MP Board Class 11th Special Hindi प्रायोजना कार्य

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अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अभाव में नवीन चिन्तन, नवीन विचार, नवीन धारणाएँ आकार नहीं ले पाती, न कोई सृजन हो पाता है। छात्र इस स्तर तक आते-आते क्रमशः अपनी भाषा के विकास के क्रम में इतना सक्षम हो जाता है कि वह अपने सबसे प्रभावशाली साधन बोली का उपयोग करे। अपने अनुभव एवं अपने विचार व्यक्त करे। क्षेत्रीय बोली की कहावतें, चुटकुलों और लोकगीतों का संग्रह कर उनका परिचय प्राप्त करे। अपने क्षेत्र की पत्र-पत्रिकाओं का पाठ्य-पुस्तकों के अलावा अध्ययन करे।

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1. भाषा के विविध क्षेत्रों का परिचय भाषा के चार मुख्य क्षेत्र हैं-

  • सुनना-श्रवण,
  • बोलना-भाषण,
  • पढ़ना-पठन,
  • लिखना-लेखन।

इस विषय का समावेश पाठ्यक्रम में इसलिए किया गया है कि बालक कक्षा 11वीं के स्तर तक भाषा के इन चारों स्तरों से भली-भाँति परिचित हो जाता है। अब उन्हें शिक्षकों द्वारा अपनी इन भाषायी योग्यता के विस्तार की प्रेरणा देना है। वह अपनी इस योग्यता से पाठ्य-पुस्तक के अतिरिक्त भी कुछ पढ़े-लिखे और इस क्रिया में रुचि उत्पन्न करने के लिए शिक्षक छात्रों को यह गृह कार्य दें कि वे अपने-अपने क्षेत्र की बोली की कहावतें, चुटकुले और लोकगीतों का संग्रह करें। इसके अतिरिक्त छात्रों को कक्षा में तथा गृह कार्य के रूप में यह लेखन कार्य दिया जाये कि वे अपने क्षेत्र की पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ें और उसमें उन्हें जो भी विवरण रोचक लगे उसे अपने शब्दों में लिखें। इससे उनका पठन-कौशल और लेखन-कौशल विकसित होगा।

छात्र के श्रवण कौशल को विकसित करने के लिए वह दूरदर्शन के रोचक कार्यक्रमों को सुने और उसे जो भी कार्यक्रम रुचिकर लगे उसे लिखे।

इस प्रकार छात्रों को पाठ्य-पुस्तक के अतिरिक्त अपनी भाषायी योग्यता विस्तार का अवसर प्राप्त होगा।

मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा वह राज्य है जिसकी सीमाओं को सात प्रदेश घेरे हैं। अतः मध्य प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्रीय भाषा या बोलियाँ अस्तित्व में हैं।

शिक्षक अपने-अपने क्षेत्र की भाषा के लोकगीतों एवं कहावतों का संग्रह छात्रों से करवायें। हमारे प्रदेश में मुख्य रूप से मालवी, निमाड़ी, बुन्देलखण्डी, बघेलखण्डी, छत्तीसगढ़ी, मराठी, गुजराती, मारवाड़ी बोली जाती हैं, अतएव इनके चुटकुले, गीत, कविता, कहावतें एकत्रित करें। उदाहरण के तौर पर मालवा, निमाड़ क्षेत्र का मुख्य समाचार-पत्र है ‘नई दुनियाँ’, जो इन्दौर से प्रकाशित होता है। उसमें प्रत्येक बुधवार को इस तरह की रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। इस क्षेत्र के छात्र उनका संग्रह कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में चालीस से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अलग-अलग बोलियाँ हैं। झाबुआ के निवासी भील हैं और इनकी भीली बोली में मुहावरों का अत्यधिक प्रचलन है। हम यहाँ कुछ भीली मुहावरे और उनका हिन्दी अर्थ दे रहे हैं। छात्र अपने अध्यापकों की सहायता से अपने आस-पास बसने वाले आदिवासियों की लोक कथाएँ, कविता, मुहावरे, कहावतें संकलित कर उनका हिन्दी अनुवाद करें।

सुबह, दोपहर, शाम समय की सूचना वाले मुहावरे

भीली बोली पर मालवी, राजस्थानी, गुजराती भाषाओं का पर्याप्त प्रभाव है।
भीली कहावतें

  1. भूखला तो भूखला सूकला खरी-भूखा ही सही पर सुखी तो हूँ।
  2. भील भोला ने चेला-भील भोले होते हैं।
  3. खारड़ा माँ काँटो, भील माँ आटो भील में बदले की भावना रहती है।
  4. पाली पपोली मनाव राखवू घणो मसकल है. भील को खुशामद से मनाना बहुत मुश्किल है।
  5. ढोली नौ सौरो गाद्यो नी मरे न भील, सौरो रोद्यो नी मरे-ढोली का लड़का गाने से और भील का लड़का रोने से नहीं मरता-वे अभावों से जूझते रहते हैं।
  6. भील भाई ने डगले दीवो-भील भले ही अभावग्रस्त रहे, वह सदा निश्चिन्त रहता है।

कुछ बुन्देली बोली की कहावतें

  1. खीर सों सौजं, महेरी को न्यारे।
  2. पराई पातर को बरा बड़ो।
  3. पराये बघार में जिया मगन।
  4. देवी फिरै बिपत की मारी पण्डा कहै करो सहाय।
  5. रौन कुमरई की कुतिया (लोककथन)।
  6. नौनी के नौ मायके, गली-गली सुसरार।
  7. जौन डुकरिया के मारे न्यारे भए बई हिस्सा में परी।
  8. माँगे को मठा मोल पर गौ।
  9. कानी अपने टेण्ट तो निहारत नईया दूसरे की फुली पर पर के देखत।
  10. कनबेरी देवो।
  11. मर गई किल्ली काजर खों।

2. पहेलियाँ

1. भीली भाषा – उत्तर
1. गाय वाकड़ी ने बेटी डाकणी – तीर-कमान
2. धवल्या बुकड़ा ने बारेह खाल – प्याज
3. औंधे बाटके ने दही लटके – कपास
4. भूत्या हेलग्या ने पेटा में दाँत – कद्दू
5. छोटी-सी दड़ी, दगड़-सी लड़ी – सुपारी

2. बुन्देली
1. थोड़ो सो सोनो, घर भर नोनो – दीपक
2. दीवार पर धरो टका, ऊको तुम उठा पाओ न बाप न कका – चन्द्रमा
3. ठाड़े हैं तो ठाड़े हैं, बैठे हैं तो ठाड़े हैं। – सींग
4. सीताजी की गोल-गोल, शिवजी को आड़ो – सीताजी की गोल बिंदिया
बूझो पहेली मोरी रामजी को – शिवजी का आड़ा त्रिपुण्ड और रामजी
ठाँड़ों। – का खड़ा रामनामी तिलक।

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3. निमाड़ी
1. एक बाई असा कि सरकजड नी – दीवाल
2. काली गाय काँटा खाय, पाणी देखे बिचकी जाय जूता

4. बघेली
अड़ी हयन, खड़ी हयन, लाख मोती जड़ी हयन बाबा केरे बाग में दुशाला ओढ़े पड़ी हयन – भुट्टा मक्के का

5. छत्तीसगढ़ी
पेट चिरहा, पीठ कुबरा – कौड़ी

6. मालवी
नानो सो चुन्नू भाय, लम्बी सारी पूँछ नी चाल्या चुन्नू भाया, पकड़ी लाओ पूँछ – सुई धागा

3. चुटकुले

  1. न्यायाधीश-तुम चार साल पूर्व भी एक ओवर कोट चुराने के अपराध में इस अदालत में आ चुके हो।।
    अपराधी-आप ठीक कहते हैं। लेकिन ओवर कोट इससे अधिक चलता भी कहाँ है।
  2. मजदूर–क्या मालिक ! गधे के समान काम कराया और एक रुपया दे रहे। कुछ तो न्याय करना चाहिए।
    मालिक-न्याय ! हाँ तुम ठीक कहते हो। मुनीम जी, इसका रुपया छीन लो और बाँध कर इसके सामने थोड़ी सी घास डाल दो।
  3. पिता-हमारा लड़का आजकल बहुत तरक्की कर रहा है। पड़ोसी-अच्छा, कैसे?
    पिता–पुलिस ने उस पर घोषित इनाम की रकम पाँच हजार से बढ़ाकर दस हजार कर दी है।

4. लोकगीत

निमाड़ी कवाड़ा
बड़ा-बड़ा तो वई गया
ढोली कय कि पार उतार
वई का वई गया ना
उतरई की उतरई लगी
एकली कुतरी कई भुख
न कई कंसुऱ्या ले
फट्या कपड़ा बुड्ढा ढोर
इनका दाम लई गया चोर
ऊँट थारो कई वाको
ऊँच कय सब वाको
थारी बइगण म्हारी छाछ
भली बघार म्हारी माय

प्रस्तुति : हरीश दुबे

कसा भनई रिया हो?
मास्टर बा तम
असा-कसा भनइ रिया हो,
छातरवती दई ने
अँगूठा लगवई रिया हो।

-दिनेश दर्पण

साथन : निमाड़ी

‘मँहगई’
एको राज ओको राज
हुया मँहगा अनाज।
काँ छे घोटालो,
समझ मज आव नी
उनकी वात!
हम, पाँच बरस तक
देखाँ, रामराज की वाट

-अखिलेश जोशी

विश्वास
आस बाँधी ने
दो कदम
चाल्यौ थो
कि
टाँग धैची लिदी।
पाछै
फरीने दैख्यौ आपणा वारा पे भी
विश्वास नी करनो कदी।।

-जगदीश सस्मरा

वात कई कयj
बैल गाड़ी की वात कई कयj
खेत वाड़ी की वात कई कयj
मीठा लागज जुवार का रोटा
नऽ अमाड़ी की वात कई कयj
जे खड़ बुनकर वणा व मयसर का
उनी साड़ी की वात कई कयणुं
दूध-घी की कमी नि होणऽ दे
भैस-पाड़ी की वात कई कयj
घर क राखज चगन-मगन केतरो
छोटी लाड़ी की वात कई कयj
गाँव मऽ उनको बड़ो नाव वजज
माय माता की वात कई कयj
वोली न अपणी जगा सब छे ‘हरिश’
पण निमाड़ी की वात कई कयणुं।

– हरीश दुबे

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गजल
हुण रे भाया म्हारी वात।
हद की दी मनखौं की जात।
जणी जण्या पारया पोस्या,
अब लगावे वण पे घात।
वा, दर-दर की माँगे भीख
जण के जीवे बेटा हात।
लाड्या की होरयां बारी,
मंगता अशो करयो उत्पाद।
मनखाँ ती वंची ने रो
झूठी कोनी या केवात॥

– प्रमोद रामावत

फागुण का दोहा
फागुण का पगल्या पड्या, बदल्या सारा रंग।
ढोलक बजी चौपाल पऽ खडक्या खड़-खड़ चंग॥
सरसों पीली हुई गई, मुहवो वारऽगन्ध।
फूल-फूल पऽ भैरा दौड़, पीणऽख मकरन्द॥
अम्बा भी बौरइ गया, फूल्या घणा पलास।
कोयलिया की कूक की, प्यारी लाग मिठास॥
अबीर गुलाल का साथ मैंs, रंग की उड़ी फुहार।
हिली-मिली न मनवाँ, आवो यो तेव्हार।।

-चन्द्रकान्त सेन

एल्याँग ………. वोल्याँग
एल्यांग गुरुजी
पकावणऽ लग्या
दलिया न दाल
वोल्याँग हुई
शिक्षा-बे-हाल
शेर की सी उनकी नियति
एकाजऽ लेण
जिन्दगी अकेलीज बीती
वोटर सी पूछो
ईज सरकार रखोगा
कि बदलोगा?
बोल्या अगला
को काई भरोसा?
ऊ एतरी धाँधली
चलन दे कि नई?

-ललित नारायण उपाध्याय

ऊँचो मोल को है तमारो पसीनो

साथे लइला हिम्मत ने हेली-मेली ताकत,
तमारा आगे माथो टेकी ऊबी रेगा आफत,

काय को डर धरती रो घर अन से भरया चालो।
चालो भरयां चालो, चालो मरदाँ चालो।

घणो ऊँचों मोल को है तमारो पसीनो
आलसी के समझावो के कसो होय है जीनो।
स्वास्थ छोड़ी मजदूरी री पूजा करदाँ चालो।
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो।

गाँवों में कबीर पंथ आज भी तो गावे है
परेम से तो मारा भाई दुनिया जीती जावे है
लड़ता-मरता आदमी ने आपण वरजाँ चालो
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो

-मोहन अम्बर

सन्दर्भ : होली

कई हँसो बाबूजी!
यूँ दूर ऊबा
नाक सिकोड़ी के
कई हँसो ओ बाबूजी,
हमारे
कीचड़ का अबीर गुलाल से
होली खेलता देखि के।
हमारो तो
योज बड़ो तीवार है
यो
कीचड़ को जरूर है, बाबूजी
पणे
तमारी जग-मग दीवाली से
घणों अच्छो है,
देखिलो
दोल्यो/धुल्यो
दोड़ी-दोड़ी के
खाँकरा की केशूड़ी को
सन्तरिया रंग के
एक-दुसरा का ऊपर ढोलिरिया
मन का बन्द किमाड़
खोलीरिया
आत्मा से घीरणा को
कीचड़ धुइरिया है
काल तक जो प्यासा था
एक दूसरा का खून का
बाबूजी
आज ऊई पाछा
एक दुइरिया है।

-बंशीधर बन्धु’

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अजगर से बड़ा साँपजी

थोड़ी-घणी लिखी या पाती,
आखी समजो बाप जी।

यो कई हुई रियो इनी दुनियाँ में,
कई करूँ इको जाप जी।

तम भी पड्या हो ईका चक्कर में
घणा ईमानदार था साबजी।

भेती गंगा में जो हाथ नी धोया तो
जनम भर होयगो भोत संतापजी।

तूज अकेली जेरीलो नी हे धरती पे,
बेठ्या हे, अजगर से बड़ा साँपजी।

घणी देर से सोया हो, अब तो जागो,
जगावा को कद से करि रियो हूँ अलापजी।

कई लाया था ने कई ली जावगा,
आता-जाता को मत करो विलापजी।

-हुकुमचन्द मालवीय

खोटो नरियल होली में !
मन में आदर भाव नी रियो, राम नी रियो बोली में,
नगद माल सब जेब हवाले, खोटो नारियल होली में।
स्वारथ आगे सब कईं भूल्या, कितरा कड़वा हुईग्या हो,
फिर भी थोड़ी तो मिठास है पाकी लीम लिम्बोड़ी में।

कई गावाँ कई ढोल बजावाँ, कई स्वागत सत्कार करौं,
डण्डा-झण्डा साते लइनें, नेता निकले टोली में।

कुरसी मिली तो मोटरगाड़ी से, तम नीचे नी उतरो,
नेताजी वी दन भूलीग्या, रेता था जद खोली में।

खन, पसीना, साँते बईग्यो, पेट पीठ से चोंटीग्यो,
सपनो हुईग्यो धान ने दलियो, टाबर रोवे झोली में।

कुल की लाज बहू ने बेटी, भूल्या सगली मरयादा,
बहू की जगे दहेज बठीग्यो, अब दुल्हन की डोली में।

नारी को सम्मान घणों है, भाषण लम्बा-चौड़ा दो,
पण मौका पे चूको नी तम, भावज बणाओ ठिठोली में।

-ओमप्रकाश पंड्या

तम देखी लेजो
बन्द कोठड़ी म
गरम गोदड़ी ओढ़ेल
सोचतो मनख;
कस लिखी सकग
ठण्ड न कड़ायलां गीत,
फटेल चादरा का दरद
अन टूटेल झोपड़ा की वारता?
कसा कई सकग
फटेल हाथ-पाँव की
बिवई न में
खोयेल नरमई,
अन सियालां म।
बगलेलो
डोलची दाजी को दम !
भई,
तम कोशिश करी न
देखी ले जो;
पन असली वात न क
कभी नी कई सकग।।

-शरद क्षीरसागर

जीवन कँई हे?
जीवन एक मेंकतो
हुवो फूल हे
हवेरा, खिले अरु हाँजे
मुरजई जावे
समजी नी जिने
जीवन की परिभासा
ऊ कदी रोवे
कदी खिलखिलावे
जीवन पाणी को
ऊठतो हुवो बुलबुलो हे,
देखतां-देखतां
जिको नामो निसान मिटी जावे
फिर बी हम
जीवन को अरथ नी जाणां
तपतो हुवो सूरज बी
हाँजे ठण्डो वई जावे।

-कन्हैयालाल गौड़

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5. लोक कथाएँ

लोक कथाओं में मानव का सुकोमल एवं हृदय को छू जाने वाला इतिहास अंकित है। आदमी ने जो कुछ किया, उसका लेखा-जोखा तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन अपने मनोजगत में उसने जो कुछ भी सोचा, विचारा, रंगीन कल्पनाओं का ताना-बाना बुना, सुन्दर सपने संजोए उन सबका विवरण इन लोक कथाओं में सुरक्षित है।

सदियों से ये लोक कथाएँ मनुष्य का मनोरंजन करती आयी हैं। इनमें कुछ भी असम्भव नहीं होता है। इनमें शेर और साँप भी दोस्ती निभाते, पक्षी सन्देश पहुँचाते और जरूरत पड़ने पर चित्र भी बोलने लगते हैं। इनमें मनुष्य सोचने के साथ ही सात समुद्र पार पहुँच जाता है, क्षण में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है और किसी द्वीप की असीम सुन्दरी से शादी करता है।

इनकी जो सबसे बड़ी विशेषता है वह यह है कि ये मानवीय तत्त्वों से भरपूर हैं। इनमें देवी-देवता के माध्यम से भी मानव जीवन की कहानी कही गयी है। चाहे सूर्य हो या ब्रह्मा, सावित्री, वे सब यहाँ मानवीय स्वरूप लेकर और पारिवारिक प्रतीकों के सहारे सामाजिक जीवन को समृद्ध कर अपना योगदान देते हैं।

इन कथाओं में व्यक्ति, स्थान या समय का कोई महत्त्व नहीं होता। इनकी उँगली पकड़ कर ही आदमी ने सदियों की दूरी को लाँघा, देश-विदेश की यात्राएँ की और सुदूर रेगिस्तान से लगाकर अपने खेत-खलिहान और घर के आँगन के सहारे सारी रात जागकर बिता दी है। इन्होंने निराशा के क्षणों में मनुष्य के मन में अमिट आशा का संचार किया है।

(क) छत्तीसगढ़ी कहानी
नियाय के गोठ

चैतू ठाकुर बिमार हावे। गाँव के सबो झन झोला देख देख के जावत हैं। तीर तिखार के गाँव के कतको सज्जन अऊ बड़े किसान किसनहा झोला देखे बार आता हे। आखर कावर नइ आहीं ओखर सुझाव सब झन बर गुरतर हावे दूरिहा दूरिया के मन ऐला जानाथे। चाहे कइसनो मुशकुल बात होय ठाकुर ओला दुइच छिन में निबटा देय। वइसे ओखर तीर कोनो बड़े जइदाद, नइहे नहिं सोना चाँदी के खजाना। ओखर तीर सिरिफ दुठन बांही के भरोसा हावे। एक छोटे असन घर बाड़ी थोरकिन खेत अउ गिनती ढोर डंगर। रात दिन मिहनत करना ओखर नियम है।

एक जमाना रिहिस के वोहा गरीब रिहिस। मजदूरी करके अपन पेट ला चलाय। तब तो हा परम संतोषी रिहिस अऊ आजो भी बोला। चिटिक मात्र घमण्ड नहीं हे यही कारण है कि गाँव भर के मन वोला मानये।

आज वो ही हा बिमार हे त पूरा गाँव दुखी है। सबो झन भगवान ले पराथना करत है कि ठाकुर जल्दी बने हो जाय।

ठाकुर परिवार में कुल चार पराणी हावे। ठाकुर ओखर घरवाली ओखर बेटा अउ अनाथ भांचा। हावो तो भांचा फेर ठाकुर बोला अपने बेटा ले चिटिक मात्र कमती नहीं समझे। ऊखर असन बेटा बीस बरस के लगभग अउ भांचा मोहन अठरह बरस के लगभग हावे। बड़ मिहनती हे। बलराम कोनो काम बूता म ओखर आगू नई टिकै।

बलराम के सगई होने। ठाकुर सोचे कि मोहन बर भी कहूँ बात चलाये जाय त दूनो के बिहाव एक संग निपट जाही। ठकुराइन के मन मां घलो यही बिचार उठे।

फेर एकोती बलराम बड़ा उलझन अउ उदंड होगे। न माँ के सुनय न बाप के सुनय कभू भूले भटके खेत के मेड नहीं खूदय न खलिहान में बैठय। लोगन कहिये कि बलराम ताश पत्ती खेले बर सीखेगे हे। कोनोन कहाय कि ससुराल वाला मन बोला बहिकाल फुसलात हावे। ससुराल वाला मन डरावत हे कि कहूँ मोहन का बलराम के हिस्सा में बाँटा झन ले लय।

चैतू ठाकुर ये सब चाल ल समझत हावे फिर मोहन ल ये पाय कि नइ भाय कि वा हा भांचा हे फेर ये पाय के चाहे कि ओखर माँ बाप गरगे हे, बल्कि ठाकुर ओखर मिहनत देख खुश होवय।
खेती बारी के संगे वो हा घर के चेता सुरता रखथे। ठाकुर ठकुरइन की कतेक सेवा कर थे।

ये बात ठीक है कि बलराम ऊखर बेटा है फेर कतेक मुरुख। काम देखता बोला जर आ जाये। भेजबे उत्तर दिशा व वोहा जाये दक्षिण दिशा। वोहा ठीक से अपने चारों खेत ला छलख नई जानय कालि के दिन वोला खेत दे दिए जाय त का होही?

ठाकुर बीमार हावे। बलराम ला ओखर ससुराल वाला मन बलवा ले हय। अभी तक ले लहुट के नई आये है। खबर भिजवाय गय हय, फिर ससुराल ले कोनो मनख नइ आय हे।

संझा के बेरा बलराम अपना दलदल के संग ठाकुर के आगु में अइस। राम राम के बाद ससुराल पक्ष के जन विहिस कि ठाकुर अब ये थोरे दिन के मेहमान हावस ऐखर सेती तोला अपन संपत्ति ला बलराम के नाम देना चाही।

ये सुनके ठाकुर ला कोनो अचंभा नइ होइस। अइसन बात के खियाल ओला आगु ले रिहिस। बोलिन”तुम्हार बात तो ठीक फिर बलराम अभी लइका है। काम धाम के सूझ अभी
बने अइसन नइ है।”

अतका सुनके रिहिस बलराम भड़क गये-बापू के त बुध सठिया गेहे। जब देख बेत मोला लइका समझते अऊ ये सब मोहन के सेती होवत हे। माहा घलो ओखरे पक्ष ले थे। फेर बापू आज त तोला फइसला करेच बर पड़ ही।

ठाकुरहा जल्दी ले गाँव के पाँच पंचु बुलबइस फिर ठकुराइन ले पूछिस मोहन कहाँ है? ठकुरइन बतइस-वो हा मंझनिया के जंगल चल दे हावे। एक ठन बइला बीमार हावेले तेखर बर जड़ी बुटी लाने बर गये है।

ठाकुर हां पंच मन ला बलराम के मंशा बतलइस। सबला बड़ अचंभा होइस फेर बलराम के संग ओखर ससुरारी मन ला देख के चुप रहिगे। ठाकुर बाते बात में बलराम लातियारिस बेटा थोरकिन खलिहान में जाके देख आतो धान मिजाइ के कुछ उड़ल हे या नइ। बलराम भागत गइस अउ आके बतइस कि खलिहान म दूनों नौकर बइठे बीड़ी पियत हावे।

ठाकुर फेर विहिस-ऊखर ले पूछ नइ लेतेस बेटा के दौरी कतेक बेर म चल ही। बलराम हा आज्ञाकारी बेटा अइसन फेर गइस अऊ आके खबर दइस कि अभीत सबो बाइला नइ आये हे। ठाकुर पूछिस”आखिर कतका बइला कमती पड़त हे?”

बलराम गल्ती कबूलिस के बापू में तो गिनती करे बार भुला गये। अभीच जाके पता करथ हंव।

बलराम लहुटके बड़ा घमण्ड करके बतइस दुबइला कमती है। अऊ तब ठाकुर हा पूछिस”उहां अभी कुल कतका बइला है।”

अऊ लोगन देखिन कि बलराम फेर बइका के गिनती करे बर भागिस।

ओतकेच बार मोहन आगे। वे हा सब झन के पांव परिस अऊ चले ल धरिस। तब ठाकुर बोलिस-बेटा थोरकिन पता लगा के आ धान वे भिंजइ होही के नई।

तभेच बलराम आके बइला के संख्या बताय लगिस। सब चुप रहिन। थोरिक देर बाद मोहन आके बतइस कि कंगलू अउ मंगलू इनो मिल के पझ डार डाले हावे। ढेर लगा चुके है। दु बइला के कमी रिहिस त बहू झगरू देके गेहे। रात के खां पी के दौरी शुरू हो जाही। फिकर के कोनो बात नइहे।

ऐखर बाद कोनो कुछु नई बोलिन। ठाकुर पारी पारी से सबके मुंह ला देखे लगिस। अऊ आखिर में बलराम ले बोलिस कुछ समझ में आइस बेटा, तोर अऊ मोहन में का फरक हे? तें घंकभु ये समझे के कोशि नई करेस के भुइयां ह मेहनत चाहथे। खेती-बारी करना हंसी-ठट्ठा नोहे। बड़ सूझ के काम हे। मोहन तो ले के छोटे हे फेर कतेक लायक हे अऊ तेहा कतेक नालयक पहिले मोर विचार रिहिस कि तुम दूनो ला संपत्ति के आधा-आधा हिस्सा दे दवं, फेर अब एक अ रास्ते रही कि तोता ईमानदार किसान बने बर पड़ही जइसे ते मोहन ला देखत हस। तबहि तेहां आधा हिस्सा के हकदार होबे।

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ठाकुर के फइसला सबके समझ में आ गइस। आज ये फेर साबित होंगे कि ठाकुर हमेशा नियाय के ही बात कहिये।

खड़ी बोली में अनुवाद

न्याय की बात
चैतू ठाकुर बीमार हैं। गाँव के सब लोग उन्हें देखकर जा चुके हैं। आस-पास के गाँवों से भी अनेक प्रतिष्ठित किसान उन्हें देखने आ रहे हैं। आखिर क्यों न हो? उनका व्यवहार सबके लिए इतना नम्र रहा है कि दूर-दूर तक लोग उन्हें जान गए हैं। चाहे कैसी भी उलझी समस्या क्यों न हो, चैतू ठाकुर अपनी सूझ-बूझ से उसे आनन-फानन में सुलझा देते हैं। वैसे उनके पास लम्बी चौड़ी जायदाद नहीं हैं, न ही सोने-चाँदी के अनगिनत सिक्के हैं। उन्हें तो केवल अपनी बाँहों का भरोसा है। एक छोटा-सा घर है। बाड़ी है कुछ खेत हैं और गिनती के ढोर-डांगर हैं। रात-दिन मेहनत करना ही उनका नियम है।

एक समय था कि वे गरीब थे। मजदूरी करके अपना पेट भरते थे। अब भी वे परम संतोषी हैं और आज भी घमण्ड उन्हें छू तक नहीं गया। यही कारण है कि गाँव के लोग उन्हें मानते हैं।

आज वे बीमार हैं, तो सारा गाँव दु:खी है। ईश्वर से सब के सब यही प्रार्थना कर रहे हैं कि वे जल्दी अच्छे हो जायें।

उनके परिवार में कुल चार प्राणी हैं। वे उनकी पत्नी, उनका बेटा और अनाथ भांजा। है तो भांजा, पर वे उसे अपने बेटे से जरा भी कम नहीं मानते। उनका अपना बेटा बलराम लगभग बीस साल का है। भांजे का नाम है मोहन, यही कोई सत्रह-अठारह वर्ष का होगा। बड़ा मेहनती है। बलराम तो उसके किसी काम में भी नहीं ठहर सकता।

बलराम की सगाई हो चुकी है। ठाकुर सोचते हैं कि मोहन के लिए भी कहीं बात हो जाय तो दोनों का विवाह एक साथ ही निपटा दें। ठकुराइन के मन में भी यही बात है।

परन्तु बलराम इधर बड़ा मनमौजी हो गया है। न माँ की बात मानता है, न बाप की सुनता है। खेत पर कभी भूलकर भी नहीं जाता है और न ही घड़ी भर खलिहान में बैठता है। लोग कहते हैं कि बलराम आजकल ताश खेलने लगा है। कुछ लोगों का यह भी ख्याल है कि उसके ससुराल वाले उसे बहका रहे हैं। ससुराल वालों को शायद यह डर है कि कहीं मोहन बलराम का हिस्सा न बँटा ले।

चैतू ठाकुर यह सब समझते हैं। वे मोहन को केवल इसलिए नहीं चाहते कि वह उनका भांजा है, उसके माँ-बाप मर गए हैं, बल्कि ठाकुर उसकी मेहनत देखकर खुश हैं। खेती-बारी के साथ-साथ वह घर का भी कितना ध्यान रखता है। उन दोनों की कितनी सेवा करता है।

ठीक है कि बलराम उनका बेटा है किन्तु कितना मूर्ख है। काम के नाम से ही ज्वर आ जाता है। भेजो उत्तर दिशा की ओर तो दक्षिण चला जाता है। उसे तो ठीक से अपने चार खेतों का भी ज्ञान नहीं है और कल यदि उसे सारे खेत दे दिये जाएँ तो क्या होगा?

ठाकुर बीमार है। बलराम को उसकी ससुराल वालों ने बुलवा लिया है। अभी तक वह लौटकर नहीं आया। सूचना भिजाई गई थी, परन्तु उसकी ससुराल से भी कोई नहीं आया।

दूसरे दिन सुबह बलराम आ गया। ठाकुर ने सुना कि उसके साथ कुछ लोग भी आए हैं, पर अभी तक कोई सामने नहीं आया।

शाम के समय बलराम अपने दल के साथ ठाकुर के सामने आया। राम-राम के बाद ससुराल पक्ष के एक आदमी ने कहा कि ठाकुर अब तो थोड़े ही दिन के मेहमान हैं, इसलिए उन्हें अपनी सम्पत्ति बलराम के नाम लिख देनी चाहिए।

यह सुनकर ठाकुर को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात की कल्पना उन्हें पहले से ही थी। बोले “बात तो ठीक है, किन्तु बलराम अभी बच्चा है। काम-धाम की सूझ अभी उसे नहीं है।”

इतना सुनना था कि बलराम उबल पड़ा “बापू की तो बुद्धि सठिया गई है। जब देखो तब मुझे बच्चा ही समझते हैं और यह सब उस मोहन के कारण ही है। माँ भी उसका ही पक्ष लेती है, लेकिन आज तो बाबू को फैसला करना ही पड़ेगा।”

ठाकुर ने शीघ्र ही गाँव के पंच बुलवा लिए। फिर ठकुराइन से पूछा “मोहन कहाँ है?” ठकुराइन बोली- “वह तो दोपहर से ही जंगल चला गया है एक बैल बीमार है, उसी के लिए कुछ जड़ी-बूटी चाहिए थी।”

ठाकुर ने पंचों से बलराम की इच्छा कह सुनाई। सबको बड़ा अचम्भा हुआ, परन्तु बलराम के साथ उसकी ससुराल वालों को देखकर चुप रह गए। ठाकुर ने बात ही बात में बलराम से कहा- “बेटे जरा खलिहान जाकर देख तो आओ धान मिजाई का कुछ डौल है या नहीं।”

बलराम भागकर गया और आकर बताया कि खलिहान में दो नौकर बैठे बीड़ी पी रहे हैं। ठाकुर ने कहा, “उनसे पूछ नहीं लिया बेटा कि कितनी देर बाद दौरी चलेगी?”

बलराम एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह फिर गया और जाकर उसने सूचना दी कि अभी तो पूरे बैल ही नहीं आये।

ठाकुर ने फिर पूछा-“आखिर कितने बैल कम पड़ते हैं?” बलराम ने अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा-“बापू मैं तो गिनती करना ही भूल गया। अभी जाकर पता लगाता हूँ।”

बलराम ने लौटकर गर्व के साथ बताया कि दो बैल कम पड़ते हैं। तभी ठाकुर ने पूछ लिया “वहाँ अभी कुल जमा बैल कितने हैं?”

और लोगों ने देखा कि बलराम बैलों की गिनती करने फिर खलिहान की ओर भागा जा रहा है।

तभी मोहन आ गया। उसने सबके पाँव छुए और चलने लगा। ठाकुर बोले-“बेटे, जरा पता तो लगाओ कि आज धान की मिजाई हो सकेगी या नहीं।”

तभी बलराम आकर बैलों की संख्या बताने लगा। सब चुप रहे। जरा देर बाद मोहन ने आकर बताया कि कंगलू और मंगलू दोनों मिलकर पैर डाल चुके हैं, ढेर लगा चुके हैं, दो बैलों की कमी थी सो अभी झगरू दे गया है। रात को खा-पीकर दौरी शुरू हो जायेगी। चिन्ता की कोई बात नहीं।

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। ठाकुर बारी-बारी से सबका चेहरा देखने लगे और अन्त में बलराम से बोले-कुछ समझ में आया बेटे, तुममें और मोहन में क्या फर्क है? तूने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं कि जमीन मेहनत माँगती है। खेती बारी करना कोई हँसी-ठट्ठा नहीं है। बड़ी सूझबूझ का काम है। मोहन तुझसे छोटा है, पर कितना लायक है और तू कितना नालायक है। पहले मेरा विचार था कि तुम दोनों को मैं अपनी सम्पत्ति का आधा-आधा हिस्सा दे दूँ, किन्तु अब एक शर्त यह भी रहेगी कि तुझे ईमानदार किसान बनना होगा, जिस प्रकार तू मोहन को देख रहा है, तभी तू आधे हिस्से का हकदार होगा।

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ठाकुर का फैसला सबकी समझ में आ चुका था। आज यह बात पूरी तरह से सिद्ध हो गयी कि ठाकुर हमेशा न्याय की ही बात कहते हैं।

(ख) निमाड़ी लोक कथा’
झूठी मंजरी

एक थी चिड़ई, एक थो कबूतर, एक थो कुत्तो और एक थी मांजरी। सबइ न विचार करयो कि अपुण खीर बणावा।
कोई लायो लक्कड़, कोई लायो पाणी, कोई लायो शक्कर, कोई लायो दूध उन खीर तैयार हुई गई।

कहयो चलो सब खाई लेवां, मांजरी न कहयो-म्हारा तो डोला आई गयाज। उन उडोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई।

सबन अपणे अपणा वाटड की खीर खाई न बचेल का ढाकी न धरी दियो।

सब अपणा, अपणा काम न पर चली गया, तंवज मांजरी उठी उन सबका वाय की खीर खाई न डोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई। सांझ ख जंव सबई काम पर सी आया तो देख्यो खीर को बासरण खाली थो।

एक एक सी पूछयो क्यों भाई तुम न खीर खाई ज।

सबई न न मना करी दियो। मांजरी से पूछ्यो तो वा बोलो हऊँ काई जाणु म्हारो तो डोला आयाज। हऊ दिन भर सी पट्टी बांधी न पड़ोज। सब न तै करयो कि एक सूखा कुआ पर झूलो बांध्यो सब ओपर बारी-बारी सी बढ़ी न कहे कि मन खीर होय तो झूलो टूटी जाये। जेन खीर खाई हायेगा ओकी बखत झूला टूटी जायगा। पहली चिड़ी बठी बोली-“ची, ची, मन खीर खाई हो तो झूलो टूटी जाय, झूलो न टूटयो।”

फिर कबूतर बठ्यो बोल्यो गुटरू गूं-गुटर गूं, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिरी कुतरो बठ्यो बोल्या–भों-भों, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिर मांजरी बठी बोली–म्यांउ म्यांउ मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय।

झूलो तो टूटी गयो अन मांजरी सूखा कूआ म पड़ी गई। खेल खतम पैसा हजम।

खड़ी बोली में अनुवाद

झठी बिल्ली

एक थी चिड़िया, एक था कबूतर, एक था कुत्ता और एक थी बिल्ली। सबने मिलकर विचार किया कि अपनी खीर बनायें।

कोई लाया लकड़ी, कोई लाया पानी, कोई लाया शक्कर, कोई लाया दूध और खीर बनकर तैयार हो गई।

कहा, चलो सब खा लें। बिल्ली ने कहा- “मेरी तो आँखें आई हैं” और वह आँखों पर पट्टी बाँध कर सो गई।

सबने अपने-अपने हिस्से की खीर खाई और शेष बची हुई खीर को शाम के लिए ढाँक कर रख दिया।

सब अपने-अपने काम पर चले गये। तब बिल्ली उठी और सबके हिस्से की खीर खाकर फिर आँखों पर पट्टी बाँधकर सो गई।

शाम को जब सब काम पर से आये, तो देखा, खीर का बरतन खाली था। हर एक से पूछा-“क्यों भाई तुमने खीर खायी है?” सबने इनकार किया।

बिल्ली से पूछा, वह भी बोली- “मैं क्या जाने? मेरी आँखें आयी हैं,सुबह से पट्टी बाँधे पड़ी हूँ।” तब सबने विचार किया कि एक सूखे कुएँ पर कच्चे धागे से झूला बाँधा जाये। सब बारी-बारी से उस पर बैठे और कहें-“मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाये।” जिसने खीर खायी होगी, उसकी बार झूला टूट जायेगा।

पहले चिड़िया बैठी-“ची-ची, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।” झूला नहीं टूटा। फिर कबूतर बैठा, बोला-“गुटर गूं-गुटर पूँ, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर कुत्ता बैठा, बोला-“ौं-भौं, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर बिल्ली बैठी, बोली-“म्याऊँ-म्याऊँ, मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाय।”

झूला था सो टूट गया और बिल्ली थी सो कुएँ में गिर गयी। खेल खतम-पैसा हजम।

(ग) मालवी कहानी
पीपल तुलसी

कणी गाम माय सासू अर बऊ रेती थी। एक दिन सासू ने बऊ तो कियो के मू तीरथ कारवा सारू जरूरी हूँ, तुम अपणे याँ जो दूध दही होवे है ऊ बेची-बेची के रुपया भेलाकर लीयो। अतरो कइके सासू चलीगी।

चैत-बैसाख को माइनो आया तो बऊ सगलो दूध-दई लई जई के पीपल अर तुलसी म सीची देती अर फेरी खाली बासन लइके घर मेली देती। सास तीरथ करी के पीछे घरे अई तो बीने बऊती दूध अर दई का रुप्या मांग्या। बऊ ने क्यो के बई मूं तो सगली दूध अर दई पीपल तुलसी म सींचत री हूँ, म्हारा कन रुप्या नी है। पण सासू ने कियो कई बी होवे जो-वी हो म्हारे तो रुप्या देणा पड़ेगा। तो बऊ पीपल अर तुलसी का कने जइके बैठीगी, अर वीनती बोलो के म्हारी सासू म्हार ती दूध दही का पइसा माँगे है। पीपल-तुलसी ने कियो के बेटी-म्हारा कन रुप्या-पइसा काँ है? इ भाटा कोंकरिया जरूर पड़िया है इनके भलाई-उठई के लई जा। बऊ सगला कोंकरिया भाटा उठई के घेर लई अर अई घरे लइके अपण कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन सासू ने फेरी रुप्या मांग्या तो बऊ ने अपणो कोठो खोल्यो। बऊ ने देख्यो कि सगला कोंकरिया भाटा का हीरा-मोती वणी ग्या है अर कोठी जगमग इरियो है। बऊ ने सास ती कियो के सासू जी अपणा रुप्या लइलो। हीरा-मोती देखी के सासु का मन-म-लालच अईग्यो। उने कियो के D वी पीपल अर तुलसी सोचूँगी।

दूसरा दन से सासू जद दूध-दई बेची के जाती तो खाली वासन माय पाणी भरी के पीपल अर तुसी म कूढ़ी आती। जद थोड़ा दन ऐसो करता-करता वइग्या तो एक दिन सासू न बऊ तो क्यों के त म्हारती दूध दई का रुप्या मांग। सासू केवा तो बऊ ने रुप्या मांग्या तो सासू बोली के म्हारा कन रुप्या कां है? मूं तो दूध-दई ती पीपल अर तुलसी के सींचती री हूँ। मेरा सासू जइके पीपल अर तुलसी का हेटे बैठी गी अर बोली के म्हारी बऊ दूध-दई का रुप्या माँगे है। पीपल तुलसी ने जवाब दियो के हमारा कन रुप्या कां है? इ कोंकरिया–भाटा पड्या है चावो तो भला ही लई जावो। सासू कोंकरिया-भाटा लइके खुशी-खुशी घरे अई अर बीने कोंकरिया-भाटा लइके अपणा कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन जद कोठी खेल्यो ग्यो तो सासू कई देखे है के पूरो कोठो सांप पर विछू तो भरियो पड्यो है।

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सासू ने बऊ ते पूछयो-के बऊ, या कंई बात है? तू तो कोंकरिया-भाटा उठई के लई थो वीनका तो हीरा मोती वणीग्या अर मूंजो कोंकरिया-भाटा उठई के लई वीनका सांप विछ्वणी गया? बऊ ने सरल भाव ती जवाब दियो के सासू जी मने पीपल-तुलसी के साफ मन तो सींच्यो थो अणी सासू कोंकरिया भाटा का हीरा-मोती वणीग्य अर थाने लालच म ऐसो करियो यो अणी वास्ते था का लाया हुआ कोंकरिया-भाटा का सांप बिछु वणीग्या।

खड़ी बोली में अनुवाद

पीपल-तुलसी

किसी गाँव में सास और बहू रहती थीं। एक दिन सास ने बहू से कहा कि मैं तीर्थाटन के लिए जा रही हूँ, तुम अपने यहाँ जो दूध-दही होता है वह बेच-बेचकर रुपये इकट्ठे कर लेना। इतना कहकर सास चली गयी।

चैत-बैसाख का महीना आया तो बहू सारा दूध-दही ले जाकर पीपल और तुलसी को सींच देती और फिर खाली बर्तन लाकर घर रख देती। सास तीर्थाटन से वापस घर आयी तो उसने बहू से दूध और दही के पैसे माँगे। बहू ने कहा कि मैं तो सारा दूध और दही पीपल-तुलसी में सींचती रही हूँ मेरे पास रुपये नहीं हैं, लेकिन सास ने कहा कि चाहे जो भी हो मुझे तो रुपये देने पड़ेंगे। तब बहू पीपल और तुलसी के पास जाकर बैठ गयी और उनसे बोली कि मेरी सास मुझसे दूध-दही के पैसे माँगती है। पीपल-तुलसी ने कहा कि बेटी, हमारे पास रुपये पैसे कहाँ हैं, ये कंकड़-पत्थर अवश्य पड़े हैं इन्हें भले उठाकर ले जा। बहू सारे कंकड़-पत्थर उठाकर धर लायी और घर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन सास ने फिर से पैसे माँगे तो बहू ने अपना कमरा खोला। बहू ने देखा कि सारे कंकड़-पत्थरों के हीरे-मोती बन गये और कमरा जगमगा रहा है। बहू ने सास से कहा कि सास जी, अपने रुपये ले लो। हीरे-मोती आदि देखकर सास के मन में लालच आ गया। उसने कहा कि मैं भी पीपल और तुलसी सीनूंगी।

दूसरे दिन सास जब दूध-दही बेचकर लौटती तो खाली बर्तनों में पानी भरकर पीपल और तुलसी में डाल आती। जब कुछ दिन ऐसा करते-करते हो गये तो एक दिन सास ने बहू से कहा कि मुझसे दूध-दही के पैसे माँग। सास के कहने पर बहू ने पैसे माँगे तो सास बोली कि मेरे पास रुपये कहाँ हैं? मैं तो दूध-दही से पीपल और तुलसी को सींचती रही हूँ। फिर सास जाकर पीपल और तुलसी के नीचे बैठ गयी और बोली कि मेरी बहू दूध-दही के पैसे माँगती है। पीपल-तुलसी ने उत्तर दिया कि हमारे पास रुपये कहाँ हैं? ये कंकड़-पत्थर पड़े हैं चाहे तो इन्हें भले ही ले जाओ। सास कंकड़-पत्थर लेकर खुशी-खुशी घर आयी और उसने कंकड़-पत्थर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन जब कमरा खोला गया तो सास क्या देखती है कि सारा कमरा साँप और बिच्छुओं से भरा पड़ा है।

सास ने बहू से पूछा कि बहू, यह क्या बात है? तू जो कंकड़-पत्थर उठाकर लायी थी उनके तो हीरे-मोती बन गये और मैं जो कंकड़-पत्थर उठाकर लायी उनके साँप-बिच्छु बन गये? बहू ने सहज भाव से उत्तर दिया कि सास जी मैंने पीपल-तुलसी को शुद्ध मन से सींचा था, इसलिए कंकड़-पत्थर के हीरे-मोती बन गये और आपने लालचवश ऐसा किया था, अतः आपके लाये हुए कंकड़-पत्थरों के साँप-बिच्छू बन गये।

6. दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम
दूरदर्शन

वैसे तो दूरदर्शन पर आजकल हर समय कोई न कोई कार्यक्रम दिखाया जाता है तथापि प्रमुख व लोकप्रिय कार्यक्रम इस प्रकार हैं-

सुबह सवेरे, समाचार, रंगोली, महादेव, मैट्रो समाचार, जय बजरंगबली, चित्रहार, सांई बाबा, चिड़ियाघर, टॉम एण्ड जैरी, कलश, चन्द्रगुप्त, कृषि दर्शन, पोकेमॉन, विरासत, हिटलर दीदी, शाका लाका बूम बूम, वाइल्ड डिस्कवरी, सी. आई. डी., घर एक सपना, बालिका वधू, डिजनी जादू, सा रे गा मा, वीर शिवाजी, सोनपरी, बूगी बूगी, ग्रेट इंडियन लाफ्टर चेलेंज एवं लापतागंज।

दूरदर्शन के कार्यक्रमों को देखकर छात्रों को उनका विवरण लिखने की प्रेरणा-लिखित भाषा की शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य छात्रों को अपने भाव, विचार तथा अनुभवों को लिखित रूप में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने योग्य बनाना है.–

  1. छात्रों को सुन्दर, परिमार्जित एवं स्पष्ट लेख लिखने की प्रेरणा देना।
  2. छात्रों के शब्द-कोष को सक्रिय रूप देना।
  3. छात्रों को विराम चिह्नों का उचित प्रयोग सिखाना और अपने भावों को अनुच्छेदों में सजाने का अभ्यास कराना।
  4. छात्रों की अवलोकन (निरीक्षण) शक्ति, कल्पना शक्ति और तर्क शक्ति का विकास करना।
  5. छात्रों की विचारधारा में परिपक्वता लाना।

दूरदर्शन एक ऐसा माध्यम है जिससे छात्रों की श्रवणेन्द्रियों के साथ दृश्येन्द्रियाँ भी क्रियाशील रहती हैं। छात्र दूरदर्शन में वार्ता सुनने के साथ कार्यक्रम में भाग लेने वालों को देख सकते हैं और वे उनके हाव-भाव के साथ बोलना, अभिनय करना, भाषण देना सीख कर स्वरों के उचित उतार-चढ़ाव के द्वारा बात को शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं। वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं क्योंकि दूरदर्शन ज्ञानवर्धन और मनोरंजन का सबल माध्यम है। वे सब कुछ समझकर अन्त में उस कार्यक्रम के समग्र प्रभाव की चर्चा करें।

शिक्षक छात्रों को दूरदर्शन के किसी विशिष्ट कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को कहें। इससे वे लेखन-कौशल में तो पारंगत होंगे ही साथ ही उन्हें विवेचना और समीक्षा करने का भी अवसर मिलेगा। कार्यक्रम के गुण-दोष दोनों पर प्रकाश डालने के लिए छात्रों को स्वतन्त्र अवसर प्रदान करना होगा। इससे उनकी प्रतिभा के विकास के साथ चिन्तन, मनन एवं स्वाध्याय की प्रवृत्ति का पल्लवन तथा उन्नयन भी होगा।

7. हिन्दी साहित्य का स्वतन्त्र पठन

मनुष्य का सबसे बड़ा अलंकार उसकी वाणी है। वाणी जितनी शुद्ध और परिष्कृत होती है, व्यक्ति उतना ही सुसंस्कृत समझा जाता है। सम्पूर्ण मानव समाज अपने भावों और विचारों को दो रूपों में व्यक्त करता है. मौखिक और लिखित। इन दोनों रूपों में भाषा उसका प्रमुख साधन है। यहाँ मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकारों पर विचार करते हैं।

(i) टिप्पणियाँ किसी सुने गए अथवा पढ़े गए भाषण, वार्तालाप, पत्र, लेख, कविता, ग्रन्थ आदि देखे गए दृश्य तथा घटना पर अपना मत मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रकट करना ही टिप्पणी कही जाती है। आकार की दृष्टि से टिप्पणी की यद्यपि कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, किन्तु संक्षिप्त टिप्पणी अच्छी समझी जाती है। मोटे तौर पर टिप्पणियाँ तीन प्रकार की हो सकती हैं
(अ) कार्यालयी टिप्पणी, (ब) सम्पादकीय टिप्पणी, (स) सामान्य टिप्पणी।

(ii) प्रेरणाएँ साहित्य में प्रेरणा से आशय उन रचनाओं अथवा कृतियों से है जो पाठक को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर उनका मार्गदर्शन करती हैं इसके अन्तर्गत मुख्यत: उन कहानियों आदि को शामिल किया जाता है जो इस उद्देश्य को लेकर लिखी जाती हैं अथवा इस उद्देश्य को पूरा करती हैं। परन्तु इन कहानियों आदि के विषय में यह महत्त्वपूर्ण है कि ये इतनी बड़ी न हों कि पाठक पढ़ते-पढ़ते कहानी के उद्देश्य से भटक जाय। एक ही बैठक में पूरी पढ़ी जाने वाली कहानियाँ ही इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है।

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8. हस्तलिखित पत्रिका तैयार करना

छात्र आपस में मिलकर हस्तलिखित पत्रिका तैयार कर सकते हैं जिसमें सर्वप्रथम सभी संकलित अथवा स्वयं के लिखे लेख, कहानियों, कविताओं के अतिरिक्त चुटकुले आदि भी हो सकते हैं, को सूचीबद्ध किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इस सूची में उसके लेखक अथवा उसके संकलनकर्ता का नाम दिया जा सकता है।

इसके बाद सम्पादक की ओर से अपने साथियों को धन्यवाद ज्ञापन के साथ पाठकों को इस पत्रिका से परिचित कराते हुए इसके लिखित अथवा संकलित लेखों आदि पर प्रकाश डाल सकते हैं। तत्पश्चात् इन लेखों आदि को बड़े रोचक रूप में समग्रता से प्रस्तुत किया जा सकता है।

ध्यान रखने लायक बात है कि कोई भी लेख बहुत छोटा व बहुत ही बड़ा न हो जाय, जो पत्रिका में रोचकता समाप्त करे।

9. क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाएँ।

मालवा अंचल

  • इन्दौर-नई दुनिया, इन्दौर समाचार, नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वदेश, भावताव, जागरण।
  • उज्जैन-विक्रम दर्शन, अवन्तिका, अग्नि बाण, भास्कर, प्रजादूत, जलती मशाल।
  • रतलाम-जनवृत, जनमत टाइम्स, प्रसारण, हमदेश। नीमच-नई विधा।
  • देवास-देवास दर्पण, देवास दूत। मंदसौर-दशपुर दर्शन, कीर्तिमान, ध्वज।
  • शाजापुर-नन्दनवन।

बघेलखण्ड अंचल

  • रीवा-बांधवीय समाचार, आलोक, जागरण।
  • सतना-जवान भारत, सतना समाचार।
  • शहडोल-विंध्यवाणी, भारती समय, जनबोध।

बुन्देलखण्ड अंचल

  • कटनी–महाकौशल केशरी, भारती, जनमेजय।
  • सागर–न्यू राकेट टाइम्स, आचरण, राही, जन-जन की पुकार।
  • टीकमगढ़-ओरछा टाइम्स।
  • छतरपुर-क्रान्ति कृष्ण, प्रचण्ड ज्वाला।
  • जबलपुर-नवभारत, नवीन दुनिया, युगधर्म, दैनिक भास्कर, नर्मदा ज्योति, देशबन्धु, लोकसेवा।

निमाड़ अंचल

  • खण्डवा-विंध्याचल, लाजवाब।
  • बुरहानपुर-वीर सन्तरी।
  • बड़वानी-निमाड़ एक्सप्रेस।

छत्तीसगढ़ अंचल

  • बिलासपुर-लोकस्वर, नवभारत, भास्कर।
  • दुर्ग-ज्योति जनता, छत्तीसगढ़ टाइम्स।
  • रायपुर-देशबन्धु, नवभारत, भास्कर, स्वदेश।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Special Hindi अलंकार

MP Board Class 11th Special Hindi अलंकार

काव्य की शोभा में वृद्धि करने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं। अलंकार से काव्य में रोचकता, चमत्कार और सुन्दरता उत्पन्न होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अलंकार.को काव्य की आत्मा ठहराया है।

1. भ्रान्तिमान अलंकार [2010]

जहाँ प्रस्तुत वस्तु को देखकर किसी विशेष समानता के कारण किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाये, वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है। जैसे
(1) जान स्याम घनस्याम को, नाच उठे वन मोर।
(2) चंद के भरम होत, मोद है कुमोदिनी को।
(3) नाक का मोती अधर की कांति से,
बीज दाडिम का समझकर भ्रान्ति से,
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,
सोचता है, अन्य शुक यह कौन है?

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(4) कपि करि हृदय विचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब।
जनु अशोक अंगार, दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ।।

(5) चाहत चकोर सूर ओर, दृग छोर करि।
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।।

2. सन्देह अलंकार
[2008]

जहाँ रूप, रंग और गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह निश्चय न हो कि यह वही वस्तु है, वहाँ सन्देह अलंकार होता है। इसमें अन्त तक संशय बना रहता है।
(1) सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।।

(2) परत चन्द्र प्रतिबिम्ब कहुँ जलनिधि चमकायो,
कै तरंग कर मुकुर लिए, शोभित छवि छायो।
कै रास-रमन में हरि मुकुट आभा जल बिखरात है,
कै जल-उर हरि मूरति बसत ना प्रतिबिम्ब लखात है।

(3) तारे आसमान के हैं आये मेहमान बनि, केशों में निशाने मुक्तावलि सजाई है।
बिखर गई है चूर-चूर के चन्द कैधों, कैधों घर-घर दीपमालिका सुहाई है।।

(4) दिग्दाही से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के।

सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर [2008]
भ्रान्तिमान में एक वस्तु में दूसरी वस्तु का झूठा निश्चय हो जाता है, जबकि सन्देह में अनिश्चय बना रहता है कि ये है कि नहीं? तर्क-वितर्क की भावना बनी रहती है। भ्रान्तिमान में हम स्वयं भ्रम दूर नहीं कर पाते, जबकि सन्देह में कर लेते हैं।

3. विरोधाभास अलंकार
[2008, 09]

जहाँ किसी पदार्थ, गुण या क्रिया में वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास हो, वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।
(1) ‘वा मुख की मधुराई कहा कहौं,
मीठी लगे अँखियान लनाई।

(2) शीतल ज्वाला जलती है,
ईंधन होता दृग-जल का।
यह व्यर्थ साँस चल-चलकर,
करती है काम अनिल का।।

(3) मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ।

(4) तन्त्री-नाद, कवित्त रस; सरस राग रति-रंग।
अनबूड़े बूड़े तिरे, जे बूड़े सब अंग।।

(5) या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहीं कोय।।
ज्यों-ज्यों बूढ़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय।।

(6) शाप हूँ जो बन गया वरदान जीवन में।
(7) नीर भरी अँखियाँ रहे तऊ न प्यास बुझाय।

4. अपहृति अलंकार
[2008, 11]

उपमेय का निषेध कर उसमें उपमान का आरोप किया जाये तो अपहृति अलंकार होता है।

अपहृति का अर्थ है छिपाना, निषेध करना। इस अलंकार में प्रायः निषेध आरोप करते हैं।
जैसे-
(1) सत्य कहहुँ हाँ दीनदयाल।
बन्धु न होय मोर यह काला।

(2) फूलों पत्तों सकल पर हैं वारि-बूंदें लखाती।
रोते हैं या निपट सब यों आँसुओं को दिखाके।।

(3) अंग-अंग जारत अरि, तीछन ज्वाला-जाल।
सिन्धु उठि बड़वाग्नि यह, नहीं इन्दु भव-भाल।।

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(4) छग जल युक्त वदन मण्डल को अलकें श्यामल थीं घेरे।
ओस-भरे पंकज ऊपर थे मधुकर माला के डेरे।।

(5) ये न मग हैं तब चरण रेखियों है?

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MP Board Class 11th Special Hindi काव्य की परिभाषा एवं लक्षण

MP Board Class 11th Special Hindi काव्य की परिभाषा एवं लक्षण

(1) काव्य की परिभाषा एवं लक्षण समस्त भाव प्रधान साहित्य को काव्य कहते हैं। विभिन्न विद्वानों ने काव्य के विभिन्न लक्षण बताये हैं-साहित्य दर्पण के प्रणेता आचार्य विश्वनाथ ने “रसात्मकं वाक्यं काव्यम्” कहा है। पण्डितराज जगन्नाथ ने ‘रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’ कहा है। कुन्तक ने ‘वक्रोक्ति काव्यस्य जीवितम्’ कहा है और आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्त ‘ध्वनिरात्मा काव्यस्य’ कहते हैं। मम्मट ने काव्य को हृदय की “सगुणावलंकृतौ पुन: क्वापि” कहा है।

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “कविता शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक सम्बन्धों की रक्षा और निर्वाह का साधन है। वह उस जगत के अनन्त रूपों, अनन्त व्यापारों और अनन्त चेष्टाओं के साथ हमारे मन की भावनाओं को जोड़ने का काम करती है।” इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्य हृदय को आनन्द देता है।

  • काव्य के भेद

(1) मुक्तक काव्य-गीत, कविता, दोहा और पद एवं आधुनिक चतुष्पदी तथा मुक्त छन्द मुक्तक काव्य कहलाता है। मुक्तक काव्य का तात्पर्य है कि बिना पूर्वापर-सम्बन्ध के वह पद्य या छन्द अपने आप में पूर्ण एक स्वतन्त्र भाव लिये हो जिसके पढ़ने मात्र से उसका भाव भली प्रकार समझ में आ जाये। सूरदास, मीरा आदि कवियों के गेय पद और बिहारी सतसई तथा आधुनिक गीत इसके अन्तर्गत आते हैं।

(2) प्रबन्ध काव्य-प्रबन्ध काव्य वह रचना होती है जिसमें कोई एक कथा आद्योपान्त क्रमबद्ध रूप से गठित हो एवं उसमें कहीं भी तारतम्य न टूटता हो, वरन् उस कथा को पुष्ट करने उसमें अन्य कई अन्तर्कथाएँ भी हो सकती हैं। प्रबन्ध काव्य विस्तृत होता है, उसमें जीवन की विभिन्न झाँकियाँ रहती हैं। प्रबन्ध काव्य में कथानक को लेकर पात्रों के चरित्रों में घटनाओं और भावों के संघर्ष द्वारा काव्य-वस्तु रखी जाती है। इसके मुख्य दो भेद होते हैं

(i) महाकाव्य और
(ii) खण्डकाव्य।

(i) महाकाव्य-यह एक विशिष्ट गुण युक्त वृहत् आकार वाला ग्रन्थ होता है। यह सर्गों या अध्यायों में विभक्त रहता है। इसका नायक उदात्त गुणों युक्त कोई कुलीन होता है। वीर, श्रृंगार अथवा शान्त रस में से किसी एक रस की प्रधानता रहती है। अन्य रस गौण रूप में आते हैं। महाकाव्य का कथानक प्रसिद्ध होता है अथवा उसमें किसी ऐतिहासिक या पौराणिक पुरुष के चरित्र का वर्णन किया जाता है। प्रत्येक सर्ग की रचना एक ही प्रकार के छन्द में होती है, किन्तु सर्ग के अन्त में छन्द बदल जाता है। सर्गों की संख्या आठ या आठ से अधिक होती है, सर्ग के अन्त में आगामी कथानक की सूचना दी जाती है। महाकाव्य में सन्ध्या, सूर्योदय, चन्द्रोदय, रात, प्रदोष, अन्धकार, वन, ऋतु, समुद्र, पर्वत, नदी आदि प्राकृतिक पदार्थों का वर्णन होता है। जैसे—रामचरितमानस, पद्मावत, साकेत आदि।

(ii) खण्डकाव्य आचार्य विश्वनाथ के अनुसार, “खण्डकाव्य महाकाव्य के एक देश या अंश का अनुसरण करने वाला है।” यह जीवन के समस्त पक्षों का उद्घाटन नहीं करता है, अपितु केवल एक पक्ष पर प्रकाश डालता है। रुद्रट के अनुसार लघु प्रबन्धों में चतुर्वर्ग में से एक ही वर्ग रहा करता है। उसमें अनेक रस असमग्र रूप से होते हैं अथवा एक रस समग्र रूप में होता है। हेमचन्द्र ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यानुशासन’ में कहा है कि “जब कवि एक ही विषय को एक ही छन्द में आद्यन्त वर्णन करता है, तब उसे सन्धान कोटि का काव्य कहते हैं।” खण्डकाव्य अन्तस्तत्व के उद्वेलन से पूरित और रसमय होता है। उसमें किसी की जीवन-कथा का विवरण न होकर भाव व्यंजना होती है। खण्डकाव्य गीतिकाव्य भी हो सकता है। खण्डकाव्य कथा के आंशिक आधार के साथ मूलत: गीतिकाव्य बन जाते हैं। इसमें सरस-ललित पदयोजना होती है। इसमें कथावस्तु प्राय: काल्पनिक भी हो सकती है। वह खण्डों में विभक्त हो सकता है। खण्डकाव्य में प्राकृतिक दृश्यों का अंकन समयानुसार और विषयानुसार तथा संक्षिप्त होना चाहिए। खण्डकाव्य तब तक सफल नहीं होगा, जब तक वह अपने लक्ष्य में पूर्ण न हो और जिस भी भाव को लेकर लिखा जाय वह अपने आप में पूर्ण हो, क्योंकि उसमें विस्तार की सुविधा नहीं रहती है। इसमें एक ही भाव की अनुभूतिमयी अभिव्यंजना होती है; जैसे—सुदामाचरित, पंचवटी। – उपर्युक्त सभी प्रकार के काव्य श्रव्य-काव्य के अन्तर्गत आते हैं। श्रव्य-काव्य में पठनीय और श्रवणीय महाकाव्य से लेकर मुक्तक और गीतों की भी गणना की जाती है। श्रव्य-काव्य वह होता है, जिसके सुनने से अथवा स्वयं पढ़ने से रसास्वादन प्राप्त हो।

(3) दृश्य-काव्य–दृश्य-काव्य के अन्तर्गत नाटक और प्रहसन आते हैं जिनका अभिनय रंगमंच पर पात्रों द्वारा किया जाता है। इसमें गद्य के सम्भाषण के अतिरिक्त गेय गीतों, छन्दों अथवा प्रसंगानुकूल नृत्यों की योजना रहती है। दृश्य-काव्य के अन्तर्गत अधिक रमणीयता होती है क्योंकि दर्शक उसकी प्रत्यक्षानुभूति करता है। कलाकार अपनी प्रभावशील अभिनय कला द्वारा हृदय पर सीधा प्रभाव डालते हैं। दृश्य-काव्य निश्चय ही श्रव्य-काव्य से श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उसका आनन्द पढ़कर एवं देखकर दोनों रूपों में प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु श्रव्य-काव्य का आनन्द केवल सुनकर ही लिया जा सकता है। नाटक में साहित्य के अन्य तत्वों के अतिरिक्त अभिनय तत्व भी होता है, जैसे-नाटक, एकांकी आदि।

(2) शब्द-शक्ति मनुष्य अपने मनोगत विचारों को दूसरों पर जिस भाषा के माध्यम से लिखकर या बोलकर प्रकट करते हैं, वह भाषा शब्दों के समूह से मिलकर बनती है। शब्द दो प्रकार के होते हैं सार्थक एवं निरर्थक। साहित्य या काव्य में सार्थक शब्द ही अपेक्षित हैं। सार्थक शब्द के कई अर्थ साहित्यिक दृष्टि से निकलते हैं—

  • वाचक,
  • लक्षण और
  • व्यंजक।

ये तीन सार्थक शब्द हैं और क्रमशः इनके तीन अर्थ निकलते हैं—

  • वाच्यार्थ,
  • लक्ष्यार्थ और
  • व्यंग्यार्थ।

शब्दों के विभिन्न अर्थ बतलाने वाले व्यापार अथवा साधन को शब्द-शक्ति कहते हैं। शब्द-कोष के मतानुसार, “शब्द की शक्ति उसके अन्तर्निहित अर्थ को व्यक्त करने का व्यापार है। यह तीन प्रकार की होती है।”

(1) अभिधा शक्ति—जिस शब्द के श्रवण मात्र से उसका परम्परागत प्रसिद्ध अर्थ सरलता से समझ में आ जाए उसे अभिधा शब्द-शक्ति कहते हैं। इस अर्थ को वाच्यार्थ, मुख्यार्थ और अभिधेयार्थ के नामों से भी जाना जाता है। अभिधा के इस अर्थ का ग्रहण जाति के नाम से, स्वतन्त्र नाम से, धर्मों से गुण यानी रंग, रूप, रस, गन्ध के नाम से और क्रिया के नाम से होता है।

जैसे—

  • ‘बैल’ बड़ा उपयोगी पशु है।
  • रमेश के ‘कान’ में पीड़ा है। इन वाक्यों में ‘बैल’ का अर्थ पशु विशेष और ‘कान’ का अर्थ श्रवणेन्द्रिय से ही होता है, जो इन शब्दों के प्रचलित अर्थ हैं। शब्द और अर्थ का ज्ञान इन कारणों से होता है व्याकरण से, उपमान से, प्रसिद्ध शब्द के सादृश्य से, शब्दकोष से, प्रामाणिक वक्ता के आप्तवाक्य से एवं सर्वव्यापक कारण है व्यवहार।

(2) लक्षणा शक्ति-लक्षणा शक्ति-शब्द के वाच्यार्थ या मुख्यार्थ से भिन्न है, परन्तु उनके समान अन्य अर्थ को प्रकट करती है। जब किसी शब्द का अभिधा के द्वारा मुख्यार्थ का बोध नहीं हो पाता, अथवा ‘मुख्यार्थ’ समझने में बाधा हो जाती है, तब उस शब्द के अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति को लाक्षणिक शक्ति कहते हैं, जैसे-

  • सुदेश ‘बैल’ है।
  • रमेश के ‘कान’ नहीं हैं।

इन वाक्यों में सुदेश मनुष्य है पशु नहीं है, किन्तु उसे बैल कहने का तात्पर्य है. बैल के समान बुद्धि शून्य है जो दूसरों के नियन्त्रण में रहता है। इसी प्रकार रमेश के कान नहीं हैं उसका मतलब होता है कि वह सुनता नहीं है। यहाँ उक्त शब्दों का अर्थ अभिधा शक्ति द्वारा प्रकट न होकर ‘लक्षणा शक्ति’ के द्वारा प्रकट होता है।

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लक्षणा के दो मुख्य भेद हैं रूढ़ि और प्रयोजनवती। जिसमें मुख्यार्थ का बोध न होने पर जिसकी लोक में प्रसिद्धि हो, उसे रूढ़ि लक्षणा कहते हैं, जैसे “वह चौकन्ना रहता है।” यहाँ चौकन्ना का अर्थ चार कान वाला नहीं वरन् ‘सतर्क’ रूढ़ हो गया है, अत: वही अर्थ होगा। इसी प्रकार ‘तेल’ शब्द का अर्थ तो होता है तिल से निकला पदार्थ, किन्तु तरल चिकने पदार्थ के लिए रूढ़ हो जाने से तेल किसी भी तरल पदार्थ को कह देते हैं।

दूसरा प्रकार है प्रयोजनवती लक्षणा। जब मुख्यार्थ से कथन का अभिप्राय बोधगम्य न हो, तब किसी खास प्रयोजन के कारण दूसरा ऐसा अर्थ ले लिया जाये, जिसका मुख्य अर्थ से सम्बन्ध हो, उसे प्रयोजनवती लक्षणा कहते हैं, जैसे—’गंगा में साधु’ हैं।’ यहाँ पर गंगा का अर्थ गंगा नदी नहीं, वरन् गंगा का तट ही अपेक्षित अर्थ है। प्रयोजन से अभीष्ट अर्थ निकाल लिया गया। गंगा के मुख्यार्थ में बाधा पड़ी तथा प्रयोजन में उसके समीप का अर्थ ग्रहण कर लिया अतः यह प्रयोजनवती लक्षणा हुई।

(3) व्यंजना शक्ति–व्यंजना से जाने हुए अर्थ को व्यंग्यार्थ, ध्वन्यार्थ या प्रतीयमान अर्थ कहते हैं और उस शब्द को व्यंजक कहते हैं। जब अभिधा और लक्षणा शक्ति से किसी शब्द का अर्थ नहीं निकल पाता है और शब्द के वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ से भिन्न कोई अन्य विशिष्ट अर्थ या कई भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ निकलती हैं, तब व्यंजना शक्ति की सहायता से अर्थ ज्ञात किया जाता है। वाच्यार्थ से भिन्न निकलने वाला विलक्षण अर्थ व्यंग्यार्थ’ होता है। इसको ध्वनि कहते हैं। श्रेष्ठ कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं में ध्वनि का कारण ही विशेष चमत्कार होता है।

यह व्यंजना वृत्ति दो प्रकार की होती है-
(i) शाब्दी व्यंजना और
(ii) आर्थी व्यंजना।

(i) शाब्दी व्यंजना-इसमें व्यंजना का आधार वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ के भेद से प्रयुक्त शब्द के सम्बन्ध से होता है। अभिधा के द्वारा शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, जैसे—’इन्दौर मध्य प्रदेश की मुम्बई है।” इसमें मुम्बई शब्द में ऐश्वर्य, सम्पन्नता की जो ध्वनि है, वही इन्दौर के लिए भी समीचीन प्रतीत होती है।

(ii) आर्थी व्यंजना–जहाँ देशकाल, परिस्थिति या कण्ठ-ध्वनि और विशेष शब्द पर जोर से कोई विशेष अर्थ निकले, वहाँ आर्थी व्यंजना होती है। एक ही वाक्य के सन्दर्भानुसार अनेक अर्थ होते हैं; जैसे..”सन्ध्या हो गयी”-इसी वाक्य को माता पुत्री से कहे तो अर्थ होगा प्रकाश कर दो। सेवक स्वामी से कहे तो अर्थ,होगा-उसके अवकाश का समय हो गया और एक मित्र दूसरे मित्र से कहे तो तात्पर्य होगा चलचित्र का समय हो गया। गुरु शिष्य से कहे तो तात्पर्य है अध्ययन का समय हो गया।

विद्वानों ने तो ‘ध्वनिरात्मा काव्यस्य’ कहा है। ध्वन्यात्मक काव्य उत्कृष्ट काव्य है। इस प्रकार शब्द-शक्तियों के अध्ययन से हम रस का पूर्ण आस्वादन कर सकते हैं। वस्तुतः उक्त तीनों शब्द शक्तियों का विवेचन एक प्राचीन संस्कृताचार्य ने निम्नांकित श्लोकों में पूर्ण रूप से कर दिया है। उसका कथन है कि

“अभिधां वदन्ति सरला।
लक्षणा नागराजनाः।
व्यंजना नर्म मर्मज्ञः।
कवयाः, कमनाजनाः।।”

तात्पर्य यह है कि सीधे-सादे, भोले-भाले सरल व्यक्ति या ग्रामीण व्यक्ति अभिधा शक्ति का प्रयोग करते हैं, क्योंकि वे जो कहेंगे उसका वही अर्थ होगा। नगरवासी शिक्षित सभ्य पुरुष अधिकतर लक्षणा शक्ति का प्रयोग करते हैं, जिसमें कई रूढ़ि शब्द होते हैं और कई शब्दों का प्रयोजन से अर्थ होता है। शेष बचे सहृदय, रसिकजनक, कवि, प्रेमी, उत्कृष्ट जन-वर्ग सदैव व्यंजना वृत्ति अपनाते हैं, जिनकी बात में चमत्कार होता है और जो आनन्दायिनी रहती है।

(3) शब्द गुण (काव्य गुण) कविता-कामिनी को अलंकारों से सुसज्जित कर भी विद्वानों ने उसके आन्तरिक रूप को ही महत्त्व दिया है। अलंकार, छन्द से काव्य का बाह्य रूप सजता है किन्तु सुन्दर सजीला तन भावपूर्ण मन के बिना तथा गुण रहित होने से व्यर्थ होता है। कहा भी है कि “गुणीनां च निर्गुणनां च दृश्यते महदन्तरम्।” अत: मानवोचित गुणों के अनुकूल ही काव्य गुण भी होते हैं। आचार्य दण्डी ने दस काव्य गुणों का उल्लेख किया है और भोज ने चौबीस गुणों का। किन्तु साहित्य में काव्य के तीन ही गुण प्रमुख माने गये हैं। उसी वर्गीकरण के अन्तर्गत इन्हीं तीनों में अन्य सभी गुण समाहित कर लिए हैं। इन गुणों का काव्य में किस प्रकार प्रणयन होता है तथा गुणयुक्त काव्य श्रोता या पाठक पर किस प्रकार प्रभावशील होता है, उनके लिए कुछ नियम हैं।

मुख्य तीन गुण हैं—

  • माधुर्य,
  • ओज,
  • प्रसाद।

(1) माधुर्य गुण–मधुरता के भाव को माधुर्य कहते हैं। मिठास अर्थात् कर्णप्रियता ही इसका मुख्य भाव है। जिस काव्य के श्रवण से आत्मा द्रवित हो जाये, मन आप्लावित और कानों में मधु घुल जाये वही माधुर्य गुणयुक्त है। यह गुण विशेष रूप से श्रृंगार, शान्त एवं करुण रस में पाया जाता है। माधुर्य गुण की रचना में

  • कठोर वर्ण यानि सम्पूर्ण ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) के शब्द नहीं होने चाहिए।
  • अनुनासिक वर्गों से युक्त अत्यन्त दीर्घ संयुक्ताक्षर नहीं होना चाहिए।
  • लम्बे-लम्बे सामासिक पदों का प्रयोग भी वर्जित है।
  • कोमलकांत मृदु पदावली का एवं मधुर वर्णों (क, ग, ज,द आदि) का प्रयोग होना चाहिए।

उदाहरण—
(1) ‘छाया करती रहे सदा, तुझ पर सुहाग की छाँह।
सुख-दुख में ग्रीवा के नीचे हो, प्रियतम की बाँह।।

(2) अनुराग भरे हरि बागन में,
सखि रागत राग अचूकनि सों।

(3) लेकर इतना रूप कहो तुम, दीख पड़े क्यों मुझे छली?
चले प्रभात बात फिर भी क्या खिले न कोमल कमल कली?

(4) बसो मोरे नैनन में नन्दलाल
मोहिनी मूरत साँवरी सूरत नैना बने बिसाल।

(2) ओज गुण-जिस काव्य-रचना को सुनने से मन में उत्तेजना पैदा होती है, उस कविता में ओजगुण होता है। ओज का सम्बन्ध चित्त की उत्तेजना वृत्ति से है। इसलिए जिस काव्य को पढ़ने या सुनने से पढ़ने वाले के हृदय में उत्तेजना आ जाती है, वही ओजगुण प्रधान रचना होती है। वीर रस रचना के लिए इस गुण की आवश्यकता होती है। इस गुण को उत्पन्न करने के लिए विद्वानों ने निम्नलिखित गुणों का विधान किया है-

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  • रचना की शैली एवं शब्द योजना दोनों का ही सुगठित एवं सुनियोजित होना आवश्यक
  • पंक्ति अथवा छन्द की रचना में कहीं भी शिथिलता होना अनपेक्षित है।
  • रचना में ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) और सभी कठोर व्यंजनों का आधिक्य होना चाहिए।
  • र के संयोग से बने शब्द प्रथम एवं तृतीय, द्वितीय और चतुर्थ वर्गों का प्रयोग होते संयोजन तथा रेफ युक्त शब्द प्रभावशाली हैं।
  • लम्बे-लम्बे समासों से युक्त शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। अधिकाधिक संयुक्ताक्षरों का प्रयोग होना चाहिए।

उदाहरण-
(1) अमर राष्ट्र, उदण्ड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र-यह मेरी बोली।
यह ‘सुधार’, ‘समझौते’ वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली।।

(2) निकसत म्यान तें मयूखै प्रलै भानु कैसी,
फारै तम-तोम से गयंदन के जाल को।

(3) महलों ने दी आग, झोंपड़ियों में ज्वाला सुलगाई थी
वह स्वतन्त्रता की चिनगारी, अन्तरतम से आई थी।

(4) हिमाद्रि तुंग शृंग पर, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्वला, स्वतन्त्रता पुकारती।

(3) प्रसाद गुण—प्रसाद का अर्थ है—प्रसन्नता या निर्मलता। जिस काव्य को सुनते या पढ़ते समय वह हृदय पर छा जाये और बुद्धि शब्दों के दुरूह जाल में या क्लिष्ट अर्थों की कलुषता में मलिन न होकर एकदम प्रभावित हो जाये, मन खिल जाये, उसे प्रसाद गुण कहते हैं। कवि का उद्देश्य होता है मानव हृदय को प्रभावित करना। प्रेमी की बात प्रिय पात्र के हृदय को रस से सराबोर न कर दे, ममता वात्सल्य को आहूदित न कर पाये, करुणा नयनों के कोरों को यदि अविरल न कर पाये और वीरता का उत्साह यदि ओजित न कर पाये-ये सभी यदि शब्दों की भूलभुलैया में पड़कर क्लिष्टता के अस्त-व्यस्त मार्ग पर चल पड़े तो काव्य ब्रह्मानन्द सहोदर न होकर मस्तक की पीड़ा बन जायेगा। व्यस्तता के इस गुण में हमें आज प्रसाद गुण युक्त काव्य की आवश्यकता है। यही गुण अधिक समय तक प्रभावशाली रह सकता है, क्योंकि यह सीधे हृदय पर छाप छोड़ता है। सभी रसों की रचना प्रसाद गुण युक्त हो सकती है। प्रसाद गुण का सम्बन्ध सभी रसों से है। उक्त दोनों गुणों की तरह यह गुण किसी रस विशेष से नियन्त्रित नहीं है। शब्दों के साथ अर्थ का भी सरल होना आवश्यक है। इसमें जो बात कही जाये, उसका वही अर्थ होता है। ‘साहित्य-दर्पण’ के प्रणेता आचार्य विश्वनाथ का कथन है कि-“समस्त रसों और रचनाओं में जो चित्र को सूखे ईंधन में अग्नि के समान शीघ्र व्याप्त करे—वह प्रसाद गुण है।”

उदाहरण-
(1) “चुप रहो जरा सपना पूरा हो जाने दो,
घर की मैना को जरा प्रभाती गाने दो,
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो,
मुझको आँचल में हरसिंगार भर लेने दो।”

(2) मानुस हौं तो वही रसखान
बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

(3) तन भी सुन्दर मन भी सुन्दर
प्रभु मेरा जीवन हो सुन्दर।

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(4) हे प्रभो आनन्द दाता ! ज्ञान हमको दीजिए।
(5) आशीषों का आँचल भर कर, प्यारे बच्चो लाई हूँ।
युग जननी मैं भारत माता द्वार तुम्हारे आई हूँ।

-बालकृष्ण बैरागी

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MP Board Class 11th Special Hindi गद्य साहित्य : विविध विधाएँ

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1. निबन्ध

निबन्ध गद्य रचना का एक प्रधान भेद है। गद्य साहित्य का सबसे परिष्कृत और प्रौढ़ रूप निबन्ध में ही उभरता है।

परिभाषा-निबन्ध वह रचना है जिसमें किसी गहन विषय पर विस्तार और पाण्डित्यपूर्ण विचार किया जाता है। वास्तव में, निबन्ध शब्द का अर्थ है-बन्धन। यह बन्धन विविध विचारों का होता है, जो एक-दूसरे से गुंथे होते हैं और किसी विषय की व्याख्या करते हैं।

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है, तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।”

जयनाथ नलिन के शब्दों में, “निबन्ध स्वाधीन चिन्तन और निश्छल अनुभूतियों का सरस, सजीव और मर्यादित गद्यात्मक प्रकाशन है।”

भाषा की पूर्ण शक्ति भी निबन्धों में ही दिखाई पड़ती है। साहित्य के अन्य विविध क्षेत्रों के विषय में गहन जानकारी भी निबन्धों द्वारा ही प्राप्त होती है। निबन्ध ही मनुष्य के मस्तिष्क का सारा ज्ञानकोश उभारकर रख देते हैं। वह गद्य साहित्य का ऐसा अंग है जो अपने में अत्यधिक पूर्ण और उपयोगी है। निबन्ध साहित्य की एक ऐसी रचना है जो पाठक के मन में आनन्द और अनुभूति उत्पन्न करने में साहित्य की अन्य विधाओं से अधिक सक्षम है।

  • निबन्ध के तत्त्व

निबन्ध को समझने और उसका रसास्वादन करने के लिए निम्नलिखित तीन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है

  1. निबन्ध की विषय-वस्तु,
  2. विषय-वस्तु को प्रस्तुत करने का उद्देश्य,
  3. निबन्ध की शैली।

निबन्ध के लिए स्वीकृत विषयों की कोई सीमा नहीं है। अभिव्यक्त विषय में किसी भाव, दृश्य आदि का चित्रण है अथवा किसी घटना मात्र का वर्णन है, किसी मनोविकार आदि का निरूपण विश्लेषण हुआ है या किसी प्रसंग का भावात्मक विवरण है।

इसके पश्चात् उद्देश्य की ओर. ध्यान देना चाहिए। लेखक कभी कुछ तथ्यों, दृश्यों या क्रिया-कलापों का विवरण देकर पाठक का ज्ञानवर्द्धन करना चाहता है तो कभी किसी दृश्य या अतीत की स्मृति को भावात्मक शैली से रमाना चाहता है; कभी वह पाठकों को कुछ प्रेरणा देना चाहता है तो कभी किसी सीख या निष्कर्ष तक ले चलना उसका उद्देश्य होता है। इस प्रकार विषय-वस्तु और उद्देश्य निबन्ध के दो ऐसे तत्त्व हैं जिनसे निबन्ध को समझने में सहायता मिलती है।

निबन्ध में लेखक का दृष्टिकोण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। वस्तुतः इसी आधार भूमि पर अवस्थित होकर निबन्ध के विवरणों का सर्वेक्षण किया जाता है। अतः निबन्ध में जो मूल्य, तथ्य, आवेश-संवेग, स्मृतियाँ अथवा पूर्वाग्रह आते हैं वे इसी पर आश्रित होते हैं, इसी के द्वारा उन्हें जाना जा सकता है। रामचन्द्र शुक्ल ने जिन संस्मरणों का संकेत अपने विचार प्रधान निबन्धों में किया है वे उनके विषय सम्बन्धी दृष्टिकोण को ही सचित करते हैं। निबन्ध में आत्मपरकता का समावेश इसी के द्वारा होता है।

निबन्धकार का कौशल उसकी अभिव्यंजना शैली में निहित होता है। निबन्ध को समझने और सराहने के लिए मुख्य रूप से यह देखना होगा कि विषय-वस्तु को अभिप्रेत उद्देश्य के लिए किस ढंग से प्रस्तुत किया गया है। किसी भी विषय के सम्बन्ध में अनेक छोटे-बड़े विवरण हो सकते हैं। लेखक अपने उद्देश्य के लिए उनमें से आवश्यक का चयन कर लेता है। अत: निबन्ध के अर्थबोध के लिए चयन और नियोजन को ध्यान रखना आवश्यक है।

भाषा के विविध स्तर भी मूल आशय का प्रतिपादन करने में सहायक होते हैं। भाषा की प्रांजलता और समृद्धि केवल शब्द चयन पर ही निर्भर नहीं है। विचारों को सुस्पष्ट वाक्यों और स्वाभाविक शैली में उपस्थित करना और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए मुहावरों,लोकोक्तियों आदि का समीचीन प्रयोग निबन्ध को अर्थवत्ता प्रदान करता है। निबन्ध में गृहीत बिम्बों, उदाहरणों एवं सन्दर्भो को भी प्रतिपाद्य विषय से सम्बद्ध करके देखना चाहिए।

  • निबन्धों के भेद [2008]

विद्वानों ने प्रमुख रूप से निबन्धों को चार कोटियों में विभाजित किया है, जो निम्न प्रकार हैं
(1) भावात्मक,
(2) विचारात्मक,
(3) वर्णनात्मक,
(4) विवरणात्मक।

(1) भावात्मक निबन्ध-उसे कहते हैं जो किसी विषय का भावना प्रधान चित्र प्रस्तुत करते हैं तथा उसमें विषय की गम्भीर विवेचना नहीं की जाती। इनमें कल्पना का स्थान महत्त्वपूर्ण होता है। निबन्धकार के हृदय से भाव स्वतः कल्पना का रंगीन आवरण ओढ़े अबाध गति से निःसृत होते हैं। विषय के चित्र की रेखाएँ उभरती चलती हैं और निबन्ध की समाप्ति पर एक आकर्षक एवं मार्मिक चित्र उपस्थित हो जाता है। इसमें गहन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है।

(2) विचारात्मक निबन्ध-इनमें भावों की अपेक्षा विचारों की प्रधानता रहती है। उनका सम्बन्ध हदय से न होकर मस्तिष्क से होता है। उनमें विषय की व्याख्या, विवेचन और विश्लेषण सभी कुछ बुद्धि-प्रसूत रहता है। स्वाभाविक है कि ऐसे निबन्धों में विचारों की गहनता होती है। विचारात्मक निबन्धों का क्षेत्र जीवन की प्रत्येक समस्या से सम्बन्धित होता है। विचारात्मक निबन्धों में भी भावों का अस्तित्व होता है किन्तु प्रधानता विचारों की रहती है। विचारात्मक निबन्ध मस्तिष्क-प्रधान होते हैं जबकि भावात्मक निबन्ध हदय-प्रधान होते हैं।

(3) वर्णनात्मक निबन्ध-ये भावात्मक निबन्धों से बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। इसमें विषय का वर्णन आकर्षक ढंग से किया जाता है। किसी भी ऐतिहासिक स्थान, किसी भी कलाकृति, किसी भी प्रकृति के उपादान या वस्तु विशेष को लेकर निबन्धकार सुन्दर भाषा में उसका वर्णन करता है। भारत की सांस्कृतिक एकता इसका उदाहरण है।

(4) विवरणात्मक निबन्ध-इन निबन्धों में किसी वस्तु, घटना या स्थान आदि का विवरण उपस्थित किया जाता है। उदाहरण के लिए, हम किसी यात्रा या नौका विहार को या किसी मेले, उत्सव को लें। उसका विवरण निबन्धकार इतने आकर्षक ढंग से देता चलेगा और अन्त तक वह अपने प्रभाव की छाप हमारे हृदय पर छोड़ देगा। इनमें सारा ध्यान निबन्धकार का प्रमुख विषय पर होता है।

  • निबन्ध रचना की शैली के प्रकार

निबन्धों की विषय-वस्तु को सजाने के तरीके का नाम शैली है। शैली से आशय है भाषागत शैली, जिसमें भाषा के बाह्य और आन्तरिक रूपों का समावेश होता है। प्रायः निबन्ध में निम्नांकित शैली रूपों का ही अधिक प्रयोग होता है

  1. व्यास शैली-इसमें भाव व विचार का विस्तार अत्यन्त सरल और रोचक ढंग से किया जाता है। सरलता, स्पष्टता और स्वाभाविकता इस शैली की विशेषताएँ हैं। कथात्मक (विवरणात्मक) और वर्णनात्मक निबन्ध इसी शैली में लिखे जाते हैं। इसे प्रसाद शैली भी कहते हैं।
  2. समास शैली-समास का अर्थ है-संक्षिप्त। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहना इस शैली की विशेषता है। इस शैली का उपयोग विचारात्मक निबन्धों में अधिक होता है।
  3. विवेचना शैली-इसमें लेखक तर्क-वितर्क, प्रमाण, पुष्टि, व्याख्या एवं निर्णय आदि का सहारा लेते हुए विषय का प्रतिपादन करता है। गहन अध्ययन, मनन और चिन्तन के आधार पर लेखक अपनी बात समझाता है। इसमें कभी-कभी क्लिष्टता आ जाती है। विचारात्मक निबन्ध इसी शैली में आते हैं। शुक्लजी के निबन्ध इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
  4. व्यंग्य शैली-इसमें व्यंग्य-विनोद के माध्यम से महत्त्वपूर्ण तत्त्वों का उदघाटन किया जाता है। इसमें कभी-कभी मनोरंजन, कभी तीखी चुभन और कभी गुदगुदी-सी होती है।
  5. आवेश शैली-इसमें लेखक भावावेश में विचारों की अभिव्यक्ति करता है। भाव प्रवाह अनुकूल भाषा और शब्द नियोजन के माध्यम से निबन्ध अपने आप आगे बढ़ता है। इसी को धारा शैली या प्रवाह शैली भी कहते हैं।
  6. संलाप शैली-संलाप शैली का अर्थ है-वार्तालाप । इसमें भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति संवादों के माध्यम से होती है।
  7. प्रलापशैली-कभी-कभी लेखक आन्तरिक आवेश के कारण भावों पर नियन्त्रण न रख सकने के कारण आवेश की सी मानसिक स्थिति से गुजरता हुआ लिखता है। इसमें भावाभिव्यक्ति अस्त-व्यस्त हो जाती है।
    कभी-कभी विषय के प्रतिपादन की दृष्टि से व्याख्या की दो शैलियों का उपयोग होता है।
  8. निगमन शैली-इसमें पहले विचारों को सूत्र रूप में रखकर फिर उसकी विस्तृत व्याख्या करके समझाया जाता है जिसमें उदाहरणों का भी उपयोग होता है।
  9. आगमन शैली-इसमें विचारों को पहले विस्तारपूर्वक व्याख्या करके बाद में उसका सारांश सूत्र या सिद्धान्त रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
  • निबन्ध का विकास

हिन्दी निबन्ध साहित्य का विकास आधुनिक काल की देन है। इसके विकास क्रमाको निम्नवत् चार युगों में विभाजित किया जा सकता है

  1. भारतेन्दु युग,
  2. द्विवेदी युग,
  3. शुक्ल युग एवं
  4. शुक्लोत्तर युग (वर्तमान युग)।

प्रारम्भ में पत्र सम्पादक स्वयं निबन्ध लिखने की कला में प्रवीण थे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द ने निबन्ध लिखने का कार्य भी बड़े ही कौशल से किया है। भारतेन्दु युग में अनेक गद्य रूपों का विकास हुआ है।

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(1) भारतेन्दु युग-भारतेन्दु युग हिन्दी गद्य का शैशवकाल है। भारतेन्दु आधुनिक काल के जन्मदाता हैं उनके युग को भारतेन्दु युग के नाम से सम्बोधित किया जाता है। भारतेन्दु युग को ऐसी मजबूत नींव के समान माना जाता है, जिस पर आगे चलकर क्रमशः एक-एक मंजिल बनती चली गई थी।

  • विशेषताएँ
  1. निबन्धों के कलेवर में पत्रकारिता का युग समाविष्ट है।
  2. सड़ी-गली मान्यताओं एवं रूढ़ियों का प्रबल विरोध है।
  3. निबन्धकारों के मस्त एवं मनमौजी व्यक्तित्व की निबन्धों में छाप है।
  4. निबन्धों में राजनैतिक चेतना, समाज सुधार की आकांक्षा के फलस्वरूप यत्र-तत्र भाषा में शिथिलता अवलोकनीय है।
  5. शैली सरस, हदयस्पर्शी एवं मनभावन है।
  6. हास्य व्यंग्य के छोटे निबन्ध की दुरूहता को कुछ कम कर देते हैं। चुभते हुए व्यंग्य एवं विनोदप्रियता के दर्शन होते हैं।
  7. भाषा, भाव एवं शैली में नवीनता का समावेश है। संस्कृत तद्भव एवं तत्सम शब्दों की भरमार है।
  8. निबन्धकार अंधानुकरण के घोर विरोधी थे।
  9. साहित्यिक रूपों की विवेचना इसी युग में प्रारम्भ हुई।
  10. पाश्चात्य शैली के अध्ययन के माध्यम से नए आदर्श अवलोकनीय हैं।
  • प्रमुख निबन्धकार

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बालमुकुन्द गुप्त एवं बद्रीनारायण चौधरी आदि प्रमुख निबन्धकार हुए।
निष्कर्ष-भारतेन्दु युग हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार है। इस युग को हम ‘सन्धि युग’ भी कह सकते हैं।

(2) द्विवेदी युग (सन् 1900 से 1920 तक)-
भारतेन्दु युग के पश्चात् आधुनिक काल का द्वितीय चरण द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है। सरस्वती पत्रिका का सम्पादन करके द्विवेदी जी ने हिन्दी गद्य को उन्नत एवं व्यवस्थित किया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, काशी नागरी प्रचारिणी सभा का गद्य साहित्य के विकास में विशेष योगदान है। द्विवेदी जी के कुशल निर्देशन में न जाने कितने कलाकार साहित्य जगत में उजागर हुए जिनकी सफल कीर्ति आज भी फैली है। द्विवेदी युग तैयारी का युग था जिसमें आधुनिक साहित्य-शैली का निर्माण हो रहा था।

  • प्रमुख निबन्धकार [2008]

महावीर प्रसाद द्विवेदी, पद्मसिंह शर्मा, सरदार पूर्णसिंह, बालमुकुन्द गुप्त, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी इस युग के प्रमुख निबन्धकार हैं।

  • विशेषताएँ [2008]
  1. भाषा को व्यवस्थित एवं सुगठित किया गया। भाषा में अभिव्यंजना शक्ति का भी पर्याप्त विकास हुआ।
  2. जीवनोपयोगी विषयों पर निबन्ध लिखे गये हैं।
  3. निबन्धों में गम्भीरता का समावेश है।
  4. साहित्य समालोचना, संस्कृति इतिहास एवं विभिन्न विषयों पर सफल निबन्ध लिखे गये हैं।
  5. निबन्धों में यत्र-तत्र दुरूहता का समावेश है।
  6. निबन्धों की भाषा प्रांजल एवं परिमार्जित है। विभक्तियों का उचित प्रयोग है।
  7. हिन्दी में समालोचना शैली का सूत्रपात भी इस युग में हुआ।
  8. सरल तथा प्रचलित शब्दावली में कहीं-कहीं करारा व्यंग्य है।

निष्कर्ष-द्विवेदी जैसा साहित्य का प्रहरी निरन्तर हिन्दी भाषा एवं साहित्य को परिष्कार कर, उसे आदर्श की ओर उन्मुख करने में दत्त-चित्त रहा। गद्य साहित्य सर्वांगीण तथा बहुमुखी बन गया।

(3) शुक्ल युग (सन् 1920 से 1945 तक)-
द्विवेदी युग के बाद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का नाम हिन्दी निबन्धकारों में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्होंने हिन्दी को महत्त्वपूर्ण मौलिक कृतियाँ दी, इसी हेतु इस युग को शुक्ल युग के नाम से जाना जाता है।

  • प्रमुख निबन्धकार

श्यामसुन्दर दास, गुलाबराय, वियोगी हरि, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, जयशंकर प्रसाद, रायकृष्ण दास, सियाराम शरण गुप्त, डॉ. रघुवीर सिंह।
विशेषताएँ

  1. भाषा शक्ति सम्पन्न एवं कलात्मक बनी।
  2. विविध प्रकार के साहित्य की रचना हुई।
  3. भाषा भावों की अनुगामिनी है।
  4. भारतीय एवं पाश्चात्य समीक्षा का तर्कसंगत समन्वय है।
  5. समसामयिक समस्याओं का निरूपण है।
  6. नाटक के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का अपूर्व योगदान है।
  7. प्रेमचन्द्र ने कहानी एवं उपन्यास के क्षेत्र में व्यावहारिक एवं सरल शैली का प्रयोग किया है।
  8. मार्क्सवाद के प्रभाव के फलस्वरूप जनवादी चेतना पर आधारित निबन्ध लिखे गए हैं।
  9. स्वतंत्रता संग्राम एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े मनोभावों को निबन्धों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।
  10. छायावाद के संदर्भ में तर्कपूर्ण विवेचना है।
  11. निबन्धों की शैली परिमार्जित एवं विषयों के अनुरूप है।
  12. यत्र-तत्र गाँधीवाद का प्रभाव भी अवलोकनीय है।
  13. द्विवेदी युगीन व्यास प्रधान शैली के स्थान पर समास प्रधान शैली का प्रचलन हुआ।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शुक्ल जी ने सरल एवं मिश्रित गद्य का ऐसा स्वरूप उपस्थित किया जो जन साधारण की भाषा का रूप था।

(4) शुक्लोत्तर युग (सन् 1945 से आज तक)-
शुक्ल युग के पश्चात् का युग शुक्लोत्तर युग के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसे वर्तमान युग’ भी कहा जाता है।

  • प्रमुख निबन्धकार

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, बाबू गुलाबराय, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नगेन्द्र, नन्ददुलारे वाजपेयी, रामवृक्ष बेनीपुरी, हरिशंकर परसाई,शान्तिप्रिय द्विवेदी, वासुदेवशरण अग्रवाल,रामधारीसिंह ‘दिनकर’, शिवदान सिंह चौहान, महादेवी वर्मा, भगवतशरण उपाध्याय, विजयमोहन शर्मा,धर्मवीर भारती, प्रभाकर माचवे आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

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विशेषताएँ

  1. इस युग के समस्त निबन्धों में चिन्तन के साथ-साथ गहराई का पुट है।
  2. भाषा शैली प्रौढ़ एवं प्रांजल है।
  3. भाषा व्यावहारिक है।
  4. निबन्धों में यत्र-तत्र व्यंग्य का पुट भी अवलोकनीय है।
  5. ‘खरगोश के सींग’ नामक निबन्ध जिसके लेखक प्रभाकर माचवे हैं,व्यंग्य का सजीव उदाहरण है।
  6. हरिशंकर परसाई एवं के. वी. सक्सेना ने भी व्यंग्यात्मक लेख लिखे हैं।
  7. निबन्धों में प्रगतिवादी विचारधारा भी परिलक्षित है।
  8. महादेवी वर्मा के संस्मरणात्मक निबन्ध भी बहुत ही सरस एवं सराहनीय हैं।
  9. जनेन्द्र कुमार ने गाँधीवादी विचारधारा को अपने निबन्धों में अभिव्यक्त किया है।
  10. सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरातल पर आधारित निबन्धों की रचना भी की गयी है।

प्रमुख निबन्धकार एवं उनकी रचनाएँ

भारतेन्दु युग
द्विवेदी युग

2. कहानी

संसार के सभी लिखित-अलिखित साहित्य में कहानी सबसे प्राचीनतम रूप है। कहानी पढ़ने या सुनने की प्रवृत्ति केवल बच्चों में ही नहीं, वयस्कों में भी होती है। आज के व्यस्त जीवन में कहानी की लोकप्रियता का कारण है उसका छोटा होना।

परिभाषा-“कहानी वास्तविक जीवन की ऐसी काल्पनिक कथा है जो छोटी होते हए भी स्वतः पूर्ण और सुसंगठित होती है।”
“कहानी में मानव जीवन की किसी एक घटना अथवा व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष का मनोरम चित्रण रहता है। उसका उद्देश्य केवल एक भी प्रभाव को उत्पन्न करना होता है।”
डॉ. श्यामसुन्दर दास के शब्दों में, “आख्यायिका एक निश्चित लक्ष्य के प्रभाव को लेकर नाटकीय आख्यान है।”

“कहानी ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उनका कथा-विन्यास सभी उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं।

“कहानी ऐसा रमणीक उद्यान नहीं है जिसमें भाँति-भाँति के फूल, बेलबूटे सजे हों, बल्कि वह एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य और सौन्दर्य अपने समुचित रूप में दृष्टिगोचर होता है।”

कहानी के तत्त्च [2008]

  1. कथावस्तु,
  2. चरित्र-चित्रण अथवा पात्र,
  3. कथोपकथन या संवाद,
  4. देशकाल व परिस्थिति,
  5. उद्देश्य,
  6. शैली और शिल्प।

(1) कथावस्तु-कहानी में कथावस्तु या कथानक कहानी का मुख्य ढाँचा होता है। विषय की दृष्टि से कहानी में सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक आदि में से किसी भी प्रकार का कथानक अपनाया जा सकता है। किन्तु यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि कहानी में जीवन की बाह्य घटनाओं की ही अभिव्यक्ति नहीं होती, मानव हृदय का भी उद्घाटन होता है। उदाहरण के लिए ‘संवदिया’ कहानी में घटनाओं का वर्णन कम, पर बड़ी बहू और संवदिया के मन का रहस्योद्घाटन करने की सफल चेष्टा की गयी है।

मानव जीवन के सुख-दुःख दोनों पक्षों की चर्चा के लिए कहानीकार के केवल घटनाओं का आयोजन ही नहीं करता, वह व्यक्ति के हृदय और मन की भावना और अन्तर्द्वन्द्व को पर्याप्त प्रमुखता देता है। कहानी की घटनाएँ अनायास ही घटित नहीं होती, कथा का विकास धीरे-धीरे होता है। इस कथा विकास की निम्नलिखित चार स्थितियाँ होती हैं

(अ) आरम्भ-कहानी के शीर्षक और प्रारम्भ में कथासूत्रों से अवगत करा दिया जाता है। कहानी आरम्भ करने के लिए अनेक विधियाँ हो सकती हैं-किसी पात्र के परिचय से, पात्रों के पारस्परिक वार्तालाप से अथवा वातावरण विशेष के चित्रण से। यदि कथा के आरम्भ में ही पाठक के मन में कौतूहल अथवा जिज्ञासा उत्पन्न हो जाय तो ‘आरम्भ’ सफल कहा जायेगा।

(आ) आरोह-सामान्य जानकारी के बाद आरोह की अथवा विकास की ओर ध्यान दिया जाता है। कथावस्तु के प्रवाह की दृष्टि से यह स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह कहानी का मध्य भाग होता है।

(इ) चरम स्थिति-कथानक के जिस स्थल द्वारा पाठक के मन में कौतूहल अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाय, उसे चरम स्थिति कहते हैं। इसमें पाठक उत्सुकता, आशा और आशंका के बीच उलझता हुआ कथानक के अन्तिम मोड़ के लिए लालायित हो उठता है।

(ई) अवरोह-अवरोह अथवा अन्त सबसे महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि कहानी का मूल उद्देश्य या भाव यहीं प्रतिफलित होता है। इस ओर उचित ध्यान न देने पर कहानी शिथिल हो जाती है और अपूर्ण प्रतीत होती है। कहानी के अवरोह में संक्षिप्तता और मार्मिकता पर विशेष बल रहता है।

(2) चरित्र-चित्रण एवं पात्र-योजना-कथा का विकास पात्रों द्वारा ही होता है। चरित्र-चित्रण के लिए अनेक प्रणालियाँ अपनायी जाती हैं, लेखक के द्वारा पात्र का प्रत्यक्ष वर्णन करके या पात्र के क्रिया-कलापों द्वारा। कभी-कभी कथोपकथन के माध्यम से भी पात्रों के व्यक्तित्व का उद्घाटन किया जाता है। पात्रों की परस्पर तुलना, प्रासंगिक घटनाओं के माध्यम से चरित्र की व्यंजना, अन्तर्द्वन्द्व की अवतरणा आदि चरित्र-चित्रण की प्रचलित शैलियाँ हैं। पात्रों के व्यक्तित्व की संक्षिप्त, स्पष्ट और संकेतात्मक अभिव्यक्ति कहानी का गुण है।

(3) कथोपकथन अथवा संवाद-कथा-सौन्दर्य की संवृद्धि में और पात्रों के निरूपण के लिए कथोपकथन का निश्चित योग है। संवाद रहित कहानियाँ अथवा. कम संवाद वाली कहानियों में उपयुक्त प्रभाव उत्पन्न नहीं हो पाता। संवादों में रोचकता, सजीवता और स्वाभाविकता का होना आवश्यक है। संवादों की गरिमा के लिए उन्हें पात्र, वातावरण, स्थान और समय के अनुकूल रखा जाता है। संवादों में पात्र के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व अथवा अन्य मनोभावों को प्रकट करने की शक्ति होनी चाहिए और यह भी आवश्यक है कि वे संक्षिप्त हों क्योंकि बड़े-बड़े संवाद प्रापः बोझिल और कृत्रिम प्रतीत होने लगते हैं।

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(4) देशकाल और परिस्थिति, वातावरण-कहानी का कथानक और उसके पात्र किसी न किसी देश और काल से जुड़े रहते हैं। प्रभाव वृद्धि के लिए आवश्यक है कि कहानी का अपना एक वातावरण भी हो। वातावरण के उपयुक्त चित्रण से कथात्मक रचनाओं में रस निष्पत्ति और मनोवैज्ञानिक प्रभाव की सृष्टि में विशेष सुविधा रहती है। कहानीकार घटनाओं, प्रकृति सौन्दर्य एवं पात्रों से सम्बद्ध स्थानों आदि का युगानुरूप चित्रण करते हैं। कुछ लेखक कहानी का आरम्भ ही वातावरण के चित्रण से करते हैं। जैसे “उसने कहा था” कहानी के प्रारम्भ में ही अमृतसर के बाजार का, वहाँ के वातावरण का बड़ा ही सजीव चित्रण है।

(5) उद्देश्य-आधुनिक कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन ही नहीं। वह हमें कोई सन्देश भी देती है। उसमें कुछ उद्देश्य भी निहित रहता है। कहानी के उद्देश्य से हमारा तात्पर्य कहानीकार के दृष्टिकोण से है। कहानी में जीवन की मार्मिक अनुभूतियों की सहज व्याख्या बड़े ही उद्देश्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत की जाती है। प्रगतिवादी, सुधारवादी आदि विभिन्न कहानियाँ विभिन्न उद्देश्यों के परिणामस्वरूप लिखी जाती हैं। कहानी में उद्देश्य को उपदेश रूप से प्रस्तुत नहीं किया जाता। प्रत्यक्ष स्थापना न करके उसका संकेत भर दिया जाता है।

(6) शैली और शिल्प-शैली से तात्पर्य लेखक द्वारा कथा वर्णन के लिए अपनायी गयी विशिष्ट पद्धति है। कहानी लेखन की अनेक शैलियाँ हो सकती हैं–लेखक अपनी सुविधा अनुसार वर्णनात्मक, आत्मकथात्मक, संवादात्मक, पत्रात्मक और डायरी शैली अपना सकता है। कला की दृष्टि से कहानी के सौन्दर्य का विधान शैली के माध्यम से ही होता है। शैली सौष्ठव के लिए लेखक अलंकार, लोकोक्ति, प्रतीक आदि उपकरणों की सहायता लेता है। कभी-कभी ग्रामीण पात्रों के लिए या तुतलाते बच्चों के लिए, आंचलिकता में सजीवता लाने के लिए वह उन्हीं की बोली का उपयोग भी करता है। यदि भाषा भाव के अनुसार न हो तो उपयुक्त प्रभाव का संचार नहीं हो पाता। इसी प्रकार हास्य, व्यंग्य, चित्रोपमता, प्रकृति के मानवीकरण से कहानी के सौन्दर्य में वृद्धि होती है।

कहानी के विविध रूप [2008]
विभिन्न तत्त्वों की प्रधानता की दृष्टि से कहानी के चार प्रमुख भेद किये जा सकते हैं-

  1. घटना प्रधान कहानी,
  2. चरित्र प्रधान कहानी,
  3. वातावरण प्रधान कहानी,
  4. भाव प्रधान कहानी।

(1) घटना प्रधान कहानी-इसमें क्रमशः अनेक घटनाओं को एक सूत्र में पिरोते हुए कथानक का विकास किया जाता है।
(2) चरित्र प्रधान कहानी-इसमें लेखक का ध्यान पात्रों के चरित्र-निरूपण की ओर ही अधिक रहता है। इसमें मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि में चरित्र की विभिन्न सूक्ष्मताओं का उद्घाटन लेखक या पात्र स्वयं करता है। कभी-कभी दूसरे पात्रों के माध्यम से भी मुख्य पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं।
(3) वातावरण प्रधान कहानी-इन कहानियों में वातावरण पर अधिक ध्यान दिया जाता है। विशेषतः ऐतिहासिक कहानियों में वातावरण को विशेष रूप से चित्रित किया जाता है क्योंकि यहाँ किसी युग विशेष का, उसकी संस्कृति, सभ्यता आदि का आभास वर्णन और संवाद द्वारा करना होता है।
(4) भाव प्रधान कहानी-इन कहानियों में एक भाव या विचार के आधार पर कथानक का विकास किया जाता है। इस कोटि में गद्य काव्य से मिलती-जुलती लघु कथाएँ, प्रेम कहानियाँ और प्रतीक कथाएँ आती हैं। ये प्रायः दृष्टांत के रूप में होती हैं और इनका अध्ययन जीवन के लिए प्रेरणादायक होता है। इस तरह कहानियाँ विचारों को प्रबुद्ध करती हैं और चिरकाल तक हृदय पर अमिट छाप छोड़ती हैं। इन कथाओं को लिखने में चित्र शैली को अपनाया जाता है।

  • हिन्दी कहानी का विकासक्रम

कहानी का अभ्युदय भारतेन्दु युग में हुआ। इसके विकास को निम्न प्रकार चार युगों में विभक्त कर सकते हैं

  1. प्रारम्भिक प्रयोगकाल – (सन् 1900 से 1910)
  2. विकास काल (पूर्वार्द्ध) – (सन् 1910 से 1936)
  3. विकास काल (उत्तरार्द्ध) – (सन् 1936 से 1947)
  4. स्वातन्त्रोतर काल – (सन् 1947 से अब तक)

1. प्रारम्भिक काल इस युग की कहानियों में कथावस्तु, देशकाल, उद्देश्य आदि तत्त्वों का समावेश है। कहानी के शिल्प विधान को भी महत्व दिया गया है।
प्रमुख कहानीकार – कहानियाँ [2008]

  1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल – ग्यारह वर्ष का समय
  2. गिरिजा दत्त बाजपेयी – पंडित और पंडिताइन
  3. श्री किशोरीलाल गोस्वामी – इन्दुमती
  4. माधव राव सप्रे – टोकरी भर मिट्टी
  5. बंग महिला – दुलाई वाली

2. विकास काल (पूर्वाद्ध) इस युग में हिन्दी कहानी के क्षेत्र में एक नवीन युग का शुभारम्भ हुआ। चरित्र-चित्रण एवं कथा संगठन पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया गया है। कहानी के कलेवर में आदर्श एवं यथार्थ के समन्वय के साथ ही इतिहास एवं कल्पना के समन्वय का प्रशंसनीय प्रयास है।

कहानियाँ
प्रमुख कहानीकार

  1. पं. चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ – उसने कहा था, बुद्ध का कांटा, सुखमय जीवन।
  2. जयशंकर प्रसाद – गुण्डा, पुरस्कार, आकाशदीप।
  3. भगवती प्रसाद बाजपेयी – सूखी लगड़ी, मिठाई वाला।
  4. प्रेमचन्द – बड़े घर की बेटी, पंच परमेश्वर, पूस की रात, कफन, शतरंज के खिलाड़ी।
  5. विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक’ – चित्रशाला, रक्षाबन्धन, ताई।

अन्य कहानीकार-सियाराम शरण गुप्त, विनोद शंकर व्यास, निराला, वृन्दावनलाल शर्मा, चण्डीप्रसाद हृदयेश, सुदर्शन।

3. विकास काल (उत्तराद्ध)

इस काल की कहानियों के कलेवर में प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड की मनोविज्ञान विषयक मान्यताओं एवं धारणाओं का विशेष प्रभाव परिलक्षित है। हास्य एवं व्यंग्य के छींटे कहानी को एक नया रूप प्रदान करते हैं। इस युग की कहानियों का विवरण निम्नवत् है

  1. अज्ञेय – कोठरी की बात, रोज, अमर वल्लरी।
  2. भगवती चरण वर्मा – दो बाँके, प्रायश्चित।
  3. जैनेन्द्र कुमार – पाजेब, अपना-अपना भाग्य।
  4. इलाचन्द्र जोशी – दीवाली, छाया, आहुति।
  5. यशपाल – दुःख, पराया सुख, परदा।

अन्य कहानीकार- महादेवी वर्मा, अमृतराय, विष्णु प्रभाकर, धर्मवीर भारती, अमृतलाल नागर, रांगेय राघव, उपेन्द्रनाथ अश्क’, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार।

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4. स्वातंत्रोत्तर काल कहानी के क्षेत्र में अल्पजीवी आन्दोलन के फलस्वरूप सचेतन कहानी,समानान्तर कहानी, अकहानी एवं नयी कहानी आदि नामों से अस्तित्व में आयीं।

  1. राजेन्द्र यादव – छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक।
  2. मोहन राकेश – एक और जिन्दगी, सौदा।
  3. फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ – लाल पान की बेगम, संवदिया, ठेस।
  4. कमलेश्वर – खोई हुई दिशाएँ, साँप।
  5. मन्नू भण्डारी – यही है जिन्दगी, सजा।

अन्य कहानीकार-निर्मल वर्मा, हरिशंकर परसाई, भीष्म साहनी, श्रीकान्त वर्मा, शिवानी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा आदि।

आज की कहानियों में कलात्मकता अवलोकनीय है। भाषा-भाव का सुन्दर समन्वय है। प्रेम तथा साहस का मनभावन सामंजस्य है।

3. एकांकी

यह गद्य की प्रमुख विधा है। विद्वानों के मत में इसकी परिभाषा अवलोकनीय है।

परिभाषा-डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, “एकांकी में हमें जीवन का क्रमबद्ध विवेचन मिलकर उसके एक पहल, एक महत्त्वपूर्ण घटना, एक विशेष परिस्थिति अथवा एक उद्दीप्त क्षण का चित्रण मिलेगा। अत: उसके लिए एकता अनिवार्य है।”

एकांकी नाटक का एक प्रकार है। एकांकी और नाटक में वही अन्तर है जो कहानी और उपन्यास में होता है। एकांकी में जीवन का खण्ड-दृश्य अंकित किया जाता है जो अपने में पूर्ण होता है।

एकांकीकार अपनी रचना द्वारा एक ही उद्देश्य को व्यक्त करता है। विचार की अभिव्यक्ति, कथावस्तु, पात्र, संवाद आदि के माध्यम से होती है और एक विशेष उद्देश्य की अभिव्यक्ति करते हुए केवल एक ही प्रभाव की सृष्टि की जाती है।

  • एकांकी के तत्त्व

एकांकी के छः तत्त्व होते हैं

  1. कथावस्तु,
  2. पात्र,
  3. संवाद,
  4. वातावरण,
  5. भाषा-शैली,
  6. अभिनेयता।

(1) कथावस्तु-कथा और कथावस्तु में अन्तर होता है। केवल क्रमबद्ध कथा लिखने से उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती। लेखक के मन में सर्वप्रथम कोई भाव आता है जिससे कथा बनती है। कभी-कभी किसी कथा से ही भाव स्फर्त होता है। एकांकीकार कथा के क्रम में आवश्यक परिवर्तन करता है, एक घटना को दूसरी घटना या क्रिया से जोड़ता है, अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि करता है, किसी पात्र का चमत्कारपूर्ण ढंग से प्रवेश कराता है। नयी-नयी नाटकीय परिस्थितियों की योजना करता है। यही रचनात्मक तन्त्र कथावस्तु है।

एकांकी की कथावस्तु को तीन भागों में विभाजित किया जाता है-

  1. प्रारम्भ,
  2. विकास,
  3. चर्मोत्कर्ष।

सामान्यतः पात्रों का परिचय, उनके पारस्परिक सम्बन्धों के निर्देश प्रारम्भ में होते हैं। विकास या कार्य-व्यापार से संघर्ष आरम्भ होता है। संघर्ष दो विरोधी स्थितियों, सिद्धान्तों, आदर्शों आदि में होता है। एकांकी देखते या पढ़ते समय कथानक के विकास के उपरान्त दर्शक के मन में एक स्थिति ऐसी आती है, जब उसका कौतूहल चरम बिन्दु तक पहुँच जाता है। इस स्थिति को चर्मोत्कर्ष की स्थिति कहते हैं। एकांकी में जब कौतूहल चरम सीमा पर पहुँच जाये तब उसे समाप्त हो जाना चाहिए।

(2) पात्र-एकांकी में पात्रों की संख्या जितनी सीमित होती है, परिस्थिति का रंग उतना ही उभरकर सामने आता है। एकांकी का प्रमुख पात्र नाटक के प्रारम्भ से अन्त तक प्राणवन्त बनाता है। एकांकी की मूल भावना को उद्दीप्त करने के लिए एक दो गौण पात्रों की भी योजना की जाती है। गौण पात्रों के चयन में यह ध्यान रखा जाता है कि उनके चरित्र में विशेषता हो। नाटक में नायक और उसके सहायक पात्रों का चरित्र-चित्रण मूलत: घटनाओं के माध्यम से किया जाता है। किन्तु एकांकी में पात्रों का चरित्र नाटकीय परिस्थितियों और भीतर-बाहर के संघर्षों के सहारे चलता है। एकांकी में चरित्र के किसी एक पहलू का ही चित्र प्रस्तुत किया जाता है।

(3) संवाद-संवाद के माध्यम से ही एकांकी प्रस्तुत होता है। संवाद से कथावस्तु में गतिशीलता आती है और पात्रों की चरित्रगत विशेषताओं का उद्घाटन होता है। एक पात्र जो कुछ कहता है, वह अर्थपूर्ण होता है। इस तरह कथा आगे बढ़ती और दर्शकों या पाठकों के मन में जिज्ञासा पैदा करती है। एकांकी का विस्तार बहुत कम होता है, इसलिए थोड़े शब्दों में अधिक
भाव की अभिव्यक्ति की चेष्टा रहती है।।

(4) वातावरण-कहा जाता है कि जिस एकांकी में देश-काल और वातावरण की अन्विति पूर्ण रूप से पायी जाती है, वही एकांकी सर्वाधिक सफल माना जाता है। देश की अन्विति का अर्थ है सम्पूर्ण घटना एक ही स्थान पर घटित हो और उसमें दृश्य परिवर्तन कम से कम हों।

(5) भाषा-शैली-सभी विधाओं की भाषा-शैली अलग-अलग होती है। एकांकी की भाषा-शैली में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि भाषा का प्रयोग पात्र की शिक्षा, संस्कृति, वातावरण, परिस्थिति के अनुरूप होना चाहिए। यदि पात्र का सांस्कृतिक स्तर ऊँचा है तो उसकी

भाषा शिष्ट और शैली परिष्कृत होगी। यदि उसका वातावरण दूषित है, सांस्कृतिक परिवेश भी उच्च स्तर का नहीं है तो भाषा में निखार और शैली में परिष्कार दिखायी नहीं देगा। इसलिए एकांकीकार अशिक्षित या अर्द्ध-शिक्षित पात्रों के मुँह से प्रायः भाषा का अनगढ़ रूपाचा स्थानीय बोली का रूप ही प्रस्तुत करता है।

(6) अभिनेयता-एकांकी वस्तुतः अभिनीत करने के लिए लिखा जाता है। रंगमंच पर अभिनय करने के लिए एकांकीकार को रंगमंच की विशेषताओं की जानकारी अवश्य होनी चाहिए। एकांकी के सफल अभिनय के लिए उपयुक्त मंचसज्जा और कुशल अभिनेताओं का होना अनिवार्य है। इन सबके अतिरिक्त ध्वनि और प्रकाश का संयोजन भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। यथा अवसर वाद्य-यन्त्र और संगीत का समायोजन होना चाहिए।

प्रकार-एकांकी कई प्रकार के होते हैं। विषय की दृष्टि से ऐतिहासिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं पौराणिक-ये भेद किये जा सकते हैं।
शैली की दृष्टि से एकांकी को कई श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-

  1. स्वप्नरूप,
  2. प्रहसन,
  3. काव्य-एकांकी,
  4. रेडियो रूपक,
  5. ध्वनि-रूपक,
  6. वृत्त रूपक।
  • एकांकी का विकासक्रम

एकांकी का विकास आधुनिक युग में माना गया है। पश्चिमी देशों से प्रभावित होकर हमारे राष्ट्र में भी एकांकी का पल्लवन एवं विकास हुआ।

  • हिन्दी का प्रथम एकांकी

कुछ मनीषियों ने जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित ‘एक घुट’ को हिन्दी का प्रथम एकांकी ठहराया है। इसकी रचना लगभग सन् 1930 में हुई थी।

प्रसाद के बाद एकांकी के क्षेत्र में डॉ. रामकुमार वर्मा का पदार्पण हुआ। ‘बादल की मृत्यु नामक एकांकी, ‘एक बूंट’ ‘नामक एकांकी के समकक्ष माना जाता है।
कतिपय विद्वान भुवनेश्वर प्रसाद का सन् 1935 में कारवाँ’ नामक एकांकी संग्रह प्रकाशित हुआ। इस पर पाश्चात्य तकनीक का प्रभाव परिलक्षित है। शिल्प की दृष्टि से कुछ आलोचक इसे भी हिन्दी के प्रथम एकांकी की श्रेणी में रखते हैं।

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विगत अनेक सालों से हिन्दी का एकांकी कलेवर अपने युग के अनुरूप परिवर्तित होता रहा है। साठ-पैंसठ वर्षों में एकांकीकारों ने पारिवारिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक, धार्मिक तथा व्यक्तिगत समस्याओं को यथार्थ के धरातल पर अंकित किया है। रेडियो रूपक के रूप में भी एकांकी को अनेक नवीन दिशा प्राप्त हुई है।

  • प्रमुख एकांकीकार

एकांकीकार – प्रसिद्ध एकांकी

  1. उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ – अधिकार का रक्षक, सूखी डाली, पापी।
  2. डॉ. रामकुमार वर्मा – रेशमी टाई, पृथ्वीराज की आँखें, दीपदान, चारुमित्रा।
  3. उदयशंकर भट्ट – नये मेहमान, नकली और असली।
  4. सेठ गोविन्द दास – केरल का सुदामा।
  5. भगवती चरण वर्मा – सबसे बड़ा आदमी, दो कलाकार।
  6. विष्णु प्रभाकर – वापसी, हब्बा के बाद।
  7. जगदीश चन्द्र माथुर – रीढ़ की हड्डी, भोर का तारा।
  8. भुवनेश्वर प्रसाद – ऊसर, कारवाँ।।

अन्य एकांकीकार-लक्ष्मीनारायण मिश्र, वृन्दावनलाल वर्मा, विनोद रस्तोगी, गिरिजा कुमार माथुर, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीनारायण लाल, हरिकृष्ण प्रेमी।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के एक अंक वाले नाटक ‘अंधेर नगरी’, ‘भारत दुर्दशा’ इनको आधुनिक प्रकार का एकांकी नहीं माना जा सकता। एकांकी आधुनिक युग की ही उपज है।

4. आलोचना

आलोचना भी गद्य की एक सशक्त विधा है। इसे समालोचना, समीक्षा, विवेचना, मीमांसा और अनुशीलन भी कहा जाता है। समालोचना में किसी विषय के गम्भीर अध्ययनपूर्ण विवेचना का भाव होता है। आलोचना सामान्य विवेचन का ही संकेत करती है। अत: हम कह सकते हैं कि किसी विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त कर उस पर विचार-विमर्श करना, उसको स्पष्ट करना, उसके गुण-दोषों की विवेचना कर उन पर अपना मंतव्य प्रकट करना आलोचना कहलाती है।

आलोचना साहित्य की किसी भी विधा की, की जा सकती है।

आलोचना के प्रकार-आलोचना के दो भेद किये जाते हैं-
(1) सैद्धान्तिक,
(2) प्रयोगात्मक। सैद्धान्तिक समीक्षा में अनेक सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला जाता है। प्रयोगात्मक समीक्षा पश्चिम की देन है। रचनाओं की पूर्ण विवेचना के साथ ही साहित्य सम्बन्धी धारणाओं के निर्माण का प्रयास पाश्चात्य साहित्य में ही अधिक दिखाई देता है। हिन्दी में भी यह प्रभाव अब स्पष्टतः दिखाई देने लगा है।

5. पत्र

पत्र-साहित्य भी गद्य की एक सशक्त विधा है। उर्दू में ‘गुबारे खातिर’ (आजाद का पत्र संग्रह) और रूसी भाषा में ‘टालस्टॉय की डायरी’ स्थायी साहित्य की निधि हैं। पत्र के द्वारा आत्म-प्रदर्शन, विचारों की अभिव्यक्ति को अच्छी दिशा प्राप्त होती है। हिन्दी में द्विवेदी पत्रावली, द्विवेदी युग के साहित्यकारों के पत्र, पिता के पत्र पुत्री के नाम आदि रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। इस विधा के प्रवर्तन में बैजनाथ सिंह, विनोद, बनारसीदास चतुर्वेदी , जवाहरलाल नेहरू आदि का योगदान महत्त्वपूर्ण है।

6. रिपोर्ताज

यह गद्य की एक नई विधा है। द्वितीय महायुद्ध के समय इस विधा का प्रचलन हुआ।
रिपोर्ताज शब्द का विकास रिपोर्ट शब्द से स्वीकारा गया है। रिपोर्ट का आशय है घटना का यथार्थ अंकन। युद्ध की विभीषिका का अनुभव कराने के लिए युद्ध का जो आँखों देखा हाल लिखा जाता था उसे रिपोर्ताज नाम दिया गया। इसमें घटना, दृश्य या वस्तु का चित्रण होता है। उसकी भाषा अत्यन्त ही सजीव और रोचक होती है। आँखों देखी कानों सुनी घटनाओं पर ही रिपोर्ताज लिखी जाती है। इस विधा का शुभारम्भ शिवदान सिंह चौहान की लक्ष्मीपुरा’ से हुआ। साहित्य के इस क्षेत्र में रांगेय राघव, वेद राही, प्रभाकर माचवे, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, अमृतराय, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

7. रेखाचित्र

इसे अंग्रेजी में स्कैच कहा जाता है। चित्रकार जिस प्रकार अपनी तूलिका से चित्र बनाता है उसी प्रकार लेखक अपने शब्दों के रंगों के द्वारा ऐसे चित्र उपस्थित करता है जिससे वर्णन योग्य वस्तु की आकृति का चित्र हमारी आँखों के सामने घूमने लगे। चित्रकार की सफलता उसके रेखांकन तथा रंगों के तालमेल पर निर्भर करती है, जबकि रेखाचित्र के लेखक की उसके शब्दों को गूंथने की कला पर। रेखाचित्र का लेखक अपने शब्दों से ऐसा चित्र बनाता है जो हमारे मानस पटल पर उभरकर मूर्त रूप धारण कर लेता है। इस विधा के प्रमुख लेखक हैं श्रीराम शर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपुरी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, निराला तथा महादेवी वर्मा।

8. संस्मरण

संस्मरण आत्मकथा के ही क्षेत्र से निकली हुई विधा है, किन्तु आत्मकथा और संस्मरण में गहरा अन्तर होता है। आत्मकथा का प्रमुख पात्र लेखक स्वयं होता है, किन्तु संस्मरण के अन्तर्गत लेखक जो कुछ देखता है, अनुभव करता है, उसे भावात्मक प्रणाली के द्वारा प्रकट करता है। ऐसे लेखन में सम्पूर्ण जीवन का चित्र न होकर किसी एक या एकाधिकार घटनाओं का रोचक वर्णन रहता है। स्मृति पटल पर आने वाले का अंकन करते हुए वह खुद ही अंकित हो जाता है। संस्मरण का क्षेत्र अन्तर्जगत न होकर बहिर्जगत का होता है। संस्मरण लेखकों में पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, महादेवी वर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा शान्तिप्रिय द्विवेदी, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि प्रमुख हैं। हिन्दी में आदर्श संस्मरण की रचना छायावादोत्तर युग में हुई।

9. जीवनी या आत्मकथा

जीवन चरित्र और आत्मकथा के रूप परस्पर भिन्न होते हैं। आत्मकथा स्वयं लिखी जाती है, जीवनी कोई दूसरा लिखता है। हिन्दी में जीवन चरित्र के लेखक अनेक हैं। आत्मकथाओं में गाँधीजी के ‘सत्य के प्रयोग’, नेहरूजी की ‘मेरी कहानी’ तथा राजेन्द्र प्रसाद बाबू की आत्मकथा’ प्रसिद्ध हैं।

10. डायरी

अपने जीवन के दैनिक प्रसंगों को या किसी प्रसंग विशेष को डायरी के रूप में लिखा जाता है। इनमें जीवन की यथार्थ घटनाओं का वर्णन संक्षेप में रहता है। व्यंजना, व्यंग्य और वर्णन डायरी
की विशेषताएँ हैं।

नित्यप्रति के जीवन की कुछ विशिष्ट घटनाओं के सुख-दुःखात्मक रूपों की मार्मिक स्थितियों को लेखक अपनी प्रतिक्रिया के साथ कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है तो डायरी साहित्य की रचना होती है। इसमें तिथि, स्थान आदि का सत्य उल्लेख होता है। इसका आकार लघु अथवा विशद दोनों प्रकार का हो सकता है। धीरेन्द्र वर्मा, प्रभाकर माचवे, घनश्याम दास बिड़ला, सुन्दरलाल त्रिपाठी हिन्दी के श्रेष्ठ डायरी लेखक हैं।

11. इण्टरव्यू (साक्षात्कार)

इण्टरव्यू वह रचना है जिसमें लेखक किसी व्यक्ति विशेष से साक्षात्कार करके उसके सम्बन्ध में कतिपय जानकारियों को तथा उसके सम्बन्ध में अपनी क्रिया-प्रतिक्रियाओं को अपनी पूर्व धारणाओं, आस्थाओं और रुचियों से रंजित कर सरस एवं भावपूर्ण शैली में व्यक्त करता है। यह एक प्रकार से संस्मरण का ही रूप है।

12. उपन्यास

उपन्यास में कल्पना का पूरा संयम और व्यायाम रहता है। उपन्यासकार विश्वामित्र की सी सृष्टि बनाता है, किन्तु ब्रह्मा की सृष्टि के नियमों में भी बँधा रहता है। उपन्यास में सुख-दुःख, प्रेम, ईर्ष्या-द्वेष, आशा, अभिलाषा, महत्त्वाकांक्षा, चरित्रों के उत्थान-पतन आदि जीवन के सभी दृश्यों का समावेश रहता है। उपन्यास में नाटक की अपेक्षा अधिक स्वतन्त्रता है, किन्तु नाटक के मूर्त साधनों के अभाव में उपन्यासकार इस कमी को शब्दचित्रों द्वारा पूरा करता है। उपन्यासकार को जीवन का सजीव चित्र अंकित करना पड़ता है। उपन्यास एक प्रकार का जेबी थियेटर बन जाता है। उसके लिए घर से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं। घर, वन, उपवन सब कहीं उसका आनन्द लिया जा सकता है किन्तु इस आनन्द दान के लिए उपन्यासकार को शुद्ध चित्रों का सहारा लेना पड़ता है। डॉ. श्यामसुन्दर दास ने उपन्यास को मानव के वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा कहा है।

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उपन्यास जीवन का चित्र है, प्रतिबिम्ब नहीं। प्रतिबिम्ब कभी-कभी पूरा नहीं होता। उपन्यासकार जीवन के निकट-से-निकट आता है, किन्तु उसे जीवन में से बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है और अपनी तरफ से जोड़ना भी पड़ता है। उपन्यास में व्यक्ति की अधिक प्रधानता होती है। वह सत्य का आदर करता हुआ भी अपने आदर्शों की पूर्ति करने तथा कथा को अधिक रोचक तथा प्रभावशाली बनाने के लिए कल्पना से काम लेता है। उसमें सत्य को सुन्दर और रोचक रूप में देखने की प्रवृत्ति रहती है। उपन्यास एक ओर इतिहास या जीवनी की तरह वास्तविकता का अनुकरण करता है। दूसरी ओर उसमें काव्य का कल्पना का-सा पुट, भावों का परिपोषण और शैली का सौन्दर्य रहता है। एक ओर उसमें दार्शनिक-सी जीवन मीमांसा और तथ्य उद्घाटन की प्रवृत्ति रहती है तो दूसरी ओर समाचार-पत्रों की-सी कौतूहल वृत्ति और वाचालता भी रहती है।

  • उपन्यास के तत्त्व

कथावस्तु, पात्र और चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, वातावरण, विचार और उद्देश्य, रस और भाव तथा शैली।

(1) कथानक-यह उपन्यास का मूल तत्व है। कथानक कार्यकारण श्रृंखला में बँधा हुआ होना चाहिए। उसका उचित विन्यास हो ताकि वह पाठकों की रुचि के अनुकूल हो सके। अच्छे कथानक में मौलिकता, कौशल, सम्भवता, सुसंगठितता और रोचकता की आवश्यकता है।

(2) पात्र और चरित्र-चित्रण-उपन्यास का विषय मनुष्य है। अत: चरित्र-चित्रण उपन्यास का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। चरित्र के द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रकाश में लाया जाता है। यह व्यक्तित्व दो प्रकार का होता है-बाहरी और आन्तरिक। बाहरी व्यक्तित्व में मनुष्य का आकार-प्रकार, वेश-भूषा, आचार-विचार, रहन-सहन, चाल-ढाल, बातचीत के विशेष ढंग और कार्यकलाप आ जाते हैं। आन्तरिक व्यक्तित्व में बाहरी परिस्थितियों के प्रति संवेदनशीलता, उसके राग-विराग, महत्त्वाकांक्षाएँ, अन्धविश्वास, पक्षपात, मानसिक संघर्ष, दया, करुणा, उदारता आदि मानवीय गुण तथा नृशंसता, क्रूरता, अनुदारता आदि सभी दुर्गुणों का चित्रण रहता है।

(3) विचार और उद्देश्य-उपन्यास कहानी मात्र नहीं है, उसमें पात्रों के भाव और विचार भी रहते हैं। पात्रों के विचार लेखक के विचारों की प्रतिध्वनि होते हैं। लेखक का जीवन के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण होता है। उसी दृष्टिकोण से वह जीवन की व्याख्या करता है। उसमें जीवन तथ्य सूक्ति रूप में बिखरे रह सकते हैं, किन्तु उपन्यासकार को उपदेशक नहीं बन जाना चाहिए। उपन्यासकार के विचार, परोक्ष रूप से व्यंजित होने चाहिए जिससे उपन्यास की स्वाभाविकता में किसी प्रकार की बाधा न पड़े।

(4) भाव या रस-हमारे विचार जीवन के प्रति रागात्मक या विरागात्मक दृष्टिकोण के ही फल-फूल होते हैं। उपन्यासों में भी महाकाव्य का-सा शृंगार, वीर, हास्य, करुण रस का समावेश होना चाहिए।

(5) शैली-उपन्यास की शैली का प्रमुख गुण है प्रसाद, ओज और माधुर्य का भी विषयानुकूल समावेश उसमें होना चाहिए। भाषा मुहावरेदार हो। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि का चमत्कार शैली को उचित मात्रा में आकर्षक बनाता है।

13. नाटक

नाटक के मुख्य तत्त्व हैं-कथावस्तु, नायक और रस। वैसे तो नाटक के भी वे ही तत्व होते हैं जो कहानी, उपन्यास आदि के होते हैं, किन्तु नाटकों में रस की प्रधानता होती है। नाटक काव्य की वह विधा है जिसमें लोक-परलोक की घटित-अपघटित घटनाओं का दृश्य दिखाने का आयोजन किया जाता है। इस कार्य के लिए अभिनय की सहायता ली जाती है। शास्त्रीय परिभाषा में नाटक को रूपक कहा जाता है। सफल नाटक का रूप और आकार, दृश्यों और अंकों का उपयुक्त विभाजन, रस का साधारणीकरण, क्रिया व्यापार, प्रवेग तथा प्रवाह, अनुभावों और सात्विक भावों का निदर्शन, संवादों की कसावट, नृत्य और गीत, भाव, भाषा और साहित्यिक अलंकरण, वर्जित दृश्यों का अप्रदर्शन, सुरुचिपूर्ण प्रदर्शन, आलेखन, अलंकरण तथा परिधान
और प्रकाश की व्यवस्था आवश्यक होती है।

14. लोक साहित्य

लोक साहित्य अंचल विशेष में रचा गया साहित्य है। यह अंचल विशेष वह भूखंड होता है, जो एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित होकर, अपनी बोली और जीवन-पद्धति को अपनी लोकपरक चेतना में ढालता है। इस साहित्य में प्रकृति सम्बन्धी उक्तियों की अधिकता है। इसके अन्तर्गत लोकगीत, लोककथाओं, लोकोक्तियों और कहावतों को शामिल किया जा सकता है। लोक साहित्य हमारी परम्पराओं और मूल्यवान धरोहरों को अपनी विषय वस्तु में समेटे है।

प्रश्नोत्तर

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निबन्ध किसे कहते हैं? बाबू गुलाबराय के अनुसार निबन्ध की परिभाषा
अथवा [2009]
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निबन्ध की क्या परिभाषा दी है?
उल्लेख कीजिए तथा निबन्ध के प्रमुख भेद बताइए।
अथवा [2011]
निबन्ध की परिभाषा एवं निबन्ध के प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2017]
अथवा
निबन्ध के कितने भेद होते हैं? नाम लिखिए। [2008, 15]
अथवा
निबन्ध के प्रमुख भेद कौन-से हैं? नाम सहित लिखें। भावात्मक निबन्ध किसे कहते हैं?
उदाहरणस्वरूप एक भावात्मक निबंध का नाम लेखक के नाम सहित लिखिए। [2012]
उत्तर-
निबन्ध हिन्दी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है। अंग्रेजी में निबन्ध को ऐसे’ (Essay) कहते हैं। निबन्ध का अर्थ है-“विधिवत् कसा हुआ अथवा बँधा हुआ।”

परिभाषा-बाबू गुलाबराय के अनुसार, “निबन्ध गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव और सजीवता व आवश्यक संगति और सम्बद्धता के साथ किया गया हो।” . परिभाषा-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है, तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।”

निबन्ध के भेद-निबन्ध-लेखक के व्यक्तित्व के अनुसार निबन्ध रचना के अनेक प्रकार हो सकते हैं। सुविधा की दृष्टि से मोटे तौर पर इसे चार भागों में विभाजित किया जा सकता

(1) वर्णनात्मक-यह निबन्ध का प्रमुख प्रकार है। निबन्ध किसी दर्शनीय स्थल, मेले, तीर्थस्थान तथा प्राकृतिक दृश्य से सम्बन्धित होते हैं। इनमें भाषा में सरसता, सजीवता तथा चित्रात्मकता होती है।
(2) विवरणात्मक निबन्ध-इन निबन्धों में यात्रा, युद्ध घटनाओं, आत्मकथा अथवा काल्पनिक घटनाक्रम का विवरण दिया जाता है। मन की माँग में भी ये निबन्ध लिखे जाते हैं।
(3) विचारात्मक निबन्ध-इस निबन्ध में किसी विषय पर सुव्यवस्थित प्रस्तुति होती है। इनमें तर्क, चिन्तन की प्रधानता होती है। बुद्धि तत्व भी प्रदान होता है। शुक्ल जी का ‘कविता क्या है’ इसी प्रकार का निबन्ध है।
(4) भावात्मक निबन्ध-ये निबन्ध भाव, काव्यतत्व, कल्पनाप्रधान होते हैं। कभी-कभी लेखक इतना भावुक हो जाता है कि वह मूल विषय से भी भटक जाता है। सरदार पूर्णसिंह का ‘सच्ची वीरता’ श्रेष्ठ भावात्मक निबन्ध है।

प्रश्न 2.
निबन्ध का स्वरूप स्पष्ट करते हुए हिन्दी निबन्ध के विकास पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए। [2013]
उत्तर-
स्वरूप-किसी विषय को व्यवस्थित ढंग से क्रमबद्ध रूप में सुगठित भाषा में प्रस्तुत करने वाली गद्य रचना निबन्ध कहलाती है। निबन्ध किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है। इसमें लेखक का व्यक्तित्व प्रतिबिम्बित होता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल मानते हैं कि “यदि गद्य काव्य की कसौटी है तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।”

विकाश-हिन्दी निबन्ध का विकास आधुनिक काल में इस प्रकार हुआ है-

  1. भारतेन्दु युग-भारतेन्दु युग से ही हिन्दी निबन्ध लेखन प्रारम्भ हुआ। इस युग में धर्म, समाज, राजनीति, शिक्षा, प्रकृति आदि सभी विषयों पर निबन्ध लिखे गये। बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त आदि श्रेष्ठ निबन्धकार हुए।
  2. द्विवेदी युग-द्विवेदी युग में विषय तथा भाषा के परिमार्जन का उल्लेखनीय कार्य हुआ। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के द्वारा लेखकों का मार्गदर्शन किया। श्यामसुन्दर दास, सरदार पूर्णसिंह, माधव प्रसाद मिश्र आदि इस युग के प्रमुख निबन्धकार हैं।
  3. शुक्ल युग-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी निबन्ध को चरम उत्कर्ष पर पहुँचाने का सराहनीय कार्य किया । विषय तथा भाषा-शैली की प्रौढ़ता उस युग के निबन्धों में देखी जा सकती है। बाबू गुलाब राय, वियोगी हरि, वासुदेव शरण अग्रवाल आदि इस युग के निबन्धकार
  4. शुक्लोत्तर युग-इस युग में इस विधा को व्यापक रूप प्राप्त हुआ है। मनोविज्ञान, विज्ञान, राजनीति, समीक्षा आदि विषयों पर निबन्ध लिखे गये हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, विद्यानिवास मिश्र आदि इस युग के प्रमुख मिबन्धकार हैं।

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प्रश्न 3.
भारतेन्दु युग के निबन्ध की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1. निबन्धों के कलेवर में पत्रकारिता का पुट समाविष्ट है।
  2. सड़ी-गली मान्यताओं एवं रूढ़ियों का प्रबल विरोध है।
  3. शैली सरस, हदयस्पर्शी एवं मनभावन है।
  4. निबन्धकार अंधानुकरण के घोर विरोधी थे।

प्रश्न 4.
भारतेन्दु युग के प्रमुख चार निबन्धकारों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,
  2. प्रताप नारायण मिश्र,
  3. बाल मुकुन्द गुप्त,
  4. बद्रीनारायण चौधरी।

प्रश्न 5.
द्विवेदी युग का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर-
भारतेन्दु युग के पश्चात् आधुनिक काल का द्वितीय चरण द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है। द्विवेदी जी के कुशल निर्देशन में न जाने कितने कलाकार साहित्य जगत् में उजागर हुए जिनकी सफल कीर्ति आज भी फैली है।

प्रश्न 6.
द्विवेदी युग के निबन्धों की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1. निबन्धों में गम्भीरता का समावेश है।
  2. निबन्धों की भाषा प्रांजल एवं परिमार्जित है।
  3. हिन्दी में समालोचना शैली का सूत्रपात भी इसी युग में हुआ।
  4. सरल एवं प्रचलित शब्दावली में कहीं-कहीं करारा व्यंग्य है।

प्रश्न 7.
शुक्ल युग के निबन्धों की किन्हीं पाँच विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1. भाषा शक्ति सम्पन्न एवं कलात्मक बनी।
  2. भारतीय एवं पाश्चात्य समीक्षा का तर्कसंगत समन्वय है।
  3. छायावाद के संदर्भ में तर्कपूर्ण विवेचना है।
  4. निबन्धों की शैली परिमार्जित एवं विषयों के अनुरूप है।
  5. यत्र-तत्र गाँधीवाद का प्रभाव भी अवलोकनीय है।

प्रश्न 8.
शुक्लोत्तर युग का सामान्य परिचय एवं प्रमुख निबन्धकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
सामान्य परिचय-शुक्ल युग के पश्चात् का युग शुक्लोत्तर युग के नाम से जाना जाता है। इसे ‘वर्तमान युग’ भी कहा जाता है।
प्रमुख निबन्धकार-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, बाबू गुलाबराय, डॉ. मगेन्द्र, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शिवदानसिंह चौहान, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, भगवतशरण उपाध्याय, प्रभाकर माचवे आदि।

प्रश्न 9.
कहानी की परिभाषा देते हुए उसके तत्त्व बताइए। (2008, 10)
अथवा
कहानी के तत्त्व लिखते हुए। किन्हीं दो कहानीकारों के नाम एवं उनकी एक-एक रचना लिखिए। [2013]
उत्तर-
परिभाषा-कहानी वास्तविक जीवन की ऐसी काल्पनिक कथा है जो छोटी होते हुए भी स्वतः पूर्ण और सुसंगठित होती है। कहानी के छः तत्त्व स्वीकार किये गये हैं जो निम्न प्रकार हैं
(1) कथानक-कथानक कहानी का मूल आधार होता है। कहानी की कथावस्तु ऐतिहासिक, पौराणिक, राजनीतिक, पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक, काल्पनिक हो सकती है। कथानक में भी तीन चरण होते हैं-आरम्भ, मध्य और अन्त । कथानक का आरम्भ आकर्षक होना चाहिए जिसमें जिज्ञासा का भाव होना चाहिए और उसका अन्त प्रभावी होना चाहिए।

(2) पात्र और चरित्र-चित्रण-कहानी पात्रों के चरित्र-चित्रण के आधार पर ही आगे बढ़ती है। जब हमारे चरित्र इतने सजीव और आकर्षक होते हैं कि पाठक स्वयं को उनके स्थान पर समझ लेता है तो पाठक को कहानी में आनन्द आता है। जब कहानीकार इस तरह की सहानुभूति उपस्थित कर देता है, तो उसे अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त होती है। कहानी में पात्रों की संख्या सीमित होनी चाहिए।

(3) कथोपकथन या संवाद-पात्र अपने संवादों के माध्यम से कहानी को गति प्रदान करते हैं। संवादों के माध्यम से पात्र जीवन्त होते हैं। कहानी में कथोपकथन पात्रों के अनुकूल, संक्षिप्त, सरल और कौतूहलपूर्ण होने चाहिए।

(4) देशकाल या वातावरण-कहानी में देशकाल या वातावरण जीवंतता लाता है। वेश-भूषा, रीति-रिवाज, बिचार एवं भाषा-शैली युग के अनुरूप होनी चाहिए। ऐतिहासिक कहानियों, ग्रामीण परिवेश की कहानियों या विदेशी कहानियों में वातावरण का विशेष ध्यान रखा जाता है।

(5) भाषा-शैली-कहानी में भाषा-शैली का विशेष महत्त्व है। सहज एवं सुगठित भाषा वातावरण को चित्रित करने में सहयोगी होती है। कहानी में उस भाषा का प्रयोग होना चाहिए जो जनजीवन के निकट हो। भाषा देशकाल एवं वातावरण के अनुकूल होनी चाहिए। कहानी में चार प्रकार की शैलियाँ प्रचलित हैं-

  • ऐतिहासिक शैली,
  • आत्म चरित्र शैली,
  • डायरी शैली,
  • पत्रात्मक शैली।

(6) उद्देश्य-वैसे तो कथा साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन माना जाता है, किन्तु मनोरंजन ही साहित्य की सार्थकता को नष्ट कर देता है। कहानी में ऐसी मूल संवेदना होती है जिसका अनुभव करके पाठक उसके बारे में सोचता है। उद्देश्य कहानी का प्राणतत्त्व है।

दो कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द (कफन) एवं जयशंकर प्रसाद (आकाशदीप) हैं।

प्रश्न 10.
कहानी में कथावस्तु का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
कहानी में कथावस्तु या कथानक मुख्य ढाँचा होता है। विषय की दृष्टि से कहानी में सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक आदि में से किसी भी प्रकार का कथानक अपनाया जा सकता है, किन्तु यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि कहानी में जीवन की बाहरी घटना का प्रकाशन न होकर मानव हृदय का भी उद्घाटन होता है।

प्रश्न 11.
एकांकी की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
परिभाषा-डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, “एकांकी में हमें जीवन का क्रमबद्ध विवेचन मिलकर उसके एक पहलू, एक महत्त्वपूर्ण घटना, एक विशेष परिस्थिति अथवा एक उद्दीप्त क्षण का चित्रण मिलेगा। अतः उसके लिए एकता अनिवार्य है।”

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प्रश्न 12.
रेखाचित्र से क्या आशय है?
उत्तर-
इसे अंग्रेजी में स्कैच कहा जाता है। चित्रकार जिस प्रकार अपनी तूलिका से चित्र बनाता है उसी प्रकार लेखक अपने शब्दों के रंगों के द्वारा ऐसे चित्र उपस्थित करता है जिससे वर्णन योग्य वस्तु की आकृति का चित्र हमारी आँखों के सामने घूमने लगे।

प्रश्न 13.
संस्मरण की परिभाषा दीजिए। दो प्रमुख रचनाकारों के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर-
संस्मरण आत्मकथा के क्षेत्र से निकली हुई विधा है, किन्तु आत्मकथा एवं संस्मरण में गहरा अन्तर होता है। आत्मकथा का प्रमुख पात्र लेखक स्वयं होता है, किन्तु संस्मरण के अंतर्गत लेखक जो कुछ भी देखता है उसे भावात्मक प्रणाली के द्वारा व्यक्त करता है। इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण जीवन का चित्र न होकर किसी एक या एकाधिक घटनाओं का रोचक वर्णन रहता है। महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी प्रमुख रचनाकार हैं।

प्रश्न 14.
रेखाचित्र एवं संस्मरण में अन्तर बताइए। [2010, 16]
उत्तर-
रेखाचित्र एवं संस्मरण निकट होते हुए भी दो अलग-अलग गद्य रूप हैं। रेखाचित्र में किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना का कलात्मक प्रस्तुतीकरण किया जाता है जबकि संस्मरण में किसी महान व्यक्ति के प्रत्यक्ष संसर्ग को यथार्थ के सहारे अंकित किया जाता है।

श्रीराम शर्मा, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ आदि प्रमुख रेखाचित्रकार हैं तथा पद्म सिंह शर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी, महादेवी वर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी आदि प्रमुख संस्मरण लेखक हैं।

प्रश्न 15.
उपन्यास की परिभाषा देते हुए उपन्यास के तत्त्वों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
उपन्यास जीवन का चित्र है, प्रतिबिम्ब नहीं । कथा मात्र को उपन्यास नहीं माना जा सकता है। उपन्यास लेखन की एक विशिष्ट शैली होती है। उपन्यास के प्रमुख तत्त्व इस प्रकार हैं-

  • कथानक,
  • पात्र एवं चरित्र-चित्रण,
  • उद्देश्य,
  • शैली,
  • भाव या रस।

प्रश्न 16.
जीवनी और आत्मकथा में क्या अन्तर है? तीन जीवनी लेखकों के नाम लिखिए।
अथवा [2008]
आत्मकथा और जीवनी में अन्तर समझाते हुए किन्हीं दो आत्मकथाकारों के नाम लिखिए।
अथवा [2009, 14]
नीवनी और आत्मकथा में अंतर लिखते हुए एक-एक रचना एवं रचनाकारों के नाम लिखिए। [2017]
उत्तर-
‘जीवनी’ तथा ‘आत्मकथा’ गद्य की प्रमुख विधाएँ हैं। किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवनवृत्त को रोचक साहित्यिक ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो वह जीवनी कहलायेगी एवं जब लेखक अपने जीवनवृत को स्वयं ही प्रस्तुत करे तब वह आत्मकथा मानी जाएगी।

जीवनी में विवरण एवं तथ्यों पर ध्यान रहता है, जबकि आत्मकथा में अनुभूति की गहराई अधिक होती है।

हिन्दी के जीवनी लेखकों में डॉ. रामविलास शर्मा, (निराला की साहित्य साधना),अमृतराय (कलम का सिपाही) तथा विष्णु प्रभाकर (आवारा मसीहा) के नाम प्रमुख हैं। आत्मकथा लेखकों में वियोगी हरि ( मेरा जीवन प्रवाह), गुलाबराय ( मेरी असफलताएँ) तथा हरिवंश राय ‘बच्चन’ (क्या भूलूँ क्या याद करूँ) प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 17.
नाटक एवं एकांकी में अन्तर बताते हुए प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर-
नाटक एवं एकांकी दोनों का सम्बन्ध रंगमंच से है किन्तु दोनों में पर्याप्त अन्तर है

  1. नाटक का आकार विस्तृत होता है। उसमें कई अंक तथा अंकों के दृश्य होते हैं जबकि एकांकी का आकार छोटा होता है तथा इसमें मात्र एक अंक होता है।
  2. नाटक की तीन या इससे भी अधिक घण्टे की समय सीमा होती है जबकि एकांकी आधा घण्टे की समयावधि में समाप्त हो जाता है।
  3. नाटक में अधिक पात्र तथा विस्तृत मंच सज्जा होती है जबकि एकांकी में सीमित पात्र तथा सीमित मंच सज्जा होती है। वस्तुतः नाटक का लघु रूप एकांकी है। प्रमुख लेखकों में जयशंकर प्रसाद, हरिकृष्ण प्रेमी, राजकुमार वर्मा, उदयशंकर भट्ट, उपेन्द्रनाथ अश्क, मोहन राकेश, विष्णु प्रभाकर, धर्मवीर भारती आदि हैं।

प्रश्न 18.
कहानी और नाटक में कोई चार अन्तर लिखिए। (2015)
उत्तर-
कहानी और नाटक में चार अन्तर इस प्रकार हैं-
(1) कहानी श्रव्य साहित्य है जबकि नाटक दृश्य साहित्य के अन्तर्गत आता है।
(2) कहानी को पाठक पढ़कर आनन्द लेता है जबकि नाटक अभिनय के द्वारा प्रस्तुत होता है। (3) कहानी का आकार छोटा होता है जबकि नाटक बड़े होते हैं। (4) कहानी किसी शैली में लिखी जा सकती है जबकि नाटक में संवाद शैली का प्रयोग होता है।

प्रश्न 19.
रिपोर्ताज किसे कहते हैं? कोई दो विशेषताएँ लिखिए। (2015)
उत्तर-
रिपोर्ताज में किसी आँखों देखी घटना, स्थिति, प्रकृति आदि का सरस, स्वाभाविक, वास्तविक एवं रोचक वर्णन किया जाता है। रिपोर्ताज की दो विशेषताएँ इस प्रकार हैं (1) रिपोर्ताज में किसी आँखों देखी घटना, स्थिति आदि का वर्णन होता है। (2) यह वर्णन सत्य होता है, इसमें कल्पना का प्रयोग नहीं किया जाता है।

प्रश्न 20.
गद्य की विधाओं में से आपको कौन-सी विधा अच्छी लगती है और क्यों? [2008]
उत्तर-
हिन्दी साहित्य की विविध विधाएँ समृद्धशाली हैं-नाटक, एकांकी, उपन्यास, कहानी, आलोचना, निबन्ध, जीवनी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, गद्य काव्य, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, डायरी तथा रेडियो रूपक आदि।

मुझे इन विधाओं में से कहानी अच्छी लगती है। यह गद्य विधा जीवन के किसी एक संक्षिप्त प्रसंग को उद्देश्य सहित प्रस्तुत करती है। लेखक कल्पना के सहारे उसे पाठकों के समक्ष रखता है। कहानी में आदर्श और यथार्थ का सुन्दर समन्वय होता है। इसमें कम-से-कम घटनाओं और प्रसंगों के माध्यम से अधिक-से-अधिक प्रभाव की सृष्टि करता है। कहानी में मानवीय संवेदनाओं को बड़ी ही बारीकी से उजागर किया जाता है। मानवीय मूल्यों को स्थापित करना कहानीकार का मूल उद्देश्य होता है। यद्यपि साहित्य की सभी विधाएँ सौद्देश्य होती हैं तथापि कहानी अल्प समय में पाठकों को उसके उद्देश्य से अवगत करा देती है। जीवन की किसी घटना या चरित्र का रोचक एवं प्रभावशाली चित्रण होता है। कहानी में चरित्र अत्यन्त ही सजीव और आकर्षक होते हैं। पाठक चरित्रों के माध्यम से उद्देश्य को समझने में तत्पर रहता है। पात्रों की सहानुभूति पाठकों को प्राप्त होती है।

कहानी का शुभारम्भ आकर्षक तथा जिज्ञासापूर्ण होता है। जिसमें विषय की विषयवस्तु समायी रहती है। ऐतिहासिक कहानी में वातावरण या घटनाओं का महत्त्व होता है। ऐतिहासिक कहानी हमें अतीत के गौरव का स्मरण कराती है जिससे देशभक्ति की भावना जाग्रत होती है। बालक के कोमल मन पर कहानी अपना अमिट प्रभाव छोड़ती है। पाठक कहानी के उद्देश्य के विषय में सोचने को विवश होता है।

प्रश्न 21.
उपन्यास और कहानी में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2011, 16]
उत्तर-
(1) उपन्यास का आकार बड़ा होता है जबकि कहानी छोटे आकार की होती है।
(2) उपन्यास में समस्त जीवन का अंकन होता है जबकि कहानी में जीवन का खण्ड चित्रण होता है।
(3) उपन्यास की अपेक्षा कहानी में पात्र कम होते हैं।
(4) उपन्यास में कई कथाएँ जुड़ जाती हैं जबकि कहानी में एक ही कथा होती है।

प्रश्न 22.
लोक साहित्य किसे कहते हैं? लोकगीत अथवा लोककथा का परिचय दीजिए। [2012, 14]
उत्तर-
लोक भाषा के माध्यम से जनसामान्य की अनुभूति को प्रस्तुत करने वाला साहित्य लोक साहित्य कहलाता है।

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लोकगीत-सामान्य समाज की अनुभूति को उन्हीं की भाषा में गेय रूप में व्यक्त करने वाला साहित्य लोकगीत कहलाता है। इसमें जीवन के यथार्थ का अनुभव भरा होता है।

लोकगाथा-जनसाधारण के अनुभवों पर आधारित वे कथाएँ जो जनभाषा में होती हैं वे लोकगाथा कही जाती हैं। ये समाज के मनोरंजन का श्रेष्ठ माध्यम होती हैं।

  • अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एकांकी में संवाद का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
संवाद से कथावस्तु में गतिशीलता आती है और पात्रों की चरित्रगत विशेषताओं का उद्घाटन होता है।

प्रश्न 2. एकांकी कितने प्रकार की होती है?
उत्तर-
एकांकी निम्न प्रकार की होती है-

  1. स्वप्नरूप,
  2. प्रहसन,
  3. काव्य एकांकी,
  4. रेडियो रूपक,
  5. ध्वनि रूपक,
  6. वृत्त रूपक।

प्रश्न 3.
आलोचना के कितने भेद किये जा सकते हैं?
उत्तर-
आलोचना के प्रमुख दो भेद हैं
(1) सैद्धान्तिक आलोचना,
(2) प्रयोगात्मक आलोचना।

प्रश्न 4.
पत्र विधा के प्रमुख लेखकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
बैजनाथ सिंह, विनोद, बनारसीदास चतुर्वेदी, जवाहरलाल नेहरू आदि।

सम्पूर्ण अध्याय पर आधारित महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. आधुनिक काल की सबसे लोकप्रिय विधा है
(i) कहानी, (ii) निबन्ध, (iii) उपन्यास,

2. भारतेन्दुयुगीन निबन्धों की विशेषता नहीं है [2012]
(i) हास्य व्यंग्य, (ii) समाज सुधार, (iii) मनमौजीपन, (iv) ज्ञान-विज्ञान युक्त विषय।

3. लेखक के स्वयं के जीवन-वृत्त को प्रस्तुत करने वाली रचना कहलाती है
(i) संस्मरण, (ii) उपन्यास, (iii) रेखाचित्र, (iv) आत्मकथा।

4. ‘भोलासम का जीव’ किस विधा की रचना है?
(i) संस्मरण, (ii) व्यंग्य, (iii) जीवनी, (iv) आत्मकथा।

5. खड़ी बोली गद्य का प्रारम्भ किस युग से माना जाता है?
(i) भारतेन्दु युग, (ii) द्विवेदी युग, (iii) शुक्ल युग, (iv) प्रगतिवादी युग।

6. ‘रेखाचित्रों की सिद्ध लेखिका हैं [2008]
(i) मालती जोशी, (ii) शिवानी, (ii) महादेवी वर्मा, (iv) महाश्वेता देवी।

7. पाठक को झकझोरने तथा सोचने के लिए बाध्य करने वाली विधा है- [2008]
(i) हास्य, (ii) व्यंग्य, (iii) नाटक, (iv) एकांकी।

8. ‘पूस की रात’ कहानी के लेखक हैं
(i) यशपाल, (ii) भगवतीचरण वर्मा, (ii) प्रेमचन्द, (iv) अमृतलाल नागर।
उत्तर-
1. (i), 2. (iv), 3. (iv), 4. (ii), 5. (i), 6. (ii), 7.(ii), 8. (iii)।

  • रिक्त स्थान पूर्ति

1. ‘भोर का तारा’ प्रसिद्ध ………….. है। [2009]
2. ……. नाटक सम्राट कहलाते हैं।
3. ‘इन्दुमती’ कहानी के लेखक ………… हैं।
4. कहानी के तत्वों की संख्या ………..” मानी जाती है। [2009]
5. ‘असफलता दिखाती है नयी राह, ……….. विधा की रचना है।
6. ‘सवा सेर गेहूँ’ के लेखक ………..” हैं।
7. उपन्यास शब्द का शाब्दिक अर्थ ………….[2012]
8. परीक्षा नामक निबन्ध …………. ने लिखा है।
9. ‘कवि वचन सुधा’ पत्रिका के सम्पादक का नाम …………. है।
उत्तर-
1. एकांकी,
2. जयशंकर प्रसाद,
3. किशोरीलाल गोस्वामी, 4. छ:,
5. आत्मकथा,
6. प्रेमचन्द,
7. समीप रखना,
8. प्रतापनारायण मिश्र,
9. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।

  • सत्य/असत्य

1. हजारीप्रसाद द्विवेदी ‘द्विवेदी युग’ के लेखक हैं। [2009, 10]
2. विद्यानिवास मिश्र ललित निबन्धकार हैं।
3. प्रेमचन्द ने मात्र नगरीय जीवन पर कहानियाँ लिखी हैं।
4. ‘मैला आँचल’ आंचलिक उपन्यास है।
5. आत्मकथा लेखक स्वयं लिखता है। [2009]
6. ‘उसने कहा था’ कहानी के लेखक प्रेमचन्द हैं।
7. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एक कवि थे। [2009]
उत्तर-
1. असत्य,
2. सत्य,
3. असत्य,
4. सत्य,
5. सत्य,
6. असत्य,
7. असत्य।

  • जोड़ी मिलाइए

I.
1. गद्य का प्रथम उत्थान काल [2008] – (क) महादेवी वर्मा
2. रेखाचित्र [2010] – (ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
3. ‘सत्य के प्रयोग’ आत्मकथा के लेखक हैं [2009] – (ग) मुंशी प्रेमचन्द
4. उपन्यास सम्राट [2008] – (घ) महात्मा गाँधी
5. आत्मकथा [2012] – (ङ) मेरे बचपन के दिन
6. संस्मरण [2013] – (च) हरिवंश राय बच्चन’
उत्तर-
1. → (ख),
2.→ (क),
3.→ (घ),
4.→ (ग),
5.→ (च),
6.→
(ङ)।

II.
1. ‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक [2009] – (क) सरदार पूर्णसिंह
2. द्विवेदी युग के प्रसिद्ध निबन्धकार हैं [2008] – (ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
3. व्यंग्य – (ग) मोहन राकेश
4. ‘एक और जिन्दगी’ [2009] – (घ) हरिशंकर परसाई
उत्तर-
1. → (ख),
2. → (क),
3.→ (घ),
4. → (ग)।

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  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. खड़ी बोली हिन्दी गद्य का प्रारम्भ किस काल में हुआ?
2. उत्साह किस प्रकार का निबन्ध है?
3. ‘गोदान’ के लेखक कौन हैं?
4. ‘कोणार्क’ के लेखक का नाम बताइए।
5. गद्य में रचित किसी विशिष्ट व्यक्ति का साक्षात्कार किस विधा में आता है?
6. हिन्दी की प्रथम कहानी कौन-सी मानी गई है? [2009]
7. एक अंक वाली नाट्य कृति क्या कहलाती है?
8. ‘कर्त्तव्य और सत्यता’ नामक निबन्ध के लेखक कौन हैं?
9. ‘आकाशदीप’ कहानी किसने लिखी है?
10. कहानी (गद्य विधा) के कितने तत्व होते हैं? [2015]
उत्तर-
1. ‘आधुनिक काल’,
2. मनोविकार सम्बन्धी,
3. प्रेमचन्द,
4. गिरिजाकुमार माथुर,
5. भेंटवार्ता,
6. इन्दुमती,
7. एकांकी,
8. श्यामसुन्दर दास,
9. जयशंकर प्रसाद,
10. छः।

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MP Board Class 11th Special Hindi पद्य साहित्य का इतिहास

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वीरगाथा काल (आदिकाल)

समाज की विविध मनोवृत्ति की झलक हमें यथातथ्य रूप में साहित्य में दिखाई देती है। परिवर्तनशील मन-अवस्था का चित्रण विविध समय में विविध रूपों में होता रहा है। जिस काल-विशेष में जिस भावना-विशेष की प्रधानता रही, उसके आधार पर इतिहासकारों ने उस काल का नामकरण या वर्गीकरण कर दिया। विक्रम सम्वत् 1050 से 1375 तक हिन्दी साहित्य में को झकार एवं कोलाहल विद्यमान है। इस काल में एकता के अभाव में युद्धों की प्रधानता रही। उस समय के कवियों में वीरभाव के प्रति विशेष आग्रह रहा, किन्तु ये कवि शृंगार रस से भी विमुख नहीं थे। इस काल के प्रमुख ग्रन्थ निम्नांकित हैं-

  1. विजयपाल रासो,
  2. हम्मीर रासो,
  3. कीर्तिलता,
  4. कीर्तिपताका,
  5. खुमान रासो,
  6. बीसलदेव रासो,
  7. पृथ्वीराज रासो,
  8. जयचन्द्र प्रकाश,
  9. जयमयंक चन्द्रिका,
  10. खुसरो की पहेलियाँ,
  11. विद्यापति की पदावलियाँ,
  12. परमाल रासो।

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इन ग्रन्थों में अधिकांश वीरगाथाएँ हैं, अतएव इस काल का नामकरण वीरगाथा काल हुआ। वीरगाथाएँ मुक्तक एवं प्रबन्ध काव्य के रूप में लिखी गयीं। जगनिक कवि का परमाल रासो’ या आल्हा एवं नरपतिनाल्ह का ‘बीसलदेव रासो’ मुक्तक हैं। प्रबन्ध काव्य में दलपति विजय का ‘खुमान रासो’, चन्दबरदाई का ‘पृथ्वीराज रासो’ बहुत प्रसिद्ध है। वीरगाथा काल के प्रमुख विषय शौर्य, प्रेम और कीर्ति रहे, जो अपभ्रंश और प्राचीन हिन्दी में वीर और श्रृंगार रस के माध्यम से अभिव्यक्त हुए। इस काल के प्रमुख छन्द थे-दूहा (दोहा), गाथा, त्रोटक, तोमर, छप्पय, आल्हा, वीर और आर्या। कवि लोग प्रायः राज्याश्रित रहते थे तथा अपने राजाओं की प्रशंसा गा-गाकर किया करते थे। वे भाट और चारण कहलाते थे। अपने राजाओं की शौर्य-गाथा का वर्णन करते-करते कवि अतिशयोक्ति एवं वर्णन की नीरस सूची से नहीं बच पाया। अतएव इन रचनाओं में राष्ट्रीय भावना एवं ऐतिहासिक प्रामाणिकता का अभाव ही है। वीरगाथाकाल में जिन युद्धों का वर्णन है, वे पारस्परिक वैमनस्य एवं सुन्दरियों को लेकर होते थे। अतएव कवि सुन्दर नायिकाओं का वर्णन कर श्रृंगार रस का समावेश कर लिया करते थे। इस काल की भाषा सर्वथा भावानुरूप थी। डिंगल भाषा में हुए अभूतपूर्व युद्ध-वर्णन ही वीरगाथा काल को चमत्कृत किये हुए हैं। छन्दों का प्रयोग रसानुभूति एवं भावाभिव्यंजना में सहायक है। इस काल का प्रिय अलंकार यद्यपि अतिशयोक्ति और अनुप्रास रहा है, फिर भी उपमा, रूपक, सन्देह, उत्प्रेक्षा का प्रयोग भी उपयुक्त व सफल है। इस युग की प्रमुख धारणा मनोरंजन की थी। विद्यापति की पदावलियाँ भक्ति-शृंगार से ओत-प्रोत हैं। सिद्धों और नाथों की रचनाओं में भक्ति के तत्व विद्यमान थे। यही हिन्दी का आदिकाल है।

वीरगाथा काल (आदिकाल) की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ

  1. राज्याश्रित चारण कवि,
  2. आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा,
  3. सजीव युद्ध वर्णन,
  4. चरित काव्यों की रचना,
  5. वीर तथा श्रृंगार रसों की प्रधानता,
  6. राजस्थानी, अपभ्रंश खड़ी बोली तथा मैथिली मिश्रित भाषा,
  7. छप्पय और दोहा छन्द।
  • प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

कवि – रचनाएँ
दलपति विजय – खुमान रासो
नरपति नाल्ह – बीसलदेव रासो
चन्दबरदाई – पृथ्वीराज रासो
जगनिक – परमाल रासो (आल्हा खण्ड)
अमीर खुसरो – पहेलियाँ, दोहे
नल्लसिंह – विजयपाल रासो
विद्यापति – कीर्तिलता, पदावली

भक्तिकाल
भक्तिकाल सम्वत् 1375 से प्रारम्भ होकर सम्वत् 1700 तक समाप्त हुआ। वीरगाथा काल की युद्ध विभीषिका से त्रस्त मानव हृदय शान्ति की खोज में भटकने लगा। हिन्दू-मुस्लिम के मध्य विद्वेष की भावना को दूर कर उन्हें एकता के सूत्र में आबद्ध करने हेतु पण्डितों और मौलवियों दोनों ने ही जनता में भक्ति का प्रसार कर असीम की छत्रछाया की ओर संकेत किया। धर्म ने मस्तिष्क से हटकर हृदय में आश्रय लिया, वह भावाकुल हो उठा। बस, इसी बिन्दु से भक्ति का उन्मेष हुआ। इसलिए इस युग का नाम भक्तिकाल पड़ा। सगुण भक्ति का प्रतिपादन हुआ, जो आगे चलकर राम-भक्ति और कृष्ण-भक्ति दो धाराओं में विभाजित हो गयी। दूसरी ओर ब्रह्म उपासना या एकेश्वरवाद के प्रतिपादकों ने अपने काव्य में एक ऐसे ईश्वर की उपासना की, जो हिन्दू तथा मुसलमानों को समान रूप से मान्य हो। इस निर्गुण धारा की भी ज्ञानमार्गी और प्रेममार्गी दो शाखाएँ हुईं।

(1) भक्तिकालीन निर्गुण प्रेममार्गी शाखा-इस शाखा में प्रेम-प्रधान निराकार ब्रह्म की उपासना का प्राधान्य था। इसमें प्रबन्ध काव्यों की रचना हुई, जिसमें मलिक मुहम्मद जायसी का ‘पद्मावत’ ग्रन्थ बहुत प्रसिद्ध हुआ। प्रमुख छन्द, सोरठा, दोहा, चौपाई हैं। अवधी और फारसी भाषा का प्रयोग है तथा मसनवी शैली है। इस काल में सूफी कवियों ने आत्मा को प्रियतम मानकर हिन्दू प्रेम कहानियों का वर्णन किया है। हिन्दू-मुस्लिम एकता इस शाखा की प्रमुखता है। कवि कुतुबन, मंझन, उस्मान एवं जायसी ने प्रेमगाथाओं को काव्य-रूप में गूंथ दिया। पद्मावत के अतिरिक्त स्वप्नवती, मुग्धावती एवं मृगावती आदि प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं। मधु मालती कवि मंझन का सुन्दर प्रेम काव्य है। ये सभी काव्य श्रृंगार रस के भण्डार हैं जिसके संयोग और विप्रलम्भ दो तट हैं। इस काल के काव्य ग्रन्थ उत्कृष्ट एवं अलौकिक प्रेम तत्व से परिपूर्ण हैं। इन सूफी काव्यों की रचना-शैली दोहा-चौपाई है और इसमें कथा को आदि से अन्त तक लिखा जाता है। इनकी भाषा-शैली बड़ी ही हृदयस्पर्शी एवं भावभीनी है। इस काल के सभी महाकाव्य प्रेम कथाओं पर आधारित हैं, जो शास्त्रीय कसौटी पर खरे उतरते हैं। इन काव्यों में कवि ने कल्पना की चादर ओढ़कर इतिहास की पृष्ठभूमि पर लेखनी चलाकर भावपूर्ण चित्र अंकित किए हैं।

3 इस काल के काव्य में कला-पक्ष के अतिरिक्त भाव-पक्ष भी सबल है। श्रृंगार रस के दोनों पक्षों पर कवियों ने समान ध्यान दिया है, किन्तु रस-प्रयोग में शृंगार में कहीं-कहीं जुगुप्सा का भाव मिलता है। इसके अतिरिक्त करुण, रौद्र के भी दर्शन होते हैं। इस काल में यदि किसी रस का अभाव है, तो वह है-वात्सल्य। इस काल की भाषा ठेठ अवधी है। काव्य में रहस्यवाद, एकेश्वरवाद के समन्वय के दर्शन होते हैं, जो अत्यन्त प्रभावशाली है।

(2) भक्तिकालीन ज्ञानमार्गी निर्गुण शाखा–भक्ति की इस शाखा में केवल ज्ञानप्रधान निराकार ब्रह्म की उपासना की प्रधानता है। इसमें प्रायः मुक्तक काव्य रचे गये। दोहा और पद आदि स्फुट छन्दों का प्रयोग हुआ है। भाषा खिचड़ी एवं सधुक्कड़ी है। भारतीय दर्शन के आधार पर आत्मा को प्रियतमा मानकर आत्मा-परमात्मा के विरह-मिलन का वर्णन है। राम और रहीम की एकता का प्रतिपादन है। इस काल में आडम्बरों का घोर विरोध किया गया और हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया गया। इस समय का प्रमुख रस शान्त रस है।।

इस बात की प्रमुख विशेषता एक ऐसे ईश्वर की उपासना है जो हिन्दू-मुस्लिम दोनों को समान रूप से मान्य हो। इन कवियों के मतानुसार ईश्वर का वास आत्मा में है, न कि बाहरी साज-सज्जा में। ईश्वर के केवल तात्विक स्वरूप की ही मीमांसा की गई है। इस काल की एक और विशेषता है-‘रहस्यवाद’। इस शाखा के कवि साम्प्रदायिकता और वर्णाश्रम धर्म के विरोधी थे। वे इन्द्रिय-निग्रह और साधना पर जोर देते थे।

इस काल के मुख्य कवि कबीरदास हैं। इनके अतिरिक्त अन्य मुख्य कवि सुन्दरलाल, मलूकदास, गुरुनानक, रैदास, दादू दयाल एवं पलटू साहब हैं।

इस शाखा के कवि सन्त कवि कहलाते हैं, क्योंकि उनके काव्यों की प्रमुख विशेषता उसमें निहित उदात्त भावों की प्रधानता है। जिसका न केवल विशुद्ध जीवन के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है, अपितु जिनकी अभिव्यक्ति भी प्रधानतः ऐसे कवियों के द्वारा की गयी-जिन्होंने स्वानुभूति की प्रयोगशाला में उनका मूल्यांकन एवं सत्यापन कर लिया था।

(3) भक्तिकालीन सगुण रामभक्ति शाखा [2008]-इस काल में भगवान श्रीराम के सत्य, शील एवं सौन्दर्य प्रधान अवतार की उपासना की गयी है। राम के सम्पूर्ण जीवन चरित का आधार लेकर इस काल में प्रबन्ध एवं मुक्तक काव्य दोनों प्रकार के काव्यों की रचना की गयी। इस काल में प्रमुख रूप से दोनों अवधी और ब्रजभाषा का उपयोग हआ और कई छन्दों में रचनाएँ . हुईं। दोहा, चौपाई,कवित्त,सवैया, बरवै,रोला, तोमर, त्रोटक,गीतिका,हरिगीतिका और पद आदि प्रमख छन्द हैं। तत्कालीन कवियों ने मर्यादित भक्ति एवं भारतीय संस्कृति के पुनःनिर्माण की भावना के साथ रामकथा का वर्णन किया। कवियों की विनय भावना में परम दैन्य के दर्शन होते हैं। इस काल के काव्य में सभी रसों का समावेश हुआ,किन्तु शान्त और श्रृंगार प्रधान रस हैं। रामचरितमानस’ इस काल का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है। इसके रचयिता तुलसीदास हैं। तुलसीदास ही इस काल के प्रमुख कवि हैं। इसके अतिरिक्त नाभादास, प्राणचन्द चौहान, हृदयराम, रघुराज सिंह और केशवदास के नाम उल्लेखनीय हैं। रामभक्ति शाखा के प्रवर्तक रामानन्द हैं। उन्होंने रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में भक्ति को ब्रह्म प्राप्ति का परम साधन बताया और सभी रामाश्रयी भक्तिकालीन कवियों ने इसी भक्ति मार्ग को अपनाया। उन्होंने भगवान राम की लोकमंगलकारी शक्ति का निरूपण किया। दास्य रूप में रामभक्ति का प्रारम्भ काव्य में तुलसीदास द्वारा ही हुआ।

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अन्य कवियों ने भी लिखा है, किन्तु तुलसी ने राम के बारे में इतना अधिक लिखकर राम-जीवन के सभी पक्षों का उद्घाटन किया कि और लोगों को लिखने के लिए कुछ भी शेषनरहा। रामकाव्य की मुख्य तीन विशेषताएँ हैं। वैष्णव धर्म को सामने रखकर भक्ति के सेव्य-सेवक रूप पर ही ध्यान दिया गया। इस काल में ज्ञान और कर्म से भक्ति की श्रेष्ठता दर्शायी है और जो सबसे प्रभावशाली बना है, वह है रचना-शैली। रामभक्त कवि किसी एक परिपाटी में नहीं बँधे। उन्होंने विभिन्न रचना-शैलियों का प्रयोग किया है। दृश्य, श्रव्य, मुक्तक और प्रबन्ध काव्य सभी की रचना हुई है। इस काल का काव्य स्वतन्त्र वातावरण में विकसित हुआ। कवियों पर किसी राजा का नियन्त्रण नहीं था, अतएव किसी की प्रशंसा करना या धनोपार्जन करना कवियों का उद्देश्य नहीं था। कवियों ने राम को अपना इष्टदेव माना और अपने हृदय का उल्लास, विनय तथा आत्म-निवेदन करना उनका मुख्य उद्देश्य था। अत: कवियों की कविता स्वान्तः सुखाय है। परम प्रतिभासम्पन्न, आदर्श भक्त एवं लोकनायक तुलसी ने लोक कल्याणार्थ कविता की रचना की। उन्होंने बारम्बार अपने काव्य में ज्ञान से भक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है। इस काल के काव्य का भाव-पक्ष और कला-पक्षदोनों ही सबल हैं। काव्य में अति स्वाभाविक और सौन्दर्यवर्द्धक अलंकार योजना है, जिससे यत्र-तत्र सभी रस प्रवाहित हैं।

(4) भक्तिकालीन सगुण कृष्णभक्ति शाखा-कृष्णभक्ति शाखा में भगवान विष्णु के कृष्णावतार की उपासना है। इस शाखा में केवल मुक्तक काव्यों की रचना हुई। भगवान कृष्ण की भक्ति के सभी पद ब्रजभाषा की माधुरी से ओत-प्रोत हैं। केवल ‘पद’ छन्द का ही प्रयोग हुआ। इन पदों का मुख्य विषय-राधाकृष्ण की प्रेमपूर्ण उपासना है, किन्तु सूरदास ने कृष्ण की बाल-लीलाओं का भी वर्णन किया है, जो स्वाभाविक और हृदयस्पर्शी है। इस काल के प्रमुख रस भंगार के दोनों पक्ष और वात्सल्य रस हैं। प्रमुख कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर ही प्रमुख ग्रन्थ है।

कृष्णभक्ति काव्य के प्रमुख प्रवर्तक बल्लभाचार्य हैं। इन्होंने कृष्णभक्ति में माधुर्य भाव को ही प्रधानता दी है। माधुर्य भाव की प्रधानता होने से कृष्ण के केवल लोकरंजक रूप का ही प्राधान्य है। किन्तु कहीं लोकरक्षक रूप का भी आभास होता है। इस काल में केवल मुक्तक रचनाएँ हुई हैं और प्रबन्ध काव्य का सर्वथा अभाव है। किन्तु ये मुक्तक भी इतने मर्मस्पर्शी हैं कि एक-एक पद पढ़कर पाठक भावानुकूल हो जाते हैं, जो स्मृति पटल में न जाने कितना विस्तार कल्पना के लिए छोड़ जाते हैं। सर्वत्र स्वतन्त्र प्रेम की झलक प्राप्त होती है, इसलिए लोक-जीवन की प्रायः अवहेलना ही हो गयी है। यदि कहीं लोक-जीवन का सामान्य-सा चित्रण है भी तो वह रस की पुष्टि के अर्थ में चित्रित है। पद-शैली में संगीत की विभिन्न राग-रागनियों का अच्छा समायोजन है। इसी से कृष्णभक्ति के अधिक पद गाये जाते हैं, जिसमें उत्कृष्ट माधुर्य भावना है। इस मधुरता को रक्षित करने के लिए ही मानो कृष्ण भक्त कवियों ने केवल एकमात्र माधुरी ब्रजभाषा को अपनाया है। अलंकारों का सुन्दर स्वाभाविक प्रयोग है।

कृष्णभक्ति काल की रचनाओं में एक और बात जो ध्यान आकर्षित करती है, वह है-कृष्ण काव्य की व्यंग्यात्मक उपालम्भ शैली। विप्रलम्भ श्रृंगार इस काल में अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर चुका है। भ्रमर गीतों की अनूठी परम्परा इस रसराज की पोषक है। केवल मीराबाई ने कृष्ण की एकभाव से प्रेमिका के रूप में उपासना की है।

कृष्णकाव्य के प्रसंग में हमें ‘अष्टछाप’ को विस्मृत नहीं करना चाहिए। बल्लभाचार्य के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी विट्ठलनाथजी थे। उनके समय तक कृष्ण की पुष्टिमार्ग के सिद्धान्तानुसार भक्ति करने वाले कवि अनेक थे। उन कवियों में से जिन आठ कवियों के काव्य का संग्रह विट्ठलनाथ ने किया, वह ‘अष्टछाप’ कहलाता है।

ये आठ कवि हैं-

  1. सूरदास,
  2. नन्ददास,
  3. कुम्भनदास,
  4. परमानन्ददास,
  5. चतुर्भुजदास,
  6. छीत स्वामी,
  7. गोविन्द स्वामी और
  8. कृष्णदास।

सूरदास व नन्ददास इनमें श्रेष्ठ हैं। इसके अतिरिक्त कुछ कवि और भी हुए, जिन्होंने स्वतन्त्र रूप से कृष्णभक्ति की कविताएँ लिखीं। मीराबाई, रसखान, नरोत्तमदास आदि की कृष्ण सम्बन्धी कविताएँ भावों की व्यंजना से पूर्ण हैं। रसखान मुस्लिम कवि थे, जो अपनी तन्मयता के लिए प्रसिद्ध थे। ‘सुजान रसखान’ और ‘प्रेमवाटिका’ इनके दो ग्रन्थ हैं। मीराबाई जोधपुर की राजकुमारी थीं। ये कृष्ण-प्रेम की मतवाली थीं और गा-गाकर नाचा करती थीं। ‘मीरा की पदावली’ में इनके पदों का संग्रह है। इनकी प्रेमवाणी हिन्दी-साहित्य में अनुपम है।

नरोत्तमदास का ‘सुदामा चरित्र’ ब्रजभाषा का खण्डकाव्य है।

जिस प्रकार राम चरित्र का गान करने वाले भक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदासजी का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। उसी प्रकार कृष्ण चरित्र गाने वालों में भक्त कवि सूरदासजी का शीर्षस्थ स्थान है। इन्हीं के काव्यों की सरसता से हिन्दी काव्य का स्रोत अविरल प्रवाहित है। सूरदास जन्मान्ध थे; किन्तु कृष्ण की बाल-लीलाओं का जो सजीव वर्णन है, वह कोई आँख वाला कवि भी नहीं कर सकता। जीवन भर सूरदास ने कृष्ण लीलाओं का गायन किया। ‘सूरसागर’, ‘सूरसारावली’ एवं ‘साहित्य लहरी’ इनके रचित ग्रन्थ हैं। बताया जाता है कि सूर ने सवा लाख पदों की रचना की। सूरदास वात्सल्य रस के सम्राट कहे जाते हैं। अंगार और शान्त रसों का भी वर्णन किया है। सूरदास बालक बनकर एक सखा की भाँति बालकृष्ण के साथ खेलते हैं। इनकी भक्ति सखा भाव की है। विनय के पदों में सूर ने सच्चे मानव जीवन की छवि अंकित की है। वह मार्मिक चित्रण शान्त रस का उत्कृष्ट उदाहरण है। सूर एक भक्ति कवि हैं। उनके काव्य का मुख्य गुण है सरलता और स्वाभाविकता। श्रृंगार के विप्रलम्भ पक्ष का अद्वितीय वर्णन भ्रमरगीत में है। इसमें सन्देह नहीं कि कृष्ण परम्परा में कवियों ने गीतिकाव्य को इतना सम्पन्न किया जो अक्षय है। यद्यपि रचनाएँ एकांगी हैं, उनमें बहुरूपता नहीं, तब भी सरस हैं।

(5) भक्तिकाल की स्फुट शाखा-भक्ति का जो प्रवाह उमड़ा वह राजाओं और शासकों के प्रोत्साहन पर अवलम्बित नहीं था। वह जनता की प्रवृत्ति का द्योतक था। उसी प्रवाहकाल के बीच अकबर जैसे शासक द्वारा स्थापित शान्तिसुख के परिणामस्वरूप जो रचनाएँ लिखी गईं वह दूसरे प्रकार की थीं। नरहरि, गंग, रहीम जैसे सुकवि और तानसेन जैसे गायक अकबरी दरबार की शोभा बढ़ाते थे। इस काल में मुक्तक कविता की रचना हुई दोहा, कवित्त आदि स्फुट छन्दों का प्रयोग हुआ। ब्रजभाषा के साथ अन्य बोलियों के शब्दों का भी निर्माण हुआ। स्फुट रूप में सभी रसों का समावेश हुआ। दरबारी कविता, नीति कविता, रीति कविता और प्रकृति की कविताएँ लिखी गयीं। प्रमुख कवि रहीम, गंग, सेनापति आदि थे। इनके अतिरिक्त कृपाराम, नरहरि, बन्दीजन, नरोत्तमदास, आलम, टोडरमल, बीरबल, मनोहर, बलभद्र मिश्र, जमाल, केशवदास, मुबारक, बनारसीदास, पुहुकर, लालचन्द या लक्षोदय और सुन्दर आदि कवियों का उल्लेख भी आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रन्थ में किया है।

रहीम अरबी, फारसी और संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। इन्होंने चार ग्रन्थ लिखे। गंग अकबर के दरबारी कवि थे। सेनापति ने ‘कविता रत्नाकर’ और ‘काव्य कल्पद्रुम’ दो ग्रन्थ लिखे। ‘ऋतु वर्णन ‘हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है। केशवदास भक्तिकाल और रीतिकाल के बीच की कड़ी हैं।

  • भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ
  1. ईश्वरभक्ति,
  2. गुरु महिमा,
  3. सादा जीवन,
  4. समन्वय की भावना,
  5. राज्याश्रय से मुक्ति,
  6. विविध रसों का परिपाक,
  7. भाषा की विविधता।

प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ
MP Board Class 11th Special Hindi पद्य साहित्य का इतिहास 1

रीतिकाल रीतिकाल का समय सम्वत् 1700 से सम्वत् 1900 तक (सन् 1643 से 1843 ई.) तक है। काल की काव्यगत रीतिबद्धता की मूल प्रवृत्ति के कारण इसे रीतिकाल कहा है।

इस काल में मुगलों का क्रमशः पतन हो रहा था, जिसके फलस्वरूप देश में छोटे-छोटे राजाओं ने अपनी रियासतें स्थापित करना शुरू कर दिया। इन राजाओं के आश्रय में कवि रहा करते थे। कवि अपने आश्रयदाताओं के मनोरंजनार्थ काव्य की रचना करते थे। इन कवियों को विषय भक्तिकाल से सहज रूप में मिल गये थे। भक्तिकाल के अलौकिक और आध्यात्मिक आराध्य राधाकृष्ण को रीतिकालीन कवियों ने बौद्धिक स्तर पर उनके लौकिक रूप को अपनी काव्य रचना में स्थान दिया। इस काल में रस, छन्द, अलंकार के शास्त्रीय पक्ष को विशेष बल मिला। रस में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों बहिर्मुखी रूप में व्यंजित हुए। यही कारण है कि इन कवियों में नारी विषयक दृष्टिकोण में अन्तर आ गया। अलंकारों को इतना अधिक महत्त्व दिया कि काव्य का भाव-पक्ष उतना उभरकर सामने नहीं आ पाया। इससे बौद्धिक व्यायाम का रूप बढ़ता गया और रीतिकालीन कविता का भाव ग्रहण करने में कष्ट और परिश्रम की आवश्यकता पड़ी।

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रीतिकालीन काव्य की विशेषताएँ-

  1. सांसारिक सुख का प्राधान्य-यह समय विलास और समृद्धि का था। जीवन क्षणभंगुर है, अत: जितने दिन सुख भोग सके उतना ही अच्छा है। अत: काव्य रचना का उद्देश्य सुख प्राप्ति माना गया।
  2. कविराज्याश्रित होने के कारण कविता भरण-पोषण और धन-प्राप्ति का साधन बनी।
  3. मुक्तक काव्य और गीतिकाव्य-इस काल में मुक्तक रचनाएँ ही अधिक लिखी गयीं, जो काव्यात्मक हैं। कवित्त, सवैया, बरवै, दोहा, छन्द, मुक्तक लिखने के लिए अनुकूल थे।
  4. श्रृंगार और नखशिख वर्णन-इनकी श्रृंगार विषयक धारा में राम, कृष्ण जो भगवान थे, वे भी अछूते नहीं रहे। नायिकाओं के अंग-अंग और हर अदा का वर्णन बहुत ही लालित्यपूर्ण और विशुद्ध शृंगारपरक है।
  5. नायिका भेद-काव्य-कला की दृष्टि से उत्कृष्ट नायिका भेद का वर्णन है, किन्तु यह काव्य विलास की वस्तु बन गया।
  6. प्रकृति-चित्रण-प्रकृति वर्णन अधिक नहीं हुआ, पर प्रकृति प्रायः विप्रलम्भ श्रृंगार के उद्दीपन के अर्थों में ही अधिक प्रयुक्त हुई। फिर भी प्रकृति वर्णन उपेक्षित नहीं है। जहाँ कहीं भी प्रकृति वर्णन हुआ है, बहुत ही उत्कृष्ट कोटि का बन पड़ा है। नये-नये उपमानों का प्रयोग हुआ है।
  7. रीतिकालीन कविता में कला-पक्ष की प्रधानता रही। इस कला के प्रदर्शन में संस्कृत की सभी परम्पराओं का प्रभाव स्पष्ट है। कई रीति ग्रन्थ भी लिखे गये। भाषा मे शब्दो का चमत्कार और अलंकारों की विविधता है।
  8. विरह-वर्णन में फारसी शैली का प्रभाव है। सूक्ष्म भाव-निरूपण नहीं हुआ है।
  9. भाषा-रीतिकाल की भाषा प्रायः ब्रजभाषा ही है। कुछ कवियों ने फारसी के शब्द अपनाये और कुछ ने संस्कृत के शब्द तथा पद अपनाये।
  10. रस-वीर और श्रृंगार रस के अतिरिक्त जीवन के सन्ध्याकाल में कवियों ने शान्त रस की भी अच्छी रचनाएँ की।
  11. भाव-पक्ष कला-पक्ष से बोझिल है। इस काल के कुछ प्रेमी कवियों ने भावनाओं का हृदयस्पर्शी चित्रण किया है।
  12. छन्द-हिन्दी के प्रचलित छन्दों के अतिरिक्त संस्कृत के कुछ छन्दों को भी अपनाया गया।
  13. संस्कृत साहित्य का अत्यधिक प्रभाव-इस काल के कवि पण्डित और विद्वान थे। इनका गहन अध्ययन था। संस्कृत के ‘अमरूकशतक’ आदि के आधार पर भावों को ग्रहण कर सतसई आदि लिखी और संस्कृत के लहरी काव्य के अनुसार ‘गंगालहरी’, ‘यमुनालहरी’ आदि भी लिखी गईं।

इस काल के प्रमुख कवि हैं-केशव, बिहारी, देव, घनानन्द आदि। घनानन्द रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि हैं। रीतिबद्ध कवियों की अपेक्षा रीतिमुक्त कवियों के काव्य में अधिक भावुकता तथा मार्मिकता पायी जाती है।

  • प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

कवि – रचनाएँ
केशवदास – रसिकप्रिया, कविप्रिया, रामचन्द्रिका
मतिराम – रसराज, ललित ललाम
भूषण – शिवराजभूषण, शिवाबावनी, छत्रसाल दशक
बिहारी – बिहारी सतसई
देव – भाव-विलास, रस-विलास
सेनापति – कवित्त रत्नाकर
पद्माकर – जगद्विनोद, गंगालहरी, पद्माभरण
घनानन्द – सुजानसागर, विरह लीला
गिरधर कविराय – नीति की कुण्डलियाँ

आधुनिक काल की कविता (1900 से अब तक) ‘उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं सामाजिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी काव्य में नई चेतना तथा विचारों ने जन्म लिया और साहित्य बहुआयामी क्षेत्रों को संस्पर्श करने लगा। भारतेन्दु युग हिन्दी कविता का जागरण काल है। देशोद्धार, राष्ट्र-प्रेम, अतीत-गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया और कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता का स्वर निनादित होने लगा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, चौधरी बद्रीनारायण ‘प्रेमघन’, लाला सीताराम आदि प्रमुख रचनाकार हुए।

द्विवेदी युग में खड़ी बोली कविता की सम्वाहिका बनी। काव्य में सामाजिक तथा पौराणिक विषयों का विस्तार हुआ। श्रीधर पाठक, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ मैथिलीशरण गुप्त, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, रामचरित उपाध्याय, रामनरेश त्रिपाठी, गोपालशरण सिंह, जगन्नाथ प्रसाद ‘रत्नाकर’, सत्यनारायण ‘कविरत्न’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। …

हिन्दी कविता में आधुनिकता तथा नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय छायावादी युग को प्रदान किया जाता है।

छायावादी कविता (1920-1935) परिभाषा-डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में, “छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह था।””

अंग्रेजी शिक्षा के फलस्वरूप हिन्दी कवि अंग्रेजी के स्वच्छन्दतावादी काव्य के सम्पर्क में आये और कवीन्द्र-रवीन्द्र की नोबुल पुरस्कार प्राप्त ‘गीतांजलि’ ने भी छायावादी कविता को प्रभावित किया।

छायावादी काव्य की प्रवृत्तियाँ व प्रमुख विशेषताएँ

  1. बाह्यार्थ निरूपण के स्थान पर स्वानुभूति-निरूपण की प्रमुखता।
  2. सौन्दर्य तथा प्रणय-भावनाओं का प्राधान्य।
  3. कल्पना का उन्मुक्त प्रयोग।
  4. करुणा और वेदना की प्रवृत्ति।
  5. प्रकृति का सजीव सत्य के रूप में चित्रण तथा प्रकृति पर कवि द्वारा अपने भावों का आरोपण।
  6. प्रगीतों का आधिक्य।
  7. छन्द-विधान में नूतनता।
  8. भाषा में माधुर्य।
  9. भाषा में लाक्षणिकता तथा वक्रता की प्रमुखता।
  10. प्रतीक-विधान।
  11. उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों की अपेक्षा अन्योक्ति, समासोक्ति आदि व्यंग्य-मूलक अलंकारों की प्रमुखता के साथ-ही-साथ विशेषता विपर्यय, मानवीकरण आदि पाश्चात्य साहित्य के अलंकारों का प्रयोग।

छायावादी काव्यधारा के कवियों में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा और अन्य कवियों में मुकुटधर पाण्डेय तथा डॉ. रामकुमार वर्मा के नाम उल्लेखनीय हैं। छायावाद-युग की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक काव्यधारा में माखनलाल चतुर्वेदी ‘एक भारतीय आत्मा’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और सुभद्रा कुमारी चौहान के नाम उल्लेखनीय हैं। जयशंकर प्रसाद मूलतः सौन्दर्य, प्रेम, यौवन और श्रृंगार के कवि हैं, उनकी ‘कामायनी’ शैव दर्शन के आनन्दवाद तथा समरसता पर आधारित छायावादी काव्य है, जो आधुनिक हिन्दी-साहित्य का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘तुलसीदास’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘नये पत्ते’ आदि अपनी प्रमुख कृतियों में पौरुष, क्रान्ति तथा विद्रोह के स्वर प्रदान किये हैं। ‘निराला’ की महत्वपूर्ण देन मुक्त छन्द है। सुमित्रानन्दन पन्त प्रकृति तथा रोमांटिक काव्य के पुरस्कर्ता हैं। उन पर गाँधीवाद, मार्क्सवाद तथा अरविन्द दर्शन का प्रभाव पड़ा। ‘वीणा’, ‘पल्लव’, ‘स्वर्ण किरण’, ‘युगान्त’, ‘ग्राम्या’,’लोकायतन’ उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। महादेवी वर्मा के काव्य में प्रधान रूप से विरह और वेदना के स्वर मिलते हैं। ‘एक भारतीय आत्मा’ और ‘नवीन’ ने राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रियतापूर्वक भाग लेकर राष्ट्रीय काव्य को बहुमुखी बनाया उत्तर छायावादी काव्य में सियारामशरण गुप्त तथा रामधारीसिंह ‘दिनकर’ के नाम अत्यन्त आदर से लिये जाते हैं।

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रहस्यवादी कविता
परिभाषा-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है।”

हिन्दी की रहस्यवादी कविता अपना आदि स्रोत कबीर तथा जायसी में पाती है। आधुनिक काल में रहस्यवादी कविता व्यापक स्वच्छन्दतावादी काव्य-क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट है। रहस्यवादी कविता में विस्मय, जिज्ञासा, व्यथा तथा आध्यात्मिकता के तत्व मिलते हैं। इस कविता में अप्रस्तुत योजना की न्यूनता है। छायावादी कवियों में रहस्य भावना की व्यापक छाप महादेवी वर्मा की कविता में मिलती है। उनके प्रमुख काव्य-संग्रह ‘नीहार’,’रश्मि’, ‘नीरजा’ और ‘सांध्यगीत’ में अनुभूति तथा विचार के धरातल पर एकान्विति मिलती है। प्रतिपाद्य गीतकाव्य है जिसमें भावप्रधानता के अतिरिक्त व्यथा, पीड़ा, आशा, अज्ञात प्रिय के प्रति प्रणय निवेदन और साधना की विविध अनुभूतियों के स्वर मुखरित हुए हैं। महादेवी ने अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रणय-निवेदन किया है, किन्तु उनका प्रणय दुःख प्रधान है। हिन्दी के रहस्यवादी काव्य को बौद्ध दर्शन के अतिरिक्त, उपनिषदों, सर्ववादी दर्शन आदि ने प्रभावित किया है। महादेवी वर्मा ने मध्यकालीन रहस्य-साधना की परम्परा को स्वीकार कर और उसे लोक-कल्याण से सम्पृक्त कर अपने युगबोध के अनुकूल निर्मित करने का प्रयास किया है। यह रहस्यवाद का एक अभिनव अध्याय है जिसके उद्घाटन का सम्पूर्ण श्रेय महादेवी को है। महादेवी के अतिरिक्त प्रसाद, निराला, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, रामकुमार वर्मा, मोहनलाल महतो ‘वियोगी’, लक्ष्मीनारायण मिश्र, जनार्दन झा ‘द्विज’ आदि में भी रहस्य साधना के अनेक रूप विद्यमान हैं।

उन्मुक्त प्रेम काव्य
इस श्रेणी के प्रमुख कवियों में भगवतीचरण वर्मा, डॉ. हरिवंशराय बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, गोपालसिंह ‘नेपाली’, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, हरिकृष्ण प्रेमी’, हृदयनारायण ‘हृदयेश’ आदि परिगणित हैं। इस काव्य में लाचारी तथा कर्म से विमुखता है। छायावादी कविता व्यक्ति चेतना से ऊपर उठकर मन एवं फिर आत्मा को संस्पर्श करती हैं परन्तु प्रेम तथा मस्ती के काव्य गायकों की व्यक्तिनिष्ठ चेतना मुख्य रूप में शरीर तथा मन के स्तर पर ही अभिव्यक्त होती रही है। इनके लिए प्रणय मार्ग न होकर मंजिल है। ये कवि मात्र प्रणय में तल्लीन होना चाहते हैं। मादकता, मदिरा आदि में व्यक्ति-स्वातन्त्र्य की भावना प्रकट हुई है। करुणा तथा हालावाद को भी प्रमुख वाणी मिली।

प्रगतिवादी कविता (1936-1943)
परिभाषा-“राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है,वह काव्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद है।” प्रगतिवादी काव्य की संज्ञा उस कविता को प्रदान की गई जो.कि छायावाद के समापन काल में सन् 1936 के आस-पास सामाजिक चेतना को लेकर अग्रसर हुआ। प्रगतिवादी कविता में राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण से मुक्ति का स्वर प्रमुख है। इस कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। रूस के नये संविधान और सन् 1905 में लखनऊ में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की प्रेमचन्द की अध्यक्षता में हुई सभा इसके विकास-क्रम के महत्वपूर्ण सोपान हैं। प्रगतिवाद की प्रमुख विशिष्टताएँ अग्रलिखित हैं-

  1. यथार्थवाद की ओर झुकाव।
  2. भाव प्रवणता के स्थान पर बौद्धिकता की प्रमुखता।
  3. श्रद्धा एवं आध्यात्मिकता का विरोध।
  4. रूढ़ियों का विरोध और समस्त क्षेत्रों में क्रान्ति की भावना।
  5. पूँजीवाद का विरोध, शोषकों के प्रति आक्रोश और शोषितों के प्रति सहानुभूति संवेदना।
  6. सुबोध तथा सहज भाषा-शैली।
  7. मार्क्सवादी विचारधारा का पल्लवन।

प्रगतिवाद ने साहित्य को सोद्देश्य रूप में स्वीकार किया और किसी विशेष दृष्टि से कला की साधना करना आवश्यक माना। उसने सौन्दर्य को नये दृष्टिकोण से देखा-परखा और उसे जन-जीवन में खोजा। प्रगतिवादी काव्य के शिल्प में सामाजिक जीवन की वास्तविकता के प्रति आग्रह और जनता के जीवन की बात को जनता तक पहुँचाने के कारण, उसकी भाषा सुस्पष्ट, सामान्य और प्रचलित रूप लेकर चली। उसने प्रतीक, बिम्ब, शब्द, मुहावरे और चित्र सभी जन-सामान्य के बीच से लिये। अतएव, एक अत्यन्त जीवन्त भाषा को प्रमुखता मिली। बाद में कविता प्रचारात्मक, अभिधात्मक और सपाट होती चली गई। इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रगतिवाद ने भाषा को कृत्रिमता के कुहरे से निकालकर सामान्य धरातल पर प्रतिष्ठित किया। ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, केदारनाथ अग्रवाल, रामविलास शर्मा, नागार्जुन, डॉ. रांगेय राघव, डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, त्रिलोचन, मुक्तिबोध आदि इस धारा के प्रमुख कवि हैं।

प्रयोगवादी कविता (1943-1950)-
‘प्रयोगवाद’ उन कविताओं के लिए प्रमुख सम्बोधन बना जो कतिपय नूतन बोधों, संवेदनाओं, शिल्पगत चमत्कारों को लेकर, प्रारम्भ में तार सप्तक’ के माध्यम से सन् 1943 में प्रकाश में आईं। इसके उन्नायक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ स्वीकार किये गये। यह वर्ग अंग्रेजी के कवियों यथा टी. एस. इलियट, ऐजरा पाउण्ड, लारेंस आदि से प्रभावित हुआ। इस क्षेत्र में अनेक वर्ग के कवियों ने अपना योगदान दिया है तथा विचारों से समाजवादी किन्तु संस्कारों से व्यष्टिपरक, जैसे-शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता और नेमिचन्द्र जैन, विचारों और क्रियाओं, दोनों से समाजवादी, जैसे-रामविलास शर्मा तथा गजानन माधव मुक्तिबोध। प्रयोगवादी कविता में हासोन्मुख मध्यमवर्गीय समाज के जीवन का चित्र मिलता है। इन कवियों ने नये सत्य के शोध तथा प्रेषण के नूतन माध्यम की खोज की। प्रयोगवादी कवि जन-जीवन के प्रवाह से कटकर उसी के मध्य नदी के द्वीप की भाँति अपनी इकाई में संस्थित रहता है। उनमें गहरा तथा सजग पीड़ा का बोध है।

प्रयोगवादी कवि यथार्थवादी होने के साथ ही साथ भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता को विशेष रूप से ग्रहण करते हैं। ये कवि मध्यमवर्गीय व्यक्ति-जीवन की समूची कुण्ठा, पराजय, मानसिक संघर्ष तथा जड़ता को बड़ी बौद्धिकता के साथ प्रकट करते है। फ्रॉयड के काम सिद्धान्त को सिरमौर बनाया गया। छायावादी कवि कल्पना लोक में नारी के साथ तादात्म्य स्थापित कर अपनी पिपासा को शान्त करता है, परन्तु प्रयोगवादी कवियों ने कल्पना के रंगीन आवरण को उच्छेद कर, अवदमित यौनाकांक्षाओं को खुले रूप में भास्वर बना दिया। अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, गिरिजा कुमार माथुर और डॉ. धर्मवीर भारती ने स्पष्ट या बारीक प्रतीकों, बिम्बों एवं माध्यमों से उलझी हुई संवेदनाओं को मूर्त किया। प्रयोगवादी काव्य महान् संघर्षों तथा जीवन प्रसंगों से न जुड़कर व्यक्ति के अन्तः संघर्षों और मन की विविध स्थितियों के प्रति प्रतिबद्ध होकर, छोटी, तीव्र तथा प्रभावशाली कवियों का स्रष्टा बना। उसने लघु मानव के प्रति सहानुभूति का मार्ग अपनाया। प्रयोग के नाम पर भाव, विचार, प्रक्रिया, छन्द, प्रतीक, अलंकार आदि सब में परिवर्तन करने की प्रवृत्ति इस दशक की कविता में प्रचुरता पा गई।

नई कविता (1950 से अब तक)
नई कविता भारतीय स्वाधीनता के अनन्तर लिखी गई उन कविताओं को कहा गया जिन्होंने नये भावबोध, नये मूल्यों और नूतन शिल्पविधान को अन्वेषित तथा स्थापित किया। नई कविता अपनी वस्तु-छवि तथा रूपायन में पूर्ववर्ती प्रगतिवाद तथा प्रयोगवाद की विकासान्विति होकर भी अपने में सर्वथा विशिष्ट तथा असामान्य है।

नई कविता की प्रमुख प्रवृत्तियों में आज की क्षणवादी, लघु मानववादी जीवन दृष्टि के प्रति नकार-निषेध नहीं अपितु स्वीकार सहमति के साथ जीवन को पूर्णतया स्वीकार करके उसके भोगने की आकांक्षा है। नई कविता क्षणों की अनुभूतियों में अपनी आस्था प्रकट करती है जो कि समस्त जीवनानुभूतियों के लिए अवरोध न बनकर सहायक होते हैं। नई कविता, लघु मानवत्व को स्वीकार करती है जिसका तात्पर्य है सामान्य मनुष्य की अपेक्षित समूची संवेदनाओं और मानसिकता की खोज या प्रतिष्ठा करना। नई कविता कोई वाद नहीं है। उसमें सर्व महान् विशिष्ट कश्य की व्यापकता तथा सृष्टि की उन्मुक्तता है। नई कविता के दो प्रमुख घटक हैं-

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(क) अनुभूति की सच्चाई और
(ख) बुद्धि की यथार्थवादी दृष्टि।

नई कविता जीवन के प्रत्येक क्षण को सत्य मानती है। आन्तरिक और मार्मिकता के कारण नई कविता में जीवन के अति साधारण सन्दर्भ अथवा क्रिया-कलाप नूतन अर्थ तथा छवि पा लेते हैं। नई कविता में क्षणों की अनुभूति को लेकर अनेकानेक मार्मिक एवं विचारोत्तेजक कविताएँ लिखी गई हैं जो कि अपने लघु आकार के बावजूद प्रभावोत्पादकता में अत्यन्त तीव्र तथा सघन हैं। नई कविता की वाणी अपने परिवेश की जीवानुभूतियों से संसिक्त है। अज्ञेय के अनुभव-क्षेत्र तथा परिवेश में ग्राम एवं नगर, दोनों ही समाहित हैं। शहरी परिवेश के साथ जुड़ने वाले रचनाकारों में बालकृष्ण राव,शमशेर बहादुर सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, कुँवर नारायण, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. प्रभाकर माचवे, विजयदेव नारायण साही, रघुवीर सहाय आदि कवि आते हैं परन्तु भवानीप्रसाद मिश्र, केदारनाथ सिंह, शम्भूनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि ऐसे सृजनकर्ता हैं जिन्होंने मुख्यतः ग्रामीण संस्कारों को अभिव्यक्ति दी। मदन वात्स्यायन में यान्त्रिक परिवेश और ठाकुर प्रसाद सिंह में संथाली जीवन का वातावरण आर्द्र हो गया है। नई कविता में जीवन मूल्यों की पुन: परीक्षा की गई है। प्रगतिवाद में लोक जीवन एक आन्दोलन के रूप में आया, प्रयोगवाद में वह कट गया परन्तु सम्प्रक्ति नई कविता की एक प्रमुख विशेषता बन गई। नई कविता के शिल्प को भी लोक-जीवन ने प्रभावित किया। उसने लोक-जीवन से बिम्बों, प्रतीकों, शब्दों तथा उपमानों को चुनकर निजी संवेदनाओं तथा सजीवता को द्विगुणित किया। नई कविता अपनी अन्तर्लय, बिम्बात्मकता, नव प्रतीक योजना, नये विशेषणों के प्रयोग, नव उपमान-संघटना के कारण प्रयोगवाद से अपना पृथक् अस्तित्व भी सिद्ध करती है।

प्रयोगवाद बोझिल शब्दावली को लेकर चलता है, परन्तु नई कविता ने प्रगतिवाद की तरह विशेष क्षेत्रों के विशिष्ट सन्दर्भ के लिए ही लोक शब्द नहीं लिये, परन्तु समस्त प्रकार के प्रसंगों के लिए लोक शब्दों का चयन किया। नई कविता की भाषा में एक खुलापन और ताजगी है।

निष्कर्षत: नई कविता मानव मूल्यों एवं संवेदनाओं की नूतन तलाश की कविता है।

प्रश्नोत्तर

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हिन्दी साहित्य के प्रथम युग का नाम वीरगाथा काल क्यों पड़ा?
उत्तर-
इस काल के राज्याश्रित चारण कवियों ने वीर रस के फुटकर दोहे लिखे हैं। श्रृंगार के साथ वीर रस प्रधान है। वीर रस की प्रधानता के कारण कतिपय विद्वान इसे वीरगाथा काल कहते हैं। शस्त्रों की झंकार तथा युद्धों का नाद है।

प्रश्न 2.
वीरगाथा काल की कोई तीन विशेषताएँ लिखते हुए इस युग के प्रमुख कवि एवं उनकी रचना का नाम लिखिए। [2017]
उत्तर-
पृष्ठ 2 देखें।

प्रश्न 3.
भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग क्यों कहा जाता है? [2008, 15]
उत्तर-
निम्नलिखित कारणों से भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है-

  1. लोक मंगल तथा समन्वय की भावना।
  2. भक्ति भाव का प्राधान्य।।
  3. स्वान्त सुखाय काव्य साधना।
  4. भाव एवं कलापक्ष का मणिकांचन योग।
  5. निराशा में आशा का स्वर्णिम प्रकाश है।

प्रश्न 4.
भक्तिकाल की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उस काल के दो कवियों के नाम लिखिए। [2011, 17]
उत्तर-
भक्तिकाल की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. ईश्वर भक्ति,
  2. गुरु महिमा,
  3. सादा जीवन,
  4. समन्वय की भावना,
  5. राज्याश्रय से मुक्ति,
  6. विविध रसों का परिपाक,
  7. भाषा की विविधता।

प्रमुख दो कवि-

  1. तुलसीदास,
  2. सूरदास।

प्रश्न 5.
भक्तिकाल की प्रमुख शाखाओं के नाम बताइए तथा उन शाखाओं के प्रवर्तक का नाम लिखिए।
अथवा [2010]
भक्तिकाल का वर्गीकरण कर प्रत्येक शाखा के प्रमुख कवि एवं उनकी एक-एक रचना का नाम लिखिए। [2016]
उत्तर-
भक्तिकाल की प्रमुख शाखाओं तथा उनके प्रवर्तकों के नाम निम्न प्रकार हैं-
MP Board Class 11th Special Hindi पद्य साहित्य का इतिहास 2

प्रश्न 6.
निर्गुण काव्य धारा के प्रकार बताते हुए उनके प्रमुख दो कवियों के नाम लिखिए। [2008, 09]
उत्तर-
भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्णिम काल है। भक्तिकाल को प्रमुख दो रूपों में बाँटा जा सकता है-
(क) निर्गुण काव्य धारा एवं
(ख) सगुण काव्य धारा।

(क) निर्गुण काव्य धारा-इसे निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया गया है
(1) ज्ञानमार्गी शाखा-यह काव्य धारा बाह्य आडम्बर पर विश्वास नहीं करती। इस धारा के कवि आन्तरिक शुद्धता पर विशेष बल देते हैं। इन्होंने जीवन को सरल तथा निर्मल बनाने पर बल दिया है। जाति भेद, वर्ण भेद को समाप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के दोहे तथा पदों की रचना की है। इस धारा के प्रमुख कवि थे-कबीरदास, दादू दयाल, गुरु नानक देव तथा रैदास
(2) प्रेममार्गी शाखा-इस काव्य धारा को सूफी या प्रेममार्गी काव्य धारा कहते हैं। इस काव्य धारा में मुसलमान सन्त कवि सम्मिलित थे। इन कवियों ने अद्वैतवाद पर अपनी लेखनी चलायी है। प्रेम का रहस्यमयी रूप प्रेममार्गी, शाखा में देखने को मिलता है। इनमें भारतीय लोकगाथाओं को आधार बनाया गया है। लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति की गयी है। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर विशेष बल दिया गया है। दोहा, चौपाई तथा मसनवी शैली में सूफी कवियों ने आध्यात्मिक प्रेम की अभिव्यक्ति की है। इस शाखा के कवियों ने जीव को ब्रह्म का अंश माना है। संसार में अज्ञानता को दूर करने का सशक्त माध्यम गुरु है।

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जायसी, कुतुबन, मंझन, आलम, उस्मान तथा शेखनवी इसके प्रमुख कवि हैं।

प्रश्न 7.
निर्गुण भक्ति धारा की कोई तीन विशेषताएँ लिखते हुए निर्गुण भक्ति धारा के किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए। [2013]
उत्तर-
निर्गुण भक्ति धारा की तीन विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. निर्गुण ब्रह्म में विश्वास रखने वाले ये कवि गुरु को ईश्वर के समान मानते हैं।
  2. इस धारा के कवियों ने रूढ़ियों, छुआछूत, कुरीतियों पर प्रहार किये हैं।
  3. इस धारा के कवियों ने अवधी, सधुक्कड़ी (मिश्रित) भाषा अपनाई है।

दो कवि-कबीर तथा जायसी निर्गुण भक्ति धारा के श्रेष्ठ कवि हैं।

प्रश्न 8.
भक्तिकाल की निर्गुण प्रेममार्गी शाखा की चार विशेषताएँ लिखिए। [2008, 14]
उत्तर-

  1. इस काल के काव्य में कलापक्ष के अतिरिक्त भावपक्ष भी सबल है।
  2. प्रमुख छन्द दोहा, सोरठा एवं चौपाई का प्रयोग किया गया है।
  3. अवधी और फारसी भाषा का प्रयोग है तथा मसनवी शैली है।
  4. कवि कुतुबन, मंझन एवं जायसी ने प्रेमगाथाओं को काव्य रूप में गूंथ लिया।

प्रश्न 9.
भक्तिकाल की निर्गुण धारा का परिचय देते हुए ज्ञानमार्गी शाखा की दो विशेषताएँ एवं दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए। [2012]
उत्तर-
भक्तिकाल में निराकार ब्रह्म में विश्वास रखने वाले कवि निर्गुण धारा के माने जाते हैं। इनके ब्रह्म घट-घट वासी हैं। ये अवतार नहीं लेते हैं। गुरु के प्रति गहरी आस्था रखने वाले इस धारा के कवि मानते हैं कि गुरु के द्वारा बताये गये ज्ञान के मार्ग पर चलकर ही मुक्ति मिल सकती है। इस धारा की दो विशेषताएँ इस प्रकार हैं
1. निर्गुण ब्रह्म में विश्वास-निर्गुण भक्तिधारा के कवि निर्गुण ब्रह्म में विश्वास रखते हैं। इनके ब्रह्म आकार रहित हैं, वे घट-घट वासी हैं।
2. गुरु की महत्ता-इस धारा के कवि गुरु का बहुत महत्व मानते हैं। गुरु की कृपा से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।

प्रमुख कवि-कबीर एवं दादू दयाल दो प्रमुख कवि हैं।

प्रश्न 10.
निर्गुण धारा और सगुण धारा में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (कोई तीन) [2015]
उत्तर-
निर्गुण धारा एवं सगुण धारा भक्तिकाल के काव्य के दो रूप हैं। इन दोनों धाराओं में तीन अन्तर इस प्रकार हैं-

  1. निर्गुण धारा के काव्य में निराकार ब्रह्म की आराधना की गई है जबकि सगुण धारा के काव्य में साकार (राम एवं कृष्ण) परमात्मा की भक्ति का अंकन किया गया है।
  2. निर्गुण धारा के कवियों ने जाति-पाँति, रूढ़ियों का विरोध कर समाज सुधार पर बल दिया है जबकि सगुण भक्ति धारा के कवियों ने राम और कृष्ण के लोकरंजक रूपों का वर्णन करके लोक मंगल पर बल दिया है।
  3. निर्गुण धारा के काव्य में रहस्यवाद एवं मसनवी शैली को अपनाया गया है जबकि सगुण धारा के काव्य में समन्वय एवं सौन्दर्य अंकन की प्रधानता है।

प्रश्न 11.
ज्ञानमार्गी शाखा की दो विशेषताएँ लिखते हुए इसके प्रवर्तक कवि का नाम एक रचना सहित लिखिए। [2010]
उत्तर-

  1. ज्ञानमार्गी शाखा में केवल ज्ञान प्रधान निराकार ब्रह्म की उपासना की प्रधानता है।
  2. इस काल की प्रमुख विशेषता एक ऐसे ईश्वर की उपासना है जो हिन्दू-मुस्लिम दोनों को समान रूप से मान्य हो।

इसके प्रवर्तक कवि कबीरदास हैं तथा इनकी प्रमुख रचना ‘बीजक’ है।

प्रश्न 12.
रीतिकाल का नाम ‘रीतिकाल’ क्यों पड़ा? इस युग की कोई तीन प्रवृत्तियों को समझाइए।
अथवा
रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए। [2008, 15]
अथवा
रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए दो कवियों के नाम लिखिए।
अथवा [2009, 11]
रीतिकाल की तीन विशेषताएँ तथा इस युग के प्रमुख कवि एवं उनकी एक-एक रचना का नाम लिखिए। [2016]
उत्तर-
नामकरण का कारण-कवियों ने रीति अर्थात् संस्कृत साहित्य के लक्षण ग्रन्थों की बँधी-बँधायी लीक का अनुसरण किया है। परिणामस्वरूप रीतिबद्ध रचनाओं के लेखन के फलस्वरूप इस काल को रीतिकाल नाम से जाना गया।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ)-

  1. सांसारिक सुख का प्राधान्य-यह समय विलास और समृद्धि का था। जीवन क्षणभंगुर है, अत: जितने दिन सुख भोग सके उतना ही अच्छा है।
  2. राज्याश्रित होने के कारण कविता भरण-पोषण और धन-प्राप्ति का साधन बनी।
  3. रीतिकालीन कविता में कलापक्ष की प्रधानता रही। इस कला के प्रदर्शन में संस्कृत की सभी परम्पराओं को प्रभाव स्पष्ट है। रीतिग्रन्थ भी लिखे गये, भाषा में शब्दों का चमत्कार और अलंकारों की विविधता है।

प्रमुख कवि-भूषण (शिवा वावनी),बिहारी (सतसई), पद्माकर (पद्माभरण), केशवदास (रामचन्द्रिका) आदि।

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प्रश्न 13.
रीतिकाल को श्रृंगार काल क्यों कहा जाता है? रीतिकाल के किन्हीं दो कवियों के नाम एवं उनकी एक-एक रचना लिखिए। [2009, 13]
उत्तर-
17वीं शताब्दी के मध्य से उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक का काल हिन्दी साहित्य के इतिहास का उत्तर-मध्य काल कहलाता है। इस काल को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रीतिकाल नाम दिया। सामंतों और राजाओं के इस काल में अधिकांश कवि राज्याश्रित थे। वे राजदरबार में रहते थे। अतः राजाओं को प्रसन्न करने के लिए कवियों का श्रृंगार प्रधान काव्य रचना करना स्वाभाविक ही था। नायक-नायिका भेद के साथ, प्रकृति के उद्दीपन रूप में भी श्रृंगारिकता के दर्शन होते हैं। इस काल की रचनाओं में श्रृंगार रस की प्रधानता रही। अतः मिश्र बंधुओं ने इसे ‘शृंगार काल’ कहा।

कवि एवं उनकी रचना-

  • बिहारी (बिहारी सतसई);
  • भूषण (छत्रसाल दशक)।

प्रश्न 14.
भारतेन्दु युग हिन्दी कविता का जागरण काल क्यों कहा जाता है? [2009]
उत्तर-
भारतेन्दु युग के कवियों की कविता में देशोद्धार, राष्ट्र प्रेम, अतीत गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया है। कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता के स्वर मुखरित हैं। सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं सामाजिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी काव्य में नयी चेतना तथा विचारों का समावेश हुआ।

प्रश्न 15.
छायावादी कविता की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2014, 15]
अथवा
छायावाद की चार विशेषताएँ तथा प्रमुख छायावादी कवियों के नाम लिखिए।
अथवा [2009]
छायावाद के सम्बन्ध में दो विचारकों का कथन देते हुए छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए। [2009]
उत्तर-

  1. डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में, “छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।”
  2. डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, “परमात्मा की छाया आत्मा में पड़ने लगती है और आत्मा की छाया परमात्मा में, यही छायावाद है।”

विशेषताएँ-

  1. सौन्दर्य तथा प्रणय-भावनाओं का प्राधान्य।
  2. भाषा में लाक्षणिकता तथा वक्रता की प्रमुखता।
  3. बाह्यार्थ निरूपण के स्थान पर स्वानुभूति निरूपण की प्रमुखता।
  4. प्रकृति का सजीव सत्य के रूप में चित्रण तथा प्रकृति पर कवि द्वारा अपने भावों का आरोपण।
  5. छन्द विधान में नूतनता। प्रमुख कवि-जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा आदि।

प्रश्न 16.
रहस्यवाद की परिभाषा देते हुए रहस्यवादी कविता की चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है।”
  2. आधुनिक काल में रहस्यवादी कविता व्यापक स्वच्छन्दतावादी काव्य क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट है।
  3. कविता में अप्रस्तुत योजना की नूतनता है।
  4. रहस्यवादी कविता में बौद्ध दर्शन के अतिरिक्त उपनिषदों का प्रभाव भी परिलक्षित है।

प्रश्न 17.
प्रयोगवादी कविता की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-

  1. प्रयोगवादी कविता पर मार्क्सवादी प्रभाव परिलक्षित है।
  2. इस काव्य में सजग एवं गहरी पीड़ा का बोध है।
  3. प्रयोगवादी कविता भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता पर विशेष बल देती है।
  4. फ्रायड के काम सिद्धान्त को सर्वोपरि रूप में स्वीकार किया गया है।

प्रश्न 18.
प्रगतिवादी कविता की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-

  1. प्रगतिवादी कविता में दीन-हीन श्रमिक तथा पद-दलित मानवों का सजीव चित्रण है।
  2. मजदूरों के शोषण के प्रति विद्रोह के स्वर हैं।
  3. प्रगतिवादी काव्य की भाषा जन सामान्य की सरल एवं सामान्य भाषा है।
  4. मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित है।

प्रश्न 19.
नई कविता की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-

  1. नई कविता जीवन के हर क्षण को सत्य ठहराती है।
  2. नई कविता की वाणी अपने परिवेश के जीवन अनुभव पर आधारित है।
  3. नई कविता लघु मानवत्व को स्वीकार करती है।
  4. नई कविता में जीवन मूल्यों की पुनः परीक्षा की गयी है।

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प्रश्न 20.
नई कविता एवं प्रयोगवादी कविता में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
नई कविता ने प्रगतिवाद की तरह विशेष क्षेत्रों में विशिष्ट शब्द नहीं लिए हैं। समस्त प्रकार के प्रश्नों हेतु लोक शब्दों का चयन किया है। प्रयोगवाद बोझिल शब्दावली को लेकर चलता है। प्रयोगवादी कविता में मध्यमवर्गीय जीवन के संघर्ष को बौद्धिकता के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।

  • अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वीराज रासो की रचना किस काव्य में हुई?
उत्तर-
‘पृथ्वीराज रासो’ प्रबन्ध काव्य में रचित है।

प्रश्न 2.
वीरगाथा काल के कवि किसके आश्रय में रहते थे?
उत्तर-
वीरगाथा काल के कवि राज्याश्रय में रहते थे।

प्रश्न 3.
वीरगाथाकालीन कवियों के काव्य की रचना का प्रमुख विषय क्या था?
उत्तर-
वीरगाथाकालीन कवि अपने राजाओं की शौर्य गाथा को अपने काव्य का विषय बनाते थे।

प्रश्न 4.
वीरगाथा काल का मुख्य रस कौन- था?
उत्तर-
वीरगाथा काल का मुख्य रस वीर रस था।

प्रश्न 5.
भक्तिकाल का प्रारम्भ कब हुआ?
उत्तर-
भक्तिकाल का प्रारम्भ सम्वत् 1375 में हुआ।

प्रश्न 6.
सूफी कवियों ने आत्मा का किस रूप में वर्णन किया है?
उत्तर-
सूफी कवियों ने आत्मा को प्रियतम मानकर हिन्दू प्रेम कहानियों का वर्णन किया है।

प्रश्न 7.
सूफी काव्यों की रचना किन छन्दों में की गयी है?
उत्तर-
रचना शैली दोहा एवं चौपाई है।

प्रश्न 8.
निर्गुण प्रेममार्गी शाखा में कौन-सी भाषा एवं शैली प्रयुक्त है?
उत्तर-
निर्गुण प्रेममार्गी शाखा में अरबी एवं फारसी भाषा तथा मसनवी शैली का प्रयोग है।

प्रश्न 9.
प्रेममार्गी शाखा के महाकाव्य कौन-सी कथाओं पर आधारित हैं?
उत्तर-
प्रेम कथाओं पर आधारित हैं।

प्रश्न 10.
प्रेममार्गी शाखा में प्रमुख रूप से किस रस का प्रयोग है?
उत्तर-
शृंगार रस।

प्रश्न 11.
भक्तिकालीन ज्ञानमार्गी शाखा में कौन-सी भाषा का प्रयोग किया है?
उत्तर-
खिचड़ी एवं सधुक्कड़ी।

प्रश्न 12.
ज्ञानमार्गी शाखा के कवियों ने आत्मा एवं परमात्मा का वर्णन किस रूप में किया है?
उत्तर-
आत्मा को प्रियतमा मानकर आत्मा एवं परमात्मा के विरह मिलन का वर्णन है।

प्रश्न 13.
रामचरितमानस के रचयिता कौन हैं?
उत्तर-
तुलसीदास।

प्रश्न 14.
राम भक्ति शाखा के प्रवर्तक कौन हैं?
उत्तर-
रामानन्द।

प्रश्न 15.
तुलसी ने राम की किस रूप में उपासना की है?
उत्तर-
तुलसी ने राम को स्वामी तथा स्वयं को दास स्वीकार किया है।

प्रश्न 16.
राम भक्ति शाखा के कवियों ने किसे अपना इष्ट देव माना है?
उत्तर-
राम को।

प्रश्न 17.
राम भक्ति शाखा में किस प्रकार के काव्य लिखे गये हैं?
उत्तर-
प्रबन्ध एवं मुक्तक काव्य। ,

प्रश्न 18.
राम भक्ति शाखा के कवियों ने प्रमुख रूप से किस भाषा का प्रयोग किया है?
उत्तर-
ब्रजभाषा एवं अवधी।

प्रश्न 19.
कृष्ण भक्ति शाखा के मुख्य प्रवर्तक कौन हैं?
उत्तर-
बल्लभाचार्य।

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प्रश्न 20.
कृष्ण भक्ति शाखा के एक कवि का नाम क्या लिखिए।
उत्तर-
सूरदास।

प्रश्न 21.
सूरदास के काव्य में प्रमुख रूप से किन रसों का प्रयोग है?
उत्तर-
शृंगार एवं वात्सल्य रस।

प्रश्न 22.
कृष्ण भक्ति शाखा में कवियों ने प्रमुख रूप से किस भाषा का प्रयोग किया है?
उत्तर-
ब्रजभाषा एवं अन्य बोलियों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 23.
भक्तिकाल की स्फुट शाखा में किस प्रकार की कविता की रचना
उत्तर-
मुक्तक काव्य की रचना हुई है।

प्रश्न 24.
स्फुट शाखा के तीन कवियों के नाम बताइए।
उत्तर-

  • रहीम,
  • गंग तथा
  • सेनापति।

प्रश्न 25.
रीतिकालीन काव्य में प्रमुख रूप से किस भाषा का प्रयोग है?
उत्तर-
ब्रजभाषा का प्रयोग है।

प्रश्न 26.
रीतिकाल में प्रयुक्त प्रमुख रसों के नाम बताइए।
उत्तर-
वीर एवं श्रृंगार के अतिरिक्त शान्त रस का प्रयोग है।

प्रश्न 27.
रीतिकालीन कवियों ने अपने जीवनयापन के लिए किसका आश्रय लिया?
उत्तर-
राजाओं का आश्रय लिया।

प्रश्न 28.
रीतिकाल के प्रमुख तीन कवियों के नाम बताइए। [2008]
उत्तर-

  • देव,
  • बिहारी एवं
  • घनानन्द।

प्रश्न 29.
रीतिकाल में कवियों ने अपनी कविता में किन-किन छन्दों का प्रयोग किया है?
उत्तर-
कवित्त, सवैया, बरवै, दोहा आदि छन्दों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 30.
रीतिकाल के कवियों ने संस्कृत के लहरी काव्य के अनुसार किन दो ग्रन्थों की रचना की है?
उत्तर-

  • गंगा लहरी,
  • यमुना लहरी।

प्रश्न 31.
भारतेन्दु युग के कवियों की वाणी में कौन-सा स्वर मुखरित है?
उत्तर-
राष्ट्रीयता का स्वर।।

प्रश्न 32.
भारतेन्दु युग के दो लेखकों के नाम लिखो।
उत्तर-

  • प्रताप नारायण मिश्र,
  • चौधरी बद्रीनारायण ‘प्रेमघन’।

प्रश्न 33.
द्विवेदी युग के तीन साहित्यकारों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  • रामनरेश त्रिपाठी,
  • गोपाल शरण सिंह,
  • जगन्नाथ प्रसाद ‘रत्नाकरा

प्रश्न 34.
हिन्दी कविता में नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय किस युग को प्रदान किया जाता है?
उत्तर-
छायावादी युग।

प्रश्न 35.
छायावादी कवियों के दो नाम बताइए।
उत्तर-

  • सुमित्रानन्दन पन्त,
  • महादेवी वर्मा।

प्रश्न 36.
महादेवी वर्मा के काव्य में प्रधान रूप से कौनसे स्वर मुखरित हैं?
उत्तर-
विरह-वेदना।

प्रश्न 37.
छायावादी युग के किस कवि ने क्रान्ति एवं विद्रोह का स्वर निनादित किया है?
उत्तर-
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।

सम्पूर्ण अध्याय पर आधारित महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय

प्रश्न
1. हिन्दी पद्य साहित्य को बाँटा गया है
(i) चार कालों में, (ii) तीन कालों में, (iii) पाँच कालों में, (iv) छ: कालों में।

2. वीरगाथा काल की प्रसिद्ध रचना है
(i) रामचरितमानस, (ii) पद्मावत, (iii) पृथ्वीराज रासो, (iv) साकेत।

3. आदिकाल के कवि हैं
(i) सूरदास, (ii) कबीरदास, (i) चन्दबरदाई (iv) भूषण।

4. भक्तिकाल के लोकनायक कवि हैं
(i) मीराबाई, (ii) तुलसीदास, (iii) रसखान, (iv) रहीम।

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5. हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहलाता है [2009]
(i) वीरगाथा काल, (ii) रीतिकाल, (iii) भक्तिकाल, (iv) आधुनिक काल।

6. लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम की अवधारणा देखने को मिलती है- [2008]
(i) ज्ञानमार्गी शाखा में, (ii) प्रेममार्गी शाखा में, (ii)रीतिकालीन कविता में, (iv) आधुनिक कविता में।

7. विराट के प्रति जिज्ञासा की भावना मिलती है [2010]
(i) प्रगतिवाद में, (ii) छायावाद में, (iii) प्रयोगवाद में, (iv) नर्य कविता में।

8. रीतिकाल की प्रतिनिधि रचना है
(iii) बिहारी सतसई, (iv) प्रेम माधुरी।

9. रीतिकालीन कवि हैं [2013]
(i) सुमित्रानन्दन पन्त, (ii) भूषण, (iii)दिनकर, (iv) हरिऔध।

10. पद्माकर कवि हैं [2015]
(i) भक्तिकाल के, (ii) आधुनिक काल के, (iii) रीतिकाल के, (iv) आदिकाल के।

11. हिन्दी कविता का जागरण काल किस युग को माना जाता है? [2009]
(i) द्विवेदी युग, (ii) भारतेन्दु युग, (iii) शुक्ल युग, (iv) प्रसाद युग।

12. नई कविता का समय माना जाता है
(i) सन् 1900 से, (ii) 1936-1943, (iii) 1943-1950, (iv) 1950 से अब तक।

13. ‘महाप्राण’ के नाम से प्रख्यात कवि हैं [2011]
(i) जवाहरलाल नेहरू, (i) लाल बहादुर शास्त्री, (iii) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ (iv) महात्मा गाँधी।

14. कबीर को हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा है
(i) भाषा का डिक्टेटर, (ii) सधुक्कड़ी भाषी, (iii) खिचड़ी भाषी, (iv) सहज भाषी।
उत्तर-
1. (i), 2. (iii), 3. (iii), 4.(ii), 5. (iii), 6. (ii), 7.(ii), 8. (iii), 9.(ii), 10. (iii), 11. (ii), 12. (iv), 13. (iii), 14. (i).

  • रिक्त स्थान पूर्ति

1. वीरगाथा काल के काव्य की भाषा प्रमुखतः ……….’ है।
2. आदिकाल में प्रमुख रूप से ……….. का सजीव वर्णन हुआ है।
3. भक्तिकाल की प्रेममार्गी काव्यधारा के प्रमुख कवि ……….’ हैं। [2009]
4. भक्तिकाल के प्रसिद्ध ग्रन्थ का नाम ………. है।
5. ………… रीतिकाल में वीर रस के कवि हुए। [2008]
6. सूरदास ………… के कवि हैं। [2009]
7. नागार्जुन ………. के कवि हैं। [2009]
8. भक्तिकाल संवत् ……….’ तक माना जाता है। [2009]
9. रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि ……….’ हैं।
10. …………. ग्रन्थ में पारिवारिक मर्यादा का सर्वोत्तम उदाहरण देखने को मिलता है। [2015]
11. निर्गुण काव्य धारा के मत के अनुसार ईश्वर ………..’ है। [2015]
उत्तर-
1. डिंगल, 2. युद्धों, 3. जायसी, 4. रामचरितमानस, 5. भूषण, 6. सगुण धारा, 7. प्रगतिवाद, 8. 1375 से 1700, 9. बिहारी, 10. रामचरितमानस, 11. निराकार।

  • सत्य/असत्य

1. वीरगाथा काल का प्रिय अलंकार अतिशयोक्ति है।
2. आदिकाल के काव्य की रचना हरिगीतिका छन्द में हुई है। [2009]
3. कबीर के काव्य में रूढ़ियों का खुलकर विरोध हुआ है।
4. जायसी ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की है।
5. तुलसीदास रामभक्ति शाखा के श्रेष्ठ कवि हैं। [2009]
6. रीतिकाल में मात्र रीतिबद्ध रचनाएँ की गईं।
7. सूरदास की श्रेष्ठ रचना का नाम ‘सूरसागर’ है।
8. उत्तर मध्यकाल या रीतिकाल संवत् 1050 से 1375 तक है। [2009]
9. शोषकों के प्रति घृणा और शोषितों के प्रति करुणा प्रगतिवाद है। [2009]
10. जयशंकर प्रसाद छायावादी कवि हैं। [2009]
11. प्रयोगवादी कवियों ने प्रकृति का मानवीकरण किया है। [2008]
12. छायावादी कवियों ने प्रकृति का मानवीकरण किया है। [2008]
13. लौकिक साहित्य आदिकाल की विशेष उपलब्धि है। [2012]
14. भूषण रीतिकाल के कवि थे। [2012]
15. हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग रीतिकाल को कहा जाता है। [2016]
उत्तर-
1. सत्य, 2. असत्य, 3. सत्य, 4. असत्य, 5. सत्य, 6. असत्य, 7. सत्य, 8. असत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. असत्य, 12. सत्य, 13. सत्य, 14. सत्य, 15. असत्य।

  • जोड़ी मिलाइए

I.
1. हिन्दी कविता का जागरण काल [2010] – (क) तुलसीदास
2. भक्तिकाल के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं [2009] – (ख) भारतेन्दु युग
3. ज्ञानमार्गी शाखा [2008] – (ग) महावीर प्रसाद द्विवेदी
4. कृष्णभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं [2009] – (घ) रीतिकाल
5. श्रृंगार काल [2010] – (ङ) कबीरदास
6. द्विवेदी युग के प्रवर्तक [2011] – (च) सूरदास
उत्तर-
1. → (ख),
2. → (क),
3. → (ङ),
4. → (च),
5. → (घ),
6. → (ग)।

II.
1. हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग (2008, 09, 13) – (क) जायसी
2. छायावाद के प्रवर्तक कवि [2008] – (ख) भक्तिकाल
3. प्रेममार्गी शाखा [2008] – (ग) जयशंकर प्रसाद
4. प्रगतिवाद [2008] – (घ) तुलसीदास
5. रीतिकाल की मुख्य भाषा है [2009] – (ङ) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
6. रामभक्ति शाखा [2011] – (च) ब्रजभाषा
उत्तर-
1. → (ख),
2. → (ग),
3. → (क),
4. → (ङ),
5. → (च),
6. → (घ)।

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  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. पृथ्वीराज रासो का काव्य रूप क्या है?
2. जगनिक द्वारा रचित कृति का क्या नाम है?
3. ‘पद्मावत’ किस कवि की रचना है?
4. ज्ञानमार्गी शाखा में किस उपासना की प्रधानता है?
5. कृष्णभक्ति काव्य में किस भाव की प्रधानता है?
6. रीतिकालीन कविता में भावपक्ष प्रबल है या कलापक्ष?
7. बिहारी सतसई किस काल की रचना है? [2009]
8. रीतिकाल को अन्य नाम क्या दिया गया है?
9. तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना किस भाषा में की है?
10. सूरदास की काव्य भाषा कौन-सी है?
उत्तर-
1. महाकाव्य,
2. परमाल रासो,
3. मलिक मुहम्मद जायसी,
4. निर्गुण ब्रह्म की,
5. माधुर्य भाव की,
6. कलापक्ष,
7. रीतिकाल,
8. शृंगारकाल,
9. अवधी,
10. ब्रजभाषा।

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MP Board Class 11th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

MP Board Class 11th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

थोड़े में कही हुई बात को विस्तार से व्याख्या करके समझाना ही भाव-विस्तार है। संक्षेप में जो बात कही जाती है, उसमें अलंकृत भाषा शैली का उपयोग होता है। जीवन का गम्भीर अनुभव उसमें छिपा रहता है। उस अनुभव को समझकर ही उसे समझाया जा सकता है। अतः भाव-विस्तार करते समय हमें इन बातों पर ध्यान देना चाहिए

  1. पहले पढ़कर समझ लेना चाहिए कि वाक्य में जीवन के किस महत्त्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख है।
  2. फिर यह ज्ञात करें कि वह तथ्य कब और किस दशा में गठित होगा।
  3. फिर विचार कीजिए कि क्या उस वाक्य में, रूपक, लोकोक्ति, उपमा अथवा मुहावरे का प्रयोग हुआ है।
  4. अब सोची हुई बात को क्रम से व्यवस्थित करके समझाते हुए लिखिए।
  5. भाव विस्तार 5-6 पंक्तियों के आस-पास होना चाहिए।
  6. उसमें कोई कठिन या महत्त्वपूर्ण शब्द हो तो उस पर विशेष ध्यान देकर उसकी व्याख्या करनी चाहिए।

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कुछ चुने हुए भाव-विस्तार
(1) समन्वय युक्त जीवन ही राष्ट्र का सुखदायी रूप है। [2009]
एक राष्ट्र के अन्तर्गत विभिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ एवं धर्म होते हैं। जब तक इन सबके मध्य प्रेम, सहयोग, सद्भावना एवं सामंजस्य नहीं होगा तब तक राष्ट्र का सुखदायी स्वरूप निर्मित नहीं हो सकता, राष्ट्र में सुख चैन तथा बन्धुत्व की भावना का विकास होना नितान्त असम्भव है। जिस राष्ट्र में द्वेष, कलह एवं अशान्ति होगी, वहाँ दुःख का ही वातावरण दृष्टिगोचर होगा। जिस प्रकार अनेक नदियाँ सागर में एकाकार हो जाती हैं तदनुसार भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ राष्ट्रीय संस्कृति में विलीन हो जाती हैं।

(2) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। [2010]
इस संसार में जन्म देने की जननी (माँ) होती है और संसार में आने के पश्चात् पालन-पोषण करने वाली जन्मभूमि होती है। इस प्रकार जननी और जन्मभूमि सबसे श्रेष्ठ होती है। इन दोनों के बिना मनुष्य का जन्म तथा जीवन सम्भव नहीं है। ईश्वर के बाद जननी ही पूज्य तथा श्रद्धेय होती है। हम जन्मभूमि पर निवास करते हैं, उसी के अन्न, फल, दूध आदि से हमारा शरीर पुष्ट होता है। इसीलिए जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।

(3) बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है। [2017]
बैर क्रोध का स्थिर रूप है जिस प्रकार आँवले या आम का मुरब्बा आम या आँवले की तुलना में अधिक टिकाऊ होता है। तद्नुसार बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है। जब किसी के प्रति मन में क्रोध हो लेकिन उसका प्रदर्शन न किया जाये तो वह मनुष्य के मन में टिक जाता है। वह मौके की तलाश में रहता है। जैसे ही स्वयं के लक्ष्य को देखता है अपना प्रतिकार चुका लेता है। यही प्रतिकार (बदला) बैर की कोटि में आता है।

(4) अज्ञान सर्वत्र आदमी को पछाड़ता है।
आदमी की जिन्दगी में अज्ञानता सबसे बड़ा अभिशाप है। ज्ञान की पगडंडी पर ही कदम बढ़ाकर ही सत् एवं असत्, शुभ एवं अशुभ की परख करने की क्षमता उत्पन्न हुई है। अज्ञानता विकास के मार्ग को अवरुद्ध करती है अतः यह कथन सत्य है कि अज्ञान सर्वत्र आदमी को पछाड़ता है।

(5) क्रोध अन्धा होता है।
अन्धा का आशय है कि बिना सोचे-विचारे काम में जुट जाना। उदाहरणस्वरूप जैसे अन्धा मानव पथ पर अग्रसर होने पर ठोकर खाता है। तद्नुसार बिना विचारे काम करने वाला इन्सान यत्र- तत्र भटकता फिरता है। क्रोध का संचार बहुत ही तेज गति से होता है। क्रोधी व्यक्ति में सोचने-विचारने की शक्ति नहीं रहती है। इसलिए क्रोध को अन्धा कहा गया है।

(6) जीवन के विटप का पुष्य संस्कृति है।
संस्कृति मानव जीवन का सर्वोत्तम रूप है अथवा जीवन का पुष्प है जिस भाँति बीज अंकुर से विशाल वृक्ष बनता है। तद्नुसार मनुष्य अपने समाज में निवास करके स्वयं के सुख के साथ-साथ समाज की सुविधा के लिए सोचता-विचारता है, कुछ नियमों का समाज में रहकर पालन करना अनिवार्य है। ये सामाजिक नियम परिपालन संस्कृति कहलाते हैं। इस भाँति जिस प्रकार वृक्ष का परिणाम पुष्प है उसी भाँति संस्कृति मानव-जीवन का सर्वोत्तम परिणाम है। इस हेतु सदृश्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जीवन रूपी वृक्ष का पुष्प संस्कृति है। सांस्कृतिक सुषमा और सुगन्ध ही राष्ट्रीय सौन्दर्य का आधार है।

(7) चरित्र सबसे बड़ा धन है।। [2012]
उत्तर-
जीवन में चरित्र का बहुत महत्त्व है। इसीलिए चरित्र की सुरक्षा सर्वोपरि मानी गयी है। चरित्र के आधार पर ही मनुष्य का मूल्यांकन होता है। जिनका चरित्र श्रेष्ठ होता है ध व्यक्ति महान होते हैं। लक्ष्मी तो आती-जाती रहती है किन्तु चरित्र एक बार गिर जाने पर फिर नहीं उठता है। इसीलिए माना गया है कि ‘धन जाने पर कुछ नष्ट नहीं होता, स्वास्थ्य जाने पर कुछ नष्ट होता है किन्तु चरित्र जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है। यही कारण है कि चरित्र सबसे बड़ा धन है जिसकी रक्षा हर हाल में करनी चाहिए।

(8) दूर के ढोल सुहावने होते हैं। [2016]
उत्तर-
दूर के ढोल सुहावने होते हैं क्योंकि उनकी तीव्र ध्वनि की कर्कशता दूर तक नहीं पहुँच पाती है। इसके विपरीत ढोल के पास बैठने वाले लोगों के कानों के पर्दे फटते रहते हैं। दूर किसी मनोरम स्थान पर शाम के समय बजने वाले ढोलों की आवाज अपनी मधुरता के साथ पहुँचती है तो सुनने वाले के मन में विवाहोत्सव का मनोरम चित्र उभर आता है। शोर-शराबे के बीच घर के एक कोने में बैठी लाजवंती नव-वधू की कल्पना से उसका हृदय आनंदित होने लगता है। प्रेम, उल्लास आदि के भाव उसके मन में उठने लगते हैं। इस प्रकार पास के लोगों को कटु लगने वाली ढोल की आवाज दूर पहुँचकर मधुर बन जाती है।

प्रश्नोत्तर

  • लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अल्पविराम किसे कहते हैं? इसका प्रयोग कहाँ होता है? उदाहरण देकर समझाइए। [2016]
उत्तर-
अल्पविराम एक विराम चिह्न है जिसका प्रयोग बहुत थोड़ी देर रुकने के संकेत के लिए होता है। जैसे-शिवाजी, महाराणा प्रताप हमारे आदर्श पुरुष हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित गद्यांश में उचित विराम चिह्न लगाइए- [2013]
बसें बदलता हुआ रात भर का सफर तय करके अगले दिन सुबह ही मैं रामेश्वरम् पहुँच गया मेरे पिताजी बहुत देर तक मेरा हाथ थामे रहे उनकी आँखों में आँसू नहीं थे क्या तुम नहीं देखते अबुल ईश्वर किस प्रकार अँधेरा कर देता है
उत्तर-
बसें बदलता हुआ रात भर का सफर तय करके अगले दिन सुबह ही मैं रामेश्वरम् पहुँच गया, मेरे पिताजी बहुत देर तक मेरा हाथ थामे रहे, उनकी आँखों में आँसू नहीं थे। क्या तुम नहीं देखते अबुल? ईश्वर किस प्रकार अँधेरा कर देता है?

प्रश्न 3.
निम्नांकित गद्यांश में विराम चिह्नों का यथास्थान प्रयोग कीजिए [2009]
बड़प्पन कहीं रहने या नहीं रहने से नहीं आता है, आता है दूसरे को बड़प्पन देने से दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानने से अपभ्रंश का एक पुराना दोहा है जिसका भावार्थ है यदि तुम पूछते हो बड़ा घर कौन है तो देखो वह छोटी सी टूटी-फूटी झोंपड़ी उसमें सबके प्यारे बन्धु रहते हैं जो कोई भी कष्ट में हो उसके कष्ट का निवारण करने के लिए तत्पर रहते हैं।
उत्तर-
बड़प्पन कहीं रहने या नहीं रहने से नहीं आता है, आता है दूसरे को बड़प्पन देने से। दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानने से। अपभ्रंश का एक पुराना दोहा है जिसका अर्थ है यदि तुम पूछते हो बड़ा घर कौन है तो देखो वह छोटी सी टूटी-फूटी झोंपड़ी। उसमें सबके प्यारे बन्धु रहते हैं। जो कोई भी कष्ट में हो, उसके कष्ट का निवारण करने के लिए तत्पर रहते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित अनुच्छेद में विराम चिह्नों का यथास्थान प्रयोग कीजिए [2008]
कभी कभार वह भी घर आ जाती पर पहले का सा तूफान नहीं करती हँसती खिलखिलाती पर उसमें पहले की सी जीवंतता नहीं थी जब वह चली जाती तो यह कहते कहा था साथ चली जाओ तब नहीं मानी पैसे का मुँह देखती रही अब मन ही मन घुल रही है।
उत्तर-
कभी कभार वह भी घर आ जाती, पर पहले का सा तूफान नहीं करती। हँसती खिलखिलाती, पर उसमें पहले की-सी जीवंतता नहीं थी। जब वह चली जाती तो यह कहते, “कहा था साथ चली जाओ। तब नहीं मानी, पैसे का मुँह देखती रही। अब मन ही मन घुल रही है।”

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों में उचित विराम चिह्न लगाइए
(1) देवेन्द्र श्याम अनुपम इन्दौर ग्वालियर जबलपुर होकर आज ही लौटे हैं। [2008]
(2) मेरा मित्र अभी आएगा पर रुकेगा नहीं [2008]
(3) हे ईश्वर उसकी रक्षा करो [2008]
(4) हाय यह तो बहुत बुरा हुआ [2008]
(5) आपका पत्र क्यों नहीं मिला [2012]
(6) अनेक बार मैंने उसे समझाया हठ न करो [2012]
उत्तर-
(1) देवेन्द्र, श्याम, अनुपम इन्दौर, ग्वालियर, जबलपुर होकर आज ही लौटे हैं।
(2) मेरा मित्र अभी आएगा, पर रुकेगा नहीं।
(3) हे ईश्वर ! उसकी रक्षा करो।
(4) हाय ! यह तो बहुत बुरा हुआ।
(5) आपका पत्र क्यों नहीं मिला?
(6) अनेक बार मैंने उसे समझाया, हठ न करो।

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प्रश्न 6.
कोई तीन विराम चिह्नों का वर्णन करते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिए। [2017]
उत्तर-
पूर्ण विराम वाक्य के पूर्ण होने पर लगाते हैं, अल्प विराम थोड़ी-सी देर रुकने को लगाते हैं और प्रश्नवाचक चिह्न प्रश्नवाचक वाक्यों के अन्त में लगाया जाता है।
उदाहरण वाक्य-अच्छा जी आप दु:खी हुए न? क्या करूँ, बिना चोरी किए इस बेरोजगारी में काम नहीं चलता।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए
(1) श्रीकृष्ण के अनेकों नाम हैं। [2009, 13]
(2) आपका पत्र सधन्यवाद मिला।
(3) क्या आप देवनागरी भाषा जानते हैं। [2009]
(4) भाषा की माधुर्यता बस देखते ही बनती है। [2013]
(5) कृपया शीघ्र पत्र देने की कृपा करें। [2016]
(6) मेले में भारी भीड़ थी। [2016]
उत्तर-
(1) श्रीकृष्ण के अनेक नाम हैं।
(2) आपका पत्र मिला, धन्यवाद।
(3) क्या आप देवनागरी लिपि जानते हैं?
(4) भाषा की मधुरता, बस देखते ही बनती है।
(5) शीघ्र पत्र देने की कृपा करें।
(6) मेले में बहुत भीड़ थी।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए-
(1) उसे अनुत्तीर्ण होने की आशा है। [2009, 14]
(2) तुम्हारा सब काम गलत होता है। [2012, 14]
(3) मेरे को खाना खाना है। [2012]
(4) हत्यारे को मृत्युदण्ड की सजा मिली है।
(5) मुझे तुम्हारी पदोन्नति की आशंका है। [2012]
उत्तर-
(1) उसे अनुत्तीर्ण होने की आशंका है।
(2) तुम्हारे सब काम गलत होते हैं।
(3) मुझे खाना खाना है।
(4) हत्यारे को मृत्युदण्ड मिला है।
(5) मुझे तुम्हारी पदोन्नति की आशा है।

प्रश्न 9.
निम्नांकित वाक्यों की अशुद्धियाँ दूर कीजिए
(1) किरन एक मोतियों का हार पहिने है।
(2) प्रधानाचार्य को प्रार्थना करनी चाहिए।
(3) मैंने कल पुस्तकें खरीदा।
(4) रामा एक विद्वान छात्रा है।
उत्तर-
(1) किरन मोतियों का एक हार पहने है।
(2) प्रधानाचार्य से प्रार्थना करनी चाहिए।
(3) मैंने कल पुस्तकें खरीदी।
(4) रामा एक विदुषी छात्रा है।

प्रश्न 10.
मुहावरे और लोकोक्ति में क्या अन्तर है? स्पष्ट कीजिए। [2014]
उत्तर-
ऐसा वाक्यांश, जो सामान्य अर्थ का बोध न कराकर किसी विशेष अर्थ का आभास दे, उसे मुहावरा कहते हैं। लोकोक्तियाँ किसी विशेष घटना या कहानी से निकलकर प्रचलित होती हैं। इनमें लोक अनुभव छिपा होता है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ बताते हुए वाक्य प्रयोग कीजिए
अन्धे की लकड़ी, ईद का चाँद होना, छप्पर फाड़ कर देना, पेट में चूहे कूदना।
उत्तर-
अन्धे की लकड़ी (एक ही सहारा)-श्रवण कुमार अपने माता-पिता की अंधे की लकड़ी थे।
ईद का चाँद होना (बहुत दिनों में दिखना) श्याम, तुम्हें देखने को आँखें तरस गईं, तुम तो ईद का चाँद हो गए।
छप्पर फाड़कर देना (बिना परिश्रम के अनायास प्राप्ति)-भगवान देता है तो छप्पर फाड़कर देता है।
पेट में चूहे कूदना (जोर से भूख लगना)-पेट में चूहे कूद रहे हैं, पहले कुछ खा लें तब काम निपटायेंगे।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित का अर्थ बताते हुए वाक्य प्रयोग कीजिए
नौ-दो ग्यारह होना, पौ बारह होना, ऊँची दुकान फीका पकवान, आँख के अन्धे गाँठ के पूरे।
उत्तर-
नौ-दो ग्यारह होना (चम्पत हो जाना)-जगार पड़ते ही चोर नौ-दो ग्यारह हो गए।
पौ बारह होना (खूब लाभ)-आजकल जमीन के व्यापार में पौ बारह है।
ऊँची दुकान फीका पकवान (दिखावा मात्र) यह शुद्ध घी का विज्ञापन करने वाले के यहाँ रेपसीड का सामान पकड़ा गया है तो सभी कहने लगे इसकी तो ऊँची दुकान और फीका पकवान है।
आँख के अन्धे, गाँठ के पूरे (मूर्ख धनवान) वकीलों के क्या कहने उनके यहाँ तो आँख के अन्धे और गाँठ के पूरे आते ही रहते हैं।

प्रश्न 13.
“सब उन्नतियों का मूल धर्म है” का भाव विस्तार कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत कथन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का है। उन्होंने देशोपकारिणी सभा में भाषण करते हुए भारतवासियों को राष्ट्र के प्रति सजग किया था। भारतेन्दु जी मानते थे कि सभी प्रकार की उन्नतियों का आधार धर्म होता है। धर्म में समाज गठन की अनेक नीतियाँ हैं। धार्मिक अनुष्ठान, त्यौहार आदि समाज को उन्नत बनाने के लिए हैं। हमारे यहाँ धर्म और समाज सुधार दूध तथा पानी के समान मिले हुए हैं। धर्म समाज सुधार के लिए होता है। धर्म समाज में अनुशासन, व्यवस्था तथा पवित्र भावनाओं का विकास करता है। अत: राष्ट्र, समाज तथा व्यक्ति का हित धर्म के अनुसार कार्य करने में है। मंगलकारी भावना से किए गए कार्य विकास की ओर ले जाने वाले होते हैं। ऐसे कार्यों से हमारा ध्यान समाज कल्याण तथा विश्व बन्धुत्व पर केन्द्रित होगा। इससे मानव मात्र का मंगल विधान होगा। इसीलिए धर्म को सभी प्रकार की उन्नतियों का मूल आधार माना गया है।

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प्रश्न 14.
“उत्साह की गिनती अच्छे गुणों में होती है।”का भाव विस्तार कीजिए। [2009]
उत्तर-
गुण अच्छे तथा बुरे दो प्रकार के माने गये हैं। भाव का अच्छा या बुरा होना उसकी प्रवृत्ति के अच्छे या बुरे फल के आधार पर निश्चित होता है। इस प्रकार देखें तो उत्साह अच्छे गुणों की कोटि में आता है। उत्साह की प्रशंसा तभी होती है, जब वह करने के योग्य कर्मों में दिखाया जाता है। न करने योग्य कामों के प्रति होने वाला उत्साह उतना प्रशंसनीय नहीं होता है।

प्रश्न 15.
“साँझ की आँखों में करुणा क्यों उभर आती है” का भाव विस्तार कीजिए। [2009]
उत्तर-
घर लौटते निरीह वनवासियों की पगड़ी पर तथा वनवासी स्त्रियों की चूनर पर दो चार फूल-पत्ते गिर जाते हैं। यह देखकर साँझ की आँखों में करुणा उभर आती है। यह करुणा ओस की बूंद रूपी आँसुओं में प्रकट होती है।

प्रश्न 16.
“प्रेम की भाषा शब्द रहित है” का भाव विस्तार कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत उक्ति सरदार पूर्णसिंह के आचरण की सभ्यता’ निबन्ध की है। भावात्मक निबन्धों के श्रेष्ठ रचनाकार ने यहाँ पर प्रेम की सहज अभिव्यक्ति के विषय में बताया है। प्रेम सहज सम्प्रेषित होने वाला भाव है। बिना शब्दों के हाव-भावों द्वारा ही प्रेम की अभिव्यक्ति हो जाती है। नेत्र, कपोल, मस्तक आदि की चेष्टाएँ प्रेम को व्यक्त करने में समर्थ हैं। प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए वाक्यों से निर्मित भाषा के प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती है। शब्द तो मात्र साधारण विषयों को ही सम्प्रेषित कर पाते हैं। प्रेम एक विशिष्ट स्तर का भाव है इसलिए इसकी अभिव्यक्ति भाषा नहीं कर सकती है। इसकी भाषा शब्दों से परे होती है।

प्रश्न 17.
“साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है” का भाव विस्तार कीजिए। [2011, 14]
उत्तर-
गम्भीर विचारक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘उत्साह’ निबन्ध में यह कथन आया है। उत्साह का स्थान आनन्द वर्ग में माना गया है क्योंकि ‘उत्साही’ कर्म सौन्दर्य के उपासक होते हैं। वे कठिन स्थिति के बीच भी साहसपूर्ण उल्लास के साथ कर्म में प्रवृत्त होते हैं। कठिन स्थिति आने से भयभीत होकर प्रायः उससे बचने का प्रयास करते हैं। लेकिन कठिनतम स्थिति में भी साहस के साथ आनन्द का अनुभव करते हुए उल्लासपूर्वक कार्य में लगने का प्रयत्न करते हैं वे प्रशंसा के योग्य होते हैं। वे सच्चे उत्साही कहे जाते हैं। उत्साह में साहसमय आनन्द के भाव का होना आवश्यक है।

प्रश्न 18.
“कला जीवन भी है और जीवनयापन का साधन भी।” का भाव विस्तार कीजिए। [2008, 13]
उत्तर-
कला ही जीवन है। जीवन जीने की शैली को कला कहते हैं। हम पल-पल जो कुछ भी सीखते हैं। उन सभी में किसी-न-किसी रूप में कला के दर्शन होते हैं। कला में संघर्ष करने की शक्ति, कर्त्तव्यनिष्ठा, दयालुता आदि मानवीय गुण पाये जाते हैं। कला रोजी-रोटी का साधन है। कला से सम्बन्धित विभिन्न कार्यों के द्वारा जीवनयापन करना सीखते हैं। कला सम्पूर्ण जीवन का प्रतिबिम्ब है।

प्रश्न 19.
“मुल्क बदल जाए वतन तो वतन होता है” का भाव पल्लवन कीजिए। [2015]
उत्तर-
विदेश में निवास करने वाला व्यक्ति कहता है कि रहें कहीं पर, किन्तु अपना वतन तो अपना ही होता है। भाव यह है कि जिस धरती पर जन्म लिया है, जिसके अन्न-जल से यह शरीर पुष्ट हुआ, उसे भला कैसे भुलाया जा सकता है? विविध प्रकार के कार्यों से, आवश्यकताओं से, विवशता से अनेक देशों में जाया जा सकता है, किन्तु वहाँ जाने पर भी अपना निजी देश तो हृदय में समाया रहता है। रहने से देश तो बदल सकते हैं, किन्तु जन्म का देश नहीं बदला जा सकता है। उसके प्रति तो अटूट भाव रहेगा ही।

प्रश्न 20.
“आज तो मर्यादाओं को फिर से पहचानना है।” पंक्ति का भाव पल्लवन कीजिए। [2008, 15
उत्तर-
‘आज तो मर्यादाओं को फिर से पहचानना है।’ का भाव है कि वर्तमान अर्थप्रधान युग में मर्यादाएँ समाप्त हो रही हैं। स्वार्थग्रस्त होकर मनुष्य सामाजिक मान्यताओं को त्याग रहा है। जिन मर्यादाओं ने परिवार को संगठित और खुशहाल रखा, आज वे चरमरा रही हैं। मर्यादा एकांकी में जगदीश के भाई स्वार्थ हित के कारण अलग हो जाते हैं, बँधा-बँधाया परिवार बिखर जाता है तभी जगदीश अनुभव करते हैं कि हमें आज की परिस्थितियों में पारिवारिक मर्यादाओं को पहचानना होगा। तभी संयुक्त परिवार चल पायेंगे।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए- [2015] पृथ्वी, आँख, पुष्प, कमल।
उत्तर-
पृथ्वी-भू, भूमि; आँख-नेत्र, नयन; पुष्प-फूल, सुमन; कमल-जलज, पंकज।

प्रश्न 22.
निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी मानक रूप लिखिए [2015]
सांझ, न्हात, जरी, बिगरी।
उत्तर-
संध्या, स्नान, जड़ी, बिगड़ी।

प्रश्न 23.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए-(कोई दो) [2015]
भय, शत्रु, उपस्थित, अल्पज्ञ।
उत्तर-
निर्भय, मित्र, अनुपस्थित, सर्वज्ञ।

  • अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित गद्यांश में उचित विराम चिह्न लगाइए
(अ) अच्छा महोदय आपको कष्ट हुआ न क्या करूँ बिना भीख माँगे इस सर्दी में पेट गालियाँ देने लगता है [2010]
उत्तर-
अच्छा महोदय, आपको कष्ट हुआ न, क्या करूँ? बिना भीख माँगे इस सर्दी में पेट गालियाँ देने लगता है।

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(ब) मनुष्य मनुष्य का विश्वास नहीं कर सका इसीलिए तो एक सुखी दूसरे दु:खी की ओर घृणा से देखता था दु:ख ने ईश्वर का अवलम्बन लिया तो भी भगवान ने संसार के दुःखों की सृष्टि बन्द कर दी क्या। . उत्तर-मनुष्य मनुष्य का विश्वास नहीं कर सका। इसीलिए तो एक सुखी दूसरे दुःखी की ओर घृणा से देखता था। दुःख ने ईश्वर का अवलम्बन लिया तो भी भगवान ने संसार के दुःखों की सृष्टि बन्द कर दी क्या?

प्रश्न 2.
हिन्दी में विराम चिह्नों का क्या महत्व है? हिन्दी में प्रयोग किए जाने वाले दो विराम चिह्नों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर-
भाषा एक व्यक्ति के विचारों को दूसरे तक पहुँचाने का माध्यम है। सही विचार सम्प्रेषित करने के लिए बोलने में रुकना पड़ता है। इस रुकने को इंगित करने के लिए विराम चिह्नों का प्रयोग होता है। यदि विराम चिह्नों का सही प्रयोग नहीं है तो बात का भाव बदल जाता है। अत: भाव सम्प्रेषण के लिए हिन्दी में विराम चिह्नों का बहुत महत्व है। पूर्ण विराम (1) तथा अर्द्ध विराम (,) हिन्दी के दो प्रमुख विराम चिह्न हैं।

प्रश्न 3.
विराम चिह्नों के प्रयोग से भाषा की शुद्धता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
विराम चिह्नों के प्रयोग से भाषा शुद्ध हो जाती है।

प्रश्न 4.
हर्ष,शोक, विस्मय आदि को प्रकट करने वाले वाक्यों में कौन-सा विराम चिह्न प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
हर्ष, शोक, विस्मय आदि को प्रकट करने वाले वाक्यों में (!) विराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ बताइए कलम तोड़ना, खेत रहना।
उत्तर-
कलम तोड़ना-अच्छा लिखना। खेत रहना-वीरगति प्राप्त करना।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(i) खाक छानना,
(ii) पट्टी पढ़ाना।
उत्तर-
(i) नौकरी के लिए वह खाक छानता फिर रहा है।
(ii) आपने राकेश को क्या पट्टी पढ़ा दी है, वह घर जाने का नाम ही नहीं लेता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित लोकोक्तियों के अर्थ लिखिए-
(i) आँख का अंधा नाम नयनसुख,
(ii) नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
उत्तर-
(i) आँख का अन्धा नाम नयनसुख….गुण के विपरीत नाम।
(ii) नाच न जाने आँगन टेढ़ा-काम न जानना और बहाना बनाना।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखिए
(i) अपना उल्लू सीधा करना,
(ii) उन्नीस-बीस होना।
उत्तर-
(i) अपना उल्लू सीधा करना-अपना काम निकालना।
(ii) उन्नीस-बीस होना-मामूली अन्तर।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(i) गाल बजाना,
(ii) जान पर खेलना।
उत्तर-
(i) गाल बजाने से कुछ नहीं होता, काम तो करने से ही होता है।
(ii) भारतीय सैनिक देश की रक्षा के लिए जान पर खेल जाते हैं।

प्रश्न 10.
‘नाक नचाना’ का अर्थ बताते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिए
उत्तर-
नाक नचाना (तंग करना)-चिन्मय अपनी माँ को सारे दिन नाक नचाता है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित लोकोक्ति का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए-
आगे नाथ न पीछे पगहा।। उत्तर…तुम्हारे तो आगे नाथ न पीछे पगहा, इसीलिए घूमते रहते हो।

प्रश्न 12.
“कान देना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
शिक्षकों की बातों पर कान देना आवश्यक है।

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प्रश्न 13.
‘सिर पीटना’ का वाक्य में प्रयोग करके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
अब सिर पीटने से क्या होता है, सारा माल तो चला गया।

प्रश्न 14.
‘चाँदी का जूता मारना’ लोकोक्ति का सही अर्थ बताइए।
उत्तर-
चाँदी का जूता मारना-पैसे के बल पर काम कराना।

प्रश्न 15.
‘आग में घी डालना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोगद्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
श्याम ने आग में घी डालकर झगड़ा बढ़ा दिया नहीं तो दोनों शान्त हो रहे थे।

प्रश्न 16.
भाव विस्तार से क्या आशय है?
उत्तर-
सूत्र रूप में कही गई बात को विस्तार से समझाना, भाव विस्तार कहलाता है।

प्रश्न 17.
भाव विस्तार की क्या उपयोगिता है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
भाव विस्तार से गूढ कथन का अर्थ उजागर होता है। उस कथन के सभी पक्ष समझ में आ जाते हैं।

सम्पूर्ण अध्याय पर आधारित महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न |

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. ‘क्या तुम घर जाओगे’ वाक्य के अन्त में कौन-सा विराम चिह्न लगेगा?
(i) ,
(ii) ।
(ii) ?
(iv) !

2. पूर्णविराम चिह्न होता है
(i) () (ii)। (iii) ; (iv) !

3. निम्नलिखित में उद्धरण विराम चिह्न कौन-सा है?
(i) “” (ii)? (iii) () (iv) ………..

4. “इस नगर में अनेकों आदमी रहते हैं।” का शुद्ध रूप है-
(i) इस नगर में रहते हैं अनेकों आदमी,
(ii) अनेकों आदमी रहते हैं, इस नगर में,
(iii) इस नगर में अनेक आदमी रहते हैं,
(iv) इस नगर में अनेकों सज्जन रहते हैं।

5. “भारत में अनेकों पर्व मनाये जाते हैं।”का शुद्ध वाक्य है- [2011]
(i) भारत भर में अनेकों पर्व मनाये जाते हैं,
(ii) भारत में अनेकों त्यौहार मनाये जाते हैं,
(iii) भारत में अनेक पर्व मनाये जाते हैं,
(iv) भारत में नाना पर्व मनाये जाते हैं।

6. “सोहन अगले वर्ष भोपाल गया था।” में अशुद्धि है [2014]
(i) काल सम्बन्धी, (ii) वर्तनी सम्बन्धी, (iii) वचन सम्बन्धी, (iv) कर्ता सम्बन्धी।

7. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ है [2016]
(i) खीर खाना, (ii) मीठी खीर, (iii) सरल कार्य, (iv) कठिन कार्य।

8. ‘सब धान बाईस पसेरी’ का अर्थ है
(i) बहुत सस्ता होना, (ii) बहुत महँगा होना, (iii) अधिक से सुविधा, (iv) अच्छे-बुरे को समान समझना।

9. ‘मँह में राम बगल में छुरी’ का अर्थ है
(i) कठोर स्वभाव, (ii) कपटपूर्ण व्यवहार, (iii) कोमल स्वभाव, (iv) राम-राम जपने वाला।

10. ‘ईद का चाँद’ का अर्थ है… [2009]
(i) ईद पर मिलना, (ii) बहुत दिन बाद मिलना, (iii) ईद पर खुश होना, (iv) ईद पर चाँद दिखना।

11. ‘कवित्री’ शब्द की सही वर्तनी होगी [2017]
(i) कवीत्री, (ii) कवीयत्री, (iii) कवयित्री, (iv) कवयीत्री।
उत्तर-
1. (iii), 2. (ii), 3. (i), 4. (iii), 5. (iii), 6. (i), 7. (iv), 8. (iv), 9. (ii), 10. (ii), 11.(iii)।

  • रिक्त स्थान पूर्ति

1. क्या भोपाल सुन्दर शहर है ……….।
2. वाक्य के अन्त में ………….’ लगाया जाता है। [2017]
3. ‘हानि’ का विलोम शब्द ‘………….. ‘ है। [2015]
4. ‘एक पंथ ………….. ‘ प्रसिद्ध मुहावरा है।
5. ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ का अर्थ ………….. है।
6. ‘आम के आम …………..’ प्रचलित लोकोक्ति है।
7. माधुर्यता का शुद्ध रूप ………….’ है।
8. ‘अनेकों’ का शुद्ध ………….. होता है।
9. ‘आस्तीन का साँप’ मुहावरे का अर्थ ………… है। [2009]
10. ‘सब धान बाईस पसेरी’ मुहावरे का अर्थ ……. है। [2014]
11. ‘ईद का चाँद होना’ मुहावरे का अर्थ है ………….. | [2016]
उत्तर-
1. ?, 2. पूर्णविराम, 3. लाभ, 4. दो काज, 5. बहुत कम, 6. गुठलियों के दाम, 7. माधुर्य, 8. अनेक, 9. कपटी मित्र, 10. अच्छे-बुरे को समान समझना, 11. कभी-कभी दिखना।

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  • सत्य असत्य

1. प्रश्नवाचक वाक्य के अन्त में (?) विराम चिह्न लगाया जाता है।
2. ‘नाक रगड़ना’ का अर्थ खुशामद करना है।
3. ‘लोहा लेना’ मुहावरे का अर्थ युद्ध करना है। [2017]
4. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ खीर खाना है।
5. ‘उज्ज्वल’ शब्द पूर्ण शुद्ध है। [2013]
6. पूर्ण विराम का प्रयोग किसी कथन के पूर्ण होने पर किया जाता है। [2008]
7. लोक + उक्ति से लोकोक्ति शब्द की उत्पत्ति हुई है। [2008, 14]
8. यह चिन्ह्न ! प्रश्नवाचक चिह्न के लिए प्रयोग किया जाता है। [2008]
9. “अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग” यह एक लोकोक्ति है। [2008]
10. लोकोक्ति पूर्ण स्वतन्त्र होती है जबकि मुहावरा पूर्ण स्वतन्त्र नहीं होता। [2008]
11. लोकोक्ति को कहावत भी कहते हैं। [2010, 16]
12. मुहावरे का प्रयोग भाषा में चमत्कार उत्पन्न करता है। [2011]
उत्तर-
1. सत्य, 2. सत्य, 3. सत्य, 4. सत्य, 5. सत्य, 6. सत्य, 7. सत्य, 8. असत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. सत्य, 12. सत्य।

  • जोड़ी मिलाइए

I. 1. रात-दिन [2015] – (क) विस्मयादिबोधक
2. ‘हे राम ! क्या-क्या सहना पड़ेगा?’ वाक्य है – (ख) द्वन्द्व समास
3. ‘दाँत खट्टे करना’ का अर्थ है – (ग) प्रश्नवाचक वाक्य
4. ‘पौन’ का तत्सम है [2015] – (घ) परास्त करना
5. वह कहाँ जा रहा है? [2017] – (ङ) पवन
उत्तर-
1.→ (ख),
2. → (क),
3. → (घ),
4.→ (ङ),
5. → (ग)।

II.
1. तुम तो कुर्सी में बैठे हो वाक्य है – (क) अशुद्ध
2. ‘एक मात्र सहारा’ के लिए मुहावरा है – (ख) बिखर जाना
3. तीन तेरह होना [2014, 17] – (ग) अन्धे की लकड़ी
4. ‘चार चाँद लगाना’ का अर्थ है – (घ) मुँह मोड़ना
5. उपेक्षा के लिए मुहावरा है – (ङ) शोभा बढ़ाना
उत्तर-
1. → (क),
2. → (ग),
3. → (ख),
4. → (ङ),
5. → (घ)।

  • एक शब्द /वाक्य में उत्तर

1. जो समाज की सेवा करता है। [2008]
2. जो हमेशा सत्य बोलता है। [2008]
3. जिसे पराजित न किया जा सके। [2008, 09]
4. जहाँ से चार रास्ते जाते हों। [2008]
5. जो सब कुछ सहन कर लेता है। [2008]
6. जिसका अस्तित्व लोक में न हो। [2008, 09]
7. जिसकी धर्म में आस्था हो। [2008]
8. जिसका विश्वास ईश्वर में न हो। [2008, 09, 16]
9. जो देश पर बलिदान हो गया हो। [2008]
10. जिनकी गिनती न की जा सके। [2008]
11. जो आदर के योग्य हो। [2008]
12. जिसे देखा न जा सके। [2008, 09]
13. जिसकी ईश्वर में आस्था हो। [2008]
14. जिस पर नियन्त्रण न हो। [2008]
15. जिसे विभाजित न किया जा सके। [2008]
16. किये गये उपकार को मानने वाला। [2009]
17. जिसके आने की तिथि ज्ञात न हो। [2010]
18. जो सबसे श्रेष्ठ हो। [2010]
19. जो उच्च कुल में पैदा हुआ हो। [2010]
20. जिसके पास धन नहीं है। [2010]

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21. तपस्या करने वाला। [2010]
22. जिसका कोई शुल्क न देना पड़े। [2011, 15, 16]
23. परिश्रम करने वाला। [2011]
24. जिसका क्षय न हो। [2011]
25. जिसका कोई शत्रु न हो। [2011]
26. जिसे क्षमा न किया जा सके। [2011]
27. जो वेतन लेकर काम करता है। [2013]
28. जो कम बोलता हो। [2013]
29. जो समाज की सेवा करता है, उसे क्या कहते हैं? [2014]
30. जिसके समान कोई दूसरा न हो। [2015]
31. व्यवसाय से सम्बन्धित। [2016]
32. जिसकी कोई उपमा न हो। [2017]
33. आकाश को छूने वाला। [2017]
34. ‘मोहन को गर्म भैंस का दूध पिलाओ’-वाक्य शुद्ध कीजिए। [2016]
35. ‘मुझे केवल मात्र पाँच रुपये चाहिए।’ वाक्य को शुद्ध करके लिखिए। [2017]
उत्तर-
1. समाजसेवक, 2. सत्यवादी, 3. अपराजेय, 4. चौराहा, 5. सहनशील, 6. अलौकिक,7. धार्मिक,8. नास्तिक,9.शहीद, 10. अनगिनत, 11. आदरणीय, 12. अदृश्य, 13. आस्तिक, 14. अनियन्त्रित, 15. अविभाज्य, 16. कृतज्ञ, 17. अतिथि, 18. सर्वश्रेष्ठ, 19. कुलीन, 20.निर्धन, 21.तपस्वी, 22. निःशुल्क, 23. परिश्रमी, 24. अक्षय, 25. अजातशत्रु, 26. अक्षम्य, 27. वैतनिक, 28. अल्पभाषी, 29. समाजसेवी, 30. अद्वितीय, 31. व्यावसायिक, 32. अनुपमेय, 33. गगनचुम्बी, 34. मोहन को भैंस का गर्म दूध पिलाओ, 35. मुझे मात्र पाँच रुपये चाहिए।

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MP Board Class 11th Special Hindi मुहावरे एवं लोकोक्तियों का अर्थ एवं प्रयोग

MP Board Class 11th Special Hindi मुहावरे एवं लोकोक्तियों का अर्थ एवं प्रयोग

(क) मुहावरे

वे छोटे-छोटे वाक्यांश हैं जिनके प्रयोग से भाषा में सौन्दर्य, प्रभाव, चमत्कार और विलक्षणता आती है। महावरा वाक्यांश होता है, अतः इसका स्वतन्त्र प्रयोग न होकर वाक्य के बीच में उपयोग किया जाता है। मुहावरे के वास्तविक अर्थ का ज्ञान होने पर ही इसका सही उपयोग हो सकता है। इसका सामान्य अर्थ न लेकर इसके गूढ़ अर्थ या व्यंजना से अर्थ समझना चाहिए। इसका उपयोग करने में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. मुहावरे को पढ़कर उसमें छिपे अर्थ को समझने का प्रयास करना चाहिए।
  2. उसी के अर्थ से मिलती-जुलती घटना या बात को चुनकर संक्षेप में लिखना चाहिए।
  3. मुहावरे को उसी वाक्य में मिलाकर उसी काल की क्रिया में रख देना चाहिए।
  4. यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मुहावरा प्रयोग करने से अनेक रूप ले सकता है, क्योंकि उसमें थोड़ा परिवर्तन हो जाता है।
  5. मुहावरे के मूल अर्थ में ही उसका प्रयोग नहीं होता। जैसे-अंगारों पर पैर रखना = संकट में पड़ जाना। आई. ए. एस. की परीक्षा में बैठना और सफलता पाना अंगारे पर पैर रखने जैसा है। अंगारे पर पैर रखने में जितना कष्ट होता है, उतना ही प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी और परीक्षा उत्तीर्ण करने में होता है।

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यहाँ कुछ मुहावरे, उनके अर्थ और प्रयोग क्रमशः दिये जा रहे हैं
(1) अपना उल्लू सीधा करना (अपना मतलब सिद्ध करना)-ममता मेरी हिन्दी की कॉपी ले गयी, अपना उल्लू तो सीधा कर लिया, पर मैंने इतिहास की किताब माँगी तो मना कर दिया। [2013]
(2) अक्ल पर पत्थर पड़ना (बुद्धि भ्रष्ट हो जाना)-परीक्षा के समय वह रोजाना दिन में सो जाती थी, मानो उसकी अक्ल पर पत्थर पड़ गये हों।
(3) अन्धे की लाठी (एकमात्र आश्रय)-राकेश अपने बूढ़े बाप की अन्धे की लाठी [2009]
(4) अन्धेरे घर का उजाला (एकमात्र पुत्र)-दीपक शर्माजी के अन्धेरे घर का उजाला है।
(5) अक्ल चकराना (विस्मित होना, बात समझ में न आना)-रामबाबू के निधन का समाचार सुनकर तो अक्ल चकरा गयी।
(6) अलग-अलग खिचड़ी पकाना (सबसे अलग-अलग)-संगीता और अनुराधा दिन भर न जाने क्या अपनी अलग-अलग खिचड़ी पकाती रहती हैं।
(7) अंगार उगलना (कटु वचन बोलना)-जीजी या तो बोलती नहीं, जब बोलेंगी तो अंगार उगलेंगी।
(8) अगर-मगर करना (टालने का प्रयत्न करना)-भाभी से जब भी कमला की शादी की बात करो, वे अगर-मगर करने लगती हैं।
(9) अंग-अंग ढीला हो जाना (थक जाना)-ऑपरेशन होने के बाद से तो ऐसा लगता है कि अंग-अंग ढीले हो गये।
(10) अंकुश देना (वश में रखना)-पिताजी तीनों लड़कों पर सदैव अंकुश दिये रहते हैं।

(11) अपने मुँह मियाँ मिट्ठ (अपनी प्रशंसा आप करना)-अरुण हमेशा अपने मुँह मियाँ मिट्ठ बना रहता है।
(12) अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना (स्वयं की हानि करना)-रश्मि पढ़ाई अधूरी छोड़कर चली गयी, उसने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली। [2009]
(13) अपना गला फँसाना (स्वयं को संकट में डालना)-मंजू की सगाई करके मैंने अपना गला फंसा दिया। [2009]
(14) अन्धे को दिया दिखाना (मूर्ख को उपदेश देना)-गाँव वालों से प्रौढ़ शिक्षा की बात करना अन्धे को दिया दिखाने जैसा है।
(15) अंगद का पैर होना (दृढ़ निश्चय से जम जाना)-राजीव तो अंगद के पैर की तरह जम गया है।
(16) अँगूठा दिखाना (साफ मना करना)-रानी से काम करने को कहा तो वह अंगूठा दिखाकर भाग गयी।
(17) अक्ल.के घोड़े दौड़ाना (अटकलें लगाना)-जब माला से पूछा कि सप्तर्षि कहाँ है तो वह अक्ल के घोड़े दौड़ाने लगी।
(18) अक्लमन्द की दुम बनना (मूर्ख होकर बुद्धिमानी की बात करना)-कमल व्यवसाय के बारे में कुछ बात समझता तो है नहीं, फिर भी अक्लमन्द की दुम बना रहता है।
(19) अपना-सा मुँह लेकर रहना (असफल होकर लज्जित होना)-जब मीनू निकी को छोड़कर सिनेमा चली गयी तो निकी अपना-सा मुँह लेकर रह गयी।
(20) अरण्यरोदन करना (निरर्थक बात करना)-नेताओं के वक्तव्य अरण्यरोदन की तरह हो गये हैं।

(21) आँखों का तारा होना (अत्यन्त प्रिय होना)-रुचि अपनी मम्मी की आँख का तारा है।
(22) आँख का किरकिरा होना (सदा खटकते रहना)-सुधीर की जब से पदोन्नति हुई है, वह सबकी आँख का किरकिरा हो गया।
(23) आँखों में पानी न रहना (बेशर्म हो जाना)-वह दिन भर व्यर्थ ही घूमता रहता है, उसकी आँखों में पानी ही नहीं रहा।
(24) आँख मूंद लेना (उदासीन होना, मर जाना)-अपना मकान बन जाने के बाद बड़े भैया ने हम सबकी तरफ से आँख मूंद ली।
(25) आड़े हाथ लेना (भर्त्सना करना, फटकारना)-इस बार जब सन्तोष फिर उपदेश देने लगा तो मैंने उसे आड़े हाथों लिया।
(26) नौ-नौ आँसू रोना (अधिक दुःखी होना)-शास्त्रीजी के निधन से देशवासी नौ-नौ आँसू रोये।
(27) आपे से बाहर होना (क्रोधित होना)-बिहारी छोटी-सी बात पर भी आपे से बाहर हो जाता है।
(28) आटे-दाल का भाव मालूम होना (विषम परिस्थितियों में यथार्थ ज्ञान मिलना)-सुरेशजी, शादी होने दो, फिर मालूम होगा आटे-दाल का भाव।
(29) आकाश के तारे तोड़ना (दुर्लभ वस्तु प्राप्त करना)-वह प्रीति को इतना प्यार करता है कि उसके लिए आकाश के तारे भी तोड़ सकता है।
(30) आसमान सिर पर उठाना (कोलाहल करना)-निष्ठा गुड़िया लेकर भागी तो जमाते ने रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लिया।

(31) आकाश से बातें करना (ऊँचे उठते जाना)-सौरभ की पतंग आकाश से बातें करने लगी तो वह बहुत खुश हो गया।
(32) आँखें लाल-पीली करना (क्रोध करना)-उत्सव के मन की न हो तो वह प्रायः आँखें लाल-पीली करने लगता है।
(33) आँख का बिछाना (प्यार से स्वागत करना)-दीपावली पर सुधा ने लिखा; आओ, हम आँखें बिछाये बैठे हैं।
(34) आँख का काजल निकालना (ठग लेना)-प्रफुल्ल इतना चतुर है कि वह आँख का काजल निकाल ले और पता ही न चले।
(35) आग में घी पड़ना (क्रोधित का क्रोध बढ़ाना)-जब माताजी को राजू समझाने लगा तो पिताजी बोले-अरे, क्यों आग में घी डालता है?
(36) आकाश-पाताल का अन्तर (अत्यधिक फर्क होना)-नीता और गीता की आदत में आकाश-पाताल का अन्तर है।
(37) उड़ती चिड़िया पकड़ना (मन की बात आनना)-शास्त्री जी के पास जाओ, वे उड़ती चिड़ियाँ पकड़ लेते हैं।
(38) कान का कच्चा (अफवाहों पर विश्वास करना)-श्रीवास्तव जी कान के कच्चे हैं, तभी तो रावत की बातों को सत्य मान लेते हैं।
(39) कान में तेल डालना (अनसुनी करना)-क्यों विमला, आज कान मे तेल डालकर बैठी हो क्या?
(40) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना (सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाना)-जब जयकुमार से पूछा-कहाँ से आ रहे हो तो उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं।

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(41) हाथों के तोड़े उड़ जाना (होश उड़ना)-विष्णु घर से क्या गया, नीलिमा के हाथों के तोते उड़ गये।
(42) न तीन में न तेरह में (किसी के बीच में न पड़ना)-विभाग की कार्यवाही में कितनी ही गड़बड़ हुई, पर रमेश को क्या वह न तीन में न तेरह में।
(43) सूरज को दीपक दिखाना (ज्ञानवान को ज्ञान देना)-सन्ध्या जब हॉस्टल से घर आई तो नई-नई बातें बताकर सूरज को दीपक दिखा रही थी।
(44) पहाड़ टूट पड़ना (मुसीबत आ पड़ना)-पेट्रोल के दाम क्या बढ़े, जनता पर पहाड़ टूट पड़ा। [2012]
(45) ईद का चाँद होना (बहुत दिनों में दीखना)-स्वाति जब छुट्टियाँ मनाकर आई तो नीलम बोली, ‘अरे ! वाह तुम तो ईद का चाँद हो गयी।’
(46) हाथ कंगन को आरसी क्या? (प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं)-रेखा की चित्रकला के लिए हाथ कंगन को आरसी क्या? पूरा घर चित्रों से भरा है।
(47) चोली-दामन का साथ (घनिष्ठ सम्बन्ध)-प्रूफ रीडर और प्रकाशक का तो चोली-दामन का साथ है।
(48) जी चुराना (काम न करना, काम से डरना)-काशीराम हमेशा काम से जी चुराता है।
(49) कलम तोड़ना (अच्छी रचना करना)-आकाश जी जब कविता लिखते हैं, कलम तोड़ देते हैं।
(50) धूप में बाल सफेद करना (अनुभवहीन ज्ञान)-दादी ने रोहन को डाँटकर कहा, तुम मेरी बात मानने को तैयार नहीं हो क्या मैंने धूप में बाल सफेद किये हैं।

(51) बाल-बाँका न होना (हानि न होना)-विपत्ति में पड़ने पर धैर्य नहीं खोना चाहिये धैर्यवान व्यक्ति का बाल भी बाँका न होगा।
(52) सिर धुनना (पछताना)-दीपक ने अपनी सारी आदमनी जुये में गँवा दी अब सिर धुन रहा है।
(53) सिर पर कफन बाँधना (मरने से न डरना)-देश के वीर सिपाही युद्ध के लिये सिर पर कफन बाँधकर चलते हैं।
(54) आँखों में धूल झोंकना (धोखा देना)-आजकल ठग आँखों में धूल झोंककर किसी भी व्यक्ति को आसानी से लूट लेते हैं।
(55) कान खड़े करना (सतर्क रहना)-युद्ध स्थल में सैनिकों को सदैव कान खड़े रखना चाहिये।
(56) नाकों चने चबाना (तंग करना)-सीमा ने उधार के रुपये लौटाने में मुझे नाकों चने चबवा दिये।
(57) मुँह की खाना (पराजित होना)-भारत को क्रिकेट विश्व में मुंह की खानी पड़ी।
(58) दाँत खट्टे करना (हरा देना)- भारतीय सैनिकों ने कारगिल के युद्ध में पाकिस्तानी सेना के दाँत खट्टे कर दिये।
(59) छाती पर मूंग दलना (जान-बूझकर तंग करना)-सुरेश ने रमेश से कहा तुम अपना काम देखो व्यर्थ में मेरी छाती पर क्यों मूंग दल रहे हो। [2009]
(60) छाती पर साँप लोटना (ईर्ष्या करना)-पड़ोसी की सम्पन्नता को देखकर उसकी छाती पर साँप लोट गया।

(61) पेट में चूहे दौड़ना (भूख लगना)- गरीबों के धन अभाव के कारण पेट में चूहे दौड़ते रहते हैं।
(62) हथेली पर सरसों उगाना (जल्दी करना)-देवेन्द्र तुम कुछ देर प्रतीक्षा करो हथेली पर सरसों उगाने से क्या लाभ?
(63) हाथ पीले करना (विवाह सम्पन्न करना)-आधुनिक युग में दहेज प्रथा के कारण बेटी के हाथ पीले करना पिता के लिये कठिन समस्या है।
(64) हाथ धोकर पीछे पड़ना (बुरी तरह पीछे लगना)-बहुत से लोगों की आदत होती है कि वे अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये व्यर्थ हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं। [2012]
(65) होम करते हाथ जलना (अच्छे काम में बदनामी)-समाज सेवा ऐसा कार्य है जिसमें होम करते हाथ जलने की सम्भावना बनी रहती है।
(66) मुट्ठी गरम करना (भेंट देना)-आजकल मुट्ठी गर्म किये बिना कोई भी कार्य नहीं होता है।
(67) टेढ़ी अँगुली से घी निकालना (सीधे काम नहीं बनता)-दुष्ट व्यक्ति से कोई भी कार्य टेढ़ी अँगुली से घी निकालने के समान है।
(68) पाँचों अंगुलियाँ घी में (सब प्रकार से सुख)-लॉटरी निकलने के बाद रमेश की पाँचों अँगुलियाँ घी में हैं।
(69) कमर टूटना (थक जाना)-श्रमिकों की घोर परिश्रम के कारण कमर टूट जाती है।
(70) फॅक-फूंककर पैर रखना (सावधानी से चलना)-आज की स्पर्धा के युग में व्यापारी को अपनी उन्नति के लिये फूंक-फूंककर पैर रखना चाहिये।

(71) आँख लगना (झपकी आना)-टी. वी. देखते-देखते अचानक मेरी आँख लग गयी और चोर चोरी कर ले गये।
(72) आँखें दिखाना (क्रोध करना)-तुम मुझे आँखें दिखाकर भयभीत नहीं कर सकते। . (73) आँखों से गिर जाना (सम्मान खो देना)-लोग झूठ बोलने के कारण दूसरों को आँखों से गिर जाते हैं।
(74) आग लगाना (भड़काना)-कुछ लोगों की आदत आग लगाकर तमाशा देखने की होती है।
(75) आँसू पीना (दुःख में विवशता का अनुभव करना)-पुत्र की मृत्यु के बाद पिता को आँसू पीकर मौन रहना पड़ा।
(76) आँसू पोंछना (धीरज देना)-हमारा कर्त्तव्य है कि दुःख पड़ने पर सदैव दूसरों के आँसू पोंछने का प्रयास करें।
(77) आकाश कुसुम (अनहोनी, असम्भव बात)-सीमा के लिये पूरे उत्तर प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त करना आकाश कुसुम के समान प्रमाणित हुआ।
(78) आस्तीन का साँप (विश्वासघाती)-आज के युग में प्रत्येक क्षेत्र में आस्तीन के साँप विद्यमान हैं। अत: उनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है।
(79) आग बबूला होना (क्रोधित होना)-परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर राजू के पिता उस पर आग बबूला हो उठे। [2013]
(80) उल्टी गंगा बहना (विपरीत काम करना)- यह कार्य मेरे वश के बाहर है तुम तो सदैव उल्टी गंगा बहाते हो।

(81) उधेड़-बुन में पड़ना (दुविधा में पड़ना)-कार्य का अत्यधिक बोझ होने के कारण दीपक उधेड़-बुन में पड़ा है कि कौन-सा कार्य पहले पूरा करे।
(82) उल्लू बनाना (मूर्ख बनाना)-सोहन ने मोहन से कहा तुम कैसे धोखा खा गये तुम तो सबको उल्लू बनाने में माहिर हो।
(83) ऊँच-नीच समझना (भले-बुरे का विवेक होना)-बुद्धिमान व्यक्ति ऊँच-नीच समझकर अपना कार्य सम्पन्न करते हैं।
(84) एक आँख से देखना (समदर्शी)-माता-पिता को पुत्र एवं पुत्री को एक आँख से देखना चाहिये।
(85) एक लाठी से हाँकना (अच्छे-बुरे का अन्तर न करना)-सज्जन एवं दुर्जन को एक लाठी से हाँकना अनुचित है।
(86) कगार पर खड़े होना (मृत्यु के समीप)-व्यक्ति को कगार पर खड़े होने के समय ईश्वर याद आता है।
(87) कचूमर निकालना (अत्यधिक पिटाई करना)-पुलिस ने चोर को इतना प्रताड़ित किया कि उसका कचूमर निकल गया।
(88) कच्चा चिट्टा खोलना (पोल खोलना)-हत्यारे को पकड़ लिये जाने पर उसने अपने अपराध का कच्चा चिट्ठा खोल दिया।
(89) कदम चूमना (खुशामद करना)-आजकल लोग आगे बढ़ने के लिये अधिकारियों के कदम चूमते है।
(90) कलेजा जलना (असन्तोष से दुःख होना)-दूसरों की प्रगति देखकर अपना कलेजा जलाना मूर्खता है।

(91) कलेजा फटना (दुःखी होना)-पति की मृत्यु के बाद सीमा का कलेजा फट गया।
(92) कलेजे पर पत्थर रखना (दुःख में धैर्य रखना)-व्यापार में घाटा आने पर मोहन ने कलेजे पर पत्थर रखकर नौकरी करना शुरू कर दी।
(93) कान कतरना (किसी से बढ़कर काम दिखाना)-प्रवीण की पुत्रवधू प्रत्येक बात में इतनी निपुण है कि वह अच्छे-अच्छों का कान कतरती है।
(94) कान भरना (चुगली करना)-पड़ोसियों के कान भरना रीमा की पुरानी आदत है। [2012]
(95) कानाफूसी करना (आपस में चुपचाप सलाह करना)-विवाह में व्यवधान आने पर रोहित ने अपने सम्बन्धियों से कानाफूसी करना प्रारम्भ कर दी।
(96) कानों कान खबर न लगना (पता न लग पाना)-जनता पार्टी के चुनाव में जीत जाने की किसी को कानों कान खबर न थी। [2009]
(97) कान पर न रेंगना (तनिक भी प्रभाव न पड़ना)-मालिक ने नौकर से कहा कि मैं तुम्हें इतनी देर से बुला रहा हूँ पर तुम्हारे कान पर जूं नहीं रेंगती।
(98) कुत्ते की मौत मरना (बुरी मौत मरना)-पुलिस मुठभेड़ में दुर्दान्त डाकू कुत्ते की मौत मारा गया।
(99) कोरा जवाब देना (स्पष्ट मना करना)-विपत्ति के समय किसी को कोरा जवाब देना अच्छा नहीं है।
(100) कोल्हू का बैल (दिन-रात परिश्रम करना)-पिता ने पुत्र से कहा तुम इस नौकरी को छोड़ दो, दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह पिले रहते हो फिर भी कुछ नहीं मिलता।

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(101) कौड़ी का न पूछना (तनिक भी सम्मान न करना)-आजकल के पुत्र वृद्ध होने पर माता-पिता को कौड़ी का भी नहीं पूछते हैं।
(102) कौड़ी-कौड़ी को मुहताज होना (अत्यधिक गरीब)-मोहन के घर चोरी हो जाने पर वह कौड़ी-कौड़ी को मुहताज हो गया।
(103) खटाई में पड़ना (काम रुक जाना)-चुनाव के कारण सड़क निर्माण का कार्य खटाई में पड़ गया।
(104) खाने को दौड़ना (क्रोध करना)-राम ने अपने पड़ोसी से कहा तुम व्यर्थ ही खाने को दौड़ रहे हो मैंने तुमसे क्या कहा है?
(105) खून खौलना (अत्यधिक क्रोधित होना)-पुत्र की शरारत को देखकर पिता का खून खौल गया।
(106) खयाली पुलाव पकाना (मन ही मन कल्पना करना)-खयाली पुलाव पकाने से कोई भी काम नहीं होता परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।
(107) गरम होना (क्रोध आना)-आजकल के नवयुवकों में बात-बात पर गर्म होने की आदत है।
(108) गऊ होना (अत्यन्त सीधा होना)-रोहन का स्वभाव गऊ के समान है।
(109) गागर में सागर भरना (थोड़े में बहुत कहना)-बिहारी ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया। [2017]
(110) गाल बजाना (बकवास करना)-परिश्रम करने से फल मिलेगा गाल बजाने से नहीं।

(111) गाल फुलाना (गुस्से में चुप होना)-सीमा ने गीता से कहा तुम तो हर समय गाल फुलाये रहती हो तुमसे कौन बात करेगा?
(112) गूलर का फूल होना (दर्शन न होना)-आज के युग में आदर्श व्यक्ति एक प्रकार से गूलर के फूल के समान हो गये हैं।
(113) गुड़ गोबर होना (बना बनाया काम बिगाड़ देना)-कार्य पूर्ण होने से पहले ही विनोद ने सब गुड़ गोबर कर दिया।
(114) गुलछरें उड़ाना (मौज मस्ती करना)-सोहन अपने पिता की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्ति से गुलछर्रे उड़ा रहा है।
(115) गोल-माल करना (घपला करना)-आजकल समाचार-पत्रों में सब गोल-माल के समाचार निकलते रहते हैं।
(116) गुल खिलना (रहस्य पता चलना)-पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर पता चला कि देवेन्द्र ने कौन-कौनसे गुल खिलाये थे।
(117) घड़ों पानी पड़ना (लज्जित होना)-अपने पुत्र की करतूतों को सुनकर सोहन के पिता पर घड़ों पानी पड़ गया।
(118) घर फंक तमाशा देखना (अपनी परिस्थिति से अधिक व्यय करना)-घर फूंक तमाशा देखने वाले कभी जीवन में सफल नहीं होते।
(119) घाव पर नमक छिड़कना (दुःख में और दुःखी करना)-राम ने मोहन से कहा मैं तो खुद ही परेशान हूँ। तुम मेरे घावों पर नमक क्यों छिड़क रहे हो?
(120) घास खोदना (व्यर्थ समय गँवाना)-अध्यापक ने छात्र से कहा कि इतने सरल प्रश्न भी नहीं कर पा रहे हो साल भर क्या घास खोदते रहे?

(121) चम्पत हो जाना (गायब हो जाना)-पुलिस को देखकर अपराधी चम्पत हो जाते हैं।
(122) चिकना घड़ा होना (किसी बात का असर न होना)-श्याम को कितना ही समझाओ लेकिन वह तो चिकना घड़ा हो गया है। किसी की बात सुनता ही नहीं।
(123) चिकनी-चुपड़ी बातें करना (बनावटी प्रेम दिखाना)-आजकल का युग चिकनी-चुपड़ी बातें करके काम बनाने का हो गया है।
(124) चित्त कर देना (हराना)-हॉकी के खेल में सेन्ट पीटर्स स्कूल के छात्रों ने राधा बल्लभ स्कूल के छात्रों को चित्त कर दिया।
(125) चुल्लू भर पानी में डूब मरना (अत्यन्त लज्जित होना)-परीक्षा में बार-बार अनुत्तीर्ण होने पर पिता ने पुत्र से कहा तुम चुल्लू भर पानी में डूब मरो।
(126) चेहरे का रंग उतरना (निराशा का अनुभव होना)-चोरी पकड़े जाने पर सुरेश के चेहरे का रंग उतर गया।
(127) चैन की बंशी बजाना (सुखपूर्वक रहना)-लॉटरी निकल आने पर महेश चैन की बंशी बजा रहा है।
(128) छक्के छूटना (पराजित होना)-भारतीय सैनिकों के समक्ष पाकिस्तान की सेना के छक्के छूट गये।
(129) छक्के छुड़ाना (निरुत्साह करना)-लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये।
(130) छक्के पंजे करना (मौज मनाना)-पूँजीपति बिना श्रम के छक्के पंजे करते रहते हैं।

(131) छठी का दूध याद आना (अत्यधिक परेशानी का अनुभव करना)-पर्वतारोहियों को दुर्गम चढ़ाई चढ़ने में छठी का दूध याद आ गया।
(132) छाती पर साँप लोटना (ईर्ष्यावश दुःखी होना)-पड़ोसी की प्रगति को देखकर रवीन्द्र की छाती पर साँप लोटने लगा है।
(133) छिद्रान्वेषण करना (दोष ढूँढ़ना)-मित्रों का छिद्रान्वेषण करना उचित नहीं होता है।
(134) छापा मारना (छिपकर आक्रमण करना)-विद्युत् विभाग ने बड़े-बड़े व्यापारियों पर छापा मारना शुरू कर दिया।
(135) छींटाकशी करना (व्यंग करना)-बहुत-से लोगों की प्रवृत्ति दूसरों पर छींटाकशी करके प्रसन्न होने की होती है।
(136) छाया करना (संरक्षण देना)-पिता पुत्र के निमित्त सदैव छाया बनकर रहता है।
(137) जबान में लगाम रखना (सम्भल कर बात करना)-बड़ों के समक्ष हमेशा जबान में लगाम रखकर बात करनी चाहिये।
(138) जबान चलना (जरूरत से ज्यादा बोलना)-तुम चुप क्यों नहीं रहते व्यर्थ में जबान चला रहे हो।
(139) जबानी जमा खर्च (व्यर्थ की बातें)-विकास कार्य की योजनाएँ आजकल जबानी जमा खर्च तक सीमित रह गयी हैं।
(140) जमीन-आसमान एक करना (सीमा से अधिक कर गुजरना)-परीक्षा के समय विद्यार्थी जमीन-आसमान एक कर देते हैं।

(141) जमीन पर पाँव न रखना (अभिमान करना)-अचानक धन प्राप्त होने पर महेश के पाँव जमीन पर नहीं पड़ते।
(142) जली-कटी सुनाना (भली-बुरी कहना)-नौकर के उचित प्रकार काम न करने पर मालिक ने उसे जली-कटी सुनाना प्रारम्भ कर दिया।
(143) जड़ खोदना (समूल नष्ट करना)-चाणक्य ने अपनी कूटनीति से नन्दवंश की जड़ खोद दी।
(144) जड़ तक पहुँचना (कारण का पता लगा लेना)-हमें बात की जड़ तक पहुँचे बिना किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिये।
(145) जहर बोना (दूसरे के लिये संकट उत्पन्न करना)-बहुत से लोगों का स्वभाव जहर बोकर दूसरों को कष्ट पहुँचाने का होता है।
(146) जहर उगलना (उग्र बातें करना)-पाकिस्तानी शासक हमेशा भारत के विरुद्ध जहर उगलते रहते हैं।
(147) जहर का यूंट पीना (क्रोध रोके रहना)-झगड़ा हो जाने पर रमेश जहर का यूंट पीकर रह गया।
(148) जान पर खेलना (जोखिम का काम करना)-सुरेश ने अपनी जान पर खेलकर डूबते बच्चे की जान बचायी।
(149) जान में जान आना (भय टल जाना)- भूकम्प समाप्त होने पर लोगों की जान में जान आ गयी।
(150) जान के लाले पड़ना (संकट पड़ना)-अकालग्रस्त क्षेत्र में अन्न के अभाव के कारण जान के लाले पड़ जाते हैं।

(151) आपे से बाहर होना (क्रोध में होश खो बैठना)-जगदीश ने श्याम से कहा मेरी जरा सी भूल पर तुम आपे से बाहर क्यों हो रहे हो?
(152) जी हल्का होना (शान्ति प्राप्त होना)-पुत्र को रोग से मुक्त देखकर माँ का जी हल्का हो गया।
(153) जी छोटा करना (निराश होना)-रमेश ने मोहन से कहा मैं तुम्हारी सहायता के लिये तैयार हूँ तुम जी छोटा क्यों करते हो?
(154) जी खट्टा होना (स्नेह कम होना)-पैतृक सम्पत्ति में विधिवत् विभाजन न होने पर भाइयों का आपस में जी खट्टा हो गया।
(155) जी का जंजाल (परेशानी का कारण)-दुष्ट का संग जी का जंजाल होता है।
(156) जीती बाजी हारना (काम बनते-बनते बिगड़ जाना)-सचिन के चोट लगने के कारण भारतीय टीम जीती बाजी हार गयी।
(157) झाँसा देना (धोखा देना)-अपराधी पुलिस वाले को झांसा देकर भाग गया।
(158) टकटकी बाँधना (एकटक देखना)-पपीहा स्वाति नक्षत्र के बादलों को टकटकी लगाकर देखता रहता है।
(159) टस से मस न होना (अड़े रहना)-रावण विभीषण के लाख समझाने पर भी टस से मस नहीं हुआ।
(160) टाँग अड़ाना (बाधा डालना)-पिता ने पुत्र को समझाते हुए कहा बड़ों के बीच में टाँग अड़ाना अनुचित है।

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(161) टाँग पसार कर सोना (निश्चिन्त होना)-बेटी का विवाह सम्पन्न होने पर माता-पिता टाँग पसार कर सोते हैं।
(162) टोपी उछालना (अपमान करना)-बरात को लौटाकर वर पक्ष ने कन्या के पिता की टोपी उछालकर अच्छा नहीं किया।
(163) ठोकना बजाना (पूर्णतः परख के देखना)-आधुनिक युग में नौकरों को ठोक बजाकर ही काम पर रखना चाहिये।
(164) डंके की चोट पर कहना (खुलेआम दृढ़तापूर्वक कहना)-प्रत्येक भारतीय डंके की चोट पर कहता है कि कश्मीर हमारा है।
(165) डींग हाँकना (झूठी शेखी बघारना)-बहुत से लोगों की व्यर्थ में ही डींग मारने की आदत होती है।
(166) ढिंढोरा पीटना (व्यर्थ प्रचार करना)-नौकरी मिलने से पूर्व ही मोहन ने ढिंढोरा पीटना प्रारम्भ कर दिया कि वह एक उच्च अधिकारी बन गया है।
(167) ढोल में पोल होना (सारहीन सिद्ध होना)-आजकल के नेताओं के कथन ढोल में पोल सिद्ध होते हैं।
(168) ढाल बनना (सहारा बनना)-पत्नी के लिये पति ढाल के समान होता है।।
(169) दुलमुल होना (अनिश्चय)-व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त करनी हो तो ढुलमुल नीति से नहीं चलना चाहिये।
(170) ढील देना (छूट देना)-माता-पिता द्वारा बच्चों को अधिक ढील देना हानिकारक सहा

(171) तलवे चाटना (खुशामद)-आजकल बहुत से लोग दूसरों के तलवे चाटकर अपना काम बना लेते हैं।
(172) तारे गिनना (नींद न आना)-सीताजी राम के विरह में तारे गिन-गिन कर अपना समय व्यतीत करती थीं।
(173) तिल का ताड़ बनाना (छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना)-राम ने मोहन से कहा तुमने तिल का ताड़ बनाकर बने काम को बिगाड़ दिया।
(174) तिलांजलि देना (पूरी तरह त्याग देना)-झूठ को तिलांजलि देना सफलता का द्योतक है।
(175) तितर-बितर होना (अलग-अलग होना)-पुलिस को देखकर जुआरी तितर-बितर हो गये।
(176) तीन तेरह होना (तितर-बितर होना)-पिता की मृत्यु के उपरान्त सम्पूर्ण परिवार तीन तेरह हो गया। [2013]
(177) तूती बोलना (अधिक प्रभावशाली होना)-.-आजकल देश में आतंकवादियों की तूती बोल रही है।
(178) थूक कर चाटना (बात कहकर मुकर जाना)-पाकिस्तानी शासकों का स्वभाव थूक कर चाटने जैसा है।
(179) दम मारना (थोड़ा विश्राम करना)-परीक्षा समाप्त होने के उपरान्त विद्यार्थियों को दम मारने की फुरसत मिली।
(180) माथा ठनकना (पहले से ही विपरीत बात होने की आशंका)–पिता को अत्यधिक रोगग्रस्त देखकर मृत्यु की आशंका से पुत्र का माथा ठनक गया।

(181) कपाल क्रिया करना (मार डालना)-वीर युद्धभूमि में शत्रुओं की कपाल क्रिया करके ही चैन की साँस लेते हैं।
(182) भाग्य फूटना (दुर्भाग्य का आना)-एकमात्र पुत्र का निधन होने पर उसकी माँ के भाग्य ही फूट गये।
(183) नमक हलाली करना (ईमानदारी बरतना)-स्वामिभक्त सेवक नमक हलाली करके अपनी वफादारी का परिचय देते हैं।
(184) बाल-बाल बचना (परेशानी आने से बचना)-ट्रक की चपेट में आने पर भी वह मौत से बाल-बाल बच गया।
(185) नाक भौं सिकोड़ना (अप्रसन्नता प्रकट करना)-जरा-जरा सी बात पर नाक भौं सिकोड़ना उचित नहीं है।
(186) छोटे मुँह बड़ी बात (सीमा से अधिक कहना)-स्वामी ने नौकर से कहा छोटे मुँह बड़ी बात अच्छी नहीं होती।
(187) दाँतों तले उँगली दबाना (चकित होना) ताजमहल के सौन्दर्य को देखकर विदेशी दाँतों तले उँगली दबाते हैं।
(188) अँगुली उठाना (दोषारोपण करना)-बिना सोचे-समझे दूसरों पर अंगुली उठाकर लोग अपने दोषों पर पर्दा डालते हैं।
(189) ऐड़ी-चोटी का पसीना एक करना (भरपूर परिश्रम करना)-परीक्षा के समय छात्र ऐड़ी-चोटी का पसीना एक करके ही दम लेते हैं।
(190) गढ़े मुर्दे उखाड़ना (बीती बातें याद करना)-बहुत से लोगों का स्वभाव गढ़े मुर्दे उखाड़ना होता है।

(191) अंधेर मचाना (खुला अन्याय करना)-आजकल आतंकवादियों ने अंधेर मचा रखा है।
(192) अन्धा धन्ध (बिना रोक-टोक के)-अन्धा धुन्ध वाहन चलाने के कारण दुर्घटनाएँ घटित हो रही हैं।
(193) अपनी पड़ना (अपनी चिन्ता)-भूकम्प आने पर सबको अपनी-अपनी पड़ रही थी।
(194) अचकचाना (भ्रमित होना)-मानसिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्ति प्रत्येक कार्य में अचकचाते रहते हैं।
(195) उखाड़-पछाड़ करना (आगे-पीछे की बातों को याद करके संघर्ष करना) उखाड़-पछाड़ करने से झगड़ा शान्त होने के बजाय और बढ़ जाता है।
(196) उठान रखना (पूर्ण प्रयास करना)-विपत्ति के समय उठान रखकर ही व्यक्ति को विपत्ति से मुक्ति मिलती है।
(197) कलेजा मुँह को आना (अत्यधिक दुःखी होना)-श्रवण कुमार की मृत्यु का समाचार सुनकर उसके माँ-बाप का कलेजा मुँह को आ गया।
(198) कलेजे पर हाथ रखना (अपने आप विचार करना)-विपत्ति पड़ने पर मोहन ने सोहन से कहा कि तुम अपने कलेजे पर हाथ रखकर देखो तब पता चलेगा।
(199) कान खड़े होना (सतर्क होना)-पुलिस के आने पर चारों के कान खड़े हो गये।
(200) काम आना (युद्ध में वीर गति को प्राप्त होना)-देश के वीर युद्धभूमि में काम आकर अमर हो जाते हैं।

(201) घमण्ड चूर करना (परास्त करना)-कारगिल के छद्म युद्ध में भारत ने पाकिस्तान का घमण्ड चूर कर दिया। [2015]
(202) मुँह छिपाना (काम से भागना)-राष्ट्रीय हित में प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्य से मुँह नहीं छिपाना चाहिए। [2015]
(203) राह पर चलना (ठीक व्यवहार करना)-जीवन में मिली एक असफलता ने सुरेश को राह पर चलना सिखा दिया। [2015]
(204) हार न मानना (डटे रहना)-युद्धभूमि में भारतीय बहादुर सैनिक कभी भी हार नहीं मानते हैं। [2017]

(ख) लोकोक्ति या कहावतें

मनुष्य का जीवन अनुभवों से भरा है। कभी-कभी एक ही अनुभव कई लोगों को होता है और उनके मुँह से जो बातें निकलती हैं वे प्रचलित होकर कहावत बन जाती हैं। लोक + उक्ति = लोकोक्ति, लोगों द्वारा कहा गया कथन है। ये लोकोक्तियाँ प्रायः नीति, व्यंग्य, चेतावनी, उपालम्भ आदि से सम्बन्धित होती हैं। अपनी बात की पुष्टि के लिए लोग लोकोक्ति का सहारा लेते हैं। कभी-कभी बिना असली बात कहे हुए भी लोग लोकोक्ति बोल देते हैं और वास्तविक अर्थ प्रसंग से समझ लिया जाता है।

लोकोक्तियाँ मुहावरे की अपेक्षा विस्तृत होती हैं। ये क्रियार्थक नहीं होती। ये अविकारी होती हैं, इन्हें लिंग, वचन के अनुसार बदलते नहीं हैं। इन्हें वाक्यों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। ये वाक्य रूप में ही अपने आप में पूर्ण होती हैं। लोकोक्तियाँ लेखकों के लेखन या भाषणकर्ताओं से निसृत होकर प्रचलित होती हैं। लोकोक्ति साहित्य का गौरव है। इन्हें समझने के लिए इनका सही अर्थ जानना आवश्यक है, तभी इनका प्रयोग सफल होगा।

लोकोक्ति का प्रयोग करते समय इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
(1) लोकोक्ति पढ़ते-पढ़ते ऐसे विस्तृत अनुभव को पकड़ने का प्रयास करना चाहिए, जिसका प्रतिनिधि बनकर लोकोक्ति का शब्द और अर्थ प्रयोग में लाया जाये।
(2) उस अनुभव वाले अर्थ को संक्षिप्त में एक वाक्य में स्पष्ट कर देना चाहिए।
(3) वर्तमान परिस्थिति में उस अनुभव को घटित करने वाली घटना और लोकोक्ति के अनुभव वाले अर्थ को फिर देख लेना चाहिए कि दोनों समानता रखते हों।
(4) अब उक्त घटना को एक या दो वाक्यों में लिखकर उसके अन्त में समर्थन रूप में लोकोक्ति लिखनी चाहिए।

इसी प्रकार कुछ लोकोक्तियाँ और उनके अर्थ इस प्रकार हैं-
(1) अपना हाथ जगन्नाथ-अपने हाथ से काम करने में ईश्वरीय शक्ति है।
(2) अपने मरे सरग दिखता है स्वयं कार्य करने से ही काम बनता है।।
(3) अपने लड़के को काना कौन कहता है अपनी वस्तु सभी को सुन्दर लगती है।
(4) अपना दाम खोटा तो परखैया क्या करे-जब स्वयं में दोष हो तो दूसरे भी बुरा कहेंगे।
(5) अपनी करनी पार उतरनी-अपने ही परिश्रम से सफलता मिलती है।
(6) अपनी ढपली अपना राग-अपनी ही बातों को महत्ता देना।
(7) अपने ही शालिग्राम डिब्बे में नहीं समाते-जो अपना ही काम पूरी तरह नहीं कर पाता, वह दूसरों की क्या मदद करेगा।
(8) अन्धी पीसे कुत्ता खाय-नासमझ के कामों का लाभ चतुर उठाते हैं।
(9) अतिसय रगर करे जो कोई, अनल प्रकट चन्दन ते होई अधिक परिश्रम से कठिन काम भी सिद्ध होते हैं या अधिक छेड़ने से शान्त पुरुष भी गरम हो जाता है।
(10) अब पछताय होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत-हानि होने से पहले रक्षा का प्रबन्ध करना चाहिए।

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(11) अन्धा क्या चाहे दो आँखें-मनचाही वस्तु देने वाले से और कुछ नहीं चाहिए।
(12) अक्ल बड़ी या भैंस (वयस = उम्र)-उम्र के बड़प्पन से बुद्धि की श्रेष्ठता अधिक अच्छी है।
(13) आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास-ऊँचे उद्देश्य की तैयारी करके साधारण काम में जुट जाना।
(14) आम के आम गुठलियों के दाम-किसी वस्तु से दुहरा लाभ होना।
(15) आँख का अन्धा गाँठ का पूरा-नासमझ धनी पुरुष जो ठगी में पड़कर हानि उठाता है।
(16) आँख के अन्धे नाम नयनसुख-ऊँचा पद और प्रसिद्धि पाने पर भी उतनी योग्यता न रखना।
(17) आधी रात खाँसी आए, शाम से मुँह फैलाये काम का समय आने के बहुत पहले से ही चिन्ता करने लगना।
(18) आधा तेल आधा पानी-ऐसी मिलावट जो अनुपयोगी हो।
(19) इधर कुआँ उधर खाई दुविधा की स्थिति। दोनों तरफ से हानि की सम्भावना।
(20) ईश्वर देता है तो छप्पर फाड़ के अकस्मात् अत्यधिक लाभ हो जाना।

(21) उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे-अनुचित काम करके भी न दबना।
(22) ऊखल में सिर देकर मूसलों का क्या डर-एक बार किसी मार्ग पर चल पड़ो तो फिर संकटों से घबराना नहीं चाहिए।
(23) ऊसर में मूसर-व्यर्थ ही बीच में अड़ना।
(24) एक साधै, सब सधै, सब साधै सब जाय-एक ही काम मन लगाकर करना चाहिए, यदि निश्चय डिग गया तो सब नष्ट हो जायेगा।
(25) एक चना क्या भाड़ फोड़ेगा-अकेला व्यक्ति बड़ी योजना सफल नहीं बना पाता।
(26) एक हाथ से ताली नहीं बजती-लड़ाई या मित्रता अकेले सम्भव नहीं।
(27) एक मछली सारे तालाब को गन्दा करती है एक के दुष्कर्म से सहकर्मी बदनाम होते हैं।
(28) ओछे की प्रीति बालू की भीति-तुच्छ व्यक्ति की मित्रता स्थायी नहीं होती।
(29) आधी छोड़ सबको धावै, आधी जाय न सबरी पावै-लालची व्यक्ति के हाथ कुछ नहीं आता।
(30) काठ के उल्लू-निकम्मा आदमी, किसी काम का नहीं।

(31) कर नहीं तो डर नहीं-बुरा न किया तो किसी से डरना कैसा।
(32) कड़वा करेला नीम चढ़ा-दुष्ट व्यक्ति को दुष्ट की संगति मिल जाये तो वह और अधिक दुष्ट हो जाता है।
(33) कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा-इधर-उधर की वस्तुओं से काम चलाना।
(34) काम परै कछु और है, काम सरै कुछ और-स्वार्थ पूरा होने पर आदमी बदल जाता है।
(35) काजी घर के चूहे सयाने चतुर लोगों की संगति में छोटे लोग भी चतुराई सीख जाते हैं।
(36) काजर की कोठरी में कैसहू सयानो जाय, एक लीक काजर को लागि है सो लागि है-कुसंगति से कुछ न कुछ हानि अवश्य होती है।
(37) कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर सभी को सभी से काम पड़ता है।
(38) खोदा पहाड़ निकली चुहिया-बड़े श्रम से थोड़ा लाभ।
(39) खरगोश के सींग-असम्भव बात, जो न देखी न सुनी।
(40) गुरु गुड़ हो रहे चेला शक्कर हो गये-जिससे कोई गुण सीखा हो, उसकी अपेक्षा अधिक चतुराई दिखाना।
(41) घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध-समीप रहने वाले गुणी को लोग महत्त्व नहीं देते, दूर वाले को सम्मान करते हैं।
(42) गिलोय और नीम चढ़ी-दुर्गुणों में और वृद्धि हो जाना, दो-दो दुर्गुण।

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MP Board Class 11th Special Hindi विराम चिह्नों का उपयोग

MP Board Class 11th Special Hindi विराम चिह्नों का उपयोग

1. विराम चिह्नों का उपयोग :

बोलना एक विशिष्ट कला है, जिसका आवश्यक गुण यह है कि सुनने वाला या सुनने वाले बोलने वाले के भाव को अच्छी तरह समझ सकें। इसके लिए यह अनिवार्य है कि बोलने वाला बीच-बीच में आवश्यकतानुसार कुछ-कुछ ठहरकर बोले। यही क्रम बोलने में होता भी है। वह किसी पद, वाक्यांश या वाक्य को बोलते समय ठहरता जाता है। इस विश्राम को व्याकरण में ‘विराम’ कहते हैं। लिखते समय ऐसे स्थानों पर कुछ चिह्न लगा दिये जाते हैं। इन चिह्नों को ‘विराम चिह्न’ कहते हैं। शाब्दिक अर्थ के अनुसार ‘विराम’ का अर्थ है रुकाव, ठहराव अथवा विश्राम। बोलने में कहीं कम समय लगता है और कहीं ज्यादा। इसी दृष्टि से चिह्न भी कम समय और अधिक समय के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ और भी चिह्न होते हैं, जिनका अध्ययन साहित्य के विद्यार्थी के लिए अत्यन्त अनिवार्य है।

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चिह्नों का महत्त्व इतना अधिक है कि भूल से गलत स्थान पर चिह्न लगा देने से वाक्य का अर्थ बदल जाता है, अतः चिह्न लगाने में पूर्ण सावधानी रखना आवश्यक है, जैसे
रुको मत जाओ। (कोई चिह्न नहीं) रुको, मत जाओ। (जाने का निषेध)

राष्ट्र भाषा हिन्दी में आजकल उसके विकास के साथ-साथ विराम चिह्नों की संख्या और प्रयोग बढ़ता जा रहा है। प्रमुख विराम चिह्न जिनका आजकल प्रयोग बहुतायत से होता है, निम्नानुसार हैं
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MP Board Class 11th Special Hindi विराम चिह्नों का उपयोग img 2

(1) अल्प विराम (,)
यह चिह्न उस स्थान पर लगाया जाता है, जहाँ वक्ता बहुत ही थोड़े समय के लिए रुके। जैसे
हेमलता, शारदा, वेदश्री और जयश्री उज्जैन, देवास और महू होकर आज ही लौटी हैं। वह आयेगा, परन्तु रुकेगा नहीं।

(2) अर्द्ध विराम (;)
अर्द्ध विराम के चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि अल्प विराम से कुछ अधिक समय तक रुकना हो। इसका प्रयोग प्राय: दो स्वतन्त्र उपवाक्यों को अलग करने के लिए किया जाता है। जैसे
मैंने गोली चलने की आवाज सुनी; चार पक्षी फड़फड़ाकर जमीन पर गिर पड़े।

(3) पूर्ण विराम (।)
वाक्य पूरा होने पर कुछ अधिक समय के लिए रुकना होता है, इसलिए प्रत्येक वाक्य की पूर्णता पर इस चिह्न का प्रयोग करते हैं। जैसे
बांग्लादेश आजाद हो गया।

संकेत-कुछ लोग इस चिह्न को पूर्ण विराम के स्थान पर केवल ‘विराम’ कहते हैं और पूर्ण विराम के चिह्न दो खड़ी लकीर ( ॥) को मानते हैं। साधारणतः दो खड़ी लकीर वाले इस चिह्न का प्रयोग पद्य की पूर्णता पर किया जाता है। जैसे

देख्यो रूप अपार, मोहन सुन्दर श्याम को।
वह ब्रज राजकुमार, हिय-जिय नैनन में बस्यो।।

(4) प्रश्न चिह्न (?)
प्रश्नवाचक चिह्न, प्रश्नसूचक वाक्यों के अन्त में पूर्ण विराम के स्थान पर आता है। जैसे
1. यह किसका घर है?
2. वह कहाँ जा रहा है?

(5) विस्मयादि बोधक चिह्न (!)
इस चिह्न का प्रयोग विस्मयादि सूचक शब्दों या वाक्यों के अन्त में किया जाता है। सम्बोधन कारक की संज्ञा के अन्त में भी इसे लगाया जाता है। जैसे
1. अरे ! वहाँ कौन खड़ा है।
2. हाय ! इसका बुरा हुआ।
3. हे ईश्वर ! उसकी रक्षा करो।

(6) संयोजक चिह्न (-)
इसे सामासिक चिह्न भी कहते हैं। इस चिह्न का प्रयोग सामासिक शब्दों के मध्य में होता है। जैसे
हे ! हर-हार-अहार-सुत, मैं विनवत हूँ तोय।

(7) निर्देशक चिह्न (-) (:-)
इस चिह्न का दूसरा नाम विवरण चिह्न भी है। इसका प्रयोग उस स्थिति में किया जाता है, जबकि किसी वाक्य के आगे कई बातें क्रम से लिखी जाती हैं। इसे आदेश चिह्न भी कहते हैं।
निम्नलिखित शब्दों की परिभाषा लिखो
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया। कभी-कभी (:-)
इस चिह्न के स्थान पर डेश (-) का भी प्रयोग कर लिया जाता है।

(8) कोष्ठक ()[ ]
कोष्ठक का प्रयोग निम्न प्रकार से किया जाता है
1. किसी विषय के क्रम बतलाने के लिए अक्षरों या अंकों के साथ इसका प्रयोग होता है। जैसे
(क) व्यक्ति वाचक संख्या।
(ख) जाति वाचक संख्या।
(1) एशिया
(2) यूरोप

2. वाक्य के मध्य में किसी शब्द के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इसका प्रयोग होता है।
जैसे- हे कोन्तेय, (अर्जुन) तू क्लेव्यता (कायरता) को प्राप्त न हो।

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3. नाटकों में अभिनय को प्रकट करने के लिए भी कोष्ठकों का प्रयोग किया जाता है।
जैसे- महाराणा प्रताप-(क्रोध से) नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता।
मानसिंह-(नम्रता से) राणा ! हठ न करो। बात के मान लेने में तुम्हारा हित है।

(9) उद्धरण या अवतरण चिह्न ()(“”)
हिन्दी में इस चिह्न के अन्य नाम भी हैं। जैसे-उल्टा विराम, युगल-पाश, आदि। इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है जबकि किसी व्यक्ति की बात या कथन को उसी के शब्दों में लिखना होता है। यह चिह्न वाक्य के आदि और अन्त में लगाया जाता है। इकहरे और दोहरे चिह्नों में यह अन्तर है कि जब किसी उद्धरण को लिखना होता है तो दोहरे चिह्न लगाये जाते हैं, किन्तु वाक्य के मध्य में यदि आवश्यकता हुई तो इकहरे उद्धरण चिह्न को लगाया जाता है।

जैसे-
अकबर ने उस दिन प्रार्थना के स्वर में कहा, “हे विश्वनियन्ता ! तू सत्य है; तू ही राम; तू ही रहीम है।” उसने आगे कहा, “दुनिया में सच्चा ईमान ‘मानव धर्म’ है।”

(10) लोप निर्देशक चिह्न (x x x) (………)
इन चिह्नों का प्रयोग तब होता है, जबकि कोई लेखक किसी का उद्धरण देते समय कुछ अंश छोड़ना चाहता है। इनका प्रयोग निम्नानुसार किया जाता है

1. उस स्थिति में जबकि लेखक किसी लम्बे विवरण को छोड़कर आगे की बात लिखना चाहता है, तब वह चार-पाँच ऐसे निशान लगा देता है। जैसे
आग का वह दृश्य क्या था, सर्वस्व नाश की विभीषिका थी। चारों ओर से लोग दौड़ रहे थे। x x x सम्पूर्ण गाँव जलकर स्वाहा हो गया।

2. जब कुछ शब्द या वाक्य छोड़ने होते हैं, तो ‘……….’ इसका प्रयोग करते हैं। जैसे-मुम्बई ………… नगर है। रिक्त स्थान की पूर्ति करो।

(11) आदेश चिह्न (: -)
जब प्रश्न न पूछा जाकर आदेश दिया जाये वहाँ आदेश चिह्न लगाया जाता है, जैसे-किन्हीं पाँच चीनी यात्रियों का नाम लिखिए :

(12) लाघव चिह्न (०)
जब किसी प्रसिद्ध शब्द को पूरा न लिखकर संक्षेप में लिखा जाता है, तब उसका प्रारम्भिक अक्षर लिखकर लाघव चिह्न (०) लगा दिया जाता है। जैसे
हिन्दी साहित्य सम्मेलन-हि० सा० स०
मध्य प्रदेश राज्य-म० प्र० राज्य
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी-ना० प्र० सं०, काशी

(13) हंस पद (^)
इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि कोई शब्द या बात वाक्य लिखते समय मध्य में छूट जाय। उस स्थिति में नीचे इस चिह्न को लगाकर ऊपर वह शब्द लिख दिया जाता है। जैसे
वह
“मैंने पास जाकर देखा ^ गुलाब का फूल था।”

(14) बराबर सूचक चिह्न (=)
इस चिह्न को तुल्यता सूचक चिह्न भी कहते हैं। इसका प्रयोग समानता दिखलाने के लिए किया जाता है। जैसे-
विद्या + आलय = विद्यालय

(15) पुनरुक्ति बोध चिह्न (,)
उस स्थिति में जबकि ऊपर कही हुई बात अथवा शब्द को नीचे की ओर उसी रूप में लिखना होता है, तो इस चिह्न को लगा देते हैं, जिसका मतलब होता है-‘यह वही शब्द है जो
ऊपर लिखा हुआ है। जैसे
5 आदमी एक काम 15 दिन में करते हैं-
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(16) समाप्ति सूचक चिह्न (- : x : -)
इस चिह्न का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि कोई लेख, अध्याय, परिच्छेद, पुस्तक आदि समाप्त हो गई हो। जैसे-
और इस प्रकार भारत देश आजाद हुआ।
– : x : –

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MP Board Class 11th Special Hindi निबन्ध-लेखन

MP Board Class 11th Special Hindi निबन्ध-लेखन

रचना का अर्थ होता है किसी चीज का स्वयं निर्माण। कक्षा 11वीं के उच्चतर माध्यमिक स्तर पर हिन्दी (विशिष्ट) के शिक्षण का उद्देश्य छात्रों में विविध व्यवहारों सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने का विकास करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिखने की क्षमता का समुचित विकास करने के लिए रचना का प्रावधान है।

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इस स्तर तक आते-आते छात्र का शब्द-भण्डार, भाषा सम्बन्धी ज्ञान तथा अन्य साहित्यिक विधाओं की जानकारी पर्याप्त हो जाती है और वह स्वतन्त्र लेखन में सक्षम हो जाता है। अतएव स्तरानुकूल रचना-कौशल के विकास के लिए तथा उदात्त भावों और सद्वृत्तियों के विकास के लिए रचना का पाठ्यक्रम में समावेश किया जाता है।

निबन्ध क्या है?

निबन्ध आधुनिक साहित्य की अत्यन्त लोकप्रिय गद्य-विधा है। अंग्रेजी में इसे ‘Essay’ कहते हैं, जो ‘एसाई’ शब्द से बना है। इस शब्द का अंग्रेजी में अर्थ होता है. अपने मन के भावों को व्यक्त करने का प्रयास करना। निबन्ध मन की एक शिथिल विचार तरंग है, जो असंगठित, अपूर्व और अव्यवस्थित होती है। इसे जब व्यवस्थित रूप में संगतिपूर्ण शब्दों के माध्यम से लिपिबद्ध किया जाता है, तब यह निबन्ध होता है। लेखक के मन की विशेष भाव-श्रृंखला की अभिव्यक्ति ही निबन्ध है। सभी व्यक्तित्व भिन्न-भिन्न प्रकृति के होते हैं और उनकी अपनी-अपनी शैली होती है। शैली में व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक होती है। इसीलिए एक ही विषय पर लोग भिन्न-भिन्न प्रकार से विचार व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि निबन्ध को हम सीमित नहीं कर सकते कि अमुक विषय पर बस इसी एक ही प्रकार से निबन्ध लिखा जाये। प्रत्येक छात्र की उस समय की मनोदशा, उसका अपना अनुभव, अपनी भाषा-शैली और व्यक्तित्व तथा शब्द-चयन निबन्ध में व्यक्त होता है। छात्र विशेष को शब्द-योजना और वाक्य-रचना का किस सीमा तक ज्ञान है, क्या वह मुहावरेदार भाषा का प्रयोग करता है या सरल भाषा का, यह सब व्यक्ति-विशेष पर निर्भर करता है।

निबन्ध विद्यार्थियों के भाषा-ज्ञान को परखने की कसौटी है। निबन्ध ही परीक्षा का वह प्रश्न है जिससे बालक की लेखन-शैली के कौशल का विकास परखा जाता है। परीक्षक यह देखना चाहता है कि अपने ज्ञान को संयोजित कर छात्र किस प्रकार उसे सरस, व्यवस्थित प्रभावशाली भाषा-शैली में व्यक्त कर सकता है।

छात्रों को यह जानना अति आवश्यक है कि वे सीमित समय में सीमित शब्दों में अच्छा निबन्ध किस प्रकार लिखें।

निबन्ध-लेखन 483 हम अच्छा निबन्ध कैसे लिखें? निबन्ध लिखने में मुख्य रूप से हमें विचार-समूह अर्थात् आधार-सामग्री पर ध्यान देना आवश्यक है और फिर भाषा-शैली तथा वाक्य-गठन भी भावानुकूल होना चाहिए।

निबन्ध लिखने के पहले हमें भली-भाँति विषय का सही चुनाव करना चाहिए। ऐसा विषय चुनना चाहिए जिसके बारे में भली-भाँति जानकारी हो। निबन्ध की भाषा रोचक होनी चाहिए। भाषा में प्रवाह और बोधगम्यता होनी चाहिए।

सबसे पहले हमें निबन्ध की रूपरेखा सुव्यवस्थित रोचक ढंग से तैयार कर लेनी चाहिए। रूपरेखा पूरी बन जाने के बाद उसके आधार पर निबन्ध लिखना चाहिए।

भाषा-लेखन में सतर्कतापूर्वक वर्तनी की अशुद्धियों पर विशेष ध्यान देकर शुद्ध लिखना चाहिए। विराम चिह्नों का समुचित प्रयोग आवश्यक है। निबन्ध में आवश्यकतानुसार अनुच्छेद का परिवर्तन एक भाव या विचार समाप्त होने पर करना चाहिए। एक बिन्दु को एक अनुच्छेद में पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करना चाहिए। निबन्ध के बीच-बीच में अपनी बात की पुष्टि के लिए या विचारों में दृढ़ता लाने के लिए प्रमाणस्वरूप यथास्थान विद्वानों के उद्धरण चाहे वे किसी भी भाषा में हों ज्यों के त्यों लिखना चाहिए। उद्धरण को अवतरण चिह्न “…………..।” के मध्य मूल भाषा में ही लिखना चाहिए। यदि मूल रूप से याद न हो तो विद्वानों के उन विचारों को अपनी भाषा में भी लिख सकते हैं, तब अवतरण चिह्न का प्रयोग न करें।

भाषा के प्रयोग में एक आवश्यक सावधानी रखें कि किसी भी शब्द. या वाक्य की पुनरावृत्ति न हो, अन्यथा भाषा का लालित्य समाप्त होकर निबन्ध प्रभावशाली नहीं रह पायेगा।
निबन्ध के अंग ये मुख्य रूप से तीन होते हैं—
(1) प्रस्तावना,
(2) विषय-विस्तार और
(3) उपसंहार।

(1) प्रस्तावना-प्रायः छात्रों को यह दुविधा रहती है कि निबन्ध किस प्रकार प्रारम्भ करें। अतएव अच्छे आरम्भ के लिए कुछ बातें ध्यान में रखें क्योंकि यदि प्रारम्भ ही गलत दिशा में हो गया तो पूरे निबन्ध का ढाँचा बिगड़ जाता है।

प्रारम्भ यदि किसी विद्वान के उद्धरण से करें तः उचित होता है। प्रारम्भ में किस विषय पर आप निबन्ध लिख रहे हैं वह क्या है? उसकी परिभाषा या विषय का स्पष्टीकरण और उसके स्वरूप का विवेचन कर दें। उस समय विशेष का हमारे जीवन में, हमारे समाज में या वर्तमान सन्दर्भो में उसकी क्या समसामयिक उपयोगिता है? यह लिखें। फिर प्राचीनकाल में इस सम्बन्ध में क्या विचार थे या क्या स्थिति थी और उसमें क्यों और कैसे परिवर्तन आया? यह लिखें।

(2) विषय-विस्तार—प्रस्तावना की सृष्टि होने पर हम निबन्ध के विषय के जितने क्षेत्र और पक्ष हो सकते हैं, उनके आधार पर निबन्ध आगे बढ़ाते हैं। इसमें भी पुनरावृत्ति से बचना चाहिए। एक स्वतन्त्र बात या विचार को एक अनुच्छेद में रखें। विषय से सम्बन्धित जो भी बात हो, वह छूटने न पाये। विषय के बारे में जो भी जानकारी हो, वह व्यवस्थित रूप में लिखनी चाहिए। किसी भी विषय के बारे में उसके भूतकाल, वर्तमान स्वरूप और भविष्य की क्या रूपरेखा होगी, यह लिख देना चाहिए। उदाहरण के लिए विज्ञान के विषय में प्राचीनकाल में उसकी क्या स्थिति थी। वर्तमान समय में उसकी क्या गतिविधि है और जीवन को क्या लाभ है? यह लिखकर भविष्य की सम्भावनाएँ लिख देनी चाहिए। इस प्रकार आसानी से किसी भी विषय पर निबन्ध लिखा जा सकता है। भाषा-शैली रोचक होनी चाहिए। महापुरुषों के उद्धरण भी लिख देने चाहिए। उससे हमारी बात में दृढ़ता आ जाती है।

निबन्ध के मध्य में ही लेखक पाठक को अपने तर्क समझाने का प्रयत्न करता है। यही भाग निबन्ध का सबसे अधिक विस्तृत भाग होता है। प्रारम्भ से इस भाग का सम्बन्धित होना
आवश्यक है और इसके सभी सिद्धान्त वाक्य अन्त की ओर उन्मुख होने चाहिए।

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(3) उपसंहार-यह निबन्ध का अन्तिम भाग है। लेखक को यह भाग अति सावधानी से पूरा करना चाहिए। उपसंहार की सफलता पर,ही निबन्ध की सफलता निर्भर करती है। भूमिका के समान ही उपसंहार का महत्त्व होता है। निबन्ध का उपसंहार आकर्षक और सारगर्भित होना चाहिए। हमें निबन्ध का अन्त वहाँ करना चाहिए, जहाँ विषय का विवेचन हमारी जिज्ञासा को पूरी तरह सन्तुष्ट कर दे। उपसंहार में जो कुछ हमने निबन्ध में लिखा है, उसका सारांश संक्षेप में एक अनुच्छेद में लिखना है।

निबन्ध के अन्तिम अंश में ऐसा न लगे कि निबन्ध अनायास समाप्त हो गया है। निबन्ध के समाप्त होने पर भी लेखक की विचारधारा का मूल भाव पाठक के मन में बार-बार आता रहे। वही सफल अन्त है, जिसमें पढ़ने वाले का ध्यान लेखक के तर्कपूर्ण संगत भावों की ओर आकर्षित हो जाये और वह विषय के गुण-दोष दोनों को जानकर अपना एक मत निश्चित कर सके। पूरे विषय के हानि-लाभ हमें इस अनुच्छेद में लिखकर किसी अच्छे उद्धरण या कविता की पंक्ति या श्लोक की पंक्ति से अपना निबन्ध प्रभावपूर्ण ढंग से समाप्त कर देना चाहिए।

उक्त प्रकार लिखा गया निबन्ध उत्कृष्ट होगा।

निबन्ध के प्रकार प्रमुख रूप से निबन्ध चार प्रकार के होते हैं-
(1) वर्णनात्मक,
(2) विवरणात्मक,
(3) विवेचनात्मक,
(4) आलोचनात्मक।

(1) वर्णनात्मक-वे निबन्ध जिनमें किसी देखी हुई वस्तु या दृश्य का वर्णन होता है उन्हें हम वर्णनात्मक निबन्ध कहते हैं; जैसे—यात्रा, पर्व, मेला, नदी, पर्वत, समुद्र, पशु-पक्षी, ग्राम, रेलवे स्टेशन आदि का वर्णन।
(2) विवरणात्मक-इसका अन्य नाम चरित्रात्मक भी है। इस प्रकार के निबन्धों में ऐतिहासिक घटनाओं, ऐतिहासिक यात्राओं तथा महान् पुरुषों की जीवनियों एवं आत्मकथा आदि का वर्णन होता है।
(3) विवेचनात्मक-इस का अन्य नाम विचारात्मक भी है। इन निबन्धों में विचारों की प्रमुख रूप से प्रधानता होती है। इसीलिये इन्हें विचारात्मक या विवेचनात्मक निबन्ध कहते हैं। इस प्रकार के निबन्धों में भावनात्मक विषयों पर भी लेखनी चलाई जाती है; जैसे—करुणा, क्रोध, श्रद्धा-भक्ति, अहिंसा, सत्संगति, परोपकार आदि विषयों पर लिखे गये निबन्ध इस श्रेणी में
आते हैं।
(4) आलोचनात्मक-इस प्रकार के निबन्धों के अन्तर्गत सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं साहित्यिक समस्त प्रकार के निबन्ध आते हैं। इस प्रकार के निबन्धों में तर्क-वितर्क द्वारा पक्ष-विपक्ष को प्रस्तुत किया जाता है।

समसमायिक समस्याओं से सम्बन्धित निबन्ध में यथा आतंकवाद, महँगाई की समस्या, साम्प्रदायिकता, जनसंख्या विस्फोट, बेरोजगारी एवं आरक्षण आदि की समसमायिक समस्याएँ सम्मिलित हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर आदर्श निबन्ध प्रस्तुत हैं।

1. साहित्य और समाज [2008, 09, 13, 16]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. साहित्य तथा समाज का सम्बन्ध,
  3. समाज का साहित्य पर प्रभाव,
  4. साहित्य का समाज पर प्रभाव,
  5. समाज के उत्थान में साहित्य का योगदान,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-

“अन्धकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है।
मुर्दा है वह देश, जहाँ साहित्य नहीं है।”

जिस प्रकार सूर्य की किरणों से जगत में प्रकाश फैलता है, उसी प्रकार साहित्य के आलोक से समाज में चेतना का संचार होता है। साहित्य ही अज्ञान के अन्धकार को मिटाकर समाज का मार्गदर्शन करता है। बाबू श्यामसुन्दर दास जी का यह कथन सत्य है कि ‘सामाजिक मस्तिष्क अपने पोषण के लिए जो भाव-सामग्री निकाल कर समाज को सौंपता है, उसी के संचित भण्डार का नाम साहित्य है।” साहित्य के अभाव में राष्ट्र एवं समाज शक्तिहीन हो जाते हैं। अत: साहित्य समाज की गतिविधियों को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त साधन है।

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साहित्य तथा समाज का सम्बन्ध साहित्य और समाज का एक-दूसरे से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। साहित्य में मानव समाज के भाव निहित होते हैं। इसी आधार पर कुछ विद्वानों ने साहित्य को ‘समाज का दीपक’, ‘समाज का मस्तिष्क’ और ‘समाज का दर्पण’ माना है। वास्तव में, समाज की प्रबल एवं वेगवती मनोवृत्तियों की झलक साहित्य में दिखायी पड़ती है। विश्व के महान् साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में अपने-अपने समाज का सच्चा स्वरूप अंकित किया है।

समाज का साहित्य पर प्रभाव-समाज का प्रभाव ग्रहण किये बिना आदर्श साहित्य की रचना असम्भव है। साहित्यकार त्रिकालदर्शी होता है, इसलिए वह अतीत के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान का अंकन भविष्य के दिशा निर्देश के लिए करता है। साहित्य में समाज की समस्याएँ और उनके समाधान निहित रहते हैं। अत: साहित्य और समाज दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। सामाजिक परम्पराएँ, घटनाएँ, परिस्थितियाँ आदि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती हैं। साहित्यकार भी समाज का प्राणी है, अत: वह इस प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता है। वह अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील होने के कारण समाज की परिस्थितियों से अधिक प्रभावित होता है। वह जो कुछ समाज में देखता है, उसी को अपने साहित्य में अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार साहित्य समाज से प्रभावित होता है।

साहित्य का समाज पर प्रभाव-किसी भी काल का समाज साहित्य के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। समाज को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साहित्य पर आश्रित रहना पड़ता है। श्रेष्ठ साहित्य समाज के स्वरूप में परिवर्तन कर देता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि-“साहित्य में जो शक्ति छिपी है वह तोप, तलवार और बम के गोले में नहीं पायी जाती है।” समाज का प्रभाव पहले साहित्य पर पड़ता है फिर समाज स्वयं साहित्य से प्रभावित होता है।

हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर दृष्टिपात करने से यह बात स्वयं स्पष्ट हो जाती है। वीरगाथा-काल का वातावरण युद्ध एवं अशान्ति का था। वीरता प्रदर्शन ही जीवन का महत्त्व था। युद्ध अधिकतर विवादों के पीछे होते थे। उस युग के वातावरण के अनुकूल ही चारण कवियों ने काव्य रचना की है। इस काल की प्रधान प्रकृति वीर और श्रृंगार की है। इसीलिए इस साहित्य की रचना हुई। भक्तिकाल के आते-आते विदेशियों का शासन स्थापित हो गया था। धीरे-धीरे भारत की संस्कृति एवं कला ध्वस्त होने लगी थी। निराशा के वातावरण में जनता को भक्ति आन्दोलन की सशक्त लहरी ने जीवनदायिनी शीतलता प्रदान की थी। इस समय की साहित्यधारा ज्ञान और प्रेम के रूप में प्रवाहित हुई। इसी समय में कुछ सन्तों ने राम और कृष्ण के लोकमंगलकारी रूपों के सहारे समाज को धैर्य प्रदान किया। इन कवियों के प्रयत्न से समाज में चेतना का संचार हुआ और निराशा से छुटकारा मिला। रीतिकाल में काव्य का सृजन राज्याश्रय में हो रहा था। दरबारी विलासिता से प्रभावित होकर बिहारी और देव जैसे प्रतिभावान कवि नारी के अंगों के मादक चित्रण करने में लगे थे। समय के अनुरूप विभिन्न प्रकार से कविता-कामिनी अपना श्रृंगार करने लगी थी। आधुनिक काल के आगमन के साथ ही भारतीय समाज पर पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव पड़ा। विज्ञान ने समाज और साहित्य में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिये। नव-जागृति से प्रेरित होकर साहित्य की धारा राष्ट्रीयता एवं समाज सुधार की ओर चल पड़ी। ‘वह हृदय नहीं पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं’ आदि उद्बोधनों ने भारतीयों में राष्ट्रीयता का संचार किया। कवियों की वाणी रोजी, रोटी, शोषण आदि की युगीन समस्याओं को स्वर देने लगी। समाज अपने अनुकूल साहित्य को परिवर्तित करता है तो साहित्य समाज को बदलने की कोशिश करता है।

समाज के उत्थान में साहित्य का योगदान—समाज और जीवन की चिन्ता करने से ही साहित्य में निखार आता है। साहित्य की सार्थकता जीवन के लिए होने में ही निहित है। गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है-

“कीरति भणिति भूति भल सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई।”

समाज की मनोवृत्तियों, परिवर्तनों एवं मान्यताओं का साहित्य पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। किन्तु साहित्यकार को केवल समाज को यथार्थ अभिव्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे यह भी बताना चाहिए कि समाज के आदर्श का स्वरूप क्या है, उसे भविष्य में किस ओर उन्मुख होना है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने साहित्य का आदर्श निश्चित करते हुए लिखा है

“हो रहा है जो जहाँ, वह हो रहा,
यदि वही हमने कहा तो क्या कहा?

किन्तु होना चाहिए कब, क्या कहाँ, व्यक्त करती हैं कला ही वह, वहाँ।” उपसंहार-जीवन में साहित्य की महत्ता अपरिहार्य है। साहित्य मानव-जीवन को वाणी देने के साथ-साथ समाज का पथ-प्रदर्शन भी करता है। साहित्य मानव-जीवन के अतीत का ज्ञान करता है, वर्तमान का चित्रण करता है और भविष्य निर्माण की प्रेरणा देता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि साहित्य और समाज का अटूट सम्बन्ध है।

साहित्य में जो अन्त:पीड़ा एवं हृदय की ठोस प्रतिध्वनित होती है वह जातीय भावों का साकार रूप है।

साहित्य मस्तिष्क का भोजन है। साहित्य मानव की रुचि का पूर्णतः परिष्कार करके उसमें निरन्तर उदात्त मनोवृत्तियों को जाग्रत करता है। जब साहित्य का पतन होने लगता है, तब समाज भी रसातल को चला जाता है। इस प्रकार साहित्य समाज के लिए प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करता है। वह जन-जीवन की विभूति है। उसका ध्येय प्रशंसनीय है। साहित्य सामाजिक परिवर्तन का प्रबल उत्तम साधन है। स्वस्थ साहित्य समाज के मार्गदर्शक का कार्य करता है।

2. वनों का महत्त्व [2010]
अथवा
वृक्षारोपण का महत्त्व रूपरेखा [2017]

  1. प्रस्तावना,
  2. वनों की महिमा,
  3. वनों की उपयोगिता,
  4. वनों का विनाश : एक अशुभ कर्म,
  5. वनों का विकास : समय की पुकार,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-
प्राकृतिक शोभा के अक्षय भण्डार वनों का मानव-जीवन से अटूट सम्बन्ध है। आदिकाल से ही वन मानव-सुख साधनों के स्रोत रहे हैं। आदिम सभ्यता में रहने वाले मानव को संरक्षण और भरण-पोषण में सहयोग देने वाले वन आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी मानव जीवन के साथ सह-अस्तित्व बनाए हुए हैं।

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वनों की महिमा-वनों में धरती तथा वृक्ष हरियाली की चादर ओढ़े रहते हैं। भाँति-भाँति के पक्षियों का कलरव मन-मानस को प्रमुदित करता है। जंगली जीव तथा जानवर वन की गोद में वास करके निर्भयता तथा आनन्द का जीवन बिताते हैं। भारत की सभ्यता तथा संस्कृति का जन्म भी वन की गोद में ही हुआ है। यहाँ वृक्षों की सघन छाया में बैठकर ऋषियों तथा सिद्ध पुरुषों ने ज्ञान के अनमोल रत्न दिये हैं।

वनों को पेड़-पौधों तथा वनस्पतियों का भण्डार मात्र न मानकर सभ्यता के विकास का अमूल्य साधन कहा जा सकता है। इनकी उपयोगिता अनेक रूपों में हमें दिखायी देती है। वैदिक काल में वन-देवता तथा वन-देवियों का वर्णन हुआ है, वनोत्सव तथा वन महोत्सवों का उल्लेख भी किया गया है।

वनों की उपयोगिता वन महोत्सव का आधुनिक अभिप्राय वृक्षारोपण या वृक्ष लगाना है। भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ की कृषि बहुत कुछ वर्षा की अनुकूलता पर निर्भर करती है। वर्षा वनों के कारण ही अधिक होती है। अत: वनों की उपयोगिता इस दृष्टि से स्वतः सिद्ध है।

केवल हमारे देश में ही नहीं, विश्व भर में वृक्षों को आश्रयदाता के रूप में माना जाता है। भारतीय संस्कृति में तो वनों का और भी अधिक महत्त्व है और वृक्षों की पूजा की जाती है, कहा भी गया है-

“तरुवर तास विलंबिये, बारह मास फलंत।
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करत॥”

इसके अतिरिक्त पीपल, बरगद, आँवला, केला, तुलसी आदि की पूजा का भाव सर्वविदित है। विद्वानों ने वृक्षों को मित्र, सहायक और शिक्षक का स्थान दिया है। 1950 ई. में तत्कालीन खाद्य मंत्री श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने जुलाई मास में वन महोत्सव का शुभारम्भ किया था। इस दृष्टि से यह कार्य एक आन्दोलन के रूप में प्रचलित हुआ और प्रतिवर्ष जुलाई मास में वृक्षारोपण का कार्य किया जाने लगा है। इस सम्बन्ध में कुछ नारे भी प्रचलित हुए

“वृक्ष धरा के भूषण हैं, करते दूर प्रदूषण हैं।”
“बंजर धरती करे पुकार, कम बच्चे हों वृक्ष हजार॥”

वनों का विनाश : एक अशुभ कर्म-आधुनिक सुख-सुविधा और विलासिता के मद में मानव वृक्षों की कटाई करके वनों के विनाश में संलग्न हुआ है। यह एक अशुभ कार्य है और मानवता तथा प्राणि-जगत के लिए अमंगलकारी है, क्योंकि वृक्षों का जीवन तो होता ही परोपकार के लिए…”परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।” प्रथम पंचवर्षीय योजना में तीस करोड़ नए वृक्षों के लगाने तथा पुराने वृक्षों और वनों की रक्षा का लक्ष्य था। अत: वनों का संरक्षण आज की एक ज्वलन्त समस्या है और इसके समाधान के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को नए पौधों के आरोपण और वन-सम्पदा के रक्षण का व्रत लेना चाहिए।

वनों का विकास : समय की पुकार–वनों के संरक्षण के साथ-साथ वनों का विकास आज के भौतिकवादी समय की एक पुकार है। इसके लिए वन महोत्सव की उपादेयता एक वरदान है। इससे हमें दो प्रकार के लाभ हैं धार्मिक लाभ एवं भौतिक लाभ। पौराणिक मान्यता के अनुसार, अपने जीवन में पाँच वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति को स्वर्ग-लाभ होता है। भौतिक दृष्टि से वृक्ष हमें प्राण वायु प्रदान करते हैं तथा फल, फूल, गोंद, रबर और जीवनोपयोगी औषधियाँ भी इनसे प्राप्त होती हैं।

जागरूकता शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ जनता में वन महोत्सव के प्रति जागरूकता आती जा रही है। सरकार द्वारा इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं और जन जीवन में भी यह प्रवृत्ति पनपने लगी है। प्रत्येक व्यक्ति का यह एक पुनीत कर्त्तव्य है और मानवता के हित में वन-महोत्सव एक सौभाग्यपूर्ण कदम है।

उपसंहार-वृक्षों का काटना अभिशाप माना जाय। प्रत्येक खाली स्थल पर वृक्षों की हरियाली दृष्टिगोचर हो। हर बगिया में रंग-बिरंगे पुष्प मन का हरण करते हों। कोयल मधुर ध्वनि में वृक्षों पर राग अलापती हो तथा पक्षी कलरव करते हों तभी देश उन्नति के मार्ग पर निरन्तर अग्रसर होगा।

3. इक्कीसवीं सदी का भारत
[2010]

“हाँ ! वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है।
ऐसा पुरातन देश कोई विश्व में क्या और है?”

रूपरेखा

  1. प्रस्तावना,
  2. बीसवीं सदी एवं भारत,
  3. विज्ञान की प्रगति,
  4. भौतिकवाद एवं आध्यात्मवाद का समन्वय,
  5. रोजगारपरक शिक्षा,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना—इक्कीसवीं सदी हमारे देश के लिए सुनहरा अवसर उज्ज्वल भविष्य तथा अनेक आशाओं तथा आकांक्षाओं के दीप सँजोकर लाने के लिए लालायित है। इक्कीसवीं सदी के भारत में शान्ति, प्रेम तथा बन्धुत्व की मंदाकिनी देश के प्रत्येक कोने में प्रवाहित होगी। प्रत्येक भारतवासी के मुख मण्डल पर मुस्कान बिखरी हुई दृष्टिगोचर होगी।

बीसवीं सदी एवं भारत-बीसवीं सदी में भारतवासियों ने गुलामी के घोर कष्टों को भोगा है। अनवरत साधना तथा संघर्ष के पश्चात् स्वतन्त्रता देवी की आरती उतारकर स्वाभिमान तथा आनन्द का अनुभव भी किया है। भारत माता को दो भागों में विभक्त होते हुए भी निहारा है।

विज्ञान की प्रगति-इस दौर में हमारे देश में विज्ञान के क्षेत्र में भी आशातीत सफलता प्राप्त की है। परमाणु शक्ति के क्षेत्र में भी भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरकर सामने आया है।

भौतिकवाद एवं आध्यात्मवाद का समन्वय…इक्कीसवीं सदी के भारत में यहाँ के निवासी भौतिकवाद में उन्नति करने के साथ ही आध्यात्मिकता को भी अपने जीवन में प्रमुख स्थान प्रदान करेंगे।

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इस सदी में यहाँ के नागरिक अपने विचारों को व्यक्त करने में पूर्णरूपेण स्वतन्त्र होंगे। शासक तथा जनता के बीच भेद की खाई नहीं रहेगी। गाँधीजी जिस रामराज्य का सपना सँजोया करते थे, उसे पूर्ण करने का भरसक प्रयास किया जायेगा। जन जीवन से खिलवाड़ करने वाले तथा स्वार्थी राजनीतिज्ञों को दूध से मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया जायेगा।

रोजगारपरक शिक्षा इक्कीसवीं सदी में रोजगारपरक शिक्षा की व्यवस्था होगी। प्रौढ़ शिक्षा तथा बुनियादी शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जायेगा। शिक्षा भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को बढ़ावा देने वाली होगी।

छात्रों के आचार, व्यवहार तथा चरित्र को उन्नत बनाने में भी शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगी।

प्रकृति का पल्लवन-देश को बाढ़, प्रदूषण तथा भूकम्प से बचाने के लिए प्रकृति का पल्लवन करके हरियाली तथा वृक्षों को विशाल पैमाने पर लगाया जायेगा।।

उपसंहार-21वीं सदी का भारत सही अर्थों में भारतीय आदर्शों के अनुरूप होगा, इसमें अपने देश, भाषा, संस्कृति आदि के पुजारी होंगे। ऊँच-नीच, छुआछूत आदि का वहाँ नाम भी न होगा। हर हाथ को काम होगा तथा हर चेहरे पर मुस्कान होगी। यहाँ के निवासी मन, वचन, कर्म की एकरूपता से प्रेरित सद्गुणी तथा सद्कामी होंगे। मेरे सपनों का भारत अनूठा देश होगा।

इसकी गोद में अनेकता में एकता के दर्शन होंगे। “सादा जीवन उच्च विचार” के आदर्श प्रतिष्ठित होंगे। 21वीं सदी के भारत में कोयल अमराई की बगियों में मधुर स्वर में कूहकेगी कि

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।
हम बुलबुले हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा॥”

4. प्रदूषण की समस्या
अथवा
पर्यावरण प्रदूषण [2008, 09]
अथवा
पर्यावरण संरक्षण हमारा दायित्व [2012]
अथवा
पर्यावरण का जीवन में महत्व [2014]

“गंगा का निर्मल जल दूषित हो गया, आसमान जहरीली हवाओं से ओत-प्रोत है, वातावरण विषाक्त है। हवाओं में घुटन तथा जहर घुला है।”

रूपरेखा [2015, 16]

  1. प्रस्तावना,
  2. प्रदूषण का अर्थ एवं अभिप्राय,
  3. प्रदूषण के प्रकार,
  4. प्रदूषण की समस्या का वर्तमान रूप,
  5. प्रदूषण की समस्या की रोकथाम के उपाय,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-विज्ञान की प्रगति ने मानव-जाति को जहाँ अनेक वरदान दिये हैं, वहीं उसके कुछ अभिशाप भी हैं। इन अभिशापों में एक है—प्रदूषण। प्रदूषण की समस्या ने पिछले कुछ वर्षों में इतना उग्र रूप धारण कर लिया है कि इसकी वजह से दुनिया के वैज्ञानिक और विचारक गहरी चिन्ता में पड़ गये हैं। वैज्ञानिकों का विचार है कि इस समस्या का यदि शीघ्र ही कोई हल न खोजा गया तो सम्पूर्ण मानव जाति का विनाश सुनिश्चित है। प्रगति एवं भौतिकवाद की अंधी दौड़ में पर्यावरण प्रतिपल दूषित हो रहा है जो विनाश का सूचक है।

प्रदूषण का अर्थ एवं अभिप्राय प्रदूषण का अर्थ है दोष उत्पन्न होना। इसी आधार पर प्रदूषण शब्द से यहाँ हमारा अभिप्राय है वायु, जल एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक विशेषताओं में अवांछनीय परिवर्तन द्वारा दोष उत्पन्न हो जाना। इसे यों भी समझा जा सकता है कि जब हवा, पानी, मिट्टी, रोशनी, समुद्र, पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और नदी आदि की स्वाभाविक स्थिति में दोष उत्पन्न हो जाता है, तब प्रदूषण की स्थिति बन जाती है। कोयला, पेट्रोलियम आदि ऊर्जा के प्राकृतिक भण्डारों के अत्यधिक प्रयोग से उत्पन्न धुआँ और मलवा वातावरण को दूषित कर प्रदूषण की समस्या को जन्म देता है। प्रदूषण मनुष्यों और सभी प्रकार के जीवधारियों तथा वनस्पतियों के लिए अत्यन्त हानिकारक है।

प्रदूषण के प्रकार-प्रदूषण प्रमुखतः पाँच प्रकार का होता है-

  1. पर्यावरण प्रदूषण,
  2. जल-प्रदूषण,
  3. थल-प्रदूषण,
  4. ध्वनि-प्रदूषण और
  5. रेडियोधर्मी प्रदूषण।

(1) पर्यावरण प्रदूषण पर्यावरण प्रदूषण को वातावरण प्रदूषण भी कहते हैं। वातावरण का अर्थ है-वायु का आवरण। हमारी धरती हर ओर से वायु की एक बहुत मोटी पर्त से ढकी हुई है, जो कुछ ऊँचाई के बाद क्रमशः पतली होती गयी है। यह वायु अनेक प्रकार की गैसों से मिलकर बनी है। ये गैसें वायु में एक निश्चित अनुपात में होती हैं। उनके अनुपात में कोई भी गड़बड़ी प्रकृति और जीवन के सन्तुलन को बिगाड़ सकती है। हम अपनी साँस द्वारा हवा से

ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड बहुत जहरीली गैस होती है। धरती पर यह पेड़-पौधों द्वारा ग्रहण कर ली जाती है। पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को साँस के रूप में ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं। इस प्रकार वायुमण्डल में इन दोनों गैसों का सन्तुलन बना रहता है। वायुमण्डल में किसी कारण से जब कार्बन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों का अनुपात आवश्यकता से अधिक हो जाता है तो वातावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। ईंधनों के जलाये जाने से उत्पन्न धुआँ वातावरण प्रदूषण का मुख्य कारण है।

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पर्यावरण या वातावरण प्रदूषण सभी प्रकार के प्रदूषणों का मुख्य आधार और सर्वाधिक हानिकारक प्रदूषण है। विषैली गैसों की अधिकता के कारण धरती का वायुमण्डल गर्म हो जाता है और धरती के तापमान में वृद्धि हो जाती है। इससे ध्रुवीय बर्फ पिघलने लगती है जिससे समुद्र का स्तर ऊँचा उठ जाता है। इससे समुद्रतटीय नगरों के डूबने और बाढ़ आदि का खतरा पैदा हो जाता है। विषैली हवा में साँस लेने के कारण दमा, तपेदिक और फेफड़ों का कैंसर जैसे भयानक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मनुष्य की जीवनी-शक्ति कम हो जाने के कारण अनेक प्रकार की महामारियाँ आदि फैलती हैं।

(2) जल-प्रदूषण-पानी के दूषित हो जाने को जल-प्रदूषण कहते हैं। जल में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ एक निश्चित अनुपात में होते हैं। जब इनके अनुपात में गड़बड़ हो जाती है और जल में हानिकारक तत्त्वों की संख्या बढ़ जाती है, तब जल-प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जल में मल-मूत्र तथा कल-कारखानों द्वारा दूषित रासायनिक पदार्थों का विसर्जन जल-प्रदूषण उत्पन्न करता है।

जल-प्रदूषण होने से समुद्र, अर्थात् खारे पानी और मीठे पानी का सन्तुलन बिगड़ जाता है। नदियों में बहाये गये हानिकारक रासायनिक तत्त्व समुद्र में पहुँचकर समुद्र के जन्तुओं के लिए संकट उपस्थित कर देते हैं जिससे समुद्र का सन्तुलन बिगड़ जाता है। अशुद्ध जल के प्रयोग से अनेक प्रकार की संक्रामक बीमारियाँ हो जाती हैं और भूमि की उर्वरा-शक्ति कम हो जाती है।

(3) थल-प्रदूषण-मिट्टी में दोष उत्पन्न हो जाना थल-प्रदूषण के अन्तर्गत है। पेड़-पौधों और खाद्य-पदार्थों आदि को कीड़े-मकोड़ों और अन्य जानवरों से बचाने के लिए डी. डी. टी. आदि तथा खेतों में रासायनिक खाद के प्रयोग से थल-प्रदूषण उत्पन्न होता है। इससे धरती की उर्वरा-शक्ति में कमी आ जाती है। प्रयोग करने वाले के भी लिए यह घातक सिद्ध हो सकता है।

(4) ध्वनि-प्रदूषण-ध्वनि सम्बन्धी प्रदूषण को ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं। मोटरकार, स्कूटर, हवाई जहाज आदि वाहनों, मशीनों के इन्जनों और रेडियो तथा लाउडस्पीकर आदि से उत्पन्न होने वाला असहनीय शोर ध्वनि प्रदूषण को जन्म देता है। यह मनुष्य की पाचन-शक्ति पर भी प्रभाव डालता है। इससे ऊँचा सुनना, अनिद्रा और पागलपन तक जैसे रोग हो सकते हैं। जरूरत से ज्यादा शोर दिमागी तनाव को बढ़ाता है।

(5) रेडियोधर्मी प्रदूषण-परमाणु शक्ति के प्रयोग एवं परमाणु विस्फोटों से मलवे के रूप में रेडियोधर्मी कणों का विसर्जन होता है। यही रेडियोधर्मी प्रदूषण को उत्पन्न करता है। जब कोई परमाणु विस्फोट होता है तो बहुत गर्म किरणें निकलती हैं। वे वातावरण में भी रच-बस जाती हैं। उस स्थान की वायु विषैली हो जाती है जो आगे आने वाली संतति तक पर प्रभाव डालती है। इससे वायुमण्डल और मौसमों तक का सन्तुलन बिगड़ जाता है।

प्रदूषण की समस्या का वर्तमान रूप—प्रदूषण की समस्या आधुनिक औद्योगिक एवं वैज्ञानिक युग की देन है। इस समस्या का जन्म औद्योगिक क्रान्ति से हुआ। आज धरती पर लाखों कारखाने वातावरण में विषैली गैसों का विसर्जन कर उसे गन्दा बना रहे हैं। कारखानों और मोटर वाहनों से विसर्जित जहरीली गैसों के कारण पृथ्वी का वायुमण्डल गर्म होता जा रहा है। प्रदूषण अगर इसी तरह बढ़ता गया तो वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन् 2100 तक वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अब से चार गुना हो जायेगी जिससे पृथ्वी का तापमान लगभग 6° से. बढ़ जायेगा। ऐसी स्थिति में ध्रुवीय बर्फ पिघल जायेगी जिससे समुद्र तल ऊँचा हो जायेगा और अनेक समुद्रतटीय नगर डूब जायेंगे। बाढ़े आयेंगी, धरती की उर्वरा-शक्ति कम हो जायेगी और अनेक प्रकार के रोग तथा महामारियाँ फैलेंगी। 20वीं सदी के प्रारम्भ में परमाणु शक्ति के आविष्कार ने प्रदूषण के खतरे को चरम सीमा पर पहुँचा दिया है। पिछले 40 वर्षों के दौरान विश्व में लगभग 1200 परमाणु विस्फोट किये जा चुके हैं। इनके रेडियोधर्मी प्रदूषण से कितनी हानि हो चुकी है, कितनी हो रही है और भविष्य में कितनी हानि होगी, इसका अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है। इन परमाणु विस्फोटों से ऋतुओं का सन्तुलन भी डगमगा गया है। मौसमों का बदलाव आदि इन परमाणु विस्फोटों का ही दुष्परिणाम है। इस प्रकार आज धरती का सारा वातावरण विषाक्त हो चुका है। कल-कारखानों से विसर्जित हानिकारक रासायनिक तत्त्व जल-प्रदूषण उत्पन्न कर रहे हैं जिससे फसलों और जीवों में अनेक प्रकार के रोग पनप रहे हैं। मोटर वाहनों आदि के भयानक शोर ने आदमी का चैन हराम कर दिया है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रदूषण की समस्या आज अपनी चरमसीमा पर है। भारत जैसे विकासशील देश में तो यह समस्या और भी भयावह रूप धारण कर चुकी है।

प्रदूषण की समस्या की रोकथाम के उपाय-आज सारा विश्व प्रदूषण की समस्या से ग्रसित एवं चिन्तित है और हर देश इसकी रोकथाम में लगा हुआ है। ब्रिटेन, अमरीका, फ्रांस आदि विकसित देशों में तेज आवाज करने वाले वाहनों में ध्वनि नियन्त्रक यन्त्र लगाये गये हैं। कारखानों द्वारा विसर्जित हानिकारक रासायनिक तत्त्वों को ये देश नदियों में नहीं बहाते, बल्कि उन्हें नष्ट कर देते हैं। परमाणु विस्फोटों के प्रतिबन्ध और परिसीमा पर भी विश्व में विचार हो रहा है। दुर्भाग्य से भारत जैसे विकासशील देशों में अब भी प्रदूषण की रोकथाम की दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो रहा है। हमारे यहाँ अब भी मल-मूत्र और रासायनिक मलवे को नदियों में बहा दिया जाता है। यहाँ की नदियों के किनारे स्थित स्थान जल-प्रदूषण की समस्या से बुरी तरह ग्रस्त हैं। अन्य प्रकार के प्रदूषण भी हमें आक्रान्त किये हुए हैं।

भोपाल गैस काण्ड भी हमारे समक्ष एक चुनौती के रूप में उपस्थित है जिसमें अनेक लोग मौत की गोद में सो गये।

इस समस्या के निराकरण का सर्वोत्तम साधन वनों की रक्षा और वृक्षारोपण है, क्योंकि पेड़-पौधों से ही ऑक्सीजन और कार्बन-डाइऑक्साइड का सन्तुलन बना रहता है। वृक्षारोपण के अतिरिक्त परमाणु विस्फोटों पर प्रतिबन्ध, कारखानों की चिमनियों में फिल्टर का प्रयोग, मोटर वाहनों में ध्वनि नियन्त्रक यन्त्रों का प्रयोग, मल-मूत्र और कचरे आदि को नदियों में बहाने के स्थान पर उन्हें अन्य तरीकों से नष्ट कर देना आदि वे साधन हैं, जिनसे प्रदूषण की समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।

उपसंहार-प्रदूषण की समस्या आज एक देश की समस्या नहीं, सम्पूर्ण विश्व तथा समूची मानव जाति की है। यदि समय रहते इस समस्या को हल करने के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किये गये तो सम्पूर्ण मानव जाति का भविष्य अन्धकारमय है। भगीरथी प्रयासों के बावजूद इस समस्या के निराकरण के आसार ही दिखाई नहीं दे रहे हैं। पर्यावरण की स्वच्छता में ही मानव की सुख एवं शान्ति निहित है।

5. समाज में नारी का स्थान
अथवा
भारतीय समाज में नारी [2008, 09, 13]

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत पग-पग तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।”

रूपरेखा [2016]-

  1. प्रस्तावना,
  2. प्राचीन भारतीय नारी,
  3. मध्यकाल में नारी की स्थिति,
  4. आधुनिक नारी,
  5. उपसंहार।]

प्रस्तावना-सृष्टि के आदिकाल से ही नारी की महत्ता अक्षुण्ण है। नारी सृजन की पूर्णता है। उसके अभाव में मानवता के विकास की कल्पना असम्भव है। समाज के रचना-विधान में नारी के माँ, प्रेयसी, पुत्री एवं पत्नी अनेक रूप हैं। वह सम परिस्थितियों में देवी है तो विषम परिस्थितियों में दुर्गा भवानी। वह समाज रूपी गाड़ी का एक पहिया है जिसके बिना समग्र जीवन ही पंगु है। सृष्टि चक्र में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं।

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मानव जाति के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होगा कि जीवन में कौटुम्बिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों में प्रारम्भ से ही नारी की अपेक्षा पुरुष का आधिपत्य रहा है। पुरुष ने अपनी इस श्रेष्ठता और शक्ति-सम्पन्नता का लाभ उठाकर स्त्री जाति पर मनमाने अत्याचार किये हैं। उसने नारी की स्वतन्त्रता का अपहरण कर उसे पराधीन बना दिया। सहयोगिनी या सहचरी के स्थान पर उसे अनुचरी बना दिया और स्वयं उसका पति, स्वामी, नाथ, पथ-प्रदर्शक और साक्षात् ईश्वर बन गया। इस प्रकार मानव जाति के इतिहास में नारी की स्थिति दयनीय बन कर रह गयी है। उसकी जीवन धारा रेगिस्तान एवं हरे-भरे बगीचों के मध्य से प्रतिपल प्रवाहमान है।

प्राचीन भारतीय नारी-प्राचीन भारतीय समाज में नारी-जीवन के स्वरूप की व्याख्या करें तो हमें ज्ञात होगा कि वैदिक काल में नारी को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वह सामाजिक धार्मिक और आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में पुरुष के साथ मिलकर कार्य करती थी। रोमशा और लोपामुद्रा आदि अनेक नारियों ने ऋग्वेद के सूत्रों की रचना की थी। रानी कैकेयी ने राजा दशरथ के साथ युद्ध-भूमि में जाकर, उनकी सहायता की। रामायण काल (त्रेता) में भी नारी की महत्ता अक्षुण्ण रही। इस युग में सीता, अनुसुइया एवं सुलोचना आदि आदर्श नारी हुईं। महाभारत काल (द्वापर) में नारी पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने लगीं। इस युग में नारी समस्त गतिविधियों के संचालन की केन्द्रीय बिन्दु थी। द्रोपदी, गान्धारी और कुन्ती इस युग की शक्ति थीं।

मध्यकाल में नारी की स्थिति-मध्य युग तक आते-आते नारी की सामाजिक स्थिति दयनीय बन गयी। भगवान बुद्ध द्वारा नारी को सम्मान दिये जाने पर भी भारतीय समाज में नारी के गौरव का ह्रास होने लगा था। फिर भी वह पुरुष के समान ही सामाजिक कार्यों में भाग लेती थी। सहभागिनी और समानाधिकारिणी का उसका रूप पूरी तरह लुप्त नहीं हो पाया था। मध्यकाल में शासकों की काम-लोलुप दृष्टि से नारी को बचाने के लिए प्रयत्न किये जाने लगे। परिणामस्वरूप उसका अस्तित्व घर की चहारदीवारी तक ही सिमट कर रह गया। वह कन्या रूप में पिता पर, पत्नी के रूप में पति और माँ के रूप में पुत्र पर आश्रित होती चली गयी। यद्यपि इस युग में कुछ नारियाँ अपवाद रूप में शक्ति-सम्पन्न एवं स्वावलम्बी थीं; फिर भी समाज सामान्य नारी को दृढ़ से दृढ़तर बन्धनों में जकड़ता ही चला गया। मध्यकाल में आकर शक्ति स्वरूपा नारी ‘अबला’ बनकर रह गयी। मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

भक्ति काल में नारी जन-जीवन के लिए इतनी तिरस्कृत, क्षुद्र और उपेक्षित बन गयी थी कि कबीर, सूर, तुलसी जैसे महान कवियों ने उसकी संवेदना और सहानुभूति में दो शब्द तक नहीं कहे। कबीर ने नारी को ‘महाविकार’, ‘नागिन’ आदि कहकर उसकी घोर निन्दा की। तुलसी ने नारी को गँवार, शूद्र, पशु के समान ताड़न का अधिकारी कहा

‘ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।’

आधुनिक नारी—आधुनिक काल के आते-आते नारी चेतना का भाव उत्कृष्ट रूप से जाग्रत हुआ। युग-युग की दासता से पीड़ित नारी के प्रति एक व्यापक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाने लगा। बंगाल में राजा राममोहन राय और उत्तर भारत में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने नारी को पुरुषों के अनाचार की छाया से मुक्त करने को क्रान्ति का बिगुल बजाया। अनेक कवियों की वाणी भी इन दु:खी नारियों की सहानुभूति के लिए अवलोकनीय है। कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने तीव्र स्वर में नारी स्वतन्त्रता की माँग की–

“मुक्त करो नारी को मानव, चिर वन्दिनी नारी को।
युग-युग की निर्मम कारा से, जननी, सखि, प्यारी को॥”

आधुनिक युग में नारी को विलासिनी और अनुचरी के स्थान पर देवी, माँ, सहचरी और प्रेयसी के गौरवपूर्ण पद प्राप्त हुए। नारियों ने सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं साहित्यिक सभी क्षेत्रों में आगे बढ़कर कार्य किया। विजयलक्ष्मी पण्डित, कमला नेहरू, सुचेता कृपलानी, सरोजिनी नायडू, इन्दिरा गाँधी, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा आदि के नाम विशेष सम्मानपूर्ण हैं।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत ने नारियों की स्थिति सुधारने के लिए अनेक प्रयत्न किये हैं। हिन्दू विवाह और कानून में सुधार करके उसने नारी और पुरुष को समान भूमि पर लाकर खड़ा कर दिया। दहेज विरोधी कानून बनाकर उसने नारी की स्थिति में और भी सुधार कर दिया। लेकिन सामाजिक एवं आर्थिक स्वतन्त्रता ने उसे भोगवाद की ओर प्रेरित किया है।

आधुनिकता के मोह में पड़कर वह आज पतन की ओर जा रही है।

उपसंहार—इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से हमें वैदिक काल से लेकर आज तक नारी के विविध रूपों और स्थितियों का आभास मिल जाता है। वैदिक काल की नारी ने शौर्य, त्याग, समर्पण, विश्वास एवं शक्ति आदि का आदर्श प्रस्तुत किया। पूर्व मध्यकाल की नारी ने इन्हीं गुणों का अनुसरण कर अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखा। उत्तर-मध्यकाल में अवश्य नारी की स्थिति दयनीय रही, परन्तु आधुनिक काल में उसने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर लिया है। उपनिषद, पुराण, स्मृति तथा सम्पूर्ण साहित्य में नारी की महत्ता अक्षुण्ण है। वैदिक युग में शिव की कल्पना ही ‘अर्द्ध नारीश्वर’ रूप में की गयी। मनु ने प्राचीन भारतीय नारी के आदर्श एवं महान रूप की व्यंजना की है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता…” अर्थात् जहाँ पर स्त्रियों का पूजन होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ स्त्रियों का अनादर होता है, वहाँ नियोजित होने वाली क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। स्त्री अनेक कल्याण का भाजन है। वह पूजा के योग्य है। स्त्री घर की ज्योति है। स्त्री गृह की साक्षात् लक्ष्मी है। यद्यपि भोगवाद के आकर्षण में आधुनिक नारी पतन की ओर जा रही है, लेकिन भारत के जन-जीवन में यह परम्परा प्रतिष्ठित नहीं हो पायी है। आशा है भारतीय नारी का उत्थान भारतीय संस्कृति की परिधि में हो। वह पश्चिम की नारी का अनुकरण न करके अपनी मौलिकता का परिचय दे।

6. समाचार-पत्रों की उपयोगिता [2010, 14, 17]
अथवा
समाचार-पत्र समाज के सजग प्रहरी [2008]

“तुम जब दो आवाज, पहाड़ों की बोली मिट्टी बोले,
तुम जब छेड़ो तान, चाँदनी घट-घट में चन्दन घोले।”

रूपरेखा

  1. प्रस्तावना,
  2. प्राचीनकाल में समाचार-पत्रों का रूप,
  3. समाचार पत्रों के भेद,
  4. समाचार-पत्रों की उपयोगिता,
  5. समाचार-पत्रों के अनियन्त्रित प्रकाशन से हानियाँ,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-आदि काल से ही मानव की जिज्ञासा रही है कि वह अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करे। विभिन्न स्थानों के क्रिया-कलापों से वह अवगत होता रहे। मस्तिष्क की भूख मिटाने के लिए मनुष्य के सम्मुख एक ही तरीका है.समाचार-पत्र। इनके माध्यम से देश-विदेशों के राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक दशा तथा परिवर्तन का हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह जनता जनार्दन की वाणी है, उसके हाथों का अमोघ अस्त्र है।

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प्राचीनकाल में समाचार-पत्रों का रूप—समाचार-पत्रों का समाज में समाचार लेकर उपस्थित होना कोई नवीन रूप नहीं है। प्राचीनकाल में भी समाचारों का आदान-प्रदान सन्देश-वाहकों से होता था, चाहे वे सन्देश-वाहक मानव हों, पशु हों या पक्षी। ये समाचार एक स्थान से दूसरे स्थान तक व्यक्तिगत सन्देश के रूप में भेजे जाते थे। उन्हीं में समाज की स्थिति का भी कभी-कभी वर्णन कर दिया जाता था।

सर्वप्रथम समाचार-पत्र का जन्म इटली में हुआ था। इटली के वेनिस प्रान्त में एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचारों के आदान-प्रदान के लिए समाचार-पत्रों का प्रयोग होने लगा। सत्रहवीं शताब्दी में ही इस परम्परा से प्रभावित होकर इंग्लैण्ड में भी समाचार-पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हो गया। इस प्रकार यह प्रक्रिया देश-देशान्तरों में वृद्धि को प्राप्त होने लगी।

भारतवर्ष में समाचार-पत्रों का प्रादुर्भाव मुगल काल में ही हो चुका था। “अखबारात ई-मुअल्ले” नामक समाचार-पत्र का उल्लेख हमें उस काल में मिलता है। हिन्दी में सबसे पहला अखबार कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था। इस समाचार-पत्र का नाम था “उदन्त मार्तण्ड”। भारतीय समाज-सुधारकों ने समाचार-पत्रों के प्रकाशन को समाज के लिए एक आवश्यक अंग माना था। इस दिशा में राजा राममोहन राय तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आदि ने प्रशंसनीय कार्य किया।

समाचार-पत्रों के भेद-प्रत्येक प्रबन्धक या सम्पादक अपने समाचार-पत्रों को समयावधि के अनुसार प्रकाशित करता है। इस समयावधि में प्रकाशन के आधार पर ही समाचार-पत्रों के विभिन्न रूप हैं। उदाहरण के लिए-दैनिक (जो समाचार-पत्र प्रतिदिन प्रकाशित हो), साप्ताहिक (जो समाचार-पत्र सप्ताह में एक बार प्रकाशित हो), पाक्षिक (एक माह में दो बार प्रकाशित हो), मासिक, त्रैमासिक, अर्द्ध-वार्षिक या षट्-मासिक और वार्षिक। यह विभाजन समय के आधार पर किया गया है। लेकिन विभिन्न विषयों के आधार पर इन्हीं समयावधि में प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र हो सकते हैं। इनको स्थान विशेष के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है। क्षेत्र की दृष्टि से इनका वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है—
(क) अन्तर्राष्ट्रीय,
(ख) राष्ट्रीय,
(ग) प्रादेशिक,
(घ) स्थानीय। विषय की दृष्टि से इनका और भी विभाजन किया जा सकता है

  1. राजनीतिक,
  2. आर्थिक,
  3. सामाजिक,
  4. धार्मिक,
  5. साहित्यिक,
  6. नैतिक,
  7. सांस्कृतिक,
  8. क्रीड़ा,
  9. मनोरंजन आदि।

इस प्रकार हम देखते हैं कि समाचार-पत्रों का एक विशाल क्षेत्र है।

समाचार-पत्रों की उपयोगिता-जैसा कि समाचार-पत्रों के वर्गीकरण में बताया जा चुका है, विविध विषयों पर समाचार-पत्रों का प्रकाशन होता है, इनमें समाज और समय की माँग के अनुसार ही प्रकाशन होते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को समाचार-पत्रों के माध्यम से उसकी अभिरुचि के अनुसार सामग्री प्राप्त हो जाती है। किसी भी बात की सम्पूर्ण जानकारी समाचार-पत्रों के माध्यम से ही प्राप्त हो पाती है। आज की स्थिति में समाचार-पत्रों की उपयोगिता और अधिक बढ़ती जा रही है। संसार की गतिविधियों का सम्यक् ज्ञान इनसे होता है। आज मानव इतना अधिक जाग्रत हो गया है कि उसकी उत्सुकता तभी शान्त होती है जब वह परिस्थितियों से अवगत हो जाता है।

समाचार-पत्रों के माध्यम से विभिन्न रोजगार सम्बन्धी समाचार भी प्राप्त होते हैं। व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं से व्यापार सम्बन्धी ज्ञान भी हमको प्राप्त होता है। समाचार-पत्रों में मनोरंजन के लिए कुछ स्तम्भ भी निकलते हैं। मनोरंजन के साथ-साथ संसार में होने वाले खेल-कूदों के विस्तृत विवरण भी हमको समाचार-पत्रों से प्राप्त होते हैं। इस प्रकार से व्यक्ति के मनोरंजन का एक प्रमुख साधन समाचार-पत्र ही है। सामाजिक हित को ध्यान में रखकर प्रकाशित होने वाली बातों के लिए भी सर्वोत्तम साधन समाचार-पत्र ही है। यह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा राष्ट्रीय चेतना को पैदा किया जा सकता है जिससे नवीन समाज का निर्माण होता है।

समाचार-पत्रों के द्वारा हम लोकतन्त्र में विभिन्न प्रकार के सुझाव, सम्मति तथा आलोचना से अपने राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक हितों की रक्षा करते हैं। इससे जनता को जागरूक एवं योग्य बनाया जा सकता है। समाज में व्याप्त कुरीतियों, भ्रष्टाचार और अन्याय की अपील, सरकार से कर सकते हैं। समाचार-पत्रों के माध्यम से इनका पर्दाफाश कर सकते हैं।

समाचार-पत्र मनुष्य के सर्वांगीण विकास का एक माध्यम है। इनसे जो विचार हम ग्रहण करते हैं उनसे चिन्तन शक्ति की वृद्धि होती है। श्रमिकों और श्रमजीवियों के लिए यह रोजी-रोटी का एक साधन भी है।

समाचार-पत्रों के अनियन्त्रित प्रकाशन से हानियाँ समाचार-पत्रों से जहाँ इतने लाभ हैं वहाँ हानियाँ भी हैं। जब प्रकाशन पर नियन्त्रण कम हो जाता है तो कुछ राजनीतिक पत्र सनसनी पैदा करने के लिए कुछ छोटे और हल्के समाचारों को अधिक महत्त्व देते हैं जिससे समाज पर कुप्रभाव पड़ता है। समाचार-पत्र आकर्षण की दृष्टि से अश्लील चित्र प्रकाशित करते हैं। इससे पाठकों के विचार दूषित होते हैं। असत्य और भ्रामक विचारों को प्रकाशित करने से भी समाज, राज्य और राष्ट्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे विचार राष्ट्रोन्नति में बाधक होते।

उपसंहार-समाचार प्रकाशन पर उचित नियन्त्रण होना चाहिए। अश्लील एवं सस्ते साहित्य और उसके प्रकाशन पर पूर्ण पाबन्दी होनी चाहिए। समाचार-पत्रों की स्वतन्त्रता केवल राष्ट्र-हित, समाज-हित और मानव-कल्याण के समाचार प्रकाशन में होनी चाहिए क्योंकि ये राष्ट्र के लिए अपरिहार्य रूप सृजन-शक्ति है। आशा है कि समाचार-पत्र एक शान्त, समृद्ध एवं सुखी दुनिया के निर्माण में अपनी पावन भूमिका का निर्वाह करेंगे।

किसी शायर के शब्दों में,

“खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो।”

7. अनुशासन का महत्त्व [2008]
अथवा
विद्यार्थी और अनुशासन [2009, 15, 17]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. अनुशासन की आवश्यकता,
  3. अनुशासन के लाभ,
  4. छात्रानुशासन,
  5. उपसंहार।

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प्रस्तावना-अनुशासन शब्द अनु + शासन के योग से बना है। शासन का अर्थ है नियम, आज्ञा तथा अनु का अर्थ है पीछे चलना, पालन करना। इस प्रकार अनुशासन का अर्थ शासन का अनुसरण करना है। किन्तु इसे परतन्त्रता मान लेना नितान्त अनुचित है। विकास के लिए तो नियमों का पालन आवश्यक है। युवक की सुख शान्तिमय प्रगतिशीलता का संसार छात्रावस्था पर अवलम्बित है। अनुशासन आत्मानुशासन का ही एक अंग है।

अनुशासन की आवश्यकता—जीवन की सफलता का मूलाधार अनुशासन है। समस्त प्रकृति अनुशासन में बँधकर गतिवान रहती है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, सागर, नदी, झरने, गर्मी, सर्दी, वर्षा एवं वनस्पतियाँ आदि सभी अनुशासित हैं।

अनुशासन सरकार, समाज तथा व्यक्ति तीन स्तरों पर होता है। सरकार के नियमों का पालन करने के लिए पुलिस, न्याय, दण्ड, पुरस्कार आदि की व्यवस्था रहती है। ये सभी शासकीय नियमों में बँधकर कार्य करते हैं। सभी बुद्धिमान व्यक्ति उन नियमों पर चलते हैं तथा जो उन नियमों का पालन नहीं करते हैं, वे दण्ड के भागी होते हैं।

सामाजिक व्यवस्था हेतु धर्म, समाज आदि द्वारा बनाये गये नियमों का पालन करने वाले व्यक्ति सभ्य, सुशील तथा विनम्र होते हैं। जो लोग अनुशासनहीन होते हैं, वे असभ्य एवं उद्दण्ड की संज्ञा से अभिहित किये जाते हैं तथा दण्ड के भागी होते हैं। अनुशासन न मानने वाले व्यक्ति को समाज में हीन तथा बुरा माना जाता है। व्यक्ति स्वयं अनुशासित रहे तो उसका जीवन स्वस्थ, स्वच्छ तथा सामर्थ्यवान बनता है। वह स्वयं तो प्रसन्न रहता है, दूसरों को भी अपने अनुशासित होने के कारण प्रसन्न रखता है।

ऋषि-महर्षि अध्ययन के बाद अपने शिष्यों को विदा करते समय अनुशासित रहने पर बल देते थे। वे जानते थे कि अनुशासित व्यक्ति ही किसी उत्तरदायित्व को वहन कर सकता है। अनुशासित जीवन व्यतीत करना वस्तुत: दूसरे के अनुभवों से लाभ उठाना है। समाज ने जो नियम बनाये हैं वे वर्षों के अनुभव के बाद सुनिश्चित किये गये हैं। भारतीय मुनियों ने अनुशासन को अपरिहार्य माना, ताकि व्यक्ति का समुचित विकास हो सके। आदेश देने वाला व्यक्ति प्रायः आज्ञा दिये गये व्यक्ति का हित चाहता है। अतएव अनुशासन में रहना तथा अनुशासन को अपने आचरण में ढाल लेना आवश्यक है।

अनुशासन से लाभ–अनुशासन के असीमित लाभ हैं। प्रत्येक स्तर की व्यवस्था के लिए अनुशासन आवश्यक है। राणा प्रताप, शिवाजी, सुभाषचन्द्र बोस, महात्मा गाँधी आदि ने इसी के बल पर सफलता प्राप्त की। इसके बिना बहुत हानि होती है। सन् 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये स्वतन्त्रता संग्राम की असफलता का कारण अनुशासनहीनता थी। 31 मई को सम्पूर्ण उत्तर भारत में विद्रोह करने का निश्चय था, लेकिन मेरठ की सेनाओं ने 10 मई को ही विद्रोह कर दिया, जिससे अनुशासन भंग हो गया। इसका परिणाम सारे देश को भोगना पड़ा। सब जगह एक साथ विद्रोह न होने के कारण फिरंगियों ने विद्रोह को कुचल दिया।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने शान्तिपूर्वक विशाल अंग्रेजी साम्राज्यवाद की नींव हिला दी थी। उसका एकमात्र कारण अनुशासन की भावना थी। महात्मा गांधी की आवाज पर सम्पूर्ण देश सत्याग्रह के लिए चल देता था। अनेकानेक कष्टों को भोगते हुए भी देशवासियों ने सत्य और अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ा। पहली बार जब कुछ सत्याग्रहियों ने पुलिस के साथ मारपीट तथा दंगा कर डाला तो महात्माजी ने तुरन्त सत्याग्रह बन्द करने की आज्ञा देते हुए कहा कि “अभी देश सत्याग्रह के योग्य नहीं है। लोगों में अनुशासन की कमी है।” उन्होंने तब तक पुनः सत्याग्रह प्रारम्भ नहीं किया, जब तक उन्हें लोगों के अनुशासन के बारे में विश्वास नहीं हो गया। अतएव अनुशासन द्वारा लोगों में विश्वास की भावना पैदा की जाती है। अनुशासन विश्वास का एक महामंत्र है।

सेना की सफलता का आधार अनुशासन होता है। सेना और भीड़ में अन्तर ही यह है कि भीड़ में कोई अनुशासन नहीं होता जबकि सेना अनुशासित होती है। नेपोलियन, समुद्रगुप्त तथा सिकन्दर आदि महान कहे जाने वाले सेनानायकों ने जो विजय पर विजय प्राप्त की, उनके मूल में उनकी सेनाओं का अनुशासित होना ही था।

यातायात, अध्ययन, वार्तालाप आदि में भी अनुशासन आवश्यक है। रेल ड्राइवर सिगनल होने पर ही गाड़ी आगे बढ़ाता है। अनुशासन के द्वारा ही एक अध्यापक पचास-साठ छात्रों की कक्षा को अकेले पढ़ाता है। राष्ट्रपति से लेकर निम्नतम कर्मचारी तक सारी शासन-व्यवस्था अनुशासन से ही संचालित रहती है। शरीर में किंचित अव्यवस्था होते ही रोग लग जाता है।

छात्रानुशासन–अनुशासन विद्यार्थी जीवन का तो अपरिहार्य अंग है। चूँकि विद्यार्थी देश के भावी कर्णधार होते हैं, देश का भविष्य उन्हीं पर अवलम्बित होता है। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे स्वयं अनुशासित, नियन्त्रित तथा कर्त्तव्यपरायण होकर देश की जनता को मार्गदर्शन करें, उसे अन्धकार के गर्त से निकालकर प्रकाश की ओर ले जायें। अत: उनके लिए अनुशासित होना आवश्यक है।

अनुशासन के सन्दर्भ में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जीवन प्रेरणादायी है। अनुशासन में रहने के कारण ही राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाने के अधिकारी हुए। अनुशासन के अधीन वे राजतिलक त्यागकर वनवासी बन जाते हैं तथा अपनी पत्नी का परित्याग कर प्रजा की आज्ञा का पालन करते हैं। इस सबका कारण है उनका अनुशासित जीवन।

उपसंहार-निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जीवन में महान् बनने के लिए अनुशासन आवश्यक है। बिना अनुशासन के कुछ भी कर पाना असम्भव है। अनुशासन से व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा समाज को शुभ दिशा मिलती है। वस्तुतः अनुशासित जीवन ही जीवन है। अनुशासित जीवन के अभाव में हमारी जिन्दगी दिशाहीन एवं निरर्थक हो जायेगी।

8. राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका [2011]
अथवा
राष्ट्रहित में विद्यार्थियों का योगदान रूपरेखा

  1. प्रस्तावना,
  2. युवकों की स्थिति,
  3. राष्ट्र निर्माण में अपेक्षाएँ,
  4. युवाशक्ति का योगदान,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना मानव जीवन की स्वर्णिम अवस्था युवा शक्ति का सागर होती है। इसमें मनुष्य का तन तथा मन उल्लास, आवेग तथा ऊर्जा से भरा रहता है। ज्ञानार्जन की भी यही अवस्था होती है। विद्या मानव के विविध स्रोतों को संचालित करती है। उसमें सोचने-समझने तथा निर्णय लेने की क्षमता आती है। विद्या अध्ययन करने वाले विद्यार्थी का जीवन तथा जगत आदि सम्बन्धी चिन्तन स्पष्ट तथा सम्यक होता है। प्रत्येक देश में अभाव, असमानताएँ, गरीबी, सामाजिक अन्याय, साम्प्रदायिकता आदि सम्बन्धी समस्याएँ होती ही हैं। उन समस्याओं से मुक्ति प्राप्त किए बिना कोई देश प्रगति नहीं कर सकता है। इन सभी प्रकार की समस्याओं के सन्दर्भ में ही विद्यार्थी का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। छात्र जगत प्रतिपल अपने कर्म में रत है।

“कर्म-रत जग, हर दिशा से, कर्म की आवाज आती।
काल की गति एक क्षण, को भी नहीं विश्राम पाती।”

युवकों की स्थिति आज का युवा कल का नागरिक होगा तथा समस्त देश का भार उसके कन्धों पर होगा। अत: आज का बालक जितना प्रबुद्ध, कुशल, सूक्ष्मदर्शी तथा प्रतिभा सम्पन्न होगा, उतना ही देश का भविष्य उज्ज्वल होगा। बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा सर्वाधिक उत्तरदायी होती है। यही कारण है कि मनुष्य के जीवन की आधारशिला विद्यार्थी जीवन होता है। जो इस समय जितना सजग, कार्यशील तथा अध्यवसायी बना रहेगा उतना ही वह देश का उपकार करने में समर्थ होगा।

राष्ट्र निर्माण में अपेक्षाएँ-स्वतन्त्र भारत के बहुमुखी विकास के लिए युवाओं (विद्यार्थी) से अपेक्षा की जाती है कि वह समाज का प्रबुद्ध प्राणी होने के कारण समाज को उचित दिशा-निर्देश करे, जिससे जो गुमराह, भटका हुआ तथा दिशाहीन समाज है वह सन्मार्ग पर आ सके। वर्षों की गुलामी के वातावरण में विकसित होने वाला समाज स्वतन्त्रता की विविध अनुभूतियों से शून्य है। उसको समझाकर उसे स्वच्छन्द रूप से अपने जीवन के विकास की ओर उन्मुख करने में विद्यार्थी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बन्धनों की जकड़न के कारण भारतीय समाज के अनेक विकास द्वार बन्द हो गये थे, आज वे सभी मुक्त हैं, उनका ज्ञान कराना आवश्यक है।

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युवा शक्ति का योगदान—युवाशक्ति में असीमित ऊर्जा होती है। युवा राष्ट्र निर्माण का गुरुतर कार्य आसानी से कर सकता है। विद्यार्थी का परम कर्त्तव्य होता है कि अपनी शिक्षा को सभी प्रकार से सुविकसित करना, किन्तु आधुनिक सन्दर्भो में उसका रूप परिवर्तित हो गया है आज का विद्यार्थी प्राचीनकाल के विद्यार्थी के समान आश्रमों में रहकर सादा जीवन-यापन करते हुए ऋषि-मुनियों के निर्देशन में शिक्षा प्राप्त नहीं करता है। उसे गृहस्थ में साथ रहकर समस्त घटनाओं से परिचित रहते हुए अपना अध्ययन करना पड़ता है। अत: विद्यार्थी का कर्तव्य और अधिक कठोर हो जाता है कि वह समाज की सभी स्थितियों में भी एकाग्र रहकर अपनी शिक्षा को नियमित रूप से चालू रखे।

आज के युग में तीव्र गतिशीलता है। विश्व में तेज प्रतियोगिता चल रही है। उसमें स्वयं को सम्मिलित करने के लिए यह आवश्यक है कि आज का युवा विद्यार्थी सामाजिक क्रियाकलापों के प्रति सजग रहे। अध्ययन के अतिरिक्त विद्यार्थी को संसार की अन्यत्र बातों की ओर भी सजग रहना आवश्यक है। वर्तमान युग में भौतिक तुष्टियों का पूरक विज्ञान है। जितनी प्रगति विज्ञान में हो जायेगी उतना ही वह राष्ट्र महान हो जायेगा। अत: आज के विद्यार्थी तथा भावी वैज्ञानिक के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह अनुसंधान रत हो। चिकित्सा, तकनीकी, आण्विक, सूचना प्रौद्योगिकी, कम्प्यूटर, कृषि, उद्योग आदि सम्बन्धी प्रगति के लिए शोध आवश्यक है। ये सभी कार्य चरित्र निर्माण करते हुए कर्त्तव्यनिष्ठ होकर ही किए जा सकते हैं।

राष्ट्र के हित के लिए समाज, परिवार, व्यक्ति सभी का हित ध्यान में रखना है। अपना घर बनाकर ही राष्ट्र के निर्माण की दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वार्थ से ऊपर उठकर कल्याणकारी योजनाओं में सक्रिय होकर ही युवाशक्ति राष्ट्र की नींव मजबूत कर सकती है।

उपसंहार-वर्तमान में युवाशक्ति (विद्यार्थी) को अनुशासित रहकर संसार पर दृष्टि रखते हुए देश के विकास की गति को बढ़ाना है। स्वार्थहीनता, लोलुपता त्यागकर अपने दायित्व को समझकर अपनी ऊर्जा का प्रयोग रचनात्मक कार्यों में करना है। शिक्षा-दीक्षा पूर्ण कर युवा वर्ग राष्ट्र के हित में अपने जीवन को अर्पित करने का संकल्प लेंगे तभी राष्ट्र का तथा स्वयं उनका मंगलकारी भविष्य हो सकेगा।

9. महँगाई की समस्या
[2015]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. मूल्य वृद्धि के कारण-कृषि उत्पादन, प्रशासन की उदासीनता, आयात नीति, जनसंख्या में वृद्धि, घाटे का बजट, अव्यवस्थित वितरण प्रणाली,
  3. समस्या का निदान,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना-भारत में इस समय जो आर्थिक समस्याएँ विद्यमान हैं, उनमें महँगाई एक प्रमुख समस्या है। भारत में पिछले दो दशकों में सभी वस्तुओं और सेवाओं में मूल्यों में अत्यन्त तीव्रता से वृद्धि हुई है। वृद्धि का यह चक्र आज भी गतिवान है।

मूल्य वृद्धि के कारण-भारत में अधिकांश वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि के बहुत से कारण हैं। इन कारणों में से प्रमुख रूप से उल्लेखनीय कारण निम्नलिखित हैं

(1) कृषि उत्पादन-कृषि पदार्थों की कीमतों में निरन्तर वृद्धि का एक प्रमुख कारण उन समस्त वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि है जो कृषि के लिए आवश्यक हैं। कृषि उर्वरकों के मूल्यों में वृद्धि, सिंचाई की दरों में वृद्धि, बीज के दामों में वृद्धि, कृषि मजदूरों की मजदूरी की दर में वृद्धि कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनमें वृद्धि होने से स्वाभाविक रूप से ही उसका प्रभाव कृषि-पदार्थों पर पड़ता है।

(2) प्रशासन की उदासीनता-साधारणतः प्रशासन के स्वरूप पर यह निर्भर करता है कि देश में अर्थव्यवस्था एवं मूल्य-स्तर सन्तुलित होगा या नहीं। प्रभावशाली प्रशासक होने से कृत्रिम रूप से वस्तुओं और सेवाओं की पूर्ति में कमी करना व्यापारियों के लिए कठिन हो जाता है।

(3) आयात नीति-कभी-कभी आयात सम्बन्धी गलत नीति के कारण वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो जाती है। यह सही है कि देश में जहाँ तक सम्भव हो, आयात कम होना चाहिए-विशेष रूप में उपभोग की वस्तुओं का आयात अधिक नहीं होना चाहिए।

(4) जनसंख्या में वृद्धि-भारत में जनसंख्या तीव्रता से एवं अनियन्त्रित रूप में बढ़ रही है। जनसंख्या के इस विशाल आकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी वस्तुओं और सेवाओं का बड़े आकार में होना अनिवार्य है। दुर्भाग्य से भारत में आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की कमी है, इसी के परिणामस्वरूप अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में निरन्तर वृद्धि जारी है।

(5) घाटे का बजट-भारत में बजट और पूँजी-निर्माण की जो स्थिति है वह योजनाओं को पूरा करने के लिए बिल्कुल पर्याप्त नहीं है। अतः इस कमी को दूर करने के लिए, अन्य उपायों के अतिरिक्त घाटे की बजट प्रणाली को अपनाया जाने लगा है, जिससे अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में तेजी से वृद्धि हुई है।

(6) अव्यवस्थित वितरण प्रणाली- भारत में अधिकतर विक्रेता संगठित हैं। इसके परिणामस्वरूप वह आपस में मिलकर वस्तुओं की खरीद, संचय एवं बिक्री के विषय में नीति का निश्चय करते हैं। धीरे-धीरे वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने लगती है। यदि सरकार इन प्रवृत्तियों को रोकने में असमर्थ होती है तो यह संस्थाएँ मूल्यों को निरन्तर बढ़ाती जाती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

समस्या का निदान-

  1. कृषि पर अधिक ध्यान देना,
  2. सिंचाई की सुविधा,
  3. वितरण प्रणाली में बदलाव,
  4. भ्रष्टाचार पर अंकुश।

उपसंहार-कृत्रिम अभाव के सजन एवं मल्यों में निरन्तर वद्धि से कालाबाजारी एवं अत्यधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति बढ़ती है। भारत में भी यह प्रवृत्ति अभी तक विद्यमान है। यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ देश की अर्थव्यवस्था को अवांछित रूप से प्रभावित करती हैं और मूल्य वृद्धि को बढ़ावा देती हैं। सरकार को इन पर प्रभावी रोक हेतु आवश्यक कदम अविलम्ब उठाने चाहिए।

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10. जीवन में खेलों का महत्त्व
[2008, 09, 15]

“मन को सदा प्रसन्न करे जो तन को स्वस्थ बनाए।
खेलों का महत्त्व जीवन में वर्णन किया न जाए॥”

रूपरेखा [2016]

  1. प्रस्तावना,
  2. आवश्यकता,
  3. खेलों का महत्त्व,
  4. आर्थिक लाभ,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना-खेल का सम्बन्ध मानव के साथ जन्मजात होता है। बच्चा जन्म लेते ही हाथ-पैर फेंकने लगता है। उस समय उसके हाथ-पैर फेंकने की प्रक्रिया का सम्बन्ध भी खेल से ही होता है। इसके बाद बड़ा होकर वह स्वयं ही खेल में रुचि लेने लगता है। यह प्रकृति प्रदत्त है। जो बच्चे खेल में रुचि लेते हैं वह स्वस्थ, हँसमुख व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्साहित से रहते हुए सफलता प्राप्त करते जाते हैं। किन्तु जो बच्चे खेल में रुचि नहीं लेते वह निरुत्साहित व सुस्त नजर आते हैं।

आवश्यकता किसी भी देश की वास्तविक सम्पदा वहाँ के स्वस्थ नागरिक होते हैं और किसी भी देश की उन्नति वहाँ के स्वस्थ नागरिकों पर निर्भर होती है। खेल हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। खेलों के माध्यम से हमें अन्य लोगों से मिलने-जुलने के व उनके साथ रहने के अवसर प्राप्त होते हैं और दूसरे देशों में जाने का व दूसरे देशों की सभ्यता व संस्कृति का ज्ञान होता है। उनकी उन्नतिशील संस्कृति अपनाकर हम अपने जीवन व उसके साथ जुड़े देश की उन्नति भी कर सकते हैं। खेल हमारे जीवन की उदासीनता को दूर कर जीवन में आशा की ज्योति जलाते हैं।

खेलों का महत्त्व-खेलों के माध्यम से अपने जीवन के उन्नत लक्ष्यों की प्राप्ति कर प्रसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। जिस तरह अभी चीन में हुए ओलम्पिक में अभिनव बिन्द्रा ने 10 मीटर रायफल में गोल्ड मैडल जीतकर व बॉक्सिंग में विजेन्दर व कुश्ती में सुशील कुमार ने कांस्य पदक जीतकर विश्व में अपना परिचय स्वयं ही दिया, उन्हें किसी के द्वारा परिचय देने की आवश्यकता नहीं। कल तक हमारे देश के अनजान बच्चों ने पूरे विश्व में अपने देश को खेलों में अपने प्रदर्शन द्वारा गौरवान्वित किया है।

आज खेलों का महत्त्व इसी बात से दिखता है कि प्रत्येक देश में खेलों से सम्बन्धित अलग मन्त्रालय होता है जिसका कार्य अपने देश में खेलों का विकास करना और उनसे सम्बन्धित समस्याओं को दूर करना है। इन्हीं खेलों के महत्त्व को देखते हुए हम अपने बच्चों को यह नहीं पढ़ा सकते कि

“पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब
खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब।”

इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों के विद्यालयों में प्रवेश के साथ ही उनकी रुचि के अनुसार विद्यार्थियों को विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें प्रशिक्षित करने की सुविधा दें क्योंकि आज विश्व के समस्त देशों की सरकारें भी अपने राज्य कर्मचारियों के लिए हर विभाग में खिलाड़ियों के लिए कोटा निर्धारित करती हैं। हमारे देश में भी अर्जुन पुरस्कार खेलों में प्रवीण व्यक्तियों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाता है। आज हर विद्यालय व कॉलेजों में इन प्रतियोगिताओं का आयोजन पहले जिला स्तरीय, फिर राज्य स्तरीय, फिर देश स्तरीय व विश्वस्तरीय होता है जिसमें भाग लेकर नागरिक अपना व अपने देश का नाम गौरवान्वित करते हैं।

आर्थिक लाभ-आज के युग में खेलों के साथ आर्थिक पहलू भी जुड़ गया है। कई बड़े-बड़े उद्योगपति भी अपनी प्रसिद्धि के लिए खेलों व खेल प्रतियोगिताओं का सहारा लेते हैं। किन्तु खेल में भाग लेने वाले खिलाड़ी अपने परिचय के लिए किसी के भी मोहताज नहीं हैं। आज सचिन तेन्दुलकर, अभिनव बिन्द्रा, गीत सेठी ने अपनी पहचान अथवा परिचय अपनी-अपनी रुचि के खेलों में प्रशिक्षण प्राप्त कर चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर दिया और इन खिलाड़ियों को कोई भी विश्वस्तरीय कम्पनी अपना ब्राण्ड एम्बेसडर मुँहमाँगी कीमत पर बनाने को तैयार है।

उपसंहार-आज सामान्य नागरिक को किसी दूसरे देश में प्रवेश के लिए अनेक औपचारिकताओं; जैसे—बीजा, परमिट आदि से गुजरना पड़ता है जिसके लिए उन्हें अपना काफी समय व धन लगाना पड़ता है किन्तु किसी भी प्रशिक्षित खिलाड़ी को उनकी अपनी सरकार वी. आई. पी. कोटे द्वारा खेल प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए स्वयं ही प्रबन्ध करती है। इस तरह आज चीन जैसे देश जिसे विश्व के निम्न स्तरीय देशों में गिना जाता था किन्तु बीजिंग में ओलम्पिक 2008 होने से विश्व के समस्त देशों की ईर्ष्या का कारण बन गया है। अतः आज आवश्यक है कि खेलों के महत्त्व को जानते हुए उनके प्रशिक्षण की विशेष सुविधा का प्रबन्ध किया जाए।

11. जल और जंगल का संरक्षण [2008, 12]
अथवा
वन संरक्षण का महत्त्व [2013]

“जल का संरक्षण वन करते
जल से हरा भरा वन हो।
जल जंगल को संरक्षित कर
जीवन सुखमय सुन्दर हो।”

जल-आधुनिक समय में मनुष्य के लिए जल का होना अत्यावश्यक हो गया है। हम इस बात को मानते हैं कि प्रत्येक युग में जल की आवश्यकता मनुष्य को रही है परन्तु आज के समय में जल की कमी को देखकर ऐसा महसूस होता है कि पानी के बिना मनुष्य का जीवन असम्भव सा है। आज के राजस्थान वाले शहरों में ही नहीं बल्कि चाहे किसी भी शहर में पानी की कमी दिखाई देती है और इसीलिए आज यह आवश्यक हो गया है कि हमें एक-एक पैसे की तरह पानी की एक-एक बूंद का संरक्षण करना चाहिए। पानी को व्यर्थ में बहते रहने देना नहीं चाहिए। अगर हम जल का संरक्षण या संग्रह नहीं करेंगे तो हमें हमारे शरीर के लिए पर्याप्त मात्रा में जल की प्राप्ति नहीं हो सकेगी और जब हमारे शरीर को पूरी मात्रा में जल नहीं मिलेगा तो हमारा शरीर रोगों से ग्रस्त हो जायेगा क्योंकि हमारे शरीर में जल की मात्रा अधिक पहुँचनी चाहिए तभी हमारा शरीर स्वस्थ रह सकेगा इसीलिए हमें अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जल का संरक्षण करना होगा। कहा भी गया है

“जल से जीवन, जीवन जल से, जल जीवन का दाता है।
जल संरक्षण कर ले मानव, यही भविष्य निर्माता है।”

जंगल का संरक्षण-वृक्ष मनुष्य के सबसे अधिक विश्वस्त मित्र होते हैं और यदि हम अपने देश को सँवारना और सुधारना चाहते हैं तो हमें वृक्षों का विशेष ध्यान रखना होगा। जंगलों से हमें अनेक प्रकार की आयुर्वेदिक दवा बनाने के लिए जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं जो हम सभी को अनेक भयंकर रोगों से बचाने में सहायक होती हैं। अत: इन सभी उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिए हमें जंगलों को सुरक्षित रखना होगा और ये जंगल तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब उनको पानी उनकी आवश्यकता के अनुसार मिलेगा। लेकिन यदि उन्हें जल उनकी मात्रा के अनुरूप नहीं मिलेगा तो जंगलों में सारे वृक्ष सूख जायेंगे।

जंगल तो एक ऐसा भण्डार या गोदाम होता है जहाँ से हमें भोजन बनाने के लिए ईंधन प्राप्त होता है तथा जंगलों में उगने वाले वृक्ष हमारे जीवन का एक मुख्य अंग होते हैं। इनके द्वारा ही हम अपने जीवन में साँस ले सकते हैं क्योंकि ये वृक्ष अपने अन्दर कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और हमारे लिए ऑक्सीजन निकालते हैं जिसके द्वारा हम साँस लेते हैं। अत: जल की तरह ही जंगल भी सुरक्षित रखना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक होता है।

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जंगलों द्वारा ही अनेक बेरोजगारों को रोजगार मिलते हैं क्योंकि जंगलों से प्राप्त वस्तुओं का उपयोग करके हमारे भारत में अनेक लघु तथा कुटीर उद्योगों की स्थापना की जाती है। ऐसा अनुमान है कि भारत के लगभग 80 करोड़ व्यक्तियों की जीविका जंगलों पर ही आश्रित है। हमारा देश कृषि प्रधान देश है और कृषि कार्य को सम्पन्न करने के लिए स्वस्थ पशुओं की आवश्यकता होती है और स्वस्थ पशु तब ही हो पाते हैं जब उनको हरा चारा पेट भर कर मिले और यह चारा उन्हें जंगलों से ही प्राप्त होता है। अतः अन्त में हम यही कहना चाहेंगे कि व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन और जीविका जल का और जंगल का संरक्षण करके ही सुरक्षित रह सकती है। कहा भी गया है

“यदि वृक्ष हैं तो जीवन है, जीवन है तो इन्सान है।
आने वाले जीवन की वृक्षों से ही पहचान है।”

12. विज्ञान एवं मानव [2017]
अथवा
विज्ञान के बढ़ते चरण [2011]
अथवा
विज्ञान आज के युग में [2015]

“बाहु में वरदान भर निर्माण के,
लोचनों में खण्ड शत दिनमान के॥”

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. संचार के क्षेत्र में,
  3. चिकित्सा के क्षेत्र में,
  4. मनोरंजन के क्षेत्र में,
  5. विज्ञान की अन्य देन,
  6. कृषि के क्षेत्र में,
  7. विज्ञान वरदान के रूप में,
  8. विज्ञान अभिशाप के रूप में,
  9. उपसंहार।

प्रस्तावना-आज विज्ञान का युग है, विज्ञान आज मानव जीवन का पर्याय बन गया है। आधुनिक युग में विज्ञान विहीन मानव की कल्पना संजोना व्यर्थ है। विज्ञान, हमारी समस्त दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का अमोघ साधन बन गया है। विज्ञान जीवन का आधार है, सुख का स्रोत है। आज विज्ञान दुनिया पर पूर्णरूपेण छाया हुआ है।

संचार के क्षेत्र में विज्ञान ने संचार क्षेत्र में नये आयाम स्थापित किये हैं। रेडियो से दूर की खबरें सुनी जा सकती हैं। टेलीविजन से दूर बैठे अपने सम्बन्धी का चित्र देखिए, टेलीफोन से बातचीत कर लीजिए, सेल्यूलर फोन भी संचार के क्षेत्र में महान उपलब्धि है। इससे संसार की समस्त दूरियाँ सिमटी हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में एक्स-रे के माध्यम से शरीर के आन्तरिक भागों का भली प्रकार निरीक्षण किया जा सकता है। रोगों के निवारण के लिए अनेक प्रकार के टीकों का भी आविष्कार हुआ है। आविष्कृत औषधियों ने काल की छाती पर करारा चूसा मारा है।

मनोरंजन के क्षेत्र में रेडियो, सिनेमा, टेलीविजन एवं टेपरिकॉर्डर आज मनोरंजन की वस्तुएँ विज्ञान ने मानव को प्रदान की हैं। इनके माध्यम से इन्सान की जिन्दगी में नयी आशा की किरणें जगी हैं।

विज्ञान की अन्य देन—बिजली का पंखा, गैस का चूल्हा एवं रेफ्रीजरेटर दैनिक उपयोग की वस्तुएँ विज्ञान की देन हैं। विशाल मशीनों के माध्यम से उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई है।

कृषि के क्षेत्र में ट्रेक्टर, थ्रेसर एवं बुलडोजर कृषि के क्षेत्र में विज्ञान की अद्भुत देन है। नई-नई खादें एवं वैज्ञानिक मशीनों से पैदावार में आशातीत बढ़ोत्तरी हुई है।

विज्ञान वरदान के रूप में आज विज्ञान ने मनुष्य को तर्क एवं बुद्धि के सन्दर्भ में नवीन दृष्टि प्रदान की है। टेपरिकॉर्डर, टी. वी. आदि ने मनुष्य को ज्ञान के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ाया है। मानव की जीवन-शैली में अत्यधिक परिवर्तन आया है। मानव की सुख-सुविधा में विज्ञान ने महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया है। मनुष्य को सभ्य एवं उदार दृष्टिकोण वाला बनाया है।

विज्ञान अभिशाप के रूप में विज्ञान द्वारा निर्मित भयंकर अस्त्र-शस्त्र मनुष्य के लिए प्राणघातक प्रमाणित हो रहे हैं। प्रक्षेपास्त्रों, रॉकेटों, विनाशकारी बमों के आक्रमण मानव की जीवन लीला को समाप्त कर रहे हैं। इन्सानियत की भावनाएँ अन्तिम साँसें ले रही हैं। सारी दुनिया भयंकर विनाश लीला के विषय में सोचकर गहरे अवसाद में निमग्न हो जाती है।

उपसंहार-विज्ञान में जहाँ अभिशापों की काली छाया मँडरा रही है वहीं बसन्त की सुषमा की कलित क्रीड़ा भी अवलोकनीय है। यह मनुष्य की बुद्धि पर निर्भर है कि वह विज्ञान का प्रयोग मानव कल्याण के लिए करता है अथवा विनाश के लिए। भगवान मानव को ऐसी सद्बुद्धि प्रदान करें जिससे वह वैज्ञानिक आविष्कारों का मानव के कल्याण के लिए प्रयोग करे। इसी में मानव के सुनहरे भविष्य का रहस्य निहित है। जब मानव विज्ञान का मानव कल्याण के लिए प्रयोग करेगा तभी वसुधा के कण-कण से शान्ति, मानवता तथा बन्धुत्व के स्वर ध्वनित होंगे।

13. राष्ट्रीय एकता [2009, 12, 14]
अथवा
राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता [2008, 09]

“भारत सबसे बड़ा रहेगा,
सबसे ऊँची लिए पताका,
सदा हिमालय खड़ा रहेगा।”

रूपरेखा [2015]-

  1. प्रस्तावना,
  2. राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्त्व,
  3. जातिवाद,
  4. विभिन्न भाषाएँ,
  5. प्रान्तीयता की भावना,
  6. संकुचित राजनैतिक दृष्टिकोण,
  7. राष्ट्रीय एकता के तत्त्व,
  8. समस्या का निराकरण,
  9. उपसंहार।

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प्रस्तावना—हमारे भारत देश में विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय एवं बहुभाषी मनुष्य निवास करते हैं। सदियाँ बीत गयीं, इस वृहद् देश में सभी जाति एवं धर्म के लोग प्रेम, सद्भावना एवं भाई-चारे के सूत्र में बँधकर जीवनयापन करते चले आ रहे हैं। अंग्रेजों की कूटनीति के फलस्वरूप भारत माता के दो टुकड़े हो गये। इसके पश्चात् साम्प्रदायिक दंगों का जहरीला नाग अपना फन फहराने लगा, जो आज तक सक्रिय है।

राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्त्व-जातिवाद, भाषावाद, प्रान्तवाद, सम्प्रदायवाद आदि राष्ट्रीय एकता में बाधा डालने वाले तत्त्व हैं।

जातिवाद-जातिवाद भारत की एकता के तारों को छिन्न-भिन्न कर रहा है। जातिवाद के फलस्वरूप घृणा, बैर तथा ऊँच-नीच की भावना पनपी है।

विभिन्न भाषाएँ-भारतवर्ष में अनेक भाषाएँ प्रयोग की जाती हैं। भाषावाद को माध्यम बनाकर संघर्षों का भी आविर्भाव हो रहा है, जो देश के लिए घातक है।

प्रान्तीयता की भावना दूषित क्षेत्रीय राजनीति के फलस्वरूप हमारी राष्ट्रीय एकता पर विनाशकारी बादल मँडरा रहे हैं। झारखण्ड, बंगाल, खालिस्तान क्षेत्रवाद की अनुदार एवं क्षुद्र प्रान्तीयता की भावना के शिकार हैं। इसके दुष्परिणाम राष्ट्र अनेक बार देख चुका है। भविष्य पर भी काली छाया मँडरा रही है।

संकुचित राजनैतिक दृष्टिकोण-वोट प्राप्त करने के लिए राजनैतिक दल हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम एवं पिछड़ा वर्ग के मध्य भेदभाव की दीवार खड़ी कर देते हैं। जिस क्षेत्र में जिस जाति का बाहुल्य होता है उसी जाति के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के लिए खड़ा किया जाता है। इस प्रकार स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष उम्मीदवार का चुनाव में विजय प्राप्त करना बहुत ही कठिन है।

राष्ट्रीय एकता के तत्त्व हमारे राष्ट्र में विभिन्न जातियों में पैदा हुए आदर्श पुरुषों की उपासना की जाती है। ईद, दीपावली, मोहर्रम आदि त्यौहारों को सभी धर्मावलम्बी साथ-साथ मनाते हैं। मेलों में सभी धर्मों को मानने वाले उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। यह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।

समस्या का निराकरण-सबसे प्रथम जातिवाद की संकुचित भावना को समाप्त करना होगा। धर्म एवं जाति के आधार पर भेद-भाव करना एक संगीन अपराध मानना होगा। छुआछूत की भावना को भी समाप्त करना होगा। अनुदार एवं संकुचित सम्प्रदायवाद को भी एक विषैला नाग समझकर उसके फन को इस तरह कुचलना होगा ताकि उसका विष राष्ट्र के शरीर को अपने जहर से विषाक्त न बना सके।

उपसंहार—हमारे भारत देश में अनेकता में एकता के स्वर गुंजित हैं। गीता, रामायण, वेद एवं पुराण हमारी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक एकता के आधार स्तम्भ हैं। एक सम्प्रभु एवं अखण्ड भारत की कल्पना देश की धरती पर युग-युगों से जीवित है। एकता की भावना आज भी जीवन्त है। आज विश्व के अनेक राष्ट्र हमारे देश की एकता के तार को छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं, ऐसी दशा में हम सबको जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय की भावना से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने में भरपूर सहयोग प्रदान करना होगा। कश्मीर में अलगाववाद की भावना भी राष्ट्रीय एकता में बाधक है। राष्ट्र की एकता एवं खुशहाली में ही सबका हित निहित है। आशा है कि निकट भविष्य में भारत की धरती पर एकता, प्रेम, बन्धुत्व की ऐसी धारा प्रवाहित होगी जिसमें अवगाहन करके भारत का जन-जन असीम उल्लास का अनुभव करेगा।

14. कम्प्यूटर के क्षेत्र में भारत की प्रगति
अथवा
आधुनिक युग में कम्प्यूटर की उपयोगिता [2013]
अथवा
कम्प्यूटर का महत्त्व [2008]

“कम्प्यूटर भारत का गौरव, नवीनतम।
गणना करे पलक झपकते अति सुन्दरतम॥”

रूपरेखा [2017]-

  1. प्रस्तावना,
  2. कम्प्यूटर के प्रयोग,
  3. सूचना और संचार क्रान्ति,
  4. कम्प्यूटर के क्षेत्र में विकास,
  5. उपसंहार।]

प्रस्तावना विगत कई सालों में हमारे राष्ट्र भारतवर्ष में कम्प्यूटरों का जीवन के अनेक क्षेत्रों में वृहद् मात्रा में प्रयोग किया जा रहा है। अनेक संस्थानों एवं उद्योग-धन्धों में कम्प्यूटर का प्रयोग इसकी सफलता का मापदण्ड है। कम्प्यूटर की सफलता को देखकर इसके सन्दर्भ में जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा मन-मस्तिष्क में पनपने लगती है। कम्प्यूटर ऐसे यांत्रिक मस्तिष्कों का समन्वयात्मक तथा गुणात्मक घनत्व है जो तेज गति से अल्प समय में त्रुटिहीन गणना सम्पन्न कर सके। कम्प्यूटर के प्रथम आविष्कारक चार्ल्स बेवेज ये प्रथम ऐसे मानव थे जिन्होंने 19वीं शताब्दी के आरम्भ में प्रथम कम्प्यूटर निर्मित किया। यह कम्प्यूटर विस्तृत गणनाएँ सम्पन्न कर देता था तथा उनके परिणामों की भी सूचना दे देता था।

कम्प्यूटर के प्रयोग आज जीवन के अनेक क्षेत्रों में इसका प्रयोग देखा जा सकता है।

  1. बैंकिंग के क्षेत्र में …भारतीय बैंकों में हिसाब-किताब रखने तथा खातों के संचालन के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग किया जा रहा है।
  2. कला के क्षेत्र में…-आज कम्प्यूटर कलाकार एवं चित्रकार की भूमिका को भी सफलतापूर्वक निर्वाह कर रहे हैं। कम्प्यूटर के समक्ष बैठकर कलाकार अपने नियत कार्यक्रम के अनुसार स्क्रीन पर चित्र बनाता है। यह चित्र प्रिण्ट की कुंजी दबाते ही प्रिंटर के माध्यम से कागज पर वास्तविक रंगों के साथ छाप दिया जाता है।
  3. प्रकाशन के क्षेत्र में पुस्तक एवं समाचार-पत्रों के प्रकाशन क्षेत्रों में भी कम्प्यूटर का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कम्प्यूटर से संचालित फोटो कम्पोजिंग मशीन के द्वारा छपने वाली मशीन से टंकित किया जाता है। टंकित की जाने वाली सामग्री को कम्प्यूटर के पर्दे पर निहारा जा सकता है तथा उसमें संशोधन भी किया जाता है। कम्प्यूटर में संचित होने के पश्चात् सम्पूर्ण सामग्री एक लघु चुम्बकीय डिस्क पर अंकित हो जाती है। फोटो कम्पोजिंग मशीन इस डिस्क के अंकीय संकेतों को अक्षरीय संकेतों में परिवर्तित कर देती है।
  4. डिजाइनिंग के क्षेत्र में-कम्प्यूटर के द्वारा हवाई जहाजों, मोटर गाड़ियों एवं भवनों आदि के डिजाइन तैयार करने में कम्प्यूटर ग्राफिक का अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है।
  5. वैज्ञानिक क्षेत्र में अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटर ने एक नवीन क्रान्ति को जन्म दिया है। इसके माध्यम से अन्तरिक्ष में वृहद् मात्रा में चित्र उतारकर कम्प्यूटर के द्वारा इन चित्रों का विश्लेषण एवं सूक्ष्म अध्ययन किया जा रहा है।
  6. शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान वाहिनी एवं विद्या वाहिनी कार्यक्रम के द्वारा कक्षाओं के अन्तर्गत शिक्षण विधियों को उपयोगी एवं सरल बनाने की चेष्टा की जा रही है। सुदूर शिक्षा के लिए भारत ने ऐजुसैट नामक उपग्रह प्रक्षेपित किया है, सामान्यतः सम्पूर्ण शिक्षा कम्प्यूटरमय बन गई है।
  7. संगीत के क्षेत्र में कम्प्यूटर की सहायता से एक नये प्रकार की संगीत तकनीक का विकास किया गया है।
  8. कृषि के क्षेत्र में कम्प्यूटर द्वारा किए गए परिवर्तनों के आधार पर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के किसान घर बैठे खेती सम्बन्धी अनेक प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  9. चिकित्सा के क्षेत्र में अभियान्त्रिकी की सक्रियता के फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध करवाई जा रही है, दूरस्थ चिकित्सा प्रणाली भी प्रारम्भ की है।

वना और संचार क्रान्ति टेलीफोन मोबाइल के साथ नेटवर्क का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है, इसके द्वारा दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में सब प्रकार की सूचनाएँ और जानकारियाँ पहुँचाई जा सकती हैं। कम्प्यूटर के क्षेत्र में विकास

  1. सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों में ब्लाक स्तर पर सम्पर्क उपलब्ध कराने तथा सामाजिक एवं आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए सामुदायिक सूचना केन्द्रों की स्थापना की गई है।
  2. ‘सक्षम योजना’ द्वारा केरल के चमरावत्तम गाँव को शत-प्रतिशत कम्प्यूटर साक्षर गाँव बना दिया गया है।
  3. चेन्नई के एम. एस. स्वामीनाथन फाउण्डेशन ने पाण्डिचेरी के तटवर्ती गाँवों में ‘इन्फोशॉप’ की स्थापना की है।

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उपसंहार—भारत में कम्प्यूटर का प्रयोग प्रत्येक क्षेत्र में देखा जा सकता है। इसके माध्यम से विकास की गति में आशातीत प्रगति हुई है। रोबोट तो साकार रूप में मानव मस्तिष्क का पर्याय प्रमाणित हो रहा है। परन्तु इसके प्रयोग में अत्यधिक ध्यान केन्द्रित करना होगा। कम्प्यूटर ने आज जो कुछ उपलब्ध किया है। वह आज के बुद्धिजीवियों की महत्त्वपूर्ण देन है। किन्तु फिर भी हमें कम्प्यूटर पर पूर्ण रूप से निर्भर न रहकर अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक रहना चाहिए इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की अत्यधिक आवश्यकता है। कहा भी गया है

“सुख सुविधाएँ जो हमें दी है विज्ञान ने,
हमें इनका गुलाम न होकर उन्हें सेवक बनाना है।
तभी हम सफल, सक्षम और बलशाली बनेंगे,
हमें विज्ञान संग स्वयं का अस्तित्व जगाना है।”

15. भारत में बेरोजगारी की समस्या
[2011, 14]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. बेरोजगारी के कारण,
  3. बेरोजगारी के प्रकार,
  4. बेरोजगारी के परिणाम,
  5. समाधान हेतु सुझाव,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना—आज देश के कर्णधार, मनीषी तथा समाज सुधारक न जाने कितनी समस्याओं की चर्चा करते हैं परन्तु सारी समस्याओं की जननी बेरोजगारी है। इसकी कोख से भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता, चोरी, डकैती तथा अनैतिकता का विस्तार होता है। बेकारों का जीवन अभिशाप की लपटों से घिरा है। यह समस्या अन्य समस्याओं को भी जन्म दे रही है। चारित्रिक पतन, सामाजिक अपराध, मानसिक शिथिलता, शारीरिक क्षीणता आदि दोष बेकारी के ही परिणाम हैं। बेरोजगारी के कारण बेरोजगारी के विभिन्न चरणों में से प्रमुख इस प्रकार हैं

(1) जनसंख्या में वृद्धि-विगत वर्षों में भारत की जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ी है। यही कारण है कि पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत रोजगार के अनेक साधनों के उपलब्ध होने के बावजूद बेरोजगारी का अन्त नहीं हो सका है।

(2) लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धों का अभाव-ब्रिटिश सरकार की नीति के कारण देश में लघु एवं कुटीर उद्योगों में समुचित प्रगति नहीं हुई है। काफी उद्योग बन्द हो गए हैं। फलतः इन धन्धों में लगे हुए व्यक्ति बेकार हो गए हैं, नए रोजगार नहीं पा रहे हैं।

(3) औद्योगीकरण का अभाव स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में बड़े उद्योगों का विकास हुआ, परन्तु लघु उद्योगों की उपेक्षा रही। फलस्वरूप यन्त्रों ने मनुष्य का स्थान ले लिया है।

(4) दूषित शिक्षा प्रणाली लिपिक बनाने वाली भारतीय शिक्षा प्रणाली में शारीरिक श्रम का कोई महत्त्व नहीं है। शिक्षित वर्ग के मन में शारीरिक श्रम के प्रति घृणा उत्पन्न होने से बेकारी में वृद्धि होती है। शिक्षित व्यक्ति स्वयं को समाज के अन्य व्यक्तियों से बड़ा मानकर काम करने में कतराता है। वह शासन करने वाली नौकरी की तलाश में रहता है, जो उसे प्राप्त नहीं हो पाती है।

(5) पूँजी का अभाव- देश में पूँजी का अभाव है, इसलिए उत्पादन में वृद्धि न होने से भी बेकारी बढ़ रही है।

(6) कुशल एवं प्रशिक्षित श्रमिकों का अभाव-दीक्षा विद्यालयों एवं कारखानों की कमी के कारण देश में कुशल एवं प्रशिक्षित श्रमिकों का अभाव है, इसलिए कुशल कर्मचारी विदेशों से भी बुलाने पड़ते हैं, इससे बेरोजगारी बढ़ती है।

बेरोजगारी के प्रकार भारत में बेरोजगारी के दो प्रकार हैं
(अ) ग्रामीण बेकारी—इस श्रेणी में अशिक्षित एवं निर्धन कृषक और ग्रामीण मजदूर आते हैं, जो प्रायः वर्ष में 5 से लेकर 9 माह तक बेकार रहते हैं।
(ब) शिक्षित वर्ग की बेकारी शिक्षा प्राप्त करके बड़ी-बड़ी उपाधियों को लेकर अनेक सरस्वती के वरद् पुत्र और पुत्रियाँ बेकार दृष्टिगोचर होते हैं। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

बेरोजगारी के परिणाम—भारत में ग्रामीण तथा नगरीय स्तर पर बढ़ती हुई बेरोजगारी की समस्या से देश में शान्ति-व्यवस्था आदि को भयंकर खतरा उत्पन्न हो गया है। उसे रोकने के लिए यदि समायोजित कदम नहीं उठाया गया तो भारी उथल-पुथल का भय है।

समस्या के समाधान हेतु सुझाव-समस्या के समाधान हेतु कुछ सुझाव अग्रलिखित प्रकार से हैं-

  1. जनसंख्या पर नियन्त्रण-जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं में परिवार कल्याण को अधिक-से-अधिक प्रभावशाली बनाया जाए।
  2. लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास-उद्योगों के केन्द्रीयकरण को प्रोत्साहन देकर गाँवों में लघु और कुटीर उद्योग-धन्धों का विकास करना चाहिए। कम पूँजी से लगने वाले ये उद्योग ग्रामों तथा नगरों में रोजगार देंगे। इन उद्योगों का बड़े उद्योगों से तालमेल करना भी आवश्यक है।
  3. बचत एवं विनियोग की दर में वृद्धि-प्रो. कीन्स के अनुसार, “पूर्ण रोजगार की समस्या देश में बचत एवं विनियोग की दर से परस्पर सम्बन्धित है।” अत: देश में घरेलू बचत एवं विनियोग की दर में वृद्धि करके भी बेरोजगारी की समस्या को हल किया जा सकता है।
  4. शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन.-आज की शिक्षा-प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करके पाठ्यक्रम में अध्ययन के साथ तकनीकी और व्यावहारिक ज्ञान पर बल देना आवश्यक है जिससे छात्र श्रम के महत्त्व को समझ सकें और रोजगार पा सकें।
  5. कृषि में स्पर्धा-कृषकों में कृषि प्रणाली का सुधार करके अधिकाधिक खाद्य सामग्री पैदा करने की स्पर्धा उत्पन्न करनी चाहिए। उन्हें उन्नत बीज, पूँजी, अच्छे हल-बैल तथा अन्य आधुनिक मशीनें और सुविधाएँ देनी चाहिए।

उपसंहार—देश की वर्तमान परिस्थितियों में बेकारी की समस्या को दूर करने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों प्रकार के प्रयास होने चाहिए। प्रसन्नता का विषय है कि भारत सरकार इस समस्या के प्रति जागरूक है। लघु एवं विशाल उद्योगों की स्थापना के प्रति सजग है। शिक्षा को भी रोजगारपरक बनाया जा रहा है। अनेक स्वरोजगार योजनाएँ चल रही हैं। विश्वास है कि यह समस्या हल हो जायेगी।

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16. आतंकवाद : समस्या और समाधान [2011]
अथवा
आतंकवाद की समस्या [2017]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. आतंकवाद का स्वरूप,
  3. आतंकवाद का विस्तृत क्षेत्र,
  4. भारतवर्ष में आतंकवादी गतिविधियाँ,
  5. विदेशों में आतंकवाद,
  6. आतंकवाद का लक्ष्य।

प्रस्तावना–आज हमारे देश में आतंकवाद का जहर बुरी तरह से फैला हुआ है। इस आतंकवादी सर्प ने हमारे देश को अपने में इस तरह से जकड़ रखा है कि पूर्ण रूप से उसके चंगुल से अपने को नहीं निकाल पा रहा है। आज प्रत्येक व्यक्ति स्टेशन, सिनेमाघर, वायुयान, रेल, बस प्रत्येक स्थान पर स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहा है। लेकिन कवि नीरज कहते हैं देखिए

‘अंगारों को भी अधरों पर, धर कर रे ! मुस्काना होगा।’

आतंकवाद का स्वरूप-अपनी बात को दृढ़ात् (जबरदस्ती) आतंक फैलाकर मनवाना ही आतंकवाद है। अपने अधिकार की माँग करना तो उचित है, किन्तु दूसरे की स्वीकृति न मिलने पर अपनी बात को घृणित बल प्रयोगों द्वारा मनवाना ही आतंकवाद है। इनके मन्सूबे संकीर्ण विचारों वाले स्वार्थ से सने हुए हैं। इन आतंकवादियों में बहुत से तो धन के लालच में पड़कर निर्दोष लोगों की हत्या करते फिरते हैं। वे परिमल पराग की बगिया में रक्त के बीज बो रहे हैं।

अमराइयों में विनाश का झूला डाल रहे हैं।

आतंकवाद का विस्तृत क्षेत्र-आज आतंकवाद का क्षेत्र विश्वव्यापी हो गया है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे भूतपूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गीय राजीव गाँधी की हत्या है, अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या भी इसका जीवन्त प्रमाण है। पंजाब एवं कश्मीर में असंख्य निर्दोष लोगों की हत्या में विदेशी शत्रु राज्यों का विशेष रूप से हाथ रहा है। इस कार्य (आतंकवाद) को करने में अधिकांश रूप से तस्कर भी सम्मिलित हैं।

भारत में आतंकवादी गतिविधियाँ-आतंक पैदा कर एवं भय दिखाकर स्वार्थपूर्ति करने की प्रवृत्ति से असोम, नागालैण्ड में विदेशियों के रचे गये कुचक्रों से आतंकवाद पनपा। उनके पश्चात् उसका भयानक साया पंजाब, कश्मीर तथा अन्य क्षेत्रों में बुरी तरह से पड़ गया है। श्रीनगर, जम्मू, चेन्नई, रुद्रपुर, हैदराबाद, मुम्बई आदि स्थानों पर तथा रेलवे स्टेशन, रेल आदि पर हुए आतंकवादी हमलों से न जाने कितने लोग घर से बेघर हो गये। कितनी नारियों का सुहाग छिना। न जाने कितनी माँ तथा बहिनें पुत्र तथा भाई के मारे जाने पर अश्रु बहाती रह गयीं।

आतंकवादी गतिविधियाँ भारत में निरन्तर बढ़ रही हैं जो विकास में बाधक सिद्ध हो रही हैं।

विदेशों में आतंकवाद-आतंकवाद का प्रभाव विश्वव्यापी है। जापान के याकोहामा रेलवे स्टेशन पर विषैली गैस छोड़ देने से बारह व्यक्ति मारे गये। अमेरिका में बम विस्फोट के कारण भयंकर विनाश हुआ। अनेक व्यक्ति मारे गये। अन्य देशों में भी आतंकवाद पैर फैला रहा है।

आतंकवाद का लक्ष्य आतंक फैलाने का प्रमुख लक्ष्य निर्दोषों की हत्या, विमान अपहरण, विमान में बम विस्फोट, रेल एवं बसों में बम रखना, बैंकों की लूट, पानी की टंकियों एवं कुओं में जहर मिलाना, राजदूतों की हत्या इत्यादि द्वारा समाज में दशहत फैलाकर सबका मुँह बन्द कर देना है जिससे कोई भी व्यक्ति उनके विरुद्ध गवाही न दे सके। राष्ट्र प्रेमी तथा बलिदानी युवक इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं करते। वे अपने प्राणों को हथेली पर रखकर सत्य तथा न्याय से तनिक भी विचलित नहीं होते। बज्र-बिजलियों के पतझर में भी पपीहा अपना स्वर अलापता ही रहता है। आतंकवादी गतिविधियों से हमें विचलित न होकर उनका डटकर मुकाबला करना है।

17. किसी खेल का वर्णन
[2012]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. खेल की तैयारियाँ,
  3. खेल का प्रारम्भ,
  4. खेल का आँखों देखा दृश्य,
  5. खेल की समाप्ति,
  6. पुरस्कार वितरण,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना-आज वही बालक जीवन संग्राम में आगे कदम बढ़ा रहे हैं जिनको खेल के प्रति विशेष लगाव होता है। क्रीड़ा स्थल इस प्रकार का उपवन होता है जहाँ सहयोग, स्पर्धा तथा बन्धुत्व के सुरभित पुष्प विकसित होते हैं। स्पष्ट है कि शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही दृष्टियों से खेलों का विशेष महत्त्व है। खेल मानव विकास की आधारशिला होते हैं। यही कारण है कि शिक्षा के साथ खेल आवश्यक रूप से जोड़े गये हैं। इनको सभी तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है।

खेल की तैयारियाँ-हमारा विद्यालय नगर के मध्य स्थित है। विद्यालय का खेल का मैदान बड़ा विशाल एवं अच्छा है। हमारे क्रीड़ा अध्यापक जी बड़े परिश्रमी एवं सक्रिय हैं। एक दिन राजकीय इण्टर कॉलेज की ओर से क्रिकेट मैच का प्रस्ताव आया जो हमारे अध्यापक जी ने स्वीकार कर लिया तथा कॉलेज के क्रिकेट दल (टीम) को बुलाकर बता दिया। यह मैच हमारे ही मैदान में होना था। यहाँ सभी तैयारियाँ थीं। खेल के लिए रविवार का दिन निश्चित किया गया।

खेल का प्रारम्भ-रविवार के दिन प्रातः 8 बजे ही खेल के मैदान पर दोनों विद्यालयों के दल पहुँच गये थे। मैदान में पिच तैयार थी। निर्णायक महोदय बाहर के विद्यालयों से आमन्त्रित थे। दोनों दलों के कप्तान मैदान में पहुँचे, निर्णायकों ने टॉस उछाला जो हमारे विद्यालय के कप्तान ने जीता। हमारे विद्यालय की टीम के कप्तान ने पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया। खेल प्रारम्भ हो गया।

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खेल का आँखों देखा दृश्य-हमारे विद्यालय के प्रारम्भिक बल्लेबाज सुनील एवं सुशील मैदान में थे। शासकीय उ. मा. शाला के खिलाड़ी मैदान में फैले थे। उनके कप्तान ने गेंद फेंकने का दायित्व राकेश को सौंपा। खेल की पहली गेंद पर ही सुनील ने चौका जमाया। इस तरह हमारी टीम की शुरूआत बड़ी अच्छी हुई। खेल जमने लगा और तीस रन बने थे कि सुशील बाहर हो गया। तीन खिलाड़ी और बाहर चले गये। रमेश की गेंद पर सुनील को राकेश ने कैच करके बाहर कर दिया, उसके 80 रन बने थे। इसी प्रकार खेल चलता रहा। बीच-बीच में चौकों और छक्कों का आनन्द भी मिलता रहा। सभी प्रसन्न थे। हमारी टीम के 5 खिलाड़ी बाहर हुए और चालीस ओवरों में हमारे दल के 200 रन हो गये थे।

बीच में भोजन के पश्चात् शासकीय उ. मा. शाला का दल खेलने आया। उनकी भी शुरुआत बहुत अच्छी हुई। पहले दस ओवरों में उन्होंने 45 रन बना लिए, जिसमें चार चौके तथा दो छक्के भी लगाये। हमारी टीम के तेज गेंदबाज कुछ कर पाने में असमर्थ रहे। फिर हमारे स्पिनरों ने दायित्व सँभाला और एक के बाद एक उन्होंने विरोधी दल के चार खिलाड़ी 25 ओवर होने तक बाहर कर दिए। अब तक उनके रन मात्र 93 ही बन पाए थे। उनके पाँचवें तथा छठे खिलाड़ी कुछ जमे, परन्तु जैसे ही गेंद बायें हाथ के गेंदबाज धीरज ने सँभाली वे दोनों ही उखड़ गये। उनके जाते ही विरोधी दल.ऐसा निराश हुआ कि 35 ओवरों में ही उनकी समस्त टीम सिमट गयी, जबकि उनके रन 168 मात्र ही थे। इस प्रकार हमारा दल विजयी रहा।

खेल की समाप्ति-इस प्रकार 5 ओवर शेष रहते हुए भी शासकीय उ. मा. शाला का दल अपने सभी खिलाड़ी गँवाकर हार गया और निर्णायकों ने विकेट उखाड़ दिये। इस तरह खेल समाप्त हो गया। दोनों दल मण्डप में लौट रहे थे। दर्शक तालियों से विजयी दल का स्वागत कर रहे थे।

पुरस्कार वितरण-सभी खिलाड़ी मण्डप में आ गये थे। दर्शक उत्सुकता से पुरस्कार पाने वालों के विषय में जानने को बेचैन थे। शील्ड, कप आदि सजे रखे थे। उद्घोषक ने घोषणा की कि अब हमारे मुख्य अतिथि जिला विद्यालय निरीक्षक महोदय विजेताओं को पुरस्कार देंगे। इसके बाद श्रेष्ठ गेंदबाज का पुरस्कार धीरज को, श्रेष्ठ बल्लेबाज का पुरस्कार सुनील को तथा श्रेष्ठ क्षेत्ररक्षण का पुरस्कार राकेश को मिला। शील्ड हमारे विद्यालय को प्रदान की गयी।

उपसंहार-पुरस्कार वितरण के निर्णयों की सभी प्रशंसा कर रहे थे। हमारे प्रधानाचार्य जी ने खिलाड़ियों को बधाई दी। हम सभी आनन्दित होकर खेल की चर्चा करते हुए घर लौट रहे थे। इस मैच को स्मरण करने मात्र से ही मन-मयूर नृत्य करने लगता है। हृदय-वीणा झंकृत होकर आनन्द का तराना छेड़ती है। स्फूर्ति तथा शान्ति का नया संचार होता है। यथार्थ में जीवन को खिलाड़ी की भावना से जीना ही उत्तम तथा श्रेयस्कर है।

18. बालिका शिक्षा
[2012]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. बालिका शिक्षा का महत्त्व,
  3. बालिका शिक्षा के प्रयास,
  4. बालिका शिक्षा की वर्तमान स्थिति,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना-शिक्षा के बिना मानव पशु के समान है। शिक्षा ही मानव की बुद्धि का विकास करती है। शिक्षा से संसार, जीवन आदि के सत्य-असत्य का बोध होता है। इसी से भावी जीवन की आधारशिला रखी जाती है। अतः शिक्षित होना अति आवश्यक है।

बालिका शिक्षा का महत्त्व-यद्यपि बालक और बालिका दोनों के लिए ही शिक्षा का महत्त्व है। बाल्यावस्था में शिक्षित होकर वे अपने भविष्य की नींव रखते हैं किन्तु बालक से अधिक बालिका शिक्षा का महत्त्व है। आज की बालिका कल जननी होगी। वह भावी पीढ़ी का निर्माण करने वाली होगी। शिक्षित बालिका शिक्षित नारी होगी और शिक्षित माँ होगी। वह बच्चों का हर प्रकार से ठीक तरह पालन करेगी। शिक्षित बालिका पत्नी बनकर जायेगी तो घर-गृहस्थी को सही प्रकार से चलायेगी। उसका व्यवहार आदि सभी के प्रति अच्छा होगा। अत: बालिका शिक्षा का विशेष महत्त्व है।

बालिका शिक्षा के प्रयास- भारत में कई महान् विदुषी हुई हैं जिन्होंने मानव को सद्मार्ग दिखाया किन्तु मध्यकाल में नारी के प्रति दृष्टिकोण बदल गया और उसे घर की चहारदीवारी तक सीमित कर दिया गया। उसकी शिक्षा-दीक्षा बन्द प्रायः हो गई। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने बालिका शिक्षा पर ध्यान दिया। इस दिशा में अनेक प्रयास किये गये। बालिकाओं के लिए विद्यालय खोले गये। उन्हें छात्रवृत्ति, पुस्तकें आदि दी गईं। इसका सुफल सामने आ रहा है।

बालिका शिक्षा की वर्तमान स्थिति-वर्तमान में केन्द्र और राज्य सरकार बालिका शिक्षा पर विशेष बल दे रही हैं। अनेक योजनाएँ प्रारम्भ की हैं जिनसे बालिका शिक्षा की गति बढ़ रही है। छात्राओं को शुल्क से मुक्ति दे दी गई है। विभिन्न प्रकार की छात्रवृत्तियाँ, पुरस्कार, सहयोग आदि अध्ययनशील बालिकाओं को दिये जा रहे हैं। आज बालिकाएँ भी अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं। वे विद्यालय से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर रही हैं। वे समझ गई हैं कि शिक्षित होकर ही जीवन तथा राष्ट्र का सही निर्माण किया जा सकता है।

उपसंहार-बालिका शिक्षा पर विविध प्रकार से जोर दिया जा रहा है। उसका फल भी दिखाई देने लगा है किन्तु अभी आदिवासी, पिछड़े या अतिदूरस्थ क्षेत्रों में बालिका शिक्षा की कमी देखी जा रही है। इस ओर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है क्योंकि आज की बालिका कल देश की निर्माता होगी। अत: उसकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था आवश्यक है।

19. किसी यात्रा का वर्णन [2012]
अथवा
मेरी रोचक यात्रा

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. यात्रा का प्रारम्भ,
  3. मार्ग के रोचक दृश्य,
  4. भ्रमण, दर्शन, स्नान,
  5. वापिसी,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-जीवन में यात्रा का आनन्द अद्भुत होता है। मेरे पिताजी प्रतिवर्ष किसी न किसी स्थान की यात्रा का कार्यक्रम अवश्य बनाते हैं। इस वर्ष उज्जैन की यात्रा की योजना बनी। माताजी ने यात्रा की सभी सामग्री एकत्र कर ली।

यात्रा का प्रारम्भ-सांस्कृतिक नगरी उज्जैन जाने के लिए ग्वालियर से उज्जयिनी एक्सप्रेस में आरक्षण कराया गया। सभी लोग स्टेशन पर समय से पहुँच गये और गाड़ी आने पर अपनी सीटों पर बैठ गये। उस समय कुम्भ चल रहा था, अत: गाड़ी में उत्तराखण्ड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि के लोगों की भीड़ थी। सभी धार्मिक यात्रा पर जा रहे थे।

मार्ग के रोचक दृश्य-गाड़ी चलनी प्रारम्भ हुई तो मन में हिलोरें उठने लगी। मार्ग में नाना प्रकार के दृश्य दिखाई दे रहे थे। वनों की हरियाली, पर्वतों की ढलान, मैदानों के विविध प्रकार मन को आकर्षित कर रहे थे। ट्रेन में बैठे यात्रियों के दल अपनी-अपनी बोलियों में धार्मिक गीत एवं लोकगीत गा रहे थे। सभी तरफ उल्लास भरा वातावरण था। इस तरह पता ही नहीं चला कि कब उज्जैन रेलवे स्टेशन आ गया। सभी ने जल्दी-जल्दी सामान नीचे उतारा।

भ्रमण, दर्शन, स्नान-हम सभी ने धर्मशाला में कमरों में सामान रखा तथा उज्जैन भ्रमण पर निकल लिये। सबसे पहले महादेव मन्दिर गये। नदी में स्नान कर पूजा की तथा वहाँ की मान्यताओं को देखकर चमत्कृत हुए। वहाँ से जगत प्रसिद्ध महाकालेश्वर मन्दिर गये। मन्दिर में दर्शकों की बहुत लम्बी लाइन लगी थी। बहुत देर बाद गर्भगृह में प्रवेश मिला वहाँ महाकालेश्वर जी के दर्शन किये, पूजा की और परिक्रमा लगाई। इसके बाद भैरव मन्दिर, भर्तृहरि, संदीपन, कालिदास के स्मृति स्थलों आदि का भ्रमण किया। कुम्भ मेले के कारण सभी स्थानों पर भीड़ थी किन्तु व्यवस्थाएँ बहुत ठीक थीं इसलिए किसी को परेशानी नहीं हो रही थी।

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वापसी-सभी प्रमुख स्थलों का भ्रमण, दर्शन कर हमने तीसरे दिन ग्वालियर लौटने का आरक्षण उज्जैनी एक्सप्रेस में ही करा रखा था। उसी गाड़ी से अनेक यात्री लौट रहे थे। सभी तरफ मेले के दृश्यों तथा अनुभवों की बातें हो रही थीं। हमारे घर के सभी लोग बहुत प्रसन्न तथा रोमांचित अनुभव कर रहे थे। ग्वालियर स्टेशन पर उतरकर ठीक समय पर घर पहुँच गये।

उपसंहार-मैंने पचमढ़ी, इन्दौर, जबलपुर, आगरा आदि की अनेक यात्राएँ की हैं किन्तु कुम्भ मेले के अवसर पर की गयी इस यात्रा ने मुझे अनुभव करा दिया कि भारतीय संस्कृति में एकता भाव व्यापक रूप में विद्यमान है। यह यात्रा मेरी अविस्मरणीय यात्रा रही।

20. आलस्य : मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु [2016]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. आलस्य एक दुर्गुण,
  3. सक्रियता उन्नति का आधार,
  4. श्रम की महिमा,
  5. आलस्य पतन का कारण,
  6. श्रम स्वावलम्बन के विकास का मूल,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना-सक्रियता मानव जीवन के विकास की आधारशिला है। किसी कवि ने कहा है।

‘गति का नाम अमर जीवन है,
निष्क्रियता ही घोर मरण है।’

बाईबिल में कहा गया है कि “तू अपना पसीना बहाकर, अपनी रोटी कमा और खा।”

आलस्य एक दुर्गुण-आलस्य मनुष्य का सबसे हानिकारक दुर्गुण है। हमें अपने जीवन का एक क्षण भी निकम्मा रहकर नहीं गँवाना चाहिए। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, वह तो गतिमान है जो आलस्य करेगा वह जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ जायेगा।

सक्रियता उन्नति का आधार-सक्रियता से मनुष्य अपनी उन्नति के साथ-साथ देश, समाज का भी कल्याण करता है। इतिहास बताता है कि सक्रिय लोगों ने असम्भव को सम्भव बनाया है। संघर्षशील जीवन की प्रेरणा देते हुए तारा पांडेय लिखती हैं-

‘संघर्षों से क्लान्त न होना, यही आज जन-जन की वाणी।
भारत का उत्थान करो तुम, शिव सुन्दर बन कल्याणी॥’

श्रम की महिमा-महान ग्रन्थ गीता में कर्म को सर्वोपरि माना गया है। कहा गया है ‘उद्यमेन सिद्धयन्ति कार्याणि न च मनोरथै।’ ईश्वर ने हमें दो हाथ और दो पैर परिश्रम के लिए ही दिए हैं। महान विचारक चाणक्य मानते थे कि “कितने ही कठिन माध्यम हों, मैं साध्य तक पहुँच जाऊँगा।” इस श्रम साधना के द्वारा उन्होंने ऐतिहासिक सफलताएँ प्राप्त की थीं। श्रम का फल मीठा होता है। हमारे देश के निर्माता किसान और मजदूर श्रम के बल पर सफलता की ओर अग्रसर होते हैं

‘परिश्रम करता हूँ अविराम, बनाता हूँ क्यारी औ कुंज।
सींचता दृग जल से सानन्द, खिलेगा कभी मल्लिका पुंज॥’

आलस्य पतन का कारण-आलस्य मनुष्य को पतन की ओर ले जाने वाला है। आलसियों में कायरता भर जाती है। वे कुछ करना नहीं चाहते हैं। उनका जीवन निरन्तर गिरता चला जाता है। फिर वे ईश्वर को पुकारते हैं

‘कायर मन कहुँ एक अधारा। दैव-दैव आलसी पुकारा।’

श्रम स्वावलम्बन के विकास का मूल-परिश्रमी व्यक्ति में स्वावलम्बन की भावना निरन्तर विकसित होती जाती है। उसमें स्वाभिमान का भाव आता जाता है। परिश्रमी व्यक्ति प्रसन्न रहता है और दूसरों को प्रेम करता है। उसमें द्वेष, ईर्ष्या, कटुता आदि दुर्गुण नहीं होते हैं। दिनकर जी लिखते हैं-

‘श्रम होता सबसे अमूल्य धन, सब जन खूब कमाते।
सब अशंक रहते अभाव से, सब इच्छित सुख पाते॥’

उपसंहार-इस प्रकार कहा जा सकता है कि श्रम और सक्रियता जीवन को श्रेष्ठ बनाने का आधार है और आलस्य निरन्तर पतन की ओर ले जाने वाला है। आलस्य से मानव जीवन व्यर्थ चला जाता है, इसीलिए आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।

21. बिन पानी सब सून [2016]
अथवा
जल ही जीवन है

रूपरेखा [2017]-

  1. प्रस्तावना,
  2. जल का महत्त्व,
  3. जल के विविध स्रोत,
  4. जल का अभाव,
  5. जल का समस्या का समाधान,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-सृष्टि की रचना जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश और वायु-पाँच तत्त्वों से हई है। जल का इनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। संसार के दैनिक जीवन में भी जल आवश्यक तत्व है।

जल का महत्त्व-पृथ्वी के जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों, फसलों, वनस्पतियों, पेड़-पौधों, आदि सभी के लिए जल अनिवार्य है। बिना जल के इन सभी का रह पाना सम्भव नहीं है। जल से संसार में जीवंतता दिखाई देती है। चारों ओर फैली हरियाली, फसलें, फल-फूल आदि सभी जल के कारण ही जीवित हैं। मानव तो बिना जल के जीवित रह ही नहीं सकता है। अतः सृष्टि में जल विशेष महत्त्वपूर्ण है। बिना पानी के संसार सूना है। रहीम लिखते हैं

“रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।।
पानी गए न ऊबरे मोती मानुस चून॥”

जल के विभिन्न स्त्रोत-जल प्राप्त करने के कई स्रोत हैं। सागर में अथाह जल भरा है किन्तु वह खारा है, इसलिए वह हर प्रकार की पूर्ति नहीं कर पाता है। पानी का मूल स्रोत वर्षा है।

वर्षा का पानी ही नदियों, तालाबों, जलाशयों में एकत्रित होकर जल की पूर्ति करता रहता है। इसके अतिरिक्त पहाड़ों पर जमने वाली बर्फ पिघलकर जल के रूप में नदियों में आती है। कुंआ, नलकूप आदि के द्वारा पृथ्वी के नीचे विद्यमान जल को प्राप्त किया जाता है। इस तरह विविध स्रोत द्वारा जल की पूर्ति होती है।

जल का अभाव-विगत वर्षों में जल की निरन्तर कमी हो रही है। वर्षा कम हो रही है, धरती का जल स्तर लगातार गिर रहा है। जल की समस्या भारत में ही नहीं संसार भर में हो रही है। कुछ स्थानों पर तो जल के लिए त्राहि-त्राहि मची है। कुछ लोगों का मानना है कि संसार का तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए ही होगा।

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जल समस्या का समाधान-जल की कमी को देखते हुए यह आवश्यक है कि हम यह समस्या भयंकर रूप धारण करे उससे पहले ही जाग जायें। जल का पूरी तरह सदुपयोग करे। वर्षा के समय जो पानी नालों और नदियों के द्वारा बहकर समुद्र में पहुँच जाता है, उसे इकट्ठा करके उपयोग में लायें। वर्षा काल में पानी को पृथ्वी में नीचे पहुँचाया जाय तो जल स्तर ऊपर आयेगा। इसलिए इस समस्या के प्रति सजग रहना आवश्यक है।

उपसंहार-यदि समय रहते जल संरक्षण की ओर ध्यान न दिया गया तो संसार का विनाश हो जायेगा। जल के बिना किसी का भी जीवित रहना सम्भव नहीं है। बिना जल के मरण अवश्यम्भावी है। जब जगत में पशु, पक्षी, मानव आदि प्राणी ही नहीं होंगे तो संसार सूना हो जायेगा। सत्य यह है कि जल ही जीवन है। इसलिए जल के महत्त्व को ध्यान में रखकर भावी योजनाएँ बनाई जानी चाहिए।

22. इण्टरनेट : आज की आवश्यकता
[2016]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. इण्टरनेट का परिचय,
  3. इण्टरनेट के लाभ,
  4. आज के जीवन की आवश्यकता,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना-इण्टरनेट पूरे विश्व में फैले कम्प्यूटरों का नेटवर्क है, साथ ही एक कार्यालय में विद्यमान कम्प्यूटरों का भी नेटवर्क है। इण्टरनेट पर कम्प्यूटर के माध्यम से घर, बाहर यहाँ तक कि सारे संसार की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

इण्टरनेट का परिचय-इण्टरनेट अत्याधुनिक संचार प्रौद्योगिकी है जिसमें अनगिनत कम्प्यूटर एक नेटवर्क से जुड़े होते हैं। इण्टरनेट न कोई सॉफ्टवेयर है,न कोई प्रोग्राम अपितु यह तो एक ऐसा स्थान है जहाँ अनेक सूचनाएँ तथा जानकारियाँ उपकरणों की सहायता से मिलती हैं। इण्टरनेट के माध्यम से मिलने वाली सूचनाओं में विश्वभर के व्यक्तियों और संगठनों का सहयोग रहता है। उन्हें नेटवर्क ऑफ सर्वर्स (सेवकों का नेटवर्क) कहा जाता है। यह एक वर्ल्ड वाइड वेब (W.w.w.) है जो हजारों सर्वर्स को जोड़ती है।

इण्टरनेट के लाभ-इण्टरनेट के द्वारा विभिन्न प्रकार के दस्तावेज, सूची, विज्ञापन, समाचार, सूचनाएँ आदि उपलब्ध होती हैं। ये संसार में कहीं पर भी प्राप्त की जा सकती हैं। पुस्तकों में लिखे विषय, समाचार-पत्र, संगीत आदि सभी इण्टरनेट के माध्यम से प्राप्त किये जाते हैं। संसार के किसी भी कोने से कहीं पर भी सूचना प्राप्त की जा सकती है और भेजी जा सकती है। हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, कार्यालयी, औद्योगिक, शिक्षा, संस्कृति, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में इण्टरनेट उपयोगी है।

आज के जीवन की आवश्यकता-त्वरित सूचना के इस युग में इण्टरनेट अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, यात्रा, पंजीकरण, आवेदन आदि सभी कार्यों में इण्टरनेट सहयोगी है। पढ़ने वाली दुर्लभ पुस्तकों को संसार के किसी कोने में पढ़ा जा सकता है। स्वास्थ्य सम्बन्धी विस्तृत जानकारियाँ इण्टरनेट पर उपलब्ध होती हैं। इण्टरनेट के द्वारा संसार के किसी भी विशिष्ट व्यक्ति के विषय में जाना जा सकता है। सभी प्रकार के टिकट घर बैठे इण्टरनेट से लिये जा सकते हैं। दैनिक जीवन की समस्याओं को भी हल करने वाला इण्टरनेट आज के जीवन की अनिवार्यता बन गया है।

उपसंहार-सूचना प्रौद्योगिकी जगत में यदि हमें सुविधापूर्वक जीवन बिताता है तो इण्टरनेट बहुत उपयोगी है। अत: इण्टरनेट का सहयोग हमें लेना चाहिए। इससे कार्य उपयुक्त तथा त्वरित होता है। यह सभी क्षेत्रों में उपयोगी है इसीलिए इण्टरनेट आज के जीवन की आवश्यकता बन गया है।

MP Board Class 11th Hindi Solutions

MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन

MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन

पत्र लिखना आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। वह मानव-मन के भाव और सन्देश-प्रेषण का सर्वोत्तम सरल माध्यम है। पत्रों में जो बात कही जाती है, उसका प्रकाशन व्यक्तिगत रूप से अभिव्यक्त करने से उत्तम होता है, क्योंकि पत्र में निर्बाध रूप से वह अपने मनोभावों का चित्रण कर सकता है। यहाँ व्यक्तित्व का व्यवधान बीच में नहीं होता।

पत्र-लेखन की रूपरेखा

  1. प्रेषक का स्थान और पता।
  2. दिनांक।
  3. प्रेषिती को सम्बोधन।
  4. अभिवादन।
  5. पत्र का मुख्य भाग।
  6. प्रेषक का आत्मबोधन।
  7. प्रेषक के हस्ताक्षर और नाम।

औपचारिक पत्र
(कार्यालयीय एवं सरकारी पत्र)

सरकार के कार्य अनेक मन्त्रालयों, विभागों और अनेक अधीनस्थ कार्यालयों के माध्यम से सम्पन्न होते हैं। इस प्रकार जो पत्र एक सरकारी कार्यालय से दूसरे कार्यालय के मध्य एक-दूसरे को लिखे जाते हैं, वे औपचारिक पत्र (अथवा कार्यालयीय या शासकीय पत्र) कहलाते हैं। भारत सरकार की ओर से समस्त विदेशी सरकारों, राज्य सरकारों सम्बद्ध और अधीनस्थ कार्यालयों, संघ लोक सेवा आयोग तथा सरकारी, अर्द्ध-सरकारी कार्यालयों के साथ औपचारिक पत्र व्यवहार सरकारी पत्र के रूप में ही किया जाता है। इसी प्रकार राज्य सरकार की ओर से एक कार्यालय को दूसरे कार्यालय से पत्र सरकारी पत्र के रूप में ही भेजा जाता है। जनता की या सरकारी कर्मचारियों की संस्थाओं और संगठनों के साथ किये जाने वाले पत्र-व्यवहार के लिए भी इसी का प्रयोग किया जाता है।

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शासनादेश, अर्द्ध-सरकारी पत्र, गैर-सरकारी पत्र, कार्यालय स्मृति पत्र, अधिसूचना, परिपत्र प्रस्ताव या संकल्प, स्मरण पत्र, प्रेस-विज्ञप्ति प्रतिवेदन तथा नागरिक या नागरिकों द्वारा किसी अधिकारी या कार्यालय के प्रमुख को लिखे पत्र भी इसी प्रकार के होते हैं।

प्रायः इन पत्रों में प्रार्थना या सूचना या परिवाद होता है। कार्यालयीय पत्रों की संरचना सम्बन्धी निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए-

  1. सरनामा-इसमें मन्त्रालय अथवा कार्यालय का नाम होता है।
  2. पत्र-संख्या तथा दिनांक
  3. पत्र पाने वाले का नाम और/या पदनाम
  4. विषय
  5. सम्बोधन
  6. पत्र का मुख्य उद्देश्य
  7. अधोलेख
  8. भेजने वाले के हस्ताक्षर और उसका पद नाम।

सरकारी अधिकारियों को लिखे जाने वाले पत्रों का आरम्भ ‘महोदय’ के सम्बोधन से होना चाहिए। सभी सरकारी पत्रों के अन्त में अधोलेख के रूप में प्रार्थी अथवा भवदीय लिखना चाहिए।

प्रश्न 1.
नगर के सहायक मन्त्री को जल की अनियमित आपूर्ति के सम्बन्ध में शिकायती पत्र लिखिये।
अथवा
मुख्य नगर पालिका अधिकारी को अनियमित जल प्रदाय से होने वाली परेशानी का उल्लेख करते हुए नियमित जल प्रदाय के लिए एक पत्र लिखिए। [2008]
उत्तर-

दिनांक : 25.3.20…….

प्रति,
सहायक मन्त्री,
नगर पालिका, ग्वालियर

विषय : नगर में जल की अनियमित आपूर्ति के सम्बन्ध में।

महोदय,
गतवर्ष की भांति इस साल भी नगर में जल प्रदाय की स्थिति अत्यन्त शोचनीय है। वार्ड संख्या 9 के सम्पूर्ण क्षेत्र में गत तीन दिनों से जल आपूर्ति नहीं हो रही है। क्षेत्रीय नागरिक जल की कमी से आकुल व्याकुल हैं। जब शीतकाल में ही जल आपूर्ति की इस प्रकार की अव्यवस्था है तो ग्रीष्मकाल में जल आपूर्ति की क्या स्थिति होगी यह आप स्वयं ही सोच सकते हैं।

आशा ही नहीं अपितु हमें पूर्णतः विश्वास है कि आप जलापूर्ति की नियमित व्यवस्था करके अनुग्रहीत करेंगे।

सधन्यवाद।

प्रार्थी
वार्ड संख्या 9 के समस्त नागरिक

प्रश्न 2.
नगर की अनियमित विद्युत् व्यवस्था के हेतु अधिशासी अभियन्ता के लिये शिकायती पत्र लिखिए। [2009, 12, 14]
उत्तर-

दिनांक : 2.02.20….

प्रति,
अधिशासी अभियन्ता,
विद्युत् विभाग, बिलासपुर

विषय : विद्युत् की अनियमित व्यवस्था के सम्बन्ध में।

महोदय,
विनम्र निवेदन है कि आजकल गर्मी का भीषण प्रकोप है। चिलचिलाती धूप एवं उमस भरे वातावरण में जीवनयापन करना अत्यन्त ही दुष्कर हो गया है। ऐसे समय में विद्युत् की अव्यवस्था अत्यन्त परेशानी का कारण है। अतः आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को उचित निर्देश देकर विद्युत् की सुचारु आपूर्ति का आदेश प्रदान कर अनुग्रहीत करें।

प्रार्थी
वार्ड संख्या 6 के समस्त नागरिक
बिलासपुर

प्रश्न 3.
परीक्षाकाल में ध्वनि विस्तारक यन्त्र के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु जिलाधीश को आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 10, 13, 15]
उत्तर-

दिनांक : 5.01.20…..

सेवा में,
जिलाधीश महोदय,
जिला-रायपुर

विषय : परीक्षा काल में ध्वनि विस्तारक यन्त्रों पर प्रतिबन्ध लगाने के सम्बन्ध में।

महोदय,
नम्र निवेदन है कि आजकल नगर के छात्र अपनी वार्षिक परीक्षा देने के लिये रात-दिन परिश्रम कर रहे हैं। ऐसे में ध्वनि विस्तारक यन्त्र प्रातः से देर रात तक भारी शोरगुल करते रहते हैं। जिससे तीव्र ध्वनि प्रदूषण के फलस्वरूप छात्र-छात्राओं के अध्ययन में अत्यधिक व्यवधान उत्पन्न हो रहा है। अतः श्रीमानजी से विनम्र प्रार्थना है कि ध्वनि विस्तारक यन्त्र पर अविलम्ब प्रतिबन्ध लगाकर छात्रों को सुचारु रूप से अध्ययन करने की सुविधा प्रदान कर अनुग्रहीत करें।

प्रार्थी
छात्रगण
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
जिला-रायपुर

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प्रश्न 4.
आप सुदामा नगर इन्दौर में रहते हैं। आपके मोहल्ले में गन्दगी व्याप्त है, जिससे बीमारियाँ फैल रही हैं, सफाई व्यवस्था हेतु नगर निगम को पत्र लिखिए। [2016]
सेवा में,
श्रीमान् मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी
नगर निगम, इन्दौर

दिनांक : 23.09.20……

विषय-सुदामा नगर की सफाई व्यवस्था हेतु।

महोदय,
सुदामा नगर, इन्दौर का महत्त्वपूर्ण मोहल्ला है। यहाँ पर प्रतिष्ठित लोग रहते हैं किन्तु यहाँ की सफाई व्यवस्था बहुत खराब है। सड़कों पर कूड़े के ढेर लगे हैं, नालियाँ बन्द पड़ी हैं, जिससे पानी चारों ओर फैल रहा है। सीवर चॉक है, अतः उफन रही है। गन्दगी और बदबू का सभी तरफ साम्राज्य है। मक्खी-मच्छरों के प्रकोप से आक्रामक बीमारियाँ फैल रही हैं। कई घरों में लोग बीमार हैं।

सफाई की नियमित व्यवस्था का अभाव है। सफाईकर्मी या तो आते ही नहीं और आते भी हैं तो यहाँ की दशा देखकर बड़ा दल लाने की कहकर चले जाते हैं। फिर किसी के दर्शन नहीं होते हैं।

ऐसी स्थिति में आप जनहित में त्वरित कार्यवाही कर इस क्षेत्र की सफाई व्यवस्था ठीक कराने का कष्ट करें।

सधन्यवाद।
दिनांक : 23.9.20….

भवदीय
त्रिभुवन प्रसाद
सुदामा नगर, इन्दौर।

प्रश्न 5.
सचिव, माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म. प्र., भोपाल को अंक सूची खो जाने पर अंक सूची की दूसरी प्रति प्राप्त करने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए। [2008, 09, 17]
उत्तर-

दिनांक : 7.06.20……

सचिव,
माध्यमिक शिक्षा मण्डल,
मध्य प्रदेश, भोपाल

विषय : अंक सूची की अन्य प्रति प्रदान करने हेतु।

महोदय,
नम्र निवेदन यह है कि मैंने हायर सेकण्डरी बोर्ड की परीक्षा 20…. में उत्तीर्ण की थी। लेकिन मेरी अंकतालिका कहीं खो गई है। अत: मुझे अन्य विद्यालय में प्रवेश लेने के लिये इसकी दूसरी प्रति चाहिये। इसके सन्दर्भ में मुझसे सम्बन्धित जानकारी निम्नवत् है-
MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन img-1

प्रार्थी
विनीत पल्लव

प्रश्न 6.
शिवपुरी के पोस्टमास्टर को एक पत्र लिखकर रकाबगंज मुहल्ले के डाकिये (पोस्टमैन) द्वारा नियमित डाक वितरण नहीं किये जाने के सम्बन्ध में शिकायती पत्र लिखिए। [2010]
उत्तर-

दिनांक : 7.01.20….

सेवा में,
पोस्ट मास्टर,
शिवपुरी (म. प्र.)

विषय : गाँधी नगर मुहल्ले में डाक-वितरण की अनियमितता के सम्बन्ध में।

महोदय,
निवेदन यह है कि आजकल हमारे क्षेत्र गाँधी नगर में डाक वितरण की व्यवस्था नियमित रूप से नहीं हो रही है। पत्र-वितरण में लगातार अनियमितता हो रही है, इसके कारण मुहल्लावासियों को अत्यधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आवश्यक पत्र विलम्ब से मिलने के फलस्वरूप यदा-कदा बहुत नुकसान भी हो जाता है।

आशा है आप मुहल्लावासियों की परेशानी दृष्टिपथ में रखते हुए क्षेत्र के पोस्टमैन को नियमित रूप से डाक वितरण किये जाने का आदेश देंगे।

प्रार्थी
अक्षय कुलश्रेष्ठ
नं. 109-A, गांधी नगर
शिवपुरी (म. प्र)

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प्रश्न 7.
नगर पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर सूचित कीजिये कि आपके मोहल्ले में चोरी की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। [2008]
उत्तर-

दिनांक : 15.02.20….

सेवा में,
नगर पुलिस अधीक्षक,
रायपुर

विषय : सुभाष नगर में चोरी की घटनाओं में वृद्धि।

महोदय,
मैं आपको सुभाष नगर में लगातार चोरी की घटनाओं के सम्बन्ध में सूचित कर इस ओर आपका ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ, क्योंकि गत पन्द्रह दिनों में इस मोहल्ले में चोरी की लगभग पाँच-छ: घटनाएँ हो गयी हैं। इन चोरी की घटनाओं के कारण मोहल्लावासियों में भय व्याप्त है। अतः आपसे सानुरोध प्रार्थना है कि कॉलोनी में रात्रिकालीन पुलिस गश्त को अधिक सतर्क रहने का आदेश प्रदत्त करें।

कष्ट के लिए धन्यवाद।

भवदीय
विनोद शर्मा
सुभाष नगर, रायपुर

प्रश्न 8.
स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु प्राचार्य को आवेदन-पत्र लिखिए। [2011]
विषय : स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु प्राचार्य को आवेदन-पत्र लिखिए।

सेवा में,
श्रीमान् प्राचार्य
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
मुरैना (म. प्र.)

महोदय,
विनम्र निवेदन है कि मैंने आपके विद्यालय से 11वीं कक्षा नियमित छात्र के रूप में उत्तीर्ण की है। अब मेरे पिताजी का स्थानान्तरण ग्वालियर के लिए हो गया है। इसलिए मैं आगे की पढ़ाई आपके विद्यालय में करने में असमर्थ हूँ। अत: मुझे स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र प्रदान करने की कृपा करें। मुझ पर विद्यालय का कुछ भी देय नहीं है। इसका प्रमाण-पत्र संलग्न है।

दिनांक : 25.6.20….

आपका आज्ञाकारी शिष्य
विकास सिंह
कक्षा 11 ‘स’

अनौपचारिक पत्र
(सामाजिक, व्यक्तिगत, निमन्त्रण एवं बधाई पत्र)

सम्बन्धियों, मित्रों, परिचितों के बीच जिन पत्रों का आदान-प्रदान होता है, उन्हें अनौपचारिक पत्र कहा जाता है। ये पत्र पूर्णत: व्यक्तिगत विषयों से सम्बन्धित होते हैं। इन निजी पत्रों में सम्बोधन, अभिवादन तथा समापन के अंश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इनसे परस्पर स्नेह, विश्वास, मधुर सम्बन्ध तथा पत्र-लेखक की शिष्टता का संकेत मिलता है। सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र में अवस्था तथा पद के छोटेपन-बड़ेपन के आधार पर समुचित सम्बोधन, अभिवादन तथा आत्मबोधन पर पूरा ध्यान देना आवश्यक होता है।

विभिन्न सम्बन्धों के योग्य सम्बोधन, अभिवादन और आत्मबोधन की शब्दावली इस प्रकार होगी

(1) आयु तथा पद में बड़ों को
MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन img-2

(2) छोटों को
MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन img-3
MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन img-4

(3) बराबर वालों को या मित्रों को,
MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन img-5

(4) अपरिचितों को प्रिय
MP Board Class 11th Special Hindi पत्र-लेखन img-6

निमन्त्रण पत्र और बधाई पत्र लिखने की शैली भिन्न होती है। जीवन में ऐसे अनेक खुशी के अवसर आते हैं, जब हम मित्र की खुशी में यदि स्वयं सम्मिलित न हों तो भी पत्र द्वारा बधाई भेज सकते हैं।

हमारे यहाँ कोई मांगलिक अवसर हो तो हम स्वयं व्यस्तता के कारण न जाकर निमन्त्रण पत्र भेज सकते हैं।

प्रश्न 1.
अपने पिताजी को एक पत्र लिखिए जिसमें परीक्षा की तैयारी के विषय में जानकारी दी गयी हो। [2008, 14]
अथवा
अपने पिताजी को पत्र लिखिए जिसमें अध्ययन में आने वाली कठिनाइयों का उल्लेख हो। [2011]
उत्तर-

69, महात्मा गाँधी मार्ग,
भोपाल
दिनांक 18.1.20…..

पूजनीय पिताजी,
सादर चरण स्पर्श।

आपका पत्र प्राप्त हुआ। मेरी परीक्षाएँ समीप आती जा रही हैं। अतः इस समय विशेष रूप से पढ़ाई करनी पड़ रही है। आपने मेरे अध्ययन के विषय में पूछा है। मेरे लगभग सभी विषय भली प्रकार से तैयार हो चुके हैं। विज्ञान, गणित एवं अंग्रेजी के कुछेक अध्यायों में मुझे कठिनाई आ रही है। उनके लिए मैं सम्बन्धित अध्यापकगणों से मार्गनिर्देशन ले रहा हूँ। साथ ही पूर्ण हो चुके अध्यायों का मैं पुनः इस दृष्टि से पुनरावलोकन कर रहा हूँ जिससे अंकों का प्रतिशत बढ़ सके। मेरी परीक्षा प्रारम्भ होने में अभी 26 दिन शेष हैं। आप विश्वास रखिए मैं निश्चित रूप से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होऊँगा। अधिक क्या, माताजी से प्रणाम कहियेगा तथा छोटू को ढेर सारा प्यार।

आपका पुत्र
सत्येन्द्र कुमार

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प्रश्न 2.
आपके क्षेत्र में अधिक वर्षा से हुए नुकसान से दुःखी पिता को सांत्वना-पत्र लिखिए। [2012]
उत्तर-

14, राजकीय छात्रावास,
इन्दौर
दिनांक 27.8.20…

परमादरणीय पिताजी,
सादर चरण स्पर्श।

आपका कृपा पत्र मिला। पत्र से ज्ञात हुआ कि हमारे यहाँ अधिक वर्षा हुई है। अतिवृष्टि के कारण फसल नष्ट हो गयी है तथा पशुओं में भी बीमारी फैल गयी है। आदमी भी बीमार हो रहे हैं। स्थिति बहुत खराब है। यह जानकर बहुत दुःख हुआ किन्तु मेरा निवेदन है कि आप चिन्ताग्रस्त न हों। ईश्वर सबका भला करेंगे। जिन्होंने वर्षा के द्वारा हानि की है वे आगे की फसल में इस हानि की भरपाई कर देंगे। अधिक वर्षा से रबी की फसल बहुत अच्छी होगी। मैं भी कम खर्च में काम चलाऊँगा। अत: आप दुःखी न हों।

घर पर माताजी को चरण स्पर्श, छोटी बहन को स्नेह।

आपका आज्ञाकारी पुत्र
चरत

प्रश्न 3.
अपने बड़े भाई के विवाह में सम्मिलित होने के लिए अपनी सहेली/मित्र को निमन्त्रण-पत्र लिखिए। [2017]
अथवा
अपनी बहन के विवाह में सम्मिलित होने के लिए मित्र को पत्र लिखिए। [2008,09]
उत्तर

20, बड़ा बाजार,
जबलपुर
दिनांक 3.1.20….

प्रिय बहिन कविता,

सप्रेम नमस्ते।
अत्यन्त हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहती हूँ कि मेरे बड़े भाई का विवाह दिनांक 3.2.20…. को सम्पन्न होना है। कार्यक्रम 1.2.20…. से ही प्रारम्भ हो जायेंगे। अतः इस शुभ अवसर पर तुम सपरिवार आमन्त्रित हो। मैं चाहती हूँ कि तुम 1.2.20… से पूर्व ही आ जाओ। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगी।

तुम्हारी सहेली
अंशु

प्रश्न 4.
अपने मित्र को छोटे भाई के जन्म-दिवस पर आमन्त्रित करने के लिए पत्र भेजिए।
उत्तर-

सरस्वती रोड, सागर
दिनांक 6 जनवरी, 20….

प्रिय मित्र राजू !

सप्रेम नमस्ते।
तुम्हें यह लिखते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि मेरा छोटा भाई संजीव 5 वर्ष का हो जायेगा। अत: दिनांक 16 जनवरी, 20…. को हम उसके जन्म-दिन समारोह के उपलक्ष में सभी भाई-बहिनों के साथ तुमको सहर्ष आमन्त्रित कर रहे हैं। समारोह में सम्मिलित होकर चि. संजीव की खुशी में सहभागी बनें। अवश्य आना।

तुम्हारी प्रतीक्षा में।

तुम्हारा प्रिय मित्र
संजय

प्रश्न 5.
अपनी सहेली/मित्र को उसके जन्म-दिवस पर बधाई-पत्र भेजिए। [2008, 09]
उत्तर-

58, छोटा सर्राफा, इन्दौर
दिनांक 20 जनवरी, 20….

प्रिय नीतू !

अनेकानेक बधाइयाँ।
तुम्हारी 16वीं वर्षगाँठ मोदप्रदाता एवं मंगलमयी हो। भावी जीवन की सुखद कामना के साथ तुम्हें एक बार पुनः बधाई।

तुम्हारी शुभेच्छु
स्वाति

प्रश्न 6.
हाईस्कूल परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर मित्र को बधाई-पत्र लिखिए। [2013]
उत्तर-

9/25, गुलमोहर कालोनी, सागर
दिनांक 25.1.20….

प्रिय मित्र रमेश,

सस्नेह नमस्कार।
आज नवजागरण में हाईस्कूल परीक्षा का परिणाम देखा। आपका अनुक्रमांक प्रथम श्रेणी में देखकर मेरा मन मयूर-मस्त होकर नृत्य करने लगा। आपका प्रावीण्य सूची में तृतीय स्थान है। इससे आप ही नहीं, शाला तथा हम लोग भी गौरवान्वित हुए हैं। अत: बधाई स्वीकार हो। मैं परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि वह इसी प्रकार आपको सदैव सफलताएँ प्रदान करता रहे और आप सुन्दर सम्पन्न जीवन में विहार करते रहें।

आपका मित्र
सतीश वर्मा

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प्रश्न 7.
वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर अपने मित्र को बधाई पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर-
प्रिय मित्र रजनीकान्त

सूबात् रोड, मुरैना
9.8.20….

सप्रेम नमस्कार।
समाचार पत्र से ज्ञात हुआ कि तुमने शिक्षा विभाग द्वारा आयोजित की गयी मण्डलीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। तुम्हारी इस सफलता से मेरा मन उल्लसित हो रहा है, मेरी ओर से स्नेहपूर्ण हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। मेरी हार्दिक कामना है कि तुम सफलता की इन ऊँचाइयों को हमेशा चूमते चले जाओ।

मेरे माता-पिता भी तुम्हारी इस सफलता से अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं। अपने पूज्य माताजी तथा पिताजी को मेरा सादर चरण स्पर्श कहना, छोटों को स्नेह।

पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में।

तुम्हारा शुभेच्छु
पल्लव

प्रश्न 8.
अपने मित्र को, आपके गाँव में वृक्षों की कटाई का वर्णन करते हुए, पत्र लिखिए। [2015]

73, प्रेमनगर, ग्वालियर
23.4.20……

प्रिय मित्र राजेश,

सप्रेम नमस्कार।
हाँ सभी कुशल हैं, आशा है तुम्हारे यहाँ भी सभी कुशल होंगे। मैं इस पत्र से तुम्हें बताना चाहता हूँ कि हमारे गाँव में आजकल वृक्षों की भयंकर कटाई चल रही है। हमारा गाँव सारे क्षेत्र में हरा-भरा था। यहाँ कई बाग थे। किन्तु पिछले वर्ष से गाँव के लोगों ने वृक्षों को काटना प्रारम्भ कर दिया है। उन्हें समझाते हैं तो वे कहते हैं कि वृक्ष कट जायगा तो फसल अधिक होगी। वे मानते ही नहीं हैं। वृक्षों का काटना संकट को निमन्त्रण देना है परन्तु मैं इसे रोक नहीं पा रहा हूँ।

घर के समाचार बताना। आदरणीय माताजी-पिताजी को चरण स्पर्श, छोटों को स्नेह।

आपका मित्र
प्रदीप

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