भाषा

उषा प्रियंवदा ने सरल, सुस्थिर, संयत एवं बोधगम्य खड़ी बोली का प्रयोग किया है। संस्कृत की ज्ञाता लेखिका आकांक्षी,कुण्ठित,अस्थायित्व जैसे शब्दों का प्रयोग कर भाषा को और अधिक सुन्दर बनाती हैं। मर्तबान,कनस्तर,खटिया जैसे प्रचलित शब्द भाषा को सहज बनाते हैं। रिटायर, क्वार्टर, पैसेन्जर जैसे शब्दों के प्रयोग से लेखिका का प्रवास झलकता है। वाजिब, जिम्मेदार, सिर्फ जैसे उर्दू के शब्द भाषा को बोधगम्य बनाने में पूर्णतः सक्षम हैं। लघु वाक्य-विन्यास,कहावतों तथा मुहावरों का प्रयोग भाषा का सरल रूप है। शब्दों के सामासिक प्रयोग से उषा प्रियंवदा के साहित्य की भाषा में कसावट विद्यमान रहती है।

  • शैली

उषा प्रियंवदाजी की शैली भावात्मक विवरणात्मक तथा व्यंग्यात्मक है। उनके उपन्यासों में विवरण शैली के दर्शन होते हैं,तो कहानियों में भावात्मकता तथा व्यंग्य परिलक्षित हैं। उनकी सहज कथन शैली तथा यथार्थ का चित्रण बेजोड़ है। भावुकता,माधुर्य और प्रवाह उनकी शैली की विशेषता है। उनके व्यंग्य चुटीले व सार्थक हैं, जिनमें विदेशी शब्दों की सहायता से पीड़ा व कराहट का अनुभव होता है। इस प्रकार उनकी शैली वर्ण्य-विषय के सर्वथा अनुकूल है।

  • साहित्य में स्थान

हिन्दी कथा साहित्य में लेखिका का विशिष्ट स्थान होने का प्रमुख कारण है-वर्तमान में नष्ट होते हुए भारतीय मूल्यों का सटीक चित्रण।

वर्तमान जीवन की विसंगतियों और उनकी विशृंखलताओं का सामाजिक व मनोवैज्ञानिक स्तर पर यथार्थ व सजीव चित्रण करके लेखिका हिन्दी कथा साहित्य में अपना उच्च स्थान स्वयं निर्धारित करती हैं। उनकी कथाएँ पारिवारिक विघटन को रोकने का संदेश देती हैं। सच्चे अर्थों में उषा प्रियंवदा आधुनिक समाज की एक आदर्श कथाकार हैं।

3. उदयशंकर भट्ट [2014, 16]

  • जीवन परिचय

एकांकी और नाटक के सिद्धहस्त लेखक उदयशंकर भट्ट का जन्म 3 अगस्त, सन् 1898 में उत्तर-प्रदेश के इटावा नगर में हुआ था। इटावा में आपकी ननिहाल भी थी। आपका परिवार साहित्यिक गतिविधियों में गहरी रुचि रखता था। आपने संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी की शिक्षा इटावा में ही प्राप्त की। जब ये मात्र चौदह वर्ष की अल्पायु के थे, इनके सिर से माँ-बाप का साया उठ गया। आपने काशी विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् पंजाब से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात आपने कलकत्ता से काव्यतीर्थ की उपाधि अर्जित की। 1923 में जीविका की तलाश में आप लाहौर चले गये तथा वहाँ संस्कृत और हिन्दी का अध्यापन-कार्य किया। साथ ही, इस दौरान आप अपने अध्ययन में भी रत रहे। जब भारत का बँटवारा हुआ तो भट्टजी लाहौर छोड़कर दिल्ली आकर बस गये। आपने आकाशवाणी में सलाहकार के पद को सुशोभित किया। कुछ वर्षों तक आप आकाशवाणी के नागपुर और जयपुर केन्द्रों पर ‘प्रोड्यूसर’ रहे। सेवानिवृत्ति के पश्चात् आपने स्वतन्त्र रूप से कहानी, उपन्यास, आलोचना और नाटक इत्यादि का लेखन कार्य किया। 22 फरवरी,1966 को आपका देहावसान हो गया।

  • साहित्य सेवा एवं रचनाएँ

भट्टजी का प्रथम एकांकी संग्रह, अभिनव एकांकी’ के नाम से सन् 1940 में प्रकाशित हुआ था। इसके पश्चात् इन्होंने सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि अनेक विषयों पर एकांकियों की रचना की, जिनमें ‘समस्या का अन्त’, ‘परदे के पीछे’, ‘अभिनव एकांकी’, ‘अस्तोदय’, ‘धूपशिखा’, ‘वापसी’, ‘चार एकांकी’ इत्यादि आपके प्रतिनिधि एकांकी संग्रह माने जाते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी उदयशंकर भट्टजी ने नाटक, कविता तथा उपन्यासों की रचना की है।

  • वर्ण्य विषय

भट्टजी ने पौराणिक, समस्या-प्रधान, हास्य-प्रधान, प्रतीकात्मक एवं सामाजिक समस्याओं से सम्बन्धित एकांकियों की रचना की है। आपने वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक की भारतीय जीवन संवेदना को चित्रित किया है। आपकी रचनाओं में विभिन्न समस्याओं को जीवन्त रूप से उजागर किया गया है। युग की प्रवृत्तियों और सामाजिक परिवर्तनों से आपने सदैव संगति बनाए रखी।

  • भाषा व शैली

भट्टजी ने अपने साहित्य सृजन में सरल, स्थिर व चुलबुली बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया है। भाव व पात्रों के अनुसार उनकी भाषा का रूप बदलता रहता है। उनकी भाषा में उर्दू के शब्दों का बाहुल्य है; जैसे-ओफ, फ़ायदा, बेहद, हर्ष इत्यादि। संस्कृत शब्दावली का प्रयोग यत्र-तत्र दिखाई पड़ता है; जैसे-गृहस्थ,सुसंस्कृति, निर्दयी इत्यादि। संवाद सरल व छोटे-छोटे वाक्यों वाले हैं। भट्टजी की लेखन-शैली की एक विशेषता प्रश्नों के माध्यम से भावाभिव्यक्ति है; जैसे-क्या छत तुम्हारे लिए है ? कहो तो मैं कहूँ ? क्या फ़ायदा ? इत्यादि। कहीं-कहीं वाक्य सूक्ति का-सा आभास कराते हैं।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भट्टजी की भाषा सरल व शैली व्याख्यात्मक है।

  • साहित्य में स्थान

एक सफल नाटककार के रूप में अपनी विशिष्ट छवि बनाने वाले उदयशंकर भट्ट प्रख्यात एकांकीकार भी हैं। उन्होंने युग के अनुरूप चरित्र-सृष्टियों की रचना की है। उनके एकांकी रंगमंचीय होने तथा जीवन की मौलिक समस्याओं से सम्बन्धित होने के कारण मर्मस्पर्शी हैं। आधुनिक हिन्दी एकांकीकारों में भट्टजी का एक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट स्थान है। हिन्दी एकांकी साहित्य उनके योगदान को सदैव याद रखेगा।

4. शरद जोशी
[2009, 13, 15]

चाय की दुकान से लेकर राष्ट्रपति भवन तक अपनी लेखनी की आवाज को पहुँचाने वाले शरद जोशी को साधारण व्यक्ति से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग तक अपना समझता है। इसी कारण उनकी तुलना कबीर और मार्क ट्वेन से की गई है।

  • जीवन परिचय

हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य लेखक शरद जोशी का जन्म 23 मई,सन् 1931 को उज्जैन में मगर मुहे की गली में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीनिवास और माता का नाम शान्ति था। विद्यार्थी जीवन से ही इनकी रुचि लेखन में थी। इन्होंने होल्कर कॉलेज, इन्दौर से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1958 में इन्होंने इरफाना सिद्दिकी से प्रेम-विवाह किया। एक स्क्रिप्ट राइटर के रूप में आप आकाशवाणी इन्दौर से लम्बे समय तक जुड़े रहे तथा मध्य प्रदेश सूचना विभाग में दस वर्षों तक जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में सेवारत रहे। तत्पश्चात् वे बम्बई चले गये और वहाँ पर सतत् लेखन कार्य करते हुए आपने 5 सितम्बर, सन् 1991 को अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।

  • साहित्य सेवा

राजनीतिज्ञों पर लगातार करारे व्यंग्य और प्रहार करने वाले शरद जोशी की 18 पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्होंने 1953-54 में लोगों के बीच एक लेखक के रूप में अपनी जगह बना ली। उनका सबसे पहला व्यंग्य लेख ‘नई दुनिया के ‘परिक्रमा’ स्तम्भ में छपा था। उनके लघु व्यंग्य-लेख नई दुनिया, धर्मयुग, रविवार, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बरी, ज्ञानोदय आदि पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से छपते थे। नवभारत टाइम्स के प्रतिदिन’ नामक स्तम्भ के लिए आपने 7 वर्षों तक लिखा। ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ उनका सरकारी अफसरों द्वारा सरकारी वाहनों पर की गई सवारी पर करारा व्यंग्य है। उन्होंने लगभग 35 वर्षों तक गद्य को कवि-सम्मेलन के मंच पर जोर-शोर से जमाये रखा। शरद जोशी को भारत सरकार ने सन् 1990 में पद्मश्री से विभूषित कर सम्मानित किया। शरदजी के कई नाटक जापान में वहाँ की स्थानीय भाषा में अनुवादित होकर मंचित किये गये।

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  • रचनाएँ

शरद जोशी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. व्यंग्य रचनाएँ-‘पिछले दिनों’, ‘तिलिस्म’, ‘रहा किनारे बैठ’, ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’, ‘किसी बहाने’, ‘यथासम्भव’, ‘नावक के तीर’ आदि अनेक प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं।
  2. लघु उपन्यास–’मैं-मैं और केवल मैं’ उनका लोकप्रिय लघु उपन्यास है।
  3. नाटक ‘अन्धों का हाथी’, ‘एक था गधा उर्फ अलादत खान’।
  4. संवाद-शरद जी ने कई फिल्मों के लिए संवाद-लेखन का कार्य भी किया-‘छोटी सी बात’, ‘क्षितिज’, ‘साँच को आँच क्या’, ‘गोधूलि’, ‘उत्सव’, ‘नाम’, ‘चमेली की शादी’, मेरा दामाद’, ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘उड़ान’ आदि।
  5. टी. वी. सीरियल्स-श्याम तेरे कितने नाम’, ‘ये जो है जिन्दगी’, ‘विक्रम और बेताल’, ‘वाह जनाब’, ‘दाने अनार के’, ‘श्रीमती जी’,’सिंहासन बत्तीसी’, ‘ये दुनिया है गजब की’, ‘प्याले में तूफान’, ‘मालगुढी डेज’, गुलदस्ता आदि।
  • वर्ण्य विषय

जोशीजी ने साहित्य की व्यंग्य विधा को अपना विशेष क्षेत्र बनाया। उनके व्यंग्य में हास्य भी मिश्रित था। शरद जोशी एक व्यक्ति नहीं विचारधारा का नाम है। उनकी व्यंग्य विधा को पैनी धार धर्मयुग’ और ‘धर्मवीर भारती’ जैसे साप्ताहिकों-पत्रिकाओं ने दी। उनके व्यंग्य-लेखन के प्रमुख विषय थे-आपातकाल, नौकरशाही, अखबार, राजनीति, सरकारी अफसर, चिन्तन के नाम पर राजनेताओं की ऐय्याशी, पुलिस-हड़ताल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री इत्यादि। इन्दिरा गाँधी से लेकर जयप्रकाश नारायण तक सभी उनके व्यंग्य-बाणों के निशाने पर रहे हैं। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली विसंगतियों का मार्मिक चित्रण कर शरदजी ने पाठकों को स्तम्भित कर दिया है।

  • भाषा

शरदजी की भाषा अत्यन्त सरस व सरल है। शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली में सहजता है। देशज व विदेशी शब्दों के प्रयोग से भाषा बोधगम्य बन गई है। भाषा में एक विशिष्ट प्रवाह है। शब्दों का चयन सटीक है। स्थान-स्थान पर मुहावरों के प्रयोग से भाषा में हास्य व चंचलता आ गई है। शरदजी व्यंग्य के भाषागत सौन्दर्य को अपनी छोटी-छोटी उक्तियों के माध्यम से प्रभावशाली बनाने में सफल रहे हैं। उनकी भाषा में सरसता के साथ-साथ चुटीलापन भी दृष्टिगोचर होता है।

  • शैली

शरदजी की शैली मुख्य रूप से हास्य-व्यंग्य प्रधान है। उन्होंने सामाजिक विडम्बनाओं और उसके अन्तर्विरोधों को आधार मानकर व्यंग्य किये हैं। वे अपनी चमत्कारिक उत्प्रेक्षाओं से व्यंग्य की सर्जना करते हैं। भेटवार्ता जैसे प्रसंगों पर संवाद शैली में गुदगुदाने वाला हास्य और उसके परोक्ष में छिपा व्यंग्य,श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर देता था। उनकी आलोचनात्मक शैली भी व्यंग्य से पूर्ण है। वे राजनीतिज्ञों की आलोचना में भी व्यंग्य करने से नहीं चूकते। उनके हर व्यंग्य में ओज का पुट मौजूद मिलता है। इसीलिए बुद्धिजीवी उनके तर्क,शब्द-शैली, भाषा-शैली और विचारों की पकड़ का लोहा मानते हैं।

  • साहित्य में स्थान

शरदजी के ओजपूर्ण व्यंग्यों ने अपने समय में लोकप्रियता की चरम सीमा को पार किया। उन्होंने अनेक पत्रिकाओं के माध्यम से सारे देश को एकसूत्र में जोड़ दिया था। जोशीजी ने हिन्दी के गम्भीर व्यंग्य को लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचाया। इस प्रकार हिन्दी गद्य साहित्य शरद जोशी को सदैव याद रखेगा।

5. डॉ. श्यामसुन्दर दुबे

  • जीवन परिचय

ललित निबन्धों में परम्परा और आधुनिकता को निभाने वाले डॉ. श्यामसुन्दर दुबे का जन्म 12 दिसम्बर, सन् 1944 को मध्यप्रदेश (हटा, दमोह) के बर्तलाई ग्राम में हुआ था। आपने एम. ए. पी-एच.डी. तक शिक्षा प्राप्त की है। ग्रामीण अंचल आपकी रचनाओं का स्रोत रहा है। आप हिन्दी साहित्य के समर्थ निबन्धकार,कवि, आलोचक होते हुए एक कुशल अध्यापक भी हैं। आप मध्यप्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों में लम्बे समय तक प्राध्यापक पद पर रहे हैं। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होकर वर्तमान में आप निदेशक, मुक्तिबोध सृजनपीठ डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर में कार्यरत हैं।

  • साहित्य सेवा

डॉ. श्यामसुन्दर दुबे साहित्यिक अभिरुचि रखने के कारण एक श्रेष्ठ गद्यकार माने जाते हैं। डॉ. दुबे को उनकी विभिन्न रचनाओं पर अनेक सम्मान तथा पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का ‘बालकृष्ण शर्मा नवीन’ पुरस्कार,मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी’ पुरस्कार, छत्तीसगढ़ शासन का ‘लोक-संस्कृति’ केन्द्रित सम्मान, डॉ. शम्भूनाथ सिंह रिसर्च फाउण्डेशन, वाराणसी का ‘डॉ. शम्भूनाथ सिंह अखिल भारतीय नवगीत’ पुरस्कार इत्यादि पुरस्कारों से आपको सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में भी आप हिन्दी साहित्य की सेवा में सागर विश्वविद्यालय के माध्यम से रत् हैं।

  • रचनाएँ

डॉ. श्यामसुन्दर दुबे ने निबन्ध, कथा, आलोचना और लोकविद् साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी लगभग 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं

  1. ललित निबन्ध संकलन-कालमृगया’, ‘विषाद बांसुरी की टेर’, ‘कोई खिड़की इसी दीवार से।
  2. काव्य संकलन-रीते खेत में बिजूका’, ऋतुएँ जो आदमी के भीतर हैं’, ‘धरती के अनन्त चक्करों में’।
  3. उपन्यास–’दाखिल खारिज’, ‘मरे न माहुर खाये’।
  4. लोक संस्कृति के रूप में-‘लोक : परम्परा, पहचान एवं प्रवाह’, ‘लोक चित्रकला : परम्परा और रचना दृष्टि’, ‘लोक में जल’, भारत की नदियाँ’।
  • वर्ण्य विषय

लोक संस्कृति से सम्बन्ध रखने वाले डॉ.दुबे की समस्त रचनाओं में भारतीयता के उन तत्वों का समावेश है,जिनकी आज के वैज्ञानिक युग में महती आवश्यकता है। आधुनिक जीवन को जीते हुए भी भारतीय ग्रामीण जीवन से अपना सम्बन्ध बनाये रखना ही उनके साहित्य का मूल विषय है। इसी को आधार मानकर डॉ.दुबे ने स्वयं को साहित्य की विभिन्न विधाओं में उतारा। आपने ललित निबन्ध, आत्माभिव्यंजना प्रधान निबन्ध, कविताएँ, कहानियाँ, आलोचना आदि रचनात्मक विधाओं के अतिरिक्त ग्रामीण लोक-संस्कृति को लोक साहित्य के आंचल में बाँधा है। इनकी विद्वता पाठक के हृदय पर गहरा प्रभाव डालती है।

  • भाषा

आपने देशज शब्दों से युक्त संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रयोग किया है। प्रकृति के सौन्दर्य का अंकन करते समय आपकी भाषा जगह-जगह काव्यमयी हो गई है,जैसे-“हलदिया पीलापन ऊर्ध्वमुखी होकर अंधेरे में दिपदिपा रहा था।”…..”अब जलाओ दिया,… करो प्रकाश”। डॉ. दुबे ने शब्दों के प्रयोग में स्वच्छन्दता बरती है तथा चतेवरी, पहलौरी जैसे देशज शब्दों; ट्रेक्टर, ट्रांजिस्टर, टी. वी. जैसे प्रचलित अंग्रेजी शब्दों; इज्जत-आबरू, दाँव जैसे उर्दू शब्दों तथा वानस्पतिक, उल्लास, वंचित जैसे संस्कृत शब्दों के प्रयोग से भाषा को सजाया है। वाक्यों में लघुता के कारण उनका प्रभाव चिरस्थायी हो उठा है।

  • शैली

डॉ. श्यामसुन्दर दुबे व्यास-शैली तथा उद्धरण शैली के माध्यम से विषय को स्पष्ट करते हैं। उनके द्वारा लिखित कहानियों व निबन्धों में विवरणात्मक शैली देखने को मिलती है। बीच-बीच में प्रचलित महावरों, जैसे-ढाक के तीन पात आदि का भी प्रयोग किया गया है। अति सूक्ष्म रूप में उपदेशात्मक शैली का भी प्रयोग हुआ है, जैसे-“बस इसी तरह जगमगाओ”…… “अपनी ज्योति का स्पर्श दो” आदि। यत्र-तत्र व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग भी देखने को मिलता है।

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  • साहित्य में स्थान

बुद्धि और संवेदना के स्वस्थ समन्वय ने डॉ.दुबे को हिन्दी साहित्य में उच्च स्थान दिलाया है। उन्हें लोक-संस्कृति के प्रचारक के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त हुई है। डॉ. दुबे की रचनाओं में कवि हृदय की भावात्मक अनुभूति एवं कथात्मक अभिव्यक्ति के दर्शन होने के कारण हिन्दी के क्षेत्र में उनका एक विशिष्ट स्थान है।

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MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

11. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ [2017]

  • जीवन परिचय

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का काव्य राष्ट्रीय चेतना और जनजागृति का काव्य है। इन्होंने जहाँ परतन्त्र भारत के सोते हुए लोगों को जगाने का काम किया वहीं मानवीय भावना से ओतप्रोत प्रेमाकुल काव्य की रचना भी की। इन्होंने वीर एवं श्रृंगार दोनों में समान रूप से लिखकर हिन्दी काव्य को अमर रचनाएँ प्रदान की।

राष्ट्रवादी चिन्तक, जुझारु पत्रकार एवं ओजस्वी कवि पंडित बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जन्म सन् 1897 ई. में शाजापुर जिले के शुजालपुर के मयाना गाँव में हुआ था। इन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के सानिध्य में पत्रकारिता और महात्मा गाँधी के सम्पर्क में गाँधीवादी विचारों को अपनाया। नवीनजी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी, साथ ही भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और नवयुवकों को प्रेरणा देने वाली ओजस्वी रचनाओं को भी लिखते रहे। इन्होंने प्रेम व श्रृंगारपरक गीत भी लिखे। नवीनजी भारतीय संविधान निर्मात्री परिषद के सदस्य भी रहे। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का पद दिलाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1952 से 1960 ई. तक ये संसद सदस्य भी रहे। 1960 में भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। सन् 1960 में हृदय गति रुक जाने से इनका देहावसान हो गया।

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  • साहित्य सेवा

नवीनजी ने अपना साहित्यिक जीवन पत्रकारिता से प्रारम्भ किया। गणेशशंकर विद्यार्थी के सम्पर्क में आने के बाद ‘प्रताप के प्रधान सम्पादक बने। राष्ट्रीय स्वर को प्रधानता देने वाली पत्रिका ‘प्रभा’ के भी ये सम्पादक रहे। इन्होंने प्रेम, श्रृंगार, राष्ट्रीय भावना, भारतीय संस्कृति, भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन आदि विषयों पर ओजस्वी रचनाएँ लिखीं। प्रकृति के विभिन्न रूपों के चित्रण के साथ उनके काव्य में रहस्यवादी भावना के दर्शन भी होते हैं।

  • रचनाएँ
  1. उर्मिला इसमें उर्मिला के जन्म से लेकर लक्ष्मण से पुनर्मिलन तक की कथा वर्णित है। इस काव्य में उर्मिला का विरह वर्णन बड़ा ही मार्मिक है।
  2. रश्मि रेखा-प्रेम, कला तथा संवेदना की दृष्टि से यह उत्कृष्ट काव्य है।
  3. कुंकुम इस गीत संग्रह में यौवन और प्रखर राष्ट्रीयता का स्वर मुखरित है।
  4. अपलक, क्वासि इनमें प्रेम और भक्ति से पूर्ण कविताएँ संकलित हैं।
  5. प्राणार्पण यह गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान पर लिखा गया खण्डकाव्य है।
  6. विनोवा स्तवन-इसमें विनोवा भावे के भूदान यज्ञ की प्रशस्ति में लिखे गये पद हैं।
  • भाव-पक्ष
  1. देश-प्रेम की भावना-इनकी कविताओं में देश-प्रेम की भावना उत्कृष्ट रूप से उजागर हुई है।
  2. क्रान्ति भावना-नवीन जी की कविताओं में स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में भोगे हुए अनुभव जीवन्त हैं और उनसे उपजे जागृति के स्वर भी मुखर हैं।
  3. प्रेम व भक्ति-भावना-देश-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना से स्फूर्त होने के परिणामस्वरूप रचनाओं में ओज प्रखर है तो प्रेम प्रवण अभिव्यक्ति में कोमलता निहित है। प्रेमाकुल संवेदनाएँ मानवीय भावनाओं से सराबोर हैं।
  • कला पक्ष
  1. भाषा शैली-नवीनजी की तत्सम शब्द प्रधान भावानुकूल भाषा है। इनकी शैली ओजपूर्ण एवं प्रबन्ध है।
  2. छन्द योजना-भावों के अनुकूल छन्द योजना उत्कृष्ट बन पड़ी है।
  3. प्रकृति चित्रण-प्रकृति के विविध रूप यत्र-तत्र दृष्टव्य हैं।
  • साहित्य में स्थान

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के काव्य में राष्ट्र प्रेम.मानव प्रेम.लौकिक प्रेम तथा अलौकिक प्रेम का प्रस्फुटन एक साथ हुआ है। नवीनजी छायावाद के समानान्तर बहने वाली प्रेम और श्रृंगार की धारा के कवि हैं। इनका अधिकांश काव्य मानवता तथा राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है,जिसके कारण हिन्दी साहित्य में इनको सम्माननीय स्थान प्राप्त है।

12. श्रीकृष्ण सरल [2015]

  • जीवन परिचय

श्रीकृष्ण सरल का जन्म 9 जून, 1921 ई. को मध्यप्रदेश के अशोक नगर में हुआ था। बचपन से ही ये कविताएँ लिखने लगे थे। यद्यपि उन्होंने गद्य की सभी विधाओं में लिखा है, फिर भी मूल रूप से वह कवि थे।

इनके हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति अनुराग था। प्रमुख क्रान्तिकारियों के ऊपर इन्होंने महाकाव्य लिखे। देश-भक्ति की भावना से ओतप्रोत सरलजी ने देश-भक्तों को ही लेखन का केन्द्र बनाया। उनकी ‘क्रान्ति कथाएँ’ भारतीय क्रान्तिकारियों की ‘एनसाइक्लोपीडिया’ है जिसमें लगभग दो हजार क्रान्तिकारियों के जीवन-वृत्तान्त सम्मिलित हैं। गद्य के क्षेत्र में इन्होंने कहानियाँ, उपन्यास,एकांकी,जीवनियाँ और निबन्ध लिखे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर इन्होंने पन्द्रह ग्रन्थों का प्रणयन किया। उनका कार्यस्थल उज्जैन रहा। इन्होंने बी. ए. तक शिक्षा प्राप्त की। फिर अध्यापन का कार्य किया। सरलजी का देहान्त 2 सितम्बर,2000 ई.को उज्जैन में हुआ।

  • साहित्य सेवा

सरलजी का लेखन इतिहास जैसा प्रामाणिक और शोधपूर्ण है। लेखन के लिए इन्होंने देश के भीतर और देश के बाहर अनेक यात्राएँ की। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित था। उन्होंने स्वयं लिखा है

“कर्त्तव्य राष्ट्र के लिए समर्पित हों अपने,
हो इसी दिशा में उत्प्रेरित चिन्तन धारा,
हर धड़कन में हो राष्ट्र, राष्ट्र हो साँसों में,
हो राष्ट्र-समर्पित मरण और जीवन सारा।”

  • रचनाएँ
  1. महाकाव्य-शहीद भगतसिंह, अजेय सेनानी चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र, जय सुभाष,शहीद अशफाक उल्ला खाँ,विवेक श्री, स्वराज तिलक,क्रान्ति ज्वाला,बागी कर्तार।
  2. गद्य रचनाएँ–’कालजयी सुभाष’,क्रान्ति कथाएँ।
  3. कविताएँ-आँसू,छोड़ो लीक पुरानी,जवानी खुद अपनी पहचान, देश के सपने फूलें फलें,देश से प्यार, धरा की माटी बहुत महान, नेतृत्व,प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है,पीड़ा का आनन्द, प्रेम की पावन धारा,मत ठहरो, मुझमें ज्योति और जीवन है, वीर की तरह,शहीद,सैनिक।
  • भाव पक्ष
  1. देश-विदेश भ्रमण के बाद उन अनुभूतियों को अपने काव्य में मूर्तिरूप प्रदान किया।
  2. राष्ट्रवाद एवं क्रान्तिकारी भावों का अपने काव्य में प्रणयन किया।
  3. राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति सरल जी का हृदय राष्ट्र-प्रेम की भावनाओं से भरपूर था। क्रान्तिकारियों के प्रति इनके हृदय का अनुराग इनके काव्य में परिलक्षित होता है।
  4. कर्त्तव्य और भारतीय संस्कृति में रुचि इनकी अपने कर्त्तव्य और भारतीय संस्कृति में आस्था थी,जो काव्य के रूप में प्रकट हुई। एक उदाहरण देखिए

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“कर्त्तव्य राष्ट्र के लिए समर्पित हों अपने,
हो इसी दिशा में उत्प्रेरित चिन्तन धारा।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा-सरल जी की भाषा ओजपूर्ण है। देश के प्रति अथाह प्रेम इनकी भाषा में देखने को मिलता है। गद्य और पद्य दोनों में इन्होंने अपनी लेखनी चलाई है। भाषा शुद्ध एवं परिमार्जित है।
  2. अलंकार योजना यथास्थान इन्होंने अलंकारों का प्रयोग भी किया है। वह अनूठा बन पड़ा है। प्रतीकों के माध्यम से अपने भावों को पाठकों तक पहुँचाया है।
  3. रस योजना-सरलजी ने प्राय: वीर रस को ही अपनाया है। इनकी कविताएँ वीर रस में डूबी हुई हैं और ओजस्वी भाषा में नवयुवकों को प्रेरणा दे रही हैं। एक उदाहरण देखिए राष्ट्र के श्रृंगार ! मेरे देश के साकार सपनो ! देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना। जिन शहीदों के लहू से लहलहाया चमन अपना उन वतन के लाड़लों की याद तुम मुझाने न देना।
  • साहित्य में स्थान

श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने अपने क्रान्तिकारी लेखन से विश्व में कीर्तिमान स्थापित किया। ‘सरल जी’ का लेखन इतिहास जैसा प्रामाणिक और शोधपूर्ण है। उनकी साहित्य साधना गहन तपस्या थी। राष्ट्र उनकी साँसों में बसता था। यद्यपि इन्होंने गद्य की सभी विधाओं में लिखा है, फिर भी मूल रूप से वह कवि थे। अपनी उत्कृष्ट सेवा के लिए साहित्य में उनका सम्माननीय स्थान है।

13. गोस्वामी तुलसीदास [2014, 17]

  • जीवन परिचय

गोस्वामी तुलसीदास एक सिद्ध कवि हैं जो देश-काल की सीमाओं से परे हैं। मानव प्रकृति के जिन रूपों का हृदयग्राही वर्णन तुलसी के काव्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र उपलब्ध नहीं। गोस्वामी तुलसीदास का कोई प्रामाणिक जीवन परिचय उपलब्ध नहीं है। उनकी जन्म-तिथि,जन्म-स्थान, माता-पिता और विवाहादि के सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। फिर भी तुलसी के जीवन-वृत्त से सम्बन्धित जो भी सामग्री मिलती है उसके आधार पर कहा जाता है कि उनका जन्म संवत् 1589 वि.में बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में हुआ था। परन्तु कुछ लोग सोरों (एटा) को इनका जन्म स्थान मानते हैं। इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि इनका जन्म अभुक्तमूल नामक अनिष्टकारी नक्षत्र में होने के कारण इनके माता-पिता ने इन्हें जन्म होते ही त्याग दिया था। स्वामी नरहरिदास के सानिध्य में इन्होंने वेद-पुराण एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया। तुलसीदास का विवाह दीनबन्धु पाठक की सुन्दर कन्या रत्नावली के साथ हुआ। किंवदन्ती है कि रलावली के व्यंग्य वाणों से आहत होकर ही तुलसी को संसार और सांसारिक ऐश्वर्यों से विरक्ति हो गई और सब कुछ छोड़कर वह काशी चले गए। वहाँ इन्होंने नाना पुराण निगमागम का गहन अध्यन किया,साथ ही रामकथा कहते रहे। काशी छोड़कर तुलसीदास अयोध्या चले गए और वहीं पर ‘रामचरितमानस’ का प्रणयन किया। तुलसी ने संसार तो त्याग ही दिया था। वे राम के चरित गायन में लग गए और स्वयं को अपने आराध्य राम की भक्ति में समर्पित कर दिया। संवत् 1680 वि.में इस महात्मा ने शरीर के बन्धनों को तोड़ दिया और परमतत्व में विलीन हो गए।

तुलसी के काव्य में प्रेम की उन्मत्तता,उत्कृष्ट वैराग्य,राम की अनन्य भक्ति एवं लोकमंगल की भावना भरी हुई थी।

  • साहित्य सेवा

तुलसी के काव्य में लोकमंगल की भावना परिपूर्ण थी। तुलसी ने राम के लोकमंगलकारी रूप को अपनी लोकपावनी कृतियों के सामने प्रतिष्ठापित किया है। तुलसी ने अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से समाजगत,राजनीतिक, आर्थिक स्थितिपरक तथा विविध जातिगत सम्बन्धों और उनके एकीकरण का अन्यतम प्रयास किया है। प्रत्येक तरह की एवं प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने का तर्कसंगत उपाय तुलसी ने प्रत्येक वर्ग के लिए अपने ही सृजित साहित्य में यथास्थान प्रस्तुत किया है।

  • रचनाएँ

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-दोहावली,कवितावली,रामचरित मानस,विनय पत्रिका,रामाज्ञा प्रश्न, हनुमान बाहुक,रामलला,नहछू,पार्वती मंगल,बरबै रामायण,संदीपनी तथा गीतावली। रामचरित मानस हिन्दी साहित्य का सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य है। सोहर छन्दों में लिखे हुए ‘नहछ’, ‘जानकी मंगल’ और ‘पार्वती मंगल’ अच्छे खण्डकाव्य हैं। ‘गीतावली’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘विनय पत्रिका’ हिन्दी के सर्वोत्तम गीतिकाव्यों में से है। ‘विनय पत्रिका’ हिन्दी के . विनय काव्यों में श्रेष्ठ है। ‘कवितावली’ मुक्तक काव्य परम्परा की उत्कृष्ट रचना है।

  • भाव पक्ष

(1) भक्ति-भावना-तुलसी ‘रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे। धार्मिक दृष्टि से उदार होने का परिचय उन्होंने शिव, दुर्गा, गणेश आदि सभी देवी देवताओं की स्तुति करके दिया है। राम के प्रति तुलसी की भक्ति सेव्य-सेवक भाव की है। राम ही उनका एकमात्र बल, एकमात्र आशा और एकमात्र विश्वास है।
उदाहरण देखिए-

“एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास॥”

(2) समन्वयवादी दृष्टिकोण तुलसी का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक एवं समन्वयवादी था। उन्होंने राम के भक्त होते हुए भी अन्य देवी-देवताओं की वन्दना की। तुलसी की रचनाओं में भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक विचारधारा पूर्णतः दिखाई देती है। वह प्रत्येक धर्म पद्धति को भगवान की प्राप्ति का साधन मानते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय के प्रति तुलसी इतने सचेष्ट थे कि अपने आराध्य राम में भी उन्होंने शक्ति, शील और सौन्दर्य का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है।

(3) दार्शनिक भाव-तुलसी ने अपनी भक्ति का निरूपण यद्यपि दार्शनिक आधार पर किया है, किन्तु उनकी दार्शनिक विचारधारा किसी मत या वाद से परे है। तुलसी की दृष्टि में राम साक्षात् परमब्रह्म हैं। संसार क्षणभंगुर और असत्य है। भवसागर को पार करने के दो ही साधन हैं-ज्ञान और भक्ति। वह ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं मानते-

“ज्ञानहिं भक्तिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव संभव खेदा॥”

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(4) लोकहित की भावना-तुलसीदास की भक्ति लोकमंगल की भावना से प्रेरित है। राम लोकपालक भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे लोकहितकारी मानवता के उच्चतम आदर्श और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। तुलसी के रामराज्य की कल्पना एक आदर्श है। उन्होंने मानवीय सिद्धान्तों पर आधारित समाज और शासन पद्धति के वृहद् स्वरूप को प्रस्तुत किया है।

(5) रससिद्धता तुलसी रससिद्ध कवि थे। उनकी कविताओं में श्रृंगार,शान्त, वीर रसों का समन्वय है। श्रृंगार रस के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का बड़ा ही सजीव निरूपण किया है। रौद्र,करुण, अद्भुत रसों का बड़ा ही सुन्दर वर्णन हुआ है।

  • कला पक्ष

(1) भाषा तुलसी ने अपनी काव्याभिव्यक्ति हेतु उस काल में प्रचलित दोनों प्रमुख भाषाओं ब्रज और अवधी को अपनाया है। तुलसी मुख्य रूप से अवधी भाषा के कवि हैं। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रचुरता है। रामचरित मानस अवधी में तथा कवितावली, गीतावली और विनय पत्रिका ब्रजभाषा में लिखी हैं। उनकी भाषा में सरलता, बोधगम्यता, सौन्दर्य,चमत्कार,प्रसाद,माधुर्य, ओज आदि सभी गुणों का समावेश है।

(2) शैली-तुलसी ने अपने युग में प्रचलित सभी शैलियों में काव्य रचना की। सभी मतों,सम्प्रदायों और सिद्धान्तों की कटुता को मिटाकर उनमें समन्वयवादी प्रवृत्ति को अपनाया है। उन्होंने अवधी,ब्रजभाषा में समान रूप से रचनाएँ लिखीं। जहाँ-तहाँ अरबी, फारसी,भोजपुरी और बुन्देलखण्डी भाषाओं के शब्द भी मिल जाते हैं। यत्र-तत्र मुहावरे और लोकोक्तियों ने उनकी भाषा को और भी सरस बना दिया है।

(3) छन्द योजना—तुलसी ने जायसी की दोहा-चौपाई छन्दों में ‘रामचरित मानस’ की रचना की। सरदास की पद शैली को उन्होंने विनय पत्रिका और गीतावली में अपनाया। कवितावली को उन्होंने सवैया शैली में लिखा। दोहावली में उन्होंने दोहा छन्द का प्रयोग किया।

(4) अलंकार योजना-तुलसी का अलंकार विधान अत्यन्त रोचक है। उनकी उपमाएँ अत्यन्त मनोहर हैं। उनके उपमा अलंकार को ही हम कहीं रूपक,कहीं उत्प्रेक्षा तो कहीं दृष्टांत के रूप में देखते हैं। उनके अलंकार काव्य का वास्तविक सौन्दर्य उजागर करने के लिए प्रयुक्त हुए हैं।

  • साहित्य में स्थान

गोस्वामी तुलसीदास लोक कवि हैं। उनके काव्य से जीने की कला सीखी जा सकती है। उनके काव्य का बहिःपक्ष जितना सबल है,उसका अन्तःपक्ष उससे भी सबल है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ने उनके बारे में लिखा है
“कविता करके तुलसी न लसै, कविता लसी या तुलसी की कला।”

14. मैथिलीशरण गुप्त [2009, 12]

  • जीवन परिचय

अपने साहित्य से राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले महान् कवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव जिला झाँसी में सन् 1886 में हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था। वह वैष्णव होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी थे। गुप्तजी को कविता के संस्कार अपने पिता से ही प्राप्त हुए। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा चिरगाँव में ही हुई। बाद में वे 9वीं कक्षा तक झाँसी में पढ़े। स्कूली शिक्षा में मन न लगने के कारण उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और घर पर ही स्वाध्याय किया।

कुछ समय बाद गुप्तजी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आए। द्विवेदीजी की प्रेरणा से उनके मन-मानस में कवि का स्फुरण हुआ। पहले उनकी रचनाएँ ‘सरस्वती’ में छपी। सन् 1923 में गुप्तजी की भारत भारती’ नामक काव्यकृति प्रकाशित हुई जिसने उन्हें साहित्य जगत में प्रसिद्धि दी। सन् 1952 से 1964 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। गुप्तजी को भारत का राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त रहा। सन् 1964 में हिन्दी के इस महान् कवि का स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

मैथिलीशरण गुप्त ने अपने साहित्य से राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की। उन्होंने भारतवासियों में एकता स्थापित करने तथा सद्भाव, सौजन्य व सौहार्द्र विकसित करने के लिए आजीवन साहित्य रचना की। उनका काव्य रामभक्ति व राष्ट्र भक्ति का अनूठा संगम है।

  • रचनाएँ

गुप्तजी ने प्रबन्ध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य लिखे हैं। उनकी रचनाओं को चार भागों में बाँटा जा सकता है खण्डकाव्य, महाकाव्य, गीतिकाव्य और गीतिनाट्य। उन्होंने संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी की कुछ रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। गुप्तजी की मौलिक रचनाएँ निम्न हैं रंग में भंग, जयद्रथ वध, पद्य प्रबन्ध, भारत-भारती, शकुन्तला, तिलोत्तमा, चन्द्रहास,पंचवटी, स्वदेश-संगीत, हिन्दू सैरन्ध्री, वन वैभव, गुरुकुल, साकेत, यशोधरा, द्वापर, सिद्धिराज, मंगल घट, नहुष, कुणाल गीत, अर्जुन और विसर्जन, काबा और कर्बला, विश्ववेदना, अजित, प्रदक्षिणा, पृथ्वी पुत्र, हिडिम्बा, अंजुली और अर्घ्य, जय भारत, युद्ध और
शान्ति,विष्णुप्रिया। साकेत महाकाव्य है। यशोधरा,द्वापर, विष्णुप्रिया,पंचवटी तथा भारत-भारती उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।

  • भाव पक्ष

(1) भारतीय संस्कृति के पक्षधर-प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति उनका आस्था असीम है। उनकी अधिकांश रचनाएँ अतीतकालीन सभ्यता और संस्कृति का गौरव लिए हुए हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम चित्रों से उनके काव्य भरे पड़े हैं।

(2) राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति-प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रखने के साथ-साथ गुप्तजी का हृदय राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है। उनके समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। भारतीय समाज की दशा अत्यन्त दयनीय थी। भारतीय अपने प्राचीन गौरवशाली आदर्शों को भूलते जा रहे थे। अपनी ‘भारत-भारती’ में वह भारतीयों का आह्वान करते हैं

“हम कौन थे, क्या हो गए है और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।”

(3) राम की अनन्य भक्ति-गुप्त जी सगुणोपासक वैष्णव कवि हैं। अन्य धर्मों के प्रति समुचित आदर रखते हुए वह राम के ही अनन्य भक्त हैं। काव्यों में उन्होंने मंगलाचरण के रूप में राम की स्तुति की है। कृष्ण चरित्र पर केन्द्रित द्वापर’ में वह इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं-

“धनुर्बाण या वेणु लो, श्याम रूप के संग।
मुझ पर चढ़ने से रहा, राम दूसरा रंग।”

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(4) मानवतावादी दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति मानवतावादी है। उनकी दृष्टि में सम्पूर्ण संसार एक कुटुम्ब के समान है।। गुप्तजी पूर्णतः मानवतावादी हैं। विश्व-प्रेम एवं लोक-सेवा के माध्यम से उन्होंने अपने काव्य में इसी विचारधारा को व्यक्त किया है।

(5) गाँधीवादी दृष्टिकोण-गुप्त जी गाँधीजी द्वारा चलाए गए स्वतन्त्रता आन्दोलन से भी जडे रहे थे। अतः उन पर गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा। उनके काव्य में अहिंसा, सत्य, राष्ट-प्रेम,समाज सुधार, हरिजनोद्धार,स्वदेशी से सम्बन्धित जो दृष्टिकोण मिलता है वह अधिकतर गाँधीजी के विचारों से प्रेरित है।

(6) नारी के प्रति सम्मान गुप्तजी के हृदय में नारी जाति के प्रति आदर का भाव और उसकी वर्तमान करुण अवस्था के प्रति गहरी करुणा का भाव है। भारतीय समाज में नारी की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। गुप्तजी का हृदय भारतीय नारी की दयनीय अवस्था पर अत्यन्त दुःखी होता है

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

(7) समन्वयवाद के पक्षधर-गुप्तजी को प्रायः समन्वयवादी कवि कहा जाता है। उनके काव्य में अतीत और वर्तमान, सगुण और निर्गुण, भक्ति और ज्ञान,सत और असत,व्यक्ति और समाज.धर्म और कर्म आदि जीवन के विभिन्न विरोधी पक्षों का अदभुत समन्वय है। रामचन्द्र शक्ल ने उनके बारे में लिखा है-“गुप्तजी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि हैं। सब प्रकार उच्चता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त है। प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह दोनों इनमें हैं।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा-गुप्तजी की काव्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी है। उनकी भाषा शुद्ध और परिमार्जित हिन्दी है, जिसमें संस्कृत शब्दों की बहुलता है। लेकिन भाषा क्लिष्ट नहीं होने पायी है। यथास्थान मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ है। सौन्दर्य और सजीवता के साथ-साथ उनकी भाषा में माधुर्य,ओज और प्रसाद गुणों का भी समावेश हुआ है।
  2. अलंकार योजना-गुप्तजी के काव्य में शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों ही प्रकार के अलंकारों का प्रयोग हुआ है। प्राचीन अलंकारों के साथ ही उन्होंने मानवीकरण, विश्लेषण-विपर्यय और ध्वन्यार्थ व्यंजना जैसे पाश्चात्य अलंकारों को भी अपनाया है। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, विभावना, सन्देह आदि अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. छन्द योजना-गुप्तजी के काव्य में छन्द विधान में पर्याप्त विविधता दिखाई देती है। या, छप्पय,घनाक्षरी,शिखरिणी,द्रुत विलम्बित; मालिनी आदि अनेक प्रकार के छन्दों का प्रयोग उन्होंने अपने काव्य में किया है।
  4. रस योजना-मैथिलीशरण गुप्त ने अपने काव्य में प्रायः सभी रसों का नियोजन किया है। उनमें श्रृंगार,करुण, वीर और वात्सल्य रसों की अधिकता है।
  5. शैली-गुप्तजी ने अपने काव्य में प्रमुखतः भावात्मक शैली का प्रयोग किया है। इसी शैली के अन्तर्गत उनके काव्य में विचारात्मक, आत्मकथात्मक, आत्माभिव्यंजक, सूक्ति आदि शैलियों का प्रयोग हुआ है।
  • साहित्य में स्थान

गुप्तजी को साहित्यिक और राष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर पर्याप्त सम्मान मिला। अपने जीवन काल में वह अनेक उपाधियों और पारितोषिकों आदि से विभूषित किये गये। आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट् की उपाधि प्रदान की और ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ ने उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से विभूषित किया। वे सन् 1952 से 1964 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे।

15. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ [2010]

  • जीवन परिचय

सुमन जी छायावाद के अन्तिम चरण में काव्य-क्षेत्र में आए और प्रारम्भ में प्रेमगीत लिखते रहे। प्रकृति के विशाल क्षेत्र से उठती हुई मानवता की कराहट को सुनकर वह राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित हुए और इनके मन में भी क्रान्ति की ज्वाला धधक उठी। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म उन्नाव (उत्तर प्रदेश) के झगरपुर नामक गाँव में सन् 1915 ई. में हुआ था। ‘सुमन’ बाल्यावस्था में ही ग्वालियर चले आए और यहीं उनकी शिक्षा सम्पन्न हुई। उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से बी.ए.किया। 1940 में एम.ए. और डी.लिट् की उपाधियाँ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उनकी नियुक्ति नेपाल स्थित दूतावास में सांस्कृतिक सहायक के रूप में हो गई। 1961 में माधव कॉलेज, उज्जैन के प्राचार्य नियुक्त हुए तथा कुछ वर्षों के बाद उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में उपकुलपति के रूप में कार्यभार संभाल लिया। उनको भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ की उपाधि से विभूषित किया गया। उपकुलपति के पद से अवकाश लेकर साहित्य सेवा में रत हुए। सन् 2002 ई. में उनका निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

सुमन जी की कविता सामाजिक जीवन तथा राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी हुई हैं। इन्होंने प्रारम्भ में प्रेमभाव पर आधारित अनेक गीत लिखे। स्वाधीनता आन्दोलन और शोषित वर्ग की पीड़ा ने इनके काव्य-सृजन की दिशा बदल दी। सुमन जी प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। अपने काव्य के माध्यम से ‘सुमन’ जी ने पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रबल प्रहार किए और पीड़ित मानवता को वाणी दी। साम्यवाद के साथ ही गाँधीवाद में भी इनकी अटूट निष्ठा रही। इनकी कविताओं में जागरण और निर्माण का सन्देश है।

  • रचनाएँ

सुमन जी की रचनाएँ अग्रलिखित हैं

  1. हिल्लोल-यह सुमन जी के प्रेमगीतों का प्रथम काव्य-संग्रह है।
  2. आँखें भरी नहीं में मिलन की आकांक्षा, सौन्दर्य तथा प्रेम का मनोहारी चित्रण है।
  3. जीवन के गान’, प्रलय सृजन’, ‘विश्वास बढ़ता ही गया’-सुमन जी की क्रान्तिकारी भावनाओं से भरे हुए रचना संग्रह हैं।
  4. विंध्य हिमालय-इसमें सुमन जी की देश-प्रेम और राष्ट्रीय भावनाओं वाली कविताएँ संगृहीत हैं।
  5. माटी की बारात-इसमें इनको साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया है।
  • भाव पक्ष
  1. प्रेम-सुमन जी छायावाद के अन्तिम चरण में काव्य क्षेत्र में आए। प्रारम्भ में इन्होंने प्रेमगीत लिखे। धीरे-धीरे इनका ध्यान समाज के प्रति अपने कर्तव्य की ओर गया। प्रकृति के विस्तृत क्षेत्र से उठती हुई त्रस्त मानवता के दुःख ने इनका ध्यान आकर्षित किया और वे देश के राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए।
  2. साम्यवाद सुमन जी को रस की नवीन अर्थव्यवस्था ने बहुत आकर्षित किया। अतः इनका झुकाव साम्यवाद की ओर रहा।
  3. पूँजीवाद का विरोध-सुमन जी के मन में क्रान्ति की ज्वाला जल रही थी। इनका मन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रति विरक्ति के भाव से भर उठा। अत: इनकी कविताओं में साम्राज्यवाद के विरुद्ध आवाज उठाई गई।
  4. सत्य और अहिंसा-सुमन जी की निष्ठा गाँधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों पर दृढ़ रही। इसी कारण इनकी कविताओं में क्रान्तिकारी स्वर पाया जाता है।
  5. जीवन दर्शन-इनके काव्य में इनका स्वयं का पुष्ट जीवन दर्शन स्पष्ट दृष्टिगत है जिसमें वर्तमान के हर्ष पुलक,राग विराग और आशा उत्साह के स्वर भी मुखरित हुए।

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  • कला पक्ष
  1. भाषा-सुमन जी की भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। उनकी खड़ी बोली में संस्कृत के सरल तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। साथ ही उर्दू के शब्द भी यत्र-तत्र मिल जाते हैं। सुमन जी एक प्रखर एवं ओजस्वी वक्ता भी थे। अतः उनकी भाषा जनभाषा कही जा सकती है।
  2. शैली इनकी शैली पर इनके व्यक्तित्व की छाप है। उनकी शैली में सरलता, स्वाभाविकता, ओज, माधुर्य और प्रसाद गुणों का समावेश है। उनके गीतों में स्वाभाविकता, संगीतात्मकता,मस्ती और लयबद्धता है।
  3. अलंकार योजना इनकी कविता में अलंकार अपने आप ही आ गए हैं। नए-नए उपमानों के माध्यम से उन्होंने अपनी बात बड़ी ही कुशलता से कह दी है।
  4. छन्द विधान-सुमन जी ने मुक्त छन्द लिखे हैं और परम्परागत शब्दों की समृद्धि में सहयोग दिया है।
  • साहित्य में स्थान

सुमन जी उत्तर छायावादी युग के प्रगतिशील प्रयोगवादी कवियों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे एक सुललित गीतकार, महान् प्रगतिवादी एवं वर्तमान युग के कवियों में अग्रगण्य हैं। हिन्दी साहित्य की प्रगति में इनका सहयोग अतुलनीय है।

16. विष्णुकान्त शास्त्री

  • जीवन परिचय

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री का जन्म 2 मई, 1929 को कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। इनके पिता का नाम गंगेय नरोत्तम शास्त्री और माता का नाम श्रीमती रूपेश्वरी देवी था। इन्होंने एम.ए,एल.एल.बी.तक शिक्षा प्राप्त की। 1953 में इनका विवाह श्रीमती इन्दिरा देवी से हुआ। इनको बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से डी. लिट् की उपाधि प्रदान की गई। विष्णुकान्त शास्त्री जी 1953 से 1994 तक कोलकाता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक रहे। अवकाश प्राप्त करने के उपरान्त वे भारत भवन, भोपाल में न्यासी सचिव के पद पर रहे तथा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पद को भी इन्होंने सुशोभित किया। 17 अप्रैल,2005 में इनका स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

विष्णुकान्त शास्त्री ने हिन्दी की अनेक पुस्तकें लिखकर साहित्य सेवा की। अनेक बंगाली और अंग्रेजी कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया। ‘उपमा कालिदासस्य’ का बंगला से हिन्दी में अनुवाद किया। बंगला की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया और ‘महात्मा गाँधी का समाज दर्शन’ का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया। डॉ. शास्त्री द्वारा लिखी गई कविताएँ जीवन के संवेदनशील क्षणों की भावना-प्रधान अभिव्यक्ति हैं।

  • रचनाएँ
  1. ‘कवि निराला की वेदना तथा अन्य निबन्ध’, ‘कुछ चन्दन की कुछ कपूर की’, ‘चिन्तन मुद्रा’, ‘अनुचिन्तन’ आदि उनके द्वारा रचित साहित्यिक समीक्षाएँ हैं।
  2. ‘बांग्लादेश के सन्दर्भ में’–उनका रिपोर्ताज है।
  3. ‘भक्ति और शरणागति’, ‘सुधियाँ उस चन्दन के वन की’ ये उनके द्वारा लिखित संस्मरण हैं।
  4. ‘उपमा कालिदासस्य’ बांग्ला से हिन्दी में अनूदित है।
  5. ‘महात्मा गाँधी का समाज दर्शन’ अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित ग्रन्थ है।
  6. ‘दर्शक और आज का हिन्दी रंगमंच’, ‘बालमुकुन्द गुप्त का एक मूल्यांकन’, ‘बांग्लादेश संस्कृति और साहित्य’, ‘तुलसीदास आज के सन्दर्भ में ये इनके द्वारा सम्पादित ग्रन्थ हैं।
  7. ‘जीवन पथ पर चलते-चलते’ उनका काव्य संकलन है।
  • भाव पक्ष
  1. संवेदनशीलता-डॉ. शास्त्री द्वारा लिखी गई कविताएँ जीवन के संवेदनशील क्षणों की भावना-प्रधान अभिव्यक्ति हैं।
  2. भारतीय संस्कृति में आस्था-विष्णुकांत शास्त्री की भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रही। ये देश की स्वतन्त्रता के पक्षधर रहे हैं। उदाहरण देखिए“विजय पथ पर बढ़ सिपाही
    विजय है तेरी सुनिश्चित।
    लोटती है विजय चरणों पर उन्हीं के, जो बढ़े हैं।
    तुच्छ कर सब आपदाएँ, धर्मपथ पर जो अड़े हैं।”
  3. राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति इन्होंने अपनी रचनाओं में राष्ट्र-प्रेम को आदर्श रूप में माना है। इनका राष्ट्र-प्रेम व्यापक और उदार है। एक उदाहरण देखिए”गगन गायेगा गरज कर गर्व से तेरी कहानी
    वक्ष पर पदचिह्न लेगी धन्य हो धरती पुरानी।
    कर रहा तू गौरवोज्ज्वल त्यागमय इतिहास निर्मित।
    विजय है तेरी सुनिश्चित।”
  4. जीवन जीने की शैली जीवन में जैसे-जैसे मोड़ आते गये कविता उन्हीं के अनुरूप मुखरित होती गई। जीवन के अनुरूप गुणों,जैसे–स्नेह, भक्ति,प्रेरणा आदि का समावेश इनकी कविताओं में देखा जा सकता है।

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  • कला पक्ष
  1. भाषा-डॉ. विष्णुकान्त शास्त्री की भाषा ओजस्वी है। इसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है। वीर रस की कविताओं में ओजगुण-प्रधान शब्दावली का प्रयोग है तथा शान्त रस की कविताओं में माधुर्य एवं प्रसाद गुणों का सहज समावेश है।
  2. अलंकार योजना-विष्णुकान्त शास्त्री की कविताओं में अलंकार स्वयं प्रविष्ट हो गए हैं। रूपक,उपमा व अनुप्रास की छटा स्थान-स्थान पर सहज ही दृष्टिगत होती है।
  3. रस निरूपण-डॉ.विष्णुकान्त शास्त्री ने अपनी कविताएँ मुख्यत: वीर रस और शान्त रस में लिखी हैं। वीर रस में ओज-प्रधान शब्दावली है और शान्त रस में माधुर्य और प्रसाद गुण झलकता है।
  • साहित्य में स्थान

शास्त्रीजी को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, डॉ. राममनोहर लोहिया सम्मान तथा राजर्षि टंडन हिन्दी सेवी सम्मान प्राप्त हुए। भावों के आधार पर उनकी कविताओं को राष्ट्रीय, विविधा,प्रेरणा व प्यार,भक्ति एवं काव्यानुवाद के रूप में विभाजित किया जा सकता है। हिन्दी साहित्य में इनका स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

17. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ [2009, 11, 13]

  • जीवन परिचय

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ एक युगान्तकारी कवि हैं। छायावाद के प्रमुख स्तम्भ और आधुनिक काव्य में क्रान्ति के अग्रदूत निराला का जन्म मेदिनीपुर (बंगाल) के महिषादल राज्य में सन् 1897 में हुआ था। इनके पिता रामसहाय त्रिपाठी महिषादल राज्य के कर्मचारी थे। इस प्रकार निराला जी का बचपन बंगाल की शस्य-श्यामला धरती पर व्यतीत हुआ। इनकी स्कूली शिक्षा केवल मैट्रिक तक हुई। कालान्तर में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेजी भाषा तथा साहित्य का बहुत अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। निरालाजी का जीवन दुःख और संघर्षों में ही बीता। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने कलकत्ता में रामकृष्ण आश्रम में रहकर ‘समन्वय’ का कार्य किया। मतवाला (कलकत्ता) एवं सुधा (लखनऊ) का सम्पादन किया। 15 अक्टूबर,1961 को इनका स्वर्गवास हो गया।

  • साहित्य सेवा

निराला जी का साहित्य बहुमुखी और विपुल है। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानियाँ, निबन्ध,रेखाचित्र,जीवनियाँ,आलोचनात्मक निबन्ध आदि सभी कुछ लिखे हैं। निराला का काव्य दार्शनिक विचारधारा, गम्भीर चिन्तन और भाव सौन्दर्य की अमूल्य निधि है। विवेकानन्द का प्रभाव उन पर सुस्पष्ट है। उनके काव्य में कहीं विराट की ओर रहस्यात्मक संकेत है तो कहीं सामान्य जन के उत्पीड़न के चित्र हैं,कहीं कथा मुखर है तो कहीं गीत माधुरी।

  • रचनाएँ

समर्थ कवि होने के साथ-साथ निराला ने उपन्यास,कहानियाँ, रेखाचित्र,नाटक,जीवनियाँ और निबन्धों की रचना की। अंग्रेजी,बंगला तथा संस्कृत के ग्रन्थों के अनुवाद भी किये। परिमल, अनामिका, गीतिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीतकुंज तथा सान्ध्य काकली ये काव्य कृतियाँ हैं। राम की शक्ति पूजा, तुलसीदास उनकी लम्बी कविताएँ हैं, जो अपनी विशिष्टताओं के कारण खण्डकाव्य मानी गई हैं। ‘सरोज स्मृति हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ शोकगीत माना गया है।

  • भाव पक्ष

(1) प्रेम और सौन्दर्य-छायावाद के उन्नायक कवि होने के कारण निराला के काव्य में प्रेम तथा सौन्दर्य के मोहक चित्र प्राप्त होते हैं। उनका सौन्दर्य चित्रण आकर्षक एवं अद्भुत है। उदाहरण के लिए निम्न पंक्तियाँ देखिए

“नयनों का नयनों से गोपन प्रिय संभाषण,
पलकों पर नव पलकों का प्रथमोत्थान पतन।”

निराला के काव्य में श्रृंगार के मादक एवं सजीव चित्र भी प्राप्त होते हैं।

(2) भक्ति एवं रहस्य भावना निराला जी के काव्य में भक्ति एवं रहस्य, भावनापरक रचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। उन्होंने आत्मा तथा परमात्मा की एकता का प्रतिपादन किया है। निराला जी की भक्तिपरक रचनाओं में सगुण भक्तों का सा आत्मसमर्पण, तल्लीनता तथा हृदय की आर्त भावना परिलक्षित होती हैं।

“उन चरणों में मुझे दो शरण,
इस जीवन को करो हे वरण
x x x
दलित जनों पर करो करुणा
दीनता पर उतर आये
प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा।”

(3) प्रकृति चित्रण-निराला जी के काव्य में प्रकृति चित्रण के विविध रूप प्राप्त होते हैं। उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मधुर और सजीव है। उन्होंने प्रकृति में मानवीय भावों तथा क्रिया-कलापों का आरोप किया है। जैसे

“सखि बसन्त आया,
आवृत्त सरसी-उर सरसिज उठे,
केशर के केश कली से छूटे
स्वर्ण-शस्य अंचल
पृथ्वी का लहराया।”

(4) राष्ट्रीयता निराला जी का काव्य देश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है। उनकी कविताओं में ओज स्पष्ट दिखाई देता है। ‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि ने भारतीयों को जाग जाने का उद्बोधन किया है। जैसे

“जागो फिर एक बार प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें।
अरुण-पंख-तरुण किरण खड़ी खोल रही है द्वार।”

(5) प्रगतिवादी दृष्टिकोण छायावाद का कवि होते हुए भी निराला जी को प्रगतिवाद का भी प्रथम कवि माना जाता है। उनके काव्य में सामाजिक तथा आर्थिक विषमता के प्रति विद्रोह तथा समाज के दलित एवं शोषित वर्ग के प्रति करुणा का भाव है। निम्न वर्ग के जीवन को उन्होंने यथा तथ्य चित्रण किया है। कुकुरमुत्ता कविता में उनका प्रगतिवादी स्वर देखिए

“अबे, सुन बे गुलाब,
भल मत गर पायी खशब रंगो आब
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर इतरा रहा कैपीटलिस्ट।”

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  • कला पक्ष

(1) भाषा-निराला जी की भाषा भावों के अनुरूप है। देश-प्रेम तथा भक्तिपरक व्यंग्यात्मक कविताओं में उनकी भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। गम्भीर रचनाओं में उनकी भाषा क्लिष्ट, संस्कृतनिष्ठ एवं दुरूह हो गई है। निराला जी की भाषा में उर्दू, फारसी एवं बंगला शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। उन्होंने कुछ नवीन शब्दों का गठन भी किया है। निराला जी की काव्य भाषा भावानुकूल, चित्रात्मक, गत्यात्मक तथा ध्वन्यात्मक गुणों से समन्वित है। जैसे

“है अमा निशा, उगलता गगन घन अन्धकार
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार।
अप्रतिहत गरज रहा पीछे, अम्बुधि विशाल
भूधर त्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।”

(2) शैली-निराला जी की दो शैलियाँ हैं-

  • उत्कृष्ट छायावादी गीतों में प्रयुक्त दुरूह शैली।
  • सरल,प्रवाहपूर्ण,प्रचलित उर्दू के शब्द लिए व्यंग्यपूर्ण और चुटीली शैली।

(3) छन्द योजना-निराला जी ने नए-नए छन्दों का प्रयोग किया है। उन्होंने तुकान्त और अतुकान्त दोनों प्रकार के छन्द लिखे हैं। निराला जी ‘मुक्त छन्द’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। मुक्त

छन्द में मात्राओं तथा वर्णों का बन्धन नहीं होता। केवल ध्वनि तथा प्रवाह का ध्यान रखा जाता है। मुक्त छन्द का उदाहरण देखिए-

“रे प्यारे को सेज पास
नम्रमुख हँसी-खिली,
खेल रंग प्यारे संग।”

(4) अलंकार विधान-निराला जी की अलंकार योजना उच्चकोटि की है। उनके काव्य में अलंकारों की प्रचुरता है। उन्होंने नवीन और प्राचीन दोनों प्रकार के उपमान खोजे हैं। उन्होंने उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक,मानवीकरण, विशेषण, विपर्यय, पुनरुक्तिप्रकाश आदि अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है। मानवीकरण का एक उदाहरण देखिए-

“किसलय वसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिया उर-तरु-पतिका।”

  • साहित्य में स्थान

आधुनिक कवियों में निराला का उत्कृष्ट स्थान है। वे मुक्तक के जनक थे। उन्होंने हिन्दी कविता को नयी दिशा प्रदान की। हिन्दी साहित्य में निराला के कृतित्व को उनके व्यक्तित्व ने और भी अधिक महान बनाया है। निराला जी हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकार हैं।

18. गजानन माधव मुक्तिबोध’

  • जीवन परिचय

नई कविता के सशक्त कवि गजानन ‘मुक्तिबोध’ का जन्म 13 अक्टूबर, 1917 को मुरैना जनपद के श्योपुर कस्बे में हुआ था। उन्होंने उज्जैन के माधव विद्यालय से हाईस्कूल की परीक्षा पास की तथा इन्दौर के होल्कर कॉलेज से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। आर्थिक विपन्नता के कारण पढ़ाई बन्द करके शुजालपुर के शारदा शिक्षा सदन में शिक्षक हो गये। सन् 1942 में उज्जैन के मॉडल स्कूल में शिक्षक रहे। सन् 1948 में नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया तथा राजनन्द गाँव के दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक हो गये। उन्होंने ‘हंस’ (वाराणसी) तथा.’समता’ (जबलपुर) मासिक पत्रों में भी कार्य किया। असाध्य रोगों से जूझते हुए सन् 1964 में उनका देहान्त हो गया।

  • साहित्य सेवा

उन्होंने पद्य और गद्य साहित्य दोनों में रचनाएँ लिखीं। मुक्तिबोध की कविताओं का भाव पक्ष उन्नत तथा समसामयिक है। इनकी भाषा परिमार्जित, प्रौढ़ तथा सबल है। मुक्तिबोध ने काव्य के माध्यम से जन को जन-जन तथा मन को मानवीय बनाने की चेष्टा की है।

  • रचनाएँ

‘चाँद का मुँह टेड़ा है’ तार सप्तक में छपने वाली कविताएँ हैं। ‘काठ का सपना’, सतह से उठता हुआ आदमी’ इनके महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं। ‘नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’, भारतीय इतिहास’, ‘कामायनी-एक पुनर्विचार’, संस्कृति एवं नई कविता का आत्मसंघर्ष’ इनकी जानी मानी गद्य रचनाएँ हैं।

  • भाव पक्ष

मुक्तिबोध की कविताओं के भाव पक्ष की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इनकी कविता के वर्ण्य विषय जीवन तथा समाज के यथार्थ से सम्बन्ध रखते हैं। इन्होंने अपनी कविता में समाज की विपन्नता,विवशता तथा विसंगतियों को चित्रित किया है।
  2. मुक्तिबोध के काव्य में मानवतावाद का स्वर स्पष्ट रूप से मुखरित हुआ है। मुक्ति बोध ने लघु मानव की खोज की है तथा उसके प्रति पूर्ण आस्था प्रकट की है। जैसे“जिन्दगी के दलदल के कीचड़ में फंसकर
    वृक्ष तक पानी में फंसकर
    मैं यह कमल तोड़ लाया हूँ।”
  3. उनकी कविता में आधुनिक भाव बोध की सशक्त अभिव्यंजना है।
  4. उनकी काव्य-चेतना में चिन्तन की प्रचुरता है। उनका यह चिन्तन जलते हुए अंगारे पर चलने वाले व्यक्ति की मनस्थिति का चिन्तन है।
  • कला पक्ष

(1) भाषा-इनकी भाषा परिमार्जित,प्रौढ़ तथा पुष्ट है। सामान्य बोलचाल की भाषा के अतिरिक्त संस्कृतनिष्ठ सामासिक पदावली से युक्त उनकी भाषा सरल एवं प्रवाहमय है। भाषा की शक्ति उनके प्रत्येक वर्णन को अर्थपूर्ण तथा चित्रमय बना देती है। मुक्तिबोध की भाषा में प्रांजलता,शब्द चयन की सहजता,सार्थकता के साथ-साथ युग बोध के अनुरूप कथ्य को प्रकट करने की पूर्ण सामर्थ्य है। उनकी भाषा में कहीं पर बनावट तथा अस्वाभाविकता नहीं है।

(2) शैली-मुक्तिबोध की अधिकांश कविताएँ लम्बी हैं। उनकी काव्य शैली बिम्ब तथा प्रतीक प्रधान है। उनके काव्य-बिम्ब तथा प्रतीक नये जीवन-सन्दों से युक्त हैं। वे सहज जीवन को व्यक्त करने के कारण सरलता से ग्राह्य हैं। उनकी शैली सबसे अलग नवीन प्रतीक और नये सन्दर्भो से युक्त है। उन्होंने कविता को एक नया आयाम दिया है।

  • साहित्य में स्थान

गजानन माधव मुक्तिबोध नई कविता के प्रतिनिधि कवि हैं और जीवन मूल्यों के प्रयोग करने वाले कवि भी हैं। नई कविता को स्वरूप प्रदान करने में उनका विशिष्ट स्थान है।

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19. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

  • जीवन परिचय

अज्ञेयजी हिन्दी में प्रयोगवादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने ‘तार-सप्तक’ का प्रकाशन करके हिन्दी में प्रयोगवाद का सूत्रपात किया। अज्ञेय जी का जन्म सन् 1911 में पंजाब के करतारपुर नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री हीरानन्द शास्त्री थे। पिता भारत के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे। इनका बचपन अपने पिता के साथ कश्मीर, लखनऊ, बिहार तथा मद्रास में व्यतीत हुआ। बी. एस-सी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एम.ए.(अंग्रेजी) में प्रवेश लिया। राजनैतिक आन्दोलन में सम्मिलित होने के कारण पढ़ाई का कार्यक्रम बीच में ही छूट गया। देश सेवा में लगे रहने के कारण इन्हें कारावास भी भोगना पड़ा। अज्ञेयजी ने कुछ समय तक अमेरिका में भारतीय साहित्य तथा संस्कृत के अध्यापक के रूप में कार्य किया। इसके बाद जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा अनशीलन विभाग के निदेशक पद पर कार्य किया। 4 अप्रैल,1987 को इस साहित्यकार का निधन हो गया।

  • साहित्य सेवा

अज्ञेयजी का जीवन एक साधक का जीवन था। इन्होंने सन् 1934 ई.के लगभग लेखन कार्य आरम्भ किया। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों में लेखन कार्य किया। उन्होंने निबन्ध, यात्रा-साहित्य, उपन्यास, कहानी, नाटक,संस्मरण,आलोचना आदि विविध विधाओं में साहित्य सृजन किया। सम्पादक और पत्रकार के रूप में उन्हें ख्याति प्राप्त थी। उन्होंने कई ग्रन्थों एवं पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। तार-सप्तक का प्रकाशन करके नये युग को जन्म दिया। उन्होंने ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’, ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘वाक’ (अंग्रेजी) पत्रों का बड़ी कुशलतापूर्वक सम्पादन किया। उनकी पहली कविता सन् 1927 में कॉलेज पत्रिका में प्रकाशित हुई। चित्रकारी,मृत्तिका-शिल्प,चर्म-शिल्प,काष्ठ-शिल्प, फोटोग्राफी,बागवानी,पर्वतारोहण आदि में उनकी विशेष रुचि थी। अज्ञेयजी प्रकृति तथा व्यवस्था प्रेमी व्यक्ति थे। उनकी साहित्यिक सेवाएँ सदैव चिर स्मरणीय रहेंगी।

  • रचनाएँ

अज्ञेयजी प्रतिभा सम्पन्न कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण निम्नवत् है

  1. काव्य-अरी ओ करुणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, हरी घास पर क्षणभर, बावरा अहेरी,इन्द्रधनु रौंदे हुए,कितनी नावों में कितनी बार, इत्यलम,सुनहले शैवाल,चिन्ता तथा पूर्वा।
  2. आलोचना-त्रिशंकु, हिन्दी-साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, तीनों तार सप्तकों की भूमिकाएँ आदि।
  3. नाटक-उत्तर प्रियदर्शी।
  4. कहानी संग्रह-विपथगा, शरणार्थी,जयदोल, तेरे ये प्रतिरूप, अमर बल्लरी, परम्परा आदि।
  5. निबन्ध-संग्रह-आत्मनेपद,लिखि कागद कोरे,सबरंग और कुछ राग आदि।
  6. उपन्यास-शेखर : एक जीवनी (भाग 1 तथा 2), नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी।
  7. यात्रा-साहित्य-एक बूंद सहसा उछली, अरे यायावर रहेगा याद।
  8. सम्पादन सैनिक, विशाल भारत,प्रतीक, दिनमान,वाक् (अंग्रेजी)।
  • भाव पक्ष

उनकी कविता में जीवन की गहरी अनुभूति तथा कल्पना की ऊँची उड़ान का सुन्दर समन्वय हुआ है। अज्ञेयजी ने एक नवीन काव्य धारा का प्रवर्तन किया। उनकी निजी अनुभूतियाँ प्रयोगवादी कविता के रूप में प्रकट हुईं।

  1. प्रकृति चित्रण-अज्ञेयजी प्रकृति प्रेमी कवि हैं। कवि ने प्रकृति का आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में प्रयोग किया है। प्रकृति के मानवीकरण रूप का प्रयोग अपने काव्य में किया है। अज्ञेयजी प्रकृति के पारखी कवि हैं। कहीं-कहीं प्रकृति के मनोरम चित्रों को उभारा है। कहीं-कहीं प्रकृति के भयंकर पक्ष का भी चित्रण किया है।
  2. प्रेम निरूपण-प्रेम के सम्बन्ध में उनका विचार है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान है। उनके प्रेम निरूपण में एक ओर प्रिया के सौन्दर्य का वर्णन किया है। वहीं दूसरी ओर मन की व्याकुलता दिखायी देती है। इनकी प्रारम्भिक रचनाओं में प्रेम की अनुभूति का वर्णन पर्याप्त रूप में किया गया है।
  3. व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति-अज्ञेयजी ने अपनी कविताओं में मानव स्वभाव का वर्णन किया है। वे समाज के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। व्यक्ति के विकास द्वारा ही समाज का विकास सम्भव है। उनका विचार है मानव के विकास के लिए मानसिक विकास भी आवश्यक है। अतः उन्होंने अपने काव्य में व्यक्ति के विकास को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है।
  4. बौद्धिकता कवि ने बौद्धिकता पर विशेष बल दिया है। उनकी कविताओं में बुद्धि का विकास अधिक है। उनकी कविताएँ अतिशय बौद्धिकता का खजाना बन कर रह गयी हैं। अत्यधिक बौद्धिकता ने रस का अभाव उत्पन्न कर दिया है। उनकी कविताओं में सर्वत्र बौद्धिकता के ही दर्शन होते हैं।
  5. क्षणवादी जीवन दृष्टि जीवन क्षणभंगुर है। इस कविता में क्षणवाद का प्रबल विरोध किया है। प्रयोगवादी कवि प्रति क्षण की अनुभूतियों को महत्त्वपूर्ण मानता है। वह क्षण को सत्य मानता है। अतः इसका उपभोग करना चाहता है।
  6. नवीन उपमानों का प्रयोग-प्रयोगवादी कवि नवीनता का पोषक है। उनका विचार है कि पुराने शब्दों में नये अर्थों को प्रकट करने की क्षमता नहीं रही। अत: नये-नये शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। नये विषय, नया शिल्प, नवीन भाषा, नए प्रतीक एवं नये उपमान इन कविताओं में प्रयुक्त किये गये हैं। इन नवीन उपमानों में नये सौन्दर्य बोध के दर्शन होते हैं।
  7. रहस्य भावना-अज्ञेय जी के काव्य में रहस्य की प्रधानता है। हरे भरे खेत,सागर, सुन्दर घाटियाँ, मनुष्य की मुस्कान,प्रेम तथा श्रद्धा आदि सभी में उस विराट ईश्वरीय सत्ता के दर्शन होते हैं। ये सभी उस ईश्वर की ही देन हैं। कवि,ईश्वर से समन्वय स्थापित करना चाहता है। अज्ञेयजी के काव्य में सर्वत्र रहस्य भावना दृष्टिगोचर होती है।
  • कला पक्ष
  1. भाषा-अज्ञेयजी का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। विषय के अनुसार आपकी भाषा बदलती रहती है। आपकी भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली से युक्त है। भावों को व्यक्त करने में जो भाषा आपको अच्छी लगी, आपने उस भाषा का ही प्रयोग किया है। कहीं-कहीं अंग्रेजी तथा उर्दू के शब्दों का प्रयोग भी अज्ञेयजी ने किया है। उनकी भाषा में नूतनता, लाक्षणिकता तथा प्रतीकात्मकता के गुण विद्यमान हैं। देशज शब्दों का प्रयोग भी किया है। भाषा में चित्रात्मकता तथा बिम्ब विधान के भी दर्शन होते हैं। भाषा में चटकीलापन लाने के लिए उन्होंने लोकोक्तियों एवं मुहावरों का प्रयोग भी किया है।
  2. शैली अज्ञेयजी का व्यक्तित्व गम्भीर था। व्यक्तित्व की छाप उनकी शैली पर दिखायी देती है। इनकी शैली में बौद्धिकता और गम्भीरता की प्रधानता है। इन्होंने गद्य में आलोचनात्मक शैली, वर्णनात्मक शैली, विवरणात्मक शैली, सम्वादात्मक शैली, विवेचनात्मक शैली, भावात्मक शैली तथा सम्बोधन शैली का प्रयोग किया है। अज्ञेयजी ने व्यंग्य-प्रधान रचनाओं में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। शैली भाषा तथा भावों के अनुकूल है।
  3. छन्द योजना-अज्ञेयजी ने छन्द मुक्त तथा छन्दबद्ध दोनों रूपों में रचनाएं की हैं। एक ओर उन्होंने छन्द के बन्धन को स्वीकारा है तथा दूसरी ओर छन्द के बन्धन को नकारा है। लय, स्वर तथा गेयता के तत्त्व विद्यमान हैं। छन्दों के प्रयोग द्वारा उनके काव्य में शब्द चित्र का अंकन किया गया है। कवि में गहन भावों को व्यक्त करने की शक्ति है।
  4. अलंकार योजना-अज्ञेयजी ने अपने काव्य में परम्परागत अलंकारों का प्रयोग किया है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। प्रकृति चित्रण में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग मिलता है। ध्वन्यर्थव्यंजना, विशेषण विपर्यय जैसे नवीन अलंकारों का प्रयोग किया है।

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उदाहरणार्थ-

उपमा-यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।
रूपक-मैं कब कहता हूँ, जीवन मरु नंदन कानन का फूल बने।

  • साहित्य में स्थान

अज्ञेयजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अज्ञेयजी हिन्दी साहित्य के लिए वरदान हैं। वे प्रतिभा सम्पन्न कवि हैं। अज्ञेयजी ने कविता का संस्कार किया है। कवि ने काव्य को नवीनता प्रदान की। वे मानवतावादी कवि हैं। उनकी कविताएँ बुद्धि को भी झकझोर देती हैं। वे प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे। नई कविता को शिल्पगत रूप देने में अज्ञेयजी का सर्वाधिक योगदान है। वर्तमान युग में अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व दोनों की विविधता के कारण काफी चर्चित रहे। साहित्य-सेवी अज्ञेयजी का हिन्दी जगत में विशिष्ट स्थान है।

20. वीरेन्द्र मिश्र

  • जीवन परिचय

वीरेन्द्र मिश्र का स्थान नवगीतकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी लेखनी में तथा कण्ठ में एक अजीव-सा माधुर्य है। मिश्रजी सरस्वती के वरद पुत्र हैं। कवि तथा गीतकार वीरेन्द्र मिश्र का जन्म दिसम्बर,1927 को ग्वालियर में हुआ था। श्री मिश्रजी ने जीवन-पर्यन्त मानव मूल्यों की स्थापना की। शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने पूरी तरह स्वयं को लेखन कार्य में तल्लीन कर दिया। उनका स्वभाव सरल तथा विनम्र था। अपने बड़ों का सम्मान करते थे। छोटों को स्नेह करते थे। वे संघर्ष की साक्षात् मूर्ति थे। स्वाभिमान तथा दृढ़ निश्चय उनके स्वभाव का प्रधान गुण था। उस समय कवि सम्मेलन उनके बिना अधूरे समझे जाते थे। अतः मिश्रजी कवि सम्मेलनों की शान थे। जून, 1975 में यह गीतकार सदैव के लिए हमसे दूर हो गया।

  • साहित्य सेवा

मिश्रजी ने अनेक रूपों में माँ भारती की सेवा की। वे गीतकार तथा गद्य लेखक के साथ-साथ एक सफल पत्रकार थे। वीरेन्द्र मिश्र आधुनिक कविता की वर्तमान पीढी के सबसे अधिक लोकप्रिय कवि माने जाते हैं। मिश्र जी छायावादोत्तर गीतकार हैं। उनके गीतों में समय तथा समाज की प्रगतिशील आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी रचनाओं में सामाजिक,सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय धरातल अत्यन्त सबल है। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से जनमानस में आस्था और विश्वास को जाग्रत किया है। उनके गीतों में जहाँ एक ओर भावुक प्रेमी के प्रणय की गूंज हैं,वहीं दूसरी ओर व्यथा एवं पीड़ा के मार्मिक स्वर भी विद्यमान हैं। उनके गीतों में राष्ट्रीय गौरव के स्वर मुखरित हुए हैं। अन्याय,शोषण और विषमता के विरुद्ध सच्ची मानवीय चिन्ता के दर्शन होते हैं।

  • रचनाएँ

वीरेन्द्र मिश्र की प्रमुख रचनाएँ हैं गीतम, मधुवंती, गीत पंचम, उत्सव गीतों की लाश पर,वाणी के कर्णधार,धरती,गीताम्बरा, शांति गन्धर्व आदि प्रमुख हैं। उन्होंने गीत, नवगीत, राष्ट्रीय गीत, मुक्तक के अतिरिक्त रेडियो नाटक एवं बाल साहित्य की रचना की।

  • भाव पक्ष

(1) सरस तथा सफल गीतकार-वीरेन्द्र मिश्र मूलतः गीतकार हैं। उनकी रचनाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरातल अत्यन्त व्यापक है। जनसाधारण उनके प्रेरणा स्रोत हैं। मिश्रजी सदैव सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूक रहे हैं। हमेशा ही युग चेतना का संचार किया है। काव्य का मर्म वही समझ सकता है जिसमें उत्सर्ग एवं त्याग की भावना निहित हो। गीतकार के भाव जगत में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है।

(2) कल्पना और यथार्थ का समन्वय-वीरेन्द्र मिश्र की कविताओं में कल्पना और यथार्थ का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। जीवन के शाश्वत सत्य से विमुख रहकर कल्पना लोक में विचरण करना कवि को रुचिकर नहीं लगता। कल्पना के माध्यम से कवि हृदय की अनुभूति कराता है। सत्य,सौन्दर्य और कल्पना की गहराई के दर्शन होते हैं। उनमें ऐसी कल्पना शक्ति है जिसके द्वारा एक सफल रचनाकार सिद्ध हुए हैं। सुधी पाठक और श्रोता उनकी कविताओं में तल्लीन हो जाता है। धरातल के वास्तविक यथार्थ को भी कवि प्रस्तुत करता है।

(3) वेदना की प्रधानता–मिश्रजी के काव्य में वेदना का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। कवि का व्यक्तिगत जीवन सुख-दुःख तथा आनन्द से पूर्ण रहा है। एक घटना ने तो उनके जीवन को ही बदल दिया। यह घटना उनके व्यक्तिगत जीवन की है। उनके बड़े भाई का असामयिक निधन हो गया। उनकी रचनाओं में सूनेपन का अनुभव होने लगा। मिश्रजी की व्यक्तिगत वेदना पूरे संसार की वेदना हो गयी। कहीं-कहीं हर्षातिरेक भी काव्य में दृष्टिगोचर होता है। उनके काव्य में विरह पीड़ित मानव की विकलता तथा उत्कण्ठा के दर्शन होते हैं। कवि की आँखों से प्रवाहित आँसू उसकी मर्म व्यथा के परिचायक हैं–

क्या तुम्हें कुछ भी पता है,
अश्रु में क्या-क्या व्यथा है?

(4) सत्यम् के सफल गायक कवि केवल कल्पना में ही विचरण नहीं करता अपितु वह सत्य के ठोस धरातल पर आधारित है। वे सत्य और ईमान के मार्ग पर हमें चलने के लिए प्रेरित करते हैं। सत्य सदैव आदरणीय है। कभी-कभी कठोर सत्य का भी समाज सम्मान करता है। कवि मानवीय जीवन के कटु सत्यों से हमें अवगत कराते हैं। यदा-कदा सुखद स्वप्न अतीत में विलीन हो जाता है।

(5) संघर्षों के कवि-संघर्ष मानव जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। जीवन में पग-पग पर बाधाएँ एवं संघर्ष हैं। इन संघर्षों से निकलना तथा टकराना ही सच्चा जीवन है। जीवन के कटु अनुभवों को प्राप्त करके जो कर्त्तव्य-पथ पर आगे बढ़ा है,वह दूसरों के लिए सदैव पथ-प्रदर्शक है। कवि ने अपने गीतों में जीवन की गतिशीलता का वर्णन किया है। कवि के गीतों में चिर शान्ति; प्रेम प्रकट होता है।

(6) युद्ध की विभीषिका का प्रबल विरोध-युद्ध देश के विकास में बाधक होते हैं। युद्ध सदैव ही मानवता के शत्रु हैं। युद्ध में विजय किसी की भी हो या पराजय किसी की हो, हानि तो प्राणिमात्र को पहुँचती ही है। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण ने कवि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। चीन ने भी जबरन भारत को युद्ध की आग में झोंक दिया। इससे अपार धन-जन की हानि हुई। कवि को युद्ध बुरा लगता है। वह चाहे अपने देश से हो अथवा किसी अन्य देश से। युद्धों से जनसामान्य को प्रदूषण, चीत्कार,विनाश और बेकारी ही मिलती है।

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  • कला पक्ष

(1) भाषा-मिश्रजी ने अपने काव्य में तत्सम शब्दों का प्रयोग किया है। कवि ने अपने काव्य में परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया है। चित्रात्मकता आपकी भाषा की प्रमुख विशेषता पायी जाती है। आपकी भाषा में कहीं-कहीं उर्दू-फारसी के शब्दों का प्रयोग स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भाषा-सौष्ठव की गहराई पायी जाती है। कवि की रचनाएँ प्रसाद, ओज तथा माधुर्य गुण से परिपूर्ण हैं। भाषा लक्षणा तथा व्यंजना शब्द शक्ति से पूर्ण है।

(2) शैली-मिश्रजी का काव्य गेयतात्मकता का श्रेष्ठ उदाहरण है। काव्य में संगीतात्मकता भी पायी जाती है। संगीत की प्रधानता तथा गेयता के कारण ही मिश्रजी की कविताएँ मंच पर लोकप्रियता को प्राप्त हुई। प्रत्येक घर में उनके गीतों को बड़े ही चाव से गुनगुनाया जाता है। मिश्रजी की कविता में अनुपम प्रवाह,सहज माधुर्य तथा अदभुत लालित्य है। प्रतीक तथा बिम्ब विधान का प्रयोग स्थान-स्थान पर मिलता है। मिश्रजी की शैली में गीति काव्य का नवीनतम विकास प्राप्त होता है।

(3) छन्द योजना कवि ने छोटे-छोटे छन्दों का प्रयोग किया है। उनका काव्य नवीन प्रकार के छन्द,धुने तथा सुरों का एक विशाल सागर है। मिश्रजी ने गीत की नवीनतम् परम्परा को जन्म दिया है। कवि स्वच्छन्द प्रवाह का पोषक है। उनका विचार है कि छन्दबद्धता स्वाभाविकता को समाप्त कर देती है।

मिश्रजी ने तुकान्त तथा अतुकान्त दोनों प्रकार के छन्दों में गीत लिखे हैं। ‘गीतम’ सर्वाधिक लयात्मक कृति है। कवि ने जन-जन की वाणी को छन्दोबद्ध किया है। लयात्मकता, गतिशीलता,प्रवाहिकता आपके छन्दों की प्रमुख विशेषता है।

(4) अलंकार योजना मिश्रजी ने अपने काव्य में लगभग सभी प्रकार के अलंकारों का प्रयोग किया है। अलंकार साधन के रूप में प्रयुक्त किये हैं; साध्य के रूप में नहीं। परम्परागत अलंकारों का प्रयोग भी कम किया है। यमक, अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, प्रतीप तथा विरोधाभास आदि अलंकार ढूँढ़ने पर यत्र-तत्र मिल जाते हैं। प्रकृति चित्रण में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया है।

  • साहित्य में स्थान

मिश्रजी छायावादोत्तर प्रमुख गीतकार हैं। उन्होंने 1940 से काव्य रचना का प्रयास किया। कवि को अपने देश की सभ्यता तथा संस्कृति से विशेष लगाव है। वे ग्रामीण संस्कृति के उपासक थे। वे देश की समसामयिक समस्याओं, साम्प्रदायिक एकता के समर्थक हैं। वे कुशल तथा लोकप्रिय गीतकार हैं। वे जनसाधारण के मनोबल में वृद्धि करते हैं। उनका विचार है कि उत्साह और आत्मबल को अपनायें तो निश्चय ही तूफान भी अपनी दिशा परिवर्तित कर लेंगे। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण मिश्रजी का हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान है। वे माँ भारती के सच्चे अर्थों में सपूत हैं।

महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न
[2010]

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में मीराबाई की रचना है
(अ) रसिक प्रिया, (ब) राग गोविन्द, (स) साहित्य लहरी, (द) मदनाष्टक।

2. केशवदास का काल है
(अ) भक्तिकाल, (ब) आदिकाल, (स) रीतिकाल, (द) आधुनिक काल।

3. सूरदास के साहित्य की भाषा है
(अ) अवधी, (ब) ब्रजभाषा, (स) खड़ी बोली, (द) उर्दू।

4. मैथिलीशरण गुप्त ने काव्य की रचना की है
(अ) अवधी में, (ब) ब्रज में, (स) खड़ी बोली में, (द) मालवी में।

5. रत्नाकर का देहावसान हुआ
(अ) हरिद्वार में, (ब) कानपुर में, (स) फतेहपुर में, (द) प्रयाग में।

6. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जन्म हुआ
(अ) सन् 1921 में, (ब) सन् 1897 में, (स) सन् 1905 में, (द) सन् 1895 में।

7. श्रीकृष्ण सरल के लेखन का विषय है
(अ) राष्ट्रवाद एवं क्रान्तिकारी. (ब) छायावाद, (स) भक्तिपूर्ण, (द) रहस्यवाद।

8. जयशंकर प्रसाद के पिता का नाम था
(अ) यायावर, (ब) रामरख, (स) सुंघनी साहू, (द) ब्रजनाथ।

9. ‘अनाम तुम आते हो’ के रचयिता हैं
(अ) घनानन्द, (ब) जयशंकर प्रसाद, (स) केशव देव, (द) भवानी प्रसाद मिश्र।

10. कबीर की भाषा को कहा जाता है
(अ) ब्रज भाषा, (ब) बुन्देलखण्डी भाषा, (स) सधुक्कड़ी भाषा, (द) परिष्कृत भाषा।
उत्तर-
1.(ब), 2. (स), 3.(ब), 4. (स), 5. (अ), 6. (ब), 7.(अ), 8. (स), 9.(द), 10. (स)।

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  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. बिहारी की प्रसिद्ध रचना ……….. है।
2. तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली’ ………. परम्परा की उत्कृष्ट रचना है।
3. मैथिलीशरण गुप्त के पिता का नाम ……….. था।
4. ‘पर आँखें नहीं भरौं’ ………. की प्रसिद्ध रचना है।
5. आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री का जन्म …………. हुआ।
6. निराला का बचपन बंगाल की …… धरती पर बीता।
7. मुक्तिबोध को …………. विषमताओं के कारण अपना अध्ययन बीच में ही रोकना पड़ा।
8. अज्ञेय का पूरा नाम …………. है।
9. वीरेन्द्र मिश्र …………. परम्परा के विशिष्ट कवि माने जाते हैं।
10. मीरा का विवाह उदयपुर के महाराज …………. से सम्पन्न हुआ।
11. ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता …………. हैं। [2009]
12. ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ …………. की रचना है। [2009]
13. श्रीकृष्ण के प्रति ……….. का दाम्पत्य भाव है। [2009]
14. ‘सूर्य का स्वागत’ …………. की रचना है। [2009]
15. ‘जहाँगीर जस चन्द्रिका’ के रचयिता …………. हैं। [2009]
16. मीराबाई ……… की कवयित्री हैं। [2009]
17. …………. को ‘हृदयहीन कवि’ कहा जाता है। [2009]
18. ………. वात्सल्य के कुशल चितेरे हैं। [2009]
19. काव्य में सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग ……… ने किया। [2009, 14]
उत्तर-
1. सतसैया, 2. मुक्तक काव्य, 3. सेठ रामचरण शुक्ल, 4. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, 5. कोलकाता, 6. शस्य-श्यामला, 7. आर्थिक, 8. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, 9. नवगीत, 10. भोजराज, 11. केशवदास, 12. गजानन माधव मुक्तिबोध’,13. मीरा,14. दुष्यन्त कुमार,15. केशवदास,16. कृष्णभक्ति शाखा,17. केशव,18. सूरदास,19. कबीरदास।

  • सत्य/असत्य

1. मीरा की भक्ति-भावना हृदय से स्फूर्त है।
2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार केशवदास का जन्मकाल सन् 1555 ई.माना गया है।
3. सूरदास का उद्धव प्रसंग’ भक्तिपूर्ण रचना है।
4. गोपाल सिंह नेपाली के पिता राय बहादुर ‘गोरखा रायफल’ में सैनिक थे।
5. ‘सुजान’ को श्रृंगार पक्ष में नायक और भक्ति पक्ष में दुर्गा मान लेना उचित होगा।
6. जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ ने क्वीन्स कॉलेज इलाहाबाद से बी.ए. पास किया।
7. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आधुनिक युग के ऊर्जावान कवि हैं। [2014]
8. श्रीकृष्ण सरल कहते हैं कि देश की सम्पूर्ण समृद्धि का भवन शहीदों के उत्सर्ग की नींव पर खड़ा है।
9. ‘कामायनी’ के रचयिता सुमित्रानन्दन पन्त हैं।
10. भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी नगर में हुआ था।
11. कबीर प्रेमाश्रयी शाखा के कवि हैं। [2009]
12. केशवदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि हैं। [2009]
13. घनानन्द रीतिसिद्ध कवि हैं। [2009]
14. मीराबाई रामभक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। [2009]
15. केशव रीतिमुक्त कवि हैं। [2012]
उत्तर-
1. सत्य, 2. सत्य, 3. असत्य, 4. सत्य,5. असत्य, 6. असत्य, 7. सत्य,8. सत्य, 9. असत्य, 10. असत्य, 11. असत्य,12. असत्य, 13. सत्य, 14. असत्य, 15. असत्य। सही जोड़ी मिलाइए

I. ‘क’
(1) मीराबाई की रचना – (अ) सुजान
(2) केशवदास – (ब) भक्तिकाल
(3) सूरदास का काल – (स) सन् 1903 में
(4) गोपाल सिंह नेपाली का जन्म – (द) रामचन्द्रिका
(5) घनानन्द की प्रेमिका [2012] – (इ) गीत गोविन्द की टीका
उत्तर-
(1), → (इ),
(2) → (द),
(3) → (ब),
(4) → (स),
(5) → (अ)।

II. ‘क’
(1) कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है [2009] – (अ) सूरदास
(2) बाललीला वात्सल्य के चितेरे [2009] – (ब) छायावाद
(3) जयशंकर प्रसाद – (स) केशवदास
(4) तुलसीदास – (द) मैथिलीशरण गुप्त
(5) साकेत [2014] – (इ) सन्त कवि
उत्तर-
(1) → (स),
(2) → (अ),
(3) → (ब),
(4) → (इ),
(5) → (द)।

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III.
(1) काव्य में सर्वाधिक छंदों का प्रयोग किया है [2009] – (अ) मीरा ने
(2) काव्य में भाव-विह्वलता कूट-कूट कर भरी है [2009] – (ब) केशव ने
(3) राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले कवि हैं [2009] – (स) घनानन्द
(4) रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि हैं [2009] – (द) जगन्नाथदास रत्नाकर
(5) ‘उद्धव प्रसंग’ नामक कविता के रचयिता हैं [2009] – (इ) गोपाल सिंह नेपाली
उत्तर-
(1) → (ब),
(2) → (अ),
(3) → (इ),
(4) → (स),
(5) → (द)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
कबीर ने अद्वैत से क्या अर्थ ग्रहण किया?
उत्तर-
ब्रह्म एक है द्वितीय नहीं।

प्रश्न 2.
बिहारी किस काल के कवि थे?
उत्तर-
रीतिकाल।

प्रश्न 3.
“विनय पत्रिका’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
तुलसीदास।

प्रश्न 4.
मैथिलीशरण गुप्त ने किस भाषा में काव्य रचना की?
उत्तर-
खड़ी बोली में।

प्रश्न 5.
किस कवि की शैली माधुर्य, प्रसाद और ओज गुणों से सम्पन है?
उत्तर-
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’।

प्रश्न 6.
विष्णुकान्त शास्त्री का ‘उपमा कालिदासस्य’ किस भाषा से किस भाषा में अनूदित है-
उत्तर-
बांग्ला से हिन्दी में।

प्रश्न 7.
छायावाद के प्रमुख स्तम्भ और आधुनिक काव्य में क्रान्ति के अग्रदूत किस कवि को माना जाता है?
उत्तर-
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।

प्रश्न 8.
‘काठ का सपना’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
गजानन माधव मुक्तिबोध’।

प्रश्न 9.
प्रयोगवाद किस कवि की सूझ की उपज है?
उत्तर-
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

प्रश्न 10.
‘वाणी के कर्णधार’ किस कवि की रचना है?
उत्तर-
वीरेन्द्र मिश्र।

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प्रश्न 11.
सूरदास के पदों की भाषा कौन-सी है? [2009]
उत्तर-
ब्रजभाषा।

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MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 1-5)

MP Board Class 12th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 1-5)

1. मीराबाई

जीवन परिचय

हिन्दी साहित्य में मीराबाई का विशेष महत्व है। मीरा भक्त कवयित्री हैं। उनकी रचनाएँ हृदय की अनुभूति मात्र हैं।

मीराबाई का जन्म राजस्थान में जोधपुर के मेड़ता के निकट चौकड़ी ग्राम में सन् 1503 ई. (संवत् 1560 ई) में हुआ था। वे राठौर रत्नसिंह की पुत्री थीं। बचपन में ही मीरा की माता का निधन हो गया था। इस कारण ये अपने पितामह राव दूदाजी के साथ रहती थीं। राव दूदा कृष्ण भक्त थे। अत: मीरा भी कृष्ण भक्ति में रंग गई। मीरा का विवाह उदयपुर के महाराज भोजराज के साथ हुआ था। विवाह के कुछ वर्ष उपरान्त ही इनके पति का स्वर्गवास हो गया। इस असह्य कष्ट ने इनके हृदय को भारी आघात पहुँचाया। इससे उनमें विरक्ति का भाव पैदा हो गया। वे साधु सेवा में ही जीवन-यापन करने लगीं। वे राजमहल से निकलकर मंदिरों में जाने लगी और साधु संगति में कृष्ण-कीर्तन करने लगीं। इनकी अनन्य कृष्ण भक्ति और संत समागम से राणा परिवार रुष्ट हो गया। इससे चित्तौड़ के तत्कालीन राणा ने उन्हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देना शुरू कर दिया। कहते हैं कि एक बार मीरा को विष भी दिया गया, किन्तु उन पर उसका असर नहीं हुआ। राणा की यातनाओं से ऊब कर ये कृष्ण की लीलाभूमि मथुरा-वृन्दावन चली गईं और वहीं शेष जीवन व्यतीत किया। मीरा की भक्ति-भावना बढ़ती गई और वे प्रभु प्रेम में दीवानी बन गईं। संसार से विरक्त, कृष्ण भक्ति में लीन मीरा की वियोग भावना ही इनके साहित्य का मूल आधार है। मीरा अपने अन्तिम दिनों में द्वारका चली गईं। वहाँ ही सन् 1546 ई.(संवत् 1603 वि) में वे स्वर्ग सिधार गईं।

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  • साहित्य सेवा

मीराबाई द्वारा लिखित काव्य उनके हृदय की मर्मस्पर्शी वेदना है और भक्ति की तल्लीनता है। उन्होंने सीधे सरल भाव से अपने हृदय के भावों को कविता के रूप में व्यक्त कर दिया है। उनका साहित्य भक्ति के आवरण में वाणी की पवित्रता है और संगीत का माधुर्य है। मन की शान्ति के लिए और भक्ति मार्ग को पुष्ट करने के लिए मीरा की साहित्य सेवा सर्वोच्च

  • रचनाएँ

मीराबाई के नाम से जिन कृतियों का उल्लेख मिलता है उनके नाम हैं-‘नरसी जी को माहेरो’, ‘गीत गोविन्द की टीका’, ‘राग-गोविन्द’, ‘राग-सोरठा के पद’, ‘मीराबाई का मलार’, ‘गर्वागीत’, ‘राग विहाग’ और फुटकर पद। भौतिक जीवन से निराश मीरा की एकान्त निष्ठा गिरधर गोपाल में केन्द्रित है। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ कहकर मीरा ने कृष्ण के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त किया है। भक्ति का यह भी एक लक्षण है।

  • भाव पक्ष

मीराबाई द्वारा रचित काव्य साहित्य में उनके हृदय की मर्मस्पर्शिनी वेदना है, प्रेम की आकुलता है तथा भक्ति की तल्लीनता है। उन्होंने अपने मन की अनुभूति को सीधे ही सरल, सहज भाव में अपने पदों में अभिव्यक्ति दे दी है। मीरा के पदों के वाचन और गायन से संकेत मिलता है कि मीरा की भक्ति-भावना अन्तःकरण से स्फूर्त है। उन्होंने मुक्त भाव से सभी भक्ति सम्प्रदायों से प्रभाव ग्रहण किया है।

उनकी रचनाओं में माधुर्य समन्वित दाम्पत्य भाव है। मीरा का विरह पक्ष साहित्य की दृष्टि से मार्मिक है। उनके आराध्य तो सगुण साकार श्रीकृष्ण हैं। मीरा के बहुत से पदों में रहस्यवाद स्पष्ट दिखाई देता है। रहस्यवाद में प्रिय के प्रति उत्सुकता, मिलन और वियोग के चित्र हैं।

  • कला पक्ष
  1. भाषा-मीरा की भाषा राजस्थानी और ब्रजभाषा है, किन्तु पदों की रचना ब्रजभाषा में ही है। उनके कुछ पदों में भोजपुरी भी दिखाई देती है। मीरा की भाषा शुद्ध साहित्यिक भाषा न रहकर जनभाषा ही रही।
  2. शैली-मीरा ने मुक्तक शैली का प्रयोग किया है। उनके पदों में गेयता है। भाव सम्प्रेषणता मीरा की गीति शैली की प्रधान विशेषता है।
  3. अलंकार इनकी रचनाओं में अधिकतर उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास आदि अलंकारों को सर्वत्र देखा जा सकता है।
  • साहित्य में स्थान

मीरा ने अपने हृदय में व्याप्त वेदना और पीड़ा को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। भक्तिकाल के स्वर्ण युग में मीरा के भक्ति भाव से सम्पन्न पद आज भी अलग ही जगमगाते दिखाई देते हैं।

2. केशवदास

जीवन परिचय
हिन्दी साहित्य के कवियों एवं आचार्यों में केशव का साहित्य विलक्षण एवं प्रभावशाली है। इन्हें रीतिकाल का प्रवर्तक माना जाता है। केशवदास के जन्मकाल के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार इनका जन्मकाल सन् 1555 ई. (संवत् 1612) तथा मृत्यु सन् 1617 ई. (संवत् 1674) माना गया है। इनका जन्म स्थान ओरछा, मध्यप्रदेश है। ये दरबारी कवि थे। इन्हें ओरछा नरेश महाराजा रामसिंह के दरबार में विशेष सम्मान प्राप्त था। नीति निपुण एवं स्पष्टवादी केशव की प्रतिभा बहुमुखी है। उनकी रचनाओं में उनके आचार्य, महाकवि और इतिहासकार का रूप दिखाई देता है। आचार्य का आसन ग्रहण करने पर इन्हें संस्कृत की शास्त्रीय पद्धति को हिन्दी में प्रचलित करने की चिन्ता हई जो जीवन के अन्त तक बनी रही। इनके पहले भी रीतिग्रन्थ लिखे गए किन्तु व्यवस्थित और सर्वांगीण ग्रन्थ सबसे पहले इन्होंने ही प्रस्तुत किए। अनुप्रास,यमक और श्लेष अलंकारों के ये विशेष प्रेमी थे। इनके श्लेष संस्कृत पदावली के हैं। अलंकार सम्बन्धी इनकी कल्पना अद्भुत है।

  • साहित्य सेवा

केशवदास ने लक्षण ग्रन्थ,प्रबन्ध काव्य, मुक्तक सभी प्रकार के ग्रन्थों की रचना की है। ‘रसिक प्रिया’,’कवि प्रिया’ और ‘छन्दमाला’ उनके लक्षण ग्रन्थ हैं। रीतिग्रन्थों की रचना इनके कवि रूप में आविर्भाव से पूर्ण भी होती रही। परन्तु जिस तरह के व्यवस्थित और समय ग्रन्थ इन्होंने प्रस्तुत किए, वैसे अन्य कोई कवि रीति ग्रन्थ प्रस्तुत करने में सफल नहीं हुआ।

इनका कवि रूप इनकी प्रबन्ध एवं मुक्तक दोनों प्रकार की रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है। संवादों के उपयुक्त विधान का इनमें विशिष्ट गुण है। मानवीय मनोभावों की इन्होंने सुन्दर व्यंजना की है। संवादों में इनकी उक्तियाँ विशेष मार्मिक हैं तथापि प्रबन्ध के बीच अनावश्यक उपदेशात्मक प्रसंगों का नियोजन उसके वैशिष्ट्य में व्यवधान उपस्थित करता है। इनके प्रशस्ति काव्यों में इतिहास की सामग्री प्रचुर मात्रा में है। मध्यकाल में किसी के पांडित्य अथवा विद्वता की परख की कसौटी थी-केशव की कविता। केशव यदि ‘रसिक प्रिया’ जैसी भाषा लिखते रहते तो वे कठिन काव्य के प्रेत’ कहलाने से बच जाते। कल्पना शक्ति-सम्पन्न और काव्यभाषा

में प्रवीण होने पर भी केशव पाण्डित्य प्रदर्शन का लोभ संवरण नहीं कर सके।

  • रचनाएँ –

‘रसिक प्रिया’, कवि प्रिया’, ‘रामचन्द्रिका’, ‘वीर चरित्र’, विज्ञान गीता’ और ‘जहाँगीर जस चन्द्रिका’,इनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। संस्कृत के ‘प्रबोध चन्द्रोदय’ नाटक के आधार पर विज्ञान गीता’ निर्मित हुई है। ‘जहाँगीर जस चन्द्रिका’ में जहाँगीर के दरबार का वर्णन है। जनश्रुति है कि रामचन्द्रिका का सृजन उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास के कहने से किया।

  • भाव पक्ष
  1. रस-केशवदास की रचनाओं में परिस्थिति के अनुसार रसों की निष्पत्ति हुई है। श्रृंगार का वर्णन उत्तम है। वियोग और संयोग दोनों पक्षों का वर्णन उत्कृष्ट है। वीर रस का प्रयोग पात्रों के सम्वादों से हुआ है। शान्त रस निर्वेद की दशा में है।
  2. अर्थ गाम्भीर्य केशवदास द्वारा प्रयुक्त सम्वादों के अर्थ में गम्भीरता है।
  3. नीति तत्व केशव दरबारी कवि थे। अतः उनकी रचनाओं में नीति तत्व की प्रधानता है। इनकी कविता में नैतिक मूल्यों की रक्षा की गई है।
  • कला पक्ष
  1. भाषा केशव ने अपने ग्रन्थों की रचना ब्रजभाषा में ही की है। कुछ रचनाओं में संस्कृत के प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं। कहीं-कहीं इनकी रचनाओं में दुरूहता आ गई है।
  2. शैली इन्होंने अपनी रचनाओं में प्रबन्ध शैली एवं मुक्तक शैली को अपनाया है। अलंकारप्रधान और व्यंग्यप्रधान शैली को स्थान दिया गया है।
  3. अलंकार-केशव ने उपमा,रूपक,उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग किया है।
  4. छन्द इन्होंने दोहा, कवित्त,सवैया,चौपाई, सोरठा आदि का प्रयोग किया है। केशव लक्षण ग्रन्थों के रचयिता रहे हैं। अतः उन्होंने छन्दों,शैली, रस निष्पत्ति आदि पर नए-नए प्रयोग किए हैं।
  5. सम्वाद योजना केशव की सम्वाद योजना बेजोड़ है। पात्र सम्वादों के माध्यम से परस्पर भावजगत की भी अभिव्यक्ति करते चलते हैं।

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  • साहित्य में स्थान

केशवदासजी हिन्दी के प्रमुख आचार्य हैं। उनकी समस्त रचनाएँ शास्त्रीय रीतिबद्ध हैं। ये उच्चकोटि के रसिक थे,पर उनकी आस्तिकता में कमी नहीं आने पाई है। नीतिनिपुण, निर्भीक एवं स्पष्टवादी केशव की प्रतिभा सर्वतोमुखी है। अपने लक्षण ग्रन्थों के लिए वे सदा स्मरणीय रहेंगे।

3. सूरदास [2009, 13, 15]

जीवन परिचय
मध्यकालीन वैष्णव भक्त कवियों में सूरदास का स्थान श्रेष्ठ है। सूरदास ने भक्तिधारा को जनभाषा के व्यापक धरातल पर अवतरित करके संगीत और माधुर्य से मंडित किया। सूरदास विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित अष्टछाप के अग्रणी भक्त कवि हैं। इनका जन्म सन् 1478 ई.(संवत् 1535 वि) में आगरा के समीप रुनकता नामक गाँव में हुआ था। कुछ विद्वान दिल्ली के समीप ‘सीही नामक स्थान को इनका जन्मस्थान मानते हैं। बल्लभाचार्य जी ने इन्हें दीक्षा प्रदान की और गोवर्धन स्थित श्रीनाथ जी के मन्दिर में इनको कीर्तन करने के लिए नियुक्त कर दिया। इस प्रकार आप आजीवन गऊघाट पर रहते हुए श्रीमद्भागवत के आधार पर श्रीकृष्ण लीला से सम्बन्धित पदों की रचना करते रहे और मधुर स्वर से उनका गायन करते रहे।

महात्मा सूरदास का जन्मान्ध होना विवादास्पद है। सूर की रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि एक जन्मान्ध कवि इतना सजीव और उच्चकोटि का वर्णन नहीं कर सकता। सूरदास की मृत्यु सन् 1583 ई.(सं.1640 वि) में मथुरा के समीप पारसोली नामक ग्राम में विट्ठलनाथ जी की उपस्थिति में हुई। कहा जाता है कि अपने परलोक गमन के समय सूरदास “खंजन नैन रूप रस माते” पद का गान अपने तानपूरे पर अत्यन्त मधुर स्वर में कर रहे थे।

सूरदास की भाषा ललित और कोमलकान्त पदावली से युक्त ब्रजभाषा है जिसमें सरलता के साथ-साथ प्रभावोत्पादकता भी मिलती है। सूरदास हिन्दी काव्याकाश के सूर्य हैं जिन्होंने अपने काव्य-कौशल से हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा की और बल्लभाचार्य से दीक्षा ग्रहण करने के बाद दास्यभाव और दैन्यभाव के पदों के स्थान पर वात्सल्य और प्रधान सखाभाव की भक्ति के पदों की रचना करना शुरू कर दिया।

  • साहित्य सेवा

सूरदास हिन्दी काव्याकाश के सूर्य हैं, जिन्होंने अपने काव्य-कौशल से हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा की। इनके गुरु बल्लभाचार्य थे। दीक्षा ग्रहण कर इन्होंने दैन्यभाव के पदों की रचना छोड़कर सखाभाव की भक्ति के पदों की रचना करना शुरू कर दिया। अष्टछाप के भक्त कवियों में सूरदास अगणी कवि थे। उनके काव्य का मुख्य उद्देश्य कृष्ण भक्ति का प्रचार करना था। वात्सल्य वर्णन को हिन्दी की अमूल्य निधि कहा जाता है जो सूरदास की रचनाओं में मिलता है। बाल मनोविज्ञान के तो सूरदास अद्वितीय पारखी थे।

  • रचनाएँ

विद्वानों के अनुसार सूरदास ने तीन कृतियों का सृजन किया था—
(1) सूरसागर,
(2) सूरसारावली,
(3) साहित्य लहरी।

(1) सूरसागर ही इनकी अमर कृति है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के सवा लाख गेय पद हैं,परन्तु अभी तक 6 या 7 हजार के लगभग पद प्राप्त हैं।
(2) सूर सारावली में ग्यारह सौ छन्द संगृहीत हैं। यह सूरसागर का सार रूप ग्रन्थ है।
(3) साहित्य लहरी में एक सौ अठारह पद संगृहीत हैं। इन सभी पदों में सूर के दृष्ट-कूट पद सम्मिलित हैं। इन पदों में रस का सर्वश्रेष्ठ सृजन हुआ है।

सूरदास सगुण भक्तिधारा कृष्णोपासक कवियों में श्रेष्ठ कवि हैं।

  • भाव पक्ष
  1. भक्तिभाव-सूरदास कृष्ण भक्त थे। काव्य ही उनका भगवत् भजन था। उनके काव्य में एक भक्त हृदय की अभिव्यक्ति सहज ही दिखाई देती है। सूर की भक्ति सखा-भाव लिए हुए थी। कृष्ण को सखा मानकर ही उन्होंने अपने आराध्य की समस्त बाल-लीलाओं और प्रेम लीलाओं का वर्णन किया है।
  2. भावुकता एवं सहृदयता-सूरदास ने अपने पदों में मानव मन के अनेक भावों का वर्णन किया है। उनके वर्णन में गोप-बालकों के,माता यशोदा के और पिता नन्द के विविध भावों की यथार्थता और मार्मिकता मिलती है।
  3. श्रेष्ठ रस संयोजना—सूर की उत्कृष्ट रस संयोजना के आधार पर डॉ.श्यामसुन्दर दास ने उन्हें रससिद्ध कवि’ कह कर पुकारा है। सूर के काव्य मैं शान्त, शृंगार और वात्सल्य रस स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
  4. अद्वितीय वात्सल्य-सूरदास ने कृष्ण के बाल चरित्र, शरीर सौन्दर्य, माता-पिता के हृदय वात्सल्य का जैसा स्वाभाविक, अनूठा एवं मनोवैज्ञानिक सरस वर्णन किया है, वैसा वर्णन सम्पूर्ण विश्व के साहित्य में दुर्लभ है। सूर वात्सल्य रस के सर्वोत्कृष्ट कवि हैं।
  5. श्रृंगार रस का वर्णन-सूरदास ने अपनी रचनाओं में श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का मार्मिक चित्रण करके उसे रसराज सिद्ध कर दिया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है-“श्रृंगार का रस-राजत्व यदि हिन्दी में कहीं मिलता है तो केवल सूर में।”
  • कला पक्ष
  1. लालित्यप्रधान ब्रजभाषा-सूरदास ने बोलचाल की ब्रजभाषा को लालित्य-प्रधान ब्रजभाषा बना दिया है। उनकी प्रयुक्त भाषा सरल, सरस एवं प्रभावशाली है जिससे भाव प्रकाशन की क्षमता का आभास होता है। सूरदास ने अवधी और फारसी के शब्दों और लोकोक्तियों के प्रयोग से अपनी भाषा में चमत्कार उत्पन्न कर दिया है। भाषा में माधुर्य सर्वत्र दिखाई देता है।
  2. गेय पद शैली-सूरदास ने अपनी काव्य रचना गेय पद शैली में की है। माधुर्य और प्रसाद गुण-सम्पन्न शैली वर्णनात्मक है। उनकी शैली में वचनवक्रता और वाग्विदग्धता उनकी एक विशेषता है।
  3. अलंकारों की सहज आवृत्ति-सूरदास की रचनाओं में अलंकार अपने स्वाभाविक सौन्दर्य के साथ प्रविष्ट हो जाते हैं। डॉ. हजारी प्रसाद के शब्दों के अनुसार, “अलंकारशास्त्र तो सूर के द्वारा अपना विषय वर्णन शुरू करते ही उनके पीछे हाथ जोड़कर दौड़ पड़ता है, उपमानों की बाढ़ आ जाती है। रूपकों की वर्षा होने लगती है।”
  4. छंद योजना की संगीतात्मकता-सूरदास ने मुक्तक गेय पदों की रचना की है। उनके पदों में संगीतात्मकता सर्वत्र परिलक्षित होती है।
  • साहित्य में स्थान

सूरदास अष्टछाप के ब्रजभाषा कवियों में सर्वोत्कृष्ट कवि हैं। इनका बाल प्रकृति-चित्रण, वात्सल्य तथा श्रृंगार का वर्णन अद्वितीय है। सूर का क्षेत्र सीमित है,पर उसके वे एकछत्र सम्राट हैं। वे अपनी काव्यकला और साहित्यिक प्रतिभा के बल पर हिन्दी साहित्य जगत के सूर्य माने जाते हैं। जब तक सूर की प्रेमासिक्त वाणी का सुधा प्रवाह है, तब तक हिन्दू जीवन से समरसता का स्रोत कभी सूखने नहीं पाएगा।

4. गोपाल सिंह नेपाली

  • जीवन परिचय

राष्ट्रीय भावों से ओतप्रोत गोपाल सिंह नेपाली का जन्म बेतिया (बिहार) में 11 अगस्त सन् 1903 को हुआ था। इनके पिता रायबहादुर गोरखा रायफल में सैनिक थे। देश-प्रेम और मानवता की भावना इन्हें विरासत में प्राप्त थीं। 14 वर्ष की आयु से ही ये कविता लिखने की ओर आकर्षित हुए। इन्होंने विभिन्न नेपाली पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन और कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से विशिष्ट पहचान बनाई। नेपाली जी रतलाम टाइम्स (मालवा), चित्रपट (दिल्ली), सुधा (लखनऊ) और योगी (साप्ताहिक,पटना) के सम्पादन विभाग में रहे। अनेक चलचित्रों में इन्होंने अपने गीत लिखे। 50 से अधिक फिल्मों में इन्होंने गीत लिखे हैं। 1962 के चीनी आक्रमण के समय इन्होंने देश में जगह-जगह घूम कर गीतों का गायन किया और देश-भक्ति की भावना जाग्रत की।

  • साहित्य सेवा

नेपाली जी अपनी रचनाओं में प्रकृति के रम्य रूप और मनोहर छवियों को प्रस्तुत करते हैं जिसमें एक ओर प्रणय और सौन्दर्य प्रकट है तो दूसरी ओर राष्ट्र-प्रेम उत्कट है। शोषित के प्रति सहानुभूति और स्थितियों से जूझने का सन्देश उनमें मुखर हो उठा है। भाई-बहन के प्रेम को देश-प्रेम में परिवर्तित कर दिया गया है तथा जिसके माध्यम से हमारे हृदय में देश-भक्ति जाग्रत होने का संदेश दिया गया है।

  • रचनाएँ

‘उमंगें’, ‘पंछी’, ‘रागिनी’, नीलिमा’, ‘पंचमी’, ‘सावन’, ‘कल्पना’, ‘आँचल’, ‘रिमझिम’, ‘नवीन’,’हिन्दुस्तान’, ‘हिमालय पुकार रहा है’,आदि इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।

  • भाव पक्ष
  1. देश-प्रेम-गोपाल सिंह नेपाली ने अपनी कविताओं में देश-प्रेम पर ही मुख्य रूप से जोर दिया है। इन्होंने अपनी कविताओं में राष्ट्रीय चेतना के साथ-साथ मानवीय जीवन की अनुभूतियों का प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. सहृदयता और भावुकता-भाई-बहन कविता में भाई-बहन के बीच के प्रेम को राष्ट्रीय प्रेम के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। हृदय के भाव राष्ट्र प्रेम को समर्पित हैं।
  3. उत्कृष्ट रस योजना-गोपाल सिंह नेपाली की कविताएँ देश-भक्ति पर आधारित होने के कारण वीर रस को ही इंगित करती हैं। नए-नए प्रतीकों एवं बिम्बों के माध्यम से अपने भावों को अभिव्यक्त किया है।
  • कला पक्ष
  1. भाषा-गोपाल सिंह नेपाली की भाषा साहित्यिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक है। इनके भाव जनमानस के निकट,सरल और सहज हैं। इनके द्वारा प्रयुक्त भाषा सरल, सहज एवं प्रभावशाली है।
  2. अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश का सुन्दर प्रयोग किया है।
  3. बिम्बों के माध्यम से भाव प्रकाश में अनूठापन आ गया है।
  • साहित्य में स्थान

नेपाली जी की रचनाओं में राष्ट्र-प्रेम उत्कट है। शोषित के प्रति सहानुभूति और स्थितियों से जूझने का सन्देश इनकी कविताओं में दिखाई देता है। नेपाली जी की गणना विशिष्ट राष्ट्रीय कवियों में की जाती है। उन्होंने मानवीय रिश्तों को आधार बनाकर काव्य रचना की है। गीतधारा को आगे बढ़ाने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

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5. घनानन्द

  • जीवन परिचय

घनानन्द हिन्दी की रीति मुक्तकाव्य धारा के कवि हैं। इनका जन्म 1658 ई. और मृत्यु 1739 ई.में मानी जाती है। हिन्दी में घनानन्द और आनन्दघन नाम के दोनों रचनाकारों को पहले एक ही माना जाता था, लेकिन आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने दोनों कवियों का भिन्न-भिन्न होना मान्य कर दिया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने घनानन्द को रीतिमुक्त काव्यधारा का श्रेष्ठ रचनाकार कहा है। रीतिमुक्त काव्यधारा के श्रेष्ठ कवि घनानन्द साक्षात् रसमूर्ति हैं। किवदन्तियों के अनुसार घनानन्द मुहम्मदशाह रंगीले के मीर मुंशी थे। सन् 1739 ई.में नादिरशाह द्वारा किए गए कत्लेआम में ये मारे गए।

  • साहित्य सेवा

घनानन्द लौकिक प्रेम के अनुपमेय कवि थे। विरहजन्य प्रेम की पीर के ये अमर गायक रहे। इनकी वेदना का मूल कारण उनकी प्रेयसी ‘सुजान’ रही है। भक्तिपरक कविताओं में ‘सुजान’ श्रीकृष्ण के सम्बोधन के लिए प्रयोग किया गया है। स्वानुभूत विरह वेदना की विविध स्थितियों के हृदयस्पर्शी चित्र इनके काव्य में अंकित हैं।

  • रचनाएँ

घनानन्द की रचनाएँ अधिकतर मुक्तक रूप में मिलती हैं। इनकी कुछ रचनाएँ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘सुन्दरी तिलक’ पत्रिका में छापी। 1870 में उन्होंने ‘सुजान शतक’ नाम के इनके 119 कवित्त प्रकाशित किए। इसके पश्चात् जगन्नाथ दास रत्नाकर ने सन् 1897 में इनकी ‘वियोग बेलि’ और ‘विरह लीला’ नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित की। ‘घनानन्द कवित्त’, ‘कवित्त संग्रह’, ‘सुजान-विनोद’, ‘सुजान हित’, ‘वियोग बेलि’, ‘आनन्द घन जू’, ‘इश्क लता’, ‘जमुना जल’ और ‘वृन्दावन सत’ आदि इनकी रचनाएँ हैं।

  • भाव पक्ष

(1) इनकी कविता में रसद शृंगार है जिसमें संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सटीक वर्णन है। उन्हें संयोग में भी वियोग दिखाई देता है।

“यह कैसो संयोग न जानि परै जु वियोग न क्यों विछोहत है।” घनानन्द के काव्य में संयोग का चित्रण अति अल्प है। उनके काव्य में वियोग की सभी अवस्थाओं,दशाओं, स्थितियों आदि का स्वाभाविक चित्रण हुआ है।

इन्होंने शब्दों के भावों का हृदय से साक्षात्कार किया है। कला पक्ष

  1. भाषा-उनकी भाषा ब्रज है जो सजीव,लाक्षणिक,व्यंजना प्रचुर तथा व्याकरणसम्मत है। उनकी भाषा फारसी काव्य से प्रभावित होते हुए भी मौलिक है।
  2. ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग किया है।
  3. अलंकार-इनकी रचनाओं में अनुप्रास एवं रूपक का प्रयोग सुन्दर रूप में हुआ है।

इस प्रकार भाषा, छन्द, शैली अलंकार और उसके अनुप्रयोग की दृष्टि से घनानन्द की रचनाएँ अत्यन्त सरस एवं प्रौढ़ हैं।

  • साहित्य में स्थान

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार घनानन्द रीतिमुक्त काव्यधारा के श्रेष्ठ कवि हैं। घनानन्द ने अपने पदों में ‘सुजान’ का इतनी तन्मयता से उल्लेख किया है कि उसका आध्यात्मीकरण हो गया है। सुजान का उनकी प्रेयसी होना ही अधिक उपयुक्त लगता है। सुजान को श्रृंगार पक्ष में नायिका और भक्ति पक्ष में कृष्ण मान लेना उचित होगा।

6. जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’

जीवन परिचय
जगन्नाथदास रत्नाकर’ आधुनिक काल के ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। इन्होंने अपने काव्य में मध्ययुगीन काव्य परम्परा के साथ-साथ भक्ति युग के भाव और रीतिकाल की कला का समन्वय किया है। कविवर रत्नाकर का जन्म सन् 1886 ई.में काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था। बचपन में उर्दू, फारसी, अंग्रेजी की शिक्षा मिली। बी.ए., एल एल.बी.के बाद एम.ए. की पढ़ाई इनकी माता के निधन के कारण पूरी नहीं हो पाई। इनके पिता पुरुषोत्तमदास फारसी भाषा के विद्वान एवं काव्य मर्मज्ञ थे। आपका घर साहित्यकारों का संगम स्थल था। आपको भारतेन्दुजी का सान्निध्य मिला इसके फलस्वरूप इन्होंने उर्दू-फारसी में कविता करना प्रारम्भ कर दिया। 21 जून सन् 1932 को हरिद्वार में इनका देहावसान हो गया।

  • साहित्य सेवा

रत्नाकर द्वारा लिखे गए ऐतिहासिक लेखों, मौलिक कृतियों की रचना और महत्वपूर्ण ग्रन्थों के सम्पादन से उनके गंभीर अध्ययन और मौलिक प्रतिभा का पता चलता है। उन्होंने साहित्य सुधा निधि तथा सरस्वती पत्रिकाओं का सम्पादन किया। रसिक मंडल, प्रयाग तथा काशी नागरी प्रचारणी सभा की स्थापना व विकास में योगदान दिया।

  • रचनाएँ

इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-‘उद्धव शतक’, ‘गंगावतरण, ‘वीराष्टक’, ‘शृंगार लहरी’, ‘गंगा लहरी’, ‘विष्णु लहरी’ ‘हिंडोला’, ‘कलकाशी’, ‘रत्नाष्टक’ आदि। इनके सम्पादित ग्रन्थ हैं ‘बिहारी रत्नाकर’,’हित तरंगिणी’, ‘सूरसागर’ आदि।

  • भाव पक्ष

जगन्नाथदास रत्नाकर ब्रजभाषा के उत्कृष्ट कवि हैं। इनके काव्य में भाों की मार्मिकता तथा कला की अभिव्यंजना परिलक्षित होती है।

  1. रस योजना ब्रजभाषा के भावुक कवि ‘रत्नाकर’ में श्रृंगार रस की प्रधानता मिलती है। उनके प्रमुख काव्य ‘उद्धव शतक’ का मूल रस श्रृंगार ही है। वियोग पक्ष में गोपियों ने उद्धव से कहा है”टूक-टूक है है मन मुकुर हमारौ हाय, चूँकि हूँ कठोर-बैन-पाहन चलावौ ना।” ‘वीराष्टक’ तथा ‘गंगावतरण’ में रौद्र रस की योजना दर्शनीय है। शान्त, करुणा,वात्सल्य, वीभत्स रसों की संयोजना भी दिखाई देती है।
  2. अनुभाव विधानरत्नाकर ने भावों को सबलता प्रदान करने के लिए पात्रों की चेष्टाओं आदि का सुन्दर वर्णन किया है। श्रीकृष्ण का संदेश सुनने के लिए कृष्ण प्रेम में व्याकुल गोपियों की आकुलता देखिए”उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै, पेखि-पेखि पाती छाटी छोहनि छबै लगी।”
  3. भक्ति-भावना रत्नाकर के काव्य में श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति हुई है। गोपियाँ अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पित हैं। उद्धव का ज्ञान गोपियों की सगुण भक्ति के सामने पराजित हो जाता है।
  4. प्रकृति चित्रण-रत्नाकर’ ने अपने काव्य में प्रकृति के अनेक रूप चित्रित किए हैं। प्रकृति के आलम्बन का एक दृश्य देखिए-

“स्वाति घटा घहराति मुक्ति-पानिप सों पूरी।
कैचों धावति झुकति सुभ्र आमा रुचि रुरी।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा रत्नाकर ने अपने काव्य की रचना ब्रजभाषा में की है। भाव के अनुरूप अभिव्यक्ति देने में यह भाषा सक्षम है। इनके काव्य में अर्थ की गम्भीरता, पद विन्यास, वाक् चातुर्य,चमत्कार सौष्ठव,समाहार शक्ति विद्यमान है।
  2. चित्रोपम वर्णन शैली-रत्नाकर’ जी में चित्रात्मक वर्णन शैली के द्वारा विषय को साकार करने की अद्भुत शक्ति है। उदाहरण देखिए
    “कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग पानी रह कोऊ घूमि-घूमि परी भूमि मुरझानी हैं।”
  3. अलंकार विधान-रूपक, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा आदि सभी अलंकारों की शोभा चमत्कारपूर्ण है। ‘रत्नाकर’ का काव्य गत्यात्मक संगीतमय छन्दों में रचित है। कवित्त, रोला, सवैया, दोहा,छप्पय उनके प्रिय छन्द हैं।
  • साहित्य में स्थान

रत्नाकर द्वारा लिखे गए साहित्यिक ऐतिहासिक लेखों मौलिक कतियों और महत्वपर्ण ग्रन्थों के सम्पादन से उनके गम्भीर अध्ययन, अद्वितीय प्रतिभा और सूक्ष्म दृष्टि का अवलोकन होता है। उन्होंने ‘साहित्य सुधानिधि’ तथा ‘सरस्वती’ पत्रिकाओं का सम्पादन किया। रसिक मंडल,प्रयाग तथा काशी नागरी प्रचारणी सभा की स्थापना व उनके विकास में योगदान दिया। ‘रत्नाकर ब्रजभाषा काव्य की महान् विभूति हैं। बाबू श्यामसुन्दरदास ने कहा है “एक विशेष पथ पर परिश्रमपूर्वक चलते-चलते रत्नाकरजी साहित्य में अपनी एक अलग लीक बना गए हैं। इस दृष्टि से वे हिन्दी के एक ऐतिहासिक पुरुष ठहरते हैं।”

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8. कबीरदास [2009, 16]

  • जीवन परिचय

जनभाषा में भक्ति, नीति और दर्शन प्रस्तुत करने वाले कवियों में कबीर अग्रगण्य हैं। कबीरदास जी निर्गुण काव्यधारा के ज्ञानमार्गी शाखा के कवि थे। इनका जन्म काशी में सन् 1398 ई.में हुआ। इनकी रचनाओं से प्रतीत होता है कि इनके माता-पिता जुलाहे थे। जनश्रुति है कि कबीर एक विधवा ब्राह्मणी की परित्यक्त संतान थे। इनका पालन-पोषण एक जुलाहा दम्पत्ति ने किया। इस नि:सन्तान जुलाहा दम्पत्ति नीरू और नीमा ने इस बालक का नाम कबीर रखा। कबीर की शिक्षा विधिवत् नहीं हुई। उन्हें तो सत्संगति की अनंत पाठशाला में आत्मज्ञान और ईश्वर प्रेम का पाठ पढ़ाया गया। स्वयं कबीर कहते हैं-“मसि कागद छुऔ नहीं, कलम गही नहिं हाथ।”

कबीर गृहस्थ थे। इनको स्वामी रामानन्द से ‘राम’ नाम का गुरुमंत्र मिला। उनकी पत्नी का नाम लोई, पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का नाम कमाली था। कबीर पाखण्ड और अन्धविश्वासों के घोर विरोधी थे। कबीर का बचपन मगहर में बीता, परन्तु बाद में काशी में जाकर रहने लगे। जीवन के अन्तिम दिनों में ये पुनः मगहर चले गए। इस प्रकार 120 वर्ष की आयु में सन् 1518 ई. में इनका देहावसान हो गया।

  • साहित्य सेवा

अशिक्षित होते हुए भी कबीरदास अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उनकी रचनाओं को धर्मदास नामक प्रमुख शिष्य ने ‘बीजक’ नाम से संग्रह किया है। डॉ.श्यामसुन्दर दास ने कबीर की रचनाओं को कबीर ग्रन्थावली’ में संगृहीत करके सम्पादित किया है। खुले आकाश के नीचे आस-पास खड़े व बैठे लोगों के बीच अपने अनुभवों को अभिव्यक्त करना ही उनकी उत्कृष्ट साहित्य सेवा थी।

  • रचनाएँ

कबीर की अभिव्यक्तियों को शिष्यों द्वारा तीन रूप में संकलित किया गया है-

  1. साखी,
  2. सबद,
  3. रमैनी।

(1) साखी कबीर की शिक्षाओं और सिद्धान्तों का प्रस्तुतीकरण ‘साखी’ में हुआ है। इसमें दोहा छन्द का प्रयोग हुआ है।
(2) सबद-इसमें कबीर के गेय पद संगृहीत हैं। गेय पद होने के कारण इसमें संगीतात्मकता है। इनमें कबीर ने भक्ति-भावना, समाज सुधार और रहस्यवादी भावनाओं का वर्णन किया है।
(3) रमैनी-रमैनी चौपाई छन्द में है। इनमें कबीर का रहस्यवाद और दार्शनिक विचार व्यक्त हुए हैं।

  • भाव पक्ष
  1. निर्गुण ब्रह्म की उपासना—कबीर निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उनका उपास्य, अरूप, अनाम, अनुपम सूक्ष्म तत्व है। इसे वे ‘राम’ नाम से पुकारते थे। कबीर के ‘राम’ निर्गुण निराकार परमब्रह्म हैं।
  2. प्रेम भावना और भक्ति कबीर ने ज्ञान को महत्व दिया। उनकी कविता में स्थान-स्थान पर प्रेम और भक्ति की उत्कृष्ट भावना परिलक्षित होती है। उनका कहना है-“यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं” और “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय।” इत्यादि।
  3. रहस्य भावना-परमात्मा से विविध सम्बन्ध जोड़कर अन्त में ब्रह्म में लीन हो जाने के भाव अपनी कविता में कबीर ने व्यक्त किए हैं। जैसे – “राम मोरे पिऊ मैं राम की बहुरिया।”
  4. समाज सुधार और नीति उपदेश सामाजिक जीवन में फैली बुराइयों को मिटाने के लिए कबीर की वाणी कर्कश हो उठी। कबीर ने समाजगत बुराइयों का खण्डन तो किया ही, साथ-साथ आदर्श जीवन के लिए नीतिपूर्ण उपदेश भी दिया। कबीर के काव्य में इस्लाम के एकेश्वरवाद, भारतीय द्वैतवाद,योग साधना, अहिंसा, सूफियों की प्रेम साधना आदि का समन्वित रूप दिखाई देता है।

इनके काव्य में शान्त रस की प्रधानता है। आत्मा-परमात्मा के मिलन का श्रृंगार भी शान्त रस ही बन गया है।

  • कला पक्ष
  1. अकृत्रिम भाषा कबीर की भाषा अपरिष्कृत है। उसमें कृत्रिमता का अंश भी नहीं है। स्थानीय बोलचाल के शब्दों की प्रधानता दिखाई देती है। उसमें पंजाबी, राजस्थानी, उर्द, फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का विकृत रूप प्रयोग किया गया है। इससे भाषा में विचित्रता आ गई है। कबीर की भाषा में भाव प्रकट करने की सामर्थ्य विद्यमान है। इनकी भाषा को पंचमेल खिचड़ी अथवा सधुक्कड़ी भी कहा जाता है।
  2. सहज निर्द्वन्द्व शैली-कबीर ने सहज, सरल व सरस शैली में अपने उपदेश दिए हैं। भाव प्रकट करने की दृष्टि से कबीर की भाषा पूर्णतः सक्षम है। काव्य में विरोधाभास,दुर्बोधता एवं व्यंग्यात्मकता विद्यमान है।
  3. अलंकार-कबीर के काव्य में स्वभावतः अलंकारिता आ गई है। उपमा, रूपक, सांगरूपक, अन्योक्ति,उत्प्रेक्षा,विरोधाभास आदि अलंकारों की प्रचुरता है।
  4. छन्द कबीर की साखियों में दोहा छन्द का प्रयोग हुआ है। ‘सबद’ पद है तथा ‘रनी’ चौपाई छन्दों में मिलते हैं। ‘कहरवाँ’ छन्द भी उनकी रचनाओं में मिलता है। इन छन्दों का प्रयोग सदोष ही है।
  • साहित्य में स्थान

कबीर समाज सुधारक एवं युग निर्माता के रूप में सदैव स्मरण किए जायेंगे। उनके काव्य में निहित सन्देश और उपदेश के आधार पर नवीन समन्वित समाज की संरचना सम्भव है। डॉ. द्वारका प्रसाद सक्सैना ने लिखा है-“कबीर एक उच्चकोटि के साधक, सत्य के उपासक और ज्ञान के अन्वेषक थे। उनका समस्त साहित्य एक जीवन मुक्त सन्त के गूढ़ एवं गम्भीर अनुभवों का भण्डार है।”

8. बिहारीलाल [2010]

  • जीवन परिचय

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में बिहारी की गणना बड़े सम्मान के साथ की जाती है। श्रृंगार रस के वर्णन में ये निस्संदेह अद्वितीय कवि हैं। कविवर बिहारी का जन्म संवत् 1652 वि. (सन् 1595 ई) में हुआ। बिहारी के जीवनवृत्त के बारे में उनका निम्न दोहा देखिए-

“जन्म ग्वालियर जानिये, खण्ड बुन्देले बाल।
तरुनाई आई सुखद, मथुरा बसि ससुराल॥”

इनका जन्म गोविन्दपुर नामक ग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम केशवराय था। इनका बचपन बुन्देलखण्ड में बीता। इनका विवाह मथुरा में हुआ और युवावस्था में ससुराल में ही रहे।

बिहारी के गुरु बाबा नरहरदास थे। उन्होंने बिहारी का परिचय सम्राट जहाँगीर से कराया। कुछ समय बाद बिहारी जयपुर चले गए। उन दिनों जयपुर के प्रौढ़ महाराजा जयसिंह ने एक अल्पवयस्का से नया-नया विवाह किया था और राजकाज से विमुख हो गए थे। ऐसी स्थिति में बिहारी ने अग्र दोहा उनके पास पहुँचाया-

“नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल।
अली कली ही सौं बिंध्यो, आगे कौन हवाल॥”

इस दोहे का राजा जयसिंह पर अनुकूल प्रभाव पड़ा और पुनः राजकाज पर ध्यान देने लगे। बिहारी को दरबार में सम्मानपूर्वक स्थान दिया गया। यहाँ रहते हुए बिहारी ने सात सौ तेरह दोहों की रचना की। प्रत्येक दोहे पर उनको एक स्वर्ण मुद्रा प्राप्त होती थी। सं.1720 वि. (सन् 1663 ई) में इनका देहावसान हो गया।

  • साहित्य सेवा

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इनकी एक ही रचना ‘सतसैया’ मिलती है। हिन्दी में समास पद्धति की शक्ति का परिचय सबसे पहले बिहारी ने दिया। श्रृंगार रस के ग्रन्थों से ‘बिहारी सतसई’ सर्वोत्कृष्ट रचना है। श्रृंगारिकता के अतिरिक्त इसमें भक्ति और नीति के दोहों का भी अदभुत समन्वय मिलता है।

  • रचनाएँ

बिहारी ने अपने जीवनकाल में 713 दोहों की रचना की है, जिन्हें ‘बिहारी सतसई’ के नाम से संकलित किया गया। यह अकेला ग्रन्थ ही कवि के रूप में बिहारी की कीर्ति का स्रोत है।

  • भाव पक्ष

विषय-वस्तु के आधार पर बिहारी के दोहों को चार भागों में बाँटा जा सकता है-
(1) शृंगारपरक,
(2) भक्तिपरक,
(3) नीतिपरक,
(4) प्रकृति चित्रण सम्बन्धी।

(1) श्रृंगारपरक दोहे-अधिकतर दोहे शृंगाररस प्रधान हैं। इन्होंने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों को अपने काव्य में स्थान दिया है। बिहारी की नायिका का मुख पूर्णचन्द्र के समान प्रकाशित है और उसके प्रकाश के कारण उसके घर के आस-पास पूर्णिमा ही रहती है। उदाहरण देखिए-

“पत्रा ही तिथि पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यों ही रहत, आनन ओप उजास॥”

(2) भक्ति भावना वृद्धावस्था में बिहारी का मन संसार से विरक्त होकर प्रभु-चरणों में लग जाता है। इस प्रकार के दोहों में शान्त रस प्रधान है। सगुण ब्रह्म के कृष्ण रूप ने उन्हें अधिक आकर्षित किया है

“मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाईं परै, स्याम हरित दुति होय॥”

(3) नीतिपरक दोहेइनके अनेक दोहे नीति और उपदेश को लिए हुए हैं। इन्होंने अपने नीतिपरक दोहों में जीवन की गहरी नीतियों को सरल ढंग से व्यक्त किया है

“दीरघ साँस न लेह, दुःख सुख साँइहि न भूलि।
दई दई क्यों करत है, दई दई सु कबूलि॥”

(4) प्रकृति चित्रण-अपने श्रृंगार चित्रण में बिहारी ने प्रकृति को अधिकतर उद्दीपन के रूप में लिया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रकृति को आलम्बन रूप में भी प्रस्तुत किया है, वे प्रकृति के कुशल पर्यवेक्षक हैं। जेठ की दोपहरी का एक दृश्य देखिए-

“बैठ रही अति सघन वन, पैठ सदन तन माह।
देखि दुपहरी जेठ की, छाँहौ चाहति छाँह।।”

  • कला पक्ष
  1. भाषा-बिहारी की भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है। यह सामान्य जन के लिए भी दुर्बोध नहीं है। इसमें कहीं-कहीं बुन्देलखण्डी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त बिहारी ने पूर्वी, अवधी और अरबी-फारसी के प्रचलित शब्दों को भी अपने काव्य में स्थान दिया है। बिहारी की भाषा सामासिक भाषा है, जिसमें थोड़े में बहुत कुछ कह देनी की सामर्थ्य है।
  2. अलंकार योजना–अन्य रीतिकाल के कवियों की भाँति बिहारी ने भी प्रायः सभी प्रकार के अलंकारों का प्रयोग किया है। लेकिन बिहारी की भाषा में अलंकार भार बनकर नहीं आए हैं। रूपक, उपमा, श्लेष, यमक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति आदि अलंकारों को बड़े स्वाभाविक रूप में अपने काव्य में प्रयुक्त किया है।
  3. छन्द विधान–बिहारी ने अपने काव्य में दोहा छन्द को ही अपनाया है। दो पंक्तियों के छोटे से छन्द में इन्होंने गागर में सागर भर दिया है।
  • साहित्य में स्थान

बिहारी की काव्य प्रतिभा बहुमुखी थी। नख-शिख वर्णन,नायिका भेद,प्रकृति चित्रण,रस, अलंकार सभी कुछ बिहारी के काव्य में उत्कृष्ट है। रचनाओं में कवित्त शक्ति और काव्य रीतियों का जैसा सुन्दर सम्मिश्रण बिहारी में है वैसा किसी अन्य रीतिकालीन कवि में दुर्लभ है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने बिहारी के विषय में सत्य ही कहा है-“जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समास शक्ति जितनी ही अधिक होगी, उतनी ही उसकी मुक्तक रचना सफल होगी। यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से विद्यमान थी।” बिहारी के काव्य में भाव पक्ष और कला पक्ष का अद्भुत सामंजस्य है। उनका हर दोहा ‘गागर में सागर’ है।

9. जयशंकर प्रसाद [2009, 11, 14]

जीवन परिचय
छायावादी काव्य के आधार स्तम्भ जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 में वाराणसी,उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता सुंघनी शाहू वैभवशाली व्यक्ति थे। विलक्षण प्रतिभा के धनी प्रसादजी एक साथ कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबंधकार थे। इनके बाल्यकाल में ही इनके पिता तथा बड़े भाई स्वर्गवासी हो गए। परिणामस्वरूप अल्पावस्था में ही प्रसादजी को घर का सारा भार वहन करना पड़ा। इन्होंने स्कूली शिक्षा छोड़कर घर पर ही अंग्रेजी, हिन्दी, बंगला तथा संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। सुस्थिर होकर कुशलतापूर्वक अपने व्यापार और परिवार को सँभाला और आजीवन अपने उत्तरदायित्व का सफलतापूर्वक निर्वाह करते रहे। साथ-साथ साहित्य सृजन भी करते रहे और अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। इनका देहावसान 15 नवम्बर,सन् 1937 को हुआ।

  • साहित्य सेवा

जयशंकर ‘प्रसाद’ आधुनिक हिन्दी काव्य के सर्वप्रथम कवि थे। सूक्ष्म अनुभूति और रहस्यवादी चित्रण इनके काव्य की विशेषता है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में नया युग ‘छायावादी युग’ के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के प्रवर्तक थे। प्रेम और सौन्दर्य इनके काव्य के प्रमुख विषय रहे।

  • रचनाएँ

प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। गद्य और पद्य,प्रबन्ध और मुक्तक, खण्डकाव्य और प्रबन्ध काव्य और कहानी, नाटक, उपन्यास, निबन्ध तथा आलोचना, कहने का आशय यह है कि साहित्य का कोई भी पक्ष उनसे अछूता नहीं बचा और इन सभी रूपों में उन्होंने अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि के साहित्य का प्रणयन किया है। प्रसाद जी की काव्य कृतियाँ निम्नलिखित हैं

  1. चित्राधार,
  2. कानन कुसुम,
  3. करुणालय,
  4. महाराणा का महत्व,
  5. प्रेम पथिक,
  6. झरना,
  7. आँसू,
  8. लहर,
  9. कामायनी।

‘कामायनी’ छायावाद का महाकाव्य है और ‘आँसू’ प्रसादजी का लोकप्रिय विरह काव्य है।

  • भाव पक्ष
  1. दार्शनिक विचारधारा प्रसाद एक दार्शनिक कवि हैं। उनके महाकाव्य ‘कामायनी’ में आनन्दवाद की प्रतिष्ठा की गई है। यह ग्रन्थ अपनी अद्भुत छटा बिखेरता हुआ भ्रमित मनुष्यों का पथ प्रदर्शन कर रहा है।
  2. प्रेम और सौन्दर्य की विवेचना-प्रसादजी प्रमुखतया प्रेम और सौन्दर्य के उपासक हैं। छायावादी कवि प्रकृति की हर वस्तु में सुन्दरता के दर्शन करता है। प्रसाद द्वारा निरूपित प्रेम में प्रधानता सर्वत्र मानसिक पक्ष की ही है। प्रसाद के द्वारा व्यक्त सौन्दर्य में बाह्य सौन्दर्य और शारीरिक सौन्दर्य का अदभुत सामंजस्य है।

कामायनी का उदाहरण देखिए-

“नील परिधान बीच सुकुमार,
खुला था मृदुल अधखुला अंग,
खिला हो ज्यों बिजली का फूल,
मेघ वन बीच गुलाबी रंग।”

(3) अनुभूतिपूर्ण काव्य-अनुभूति की गहनता काव्य की श्रेष्ठता को प्रदर्शित करती है। प्रसादजी के काव्य में हमें यही गहराई दिखाई देती है। आँसू में प्रेमानुभूति देखिए-

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“रो रो कर सिसक सिसक कर
कहता मैं करुण कहानी,
तुम सुमन नोचते सुनते,
करते जाते अनजानी।”

(4) वेदना की अभिव्यक्ति प्रसाद के काव्य में सर्वत्र एक गहन वेदना की अभिव्यक्ति मिलती है। ‘आँसू’ में तो उनकी गहन वेदनाभूति अपनी सम्पूर्ण गहराई से व्यक्त हुई है, जिसकी पीड़ा पाठक के हृदय को छू जाती है।
(5) कल्पना का अतिरेक व रहस्यवाद-भावानुभूति के साथ-साथ प्रसाद की कविताओं में कल्पना की अधिकता भी है। कंटकाकीर्ण कठोर यथार्थ के सामने अपनी कल्पना का जगत उसे अत्यन्त मधुर प्रतीत होता है। रहस्य की ओर आकर्षण छायावादी कवियों की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। प्रसाद जी प्रकृति के कण-कण में रहस्यमयी सत्ता का आभास पाते और अनुभव करते हैं। पर इस रहस्यमयी सत्ता का रहस्य आखिर में रहस्य ही रहता है।

कामायनी का उदाहरण देखिए-

“हे अनन्त रमणीय ! कौन तुम,
यह मैं कैसे कह सकता, कैसे हो?
क्या हो इसका तो,
भार विचार न सह सकता।”

(6) प्रकृति चित्रण-प्रसादजी के काव्य में प्रकृति के सभी मनोहारी रूपों का बड़ा ही रमणीय चित्रण हुआ है। प्रसाद जी ने प्रकृति को जड़वस्तु के रूप में ग्रहण न कर जीवित और चैतन्य सत्ता के रूप में ग्रहण किया है।
(7) नारी के प्रति श्रद्धा भाव छायावादी कवियों ने नारी को पूर्ण सम्मान दिया है। प्रसादजी ने भी अपने काव्य में नारी के सभी रूपों को दर्शाते हुए इस बात का ध्यान रखा है कि उसके सम्मान में कहीं कमी न आने पाए।

  • कला पक्ष
  1. भाषा-प्रसादजी के काव्य की भाषा व्याकरणसम्मत, परिष्कृत एवं परिमार्जित खड़ी बोली है। संस्कृत शब्दों की बहुलता होने पर भी भाषा क्लिष्ट अथवा दुरूह नहीं हुई है। भावों की गहराई और कवि कौशल के कारण प्रसादजी की लाक्षणिक और व्यंजनामयी भाषा में चित्रोपमता आ गई है।
  2. अलंकारों का प्रयोग-प्रसादजी की भाषा में अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है। उनका प्रयोग इतना सहज है कि वे सर्वत्र काव्य के सौन्दर्य को स्पष्ट करते हैं। शब्दालंकारों और अर्थालंकारों के साथ-साथ उन्होंने मानवीकरण, विशेषण विपर्यय और ध्वन्यार्थ व्यंजना आदि पाश्चात्य अलंकारों को भी मुक्त हृदय से अपनाया है।
  3. छन्द योजना प्रसादजी ने अपने काव्य में परम्परागत छन्दों के साथ ही साथ नये-नये छन्दों को लिखकर मौलिकता का परिचय दिया है। ‘आँसू’ में प्रयुक्त छन्द आँसू छन्द ही कहा जाने लगा।
  • साहित्य में स्थान

भाव पक्ष और कला पक्ष की दृष्टि से प्रसादजी का काव्य उच्चकोटि का है। निःसन्देह प्रसाद हिन्दी के युग प्रवर्तक साहित्यकार एवं छायावादी कवि हैं। नूतनता की काव्यधारा को प्रवाहित करने का श्रेय जयशंकर प्रसाद को ही है। प्रसादजी की शैली काव्यात्मक चमत्कारों से परिपूर्ण है।

10. भवानी प्रसाद मिश्र [2016]

जीवन परिचय
भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म सन 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के टिगरिया ग्राम में हुआ था। कविता और साहित्य के साथ-साथ राष्ट्रीय आन्दोलन में जिन कवियों की भागीदारी थी उनमें श्री मिश्रजी प्रमुख थे। इनके पिता का नाम श्री सीताराम मिश्र तथा माँ का नाम श्रीमती गोमती देवी था। इन्होंने खण्डवा, बैतूल आदि से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर जबलपुर के ऐवर्टसन कालेज से बी.ए.परीक्षा पास की। स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सन् 1942 ई.में इन्होंने जेल यात्रा की। प्रारम्भ में इन्होंने वर्धा में महिला आश्रम में अध्यापन कार्य किया तथा ‘कल्पना’ नामक पत्रिका का सम्पादन किया। तत्पश्चात् आकाशवाणी में सेवारत रहे। 1985 ई.में इनका देहावसान हो गया।

  • साहित्य सेवा

भवानी प्रसाद मिश्र की कविता हिन्दी की सहज लय की कविता है। भाषा में भावाभिव्यक्ति की अपूर्व क्षमता है। इनकी रचनाएँ मुक्त छंद में लिखी गई हैं। मिश्रजी को सच्चा कवि हृदय प्राप्त है। हिन्दी के नए कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। गाँधीवाद से प्रभावित मिश्रजी के काव्य में मानव कल्याण के स्वर मुखरित हुए हैं। प्रयोगवाद एवं नयी कविता के कवियों में इनका सम्माननीय स्थान है।

  • रचनाएँ

भवानी प्रसाद मिश्र की प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं—’गीत फरोश’, ‘सतपुड़ा के जंगल’, ‘सन्नाटा’, ‘चकित है दुःख’, बनी हुई रस्सी’,’खुशबू के शिलालेख’, अनाम तुम आते हो’, इन्द्र कुसुम’, ‘गाँधी पचशती’, ‘त्रिकाल संध्या’, ‘कालजयी’, ‘संप्रति’, ‘जल रही हैं सड़कों पर बत्तियाँ’ आदि।

  • भाव पक्ष
  1. भाषा-मिश्रजी की भाषा सहज एवं सरल है। उनकी भाषा भावाभिव्यक्ति में सशक्त है। इन्होंने अपने काव्य में मुक्त छन्द को अपनाया है। अपने भावों को सहज, सरल भाषा शैली में व्यक्त करने में मिश्रजी कुशल रहे हैं।
  2. अपूर्व प्रकृति चित्रण-इनकी कविताओं में अनुपम प्रकृति चित्रण को भी स्थान दिया गया है। सतपुड़ा के जंगल इनको प्रभावित करते हैं।
  3. अनुभूतिपूर्ण काव्य-इनकी कविताओं में अपनी अनुभूति को कल्पना का जामा पहनाकर अभूतपूर्व बना दिया गया है। इनके काव्य में भावाभिव्यक्ति की सशक्त योजना है।
  4. वेदना की अभिव्यक्ति-इनके काव्य में कहीं-कहीं वेदना की अभिव्यक्ति बड़ी अनूठी बन पड़ी है जो पाठकों के हृदय तक पहुँचने में समर्थ है। प्रतीकों का प्रयोग भी मार्मिक बन पड़ा है।
  • कला पक्ष
  1. अभिव्यक्ति की कशलता मिश्रजी की भाषा में सहजता और सरलता मिलती है। भाषा में भावाभिव्यक्ति की अपूर्व क्षमता है। इनके भावों में गहराई होते हुए भी वे सरलता लिए हुए है। चिन्तनशीलता इनकी रचनाओं का विशिष्ट गुण है। अपने नए-नए भावों को कविता की पंक्तियों में पिरोकर पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।
  2. अलंकारों और महावरों का प्रयोग मिश्रजी ने अपनी कविता में अलंकारों, लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रयोग किया है। अनेक प्रतीकों के माध्यम से नए-नए विचारों को समझाने का कार्य किया है।
  3. गाँधीवादी विचारधारा-मिश्रजी ने गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित होने के कारण अपनी कविताओं में गाँधी दर्शन का प्रभाव छोड़ा है। इनकी कविताओं में वैयक्तिकता और आत्मानुभूति दृष्टिगोचर होती है। इनकी गीतफरोश नामक कविता अत्यन्त चर्चित रही।

उसकी कुछ पंक्तियाँ देखिए-

“जी हाँ हुजूर मैं गीत बेचता हूँ।
मैं तरह-तरह के किसिम किसिम के गीत बेचता हूँ।
जी पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको
पर पीछे-पीछे अकल जगी मुझको
जी लोगों ने तो बेच दिए ईमान
जी आप न हों सुनकर ज्यादा हैरान
मैं सोच समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ।”

  • साहित्य में स्थान

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पं. भवानी प्रसाद मिश्र प्रयोगशील एवं नई कविता के लोकप्रिय कवि हैं। इनकी कविताओं में एक ऐसी सरलता और ताजगी है.जो आज के किसी अन्य कवि में दिखाई नहीं देती। गाँधीवाद से प्रभावित मिश्रजी की कविताओं में मानव कल्याण के स्वर मुखरित हुए हैं। प्रयोगवाद एवं नयी कविता के कवियों में इनका प्रशंसनीय स्थान है। इन्होंने सहज और सरल भाषा शैली में अपने विचारों को व्यक्त करके अपनी कविता को आत्मीय वार्तालाप तथा आत्मानुभव के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

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MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध छन्द

MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध छन्द

छन्द दो प्रकार के होते हैं :

  1. मात्रिक छन्द,
  2. वर्णिक छन्द।

(1) मात्रिक छन्द-पहले प्रकार के छन्द में मात्राएँ गिनी जाती हैं जिन्हें मात्रिक छन्द कहते हैं। इसमें इस प्रकार की मात्राएँ होती हैं
लघु मात्रा – ।
गुरु मात्रा – ऽ

लघु मात्रा को गिनते समय 1 और गुरु मात्रा को 2 माना जाता है। अब लघु और दीर्घ किसे कहेंगे। वह समझ लें।
“सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्, वर्ण: संयोग पूर्वाश्च पादान्त गोऽपि वा।”

तात्पर्य यह कि बिना मात्रा या छोटी (ह्रस्व) मात्रा के अक्षर को लघु मानेंगे तथा अनुस्वार वाले, विसर्ग वाले, दीर्घ मात्रा वाले, संयुक्त अक्षर के पहले का अक्षर तथा कभी-कभी अन्तिम चरण का अन्तिम अभार ‘गुरु’ ऽ मात्रा वाला कहलाता है।

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जैसे-
।।। ऽ।। ऽ।
कमल यह 3 मात्रा मानेंगे। चंचल यह 4 मात्रा होगी। दुःख यह भी विसर्ग के कारण
ऽऽऽ
दो अक्षर होने पर 3 मात्रा गिनेंगे। सम्पत्ति = छ: मात्रा होंगी, क्योंकि स पर मात्रा नहीं है फिर भी आगे संयुक्त अभार होने से सऽ गुरु माना जायेगा।

(2) वर्णिक छन्द-वर्णिक छन्द में मात्रा तो वैसे ही गिनते हैं, किन्तु इसमें गण होते हैं। इसे आप इस सूत्र से याद रख सकते हैं :

  • ‘यमाताराजभानसलगा।
  • प्रत्येक गण तीन अक्षर होता है।
  • यगण (यमाता) ।ऽऽ
  • मगण (मातारा) ऽऽऽ
  • तगण (ताराज) ऽऽ।
  • रगण (राजभा) ऽ।ऽ
  • जगण (जभान) ।ऽ।
  • भगण (भानस) ऽ।।
  • नगण (नसल)।।।
  • सगण (सलगा)।।ऽ

और अन्त में ल= लघु के लिए एवं गा (गुरु के लिए) प्रयुक्त है।

1. कवित्त [2009, 16]

इसके अनेक रूप हैं। कवित्त या मनहरण के प्रत्येक चरण में इकत्तीस वर्ण होते हैं,सोलह और पन्द्रह वर्गों पर विराम होता है। चरण के अन्त में गुरु रहता है।

उदाहरण-
झहरि-झहरि झीनी बूंद हैं परति मानो,
घहरि-घहरि घटा घेरी है गगन में।
आनि कयौं स्याम मोसों चलौ झूलिबे को आज,
फूलि न समानी भई, ऐसी हौं मगन में।
चाहति उद्योई उठि गयी सो निगोड़ी नींद,
सोय गए भाग मेरे जागि वा जगन में।
ऑखि खोल देखौ तौ न घन हैं न घनस्याम,
वेई छाई बूंदें मेरे आँसू है दृगन में।

2. सवैया [2009]

सवैया गण छन्द है। बाइस से लेकर छब्बीस वर्षों तक के वृत्त सवैया कहलाते हैं। इस छन्द के मुख्य भेद मदिरा, चकोर,मत्तगयंद,अरसात, किरीट, दुर्मिल, सुन्दरी, मुक्तहरा आदि 7-8 प्रकार के होते हैं।

यहाँ दुर्मिल सवैया का उदाहरण दिया जा रहा है, जिसके प्रत्येक चरण में आठ सगण होते हैं। इसका दूसरा नाम ‘चन्द्रकला’ भी है।

उदाहरण-
पुर से निकसी रघुवीर-वधू धरि-धीर दये मग में डग द्वै।
झलकी भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गये मधुराधर द्वै।
फिर बूझति हैं चलनौ अब केतकि पर्णकुटी करिहौ कित है।
तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चली जल च्वै॥

(1) मत्तगयंद सवैया [2010, 12]
इसके प्रत्येक चरण में सात भगण और दो गुरु होते हैं।

उदाहरण-
या लकुटी अरु कमरिया पर राज तिहुँपुर को तज डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौं निधि को सुख नन्द की गाय चराइ विसारौं।
रसखान कबौं इन आँखिन सौं ब्रज के वन बाग तड़ाग निहारौं।
कौटिक हूँ कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर बारौं।।

(2) दुर्मिल सवैया दुर्मिल सवैया के हर चरण में आठ सगण पाये जाते हैं। वर्ण संख्या 24 मानी गयी है। इसका दूसरा नाम चन्द्रकला भी है।

उदाहरण-
इसके अनुरूप कहैं किसको, वह कौन सुदेश समुन्नत है।
समझे सुरलोक समान इसे, उनका अनुमान असंगत है।
कवि कोविद वृन्द बखान रहे, सबका अनुभूत यही मत है।
उपमान विहीन रचा विधि ने, बस भारत के सम भारत है।

3. छप्पय [2009]
छप्पय छन्द रोला और उल्लाला छन्दों के मिलने से बनता है। प्रथम चार चरण रोला छन्द के और शेष दो चरण उल्लाला छन्द के होते हैं। इस प्रकार,प्रथम चार चरणों में 24-24 मात्रायें होती हैं और 11-13 पर यति होती है। अन्तिम दोनों चरणों में 28-28 मात्रायें होती हैं और 15-13 पर यति होती है।

उदाहरण-
(1) सर्वभूत हित महामन्त्र का सबल प्रचारक।
सदय हृदय से एक-एक जन का उपकारक।
सत्यभाव से विश्व-बन्धुता का अनुरागी।
सकल सिद्धि सर्वस्व सर्वगत सच्चा त्यागी।
उसकी विचारधारा धरा के धर्मों में है वही। उल्लाला
सब सार्वभौम सिद्धान्त का आदि प्रवर्तक है वही॥

(2) नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है,
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मण्डप है,
बन्दीजन खग-वृन्दृ शेष फन सिंहासन है।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस देश की,
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की।

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(3) निर्मल तेरा नीर अमृत के सम उत्तम है,
शीतल मन्द सुगन्ध पवन हर लेता श्रम है।
षट ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है,
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है।
शुचि सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश,
हे मातृभूमि दिन में परणि करता तम का नाश।

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MP Board Class 12th Special Hindi काव्य-बोध अलंकार

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1. यमक अलंकार।

यमक का सामान्य अर्थ है दो। अत: जब एक ही शब्द की भिन्न अर्थ में आवृत्ति होती है, वहाँ यमक अलंकार होता है।
जैसे-

(1) कनक-कनक ते सौ गुणी मादकता अधिकाय।
या पाये बौरात नर वा खाये बौराय॥ [2014]

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यहाँ कनक शब्द दो बार आया है। एक कनक का अर्थ है सोना और दूसरे कनक का अर्थ है धतूरा।

(2) मूरति मधुर मनोहर देखी।
भयउ विदेह विदेह विसेखी।

जहाँ एक विदेह का अर्थ है राजा जनक और दूसरे विदेह का अर्थ है देह रहित अर्थात् शरीर की सुधबुध खो देना।

(3) ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहनहारी,
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती हैं।
कन्द-मूल भोग करें, कन्द मूल भोग करें,
तीन बेर खाती थीं वे तीन बेर खाती हैं।
भूखन सिथिल अंग, भूखन सिथिल अंग,
विजन डुलाती थीं वे विजन डुलाती हैं।
भूखन भणत सिवराज वीर तेरे त्रास,
नगन जड़ाती थीं वे नगन जड़ाती हैं।

पद या वाक्य खण्ड बार-बार आये पर अर्थ भिन्न हो।

(4) बसन हमारौ, करहु बस; बस न लेहु प्रिय लाज,
बसन देहु ब्रज में हमें, बसन देहु ब्रजराज।

यहाँ बस और बस में अधिकार तथा समाप्ति का अर्थ है। बसन अर्थात् वस्त्र और बसन-निवास करना।

यमक का प्रयोग कभी-कभी एक-से पदों को भंग करके उनके अर्थ करने में होता है।

जैसे-
वर जीते सर मैन के ऐसे देखे मैं न।
हरिनी के नैनान तें हरी नीके ये नैन।

मैन = कामदेव। मैं न = मैंने नहीं। हरिणी = मृगी के। हरी नीके = हरि (कृष्ण) अच्छे हैं।

2. श्लेष अलंकार

काव्य में जहाँ एक शब्द के एक से अधिक अर्थ निकलते हैं वहाँ श्लेष अलंकार होता है। श्लेष शब्द का अर्थ है चिपका हुआ अर्थात् एक से अधिक अर्थ चिपके रहते हैं। जैसे
(1) रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे मोती मानस चून॥ [2015]

इस दोहे में पानी के तीन अर्थ हैं।
1. मोती का पानी = मोती की आभा या चमक।
2. मनुष्य का पानी = मनुष्य की आभा या चमक प्रतिष्ठा।
3. चूने का पानी = चूने में पानी (बिना पानी के चूना सूखकर व्यर्थ हो जाता है)।

(2) चरण धरत चिला करत चितवत चारिहूँ ओर।
सुबरन की चोरी करत कवि व्यभिचारी चोर॥

यहाँ ‘चरण’ और ‘सुबरन’ में श्लेष है।

(3) अज्यौं तरौ ना ही रह्यो, स्रुति सेवत इक अंग।
नाक बास बेसर लह्यौ, बसि मुकतनु के संग॥

इसमें इस प्रकार दो अर्थ हैं। तरौ ना ही = तरौना नामक कर्णाभूषण तथा तरा नहीं = मोक्ष नहीं पाया। स्रुति = वेद,कान। नाक = नासिका,स्वर्ग। बेसर = नथ कान का आभूषण, अनुपम। मुकतनु = मोती, मुक्त पुरुषों के संग।

(4) चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गम्भीर।
को घटि ये वृषभानुजा, ये हलधर के बीर।

1. वृषभ+ अनुजा = बैल की बहन।
2. वृषभानु + जा = वृषभानु की पुत्री राधा।
3. हलधर के बीर = हल धारण करने वाले बैल के भाई। हलधर के बीर = बलदाऊ के भाई कृष्ण। राधा कृष्ण से परिहास किया है।

(5) गुन ते लेत रहीमजन सलिल कूप ते काढ़ि।
कूपहूँ ते कहुँ होत है, मन काहुँ को बाढ़ि।
यहाँ गुन शब्द के दो अर्थ हैं-सद्गुण और रस्सी।

3. व्याजस्तुति। [2011, 13, 16]

जिस वर्णन में देखने में तो निन्दा-सी प्रतीत होती है,पर वास्तव में उसके विपरीत स्तुति का तात्पर्य हो उसे व्याजस्तुति अलंकार कहते हैं। व्याज अर्थात् बहाने, स्तुति यानी प्रशंसा।
जैसे-
“जमुना तुम अविवेकिनी,
कौन लियौ यह ढंग।
पापिन सौं निज बन्धु को,
मान करावति भंग॥”

इस वर्णन में शब्दों के अर्थों से तो यमुनाजी की निन्दा प्रतीत होती है,जो पापियों से अपने भाई यमराज का मान भंग कराती है,पर वास्तव में पुण्य-सलिला यमुना की महिमा का वर्णन है, जिसमें स्नान करने से पापियों के पापों का हरण हो जाता है और वे यमलोक या नरक में नहीं जाते।

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4. व्याजनिन्दा [2011]

जिस वर्णन में देखने में स्तुति प्रतीत हो,पर वास्तव में उसमें विपरीत निन्दा का तात्पर्य हो, उसे व्याजनिन्दा अलंकार कहते हैं। जैसे
नाक कान बिनु भगिनि तिहारी,
छमा कीन्ह तुम धर्म विचारी।
लाजवन्त तुम सहज सुभाऊ,
निज गुन निज मुख कहसिन काऊ॥

हनुमानजी के इस कथन से स्तुति-सी प्रतीत होती है, पर यथार्थ में इसमें कायर और निर्लज्ज होने का तात्पर्य निकलता है, जिसमें निन्दा है।

5. अन्योक्ति

जहाँ किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु को लक्ष्य में रखकर कोई बात किसी दूसरे के लिए कही जाती है, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है। जैसे
(1) स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखि विहंग विचारि।
बाज पराए पानि परि तूं पच्छीनु न मारि॥

हे बाज पक्षी ! रों के हाथ में पड़कर पक्षियों को मत मार। इससे तेरा न तो कोई स्वार्थ सिद्ध होता है और न तुझे पुण्य मिलता है। तेरा यह श्रम व्यर्थ ही है।

बिहारी कवि का यह कथन राजा जयसिंह के लिए है,जो औरंगजेब की ओर से हिन्दुओं के विरुद्ध युद्ध करते थे। सीधे न कहकर भ्रमर के माध्यम से कहा है :

(2) नहीं परागु, नहिं मधुर-मधु, नहिं विकास, इहिं काल।
अली कली ही सौं बिंध्यौ, आगे कौन हवाल॥

(3) करि फुलैल की आचमनु मीठो कहत सराहि।
ए गन्धी ! मतिमन्ध तू इतर दिखावत काहि।

यहाँ कवि का प्रस्तुत विषय तो यह है कि कोई गुणी व्यक्ति मूों के समाज में पहुँच गया है और उन मों को उपदेश दे रहा है जो उसे समझते नहीं। पर कवि इस बात को सीधे न कहकर किसी इत्र बेचने वाले के माध्यम से कह रहा है।

(4) माली आवत देखकर कलियन करी पुकार।
फूले-फूले चुन लिए, कालि हमारी बार॥

यहाँ कबीरदास जी ने नश्वर जीवन के बारे में कली और फूल के माध्यम से अपनी बात कही है। एक न एक दिन सबको जाना है।

6. विभावना [2010]

जहाँ कारण के बिना या कारण के विपरीत कार्य की उत्पत्ति का वर्णन किया जाये, वहाँ विभावना अलंकार होता है। जैसे

(1) बिनु पद चलै, सुने बिनु काना,
कर बिनु करम करै विधि नाना।
आनन-रहित सकल रस भोगी,
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।

चलना, सुनना,करना और खाना ये सब पैर,हाथ,कान,सुख के काम हैं। यहाँ बिना कारण के कार्य है।

(2) सखि, इन नैनन,ते घन हारे,
बिनु ही रितु बरसत निसि-बासर, सदा मलिन दोऊ तारे।

यहाँ पर वर्षा ऋतु के न होने पर भी नेत्रों से आँसुओं की वर्षा हो रही है।

(3) बिनु घनस्याम धामु धामु ब्रज मण्डल के
ऊधो नित बसति बहार वर्षा की।

वर्षा के लिए मेघों का कारण आवश्यक है परन्तु यहाँ बिना बादलों के ही ब्रज के घर-घर में वर्षा होती है। यहाँ घनश्याम से अर्थ श्रीकृष्ण तथा घने श्यामवर्ण बादल से है।

7. व्यतिरेक।

जहाँ उपमेय को उपमान से भी श्रेष्ठ बताया जाये,वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। जैसे
(1) स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहाँ,
किन्तु सुरसरिता कहाँ, सरयू कहाँ?
वह मरों को मात्र पार उतारती,
यह यहीं से जीवितों को तारती।

(2) जनम सिन्धु पुनि बन्धु विषु,
दिन मलीन सकलंक॥
सिय मुख ममता पाव किमि,
चन्द बापुरो रंक॥

(3) सन्त-हृदय नवनीत समाना,
कहौं कवनि पर कहै न जाना।
निज परिताप द्रवै नवनीता,
पर दुःख द्रवै सुसंत पुनीता॥

यहाँ सन्तों (उपमेय) को नवनीत (उपमान) से श्रेष्ठ प्रतिपादित किया गया है।

(4) सिय सुबरन, सुखमाकर, सुखद न थोर
सीय अंग सखि ! कोमल कनक कठोर।

यहाँ सीता के शरीर को सुवर्ण के समान बताकर भी सीता के अंग में स्वर्ण की अपेक्षा कोमलता की विशेषता बतायी है।

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(5) सिय मुख सरद कपल जिमि किमि कहि जाय।
निसी मलीन वह निसिदन यह विगसाय।

शरद कमल तो रात्रि में मुरझा जाता है किन्तु सीता का मुख दिन-रात खिला रहता है।

8. विशेषोक्ति [2010]

जहाँ कारण के उपस्थित होने पर भी कार्य नहीं होता,वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है।

जैसे-
(1) अब छूटता नहीं छुड़ाये, रंग गया हृदय है ऐसा,
आँसू से धुला निखरता यह रंग अनौखा कैसा।

(2) इन नैननि को कछु उपजी बड़ी बलाय,
नीर भरे नित प्रति रहें, तऊ न प्यास बुझाय।

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