MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 7-12)

7. विष्णु प्रभाकर

  • जीवन-परिचय

एकांकी कला के क्षेत्र में नवीनता का संचार करने वाले विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, सन् 1912 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के अन्तर्गत मीरनपुर नामक ग्राम में हुआ। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा मुजफ्फरनगर में ही सम्पन्न हुई। आपने बी. ए. की परीक्षा पंजाब विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। हिन्दी की प्रभाकर परीक्षा उत्तर्ण करने पर आपके नाम के साथ ‘प्रभाकर’ स्थायी रूप से जुड़ गया। आपने आकाशवाणी के दिल्ली केन्द्र पर ड्रामा प्रोड्यूसर के रूप में कार्य किया है। आज भी आप साहित्य सृजन में संलग्न हैं।

  • साहित्य-सेवा

विष्णु प्रभाकर वर्षों तक आकाशवाणी के दिल्ली केन्द्र पर ड्रामा प्रोड्यूसर रहे। इसलिए आपकी नाट्य कला में विकास एवं परिष्कार होता गया। आपने पर्याप्त मात्रा में रेडियो रूपक लिखे। आपने बाल भारती’ पत्रिका का सफल सम्पादन किया।

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  • रचनाएँ

बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न प्रभाकर जी ने नाट्य साहित्य के अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रावृत, निबन्ध, बाल-साहित्य आदि का विपुल साहित्य सृजित किया है। ‘इन्सान संघर्ष के बाद’, ‘प्रकाश और परछाई’, ‘गीत और गोली’, ‘स्वाधीनता संग्राम’, ‘ऊँचा पर्वत गहरा सागर’, ‘मेरे श्रेष्ठ रंग एकांकी’ आदि आपके उल्लेखनीय एकांकी संग्रह हैं।

  • वर्ण्य विषय

विषय वस्तु की दृष्टि से आपके एकांकी इस प्रकार विभक्त किए जा सकते हैं

  1. सामाजिक-‘बन्धन मुक्त पाप’, ‘इन्सान’, ‘साहस’, ‘वीर पूजा’, ‘नया समाज’, ‘नये पुराने’, ‘प्रतिशोध’, ‘देवताओं की घाटी’ आदि।
  2. मनोवैज्ञानिक-‘ममता का विष’, भावना और संस्कार’,’जज का फैसला’, हत्या के बाद’ आदि।
  3. राजनीतिक-‘हमारा स्वाधीनता संग्राम’, ‘क्रान्ति’, ‘काँग्रेसमैन बनो’ आदि।
  4. पौराणिक-‘जन्माष्टमी’, ‘नहुष का पतन’, ‘शिवरात्रि’, ‘गंगा की गाथा’,’कंस मर्दन’, ‘सम्भवामि युगे-युगे’ आदि।
  5. हास्य व्यंग्य प्रधान-‘मूर्ख’, ‘पुस्तक कीट’, कार्यक्रम’, ‘प्रो. लाल’ आदि।

इसके अतिरिक्त ‘नया कश्मीर’, ‘पंचायत’ आदि विविध विषयक एकांकी आपने लिखे हैं।

  • भाषा

प्रभाकर जी की भाषा सरल, सुबोध साहित्यिक खड़ी बोली है। तत्सम प्रधान भाषा में तद्भव, विदेशी तथा देशज शब्दों का प्रयोग भी आवश्यकतानुसार किया गया है। वाक्य संरचना सुस्पष्ट एवं सुगठित है। भाषा विषय एवं पात्रों के अनुरूप बदलती चलती है। आपकी भाषा में सम्प्रेषण की अपूर्व क्षमता है।

  • शैली

विष्णु प्रभाकर की शैली के अन्यान्य रूप देखे जा सकते हैं

  1. संवाद शैली-आपने संवाद शैली का बड़ा प्रभावी प्रयोग अपने एकांकियों में किया है। संवाद संक्षिप्त तथा चुटीले होते हैं। पात्र एवं विषय के अनुरूप उनके रूप बदलते रहते हैं।
  2. व्यंग्यात्मक शैली-प्रभाकर जी के एकांकियों में व्यंग्य के बड़े ही सटीक पुट देखे जा सकते हैं। उनके व्यंग्य पाठकों के हृदय पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली का प्रयोग भाव प्रबल स्थलों पर देखा जा सकता है। अतिशय भावुकता से परिपूर्ण इस शैली में सम्प्रेषणीयता निरन्तर बनी रहती है।

इसके अतिरिक्त आपकी शैली पर रेडियो रूपक शैली का पर्याप्त प्रभाव देखा जा सकता है।

  • साहित्य में स्थान

राष्ट्रीय चेतना और समाज-सुधार को अपने नाट्य साहित्य का विषय बनाने वाले विष्णु प्रभाकर ने ब्रिटिश शासन के कोप के कारण नौकरी छोड़कर लेखन को ही जीविका का साधन बनाया। बहुविध रचनाकार प्रभाकर जी का वर्तमान हिन्दी रचनाकारों में सम्मानजनक स्थान है।

8. जगदीश चन्द्र माथुर। [2010, 16]

  • जीवन-परिचय

जगदीश चन्द्र माथुर का जन्म 16 जुलाई, 1917 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा नगर में हुआ। शिक्षक पिता से प्राप्त संस्कारों ने आपको लेखन की प्रेरणा दी। आपने हाईस्कूल स्तर के अध्ययन काल से ही नाटक लिखना, अभिनय करना, मंच व्यवस्था आदि में रुचि लेना प्रारम्भ कर दिया था। आपने प्रयाग विश्वविद्यालय से एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। आप आई. ए. एस. की परीक्षा में बैठे और सफल हुए। आई. ए. एस. अधिकारी के रूप में आपने अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। आपने बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, तिरहुत डिवीजन के कमिश्नर, आकाशवाणी के महानिदेशक, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव, कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव आदि राजकीय पदों पर कार्य किया। वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए भी ये साहित्य-सर्जन में संलग्न रहे। 14 मई, 1978 को आप इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गये।

  • साहित्य-सेवा

प्रारम्भ से ही अभिनय के प्रति आकर्षण होने के कारण आपका नाटकों के प्रति विशेष जुड़ाव रहा। विद्यार्थी जीवन से ही आपका लेखन प्रारम्भ हो गया था। प्रयाग विश्वविद्यालय में आपके प्रयास से ही रंगमंच पर अभिनीत होने वाले हिन्दी नाटकों की प्रस्तुतियों को गति प्राप्त हुई। आपका प्रथम एकांकी ‘मेरी बाँसुरी’ विश्वविद्यालय के ‘म्योर होस्टल’ के मंच पर अभिनीत हुआ। आकाशवाणी के महानिदेशक तथा नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के अध्यक्ष पदों पर रहते हुए आपने साहित्य सृजन के साथ-साथ नाट्य विधाओं के विकास का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। आप केन्द्रीय गृह मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार रहे।

  • रचनाएँ

जगदीश चन्द्र माथुर का प्रथम एकांकी ‘मेरी बाँसुरी’ सन् 1936 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। सन् 1937 से 1943 तक लिखे गये एकांकी ‘भोर का तारा’ संग्रह में प्रकाशित हुए। इसमें पाँच एकांकी संकलित हैं। फिर तो लेखन और प्रकाशन क्रम चलता रहा। आपकी प्रमुख रचनाएँ हैं एकांकी संग्रह-‘भोर का तारा’ एवं ‘ओ मेरे सपने’।

अन्य प्रमुख एकांकी-‘कोणार्क’,
‘शारदीया’, ‘बन्दी’ आदि।
चरित्र निबन्ध-‘दस तस्वीरें।
इसके अतिरिक्त ‘बोलते क्षण’
आदि रचनाएँ भी हिन्दी जगत् में चर्चित रही हैं।

  • वर्ण्य विषय

भावभूमि की दृष्टि से आपके एकांकी ऐतिहासिक और सामाजिक हैं। आपने इतिहास के पृष्ठों से चयनित गौरवपूर्ण चरित्रों और मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया है। सामाजिक एकांकियों में आपने आधुनिक सभ्य समाज की मानवीय दुर्बलताओं और नैतिक खोखलेपन का सफल चित्रण किया है। रूढ़ियों और पुरातनता पर आपने करारे प्रहार किए हैं। समाज की विसंगतियों को उजागर करते हुए आपने मानव समाज को सोचने के लिए विवश कर सराहनीय कार्य किया है।

  • भाषा

जगदीश चन्द्र माथुर ने सरल, सुबोध खड़ी बोली में साहित्य रचना की है। विषय, पात्र तथा अवसर के अनुरूप शब्दावली एवं मुहावरों आदि का प्रयोग करने में आप कुशल हैं। पात्रों के संवादों में चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित करने की पूर्ण क्षमता है। सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित रचनाओं की भाषा तत्सम प्रधान है तथा सामाजिक एकांकियों में व्यावहारिक खड़ी बोली को अपनाया है। आपकी भाषा में सम्प्रेषण की अद्भुत क्षमता है।

  • शैली

माथुर जी की शैली के प्रमुख रूप इस प्रकार हैं

  1. संवाद शैली-माथुर जी ने अपनी नाट्य कृतियों में इस शैली का प्रयोग किया है। संवाद विषय के अनुसार दीर्घ एवं लघु आकार के लिखे गये हैं। पात्र के अनुरूप कथन आपके एकांकियों की विशेषता है।
  2. व्यंग्य शैली-आपने अपने एकांकियों में व्यंग्य शैली के बड़े प्रभावी प्रयोग किए हैं। इस शैली की विशेषता यह है कि पाठक व्यंग्य को भूल नहीं पाता है।
  3. यथार्थवादी शैली-माथुर जी ने अपने एकांकियों में यथार्थवादी शैली में अनेक समस्याओं का सजीव चित्रण किया है। वे इन समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करते हैं।
  • साहित्य में स्थान

जगदीश चन्द्र माथुर को रंगमंच का बड़ा व्यापक ज्ञान था, यही कारण था कि आपके सभी एकांकी अभिनेय हैं। मात्रा की दृष्टि से भले ही विपुल साहित्य का सृजन आपने न किया हो किन्तु गुणवत्ता के आधार पर हिन्दी नाट्य साहित्य में आपका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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9. हरिशंकर परसाई
[2008, 09, 12, 13, 15, 17]

  • जीवन-परिचय

हिन्दी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्म का मध्य प्रदेश में इटारसी के निकट जमानी नामक ग्राम में 22 अगस्त, 1924 को हुआ था। आपने स्नातक स्तर तक की शिक्षा इटारसी में ही प्राप्त की तत्पश्चात् नागपुर विश्वविद्यालय से एम. ए. हिन्दी की परीक्षा उत्तीर्ण की। कुछ वर्षों तक आपने अध्यापन कार्य किया। परसाई जी की बाल्यावस्था से ही लेखन में अभिरुचि थी। अध्यापन से उनके लेखन में बाधा उत्पन्न होती थी, अतः अध्यापक पद से त्यागपत्र देकर साहित्य साधना को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। जीवन पर्यन्त साहित्य सेवा करने वाले परसाई जी का 10 अगस्त, 1995 को देहावसान हो गया।

  • साहित्य-सेवा

समाज तथा व्यक्ति की विभिन्न विसंगतियों पर व्यंग्य प्रहार करने वाले हरिशंकर परसाई ने जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का सम्पादन एवं प्रकाशन किया, किन्तु अर्थाभाव के कारण वह पत्रिका बन्द कर देनी पड़ी। फिर आप साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘धर्मयुग’ आदि पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित रूप से लिखने में व्यस्त रहे। आपके व्यंग्य, निबन्ध आदि निरन्तर प्रकाशित होते रहते थे।

  • रचनाएँ

हरिशंकर परसाई की रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. व्यंग्य संग्रह-तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडण्डियों का जमाना’, ‘सदाचार का ताबीज’, ‘शिकायत मुझे भी है’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, ‘सुनौ भाई साधौ’ और ‘अन्त में’।
  2. कहानी संग्रह-‘हँसते हैं रोते हैं’, ‘जैसे उनके दिन फिरे’।
  3. उपन्यास-‘रानी नागमती की कहानी’, ‘तट की खोज’।
  • वर्ण्य विषय

हरिशंकर परसाई मूलत: व्यंग्य लेखक थे। समाज तथा जीवन की विसंगतियों. विडम्बनाओं आदि का सूक्ष्म निरीक्षण कर आपने प्रभावी व्यंग्य लिखे हैं। आपका मन्तव्य उपहास या खिल्ली उड़ाना नहीं है अपितु व्यंग्य द्वारा रचनात्मक सुधार के सूत्र सुझाने का रहा है। समाज राजनीति, अर्थव्यवस्था आदि की अव्यवस्था, कुटिलता, विद्रूपता आदि पर आपने करारे प्रहार किए हैं। भ्रष्टाचार, नैतिकता, रिश्वतखोरी, कुत्सित मनोवृत्तियों को उजागर करने की अद्भुत कला के धनी परसाई जी की जीवन दृष्टि सर्जनात्मक रही है।

  • भाषा

परसाई जी की भाषा सरल, सुबोध होते हुए भी तीखे प्रहार करने में सक्षम है। आपकी भाषा में फक्कड़पन और जिन्दादिली का पुट सर्वत्र दिखाई देता है। विषय के अनुरूप नपे-तुले शब्दों में अभिव्यक्त आपके व्यंग्य पाठक पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं। आपने तत्सम, तद्भव, विदेशी तथा देशज सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है। आप लक्षणा एवं व्यंजना के सहारे मूल भाव को सम्प्रेषित करने की कला में पारंगत हैं।

  • शैली

हरिशंकर परसाई की रचनाओं में विषयानुरूप शैली के विविध रूपों का प्रयोग हुआ है।

  1. व्यंग्यात्मक शैली-परसाई जी की व्यंग्य रचनाओं में इस शैली की प्रधानता है। जीवन की विविध प्रकार की विसंगतियों पर करारे प्रहार करने में यह शैली सफल रही है। सामाजिक पाखण्डों, रूढ़ियों, कुरीतियों, राजनीतिक छल-प्रपंचों आदि पर आपके द्वारा प्रभावी व्यंग्य लिखे गये हैं।
  2. वर्णनात्मक शैली-किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना को प्रस्तुत करने के लिए परसाई जी ने इस शैली का प्रयोग किया है। इसकी मिश्रित शब्दावली युक्त भाषा में वाक्य प्रायः छोटे ही . प्रयोग किये गये हैं।
  3. उद्धरण शैली-हरिशंकर परसाई अपने कथन की पुष्टि के लिए उद्धरण शैली का सहारा लेते हैं। गद्य तथा पद्य दोनों प्रकार के उद्धरणों का प्रयोग उन्होंने किया है। इस शैली से प्रभावशीलता की वृद्धि होती है।
  4. सूत्र शैली-हरिशंकर परसाई ने सूत्रात्मक कथनों के द्वारा कथ्य को रोचक बनाया है। आवश्यकतानुसार ये उक्तियाँ तीखी अथवा उपदेशात्मक प्रकार की होती हैं।
  • साहित्य में स्थान

सूक्ष्म निरीक्षण-दृष्टि तथा सशक्त अभिव्यक्ति के धनी हरिशंकर परसाई ने हिन्दी व्यंग्य साहित्य को सम्पन्न करने का प्रशंसनीय कार्य किया है। आपने सटीक व्यंग्यों के द्वारा समाज, राष्ट्रीयता, मानवता के उत्थान का महान कार्य किया है। व्यंग्य को अद्भुत अन्दाज में प्रस्तुत करने वाले हरिशंकर परसाई जी हिन्दी जगत् में चिर स्मरणीय रहेंगे।

10. महादेवी वर्मा
[2008, 09]

  • जीवन-परिचय

आधुनिक युग की मीरा महादेवी जी का जन्म 26 मार्च, सन् 1907 को फर्रुखाबाद में एक सम्भ्रान्त कायस्थ परिवार में हुआ था। आपके पिता गोविन्द प्रसाद, भागलपुर विद्यालय में प्रधानाचार्य थे। इनकी माता हेमरानी देवी विदुषी और भक्त महिला थीं। वे मीरा, कबीर आदि के पद गाती थीं और कविता भी करती थीं। आपको अपनी माँ से कविता, साहित्य तथा भक्ति की प्रेरणा प्राप्त हुई।

महादेवी जी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में हुई। इन्होंने घर पर संगीत और चित्रकला की शिक्षा प्राप्त की। इनका विवाह ग्यारह वर्ष की अवस्था में डॉ. स्वरूपनारायण वर्मा के साथ हुआ। श्वसुर के विरोध से शिक्षा में विघ्न पड़ गया। उनके देहावसान के बाद पुन: शिक्षा प्रारम्भ करके संस्कृत विषय में एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, अनेक वर्षों तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या रहीं, जहाँ से सन् 1965 ई. में अवकाश ग्रहण किया। हिन्दी साहित्य की ये महादेवी 11 सितम्बर, 1987 ई. को स्वर्ग सिधार गयीं।

  • साहित्य सेवा

कल्पना लोक में विचरण करने वाली महादेवी वर्मा जीवन के यथार्थ के उतने ही निकट थीं, जितना कि एक महामानव होता है। महादेवी जी की बचपन से ही काव्य के प्रति रुचि रही। उस समय की प्रसिद्ध नारी पत्रिका ‘चाँद’ में उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ छपी। बाद में उन्होंने ‘चाँद’ का सम्पादन भी किया। भावपूर्ण कविताओं ने आपको छायावाद की प्रमुख कवयित्री के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।

महादेवी के गद्य में पर दुःख, कातरता, आत्मीयता, समाज में अन्याय के प्रति दुःख और चिन्ता के दर्शन होते हैं। महादेवी जी ने सहस्रों वर्षों से उपेक्षित नारी के शिवरूप को उभारा है और नारी को अपना वास्तविक रूप पहचानने के लिए प्रेरित किया है। साहित्यिक उपलब्धियों के कारण आप उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्या भी मनोनीत की गयीं। भारत के राष्ट्रपति ने आपको पद्मश्री’ की उपाधि से सम्मानित किया। आपको ‘सेक्सरिया’ तथा ‘मंगलाप्रसाद पुरस्कार’ भी प्राप्त हुए हैं। कुमायूँ विश्वविद्यालय ने 1975 ई. में अपने प्रथम दीक्षान्त समारोह में आपको डी. लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित किया। आपने प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ नामक संस्था तथा देहरादून में ‘उत्तरायण’ नामक साहित्यिक आश्रम स्थापित किया।

  • रचनाएँ

आपने गद्य-पद्य दोनों में ही सफलतापूर्वक रचनाएँ की हैं। महादेवी जी की प्रमुख गद्य रचनाएँ हैं

  1. निबन्ध संग्रह-‘श्रृंखला की कड़ियाँ’, ‘क्षणदा’, ‘साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध’।
  2. आलोचना-‘हिन्दी का विवेचनात्मक गद्य।’
  3. संस्मरण और रेखाचित्र-अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी और मेरा परिवार।
  4. सम्पादन-‘चाँद’ मासिक पत्रिका और ‘आधुनिक कवि’ नामक काव्य-संग्रह का आपने कुशलता एवं विद्वतापूर्वक सम्पादन किया।
  • वर्ण्य विषय

वेदना की अमर गायिका महादेवी जी के गद्य में विचार एवं भाव ने व्यापक रूप धारण कर लिया। उनके निबन्धों में विचार प्रधानता दिखाई देती है तो समीक्षा में गहन अनुभूतिपरक चिन्तन उभरकर आया है। उनके रेखाचित्र और संस्मरणों में आत्मीयता, सहजता तथा सरलता की अजस्त्रधारा प्रवाहित है। आपके साहित्य में पशु-पक्षियों, सेवकों के सम्बन्ध में लिखे गए संस्मरण हिन्दी की बहुमूल्य धरोहर हैं। नारी के प्रति आपके हृदय में अपार सहानुभूति रही है।

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  • भाषा

महादेवी जी की गद्य-भाषा संस्कृत गर्भित, शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। आपकी भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी सरस, माधुर्ययुक्त और प्रवाहपूर्ण है। भाव, भाषा और संगीत की त्रिवेणी के संगम पर उनके गद्य का निर्माण हुआ है। उनका शब्द चयन उत्कृष्ट, भावानुकूल है। भाषा में तल्लीनता और तन्मयता के दर्शन होते हैं।

महादेवी जी की चित्रोपम भाषा में उपमा, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, विरोधाभास जैसे अलंकारों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। आपकी भाषा में मुहावरों और कहावतों का सटीक प्रयोग मिलता है। भावुकता, विदग्धता, मधुरता तथा लालित्य आपकी भाषा के विशेष गुण हैं। एक-एक शब्द बोलता-सा प्रतीत होता है।

  • शैली

महादेवी जी की गद्य-शैली के प्रमुख रूप निम्नांकित हैं-

  1. भावात्मक शैली-महादेवी जी की यह शैली उनके रेखाचित्र में मिलती है। महादेवी जी का कवि हृदय अपनी सम्पूर्ण भाव चेतना के साथ गद्य पर छाया रहता है। आलंकारिक सौन्दर्य, सरलता, भावों की सुकुमारता ने इस शैली को आकर्षक बना दिया है। इनमें महादेवी जी का कोमल हृदय झाँकता दिखायी देता है।
  2. वर्णनात्मक शैली-वर्णनात्मक शैली का प्रयोग वर्णन-प्रधान निबन्धों में हुआ है। वर्णनात्मक शैली सरल और व्यावहारिक है। भाषा सरल होते हुए भी शुद्ध, परिमार्जित और परिष्कृत है। वाक्य छोटे होते हैं, वर्णन में सजीवता और प्रवाह है।।
  3. चित्रात्मक शैली-आपने चित्रात्मक शैली का सफल प्रयोग किया है। पाठक के सामने शब्दों के द्वारा व्यक्ति या वस्तु का चित्र सा उपस्थित हो जाता है। इस शैली की भाषा चित्रात्मक एवं लाक्षणिक है।
  4. विवेचनात्मक शैली-महादेवी जी ने आलोचनात्मक निबन्धों में इस शैली को अपनाया है। इस शैली की भाषा दुरूह और संस्कृतनिष्ठ है, परन्तु उसमें सुबोधता और स्पष्टता सर्वत्र विद्यमान है।
  5. व्यंग्यात्मक शैली-महादेवी जी कभी-कभी शिष्ट-हास्य और तीखे व्यंग्य भी कर देती हैं। जहाँ वे तीखे व्यंग्य करती हैं, वहाँ उनकी शैली व्यंग्यात्मक हो गयी है। आपके व्यंग्यों में सुधार की भावना, करुण और शिष्ट-हास्य का समन्वय है। महादेवी जी की शैली में कल्पना, सजीवता, भाषा-चमत्कार इत्यादि एक साथ देखे जा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त उनकी गद्य-रचनाओं में कहीं-कहीं सूक्ति शैली, उद्धरण शैली और आत्माभिव्यंजक शैली के भी दर्शन होते हैं।

  • साहित्य में स्थान

आधुनिक युग की मीरा महादेवी वर्मा का हिन्दी साहित्य मे महत्त्वपूर्ण स्थान है। आपकी रचनाओं में नारी हृदय की शाश्वत वेदना का बड़ा ही मार्मिक चित्रण मिलता है। महादेवी वर्मा ने गद्य में दरिद्र जीवन का सुन्दर चित्रण किया है। इसमें आपकी उन विद्रोही भावनाओं के दर्शन होते हैं, जो समाज के प्रति हृदय में उठती रहती हैं। हिन्दी को उनकी अभूतपूर्व देन सजीव रेखाचित्र हैं। उनकी बहुमुखी साधना कवयित्री, रेखाचित्रकार, निबन्ध लेखिका और आलोचक के रूप में सर्वविदित है।

11. महात्मा गाँधी

  • जीवन-परिचय

सत्य व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबन्दर नगर, काठियावाड़ में हुआ था। आपके पिता का नाम करमचन्द तथा माता का नाम पुतलीबाई था। आपका बचपन का नाम मोहनदास था। आपका पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गाँधी था। आपके पिता राजकोट के दीवान थे। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा राजकोट में पूरी हुई। 13 वर्ष की अवस्था में आपका विवाह कस्तूरबा से हुआ। उच्च शिक्षा के लिए आप इंग्लैण्ड गए और बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। भारत आकर आपने वकालत शुरू की। एक मुकदमे के सिलसिले में आपको अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ भारतीयों तथा अपने साथ गोरों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार का अहिंसा द्वारा आपने विरोध किया। दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्ष रहकर आप 1915 में भारत लौटे। गोपाल कृष्ण गोखले के सम्पर्क में आकर आपने राजनीति में प्रवेश किया। आपने असहयोग व सत्याग्रह के द्वारा ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। आपने भारतीयों को आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर जोर दिया। आप निम्न वर्ग व नारी उत्थान तथा साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रबल पक्षधर थे। शिक्षा व घरेलू धन्धों को आप भारतीयों के लिए अनिवार्य मानते थे। आपने मई 1915 में साबरमती आश्रम की स्थापना की। 15 अगस्त, 1947 को आपके नेतृत्व में लड़ी गई स्वतन्त्रता की लम्बी लड़ाई के बाद भारत आजाद हुआ। 30 जनवरी, 1948 को भारत माता का यह अमर सपूत चिरनिद्रा में सो गया।

  • साहित्य-सेवा

गाँधीजी मूलतः एक साहित्यकार न होकर एक राजनीतिक व्यक्तित्व थे। अत: उनकी रचनाएँ भी राजनीति से सम्बन्धित रहीं। आपने 1903 में डरबन, अफ्रीका में बहुभाषी साप्ताहिक-पत्र ‘इण्डियन ओपीनियन’ निकाला। भारत आकर आपने ‘हरिजन’ तथा ‘यंग इण्डिया’ नामक पत्र निकाले। आपने ‘हिन्दू स्वराज्य’, ‘सर्वोदय’ (रस्किन की अनटु दि लास्ट पुस्तक का अनुवाद) तथा दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर अत्याचारों का वर्णन करने वाली पुस्तक ‘हरि पुस्तिका’ लिखी। आपने गुजराती में ‘नवजीवन’ नामक पुस्तक निकाली। ‘सत्य के प्रयोग’ आत्मकथा लिखकर आपने साहित्य की सेवा की।

  • रचनाएँ

महात्मा गाँधी की रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. आत्मकथा-‘सत्य के प्रयोग’।
  2. अनुवाद-‘हिन्द स्वराज्य’ तथा ‘सर्वोदय’।
  3. पत्र-‘हरिजन’, ‘यंग इण्डिया’, ‘इण्डियन ओपीनियन’।
  4. अन्य पुस्तक-‘नवजीवन’, ‘हरि पुस्तिका’।
  • वर्ण्य विषय

महात्मा गाँधी मूलतः एक बैरिस्टर थे। इस कारण तर्क करना उनकी फितरत थी। देश, समाज तथा जीवन की विसंगतियों, विडम्बनाओं आदि का सूक्ष्म निरीक्षण कर आपने प्रभावी लेख लिखे। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर अत्याचार देखकर गाँधीजी राजनीति में आये थे। समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था आदि की अव्यवस्था तथा विद्रूपता देखकर आपने उस पर प्रहार किये। नारी व निम्न वर्गका उत्थान, साम्प्रदायिक सद्भाव, किसानों की समस्या, ब्रिटिश सरकार के अत्याचार आदि आपके वर्ण्य विषय थे। देश को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाना आपका मुख्य उद्देश्य था।

  • भाषा

गुजराती मातृभाषा तथा अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम होने पर भी आपने खड़ी बोली हिन्दी में भी लिखा जिसमें संस्कृत शब्दों की अधिकता के कारण क्लिष्टता आ गई है। फिर भी भाषा में सरलता तथा बोधगम्यता मिलती है। आपकी भाषा दर्शन जैसे विषयों में गम्भीर हो गई है। कहीं-कहीं सूत्र ही गद्यांश बन गए हैं। वाक्य लघु हैं।

  • शैली

युग पुरुष महात्मा गाँधी की रचनाओं में भाव, विचार, व्याख्या आदि का मिला-जुला रूप मिलता है। आपके व्यक्तित्व में संस्कार, अध्ययन, अनुशीलन, रुचि व प्रवृत्ति के जो तत्त्व हैं, उन्होंने शैली को रक्षात्मक बना दिया है।

  1. वर्णनात्मक शैली-राजनेता होने के कारण बापू अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए इस शैली को अपनाते हैं।
  2. उद्धरण शैली-अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए गाँधीजी उदाहरण देते हैं तथा व्याख्या करते हैं। इसके लिए वह गीता से उदाहरण देते हैं।
  3. ओजपूर्ण शैली-ब्रिटिश सरकार के विरोध में लिखते समय उनकी भाषा में ओज था, अपने अधिकारों की माँग थी।
  4. सूत्रात्मक शैली-इस शैली में अत्यन्त लघु वाक्यों का प्रयोग है, जैसे-“

अद्वितीय उपाय है कर्म के फल का त्याग”,
“जहाँ देह है वहाँ कर्म तो है ही।”
इन सूत्रों में गीता का सार आ जाता है।

अनुवादों में भी नपी-तुली भाषा व शब्द हैं। मुहावरे व कहावतों का संक्षिप्त प्रयोग दृष्टिगोचर होता है।

  • साहित्य में स्थान

महात्मा गाँधी निबन्धकार, अनुवादक, सम्पादक, आत्मकथा लेखक तथा कुशल वक्ता थे। इस कारण उनका साहित्य में विशेष स्थान है। हिन्दी के विचार प्रधान निबन्धों के क्षेत्र में आपकी देन अनुपम है।

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12. श्रीधर पराड़कर

  • जीवन-परिचय

मध्य प्रदेश के ग्वालियर नामक शहर के निवासी श्रीधर पराड़कर का जन्म 15 मार्च, 1954 को हुआ था। आपके पिताजी का नाम गोविन्द राव पराड़कर और माता का नाम श्रीमती इन्दिरा बाई पराड़कर है। श्रीधर पराड़कर ने वाणिज्य विषय के साथ स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् अपने एकाउंटेंट जनरल कार्यालय में लेखा परीक्षक के रूप में शासकीय सेवा के साथ अपने कैरियर की शुरुआत की। परन्तु रक्त में प्रवाहित देशभक्ति की भावना और हृदय में आकण्ठ राष्ट्रप्रेम के वशीभूत श्रीधर पराड़कर ने 1986 में शासकीय सेवा से निवृत्ति लेकर अपना जीवन राष्ट्रोत्थान के लिए न्यौछावर कर दिया। श्रीधर पराड़कर का व्यक्तित्व आकर्षक है। वे सात्विक ऊर्जा के स्रोत भी हैं। आपके चेहरे पर सदैव विद्यमान रहने वाली बाल सुलभ मुस्कान सम्पर्क में आये व्यक्ति का भी तनाव समाप्त करने में सक्षम है।

  • साहित्य-सेवा

राष्ट्रीय आन-बान-शान और सम्मान को अपनी ओजस्वी कलम से नई धार देने वाले श्रीधर पराड़कर अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री एवं देश के प्रख्यात साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति और मूल्यों तथा राष्ट्रप्रेम की अलख जगा रहे श्रीधर पराड़कर ने इंग्लैण्ड, श्रीलंका आदि देशों की यात्रा के साथ-साथ भारत में अनेक स्थानों, जैसे-जौनसार (उत्तराखण्ड), लाहौल स्पीति और झाबुआ के वनांचल में साहित्य संवर्धन यात्राएँ की, ताकि लेखक अनुभूत साहित्य का सृजन कर सकें।

  • रचनाएँ

आपने अनेक लोकप्रिय पुस्तकों की रचना कर हिन्दी साहित्य की अद्भुत सेवा की है। आपकी प्रमुख रचनाएँ/पुस्तक निम्नवत हैं-

  1. जीवन-चरित्र—’राष्ट्रनिष्ठ खण्डोबल्लाल,”अप्रतिम क्रांतिदृष्टा भगतसिंह’, ‘रानी दुर्गावती’, माँ सारदा, कर्मयोगी बाबा साहेब आप्टे’, ‘बाला साहेब देवरस’, ‘राष्ट्रसंत तुकडोजी’, ‘1857 के प्रतिसाद,”अद्भुत संत स्वामी रामतीर्थ’, ‘सिद्धयोगी उत्तम स्वामी’ आदि।”
  2. अनुवाद—दत्तोपंत ठेगड़ी की पुस्तक ‘सामाजिक क्रांति की यात्रा और डॉ. आम्बेडकर’ का मराठी से हिन्दी में अनुवाद किया।
  3. अन्य पुस्तकें ‘ज्योति जला निज प्राणों की’ तथा ‘मध्य भारत की संघ गाथा’ आदि।
  • वर्ण्य विषय

राष्ट्रीय स्वाभिमान के अनन्य नायक एवं भारतीय संस्कृति तथा मूल्यों के वाहक श्रीधर पराड़कर की पुस्तकों में राष्ट्रप्रेम प्रमुख रूप से वर्णित विषय रहा है। उनकी पुस्तकों में मनुष्यों के उच्च विचारों के भाव भी परिलक्षित होते हैं। सामाजिक चेतना के स्वर उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं। आपने सदैव साहित्य में सद्विचारों को प्रोत्साहन प्रदान करने का कार्य किया है।

  • भाषा

श्रीधर पराड़कर की भाषा विशुद्ध रूप से हिन्दी है। उन्होंने अपनी रचनाओं में सरल, सहज एवं बोधगम्य भाषा का उपयोग किया है। भाषा की क्लिष्टता एवं दुरहता से दूर रहते हुए आपने पाठक की भाषा को ही अपनी साहित्य-भाषा के रूप में चुना है। सम्भवतया इसी कारण प्रत्येक पाठक वर्ग के लिये आपकी पुस्तकें सुग्राह्य हैं।

  • शैली

श्रीधर पराड़कर जी मूलतः वाणिज्य के छात्र रहे हैं। भाषा पर उनकी समझ एवं पकड़ किसी उपाधि से अर्जित ज्ञान की वजह से न होकर जीवन के स्वयं के अनुभवों से अर्जित ज्ञान पर आधारित है।

मुख्य रूप से उनकी शैली वर्णनात्मक, उद्धरण एवं ओजपूर्ण है। कहीं-कहीं उनकी पुस्तकों में चित्रात्मक एवं विवेचनात्मक शैली की झलक भी देखने को मिलती है।

  • साहित्य में स्थान

श्रीधर पराड़कर की पुस्तकें हमारे भीतर राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक संवेदनाओं का संचार करती हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को दृष्टिपथ पर रखकर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार) द्वारा उन्हें भारतीय विद्या (इन्डोलॉजी) में लेखन के लिए प्रतिष्ठित ‘विवेकानन्द पुरस्कार’ प्रदान किया गया। साथ ही, आपको तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा ‘हिन्दी सेवी सम्मान 2015’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।

सम्पूर्ण अध्याय पर आधारित महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म हुआ था
(i) सन् 1884 में, (i) सन् 1894 में, (ii) सन् 1904 में, (iv) सन् 1880 में।

2. पारिवारिक मर्यादा का उत्कृष्ट उदाहरण मिलता है
(i) गीता में, (ii) रामचरितमानस में, (iii) महाभारत में, (iv) कामायनी में।

3. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचना है
(i) चित्रलेखा, (ii) चिन्तामणि, (ii) अशोक के फूल, (iv) पथ के साथी।

4. जयशंकर प्रसाद का जन्म स्थान है
(i) इलाहाबाद, (ii) सागर, (iii) उज्जै न, (iv) वाराणसी।

5. ‘गीत और गोली’ के रचनाकार हैं
(i) विष्णु प्रभाकर, (ii) पं. कमलापति त्रिपाठी, (iii) हरिशंकर परसाई, (iv) श्रीराम परिहार।

6. कराची में बनारसी ने विद्यानिवास मिश्र से कहा था
(i) मातृभूमि को प्रणाम कहें, (ii) भारतमाता को सलाम कहें, (iii) गंगा और गंगा के कछार से मेरा सलाम कहें, (iv) भारतवासियों को मेरा सलाम कहें।

7. महात्मा गाँधी के राजनीतिक गुरु थे
(i) गोपाल कृष्ण गोखले, (ii) आचार्य विनोबा भावे, (iii) पं. जवाहर लाल नेहरू, (iv) सीमान्त गाँधी।

8. श्रीधर पराड़कर यहाँ के निवासी हैं [2008]
(i) कलकत्ता, (ii) कानपुर, (iii) ग्वालियर, (iv) भोपाल।
उत्तर-
1. (i),
2. (ii),
3. (iii),
4. (iv),
5. (i),
6. (iii),
7. (i),
8. (iii)।

  • रिक्त स्थान पूर्ति

1. हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म ……… में हुआ था।
2. ‘कुटुज’ ………’ की रचना है। [2013]
3. विद्यानिवास मिश्र के एक निबन्ध संग्रह का नाम ……..”
4. जयशंकर प्रसाद का जन्म स्थान ……… है।
5. जगदीशचन्द्र माथुर प्रसिद्ध …………. हैं। [2009]
6. ‘तेरा घर मेरा घर’ की लेखिका ………. हैं।
7. महादेवी वर्मा का निधन ……… में हआ था।
8. विद्यानिवास मिश्र ……… निबन्धकार हैं। [2009]
9. महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर …………. को हुआ था।
10. गुजराती में प्रकाशित ‘नवजीवन’ नामक पुस्तक के लेखक …….. थे।
11. श्रीधर पराड़कर ने ……… विषय में स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त की।
उत्तर-
1. सन् 1907,
2. हजारी प्रसाद द्विवेदी,
3. चितवन की छाँह,
4. वाराणसी (उ. प्र.),
5. एकांकीकार,
6.मालती जोशी,
7. सन् 1987,
8. ललित,
9. 1869,
10. महात्मा गाँधी,
11. वाणिज्य।

  • सत्य असत्य

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एक कवि थे। [2014]
2. विद्यानिवास का निधन सन् 2005 में हुआ था।
3. महादेवी वर्मा श्रेष्ठ उपन्यासकार हैं।
4. हरिशंकर परसाई व्यंग्यकार थे। [2015]
5. श्रीराम परिहार का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ है।
6. प्रेमचन्द उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। [2011]
7. महात्मा गाँधी द्वारा लिखित पुस्तक ‘सर्वोदय’ रस्किन की ‘अन टू दि लास्ट’ का अनुवाद
8. ‘राष्ट्रनिष्ठ खण्डोबल्लाल’ श्रीधर पराड़कर द्वारा लिखित पुस्तक है।
उत्तर-
1. असत्य,
2. सत्य,
3. असत्य,
4. सत्य,
5. असत्य,
6. सत्य,
7. सत्य,
8. सत्य।

  • जोड़ी मिलाइए

1. व्यंग्यकार [2009] – (क) शिकायत मुझे भी है
2. हरिशंकर परसाई [2009] – (ख) हरिशंकर परसाई
3. मर्यादा [2014] – (ग) आकाशदीप
4. जयशंकर प्रसाद – (घ) विष्णु प्रभाकर
5. रामचन्द्र शुक्ल – (ङ) महादेवी वर्मा
6. वेदना की अमर गायिका [2009] – (च) चिन्तामणि [2016]
7. महादेवी वर्मा [2017] – (छ) आधुनिक मीरा
उत्तर-
1.→ (ख),
2. → (क),
3. → (घ),
4.→ (ग),
5.→ (च),
6. → (ङ),
7. → (छ)।

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  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म स्थान कहाँ है?
2. ‘बेईमानी की परत’ के लेखक कौन हैं?
3. श्रीराम परिहार के एक निबन्ध का नाम लिखिए।
4. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के एक निबन्ध संग्रह का नाम लिखिए।
5. जयशंकर प्रसाद का जन्म किस वर्ष में हुआ था?
6. महादेवी वर्मा का जन्म स्थान कहाँ है?
7. गाँधीजी द्वारा 1930 में डरबन, दक्षिण अफ्रीका में निकाले गये बहभाषी साप्ताहिक-पत्र का क्या नाम था?
8. श्रीधर पराड़कर की माताजी का नाम क्या है?
उत्तर-
1. अगोना (उ. प्र.),
2. हरिशंकर परसाई,
3. धूप का अवसाद,
4. कुटज,
5. सन् 1889,
6. फर्रुखाबाद,
7. इण्डियन ओपीनियन,
8. श्रीमती इन्दिरा बाई पराड़कर।

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