MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 9 रक्षाबंधन

MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 9 रक्षाबंधन (कहानी, विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’)

रक्षाबंधन अभ्यास

कहानी

प्रश्न 1.
धनश्याम ने अपनी माता और बहिन की खोज कहाँ-कहाँ की?
उत्तर:
घनश्याम एक स्वस्थ तथा सुन्दर युवक था। जो धन कमाने दक्षिण को गया था। इस दौरान उसका अपनी माँ तथा छोटी बहन से सम्पर्क टूट गया। जो उससे बिछुड़ गये उनको विभिन्न शहरों; जैसे-कानपुर, लखनऊ, उन्नाव आदि में तलाश किया। अन्त में जब उसकी काफी कोशिश के पश्चात् भी उसकी माँ तथा बहन न मिली, तो वह निराश हो गया।

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प्रश्न 2.
नाटकीय ढंग से हुए माँ-बेटे और बहिन के मिलन दश्य का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
घनश्याम माँ तथा बहन से बिछुड़ने के पश्चात् नितान्त अकेला रह गया था। उसका एक मित्र अमरनाथ जो उसके भविष्य को लेकर चिन्तित रहता था; उसके लिए विवाह योग्य कन्या की तलाश में रहता था। काफी तलाश के पश्चात् अपने मित्र घनश्याम के योग्य एक कन्या देखी। वह अपने मित्र घनश्याम के साथ उस कन्या को देखने हेतु उसके घर पहुँचा उस कन्या का घर यहियागंज की गली में एक छोटा-सा मकान था। वहाँ उसकी माँ उसको देखकर बेहोश हो गई। अमरनाथ ने पानी लेकर घनश्याम की माता की आँखें तथा मुख धो दिये। थोड़ी देर में उसे होश आया। उसने आँखें खोलते ही फिर घनश्याम को देखा। वह शीघ्रता से उठकर बैठ गयी और बोली-ऐ, मैं क्या स्वप्न देख रही हूँ? घनश्याम क्या तू मेरा खोया घनश्याम है? या कोई और? माता ने पुत्र को उठाकर छाती से लगा लिया। लड़की यह सब देख सुनकर भैया-भैया कहती हुई घनश्याम से लिपट गयी घनश्याम ने देखा-लड़की कोई और नहीं,वही बालिका है जिसने पाँच वर्ष पूर्व उसके राखी बाँधी थी और जिसकी याद प्रायः उसे आया करती थी। इस प्रकार घनश्याम का अपनी माँ तथा बहन से मिलन हुआ।

प्रश्न 3.
“अमरनाथ एक सच्चा मित्र है।” क्यों कहा गया है? (2016)
उत्तर:
अमरनाथ एक सच्चा मित्र है,क्योंकि एक सच्चे मित्र में जो गुण होते हैं वह समस्त गुण अमरनाथ में हैं। घनश्याम एक सुन्दर धनी युवक है। वह अपने खोई माँ तथा बहिन के लिए चिन्तित रहता है। उसका मित्र अमरनाथ उसकी परिस्थितियों को समझता है। उसकी सहायता करने के लिए प्रयास करता रहता है।

हालांकि उसका मित्र घनश्याम धनी है। फिर भी वह उससे धन तथा अन्य किसी भी प्रकार के स्वार्थ की भावना नहीं रखता है। अमरनाथ के प्रयास से ही घनश्याम का बिछुड़ी हुई माँ तथा बहिन से मिलना होता है।

यद्यपि वह अपने विवाह के लिए कन्या देखने गया था लेकिन वहाँ उसकी मुलाकात अपनी खोई हुई माँ और बहिन से होती है। अमरनाथ में एक सच्चे मित्र का गुण है। जो अपने मित्र को अकेला परेशानियों में देखकर उसे छोड़ नहीं देता अपितु वह उसका हर परिस्थिति में साथ देता है। वास्तव में अमरनाथ एक उत्तम मित्र सिद्ध हुआ है।

इस सन्दर्भ में महाकवि तुलसी ने भी कहा है-
“धीरज, धर्म, मित्र और नारी,
आपति काल परखिए चारी।”

प्रश्न 4.
“यह सब मेरे ही कर्मों का फल है” घनश्याम के इस कथन के आलोक में माँ-बेटे के बिछुड़ने की घटना का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
घनश्याम एक पढ़ा-लिखा स्वस्थ, सुन्दर तथा महत्त्वाकांक्षी युवक था। जैसा कि युवावस्था में होता है प्रत्येक नवयुवक के मन में उमंगें होती हैं। उसी प्रकार धन कमाने की इच्छा भी घनश्याम को थी। परिणामस्वरूप घनश्याम धन कमाने दक्षिण को चला गया। वहाँ वह धन कमाने के लिए परिश्रम में इतना डूब गया कि उसको अपनी माँ तथा बहिन का ख्याल ही न रहा। परिणामस्वरूप जब वह धन कमाकर वापिस लौटा तो उसकी माँ तथा बहिन उससे निराश होकर कहीं चली गयीं। घनश्याम को अपनी गलती का आभास हुआ। उसने अपनी माँ तथा बहन को ढूँढ़ने का बहुत प्रयास किया वह विभिन्न शहरों में भटकता रहा लेकिन काफी प्रयास के पश्चात् भी उसकी माँ तथा बहिन नहीं मिलीं। निराश होकर वह कहने लगा यह सब मेरे कर्मों का फल है। क्योंकि न मैं इतना व्यस्त होता,न ही मेरा,मेरी माँ तथा बहिन से सम्पर्क टूटता अतः घनश्याम अब पछताने लगा। अतः किसी ने उचित ही कहा है-
“जो जस करहिं सो तस फल चाखा।”

प्रश्न 5.
प्रस्तुत कहानी के माध्यम से कहानीकार क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी के माध्यम से कहानीकार ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि खून के रिश्ते कभी झूठे नहीं होते हैं, क्योंकि यह सम्बन्ध भावात्मक होता है। व्यक्ति चाहे अपने प्रियजन से कितना भी दूर क्यों न हो लेकिन उसके हृदय में आत्मीयता अवश्य होती है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि मनुष्य को रुपया-पैसा कमाने के चक्कर में इतना व्यस्त नहीं होना चाहिए कि आपसी सम्बन्धी बिछुड़ जायें जीवन की धूप-छाँव में व्यस्त रहते हुए भी अपने प्रियजनों को कुछ समय अवश्य देना चाहिए।

रक्षाबन्धन कहानी के द्वारा लेखक ने भाई-बहन, माँ-पुत्र के रिश्तों की गरिमा को समझाते हुए उसका महत्त्व बताया है। लेखक का कथन है मानव को कर्म करते हुए अपने आत्मीय सम्बन्धों को भूलना नहीं चाहिए। यदि वे इस प्रकार की भूल करते हैं तो उन्हें जीवन भर पछतावे के अलावा कुछ नहीं मिलता है। इस कहानी के द्वारा लेखक सन्देश देना चाहता है कि धन और सत्ता के पीछे जो मानव आवश्यकता से अधिक भागता है,उसका परिणाम हमेशा दुःखद ही होता है। अतः आवश्यकता से अधिक धन कमाने के फेर में नहीं पड़ना चाहिए। जब मानव पारिवारिक सम्बन्धों को मन-मानस में गहराई से स्थान देता है,तब रोती हुई घटाओं में हँसती हुई बहारें बरसने लगती हैं। मुसीबतों का अँधेरा उजाले में परिवर्तित हो जाता है।

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रक्षाबन्धन महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

रक्षाबन्धन बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘रक्षाबन्धन’ पाठ की विधा है (2014)
(क) कविता
(ख) कहानी
(ग) आत्मकथा
(घ) संस्मरण।
उत्तर:
(ख) कहानी

प्रश्न 2.
“सब तेरे ही कर्मों से नाश हो गया”; कथन किसका है?
(क) बालिका का
(ख) घनश्याम का
(ग) बालिका की माँ का
(घ) अमरनाथ का।
उत्तर:
(ग) बालिका की माँ का

प्रश्न 3.
घनश्याम की बहन का नाम क्या था? (2009)
(क) शारदा
(ख) सुन्दरी
(ग) श्यामा
(घ) सरस्वती।
उत्तर:
(घ) सरस्वती।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. राखी बंधवा कर युवक ने जेब में हाथ डाला और ……………… निकालकर बालिका को देने लगा।
  2. मेरे हृदय में सुख शान्ति नहीं तो धन किस ……………. की दवा है।
  3. आखिर यह …………… बाँधा किसने है?

उत्तर:

  1. दो रुपये
  2. मर्ज
  3. डोरा।

सत्य/असत्य

  1. घनश्याम अपनी माँ और बहिन से बिछुड़ा नहीं था।
  2. राखी का त्योहार श्रावणी कहा जाता है।
  3. घनश्याम के पिता का निधन हो गया था।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य।

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सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 9 रक्षाबंधन img-1
उत्तर:
1. → (घ)
2. → (ख)
3. → (क)
4. → (ग)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. श्रावण मास की पूर्णिमा को कौन-सा पर्व मनाया जाता है? (2009)
  2. घनश्याम के लिए सुन्दर सी दुल्हन किसने ढूँढ़ ली?
  3. “यह सब मेरे ही कर्मों का फल है।” कथन किसका है?

उत्तर:

  1. रक्षाबन्धन
  2. अमरनाथ ने
  3. घनश्याम का।

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MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 8 बेटियाँ पावन दुआएँ हैं

MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 8 बेटियाँ पावन दुआएँ हैं (कविता, अजहर हाशमी)

बेटियाँ पावन दुआएँ हैं अभ्यास

कविता

प्रश्न 1.
कवि ने बेटियों को गौरव कथाएँ क्यों कहा है? स्पष्ट कीजिये। (2009, 12, 15)
उत्तर:
कवि ने बेटियों को गौरव कथाएँ इसलिये कहा है,क्योंकि बेटियाँ संसार में ईश्वर के वरदान के समान हैं। बेटियाँ पैगम्बर और गुरु ग्रन्थ साहिब की वाणी की भाँति पवित्र हैं। बेटियाँ वेदों की ऋचाओं की भाँति ईश्वर की पवित्र वाणी हैं। बेटियाँ उन प्रार्थनाओं की भाँति हैं, जो साक्षात् ईश्वर का दर्शन कराती हैं।

शास्त्रों में भी कहा है कि नारी का सम्मान करने से ईश्वर प्रसन्न होता है-
“यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता।”

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प्रश्न 2.
‘जीवन में बेटियों का महत्त्व’ विषय पर अपने विचार प्रकट कीजिये।
उत्तर:
जीवन में बेटियों का महत्त्व समझाते हुए कवि ने कहा कि वे जीवन को सुन्दर आकांक्षाओं से भर देने वाली होती हैं। बेटियाँ उन प्रार्थनाओं की भाँति हैं,जो साक्षात् ईश्वर का दर्शन कराती हैं। बेटियाँ जल की घटाओं के समान हैं। वे ही मानव को दुःख की घड़ी में सांत्वना प्रदान करती हैं। बेटियाँ ईश्वर ने इस प्रकार बनाई हैं कि वे जीवन के लू-लपटों अर्थात् कष्टों से भरे दिनों में ममता व दुलार से शान्ति प्रदान करने वाली होती हैं।

जीवन के दुःख भरे कठिनाइयों के समय वे संवेदना का मरहम लगाने वाली होती हैं। जीवन राह की कठिनाइयों में वे आशीष बन जाती हैं। पतझड़ में बसन्त की आभा विकीर्ण करती हैं।

प्रश्न 3.
‘आज के बच्चे कल के नागरिक हैं’ विषय पर दस पंक्तियाँ लिखिये।
उत्तर:

  1. आज का बच्चा ही कल का एक संभ्रान्त नागरिक होगा, यह बात अक्षरशः सत्य है।
  2. हमारे देश के बच्चे ही बड़े होने के पश्चात इसकी बागडोर थामेंगे।
  3. वे ही देश के विकास के लिए प्रयत्नशील रहेंगे।
  4. मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं का निराकरण करके अपने पथ को प्रशस्त करेंगे।
  5. हम यह कदापि नहीं जानते कि आगे चलकर कौन-सा बच्चा, गाँधी, नेहरू अथवा बोस की भाँति वीर और सत्यवक्ता होगा।
  6. हमें इन बच्चों को उत्साहित करके आगे बढ़ने में सहायता करनी चाहिए जिससे देश का भविष्य उज्ज्वल हो।
  7. बीज के सृदश बालक के मन-मानस में विकास की सम्भावनाएँ निहित होती हैं।
  8. इतिहास साक्षी है कि बालकों ने असम्भव कार्य को भी सम्भव किया है।
  9. बालक अच्छे बनकर देश की फुलबगिया में पुष्प के समान पल्लवित होंगे।
  10. बच्चे कल के नागरिक बनकर देश की यश-सुरभि को विकीर्ण करेंगे।

प्रश्न 4.
‘बेटियाँ’ कविता का केन्द्रीय भाव स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
‘बेटियाँ पावन दुआएँ हैं’ इस कविता के रचयिता अजहर हाशमी हैं। उन्होंने इस कविता की रचना करके बेटियों को सम्मान प्रदान किया है। उन्होंने बेटियों के महत्त्व को स्वीकारा जो इस प्रकार है। कवि का कथन है कि बेटियाँ ईश्वर के वरदान के समान जीवन को शुभ आकांक्षाओं से भर देने वाली हैं। बेटियाँ पवित्र दुआएँ हैं, वे आशीर्वाद का साकार स्वरूप हैं। बेटियाँ पैगम्बर के अमूल्य उपदेशों की भाँति हैं और बेटियाँ ही गौतम बुद्ध के आदर्श चरित्र कथाओं की भाँति हैं। बेटियाँ गुरु ग्रन्थ साहब की वाणी की भाँति पवित्र हैं। बेटियाँ वेदों की ऋचाओं की भाँति ईश्वर की वाणी हैं। ईश्वर स्वयं इनमें निवास करता है। बेटियाँ उन प्रार्थनाओं की भॉति हैं,जो साक्षात् ईश्वर का दर्शन कराती हैं।

बेटियाँ ईश्वर ने इस प्रकार बनाई हैं कि वे जीवन के ल-लपटों से अर्थात भयंकर कष्टों से भरे दिनों को घटाओं से जल बरसाने की भाँति शीतल करने वाली हैं अर्थात् कष्ट के दिनों में सांत्वना देने वाली बेटियाँ ही होती हैं।

आज के वातावरण में वैचारिक प्रदषण बढ़ गया है। इस प्रकार के भ्रष्टाचार और अनाचार के युग में बेटियाँ वातावरण में सुगन्ध बिखेरती हुई प्रतीत होती हैं। इस भाँति जीवन के कठिन और दुःख भरे दुर्दिनों में बेटियाँ ही संवेदना प्रकट करके हमारे कष्टों पर मरहम लगाने वाली होती हैं।
बेटियों के सम्बन्ध में किसी कवि का निम्न कथन है-
“पड़े तुम्हारे पाँव जहाँ हो,
तीरथ वहाँ सबेरे का।”

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बेटियाँ पावन दुआएँ हैं महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बेटियाँ पावन दुआएँ हैं बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेटियाँ वेदों की ऋचाओं की भाँति वाणी हैं
(क) गुरु ग्रन्थ की
(ख) वीरता की
(ग) साहस की
(घ) सभी की।
उत्तर:
(क) गुरु ग्रन्थ की

प्रश्न 2.
बेटियों को कवि ने बताया है
(क) वेदों की ऋचाएँ
(ख) पावन दुआएँ
(ग) जल की घटाएँ
(घ) ये सभी।
उत्तर:
(घ) ये सभी।

प्रश्न 3.
जब वातावरण में प्रदूषण का भ्रष्टाचार छाया हो तो बेटियाँ
(क) शुभकर्म करती हैं।
(ख) वातावरण सुगंधित करती हैं
(ग) शक्ति प्रदान करती हैं
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) वातावरण सुगंधित करती हैं

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. दुर्दिनों के दौर में देखा बेटियाँ …………. हैं।
  2. मुस्कुरा के पीर पीती बेटियाँ ………… व्यथाएँ हैं।
  3. बेटियाँ पावन ………. हैं।

उत्तर:

  1. संवेदनाएँ
  2. हर्षित
  3. दुआएँ।

सत्य/असत्य

  1. बेटियाँ पावन दुआएँ हैं,कविता में बेटियों का महत्त्व दर्शाया है।
  2. बेटियों को गौरव कथा कहा है। (2009)
  3. बेटियों में ईश्वर स्वयं बसता है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. सत्य

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सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 8 बेटियाँ पावन दुआएँ हैं img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (ग)
3. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘बेटियाँ पावन दुआएँ’ हैं कविता के रचयिता कौन हैं?
  2. कवि ने बेटियों को लू-लपट को दूर करने वाली क्या कहा है?
  3. बेटियाँ प्रदूषण के युग में किसके समान हैं?

उत्तर:

  1. अजहर हाशमी
  2. जल की घटाएँ
  3. सुरभित फिजाओं के।

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MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 7 यक्ष प्रश्न

MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 7 यक्ष प्रश्न (वार्ता, संकलित)

यक्ष प्रश्न अभ्यास

वार्ता

प्रश्न 1.
विषैले तालाब के नजदीक युधिष्ठिर ने क्या देखा?
उत्तर:
युधिष्ठिर जैसे ही तालाब के पास पहुँचे, वहाँ पर उन्होंने अपने चारों भाइयों को मृत अवस्था में देखा।

प्रश्न 2.
यक्ष के, संसार के सबसे बड़े आश्चर्य सम्बन्धी प्रश्न पर युधिष्ठिर ने क्या उत्तर दिया? (2015, 18)
उत्तर:
यक्ष के, संसार के सबसे बड़े आश्चर्य सम्बन्धी प्रश्न पर युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि प्रतिदिन आँखों के समक्ष न जाने कितने प्राणियों को मौत के मुख में जाते देखकर भी बचे हुए प्राणी इस बात की इच्छा रखते हैं कि हम अमर रहें, यह कितने आश्चर्य की बात है।

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प्रश्न 3.
युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित करवाने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित करने के लिए इसलिए कहा क्योंकि उनके पिता की दो पत्नियाँ थीं। उनमें से एक पत्नी कुंती के पुत्र वे स्वयं थे। अतः यदि यक्ष नकुल को जीवित करेंगे तो माता माद्री का भी एक पुत्र जीवित हो जायेगा। इस प्रकार दोनों का एक-एक पुत्र जीवित रहेगा।

प्रश्न 4.
यक्ष ने आशीर्वाद देते हुए युधिष्ठिर से क्या कहा? (2009)
उत्तर:
यक्ष ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए कहा कि मैं तुम्हारे सद्गुणों और शिष्टाचार से प्रसन्न हूँ। अब बारह वर्ष के वनवास की अवधि पूर्ण होने जा रही है लेकिन एक वर्ष तक तुम्हें अज्ञातवास करना है, वह भी सफलता से पूरा हो जायेगा। मेरे आशीर्वाद से इस अवधि में कोई भी व्यक्ति तुम्हें पहचान नहीं पायेगा।

प्रश्न 5.
वनवास की कठिनाइयों के बीच अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर ने क्या-क्या प्राप्त किया? (2010)
उत्तर:
वनवास की कठिन घड़ी में अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर को कुछ न कुछ अनुभव और आशीर्वाद प्राप्त हुए-

  1. अर्जुन को वनवास के समय ही इन्द्रदेव के दिव्य अस्त्र प्राप्त हुए।
  2. भीम को हनुमान से भेंट और आलिंगन करने के पश्चात् हनुमान का बल प्राप्त हुआ।
  3. युधिष्ठिर को मायावी सरोवर के समीप धर्मदेव ने दर्शन दिये तथा उन्हें गले लगाकर आशीर्वाद प्रदान किया।

इस प्रकार वनवास की कठिनाइयों के मध्य तीनों ने विभिन्न प्रकार के वरदान प्राप्त किये।

प्रश्न 6.
युधिष्ठिर के द्वारा दिये गये उत्तरों की यक्ष पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
युधिष्ठिर के द्वारा दिये गये उत्तरों को सुनकर यक्ष, युधिष्ठिर के सद्गुणों से प्रभावित हुए; क्योंकि युधिष्ठिर के द्वारा दिये गये सभी प्रश्नों के उत्तर सटीक और सार्थक थे। उन्होंने हर प्रश्न का उत्तर बुद्धि और विवेक का प्रयोग कर निरपेक्ष भाव से दिया था। यक्ष युधिष्ठिर के बुद्धि, कौशल और चातुर्य से प्रभावित थे। मन ही मन यक्ष, युधिष्ठिर के मनोभावों को भी पढ़ते जा रहे थे।

लेकिन युधिष्ठिर ने यक्ष के हर प्रश्न का उचित उत्तर देकर परीक्षा में सफलता प्राप्त की। साथ ही धर्मदेव बने यक्ष से आशीर्वाद भी प्राप्त किया। यथार्थ में मानव का विवेक एवं बुद्धि कौशल सफलता की सीढ़ी है।

प्रश्न 7.
यक्ष-युधिष्ठिर संवाद से आपको क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
यक्ष और युधिष्ठिर के संवाद से यह शिक्षा मिलती है कि मानव को कभी भी किसी की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि किसी भी वस्तु का उपयोग उस वस्तु के स्वामी से पूछकर ही करें।

ईश्वर व्यक्ति की किसी भी समय परीक्षा ले सकता है। अतः व्यक्ति को सदैव सत्य, निष्ठा और धर्म का आचरण करना चाहिए। यदि व्यक्ति सद्गुणों पर चलेगा, तो सदैव कर्तव्य के मार्ग में आगे बढ़ता रहेगा। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को सत्यनिष्ठ व धर्मनिष्ठ होना चाहिए। यही सफलता का मूलमन्त्र है।

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यक्ष प्रश्न महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

यक्ष प्रश्न बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
युधिष्ठिर ने विषैले तालाब के पास देखा
(क) दोनों भाई मूर्छित हैं
(ख) भाई अदृश्य थे
(ग) वहाँ कोई नहीं था
(घ) चारों भाई मृत से पड़े हुए थे।
उत्तर:
(घ) चारों भाई मृत से पड़े हुए थे।

प्रश्न 2.
हवा से भी अधिक तेज चलने वाला कौन है? (2009, 15)
(क) तितली
(ख) मन
(ग) मस्तिष्क
(घ) मक्खी
उत्तर:
(ख) मन

प्रश्न 3.
किस वस्तु को गँवाकर व्यक्ति धनी बनता है?
(क) प्रेम को
(ख) क्रोध को
(ग) स्त्री को
(घ) लालच को।
उत्तर:
(घ) लालच को।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. उन्होंने युधिष्ठिर के सद्गुणों से मुग्ध होकर उन्हें …………. से लगा लिया।
  2. युधिष्ठिर की माता का नाम …………. है। (2009)
  3. ………… राजा विराट बड़े शक्तिसम्पन्न थे।

उत्तर:

  1. छाती
  2. कुन्ती
  3. मत्स्याधिपति

सत्य/असत्य

  1. धैर्य मनुष्य का सबसे बड़ा साथी होता है।
  2. युधिष्ठिर ने यक्षराज से सहदेव को जीवित करवाना चाहा।
  3. बारह वर्ष तक कौरवों को अज्ञातवास करना पड़ा।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य

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MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 7 यक्ष प्रश्न img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (क)
3. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. भीमसेन में कितने हाथियों के बराबर बल था?
  2. बर्तनों में सबसे बड़ा बर्तन कौन-सा है?
  3. हवा से भी तेज चलने वाला कौन है? (2013)
  4. मायावी सरोवर के पास युधिष्ठिर को किसके दर्शन हुए?
  5. किस चीज़ को गँवाकर मनुष्य धनी बनता है? (2014)

उत्तर:

  1. दस हजार
  2. भूमि ही सबसे बड़ा बर्तन है
  3. मन
  4. धर्मदेव
  5. लालच को।

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MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 6 निंदा रस

MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 6 निंदा रस (व्यंग्य निबन्ध, हरिशंकर परसाई)

निंदा रस अभ्यास

व्यंग्य निबन्ध

प्रश्न 1.
लेखक ने निन्दकों को पास में रखने की सलाह क्यों दी है?
उत्तर:
हीनता की भावना ही निन्दा की जन्मदात्री है। निन्दा की प्रवृत्ति आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होती है। निठल्ला इन्सान दूसरों को कार्य में जुटा देखकर उनसे अकारण ईर्ष्या करने लगता है। प्रमादी मानव कार्य करने से जी चुराता है। यही अकर्मण्यता व्यक्ति को निन्दक के रूप में परिवर्तित कर देती है। निन्दा से बचने का एकमात्र साधन कर्म में प्रतिपल जुटे रहना है। कर्म से आत्म-सन्तुष्टि मिलती है।

प्रश्न 2.
अपने निन्दकों को उचित उत्तर देने का लेखक ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर:
लेखक ने निन्दकों को उचित उत्तर देने का सर्वश्रेष्ठ उपाय बताया है कि कठोर श्रम से हम ईर्ष्या,जलन, ढाह आदि बुरी भावनाओं का समूल नाश कर सकते हैं। निन्दकों को उचित उत्तर देने का यही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

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प्रश्न 3.
निन्दा की प्रवृत्ति से बचने के लिए क्या करना चाहिए? (2009)
उत्तर;
जो इन्सान निन्दा में प्रवृत रहता है, उसका मन कमजोर तथा अशक्त होता है। उसके मन में हीनता की भावना विद्यमान रहती है। निन्दा के माध्यम से वह दूसरों को अपने से हीन तथा तुच्छ करार देता है। इस प्रकार के कृत्य से वह अपने अहम् को पारितोष देता है। निन्दा से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय काम में जुटे रहना है। कर्म में प्रवृत्त रहने से धीरे-धीरे निन्दा का अवगुण समाप्त हो जाता है। कठिन कर्म ही निन्दा को नष्ट करता है। कार्यरत मानव को दूसरे की निन्दा करने का अवकाश ही नहीं मिलता।

प्रश्न 4.
“छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए।” कथन का आशय स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
पुतला निर्जीव एवं भावना-शून्य होता है। लेखक की धारणा है कि जब कोई इन्सान छल-कपट की भावना मन-मानस में छिपा कर हमसे मिले तो हमें भी ऐसे इन्सान के साथ मिलने तथा प्रेम-प्रदर्शन की औपचारिकता को ही निभाना चाहिए। इनके साथ हमें इसी भाँति मिलना चाहिए जिस तरह कि कृष्ण ने धृतराष्ट्र के समक्ष भीम की जगह पर भीम का पुतला आगे बढ़ा दिया था। इस कथन का तात्पर्य यह है कि कपटी तथा छली धृतराष्ट्र भी भीम के आलिंगन का इच्छुक न होकर,उसको मौत के घाट उतारना चाहता था।

प्रश्न 5.
“कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं।” कथन की विवेचना कीजिये। (2009, 14, 16)
उत्तर:
कुछ इन्सान बड़े निर्दोष-मिथ्यावादी स्वभाव वाले होते हैं। वे स्वभाववश झूठ का आश्रय लेते हैं। बिना किसी कारण निष्प्रयास असत्य बोलते हैं। ठीक बात उनके मुख से कभी निकलती ही नहीं है। इस प्रकार के मिथ्यावादियों के लिए लेखक ने निर्दोष शब्द का जो प्रयोग किया है, वह उचित प्रतीत होता है। जो इन्सान इस प्रकार का झूठ बोलता है, वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता। वे झूठ का सहारा स्वभाववश लेते हैं। दुनिया में अक्सर लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु या दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं, परन्तु निर्दोष मिथ्यावादी अपनी प्रकृति के वशीभूत होकर ही असत्य बोलता है।

प्रश्न 6.
इस पाठ से आपने क्या शिक्षा ग्रहण की और क्या निश्चय किया? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
हीनता की भावना से निन्दा का जन्म होता है। जिस इन्सान में हीनता की भावना होती है, निन्दक बन जाता है। हीनता की भावना से ग्रसित होकर व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता का प्रभाव जमाना चाहता है। अपने अहम् को सन्तुष्ट करने के लिए वह निन्दा करता है। निन्दक की प्रवृत्ति आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होती है। प्रमादी मानव कार्य करने से जी चुराता है। निन्दा रस से बचने का एकमात्र साधन कर्म में प्रतिपल जुटे रहना है। कर्म से आत्म-सन्तुष्टि मिलती है। इस पाठ से हमने यह शिक्षा ग्रहण की है कि निन्दा रस से बचने के लिए हमेशा कर्म में जुटे रहना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप हमारे भीतर की निन्दा रस रूपी बुराई समूल नष्ट हो जाती है। इस पाठ के अध्ययन के उपरान्त हमने निश्चय किया कि हम प्रतिक्षण अपने कर्म में जुटे रहेंगे तथा निन्दा रस रूपी बुराई अपने हृदय से निकालकर अपना तथा आसपास के वातावरण को खुशहाल बनायेंगे।

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निन्दा रस महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निन्दा रस बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूरदास जी ने निन्दा के विषय में लिखा है
(क) ‘निन्दा सबद रसाल’
(ख) विशाल निन्द
(ग) रस निन्दा
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) ‘निन्दा सबद रसाल’

प्रश्न 2.
निन्दा का उद्गम है
(क) दीनता
(ख) निन्दक
(ग) हीनता और कमजोरी
(घ) कमजोरी।
उत्तर:
(ग) हीनता और कमजोरी

प्रश्न 3.
निन्दा कुछ लोगों की पूँजी होती है, इससे वे फैलाते हैं
(क) बुराई
(ख) प्रतिष्ठा
(ग) पूँजी
(घ) लम्बा चौड़ा व्यापार।
उत्तर:
(घ) लम्बा चौड़ा व्यापार।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो ………… ही आगे बढ़ाना चाहिए।
  2. निंदा रस नामक निबन्ध में ………… तत्त्व की प्रधानता है। (2009)
  3. मनुष्य अपनी ……………. से दबता है।

उत्तर:

  1. पुतला
  2. व्यंग्य
  3. हीनता।

सत्य/सत्य

  1. कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं।
  2. कठिन कर्म ही ईर्ष्या और द्वेष को जन्म देता है।
  3. बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बनती है।
  4. निन्दा रस व्यंग्य निबन्ध है। (2010)
  5. निंदक समाज में सम्मान के पात्र होते हैं। (2015)

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. असत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 6 निंदा रस img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (ग)
3. → (क)
4. → (घ)

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एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. लेखक ने किसको अपने पास रखने की सलाह दी है?
  2. कौन-सा रस आनन्ददायक है?
  3. किस व्यक्ति की स्थिति बड़ी दयनीय होती है?
  4. निन्दा रस के लेखक कौन हैं? (2017)

उत्तर:

  1. निन्दकों को
  2. निन्दा रस
  3. निन्दक की
  4. हरिशंकर परिसाई।

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MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 5 भगिनी निवेदिता

MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 5 भगिनी निवेदिता (संस्मरण, प्रवाजिका आत्मप्राणा)

भगिनी निवेदिता अभ्यास

संस्मरण

प्रश्न 1.
स्वामी विवेकानन्द से निवेदिता की मुलाकात कब, कहाँ और कैसे हुई? (2013, 17)
उत्तर:
स्वामी विवेकानन्द से निवेदिता की मुलाकात सन् 1893 के शिकागो के विश्वधर्म सम्मेलन में हई स्वामीजी लन्दन अपने मित्रों के आग्रह पर आये थे यहीं पर मार्गरेट (निवेदिता) ने स्वामीजी के प्रवचन सुने और अपना आदर्श मान लिया।

प्रश्न 2.
स्वामी जी के साथ हिमालय यात्रा में निवेदिता को क्या अनुभव हुए?
उत्तर:
स्वामीजी के साथ हिमालय यात्रा में निवेदिता पैदल ही चलीं। मार्ग में वे पटना, वाराणसी, लखनऊ, पंजाब, रावलपिण्डी, बारामुला होते हुए कश्मीर पहुँचे। उन्होंने पहली बार भारत की पवित्र भूमि पर पाँव रखा था।

भारत के पवित्र तीर्थस्थान गाँव, पर्वत, नदियाँ तथा भारत के श्रद्धालुओं से मिलने का अवसर उन्हें प्राप्त हुआ।

वे अमरनाथ की दुर्गम यात्रा पर स्वामी जी के साथ अकेली ही गयीं इस यात्रा के पश्चात् उनकी जीवन शैली में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। वे स्थान-स्थान पर व्याख्यान देने लगीं। उन्होंने शिक्षा के उत्थान के लिए अपनी अदम्य शक्ति लगायी और निरन्तर प्रयास किया कि सभी महिलाएँ शिक्षित हो जायें। उनका कहना था यह सम्पूर्ण देश तुम्हारा है और देश को तुम्हारी आवश्यकता है। अतः अपने मूल्यवान समय को देश के हित के लिए लगाओ।

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प्रश्न 3.
अमरनाथ यात्रा से भगिनी निवेदिता को भारत को समझने में किस प्रकार सहायता मिली?
उत्तर:
अमरनाथ यात्रा से भगिनी निवेदिता को भारत के रहन-सहन, खान-पान एवं वेश-भूषा की पर्याप्त जानकारी मिली। स्थान-स्थान पर रुकने से वहाँ के लोगों की बोली और विचारों से अवगत हुई।

भगिनी निवेदिता भारत के ज्ञान,दर्शन,संस्कृति व परम्पराओं से परिचित हुईं। वे यहाँ की संस्कृति और सभ्यता से इतना अधिक प्रभावित हुईं कि उन्होंने स्वयं को भारत की माटी में ही एकाकार (समाहित) कर लिया।

उन्होंने यहाँ महिलाओं के आचार-व्यवहार व रहन-सहन तथा वात्सल्यपूर्ण व्यवहार को देखा। यात्रा के दौरान उन्होंने प्रकृति का अपूर्व आनन्द लिया। उनका कहना था कि भारत में जितनी शान्ति है, उतनी अन्य कहीं नहीं वास्तव में इस देश की सभ्यता एवं संस्कृति, दुनिया को एक नई रोशनी प्रदान करने वाली है। यहाँ के प्रत्येक दृश्य एवं संस्कार अपनी अलौकिक छटा विकीर्ण कर रहे हैं।

प्रश्न 4.
कलकत्ता में फैले प्लेग के समय निवेदिता ने किस प्रकार सेवा की?
उत्तर:
निवेदिता ने 13 नवम्बर, सन् 1896 को कलकत्ता (कोलकाता) में अपने निवास स्थान के समीप एक बालिका विद्यालय की स्थापना की, लेकिन अगले वर्ष जैसे ही निवेदिता को कलकत्ता (कोलकाता) में प्लेग फैलने का समाचार मिला, वे अपने सभी शिष्यों के साथ टोली बनाकर रोगियों की सेवा में जुट गयीं। वे रात-दिन भूखी-प्यासी रहकर और अपनी चिन्ता छोड़कर रोगियों की चिकित्सा में निःस्वार्थ भाव से जुटी रहती थीं। रोगियों की सेवा के उपरान्त उन्हें हार्दिक प्रसन्नता प्राप्त होती थी। उन्हें रोगियों से पर्याप्त स्नेह और आदर मिलता था। उनके विषय में जिला चिकित्सा अधिकारी ने एक रिपोर्ट में लिखा है-
“निवेदिता अपने आराम, स्वास्थ्य, भोजन तक की चिन्ता न कर गन्दी बस्तियों में घूमती रहीं।”
इस प्रकार निवेदिता ने निःस्वार्थ भाव से रोगियों की सेवा की।

प्रश्न 5.
स्त्री शिक्षा पर निवेदिता के विचार स्पष्ट कीजिये। (2018)
उत्तर:
निवेदिता जब भारत आयीं, उस समय उनके मन में एक विद्यालय स्थापित करने की भावना ने जन्म लिया। अतः सन् 1896 में 13 नवम्बर को उन्होंने अपने घर के पास बालिका विद्यालय की स्थापना की थी, माँ ने इस विद्यालय का विधिवत् उद्घाटन किया। इस विद्यालय में लड़कियों को पढ़ने-लिखने के अतिरिक्त चित्रकारी, मिट्टी का काम भी सिखाया जाता था। उनको इस कार्य में अपूर्व सुख की अनुभूति होती थी। लगभग छः माह बाद धनाभाव के कारण विद्यालय चलाने में असुविधा हुई। अतः धन संग्रह के लिए वे पुनः विदेश गयीं और वहाँ उन्होंने देखा कि विदेशों में भारतवासियों की झूठी और घृणित तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है। विशेषकर भारत की स्त्रियों की निन्दा की जा रही है। उन्होंने स्त्रियों की उचित स्थिति को व्यक्त किया।

प्रारम्भ में बालिका विद्यालय में कोई भी अपनी बालिका को नहीं भेजना चाहता था, लेकिन निवेदिता ने अपनी सेवा तथा सरल चित्तवृत्ति के द्वारा लोगों के मन को आकर्षित किया और लोगों ने अपनी बालिकाओं को विद्यालय भेजना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे विद्यालय बढ़ने लगा और आज भी यह विद्यालय सुव्यवस्थित रूप से चल रहा है।

प्रश्न 6.
भारतीय स्त्रियों के कौन-कौन से गुणों ने निवेदिता को प्रभावित किया? (2015)
उत्तर:
भारतीय स्त्रियों के निम्नलिखित गुणों ने निवेदिता को प्रभावित किया-
(1) ममतामयी माँ :
निवेदिता ने भारत की महिलाओं को आदर्श माँ के रूप में पाया। वात्सल्य भाव की जो छवि भारत की स्त्रियों में पायी जाती है,वह अन्यत्र दुर्लभ है। वे वास्तव में ममता और प्रेम से परिपूर्ण हैं।

(2) आदर्श पत्नी :
निवेदिता ने भारत की स्त्रियों को आदर्श पत्नी के रूप में पाया। माँ-बाप तथा सास-ससुर की सेवा का जो आदर्श भाव यहाँ की महिलाओं में है, वह अन्य कहीं नहीं है। वह अपने पति की रक्षा के लिए अपने प्राणों का भी बलिदान कर देती हैं।

(3) वीरता की साक्षात् प्रतिमूर्ति :
भारत की स्त्रियाँ वीरता की साक्षात् मूर्ति हैं। रानी लक्ष्मीबाई और अहिल्याबाई इसका साक्षात् उदाहरण हैं। वास्तव में यहाँ की महिलाएँ देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने वाली हैं।

(4) दया और सद्भावना :
भारत की स्त्रियों में दया और सद्भावना अधिक है। यह बात निवेदिता ने यहाँ की स्त्रियों के सम्पर्क में आकर ही जानी भारत आने के बाद ही उन्हें स्त्रियों के समुचित गुणों का सही रूप में ज्ञान हुआ। वास्तव में भारत की महिलाएँ धन्य हैं। अतः किसी विद्वान ने उचित ही कहा है-
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।”

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भगिनी निवेदिता महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भगिनी निवेदिता बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भगिनी निवेदिता पर लिखा गया ‘संस्मरण’ के लेखक हैं- (2011)
(क) अजहर हाशमी
(ख) प्रवासिका आत्मप्राणा
(ग) डॉ.श्यामसुन्दर दुबे
(घ) डॉ. यतीन्द्र अग्रवाल।
उत्तर:
(ख) प्रवासिका आत्मप्राणा

प्रश्न 2.
निवेदिता ने गुरु मान लिया था
(क) दयानन्द को
(ख) रामानुजाचार्य को
(ग) विवेकानन्द को
(घ) रामानन्द को।
उत्तर:
(ग) विवेकानन्द को

प्रश्न 3.
भगिनी निवेदिता का वास्तविक नाम था (2009)
(क) मार्गरेट थेचर
(ख) मिस वीन्स
(ग) मार्गरेट एलिजाबेथ नोबुल
(घ) लिली।
उत्तर:
(ग) मार्गरेट एलिजाबेथ नोबुल

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. उनकी लन्दन में एक संन्यासी …………… से भेंट हुई।
  2. समुद्री यात्रा पर उन्होंने अपने ……………. से बहुत कुछ सीखा।
  3. वे भारत को महान ………….. का देश कहा करती थीं।
  4. कलकत्ता में …………. फैला था। (2016)

उत्तर:

  1. विवेकानन्द
  2. गुरु
  3. महिलाओं
  4. प्लेग।

सत्य/असत्य

  1. निवेदिता भारत आकर अप्रसन्न थीं।
  2. निवेदिता गीता का निरन्तर अध्ययन करती थीं।
  3. रामकृष्ण शारदा मिशन भगिनी निवेदिता बालिका विद्यालय आज भी चल रहा है।
  4. भगिनी निवेदिता संस्मरण नहीं है। (2010)

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य

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सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 5 भगिनी निवेदिता img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (ख)
3. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. निवेदिता नाम का क्या अर्थ है?
  2. शिक्षा के लिए धन एकत्र करने उन्हें कहाँ जाना पड़ा?
  3. अपने विद्यालय में उन्होंने क्या चलाना सीखा?

उत्तर:

  1. समर्पण
  2. विदेश
  3. चरखा।

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MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 4 थके हुए कलाकार से

MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 4 थके हुए कलाकार से (कविता, धर्मवीर भारती)

थके हुए कलाकार से अभ्यास

कविता

प्रश्न 1.
अधबनी धरा पर अभी क्या-क्या बनना शेष है? (2015, 17)
उत्तर:
अधबनी धरा पर अभी चाँदनी पूरी तरह नहीं फैल पायी है। पुष्प की कली भी अभी अधखिली है। अभी तो इस धरा में भी अपूर्णता है, क्योंकि इसकी नींव का भी पता नहीं है। अभी तो संसार की सृष्टि का सृजन भी अधूरा है। इस कारण सभी वस्तुएँ अभी अपने आप में अपूर्ण हैं। इस धरा की सम्पूर्ण वस्तुओं का अभी विकास होना है।

प्राकृतिक वस्तुएँ इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि जिस भाँति उनका विकास अपूर्ण है, तद्नुकूल संसार की प्रगति भी अभी अवशेष है।

प्रश्न 2.
स्वर्ग की नींव का पता किस प्रकार लग सकता है? (2014, 17)
उत्तर:
स्वर्ग की नींव का पता अभी नहीं चल सकता है, क्योंकि धरा अभी अपूर्ण है। अतः सृष्टि का सृजन भी अपूर्ण है। अतः हे थके हुए कलाकार! तुम्हें प्रतिपल सजग रहकर धरती को स्वर्ग में परिणित करने के लिए चलते रहना चाहिए। तभी धरती पर स्वर्ग की नींव का पता चल सकता है।

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार प्रलय से कलाकार को निराश क्यों नहीं होना चाहिए?
उत्तर:
कवि के अनुसार प्रलय से कलाकार को निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि निराश होने पर कलाकार अपनी कृति को पूर्ण नहीं कर सकता। कलाकार को अपनी कृति पूर्ण करने के लिए प्रतिपल जीवन के झंझाओं से जूझने के लिए तत्पर रहना चाहिए। सबल प्राणों से तभी जीवन का संचार होगा जबकि कलाकार बिना रुके अपने सृजन में निरन्तर लगा रहेगा, क्योंकि गति का नाम ही अमर जीवन है। निम्न कथन इस बात का द्योतक हैं, देखिए-
“प्राणदीप जूझे झंझा से, फिर भी मन्द प्रकाश न हो,मेरे मीत उदास न हो।”

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प्रश्न 4.
‘थके हुए कलाकार से’ कविता का केन्द्रीय भाव स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
थके हुए कलाकार से’ कविता के माध्यम से धर्मवीर भारती ने मानव को निरन्तर चलते रहने की प्रेरणा दी है।

कवि का कथन है कि हे देवता! तू सृष्टि की थकान का विस्मृत कर दे,क्योंकि धरती तो अभी अधूरी है। जिस मृदुल चाँदनी की कल्पना तुमने की थी, वह भी अधूरी है। ये जीवन सुगन्धि से युक्त नहीं है क्योंकि अभी कली पूर्णरूप से खिली नहीं है। इस अपूर्ण धरती पर स्वर्ग की नींव का कोई भी चिह्न नहीं है। अतः हे देवता! तू सृष्टि के सृजन को भूल कर निरन्तर चलता रह,क्योंकि चलने का अर्थ ही जीवन है। रुकने का अर्थ है सृजन को बन्द करना। यदि अन्धकार में रास्ता भूल गये हो अथवा कोई रोशनी की किरण नहीं मिल रही हो अथवा सूर्य कहीं बादलों में छिप गया हो; तुम्हें इस पथ में व्यवधान उत्पन्न करने वाली बाधाओं को परास्त करना हो। नई सृष्टि का रंगों का सपना विलुप्त हो जायेगा, यदि तुम रुक जाओगे तो संसार का सृजन रुक जायेगा। तुम्हें इस पथ पर व्यवधान से उत्पन्न होने वाली बाधाओं को परास्त करना है।

इस प्रकार इस अपूर्ण सृजन से तुम निराश मत होना और सृजन की थकान को भूलकर, यदि तुझे प्रलय से कोई निराशा हुई हो तो तुम अपनी अव्यवस्थित श्वांसों को झरोखों से शुद्ध वायु लेकर; उनमें प्राणों का संचार करना यदि कलाकार की बाँहें थक जायेंगी तो प्रलय भी अपूर्ण होगी और सृजन की योजना भी अधूरी होकर खो जायेगी।

अतः यदि इस प्रलय से तुझे निराशा हुई हो तो क्या पता इस नाश में कहीं पर मूच्छित जिन्दगी पड़ी हो अतः हे देवता! तू सृजन की थकान को भूल जा क्योंकि अभी इस धरती पर सभी वस्तुएँ अपूर्ण हैं।

प्रश्न 5.
कवि ने अधूरे सृजन से निराश न होने की बात कहकर क्या संकेत देना चाहा है?
उत्तर:
कवि ने अधूरे सृजन से निराश न होने की बात कहकर यह संकेत किया है कि हे मानव! तू निराश मत हो क्या पता इस निराशा में ही तुझे कोई आशा की किरण मिल जाये। कवि का अभिप्राय है कि कलाकार की बाहें चाहे कितनी भी थकी हों,उसे अपनी कला को अपूर्ण नहीं छोड़ना चाहिए।

कवि का कथन है कि कभी-कभी नष्ट वस्तुओं में भी जीवन होता है। कलाकार का कर्तव्य है उन वस्तुओं में जीवन डाल कर प्राणों का संचार कर दे।

जीवन में चाहे कितनी ही विपत्तियों के बादल मँडरायें,मानव को धैर्य नहीं खोना चाहिए। आशा ही एक ऐसा सम्बल जिसके माध्यम से मानव अपने मन-मन्दिर में आशा का भाव जाग्रत करके नई जिन्दगी जीने की प्रेरणा लेता है।

इस सन्दर्भ में निम्न कथन देखिये-
“जिनके जीवन में आशा नहीं, उनके लिये जगत ही तमाशा है।”

थके हुए कलाकार से महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

थके हुए कलाकार से बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘थके हुए कलाकार से’ कविता के रचयिता हैं
(क) अज्ञेय
(ख) संकलित
(ग) गजानन्द माधव
(घ) धर्मवीर भारती।
उत्तर:
(घ) धर्मवीर भारती।

प्रश्न 2.
‘थके हुए कलाकार से’ कविता के द्वारा कवि ने प्रेरणा दी है
(क) गति करने की
(ख) निरन्तर चलने की
(ग) निराश न होने की
(घ) निराश होने की।
उत्तर:
(ख) निरन्तर चलने की

प्रश्न 3.
सृष्टि का सृजनकर्ता कौन है?
(क) कलाकार
(ख) ईश्वर
(ग) मानव
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) ईश्वर

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. अधूरी धरा पर नहीं है कहीं, अभी ………. की नींव का भी पता।
  2. अभी अधखिली ज्योत्स्ना की कली,नहीं जिन्दगी की …………. में सनी।
  3. रुका तू, गया रुक ………. का सृजन।

उत्तर:

  1. स्वर्ग
  2. सुरभि
  3. जग।

सत्य/असत्य

  1. ‘थके हुए कलाकार से’ कविता में धर्मवीर भारती ने निरन्तर चलते रहने की प्रेरणा दी है।
  2. कलाकार प्रलय होने पर कला को त्याग देता है।
  3. इस कविता में कवि ने प्राकृतिक उपमानों का प्रयोग नहीं किया है।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 4 थके हुए कलाकार से img-1
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (क)
3. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘थके हुए कलाकार से’ के कृतिकार का नाम लिखिए। (2018)
  2. ‘थके हुए कलाकार से’ कविता में कवि ने क्या प्रेरणा दी है?
  3. कलाकार अपना सम्पूर्ण जीवन किसको समर्पित कर देता है?

उत्तर:

  1. धर्मवीर भारती
  2. निरन्तर चलने की
  3. कला को।

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MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 2 तेरे घर पहिले होता विश्व सबेरा

MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 2 तेरे घर पहिले होता विश्व सबेरा (कविता, माखनलाल चतुर्वेदी)

तेरे घर पहिले होता विश्व सबेरा अभ्यास

कविता

प्रश्न 1.
‘नक्षत्रों पर बैठे पूर्वज माप रहे उत्कर्ष’ का आशय स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
नक्षत्रों पर बैठे पूर्वज माप रहे उत्कर्ष से कवि का अभिप्राय है प्रारम्भ में भारत अंग्रेजों के अधीन था लेकिन जब भारत देश स्वतन्त्र हो गया तब उन्होंने एक स्वतन्त्र वातावरण में चैन की साँस ली। कवि का कथन है कि तुमने एक स्वतन्त्र वातावरण में भारत को विजयी देखा है लेकिन अब तुम्हें हमेशा ही चैतन्य रहना है तथा देश की रक्षा के लिए सदैव उद्यत रहना है,क्योंकि हमारे पूर्वज जिन्होंने देश के लिए बलिदान करके स्वर्णिम भविष्य का सपना सँजोया था। आज उसे पुनः उत्कर्ष रूप में देखने के अभिलाषी हैं।

प्रश्न 2.
‘उपनिवेश के दाग’ को कवि ने किसे कहा है? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
भारत अंग्रेजों के अधीन था। यह गुलामी ही भारत और भारतवासियों के लिए उपनिवेश का दाग है क्योंकि अंग्रेजों के शासन में भारतीयों को अपने ही देश में रहकर अंग्रेजों की गुलामी और चाटुकारिता करनी पड़ती थी। ऐसा न करने पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता था। इसी दासता को कवि ने उपनिवेश का दाग कहा है।

प्रश्न 3.
कवि स्वतन्त्रता को स्थायी रखने के लिए क्या चाहता है?
उत्तर:
कवि स्वतन्त्रता को स्थायी रखने के लिए यह चाहता है कि हमें हर पल सचेत रहना चाहिए, क्योंकि शत्रु कभी भी चालाकी से हमारे देश पर आक्रमण कर सकता है। अतः हे भारतभूमि के वीरो! तुम देश की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहो, क्योंकि अब देश की स्वतन्त्रता का सारा भार भारतवासियों के कन्धों पर है।

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प्रश्न 4.
प्रस्तुत कविता का केन्द्रीय भाव स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
‘तेरे घर पहिले होता विश्व सवेरा’ कविता में कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने बताया है कि वर्षों से ब्रिटिश शासन के अधीन रहने वाले भारतीयों ने स्वतन्त्र होने के उपरान्त खुली हवा में चैन की साँस ली। लेकिन कवि का कथन है कि हमें सदैव जागरूक रहना होगा। इस अग्नि को प्रज्ज्वलित करने के लिए हमें तिरंगा उड़ाकर लोगों को देश प्रेम व स्वतन्त्रता की अनुभूति करानी होगी।

युद्ध के नगाड़े भारत की विजय का गुणगान कर रहे हैं। ये आकाश में उड़ने वाले वायुयान किसके हैं। जिस प्रकार से स्वर्ण को घिस कर परखा जाता है, उसी प्रकार हमारे देश के सैनिकों को रणभूमि के लिए परख कर तैयार किया जाता है।

कवि ने पूर्व और पश्चिम को प्रहरी की संज्ञा प्रदान की है। प्रत्येक भारतवासी की प्रतिभा विलक्षण है। ये श्रम करने को तत्पर रहते हैं तथा देश की बलिवेदी पर अपने प्राणों को बलिदान करने के लिए तत्पर रहते हैं। भारतभूमि के तीन ओर समुद्र है। यहाँ पर भाग्य रूपी पतवारों के द्वारा नाव चलती है। जिस प्रकार जल में लहरें निरन्तर उठती हैं,उसी प्रकार हम भारतवासी अपने देश के झंडे की रक्षा हेतु एक सजग प्रहरी की भाँति तत्पर रहते हैं।

कवि का कथन है शत्रु को कुचलते हुए हमारा देश विजयी हो। जिस ब्रिटिश साम्राज्य के टुकड़े-टुकड़े हो गये, अब हमें उन शासकों से डरने की आवश्यकता नहीं है। आज हमारे ऊपर अपने देश की रक्षा का भार है। हम सभी भारतवासी क्रोधाग्नि से युक्त होकर हाथों में शस्त्र लेकर युद्ध करने को हर पल तैयार हैं। तुम तनिक-सा संकेत करके परीक्षा करो। तुम्हारे एक संकेत पर सैकड़ों भारतवासी मर मिटने को तैयार हो जायेंगे।

प्रश्न 5.
‘तेरे घर पहिले होता विश्व सबेरा’ कविता के माध्यम से कवि क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
‘तेरे घर पहिले होता विश्व सबेरा’ कविता के माध्यम से कवि ने सन्देश दिया है कि भारत देश के निवासी अन्य देशों की अपेक्षा उत्तम व श्रेष्ठ हैं। सबसे पहले भारत में स्वतन्त्रता का सूर्य उदय हुआ। आज तेरे ही घर में अर्थात् भारतवासियों ने सबसे पहले स्वतन्त्र और उन्मुक्त वातावरण में साँस ली। आज हम सभी का कर्त्तव्य है कि अपने देश की रक्षा करें। देश के स्वाभिमान के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने को तत्पर रहें। हम भारतवासियों को अपने देश की तथा मातृभूमि की रक्षा के लिए सदैव सचेत रहना चाहिए।

हम सभी एकजुट होकर अपने तिरंगे की शान को बनाये रखें। यही कवि के द्वारा दिया गया सन्देश है। हम एकता के सूत्र में बँधकर ही देश के विकास एवं प्रगति का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।

प्रश्न 6.
कवि देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या चाहता है? (2012, 14)
उत्तर:
कवि देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चाहता है कि सभी देशवासी प्रहरी को भाँति जाग्रत रहें और वे कभी भी अपने कर्त्तव्य से विचलित न हों। जब शत्रु प्रबल वेग से आगे बढ़े तो सभी देशवासियों को एकजुट होकर विजयी बनने की प्रबल आकांक्षा रखनी चाहिए। आत्मनिर्भर रहने के लिए व्यक्ति को कर्त्तव्यनिष्ठ होना आवश्यक है। कर्त्तव्यपालन वही व्यक्ति कर सकता है जो अपनी मातृभूमि से प्यार करता हो तथा उसकी सुरक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने को तत्पर हो।

देश के नागरिकों को अपने दायित्व का बोझ होना, भुजाओं में शस्त्र तथा नेत्रों में क्रोधाग्नि प्रज्वलित करना अपेक्षित है। तेरी एक हुँकार पर करोड़ों मानव स्वयं को बलिदान करने के लिए तत्पर हैं।

तेरे घर पहिले होता विश्व सवेरा महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

तेरे घर पहिले होता विश्व सवेरा बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तेरे घर पहिले होता विश्व सवेरा सम्बोधन है
(क) धरती के लिए
(ख) विश्व के लिए
(ग) देश के लिए
(घ) भारतभूमि के लिए।
उत्तर:
(घ) भारतभूमि के लिए।

प्रश्न 2.
उपनिवेश का दाग से कवि का आशय है
(क) बन्धन
(ख) ब्रिटिश शासन की परतन्त्रता
(ग) दासता
(घ) मुगल शासन की दासता
उत्तर:
(ख) ब्रिटिश शासन की परतन्त्रता

प्रश्न 3.
रत्नाकर शब्द किसके लिए प्रयोग किया है?
(क) रत्नों का भण्डार
(ख) लहरों के लिए
(ग) समुद्र
(घ) किसी के लिए नहीं।
उत्तर:
(ग) समुद्र

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. मुक्त पवन है, मुक्त गगन है, ……………. साँस गर्वीली।
  2. तेरे नभ पर उड़ जाते हैं ………… किसके?
  3. अरे ………… तुझे उड़ाएँ जगा जगा कर आग।

उत्तर:

  1. मुक्त
  2. वायुयान
  3. तिरंगे।

सत्य/असत्य

  1. कवि देश को पराधीन देखना चाहता है।
  2. यह कविता माखनलाल चतुर्वेदी ने स्वतन्त्रता के पश्चात् लिखी है।
  3. ब्रिटिश राज्य में भारतवासी सुखी व प्रसन्न थे।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 2 तेरे घर पहिले होता विश्व सबेरा img-1
उत्तर:
1. → (ख)
2. → (ग)
3. → (क)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. तेरे घर पहिले होता विश्व सवेरा कविता में कौन-सी भावना है?
  2. भारत देश का राष्ट्रीय ध्वज कौन-सा है?
  3. माखनलाल चतुर्वेदी ने इस कविता के द्वारा भारतवासियों को क्या प्रेरणा दी है?

उत्तर:

  1. देशप्रेम की
  2. तिरंगा
  3. देश की स्वतन्त्रता व स्वाभिमान की रक्षा करने की।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 11 मन की एकाग्रता

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 11 मन की एकाग्रता (निबंध, पं. बालकृष्ण भारद्वाज)

मन की एकाग्रता अभ्यास

बोध प्रश्न

मन की एकाग्रता अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
छात्रों की क्या समस्या है?
उत्तर:
छात्रों की समस्या मन का विचलन (चंचलता) है।

प्रश्न 2.
स्थित प्रज्ञता कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर:
इन्द्रिय और मन विषयों से अनासक्त ही हो जाते हैं तब स्थित प्रज्ञता प्राप्त होती है।

प्रश्न 3.
मन कितने प्रकार से उत्तेजित होता है?
उत्तर:
मन दो प्रकार से उत्तेजित होता है-बाह्य विषयों से तथा अन्दर की वासनाओं से।

प्रश्न 4.
गीता में परं का अर्थ क्या है?
उत्तर:
गीता में परं का अर्थ परमात्मा है।

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मन की एकाग्रता लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्जुन की स्वीकारोक्ति को लिखिए।
उत्तर:
अर्जुन की स्वीकारोक्ति है कि चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने की तरह दुष्कर है।

प्रश्न 2.
मन को एकाग्र करने के बाह्य साधन क्या हैं?
उत्तर:
यम, नियम, हठयोग आदि मन को एकाग्र करने के बाह्य साधन हैं। इनेके द्वारा मन की वासनाएँ कुछ समय के लिए दवाई जा सकती हैं।

प्रश्न 3.
छात्र की समस्याएँ कौन-कौनसी हैं?
उत्तर:
छात्र की समस्या यह है कि जब वह अध्ययन करने बैठता है तो उसके मन में विभिन्न प्रकार के विचार आने लगते हैं। वह सोचता है कि वह उच्च श्रेणी में परीक्षा पास करके ऊँचा पद प्राप्त करे। परन्तु वह पढ़ने बैठता है तो क्रिकेट खेलने, सिनेमा देखने तथा मस्ती करने के विचार मन में उठने लगते हैं। अध्ययन में मन न लगने के कारण वह घबरा जाता है। उसे परीक्षा की बैचेनी होती है। वह समझ नहीं पाता है कि क्या करे, कैसे करे। उसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगता है।

प्रश्न 4.
इन्द्रियों का कार्य क्या होना चाहिए?
उत्तर:
इन्द्रियों का कार्य विषय सेवन है किन्तु उन्हें संयमित रहकर विषय सेवन करना चाहिए। अनिवार्य विषयों में इन्द्रियों को प्रवृत्त होना चाहिए तथा धर्म द्वारा वर्जित विषयों से बचना चाहिए। इस प्रकार इन्द्रियों का कार्य है कि वे नियन्त्रित रहकर अनिवार्य विषयों का सेवन करें।

मन की एकाग्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयम को समझाइए।
उत्तर:
संयम का अर्थ है नियन्त्रण। संसार में संयम अति आवश्यक है। बिना संयम के हर प्रकार के भोग हानिकारक होते में हैं। इसीलिए इन्द्रिय निग्रह या संयम आवश्यक माना गया है। इन्द्रियों का विषय-सेवन संयमित नहीं होगा तो अनाचरण व्याप्त हो जायेगा। अतः जीवन में संयम का विशेष महत्व है। संयम के बिना स्वस्थ समाज की रचना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 2.
परं उच्च लक्ष्य का तात्पर्य क्या है?
उत्तर:
परं उच्च लक्ष्य का तात्पर्य समाज संगठन, राष्ट्र भक्ति, दरिद्र सेवा, ज्ञान प्राप्ति आदि श्रेष्ठ कार्यों से है। गीता में हैं परं का अर्थ परमात्मा बताया गया है। कहा गया है कि समस्त जगत परमात्मा ही है। इसलिए विश्व के श्रेष्ठ कार्यों में लगना परमात्मा के प्रति समर्पण है। धन, शक्ति, राज्य आदि संसार के सामान्य लक्ष्य हैं। उच्च कार्यों में संलग्न होना परमात्मा का ध्यान है। छात्र का परम लक्ष्य अध्ययन में लग जाना है।

मन की एकाग्रता भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 11 मन की एकाग्रता img-1

प्रश्न 2.
दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:

  1. चंचल-चपल, विचलन।
  2. कामनाएँ-इच्छाएँ, वासनाएँ।
  3. निग्रह-संयम, नियन्त्रण।

प्रश्न 3.
उपसर्ग का नाम उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 11 मन की एकाग्रता img-2

प्रश्न 4.
समास विग्रह कर समास का नाम बताइए।
उत्तर:
MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 11 मन की एकाग्रता img-3

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मन की एकाग्रता महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

मन की एकाग्रता बहु विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गीता में परं का अर्थ है-
(क) बड़ा
(ख) अन्य
(ग) परमात्मा
(घ) विशाल।
उत्तर:
(ग) परमात्मा

प्रश्न 2.
मन की एकाग्रता की समस्या है
(क) सनातन
(ख) प्राचीन
(ग) आधुनिक
(घ) अकल्पनीय।
उत्तर:
(क) सनातन

प्रश्न 3.
इन्द्रिय और मन से संयमित बुद्धि का नाम है-
(क) एकाग्रता
(ख) स्थित प्रज्ञता
(ग) विद्वता
(घ) निश्चयात्मक बुद्धि।
उत्तर:
(ख) स्थित प्रज्ञता

प्रश्न 4.
मन कितने प्रकार से उत्तेजित होता है?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) सात।
उत्तर:
(ख) दो

प्रश्न 5.
छात्रों के लिए परम लक्ष्य है
(क) मनोरंजन
(ख) धनार्जन
(ग) पूजा-पाठ
(घ) अध्ययन।
उत्तर:
(घ) अध्ययन।

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. स्थित प्रज्ञता इन्द्रिय और मन से संयमित ……….. का नाम है।
  2. …………. मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है।
  3. ………….. वह है जिसकी बुद्धि अस्थिर, चंचल तथा विचलित नहीं है।
  4. ……….. की विषय रस की चार बाह्य दमन से नष्ट नहीं होती है।
  5. अनियन्त्रित ………. समाज में अनाचार पनपाएँगी।

उत्तर:

  1. बुद्धि
  2. चंचल
  3. स्थित प्रज्ञ
  4. इन्द्रियों
  5. इच्छाएँ

सत्य/असत्य

  1. मन की एकाग्रता की समस्या सनातन है।
  2. आज का युग अर्थ प्रधान युग है।
  3. आन्तरिक मनश्चक्र की गति नियन्त्रित वेग से चलती रहती है।
  4. इन्द्रियों की विषय रस की चाह बाह्य दमन से नष्ट नहीं होती है।
  5. ईश्वर और विश्व भिन्न-भिन्न हैं।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 11 मन की एकाग्रता img-4
उत्तर:
1. → (ग)
2. → (ङ)
3. → (घ)
4. → (क)
5. → (ख)

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एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘मन की एकाग्रता’ पाठ के लेखक कौन हैं?
  2. “चंचल मन का निग्रह वायु की गति रोकने के समान दुष्कर है।” यह स्वीकारोक्ति किसकी
  3. मन की पूर्ण एवं स्थायी एकाग्रता कराने का उपाय किसमें है?
  4. इन्द्रिय और मन से संयमित बुद्धि का नाम क्या है?
  5. गीता में परं का क्या अर्थ है?

उत्तर:

  1. पं. बालकृष्ण भारद्वाज
  2. अर्जुन की
  3. गीता के स्थितप्रज्ञ के विवरण में
  4. स्थित प्रज्ञता
  5. परमात्मा।

मन की एकाग्रता पाठ सारांश

‘मन की एकाग्रता’ कहानी के लेखक पं. बालकृष्ण भारद्वाज हैं। प्रस्तुत कहानी में पं. बालकृष्ण भारद्वाज ने छात्र को गीता के स्थित प्रज्ञ सिद्धान्त का अनुसरण करने का सत्परामर्श दिया है।

आज के प्रौद्योगिकी युग में भौतिक उन्नति के प्रति आकर्षित छात्र को मन की चंचलता का संकट झेलना पड़ रहा है। चंचल मन के कारण वह धन-वैभव के प्रति लालायित हो रहा है और उसका अन्तर्मन अनेक अभिलाषाओं में भटकता है । उसको नियन्त्रित करने का उपाय गीता के स्थित प्रज्ञ सिद्धान्त में है। इसके लिए मन को वासनाओं से दूर रखें तथा इन्द्रियों को भोगों में न लगाएँ। हठयोग द्वारा इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लें तब भी मौका मिलने पर विषय मन में विकसित हो जाते हैं। इसलिए मन को उच्च लक्ष्य में लगाकर विषय-वासना को नष्ट करना चाहिए। गीता के अनुसार ईश्वर और जगत एक ही हैं। अतः सभी के प्रति सेवा भाव वासनाओं को शुद्ध करके मानव मन को नियन्त्रित करता है। उससे इन्द्रियगत विषय भोग भी नियन्त्रित रहता है जिसके फलस्वरूप समाज में सदाचरण पनपता है।

मन की एकाग्रता संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) मन की एकाग्रता की समस्या सनातन है। आज के प्रौद्योगिकी युग में जहाँ भौतिक उन्नति की संभावनाएँ अपार हैं ऐसे में छात्र जब अध्ययन करने बैठता है, तब उसके मन को अनेक तरह के विचार घेरने लगते हैं। वह सोचता है इस अर्थ प्रधान युग में मुझे उत्कृष्ट पद प्राप्ति के लिए एकाग्र मन से पढ़कर परीक्षा में उच्चतम श्रेणी प्राप्त करना आवश्यक है। लेकिन वह जब पढ़ने बैठता है तो क्रिकेट, सिनेमा या मित्र मण्डली की मौज मस्ती के विचार में उसका मन भटकने लगता है। मन का यह विचलन बुद्धि की एकाग्रता भंग कर देता है।

कठिन शब्दार्थ :
एकाग्रता = एकनिष्ठता। सनातन = चिरकाल से चली आ रही। अपार = असीमित। उत्कृष्ट = ऊँचा। विचलन = चंचलता।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘मन की एकाग्रता’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक पं. बालकृष्ण भारद्वाज हैं।

प्रसंग :
इस अंश में छात्र के मन की एकाग्रता की समस्या के विषय में बताया गया है।

व्याख्या :
इस जगत में मन की एकाग्रता की समस्या चिरकाल से चली आ रही है। वर्तमान समय औद्योगिकीकरण का है, इससे भौतिक सम्पन्नता का आकर्षण बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के मन में विभिन्न प्रकार की बातें आना स्वाभाविक है। उसे लगता है कि आज के अर्थ प्रधान समय में उसे एकनिष्ठ मन से पढ़कर ऊँची श्रेणी में परीक्षा पास करनी चाहिए। इससे ही वह ऊँचा पद पा सकेगा। परन्तु जब वह पढ़ना प्रारम्भ करता है तो उसके मन में क्रिकेट खेलने, सिनेमा देखने अथवा मस्ती करने आदि के विचार आने लगते हैं। इससे उसका मन इधर-उधर भटकने लगता है। मन की यह चंचलता एकाग्र होकर पढ़ने में लगने वाली बुद्धि को भटका देती है। फलस्वरूप वह पढ़ नहीं पाता है।

विशेष :

  1. आज के भौतिकवादी युग में छात्र के मन के भटकाव के संकट से परिचित कराया गया है।
  2. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया
  3. विचारात्मक शैली में विषय को समझाया है।

(2) यम-नियम, आसन, प्राणायाम आदि कुछ क्षण के लिए मन को एकाग्र कर सकते हैं पर ये सब मन की पूर्ण और स्थायी एकाग्रता कराने में समर्थ नहीं हैं। इसका पूर्ण उपाय गीता के स्थित प्रज्ञ के विवरण में है। स्थित प्रज्ञ वह है जिसकी बुद्धि अस्थिर, चंचल तथा विचलित नहीं है। स्थित प्रज्ञता इन्द्रिय और मन से संयमित बुद्धि का नाम है।

कठिन शब्दार्थ :
मन = संकल्प करने वाला। बुद्धि = निश्चय करने वाली।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ बताया गया है कि योग द्वारा मन को स्थायी रूप से एकाग्र करना सम्भव नहीं है।

व्याख्या :
मन की एकाग्रता के लिए यम-नियम, प्राणायाम आदि की योग-साधना की जाए तो मन कुछ समय के लिए एकनिष्ठ हो जाता है। लेकिन मन को पूरी तरह स्थायी रूप से एकाग्र करना इस साधना से सम्भव नहीं है। मन के अन्दर वासनाओं के कुछ संस्कार रह जाते हैं। मन की एकाग्रता का स्थायी उपाय गीता द्वारा बताया गया स्थित प्रज्ञ दर्शन है। स्थित प्रज्ञ वह होता है जिसकी चंचलता से मुक्त होकर एकाग्र हो जाये। वस्तुतः स्थित प्रज्ञता उस बुद्धि को कहते हैं जिसने मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लिया हो। ऐसी बुद्धि ही एकनिष्ठ होती है।

विशेष :

  1. इसमें मन की एकाग्रता का साधन स्थित प्रज्ञता को बताया गया है।
  2. साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
  3. विचारात्मक शैली में विषय को प्रतिपादित किया गया है।

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(3) स्थित प्रज्ञ दर्शन में बुद्धि की स्थिरता के लिए आवश्यक है कि मन को विषयों के पास न ले जावें, पर यह तभी सम्भव है जब मन इन्द्रियों के भोगों में आसक्त न हो, उनसे दूर रहे, मन इन्द्रियों से दूर तभी तक रह सकता है जब उसमें रहने वाली कामनाएँ नष्ट हो जायें। पर कामनाओं का अभाव तभी सम्भव है जब व्यक्ति अन्य वस्तुओं के बिना स्वयं सन्तुष्ट हो।

कठिन शब्दार्थ :
स्थित प्रज्ञ = इन्द्रिय और मन से संयमित बुद्धि। आसक्त = अति लगावमय, लीन। कामनाएँ = मन की इच्छाएँ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ गद्यांश में बताया गया है कि व्यक्ति के स्वयं में सन्तुष्ट होने पर ही बुद्धि स्थिर होती है।

व्याख्या :
गीता के स्थित प्रज्ञ दर्शन में स्पष्ट बताया गया है कि मन को विषय-वासनाओं के निकट नहीं जाने दें। मन वासनाओं से तभी दर रह पायेगा जब वह इन्द्रियों के भोग से मुक्त रहेगा। यह तभी सम्भव है जब मनोकामनाएँ समाप्त हो जायें। मन की इच्छाओं का नष्ट होना तभी हो पायेगा जब व्यक्ति स्वयं में ही सन्तुष्ट रहे और उसमें किसी अन्य वस्तु के प्रति आकर्षण न हो।

विशेष :

  1. बुद्धि की स्थिरता के लिए मन का कामना रहित होना आवश्यक है।
  2. साहित्यिक खड़ी बोली में विषय को समझाया गया है।
  3. विचारात्मक शैली अपनाई गई है।

(4) अनियन्त्रित इच्छाएँ समाज में अनाचार पनपायेंगी। लोग कामनाओं से आवेशित होकर निषिद्ध आचरण में प्रवृत्त होवेंगे। अतः इन्द्रियों द्वारा विषयों का सेवन तो हो पर विवेक शून्य आसक्ति न हो। इन्द्रियाँ अपने वश में रहें। उन पर अंकुश रहे अनिवार्य विषयों में इन्द्रियाँ प्रवृत्त हों, पर निषिद्ध वर्जित विषयों में नहीं।

कठिन शब्दार्थ :
निषिद्ध = धर्म द्वारा वर्जित। प्रवृत्त = संलग्न। वर्जित = मना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
यहाँ पर इन्द्रियों के नियन्त्रण की अनिवार्यता से अवगत कराया गया है।

व्याख्या :
जब मन की कामनाओं पर कोई नियन्त्रण नहीं होगा तो वे असंगत कार्यों के लिये भी प्रेरित करेंगी। इस तरह दुराचार को बढ़ावा मिलेगा। फल यह होगा कि मन धर्म द्वारा वर्जित आचरण में संलग्न होने लगेगा। अनाचार फैलने से समाज व्यवस्था नष्ट हो जायेगी। इसलिए यह आवश्यक है कि इन्द्रियों पर नियन्त्रण हो। इन्द्रियाँ अनासक्त भाव से अनिवार्य विषयों का ही सेवन करें। धर्म द्वारा वर्जित विषयों से वे पूरी तरह विरक्त रहें।

विशेष :

  1. इन्द्रियों के विषय भोग पर नियन्त्रण को आवश्यक बताया गया है।
  2. संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
  3. विचारात्मक शैली को अपनाया गया है।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री (कहानी, सियाराम शरण गुप्त)

बैल की बिक्री अभ्यास

बोध प्रश्न

बैल की बिक्री अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
खेतों के पौधे असमय में ही क्यों मुरझा रहे थे?
उत्तर:
खेतों के पौधे समय पर वर्षा न होने के कारण असमय में ही मुरझा रहे थे।

प्रश्न 2.
महाजन का नाम क्या था?
उत्तर:
महाजन का नाम ज्वाला प्रसाद था।

प्रश्न 3.
किसान के हाथ-पैर किसे कहा गया है?
उत्तर:
बैलों को किसान के हाथ-पैर कहा गया है।

प्रश्न 4.
शिबू अपना बैल बेचने कहाँ जाता है?
उत्तर:
शिबू अपना बैल रामपुर की हाट में बेचने जाता है।

प्रश्न 5.
डाकुओं की कुल संख्या कितनी थी?
उत्तर:
डाकुओं की कुल संख्या पाँच थी।

प्रश्न 6.
मोहन रामधन के साथ कहाँ गया?
उत्तर:
मोहन रामधन के साथ ज्वाला प्रसाद महाजन के यहाँ गया था।

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बैल की बिक्री लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मोहन शिबू के विषय में क्यों चिन्तित था?
उत्तर:
मोहन को शिबू के विषय में इसलिए चिन्ता थी कि वह जवान हो चुका था और उसे घर के काम-काज से कोई सरोकार न था।

प्रश्न 2.
मोहन को अपने स्वर्गीय पिता का स्मरण क्यों हुआ?
उत्तर:
जब भी शिबू के उद्दण्ड व्यवहार से मोहन दुःखी होता था, तब उसे अपने मृत पिता की याद आ जाती क्योंकि उसने भी अपने पिता को कम नहीं खिझाया था। पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे बड़ा साधन कदाचित् बच्चे को प्यार करना ही है।

प्रश्न 3.
शिबू द्वारा बैल का अपमान करने पर मोहन की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
मोहन को अपने पुत्र शिबू के बैल के प्रति किये व्यवहार से बहुत दुःख हुआ। उसने बैल की सार की अच्छी तरह सफाई की, बैल को पानी पिलाने ले गया, उसको नहलाया, फिर भूसा डाला, इसके बाद घर से रोटी लाकर उसके टुकड़े-टुकड़े करके खिलाया।

प्रश्न 4.
बैल को बेचने के लिए जाते हुए मोहन ने शिबू से क्या कहा?
उत्तर:
बैल को बेचने के लिए जाते हुए मोहन ने शिबू से कहा-एक बात बेटा, मेरी मानना। बैल किसी भले आदमी को देना जो उसे अच्छी तरह रखे। दो-चार रुपये कम मिलें तो ख्याल न करना।

प्रश्न 5.
शिबू ने डाकुओं का प्रतिकार किस प्रकार किया?
उत्तर:
पहले तो शिबू छाती तानकर खड़ा हो गया। बोला। मैं रुपये नहीं दूंगा। इसके बाद दूसरे डाकू के बन्दूक के कुन्दे को मारने पर उसने कुन्दे को इस तरह पकड़ लिया जिस तरह सपेरे साँप का फन पकड़ लेते हैं। अपने को आगे ठेलता हुआ वह बोला-तुम मुझे मार सकते हो, परन्तु रुपये नहीं छीन सकते। शिबू के साहस को देखकर डाकुओं से लुटे-पिटे व्यक्ति भी एक साथ आ गये, जिन्हें देखकर डाकू भाग खड़े हुए।

प्रश्न 6.
ज्वाला प्रसाद ने मोहन से क्या कहा?
उत्तरे:
ज्वाला प्रसाद ने मोहन से कहा कि वायदे बहुत हो चुके। अब हमारे रुपये अदा कर दो, नहीं तो अच्छा न होगा।

बैल की बिक्री दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मोहन शिबू को बैल बेचने से क्यों मना करता है?
उत्तर:
बैल बेचने के बचाव में मोहन ने शिबू को डाँटते हुए कहा-“चुप रह! घर में जोड़ी न होती तो इतनी बातें बनाना न आता। बैल किसान के हाथ-पैर होते हैं। एक हाथ टूट जाने पर कोई दूसरा भी कटा नहीं डालता। मैं इसका जोड़ मिलाने की फ्रिक में हूँ, तू कहता है-बेच दो। दूर हो, जहाँ जाना हो चला जा। मैं सब कर लूँगा।” वह दोगुने प्यार से उसका ख्याल रखता है।

प्रश्न 2.
दद्दा के दोपहर में न आने पर शिबू ने क्या किया?
उत्तर:
सबेरे ज्वाला प्रसाद के आदमी के साथ गए दद्दा दोपहर तक रोटी खाने भी नहीं आए हैं। यह जानकर शिबू झपाटे के साथ घर से निकलकर ज्वाला प्रसाद के यहाँ जा पहुँचा। वहाँ उसने पिता को मुँह सुखाए, पसीने-पसीने एक जगह बैठा देखा। ज्वाला प्रसाद द्वारा रुपये की कहने पर उसने कहा-अपनी रुपहट्टी लोगे या किसी की जान? अरे, कुछ तो दया होती! बूढ़े ने सवेरे से पानी तक नहीं पिया। तुम कम-से-कम चार दफे दूंस चुके होंगे। अपने पिता से यह कहकर कि मैं तुम्हें कसाई की गाय की तरह मरने न दूंगा और रामपुर की हाट में सोमवार को बैल बेचकर उनकी कौड़ी पाई चुका दूँगा, उनका हाथ पकड़कर झकझोरता हुआ साथ ले गया। साहूकार चुपचाप देखता रह गया, एक शब्द भी उसके मुँह से नहीं निकला।

प्रश्न 3.
शिबू द्वारा किये गये व्यवहार की ज्वाला प्रसाद पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
शिबू के व्यवहार से ज्वाला प्रसाद हतबुद्धि होकर ज्यों के त्यों बैठे रहे। उन्होंने शिबू के जैसा निर्भय आदमी न देखा था। उनके मुँह पर ही उन्हें कसाई बनाया गया। गुस्सा की अपेक्षा उन्हें डर ही अधिक मालूम हुआ।

प्रश्न 4.
बैल के बेचने का निश्चय होते ही मोहन की हालत कैसी हो गई?
उत्तर:
बैल के बेचने का निश्चय होते ही दो दिन में ही ऐसा जान पड़ने लगा-मानो मोहन बहुत दिन का बीमार हो। दिनभर वह बैल के विषय में ही सोचा करता। रात को उठकर कई बार बैल के पास जाता। रात के एकान्त में जब उसे अवसर मिलता, बैल के गले से लिपटकर प्रायः आँसू बहाने लगता।

प्रश्न 5.
बैल को बेचने के पश्चात् शिबू की मानसिक स्थिति का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
बैल बेचने के पश्चात् शिबू घर लौट रहा था। रुपये उसकी अण्ढी में थे तो भी आज उसकी चाल में बहुत तेजी नहीं थी, जो जाते समय थी। न जाने, कितनी बातें उसके भीतर आ-जा रही थीं। बैल के बिना उसे सूना-सूना मालूम हो रहा था। आज के पहले वह यह बात किसी तरह न मानता कि उसके मन में भी उस क्षुद्र प्राणी के लिए इतना प्रेम था। बार-बार उसे बैल की सूरत याद आती। उसके ध्यान में आता मानो विदा होते समय बैल भी उदास हो गया था। उसकी आँखों में आँसू छलक आये थे। बैल का विचार दूर करता तो पिता का सूखा बेहरा सामने आ जाता। बैल और पिता मानो एक ही चित्र के दो ख थे। लौट फिर कर एक के बाद दूसरा उसके सामने आ जाता था।

प्रश्न 6.
शिबू का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
शिबू किसान मोहन का लड़का था। वह उद्दण्ड स्वभाव का था। उसे घर के काम-काज से कोई सरोकार नहीं था। खाना-पीना और इधर-उधर आवारागर्दी में घूमना ही उसका काम था।

इसके अतिरिक्त वह महाजन तथा साहूकारों से घृणा करता था। वह किसी से दबता नहीं था। वह साहसी था। जब डाकुओं ने उसे पकड़ लिया तब वह उनसे भी लड़ने-मरने को आमादा हो जाता है। उसके साहस से ही डाकू भाग जाते हैं और वह लुटे हुए लोगों को स्वतन्त्र करा देता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
“भीड़ में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आया। …………. अब लुट जाए तो मैं जिम्मेदार नहीं।”।
उत्तर:
लेखक कहता है कि डाकुओं द्वारा पकड़े हुए व्यापारियों में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आता है और कहता है अरे भैया तुम कौन, शिबू माते? आज तुमने इतने आदमियों को डाकुओं के चंगुल से बचा दिया, तुम धन्य हो।

शिबू ने कहा यह वही ज्वाला प्रसाद है जिसने अपने कर्ज के रुपये के लिए मेरे पिता को बन्धक बना लिया था। उस समय उसके शरीर पर धोती के अलावा और कोई वस्त्र नहीं था। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से भर गया था। शिबू ने बैल बेचने से मिले हुए रुपयों को अपनी अण्टी से निकालकर उसके सामने रखते हुए कहा कि यह आज एक बहुत बड़ी बात हुई कि शिबू माते अर्थात् मैं तुम्हें यहीं मिल गया। लो अपने कर्ज के रुपये चुकता कर लो। आगे तुम लुट जाओ तो मैं इसका जिम्मेदार नहीं हूँ।

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बैल की बिक्री भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद कीजिए
उत्तर:

  1. अन्तस्तल = अन्तः + स्तल (स्थल)।
  2. प्रेमातुर = प्रेम + आतुर।
  3. सज्जन = सत् + जन।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का समास-विग्रहकीजिए
उत्तर:

  1. स्त्री-पुरुष = स्त्री और पुरुष।
  2. यथासमय = समय के अनुसार।
  3. क्षतिपूर्ति = क्षति की पूर्ति।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के लिए एक-एक शब्द लिखिए-

  1. जो किसी से भयभीत न हो।
  2. जिसे ज्ञान न हो।
  3. जिसके पास धन नहीं है।
  4. जो क्षय न हो।

उत्तर:

  1. निर्भय
  2. अज्ञानी
  3. निर्धन
  4. अक्षय।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए-

  1. बादल समय पर पानी नहीं देते थे। (विधानवाचक)
  2. सेठ ज्वाला प्रसाद अच्छे महाजन थे। (निषेधवाचक)
  3. शिबू बाबू बनकर डाकखाने में टिकट बेचेगा। (प्रश्नवाचक)
  4. मोहन बैल को बहुत प्यार करता है। (विस्मयादिवाचक)

उत्तर:

  1. बादल समय पर पानी देते थे।
  2. सेठ ज्वाला प्रसाद अच्छे महाजन नहीं थे।
  3. क्या शिबू बाबू बनकर डाकखाने में टिकट बेचेगा?
  4. ओहो! मोहन बैल को बहुत प्यार करता है।

प्रश्न 5.
आज्ञावाचक वाक्य किसे कहते हैं? उदाहरण देकर बताइए।
उत्तर:
आज्ञावाचक वाक्य में आज्ञा देकर कोई कार्य करवाया जाता है।
उदाहरण :
आप जाइये, और वहाँ से सामान लेकर आइये।

बैल की बिक्री महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बैल की बिक्री बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बैल की बिक्री’ कहानी में किस समस्या को प्रमुख रूप से उठाया गया है?
(क) साहूकारों की
(ख) ऋणग्रस्त लोगों की
(ग) नौजवानों की
(घ) ऋणग्रस्त किसानों की
उत्तर:
(घ) ऋणग्रस्त किसानों की

प्रश्न 2.
‘बैल की बिक्री’ कहानी का केन्द्रीय चरित्र है- (2017)
(क) मोहन
(ख) शिबू
(ग) साहूकार
(घ) मुनीम।
उत्तर:
(ख) शिबू

प्रश्न 3.
किसान के हाथ-पैर किसे कहा गया है? (2013)
(क) गाय
(ख) भैंस
(ग) बैल
(घ) बकरी।
उत्तर:
(ग) बैल

प्रश्न 4.
मोहन ने ऋण चुकाने के लिए क्या किया?
(क) अनाज बेच दिया
(ख) घर बेच दिया
(ग) बैल बेच दिया
(घ) खेत बेच दिया।
उत्तर:
(ग) बैल बेच दिया

प्रश्न 5.
शिबू ने बैल को कहाँ बेच दिया?
(क) मित्र को
(ख) साहूकार को
(ग) पड़ोसी को
(घ) रामपुर की हाट में
उत्तर:
(घ) रामपुर की हाट में

प्रश्न 6.
महाजन का नाम था (2016)
(क) अम्बिका प्रसाद
(ख) शिबू
(ग) मोहन
(घ) ज्वाला प्रसाद
उत्तर:
(घ) ज्वाला प्रसाद

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ‘बैल की बिक्री’ कहानी में लेखक ने ………… किसानों की समस्या को उठाया है।
  2. मेरे जीते जी इन रुपयों को ………….. के सिवा अन्य कोई नहीं ले सकता।
  3. ‘बैल की बिक्री’ एक ………….. कहानी है।
  4. महाजन का नाम …………. था। (2009)
  5. बादल चाहे जैसी शत्रुता रखें मगर खेती के लिए उनसे ………… वस्तु नहीं है।

उत्तर:

  1. ऋणग्रस्त
  2. महाजन
  3. मनोवैज्ञानिक
  4. ज्वालाप्रसाद
  5. प्यारी

सत्य/असत्य

  1. महाजन का नाम ज्वालाप्रसाद था। (2013)
  2. मोहन रामधन के साथ डाकू से मिलने गया। (2009)
  3. शिबू मोहन का लड़का है। (2018)
  4. शिबू डाकुओं को देखकर भाग गया क्योंकि वे संख्या में दो सौ के लगभग थे।
  5. सेठ ज्वालाप्रसाद उन्हीं महाजनों में से थे। विधाता के वर से उनका धन अक्षय था।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 10 बैल की बिक्री img-1
उत्तर:
1. → (ङ)
2. → (ग)
3. → (घ)
4. → (क)
5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘बैल की विक्री’ कहानी में लेखक ने किसानों की किस समस्या का चित्रण किया है?
  2. शिबू बैल बेचने कहाँ गया था?
  3. मोहन किसका कर्जदार है?
  4. किसान के हाथ-पैर किसको कहा गया है?
  5. ‘बैल की बिक्री’ कहानी के लेखक कौन हैं?

उत्तर:

  1. ऋणग्रस्तता
  2. रामपुर की हाट में
  3. ज्वालाप्रसाद
  4. बैल को
  5. सियाराम शरण गुप्त।

बैल की बिक्री पाठ सारांश

‘बैल की बिक्री’ कहानी के लेखक सियारामशरण गुप्त हैं। प्रस्तुत कहानी ग्रामीण जीवन तथा कृषकों की विभिन्न समस्याओं पर आधारित है। इस कहानी के माध्यम से गुप्त जी ने किसानों पर साहूकारों के द्वारा जो अत्याचार होते हैं उनका वर्णन किया है।

इस कहानी का प्रमुख पात्र मोहन एक ऋणग्रस्त किसान है। शिबू उसका इकलौता और निकम्मा लाडला बेटा है। मोहन ने ज्वालाप्रसाद नामक महाजन से कर्ज लिया है। यह परिवार एक बैलगाड़ी के सहारे से अपने परिवार का भरण-पोषण करता है लेकिन एक दिन बैलों की जोड़ी में से एक बैल की मृत्यु हो जाती है।

एक दिन साहूकार के द्वारा जब शिबू के पिता को बन्दी बना लिया गया तब शिबू को क्रोध आया और उसने सेठ ज्वालाप्रसाद का कर्ज चुकाने के लिए अपना बैल हाट में ले जाकर बेच दिया।

जब शिबू बैल बेचकर लौट रहा था तो रास्ते में उसे डाकू मिले वह डाकुओं का डटकर मुकाबला करता है और डाकू भाग जाते हैं। वहीं पर सेठ ज्वालाप्रसाद को शिबू उन्हें बैल की बिक्री के रुपये दे देता है और कहता है कि मैंने अपना कर्जा चुका दिया है। अब चाहे तुम लुट जाओ इसके जिम्मेदार तुम स्वयं ही होगे।

शिबू जब बैल को बेचने जा रहा था तब उसके पिता को बहुत दुःख हुआ क्योंकि बैल के प्रति उनके हृदय में ममता थी और उससे अलग होने की वेदना भी। शिबू का चरित्र भी लेखक ने मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया है। पिता के प्रति होने वाले अत्याचार को देख शिबू ने सेठ ज्वालाप्रसाद को मुँहतोड़ जवाब दिया। अपने पिता को उसके चंगुल से छुड़ा लाया। यह एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। परिस्थितियों के अनुरूप ही शिबू के व्यवहार में परिवर्तन हुआ है।

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बैल की बिक्री संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) कई साल से फसल बिगड़ रही थी। बादल समय पर पानी नहीं देते थे। खेती के पौधे अकाल वृद्ध होकर असमय में ही मुरझा रहे थे, परन्तु महाजनों की फसल का हाल ऐसा न था। बादल ज्यों-ज्यों अपना हाथ खींचते, उनकी खेती में त्यों-त्यों नये अंकुर निकलते थे। सेठ ज्वाला प्रसाद उन्हीं महाजनों में से थे। विधाता के वर से उनका धन अक्षय था। जिस किसान के पास पहुँच जाता, जीवन-भर उसका साथ न छोड़ता। अपने स्वामी की तिजोरी में निरन्तर जाकर भी दरिद्र की झोंपड़ी की माया उससे छोड़ी न जाती थी।

कठिन शब्दार्थ :
अकाल = बिना समय आये। वृद्ध = बूढ़ा, यहाँ नष्ट। विधाता = ईश्वर। वर = आशीर्वाद। अक्षय = कभी नष्ट न होने वाला।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘बैल की बिक्री’ कहानी से लिया गया है। इसके लेखक श्री सियारामशरण गुप्त हैं।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि सूदखोर लोगों का धन जिसे एक बार चंगुल में ले लेता है उसका उस सरलता से पीछा नहीं छूटता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि अनेक वर्षों से फसल बिगड़ रही थी। उसका कारण यह था कि समय पर वर्षा नहीं हो रही थी। खेती के पौधे वर्षा के न होने के कारण असमय ही सूख रहे थे लेकिन दूसरी ओर महाजनों (सूदखोरों) की फसल ऐसी नहीं थी। कहने का भाव यह है कि जैसे-जैसे वर्षा कम होती थी, फसल खराब होती थी, गरीब किसान अपना खर्च चलाने के लिए ऋणदाताओं के द्वार जाता था और उनसे ब्याज पर अधिक धन उधार लेता था।

इस प्रकार सूखा पड़ने पर महाजनों की फसल और अधिक हरी-भरी होती थी। बादल जैसे-जैसे अपना हाथ खींचते अर्थात् वर्षा कम होती थी, वैसे ही वैसे सूदखोरों की खेती में नये-नये अंकुर निकल आते थे। सेठ ज्वाला प्रसाद भी इसी वर्ग के महाजन थे। ईश्वर की उन पर ऐसी कृपा थी कि उनका धन कभी भी नष्ट नहीं होता था। उनका कर्ज का धन जिस किसान के पास भी पहुँच जाता, वह जीवन भर उस किसान का साथ नहीं छोड़ता था। वह तो उनकी तिजोरी में जाकर सुरक्षित हो जाता और वह कर्जदाताओं का कभी भी साथ नहीं छोड़ता था।

विशेष :

  1. कर्ज का धन कर्जदाताओं को उन्नति देता है, जबकि किसानों का वह खून पीता था।
  2. भाषा भावानुकूल।

(2) उस दिन मोहन ने सार की सफाई और अच्छी तरह की। बैल को पानी पिलाने ले गया तो सोचा इसे नहला हूँ। उजड्ड लड़के ने बैल का जो अपमान किया था, उसे वह उसके अन्तस्तल तक धो देना चाहता था। नहला चुकने पर अपने अंगोछे से पानी अंगोछा, बाँधने की रस्सी को भी पानी से धोना न भूला। सार में बाँधकर भूसा डाला। तब भी मन की ग्लानि दूर न हई, तो भीतर जाकर रोटी ले आया और टुकड़े-टुकड़े करके उसे खिलाने लगा। वह कहा करता था कि जानवर अपनी बात समझा नहीं सकते, परन्तु बहुत-सी बातें आदमियों से अधिक समझते हैं। इसलिए वह अनुभव कर रहा था कि बैल उसके प्रेम को अच्छी तरह हृदयंगम कर रहा है।

कठिन शब्दार्थ :
सार = पशुओं का चारा खिलाने की नौद। उजड्ड = असभ्य। अंतस्तल = हृदय तक। अंगोछा = पौंछा। ग्लानि = मन का पछतावा। हृदयंगम = हृदय में धारण कर लेना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
शिबू द्वारा बैल का अपमान किये जाने पर मोहन बहुत दुःखी होता है और अपने पुत्र की करनी का प्रायश्चित करते हुए बैल को नहलाता, धुलाता और उसकी सेवा करता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जब शिबू ने बैल का अपमान किया तो मोहन को इससे बड़ा दुःख हुआ। अतः उस दिन मोहन ने बैल के चारे खाने के स्थानकी अच्छी तरह सफाई की। बैल को पानी पिलाने वह स्वयं लेया। वहाँ जाकर उसने बैल को नहला भी दिया। अपने उजड्ड पुत्र शिबू के बैल के साथ किये गये अपमान को वह उसके हृदय तक से धो देना चाहता था। बैल को नहला चुकने के बाद अपने अंगोछे से उसके शरीर को पौंछा, बाँधने की रस्सी को भी पानी से खूब धोया। सार में बाँधकर भूसा डाला। इतना करने पर भी उसके मन की ग्लानि दूर नहीं हुई तो वह घर के भीतर जाकर रोटी ले आया और टुकड़े-टुकड़े करके उसे खिलाने लगा। मोहन कहा करता था कि पशु अपनी बात मनुष्य को समझा तो नहीं सकते पर वे बहुत-सी बातें मनुष्यों से अधिक समझते हैं। अतः मोहन यह अनुभव कर रहा था कि बैल उसके प्रेम को अच्छी तरह अपने हृदय में धारण कर रहा है।

विशेष :

  1. मोहन बैलों के साथ घुल-मिलकर रहता था, खेती आदि करता था। अत: वह बैलों के स्वभाव को जानता था, तभी तो वह उस बैल का मान-सम्मान कर रहा था।
  2. भाषा भावानुकूल।

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(3) भीड़ में एक आदमी निकलकर शिबू के पास आया। बोला-कौन है, शिब माते? तुमने आज इतने आदमियों को…………।
शिबू ने कहा-ज्वाला प्रसाद है। शरीर पर धोती के सिवा कोई वस्त्र नहीं। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से विकृत हो उठा। अण्टी से रुपये निकालकर उसने कहा-बड़ी बात, शिबू माते तुम्हें आज यहीं मिल गये। लो, अपने रुपये चुकते कर लो। अब लुट जाएँ तो मैं जिम्मेदार नहीं।

कठिन शब्दार्थ :
विकृत = विकार युक्त, खराब। घृणा = नफरत।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
जब डाकुओं के चंगुल में से सभी व्यापारियों की शिबू अपने साहस से छुड़ा लेता है तो उन्हीं में से एक ज्वाला प्रसाद (जो शिबू के पिता का कर्जदाता था) गिड़गिड़ाते हुए शिबू की तारीफ करता है, तो शिबू उसको फटकार लगाते हुए कर्ज के रुपये दे देता है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि डाकुओं द्वारा पकड़े हुए व्यापारियों में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आता है और कहता है अरे भैया तुम कौन, शिबू माते? आज तुमने इतने आदमियों को डाकुओं के चंगुल से बचा दिया, तुम धन्य हो।

शिबू ने कहा यह वही ज्वाला प्रसाद है जिसने अपने कर्ज के रुपये के लिए मेरे पिता को बन्धक बना लिया था। उस समय उसके शरीर पर धोती के अलावा और कोई वस्त्र नहीं था। डाकुओं ने रुपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवा कर रखवा लिये थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से भर गया था। शिबू ने बैल बेचने से मिले हुए रुपयों को अपनी अण्टी से निकालकर उसके सामने रखते हुए कहा कि यह आज एक बहुत बड़ी बात हुई कि शिबू माते अर्थात् मैं तुम्हें यहीं मिल गया। लो अपने कर्ज के रुपये चुकता कर लो। आगे तुम लुट जाओ तो मैं इसका जिम्मेदार नहीं हूँ।

विशेष :

  1. शिबू के साहस की प्रशंसा ज्वाला प्रसाद भी करता है।
  2. भाषा भावानुकूल।

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा (कहानी, प्रेमचन्द)

परीक्षा अभ्यास

बोध प्रश्न

परीक्षा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सुजान सिंह कौन थे?
उत्तर:
सुजान सिंह देवगढ़ रियासत के दीवान थे।

प्रश्न 2.
देश के प्रसिद्ध पत्रों में विज्ञापन क्यों निकाला गया?
उत्तर:
देश के प्रसिद्ध पत्रों में देवगढ़ के लिए एक सुयोग्य दीवान खोजने के लिए विज्ञापन निकाला गया था।

प्रश्न 3.
रियासत देवगढ़ में आये हुए उम्मीदवारों ने कौन-सा खेल खेलने की योजना बनाई?
उत्तर:
रियासत देवगढ़ में आये हुए उम्मीदवारों ने हॉकी का खेल खेलने की योजना बनाई।

प्रश्न 4.
किसान की गाड़ी कहाँ फंस गई थी?
उत्तर:
किसान की अनाज से भरी हुई गाड़ी नाले में फंस गई थी।

प्रश्न 5.
‘अच्छा तुम गाड़ी पर जाकर बैलों को साधो, मैं पहियों को ढकेलता हूँ ………….. “यह बात किसने किससे कही?
उत्तर:
यह बात हॉकी के खेल में चोट खाये हुए युवक ने किसान से कही है।

प्रश्न 6.
गाड़ी पर किसान के वेश में कौन था?
उत्तर:
गाड़ी पर किसान के वेश में स्वयं सरदार सुजान सिंह थे।

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परीक्षा  लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजा दीवान सुजान सिंह का आदर क्यों करते थे?
उत्तर:
राजा दीवान सुजान सिंह का आदर उनकी अनुभवेशीलता एवं नीति कुशलता के कारण करते थे।

प्रश्न 2.
बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा क्या देख रहा था?
उत्तर:
बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है।

प्रश्न 3.
खिलाड़ियों ने निराश और असफल किसान को किस भाव से देखा?
उत्तर:
खिलाड़ियों ने निराश और असफल किसान को बन्द आँखों से देखा जिनमें न सहानुभूति थी और न ही उनमें उदारता और वात्सल्य था।

प्रश्न 4.
परेशान किसान की सहायता किसने की?
उत्तर:
नाले में गाड़ी फंसने पर किसान अत्यधिक परेशान था। ऐसे में परेशान किसान की सहायता चुटैल खिलाड़ी पण्डित जानकीनाथ ने की।

प्रश्न 5.
युवक को किसान की तरफ देखकर क्या सन्देह हुआ?
उत्तरः
युवक को किसान की तरफ देखकर उसके सुजान। सिंह होने का सन्देह हुआ।

परीक्षा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जिससे बात कीजिए, वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम होता था’, इस उक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
देवगढ़ के दीवान के पद हेतु जो-जो उम्मीदवार . आये थे, उनसे बात करने पर ऐसा लगता था मानो वे सभी व्यक्ति नम्रता और सदाचार के देवता हों।

प्रश्न 2.
दीवान सुजान सिंह ने अपने उत्तराधिकारी का चयन किस प्रकार किया?
उत्तर:
दीवान सुजान सिंह अपने उत्तराधिकारी के चयन के लिए एक अनाज से भरी हुई गाड़ी को लेकर ऐसी जगह आ गया जहाँ से हॉकी के खिलाड़ी आ जा रहे थे। गाड़ी नाले में फंस गयी थी और बैलों ने जवाब दें दिया था। वह किसान बनकर बड़ी आपत्ति में फंसा हुआ था। खिलाड़ी उसकी तरफ देखते थे और यों ही चले जाते थे। उनमें उदारता और मदद करने का भाव नहीं था, पर उन लोगों में एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसमें दया भी थी ओर साहस भी, और अन्त में वही व्यक्ति दीवान पद पर चुना गया।

प्रश्न 3.
देवगढ़ रियासत के ‘दीवान’ पद के लिए जानकी नाथ का चयन क्यों किया गया?
उत्तर:
देवगढ़ रियासत के ‘दीवान’ पद के लिए जानकी नाथ का चयन इसलिए किया गया क्योंकि उसके हृदय में साहस, आत्मबल और उदारता का वास था।

प्रश्न 4.
परीक्षा’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
कहानी का ‘परीक्षा’ शीर्षक सटीक सारगर्भित एवं उपयुक्त है क्योंकि देवगढ़ के दीवान के लिए एक योग्य, साहसी एवं दयावान दीवान का चयन करना था। अतः उसकी अनेक प्रकार से परीक्षा ली गयी और परीक्षा में सटीक उतरने पर ही उसे दीवान पद पर चुना गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश की व्याख्या कीजिए-
(1) इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी ……….. उन तक हमारी पहुँच नहीं है।
उत्तर:
सरदार सुजान सिंह के स्थान पर जिस व्यक्ति का चयन हुआ उसकी घोषणा करते हुए सुजान सिंह ने कहा-इस पद के लिए ऐसे पुरुष की हमें आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ ही साथ आत्मबल। उसका हृदय उदार होना चाहिए, उसमें ऐसा आत्मबल हो जो किसी भी आपत्ति का वीरता के साथ सामना कर सके। इस देवगढ़ रियासत का यह सौभाग्य रहा कि उसे एक योग्य व्यक्ति मिल गया। ऐसे गुण वाले संसार में कम ही होते हैं और जो थोड़े से हैं भी वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमारी पहुँच नहीं है।

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परीक्षा भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पदों का समास-विग्रह कर समास का नाम लिखिए
उत्तर:

  1. नीति-कुशल = नीति में कुशल है जो = बहुब्रीहि समास।
  2. धर्मनिष्ठ = धर्म में निष्ठ = तत्पुरुष समास।
  3. आत्मबली = आत्मा से बल वाला = कर्मधारय समास।
  4. वेद-मन्त्र = वेद का मन्त्र = तत्पुरुष समास।
  5. कृपा दृष्टि = कृपा की दृष्टि = तत्पुरुष समास।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम लिखिए
उत्तर:

  1. परीक्षा = परि + ईक्षा = दीर्घ सन्धि।
  2. मन्दाग्नि = मन्द + अग्नि = दीर्घ सन्धि।
  3. सहानुभूति = सह + अनुभूति = दीर्घ सन्धि।
  4. निराशा = निः + आशा = विसर्ग सन्धि।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्द समूह के लिए एक शब्द लिखिए

  1. जो धर्म को न मानता हो।
  2. जो धर्म को मानता हो।
  3. उपासना करने वाला।
  4. पुत्र के प्रति स्नेह का भाव।
  5. पूजा करने वाला।

उत्तर:

  1. अधर्मी
  2. धर्मात्मा
  3. उपासक
  4. वात्सल्य
  5. पुजारी।

परीक्षा महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

परीक्षा बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘परीक्षा’ कहानी के लेखक हैं-
(क) यशपाल
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) शिवानी
(घ) प्रेमचन्द।
उत्तर:
(घ) प्रेमचन्द।

प्रश्न 2.
‘परीक्षा’ कहानी में किस स्थान की रियासत का वर्णन है?
(क) देवगढ़
(ख) जोधपुर
(ग) आनन्दपुर
(घ) रामपुर।
उत्तर:
(क) देवगढ़

प्रश्न 3.
हॉकी खेलते समय जिस नौजवान के चोट लगी उसका नाम था
(क) सुजान सिंह
(ख) रामधन
(ग) मोहन
(घ) जानकीनाथ।
उत्तर:
(घ) जानकीनाथ।

प्रश्न 4.
देवगढ़ रियासत में आये उम्मीदवारों ने कौन-सा खेल खेलने की योजना बनाई? (2009)
(क) फुटबॉल
(ख) शतरंज
(ग) हॉकी
(घ) गुल्ली डण्डा।
उत्तर:
(ग) हॉकी

प्रश्न 5.
देवगढ़ के पुराने दीवान थे (2014)
(क) शिव सिंह
(ख) अभय सिंह
(ग) सुजान सिंह
(घ) मोहन सिंह।
उत्तर:
(ग) सुजान सिंह

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रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. हाँफते-हाँफते बेदम हो गये लेकिन ………….. का निर्णय न हो सका।
  2. कहीं भूल-चूक हो जाये तो ……………. में दाग लगे।
  3. जो महाशय इस परीक्षा में पूरे उतरेंगे, वे इस उच्च पद पर ……………. होंगे।
  4. किसान ने सहमी आँखों से देखा परन्तु किसी से मदद माँगने का ………….. न हुआ।
  5. परीक्षा कहानी के लेखक …………. हैं। (2010)

उत्तर:

  1. हार-जीत
  2. बुढ़ापे
  3. सुशोभित
  4. साहस
  5. प्रेमचन्द।

सत्य/असत्य

  1. राजा साहब अनुभवहीन दीवान की इच्छा रखते थे।
  2. किसान ने उनकी तरफ सहमी आँखों से देख और उनसे मदद माँगी।
  3. गाड़ीवान के रूप में स्वयं सरदार सुजान सिंह थे।
  4. दीवान पद के विज्ञापन ने सारे मुल्क में तहलका मचा दिया।
  5. जिस पुरुष ने स्वयं जख्मी होकर एक गरीब किसान की भरी हुई गाड़ी को दलदल से निकाल दिया, वह दूसरों की सहायता अवश्य करेगा।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा img-1
उत्तर:
1. → (ङ)
2. → (घ)
3. → (क)
4. → (ख)
5. → (ग)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

  1. ‘परीक्षा’ कहानी के लेखक कौन हैं?
  2. दीवान पद की परीक्षा हेतु कितने दिन का समय निश्चित किया गया था?
  3. देवगढ़ रियासत में आये हुए उम्मीदवारों ने कौन-सा खेल खेलने की योजना बनाई?
  4. देवगढ़ रियासत के दीवान पद हेतु किस युवक का चयन किया गया?
  5. गाड़ी पर किसान के वेश में कौन बैठा था? (2009)

उत्तर:

  1. प्रेमचन्द
  2. एक महीना
  3. हॉकी
  4. पण्डित जानकीनाथ
  5. सुजान सिंह।

परीक्षा पाठ सारांश

‘परीक्षा’ कहानी प्रेमचन्द द्वारा रचित उत्तम श्रेणी की सामाजिक कहानी है। यह कहानी नैतिकता एवं मानव के आदर्श मूल्यों पर आधारित है। देवगढ़ रियासत के दीवान सुजानसिंह जब बूढ़े हो गये तब उन्होंने राजा से आज्ञा लेकर अपना पद त्याग करने का निश्चय किया, क्योंकि वे अपने जीवन के शेष दिन ईश्वर की पूजा में व्यतीत करना चाहते थे लेकिन राजा ने उन्हें ऐसा करने से पूर्व उपयुक्त नया दीवान चुनने का कार्य सौंप दिया। राजा की प्रबल इच्छा थी कि सुजानसिंह के पश्चात् जो भी नया दीवान बने वह सुजानसिंह की भाँति कर्त्तव्यनिष्ठ व ईमानदार हो।

अतः दीवान पद की नियुक्ति हेतु सुजानसिंह ने अगले दिन अखबार में विज्ञापन निकलवा दिया कि देवगढ़ के लिए एक योग्य दीवान की आवश्यकता है। जो व्यक्ति स्वयं को इस पद के योग्य समझता हो, वह स्वयं दीवान सुजानसिंह से मिले। दीवान पद का प्रत्याशी अधिक पढ़ा-लिखा न हो,लेकिन स्वस्थ व व्यवहार कुशल होना आवश्यक है। प्रत्याशी को एक माह तक दीवान सुजानसिंह के समक्ष अपने आचार-व्यवहार की परीक्षा देनी होगी। परीक्षा में सफल होने पर ही उसे दीवान पद पर नियुक्त किया जायेगा।

विज्ञापन के पश्चात् दीवान पद के उम्मीदवारों का तांता लग गया। कुछ प्रत्याशी पढ़े-लिखे व सम्भ्रान्त परिवारों के थे। कुछ पण्डित व मुल्ला भी थे। सभी इच्छुक व्यक्ति अपनी-अपनी किस्मत का परीक्षण कर रहे थे। इस पद के लिए ग्रेजुएट प्रत्याशी बहुत अधिक संख्या में आये थे। उन्होंने अपने आपको सफल उम्मीदवार दर्शाने का प्रयत्न किया। इसके लिए अपनी गलतियों को छिपाते रहे। कुछ उम्मीदवार ईश्वर में आस्था रखते थे, कुछ बिल्कुल नास्तिक थे। सुजानसिंह एक जौहरी की भाँति उम्मीदवार का चयन करने हेतु परीक्षण कर रहे थे। एक दिन नई उम्र के उम्मीदवारों ने हॉकी का खेल खेलने का निश्चय किया। देवगढ़ में यह खेल बिल्कुल नया था। सायंकाल तक खेल चलता रहा परन्तु हार-जीत का निर्णय नहीं हो पाया।

जहाँ खेल का मैदान था उसी के पास एक नाला था। चारों ओर अँधेरा छाया था। इसी समय एक किसान अनाज से भरी बैलगाड़ी लेकर आ रहा था। उसकी बैलगाड़ी नाले की कीचड़ में फँस गयी। निरन्तर प्रयत्न करने पर भी किसान अपनी गाड़ी को कीचड़ से नहीं निकाल पा रहा था। सभी खिलाड़ी खेल के बाद एक-एक करके चले गये। किसी ने किसान की ओर ध्यान नहीं दिया लेकिन उसी समय एक सुन्दर-सा नवयुवक आया। उसके पैर में चोट थी लेकिन उसने लँगड़ाते हुए किसान से कहा,“क्या मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूँ। तुम बैलों को गाड़ी में बैठकर हाँको, मैं पीछे से धक्का लगाता हूँ।” उस नवयुवक के प्रयास से बैलगाड़ी कीचड़ से बाहर आ गयी। उस युवक के पैर कीचड़ में सन गये थे। किसान ने उसे आशीर्वाद दिया कि भगवान चाहेगा तो तुम्ही देवगढ़ के दीवान बनोगे।

एक माह पूरा हो गया था। दीवान के पद का चुनाव का दिन आ गया था। सभी अपना-अपना परिणाम जानने के उत्सुक थे। सुजानसिंह ने जानकीनाथ को देवगढ़ का दीवान चुनकर घोषणा कर दी कि जानकीनाथ में दीवान बनने के सभी गुण निहित हैं। वह सभी प्रकार से उपयुक्त है।

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परीक्षा संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

(1) जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजान सिंह बूढ़े हुए तो परमात्मा की याद आई। जाकर महाराज से विनय की कि दीनबन्धु! दास ने श्रीमान् की सेवा चालीस साल तक की, अब मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाये तो बुढ़ापे में दाग लगे। सारी जिन्दगी की नेकनामी मिट्टी में मिल जाये।

कठिन शब्दार्थ :
दीनबन्धु = गरीबों के भाई, गरीबों पर कृपा करने वाले। भूल-चूक = गलती। नेकनामी = अच्छे काम करने से मिलने वाला यश। मिट्टी में मिल जाये = नष्ट हो जाये।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश ‘परीक्षा’ नामक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक श्री प्रेमचन्द हैं।

प्रसंग :
देवगढ़ रियासत के दीवान सुजान सिंह ने राजा से उन्हें कार्यभार से मुक्त करने की प्रार्थना की है।

व्याख्या :
देवगढ़ रियासत के दीवान सरदार सुजान सिंह जब वृद्ध हो गये तो उन्हें परमात्मा का स्मरण हुआ। वे जाकर महाराज से बोले कि हे दीनबन्धु! मैंने आपकी चालीस साल तक पूर्ण निष्ठा से सेवा की है। अब मेरी अवस्था अधिक हो गई है, मुझमें अब राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं है। कहीं मुझसे भूल-चूक हो जाये, तो मेरे बुढ़ापे में दाग लग जायेगा। मेरी जिन्दगी की सब अच्छाइयाँ मिट्टी में मिलकर नष्ट हो जायेंगी।

विशेष :

  1. दीवान सरदार सुजान सिंह ने अपने को राजकीय कार्यभार से मुक्त करने की प्रार्थना राजा से की है।
  2. भाषा भावानुकूल है।

(2) लेकिन उसी समूह में एक ऐसा मनुष्य था जिसके। हृदय में दया थी और साहस था। आज हॉकी खेलते हुए उसके पैरों में चोट लग गई थी। लँगड़ाता हुआ धीरे-धीरे चला आता था। अकस्मात् उसकी निगाह गाड़ी पर पड़ी। ठिठक गया। उसे किसान की सूरत देखते ही सब बातें ज्ञात हो गईं। डंडा एक किनारे रख दिया। कोट उतार डाला और किसान के पास जाकर बोला-मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूं।

कठिन शब्दार्थ :
अकस्मात् = अचानक। निगाह = दृष्टि। ठिठक गया = रुक गया।

प्रसंग :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
दीवान पद की उम्मीदवारी के लिए यों तो अनेक। लोग आये थे। सबके निराले ठाट-बाट एवं शौक थे, पर उसी समूह में एक दयावान और साहसी व्यक्ति भी था। उसी का यहाँ वर्णन है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि दीवान पद की उम्मीदवारी के लिए देश के कोने-कोने से अनेक आदमी आये थे पर उस समूह में एक ऐसा भी व्यक्ति था जिसके हृदय में दया और साहस था। हॉकी का खेल खेलते समय उसके पैर में चोट लग गयी थी, अतः वह लँगड़ाता हुआ धीरे-धीरे चला आ रहा था। अचानक उसकी दृष्टि गाड़ी पर पड़ी। वह वहीं रुक गया। जब उसने किसान की सूरत देखी तो उसे किसान की परेशानी मालूम हो गई। उसने अपना खेल का डण्डा एक तरफ रख दिया। कोट उतार लिया और किसान के पास जाकर कहने लगा कि-‘मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूं।

विशेष :

  1. लेखक ने इस व्यक्ति के हृदय में दया और साहस का दर्शन कराया है।
  2. भाषा भावानुकूल है।

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(3) इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ-साथ आत्मबल। हृदय वह जो उदार हो, आत्मबल वह जो आपत्ति का वीरता के साथ सामना करे और रियासत के सौभाग्य से हमें ऐसा पुरुष मिल गया। ऐसे गुण वाले संसार में कम हैं और जो हैं, वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमारी पहुँच नहीं है।

कठिन शब्दार्थ :
कीर्ति = यश। मान = सम्मान।

सन्दर्भ:
पूर्ववत्।

प्रसंग :
देवगढ़ के नये दीवान की खोज में नया दीवान मिल जाता है, उसी का वर्णन है।

व्याख्या :
सरदार सुजान सिंह के स्थान पर जिस व्यक्ति का चयन हुआ उसकी घोषणा करते हुए सुजान सिंह ने कहा-इस पद के लिए ऐसे पुरुष की हमें आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ ही साथ आत्मबल। उसका हृदय उदार होना चाहिए, उसमें ऐसा आत्मबल हो जो किसी भी आपत्ति का वीरता के साथ सामना कर सके। इस देवगढ़ रियासत का यह सौभाग्य रहा कि उसे एक योग्य व्यक्ति मिल गया। ऐसे गुण वाले संसार में कम ही होते हैं और जो थोड़े से हैं भी वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमारी पहुँच नहीं है।

विशेष :

  1. देवगढ़ के दीवान पद की खोज में एक आत्मविश्वासी एवं कर्मठ व्यक्ति की प्राप्ति हो गयी।
  2. भाषा भावानुकूल, सहज।

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