MP Board Class 11th Special Hindi अपठित पद्यांश

MP Board Class 11th Special Hindi अपठित पद्यांश

MP Board Class 11th Special Hindi अपठित पद्यांश

(1) क्रुद्ध नभ के वज्रदंतों,
में उषा है मुस्कराती,
घोर, गर्जनमय गगन के,
कंठ में खग-पंक्ति गाती।
एक चिड़िया चोंच में तिनका,
लिये जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन,
उनचास को नीचा दिखाती।
नाश के दुःख से कभी,
दबता नहीं निर्माण का सुख,
प्रलय की निस्तब्धता से,
सृष्टि का नवगान फिर-फिर।
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
सृष्टि का निर्माण फिर-फिर।

प्रश्न
1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
2. इस पद्यांश का शीर्षक लिखो।
उत्तर-
(1) प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने मानव को सदैव आशा के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दी है। जैसे आकाश में काले बादलों के पश्चात् प्रात:काल उषा का आगमन होता है। आकाश में बादल घोर गर्जना करते हैं। पक्षी उसकी तनिक भी परवाह न करके अपने घोंसला बनाने में संलग्न रहते हैं। इसी प्रकार सृष्टि में दुःख-सुख का चक्र चलता है। प्रलय के पश्चात् नया जीवन प्रारम्भ होता है।
(2) शीर्षक ‘नव निर्माण’।

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(2) “तुम हो धरती के पुत्र न हिम्मत हारो,
श्रम की पूँजी से अपना काज सँवारो।
श्रम की सीपी में ही वैभव पलता है,
तब स्वाभिमान का दीप स्वयं ही जलता है।
मिट जाता है दैन्य स्वयं क्षण में,
छा जाती है नव दीप्ति धरा के कण में,
जागो, जागो श्रम से नाता तुम जोड़ो,
पथ चुनो कर्म का, आलस भाव तुम छोड़ो।”

प्रश्न
1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
2. प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
उत्तर-
(1) कवि कहता है कि जिस प्रकार से सृष्टि में परिवर्तन होता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में भी निरन्तर परिवर्तन होता है। अत: व्यक्ति को जीवन में निराश नहीं होना चाहिये। सदैव स्वाभिमान के साथ परिश्रम करते हुए उद्यम ही सुख की निधि है। श्रम वैभव का प्रवेश द्वार है इसी के कारण स्वाभिमान की भावना जागृत होती है तथा निर्धनता समाप्त हो जाती है। मानव को प्रमाद त्यागकर श्रम करना चाहिये।
(2)शीर्षक-श्रम की महत्ता’।

(3) “प्राचीन हो या नवीन छोड़ो रूढ़ियाँ जो हो बुरी,
बनकर विवेकी तुम दिखाओ हंस जैसी चातुरी।
प्राचीन बातें ही भली हैं यह विचारों अलीक है,
जैसी अवस्था हो जहाँ, तैसी व्यवस्था ठीक है।
सर्वज्ञ एक अपूर्व युग का हो रहा संचार है,
देखो दिनों दिन बढ़ रहा विज्ञान का विस्तार है।
अब तो उठो क्यों पड़ रहे हो व्यर्थ सोच विचार में,
सुख दूर जीना भी कठिन है श्रम बिना संसार में।”

प्रश्न
1. इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
2. इस पद्यांश का शीर्षक बताइए।
उत्तर-
(1) हंस का नीर क्षीर विषय ज्ञान विश्वविख्यात है। कवि के मतानुसार मानव को प्राचीन अथवा नवीन रूढ़ियाँ जो उसकी उन्नति में बाधक हैं, उन्हें त्यागकर कल्याणकारी नीतियाँ ग्रहण करनी चाहिये तथा सड़ी-गली रूढ़ियों का मोह त्याग देना चाहिए।
(2) शीर्षक प्रगतिशील दृष्टिकोण’।

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(4) “निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिये
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
तुम कल्पना करो।
अब देश है स्वतन्त्र, मेदिनी स्वतन्त्र है
मधुमास है स्वतन्त्र, चाँदनी स्वतन्त्र है,
हर दीप स्वतन्त्र, रोशनी स्वतन्त्र है।
अब शक्ति की ज्वलन्त दामिनी स्वतन्त्र है।
लेकर अनन्त शक्तियाँ संघ समृद्धि की
तुम कामना करो, किशोर कामना करो,
तुम कामना करो।”

प्रश्न
1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
2. प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक लिखिए।
उत्तर-
(1) कवि नवयुवकों को प्रेरणा प्रदान करते हुए कह रहा है कि तुम्हें नयी-नयी आजादी मिली है फलतः राष्ट्र को सजाने-सँवारने का काम तुम्हारे कंधों पर टिका है। अपनी पृथ्वी, अपना मधुमास एवं चाँदनी भी स्वतन्त्र है, प्रत्येक दीपक स्वतन्त्र है। शक्ति उदात्त स्रोत दामिनी (बिजली) भी स्वतन्त्र है। अतः इन शक्तियों के माध्यम से देश का नया निर्माण करना है।
(2) शीर्षक—देश का नव निर्माण’।

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MP Board Class 11th Special Hindi अपठित गद्यांश

MP Board Class 11th Special Hindi अपठित गद्यांश

अपठित गद्यांशों/पद्यांशों के शीर्षक एवं सारांश लेखन

निर्देश : अपठित गद्यांश/पद्यांश वह रचना है, जो पूर्व में पढ़ा हुआ नहीं होता। इसके द्वारा छात्रों के बौद्धिक स्तर और पाठ्येत्तर मनन-अध्ययन का पता चलता है। जिस छात्र का भाषा ज्ञान जितना समृद्ध होता है, वह अपठित गद्यांश/पद्यांश को उतनी ही सरलता से हल कर सकता है।
अपठित गद्यांश/पद्यांश हल करते समय निम्नांकित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. मूल अवतरण का बड़ी एकाग्रता से समग्र वाचन कर, उसके मूल भाव को समझने का प्रयास कीजिए। वाचन कम से कम चार बार कीजिए।
  2. मूल भाव से शीर्षक ज्ञात हो जाता है उसे अलग से लिख लीजिए।
  3. प्रश्नों के उत्तर मूल अवतरण में सन्निहित होते हैं। उनके अनुसार अपनी भाषा में उत्तर दीजिए।
  4. मूल अवतरण का एक-तिहाई में सारांश दीजिए। सारांश ऐसा सुगठित होना चाहिए कि उसमें सभी प्रमुख बातें आ जायें।
  5. वर्तनी की भूलों से बचने का प्रयास कीजिए।
  6. शीर्षक सरल, संक्षिप्त और सारगर्भित होना चाहिए। यहाँ कुछ गद्यांश एवं पद्यांश दिये गये हैं, उनका गम्भीरतापूर्वक मनन कीजिए।

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MP Board Class 11th Special Hindi अपठित गद्यांश

(1) उदारता का अभिप्राय केवल मिःसंकोच भाव से किसी को धन दे डालना ही नहीं वरन् दूसरों के प्रति उदार भाव रखना भी है। उदार पुरुष सदा दूसरों के विचारों का आदर करता है और समाज में सेवक भाव से रहता है। यह न समझो कि केवल धन से उदारता हो सकती है। सच्ची उदारता इस बात में है कि मनुष्य को मनुष्य समझा जाए। धन की उदारता के साथ सबसे बड़ी एक और उदारता की आवश्यकता है। वह यह है कि उपकृत के प्रति किसी प्रकार का अहसान न जताया जाए। अहसान दिखाना उपकृत को नीचा दिखाना है। अहसान जताकर उपकार करना अनुपकार है। [2012]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) उदार पुरुष की क्या विशेषता होती है?
(3) सच्ची उदारता किसमें है?
(4) अनुपकार क्या है?
(5) विरुद्धार्थी लिखिए-उदार, सच्ची।
उत्तर-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक ‘उदारता का अर्थ’ है।
(2) उदार पुरुष दूसरों के प्रति उदार भाव रखता है। वह दूसरों के विचारों का आदर करता है और समाज में सेवक भाव से रहता है।
(3) सच्ची उदारता इस बात में है कि मनुष्य को मनुष्य समझा जाय।
(4) अहसान जताकर उपकार करना अनुपकार है।
(5) उदार-कठोर, सच्ची -झूठी।

(2) जो साहित्य मुर्दे को भी जिन्दा करने वाली संजीवनी औषधि का भण्डार है, जो साहित्य पतितों को उठाने वाला और उत्पीड़ितों के मस्तक को उन्नत करने वाला है, उसके उत्पादन और संवर्धन की चेष्टा जो गति नहीं करती वह अज्ञानांधकार की गर्त में पड़ी रहकर किसी दिन अपना अस्तित्व ही खो बैठती है। अतएव समर्थ होकर भी जो मनुष्य इतने महत्वशाली साहित्य की सेवा और श्री वृद्धि नहीं करता अथवा उससे अनुराग नहीं रखता वह समाज द्रोही है, वह देश द्रोही है, वह जाति द्रोही है। [2013]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) संजीवनी औषधि का भण्डार क्या है?
(3) साहित्य के संवर्धन की चेष्टा कब अपना अस्तित्व खो बैठती है?
(4) समाजद्रोही एवं देशद्रोही कौन है?
(5) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक ‘सत्साहित्य की महत्ता’।
(2) संजीवनी औषधि का भण्डार प्रेरक साहित्य है।
(3) साहित्य के संवर्धन की चेष्टा गतिहीन होने पर अपना अस्तित्व खो बैठती है।
(4) महत्वशाली साहित्य की सेवा और श्री वृद्धि न करने वाला मनुष्य समाजद्रोही एवं देशद्रोही है।
(5) सारांश-मुर्दे में जान डालने वाले, पतितों एवं उत्पीड़ितों को उन्नत बनाने वाले साहित्य के उत्पादन एवं संवर्धन की चेष्टा अनिवार्य है। जो सामर्थ्यवान मनुष्य श्रेष्ठ साहित्य की सेवा नहीं करता है वह राष्ट्र विरोधी है।

(3) मनुष्य के कर्त्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के भले और बुरे कर्मों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहता है और अन्त में यदि उसका मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपने कर्म का पालन करता है और यदि उसका मन कुछ काल तक दुविधा में पड़ा रहा तो स्वार्थता निश्चित उसे आ घेरेगी और उसका चरित्र घृणा योग्य हो जायेगा। (2009)

प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का सार 30 शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
(1) कर्त्तव्य-पालन।
(2) मन की दृढ़ता के अभाव में मनुष्य सद्-असद् को पहचान नहीं पाता। आत्मा मनुष्य को कर्त्तव्य का ज्ञान कराती है, इसके विपरीत दुविधा में पड़ा व्यक्ति स्वार्थ के वशीभूत होकर अपने चरित्र को घृणित बना लेता है।

(4) “कई लोग समझते हैं कि अनुशासन और स्वतन्त्रता में विरोध है, किन्तु वास्तव में यह भ्रम है। अनुशासन द्वारा स्वतन्त्रता नहीं छीनी जाती, बल्कि दूसरों की स्वतन्त्रता की रक्षा होती है। सड़क पर चलने के लिए हम स्वतन्त्र हैं। हमें बाईं तरफ से चलना चाहिए, किन्तु हम चाहें तो बीच से भी चल सकते हैं। इससे हम अपने प्राण तो संकट में डालते हैं, दूसरों की स्वतन्त्रता भी छीनते हैं। विद्यार्थी भारत के भावी राष्ट्र-निर्माता हैं। उन्हें अनुशासन के गुणों का अभ्यास अभी से करना चाहिए जिससे वे भारत के सच्चे सपूत कहला सकें।”

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सार लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
(1) प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अनुशासन आवश्यक है। इससे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के साथ-साथ दूसरों की स्वतन्त्रता की भी रक्षा होती है अपना जीवन सुरक्षित होता है और दूसरों का भी। भविष्य के आशा पुंज विद्यार्थियों को अनुशासन में रहना चाहिए, जिससे वे भावी भारत का स्वस्थ निर्माण कर सकें।
(2) अनुशासन और विद्यार्थी जीवन।

(5) संस्कार ही शिक्षा है। शिक्षा इन्सान को बनाती है। आज के भौतिक युग में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य सुख पाना रह गया है। अंग्रेजों ने देश में अपना शासन सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए ऐसी शिक्षा को उपयुक्त समझा, यह विचारधारा हमारी मान्यता के विपरीत है। आज की शिक्षा प्रणाली एकांगी है, उसमें व्यावहारिकता का अभाव है, श्रम के प्रति निष्ठा नहीं है। प्राचीन शिक्षा प्रणाली में आध्यात्मिक तथा व्यावहारिक जीवन की प्रधानता थी। यह शिक्षा केवल नौकरी के लिए नहीं थी। अत: आज के परिवेश में आवश्यक हो गया है कि इन दोषों को दूर किया जाये अन्यथा यह दोष सुरसा के समान हमारे सामाजिक जीवन को निगल जाएगा। [2010, 14]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(2) आज के युग में शिक्षा का क्या उद्देश्य है?
(3) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) संस्कार की महत्ता।
(2) आज के युग में शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी करके उदर पूर्ति तथा सुख पाना रह गया है।
(3) संस्कारों के द्वारा मनुष्य वाली शिक्षा भौतिक सुखों को प्रदान करने वाली हो गयी है। शासन चलाने के उद्देश्य से प्रारम्भ हुई इस शिक्षा में व्यावहारिकता, परिश्रम तथा आध्यात्मिकता का अभाव है। शिक्षा से इन दोषों को दूर करना आवश्यक है।

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(6) ‘जनता के साहित्य’ का अर्थ जनता को तुरन्त ही समझ में आने वाले साहित्य से हरगिज नहीं है। अगर ऐसा होता तो ‘किस्सा तोता मैना’ और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते। साहित्य के अन्दर सांस्कृतिक भाव होते हैं। सांस्कृतिक भावों को पाने के लिए बुलन्दी बारीकी और खूबसूरती को पहचानने के लिए, उस असलियत को पाने के लिए जिसका नक्शा साहित्य में रहता है, सुनने या पढ़ने वाले की कुछ स्थिति अपेक्षित होती है। वह स्थिति है उसकी शिक्षा, उसके मन के सांस्कृतिक परिष्कार की, जबकि साहित्य का उद्देश्य सांस्कृतिक परिष्कार है, मानसिक परिष्कार है। [2008]

प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) जनता के साहित्य का क्या अर्थ है?
(3) सांस्कृतिक भावों को ग्रहण करने के लिए क्या जरूरी है?
(4) साहित्य के अन्दर क्या होता है?
(5) साहित्य का उद्देश्य क्या है?
उत्तर-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक ‘जनता के साहित्य का अर्थ’ है।
(2) जनता के साहित्य का अर्थ है सांस्कृतिक भावों को पाने की सूक्ष्म पहचान एवं जनता के सांस्कृतिक और मानसिक परिष्कार की स्थिति को प्राप्त करने वाला साहित्य।
(3) सांस्कृतिक भावों को ग्रहण करने के लिए सुनने वाले की शिक्षा उसके मन का सांस्कृतिक और मानसिक परिष्कार जरूरी है।।
(4) साहित्य के अन्दर सांस्कृतिक भाव निहित होते हैं।
(5) साहित्य का उद्देश्य है सांस्कृतिक और मानसिक परिष्कार ।

(7) कवि अपनी कल्पना.के पंखों से, इसी विश्व के गीत लेकर अनन्त आकाश में उड़ता है और उन्हें मुक्त व्योम में बिखेरकर अपने भाराक्रान्त हृदय को हल्का कर फिर अपने विश्व नीड़ में लौट आता है। इस क्रिया से कवि अपने जीवन की विश्रान्ति पाता है और स्वस्थ होकर वह नूतन प्रभाव में नूतन हृदय से नित नूतन संसार का स्वागत करता है। यदि ऐसा न हो तो कवि भी अन्य सांसारिक प्राणियों की भाँति ही, विश्व के कोलाहल में ही अपने आपको खो दे और उसके द्वारा संसार को उन अमृत गीतों से वंचित रहना पड़े जिनके सरल शीतल स्रोत में बहकर मानव जगत् अपने संतप्त प्राणों को सान्त्वना का अनुलेप प्राप्त करता है। [2008, 09]

प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) कवि अपने भाराक्रान्त हृदय को किस प्रकार हल्का करता है?
(3) कवि नित नूतन संसार का स्वागत कैसे करता है?
(4) अमृत गीतों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक कवि की कल्पना’ है।
(2) कवि अपने भाराक्रान्त हृदय को विश्व के गीतों को आकाश में उड़ते हुए उन्हें मुक्त व्योम में बिखेरकर हल्का करता है।
(3) कवि अपने जीवन में स्वस्थ रहते हुए जीवन में शान्ति प्राप्ति से नित नये प्रभाव से नूतन संसार का स्वागत करता है।
(4) अमृत गीतों से तात्पर्य शीतल स्रोत द्वारा मानव के अतृप्त मन को तृप्त करना है।

(8) हम एक ऐसे सभ्य समाज में जिन्दा हैं जिसमें सभ्यता जैसे-जैसे विकसित हुई वैसे-वैसे आदमी जंगली और नंगा होता गया। सोचो कौन से कारण हैं कि कुछ लोग बहुत से लोगों की रोटियाँ माल गोदामों में बन्द किए हुए हैं। लोग भूख से बिलबिला रहे हैं और उन्हें दामों के बढ़ने का इन्तजार है। मानवता को रौंदते हुए अपने लाभ के लिए जीवन रक्षक दवाएँ तक नकली बनाने में लगे हुए हैं। कपड़ा मिलों में रात-दिन कपड़ा बनाया जा रहा है और लोग नंगे है। खेतों में फसलें लहलहा रही हैं और किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं। रेखाएँ, रेखा गणित से बाहर आकर गरीबों की बस्तियों में बस गयी हैं। एक को दूसरे की चिन्ता नहीं है। हर आदमी स्वार्थ में अन्धा हो गया है। बर्बरता जंगलीपन की निशानी मानी जाती है, सभ्य समाज और सभ्यता को तो उससे दूर ही रहना चाहिए। [2008]

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) हम कैसे समाज में जिन्दा हैं?
(3) कुछ लोग क्या कर रहे हैं?
(4) आदमी स्वार्थ में कैसा हो गया है?
(5) सभ्य समाज को किससे दूर रहना चाहिए?
उत्तर-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक ‘बर्बर समाज’ है।
(2) हम सभ्य समाज में जिन्दा हैं।
(3) कुछ लोग बहुत से लोगों की रोटियाँ मालगोदामों में बन्द किए हुए हैं।
(4) आदमी स्वार्थ में अन्धा हो गया है।
(5) सभ्य समाज को जंगलीपन से दूर रहना चाहिए।

(9) हमें स्वराज्य मिला परन्तु सुराज आज भी हमसे बहुत दूर है। कारण स्पष्ट है, देश को समृद्ध बनाने के उद्देश्य से कठोर परिश्रम करना न हमने सीखा है, न सीखने के लिए ईमानदारी से उस ओर उन्मुख ही हैं। श्रम का महत्त्व न तो हम जानते हैं, न मानते हैं। हमारी नस-नस में आराम तलबी समाई है। हाथ से काम करने को हीनता समझते हैं। कामचोरी से हमारा नाता घना है। कम से कम काम करके अधिक दाम पाने की दूषित मनोवृत्ति राष्ट्र की आत्मा में घर कर गई है। इससे हमें मुक्त होना होगा और आज की अपेक्षा कई गुना कठिन परिश्रम करना होगा। तभी देश आगे बढ़ेगा, समाज सुखी होगा और तभी स्वराज्य सुराज में परिणित होगा। [2011]

प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) सुराज हमसे दूर क्यों है?
(3) लेखक ने किस दूषित मनोवृत्ति की ओर संकेत किया है?
(4) स्वराज्य, सुराज में कब परिणित होगा?
उत्तर-
(1) शीर्षक ‘श्रम का महत्त्व’।
(2) सुराज हमसे इसलिए दूर है क्योंकि न हमने कठिन परिश्रम करना सीखा है और न सीखने का प्रयास कर रहे हैं। हमने श्रम के महत्त्व को स्वीकार नहीं किया है।
(3) कामचोरी से नाता जोड़ने वाले हम लोगों की कम से कम काम करके अधिक से अधिक दाम पाने की दूषित वृत्ति की ओर लेखक ने संकेत किया है।
(4) हम आज से कई गुना कठिन परिश्रम करेंगे तभी देश का विकास होगा। कठोर श्रम से ही समाज सुखी होगा और तब ही स्वराज्य सुराज में परिणित होगा।

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(10) लक्ष्य-बेधन की महत्त्वाकांक्षा भी एक उपकरण है। जब तक महान् लक्ष्य को प्राप्त करने की बलवती आकांक्षा मानव-हृदय में जाग्रत न होगी, तब तक वह कभी भी कृत-संकल्प होकर न लक्ष्य को स्थिर कर सकेगा, न उसके बेधन के लिए प्रेरित होगा। लक्ष्य-बेध की ओर बढ़ते हुए पथिक को यह शक्ति प्रदान करती है। इसमें स्वार्थ की भावना नहीं होनी चाहिए, मनुष्य को नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में ही महत्त्वाकांक्षी होना चाहिए। इस कार्य में आशा, आत्म-विश्वास और तन्मयता के साथ-साथ संकल्प दृढ़ता भी होनी चाहिए। संकल्पों में शिथिलता मनुष्य को लक्ष्य से दूर करती है।

प्रश्न-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का सार 30 शब्दों में लिखिए।
(2) उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
(1) वही मनुष्य लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है, जो प्रतिपल आगे बढ़ने की दृढ़ इच्छा रखता है। उसमें स्वार्थ की भावना नहीं आनी चाहिए। वह आशा, आत्म-विश्वास, तन्मयता और दृढ़ संकल्प के गुणों से ओत-प्रोत होना चाहिए।
(2) महत्त्वाकांक्षा और संकल्प बल।

(11) जनसंख्या विस्फोट से सारा देश भयाक्रान्त है। जहाँ भी जाओ लोगों की अनन्त भीड़ दिखाई देती है। महानगरों में तो लोगों का पैदल चलना मश्किल हो गया है। चारों तरफ बेरोजगारी का संकट छाया हुआ है। निर्धनता मुँह फैलाए खड़ी है। लोगों का जीवन स्तर गिरता जा रहा है। गरीब और गरीब होते जा रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की समस्या आदि का संकट गहराता जा रहा है। आबादी और साधनों का सन्तुलन टूट चुका है। [2015, 17]

प्रश्न-
(1) उक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।
(2) लोगों का पैदल चलना कहाँ मुश्किल हो गया है?
(3) चारों तरफ कौन-सा संकट छाया हुआ है?
(4) सारा देश किससे भयाक्रांत है?
(5) ‘संकट’ और ‘गरीब’ शब्दों के समानार्थी शब्द लिखो।
(6) उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘जनसंख्या विस्फोट’।
(2) महानगरों में लोगों का पैदल चलना मुश्किल हो गया है।
(3) चारों तरफ बेरोजगारी का संकट छाया हुआ है।
(4) सारा देश ‘जनसंख्या विस्फोट’ से भयाक्रान्त है।
(6) सारांश-जनसंख्या विस्फोट के कारण अनन्त भीड़ बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी, निर्धनता बढ़ रही है। गिरते जीवन स्तर के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की समस्या विकट
हो रही है। आबादी और साधनों में कोई संतुलन नहीं रह गया है।

(12) ‘चरित्र एक ऐसा हीरा है, जो हर किसी पत्थर को घिस सकता है।’ चरित्र केवल शक्ति ही नहीं सब शक्तियों पर छा जाने वाली महाशक्ति है। जिसके पास चरित्र रूपी धन होता है,
शब्द उसके सामने संसार भर की विभूतियाँ, सम्पत्तियाँ और सुख-सुविधाएँ घुटने टेक देती हैं। चरित्र एक साधना है जिसे अपने प्रयास से पैदा किया जा सकता है। सद्गुणों पर चलकर, प्रेम, करुणा, मानवता, अहिंसा को अपनाना तथा लोभ, मोह, निंदा, उग्रता, क्रोध, अहंकार को छोड़कर चरित्र बल प्राप्त किया जा सकता है। चरित्रवान व्यक्ति छाती तानकर, नजरें उठाकर शान से जीता है। [2016]

प्रश्न-
(1) गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(2) चरित्रवान व्यक्ति किस प्रकार जीवन जीता है?
(3) चरित्रवान व्यक्ति के सामने कौन घुटने टेक देता है?
(4) गद्यांश का सारांश 30 शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
(1) शीर्षक-‘चरित्र बल’।
(2) चरित्रवान व्यक्ति छाती तानकर और नजरें उठाकर शान से जीता है।
(3) चरित्रवान व्यक्ति की सामने समस्त संसार की विभूतियाँ, सम्पत्तियाँ और सुख-सुविधाएँ घुटने टेक देती हैं।
(4) सारांश-चरित्र वह महाशक्ति है जिसके सामने सभी घुटने टेकते हैं। इसकी प्राप्ति लोभ, मोह, निंदा, क्रोध आदि अवगुणों को छोड़कर प्रेम, करुणा, अहिंसा आदि सद्गुणों के अपनाने से होती है। चरित्रवान छाती तानकर व नज़र उठाकर जीता है।

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MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 7-12)

MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 7-12)

7. विष्णु प्रभाकर

  • जीवन-परिचय

एकांकी कला के क्षेत्र में नवीनता का संचार करने वाले विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, सन् 1912 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के अन्तर्गत मीरनपुर नामक ग्राम में हुआ। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा मुजफ्फरनगर में ही सम्पन्न हुई। आपने बी. ए. की परीक्षा पंजाब विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। हिन्दी की प्रभाकर परीक्षा उत्तर्ण करने पर आपके नाम के साथ ‘प्रभाकर’ स्थायी रूप से जुड़ गया। आपने आकाशवाणी के दिल्ली केन्द्र पर ड्रामा प्रोड्यूसर के रूप में कार्य किया है। आज भी आप साहित्य सृजन में संलग्न हैं।

  • साहित्य-सेवा

विष्णु प्रभाकर वर्षों तक आकाशवाणी के दिल्ली केन्द्र पर ड्रामा प्रोड्यूसर रहे। इसलिए आपकी नाट्य कला में विकास एवं परिष्कार होता गया। आपने पर्याप्त मात्रा में रेडियो रूपक लिखे। आपने बाल भारती’ पत्रिका का सफल सम्पादन किया।

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  • रचनाएँ

बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न प्रभाकर जी ने नाट्य साहित्य के अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रावृत, निबन्ध, बाल-साहित्य आदि का विपुल साहित्य सृजित किया है। ‘इन्सान संघर्ष के बाद’, ‘प्रकाश और परछाई’, ‘गीत और गोली’, ‘स्वाधीनता संग्राम’, ‘ऊँचा पर्वत गहरा सागर’, ‘मेरे श्रेष्ठ रंग एकांकी’ आदि आपके उल्लेखनीय एकांकी संग्रह हैं।

  • वर्ण्य विषय

विषय वस्तु की दृष्टि से आपके एकांकी इस प्रकार विभक्त किए जा सकते हैं

  1. सामाजिक-‘बन्धन मुक्त पाप’, ‘इन्सान’, ‘साहस’, ‘वीर पूजा’, ‘नया समाज’, ‘नये पुराने’, ‘प्रतिशोध’, ‘देवताओं की घाटी’ आदि।
  2. मनोवैज्ञानिक-‘ममता का विष’, भावना और संस्कार’,’जज का फैसला’, हत्या के बाद’ आदि।
  3. राजनीतिक-‘हमारा स्वाधीनता संग्राम’, ‘क्रान्ति’, ‘काँग्रेसमैन बनो’ आदि।
  4. पौराणिक-‘जन्माष्टमी’, ‘नहुष का पतन’, ‘शिवरात्रि’, ‘गंगा की गाथा’,’कंस मर्दन’, ‘सम्भवामि युगे-युगे’ आदि।
  5. हास्य व्यंग्य प्रधान-‘मूर्ख’, ‘पुस्तक कीट’, कार्यक्रम’, ‘प्रो. लाल’ आदि।

इसके अतिरिक्त ‘नया कश्मीर’, ‘पंचायत’ आदि विविध विषयक एकांकी आपने लिखे हैं।

  • भाषा

प्रभाकर जी की भाषा सरल, सुबोध साहित्यिक खड़ी बोली है। तत्सम प्रधान भाषा में तद्भव, विदेशी तथा देशज शब्दों का प्रयोग भी आवश्यकतानुसार किया गया है। वाक्य संरचना सुस्पष्ट एवं सुगठित है। भाषा विषय एवं पात्रों के अनुरूप बदलती चलती है। आपकी भाषा में सम्प्रेषण की अपूर्व क्षमता है।

  • शैली

विष्णु प्रभाकर की शैली के अन्यान्य रूप देखे जा सकते हैं

  1. संवाद शैली-आपने संवाद शैली का बड़ा प्रभावी प्रयोग अपने एकांकियों में किया है। संवाद संक्षिप्त तथा चुटीले होते हैं। पात्र एवं विषय के अनुरूप उनके रूप बदलते रहते हैं।
  2. व्यंग्यात्मक शैली-प्रभाकर जी के एकांकियों में व्यंग्य के बड़े ही सटीक पुट देखे जा सकते हैं। उनके व्यंग्य पाठकों के हृदय पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली का प्रयोग भाव प्रबल स्थलों पर देखा जा सकता है। अतिशय भावुकता से परिपूर्ण इस शैली में सम्प्रेषणीयता निरन्तर बनी रहती है।

इसके अतिरिक्त आपकी शैली पर रेडियो रूपक शैली का पर्याप्त प्रभाव देखा जा सकता है।

  • साहित्य में स्थान

राष्ट्रीय चेतना और समाज-सुधार को अपने नाट्य साहित्य का विषय बनाने वाले विष्णु प्रभाकर ने ब्रिटिश शासन के कोप के कारण नौकरी छोड़कर लेखन को ही जीविका का साधन बनाया। बहुविध रचनाकार प्रभाकर जी का वर्तमान हिन्दी रचनाकारों में सम्मानजनक स्थान है।

8. जगदीश चन्द्र माथुर। [2010, 16]

  • जीवन-परिचय

जगदीश चन्द्र माथुर का जन्म 16 जुलाई, 1917 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा नगर में हुआ। शिक्षक पिता से प्राप्त संस्कारों ने आपको लेखन की प्रेरणा दी। आपने हाईस्कूल स्तर के अध्ययन काल से ही नाटक लिखना, अभिनय करना, मंच व्यवस्था आदि में रुचि लेना प्रारम्भ कर दिया था। आपने प्रयाग विश्वविद्यालय से एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। आप आई. ए. एस. की परीक्षा में बैठे और सफल हुए। आई. ए. एस. अधिकारी के रूप में आपने अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। आपने बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, तिरहुत डिवीजन के कमिश्नर, आकाशवाणी के महानिदेशक, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव, कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव आदि राजकीय पदों पर कार्य किया। वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए भी ये साहित्य-सर्जन में संलग्न रहे। 14 मई, 1978 को आप इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गये।

  • साहित्य-सेवा

प्रारम्भ से ही अभिनय के प्रति आकर्षण होने के कारण आपका नाटकों के प्रति विशेष जुड़ाव रहा। विद्यार्थी जीवन से ही आपका लेखन प्रारम्भ हो गया था। प्रयाग विश्वविद्यालय में आपके प्रयास से ही रंगमंच पर अभिनीत होने वाले हिन्दी नाटकों की प्रस्तुतियों को गति प्राप्त हुई। आपका प्रथम एकांकी ‘मेरी बाँसुरी’ विश्वविद्यालय के ‘म्योर होस्टल’ के मंच पर अभिनीत हुआ। आकाशवाणी के महानिदेशक तथा नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के अध्यक्ष पदों पर रहते हुए आपने साहित्य सृजन के साथ-साथ नाट्य विधाओं के विकास का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। आप केन्द्रीय गृह मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार रहे।

  • रचनाएँ

जगदीश चन्द्र माथुर का प्रथम एकांकी ‘मेरी बाँसुरी’ सन् 1936 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। सन् 1937 से 1943 तक लिखे गये एकांकी ‘भोर का तारा’ संग्रह में प्रकाशित हुए। इसमें पाँच एकांकी संकलित हैं। फिर तो लेखन और प्रकाशन क्रम चलता रहा। आपकी प्रमुख रचनाएँ हैं एकांकी संग्रह-‘भोर का तारा’ एवं ‘ओ मेरे सपने’।

अन्य प्रमुख एकांकी-‘कोणार्क’,
‘शारदीया’, ‘बन्दी’ आदि।
चरित्र निबन्ध-‘दस तस्वीरें।
इसके अतिरिक्त ‘बोलते क्षण’
आदि रचनाएँ भी हिन्दी जगत् में चर्चित रही हैं।

  • वर्ण्य विषय

भावभूमि की दृष्टि से आपके एकांकी ऐतिहासिक और सामाजिक हैं। आपने इतिहास के पृष्ठों से चयनित गौरवपूर्ण चरित्रों और मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया है। सामाजिक एकांकियों में आपने आधुनिक सभ्य समाज की मानवीय दुर्बलताओं और नैतिक खोखलेपन का सफल चित्रण किया है। रूढ़ियों और पुरातनता पर आपने करारे प्रहार किए हैं। समाज की विसंगतियों को उजागर करते हुए आपने मानव समाज को सोचने के लिए विवश कर सराहनीय कार्य किया है।

  • भाषा

जगदीश चन्द्र माथुर ने सरल, सुबोध खड़ी बोली में साहित्य रचना की है। विषय, पात्र तथा अवसर के अनुरूप शब्दावली एवं मुहावरों आदि का प्रयोग करने में आप कुशल हैं। पात्रों के संवादों में चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित करने की पूर्ण क्षमता है। सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित रचनाओं की भाषा तत्सम प्रधान है तथा सामाजिक एकांकियों में व्यावहारिक खड़ी बोली को अपनाया है। आपकी भाषा में सम्प्रेषण की अद्भुत क्षमता है।

  • शैली

माथुर जी की शैली के प्रमुख रूप इस प्रकार हैं

  1. संवाद शैली-माथुर जी ने अपनी नाट्य कृतियों में इस शैली का प्रयोग किया है। संवाद विषय के अनुसार दीर्घ एवं लघु आकार के लिखे गये हैं। पात्र के अनुरूप कथन आपके एकांकियों की विशेषता है।
  2. व्यंग्य शैली-आपने अपने एकांकियों में व्यंग्य शैली के बड़े प्रभावी प्रयोग किए हैं। इस शैली की विशेषता यह है कि पाठक व्यंग्य को भूल नहीं पाता है।
  3. यथार्थवादी शैली-माथुर जी ने अपने एकांकियों में यथार्थवादी शैली में अनेक समस्याओं का सजीव चित्रण किया है। वे इन समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करते हैं।
  • साहित्य में स्थान

जगदीश चन्द्र माथुर को रंगमंच का बड़ा व्यापक ज्ञान था, यही कारण था कि आपके सभी एकांकी अभिनेय हैं। मात्रा की दृष्टि से भले ही विपुल साहित्य का सृजन आपने न किया हो किन्तु गुणवत्ता के आधार पर हिन्दी नाट्य साहित्य में आपका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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9. हरिशंकर परसाई
[2008, 09, 12, 13, 15, 17]

  • जीवन-परिचय

हिन्दी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्म का मध्य प्रदेश में इटारसी के निकट जमानी नामक ग्राम में 22 अगस्त, 1924 को हुआ था। आपने स्नातक स्तर तक की शिक्षा इटारसी में ही प्राप्त की तत्पश्चात् नागपुर विश्वविद्यालय से एम. ए. हिन्दी की परीक्षा उत्तीर्ण की। कुछ वर्षों तक आपने अध्यापन कार्य किया। परसाई जी की बाल्यावस्था से ही लेखन में अभिरुचि थी। अध्यापन से उनके लेखन में बाधा उत्पन्न होती थी, अतः अध्यापक पद से त्यागपत्र देकर साहित्य साधना को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। जीवन पर्यन्त साहित्य सेवा करने वाले परसाई जी का 10 अगस्त, 1995 को देहावसान हो गया।

  • साहित्य-सेवा

समाज तथा व्यक्ति की विभिन्न विसंगतियों पर व्यंग्य प्रहार करने वाले हरिशंकर परसाई ने जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का सम्पादन एवं प्रकाशन किया, किन्तु अर्थाभाव के कारण वह पत्रिका बन्द कर देनी पड़ी। फिर आप साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘धर्मयुग’ आदि पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित रूप से लिखने में व्यस्त रहे। आपके व्यंग्य, निबन्ध आदि निरन्तर प्रकाशित होते रहते थे।

  • रचनाएँ

हरिशंकर परसाई की रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. व्यंग्य संग्रह-तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडण्डियों का जमाना’, ‘सदाचार का ताबीज’, ‘शिकायत मुझे भी है’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, ‘सुनौ भाई साधौ’ और ‘अन्त में’।
  2. कहानी संग्रह-‘हँसते हैं रोते हैं’, ‘जैसे उनके दिन फिरे’।
  3. उपन्यास-‘रानी नागमती की कहानी’, ‘तट की खोज’।
  • वर्ण्य विषय

हरिशंकर परसाई मूलत: व्यंग्य लेखक थे। समाज तथा जीवन की विसंगतियों. विडम्बनाओं आदि का सूक्ष्म निरीक्षण कर आपने प्रभावी व्यंग्य लिखे हैं। आपका मन्तव्य उपहास या खिल्ली उड़ाना नहीं है अपितु व्यंग्य द्वारा रचनात्मक सुधार के सूत्र सुझाने का रहा है। समाज राजनीति, अर्थव्यवस्था आदि की अव्यवस्था, कुटिलता, विद्रूपता आदि पर आपने करारे प्रहार किए हैं। भ्रष्टाचार, नैतिकता, रिश्वतखोरी, कुत्सित मनोवृत्तियों को उजागर करने की अद्भुत कला के धनी परसाई जी की जीवन दृष्टि सर्जनात्मक रही है।

  • भाषा

परसाई जी की भाषा सरल, सुबोध होते हुए भी तीखे प्रहार करने में सक्षम है। आपकी भाषा में फक्कड़पन और जिन्दादिली का पुट सर्वत्र दिखाई देता है। विषय के अनुरूप नपे-तुले शब्दों में अभिव्यक्त आपके व्यंग्य पाठक पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं। आपने तत्सम, तद्भव, विदेशी तथा देशज सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है। आप लक्षणा एवं व्यंजना के सहारे मूल भाव को सम्प्रेषित करने की कला में पारंगत हैं।

  • शैली

हरिशंकर परसाई की रचनाओं में विषयानुरूप शैली के विविध रूपों का प्रयोग हुआ है।

  1. व्यंग्यात्मक शैली-परसाई जी की व्यंग्य रचनाओं में इस शैली की प्रधानता है। जीवन की विविध प्रकार की विसंगतियों पर करारे प्रहार करने में यह शैली सफल रही है। सामाजिक पाखण्डों, रूढ़ियों, कुरीतियों, राजनीतिक छल-प्रपंचों आदि पर आपके द्वारा प्रभावी व्यंग्य लिखे गये हैं।
  2. वर्णनात्मक शैली-किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना को प्रस्तुत करने के लिए परसाई जी ने इस शैली का प्रयोग किया है। इसकी मिश्रित शब्दावली युक्त भाषा में वाक्य प्रायः छोटे ही . प्रयोग किये गये हैं।
  3. उद्धरण शैली-हरिशंकर परसाई अपने कथन की पुष्टि के लिए उद्धरण शैली का सहारा लेते हैं। गद्य तथा पद्य दोनों प्रकार के उद्धरणों का प्रयोग उन्होंने किया है। इस शैली से प्रभावशीलता की वृद्धि होती है।
  4. सूत्र शैली-हरिशंकर परसाई ने सूत्रात्मक कथनों के द्वारा कथ्य को रोचक बनाया है। आवश्यकतानुसार ये उक्तियाँ तीखी अथवा उपदेशात्मक प्रकार की होती हैं।
  • साहित्य में स्थान

सूक्ष्म निरीक्षण-दृष्टि तथा सशक्त अभिव्यक्ति के धनी हरिशंकर परसाई ने हिन्दी व्यंग्य साहित्य को सम्पन्न करने का प्रशंसनीय कार्य किया है। आपने सटीक व्यंग्यों के द्वारा समाज, राष्ट्रीयता, मानवता के उत्थान का महान कार्य किया है। व्यंग्य को अद्भुत अन्दाज में प्रस्तुत करने वाले हरिशंकर परसाई जी हिन्दी जगत् में चिर स्मरणीय रहेंगे।

10. महादेवी वर्मा
[2008, 09]

  • जीवन-परिचय

आधुनिक युग की मीरा महादेवी जी का जन्म 26 मार्च, सन् 1907 को फर्रुखाबाद में एक सम्भ्रान्त कायस्थ परिवार में हुआ था। आपके पिता गोविन्द प्रसाद, भागलपुर विद्यालय में प्रधानाचार्य थे। इनकी माता हेमरानी देवी विदुषी और भक्त महिला थीं। वे मीरा, कबीर आदि के पद गाती थीं और कविता भी करती थीं। आपको अपनी माँ से कविता, साहित्य तथा भक्ति की प्रेरणा प्राप्त हुई।

महादेवी जी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में हुई। इन्होंने घर पर संगीत और चित्रकला की शिक्षा प्राप्त की। इनका विवाह ग्यारह वर्ष की अवस्था में डॉ. स्वरूपनारायण वर्मा के साथ हुआ। श्वसुर के विरोध से शिक्षा में विघ्न पड़ गया। उनके देहावसान के बाद पुन: शिक्षा प्रारम्भ करके संस्कृत विषय में एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, अनेक वर्षों तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या रहीं, जहाँ से सन् 1965 ई. में अवकाश ग्रहण किया। हिन्दी साहित्य की ये महादेवी 11 सितम्बर, 1987 ई. को स्वर्ग सिधार गयीं।

  • साहित्य सेवा

कल्पना लोक में विचरण करने वाली महादेवी वर्मा जीवन के यथार्थ के उतने ही निकट थीं, जितना कि एक महामानव होता है। महादेवी जी की बचपन से ही काव्य के प्रति रुचि रही। उस समय की प्रसिद्ध नारी पत्रिका ‘चाँद’ में उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ छपी। बाद में उन्होंने ‘चाँद’ का सम्पादन भी किया। भावपूर्ण कविताओं ने आपको छायावाद की प्रमुख कवयित्री के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।

महादेवी के गद्य में पर दुःख, कातरता, आत्मीयता, समाज में अन्याय के प्रति दुःख और चिन्ता के दर्शन होते हैं। महादेवी जी ने सहस्रों वर्षों से उपेक्षित नारी के शिवरूप को उभारा है और नारी को अपना वास्तविक रूप पहचानने के लिए प्रेरित किया है। साहित्यिक उपलब्धियों के कारण आप उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्या भी मनोनीत की गयीं। भारत के राष्ट्रपति ने आपको पद्मश्री’ की उपाधि से सम्मानित किया। आपको ‘सेक्सरिया’ तथा ‘मंगलाप्रसाद पुरस्कार’ भी प्राप्त हुए हैं। कुमायूँ विश्वविद्यालय ने 1975 ई. में अपने प्रथम दीक्षान्त समारोह में आपको डी. लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित किया। आपने प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ नामक संस्था तथा देहरादून में ‘उत्तरायण’ नामक साहित्यिक आश्रम स्थापित किया।

  • रचनाएँ

आपने गद्य-पद्य दोनों में ही सफलतापूर्वक रचनाएँ की हैं। महादेवी जी की प्रमुख गद्य रचनाएँ हैं

  1. निबन्ध संग्रह-‘श्रृंखला की कड़ियाँ’, ‘क्षणदा’, ‘साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध’।
  2. आलोचना-‘हिन्दी का विवेचनात्मक गद्य।’
  3. संस्मरण और रेखाचित्र-अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी और मेरा परिवार।
  4. सम्पादन-‘चाँद’ मासिक पत्रिका और ‘आधुनिक कवि’ नामक काव्य-संग्रह का आपने कुशलता एवं विद्वतापूर्वक सम्पादन किया।
  • वर्ण्य विषय

वेदना की अमर गायिका महादेवी जी के गद्य में विचार एवं भाव ने व्यापक रूप धारण कर लिया। उनके निबन्धों में विचार प्रधानता दिखाई देती है तो समीक्षा में गहन अनुभूतिपरक चिन्तन उभरकर आया है। उनके रेखाचित्र और संस्मरणों में आत्मीयता, सहजता तथा सरलता की अजस्त्रधारा प्रवाहित है। आपके साहित्य में पशु-पक्षियों, सेवकों के सम्बन्ध में लिखे गए संस्मरण हिन्दी की बहुमूल्य धरोहर हैं। नारी के प्रति आपके हृदय में अपार सहानुभूति रही है।

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  • भाषा

महादेवी जी की गद्य-भाषा संस्कृत गर्भित, शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। आपकी भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी सरस, माधुर्ययुक्त और प्रवाहपूर्ण है। भाव, भाषा और संगीत की त्रिवेणी के संगम पर उनके गद्य का निर्माण हुआ है। उनका शब्द चयन उत्कृष्ट, भावानुकूल है। भाषा में तल्लीनता और तन्मयता के दर्शन होते हैं।

महादेवी जी की चित्रोपम भाषा में उपमा, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, विरोधाभास जैसे अलंकारों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। आपकी भाषा में मुहावरों और कहावतों का सटीक प्रयोग मिलता है। भावुकता, विदग्धता, मधुरता तथा लालित्य आपकी भाषा के विशेष गुण हैं। एक-एक शब्द बोलता-सा प्रतीत होता है।

  • शैली

महादेवी जी की गद्य-शैली के प्रमुख रूप निम्नांकित हैं-

  1. भावात्मक शैली-महादेवी जी की यह शैली उनके रेखाचित्र में मिलती है। महादेवी जी का कवि हृदय अपनी सम्पूर्ण भाव चेतना के साथ गद्य पर छाया रहता है। आलंकारिक सौन्दर्य, सरलता, भावों की सुकुमारता ने इस शैली को आकर्षक बना दिया है। इनमें महादेवी जी का कोमल हृदय झाँकता दिखायी देता है।
  2. वर्णनात्मक शैली-वर्णनात्मक शैली का प्रयोग वर्णन-प्रधान निबन्धों में हुआ है। वर्णनात्मक शैली सरल और व्यावहारिक है। भाषा सरल होते हुए भी शुद्ध, परिमार्जित और परिष्कृत है। वाक्य छोटे होते हैं, वर्णन में सजीवता और प्रवाह है।।
  3. चित्रात्मक शैली-आपने चित्रात्मक शैली का सफल प्रयोग किया है। पाठक के सामने शब्दों के द्वारा व्यक्ति या वस्तु का चित्र सा उपस्थित हो जाता है। इस शैली की भाषा चित्रात्मक एवं लाक्षणिक है।
  4. विवेचनात्मक शैली-महादेवी जी ने आलोचनात्मक निबन्धों में इस शैली को अपनाया है। इस शैली की भाषा दुरूह और संस्कृतनिष्ठ है, परन्तु उसमें सुबोधता और स्पष्टता सर्वत्र विद्यमान है।
  5. व्यंग्यात्मक शैली-महादेवी जी कभी-कभी शिष्ट-हास्य और तीखे व्यंग्य भी कर देती हैं। जहाँ वे तीखे व्यंग्य करती हैं, वहाँ उनकी शैली व्यंग्यात्मक हो गयी है। आपके व्यंग्यों में सुधार की भावना, करुण और शिष्ट-हास्य का समन्वय है। महादेवी जी की शैली में कल्पना, सजीवता, भाषा-चमत्कार इत्यादि एक साथ देखे जा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त उनकी गद्य-रचनाओं में कहीं-कहीं सूक्ति शैली, उद्धरण शैली और आत्माभिव्यंजक शैली के भी दर्शन होते हैं।

  • साहित्य में स्थान

आधुनिक युग की मीरा महादेवी वर्मा का हिन्दी साहित्य मे महत्त्वपूर्ण स्थान है। आपकी रचनाओं में नारी हृदय की शाश्वत वेदना का बड़ा ही मार्मिक चित्रण मिलता है। महादेवी वर्मा ने गद्य में दरिद्र जीवन का सुन्दर चित्रण किया है। इसमें आपकी उन विद्रोही भावनाओं के दर्शन होते हैं, जो समाज के प्रति हृदय में उठती रहती हैं। हिन्दी को उनकी अभूतपूर्व देन सजीव रेखाचित्र हैं। उनकी बहुमुखी साधना कवयित्री, रेखाचित्रकार, निबन्ध लेखिका और आलोचक के रूप में सर्वविदित है।

11. महात्मा गाँधी

  • जीवन-परिचय

सत्य व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबन्दर नगर, काठियावाड़ में हुआ था। आपके पिता का नाम करमचन्द तथा माता का नाम पुतलीबाई था। आपका बचपन का नाम मोहनदास था। आपका पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गाँधी था। आपके पिता राजकोट के दीवान थे। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा राजकोट में पूरी हुई। 13 वर्ष की अवस्था में आपका विवाह कस्तूरबा से हुआ। उच्च शिक्षा के लिए आप इंग्लैण्ड गए और बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। भारत आकर आपने वकालत शुरू की। एक मुकदमे के सिलसिले में आपको अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ भारतीयों तथा अपने साथ गोरों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार का अहिंसा द्वारा आपने विरोध किया। दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्ष रहकर आप 1915 में भारत लौटे। गोपाल कृष्ण गोखले के सम्पर्क में आकर आपने राजनीति में प्रवेश किया। आपने असहयोग व सत्याग्रह के द्वारा ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। आपने भारतीयों को आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर जोर दिया। आप निम्न वर्ग व नारी उत्थान तथा साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रबल पक्षधर थे। शिक्षा व घरेलू धन्धों को आप भारतीयों के लिए अनिवार्य मानते थे। आपने मई 1915 में साबरमती आश्रम की स्थापना की। 15 अगस्त, 1947 को आपके नेतृत्व में लड़ी गई स्वतन्त्रता की लम्बी लड़ाई के बाद भारत आजाद हुआ। 30 जनवरी, 1948 को भारत माता का यह अमर सपूत चिरनिद्रा में सो गया।

  • साहित्य-सेवा

गाँधीजी मूलतः एक साहित्यकार न होकर एक राजनीतिक व्यक्तित्व थे। अत: उनकी रचनाएँ भी राजनीति से सम्बन्धित रहीं। आपने 1903 में डरबन, अफ्रीका में बहुभाषी साप्ताहिक-पत्र ‘इण्डियन ओपीनियन’ निकाला। भारत आकर आपने ‘हरिजन’ तथा ‘यंग इण्डिया’ नामक पत्र निकाले। आपने ‘हिन्दू स्वराज्य’, ‘सर्वोदय’ (रस्किन की अनटु दि लास्ट पुस्तक का अनुवाद) तथा दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर अत्याचारों का वर्णन करने वाली पुस्तक ‘हरि पुस्तिका’ लिखी। आपने गुजराती में ‘नवजीवन’ नामक पुस्तक निकाली। ‘सत्य के प्रयोग’ आत्मकथा लिखकर आपने साहित्य की सेवा की।

  • रचनाएँ

महात्मा गाँधी की रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. आत्मकथा-‘सत्य के प्रयोग’।
  2. अनुवाद-‘हिन्द स्वराज्य’ तथा ‘सर्वोदय’।
  3. पत्र-‘हरिजन’, ‘यंग इण्डिया’, ‘इण्डियन ओपीनियन’।
  4. अन्य पुस्तक-‘नवजीवन’, ‘हरि पुस्तिका’।
  • वर्ण्य विषय

महात्मा गाँधी मूलतः एक बैरिस्टर थे। इस कारण तर्क करना उनकी फितरत थी। देश, समाज तथा जीवन की विसंगतियों, विडम्बनाओं आदि का सूक्ष्म निरीक्षण कर आपने प्रभावी लेख लिखे। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर अत्याचार देखकर गाँधीजी राजनीति में आये थे। समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था आदि की अव्यवस्था तथा विद्रूपता देखकर आपने उस पर प्रहार किये। नारी व निम्न वर्गका उत्थान, साम्प्रदायिक सद्भाव, किसानों की समस्या, ब्रिटिश सरकार के अत्याचार आदि आपके वर्ण्य विषय थे। देश को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाना आपका मुख्य उद्देश्य था।

  • भाषा

गुजराती मातृभाषा तथा अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम होने पर भी आपने खड़ी बोली हिन्दी में भी लिखा जिसमें संस्कृत शब्दों की अधिकता के कारण क्लिष्टता आ गई है। फिर भी भाषा में सरलता तथा बोधगम्यता मिलती है। आपकी भाषा दर्शन जैसे विषयों में गम्भीर हो गई है। कहीं-कहीं सूत्र ही गद्यांश बन गए हैं। वाक्य लघु हैं।

  • शैली

युग पुरुष महात्मा गाँधी की रचनाओं में भाव, विचार, व्याख्या आदि का मिला-जुला रूप मिलता है। आपके व्यक्तित्व में संस्कार, अध्ययन, अनुशीलन, रुचि व प्रवृत्ति के जो तत्त्व हैं, उन्होंने शैली को रक्षात्मक बना दिया है।

  1. वर्णनात्मक शैली-राजनेता होने के कारण बापू अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए इस शैली को अपनाते हैं।
  2. उद्धरण शैली-अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए गाँधीजी उदाहरण देते हैं तथा व्याख्या करते हैं। इसके लिए वह गीता से उदाहरण देते हैं।
  3. ओजपूर्ण शैली-ब्रिटिश सरकार के विरोध में लिखते समय उनकी भाषा में ओज था, अपने अधिकारों की माँग थी।
  4. सूत्रात्मक शैली-इस शैली में अत्यन्त लघु वाक्यों का प्रयोग है, जैसे-“

अद्वितीय उपाय है कर्म के फल का त्याग”,
“जहाँ देह है वहाँ कर्म तो है ही।”
इन सूत्रों में गीता का सार आ जाता है।

अनुवादों में भी नपी-तुली भाषा व शब्द हैं। मुहावरे व कहावतों का संक्षिप्त प्रयोग दृष्टिगोचर होता है।

  • साहित्य में स्थान

महात्मा गाँधी निबन्धकार, अनुवादक, सम्पादक, आत्मकथा लेखक तथा कुशल वक्ता थे। इस कारण उनका साहित्य में विशेष स्थान है। हिन्दी के विचार प्रधान निबन्धों के क्षेत्र में आपकी देन अनुपम है।

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12. श्रीधर पराड़कर

  • जीवन-परिचय

मध्य प्रदेश के ग्वालियर नामक शहर के निवासी श्रीधर पराड़कर का जन्म 15 मार्च, 1954 को हुआ था। आपके पिताजी का नाम गोविन्द राव पराड़कर और माता का नाम श्रीमती इन्दिरा बाई पराड़कर है। श्रीधर पराड़कर ने वाणिज्य विषय के साथ स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् अपने एकाउंटेंट जनरल कार्यालय में लेखा परीक्षक के रूप में शासकीय सेवा के साथ अपने कैरियर की शुरुआत की। परन्तु रक्त में प्रवाहित देशभक्ति की भावना और हृदय में आकण्ठ राष्ट्रप्रेम के वशीभूत श्रीधर पराड़कर ने 1986 में शासकीय सेवा से निवृत्ति लेकर अपना जीवन राष्ट्रोत्थान के लिए न्यौछावर कर दिया। श्रीधर पराड़कर का व्यक्तित्व आकर्षक है। वे सात्विक ऊर्जा के स्रोत भी हैं। आपके चेहरे पर सदैव विद्यमान रहने वाली बाल सुलभ मुस्कान सम्पर्क में आये व्यक्ति का भी तनाव समाप्त करने में सक्षम है।

  • साहित्य-सेवा

राष्ट्रीय आन-बान-शान और सम्मान को अपनी ओजस्वी कलम से नई धार देने वाले श्रीधर पराड़कर अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री एवं देश के प्रख्यात साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति और मूल्यों तथा राष्ट्रप्रेम की अलख जगा रहे श्रीधर पराड़कर ने इंग्लैण्ड, श्रीलंका आदि देशों की यात्रा के साथ-साथ भारत में अनेक स्थानों, जैसे-जौनसार (उत्तराखण्ड), लाहौल स्पीति और झाबुआ के वनांचल में साहित्य संवर्धन यात्राएँ की, ताकि लेखक अनुभूत साहित्य का सृजन कर सकें।

  • रचनाएँ

आपने अनेक लोकप्रिय पुस्तकों की रचना कर हिन्दी साहित्य की अद्भुत सेवा की है। आपकी प्रमुख रचनाएँ/पुस्तक निम्नवत हैं-

  1. जीवन-चरित्र—’राष्ट्रनिष्ठ खण्डोबल्लाल,”अप्रतिम क्रांतिदृष्टा भगतसिंह’, ‘रानी दुर्गावती’, माँ सारदा, कर्मयोगी बाबा साहेब आप्टे’, ‘बाला साहेब देवरस’, ‘राष्ट्रसंत तुकडोजी’, ‘1857 के प्रतिसाद,”अद्भुत संत स्वामी रामतीर्थ’, ‘सिद्धयोगी उत्तम स्वामी’ आदि।”
  2. अनुवाद—दत्तोपंत ठेगड़ी की पुस्तक ‘सामाजिक क्रांति की यात्रा और डॉ. आम्बेडकर’ का मराठी से हिन्दी में अनुवाद किया।
  3. अन्य पुस्तकें ‘ज्योति जला निज प्राणों की’ तथा ‘मध्य भारत की संघ गाथा’ आदि।
  • वर्ण्य विषय

राष्ट्रीय स्वाभिमान के अनन्य नायक एवं भारतीय संस्कृति तथा मूल्यों के वाहक श्रीधर पराड़कर की पुस्तकों में राष्ट्रप्रेम प्रमुख रूप से वर्णित विषय रहा है। उनकी पुस्तकों में मनुष्यों के उच्च विचारों के भाव भी परिलक्षित होते हैं। सामाजिक चेतना के स्वर उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं। आपने सदैव साहित्य में सद्विचारों को प्रोत्साहन प्रदान करने का कार्य किया है।

  • भाषा

श्रीधर पराड़कर की भाषा विशुद्ध रूप से हिन्दी है। उन्होंने अपनी रचनाओं में सरल, सहज एवं बोधगम्य भाषा का उपयोग किया है। भाषा की क्लिष्टता एवं दुरहता से दूर रहते हुए आपने पाठक की भाषा को ही अपनी साहित्य-भाषा के रूप में चुना है। सम्भवतया इसी कारण प्रत्येक पाठक वर्ग के लिये आपकी पुस्तकें सुग्राह्य हैं।

  • शैली

श्रीधर पराड़कर जी मूलतः वाणिज्य के छात्र रहे हैं। भाषा पर उनकी समझ एवं पकड़ किसी उपाधि से अर्जित ज्ञान की वजह से न होकर जीवन के स्वयं के अनुभवों से अर्जित ज्ञान पर आधारित है।

मुख्य रूप से उनकी शैली वर्णनात्मक, उद्धरण एवं ओजपूर्ण है। कहीं-कहीं उनकी पुस्तकों में चित्रात्मक एवं विवेचनात्मक शैली की झलक भी देखने को मिलती है।

  • साहित्य में स्थान

श्रीधर पराड़कर की पुस्तकें हमारे भीतर राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक संवेदनाओं का संचार करती हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को दृष्टिपथ पर रखकर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार) द्वारा उन्हें भारतीय विद्या (इन्डोलॉजी) में लेखन के लिए प्रतिष्ठित ‘विवेकानन्द पुरस्कार’ प्रदान किया गया। साथ ही, आपको तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा ‘हिन्दी सेवी सम्मान 2015’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।

सम्पूर्ण अध्याय पर आधारित महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म हुआ था
(i) सन् 1884 में, (i) सन् 1894 में, (ii) सन् 1904 में, (iv) सन् 1880 में।

2. पारिवारिक मर्यादा का उत्कृष्ट उदाहरण मिलता है
(i) गीता में, (ii) रामचरितमानस में, (iii) महाभारत में, (iv) कामायनी में।

3. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचना है
(i) चित्रलेखा, (ii) चिन्तामणि, (ii) अशोक के फूल, (iv) पथ के साथी।

4. जयशंकर प्रसाद का जन्म स्थान है
(i) इलाहाबाद, (ii) सागर, (iii) उज्जै न, (iv) वाराणसी।

5. ‘गीत और गोली’ के रचनाकार हैं
(i) विष्णु प्रभाकर, (ii) पं. कमलापति त्रिपाठी, (iii) हरिशंकर परसाई, (iv) श्रीराम परिहार।

6. कराची में बनारसी ने विद्यानिवास मिश्र से कहा था
(i) मातृभूमि को प्रणाम कहें, (ii) भारतमाता को सलाम कहें, (iii) गंगा और गंगा के कछार से मेरा सलाम कहें, (iv) भारतवासियों को मेरा सलाम कहें।

7. महात्मा गाँधी के राजनीतिक गुरु थे
(i) गोपाल कृष्ण गोखले, (ii) आचार्य विनोबा भावे, (iii) पं. जवाहर लाल नेहरू, (iv) सीमान्त गाँधी।

8. श्रीधर पराड़कर यहाँ के निवासी हैं [2008]
(i) कलकत्ता, (ii) कानपुर, (iii) ग्वालियर, (iv) भोपाल।
उत्तर-
1. (i),
2. (ii),
3. (iii),
4. (iv),
5. (i),
6. (iii),
7. (i),
8. (iii)।

  • रिक्त स्थान पूर्ति

1. हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म ……… में हुआ था।
2. ‘कुटुज’ ………’ की रचना है। [2013]
3. विद्यानिवास मिश्र के एक निबन्ध संग्रह का नाम ……..”
4. जयशंकर प्रसाद का जन्म स्थान ……… है।
5. जगदीशचन्द्र माथुर प्रसिद्ध …………. हैं। [2009]
6. ‘तेरा घर मेरा घर’ की लेखिका ………. हैं।
7. महादेवी वर्मा का निधन ……… में हआ था।
8. विद्यानिवास मिश्र ……… निबन्धकार हैं। [2009]
9. महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर …………. को हुआ था।
10. गुजराती में प्रकाशित ‘नवजीवन’ नामक पुस्तक के लेखक …….. थे।
11. श्रीधर पराड़कर ने ……… विषय में स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त की।
उत्तर-
1. सन् 1907,
2. हजारी प्रसाद द्विवेदी,
3. चितवन की छाँह,
4. वाराणसी (उ. प्र.),
5. एकांकीकार,
6.मालती जोशी,
7. सन् 1987,
8. ललित,
9. 1869,
10. महात्मा गाँधी,
11. वाणिज्य।

  • सत्य असत्य

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एक कवि थे। [2014]
2. विद्यानिवास का निधन सन् 2005 में हुआ था।
3. महादेवी वर्मा श्रेष्ठ उपन्यासकार हैं।
4. हरिशंकर परसाई व्यंग्यकार थे। [2015]
5. श्रीराम परिहार का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ है।
6. प्रेमचन्द उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। [2011]
7. महात्मा गाँधी द्वारा लिखित पुस्तक ‘सर्वोदय’ रस्किन की ‘अन टू दि लास्ट’ का अनुवाद
8. ‘राष्ट्रनिष्ठ खण्डोबल्लाल’ श्रीधर पराड़कर द्वारा लिखित पुस्तक है।
उत्तर-
1. असत्य,
2. सत्य,
3. असत्य,
4. सत्य,
5. असत्य,
6. सत्य,
7. सत्य,
8. सत्य।

  • जोड़ी मिलाइए

1. व्यंग्यकार [2009] – (क) शिकायत मुझे भी है
2. हरिशंकर परसाई [2009] – (ख) हरिशंकर परसाई
3. मर्यादा [2014] – (ग) आकाशदीप
4. जयशंकर प्रसाद – (घ) विष्णु प्रभाकर
5. रामचन्द्र शुक्ल – (ङ) महादेवी वर्मा
6. वेदना की अमर गायिका [2009] – (च) चिन्तामणि [2016]
7. महादेवी वर्मा [2017] – (छ) आधुनिक मीरा
उत्तर-
1.→ (ख),
2. → (क),
3. → (घ),
4.→ (ग),
5.→ (च),
6. → (ङ),
7. → (छ)।

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  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म स्थान कहाँ है?
2. ‘बेईमानी की परत’ के लेखक कौन हैं?
3. श्रीराम परिहार के एक निबन्ध का नाम लिखिए।
4. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के एक निबन्ध संग्रह का नाम लिखिए।
5. जयशंकर प्रसाद का जन्म किस वर्ष में हुआ था?
6. महादेवी वर्मा का जन्म स्थान कहाँ है?
7. गाँधीजी द्वारा 1930 में डरबन, दक्षिण अफ्रीका में निकाले गये बहभाषी साप्ताहिक-पत्र का क्या नाम था?
8. श्रीधर पराड़कर की माताजी का नाम क्या है?
उत्तर-
1. अगोना (उ. प्र.),
2. हरिशंकर परसाई,
3. धूप का अवसाद,
4. कुटज,
5. सन् 1889,
6. फर्रुखाबाद,
7. इण्डियन ओपीनियन,
8. श्रीमती इन्दिरा बाई पराड़कर।

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MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति लेखक परिचय (Chapter 1-6)

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1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
[2008, 09, 13, 17]

  • जीवन-परिचय

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 11 अक्टूबर, सन् 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के अगोना ग्राम में हुआ था। आपके पिता पं. चन्द्रबलि शुक्ल सुपरवाइजर कानूनगो थे। शुक्लजी ने एफ. ए. (इण्टर) तक की शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा समाप्ति पर जीविकोपार्जन के लिए मिर्जापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग के शिक्षक हो गये। इस समय तक इनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। जब नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी द्वारा ‘हिन्दी शब्द सागर’ नाम से शब्दकोश के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया गया, तब शुक्लजी मात्र छब्बीस वर्ष की अवस्था में उसके सहायक सम्पादक नियुक्त किये गये। उसके बाद हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में आप हिन्दी विभाग में प्राध्यापक हो गये। सन् 1937 में आप वहाँ हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हो गये। 2 फरवरी, सन् 1940 को आपका निधन हो गया।

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  • साहित्य-सेवा

आचार्य शुक्लजी की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे कवि, निबन्धकार, आलोचक, सम्पादक तथा अनुवादक अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैं। आपने “हिन्दी शब्द सागर” और “नागरी प्रचारिणी पत्रिका” का सम्पादन किया। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में हिन्दी को उच्चकोटि के निबन्ध, वैज्ञानिक समालोचनाएँ, साहित्यिक ग्रन्थ एवं सरल कविताएँ प्रदान की। शुक्ल जी ने हिन्दी में समालोचना और निबन्ध कला का उच्च आदर्श स्थापित किया। उनसे पहले की समालोचनाओं में गुण-दोष विवेचन की ही प्रधानता थी। उन्होंने वैज्ञानिक ढंग की व्याख्यात्मक आलोचना-पद्धति की नींव डाली और जायसी, तुलसी तथा सूर के काव्यों पर उत्कृष्ट व्याख्यात्मक आलोचनाएँ लिखीं। आपने करुणा, उत्साह, क्रोध, श्रद्धा और भक्ति आदि मनोविकारों पर सुन्दर निबन्ध लिखे। उनके निबन्ध ‘चिन्तामणि’ नामक पुस्तक में संग्रहीत हैं। ‘चिन्तामणि’ पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्राप्त हुआ। उन्होंने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ नामक गवेषणापूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ लिखा, जिस पर हिन्दुस्तानी एकेडमी, प्रयाग ने पुरस्कार प्रदान किया।

  • रचनाएँ

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएँ अग्र प्रकार हैं

  1. निबन्ध-संग्रह-चिन्तामणि, विचार-वीथी।
  2. आलोचना-त्रिवेणी, रस-मीमांसा।
  3. इतिहास-हिन्दी साहित्य का इतिहास।
  • वर्ण्य विषय

साहित्य के समस्त क्षेत्रों को स्पर्श करने वाली शुक्लजी की प्रतिभा समालोचना एवं निबन्ध के क्षेत्र में भी प्रखरता के साथ परिलक्षित होती है। निबन्ध एवं आलोचना दोनों ही क्षेत्रों में शुक्लजी ने लोक मंगल एवं नैतिक आदर्श को प्रमुख स्थान दिया है। निबन्ध-रचना के क्षेत्र में उन्होंने सामाजिक उपयोगिता से सम्बन्धित मानव-मनोभावों पर सुन्दर निबन्ध लिखे। शुक्लजी ने मनोभावों सम्बन्धी निबन्धों के साथ ही समीक्षात्मक एवं सैद्धान्तिक निबन्धों की भी रचना की।

  • भाषा

आचार्य शुक्लजी की भाषा परिष्कृत, प्रौढ़ एवं साहित्यिक खड़ी बोली है। इस भाषा में सौष्ठव है तथा उसमें गम्भीर विवेचन की अपूर्व शक्ति है। शुक्लजी की भाषा में व्यर्थका शब्दाडम्बर नहीं मिलता। भाव और विषय के अनुकूल होने के कारण वह सर्वथा सजीव और स्वाभाविक है। गूढ़ विषयों के प्रतिपादन में भाषा अपेक्षाकृत क्लिष्ट है। उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता है। वाक्य-विन्यास भी कुछ लम्बे हैं। सामान्य विचारों के विवेचन में भाषा सरल एवं व्यावहारिक है। कहावतों एवं मुहावरों के प्रयोग से उसमें सरसता आ गयी है। शुक्लजी की भाषा व्यवस्थित तथा पूर्ण व्याकरण सम्मत है तथा उसमें कहीं भी शिथिलता देखने को नहीं मिलती। भाषा की इसी कसावट के कारण उसमें समास शक्ति पायी जाती है तथा कहीं-कहीं तो भाषा सूक्तिमयी बन गयी है–“बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।”

  • शैली

शुक्लजी अपनी शैली के स्वयं निर्माता थे। उनकी शैली समास के रूप से प्रारम्भ होकर व्यास शैली के रूप में समाप्त होती है अर्थात् एक विचार को सूत्र रूप में कहकर फिर उसकी व्याख्या कर देते हैं। मुख्य रूप से शुक्लजी की शैली चार प्रकार की है-

  1. समीक्षात्मक शैली-शुक्लजी ने व्यावहारिक, समीक्षात्मक एवं समालोचनात्मक निबन्धों में इस शैली का प्रयोग किया है। इस शैली में वाक्य छोटे, संयत एवं गम्भीर हैं। इसमें विषय का प्रतिपादन सरलता के साथ इस प्रकार किया गया है कि सहज ही हृदयंगम हो जाता है।
  2. गवेषणात्मक-अनुसन्धानपरक तथा सैद्धान्तिक समीक्षा सम्बन्धी तथा तथ्यों के विश्लेषण-निरूपण में शुक्लजी ने इस शैली का प्रयोग किया है। यह शैली गम्भीर तथा कुछ सीमा तक दुरूह है। शब्द-विन्यास क्लिष्ट तथा वाक्य-विन्यास जटिल है। यह शैली सामान्य पाठकों के लिए बोधगम्य नहीं है।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली में वाक्य कहीं छोटे तथा कहीं लम्बे हैं तथा भाषा कुछ-कुछ अलंकारिक हो गयी है। इसमें भावनाओं का धाराप्रवाह रूप मिलता है।
  4. हास्य-विनोद एवं व्यंग्य प्रधान शैली-इस शैली के दर्शन मनोविकारों तथा समीक्षात्मक निबन्धों में यत्र-तत्र ही होते हैं, क्योंकि हास्य तथा व्यंग्य शुक्लजी के निबन्धों का मुख्य विषय नहीं है, फिर भी इस शैली के प्रयोग से निबन्धों में रोचकता आ गयी है।
  • साहित्य में स्थान

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी असाधारण प्रतिभा द्वारा साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन किया। लेकिन उनकी विशेष ख्याति निबन्धकार, समालोचक तथा इतिहासकार के रूप में है। उन्होंने हिन्दी में वैज्ञानिक आलोचना-प्रणाली को जन्म दिया, निबन्ध-साहित्य को समृद्ध किया तथा हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन के लिए एक आधार प्रदान किया। शुक्लजी की भाषा तथा शैली आने वाले साहित्यकारों के लिए आदर्श रूप है। वे युग प्रवर्तक निबन्धकार हैं।

2. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
[2008, 10, 14, 16]

  • जीवन-परिचय

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त, सन् 1907 में बलिया जिले के दुबे का छपरा नामक ग्राम में हुआ था। द्विवेदी जी के पिता का नाम अनमोल दुबे तथा माता का नाम ज्योतिकली देवी था। इनका परिवार ज्योतिष विद्या के ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था। द्विवेदी जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही हुई और वहाँ से उन्होंने सन् 1920 में मिडिल की परीक्षा पास की। इसके बाद कुल-परम्परा के अनुसार संस्कृत का अध्ययन करने के लिए आप काशी गये। काशी विश्वविद्यालय से साहित्य एवं ज्योतिष में आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की। इण्टर के बाद अस्वस्थ हो जाने के कारण आप बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण न कर सके।

सन् 1940 ई. में हिन्दी एवं संस्कृत के अध्यापक के रूप में आप शान्ति निकेतन गये। यहाँ लगभग 20 वर्ष तक हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। आपने महाकवि रवीन्द्र के संसर्ग में अपनी साहित्यिक प्रतिभा का विकास किया। आपने विश्वभारती’ का सम्पादन भी किया।

सन् 1949 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट. की उपाधि प्रदान की। सन् 1956 ई. में वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष बने। आपने पंजाब विश्वविद्यालय में भी हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। हिन्दी साहित्य की सेवा करते-करते 19 मई, 1979 को यह दैदीप्यमान नक्षत्र सदैव के लिए विलीन हो गया।

  • साहित्य-सेवा

आचार्य द्विवेदी जन्मजात प्रतिभासम्पन्न साहित्यकार थे। कविता के क्षेत्र में दिशा निर्देशन व्योमकेश शास्त्री से प्राप्त किया। शनैः-शनैः इनकी प्रतिभा प्रखर होने लगी। रवीन्द्रनाथ के बंगला साहित्य से आप विशेषतः प्रभावित हुए। उनका एक शब्द तथा वाक्य उनके लिए अमूल्य सिद्ध हुआ। निबन्धकार, इतिहास लेखक, उपन्यासकार, शोधकर्ता के रूप में आप हिन्दी साहित्य में विशेष रूप से जाने-पहचाने जाते हैं। आप एक सफल आलोचक थे। सिद्ध, जैन एवं अपभ्रंश साहित्य को आपने उजागर किया है। उनके उपन्यास तथा निबन्ध शैली, भावों तथा विचारों की दृष्टि से नूतनता तथा गहनता से ओत-प्रोत हैं। आपने ‘हिन्दी-संस्थान’ के उपाध्यक्ष पद को भी सुशोभित किया है। ‘कबीर’ नामक रचना पर आपको मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ मिला। भारत सरकार ने आपकी साहित्यिक उपलब्धियों को ध्यान में रखकर सन् 1950 में ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से भी सम्मानित किया। ‘सूर साहित्य’ पर आपको इन्दौर साहित्य समिति ने स्वर्ण पदक’ प्रदान किया था। आपने भक्ति साहित्य पर उच्चकोटि के समीक्षक ग्रन्थों की रचना की तथा ‘अभिनव भारती’ ग्रन्थमाला का सराहनीय सम्पादन किया है।

  • रचनाएँ

आचार्य द्विवेदी जी ने साहित्य की विविध विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी। उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं- .

  1. आलोचना साहित्य-‘सूर-साहित्य’,’हिन्दी साहित्य की भूमिका’, ‘कबीर’, ‘सूरदास और उनका काव्य’, ‘हमारी साहित्य समस्याएँ’, ‘साहित्य का धर्म’, ‘नख दर्पण में हिन्दी कविता’, “हिन्दी साहित्य’,’समीक्षा साहित्य’ आदि।
  2. उपन्यास-‘चारुचन्द्र लेख’, ‘अनामदास का पोथा’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा पुनर्नवा’।
  3. निबन्ध- विचार और वितर्क’, ‘अशोक के फूल’, ‘कल्पना’, ‘साहित्य के साथी’, ‘कुटज’, ‘कल्पलता’, आदि।
  4. शोध सम्बन्धी साहित्य-‘नाथ सम्प्रदाय’, ‘मध्यकालीन धर्म साधना’, ‘हिन्दी साहित्य का अदिकाल’, ‘प्राचीन भारत का कला विकास’ आदि।
  5. अनूदित साहित्य-‘प्रबन्ध चिन्तामणि’, ‘लाल कनेर’, ‘मेरा बचपन’, ‘पुरातन प्रबन्ध संग्रह’, ‘प्रबन्ध कोष’ आदि आपकी अनूदित रचनाएँ हैं।।
  • वर्ण्य विषय

बहुमुखी प्रतिभा के धनी द्विवेदी जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में विविध प्रकार से साहित्य की रचना की है। आलोचना, निबन्ध, उपन्यास, अन्वेषण आदि रचनात्मक विधाओं के अतिरिक्त आपने अनुवाद के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया है। आपके निबन्धों में साहित्य तथा संस्कृति का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। आपके साहित्य में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्ट देखी जा सकती हैं। ललित निबन्धों में इनकी विशेषताएँ हैं कि अपनी विद्वता की स्थायी छाप पाठक के हृदय पर छोड़ते हैं।

  • भाषा

आचार्य द्विवेदी जी ने सरल, सुस्थिर, संयत एवं बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया है। सामान्यत: वे तत्सम प्रधान, शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग करते हैं। भाव और विषय के अनुसार इनकी भाषा का रूप बदलता रहता है। उन्होंने निबन्धों की भाषा में संस्कृत शब्दों को ही प्राथमिकता दी है। संस्कृत शब्दावली की प्रचुरता के कारण कहीं-कहीं क्लिष्टता भी आ गयी है। सामान्यतः उसमें स्पष्टता और प्रवाह बना रहा है। द्विवेदी जी ने व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है, जिसमें उर्दू, अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग है। इनकी भाषा में ‘देशज’ और ‘स्थानीय’ बोलचाल के शब्दों का भी प्रयोग है, लेकिन मुहावरों का कम ही प्रयोग हुआ है।

  • शैली

द्विवेदी जी एक महान् शैलीकार थे। उनकी शैली में विभिन्नता, विविधता है। उनकी शैली चुस्त और गठी हुई है। द्विवेदी जी के साहित्य को शैली की दृष्टि से हम निम्नलिखित रूपों में विभाजित कर सकते हैं

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  1. गवेषणात्मक शैली-यह द्विवेदी जी की प्रतिनिधि शैली है। उनकी आलोचनात्मक एवं विचारात्मक रचनाएँ इस शैली में लिखी गयी हैं। इसमें स्वाभाविकता के सर्वत्र दर्शन होते हैं। इस शैली में उनकी संस्कृतनिष्ठ प्रांजल भाषा की प्रधानता रहती है।
  2. आलोचनात्मक शैली-आलोचनात्मक रचनाएँ तथा ‘कबीर’, ‘सूर साहित्य’ जैसी व्यावहारिक आलोचना की रचनाएँ इस शैली में हैं। इस शैली की भाषा संस्कृत-प्रधान और स्पष्टवादिता से पूर्ण है।
  3. भावात्मक शैली-इस शैली का प्रयोग द्विवेदी जी ने वैयक्तिक और ललित निबन्धों में किया है। भावुकता, माधुर्य और प्रवाह शैली की विशेषताएँ हैं।
  4. व्यंग्यात्मक शैली-द्विवेदी जी के निबन्धों में व्यंग्यात्मक शैली का बहुत ही सुन्दर और सफल प्रयोग हुआ है। उनके व्यंग्य सार्थक होते हैं। इस शैली में भाषा प्रवाहमय तथा उर्दू, फारसी आदि के शब्दों से युक्त है। इसके अतिरिक्त द्विवेदी जी की रचनाओं में अनेक स्थलों पर उद्धरण, व्याख्यात्मक, व्यास एवं सूक्ति शैलियों के भी दर्शन होते हैं।
  • साहित्य में स्थान

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उच्चकोटि के विद्वान, निबन्धकार, उपन्यासकार, सबल समीक्षक, साहित्य-इतिहासकार के रूप में अपार श्रद्धा के पात्र थे। उनके निबन्धों में विचारों की गम्भीरता, विषय की स्पष्टता तथा विश्लेषण की सूक्ष्मता मिलती है। आधुनिक हिन्दी आलोचकों एवं निबन्धकारों में आपका महत्त्वपूर्ण स्थान है। निश्चय ही वे हिन्दी गद्य साहित्य की महान् विभूति थे।

3. डॉ. विद्यानिवास मिश्र
[2008, 09, 11, 12]

  • जीवन-परिचय

विख्यात निबन्धकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र का जन्म गोरखपुर जिले के पकड़डीहा ग्राम में 14 जनवरी, 1926 में हुआ था। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम में ही अर्जित कर आप उच्च शिक्षा के अध्ययन हेतु इलाहाबाद चले गये। वहाँ संस्कृत में एम. ए. करने के पश्चात् गोरखपुर विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय तक आपने उत्तर प्रदेश तथा विध्य प्रदेश के सूचना विभागों में कार्य किया। इसके बाद गोरखपुर तथा आगरा विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। आप क. मुं. हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विद्यापीठ, आगरा के निदेशक रहे। काशी विद्यापीठ तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयों के कुलपति नियुक्त हुए। भारत सरकार ने आपको पद्म भूषण की उपाधि से अलंकृत किया। एक दुर्घटना में 14 फरवरी, 2005 को आपका निधन हो गया।

  • साहित्य-सेवा

प्रारम्भ से ही साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न विद्यानिवास मिश्र ने विविध प्रकार से हिन्दी साहित्य की सेवा की। साहित्य सृजन के साथ-साथ आप नवभारत टाइम्स समाचार पत्र के प्रधान सम्पादक रहे। आपने ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका का सम्पादन किया। मिश्र जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, काशी नागरी प्रचारिणी सभा एवं नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा आदि हिन्दी सेवी संस्थाओं से जुड़े रहे। आपने अमेरिका के वर्कले विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। अन्तिम समय तक आप साहित्य सेवा में संलग्न रहे।

  • रचनाएँ

विद्यानिवास मिश्र का साहित्य बहुआयामी है। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. निबन्ध संग्रह-‘चितवन की छाँह’, कदम की फूली डाल’, ‘तुम चन्दन हम पानी’, ‘आँगन का पंछी और बनजारा मन’,’तमाल के झरोखे से’, ‘मैंने सिल पहुँचाई’, ‘हल्दी, दूब और अक्षत’, वसंत आ गया पर कोई उत्कण्ठा नहीं’, ‘कंटीले तारों के आर पार’ आदि।
  2. आलोचना-साहित्य की चेतना।।
  3. संस्मरण-अमरकंटक की सालती स्मृति।

इसके अतिरिक्त ‘पानी की पुकार’ (कविता संग्रह), ‘रीति विज्ञान’, हिन्दी शब्द सम्पदा आदि आपकी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं।

  • वये विषय

विद्यानिवास मिश्र ने शिक्षा, भाषा, राष्ट्रीयता, धर्म, जीवन आदि विषयों पर निबन्धों की रचना की है। इन निबन्धों में शास्त्र-ज्ञान तथा लोक जीवन का मणिकांचन योग दिखाई देता है। इनके निबन्धों में लोक जीवन तथा ग्रामीण समाज मुखरित हो उठा है। आपने स्थान-स्थान पर पौराणिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक सन्दर्भ देकर विषय को समझाने का स्तुत्य प्रयास किया है।
आपने भावात्मक, विचारात्मक, समीक्षात्मक, संस्मरणात्मक आदि विविध प्रकार के निबन्ध लिखे हैं।

  • भाषा

मिश्र जी की भाषा में विषय के अनुसार विविधता परिलक्षित होती है। आपकी तत्सम प्रधान खड़ी बोली में तद्भव, विदेशी एवं देशज शब्दों को आवश्यकतानुसार अपनाया गया है। भाषा की ताजगी, उक्तियों का चमत्कार, भंगिमाओं की सुसज्जा ने आपके निबन्धों में सम्प्रेषणीयता का अद्भुत गुण पैदा कर दिया है। मिश्र जी भाषा के कुशल पारखी हैं। इसीलिए जिस स्थान पर जो शब्द आना चाहिए वही प्रयोग हुआ है।

• शैली
मिश्र जी ने विषयानुरूप शैली के विविध रूप अपनाये हैं

  1. भावात्मक शैली-मिश्र जी के ललित निबन्धों में इस शैली का प्रयोग हुआ है। भावुकता से परिपूर्ण होकर आप पाठक को अपने साथ बहाए ले जाते हैं। उसमें यत्र-तत्र गद्य काव्य का सा आनन्द अनुभव होता है।
  2. विचारात्मक शैली-विचार प्रधान गूढ़ गम्भीर विषय का विवेचन इस शैली में किया गया है। इस शैली के वाक्य कुछ लम्बे हो गए हैं किन्तु उनमें स्पष्टता का गुण विद्यमान रहता है।
  3. समीक्षात्मक शैली-आलोचनात्मक रचनाओं में इस शैली के दर्शन होते हैं। इस शैली की भाषा तत्सम प्रधान शुद्ध साहित्यिक हो गई है।
  4. विश्लेषणात्मक शैली-विषय का विश्लेषण करते समय इस शैली का प्रयोग किया गया है। इस शैली की भाषा सरल, सुबोध तथा स्पष्ट होती है।
  5. उद्धरण शैली-मिश्र जी अपनी बात को स्पष्ट करने तथा पुष्ट करने के लिए शास्त्र आदि से उद्धरण देना नहीं भूलते हैं। लोक जीवन के उदाहरण देकर आप कथन को सहज सम्प्रेष्य बना देते हैं।

इसके अतिरिक्त व्यंग्यात्मक, वर्णनात्मक, चित्रात्मक आदि शैलियों का प्रयोग मिश्र जी की रचनाओं में हुआ है।

  • साहित्य में स्थान

मिश्र जी के व्यक्तिपरक निबन्धों में ललित अनुभूति के साथ लोक जीवन के अनुभव मिलकर एक नवीन गरिमा का सृजन करते हैं। व्यक्ति व्यंजक निबन्धों के लेखक के रूप में मिश्र जी की छवि अद्वितीय है। निबन्धकार, समीक्षक, भाषाविद् एवं विचारक के रूप में मिश्र जी की हिन्दी जगत् में एक विशिष्ट पहचान रही है।

4. श्रीराम परिहार
[2008]

  • जीवन-परिचय

ललित निबन्धकार डॉ. श्रीराम परिहार का जन्म 16 जनवरी, 1952 को मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले के केकरिया ग्राम में हुआ। आपको अपने किसान पिता श्री देवाजी परिहार का भरपूर प्यार मिला। आपकी माता जी श्रीमती लखूदेवी से आपको लोक संस्कारों और लोकगीतों के सरस वातावरण का आनन्द प्राप्त हुआ। गाँव में प्रकृति के उन्मुक्त परिवेश में ही आपका बचपन पुष्ट हुआ। आपने स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में मध्य प्रदेश शासन की उच्च शिक्षा महाविद्यालयीन सेवा में कार्य कर रहे हैं। आप श्री नीलकण्ठेश्वर महाविद्यालय, खण्डवा में हिन्दी विभाग में प्राध्यापक एवं अध्यक्ष पद सँभाले हुए हैं।

  • साहित्य-सेवा

गाँव के मनोरम प्राकृतिक परिवेश में माता के लोक गीतों तथा लोक-संस्कारों से प्रभावित श्रीराम परिहार की प्रारम्भ से ही साहित्य के प्रति गहरी रुचि रही है। लोक संस्कृति में रचे-बसे परिहार के लेखन पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। आपकी सेवाओं को ध्यान में रखकर अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया है। आप वागीश्वरी पुरस्कार, ईसुरी पुरस्कार, दुष्यन्त कुमार राष्ट्रीय अलंकरण जैसे सम्मानों से अलंकृत हो चुके हैं।

  • रचनाएँ

अब तक आपकी 11 रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं तथा लगभग पचास शोध आलेख विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. ललित निबन्ध संग्रह-‘आँच अलाब की’, ‘अँधेरे में उम्मीद’, ‘धूप का अवसाद’, ‘बजे तो बंसी गूंजे तो शंख’, ‘ठिठके पल पाँखुरी पर’, ‘रसवन्ती बोलो तो’, ‘झरते फूल हरसिंगार के’, ‘हंसा कहो पुरातन बात’।
  2. समीक्षा-रचनात्मकता और उत्तर परम्परा।
  3. लोक साहित्य-कहे जनसिंगा।
  4. नवगीत संग्रह-चौकस रहना है।
  5. सम्पादन-‘अक्षत’ पत्रिका का सम्पादन।

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  • वर्ण्य विषय

भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था रखने वाले श्रीराम परिहार के साहित्य में लोक जीवन एवं लोक-संस्कारों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति मिलती है। आपने अतीत एवं वर्तमान के विविध संदर्भो को अपनी लेखनी का विषय बनाया है। आप विषय से अन्तरंगता रखते हुए लिखते हैं। यही कारण है कि पाठक उसके साथ बँधा हुआ रहता है।

  • भाषा

श्रीराम परिहार की भाषा तत्सम प्रधान खड़ी बोली है जिसमें तद्भव, देशज एवं विदेशी शब्दों को भी यथास्थान लिया गया है। वाक्य रचना सहज एवं सरल है। लक्षणा एवं व्यंजना के पुट भी स्थान-स्थान पर देखे जा सकते हैं। भाषा में दुरूहता या उबाऊपन का नितान्त अभाव है। आपकी भाषा में सम्प्रेषण की अद्भुत क्षमता विद्यमान है।

  • शैली

परिहार जी ने प्रमुखतः ललित शैली को अपनाया है। उनकी शैली के विविध रूप निम्न प्रकार हैं

  1. भावात्मक शैली-श्रीराम परिहार सांस्कृतिक भावानुभूतियों से परिपूर्ण रचनाकार हैं। लालित्य से युक्त आपके निबन्धों में ललित शैली का प्रयोग हुआ है। आपकी रचनाओं में भाव प्रधानं स्थलों पर भावात्मक शैली का सौन्दर्य देखा जा सकता है।
  2. आलंकारिक शैली-परिहार जी अपने निबन्धों में अवसर के अनुरूप अलंकारों का बड़ा स्वाभाविक प्रयोग करते हैं। आपकी आलंकारिक शैली में पाठक के हृदय का स्पर्श करने की भी शक्ति मौजूद है।
  3. चित्रात्मक शैली-श्रीराम परिहार शब्द-चित्र उकेरने में बड़े चतुर हैं। इस शैली के रचित अंश पाठक के मनपटल पर चित्र अंकित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त तरंग शैली, प्रवाह शैली, समीक्षात्मक आदि शैली रूप भी आपकी रचनाओं में उपलब्ध हैं।
  • साहित्य में स्थान

परिहार जी ने अपनी लेखनी की क्षमता से हिन्दी साहित्य को अनूठी रचनाएँ प्रदान की हैं। वर्तमान के ललित निबन्धकारों में आपका सम्मानजनक स्थान है। हिन्दी साहित्य को आपसे अनेक अपेक्षाएँ हैं।

5. जयशंकर प्रसाद
[2008, 09, 14]

  • जीवन-परिचय

युग-प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद का जन्म वाराणसी के प्रसिद्ध सुघनी साहू नामक वैश्य परिवार में 30 जनवरी, सन् 1889 ई. को हुआ था। उनके पिता का नाम देवीप्रसाद था। प्रसाद जी की बाल्यावस्था में ही उनके माता-पिता का देहान्त हो गया था। सत्रह वर्ष की अवस्था में बड़े भाई की भी मृत्यु हो गयी। इस कारण सारे परिवार का बोझ इन पर ही आ पड़ा। पिता की मृत्यु के बाद गृह-कलह आरम्भ हुआ तथा पैत्रिक व्यवसाय को इतनी अधिक हानि पहुँची कि वैभव सम्पन्न सुघनी साहू परिवार ऋण के भार से दब गया।

प्रसाद जी की प्रतिभा इन सभी संकटों के बीच भी अपना आलोक फैलाने लगी। प्रसाद जी ने साहस, आत्मविश्वास, योग्यता तथा लगन के साथ अपने गिरे हुए व्यवसाय को सँभाला। अपने परिवार को प्रतिष्ठा प्रदान की तथा लाखों रुपये के ऋण से भार-मुक्त हुए। प्रसाद जी ने अपने घर पर ही वेद, पुराण, इतिहास, दर्शन, संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी, फारसी का गहन अध्ययन किया। इन्होंने तीन शादियाँ की, किन्तु तीनों ही पत्नियों की असमय मृत्यु हो गयी। 15 नवम्बर, सन् 1937 में 48 वर्ष की अल्प आयु में ही यह सरस्वती-पुत्र इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गया।

  • साहित्य-सेवा

प्रसाद जी को बाल्यकाल से ही कविता से प्रेम था। उनके साहित्यिक जीवन में साधु का सा मौन विद्यमान था। प्रारम्भ में वे ‘कलाधर’ नाम से ब्रजभाषा में कविताएँ करते थे। बाद में उन्होंने खड़ी बोली में रचनाएँ की। प्रसाद जी ने सन् 1906 में हिन्दी साहित्य के सृजन का कार्य प्रारम्भ किया। उनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। प्रसाद जी ‘इन्दु’ नामक मासिक-पत्र में निरन्तर रचनाएँ प्रकाशित कराते रहे। प्रसाद जी ने नाटक, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, मुक्तक काव्य एवं प्रबन्ध काव्य सभी रूपों में हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि की। आपने गम्भीर निबन्ध लिखकर अपने गहन अध्ययन, पाण्डित्य और सूक्ष्म विवेचन-शक्ति का परिचय दिया।

  • रचनाएँ

प्रसाद जी ने अपने छोटे से साहित्यिक जीवन में विविध विषयों पर ग्रन्थ लिखे। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. निबन्ध-‘काव्यकला और अन्य निबन्ध।’ इन निबन्धों में प्रसाद जी का साहित्य सम्बन्धी दृष्टिकोण और गम्भीर चिन्तक रूप प्रकट हुआ है।
  2. कहानी-संग्रह-प्रसाद जी की कहानियाँ-प्रतिध्वनि, छाया, आकाशदीप, आँधी तथा इन्द्रजाल कहानी संग्रहों में संकलित हैं। आपकी पुरस्कार, आकाशदीप, ममता आदि अनेक प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
  3. नाटक-प्रसाद जी ने स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, राज्यश्री, जनमेजय का नागयज्ञ आदि ऐतिहासिक नाटकों की रचना की है।
  4. उपन्यास-कंकाल, तितली तथा इरावती (अधूरा) प्रसिद्ध उपन्यास हैं।
  5. काव्य-कामायनी महाकाव्य प्रसाद जी की सर्वश्रेष्ठ रचना है। लहर, आँसू, झरना आदि आपकी अन्य काव्य कृतियाँ हैं।
  • वर्य विषय

प्रसाद जी की प्रतिभा बहुआयामी थी। उन्होंने भारतीय संस्कृति, इतिहास, मानवीय मूल्य, ग्रामांचल आदि को अपनी लेखनी का विषय बनाया। उनकी नूतन व्यवस्थाएँ तथा अद्भुत विवेचनाएँ गहन विचारशीलता को उजागर करती हैं। आपने इतिहास तथा दर्शन का मधुर समन्वय किया है। मानव मनोवृत्तियों का सफल चित्रण उनके साहित्य की विशेषता है। भावों तथा कल्पना के योग से उन्होंने मोहक शब्द चित्र उकेरे हैं। नारी के प्रति सहानुभूति का भाव, राष्ट्रीयता, दार्शनिकता, प्रेम और सौन्दर्य आपके काव्य के प्रमुख तत्त्व हैं।

  • भाषा

सामान्यतःप्रसाद जी की भाषा शुद्ध एवं संस्कृतनिष्ठ है। उनकी भाषा में तत्सम शब्दावली का बाहुल्य है। संस्कृत शब्द होने के कारण कहीं-कहीं भाषा में क्लिष्टता आ गयी है, किन्तु स्वाभाविकता तथा प्रवाह भाषा में सदैव बना रहता है। एक-एक शब्द मोती की भाँति जड़ा हुआ है। खड़ी बोली में लालित्य और मधुरता लाने का श्रेय प्रसाद जी को ही है। भाषा भावों के अनुकूल है। ‘मुहावरों’ और ‘कहावतों’ को आवश्यकतानुसार साहित्यिक रूप देकर अपनाया गया है। प्रसाद जी की भाषा प्रांजल, प्रौढ़ और परिमार्जित है। विचारों की प्रौढ़ता, भाषा का प्रवाह, सुन्दर शब्द चयन, काव्योचित लालित्य, अर्थ गाम्भीर्य आदि उनकी भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं। आपकी भाषा प्रसाद गुण युक्त है।

  • शैली

प्रसाद जी ने निबन्ध, कहानी आदि में विविध शैलियाँ अपनायी हैं-

  1. भावात्मक शैली-प्रसाद जी एक भावुक कवि थे। इसलिए गद्य में भी जहाँ कहीं भावपूर्ण स्थल आये हैं, वहाँ उनकी शैली भावात्मक है।
  2. चित्रात्मक शैली-प्रसाद जी ने जहाँ वस्तुओं, स्थानों और व्यक्तियों के शब्द चित्र उपस्थित किये हैं, वहाँ उनकी शैली चित्रात्मक हो गयी है।
  3. आलंकारिक शैली-कवि हृदय प्रसाद जी गद्य में भी अलंकारों का सहज प्रयोग किये बिना नहीं रहे हैं। अतः जहाँ अलंकार आये हैं, वहाँ उनकी शैली आलंकारिक हो गयी है। उनकी अलंकारपूर्ण शैली ने काव्यात्मक सौन्दर्य और सरसता की सृष्टि की है।
  4. संवाद शैली-प्रसाद जी ने उपन्यास, कहानी और नाटकों में संवाद शैली का प्रयोग किया है। नाटकों में ‘प्रसाद’ के संवाद अति प्रवाहपूर्ण हैं। उनके संवाद पात्रानुकूल एवं सरस हैं।
  5. वर्णनात्मक शैली-प्रसाद जी ने उपन्यास, कहानी आदि में जहाँ घटनाओं, वस्तुओं और व्यक्तियों का वर्णन किया है, वहाँ उनकी शैली वर्णनात्मक है। इस शैली में वाक्य छोटे हैं और भाषा सरल है।
  • साहित्य में स्थान

प्रसाद जी एक ऐसे पारस थे, जिसके स्पर्श से हिन्दी की अनेक विधाएँ कंचन बन गयीं। वे हिन्दी के मूर्धन्य कवि, नाटककार, उपन्यासकार, अद्वितीय कहानीकार एवं श्रेष्ठ निबन्धकार थे। प्रसाद जैसे महान् कलाकार को पाकर हिन्दी गौरवान्वित हो गयी और हिन्दी साहित्य प्रसाद के प्रसाद को पाकर धन्य हो उठा।

6. मालती जोशी
[2011, 15]

  • जीवन-परिचय

मालती जोशी का जन्म 4 जून, 1934 ई. को महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर के मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ। आपने प्रारम्भिक तथा माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद स्नातक किया और एम. ए. (हिन्दी) की परीक्षा उत्तीर्ण की। आपने अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए साहित्य सृजन का स्तुत्य कार्य किया। आपकी प्रारम्भ से ही साहित्यिक अभिरुचि रही। किशोरावस्था से ही कवि सम्मेलनों में आप बहुत चर्चित कवयित्री रहीं। कवयित्री, बाल साहित्यकार, कहानीकार आदि रूपों में आपने ख्याति प्राप्त की। आपकी रचनाएँ मराठी, कन्नड़, गुजराती तथा अंग्रेजी में अनूदित हुई हैं। आपको साहित्यकार के रूप में अनेक पुरस्कार, सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। रेडियो तथा दूरदर्शन पर आपकी कहानियों के नाट्य रूपान्तर प्रसारित होते रहे हैं। आप आज भी साहित्य सजन में संलग्न हैं।

  • साहित्य-सेवा

साहित्यिक रुचि सम्पन्न मालती जोशी ने प्रारम्भ में कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ के माध्यम से लोकप्रियता अर्जित की। तत्पश्चात् आपने बाल साहित्य, कहानी लेखन में पदार्पण किया। सन् 1969 में आपने बच्चों के लिए लिखना प्रारम्भ किया और खूब ख्याति प्राप्त की। आपकी प्रथम रचना सन् 1971 में ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुई। तब से अब तक यह क्रम निरन्तर चलता आ रहा है।

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  • रचनाएँ

मालती जोशी का लेखन बहुआयामी है। आपने मराठी तथा हिन्दी दोनों में साहित्य सर्जना की है। कवि, बाल साहित्य तथा कहानीकार के रूप में आपकी एक विशिष्ट पहचान है। श्रीमती जोशी की अनेक रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। आपकी हिन्दी तथा मराठी साहित्य की 32 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो मराठी कला संग्रह, दो उपन्यास, पाँच बाल कथा संग्रह, एक गीत संग्रह तथा शेष कहानी संग्रह हैं। श्रीमती जोशी के प्रमुख कहानी संग्रह-‘पाषाण युग’,’तेरा घर मेरा घर’, ‘पिया पीर न जानी’, ‘मोरी रंग दीनी चुनरिया’, ‘बाबुल का घर’ एवं ‘महकते रिश्ते’ हैं।

  • वर्ण्य विषय

भारतीयता में रची बसी मालती जोशी की कहानियों का संसार भी भारतीय परिवारों का जीवंत परिवेश रहा है। आपने जन-जीवन के विविध पक्षों को अपनी कहानियों में उभारा है। घर-परिवार के पारस्परिक सम्बन्ध, व्यवहार, स्वरूप आदि को आधार बनाकर सुश्री जोशी ने आनी बात कहने का सटीक प्रयास किया है। आधुनिक युग के बदलते परिवेश के कारण उभरने वाली परेशानियों को आपने सशक्त अभिव्यक्ति दी है। आपने मध्यमवर्गीय परिवारों की मानवीय संवेदनाओं और नारी मन के सूक्ष्म-स्पन्दनों को स्वाभाविकता के साथ प्रस्तुत किया है।

  • भाषा

श्रीमती मालती जोशी की भाषा आडम्बरों से मुक्त सहजता एवं संवेदनशीलता से परिपूर्ण है। आपकी भाषा में मुख्यतः तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है किन्तु आवश्यकता के अनुसार तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों को भी स्थान मिला है। यत्र-तत्र लक्षणा और व्यंजना का पुट पाठक के मानस का स्पर्श करता है। मुहावरे, अलंकार आदि का प्रयोग भाषा को अधिक सम्प्रेषणीय बनाने में सहयोगी रहा है। वाक्य रचना सरल एवं सुस्पष्ट है।

  • शैली

मालती जोशी की कहानियों में विभिन्न शैली रूपों का प्रयोग हुआ है

  1. संवाद शैली-पात्रों के पारस्परिक कथोपकथनों के माध्यम से जब कहानी का विकास होता है तब संवाद शैली होती है। इस शैली के प्रयोग से आपकी कहानियों में सजीवता, स्वाभाविकता तथा प्रभावशीलता आ गई है।
  2. वर्णनात्मक शैली-जहाँ-जहाँ वर्णनों का सहारा लिया गया है, वहाँ वर्णनात्मक शैली है। श्रीमती जोशी की कहानियों में इस शैली का पर्याप्त प्रयोग हुआ है।
  3. विश्लेषणात्मक शैली-सुश्री जोशी की कहानियों में स्थान-स्थान पर विश्लेषण का सहारा लिया गया वहाँ यह शैली परिलक्षित होती है।

इसके अतिरिक्त आपने आत्मकथात्मक, भावात्मक, विवेचनात्मक, चित्रात्मक, आलंकारिक शैली रूपों का प्रयोग अपनी कहानियों में आवश्यकतानुसार किया है।

  • साहित्य में स्थान

अनुभूति और अभिव्यक्ति के विशिष्ट कौशल के कारण मालती जोशी की पहचान हिन्दी कहानीकारों में अलग ही है। आधुनिक युग के संवेदनशील कहानीकारों में उन्हें बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। वर्तमान कथाकारों में उनका विशिष्ट स्थान है।

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MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 6-10)

11. भूषण
[2010]

  • जीवन-परिचय

सरस्वती के इस ओजस्वी पुत्र का असली नाम क्या था? इस समस्या का समाधान अभी तक नहीं हुआ है। चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्रराम ने उन्हें भूषण’ की उपाधि दी थी; जो आज उनकी पूर्णरूपेण सामाजिक उपाधि बनी हुई है।

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भूषण का जन्म कानपुर के पास तिकवाँपुर नामक गाँव में सन् 1613 ई. (संवत् 1670 वि.) में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. रत्नाकर त्रिपाठी था। इनके अन्य भाई चिन्तामणि और मतिराम तथा नीलकण्ठ भी श्रेष्ठ कवि थे। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने खोज की है कि उनका नाम घनश्याम था। परन्तु काव्य जगत् में इनका नाम भूषण ही प्रसिद्ध है।

चित्रकूट के सोलंकी राजा के यहाँ से इन्हें शिवाजी महाराज का राजाश्रय प्राप्त हो गया। शिवाजी इनके एक छन्द ‘इन्द्र जिमि जम्भ पर’ को कई बार बड़ी तल्लीनता से सुनते रहे। इसके लिए उन्होंने भूषण को अठारह लाख स्वर्णमुद्राएँ और अठारह गाँव की जागीर देकर सम्मानित किया। भूषण को आश्रय देने वाले अन्य महाराज छत्रसाल थे। रीतिकालीन विलासितापूर्ण वातावरण में वीरता को स्वर देने वाले ओज गुण सम्पन्न इस कवि ने सन् 1715 ई. (संवत् 1772 वि.) में अन्तिम साँस ली।

  • साहित्य-सेवा व उद्देश्य

विलासी प्रवृत्ति के राजाओं के दरबार में रहने वाले कवियों ने अपने आश्रयदाताओं को सन्तुष्ट करने और उनकी तृप्ति के लिए नारी के अंग-प्रत्यंग के कामोद्दीपक चित्र अपनी कविता में उभारे। इस तरह रीतिकालीन इन कवियों ने कविता को वासना की वाहिका बनाया हुआ था तभी वीर रस की सशक्तवाणी लिए हुए महाकवि भूषण काव्यमंच पर उभर पड़े और उन्होंने अपनी ओजभरी वाणी में राष्ट्र गौरव की अनुभूति कराने वाला शंखनाद फूंक दिया। सम्पूर्ण राष्ट्रीयजनों ने उनके स्वर को सुना और भूषण के इस सिंहनाद ने भारत में राष्ट्रीय चेतना का स्वर फूंक दिया। \

काव्य का विषय-भूषण को काव्यशास्त्र पर विशेष अधिकार प्राप्त था। धर्म, दर्शन, इतिहास और भूगोल आदि विषयों का उन्हें व्यापक ज्ञान प्राप्त था। उनका ओजस्वी व्यक्तित्व, स्वाभिमान, निर्भीकता, जातीय गौरव एवं अन्याय के विरुद्ध विद्रोह की भावना से भरा हुआ था। उन्होंने भारतीय संस्कृति के महान रक्षक शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का ओजस्वी वर्णन करके हिन्दी कविता की श्रीवृद्धि की।

  • रचनाएँ

भूषण की निम्नलिखित प्रसिद्ध रचनाएँ हैं

  1. शिवा-बावनी-इस रचना में महाराज शिवाजी के शौर्य का वर्णन किया गया है। इस रचना में ओज गुण की प्रधानता है।
  2. शिवराज भूषण-शिवराज भूषण रीतिकालीन प्रवृत्तियों से प्रभावित ग्रन्थ है। यह अलंकारवादी और लक्षण ग्रंथ के रूप में एक प्रसिद्ध रचना है।
  3. छत्रसाल दशक-छत्रसाल दशक में वीर छत्रसाल के यश और कीर्ति का गान किया गया है। इसमें उनके पराक्रम, वीरता एवं युद्ध कौशल का ओज गुण प्रधान शैली में बखान किया गया है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त ‘भूषण हजारा’ और ‘भूषण-उल्लास’ नामक दो कृतियों को भी भूषण की रचनाओं के रूप में बताया गया है। लेकिन ये रचनाएँ अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। महाकवि भूषण ने अपने युग की प्रचलित काव्यधारा के विपरीत काव्य-साधना की।

  • भाव-पक्ष

(1) वीर रस की अभिव्यक्ति-वीर रस के अन्यतम कवि भूषण की कविता का प्रतिपाद्य शिवाजी और छत्रसाल की वीरता ही है। भूषण के काव्य में वीर रस ने पूर्णता प्राप्त की है। शिवाजी को युद्धवीर और धर्मवीर के रूप में चित्रित करते हुए भूषण कहते हैं-

युद्धवीर-“साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि,
सरजा शिवाजी जंग जीतन चलत है।”
धर्मवीर-“राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यो,
अस्मृति पुरान राखे वेद विधि सुनी मैं।”

भूषण के काव्य में वीर रस की स्वाभाविक और सर्वांगीण अभिव्यक्ति हुई है। जिसे सुनकर या पढ़कर ही एक बार तो कायर व्यक्ति में वीरोचित उत्साह भर जाता है।

(2) अन्य रस-भूषण के काव्य में वीर रस के अतिरिक्त रौद्र, वीभत्स तथा भयानक आदि रसों की अभिव्यक्ति उत्कृष्ट रूप से देखी जा सकती है। भूषण ने भंगार रस प्रधान छन्दों की भी रचना की है, जो बेजोड़ है।

(3) युद्ध वर्णन में सजीवता-शिवाजी महाराज और छत्रसाल के आश्रय में काव्य रचना करने के कारण उन्हें युद्ध को अति निकट से देखने का भी मौका मिला। अत: कवि ने युद्ध में सेना का परिमाण, उसके द्वारा की गई मारकाट, एवं विजय पक्ष द्वारा पराजित पक्ष पर भय पैदा करने वाले प्रभाव का स्वाभाविक वर्णन किया है।

(4) राष्ट्रीय भावना-तत्कालीन परिस्थितियों में भारत एक हिन्दू राष्ट्र था। दिल्ली विदेशी अस्थायी शासन की प्रतीक बन चुकी थी। उस समय विदेशी शक्तियों ने भारत के हिन्दुत्व पर ही सीधा आक्रमण किया हुआ था। वे यहाँ से हिन्दुत्व और भारतीय राष्ट्रीय गौरव को मिटा देने देने पर तुले हुए थे। इधर शिवाजी और छत्रसाल जैसे वीर हिन्दुत्व प्रिय राष्ट्रवादी शासकों से भूषण जैसे राष्ट्रवादी कवि को कुछ उम्मीद थी। अतः भूषण को कहना पड़ा-“दिल्ली दल दाबि के दिबाल राखी दनी में।” शिवाजी रूपी महाकाल के धक्के से दिल्ली दलने’ की चुनौती भी दे दी गई। यह विचार ठीक वैसा ही लगता है जैसे भारतीय आजादी से पूर्व नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने ‘आजाद हिन्द फौज को दिल्ली चलो, दिल्ली दूर नहीं है’ का नारा दिया था। इस तरह भूषण के कवित्व में राष्ट्रीयता की सशक्त भावना उल्लसित है।

(5) आश्रयदाता की प्रशंसा-भूषण को हिन्दू राष्ट्रवादी राजा-महाराजाओं का आश्रय प्राप्त था। वे विलासी राजाओं के सख्त विरोधी थे। उन्हें तो राष्ट्रीय गौरव बाए रखने वाले राजाओं का आश्रय ही अभिप्रेय था। द्रष्टव्य है-

‘अब साहु कौ सराहों के सराहौं छत्रसाल कौ।”

  • कला-पक्ष
  1. विषयानरूप ब्रजभाषाका सशक्त स्वरूप-भषण की काव्यभाषा ब्रज है। उन्होंने अपने काव्य में विषय के अनुरूप ही ब्रजभाषा के सशक्त एवं श्रुति कटु पदावली का प्रयोग किया है। कवि ने वीर, रौद्र और भयानक रसों की व्यंजना के लिए कठोर ध्वनि वाली शब्दावली की भाषा को अधिक उपयुक्त समझा। उनकी भाषा में ओजत्व और वीरत्व विद्यमान है। द्रष्टव्य है ‘चकित चकत्ता चौकि-चौकि उठे बार-बार’ इत्यादि।
  2. मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग-भूषण ने अपने काव्य में मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग से उसमें सजीयता उत्पन्न कर दी है। औरंगजेब के लिए प्रयुक्त शब्दावली दर्शनीय है ‘सौ-सौ चूहे खाइ के बिलारी तप को बैठी।’
  3. अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग-भूषण ने अपनी काव्यधारा (ब्रज) के साथ अरबी, फारसी, बुन्देली आदि शब्दों का प्रयोग किया है। कहीं-कहीं खड़ी बोली का भी पुट मिलता है।
  4. अलंकार योजना-महाकवि भूषण अलंकारशास्त्र के पूर्णज्ञाता थे। उन्होंने उत्प्रेक्षा, यमक, श्लेष, सांगरूपक आदि अलंकारों का प्रयोग खूब किया है। युद्ध वर्णनों में भूषण ने वीरभावों की अभिव्यंजना के लिए अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग किया है। देखिए“ऊँचे घोर मंदिर के अन्दर रहन बारी,
    ऊँचे घोर मंदिर में रहाती हैं।” 
  5. शैलीगत ओज और चित्रोपमता-भूषण ने वीर रस की अभिव्यंजना के लिए ओज और चित्रोपमता प्रधान शैली को अपनाया है। शैली में ध्वन्यात्मकता विद्यमान है। भूषण के काव्य में चमत्कार प्रदर्शन भी किया गया है।
  6. छन्द योजना-भूषण ने वीर रस के अनुकूल काव्य में कवित्त, छप्पय, सवैया और दोहा छन्दों का प्रयोग किया है।
  • साहित्य में स्थान

भूषण ने वीरत्व, ओजत्व एवं राष्ट्रीयत्व का सिंहनाद उस समय अपने काव्य में किया जब अधिकांशतः राजा लोग विलासिता में डूबे हुए थे। कविगण भी चाटुकार थे। भूषण ने उस युग में भारत राष्ट्र को अपने ओजस्वी स्वर से जगाने का प्रयास किया। भूषण और भूषण की लेखनी दोनों ही राष्ट्रीय जागरण के प्रतीक बन गए हैं। यही कवि भूषण निश्चय ही माँ भारत के भूषण हैं।

12. रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
[2008, 09, 12, 14, 15, 16]

  • जीवन-परिचय

श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म बिहार के मुंगेर जनपद के सिमरिया घाट नामक गाँव में सन् 1908 ई. (संवत् 1965 वि.) में हुआ था। पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. (ऑनर्स) किया। आप एक वर्ष मोकामा घाट के विद्यालय में प्रधानाचार्य रहे। सन् 1935 ई. में सब-रजिस्ट्रार के रूप में सरकारी नौकरी में आए। सन् 1942 ई. में ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रचार विभाग में आए और उपनिदेशक के पद पर रहे। बाद में, मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे। आप सन् 1952 ई. से सन् 1963 ई. तक राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत राज्यसभा के सदस्य रहे। सन् 1964 ई. में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर आपकी नियुक्ति हुई। हिन्दी साहित्य का यशस्वी ‘दिनकर’ सन् 1974 ई. (सं. 2031 वि.) में सदैव के लिए अस्त हो गया।

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  • साहित्य-सेवा

‘दिनकर’ जी ने भारत सरकार की ‘हिन्दी समिति’ के सलाहकार और आकाशवाणी में निदेशक के पद पर रहकर हिन्दी के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। ‘दिनकर’ जी पर पं. रामनरेश त्रिपाठी की ‘पथिक’ और मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ रचनाओं का बड़ा प्रभाव पड़ा। ‘दिनकर’ जी प्रारम्भ से ही लोक के प्रति निष्ठावान, सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सजग और जनसाधारण के प्रति समर्पित कवि थे। इनकी कविताओं में राष्ट्रीयता की छाप सबसे अधिक है।

दिनकर ने काव्य और गद्य दोनों ही क्षेत्रों में सशक्त साहित्य का सृजन किया है। उनकी कविता हृदय को झकझोर डालती है। वर्तमान भारत की दलित आत्मा उनकी कविता में जाग उठी है। दिनकर अपनी रचनाओं के माध्यम से देशव्यापी जागरण का मंच ऊँचे स्तर का बना चुके हैं। उन्होंने अपनी कृतियों के ही माध्यम से भारतीय आर्य संस्कृति की पतितावस्था के प्रति असन्तुष्ट होकर क्रान्ति का बिगुल फूंक दिया। द्रष्टव्य है-

“क्रांतिधात्रि कविते जाग उठ, आडम्बर में आग लगा दे।
पतन, पाप, पाखण्ड जले, जग में ऐसी ज्वाला सुलगा दे।।”

ध्येय-उन्होंने हिन्दी साहित्य की सेवा द्वारा देश में समग्र परिवर्तन लाने के लिए सपना देखा था। वे चाहते थे कि भारतीय आर्य संस्कृति को जीवन्तता प्राप्त कराने वाले समर्पित काव्यकार, सचेतक आर्यजन सामूहिक रूप से पाखण्डों की कारा को तोड़ने का बीड़ा उठाएँ तो फिर यह राष्ट्र अवश्य ही अपने खोए हुए गौरव को प्राप्त कर सकेगा और विश्वगुरु की उपाधि को पुन: धारण करने में सक्षम होगा। भावी राष्ट्र के कंधे पर कवि के सपने को यथार्थ में बदल देने की जिम्मेदारी है।

उपाधियाँ/सम्मान-

  1. भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति ने उनकी प्रतिभा और साहित्य सेवा के लिए उन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया।
  2. दिनकर जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के लिए एक लाख रुपया दिया जाता है।
  • रचनाएँ

दिनकर जी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. रेणुका,
  2. हुंकार,
  3. रसवन्ती,
  4. द्वन्द्वगीत,
  5. सामधेनी,
  6. कुरुक्षेत्र,
  7. रश्मिरथी,
  8. उर्वशी,
  9. परशुराम की प्रतिज्ञा।

इनके अतिरिक्त-प्रणभंग, बापू, इतिहास के आँसू, धूप और धुंआ, दिल्ली, नीम के पत्ते, नीलकुसुम, चक्रवात, ‘सीपी और शंख’, नए सुभाषित, कोयला और कवित्व’, आत्मा की आँखें, हारे को हरि नाम’, आदि रचनाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं।

  • भाव-पक्ष
  1. हिन्दी काव्य को नई धारा प्रदत्त-‘दिनकर’ जी ने काव्य को नई धारा प्रदान की। इन्होंने देश तथा समाज को अपने काव्य का विषय बनाया।
  2. शोषण के विरुद्ध स्वर-दिनकर जी ने अपने काव्य के द्वारा पूँजीपतियों और शासक वर्ग के अत्याचारों एवं शोषण का नग्न चित्रण किया है।
  3. मजदूरों और किसानों के प्रति सहानुभूति-‘दिनकर’ जी ने गरीबों, मजदूरों तथा किसानों के प्रति अपनी विशेष सहानुभूति को अपने गीतों के माध्यम से प्रकट किया है। भुखमरी, गरीबी, दासता के विरुद्ध वे क्रान्ति ला देना चाहते हैं।
  4. उत्साह और ओज-इनके काव्य का अध्ययन करने से पाठकों और श्रोताओं दोनों के हृदय में ओज और उत्साह के भावों की जागृति हो उठती है।
  5. राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत-‘दिनकर’ जी की कविताएँ राष्ट्रीय-भावनाओं से ओत-प्रोत हैं। उन्होंने गंगा, हिमालय और चित्तौड़ को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रनेताओं, राष्ट्रसेवकों और जनसाधारण में आचरण की पवित्रता, अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ता और राष्ट्रीय हित में बलिदान की भावना भरने का आह्वान किया है। दिनकर जी आधुनिक युग के कवि हैं। इनके काव्य में ओज और उत्साह तथा क्रान्ति की भावना झलकती है।
  6. प्राचीन संस्कृति और नई प्रेरणा की झाँकी-दिनकर जी की कविताओं से नई प्रेरणा मिलती है। इसके साथ ही भारत की प्राचीन संस्कृति की निर्मल झाँकी झलकती है, जिसके प्रति हमारे अन्दर गौरव की भावना अपने आप ही उद्भुत हो उठती है।
  7. देशहित तथा लोककल्याण की भावना-‘दिनकर’ जी की कविताओं में देशहित और लोककल्याण के प्रयत्नों का पारावार लहराता है। आपकी कविताओं से नए भारत के निर्माण का एक नया सन्देश मिलता है।
  8. रस-दिनकर जी ने मुख्य रूप से वीर रस प्रधान कविताओं की रचना की है। परन्तु फिर भी कहीं-कहीं शान्त तथा श्रृंगार रस भी प्रयुक्त हुए हैं।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-दिनकर जी की भाषा शुद्ध खड़ी बोली है। वे अपनी भाषा में अधिकांश तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनका शब्द चयन अत्यन्त पुष्ट और भावानुकूल होता है। उनकी भाषा उनके विचारों का पूर्णरूपेण अनुगमन करती है। शब्दों की तोड़-मरोड़ और व्याकरण की अशुद्धियों से उनकी भाषा मुक्त है। इनक भाषा व्याकरण सम्मत है और अलंकारपूर्ण है। उसमें खड़ी बोली का निखरा रूप मिलता है।
  2. शैली-‘दिनकर’ जी की काव्य शैली ओज प्रधान है। उसमें सजीवता है। तन्मयता उनकी शैली की एक विशिष्ट विशेषता है।
  3. छन्द-‘दिनकर’ जी ने अपने काव्य में कवित्त, सवैया आदि प्राचीन अलंकारों को तो प्रयोग में लिया ही है, साथ ही कुछ नवीन छन्दों की भी अवतारणा की है। वे छन्द तुकान्त और अतुकान्त दोनों ही हैं।
  4. अलंकार-‘दिनकर’ जी की कविताओं में अलंकारों की घनी छटा नहीं दिखाई पड़ती है। उन्होंने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास तथा श्लेष आदि अलंकारों का स्वाभाविक रूप से सहज ही प्रयोग किया है। अलंकारों के असहज प्रयोग के लिए उन्होंने सदैव विरुद्ध भाव ही अपनाया।
  • साहित्य में स्थान

दिनकर जी की प्रतिभा बहुमुखी है। वे अत्यन्त लोकप्रिय कवि हैं। भाव, भाषा तथा शैली सभी दृष्टियों से वे एक कुशल साहित्यकार हैं। वे अपने युग के प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी भाषा में ओज, उनके भावों में क्रान्ति की ज्वाला और उनकी शैली में प्रवाह है। उनकी कविता में महर्षि दयानन्द की सी निडरता, भगत सिंह जैसा बलिदान, गाँधी की सी निष्ठा एवं कबीर की सी सुधार भावना एवं स्वच्छन्दता विद्यमान है। वे आधुनिक हिन्दी काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि हैं।

13. कबीरदास
[2008]

  • जीवन-परिचय

कबीरदास जी निर्गुण काव्यधारा के ज्ञानमार्गी शाखा के कवि थे। उनका जन्म सन् 1398 ई. (सं. 1455 वि.) में हुआ था। उनकी रचनाओं से यह प्रतीत होता है कि इनके माता-पिता जुलाहे थे। जनश्रुति है कि वे एक विधवा ब्राह्मणी के परित्यक्त सन्तान थे। इनका पालन-पोषण एक जुलाहा दम्पत्ति ने किया था। इस नि:सन्तान जुलाहा दम्पत्ति नीरू और नीमा ने इस बालक का नास कबीर रखा।

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कबीर की शिक्षा विधिवत् नहीं हुई। उन्हें तो सत्संगति की अनंत पाठशाला में आत्मज्ञान और ईश्वर प्रेम का पाठ पढ़ाया गया। स्वयं कबीर कहते हैं-“मसि कागद छुऔ नहीं, कलम गहि नहिं हाथ।”

कबीर के गुरु का नाम स्वामी रामानन्द था और उन्होंने ‘राम’ नाम का गुरुमंत्र दिया। कबीर गृहस्थ भी थे। उनकी पत्नी का नाम लोई, पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का नाम कमाली था। कबीरदास पाखण्ड और अंधविश्वासों के विरोधी थे। कहा जाता है कि काशी में मरने वाले स्वर्ग जाते हैं और मगहर में मरने पर नरक मिलता है। कबीर ने अनुभव किया है कि ‘जो काशी तन तजै कबीर रामहि कौन निहोरा।’ इसलिए कबीर अपने जीवन के अन्तिम दिनों में मगहर चले गए। इस प्रकार 120 वर्ष की आयु में सन् 1518 ई. (संवत् 1575 वि.) में इनका देहावसान हो गया।

  • साहित्य-सेवा

कबीरदास जी अशिक्षित थे लेकिन अद्भुत प्रतिभासम्पन्न थे। अचानक ही तन्मय होकर गा उठते थे। यही उनकी उच्चकोटि की कविता थी। उनकी इन रचनाओं को धर्मदास नामक प्रमुख शिष्य ने ‘बीजक’ नाम से संग्रह किया है और डॉ. श्यामसुन्दर दास ने कबीर की रचनाओं को ‘कबीर-ग्रन्थावली’ में संग्रहीत करके सम्पादित किया है। खुले आकाश के नीचे आस-पास खड़े व बैठे लोगों के बीच अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करना ही उनकी साहित्य सेवा थी।

उद्देश्य-समाज और कविता का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित होता है। समाज से ही कविता अपना प्राणरस ग्रहण करती है। कविता में अपने समाज का यथातथ्य चित्रण होता है और उसका दिशा निर्देशन भी। यह दिशा निर्देशन समाज को अपेक्षाकृत समुन्नत बनाने के लिए कविता का सुधारात्मक आचरण काव्य की क्रान्ति-चेतना का भी पर्याय है। इनमें कबीर अग्रगण्य हैं। उन्होंने समाज के अन्तर्विरोधों को यथार्थ के स्तर पर अनुभव किया और सामाजिक परिवर्तन के लिए अपनी कविताओं में क्रान्ति का शंख फूंका। समाज व्याप्त पाखण्ड, बाहरी प्रदर्शन, विद्वेष और उन्माद को गहराई से अनुभव किया था। उन्होंने सामाजिक सुधार की बात तीक्ष्ण व्यंग्यात्मक लहजे में व्यक्त की थी। उनकी दो टूक सच्ची बात में उनके साहस एवं निर्भीक व्यक्तित्व को परखा गया। उन्होंने साफ स्पष्ट किया कि समाज में समरसता के लिए दया-भाव का विस्तार परमावश्यक है। इसी आधार पर हिन्दू-मुसलमान एक हो सकते हैं।

कबीर अपने काव्य सर्जना में इस उद्देश्य को पूरा करने में सफल हुए। परन्तु समाज सुधार और संक्रान्ति तो सतत् प्रक्रियाएँ हैं जो चलती रहती हैं।

  • रचनाएँ

कबीर की अभिव्यक्तियों को शिष्यों द्वारा तीन रूप में संकलित किया है-वे रूप हैं-
(1) साखी,
(2) सबद,
(3) रमैनी।

(1) साखी-कबीर ने जो अनुभव किया, उसे ‘साख’, नामक दोहा छंद में प्रसिद्धि प्राप्त हुई। “साखी आँखी ज्ञान की” कहकर कबीर ने अपनी भक्ति, आत्मज्ञान, सहज कल्याण एवं सदाचार सम्बन्धी विचारों को स्पष्ट किया है।
(2) सबद-गेय पद ‘सबद’ कहे गए हैं। इन सबदों में विषय की गम्भीरता है तथा संगीतात्मकता है। इनमें कबीर ने भक्ति भावना, समाज सुधार और रहस्यवादी भावनाओं का वर्णन किया है।
(3) रमैनी-रमैनी चौपाई छंद में हैं। इनमें कबीर का रहस्यवाद और दार्शनिकता प्रकट हुई है।

कबीर काव्य में कबीर की खरी अनुभूति है।

  • भाव-पक्ष
  1. निर्गुण ब्रह्मोपासना-कबीर निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उनका उपास्य अरूप, अनाम, अनुपम सूक्ष्म तत्व हैं। इसे वे ‘राम’ नाम से पुकारते हैं। कबीर के ‘राम’ निर्गुण निराकार परमब्रह्म हैं। दशरथ के पुत्र ‘राम’ नहीं।
  2. उत्कष्ट प्रेम और भक्ति-कबीर ज्ञान की महत्ता में विश्वास करते हैं। उनकी कविता में स्थान-स्थान पर प्रेम और भक्ति की उत्कृष्ट भावना प्रदर्शित होती है। वे कहते हैं-“यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।” इत्यादि। वे घोषणा करते हैं कि ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय।’
  3. रहस्य भावना-आत्मा परमात्मा के विविध सम्बन्धों को जोड़कर आत्मा के परमात्मा से मिलन और अन्त में ब्रह्म में लीन हो जाने के भाव अपनी कविता में कबीर ने व्यक्त किए हैं।

द्रष्टव्य है-

  1. ‘राम मोरे पिऊ मैं राम की बहुरिया।’
  2. ‘दुलहिनी गावहु मंगलचार।
  3. म्हारे घर आए है राजा राम भरतार।’
  4. समाज-सुधार-सामाजिक जीवन में व्याप्त जाति-भेद, साम्प्रदायिकता, अंधविश्वास, पाखण्ड एवं आडम्बर और मूर्तिपूजा आदि को मिटाने के लिए कबीर की वाणी थोड़ी कर्कश हो उठी थी। उन्होंने पाखण्डियों और मौलवियों को खूब आढ़े हाथ लिया था। आज हम जिस हरिजन उद्धार और हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं, वह तो मध्ययुग में ही शुरू हो गई थी। इन प्रयासों की शुरुआत तो क्रान्तिकारी युग द्रष्टा एवं समाज सुधारक कबीर कर चुके थे।
  5. नीति-उपदेश-कबीर ने समाजगत बुराइयों का खण्डन तो किया ही, लेकिन इसके साथ आदर्श जीवन के लिए नीतिपूर्ण उपदेश भी दिया। सत्य, तप और अहिंसा को जीवन के आधारभूत तत्व माना। धर्म के नाम पर की जाने वाली नरबलि या पशुवध को घृणित माना। अतिथि सत्कार, सन्तोष, दया, क्षमा, करुणा आदि के मूल तत्वों के रूप में प्रतिष्ठापित किए। कथनी करनी के समन्वय पर और सदाचारपूर्ण जीवन पर कबीर ने बल दिया। कर्म प्रधान गृहस्थ जीवन के महत्व को आँका।
  6. धर्मों के अभिन्नता-कबीर के काव्य में हमें इस्लाम के एकेश्वरवाद, भारतीय द्वैतवाद, योग साधना, बौद्धमत एवं वैष्णवों की शरणागत भावना तथा अहिंसा, सूफियों से प्रेम साधना आदि का समन्वित रूप देखने को मिलता है।
  7. रस निरूपण-कबीर के काव्य में काव्यानुभूति व्याप्त है। अतः रस का परिपाक उत्तम कोटि का है। शान्त रस की प्रधानता है। विमुक्त आत्मा का चित्रण एवं आत्मा-परमात्मा के मिलन में श्रृंगार भी इस शान्त रस का ही सहायक बन गया है।
  • कला-पक्ष
  1. अकृत्रिम भाषा की सामर्थ्य-कबीर की भाषा अपरिष्कृत है। उसमें कृत्रिमता का नाम भी नहीं है। स्थानीय बोलचाल के शब्दों की प्रधानता है। उसमें पंजाबी, राजस्थानी, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं के शब्दों के प्रयोग विकृत स्वरूप में प्रयोग किए गए हैं जिससे भाषा में विचित्रता आ गई है। कबीर की भाषा में भाव प्रकट करने की सामर्थ्य विद्यमान है। इनकी भाषा को पंचमेल खिचड़ी अथवा सधुक्कड़ी भी कहा गया है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तो कबीर को भाषा का ‘डिक्टेटर’ बताया है। भाषा का शिथिल स्वरूप है। परन्तु काव्यानुभूति उच्चकोटि की है।
  2. सहज निर्द्वन्द्व शैली-कबीर ने काव्य में सहजता, सजीवता और निर्द्वन्द्वता अपनाई है। काव्य में विरोधाभास, दुर्बोधता एवं व्यंग्यात्मकता का तीखापन मौजूद है। कबीर की भाषा में गतिशीलता और प्रवाह है।
  3. अलंकार-कबीर के काव्य में स्वभावतः अलंकारिता आ गई है। उपमा, रूपक, रूपकातिश्योक्ति, सांगरूपक, अन्योक्ति, उत्प्रेक्षा, विरोधाभास आदि अलंकारों की प्रचुरता है।
  4. छन्द-कबीर की साखियों में दोहा छन्द का प्रयोग है। ‘सबद’ पद है तथा ‘रमैनी’ चौपाई छन्दों में मिलते हैं। ‘कहरवा’ छन्द भी उनकी रचनाओं में प्राप्य है। इन छन्दों का प्रयोग सदोष ही है।
  • साहित्य में स्थान

कबीर समाज सुधारक एवं युगनिर्माता के रूप में सदैव स्मरण किए जायेंगे। उनके काव्य में निहित सन्देश और उपदेश के आधार पर नवीन समन्वित एवं सन्तुलित समाज की संरचना सम्भव है।

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14. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

  • जीवन-परिचय

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ खड़ी बोली की कविता के प्रतिनिधि कवि हैं। इनका जन्म सन् 1865 ई. में निजामाबाद, जिला आजमगढ़ में हुआ था। इनके पिताजी का नाम पण्डित भोलासिंह उपाध्याय और माता का नाम रुक्मणि देवी था। इनके चाचा ब्रह्मसिंह ज्योतिषी और उच्चकोटि के विद्वान थे। इनकी शिक्षा फारसी के माध्यम से प्रारम्भ हुई। इन्होंने मिडिल तथा नॉर्मल परीक्षाएँ उत्तीर्ण करके काशी में क्वीन्स कॉलेज में प्रवेश लिया, परन्तु अस्वस्थ होने के कारण अध्ययन छुट गया। परन्तु स्वाध्याय से ही इन्होंने अंग्रेजी, फारसी आदि का अच्छा ज्ञान और भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया।

प्रारम्भ में आप निजामाबाद के मिडिल स्कूल में अध्यापक नियुक्त हुए। पाँच वर्ष बाद कानूनगो के पद पर नियुक्त हुए। इन्होंने सन् 1932 ई. में इस पद से अवकाश ग्रहण कर लिया और निजामाबाद में ही रहने लगे। सन् 1947 ई. में इनका निधन हो गया।

हिन्दी जगत् ने आपको ‘कवि सम्राट’ और ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधियों से विभूषित किया।

  • साहित्य-सेवा

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने पौराणिक प्रसंगों को अपनी कविता का आधार बनाया है। उन्होंने अपने समय के उपेक्षित और शोषित नारी समाज के उत्थान हेतु पौराणिक चरित्र राधा को आधार बनाया है। उनके प्रिय प्रवास की राधा विरहिणी होकर भी समाज सेवा में संलग्न है। वे अपने सेवा कर्म से सम्पूर्ण बृज का दुःख बाँटती हैं।

उद्देश्य-‘हरिऔध’ ने श्रीकृष्ण को एक महापुरुष मानकर मानवीय रूप में प्रस्तुत करके समाज के हित और कल्याण के कार्यों में संलग्न होने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। साथ ही, राधा के स्वरूप में समाज सेवा में निरत रहकर नारी उत्थान की कल्पना को साकार किया है। शोषित और बन्दिनी बनी नारी को शोषण से मुक्ति दिलाने, उसे पुरुष-प्रधान समाज में समानता का अधिकार प्राप्त कराने के लिए विविध उपायों को निर्दिष्ट करना ही कवि का समग्रतः उद्देश्य रहा है। समाज के प्रत्येक सदस्य के सुख-दुःख में सहभागी बनने की प्रेरणा देना ही मुख्य ध्येय रहा है कवि हरिऔध का।

  • रचनाएँ

हरिऔध जी की निम्नलिखित रचनाएँ हैं

  1. ‘प्रिय-प्रवास’-खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। इस पर इन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था।
  2. ‘वैदेही वनवास’-इस महाकाव्य का विषय राम के राज्याभिषेक के बाद सीता के वनवास की करुणा प्रधान गाथा है।
  3. पारिजात’-स्फुट गीतों का क्रमबद्ध संकलन है। इन गीतों में मानव जीवन के विविध रूपों की झाँकी प्रस्तुत की है।
  4. ‘चुभते चौपदे’,
  5. चोखे चौपदे’,
  6. बोलचाल-ये सभी साधारण भाषा में लिखित प्रभावशाली स्फुट काव्य संग्रह हैं।
  7. ‘रस-कलश’ भी ब्रजभाषा के छन्दों का संकलन है।

इनके अतिरिक्त ‘अधखिला फूल’, ‘ठेठ हिन्दी का ठाठ’ (उपन्यास), रुक्मणी परिणय’ (नाटक), हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास’ आदि प्रमुख रचनाएँ हैं। अंग्रेजी, बंगला आदि भाषाओं की कृतियों के अनुवाद भी किए हैं। ‘कबीर वचनावली’ नाम से कबीर काव्य का संग्रह किया है।

  • भाव-पक्ष
  1. वर्णन के विविध विषय-‘हरिऔध’ के काव्य की पहली विशेषता है वर्ण्य विषय की विविधता। इन्होंने प्राचीन आख्यानों को वर्तमान युग की नाना समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है।
  2. प्राचीन कथानकों में नवीनताएँ-हरिऔध जी ने अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर पात्रों के चरित्रों में स्वाभाविकता का निरूपण किया है।
  3. लोक सेवा का महान सन्देश-‘हरिऔध’ जी के सम्पूर्ण काव्य में लोकमंगल का स्वर सर्वत्र मुखरित हुआ है। प्रिय-प्रवास’ की राधा कहती है-“आज्ञा भूलूँ न प्रियतम की विश्व के काम आऊँ।”
  4. सजीव प्रकृति चित्रण-हरिऔध जी ने प्रकृति का आलम्बन स्वरूप में चित्रण किया है। साथ ही प्रकृति में संवेदनशीलता, उपदेशिका और उसका उद्दीपन भाव आदि का निरूपण किया है।
  5. रस-योजना-हरिऔध के काव्य में सरसता एवं मार्मिक व्यंजना विद्यमान है। आपके काव्य में वात्सल्य, वियोग, शृंगार के हृदयस्पर्शी चित्र चित्रित हैं। साथ ही-‘वैदेही वनवास’ में तो करुण रस की प्रधानता मिलती है। समग्र रूप से देखा जाय तो कवि ने विविध रसों का प्रयोग अवस्था चित्रण में किया है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा वैविध्य-‘हरिऔध’ ने अपने काव्य में भाषा के विविध रूपों का सफल प्रयोग किया है। इनके काव्य में भाषा कोमलकान्त पदावली से युक्त ब्रजभाषा है। उसका माधुर्य सर्वत्र छलक पड़ता है। इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है। उर्दू शब्दों की भरमार भी है। मुहावरों का प्रयोग करके भाव को गम्भीर बना दिया है। शुद्ध सरल खड़ी बोली तथा भोजपुरी में काव्य रचना करना कवि के विशेष भाषा अधिकार को व्यक्त करता है। अभिधा, लक्षणा, व्यंजना आदि शक्तियों तथा ओज, माधुर्य और प्रसाद गुणों से युक्त हरिऔध की भाषा अत्यन्त समृद्ध है।
  2. शैली के विविध रूप-हरिऔध जी ने आलंकारिक और चमत्कारपूर्ण शैली, व्यंग्य, विनोद प्रधान शैली को अपनाया है जिसमें मुहावरेदार उर्दू का सौष्ठव विशेष आकर्षण की वस्तु है।
  3. अलंकार-हरिऔध जी ने अपने काव्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, सन्देह, यमक, अपहृति, वीप्सा, पुनरुक्तिप्रकाश का प्रयोग किया है।
  4. छन्द-हरिऔध ने अपने से पूर्व प्रचलित-कवित्त, सवैया, छप्पय, दोहा आदि छन्दों का सफल प्रयोग किया है। इनके अतिरिक्त संस्कृत के वर्णवृत्तों में अतुकान्त छन्द योजना अपनाई है।
  • साहित्य में स्थान

हरिऔध जी ने खड़ी बोली को सफल काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करके आधुनिक हिन्दी कविता की सशक्त नींव रखी। साथ ही इन्होंने दो महाकाव्यों का सृजन अतुकान्त छन्दों में किया। उन्हें ‘कवि सम्राट’ और ‘साहित्य वाचस्पति’ आदि उपाधियों से सम्मानित किया गया। वे अनेक साहित्यिक सभाओं और हिन्दी साहित्य सम्मेलनों के सभापति भी रहे। इनकी साहित्यिक सेवाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। निःसन्देह, हरिऔध जी हिन्दी साहित्य की एक महान विभूति हैं। उन्हें साहित्य जगत् सदैव स्मरण करता रहेगा।

15. केशवदास

  • जीवन-परिचय

केशवदास रीतिकाल के आचार्य कवि हैं। केशव ने ही हिन्दी में संस्कृत की परम्परा की व्यवस्थापूर्वक स्थापना की थी। इस महान और उच्चकोटि के विद्वान का जन्म संवत् 1612 वि. के लगभग हुआ था। ये दरबारी कवि थे। इन्हें ओरछा नरेश महाराजा रामसिंह के दरबार में विशेष आदर सम्मान प्राप्त था।

विद्वान कवि-केशवदास संस्कृत के बड़े पंडित थे। आधुनिक युग के पूर्व तक संस्कृत की परम्परा का हिन्दी में अनुगमन होता आया है। इनकी कविता बहुत गूढ़ होती थी। इसी से प्रसिद्ध देवकवि ने उन्हें कठिन काव्य का प्रेत’ कहा है। इनकी कविता के विषय में यहाँ भी प्रसिद्ध है कि

“कवि का दीन न चहै विदाई, पूछ केशव की कविताई।।”

  • साहित्य-सेवा

रीति ग्रंथ रचना का श्रेय-रीति ग्रंथों की रचना इनके कवि रूप में आविर्भाव से पूर्ण भी होती रहीं। परन्तु जिस तरह के व्यवस्थित और समग्र ग्रंथ इन्होंने प्रस्तुत किए, वैसे अन्य कोई कवि रीति ग्रंथ प्रस्तुत करने में सफल नहीं हुआ।

कविता जीवन की अभिव्यक्ति-कविता जीवन की अभिव्यक्ति है। कविता जीवन के विस्तार को अपनी संक्षिप्तता में बाँधकर जीवन व्यवहार के अनेक प्रसंग, उसमें मानवीय भाव, चेतना के आधार बिन्दु बन जाते हैं। आस्था, विश्वास, श्रद्धा और स्नेह जैसे भाव मानवीय व्यवहार को सार्वभौमिक और सर्वकालिक स्वीकृतियाँ देने वाले हैं। कविता इन्हीं जीवन मूल्यों से अपने ताने-बाने बुनती है। केशवदास जी ने जीवन मूल्यों को महत्व देते हुए अपने काव्य ग्रन्थों की रचना की; जिनमें मानव जीवन ही पूर्णतः मुखरित हुआ है।

काव्य का उद्देश्य-कविता का लक्ष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करने में निहित है। इसलिए कविता में मानवीय चेतना के विस्तार के अवसर सदैव उपस्थित होते रहते हैं। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक सभी कवियों ने मानव मूल्यों को अनेक तरह से अपनी कविता में (रचनाओं में) प्रस्तुत किया है। प्रायः प्रबन्ध काव्यों में जीवन दर्शन के अनेक पक्षों की अभिव्यक्ति उनके पात्रों के चरित्रगत संरचनाओं से प्राप्त होती है। केशव की रामचन्द्रिका में जीवन दर्शन को अभिव्यक्त करने के अनेक प्रसंग चरित रचनाओं में प्राप्त हो जाते हैं।

केशवदास की रामचन्द्रिका मानवीय व्यवहारों को अपने कथा विन्यास में समाहित किए हुए हैं।

  • रचनाएँ

केशवदास ने निम्नलिखित ग्रंथों की रचना की है

  1. रसिकप्रिया,
  2. कविप्रिया,
  3. रामचन्द्रिका,
  4. विज्ञान गीता,
  5. वीरसिंह देव चरित,
  6. जहाँगीर चन्द्रिका,
  7. नखशिखा,
  8. रत्न बावनी।

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इन रचनाओं में से चार-रामचन्द्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया और विज्ञान गीता बहुत प्रसिद्ध हैं। जनश्रुति है कि रामचन्द्रिका का सृजन उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास के कहने से किया। इनमें से रामचन्द्रिका महाकाव्य है।
केशवदास ने लक्षण ग्रंथ, प्रबन्ध काव्य, मुक्तक सभी प्रकार के ग्रंथों की रचना की है। रसिकप्रिया, कविप्रिया और छन्दमाला-उनके लक्षण ग्रंथ हैं।

  • भाव-पक्ष
  1. रस-केशव की रचनाओं में परिस्थिति और क्रियान्विति के आधार पर सभी रसों की निष्पत्ति हुई है। शृंगार वर्णन भी उच्चकोटि का है। वियोग और संयोग अपने सभी अंगों सहित पूर्णता को प्राप्त हुआ है। वीर रस की अनुभूति युद्धकाल और प्रतिद्वन्द्वियों के परस्पर संवादों में होती है। शान्त रस निर्वेद की दशा में, वीभत्स आदि की अनुभूति युद्ध स्थल पर होती है।
  2. अर्थ गाम्भीर्य-केशवदास जी द्वारा प्रयुक्त संवादों में प्रयुक्त शब्दावली अर्थ गाम्भीर्य से परिपूर्ण है।
  3. नीति तत्व-केशव दरबारी कवि थे। अत: वे अपने पात्रों के चरित्राङ्कन में नीति तत्त्व की प्रधानता को स्वीकार करते हैं। संवादों में निर्भीकता, युक्तियों का प्रयोग करके नैतिक मूल्यों की रक्षा का प्रयास भी किया गया है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-केशव ने अपने ग्रंथों की रचना सामान्य काव्य की भाषा-ब्रजभाषा में की है। लेकिन कुछ रचनाओं पर संस्कृत भाषा का प्रभाव अधिक है। अत: केशव की रचनाओं में कुछ दुरूहता आ गई है। काव्य प्रवाह के अनुरूप भाषा सशक्त, समर्थ और प्रांजलता के गुण से युक्त है।
  2. शैली-केशवदास ने अपनी रचनाओं में प्रबंध शैली एवं मक्तक शैली को अपनाया है। अलंकार प्रधान शैली को केशव ने बहुत आगे बढ़ाया। शैली में व्यंग्यात्मकता अपनाई गई है।
  3. अलंकार-महाकवि केशवदास ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आदि सभी अलंकारों का प्रयोग किया है।
  4. छन्द-केशवदास ने दोहा, कवित्त, सवैया, चौपाई, सोरठा आदि का प्रयोग किया है। अपनी सुविधानुसार अन्य नए छन्दों का प्रयोग भी किया है। क्योंकि केशवदास लक्षण ग्रंथों के रचयिता रहे हैं अतः उन्होंने छन्दों, शैली, भाषा प्रयोग, रस-निष्पत्ति आदि पर नए-नए प्रयोग किए हैं। रीतिबद्धता उनके सम्पूर्ण ग्रंथ साहित्य की विशेषता है।
  5. संवाद योजना-केशव की संवाद योजना अपनी प्रस्तुति में बेजोड़ है। रावण-अंगद के संवाद के माध्यम से संवादों की संक्षिप्तता, अर्थगर्मिता और उनकी मारक शक्तियों के साथ-साथ राजसी परिवेश को नीति – निपुणता तथा व्यक्ति की प्रत्युत्पन्न मति का भी परिचय प्रदान किया है। पात्र संवादों के माध्यम से परस्पर भावजगत की भी अभिव्यक्ति करते चलते हैं।
  • साहित्य में स्थान

केशवदास जी हिन्दी के प्रमुख आचार्य हैं। उनकी सभी रचनाएँ पूर्णतः शास्त्रीय हैं,रीतिबद्ध हैं। उच्चकोटि के रसिक होने पर भी वे पूरे आस्तिक थे। नीतिनिपुण, निर्भीक और स्पष्टवादी केशव की प्रतिभा सर्वतोमुखी है। अपने लक्षण ग्रंथों के लिए उन्हें हमेशा स्मरण किया जाएगा।

16. गिरिजा कुमार माथुर
[2009, 10]

  • जीवन-परिचय

श्री गिरिजा कुमार माथुर का जन्म सन् 1919 ई. (संवत् 1976 वि.) में मध्य प्रदेश के अशोक नगर में हुआ। उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा शासकीय हाईस्कूल, झाँसी से उत्तीर्ण की।

इण्टर तथा बी. ए. की परीक्षाएँ विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) से उत्तीर्ण की। एम. ए. की परीक्षा तथा एल. एल. बी. की उपाधि इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इन्होंने कुछ समय तक झाँसी में वकालत की परन्तु बाद में संवत् 2000 वि. में इन्होंने आकाशवाणी में नौकर कर ली।

  • साहित्य-सेवा

गिरिजा कुमार माथुर की गणना नई कविता के प्रमुख कवियों में की जाती है। आज के परिवेश में बदलती हुई परिस्थितियों, जटिलताओं और कुण्ठाओं से टकराने से आप कभी पीछे नहीं रहे। हमेशा आपने सामाजिक दायित्व बोध से प्रेरित संघर्ष चेतना को अपनाने पर बल दिया।

श्री गिरिजा कुमार ने सौन्दर्य बोध को सापेक्ष्य अनुभूति के साथ अपनाया है।

विषय व ध्येय-गिरिजा कुमार की प्रारम्भिक कविताएँ प्रणय और वैयक्तिक चेतना से प्रभावित थीं। धीरे-धीरे उनकी कविताओं में जीवन की विषमताओं का प्रभाव स्पष्ट होने लगा। मध्यमवर्गीय जीवन की कुण्ठा और नवीन सामाजिक चेतना उनके काव्य के मुख्य स्वर हैं। किन्तु प्रगतिवादी चौखटे को उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इसीलिए उनकी बाद की रचनाओं में आशा और आस्था की अभिव्यक्ति स्पष्ट परिलक्षित होती है।

  • रचनाएँ

गिरिजा कुमार माथुर की निम्नलिखित प्रमुख रचनाएँ हैं

  1. मंजीर,
  2. नाश और निर्माण,
  3. धूप के धान,
  4. शिलापंख चमकीले,
  5. छायामत,
  6. छूनामन,
  7. कल्पान्तर,
  8. पृथ्वीकल्प।
  • भाव-पक्ष
  1. सरसता-गिरिजा कुमार माथुर आधुनिक युग के कवि हैं। इनकी कविता में सरसता
  2. रागात्मकता-इनकी कविता में रागात्मकता की विशेषता है। उनकी कविताओं को विशेष राग और ध्वनि में संगीतबद्ध किया जा सकता है।
  3. नई कविता-आप नई कविता के कवि हैं। छायावाद के उपरान्त प्रारम्भ में आधुनिक नई कविताओं में आपने सामयिक समस्याओं को उभारा है।
  4. प्रयोगवादी विचारधारा-आपकी कविता प्रयोगवादी विचारधारा की है और उसमें नए प्रयोग किये गए हैं।
  5. नवीन विचारधारा की प्रतिष्ठापना-गिरिजा कुमार माथुर ने अपनी कविता में नवीन विचारधारा को आगे बढ़ाया है तथा नया रूप प्रदान किया है। इसके लिए आपने प्राचीन विचारधारा को तोड़ा और मरोड़ा है।
  6. मानस जगत की अभिव्यक्ति-आपकी कविताओं में मनुष्य के मन की गहन व सूक्ष्म अनुभूतियों का उद्घाटन व विश्लेषण किया गया है।
  7. प्रेम और सौन्दर्य-माथुर जी प्रयोगवादी दृष्टिकोण के कवि हैं अत: प्रेम और सौन्दर्य को वर्ण्य विषय के रूप में स्वीकार किया।
  8. प्रकृति चित्रण-माथुर जी का प्रकृति चित्रण छायावादियों से कुछ भिन्न प्रकार का है।
  9. बुद्धि तत्व की प्रधानता-माथुर जी की कविता में बुद्धि तत्व की प्रधानता है। साथ ही भावानुभूति और भावाभिव्यक्ति को भी महत्व दिया।
  10. व्यंग्य की तीक्ष्णता-गिरिजा कुमार माथुर की कविता व्यंग्य की तीक्ष्णता से मन और मस्तिष्क तक चुभ जाती है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-माथुर जी की भाषा में चित्र खींचने की अद्भुत शक्ति विद्यमान है। आपकी भाषा में विविधता है। भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द भी प्रयुक्त हैं।
  2. यथार्थवादी चित्रण-माथुर जी की कविता में यथार्थवादी चित्रण किया गया है जो इनकी भाषा की सशक्तता को व्यंजित करता है। .
  3. बिम्ब और प्रतीक माथुर जी की कविता में दृश्य, स्पर्श एवं ध्वनि के साथ सार्थक प्रतीक बहुत मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
  4. छन्द-छन्द प्रयोग के सन्दर्भ में आप पुरानी मान्यताओं के पीछे चलने वाले नहीं हैं। लोकधुनों का प्रयोग करके अपने गीतों की शोभा बढ़ाई है।
  5. अलंकार-माथुर जी ने अपनी कविता में पुराने अलंकारों को नए रूप में प्रयोग किया है। वे प्रायः मानवीकरण, ध्वन्यार्थव्यंजना एवं विशेषण विपर्यय आदि नए अलंकारों का प्रयोग करते हैं।
  6. शैली-आपकी शैली सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है।
  • साहित्य में स्थान

गिरजा कुमार माथुर हिन्दी साहित्य के नई कविता के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक हैं। आपने “गागर में सागर” भरने का कार्य किया है। हिन्दी कविता में प्रयोग को आपने नई भाषा और शैली प्रदान की है। इसके लिए हिन्दी साहित्य जगत् आपका चिरऋणी है।

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17. दीनदयाल गिरि

  • जीवन-परिचय

दीनदयाल गिरि का जन्म काशी के साधारण ब्राह्मण परिवार में सन् 1802 ई. (संवत् 1859 वि.) में हुआ था। यह बालक (दीनदयाल गिरि) जब पाँच या छ: वर्ष का ही रहा होगा, उस समय इसके माता-पिता दोनों का ही निधन हो गया था। अल्पायु के इस बालक का पालन-पोषण महंत कुशगिरि ने किया। इन्होंने संस्कृत का विशेष ज्ञान प्राप्त किया और इस तरह अपने सतत् परिश्रम से संस्कृत और हिन्दी में उच्चकोटि का ज्ञान प्राप्त कर लिया। अपने सतत् अभ्यास से इन्होंने काव्यकला में कदम रखा और उच्चकोटि के कवियों में इनका नाम गिना जाने लगा।

दीनदयाल गिरि और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के पिता श्री गिरधरदास-दोनों महानुभावों के मध्य गहरी मित्रता थी। दीनदयाल गिरि का देहावसान सन् 1915 ई. में हो गया, ऐसा बताया जाता है।

साहित्य-सेवा

दीनदयाल गिरि ने वसंत, ग्रीष्म, शरद आदि ऋतुओं पर, कोकिल, कौआ, हंस आदि पक्षियों पर, बादल, नदी, समुद्र आदि प्राकृतिक उपादानों पर, हाथी, करंग, अश्व आदि पशओं पर, पलाश-बबूल आदि वृक्षों पर जो अन्योक्तियाँ लिखी हैं, उनकी समानता हिन्दी साहित्य में मिलना कठिन है। यद्यपि दीनदयाल जी ने अन्य कवियों की रचनाओं में भी भाव ग्रहण किए हैं, लेकिन उनकी कविताओं में पूर्व के कवियों की अपेक्षा नूतन चमत्कार है, पूर्ण मौलिकता है। गिरि जी ने अपनी कुण्डलियों में विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से नीति सम्बन्धी बातें कही हैं।

उद्देश्य-काव्य से हमारे मनोलोक में भावों और विचारों के सतरंगी इन्द्रधनुष के निर्माण की प्रेरणा मिलती है। काव्य के माध्यम से ही सुख-दुःख, हर्ष-अमर्ष, प्रेम-घृणा आदि भावों का चित्रण होता है जिससे जीवन में सम्पूर्णता प्रकट होने लगें। काव्य के लिए भाव और भाषा अनिवार्य तत्व हैं। भाव काव्य की आत्मा है जबकि भाषा काव्य का शरीर है। जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए, उसके विकास के लिए तथा आनन्द की सृष्टि के लिए काव्य का बड़ा महत्त्व है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही दीनदयाल गिरि ने अपनी काव्य कृतियों की रचना की।

  • रचनाएँ

दीनदयाल गिरि द्वारा रचित उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. दृष्टान्त तरंगिणी,
  2. विश्वनाथ नवरत्न,
  3. अनुराग वाटिका,
  4. अन्योक्ति कल्पद्रुम।
  • भाव-पक्ष
  1. भाव-दीनदयाल गिरि ने अपने अन्तर्मन से उठते द्वन्द्व को मन की भावभूमि के समतल पर तौलकर अत्यन्त बहुमूल्य नीति बताकर पाठकों को प्रेरित किया है।
  2. प्रतीक-विविध प्रतीकों के माध्यम से नीतिपरक उपदेश दे दिए गए हैं।
  3. रस-दीनदयाल गिरि की कविताओं में शान्त रस की ही निष्पत्ति हुई है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-दीनदयाल गिरि की भाषा ब्रजभाषा है। ब्रजभाषा ने कवि के भावों को स्पष्टता देने में पूर्ण क्षमता दिखाई है। इनकी भाषा प्रसाद गुण से सम्पन्न है। माधुर्य रस की सम्पूर्ति हो रही है।
  2. मुहावरे लोकोक्तियाँ-दीनदयाल गिरि की भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी प्रयुक्त हैं, जो अपने गाम्भीर्य को बढ़ावा देती हैं।
  3. शैली-कवि ने व्यंग्य प्रधान शैली अपनाई है। प्रायः सम्पूर्ण काव्य ही व्यंग्य प्रधान है। कवि ने शब्दों की तोड़-मरोड़ जारी रखी है।
  4. व्यंग्यात्मक-कवि महोदय ने अपनी कविता को व्यंग्यात्मक बनाकर कविता को उच्चकोटि का बना दिया है।
  5. अलंकार-दीनदयाल गिरि की कविता में अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से ही हुआ है। उनका अन्योक्ति अलंकार अत्यन्त प्यारा है।
  • साहित्य में स्थान

दीनदयाल गिरि अपनी अनूठी काव्य शैली के लिए सदैव स्मरण किए जायेंगे।

18. दुष्यन्त कुमार त्यागी
[2008,09]

  • जीवन-परिचय

दुष्यन्त कुमार त्यागी का जन्म 1 सितम्बर, सन् 1933 ई. में हुआ। इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से एम. ए. किया। इसके बाद कई वर्षों तक आकाशवाणी, भोपाल से सम्बद्ध रहे। आप भाषा विभाग, भोपाल में भी अधिकारी रहे। 30 दिसम्बर, 1975 ई. को अल्पायु में ही आपका निधन हो गया। इससे हिन्दी साहित्य को अपार क्षति पहुँची जिसे पूर्ण करना कठिन है।

  • साहित्य-सेवा

उद्देश्य-अत्याधुनिक काल में सामाजिक यथार्थ के चित्रण में दुष्यन्त कुमार की गजलों का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। वे बिना लाग लपेट के अपने समय और अपने समाज की तीखी आलोचना करते रहे हैं। उनकी कविता में यथार्थ से जूझने की शक्ति है। वे मानते हैं कि परिस्थितियाँ यद्यपि अनुकूल नहीं हैं; किन्तु इसमें परिवर्तन की तो हमें हिम्मत जुटानी ही पड़ेगी। संकलित गजलों में उनका वह स्वर जीवन के प्रति गहन आस्था जगाने वाला है। अपने समय की भयावह स्थिति को व्यक्त करने वाली दुष्यन्त की इन गजलों में सामान्य-जन की पीड़ा और सामान्य-जन की जिजीविषा का प्रभावशाली भाषा में चित्रण किया गया है।

  • रचनाएँ

दुष्यन्त कुमार त्यागी द्वारा रचित उनकी कृतियाँ निम्नलिखित हैं
(1) काव्य संकलन-

  • सूर्य का स्वागत,
  • आवाजों के घेरे।

(2) गीति नाट्य-एक कण्ठ विषपायी।
(3) उपन्यास-

  • छोटे-छोटे सवाल,
  • आँगन में एक वृक्ष,
  • दुहरी जिन्दगी।
  • गजल संग्रह-साये में धूप।

दुष्यन्त कुमार त्यागी ने अपनी साहित्य सृजन की यात्रा सन् 1957 ई. में प्रारम्भ की और सन् 1975 ई. में ‘साये में धूप’ गजल संग्रह की सम्पूर्ति के साथ ही अपनी जीवन यात्रा को विराम दे दिया। अपार ख्याति प्राप्त दुष्यन्त जी अपनी कृतियों के साथ ही अमर हो गए हैं और युवा पीढ़ियों के लिए चिरन्तन प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

  • भाव-पक्ष
  1. गहन व सूक्ष्म अनुभूतियाँ-दुष्यन्त कुमार जी की कविता में भाव की अनुभूति गहन और सूक्ष्म दोनों ही हैं। इन अनुभूतियों से व्यवहार पद्य को समझने में आसानी होती है। उनकी गजलें स्पष्ट कर देती हैं कि उनके ऊपर मनोविश्लेषणवाद का प्रभाव अवश्य ही रहा है।
  2. प्रेम और सौन्दर्य-इनकी गजलों में प्रेम और सौन्दर्य को धरती के ठोस धरातल पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  3. छायावादी रहस्यवाद-कवि के ऊपर बीते छायावादी युगीन रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है।
  4. निराशा उद्विग्नता का भाव-कवि छायावादी लगता है जिसमें घोर निराशा भरने वाली भावना अपनी गजलों में प्रतीक बनकर उभरती है। द्रष्टव्य है“ऐसा लगता है कि उड़कर भी कहाँ पहुँचेंगे,
    हाथ में जब कोई टूटा हुआ ‘पर’ होता है।”
    तथा “गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
    वो सब के सब परेशां हैं, वहाँ पर क्या हुआ होगा।”
    कवि यथार्थ की अनुभूति के भय से भी टूटा हुआ दिखता है।
  5. रस-शान्त रस का प्रयोग है।

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  • कला-पक्ष
  1. भाषा-दुष्यन्त कुमार त्यागी अपनी कविताओं में भाव के अनुकूल भाषा का प्रयोग करते हैं। इस कारण उसमें तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी सभी प्रकार के शब्दों का अवसर के अनुकूल चयन किया है। भाषा में सहजता है।
  2. छन्द-इनकी कविताएँ अधिकतर छन्द के बन्धन से मुक्त हैं।
  3. शैली-कवि ने अपनी कविता में व्यंग्यात्मक मुक्तक शैली को अपनाया है। प्रत्येक छन्द अपनी भावभूमि के अर्थ के लिए स्वतंत्र होता है। उनकी व्याख्या परस्पर सम्बद्ध नहीं होती।
  4. अलंकार-अलंकारों का प्रयोग सप्रयास नहीं किया गया है। अपने आप ही उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा शामिल हो गये हैं।

काव्य-धर्म का मर्म-दुष्यन्त जी कविता को राजनीतिक, सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्तर पर लड़ाई का हथियार स्वीकार करते हैं। उनके व्यंग्यों में हास्य की अपेक्षा आक्रोश की प्रबलता है। दुष्यन्त कुमार की कविता का मूल स्वर आम आदमी है।

  • साहित्य में स्थान

दुष्यन्त कुमार की गजलें जन-जन तक पहुँचती हैं। उन्होंने गज़ल की उर्दू परम्परा को एक मोड़ देते हुए हिन्दी को समृद्ध किया है तथा कवियों को एक नई जमीन और नई दिशा प्रदान की है। समग्र रूप से अपने इस महान योगदान के लिए हिन्दी साहित्य चिर ऋणी रहेगा।

19. वीरेन्द्र मिश्र

  • जीवन-परिचय

कवि एवं गीतकार वीरेन्द्र मिश्र का जन्म दिसम्बर, 1927 ई. को ग्वालियर में हुआ था। उनका जीवन आर्थिक संघर्षों एवं सामाजिक थपेड़ों से जूझते हुए आरम्भ हुआ। संघर्षशील जीवन जीते हुए उन्होंने बड़ी कठिनाई से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। उन्होंने जीवन मूल्यों के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर, स्वाभिमानपूर्वक असमानताओं से लोहा लेते हुए कठिनाई का जीवन जिया। जहाँ एक ओर वे अत्यन्त विनम्र, सहज, स्नेहशील और कोमल हृदय थे, वहीं दूसरी ओर प्रबल आत्माभिमानी, दृढ़ निश्चयी और संघर्षशील साहित्यकार थे। अपनी आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए वे निरन्तर इधर-उधर भटके और छोटी-मोटी नौकरियाँ भी की। वे मंचीय कविता के वरिष्ठ एवं लोकप्रिय कवि और गीतकार के रूप में प्रख्यात रहे हैं। उन्होंने लगभग एक दर्जन फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं। अपने समय में मिश्र जी कवि सम्मेलनों के लिए अपरिहार्य हो गए थे।

जून 1975 ई. में वीरेन्द्र मिश्र ने सांसारिक बन्धनों को तोड़ दिया और पंचतत्व में विलीन हो गए।

  • साहित्य-सेवा

आदिकाल से ही मनुष्य अपनी हृदयस्थ भावनाओं को काव्य के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। प्राकृतिक सौन्दर्य के मनोहारी दृश्य के अवलोकन से मनुष्य प्रकृति से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। प्रकृति से तादात्म्यता द्वारा गहन भावों के गूढ़ अर्थों को समझा जा सकता है। यही प्रकृति, प्रेरक शक्ति का स्रोत बनकर उभर बैठती है।

ध्येय-इस सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए एक काव्यकार अथवा गीतकार अपने ध्येय में सफल होता है। इसी प्रेरक शक्ति ने आधुनिक युग में कवि वीरेन्द्र मिश्र ने अपने गीतों के माध्यम से आधुनिक हिन्दी कविता को नई संवेदना और नई लय प्रदान की है।

प्रस्तुत गीत में बादल को सम्बोधित करते हुए कवि अपने कृतज्ञतापूर्ण व्यवहार को अपनाता है और कहता है कि बादल धरती को जीवन देता है। वर्षा करने के अपने व्यवहार में वह कोई भेदभाव नहीं करता। वह सर्वत्र समान रूप से जल बरसाता है। वह सर्वत्र ही बिना किसी भेदभाव के गागर तथा सागर पर बरस पड़ता है। तेरे द्वारा बरसने पर ही पूर्व दिशा से बहती हवा का मान बढ़ेगा, कजरी गीत की तान छिड़ उठेगी। कवि ने इस संदर्भ में आधुनिक जीवन में आस्था, विश्वास और अपनी क्षमताओं का सही उपयोग करने का सदुपदेश दिया है।

  • रचनाएँ

कविवर वीरेन्द्र मिश्र द्वारा रचित कृतियाँ इस प्रकार हैं

  1. गीतम,
  2. मधुवंती,
  3. गीत पंचम,
  4. उत्सव गीतों की लाश पर,
  5. वाणी के कर्णधार,
  6. धरती गीताम्बरा,
  7. शान्ति गंधर्व।

उपर्युक्त के अतिरिक्त वीरेन्द्र मिश्र ने गीत, नवगीत, राष्ट्रीय गीत, व्यंग्य गीत तथा मुक्तक की रचना की है। इसके अलावा रेडियो नाटक तथा बाल साहित्य की रचना भी की है। . भाव-पक्ष

  1. विषमता और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष-वीरेन्द्र मिश्र जी परिवार, समाज, राष्ट्र तथा साहित्य में व्याप्त रूढ़ि, विषमता तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। उनका यह संघर्ष इतिहास के प्रत्येक जीवन संघर्ष से प्रतिबद्ध रहा।
  2. राष्ट्रीय गौरव-मिश्र जी के गीतों में राष्ट्रीय गौरव के भाव भरे हैं। उन्होंने इन गीतों के माध्यम से समाज और राष्ट्र की प्रगतिशील आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया है।
    रहा।
  3. पूँजीवाद का विरोध-मिश्र जी ने अपने गीतों में पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के घृणित स्वरूप का चित्रण किया है और उनके गीतों में शोषण तथा विषमता के विरुद्ध एक सच्ची मानवीय चिन्ता मिलती है। कवि के गीतों के माध्यम से लोगों में आस्था और विश्वास की प्रतिध्वनियाँ लगातार मिलती रहती हैं।
  4. प्रणय के मधुर स्वरों के गायक-मिश्र जी प्रणय के मधुर स्वरों के भी गायक हैं। उनके भाव भरे गीत भावुक प्रेमी कवि के प्रणय की प्रतिध्वनियाँ हैं। इसके साथ ही मिश्र जी के इन्हीं प्रणय गीतों में व्यथा और पीड़ा के मार्मिक स्वर भी समाहित हैं।
  5. रस-शान्त, करुण रस की अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है।
  • कला-पक्ष
  1. वीरेन्द्र मिश्र के गीतों की भाषा सहज, व्यावहारिक तथा लोक में प्रचलित शब्दों में युक्त है। उनकी भाषा की शब्दावली में भाव सम्प्रेषणीयता है, कसावट है, और संगीतात्मकता है।
  2. शैली-कवि ने अपने गीतों में गीति शैली और अभिव्यंजनावाद को स्वीकार किया है। प्रतीक-प्रधान शैली महत्वपूर्ण है।।
  3. छन्द-छन्द बन्धन से मुक्त कविता, प्रतीक शब्दों के प्रयोग से अर्थ को स्पष्ट करती
  4. अलंकार-कवि अपने गीतों में सहज भाव से अलंकारों का प्रयोग करते हैं। नवीन अलंकारों में मानवीकरण का प्रयोग सामान्य रूप से होता रहा है। इसके अतिरिक्त उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, विशेषण विपर्यय, व्यतिरेक, ध्वन्यार्थप्रकाश आदि अलंकार कवि को प्रिय हैं।

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  • साहित्य में स्थान

उपर्युक्त विशेषताओं के कारण वीरेन्द्र मिश्र का हिन्दी साहित्य में एक काव्यकार और गीतकार के रूप में अति महत्वपूर्ण स्थान है। वीरेन्द्र मिश्र इस नवगीत परम्परा के विशिष्ट कवि माने जाते हैं। हिन्दी काव्य जगत् और गीतकार मण्डल आपकी सेवाओं से सदैव उपकृत अनुभव करता है।

20. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ | [2008]

  • जीवन-परिचय

डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म उन्नाव जनपद (उत्तर प्रदेश) के अन्तर्गत झगरपुर नामक ग्राम में सन् 1915 ई. में नाग-पंचमी के शुभ अवसर पर हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इसी ग्राम में हुई थी। इसके बाद वे ग्वालियर चले गए और वहाँ के विक्टोरिया कॉलेज से उन्होंने बी. ए. पास किया। सन् 1940 ई. में एम. ए. की डिग्री और डी. लिट् की उपाधि उन्होंने काशी विश्वविद्यालय से प्राप्त की। अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण करने के पश्चात् उन्होंने होल्कर कॉलेज, इन्दौर और माधव कॉलेज, ग्वालियर में अध्यापन कार्य किया। इसी बीच नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक सहायक के पद पर उनकी नियुक्ति हुई। वहाँ से स्वदेश लौटने पर वे 1961 ई. में माधव कॉलेज, उज्जैन के प्राचार्य नियुक्त हुए। तत्पश्चात् वे विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में कुलपति के पद पर आसीन हुए। उसको भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ के अलंकरण से भूषित किया गया।

  • साहित्य-सेवा व विषय

सुमन जी की कविताएँ सामाजिक जीवन एवं राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी हुई हैं। उनमें सांस्कृतिक तत्व विद्यमान रहता है। सुमन जी प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। जीवन के गान में संगृहीत उनकी रचनाओं में शोषित, दलित एवं उपेक्षित मानव के प्रति सहानुभूति एवं शोषक सत्ताधारियों के प्रति विद्रोह की भावना जागृत हो उठी है। सुमन जी की कविताओं में जागरण एवं निर्माण का सन्देश है।

सुमन जी आस्था तथा विश्वास के गीतकार हैं। इस दृष्टि से ‘वरदान माँगूंगा नहीं’ तथा ‘तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार’ आदि ओजस्वी गीत उल्लेखनीय हैं।

  • रचनाएँ

सुमन जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. हिल्लोल,
  2. जीवन के गान,
  3. प्रलय,
  4. सृजन,
  5. विश्वास बढ़ता ही गया,
  6. पर आँखें भरी नहीं,
  7. विन्ध्य-हिमालय,
  8. माटी की बारात आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।

‘माटी की बारात’ पर आपको साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया है।

  1. प्रेम-सुमन जी का छायावाद के अन्तिम चरण में काव्य क्षेत्र में अवतरण हुआ। प्रारम्भ में प्रेम-गीत लिखते रहे। धीरे-धीरे इन्होंने प्रेम से अधिक कर्त्तव्य का महत्व स्वीकार किया। प्रकृति के विस्तृत क्षेत्र से उठती हुई त्रस्त मानवता की कराहट ने इनके ध्यान को आकर्षित किया और वे देश के राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए।
  2. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का विरोध-सुमन जी के मन में क्रान्ति की आग धधक उठी। उनका मन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रति विरक्ति के भाव से भर उठा। उनकी रचनाओं में साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वर मुखरित हो उठा।
  3. साम्यवाद-सुमन जी का झुकाव साम्यवाद की ओर रहा और इन्हें रूस की नवीन अर्थव्यवस्था ने बहुत आकर्षित किया।
  4. सत्य और अहिंसा-सुमन जी की आस्था गाँधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों पर दृढ़ रही। इसी कारण इनकी कविताओं में क्रान्तिकारी स्वर लोकप्रिय हो गए।
  5. जीवन दर्शन-इनके काव्य में इनका स्वयं का पुष्ट जीवन दर्शन स्पष्ट झलकता है जिसमें वर्तमान के हर्ष पुलक, राग-विराग, आशा-उत्साह के स्वर भी मुखरित हुए।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-सुमन जी सरल एवं व्यावहारिक भाषा के पक्षपाती हैं। उनकी खड़ी बोली में संस्कृत के सरल तत्सम शब्द प्रयुक्त हुए हैं। साथ ही, उर्दू के शब्द भी यत्र-तत्र मिल जाते हैं। परन्तु उर्दू के ये शब्द खटकते नहीं हैं। वे भावों को उद्दीप्त करने में सहायक होते हैं। सुमन जी एक प्रखर एवं ओजस्वी वक्ता भी थे। अत: उनकी भाषा जनभाषा कही जा सकती है। भाषा उनके भावों का अनुगमन करती है।
  2. शैली-सुमन जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट है। उनकी शैली में सरलता है, स्वाभाविकता है। उनकी शैली ओज, माधुर्य और प्रसाद गुणों से सम्पन्न है। उनके गीतों में स्वाभाविकता है, संगीतात्मकता है, मस्ती और लय विद्यमान है।
  3. अलंकार-इनकी कविता में अलंकार अपने आप ही आ गए हैं। नए-नए उपमानों के माध्यम से इन्होंने अपनी बात बड़ी ही कुशलता से कह दी है।
  4. छन्द-सुमन जी ने मुक्त छन्द लिखे हैं और परम्परागत शब्दों की समृद्धि में सहयोग दिया है।
  • साहित्य में स्थान

सुमन जी उत्तर छायावादी युग के प्रगतिशील प्रयोगवादी व्यक्तियों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे एक सुललित गीतकार, महान् प्रगतिवादी एवं वर्तमान युग के कवियों में अग्रगण्य हैं। हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि में आपका सहयोग अतुलनीय है, अविस्मरणीय है।

सम्पूर्ण अध्याय पर आधारित महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. राम राज्य की परिकल्पना के काव्य का प्रमुख आधार है [2013]
(i) सूरदास, (ii) तुलसीदास, (iii) बिहारी, (iv) पद्माकर।

2. तुलसीदास की भक्ति भावना में प्रधानता है [2011]
(i) दास्य भाव, (ii) सखा भाव, (iii) दाम्पत्य भाव, (iv) माधुर्य भाव।

3. सूरदास की साधना-स्थली है
(i) वृन्दावन, (ii) सोरों, (iii) रुनकता, (iv) काशी।

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4. अकबर के नवरत्नों में से एक थे [2008]
(i) रहीम, (ii) सेनापति, (iii) रसखान, (iv) जायसी।
5. रामभद्राचार्य ‘गिरिधर’ किस काल के कवि हैं?
(i) आदिकाल, (ii) भक्ति काल, (iii) रीतिकाल, (iv) आधुनिक काल।

6. तुलसीदास जी को हिन्दी साहित्य का सर्य माना [2008]
(i) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने, (ii) आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने, (iii) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने, (iv) डॉ. नगेन्द्र ने।

7. पद्माकर ने काव्य की रचना की [2008]
(i) ललित ललाम, (ii) गंगा लहरी, (iii) मदनाष्टक, (iv) बारहमासा।
उत्तर-
1. (ii), 2. (i), 3. (iii), 4.(i), 5. (iv), 6. (i), 7. (ii)।

  • रिक्त स्थान पूर्ति

1. रामराज्य की परिकल्पना ……… के काव्य का प्रमुख आधार रही है। [2008]
2. सूर के पदों को …………….” काव्य कहते हैं। [2009]
3. सूरदास ने …………….. में काव्य रचना की है।[2010]
4. जगत विनोद के कवि …………… हैं।
5. …………….. रीतिकाल के वीर रस के कवि हैं।
6. कबीर सच्चे ……………” सुधारक थे।
7. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ …………….” काव्य धारा के कवि थे।
8. श्रीरामभद्राचार्य ‘गिरिधर’ …………….. के कवि थे। [2010]
9. तुलसीदास का ……………. साहित्य एवं समाज की अमूल्य सम्पदा है। [2011]
10. वृन्द के दोहे …………….” की श्रेणी में आते हैं। [2011]
11. रहीम का पूरा नाम ” …………..” था। [2013]
12. गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति ……………” की थी। [2013]
13. मीराबाई ने …………….” को अपना आराध्य बताया। [2014]
उत्तर-
1. तुलसी, 2. मुक्तक, 3. गेयपद शैली, 4. पद्माकर, 5. भूषण, 6. समाज, 7. प्रगतिवादी, 8. आधुनिक काल,9. रामचरितमानस, 10. मुक्तक, 11. अब्दुल रहीम खानखाना, 12. दास्य भाव, 13. कृष्ण।

  • सत्य/असत्य

1. तुलसीदास नरहरि दास के शिष्य थे।
2. हरिऔध का जन्म फतेहपुर में हुआ था।
3. केशवदास रीतिकाल के आचार्य कवि थे।
4. वीरेन्द्र मिश्र छायावादी गीतकार हैं।
5. दीनदयाल गिरि ने कुण्डलियाँ छन्द का प्रयोग किया है। [2010]
6. गिरिजाकुमार माथुर प्रगतिवादी कवि माने जाते हैं।
7. वृन्द के नीतिपरक दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं। 8. अरुन्धति एक महाकाव्य है। [2009]
9. कबीर के कर्मकाण्ड पर करारा प्रहार किया। [2011]
10. दुष्यन्त कुमार ने उर्दू भाषा में ही गज़लें लिखी हैं। [2013]
उत्तर-
1. सत्य, 2. असत्य, 3. सत्य, 4. असत्य, 5. सत्य, 6. असत्य, 7. सत्य, 8. सत्य, 9. सत्य, 10. असत्य।

  • जोड़ी मिलाइए

1. छत्रसाल दशक [2010] – (क) केशवदास
2. जहाँगीर चन्द्रिका [2009] – (ख) भूषण
3. अलीजाह प्रकाश [2009] – (ग) सेनापति ने
4. रीतिकाल में श्रेष्ठ प्रकृति चित्रण किया है – (घ) पद्माकर
5. अतिमा [2009] – (ङ) दुष्यन्त कुमार
6. हिन्दी गजल विधा/प्रसिद्ध हिन्दी – (च) सुमित्रानन्दन पन्त गजलकार [2008, 12]
उत्तर-
1.→ (ख),
2.→ (क),
3.→ (घ),
4. → (ग),
5.→ (च),
6.→ (ङ)।

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II.
1. वात्सल्य [2008] – (क) सुमित्रानन्दन पन्त
2. प्रयोगवादी कवि – (ख) केशवदास
3. सुकुमार भावनाओं के कवि – (ग) सूरदास छायावादी कवि [2008, 11]
4. आधुनिक काल के सूरदास [2008] – (घ) गिरिजाकुमार माथुर
5. कठिन काव्य का प्रेत [2008] – (ङ) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
6. प्रसिद्ध गीतकार [2011] – (च) वीरेन्द्र मिश्र
उत्तर-
1.→ (ग),
2.→ (घ),
3.→ (क),
4. → (ङ),
5.→ (ख),
6. → (च)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. मीराबाई की भाषा किस प्रकार की है?
2. भूषण के पिता का नाम क्या था?
3. ‘प्रिय-प्रवास की रचना किसने की?
4. वीरेन्द्र मिश्र का जन्म स्थान कहाँ है?
5. सेनापति ने प्रबन्ध काव्य की रचना की है या मुक्तक काव्य की?
6. गिरिजाकुमार माथुर किस धारा के कवि हैं?
7. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ किस युग के कवि हैं?
8. दुष्यन्त कुमार का जन्म किस वर्ष में हुआ था?
9. कवि सूरदास जी के गुरु का क्या नाम है? [2013]
10. वात्सल्य रस का सम्राट किसे कहा जाता है? [2015]
उत्तर-
1. राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा,
2. पं. रत्नाकर त्रिपाठी,
3. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,
4. ग्वालियर,
5. मुक्तक काव्य,
6. प्रयोगवादी,
7. द्विवेदी युग,
8. सन् 1933 ई.,
9. बल्लभाचार्य,
10. सूरदास को।

MP Board Class 11th Special Hindi कवि परिचय (Chapter 6-10) 1

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MP Board Class 11th Special Hindi कवि परिचय (Chapter 6-10) 2
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MP Board Class 11th Special Hindi कवि परिचय (Chapter 6-10) 5

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MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 1-5)

MP Board Class 11th Special Hindi स्वाति कवि परिचय (Chapter 1-5)

1. तुलसीदास
[2008,09, 14, 17]

  • जीवन-परिचय

लोकनायक तुलसीदास कविता कामिनी के ललाट के ज्योति-बिन्दु हैं। इस ज्योति-बिन्दु ने अपने चारों ओर प्रकाश विकीर्ण किया हुआ है। ऐसे महान् कवि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् 1589 वि. में बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में हुआ था। परन्तु कुछ लोग सोरों (एटा) को ही इनका जन्म-स्थान मानते हैं। तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। इनके सिर से बाल्यावस्था में ही माता-पिता का साया उठ गया था और उनका पालन-पोषण नरहरिदास ने किया था। उन्होंने तुलसीदास को गुरुमंत्र दिया, रामकथा सुनाई तथा संस्कृत की शिक्षा दी। इन्होंने काशी में विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन किया तथा दीनबन्धु पाठक की अति सुन्दरी कन्या से विवाह किया। उनका नाम रलावली था। भावुक युवक तुलसीदास अपनी प्रिया के प्रेम और सौन्दर्य में सब कुछ भूल बैठा। विदुषी रत्नावली ने अपने अत्यन्त ज्ञान सम्पन्न पति के प्रेम और आसक्ति को ‘अस्थि-चर्ममय देह’ के प्रति देखकर उन्हें बहुत ही दुत्कारा। उनके ज्ञानचक्षु वैराग्य की ज्योति पाकर अलौकिक प्रकाश को विकीर्ण करने लगे।

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तुलसी ने संसार त्याग दिया। राम-गुलाम तुलसी, राम के चरित गायन में लग गए और स्वयं को अपने आराध्य राम की भक्ति में समर्पित कर दिया। संवत् 1680 वि. में इस महात्मा ने शरीर के बन्धनों को तोड़ दिया और परमतत्त्व (राम) में लीन हो गए।

कहा भी है-
“संवत् सोलह सौ अस्सी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यौ शरीर।।

तुलसी में प्रेम की उन्मत्तता, उत्कृष्ट वैराग्य, राम की अनन्य एवं दास्यभाव की भक्ति एवं लोकमंगल की भावना भरी हुई थी।

  • साहित्य सेवा

एक आदर्श साहित्य सेवक का उद्देश्य अपने वृहद् लोक जीवन को सुख और शान्ति से परिपूर्ण बनाना होता है। ‘स्वान्तः सुखाय’ से ‘पर-अन्तः सुखाय’ के आदर्श को यथार्थ में स्थापित करने के लिए लोक मर्यादा की आवश्यकता का अनुभव तुलसी ने किया। तुलसी ने राम के लोकमंगल व लोककल्याणकारी रूप को अपनी लोकपावनी काव्य कृतियों के माध्यम से जनता-जनार्दन के सामने प्रतिष्ठापित किया है। तुलसी के काव्य का प्रमुख आधार रही है-‘राम राज्य की परिकल्पना’। तुलसी द्वारा परिकल्पित आदर्श राज्य की स्थापना आज के युग में भी बहुत प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण हो गई है। कवि ने (तुलसी ने) अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से समाजगत, राजनीतिगत, आर्थिकस्थितिपरक तथा विविध जातिगत सम्बन्धों और उनके एकीकरण का अनन्यतम प्रयास किया है। प्रत्येक तरह की एवं प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने का तर्कसंगत उपाय तुलसी ने प्रत्येक वर्ग के लिए अपने ही सृजित साहित्य में यथास्थान संकेतित किया है। अतः अपनी साहित्य सेवा द्वारा तुलसी ने महान् उद्देश्य की प्राप्ति की है। आवश्यकता है उनके साहित्य को अध्ययन व मनन किए जाने की और हो सके तो तद्नुसार अधिक से अधिक जीवन में यथार्थता लाने की।

  • रचनाएँ
  1. रामचरित मानस-यह महाकाव्य भारतीय संस्कृति, धर्मदर्शन, भक्ति और कवित्व का अद्भुत् समन्वयकारी ग्रन्थ है।
  2. विनय पत्रिका-विनय पत्रिका भक्ति रस का अद्वितीय काव्य है। ब्रजभाषा में रचित ‘भक्तों के गले का हार’ है।
  3. कवितावली-कवितावली में कवित्त-सवैया छंदों में राम कथा का गायन किया गया है।
  4. गीतावली-गीतावली गेय-पद शैली का श्रेष्ठ कवित्व-प्रधान रामकाव्य है।
  5. बरवै रामायण’-यह बरवै छंद में रचित श्रेष्ठ काव्यकृति है। उपर्युक्त काव्य रचनाओं के अलावा तुलसीदास द्वारा रचित कृतियाँ हैं-
  6. रामलला नहरु,
  7. रामाज्ञा प्रश्नावली,
  8. वैराग्य संदीपनी,
  9. दोहावली,
  10. जानकी मंगल,
  11. पार्वती मंगल,
  12. हनुमान बाहुक तथा
  13. कृष्ण गीतावली।
  • भाव-पक्ष

(क) शक्ति, शील और सौन्दर्य का समन्वय-तुलसी ‘राम भक्ति’ शाखा के प्रमुख कवि थे। उन्होंने भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श रूप प्रतिपादित किया और अपने इष्ट राम में शील-शक्ति और सौन्दर्य का समन्वित स्वरूप देखा। इस तरह समग्र तुलसी-काव्य में भाव लोक की सम्पन्नता द्रष्टव्य है।

(ख) समन्वयवादी व्यापक दृष्टिकोण-तुलसी का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक एवं समन्वयवादी था। इन्होंने राम के भक्त होते हुए भी अन्य देवी-देवताओं की वंदना की है। तुलसी के काव्य में भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक विचारधारा पूर्णतः परिलक्षित हुई है। मानव मन की उदात्त भावनाओं, कर्त्तव्यपरायणता एवं लोक कल्याण का जैसा सुन्दर संदेश इनके काव्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र नहीं।

(ग) रससिद्धता-तुलसी रससिद्ध कवि थे। उनकी कविताओं में श्रृंगार, शान्त, वीर रसों की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। शृंगार रस के दोनों पक्षों-संयोग व वियोग का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन किया गया है। रौद्र, करुण, अद्भुत रसों का सजीव चित्रण किया गया है। विनय पत्रिका’ में भक्ति और विनय का उत्कृष्टतम स्वरूप मिलता है।

(घ) लोकहित एवं लोक जीवन-तुलसी के काव्य में मानव हृदय की दशाओं का चित्रण सहज और प्राकृतिक है। उन्होंने लोकहित और लोक जीवन को सुखी बनाने के लिए माता-पिता, गुरु, पुत्र, सेवक, राजा-प्रजा का आदर्श रूप प्रस्तुत किया है। इनकी ‘ईश्वर भक्ति-विनय, श्रद्धा एवं करुणा से अभिभूत है। तुलसी के रामराज्य की कल्पना एक आदर्श है। इन्होंने मानवीय सिद्धान्तों पर आधारित समाज और शासन पद्धति के वृहद् स्वरूप को प्रस्तुत किया है।

(ङ) मतमतान्तरों में समन्वय-तुलसी के काव्य में सर्वोत्कृष्ट विशेषता है उनका समन्वयवादी स्वरूप। विभिन्न मतों, सम्प्रदायों और सिद्धान्तों की कटुता को मिटाकर उनमें परस्पर समन्वय स्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।

  • कला-पक्ष

(1) भाषा-तुलसी के काव्य का कला-पक्ष भी भाव-पक्ष के ही समान पर्याप्त समृद्ध है। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे। इस तरह उन्होंने अन्य बहुत-सी भाषाओं-ब्रज, अवधी आदि पर पूर्ण अधिकार प्राप्त किया हुआ था और इन भाषाओं में सर्वोत्कृष्ट कृतियों की रचना की। उनकी कृतियों में सभी भाषाओं के शब्दों का सहज समावेश है। तुलसीदास मुख्य रूप से अवधी भाषा के कवि हैं। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है। अवधी के साथ तुलसी ने ब्रजभाषा का भी प्रयोग किया है। रामचरित मानस अवधी में तथा कवितावली, गीतावली और विनय पत्रिका ब्रजभाषा में लिखी गयी हैं। उनकी भाषा का गुण साहित्यिकता है। उनकी भाषा में सरलता, बोधगम्यता, सौन्दर्य चमत्कार, प्रसाद, माधुर्य, ओज आदि सभी गुणों का समावेश है।

(2) शैली-तुलसीदास ने अपने समय की सभी प्रचलित काव्य शैलियों में रचनाएँ प्रस्तुत करके अपने वृहद् समन्वयवादी स्वरूप को प्रदर्शित किया। विभिन्न मतों, सम्प्रदायों और सिद्धान्तों की कटुता को मिटाकर उनमें समन्वय स्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। तुलसीदास ने भाषा और छन्द विषयक क्षेत्र में भी समन्वयवादी प्रवृत्ति का परिचय दिया है। उन्होंने अवधी, ब्रज-भाषाओं में समान रूप से रचनाएँ की हैं। इस समय प्रचलित दोहा, चौपाई, कवित्त, सर्वया आदि सभी छन्दों का प्रयोग किया है।

(3) छन्द योजना-तुलसीदास ने जायसी की दोहा-चौपाई छन्दों में रामचरित मानस की रचना की। सूरदास की पद शैली में उन्होंने विनय पत्रिका और गीतावली रची। सवैया शैली में उन्होंने कवितावली की रचना की। दोहा का प्रयोग उन्होंने दोहावली में किया है।

(4)अलंकार-योजना-तुलसीदास का अलंकार विधान भी अत्यन्त मनोहर बन पड़ा है। उनकी उपमाएँ अति मनोहर हैं। उनके उपमा अलंकार को ही हम कहीं पर रूपक, कहीं उत्प्रेक्षा, तो कहीं दृष्टान्त के रूप में प्रतिष्ठित पाते हैं।

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  • साहित्य में स्थान

गोस्वामी तुलसीदास लोककवि हैं। उनके काव्य से जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। उनकी लोकप्रियता के आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि वास्तव में तुलसी ही हिन्दी साहित्याकाश के सूर्य हैं। तुलसीदास को गौतम बुद्ध के बाद सबसे बड़ा लोकनायक माना जाता है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने सच ही कहा है-

“कविता करके तुलसी न लसै,
कविता लसी या तुलसी की कला।”

2. मीराबाई
[2009, 12. 15]

  • जीवन-परिचय

हिन्दी साहित्य में मीराबाई का विशेष महत्त्व है। मीरा भक्त कवयित्री हैं। उनकी रचनाएँ हृदय की अनुभूति मात्र हैं। इस कारण इनकी रचनाएँ सीधे हृदय को स्पर्श करती हैं।

मीराबाई का जन्म राजस्थान में जोधपुर में मेड़ता के निकट चौकड़ी ग्राम में सन् 1498 ई. (संवत् 1555 वि.) के लगभग हुआ था। ये राठौर रत्नसिंह की पुत्री थीं। बचपन में ही मीरा की माता का निधन हो गया। इस कारण ये अपने पितामह राव दूदाजी के साथ रहती थीं। राव दूदा जी कृष्णभक्त थे। उनका मीरा पर गहरा प्रभाव पड़ा। मीरा का विवाह चित्तौड़ के राणा साँगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। विवाह के कुछ ही वर्ष बाद इनके पति का स्वर्गवास हो गया। इस असह्य कष्ट ने इनके हृदय को भारी आघात पहुँचाया। इससे उनमें विरक्ति का भाव पैदा हो गया। वे साधु सेवा में ही जीवन यापन करने लगीं। वे राजमहल से निकलकर मन्दिरों में जाने लगी तथा साधु संगति में कृष्ण कीर्तन करने लगी। इसे चित्तौड़ के तत्कालीन राणा ने प्रतिष्ठा के विरुद्ध मानकर, उन्हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देना शुरू कर दिया जिससे ऊबकर मीरा कृष्ण की लीलाभूमि मथुरा-वृन्दावन चली गयी और वहीं शेष जीवन व्यतीत किया। इस तरह मीरा का समग्र जीवन कृष्णमय था। मीरा की भक्ति भावना बढ़ती गई और वे प्रभु-प्रेम में दीवानी बन गईं। संसार से विरक्त, कृष्ण भक्ति में लीन मीरा की वियोग भावना ही इनके साहित्य का मूल आधार है। मीरा अपने जीवन के अन्तिम दिनों में द्वारका पहुँच गईं। रणछोड़ भगवान् की भक्ति करने लगीं। वहाँ ही सन् 1546 ई. (संवत् 1603 वि.) में स्वर्ग सिधार गईं।

  • साहित्य-सेवा

मीराबाई द्वारा सृजित काव्य साहित्य में उनके हृदय की मर्मस्पर्शिनी वेदना है, प्रेम की आकुलता है तथा भक्ति की तल्लीनता है। उन्होंने अपने मन की अनुभूति को सीधे ही सरल, सहज भाव में अपने पदों में अभिव्यक्ति दे दी है। उनका साहित्य, भक्ति के आवरण में वाणी की पवित्रता व शुचिता को लिए हुए संगीत का माधुर्य है जिनसे सभी अनुशीलन कर्ताओं को मनोमुग्ध किया हुआ है। भक्तिमार्ग की पुष्टि करने में, मन को शान्ति देने में, मीरा की साहित्य सेवाएँ उत्कृष्ट हैं।

  • रचनाएँ

मीरा की रचनाओं में नरसी जी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, राग गोविन्द, राग-सोरठा के पद प्रसिद्ध हैं। इन रचनाओं में अपने आराध्य श्रीकृष्ण-गिरधर गोपाल के प्रति प्रेम के आवेश में गाये पदों के संग्रह मात्र हैं। मीराबाई की रचनाएँ वियुक्त हृदय की अनुभूति हैं। उनमें हृदय की टीस है, माधुर्य है, लालित्य है।

  • भाव-पक्ष
  1. विरह वेदना-मीराबाई भगवान कृष्ण के प्रेम की दीवानी थीं। उन्होंने आँसुओं के जल से सींच-सींचकर प्रेम की बेल बोई थी। मीरा ने अपने प्रियतम (भगवान कृष्ण) के विरह में जो कुछ लिखा, उसकी तुलना कहीं पर भी नहीं की जा सकती। मीरा की विरह वेदना अकथनीय और अनुभूतिपरक है।
  2. रस और माधुर्य भाव-मीरा के साहित्य में माधुर्य भाव को बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। उनकी रचनाओं में माधुर्य भाव प्रधान है, शान्त रस और श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति है।
  3. रहस्यवाद-मीरा के बहुत से पदों में उनका रहस्यवाद स्पष्ट प्रदर्शित होता है। इस रहस्यवाद में प्रियतम के प्रति उत्सुकता, मिलन और वियोग के सजीव चित्र हैं।
  • कला-पक्ष

(1) भाषा–मीरा की भाषा राजस्थानी-संस्कार से संयुक्त ब्रजभाषा है। उन्होंने राजस्थानी शब्दों और उच्चारणों का खूब प्रयोग किया है। परन्तु अपने पदों की रचना, उस युग की काव्यभाषा ब्रजभाषा में ही की। उनके कुछ पदों में भोजपुरी भाषा का भी पुट दिया हुआ है। मीरा की भाषा को शुद्ध साहित्यिक भाषा नहीं कहा जा सकता। वरन् उनकी भाषा जनभाषा ही कही जा सकती है, इसी जनभाषा का प्रयोग उनके समग्र साहित्य में मिलता है।

(2) शैली-मीरा ने मुक्तक शैली का प्रयोग किया है। उनके पदों में गेयता है। गीति शैली पर रचित प्रत्येक पद-गिरधर गोपाल के प्रति आलम्बन प्रधान है तथा उसमें ‘माधुर्यता’ की उपस्थिति गायक और श्रोताओं को भावविलोडित करने वाली है। भाव-सम्प्रेषणता मीरा की गीति शैली की प्रधान विशेषता है। शैलीगत-प्रवाह-भाव को झंकृत कर बैठता है।

(3) अलंकार-मीराबाई ने अपनी रचना-कविता करने के उद्देश्य से नहीं की है। अतः हृदय से निकले गान में अलंकार अपने आप ही आकर जुड़ते रहे हैं। अधिकतर उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास आदि अलंकारों को इनकी रचनाओं में सर्वत्र देखा जा सकता है।

  • साहित्य में स्थान

मीरा ने हृदय में व्याप्त अपनी वेदना और पीड़ा को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। मीरा को तीव्र वेदना की मूर्ति के रूप में विशिष्ट स्थान प्राप्त है।

3. सूरदास
[2008, 09, 13, 16]

  • जीवन-परिचय

महात्मा सूरदास का जन्म सन् 1478 ई. (संवत् 1535 वि.) में आगरा से मथुरा जाने वाले राजमार्ग पर स्थित रुनकता नामक गाँव में हुआ था। परन्तु कुछ अन्य विद्वान दिल्ली के समीप ‘सीही’ को इनका जन्म स्थान मानते हैं। पुष्टिमार्ग के संस्थापक महाप्रभु बल्लभाचार्य जी इनकी प्रतिभा से बहुत ही प्रभावित थे अतः आपकी नियुक्ति श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तनिया के रूप में कर दी। महाप्रभु बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा ‘अष्टछाप’ की स्थापना की और अष्टछाप के कवियों में सूरदास’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया। इस प्रकार आजीवन गऊघाट पर रहते हुए श्रीमद्भागवत के आधार पर प्रभु श्रीकृष्ण लीला से सम्बन्धित पदों की सर्जना करते थे और उनका गायन अत्यन्त मधुर स्वर में करते थे।

महात्मा सूरदास जन्मान्ध थे, यह अभी तक विवादास्पद है। सूर की रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि एक जन्मान्ध द्वारा इतना सजीव और उत्तमकोटि का वर्णन नहीं किया जा सकता।

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एक किंवदन्ती के अनुसार, वे किसी स्त्री से प्रेम करते थे, परन्तु प्रेम की सम्पूर्ति में बाधा आने पर उन्होंने अपने दोनों नेत्रों को स्वयं फोड़ लिया। परन्तु जो भी कुछ तथ्य रहा हो, हमारे मतानुसार तो सूरदास बाद में ही अन्धे हुए हैं। वे जन्मान्ध नहीं थे।

सूरदास का देहावसान सन् 1583 ई. (संवत् 1640 वि.) में मथुरा के समीप पारसोली नामक ग्राम में गोस्वामी विट्ठलनाथ जी की उपस्थिति में हुआ था। कहा जाता है कि अपनी मृत्यु के समय सूरदास “खंजन नैन रूप रस माते” पद का गान अपने तानपूरे पर अत्यन्त मधुर स्वर में कर रहे थे।

  • साहित्य-सेवा

सूरदास हिन्दी काव्याकाश के सूर्य हैं, जिन्होंने अपने काव्य कौशल से हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा की और अपने गुरु बल्लभाचार्य के सम्पर्क में आने के बाद पुष्टिमार्ग में दीक्षा ग्रहण की और दास्यभाव एवं दैन्यभाव के पदों की रचना करना छोड़ दिया। इसके स्थान पर वात्सल्य प्रधान सखाभाव की भक्ति के पदों की रचना करना शुरू कर दिया। अष्टछाप के भक्त कवियों में सूरदास अग्रणी थे। उनके काव्य का मुख्य उद्देश्य कृष्ण भक्ति का प्रचार करके जनसामान्य में तथा संगीतकारों में भक्ति रस से उनके मन को आप्लावित करना रहा था। इसके अतिरिक्त सूर ने अपने काव्य की साधना से प्रभुभक्ति और पवित्र प्रेम का निरूपण किया। सूर के सम्पूर्ण साहित्य में विनय, वात्सल्य और श्रृंगार ने अद्वितीय स्थान प्राप्त किया है। वात्सल्य वर्णन को हिन्दी की अमूल्य निधि कहा गया है जिसमें मानव हृदय की प्रकृत अवस्था निर्विघ्न रूप से निरूपित है। बाल मनोविज्ञान के तो सूर अद्वितीय पारखी थे। शिशु चेष्टाओं का आंकलन कवि ने अपने ग्रंथों में स्वाभाविक रूप से किया है, जो बेजोड़ है।

  • रचनाएँ

विद्वानों के मतानुसार सूरदास ने तीन कृतियों का ही सृजन किया था, वे हैं-
(1) सूरसागर,
(2) सूर सारावली,
(3) साहित्य लहरी।

(1) इनमें सूरसागर ही उनकी अमर कृति है। सूरसागर में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित सवा लाख गेय पद हैं। परन्तु अभी तक 6 या 7 हजार से अधिक पद प्राप्त नहीं हुए हैं।
(2) सूर सारावली में ग्यारह सौ सात छन्द संग्रहीत हैं। यह सूरसागर का सार रूप ग्रन्थ है।
(3) साहित्य लहरी में एक सौ अठारह पद संग्रहीत हैं। इन सभी पदों में सूर के दृष्ट-कूट पद सम्मिलित हैं। इन पदों में रस का सर्वश्रेष्ठ परिपाक हुआ है।

सूरदास सगुण भक्तिधारा के कृष्णोपासक कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि थे। उनके काव्य में तन्मयता और सहज अभिव्यक्ति होने से उनका भावपक्ष अत्यन्त सबल और कलापक्ष अत्यन्त आकर्षक और सौन्दर्य प्रधान हो गया है।

  • भाव-पक्ष
  1. भक्तिभाव-सूरदास कृष्ण के भक्त थे। काव्य ही भगवत् भजन एवं उनका जीवन था। एक भक्त हृदय की अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई है। सूर की भक्ति सखा भाव की भक्ति थी। कृष्ण को सखा मानकर ही उन्होंने अपने आराध्य की समस्त बाल-लीलाओं और प्रेम-लीलाओं का वर्णन पूर्ण तन्मयता से किया है।
  2. सहृदयता और भावुकता-सूरदास ने अपने पदों में मानव के अनेक भावों का बड़ी सहृदयता से वर्णन किया है। उस वर्णन में सखा गोप-बालकों के, माता यशोदा के और पिता नंद के विविध भावों की यथार्थता और मार्मिकता मिलती है। कृष्ण और गोपी प्रेम में प्रेमी केहदय के भाव पूर्णत् सरोवर में लहराती तरंगें हैं।
  3. उत्कृष्ट रस संयोजना-सूर की उत्कृष्ट रस संयोजना के आधार पर डॉ. श्यामसुन्दर दास ने उन्हें रससिद्ध कवि’ कहकर पुकारा है। सूर के काव्य में शान्त, श्रृंगार और वात्सल्य रस की त्रिवेणी प्रवाहित है।
  4. अद्वितीय वात्सल्य-सूरदास ने कृष्ण के बाल-चरित्र, शरीर सौन्दर्य, माता-पिता के हृदयस्थ वात्सल्य का जैसा स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक सरस वर्णन किया है, वैसा वर्णन सम्पूर्ण विश्व साहित्य में दुर्लभ है। सूर वात्सल्य के अद्वितीय कवि हैं।
  5. श्रृंगार रस वर्णन-सूर ने अपनी रचनाओं में श्रृंगार के दोनों पक्षों-संयोग और वियोग का चित्रण करके उसे रसराज सिद्ध कर दिया है। आचार्य रामचन्द्र शक्ल ने कहा है, “श्रृंगार का रस-राजत्व यदि हिन्दी में कहीं मिलता है तो केवल सूर में।”
  • कला-पक्ष
  1. लालित्य प्रधान ब्रजभाषा-सूरदास ने बोलचाल की ब्रजभाषा को लालित्य-प्रधान बनाकर उसमें साहित्यिकता पैदा कर दी है। उनके द्वारा प्रयुक्त भाषा-सरल, सरस एवं अत्यन्त प्रभावशाली है जिससे भाव प्रकाशन की क्षमता का आभास होता है। सूरदास ने अवधी और फारसी के शब्दों का प्रयोग करके एवं लोकोक्तियों के प्रयोग से अपनी भाषा में चमत्कार एवं सौन्दर्य उत्पन्न कर दिया है। भाषा माधुर्य सर्वत्र ही विद्यमान है। इस प्रकार सूर की काव्य भाषा एक आदर्श काव्य भाषा है।
  2. गेय-पद शैली-सूर ने गेय-पद शैली में काव्य रचना की है। माधुर्य और प्रसाद गुण युक्त शैली वर्णनात्मक है। उनकी शैली की वचनवक्रता और वाग्विदग्धता एक प्रधान विशेषता है।
  3. आलंकारिकता की सहज आवृत्ति-सूरदास के काव्य में अलंकार अपने स्वाभाविक सौन्दर्य के साथ प्रविष्ट से होते जाते हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, अलंकारशास्त्र तो सूर के द्वारा अपना विषय वर्णन शुरू करते ही उनके पीछे हाथ जोड़कर दौड़ पड़ता है। उपमानों की बाढ़ आ जाती है। रूपकों की वर्षा होने लगती है।”
  4. छन्द योजना की संगीतात्मकता-सूरदास ने मुक्तक गेय पदों की रचना की है। इन पदों में संगीतात्मकता सर्वत्र विद्यमान है।
  • साहित्य में स्थान

सूर अष्टछाप के ब्रजभाषा कवियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। बाल प्रकृति-चित्रण, वात्सल्य तथा श्रृंगार में तो सूर अद्वितीय हैं। सूर का क्षेत्र सीमित है, पर उसके वे एकछत्र सम्राट हैं। जब तक सूर की प्रेमासिक्त वाणी का सुधा प्रवाह है, तब तक हिन्दू जीवन से समरसता का स्रोत कभी सूखने नहीं पाएगा और उसका मधुर स्वर सदैव हिन्दी जगत में गूंजता रहेगा।

भक्तिकाल के प्रमुख कवि सूरदास अपनी रचनाओं, काव्य कला और साहित्यिक प्रतिभा के कारण निःसन्देह साहित्याकाश के ‘सूर’ ही हैं। इन सभी विशेषताओं के कारण यह

दोहा अक्षरशः सत्य है
“सूर सूर तुलसी ससी,
उडुगन केसव दास।
अब के कवि खद्योत सम,
जहँ-तहँ करत प्रकाश।।”

4. स्वामी रामभद्राचार्य ‘गिरिधर’

  • जीवन-परिचय

कवि रामभद्राचार्य ‘गिरिधर’ का जन्म जनवरी महीने की चौदहवीं तारीख को सन् 1950 ई. में उत्तर-प्रदेश के जौनपुर जिले के गाँव शाणीपुर में हुआ था। इनका पूरा नाम स्वामी रामभद्राचार्य है। दो वर्ष की अल्पायु में ही इनके दोनों नेत्रों की ज्योति सदा के लिए चली गई और ये कुछ भी देख नहीं सकते थे। इन्होंने अपने ही अध्यवसाय से और निरुत्साहित हुए बिना ही विद्यार्जन का उपाय स्वयं ढूंढ़ निकाला और अभ्यास करके ही श्रीमद्भगवद्गीता एवं रामचरितमानस इन्हें कंठस्थ हो गये। श्री ‘गिरिधर’ जी (जो इसी उपनाम से प्रसिद्ध हैं और लोगों द्वारा समादरित होते हैं) ने अपनी सभी परीक्षाओं में प्रथम से लेकर एम. ए. तक-99 (निन्यानवे) प्रतिशत अंक प्राप्त किये। आपके ऊपर माँ शारदा के असीम कृपा और वरदहस्त रहा है। ‘होनहार विरवान के होत चीकने पात वाली कहावत अक्षरशः सत्य सिद्ध होती है। वे उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने के प्रत्येक अवसर को प्राप्त करने में कभी पीछे नहीं रहे। इन्होंने संस्कृत व्याकरण सम्बन्धी किसी महत्वपूर्ण विषय में पी-एच. डी. की डिग्री प्राप्त करके अपनी कुशाग्र बुद्धित्व का परिचय दिया तथा कुछ समय के बाद संस्कृत के किसी अति महत्वपूर्ण विषय में डी. लिट. की उपाधि भी प्राप्त कर ली।

उपर्युक्त विवरण हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। परि श्रम और निरन्तर अध्यवसाय से मनुष्य अपने ध्येय तक पहुँचने में सफल हो सकता है। सफलता के शिखर पर उत्साही और अपनी क्षमताओं में अटूट विश्वास रखने वाले ही पहुँचकर अपने देश और समाज को उन्नति पथ पर ले जाते हैं। ऐसे ‘गिरिधर’ जी को हम सम्मान प्रतिष्ठा देते हुए गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

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  • साहित्य-सेवा

श्री ‘गिरिधर जी ने हिन्दी साहित्य और संस्कृत साहित्य के विकास के लिए निरन्तर प्रयास किया। उन्होंने दोनों भाषाओं में अनन्यतम ग्रंथों की सर्जना करके सूरकालीन भक्तियुग की परम्पराओं को अक्षुण्य बनाने का सतत् प्रयास किया है। उनका प्रयास अत्यन्त स्तुत्य है। भाषा में शास्त्रीयता विद्यमान है, साथ ही साथ लोकभाषा के प्रयोग एवं उसके सम्वर्द्धन के प्रयास अभी भी निरन्तर किए जा रहे हैं। संस्कृत भाषा को सामान्य जनभाषा के रूप में विकसित करने का तथा उसके प्रयोग की विधि में सरलता, सरसता एवं प्रवाह उत्पन्न करने का प्रयत्न आपके द्वारा किया जा रहा है। हमें विश्वास है कि ‘गिरिधर’ जी के दिशा निर्देशन में हिन्दी साहित्य एवं संस्कृत साहित्य अपने चरम विकास को प्राप्त कर सकेगा।

  • रचनाएँ

स्वामी रामभद्राचार्य द्वारा रचित कृतियाँ निम्नलिखित हैं

  1. प्रस्थानमयी काव्य-प्रस्थानमयी काव्य की रचना आचार्य जी ने संस्कृत भाषा में की है। इस ग्रंथ की भाषा में सरसता और सरलता है तथा भाव-सम्प्रेषण की क्षमता विद्यमान है।
  2. भार्गव राघवीयम् महाकाव्य-‘भार्गव राघवीयम्’ एक महाकाव्य है। इसकी रचना संस्कृत भाषा में की गई है। अपने प्रकार का यह अद्वितीय महाकाव्य है।
  3. अरुन्धती महाकाव्य-इस महाकाव्य की रचना कवि श्री रामभद्राचार्य जी ने हिन्दी भाषा में की है। विषयवस्तु समाज के परिवेश में नवीनता उत्पन्न करके सुधार की परिकल्पना से सम्बन्ध रखती है।

उपर्युक्त के अलावा राघवगीत गुंजन, भक्तिगीत सुधा एवं अन्य 75 ग्रन्थों की रचना हिन्दी भाषा में की गई है। हिन्दी का स्वरूप परिष्कृत और परिमार्जित है।

साहित्य और शिक्षा क्षेत्र के विकास के लिए आपने ‘जगद्गुरु’ रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय’ की स्थापना चित्रकूट में की है। शासन द्वारा आपको इस विश्वविद्यालय का जीवनपर्यन्स कुलाधिपति बनाया गया है।

साहित्य सेवा के लिए पुरस्कार-आपको भारतीय संघ के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा

  1. महर्षि वेदव्यास वादरायण पुरस्कार दिया गया है। इस पुरस्कार के लिए जीवनपर्यन्त एक लाख रुपये प्रतिवर्ष दिए जाते हैं।
  2. भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया है। इसके लिए पचास हजार रुपये दिये जाते हैं।
  3. दो लाख का श्री वाणी अलंकरण-यह पुरस्कार रामकृष्ण डालमिया वाणी न्यास, नई दिल्ली द्वारा दिया गया।
  • भाव-पक्ष
  1. प्रेम और हृदय की उदात्तता-कविरामभद्राचार्य की रचनाओं के भाव पक्षीय सबलता स्तुत्य है। हृदयगत भाव वास्तुजगत के प्रभाव से अनुभूतिजन्य हैं जिनमें प्रेम और हृदय की उदात्तता परिलक्षित होती है।
  2. वात्सल्य रस, भक्ति रस के परिपाक से सम्प्रक्त होकर अति पुष्ट होता गया है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-भाषा भावानुकूल प्रयुक्त हुई है। उसमें शास्त्रीयता का प्राधान्य है। भाषा का परिष्कृत स्वरूप लोकभाषा के विकास को नई दिशा देते हैं। अतः लोकभाषा में प्रवाह की प्रबलता है।
    कवि ने भाव को स्पष्ट करने के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग किया है।
  2. शैली-कवि ने सूरदास की मुक्तक गेय-पद शैली को अपनाया है। उसमें विषय की विशदता और गम्भीरता को अनायास ही सरसता देकर एक विशेष शैली का अन्वेषण किया है।
  3. अलंकार योजना-कवि का अपने काव्य में अलंकार संयोजन सप्रयोजन नहीं होता है। वह तो अनायास ही भाव के अभिव्यक्तिकरण के लिए अपने आप ही प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। इनकी कृतियों में उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास आदि महत्त्वपूर्ण सभी अर्थालंकारों और शब्दालंकारों का प्रयोग परिलक्षित होता है।
  4. छंद-योजना-कवि ने मुक्तक-छंद की संयोजना की है जिसे हम भक्तियुगीन सूरदास के छंद विधान के समकक्ष पाते हैं। अन्तर है, तो केवल भाषा का। सूर की भाषा परिष्कृत ब्रजभाषा है और रामभद्राचार्य जी की भाषा परिनिष्ठित खड़ी बोली हिन्दी।
  • साहित्य में स्थान

कवि रामभद्राचार्य ‘गिरिधर’ हिन्दी और संस्कृत भाषा के विकास के लिए प्रयासरत हैं। उनके रचित ग्रन्थ हिन्दी और संस्कृत साहित्य की अक्षुण्यनिधि हैं। हम आशा करते हैं कि आपके द्वारा संस्कृत और हिन्दी साहित्य का विकास दिशा निर्दिष्ट होता रहेगा। हिन्दी और संस्कृत जगत आपके नृत्य कार्यों के लिए चिरऋणी है।

5. पद्माकर
[2011]

  • जीवन-परिचय

पद्माकार रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। इनके पूर्वज दक्षिण भारत के तेलंग ब्राह्मण थे। पद्माकर के पिताजी का नाम श्री मोहनलाल भट्ट था। वे मध्य प्रदेश के सागर में आकर बस गए थे। यी (सागर में ही) पद्माकर जी का जन्म सन् 1753 ई. में हुआ था। सागर के तालाब घाट पर पद्माकर जी की मूर्ति स्थापित है। पद्माकर एक प्रतिभा सम्पन्न कवि थे। ‘कवित्त’ छन्द की रचना करने की अलौकिक क्षमता व कौशल उन्हें वंश-परम्परा से प्राप्त था। कवित्त शक्ति और क्षमता सम्पन्न पद्माकर ने मात्र नौ वर्ष की उम्र से ही कवित्त-रचना करना शुरू कर दिया था।

पद्माकर जी रीतिकालीन कवि थे। वे राजदरबारी श्रेष्ठ कवि थे। उन्होंने राजाओं की प्रशंसा में अनेक कृतियों की रचना की। राजाओं की प्रशंसा करते हुए उन्होंने हिम्मत बहादुर विरुदावली, प्रतापसिंह विरुदावली और ‘जगत-विनोद’ की रचना की। समय की प्रबलता से जीवन के अन्तिम समय में उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उस रोग की मुक्ति के लिए उन्होंने गंगाजी की स्तुति की। गंगा की स्तुति में उन्होंने गंगा-लहरी’ काव्य की रचना की। इस काव्यकृति की रचना करते हुए ही यहीं पर 80 वर्ष की उम्र में सन् 1833 ई. में उनका निधन हो गया।

  • साहित्य-सेवा

पद्माकर जी ने जीवन पर्यन्त साहित्य की अचूक सेवा की। राजदरबार में रहकर श्रेष्ठ काव्य-साहित्य की रचना करना अपने आप में एक बहत ऊँची साधना की। रीतिकालीन परम्पराओं का निर्वाह करते हुए उन्होंने अपने आश्रयदाता राजा-महाराजाओं की प्रशंसा करने में शृंगार प्रधान रचनाओं की सर्जना की। वे निरन्तर ही साहित्य सेवा में संलग्न रहे। रीति युग की विशेषताओं का समावेश पद्माकर की काव्य प्रणाली बन चुकी थी। श्रृंगार के दोनों ही पक्षों-संयोगावस्था व वियोगावस्था में नायक और नायिकाओं के चित्रण अद्वितीय काव्य कौशल से उभारे हैं। समय-समय पर अपनी काव्यकृतियों की भाव-व्यंजना के लिए पद्माकर जी को अन्य राजाओं ने पुरस्कृत करके सम्मानित भी किया।

पद्माकर अपनी साहित्य सेवाओं के लिए सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। उन्होंने अपने कवित्त छंद के प्रयोग के माध्यम से प्रकृति, प्रेम भक्ति और रूप का चित्रण किया है। उन्होंने अलौकिक भाव-भंगिमाओं के चित्र उकेरते हुए अपने मनोभावों की सूक्ष्मता को स्पष्ट किया है।

  • रचनाएँ

पद्माकर ने निम्नलिखित ग्रंथों की रचना की है। वे इस प्रकार हैं-

  1. पद्माभरण,
  2. जगत विनोद,
  3. आलीशाह प्रकाश,
  4. हिम्मत बहादुर विरुदावली,
  5. प्रतापसिंह विरुदावली,
  6. प्रबोध पचासा,
  7. गंगालहरी तथा
  8. राम रसायन।

पद्माकर के काव्य ग्रंथों की विषय-वस्तु-पद्माकर द्वारा प्रणीत ग्रंथ अपने आप में हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इनके द्वारा कवि ने प्रकृति के विविध स्वरूपों का चित्र उकेरा है। इनका षट्ऋतु वर्णन बहुत ही प्रसिद्ध है। प्रत्येक ऋतु के प्रभाव और मानव-मन में उत्पन्न होते विकारों का बेलाग वर्णन पद्माकर जी की विविधतामयी बुद्धि कौशल की देन है। इसके अतिरिक्त पद्माकर ने प्रेम को ईश्वरीय रूप में प्रतिष्ठापित किया है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से सिद्धान्त निरूपति करते हुए कहा है कि-

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  1. लौकिक प्रेमानुभूति ही अलौकिक (ईश्वरीय) प्रेम की अनुभूति का आधार है।
  2. लौकिक प्रेम ही मानवीय रचनात्मकता से सीधा सम्बन्ध रखता है।
  • भाव-पक्ष

(1) प्रकृति चित्रण-पद्माकर ने अपने काव्य कौशल से प्रकृति के उद्भ्रान्त स्वरूप को षट्ऋतु वर्णन में अनेक अनुभूतियों के माध्यम से वर्णन करके प्रस्तुत किया है। प्रकृति और मानव सम्बन्धों की घनिष्ठता को काव्यभाषा ब्रजभाषा के प्रयोग से परिभाषित किया है।

(2) भक्ति-पद्माकर अपनी बढ़ती उम्र के पड़ाव पर पहुँचकर शारीरिक कष्टों से पीड़ित करने लगे। अत: उनका स्वाभाविक रूप से झुकाव ईश्वर और इष्ट-भक्ति की ओर हो चला था। पद्माकर की वैराग्य भावना का प्राकट्य उनकी अमर कृतियों-गंगा-लहरी, प्रबोध पचासा तथा राम रसायन में अपने आप ही हो चला है।

(3) रस-संयोजना-पद्माकर की सभी कृतियों में प्रेम का विस्तार और विकास भक्ति, वात्सल्य तथा दाम्पत्य भाव के अन्तर्गत हुआ है। प्रेम की पृष्ठभूमि ‘रति’ नामक स्थायी भाव से होती है। अतः कवि ने श्रृंगार रस का प्रयोग अपनी संयोग और वियोग की दोनों ही अवस्था में चरम तक पहुँचा दिया है। कवि द्वारा संयोगवस्था में प्रिय और प्रियतमा की रूप चेष्टा का वर्णन उनकी काव्य कला की अनुपम धरोहर बन चुकी है। इसके विपरीत वियोग की अवस्था में प्रिय से वियुक्त हुई प्रियतमा स्मृतिजन्य वेदना-व्यथा से व्यथित होती हुई प्रेम की केन्द्रीय भावभूमि में पहुँच चुकी होती है। इस प्रकार पद्माकर के काव्य में प्रेम और श्रृंगार का अनुभूतिपरक चित्रण हुआ है जो अनुपमेय है। उनके द्वारा किया गया प्रेम की एकान्तिक दशा तथा प्रेम परिपूर्ण बहानों का विवेचन इस बात को स्पष्ट करता है कि पद्माकर मनोभावों की सूक्ष्मता के पारखी थे।

  • कला-पक्ष

(1) भाषा-पद्माकर ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की है। उनकी प्रारम्भिक रचनाओं में (कविता में) बुन्देली का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस बुन्देली के साथ ही कहीं उर्दू, फारसी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग बहुत अधिक हुआ है। पद्माकर की भाषा परिष्कृत और बोझिल सी प्रतीत होती है। यद्यपि उन्हें भाषा पर अप्रतिम रूप से अधिकार प्राप्त था।
(2) शैली-पद्माकर एक राजदरबारी कवि थे अतः उनकी शैली वर्णन प्रधान थी। चित्रोपम वर्णन अपनी काव्यकृति के लिए उनकी अनूठी देन है। उन्होंने अलंकार प्रधान शैली का विकास स्वयं ही किया है। यह शैली प्रायः सभी राजदरबारी कवियों के काव्य में प्रतिष्ठापित हुई है। अतः यह परम्परागत शैली है जो रीतिकालीन काव्य की विशेषताओं में से एक अन्यतम विशेषता है।
(3) अलंकार-पद्माकर ने अपनी काव्य कृतियों में यथास्थान अलंकारों का प्रयोग किया है। अनुप्रास अलंकार उनका अति प्रिय अलंकार है। इसके प्रयोग के सौन्दर्य का अवलोकन एक ही उदाहरण से हो जाएगा

“कूलन में, केलिन में, कछारन में, कुंजन में।
क्यारिन में, कलिन कलीन किलकत हैं।।”

पद्माकर ने अनुप्रास के अतिरिक्त यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का भी प्रयोग किया है। अनुप्रास के प्रयोग से ध्वनि चित्र खड़ा करने में पद्माकर अद्वितीय हैं।

(4) मुहावरे व लोकोक्तियाँ-पद्माकर की कविताओं में भाव को स्पष्टता प्रदान करने के उद्देश्य से मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग सफलता के साथ किया गया है। द्रष्टव्य है

“नैन नचाइ कही मुसकाइ, लला फिर आइयो खेलन होरी।” और
“अब तो उपाय एकौ चित्त पै चट्टै नहीं।।”

  • साहित्य में स्थान

पद्माकर निःसन्देह रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में से एक थे। इनके द्वारा प्रयुक्त भाषा की विशेषता के सन्दर्भ में आचार्य रामचन्द्रशुक्ल ने लिखा है-“भाषा की सब प्रकार की शक्तियों (अभिधा व्यंजना आदि) पर इनका अधिकार स्पष्ट दीख पड़ता है। एक महान कवि की भाषा में अनेकरूपता हुआ करती है, उस सबका साक्षात् रूप पद्माकर की कविता में परिलक्षित होता है। आपने साहित्यिक अभिव्यक्ति और विकास की जो दिशा अपनी काव्यकृतियों के माध्यम से हिन्दी जगत को दिखाई है, उसके लिए अध्येता जगत आपका सदैव ऋणी रहेगा। वास्तविकता यह है कि पद्माकर रीतिकालीन परम्परा के उत्तरार्द्ध के प्रतिनिधि कवि हैं।

6. मतिराम

  • जीवन-परिचय

कविवर मतिराम के पिताजी का नाम रत्नाकर था। ये कानपुर के एक गाँव तिकवांपुर के रहने वाले थे। मतिराम के जन्म की निश्चित तिथि का निर्णय नहीं हो सका है। परन्तु इनका जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था। वे बूंदी के महाराज भावसिंह के दरबारी कवि थे। जन्मतिथि के समान ही मतिराम के निधन के सम्बन्ध में भी विवादास्पद स्थिति बनी हुई है।

मतिराम और भूषण दोनों ही सगे भाई थे। दोनों ही उच्चकोटि के कवि हुए। हिन्दी साहित्य में यह एक उदाहरण है। काव्य के क्षेत्र में इन दोनों (मतिराम और भूषण ने) ही ने उत्कृष्ट ख्याति प्राप्त की।

  • साहित्य-सेवा

मतिराम के काव्य के अनुशीलन से यह सिद्ध होता है कि उन्होंने उच्चकोटि की शिक्षा प्राप्त की होगी और श्रेष्ठ ग्रन्थों के प्रतिपादन में अपनी शास्त्रीय क्षमताओं का उपयोग किया। मतिराम ने कई ग्रंथों की रचना की है। उन सभी ग्रंथों में काव्य लक्षण निर्दिष्ट करते हुए विशिष्ट कवि कौशल को प्रदर्शित किया था। चमत्कार प्रदर्शन करने वाले लक्षण ग्रंथ हिन्दी साहित्य की अनूठी निधि हैं।

  • रचनाएँ

मतिराम ने कुल नौ ग्रंथों की रचना की है। लेकिन उनमें से कुल चार ग्रंथ ही उपलब्ध हैं, जो अग्रलिखित हैं

  1. फूल मंजरी,
  2. रसराज,
  3. ललित ललाम,
  4. मतिराम सतसई। (मतिराम सतसई में 703 दोहे सकंलित हैं।)

काव्य विषय-फूल मंजरी, रसराज, ललित ललाम उच्चकोटि के शास्त्रीय लक्षण ग्रंथ हैं। मतिराम सतसई में नीतिपरक दोहे हैं जिनमें व्यावहारिक पक्ष को स्पष्टता प्रदान की है। व्यवहार का उत्कृष्ट स्वरूप निखर आया है। लक्षण ग्रंथों में छंद, रस, काव्यांग, अलंकार प्रयोग की विधि, रूप सौन्दर्य वर्णन आदि प्रमुख विषय वस्तु रहे हैं।

  • भाव-पक्ष

(1) प्रेम-मतिराम ने अपनी काव्यकृति में सहज प्रेम के मर्मस्पर्शी चित्रों में जो भाव व्यक्त किए हैं, वे सभी सामान्य लोगों की सामान्य अनुभूति के अंग हैं।
(2) माधुर्य एवं रस प्रयोग-मतिराम की कविता में माधुर्यता सबसे अधिक है। ‘रसराज’ शीर्षक ग्रंथ में कवि ने रसों के प्रयोग किये हैं जिन्हें हम लाक्षणिकता से पूर्ण मान सकते हैं। श्रृंगार रस की भी प्रचुरता रही है। मतिराम का श्रृंगार वर्णन अद्वितीय है। संयोग और वियोग में मतिराम ने राधा-कृष्ण के माध्यम से श्रृंगार के विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों का मधुरिम चित्रण किया है। शील और सौन्दर्य चित्रण में कवि की विदग्धता परिलक्षित होती है।

  • कला-पक्ष
  1. भाषा-मतिराम की भाषा के विविध रूप दृष्टिगोचर होते हैं। उनकी भाषा विशुद्ध ब्रजभाषा है।
  2. शैली-मतिराम-रीतिबद्ध कवियों में शामिल किए जाते हैं। फिर भी इनकी कविता में कृत्रिमता नहीं है। काव्य में वास्तविक और व्यावहारिक शैली की प्रधानता होने से वर्णन प्रधान हो गई है। शैली में अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना आदि भाषायी शक्तियों का प्रयोग कवि ने अपनाया
  3. छन्द-योजना-कवि ने अपनी कृतियों में कवित्त, सवैया और दोहे आदि छन्दों का प्रयोग किया है। कवित्त और सवैया के माध्यम से उन्होंने अपने शास्त्रीय प्रयोग की उत्कृष्टता परिलक्षित कर दी है। उन्होंने छन्दों के प्रयोग में चमत्कार प्रदर्शन को दूर ही रखा है।
  4. अलंकार का चमत्कारपूर्ण प्रदर्शन-मतिराम अपनी सभी कृतियों के शब्द और अर्थ तथा अलंकार के प्रयोग में चमत्कारपूर्ण प्रदर्शन को अधिक पसन्द नहीं करते हैं। आपकी रचनाओं में अलंकारों का ही सर्वाधिक वर्णन किया गया है क्योंकि वे लक्षण ग्रन्थ हैं। अतः कविता में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यतिरेक, अतिश्योक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग उपयुक्त ही किया गया है। मतिराम का अलंकार विधान स्वाभाविक है। इससे उनकी रचना में सौन्दर्य की अभिवृद्धि हो गई है।

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  • साहित्य में स्थान

मतिराम रीतिकाल के शीर्षस्थ कवियों में माने जाते हैं। वे अपने सहज कृतित्व के लिए अति प्रसिद्ध हैं, इसलिए रीतिकालीन कवियों में उनका सबसे उच्च स्थान है। लक्षण ग्रन्थ के प्रणेता के रूप में सर्वत्र ख्याति प्राप्त व्यक्तित्व के धनी मतिराम हिन्दी साहित्य जगत में सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। वे अपने कर्त्तव्य कौशल से आचार्यत्व को प्राप्त महाकवि हैं।

7. कविवर वृन्द

  • जीवन-परिचय

रीतिकालीन परम्परा के अन्तर्गत कवि वृन्द का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उनके नीति के दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं। अन्य प्राचीन कवियों की भाँति वृन्द का जीवन परिचय भी प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

पं. रामनरेश त्रिपाठी इनका जन्म सन् 1643 ई. में मथुरा (उत्तर प्रदेश) क्षेत्र के किसी गाँव का बताते हैं। परन्तु डॉ. नगेन्द्र का मत है कि कवि वृन्द का जन्म मेड़ता, जिला जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। इनका पूरा नाम वृन्दावन था। विद्याध्ययन के लिए इन्हें काशी भेज दिया गया। उस समय इनकी अवस्था सम्भवतः दस वर्ष की रही होगी। काशी में रहकर इन्होंने व्याकरण, साहित्य, वेदान्त तथा गणित दर्शन विषय का अध्ययन किया और ज्ञान प्राप्त किया। इसके साथ ही इन्होंने काव्य की रचना करना भी सीखना शुरू कर दिया। मुगल सम्राट औरंगजेब के दरबार में ये दरबारी कवि रहे। सन् 1723 ई. में इनको देहावसान हो गया।

  • साहित्य-सेवा

कवि वृन्द ने लोक जीवन का गहन अध्ययन करके काव्य में अपने अनुभवों का विशद विवेचन किया है। वृन्द के ‘बारहमासा’ में बारह महीनों का सुन्दर वर्णन मिलता है। भाव-पंचासिका’ में शंगार के विभिन्न भावों के अनुसार सरस छंद लिखे गए हैं। ‘शंगार-शिक्षा’ में नायिका भेद के आधार पर आभषण और अंगार के साथ नायिकाओं का चित्रण किया गया है। ‘नयन पचीसी’ में नेत्रों के महत्व का चित्रण है। छन्दों के लक्षणों के सन्दर्भ में ही इसी कृति में दोहा, सवैया और घनाक्षरी छन्दों का प्रयोग भी हुआ है। ‘नयन पचीसी’ में ऋतु वर्णन अत्यन्त आकर्षक है। हिन्दी में वृन्द के समान सुन्दर दोहे बहुत ही कम कवियों ने लिखे हैं। उनके दोहों का प्रचार शहरों से लेकर गाँवों तक में है। पवन पचीसी में षड्ऋतु वर्णन के अन्तर्गत वृन्द ने पवन के वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतुओं के स्वरूप और प्रभाव का वर्णन किया है।

उद्देश्य (ध्येय)-काव्य द्वारा जीवन को संस्कार युक्त बनाया जाता है। अगली पीढ़ियों तक जीवन के उच्च अनुभवों को संप्रेषित करने की शक्ति काव्य में होती है। जीवन जीना यदि एक कला है, तो इस कला की शिक्षा काव्य में समायी रहती है। व्यक्ति और समाज के स्वस्थ तालमेल में ही व्यक्ति के स्व-विकास का सही और उच्चकोटि की भूमिका निर्धारित होती है। इस तरह से जीवन-विकास की शिक्षा देने वाला काव्य ही नीतिपरक काव्य कहा जाता है। सभी युगों में कविता का जीवन-शिक्षा से गहरा सम्बन्ध रहा है। अत: कवि वृन्द ने अपने काव्य में नीति को स्थान दिया है।

विषय-वृन्द के दोहे जीवन शिक्षा के कोश हैं। उनका प्रत्येक दोहा जीवन के किसी न किसी अमूल्य अनुभव से परिपूर्ण है। प्रस्तुत दोहों में शिक्षाप्रद जीवन-सूत्रों को संकलित किया गया है। अवसर के अनुकूल बात कहना अति महत्वपूर्ण है। एक बार ही किसी को धोखा देकर सफलता प्राप्त की जा सकती है-बार-बार नहीं क्योंकि काठ की हाँड़ी एक बार ही चूल्हे पर चढ़ती है; फिर से चढ़ाने में तो वह अग्नि से नष्ट हो जाती है। वृन्द के दोहों की विषयवस्तु बहुत ही विस्तृत और विशद है। इसका प्रचलन जनसामान्य तक है।

  • रचनाएँ

कवि वृन्द की निम्नलिखित रचनाएँ अति महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से कवि ने काव्य रचना के अपने ध्येय की सम्पूर्ति की है। ये रचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. बारहमासा,
  2. भाव पंचासिका,
  3. नयन पचीसी,
  4. पवन पचीसी,
  5. श्रृंगार शिक्षा,
  6. यमक सतसई। यमक सतसई में 715 दोहे हैं।

कवि वृन्द के द्वारा रचित दोहों को ‘वृन्द विनोद सतसई’ में संकलित किया गया है।

  • भाव-पक्ष
  1. नीति तत्त्व-कवि वृन्द ने अपनी कृतियों के अन्तर्गत नीति तत्त्व को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करके उन्हें आत्मविकास का पथ प्रदर्शित किया है। नीतिगत बात कहना, उसके अनुसार आचरण करना स्तुत्य होता है। ज्ञान प्राप्त करके प्रबुद्धजन समाज को विकास की दिशा निर्दिष्ट करते हैं।
  2. व्यावहारिक तत्त्व-कवि वृन्द ने अपने काव्य के माध्यम से व्यावहारिक पक्ष को उन्नत बनाये रखने की शिक्षा दी गई है।
  3. धैर्य गुण-धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वाह करते रहने से जीवन सफलता की ओर अग्रसर होता रहता है।
    इस तरह कवि वृन्द ने अपनी कृतियों के द्वारा प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली महत्त्वपूर्ण बातों की शिक्षा देते हुए व्यक्ति और समाज के परस्पर सम्बन्धों को सापेक्षक बनाने का प्रयास किया है।
  4. रस-कवि वृन्द ने ‘भाव पंचासिका’ में श्रृंगार के विभिन्न भावों की अनुभूति कराने वाले छन्द लिखे हैं। नायिकाओं के श्रृंगार सम्बन्धी चित्रण अति मनमोहक बन पड़े हैं जिनके द्वारा संयोग और वियोग की अवस्थाओं की अभिव्यक्ति विषय और वातावरण के अनुकूल हुई है। नीति व व्यवहारपरक दोहों में शान्त रस का परिपाक हुआ है।
  5. प्रकृति चित्रण-कवि के द्वारा अपने ‘बारहमासा’ में बारह महीनों का सुन्दर वर्णन किया गया है। प्रत्येक महीने के बदलते स्वरूप का चित्रण मनुष्य के जीवन चक्र को प्रदर्शित करता है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-कवि वृन्द के अपने काव्य में ब्रजभाषा के मिश्रित रूप को अपनाया है, जो आंचलिक शब्दावली से परिनिष्ठित है। भाषा के आंचलिक प्रयोग कवि के भाव को पाठकों तक सम्प्रेषित करने में पूर्ण सक्षम हैं। कवि के सूक्ष्मदर्शी व्यक्तित्व को उनकी भाषा पूर्णतः अभिव्यक्ति देने में सफल सिद्ध है। ब्रजभाषा के माध्यम से अपने काव्य में लोक जीवन को, अपने अनुभवों को, नीति भक्ति और लोकदर्शन आदि का विशद विवेचन प्रस्तुत किया है।
  2. शैली-वृन्द की रचनाएँ रीति परम्परा की हैं। उनकी ‘नयन-पचीसी’ युगीन परम्परा से जुड़ी हुई कृति है। इनकी कृतियों में किसी भी व्यवहार तत्त्व को सहज-सरस अभिव्यक्ति देकर लोकोक्ति का स्वरूप दे दिया गया है। जिसका प्रभाव सामान्य लोक जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से देखा गया है। अलंकार प्रधान शैली को बारहमासा और षड्ऋतु वर्णन में अपनाया गया है। वस्तुतः वृन्द ने नीति शैली, आलंकारिक शैली, सूत्रशैली का प्रयोग अपने सम्पूर्ण काव्य में किया है।
  3. छन्द-कवि वृन्द का सर्वप्रिय छंद दोहा है। लेकिन दोहा के अतिरिक्त उन्होंने सवैया, घनाक्षरी छन्दों का भी प्रयोग किया है। इन छन्दों के प्रयोग से एवं विषयवस्तु के प्रतिपादन की शैली से कवि वृन्द के आचार्यत्व गुण व विशेषता का आभास होता है।।
  4. अलंकार-कवि वृन्द का यमक अलंकार के प्रति अत्यधिक झुकाव है। उन्होंने अपनी ‘यमक-सतसई’ में यमक अलंकार के विविध स्वरूप को अनेक प्रकार से स्पष्टता प्रदान की है। इस प्रकार से ‘यमक-सतसई’ लक्षण ग्रंथ ही है।
  • साहित्य में स्थान

कवि वृन्द ने अपने दोहों में लोक व्यवहार के अनेक अनुकरणीय सिद्धान्तों का उल्लेख किया है। उनकी रचनाएँ रीतिबद्ध परम्परा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उनकी रचनाओं में सरसता-सरलता, अभिव्यक्ति की सहजता एवं वाणी की विदग्धता विद्यमान है। अपनी साहित्यिक सेवा के लिए रीतिकाल के सभी कवियों में कविवर वृन्द अपना विशेष स्थान रखते हैं।

8. रहीम

  • जीवन-परिचय

रहीम का जन्म सन् 1556 ई. में हुआ था। इनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। वे अकबर के अभिभावक सरदार बैरम खाँ खानखाना के पुत्र थे। रहीम जी अकबर के एक मनसबदार थे और दरबार के नवरत्नों में प्रमुख थे। मुगल साम्राज्य के लिए इन्होंने अनेक युद्ध लड़े थे। परिणामतः अनेक प्रदेशों में जीत भी प्राप्त की थी। जागीर में इन्हें बड़े-बड़े सूबे और किले मिले हुए थे। किन्तु अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने इन्हें राजद्रोही ठहराया और बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया था। उनकी जागीरें जब्त कर ली गई थीं। इनकी मृत्यु सन् 1626 ई. में हो गयी।

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  • साहित्य-सेवा

रहीम हिन्दी साहित्य की दिव्य विभूति हैं। उनकी वाणी में जो माधुर्य है, वह हिन्दी के बहुत थोड़े कवियों की रचनाओं में मिलता है। वे हिन्दी के ही नहीं, फारसी और संस्कृत के भी विद्वान थे। हिन्दी में वे अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन दोहों में नीति, ज्ञान, श्रृंगार और प्रेम का इतना सुन्दर समन्वय हुआ है कि मानव हृदय पर उसका बहुत गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ता है। अपनी विविध आयामी सेवाओं से रहीम ने हिन्दी साहित्य की सेवा की है। उनकी साहित्यिक सेवाओं से हिन्दी साहित्य विकसित होकर पुष्ट भी हुआ है। . विषय तथा उद्देश्य-रहीम की कविता का विषय नीति और प्रेम है। अनेक सूक्तियों और नीति सम्बन्धी दोहे आज भी मनुष्य जाति का पथ-प्रदर्शन करते हैं। रहीम की मित्रता उस समय के लोक कवि एवं लोकनायक तुलसीदास जी से थी।

रहीम के दोहों की विषयवस्तु विविधता लिए हुए है। रहीम जी ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, धर्म, नीति, सत्संग, प्रेम, परिहास, स्वाभिमान आदि सभी विषयों पर सफलतापूर्वक अपने भावों को अपने छोटे से दोहा छंद में अभिव्यक्ति दी है। इस्लामी सभ्यता के परिवेश में रहीम जी का परिपालन और पोषण हुआ, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति रखते थे। तात्पर्य यह है कि रहीम जी हिन्दू संस्कृति, सभ्यता, दर्शन और धर्म तथा विश्वासों के प्रति निष्ठावान् थे।

रहीम की लोकप्रियता-रहीम, वस्तुतः अपने नीति के दोहों के लिए ही हिन्दी भाषा-भाषी जनता में अत्यधिक लोकप्रिय हैं। अपने नीति के दोहों में वह एक शिक्षक और उपदेशक के रूप में हमारे सामने आते हैं। उन्होंने अपने भावों की अभिव्यक्ति सरल, सुबोध शब्दों में की है।

  • रचनाएँ

रहीम की निम्नलिखित काव्य कृतियाँ बहुत ही प्रसिद्ध हैं

  1. रहीम सतसई-यह रहीम के नीति परक दोहों का संग्रह है। इन दोहों में जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्र से सम्बन्धित नीतियों का प्रतिपादन किया गया है। अभी तक इसके तीन सौ के लगभग दोहे प्राप्त हुए हैं।
  2. शृंगार सतसई-यह शृंगार प्रधान काव्य रचना है। अभी तक इसके कुल छः छन्द ही उपलब्ध हुए हैं।
  3. मदनाष्टक-इसमें कृष्ण और गोपिकाओं की प्रेममयी लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।
  4. बरवै नायिका भेद-यह 115 छन्दों का नायिका भेद पर लिखित ग्रंथ है। सम्भवतः यह हिन्दी का सबसे पहला काव्य ग्रंथ है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त रहीम की अन्य रचनाओं में-श्रृंगार सोरठा, रास-पञ्चाध्यायी, नगर शोभा, फुटकल बरवै तथा फुटकल कवित्त सवैये भी प्रसिद्ध हैं।

  • भाव-पक्ष
  1. हृदय पक्ष की प्रधानता-रहीम भक्ति एवं नीति के प्रसिद्ध कवि हैं। वे भगवान कृष्ण के अनन्य उपासक थे। इनकी कविता में हृदयपक्ष की प्रधानता तथा भाव अभिव्यंजना की अपूर्व शक्ति मिलती है।
  2. काव्यगत मार्मिकता-रहीम जी अपने जीवन में सरल, सरस और उदार प्रकृति के बने रहे, उसी तरह इनकी कविता में भी सरलता एवं मार्मिकता के दर्शन होते हैं। इनकी कविताएँ हृदय की सच्ची अनुभूति से सम्पुक्त अभिव्यक्ति हैं। इस कारण वे अत्यन्त आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक
  3. नीति, श्रृंगार और प्रेम का समन्वय-रहीम काव्य क्षेत्र में अत्यन्त कौशल प्राप्त विद्वान कवि थे और कृष्ण उपासक भी। इनके काव्य में गहरे अनुभवों की छाप सर्वत्र मिलती है, विशेषतः दोहों में। इनके दोहे संवेदनशील हृदय की मार्मिक उक्तियाँ हैं। इनमें नीति, श्रृंगार और प्रेम का बहुत सुन्दर समन्वय हुआ है।
  • कला-पक्ष
  1. भाषा-रहीम ने ब्रजभाषा और अवधी दोनों ही भाषाओं में काव्य-रचना की है। उनका दोनों भाषाओं पर समान अधिकार है। वे हिन्दी, संस्कृत, अरबी और फारसी के उच्चकोटि के विद्वान थे। अतः इन सभी भाषाओं के शब्दों की आवृत्ति इनकी रचनाओं में खूब होती रही है।उनकी भाषा में बाह्य आडम्बर अथवा पाण्डित्य प्रदर्शन की भावना नहीं है। उसमें स्वाभाविक सौन्दर्य है। उनकी भाषा, परिमार्जित, परिष्कृत और माधुर्य गुण प्रधान है।
  2. शैली-रहीम की शैली सरल, सरस और सुबोध है। उनकी शैली अपने अनुभवजन्य रत्नों से परिपूर्ण है। भावों की व्यंजना करना इनकी शैली की अप्रतिम विशेषता है।
  3. रस-रहीम के काव्य में शृंगार, शान्त एवं हास्य रसों की निष्पत्ति सर्वत्र होती है। उन्होंने श्रृंगार रस के दोनों ही पक्षों-वियोग व संयोग का चित्रण बहुत ही अनूठे ढंग से किया है।
  4. अलंकार-रहीम की रचनाओं में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त आदि अलंकारों का विशेष रूप से प्रयोग हुआ है।
  5. छन्द-दोहों को छोड़कर रहीम ने बरवै, कवित्त, सवैया, सोरठा, पद आदि सभी छन्दों में रचनाएँ की हैं। बरवै छन्द के तो वे जनक ही कहे जाते हैं।
  6. मुहावरे व लोकोक्तियाँ-रहीम ने अपनी रचनाओं में मुहावरे और लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया है जिससे विषय बोध में सरलता हो गई है।
  • साहित्य में स्थान

हिन्दी साहित्य में रहीम की रचनाएँ प्रत्येक हिन्दी भाषा-भाषी का पथ प्रशस्त करती रहेंगी। कवित्व क्षेत्र में दिया गया उनका योग अविस्मरणीय है।

9. सेनापति

  • जीवन-परिचय

हिन्दी काव्य के प्रांगण में प्रकृति-चित्रण की अनुपम छटा बिखेरने वाले कवियों में सेनापति का नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। सेनापति की प्रमाणित जीवनी अन्य अनेक प्राचीन कवियों की भाँति उपलब्ध नहीं है। उनके जीवन के विषय में कुछ सूचनाएँ उन्हीं के द्वारा लिखित एक कवित्त के आधार पर उपलब्ध हैं, जिसके अनुसार उनका जन्म उत्तर प्रदेश में गंगा के तट पर स्थित अनूपशहर (बुलन्दशहर जनपद) में सन् 1589 के आस-पास हुआ था। इनके पिता गंगाधर दीक्षित थे। इनके पितामह परशुराम दीक्षित ने इन्हें हीरामणि दीक्षित नामक किसी काव्यज्ञ से काव्यशास्त्र की शिक्षा में दीक्षित करवाया। आश्चर्य है कि सेनापति ने अपने वास्तविक नाम का उल्लेख कहीं नहीं किया है। सेनापति उनका उपनाम था, जिसका उपयोग उन्होंने अपनी कविता में किया है। उनकी रचनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि वे कई राजाओं और नवाबों के दरबार में रहे थे। उनके आश्रयदाताओं ने उन्हें पर्याप्त सम्मान भी दिया था। जीवन के अन्तिम दिनों में वे विरक्त होकर वृन्दावन में रहने लगे थे। उन्होंने लिखा है सेनापति चाहता है सफल जनम करि।

वृन्दावन सीमा तें बाहर न निकसिबो। सेनापति का निधन सन् 1649 ई. में हुआ था। साहित्य-सेवा कविवर सेनापति रीतिकाल के उल्लेखनीय और विशिष्ट कवियों की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने मानव सहचरी प्रकृति का चित्रण अपने सूक्ष्म निरीक्षण के आधार पर किया है। सेनापति ने प्रकृति की बदलती छवियों का मनोहारी दिग्दर्शन अपने कलात्मक परिवेश में कराया है। अपने द्वारा रचित ग्रन्थों में संवेदनाओं से भरपूर हृदय वाले कवि सेनापति ने अपने काव्य में हमारी जीवन पद्धति को चित्रांकित कर यह उपदेश दे दिया है कि परिवर्तन का यह दिशाचक्र बिना रुके मानव को गतिशील बनाए रखता है। क्योंकि गतिशीलता ही जीवन है, तो गतिहीनता मृत्यु।

ध्येय-कवि का कर्तृत्व (काव्य) सोद्देश्य होता है। प्रकृति ने मनुष्य की संवेदनाओं को विस्तार दिया है और प्रकृति ही मनुष्य के भाव जगत को व्यापकता प्रदान करती है। आलम्बन और उद्दीपन रूप में अभिव्यक्त प्रकृति मनुष्य को अपने उदार भावों-दयालुता, धीरता, उद्देश्य की दृढ़ता एवं आत्म-क्षमताओं का विकास करने का सदुपदेश देकर एक शिक्षक और हितोपदेशक का कार्य करती है। इसी ध्येय से कवि ने अपने द्वारा रचित काव्य में अपने काव्य-कौशल का दिग्दर्शन कराया है।

  • रचनाएँ

इनकी दो रचनाएँ मानी जाती हैं-‘काव्यकल्पद्रुम’ और ‘कवित्त रत्नाकर’। पहली रचना अप्राप्य है। ‘कवित्त रत्नाकर’ में पाँच तरंगें हैं और कुल 394 छन्द हैं। पहली तरंग में श्लेष, दूसरी में श्रृंगार, तीसरी में ऋतु वर्णन, चौथी में रामकथा और पाँचवीं में भक्ति विषयक पद संकलित हैं।

  • भाव-पक्ष

(1) भक्ति भावना-सेनापति की कविताओं में उनकी भक्ति-भावना प्रकट हुई है। वे अपनी भक्ति-भावना के क्षेत्र में वैष्णव-सम्प्रदाय से बहुत प्रभावित थे। वे राम के अनन्य भक्त थे। किन्तु कृष्ण और शिव से भी उन्हें प्रेम था। वैष्णव-भक्त कवियों की भाँति वे गंगा में आस्था रखते थे।
(2) रस-कवि सेनापति ने अपनी कविताओं में रसोत्कर्ष पर ध्यान दिया है। उनमें रस निष्पत्ति भरपूर हुई है। कहीं-कहीं उनके काव्य में रसानुभूति का प्रवाह कुछ मन्द हुआ है, क्योंकि वहाँ अलंकारों का उत्कर्ष और चमत्कार बढ़ गया है। उनके काव्य में शृंगार, भक्ति और वीर रस की प्रधानता है। उन्होंने शृंगार के दोनों पक्षों का निरूपण बहुत गम्भीरता से किया है।

द्रष्टव्य है-

आयो सखि सावन, विरह सरसावन।
लग्यौ है बरसावन, सलिल चहु और तै।।

(3) ऋत वर्णन-सेनापति के काव्य की विशेषता है उनका ऋत वर्णन। रीतिकाल के कवियों ने ऋतु वर्णन उद्दीपन-विभाव के अन्तर्गत किया है। किन्तु सेनापति ने ऋतु वर्णन आलम्बन विभाग के अन्तर्गत किया है। आलम्बन विभाव के अन्तर्गत प्रकृति के स्वतन्त्र रूप का चित्रण किया जाता है। उस पर नायक अथवा नायिका की भावनाओं का आरोप नहीं है। सेनापति ने अपने ऋतु वर्णन में अपने देश की छ: ऋतुओं को स्थान दिया है और वर्ण्य वस्तुओं की संश्लिष्ट योजना की है।

(4) प्रकृति चित्रण-प्रकृति चित्रण सेनापति की अपनी एक विशिष्टता है। कवि स्वयं प्रकृति की प्रत्येक क्षण बदलती छवि पर मन्त्रमुग्ध प्रतीत होता है। उनके द्वारा रचित कवित्तों में प्रकृति के स्वरूप को इस तरह प्रस्तुत किया है-द्रष्टव्य है

“मेरे जान पौनों,
सीरी ठौर को पकरि कौनों,
घरी एक बैठि कहूँ घामै बितवत है।”
“कातिक की राति थोरि-थोरि सियराति।”

  • कला-पक्ष

(1) भाषा-सेनापति ने साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनकी ब्रजभाषा के मुख्यतः दो रूप हैं-

  • क्लिष्ट ब्रजभाषा,
  • सरल ब्रजभाषा।

उन्होंने क्लिष्ट ब्रजभाषा का प्रयोग क्लिष्ट रचनाओं में किया है, जबकि चलती हुई एवं सरल ब्रजभाषा का प्रयोग उनकी रस-प्रधान रचनाओं में अनुभूत है। संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ ही आपने अरबी और फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया है। वे अपनी भाषा में शब्दों की तोड़-मरोड़ कभी नहीं करते। ओज, प्रसाद और माधुर्य उनकी भाषा में सर्वत्र देखे जा सकते हैं। उनकी भाषा सरल, सरस, कर्णप्रिय
और सुबोध है। कवि ने अनेक ध्वन्यात्मक शब्दों का आविष्कार किया है, जिनसे काव्य में संगीतात्मकता उत्पन्न हो गई है।

(2) शैली-सेनापति की शैली की दृष्टि से उनकी रचनाओं को दो रूपों में बाँटा जा सकता है-

  1. भावात्मक,
  2. वर्णनात्मक।

भावात्मक शैली में उन्होंने अनुभूतियों का और वर्णनात्मक शैली में घटनाओं, ऋतुओं, दृश्यों आदि का चित्रण किया है। इन दोनों प्रकार की शैलियों की भाषा अलंकार प्रधान है।

(3) अलंकार-सेनापति काव्य के क्षेत्र में अलंकारवादी सम्प्रदाय से प्रभावित थे। उनके अलंकारवादी होने का तात्पर्य यह नहीं कि उन्होंने रस के उत्कर्ष पर ध्यान नहीं दिया हो। इनकी रचनाओं में अलंकारों का उत्कर्ष है एवं चमत्कार से परिपूर्ण हैं। परन्तु यह कहा जाता है कि जिन रचनाओं में अलंकारों की चकाचौंध है, उनमें रस का प्रवाह बहुत ही मन्द है। सेनापति का सबसे प्यारा अलंकार श्लेष है। अनुप्रास, यमक, प्रतीप, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, भ्रान्तिमान, सन्देह और श्लेष आदि अलंकारों से उनकी कविता जगमगाती है।

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(4) छन्द-सेनापति के छन्दों में मनहरण कवित्त ही सर्वाधिक लोकप्रिय है। इसके अतिरिक्त उन्होंने घनाक्षरी, छप्पय और दोहे भी लिखे हैं।

  • साहित्य में स्थान

रीतिकालीन कवियों में प्रचलित परम्परा से हटकर काव्य रचना करने वाले कवियों में सेनापति का विशिष्ट स्थान है। आपका प्रकृति चित्रण तो अप्रतिम है। सेनापति की कविता शब्द चमत्कार तथा उक्ति वैचित्र्य की दृष्टि से अन्य कवियों के बीच सहज ही पहचानी जा सकती हैं। आपका ऋतु वर्णन हिन्दी साहित्य में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इन सभी विशेषताओं के कारण हिन्दी जगत अपने आपको आपके द्वारा बहुत ही उपकृत समझता है। हिन्दी साहित्य में आपका नाम सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

10. सुमित्रानन्दन पन्त।
[2009, 11, 13, 17]

  • जीवन-परिचय

प्रारम्भ में छायावादी फिर प्रगतिवादी और अन्त में आध्यात्मवादी सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म हिमालय की अनन्त सौन्दर्यमयी प्रकृति की गोद में बसे कर्माचल प्रदेश (अल्मोड़ा जिला) के कौसानी नामक ग्राम में सन् 1900 ई. (संवत् 1957 वि.) में हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद इनकी माता सरस्वती देवी का देहावसान हो गया था। मातृहीन बालक ने प्रकृति माँ की गोद में बैठकर घण्टों तक चिन्तनलीन होना सीख लिया। इससे आभ्यन्तरिक विचारशीलता का संस्कार विकसित होने लगा। अपने गाँव और अल्मोड़ा के शासकीय हाईस्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की और काशी से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। सेन्ट्रल म्योर कॉलेज में एफ. ए. की कक्षा में अध्ययनरत सुमित्रानन्दन पन्त सन् 1921 ई. गाँधी जी के प्रस्तावित असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गए। कॉलेज पढ़ाई छूट गई। बाद में स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत एवं बंगला साहित्य का गहन अध्ययन किया। 29 सितम्बर, सन् 1977 ई. को प्रकृति का गीतकार हमारे बीच से उठ गया।

  • साहित्य-सेवा

इनका बचपन का नाम गुसाई दत्त था। कविता करने की रुचि बचपन से ही थी। इनकी प्रारम्भिक कविता ‘हुक्के का धुंआ’ थी। काव्य की निरन्तर साधना से शीर्षस्थ कवियों में प्रतिष्ठित हुए। कालाकांकर नरेश के सहयोगी रहे। ‘रूपाभ’ पद के सम्पादक का कार्य सफलतापूर्वक किया। बाद में सन् 1950 ई. में आकाशवाणी में अधिकारी बने। अविवाहित पन्त ने सारा जीवन साहित्य साधना में ही समर्पित कर दिया। साहित्य साधना के लिए भारत सरकार ने ‘पद्म-भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया। इन्हें साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हुए।

पन्त जी हिन्दी की नई धारा के जागरूक कवि और कलाकार हैं। प्रकृति सुन्दरी की गोदी में जन्म लेने तथा विद्यार्थी जीवन में अंग्रेजी कवि शैली, कीट्स, वर्ड्सवर्थ की स्वच्छन्द प्रवृत्तियों से अत्यधिक प्रभावित होने के कारण वे नई दिशा में अग्रसर हो गए। वे प्रकृति और जीवन की कोमलतम विविध भावनाओं के कवि हैं। प्रकृति की प्रत्येक छवि को, जीवन के प्रत्येक रूप को उन्होंने आत्म-विभोर और तन्मय होकर देखा है। उनके काव्य में दो धाराओं का समावेश हो गया है-एक में उनके कवि हृदय का स्पन्दन है, तो दूसरी में विश्व जीवन की धड़कन।

ध्येय-मुख्य रूप से पन्त जी दृश्य जगत के कवि हैं। पहले वे प्राकृतिक सौन्दर्य के कवि थे। बाद में, वे जीवन सौन्दर्य के कवि के रूप में बदल गए। पन्त जी विश्व में ऐसा समाज चाहते हैं जो एक-दूसरे के सुख-दुःख का सहगामी हो सके। पन्त की पंक्तियों में झाँककर देखिए-

“जग पीड़ित रे अति दुःख से, जग पीड़ित रे अति सुख से।
मानव जग में बट जाए, दुःख-सुख से और सुख-दुःख से।।”

  • रचनाएँ

पन्त जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. वाणी-प्रेम, सौन्दर्य और प्रकृति चित्रों से युक्त प्रथम रचना।
  2. पल्लव-छायावादी शैली पर आधारित काव्य संग्रह।
  3. गुञ्जन-सौन्दर्य की अनुभूति प्रधान गम्भीर रचना।
  4. युगान्त,
  5. युगवाणी,
  6. ग्राम्य-प्रगतिशील विचारधारा की मानवतावादी कविताएँ,
  7. स्वर्ण किरण,
  8. स्वर्ण धूलि,
  9. युगपथ,
  10. उत्तरा,
  11. अतिमा,
  12. रजत-रश्मि,
  13. शिल्पी,
  14. कला और बूढ़ा चाँद,
  15. चिदम्बरा,
  16. रश्मिबन्ध,
  17. लोकायतन महाकाव्य आदि उनके काव्य संग्रह हैं।।

उपर्युक्त के अतिरिक्त ‘ग्रन्थि’ (खण्डकाव्य), ज्योत्सना, परी, रानी आदि नाटक, हाट’ (उपन्यास), पाँच कहानियाँ (कहानी संग्रह), मधु ज्वाल’ उमर खैयाम की रूबाइयों का अनुवाद, तथा ‘रूपाभ’ पत्र का सम्पादन उनकी प्रतिभा का प्रमाण है।

उपाधि एवं पुरस्कार-लोकायतन-महाकाव्य है-उ. प्र. सरकार द्वारा दस हजार रुपये से पुरस्कृत।
‘कला और बूढ़ा चाँद’ पर साहित्य अकादमी का पाँच हजार रुपये से पुरस्कृत। ‘चिदम्बरा’ पर एक लाख रुपए का पुरस्कार ज्ञानपीठ द्वारा दिया गया। ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले हिन्दी के सबसे पहले कवि थे पन्त जी। भारत सरकार ने ‘पद्य भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया।

  • भाव-पक्ष

(1) सुकुमार भावना और कोमल कल्पना-पन्त जी स्वभाव से अत्यन्त कोमल और सुकुमार स्वभाव थे। अतः उन्होंने अपने काव्य में कोमल बिम्बों का ही विधान किया है। उन्हें ‘कोमल भावनाओं का सुकुमार कवि’ कहा जाता है।
(2) वेदना की अनुभूति-पन्त के अनुसार कविता विरह से उठा हुआ गान होती है।

“वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।
उमड़ कर नयनों से चुपचाप, वही होगा कविता अनजान।।”

(3) प्रकृति का सजीव चित्रण-पन्त जी का सारा जीवन प्रकृति की गोद में बीता, अतः प्रकृति के साथ ही उन्होंने भावात्मक तल्लीनता स्थापित कर ली। पन्त जी की कविता में प्रकृति के रूप, रंग, रस, गन्ध, ध्वनि तथा गति के चित्र प्राप्त होते हैं। गंगा में उतराती नाव का गतिमय चित्र प्रस्तुत है

‘मृदु मन्द-मन्द, मन्थर-मन्थर।
लघु तरणि हंसिनी-सी सुन्दर,
तिर रही खोल पालों के पर।।’

पन्त जी ने प्रकृति में आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण और एक उपदेशिका के रूप को देखा है। इस तरह वे प्रकृति के अप्रतिम चितेरे हैं।

(4) प्रेम और सौन्दर्य का चित्रण-चिरकुमार कवि पन्त जी की कविता छायावादी है। इन्होंने प्रेम की भावना को और सूक्ष्म भावों के चित्रों को काव्य में उभारा है। संयोग और वियोग की अनुभूतियाँ भी चित्रोपम हैं।
(5) रहस्य भावना-अज्ञात और दिव्य सत्ता के प्रति जिज्ञासा को अपने ‘मौन-निमंत्रण’ में कहते हैं न जाने कौन, अये द्युतिमान आन मुझको अबोध अज्ञान।

सुझाते हो तुम पथ अनजान।
फेंक देते छिद्रों में गान।’
यह जिज्ञासा ही उनके रहस्यवाद की द्योतक है।

(6) मानवतावादी दृष्टिकोण-कवि मानव के आन्तरिक और बाह्य रूप पर अपनी दृष्टि डालते हैं

“सुन्दर है विहग, सुमन सुन्दर,
मानव तुम सबसे सुन्दरतम।।”

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(7) नारी के प्रति सहानुभूति-चिर पीड़िता नारी के प्रति अनन्त करुणा और सहानुभूति द्रष्टव्य है
“मुक्त करो नारी को मानव ! चिर वन्दिनी नारी को।”

(8) प्रगतिवाद-पन्त जी पर कार्ल मार्क्स का प्रभाव था। वे आदर्शों के आकाश से ठोस धरती पर उतरकर आने का स्वर-‘युगान्त’, ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ में गुंजायमान करते हैं।
(9) दार्शनिकता-पन्त जी ने जीवन, जगत् और ईश्वर पर अपने दार्शनिक विचार व्यक्त किये हैं।

  • कला-पक्ष
  1. सशक्त भाषा-पन्त जी का भाषा कोमलकान्त पदावली से युक्त, सहज और सुकुमार है। उसमें चित्रमयता, लालित्य और ध्वन्यात्मकता विद्यमान है। माधुर्य प्रधान अनूठा शब्द चयन है। भावानुसार भाषा कोमलता को त्यागकर भयानकता को प्राप्त हो उठती है।
  2. छायावादी लाक्षणिक शैली-छायावाद से प्रभावित इनकी रचनाओं में लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता तथा सजीव बिम्ब-विधान सर्वत्र द्रष्टव्य है।
  3. स्वाभाविक अलंकरण-इनकी रचनाओं में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, यमक, रूपकातिशयोक्ति एवं अन्योक्ति अलंकारों का मौलिक प्रयोग किया गया है। मानवीकरण, विशेषण विपर्यय, ध्वन्यार्थ व्यंजना आदि नवीन अलंकारों का बहुत सुन्दर प्रयोग हुआ है।
  4. लय प्रधान छन्दों की योजना-पन्त जी ने अपनी कविताओं में तुकान्त और अतुकान्त सभी प्रकार के परम्परागत व नवीन छन्दों का प्रयोग किया है। उनके छन्दों में लय है एवं संगीत तत्व की प्रधानता है।

साहित्य में स्थान पन्त जी का काव्य, भाव और कला दोनों पक्षों में सशक्त और समृद्ध है। भाव कल्पना, चिन्तन, कला सभी दृष्टियों से काव्य उत्कृष्ट है। आधुनिक हिन्दी साहित्य के शीर्षस्थ कवियों में पन्त जी का अति महत्वपूर्ण स्थान है।

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MP Board Class 12th Special Hindi प्रायोजना कार्य

MP Board Class 12th Special Hindi प्रायोजना कार्य

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अभाव में नवीन चिन्तन, नवीन विचार, नवीन धारणाएँ आकार नहीं ले पातीं, न कोई सृजन हो पाता है। छात्र इस स्तर तक आते – आते क्रमश: अपनी भाषा के विकास के क्रम में इतना सक्षम हो जाता है कि वह अपने सबसे प्रभावशाली साधन बोली का उपयोग करे। अपने अनुभव एवं अपने विचार व्यक्त करे। क्षेत्रीय बोली की कहावतें, चुटकुलों और लोकगीतों का संग्रह कर उनका परिचय प्राप्त करे। अपने क्षेत्र की पत्र – पत्रिकाओं का पाठ्य – पुस्तकों के अलावा अध्ययन करे।

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(1) भाषा के विविध क्षेत्रों का परिचय भाषा के चार मुख्य क्षेत्र हैं –

  1. सुनना – श्रवण,
  2. बोलना – भाषण,
  3. पढ़ना – पठन,
  4. लिखना – लेखन।

इस विषय का समावेश पाठ्यक्रम में इसलिए किया गया है कि बालक कक्षा 11वीं के स्तर तक भाषा के इन चारों स्तरों से भली – भाँति परिचित हो जाता है। अब उन्हें शिक्षकों द्वारा अपनी इन भाषायी योग्यता के विस्तार की प्रेरणा देना है। वह अपनी इस योग्यता से पाठ्य – पुस्तक के अतिरिक्त भी कुछ पढ़े लिखे और इस क्रिया में रुचि उत्पन्न करने के लिए शिक्षक छात्रों को यह गृह कार्य दें कि वे अपने – अपने क्षेत्र की बोली की कहावतें,चुटकुले और लोकगीतों का संग्रह करें। इसके अतिरिक्त छात्रों को कक्षा में तथा गृह कार्य के रूप में यह लेखन कार्य दिया जाये कि वे अपने क्षेत्र की पत्र – पत्रिकाओं को पढ़ें और उसमें उन्हें जो भी विवरण रोचक लगे उसे अपने शब्दों में लिखें। इससे उनका पठन – कौशल और लेखन – कौशल विकसित होगा।

छात्र के श्रवण कौशल को विकसित करने के लिए वह दूरदर्शन के रोचक कार्यक्रमों को सुने और उसे जो भी कार्यक्रम रुचिकर लगे उसे लिखे।

इस प्रकार छात्रों को पाठ्य – पुस्तक के अतिरिक्त अपनी भाषायी योग्यता विस्तार का अवसर प्राप्त होगा।

मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा वह राज्य है जिसकी सीमाओं को सात प्रदेश घेरे हैं। अत: मध्य प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्रीय भाषा या बोलियाँ अस्तित्व में हैं।

शिक्षक अपने – अपने क्षेत्र की भाषा के लोकगीतों एवं कहावतों का संग्रह छात्रों से करवायें। हमारे प्रदेश में मुख्य रूप से मालवी, निमाड़ी, बुन्देलखण्डी, बघेलखण्डी, छत्तीसगढ़ी, मराठी, गुजराती,मारवाड़ी बोली जाती हैं, अतएव इनके चुटकुले, गीत,कविता,कहावतें एकत्रित करें। उदाहरण के तौर पर मालवा,निमाड़ क्षेत्र का मुख्य समाचार – पत्र है—’नई दुनियाँ’, जो इन्दौर से प्रकाशित होता है। उसमें प्रत्येक बुधवार को इस तरह की रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। इस क्षेत्र के छात्र उनका संग्रह कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में चालीस से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अलग – अलग बोलियाँ हैं। झाबुआ के निवासी भील हैं और इनकी भीली बोली में मुहावरों का अत्यधिक प्रचलन है। हम यहाँ कुछ भीली मुहावरे और उनका हिन्दी अर्थ दे रहे हैं। छात्र अपने अध्यापकों की सहायता से अपने आस – पास बसने वाले आदिवासियों की लोक कथाएँ, कविता, मुहावरे, कहावतें संकलित कर उनका हिन्दी अनुवाद करें।
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सुबह दोपहर, शाम समय की सूचना वाले मुहावरे
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भीली बोली पर मालवी, राजस्थानी, गुजराती भाषाओं का पर्याप्त प्रभाव है।

  • भीली कहावतें
  1. भूखला तो भूखला सूकला खरी – भूखा ही सही पर सुखी तो हूँ।
  2. भील भोला ने चेला – भील भोले होते हैं।
  3. खारड़ा माँ काँटो,भील माँ आटो – भील में बदले की भावना रहती है।
  4. पाली पपोली मनाव राखवू घणो मसकल है – भील को खुशामद से मनाना बहुत मुश्किल है।
  5. ढोली नौ सौरो गाद्यो नी मरे न भीलनुं सौरो रोद्यो नी मरे – ढोली का लड़का गाने से और भील का लड़का रोने से नहीं मरता – वे अभावों से जूझते रहते हैं।
  6. भील भाई ने डगले दीवो – भील भले ही अभावग्रस्त रहे, वह सदा निश्चिन्त रहता हैं।

कुछ बुन्देली बोली की कहावतें

  1. खीर सों सौजं,महेरी को न्यारे।
  2. पराई पातर को बरा बड़ो।
  3. पराये बघार में जिया मगन।
  4. देवी फिरै बिपत की मारी पण्डा कहै करो सहाय।
  5. रौन कुमरई की कुतिया (लोककथन)।
  6. नौनी के नौ मायके, गली – गली सुसरार।
  7. जौन डुकरिया के मारे न्यारे भए बई हिस्सा में परी।
  8. माँगे को मठा मोल पर गौ।
  9. कानी अपने टेण्ट तो निहारत नईया दूसरे की फुली पर पर के दैखत।
  10. कनबेरी देवो।
  11. मर गई किल्ली काजर खों।

(2) पहेलियाँ

1. भीली भाषा – उत्तर
1. गाय वाकड़ी ने बेटी डाकणी – तीर – कमान
2. धवल्या बुकड़ा ने बारेह खाल – प्याज
3. औंधे बाटके ने दही लटके – कपास
4. भूत्या हेलग्या ने पेटा में दाँत – कद्दू
5. छोटी – सी दड़ी,दगड़ – सी लड़ी – सुपारी

2. बुन्देली
1. थोड़ो सो सोनो,घर भर नोनो – दीपक
2. दीवार पर धरो टका,ऊको तुम उठा पाओ न बाप न कका – चन्द्रमा
3. ठाड़े हैं तो ठाड़े हैं, बैठे हैं तो ठाड़े हैं। – सींग

3. निमाड़ी
1. एक बाई असा कि सरकजड नी – दीवाल
2. काली गाय काँटा खाय,पाणी देखे बिचकी जाय – जूता

4. बघेली
अड़ी हयन,खड़ी हयन, लाख मोती जड़ी हयन बाबा करें बाग में दुशाला ओढ़े पड़ी हयन – भुट्टा मक्के का

5. छत्तीसगढ़ी
पेट चिरहा, पीठ कुबरा – कौड़ी

6. मालवी
नानो सो चुन्नू भाय, लम्बी सारी पूँछ नी चाल्या चुन्नू भाया,पकड़ी लाउ – सुई धागा

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(3) चुटकुले

(1) न्यायाधीश – तुम चार साल पूर्व भी एक ओवर कोट चुराने के अपराध में इस अदालत में आ चुके हो।
अपराधी – आप ठीक कहते हैं। लेकिन ओवर कोट इससे अधिक चलता भी कहाँ है।

(2) मजदूर क्या मालिक ! गधे के समान काम कराया और एक रुपया दे रहे हो। कुछ तो न्याय करना चाहिए।
मालिक – न्याय ! हाँ तुम ठीक कहते हो। मुनीम जी,इसका रुपया छीन लो और बाँध कर इसके सामने थोड़ी – सी घास डाल दो।

(3) पिता हमारा लड़का आजकल बहत तरक्की कर रहा है। पड़ौसी – अच्छा,कैसे?
पिता – पुलिस ने उस पर घोषित इनाम की रकम पाँच हजार से बढ़ाकर दस हजार कर दी है।

(4) लोकगीत

निमाड़ी कवाड़ा
बड़ा – बड़ा तो वई गया
ढोली कय कि पार उतार
वई का वई गया ना
उतरई की उतरई लगी
एकली कुतरी कई भुख
न कई कंसुऱ्या ले
फट्या कपड़ा बुड्डा ढोर
इनका दाम लई गया चोर
ऊँट थारो कई वाको
ऊँच कय सब वाको
थारी बइगण म्हारी छाछ
भली बघार म्हारी माय

प्रस्तुति : हरीश दुबे

साथन : निमाड़ी

‘मँहगई
एको राज ओको राज
हुया मँहगा अनाज।
काँ छे घोटालो,
समझ मज आव नी
उनकी वात।
हम, पाँच बरस तक
देखाँ, रामराज की वाट

– अखिलेश जोशी

विश्वास
आस बाँधी ने
दो कदम
चाल्यौ थो
कि
टाँग घैची लिदी !
पाछै
फरीने देख्यो आपणा वारा पे भी
विश्वास नी करनो कदी!!

– जगदीश सरगरा

वात कई कई
बैल गाड़ी की वात कई कयणुं
खेत वाड़ी की वात कई कयणुं
मीठा लागज जुवार का रोटा
नऽ अमाड़ी की वात कई कयणुं
जे खड़ बुनकर वणा व मयसर का
उनी साड़ी की वात कई कयणुं
दुध – घी की कमी नि होणऽ दे
भैस – पाड़ी की वात कई कयणुं
घर क राखज चगन – मगन केतरो
छोटी लाड़ी की वात कई कयणुं
गाँव मऽ उनको बड़ो नाव वजज
माय माता की वात कई कयणुं
वोली न अपणी जगा सब छे ‘हरिश’
पण निमाड़ी की वात कई कयणं

– हरीश दुबे

गजल हुण रे भाया म्हारी वात।
हद की दी मनखाँ की जात॥
जणीं जण्या पारया पोस्या,
अबे लंगावे वर्ण पे घात।
वा,दर – दर की माँगे भीख
जण के जीवे बेटा हात।
लाड्या की होरयां बारी,
मंगता अशो करयो उत्पाद।
मनखाँ ती वंची ने रो
झूठी कोनी या केवात।

– प्रमोद रामावत

फागुण का दोहा
फागुण का पगल्या पड्या,बदल्या सारा रंग।
ढोलक बजी चौपाल पऽ खडक्या खड़ – खड़ चंग।।
सरसों पीली हुई गई,महुवो वारऽ गन्ध।
फूल – फूल पऽ भैरा दौड़,पीणऽख मकरन्द।।
अम्बा भी बौरइ गया, फूल्या घणा पलास।
कोयलिया की कूक की,प्यारी लाग मिठास॥
अबीर गुलाल का साथ मँऽ,रंग की उड़ी फुहार।
हिली – मिली न मनवाँ, आवो यो तेव्हार ॥

– चन्द्रकान्त सेन

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एल्याँग ……. वोल्याँग
एल्यांग गुरुजी
पकावणऽ लग्या
दलिया न दाल
वोल्याँग हुई
शिक्षा – बे – हाल
शेर की सी उनकी नियति
एकाजऽ लेण
जिन्दगी अकेलीज बीती
वोटर सी पूछो
ईज सरकार रखोगा
कि बदलोगा?
बोल्या अगला
को काई भरोसा?
ऊ एतरी धाँधली
चलऽन दे कि नई?

– ललित नारायण उपाध्याय

ऊँचो मोल को है तमारो पसीनो
साथे लइलाँ हिम्मत ने हेली – मेली ताकत,
तमारा आगे माथो टेकी ऊबी रेगा आफत,
काय को डर धरती रो घर अन से भरया चालो।
चालो भरयां चालो, मरदाँ चालो।
घणो ऊँचों मोल को है तमारो पसीनो
आलसी के समझावो के कसो होय है जीनो
स्वास्थ छोड़ी मजदूरी री पूजा करदाँ चालो।
चलो मरदाँ,चालो, चालो मरदाँ चालो।
गाँवों में कबीर पंथ आज भी तो गावे है
परेम से तो मारा भाई दुनिया जीती जावे है
लड़ता – मरता आदमी ने आपण वरजाँ चालो
चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो
आदिवासी भाई मारा धणो दुःख पायो
नीचे को यो आदमी भी अपणी माँ को जायो
तो छापर वाली टापरी ने पक्की करदाँ
चालो चालो मरदाँ चालो, चालो मरदाँ चालो।

– मोहन अम्बर

सन्दर्भ : होली

कई हँसो बाबूजी !
यूँ दूर ऊबा
नाक सिकोड़ी के
कई हँसो ओ बाबूजी,
हमारे
कीचड़ का अबीर गुलाल से
होली खेलता देखि के।
हमारो तो
योज बड़ो तीवार है
यो
कीचड़ को जरूर है, बाबूजी
पणे
तमारी जग – मग दीवाली से
घणों अच्छो है,
देखिलो
दोल्यो /धुल्यो
दोड़ी – दोड़ी के
खाँकरा की केशूड़ी को
सन्तरिया रंग के
एक – दुसरा का ऊपर ढोलिरिया
मन का बन्द किमाड़
खोलीरिया
आत्मा से धीरणा को
कीचड़ धुइरिया है
काल तक जो प्यासा था
एक दूसरा का खून का
बाबूजी
आज ऊई पाछा
एक हुइरिया है।

– बंशीधर ‘बन्धु’

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अजगर से बड़ा साँपजी
थोडी – घणी लिखी या पाती.
आखी समजो बाप जी।
यो कई हुई रियो इनी दुनियाँ में,
कई करूँ इको जाप जी।
तम भी पड्या हो ईका चक्कर में
घणा ईमानदार था साबजी।
भेती गंगा में जो हाथ नी धोया तो
जनम भर होयगो भोत संतापजी।
तूज अकेली जेरीलो नी हे धरती पे,
बेठ्या हे, अजगर से बड़ा साँपजी।
घणी देर से सोया हो, अब तो जागो,
जगावा को कद से करि रियो हूँ अलापजी।
कई लाया था ने कई ली जावगा,
आता – जाता को मत करो विलापजी।

– हुकुमचन्द मालवीय

खोटो नरियल होली में !
मन में आदर भाव नी रियो, राम नी रियो बोली में,
नगद माल सब जेब हवाले,खोटो नरियल होली में।

स्वारथ आगे सब कईं भूल्या, कितरा कड़वा हुईग्या हो,
फिर भी थोड़ी तो मिठास है पाकी लीम लिम्बोड़ी में।

कई गावाँ कई ढोल बजावाँ, कई स्वागत सत्कार कराँ,
डण्डा – झण्डा साते लइने,नेता निकले टोली में।

कुरसी मिली तो मोटरगाड़ी से,तम नीचे नी उतरो,
नेताजी वी दन भूलीग्या,रेता था जद खोली में।

खून, पसीना, साँते बईग्यो,पेट पीठ से चोंटीग्यो,
सपनो हुईग्यो धान ने दलियो,टाबर रोवे झोली में।

कुल की लाज बहू ने बेटी, भूल्या सगली मरयादा,
बहू की जगे दहेज बठीग्यो, अब दुल्हन की डोली में।

नारी को सम्मान घणों है, भाषण लम्बा – चौड़ा दो,
पण मौका पे चूको नी तम, भावज बणाओ ठिठोली में।

– ओमप्रकाश पंड्या

तम देखी लेजो
बन्द कोठड़ी म
गरम गोदड़ी ओढ़ेल
सोचतो मनख;
कस लिखी सकग
ठण्ड न क कड़ायलां गीत,
फटेल चादरा का दरद
अन टूटेल झोपड़ा की वारता?
कसा कई सकग
फटेल हाथ – पाँव की
बिवई न में
खोयेल नरमई,
अन सियालां म
बगलेलो
डोलची दाजी को दम !
भई,
तम कोशिश करी न
देखी ले जो;
पन असली वात न क
कभी नी कई सकग ॥

– शरद क्षीरसागर

जीवन कँई हे?
जीवन एक मेंकतो
हुवो फूल हे
हवेरा, खिले अरु हाँजे
मुरजई जावे
समजी नी जिने
जीवन की परिभासा
ऊ कदी रोवे
कदी खिलखिलावे
जीवन पाणी को
ऊठतो हुवो बुलबुलो हे,
देखतां – देखतां
जिको नामो निसान मिटी जावे
फिर बी हम
जीवन को अरथ नी जाणां
तपतो हुवो सूरज बी
हाँजे ठण्डो वई जावे।

– कन्हैयालाल गौड़

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(5) लोक कथाएँ

लोक कथाओं में मानव का सुकोमल एवं हृदय को छू जाने वाला इतिहास अंकित है। आदमी ने जो कुछ किया, उसका लेखा – जोखा तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन अपने मनोजगत् में उसने जो कुछ भी सोचा, विचारा, रंगीन कल्पनाओं का ताना – बाना बुना, सुन्दर सपने संजोए उन सबका विवरण इन लोक कथाओं में सुरक्षित है।

सदियों से ये लोक कथाएँ मनुष्य का मनोरंजन करती आयी हैं। इनमें कुछ भी असम्भव नहीं होता है। इनमें शेर और साँप भी दोस्ती निभाते,पक्षी सन्देश पहुँचाते और जरूरत पड़ने पर चित्र भी बोलने लगते हैं। इनमें मनुष्य सोचने के साथ ही सात समुद्र पार पहुँच जाता है,क्षण में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है और किसी द्वीप की असीम सुन्दरी से शादी करता है।

इनकी जो सबसे बड़ी विशेषता है वह यह है कि ये मानवीय तत्वों से भरपूर हैं। इनमें देवी – देवता के माध्यम से भी मानव जीवन की कहानी कही गयी है। चाहे सूर्य हो या ब्रह्मा, सावित्री, वे सब यहाँ मानवीय स्वरूप लेकर और पारिवारिक प्रतीकों के सहारे सामाजिक जीवन को समृद्ध कर अपना योगदान देते हैं।

इन कथाओं में व्यक्ति, स्थान या समय,का कोई महत्त्व नहीं होता। इनकी उँगली पकड़ कर ही आदमी ने सदियों की दूरी को लाँघा, देश – विदेश की यात्राएँ की और सुदूर रेगिस्तान से लगाकर अपने खेत – खलिहान और घर के आँगन के सहारे सारी रात जागकर बिता दी है। इन्होंने निराशा के क्षणों में मनुष्य के मन में अमिट आशा का संचार किया है।

(क) छत्तीसगढ़ी कहानी
नियाय के गोठ

चैतू ठाकुर बिमार हावे। गाँव के सबो झन झोला देख देख के जावत हैं। तीर तिखार के गाँव के कतको सज्जन अऊ बड़े किसान किसनहा झोला देखे बार आता हे। आखर कावर नइ आही ओखर सुझाव सब झन बर गुरतर हावे दूरिहा दूरिया के मन ऐला जानाथे। चाहे कइसनो मुशकुल बात होय ठाकुर ओला दुइच छिन में निबटा देय। वइसे ओखर तीर कोनो बड़े जइदाद, नइहे नहिं सोना चाँदी के खजाना। ओखर तीर सिरिफ दुठन बांही के भरोसा हावे। एक छोटे असन घर बाड़ी थोरकिन खेत अउ गिनती ढोर डंगर। रात दिन मिहनत करना ओखर नियम है।

एक जमाना रिहिस के वोहा गरीब रिहिस। मजदूरी करके अपन पेट ला चलाय। तब वो हा परम संतोषी रिहिस अऊ आजो भी वोला। चिटिक मात्र घमण्ड नहीं हे यही कारण है कि गाँव ‘भर के मन वोला मानये।

आज वो ही हा बिमार हे त पुरा गाँव दखी है। सबो झन भगवान ले पराथना करत है कि ठाकुर जल्दी बने हो जाय।

ठाकुर परिवार में कुल चार पराणी हावे। ठाकुर ओखर घरवाली ओखर बेटा अउ अनाथ भांचा। हावो तो भांचा फेर ठाकुर बोला अपने बेटा ले चिटिक मात्र कमती नहीं समझे। ऊखर असन बेटा बीस बरस के लगभग अउ भांचा मोहन अठरह बरस के लगभग हावे। बड़ मिहनती हे। बलराम कोनो काम बूता म ओखर आगू नई टिकै।

बलराम के सगई होने। ठाकुर सोचे कि मोहन बर भी कहूँ बात चलाये जाय त दूनो के बिहाव एक संग निपट जाही। ठकुराइन के मन मां घलो यही बिचार उठे।

फेर एकोती बलराम बड़ा उलझन अउ उदंड होगे। न माँ के सुनय न बाप के सुनय। कभू भूले भटके खेत के मेड नहीं बूंदय न खलिहान में बैठय। लोगन कहिये कि बलराम ताश पत्ती खेले बर सीखेगे हे। कोनोन कहाय कि ससुराल वाला मन वोला बहिकाल फुसलात हावे। ससुराल वाला मन डरावत हे कि कहूँ मोहन का बलराम के हिस्सा में बाँटा झन ले लय।

चैतू ठाकुर ये सब चाल ल समझत हावे फिर मोहन ल ये पाय कि नइ भाय कि वा हा भांचा हे फेर ये पाय के चाहे कि ओखर माँ बाप गरगे हे, बल्कि ठाकुर ओखर मिहनत देख खुश होवय। खेती बारी के संगे वो हा घर के चेता सुरता रखथे। ठाकुर ठकुरइन की कतेक सेवा कर थे।

ये बात ठीक है कि बलराम ऊखर बेटा है फेर कतेक मुरुख। काम देखता बोला जर आ जाये। भेजबे उत्तर दिशा त वोहा जाये दक्षिण दिशा। वोहा ठीक से अपने चारों खेत ला छलख नई जानय कालि के दिन वोला खेत दे दिए जाय त का होही?

ठाकुर बीमार हावे। बलराम ला ओखर ससुरार वाला मन बलवा ले हय। अभी तक ले लहुट के नई आये हे। खबर भिजवाय गय हय, फिर ससुराल ले कोनो मनख नइ आये हे।

संझा के बेरा बलराम अपना दलदल के संग ठाकुर के आगु में अइस। राम राम के बाद ससुरार पक्ष के जन विहिस कि ठाकुर अब ये थोरे दिन के मेहमान हावस ऐखर सेती तोला अपन संपत्ति ला बलराम के नाम देना चाही।

ये सनके ठाकर ला कोनो अचंभा नइ होइस। अइसन बात के खियाल ओला आग ले रिहिस। बोलिन – “तुम्हार बात तो ठीक फिर बलराम अभी लइका है। काम धाम के सूझ अभी बने अइसन नइ हे।”

अतका सुनके रिहिस बलराम भड़क गये—बापू के त बुध सठिया गेहे। जब देख बेत मोला लइका समझते अऊ ये सब मोहन के सेती होवत हे। मांहा घलो ओखरे पक्ष ले थे। फेर बापू आज त तोला फइसला करेच बर पड़ ही।

ठाकुरहा जल्दी ले गाँव के पाँच पंच बुलबइस फिर ठकुराइन ले पुछिस मोहन कहाँ है? ठकुरइन बतइस – वो हा मंझनिया के जंगल चल दे हावे। एक ठन बइला बीमार हावे ले तेखर बर जड़ी बुटी लाने बर गये है।

ठाकुर हां पंच मन ला बलराम के मंशा बतलइस। सबला बड़ अचंभा होइस फेर बलराम के संग ओखर ससुरारी मन ला देख के चुप रहिगे। ठाकुर बाते बात में बलराम लातियारिस बेटा थोरकिन खलिहान में जाके देख आतो धान मिजाइ के कुछ उडल हे या नइ। बलराम भागत गइस अउ आके बतइस कि खलिहान म दूनों नौकर बइठे बीड़ी पियत हावे।

ठाकुर फेर विहिस – ऊखर ले पूछ नइ लेतेस बेटा के दौरी कतेक बेर म चल ही। बलराम हा आज्ञाकारी बेटा अइसन फेर गइस अऊ आके खबर दइस कि अभीत सबो बाइला नइ आये हे। ठाकुर पूछिस – “आखिर कतका बइला कमती पड़त हे?”

बलराम गल्ती कबलिस के बाप में तो गिनती करे बार भुला गये। अभीच जाके पता करथ हंव। बलराम लहुटके बड़ा घमण्ड करके बतइस दुबइला कमती है। अऊ तब ठाकुर हा पूछिस – “उहां अभी कुल कतका बइला हे।”
अऊ लोगन देखिन कि बलराम फेर बइका के गिनती करे बर भागिस। ओतकेच बार मोहन आगे। वे हा सब झन के पांव परिस अऊ चले ल धरिस। तब ठाकुर बोलिस – बेटा थोरकिन पता लगा के आ धान वे भिंजइ होही के नई।

तभेच बलराम आके बइला के संख्या बताय लगिस। सब चुप रहिन। थोरिक देर बाद मोहन आके बतइस कि कंगलू अउ मंगलू इनो मिल के पझ डार डाले हावे। ढेर लगा चुके है। दुबइला के कमी रिहिस त बहू झगरू देके गेहे। रात के खां पी के दौरी शुरू हो जाही। फिकर के कोनो बात नइहे।

ऐखर बाद कोनो कुर्छ नई बोलिन। ठाकुर पारी पारी से सबके मुंह ला देखे लगिस। अऊ आखिर में बलराम ले बोलिस कुछ समझ में आइस बेटा, तोर अऊ मोहन में का फरक हे? तें घंकभु ये समझे के कोशिश नई करेस के भुइयां ह मेहनत चाहथे। खेती – बारी करना हंसी – ठट्ठा नोहे। बड़ सूझ के काम हे। मोहन तो ले के छोटे हे फेर कतेक लायक हे अऊ तेहा कतेक नालयक पहिले मोर विचार रिहिस कि तुम दूनो ला संपत्ति के आधा – आधा हिस्सा दे दवं,फेर अब एक अ रास्त ये रही कि तोता ईमानदार किसान बने बर पड़ही जइसे ते मोहन ला देखत हस। तबहि तेहां आधा हिस्सा के हकदार होबे।

MP Board Solutions

ठाकुर के फइसला सबके समझ में आ गइस। आज ये फेर साबित होंगे कि ठाकुर हमेशा नियाय के ही बात कहिये। खड़ी बोली में अनुवाद न्याय की बात चैतू ठाकुर बीमार है। गाँव के सब लोग उन्हें देखकर जा चुके हैं। आस – पास के गाँवों से भी अनेक प्रतिष्ठित किसान उन्हें देखने आ रहे हैं। आखिर क्यों न हो? उनका व्यवहार सबके लिए इतना नम्र रहा है कि दूर – दूर तक लोग उन्हें जान गए हैं चाहे कैसी भी उलझी समस्या क्यों न हो,चैतू ठाकुर अपनी सूझ – बूझ से उसे आनन – फानन में सुलझा देते हैं। वैसे उनके पास लम्बी चौड़ी जायदाद नहीं हैं,न ही सोने – चाँदी के अनगिनत सिक्के हैं। उन्हें तो केवल अपनी बाँहों का भरोसा है। एक छोटा – सा घर है। बाड़ी है,कुछ खेत हैं और गिनती के ढोर – डांगर हैं। रात – दिन मेहनत करना ही उनका नियम है।

एक समय था कि वे गरीब थे। मजदूरी करके अपना पेट भरते थे। अब भी वे परम संतोषी हैं और आज भी घमण्ड उन्हें छु तक नहीं गया। यही कारण है कि गाँव के लोग उन्हें मानते हैं।

आज वे बीमार हैं, तो सारा गाँव दु:खी है। ईश्वर से सब के सब यही प्रार्थना कर रहे हैं कि वे जल्दी अच्छे हो जायें।

उनके परिवार में कुल चार प्राणी हैं। वे,उनकी पत्नी,उनका बेटा और अनाथ भांजा। है तो भांजा,पर वे उसे अपने बेटे से जरा भी कम नहीं मानते। उनका अपना बेटा बलराम लगभग बीस साल का है। भांजे का नाम है मोहन, यही कोई सत्रह – अठारह वर्ष का होगा। बड़ा मेहनती है। बलराम तो उसके किसी काम में भी नहीं ठहर सकता।

बलराम की सगाई हो चुकी है। ठाकुर सोचते हैं कि मोहन के लिए भी कहीं बात हो जाय तो दोनों का विवाह एक साथ ही निपटा दें। ठकुराइन के मन में भी यही बात है।

परन्तु बलराम इधर बड़ा मनमौजी हो गया है। न माँ की बात मानता है,न बाप की सुनता है। खेत पर कभी भूलकर भी नहीं जाता है और न ही खड़ी भर खलिहान में बैठता है। लोग कहते हैं कि बलराम आजकल ताश खेलने लगा है। कुछ लोगों का यह भी ख्याल है कि उसके ससुराल वाले उसे बहका रहे हैं। ससुराल वालों को शायद यह डर है कि कहीं मोहन बलराम का हिस्सा न बॅटा ले।

चैतू ठाकुर यह सब समझते हैं। वे मोहन को केवल इसलिए नहीं चाहते कि वह उनका भांजा है. उसके माँ – बाप मर गए हैं,बल्कि ठाकुर उसकी मेहनत देखकर खुश हैं। खेती – बारी के साथ – साथ वह घर का भी कितना ध्यान रखता है। उन दोनों की कितनी सेवा करता है।

ठीक है कि बलराम उनका बेटा है किन्तु कितना मूर्ख है। काम के नाम से ही ज्वर आ जाता है। भेजो उत्तर दिशा की ओर तो दक्षिण चला जाता है। उसे तो ठीक से अपने चार खेतों का भी ज्ञान नहीं है और कल यदि उसे सारे खेत दे दिये जाएँ तो क्या होगा?

ठाकुर बीमार है। बलराम को उसकी ससुराल वालों ने बुलवा लिया है। अभी तक वह लौटकर नहीं आया। सूचना भिजवाई गई थी,परन्तु उसकी ससुराल से भी कोई नहीं आया। दूसरे दिन सुबह बलराम आ गया। ठाकुर ने सुना कि उसके साथ कुछ लोग भी आए हैं, पर अभी तक कोई सामने नहीं आया।

शाम के समय बलराम अपने दल के साथ ठाकुर के सामने आया। राम – राम के बाद ससुराल पक्ष के एक आदमी ने कहा कि ठाकुर अब तो थोड़े ही दिन के मेहमान हैं, इसलिए उन्हें अपनी सम्पत्ति बलराम के नाम लिख देनी चाहिए।

यह सुनकर ठाकुर को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात की कल्पना उन्हें पहले से ही थी। बोले – “बात तो ठीक है, किन्तु बलराम अभी बच्चा है। काम – धाम की सूझ अभी उसे नहीं इतना सुनना था कि बलराम उबल पड़ा – “बापू की तो बुद्धि सठिया गई है। जब देखो तब मुझे बच्चाही समझते हैं और यह सब उस मोहन के कारण ही है। माँ भी उसका ही पक्ष लेती है.लेकिन आज तो बाबू को फैसला करना ही पड़ेगा।”

ठाकुर ने शीघ्र ही गाँव के पंच बुलवा लिए। फिर ठकुराइन से पूछा “मोहन कहाँ है?” ठकुराइन बोली – “वह तो दोपहर से ही जंगल चला गया है एक बैल बीमार है,उसी के लिए कुछ जड़ी – बूटी चाहिए थी।”

ठाकुर ने पंचों से बलराम की इच्छा कह सुनाई। सबको बड़ा अचम्भा हुआ,परन्तु बलराम के साथ उसकी ससुराल वालों को देखकर चुप रह गए। ठाकुर ने बात ही बात में बलराम से कहा – “बेटे जरा खलिहान जाकर देख तो आओ धान मिजाई का कुछ डौल है या नहीं।”

बलराम भागकर गया और आकर बताया कि खलिहान में दो नौकर बैठे बीड़ी पी रहे हैं। . ठाकुर ने कहा, “उनसे पूछ नहीं लिया बेटा कि कितनी देर बाद दौरी चलेगी?”

बलराम एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह फिर गया और जाकर उसने सूचना दी कि अभी तो पूरे बैल ही नहीं आये।

ठाकुर ने फिर पूछा – “आखिर कितने बैल कम पड़ते हैं?” बलराम ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा – “बापू मैं तो गिनती करना ही भूल गया। अभी जाकर पता लगाता

बलराम ने लौटकर गर्व के साथ बताया कि दो बैल कम पड़ते हैं। तभी ठाकुर ने पूछ लिया – “वहाँ अभी कुल जमा बैल कितने हैं?”

और लोगों ने देखा कि बलराम बैलों की गिनती करने फिर खलिहान की ओर भागा जा रहा है।

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तभी मोहन आ गया। उसने सबके पाँव छुए और चलने लगा। ठाकुर बोले – “बेटे,जरा पता तो लगाओ कि आज धान की मिजाई हो सकेगी या नहीं।”

तभी बलराम आकर बैलों की संख्या बताने लगा। सब चुप रहे। जरा देर बाद मोहन ने आकर बताया कि कंगलू और मंगलू दोनों मिलकर पैर डाल चुके हैं, ढेर लगा चुके हैं, दो बैलों की कमी थी सो अभी झगरू दे गया है। रात को खा – पीकर दौरी शुरू हो जायेगी। चिन्ता की कोई बात नहीं।

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। ठाकुर बारी – बारी से सबका चेहरा देखने लगे और अन्त में बलराम से बोले कुछ समझ में आया बेटे,तुममें और मोहन में क्या फर्क है? तूने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं कि जमीन मेहनत माँगती है। खेती बारी करना कोई है। बड़ी सूझबूझ का काम है। मोहन तुझसे छोटा है, पर कितना लायक है और तू कितना मागता है। खाता बारा करना काइहसा – ठट्रानहा नालायक है। पहले मेरा विचार था कि तुम दोनों को मैं अपनी सम्पत्ति का आधा – आधा हिस्सा दे दूँ, किन्तु अब एक शर्त यह भी रहेगी कि तुझे ईमानदार किसान बनना होगा, जिस प्रकार तू मोहन को देख रहा है, तभी तू आधे हिस्से का हकदार होगा।

ठाकुर का फैसला सबकी समझ में आ चुका था। आज यह बात पूरी तरह से सिद्ध हो गयी कि ठाकुर हमेशा न्याय की ही बात कहते हैं।।

(ख) निमाड़ी लोक कथा
झूठी मंजरी

एक थी चिड़ई,एक थो कबूतर,एक थो कुत्तो और एक थी मांजरी। सबइ न विचार करयो कि अपुण खीर बणावा।

कोई लायो लक्कड़,कोई लायो पाणी,कोई लायो शक्कर,कोई लायो दूध उन खीर तैयार हुई गई।

कहयो चलो सब खाई लेवां,मांजरी न कहयो – म्हारा तो डोला आई गयाज। उन उ डोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई।

सबन अपणे अपणा वाटड की खीर खाई न बचेल का ढाकी न धरी दियो।

सब अपणा, अपणा काम न पर चली गया, तंवज मांजरी उठी उन सबका वाय की खीर खाई न डोला न पर पट्टी बांधी न सोई गई। सांझ ख जंव सबई काम पर सी आया तो देख्यो खीर को बासरण खाली थो।।

एक एक सी पूछयो क्यों भाई तुम न खीर खाई ज। . सबई न न मना करी दियो। मांजरी से पूछयो तो वा बोलो हऊँ काई जाणु म्हारो तो डोला आयाज। हऊ दिन भर सी पट्टी बांधी न पड़ोज। सब न तै करयो कि एक सूखा कुआ पर झूलो बांध्यो सब ओपर बारी – बारी सी बढी न कहे कि मन खीर होय तो झूलो टूटी जाये। जेन खीर खाई हायेगा ओकी बखत झूला टूटी जायेगा। पहल चिड़ी बठी बोली – “ची,ची,मन खीर खाई हो तो झूलो टूटी जाय,झूलो नो टूटयो।”

फिर कबूतर बठ्यो बोल्यो गुटरू गूं – गुटर गूं, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिरी कुतरो बठ्यो बोल्यो – भों – भों, मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय। झूलो ना टूटयो।

फिर मांजरी बठी बोली – म्यांउ म्यांउ मन खीर खाई होय तो झूलो टूटी जाय।

झूलो तो टूटी गयो अन मांजरी सूखा कूआ म पड़ी गई। खेल खतम पैसा हजम।

खड़ी बोली में अनुवाद

झूठी बिल्ली

एक थी चिड़िया, एक था कबूतर, एक था कुत्ता और एक थी बिल्ली। सबने मिलकर विचार किया कि अपनी खीर बनायें।
कोई लाया लकड़ी,कोई लाया पानी,कोई लाया शक्कर,कोई लाया दूध और खीर बनकर तैयार हो गयी।

कहा, चलो सब खा लें।
बिल्ली ने कहा – “मेरी तो आँखें आई हैं” और वह आँखों पर पट्टी बाँध कर सो गई। सबने अपने – अपने हिस्से की खीर खाई और शेष बची हुई खीर को शाम के लिए ढाँक कर रख दिया। सब अपने – अपने काम पर चले गये। तब,बिल्ली उठी और सबके हिस्से की खीर खाकर, फिर आँखों पर पट्टी बाँधकर सो गई। शाम को जब सब काम पर से आये,तो देखा,खीर का बरतन खाली था। हर एक से पूछा – “क्यों भाई तुमने खीर खायी है?” सबने इनकार किया।

बिल्ली से पूछा,वह भी बोली – “मैं क्या जानू? मेरी आँखें आयी हैं,सुबह से पट्टी बाँधे पड़ी हूँ।” तब सबने विचार किया कि एक सूखे कुएँ पर कच्चे धागे से झूला बाँधा जाये। सब बारी – बारी से उस पर बैठे और कहें – “मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाये।” जिसने खीर खायी होगी,उसकी बार झूला टूट जायेगा।

पहले चिड़िया बैठी – “ची – ची, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर कबूतर बैठा, बोला – “गुटर गूं – गुटर – गूं, मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।”

झूला नहीं टूटा। फिर कुत्ता बैठा, बोला – “भौं – भौं,मैंने खीर खायी हो, तो झूला टूट जाय।” झूला नहीं टूटा। फिर बिल्ली बैठी, बोली – “म्याऊँम्याऊँ,मैंने खीर खायी हो तो झूला टूट जाय।”

झूला था सो टूट गया और बिल्ली थी सो सूखे कुएँ में गिर गयी। खेल खतम—पैसा हजम।

(ग) मालवी कहानी
पीपल – तुलसी

कणी गाम माय सासू अर बऊ रेती थी। एक दिन सासू ने बऊ तो कियो के मू तीरथ कारवा सारू जरूरी हूँ,तुम अपणे याँ जो दूध दही होवे है ऊ बेची – बेची के रुपया भेलाकर लीयो। अतरो कइके सासू चलीगी।

चैत – बैसाख को माइनो आयो तो बऊ सगलो दूध – दई लई जई के पीपल अर तुलसी म सीची देती अर फेरी खाली बासन लइके घरे मेली देती। सास तीरथ करी के पीछो घरे अई तो बीने बऊती दूध अर दई का रुप्या मांग्या। बऊ ने क्यो के बई मूं तो सगलो दूध अर दई पीपल तुलसी म सींचती री हूँ,म्हारा कन रुप्या नी है। पण सासू ने कियो कई बी होवे जो – वी हो म्हारे तो रुप्या देणा पड़ेगा। तो बऊ पीपल अर तुलसी का कने जइके बैठीगी, अर वीनती बोलो के म्हारी सासू म्हार ती दूध दही का पइसा मागे है। पीपल – तुलसी ने कियो के बेटी – हम्हारा कन रुप्या – पइसा काँ है? इ भाटा कोंकरिया जरूर पड़िया है इनके भलाई – उठई के लई जा। बऊ सगला कोंकरिया भाटा उठई के घेर लई अर अई घरे लइके अपण कोठा माय मेली दिया। दूसरा दन सास ने फेरी रुप्या मांग्या तो बऊ ने अपणो कोठो खोल्यो। बऊ ने देख्यो कि सगला भले ही ले जाओ। सास कंकड़ – पत्थर लेकर खुशी – खुशी घर आयी और उसने कंकड़ – पत्थर लाकर अपने कमरे में रख दिये। दूसरे दिन जब कमरा खोला गया तो सास क्या देखती है कि सारा कमरा साँप और बिच्छुओं से भरा पड़ा है।

सास ने बहू से पूछा कि बहू, यह क्या बात है? तू जो कंकड़ – पत्थर उठाकर लायी थी। उनके तो हीरे – मोती बन गये और मैं जो कंकड़ – पत्थर उठाकर लायी। उनके साँप – बिच्छू बन गये? बहू ने सहज भाव से उत्तर दिया कि सास जी मैंने पीपल – तुलसी को शुद्ध मन से सींचा था, इसलिए कंकड़ – पत्थर के हीरे – मोती बन गये और आपने लालचवश ऐसा किया था अतः आपके लाये हुए कंकड़ – पत्थरों के साँप – बिच्छू बन गये।

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(6) दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम दूरदर्शन

पर आजकल हर समय कोई न कोई कार्यक्रम दिखाया जाता है तथापि प्रमुख व लोकप्रिय कार्यक्रम इस प्रकार हैं –

सुबह सवेरे,समाचार,रंगोली,कृष्ण कथाएँ,मैट्रो समाचार, जय गणेश, चित्रहार, सांई बाबा, खिचड़ी,टॉम एण्ड जैरी,कलश,शांति, कृषि दर्शन,पोकेमॉन,विरासत,कुमकुम,शाका लाका बूम बूम, वाइल्ड डिस्कवरी, करम चन्द, कसौटी जिन्दगी की, कहानी घर – घर की, डिजनी जादू, सारे गा मा, हनुमान, सोनपरी,बूगी बूगी,ग्रेट इंडियन लामटा चेलेंज एवं अंताक्षरी। दूरदर्शन के कार्यक्रमों को देखकर छात्रों को उनका विवरण लिखने की प्रेरणा लिखित भाषा की शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य छात्रों को अपने भाव, विचार तथा अनुभवों को लिखित रूप में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने योग्य बनाना है –

  1. छात्रों को सुन्दर, परिमार्जित एवं स्पष्टं लेख लिखने की प्रेरणा देना।
  2. छात्रों के शब्द – कोषं को सक्रिय रूप देना।
  3. छात्रों को विराम चिह्नों का उचित प्रयोग सिखाना और अपने भावों को अनुच्छेदों में सजाने का अभ्यास कराना।
  4. छात्रों की अवलोकन (निरीक्षण) शक्ति, कल्पना शक्ति और तर्क शक्ति का विकास करना।
  5. छात्रों की विचारधारा में परिपक्वता लाना।

दूरदर्शन एक ऐसा माध्यम है जिससे छात्रों की श्रवणेन्द्रिय के साथ दृश्येन्द्रियाँ भी क्रियाशील रहती हैं। छात्र दूरदर्शन में वार्ता सुनने के साथ कार्यक्रम में भाग लेने वालों को देख सकते हैं और वे उनके हाव – भाव के साथ बोलना, अभिनय करना,भाषण देना सीख कर स्वरों के उचित उतार – चढ़ाव के द्वारा बात को शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं। वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। क्योंकि दूरदर्शन ज्ञानवर्धन और मनोरंजन का सबल माध्यम है। वे सब कुछ समझकर अन्त में उस कार्यक्रम के समग्र प्रभाव की चर्चा करें।

शिक्षक छात्रों को दूरदर्शन के किसी विशिष्ट कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को कहें। इससे वे लेखन – कौशल में तो पारंगत होंगे ही साथ ही उन्हें विवेचना और समीक्षा करने का भी अवसर मिलेगा। कार्यक्रम के गुण – दोष दोनों पर प्रकाश डालने के लिए छात्रों को स्वतन्त्र अवसर प्रदान करना होगा। इससे उनकी प्रतिभा के विकास के साथ चिन्तन,मनन एवं स्वाध्याय की प्रवृत्ति का पल्लवन तथा उन्नयन भी होगा।

(7) हिन्दी साहित्य का स्वतन्त्र पठन

मनुष्य का सबसे बड़ा अलंकार उसकी वाणी है। वाणी जितनी शुद्ध और परिष्कृत होती है, व्यक्ति उतना ही सुसंस्कृत समझा जाता है। सम्पूर्ण मानव समाज अपने भावों और विचारों को दो रूपों में व्यक्त करता है – मौखिक और लिखित। इन दोनों रूपों में भाषा उसका प्रमुख साधन है। यहाँ मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकारों पर विचार करने हैं।

(i) टिप्पणियाँ
किसी सुने गए अथवा पढ़े गए भाषण, वार्तालाप, पत्र, लेख, कविता, ग्रंथ आदि देखे गए दृश्य तथा घटना पर अपना मत मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रकट करना ही टिप्पणी कही जाती है। अकार की दृष्टि से टिप्पणी की यद्यपि कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, किन्तु संक्षिप्त टिप्पणी अच्छी समझी जाती है।

मोटे तौर पर टिप्पणियाँ तीन प्रकार की हो सकती-

(अ) कार्यालयीय टिप्पणी,
(ब) सम्पादकीय टिप्पणी,
(स) सामान्य टिप्प्णी।

(ii) प्रेरणाएँ
साहित्य में प्रेरणा से आशय उन रचनाओं अथवा कृतियों से है जो पाठक को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर उनका मार्गदर्शन करती हैं। इसके अन्तर्गत मुख्यतः उन कहानियों आदि को शामिल किया जाता है जो इस उद्देश्य को लेकर लिखी जाती हैं अथवा इस उद्देश्य को पूरा करती हैं। परन्तु इन कहानियों आदि के विषय में यह महत्त्वपूर्ण है कि ये इतनी बड़ी न हों कि पाठक पढ़ते – पढ़ते कहानी के उद्देश्य से भटक जाय। एक ही बैठक में पूरी पढ़ी जाने वाली कहानियाँ ही इसके लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।

(8) हस्तलिखित पत्रिका तैयार करना

छात्र आपस में मिलकर हस्तलिखित पत्रिका तैयार कर सकते हैं जिसमें सर्वप्रथम सभी संकलित अथवा स्वयं के लिखे लेख,कहानियों,कविताओं के अतिरिक्त चुटकुले आदि भी हो सकते हैं,को सूचीबद्ध किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इस सूची में उसके लेखक अथवा उसके संकलनकर्ता का नाम दिया जा सकता है।।

इसके बाद सम्पादक की ओर से अपने साथियों को धन्यवाद ज्ञापन के साथ पाठकों को इस पत्रिका से परिचित कराते हुए इसके लिखित अथवा संकलित लेखों आदि पर प्रकाश डाल सकते हैं। तत्पश्चात् इन लेखों आदि को बड़े रोचक रूप में समग्रता से प्रस्तुत किया जा सकता ध्यान रखने लायक बात है कि कोई भी लेख बहुत छोटा व बहुत ही बड़ा न हो जाय,जो पत्रिका में रोचकता समाप्त करे।

(9) क्षेत्रीय पत्र – पत्रिकाएँ

मालवा अंचल

  • इन्दौर – नई दुनिया,इन्दौर समाचार, नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वदेश, भावताव, जागरण।
  • उज्जैन – विक्रम दर्शन, अवन्तिका, अग्नि बाण, भास्कर, प्रजादूत, जलती मशाल।
  • रतलाम – जनवृत,जनमत टाइम्स, प्रसारण, हमदेश।
  • नीमच – नई विधा। देवास – देवास दर्पण, देवास दूत।
  • मंदसौर – दशपुर दर्शन, कीर्तिमान, ध्वज।
  • शाजापुर – नन्दनवन।

बघेलखण्ड अंचल

  • रीवा – बांधवीय समाचार, आलोक, जागरण।
  • सतना – जवान भारत,सतना समाचार।
  • शहडोल – विंध्यवाणी, भारती समय,जनबोध।

बुन्देलखण्ड अंचल

  • कटनी – महाकौशल केशरी, भारती, जनमेजय।
  • सागर – न्यू राकेट टाइम्स, आचरण, राही, जन – जन की पुकार।
  • टीकमगढ़ – ओरछा टाइम्स।
  • छतरपुर – क्रान्ति कृष्ण,प्रचण्ड ज्वाला।
  • जबलपुर – नव भारत, नवीन दुनिया, युगधर्म, दैनिक भास्कर, नर्मदा ज्योति, देशबन्धु, लोकसेवा।

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निमाड़ अंचल

  • खण्डवा – विध्यांचल,लाजवाब।
  • बुरहानपुर – वीर सन्तरी।
  • बड़वानी – निमाड़ एक्सप्रेस।

छत्तीसगढ़ अंचल

  • बिलासपुर – लोकस्वर, नवभारत, भास्कर।
  • दुर्ग – ज्योति जनता, छत्तीसगढ़ टाइम्स।
  • रायपुर – देशबन्धु, नवभारत, भास्कर, स्वदेश।

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MP Board Class 12th Special Hindi पत्र-लेखन

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आधुनिक युग यद्यपि दूरभाष और मोबाइल संदेशों का है तथापि पत्र-लेखन का महत्त्व आज भी अक्षुण्ण है। आधुनिक युग में तो पत्र-लेखन ने एक कला का रूप धारण कर लिया है। पारिवारिक जीवन तथा सामाजिक जीवन के अनेक कर्तव्यों तथा उत्तर-दायित्वों का निर्वाह करने के लिए हमको प्रतिदिन अनेक प्रकार के पत्र लिखने पड़ते हैं। पारिवारिक पत्र स्नेह सम्बन्धों पर आधारित होते हैं तथा उनमें प्राय: अपनी व्यक्तिगत या परिवार सम्बन्धी बातें ही लिखी जाती हैं। अतः उनको लिखने में कोई कठिनाई नहीं होती तथा लिखने में विशेष सावधानियाँ भी नहीं रखनी पड़तीं। लेकिन जो पत्र सामाजिक, व्यावसायिक तथा व्यापारिक क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हैं, उनको लिखने में विशेष सावधानियाँ बरतने की आवश्यकता होती है। पत्र हमारी भावनाओं तथा विचारों की अभिव्यक्ति होता है। अभिव्यक्ति सरल तथा स्पष्ट होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि (1) अपनी बात स्पष्ट रूप से लिखनी चाहिए। इसके लिए संक्षिप्तता पर ध्यान देना चाहिए। अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए। आजकल प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त है तथा वह समय का सदुपयोग करता है। अतः लम्बे पत्र पढ़ने का समय किसी के पास नहीं है। (2) सरल तथा प्रवाहपूर्ण भाषा का प्रयोग करना चाहिए। विद्वत्ता या पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिए क्लिष्ट शब्दों या समास-प्रधान लम्बे-लम्बे वाक्यों का प्रयोग निरर्थक है। इससे लाभ होने की अपेक्षा हानि अधिक होने की सम्भावना होती है। वाक्य रचना ऐसी होनी चाहिए, जिससे पढ़ने वाला आपके आशय को अच्छी तरह से समझ सके।

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पत्र-लेखन की रूप-रेखा

  1. पत्र प्रेषक का पता और दिनांक।
  2. सम्बोधन।
  3. पत्र का विषय।
  4. अभिवादन।
  5. पत्र का मुख्य भाग।
  6. प्रेषक का आत्मबोधन (हस्ताक्षर से पूर्व प्रयुक्त शब्दावली)।
  7. प्रेषक के हस्ताक्षर और नाम।
  8. पता।

पत्र को ठीक से समझने के लिए उसे अग्रलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता

(1) पत्र प्रेषक का पता और दिनांक-इसके अन्तर्गत आप अपना पता और वह दिनांक लिखते हैं जिस दिन पत्र लिखा गया। ये दोनों बातें पत्र के दाहिने ओर सबसे ऊपर लिखी जाती हैं। अपना पता लिखते समय मकान का नम्बर एवं गली के नाम के बाद अल्प विराम (,) लगाना चाहिए तथा दूसरी पंक्ति में शहर या गाँव का नाम लिखना चाहिए और तब पूर्ण विराम लगाना चाहिए। पते के नीचे दिनांक लिखते समय दिनांक एवं महीना लिखकर अल्प विराम लगाना चाहिए। व्यापारिक पत्रों में इस सबको अब प्राय: बाईं ओर लिखा जाता है। जैसे-
MP Board Class 12th Special Hindi पत्र-लेखन img-1

(2) सम्बोधन-ये दो प्रकार के होते हैं—
(क) निजी अथवा व्यक्तिगत पत्रों के सम्बोधन,
(ख) अन्य पत्रों के सम्बोधन।

व्यक्तिगत पत्रों के लिए (बड़ों के लिए)-श्रद्धेय, परमपूज्य, आदरणीय, पूज्यपाद, माननीय मान्यवर; (स्त्रियों के लिए)-पूज्या, पूज्यपाद, पूजनीया,माननीया आदि।
सम्बोधन इस प्रकार भी लिखते हैं-श्रद्धेय गुरुवर,परमपूज्य पिताजी,आदरणीय माताजी, आदरणीय भ्रातृवर; (बराबर वालों को) -प्रियवर, प्रिय, भाई, मित्रवर, बन्धुवर; (बच्चों के लिए) -आयुष्मान, प्रियवर, परमप्रिय,प्रिय,चिरंजीव आदि।

व्यावसायिक एवं आधिकारिक पत्रों में पहले सम्बन्धित व्यक्ति का उल्लेख करते हैं, जिसको पत्र लिखा जाता है। जैसे

  • सेवा में,
  • प्रधानाचार्य,
  • शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
  • शिवपुरी।
  • इसके बाद नीचे महोदय, मान्यवर, प्रिय महोदय आदि लिखते हैं।

(3) पत्र का विषय-आधिकारिक पत्रों में प्रायः महोदय या प्रिय महोदय आदि के ऊपर पत्र का विषय लिखते हैं जिससे पत्र को सम्बन्धित व्यक्ति के पास भेजने में विभाग को सुविधा रहती है। अब व्यावसायिक पत्रों में भी इसका प्रयोग होने लगा है।

(4) अभिवादन-आधिकारिक एवं व्यावसायिक पत्रों में अभिवादन की परम्परा नहीं है। व्यक्तिगत पत्रों में; (बड़ों को) प्रणाम, सादर प्रणाम, चरण स्पर्श, सादर चरण स्पर्श, नमस्ते, नमस्कार आदि; (बराबर वालों को) नमस्ते, नमस्कार, जय राम जी की,जय हिन्द तथा; (छोटों को)-आशीर्वाद,शुभाशीष,प्रसन्न रहो, सौभाग्यवती रहो आदि लिखते हैं।

(5) पत्र का मुख्य भाग-पत्र का मुख्य भाग सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। व्यक्तिगत पत्रों में कुशल समाचार लिखने के बाद जो भी समाचार या सूचनाएँ देनी होती हैं,वे इसी भाग में होती हैं। व्यापारिक और (सरकारी) आधिकारिक पत्रों में संक्षेप में औपचारिकता का पूरा निर्वाह करते हुए अपनी बात कही जाती है। इस भाग की समाप्ति प्रायः कुछ वाक्यों या शब्दों से की जाती है। व्यक्तिगत पत्रों में ‘शेष फिर’, ‘शेष मिलने पर’, ‘प्रणाम सहित’, दर्शन की प्रतीक्षा में’;(बड़ों के लिए-आशीर्वाद सहित; (छोटों के लिए-साधुवाद आदि तथा व्यापारिक और आधिकारिक पत्रों में ‘सधन्यवाद’, धन्यवाद सहित’, ‘साभार’ आदि लिखते हैं।

(6) प्रेषक का आत्मबोधन (हस्ताक्षर से पूर्व प्रयुक्त शब्दावली)-निजी पत्रों में अपने सम्बन्ध के अनुसार पत्र लिखकर पत्र के अन्त में हस्ताक्षर से पूर्व एक या एक से अधिक सम्बन्ध द्योतक शब्दों का प्रयोग करते हैं। (बड़ों के लिए-आज्ञाकारी, विनीत, आपका दास, भवदीय, आपका सेवक, कृपाकांक्षी, स्नेहभाजन आदि; (बराबर वालों के लिए—आपका, आपका ही, तुम्हारा, सस्नेह तुम्हारा तथा (छोटों के लिए)-तुम्हारा शुभचिन्तक, शुभैषी, शुभेच्छु, शुभाकांक्षी आदि लिखते हैं। आवेदन पत्रों में भवदीय,प्रार्थी आदि लिखते हैं।

(7) प्रेषक के हस्ताक्षर और नाम बड़ों को लिखे गये पत्रों में विनम्रतापूर्वक प्रायः नाम लिखने की परम्परा है। नाम के साथ शर्मा, गुप्ता, तिवारी, सिंह आदि नहीं लिखा जाता। अन्य पत्रों में पूरा नाम लिखते हैं। व्यापारिक एवं आधिकारिक पत्रों एवं आवेदन-पत्रों में तो पूरा नाम अवश्य ही लिखा जाना चाहिए।

(8) पता-निजी पत्र के अन्त में पता नहीं लिखा जाता। अन्य पत्रों के अन्त में पता लिखा जाता है। पता ऊपर बताये अनुसार ही लिखें।

विभिन्न प्रकार के पत्रों में प्रयोग किये जाने वाले सम्बोधन, निवेदन आदि।
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यहाँ पर अभ्यास हेतु आवेदन-पत्रों, स्थानीय निकाय से सम्बन्धित पत्रों एवं सम्पादक के नाम पत्रों (अपनी रचना प्रकाशन हेतु, समसामयिक विषयों पर परिचर्चा तथा समसामयिक समस्याओं के समाधान हेतु पत्र) के कुछ उदाहरण दिये जा रहे हैं। इनके आधार पर विद्यार्थियों को पत्र-लेखन का अभ्यास करना चाहिए, जिससे वे इस कला में पारंगत हो सकें।

1. आवेदन-पत्र

प्रश्न 1.
किसी महाविद्यालय में व्याख्याता पद के लिए आवेदन-पत्र दीजिए।
उत्तर-
सेवा में,
प्राचार्य,
महात्मा गाँधी महाविद्यालय,
सागर (म.प्र)।

विषय : हिन्दी व्याख्याता पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन-पत्र।

मान्यवर,
दैनिक ‘नवभारत’ में दिनांक 11-4-20….. के अंक में प्रकाशित विज्ञापन के सन्दर्भ में आपके महाविद्यालय में हिन्दी व्याख्याता के रिक्त स्थान के लिए मैं आपकी सेवा में यह आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मैंने सागर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है तथा विश्वविद्यालय की योग्यता-सूची में मुझे द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। इसी विश्वविद्यालय से मैंने पी-एच.डी.की उपाधि प्राप्त की है। मेरे शोध प्रबन्ध का विषय है—’नयी कविता के सन्दर्भ में मुक्तिबोध के काव्य का समग्र मूल्यांकन।’

मैं गत तीन वर्षों से जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय, जगदलपुर में हिन्दी व्याख्याता के पद पर कार्य कर रहा हूँ। यह स्थान मेरे गृह-नगर से अत्यधिक दूर है। अपनी पारिवारिक कठिनाइयों के कारण मैं सागर में ही कार्य करने का आकांक्षी हूँ।

मुझे विश्वास है कि मेरी शैक्षिक योग्यताएँ तथा अनुभव पर विचार करते हुए आप मुझे सेवा करने का अवसर प्रदान कर अनुग्रहीत करेंगे।

भवदीय
डॉ.सुरेन्द्र मोहन
50, इतवारी हिल्स, सागर (म.प्र)

दिनांक : 15-4-20….

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प्रश्न 2.
जिला शिक्षा अधिकारी को उसके अधीन सहायक शिक्षक के रिक्त पद पर नियुक्त किये जाने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
सेवा में,
जिला शिक्षा अधिकारी,
रायपुर (छत्तीसगढ़)।

विषय : सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
दैनिक भास्कर’ में दिनांक 10-5-20…. को प्रकाशित विज्ञापन के सन्दर्भ में आपके अधीनस्थ सहायक शिक्षक पद के रिक्त स्थान पर नियुक्ति हेतु यह आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रहा मैंने वर्ष 20…. में रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से बी.ए. की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में 54% अंक प्राप्त कर उत्तीर्ण की है।

मैंने वर्ष 20…. में बी.टी.सी. की परीक्षा उत्तीर्ण की है। मैं 23 वर्ष का एक स्वस्थ युवक हूँ तथा स्काउटिंग, रेडक्रास तथा प्राथमिक चिकित्सा में मैंने अनेक प्रमाण-पत्र प्राप्त किये हैं।

मुझे विश्वास है कि आप अपने अधीन सहायक शिक्षक पद पर मुझे नियुक्त कर सेवा करने का अवसर प्रदान कर अनुग्रहीत करेंगे।

भवदीय
जगदीश कुमार सिंह
363, मालवीय नगर,रायपुर

दिनांक : 17-5-20….

प्रश्न 3.
अपने विद्यालय के प्रधानाध्यापक को निर्धन छात्र कोष से छात्रवृत्ति हेतु आवेदन-पत्र लिखिए। (2009, 12)
उत्तर-
सेवा में,
प्रधानाध्यापक,
महात्मा गाँधी विद्यालय,
रीवा।

विषय : निर्धन छात्र कोष से छात्रवृत्ति हेतु आवेदन-पत्र। महोदय,
आ है कि इस वर्ष विद्यालय द्वारा कक्षा 12 में पढ़ रहे कुछ निर्धन एवं मेधावी छात्रों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जायेंगी। इस सन्दर्भ में, मैं आपकी सेवा में अपना यह आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मैंने वर्ष 20…. में माध्यमिक शिक्षा मण्डल,मध्य प्रदेश की हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की तथा विज्ञान तथा गणित विषयों में मैंने 80% से अधिक अंक प्राप्त किये हैं। कक्षा 11 की वार्षिक परीक्षा में मैंने अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। मैं विद्यालय की ओर से जनपदीय क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में सक्रिय भाग लेता रहा हूँ।

मैं एक सामान्य कृषक परिवार से सम्बन्ध रखता हूँ। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मुझे पढ़ाने में मेरे पिताजी को कठिनाई हो रही है।

मुझे आशा है कि आप मेरे आवेदन-पत्र पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए छात्रवृत्ति प्रदान करने की महती कृपा करेंगे। इसके लिए मैं आपका आजीवन ऋणी रहूँगा।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
राकेश मोहन तिवारी
कक्षा 12 (ब)

दिनांक : 10-7-20……

प्रश्न 4.
अपने विद्यालय के प्राचार्य को विद्यालय में खेलों की समुचित व्यवस्था तथा पर्याप्त खेल-सामग्री उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
उत्तर-
सेवा में,
श्रीमान् प्राचार्य,
महात्मा गाँधी उच्च माध्यमिक विद्यालय,
इन्दौर (म.प्र)।

विषय : विद्यालय में खेलों की समुचित व्यवस्था तथा पर्याप्त खेल-सामग्री उपलब्ध कराने हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
विनम्र निवेदन है कि हमारे विद्यालय में खेलों की व्यवस्था का हाल वर्तमान में काफी खराब है। न तो विद्यार्थी संख्या के अनुपात में खेल-सामग्री विद्यालय में मौजूद है और न ही विभिन्न खेलों के नियमित प्रशिक्षण की ही कोई व्यवस्था है। साथ ही, विद्यालय के शैक्षिक कैलेण्डर में भी खेलों के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका दुष्परिणाम यह है कि विद्यार्थियों की खेल प्रतिभा का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है जबकि विद्यार्थी जीवन में खेलों के महत्व से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं।

अतएव आपसे नम्र प्रार्थना है कि आप अपने स्तर से क्रीडाध्यापक महोदय को आवश्यक निर्देश देते हुए विद्यालय में खेलों की समुचित व्यवस्था तथा पर्याप्त खेल-सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कहें। आपकी अति कृपा होगी।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
प्रवेश सोलंकी
कक्षा 12 (अ)

दिनांक : 10-8-20…….

MP Board Solutions

प्रश्न 5.
सचिव माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म.प्र., भोपाल को कक्षा 12वीं की अंक-सूची की द्वितीय प्रति भेजने के सम्बन्ध में आवेदन-पत्र लिखिए। (2009, 11, 15, 17)
उत्तर-
सेवा में,
सचिव, माध्यमिक शिक्षा मण्डल,म.प्र.,
भोपाल।

विषय : अंक-सूची की द्वितीय प्रति भेजने के सम्बन्ध में।

महोदय,
मेरी 12वीं परीक्षा 20….. की अंक-सूची खो गयी है। अतः मुझे द्वितीय प्रति भेजने का कष्ट करें। इसके लिए मैं 20 रुपये का बैंक ड्राफ्ट नं.37701 आपके नाम से भेज रहा हूँ।

मुझसे सम्बन्धित जानकारी निम्नानुसार है-
MP Board Class 12th Special Hindi पत्र-लेखन img-3

दिनांक : 17 जुलाई,20…..

विनीत
रवीन्द्र मोहन

प्रश्न 6.
पिता के स्थानान्तरण होने पर प्राचार्य को शाला त्याग-प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
सेवा में,
प्राचार्य,
आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय,
टी.टी. नगर, भोपाल (म.प्र)।

विषय : शाला स्थानान्तरण-प्रमाण-पत्र (टी.सी) प्राप्त करने विषयक।

महोदय,
निवेदन है कि मेरे पिता का स्थानान्तरण भोपाल से छिंदवाड़ा हो गया है। अतः अब मैं वहीं पर अध्ययन करूँगा। आपसे प्रार्थना है कि मेरी शाला स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र शीघ्र देने की कृपा करें। मुझसे सम्बन्धित विवरण निम्नानुसार हैं
नाम : राजीव माथुर
पिता का नाम : श्री चन्द्रमोहन माथुर
कक्षा एवं वर्ग : 12 ‘ब’
प्रवेश वर्ष एवं कक्षा : 20….., 11वीं

दिनांक : 12-2-20…..

भवदीय
राजीव माथुर
7, हर्ष नगर,
भोपाल

प्रश्न 7.
अपने विद्यालय के प्राचार्य को चरित्र प्रमाण-पत्र प्रदान करने हेतु आवेदन-पत्र लिखिए। [2010]
उत्तर-
सेवा में,
प्राचार्य, महात्मा गाँधी उच्च माध्यमिक विद्यालय
विदिशा (म.प्र)।

विषय : चरित्र प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,
निवेदन है कि मेरा चयन पी.एम.टी. में हो गया है। प्रवेश के लिए आवश्यक कागजों में मुझे अन्तिम संस्था प्रमुख का चरित्र प्रमाण-पत्र लगाना आवश्यक है। मैंने इसी वर्ष आपके विद्यालय से 12वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है। मेरा विस्तृत विवरण निम्नवत् है
नाम : संजय कुमार
कक्षा : 12 (स)
पिता का नाम : नीरज कुमार
छात्र रजिस्टर संख्या : 10/239

मैं कक्षा 6 से ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता रहा हूँ। खेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं अन्य पाठ्य-सहगामी क्रिया-कलापों में भी मैं बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता रहा हूँ और कई पुरस्कार जीतता रहा हूँ। मैंने सदैव अपने गुरुजनों,साथियों एवं विद्यालय के अन्य कर्मचारियों के साथ सम्मानित एवं भद्र व्यवहार किया है। मैं विद्यालय का एक अनुशासित छात्र रहा हूँ।

कृपया मुझे चरित्र प्रमाण-पत्र प्रदान करने की कृपा करें।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
संजय कुमार
75, मालवीय कुंज, विदिशा

दिनांक : 13-06-20…..

MP Board Solutions

प्रश्न 8.
उत्तर-पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन हेतु सचिव, माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म. प्र., भोपाल को आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 12, 14, 16]
उत्तर-
सेवा में,
सचिव,
माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म.प्र., भोपाल

विषय-उत्तर-पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन के सन्दर्भ में।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैंने हाल ही में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भोपाल से कक्षा 10वीं की परीक्षा अनुक्रमांक 30708 के साथ अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की है किन्तु अंग्रेजी विषय में आशानुरूप अंक न आने के कारण मैं प्रथम श्रेणी नहीं पा सका हूँ। मेरी अंग्रेजी की परीक्षा काफी अच्छी हुई थी और मैंने शत-प्रतिशत प्रश्न हल किये थे। मेरे आंकलन के अनुसार मेरे कम-से-कम 90-95 अंक आने चाहिये थे, जबकि आये हैं मात्र 42.

अतः श्रीमान जी से विनम्र प्रार्थना है कि वे प्रार्थी की अंग्रेजी विषय की उत्तर-पुस्तिका खुलवाने व उसका पुनर्मूल्यांकन करवाने की व्यवस्था करें। आपकी अति कृपा होगी।

प्रार्थी
सौरभ सिंह
44, गाँधी कॉलोनी,
भोपाल

2. स्थानीय निकाय से सम्बन्धित
पत्र (शिकायती-पत्र)

शिकायती-पत्र साधारण जनता की ओर से सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों को लिखे जाते हैं। इसमें उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की शिकायत की जाती है। यहाँ पर नमूने के लिए कुछ पत्र दिये जा रहे हैं।

प्रश्न 1.
नगर निगम अध्यक्ष को शिकायती पत्र लिखिए, जिसमें मोहल्ले की नियमित सफाई न होने की बात कही गई हो। [2017]
उत्तर-
सेवा में,
अध्यक्ष,
नगर निगम, इंदौर।

विषय : मोहल्ले की सफाई के सम्बन्ध में।

महोदय,
निवेदन है कि मैं वार्ड क्रमांक चार का निवासी हूँ। इस मोहल्ले में सफाई का कार्य पूरीसरह से उपेक्षित है। नगर निगम के सफाई कर्मचारी 15 दिन में एक बार इस वार्ड में आते हैं। शेष दिनों में कूड़ा-कचरा गलियों तथा सड़कों पर बिखरा रहता है। इस मोहल्ले में नालियों की सफाई भी नियमित नहीं होती जिसके कारण मच्छरों के प्रकोप से बीमारियाँ फैलने का डर है। साथ ही स्थान- स्थान पर कूड़ा-कचरा फैला रहने से मोहल्ले की स्थिति नारकीय हो गई है।

आपसे विनम्र निवेदन है कि आप स्वयं इस मोहल्ले का निरीक्षण करें तथा सार्वजनिक हित में आप नगर निगम के कर्मचारियों को इस मोहल्ले की नियमित सफाई करने का निर्देश दें क्योंकि सफाई की उपेक्षा से मोहल्लेवासियों को बहुत कष्ट है तथा सफाई की समुचित व्यवस्था न होने पर वे आन्दोलन प्रारम्भ कर सकते हैं। कृपया इस शिकायत को प्राथमिकता के आधार पर निराकरण कराने का कष्ट करें। आपका अति आभारी रहूँगा।

भवदीय
रमेश साहू
54- शुभ कॉलोनी, इंदौर

दिनांक : 17 मार्च,20……

प्रश्न 2.
अपने नगर के पोस्ट मास्टर को मनीआर्डर न मिलने की शिकायत कीजिए।
उत्तर-
सेवा में,
पोस्ट मास्टर,
हैड पोस्ट ऑफिस,
होशंगाबाद।

विषय : मनीआर्डर न मिलने की शिकायत।

महोदय,
निवेदन है कि मैंने 20 अगस्त,20….. को 101:00 रुपये का मनीआर्डर अपनी बड़ी बहन श्रीमती आशारानी,54, सातवीं लाइन,इटारसी को भेजा था, जिसका रसीद क्रमांक 3370 है। यह मनीआर्डरदो माह बीत जाने पर भी उनको नहीं मिला। ऐसा लगता है कि आपके पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी की लापरवाही से वह मनीआर्डर खो गया है। रसीद मेरे पास सुरक्षित है। कृपया आप इस सम्बन्ध में छानबीन कीजिए अन्यथा जनता को पोस्ट ऑफिस की कार्य-प्रणाली पर सन्देह होगा। आप मनीआर्डर का भुगतान उपर्युक्त पते पर करायें,अथवा राशि मुझे लौटाने का कष्ट करें।

भवदीय
विष्णुकान्त तिवारी
नर्मदा मन्दिर मार्ग होशंगाबाद

दिनांक : 22-10-20…..

MP Board Solutions

प्रश्न 3.
परीक्षाकाल में ध्वनि विस्तारक यन्त्र (लाउडस्पीकर) के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु जिलाधीश को पत्र लिखिए। [2009, 15]
उत्तर-
सेवा में,
जिलाधीश,
उज्जैन (म.प्र)।

विषय : परीक्षा-अवधि में ध्वनि विस्तारक यन्त्र (लाउडस्पीकर) पर प्रतिबन्ध लगाने के सम्बन्ध में।

महोदय.
निवेदन है कि माध्यमिक शिक्षा मण्डल की परीक्षाओं का समय निकट है। हम छात्र अपने अध्ययन में व्यस्त हैं,परन्तु जगह-जगह लाउडस्पीकरों की आवाजों से हमारे अध्ययन में व्यवधान पड़ता है। इसके पूर्व महाविद्यालयों के छात्रों ने आपको एक प्रार्थना-पत्र इसी सम्बन्ध में दिया है। धार्मिक कार्यक्रमों,सभा और दुकानों पर निर्बाध रूप से लाउडस्पीकर बजाये जा रहे हैं। इससे ध्वनि-प्रदूषण होता है और हम एकाग्रचित्त होकर अध्ययन नहीं कर सकते। अतः नगर के हजारों छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए शीघ्रातिशीघ्र ध्वनि विस्तारक यन्त्रों के परीक्षा-अवधि में प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाने सम्बन्धी आदेश जारी करें। आपकी अति कृपा होगी।

भवदीय
राजेश रावल
अध्यक्ष, छात्रसंघ
शास.बालक उ.मा.शाला, उज्जैन

दिनांक : 10 मार्च,20….

प्रश्न 4.
शिवपुरी के पोस्ट मास्टर को एक पत्र लिखकर कमलागंज मुहल्ले के डाकिए (पोस्टमैन) द्वारा नियमित डाक वितरण नहीं किये जाने की शिकायत कीजिए।
उत्तर-
सेवा में,
पोस्ट मास्टर, हैड पोस्ट ऑफिस,
शिवपुरी (म.प्र)।

विषय : कमलागंज मुहल्ले में डाक-वितरण की अनियमितता के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि मेरे मुहल्ले कमलागंज में क्षेत्र के पोस्टमैन द्वारा डाक का वितरण नियमित रूप से नहीं किया जा रहा है। इससे मुहल्लावासियों को अत्यधिक परेशानी हो रही है। आवश्यक पत्र देर से मिलने के कारण कभी-कभी बहुत नुकसान भी हो जाता है।

आशा है कि आप मुहल्लावासियों की परेशानी पर ध्यान देते हुए क्षेत्र के पोस्टमैन को . नियमित रूप से डाक वितरण किये जाने का निर्देश देंगे। आपकी अति कृपा होगी।

भवदीय
हरिशंकर वर्मा
105, कमलागंज, शिवपुरी

दिनांक : 15-2-20…..

प्रश्न 5.
नगरपालिका अध्यक्ष को जल की अनियमित पूर्ति के सम्बन्ध में शिकायती-पत्र लिखिए। [2013]
उत्तर-
सेवा में.
नगरपालिका अध्यक्ष,
सागर।

विषय : नगर में जल की अनियमित आपूर्ति के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान नगर की जल आपूर्ति की समस्या की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। गर्मी के इस मौसम में जबकि पानी की अधिक आवश्यकता होती है,नगर की जल आपूर्ति प्रायः ठप्प रहती है। प्रातः तथा सायं केवल एक-दो घण्टे ही नलों में पानी आता है तथा दबाव इतना कम होता है कि ऊँचे स्थानों पर रहने वालों को पानी मिल ही नहीं पाता। अनेक बार इस सम्बन्ध में पूर्व में भी अधिकारियों को लिखा गया, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। कृपया इस बार हमें निराश मत कीजिएगा। आपका आभारी रहूँगा।

भवदीय
नरेन्द्र कुमार
इतवारी बाजार, सागर

दिनांक : 15-5-20……

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प्रश्न 6.
नगर पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर सूचित कीजिए कि आपके मोहल्ले में चोरी की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, पुलिस गश्त बढ़ाई जाये। [2009, 11, 14]
उत्तर-
नगर पुलिस अधीक्षक,
ग्वालियर।

विषय : तानसेन नगर में चोरी की घटनाओं में वृद्धि के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान नवविकसित कॉलोनी तानसेन नगर में चोरी की घटनाओं की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। गत एक पखवाड़े से इस कॉलोनी में चोरी की अनेक घटनाएँ घट चुकी हैं तथा घटनाओं में कमी के स्थान पर निरन्तर वृद्धि ही होती जा रही है। इस कारण से कॉलोनी निवासी भय से त्रस्त हैं। चोरी की घटनाओं ने उनका रात-दिन का चैन छीन लिया है। . अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि कॉलोनी में रात्रिकालीन पुलिस गश्त को और अधिक सक्रिय बनाया जाये तथा पुलिसकर्मियों की पर्याप्त संख्या में तैनाती की जाये, जिससे हम नागरिक निश्चिन्त होकर अपना जीवन-यापन कर सकें।

भवदीय
पवन कुमार बंसल
सचिव, तानसेन नगर आवासीय संघ, ग्वालियर

दिनांक : 15 मार्च,20….

प्रश्न 7.
अपने जिले के जिलाधिकारी को अपने क्षेत्र में सिंचाई-सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए एक आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर-
सेवा में,
जिलाधिकारी,
रीवा।

विषय : सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के सम्बन्ध में।

महोदय,
मैं आपका ध्यान जनपद के ग्रामीण क्षेत्र की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। चित्रकूट धार्मिक क्षेत्र होने के कारण पूरे देश में जितना प्रसिद्ध है,उतना ही आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में कृषि ही लोगों की आजीविका का एकमात्र साधन है, लेकिन सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएँ न होने के कारण यह क्षेत्र कृषि में पिछड़ा हुआ है। क्षेत्र में यदि छोटे-छोटे बाँध तथा बड़े जलाशयों का निर्माण करके सिंचाई की अतिरिक्त सुविधाएँ उपलब्ध करा दी जायें तो इस क्षेत्र में कृषि की बहुत उन्नति होगी। इससे किसानों के साथ-साथ सरकार को भी राजस्व वृद्धि का लाभ प्राप्त होगा।

अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि आप जिला योजना मण्डल तथा सिंचाई विभाग के अधिकारियों को क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं में विस्तार करने के सम्बन्ध में आवश्यक कार्यवाही प्रारम्भ करने का निर्देश प्रदान कर अनुगृहीत करें।

भवदीय
राजीव नारायण तिवारी
ग्राम सिबरी,तहसील रीवा

दिनांक : 23-1-20…..

3. सम्पादक के नाम पत्र

इन पत्रों के अन्तर्गत किसी समाचार-पत्र अथवा पत्रिका के सम्पादक को अपनी रचना प्रकाशन हेतु, समसामयिक विषयों पर परिचर्चा हेतु, समसामयिक समस्याओं के समाधान हेतु, किसी विषय पर जनता को अपने विचारों से अवगत कराने हेतु,खेलों पर अपनी राय प्रकट करने हेतु,टिप्पणी या आलोचना करने हेतु अथवा फिल्म या फिल्म जगत के लोगों के बारे में जानकारी देने हेतु पत्र लिखे जाते हैं।

यहाँ नमूने के लिए कुछ पत्र दिये गये हैं

प्रश्न 1.
स्थानीय समाचार-पत्र के सम्पादक को एक पत्र लिखिए जिसमें उनसे अपनी रचना के प्रकाशन हेतु निवेदन किया गया हो।
उत्तर-
सेवा में,
सम्पादक,
दैनिक नवभारत,
भोपाल (म.प्र)।

विषय : रचना के प्रकाशन के सम्बन्ध में।

महोदय,
आपके प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के माध्यम से मैं समाज में व्याप्त नारी की दुर्दशा पर एक लेख भेज रहा हूँ। आशा है आप इसे प्रकाशित करने की कृपा करेंगे।

धन्यवाद सहित,
दिनांक : 20-05-20….

भवदीय
संजय कुमार सीठा
महाराणा प्रताप नगर, भोपाल

MP Board Solutions

प्रश्न 2.
किसी स्थानीय समाचार-पत्र के सम्पादक को ‘सम्पादक के नाम पत्र’ कॉलम में प्रकाशन हेतु एक पत्र लिखिये जिसमें बिजली संकट से उत्पन्न कठिनाइयों का वर्णन करते हुए क्षेत्र के प्रभारी मन्त्री से समस्या के निदान हेतु शीघ्र कार्यवाही किये जाने का निवेदन किया गया हो।
उत्तर-
सेवा में,
सम्पादक, दैनिक भास्कर,
भोपाल (म.प्र)।

विषय : बिजली संकट से उत्पन्न कठिनाइयों के सन्दर्भ में।

महोदय,
मैं आपके प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के लोकप्रिय कॉलम ‘सम्पादक के नाम पत्र के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभारी मन्त्री के संज्ञान में यह लाना चाहता हूँ कि तानसेन नगर, भोपाल में बिजली प्रायः गुल रहती है। गर्मी के भीषण मौसम में दिनचर्या को सुचारु रूप से चलाना भी अत्यन्त दुष्कर है। अनेक बार क्षेत्रीय अभियन्ता से शिकायत की जा चुकी है लेकिन परिणाम शून्य है।
अत: मन्त्री जी से सानुरोध प्रार्थना है कि जनता की परेशानी को ध्यान में रखकर सम्बन्धित अधिकारियों को उचित निर्देश देने की कृपा करें।

सधन्यवाद,
दिनांक : 12-09-20….

भवदीय
कनिष्क
तानसेन नगर, भोपाल

प्रश्न 3.
किसी समाचार-पत्र के सम्पादक को ‘सम्पादक के नाम पत्र’ कॉलम में प्रकाशन हेतु एक पत्र लिखिए जिसमें शासकीय चिकित्सालय में निर्धन रोगियों के प्रति हो रही उपेक्षा को लेकर क्षेत्र के प्रभारी सचिव से शिकायत दर्ज की गई हो तथा उनसे इस समस्या के शीघ्रताशीघ्र निवारण हेतु निवेदन किया गया हो।
उत्तर-
सेवा में,
सम्पादक, हिन्दुस्तान,
भोपाल (म.प्र)।

विषय : निर्धन रोगियों के प्रति हो रही उपेक्षा के सन्दर्भ में।

महोदय,
मैं आपके प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के लोकप्रिय कॉलम ‘सम्पादक के नाम पत्र’ के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभारी सचिव, शासकीय चिकित्सालय, भोपाल (म.प्र) के संज्ञान में यह लाना चाहता हूँ कि शासकीय चिकित्सालय, भोपाल में निर्धन रोगियों की चिकित्सा की उपेक्षा की जाती है। उन्हें यथा-समय कोई भी सम्बन्धित चिकित्सक देखने नहीं आता है और न ही उन्हें उचित एवं आवश्यक औषधियाँ ही प्रदान की जाती हैं।

आपसे विनम्र अनुरोध है कि उचित एवं त्वरित कार्यवाही करते हुए कृपया शीघ्रताशीघ्र पीड़ित रोगियों को पर्याप्त चिकित्सा-सेवा व देखभाल सुनिश्चित करने का कष्ट करें।

सधन्यवाद,
दिनांक 15-12-20….

भवदीय
मोहन राव, अरेरा कॉलोनी,
भोपाल

विविध पत्र

प्रश्न 1.
आपके मित्र की रचना विद्यालय की वार्षिक पत्रिका में प्रकाशित हुई है। अतएव उसे बधाई देते हुए पत्र लिखिए तथा प्रकाशित रचना की एक प्रति भेजने का भी अनुरोध कीजिए। [2010]
उत्तर-
10/105, राष्ट्रीय नगर,
हरदा (म.प्र)।

प्रिय मित्र किशोर,
सप्रेम प्रणाम।
विद्यालय की वार्षिक पत्रिका ‘वाणी’ में तुम्हारी रचना ‘राष्ट्र-दीप’ के प्रकाशित होने का समाचार सुनकर मुझे आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई। वास्तव में,मुझे तुम्हारी इस प्रतिभा का भान ही नहीं था। इस हेतु मेरी बधाई स्वीकार करो। साथ ही, मैं तुम्हारी उक्त कविता को पढ़ने के लिए बेहद उत्सुक हूँ, इसलिए कृपया मुझे उसकी एक प्रति भेज देना। माताजी व पिताजी को चरण स्पर्श व भावना को स्नेह।

तुम्हारा
कपिल वाष्र्णेय

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प्रश्न 2.
अपने बड़े भाई के विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिए मित्र को निमन्त्रण-पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर-
26, माधव कुंज,
धार।
10 जनवरी,20…..

प्रिय मित्र संतोष,
सस्नेह नमस्कार,
शुभ समाचार यह है कि मेरे बड़े भैया हर्ष कुमार का शुभ विवाह दिनांक 20 जनवरी, 20….. को होना निश्चित हुआ है। तुम तो जानते ही हो कि ऐसे शुभ अवसर पर तुम्हारा आगमन मेरे लिए कितना सुखद और आनन्ददायक होगा। तुम्हें इस विवाह में कम से कम चार दिन पूर्व जरूर आना होगा। पत्र के साथ निमन्त्रण-पत्र संलग्न है। तुम्हें प्रत्येक कार्यक्रम में शामिल होना है। मुझे तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा रहेगी।

पिताजी और माताजी को चरण स्पर्श एवं छोटू को बहुत-सा प्यार।

तुम्हारा अभिन्न
जितेन्द्र कुमार

MP Board Class 12th Hindi Solutions

MP Board Class 12th Special Hindi भाषा-बोध प्रश्नोत्तर

MP Board Class 12th Special Hindi भाषा-बोध प्रश्नोत्तर

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु-विकल्पीय

प्रश्न
1. वाक्य के प्रमुख गुण होते हैं
(अ) एक, (ब) दो, (स) तीन, (द) चार।

2. ‘वे सज्जन पुरुष आये हैं’ का शुद्ध रूप है
(अ) वह सज्जन पुरुष आया है, (ब) वह सज्जन आया है, (स) वे सज्जन आया है, (द) वे सज्जन आये हैं।

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3. सही वर्तनी है
(अ) परन्तु, (ब) परतुं, (स) पंरतु, (द) परतु।

4. सही वर्तनी है [2013]
(अ) रिचा, (ब) रीचा, (स) ऋचा, (द) ऋिचा।

5. सही शब्द है [2015]
(अ) आशीवाद, (ब) आर्शीवाद, (स) आशिर्वाद, (द) आशीर्वाद।

6. सही शब्द है
(अ) उज्ववल, (ब) उज्ज्वल, (स) उज्बवल, (द) उजव्वल।

7. ‘हमें पानी दो’ का शुद्ध रूप है [2016]
(अ) हमें पानी चाहिए, (ब) हमें पानी पीना है, (स) मुझे पानी दो, (द) मुझे पानी पीना है।

8. निम्नलिखित में से ‘विस्मयादिबोधक चिह्न’ है
(अ) ?, (ब) 1, (स) ;, (द)!.

9. निम्नलिखित में से ‘अर्द्ध विराम’ का चिह्न है
(अ) ?, (ब)।, (द)!.

10. (“) चिह्न है
(अ) पुनरुक्ति बोध चिह्न, (ब) लाघव चिह्न, (स) आदेश चिह्न, (द) हंस पद।

11. रचना के अनुसार वाक्य-भेद के होते हैं
(अ) दो प्रकार, (ब) तीन प्रकार, (स) सात प्रकार, (द) आठ प्रकार।

12. ‘आप दिल्ली जायेंगे’ है, एक
(अ) मिश्रित वाक्य, (ब) सरल वाक्य, (स) नकारात्मक वाक्य, (द) प्रश्नवाचक वाक्य।

13. ‘वह अच्छा खेला, परन्तु हार गया है, एक
(अ) संयुक्त वाक्य, (ब) सरल वाक्य, (स) नकारात्मक वाक्य, (द) प्रश्नवाचक वाक्य।

14. ‘भाषा’ शब्द की मूल क्रिया है
(अ) भाष, (ब) भष, (स) भोष, (द) भए।

15. मध्य प्रदेश में रीवा, सतना, सीधी, शहडोल इत्यादि की प्रमुख बोली है- [2014]
(अ) मालवी, (ब) निमाड़ी, (स) ब्रज, (द) बघेली।

16. राष्ट्रभाषा के लिए प्रयुक्त किये जाने वाला शब्द है
(अ) राज्यभाषा, (ब) सम्पर्क भाषा, (स) मातृभाषा, (द) विभाषा।

17. ‘आसन डोलना’ मुहावरे का अर्थ है
(अ) ऊपर से नीचे आना, (ब) नीचे से ऊपर जाना, (स) चंचल होना, (द) एक जगह से दूसरी जगह जाना।

18. ‘सब धान बाईस पसेरी’ का अर्थ है
(अ) बहुत सस्ता होना, (ब) बहुत महँगा होना, (स) अधिक से सुविधा, (द) अच्छे-बुरे को समान समझना।

19. ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ का अर्थ है
(अ) कठोर स्वभाव, (ब) कपटपूर्ण व्यवहार, (स) झूठा दिखावा, (द) प्रचार करना।

20. ‘तन पर नहीं लत्ता पान खाए कलकत्ता’ का अर्थ है
(अ) बुरी आदत में पड़ना, (ब) बहुत गरीब, (स) झूठा दिखावा, (द) प्रचार करना।

21. ‘शत्रुता’ शब्द का विपरीत अर्थ है [2010]
(अ) मधुरता, (ब) मित्रता, (स) सुन्दरता, (द) मनुष्यता।

22. “कपड़ा’ शब्द का पर्यायवाची क्या है? [2017]
(अ) वसन, (ब) कनक, (स) पाहन, (द) पावन।
उत्तर-
1. (स), 2. (द), 3. (अ), 4.(स), 5. (द), 6. (ब), 7. (स), 8.(द), 9. (स), 10. (अ), 11. (ब), 12. (ब), 13. (अ), 14. (अ), 15. (द), 16. (ब), 17. (स), 18. (द), 19. (ब), 20. (स),
21. (ब), 22. (अ)।

  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. क्या भोपाल सुन्दर शहर है …
2. आह ……..” दर्द असहनीय है।
3. रचना के आधार पर वाक्य ……… प्रकार के होते हैं। [2014]
4. ‘एक पंथ … ‘ प्रसिद्ध मुहावरा है।
5. ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ का अर्थ …… है। [2016]
6. ‘दाल न गलना’ मुहावरे का अर्थ … है। [2017]
7. ‘आम के आम …’ प्रचलित लोकोक्ति है।
8. ‘अनेकों’ का शुद्ध …. होता है।
9. माधुर्यता का शुद्ध रूप …… है।
10. ‘नलनी’ का शुद्ध रूप ……..” है।
11. ‘अनुसुइया’ का शुद्ध रूप ………. है।
12. ‘सामर्थ’ का शुद्ध रूप ……… है।
13. ‘प्रेयसि’ का शुद्ध रूप ……..” है।
14. ‘यदि वह आता तो मैं चला जाता यह वाक्य ……… वाक्य है। [2010]
15. एक भाषा-क्षेत्र में कई ……… होती हैं।
16. जब बोली किसी कारण से महत्त्व प्राप्त कर लेती है तब वह ……” कहलाती है। [2015]
17. प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत ……..होती है।
18. राष्ट्रभाषा के लिए ……… भाषा शब्द भी प्रयुक्त होता है।
19. विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को ……… भी कहते हैं।
20. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ …. है। [2012]
उत्तर-
1. ?, 2. !, 3. तीन, 4. दो काज, 5. आवश्यकता से कम वस्तु, 6. सफल न होना, 7. गुठलियों के दाम, 8. अनेक, 9. माधुर्य, 10. नलिनी, 11. अनुसूया, 12. सामर्थ्य, 13. प्रेयसी, 14. सन्देहवाचक, 15. उप-बोलियाँ, 16. भाषा, 17. राष्ट्र भाषा, 18. सम्पर्क, 19. पल्लवन, 20. कठिन कार्य करना।

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  • सत्य/असत्य

1. शब्दों का कोई भी समूह वाक्य कहलाता है। [2014]
2. यह (,) अल्प विराम का चिह्न है।
3. विस्मय के लिए (!) विराम चिह्न का प्रयोग होता है।
4. ‘नाक रगड़ना’ का अर्थ ‘खुशामद करना है’।
5. ‘चिराग तले अँधेरा’ का अर्थ है-‘चिराग के नीचे अँधेरा’। [2011]
6. ‘कान भरना’ का अर्थ ‘चुगली करना है।
7. काला अक्षर भैंस बराबर का अर्थ साक्षर होता है। [2015]
8. ‘टेढ़ी खीर’ मुहावरे का अर्थ ‘खीर खाना है’।
9. ‘उपर्युक्त टिप्पणी संगत है।’ शुद्ध वाक्य है।
10. ‘क्या आप खाना खा लिये हैं।’ वाक्य अशुद्ध है।
11. ‘महत्त्व’ शब्द की वर्तनी शुद्ध है।
12. ‘कवियत्री’ शुद्ध वर्तनी में नहीं है।
13. ‘क्या मधु आयी थी?’ एक प्रश्नवाचक वाक्य है।
14. ‘मेरा लड़का बुद्धिमान है’ का निषेधवाचक वाक्य ‘मेरा लड़का मूर्ख नहीं है।
15. भाषा का सम्बन्ध मनुष्य की ध्वनियों से होता है। [2009]
16. राष्ट्र भाषा को अंग्रेजी में ऑफिशियल लैंग्वेज’ कहते हैं। [2009]
17. हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है।
18. मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ समान नहीं हैं।
19. ‘अपने मुँह मियाँ मिठू बनना’ का अर्थ है-अपने मुँह को मिठू जैसा बनाना। [2010]
20. विचार एवं भाव-विस्तार, आलोचना,टीका-टिप्पणी या व्याख्या से भिन्न है।
21. गगन का पर्यायवाची वसुंधरा है। [2016]
उत्तर-
1. असत्य, 2. सत्य, 3. सत्य, 4. सत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. असत्य, 8. असत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. सत्य, 12. सत्य, 13. सत्य, 14. सत्य, 15. सत्य, 16. असत्य, 17. सत्य, 18. सत्य, 19. असत्य, 20. सत्य, 21. असत्य।

  • सही जोड़ी मिलाइए

I.
1. तुम घर मत जाओ। [2016] – (अ) विस्मयादिबोधक
2. ‘हे राम ! क्या-क्या सहना पड़ेगा।’ वाक्य है – (ब) आज्ञावाचक वाक्य
3. ‘दाँत खट्टे करना’ का अर्थ है – (स) वाक्य
4. ‘द्वन्द’ की शुद्ध वर्तनी है – (द) परास्त करना
5. पूर्ण विचार व्यक्त करने वाला शब्द [2009] – (इ) द्वन्द्व
उत्तर-
1.→ (ब),
2.→ (अ),
3.→ (द),
4.→ (इ),
5.→ (स)।

II.
1. तुम यहाँ आओ। [2017] – (अ) आज्ञावाचक
2. ‘एक मात्र सहारा’ के लिए मुहावरा है – (ब) बिखर जाना
3. ‘तीन तेरह होना’ का अर्थ है – (स) अन्धे की लकड़ी
4. ब्रज [2014] – (द) दर्शनशास्त्री
5. दर्शनशास्त्र को जानने वाला [2010, 15] – (इ) बोली
उत्तर-
1. → (अ),
2. → (स),
3. → (ब),
4. → (इ),
5. → (द)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
जिस वाक्य में एक ही संज्ञा और क्रिया का प्रयोग होता है, उसे कौन-सा वाक्य कहते हैं? [2009]
उत्तर-
सरल या साधारण वाक्य।

प्रश्न 2.
जिस वाक्य में एक उद्देश्य तथा एक विधेय होता है, वह कैसा वाक्य कहलाता [2013]
उत्तर-
सरल या साधारण वाक्य।

प्रश्न 3.
‘जिसका कोई शत्रु न हो’ के लिए एक शब्द क्या है? [2011]
उत्तर-
अजातशत्रु।

प्रश्न 4.
‘प्रमाणिक’ का शुद्ध रूप क्या होगा?
उत्तर-
प्रामाणिक।

प्रश्न 5.
‘लक्ष्मीबाई एक तेजस्वी नारी थी’-यह वाक्य शुद्ध है अथवा अशुद्ध? [2011]
उत्तर-
अशुद्ध।

प्रश्न 6.
‘वह गुणवान महिला है’ का शुद्ध वाक्य क्या होगा? [2014]
उत्तर-
वह गुणवती महिला है।

प्रश्न 7.
‘राम घर पर है’ का सन्देहवाचक रूप क्या होगा?
उत्तर-
शायद राम घर पर है।

प्रश्न 8.
‘बच्चे सुन्दर चित्र बना रहे हैं’ का आज्ञावाचक रूप क्या होगा?
उत्तर-
बच्चो ! सुन्दर चित्र बनाओ।

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प्रश्न 9.
जब बोली किन्हीं कारणों से महत्त्व प्राप्त कर लेती है, तो क्या कहलाने लगती है?
उत्तर-
भाषा।

प्रश्न 10.
घर के सदस्य अपने विचारों का आदान-प्रदान किस भाषा में करते हैं? [2012]
उत्तर-
मातृभाषा में।

प्रश्न 11.
बघेली बोली किस क्षेत्र में बोली जाती है? [2016]
उत्तर-
बधेली बोली मध्य प्रदेश के रीवा,सतना, सीधी, बालाघाट, शहडोल इत्यादि क्षेत्रों में बोली जाती है।

प्रश्न 12.
मालवी बोली मध्य प्रदेश के किन-किन जिलों में बोली जाती है? कोई दो जिलों के नाम लिखिए। [2017]
उत्तर-
(1) देवास,
(2) रतलाम।

प्रश्न 13.
छोटे-छोटे वाक्यांश क्या कहलाते हैं?
उत्तर-
मुहावरे।

प्रश्न 14.
‘उल्टी गंगा बहाना’ का क्या अर्थ है? [2011]
उत्तर-
विपरीत काम करना।

प्रश्न 15.
‘गढ़े मुर्दे उखाड़ना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
पुरानी बातें याद करना।

प्रश्न 16.
विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को और क्या कहते हैं?
उत्तर-
पल्लवन।

प्रश्न 17.
जिसकी कल्पना न की जा सके। [2010]
उत्तर-
कल्पनातीत।

(ख) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए [2015]
कुसंग, अज्ञ, अभ्यस्त।
उत्तर-
कुसंग = सत्संग,अज्ञ = विज्ञ,अभ्यस्त = अनअभ्यस्त।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित तद्भव शब्दों को तत्सम में बदलिए। [2015]
पाथर, औगुन, मच्छी।
उत्तर-
पाथर = प्रस्तर, औगुन = अवगुण, मच्छी = मत्स्य।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों के लिए एक शब्द लिखिए [2015]
(i) जिसके आने की तिथि मालूम न हो।
(ii) आयुर्वेदिक औषधियों से इलाज करने वाला।
(iii) कविताएँ रचने वाला।
उत्तर-
(i) अतिथि,
(ii) वैद्य,
(iii) कवि।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
(1) आप लोग अपनी बात कहें।
(2) आपको चलना हो तो चलिए।
उत्तर-
(1) आप अपनी बात कहें।
(2) आपको अगर चलना है तो चलिए।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अवतरण को उचित विराम-चिह्न का प्रयोग करते हुए पुनः लिखिए
कैसा अकेला-सा एकटक देखता रहता है जानते हो क्यों नहीं जानते बात यह है कि एक बार रजनीबाला अपने प्रियतम प्रभात से मिलने चली गहरे नीले कपड़े पहनकर जिसमें सोने के तारे टँके थे?
उत्तर-
कैसा अकेला-सा एकटक देखता रहता है। जानते हो क्यों? नहीं जानते? बात यह है कि एक बार रजनीबाला अपने प्रियतम प्रभात से मिलने चली, गहरे नीले कपड़े पहनकर, जिसमें सोने के तारे टँके थे।

प्रश्न 6.
निम्न अवतरण में उचित विराम चिह्न लगाइए राम अरे भाई तुम बैठे-बैठे क्यों रो रहे हो श्याम लज्जित होकर अभी एक पत्र से पता चला है कि मैं परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा राम क्यों निराश होते हो विश्वास रखो तुम निश्चय ही भविष्य में सफल होगे।
उत्तर-
राम-“अरे ! भाई तुम बैठे-बैठे क्यों रो रहे हो?” श्याम (लज्जित होकर)-“अभी एक पत्र से पता चला है कि मैं परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा।” राम-“क्यों निराश होते हो? विश्वास रखो, तुम निश्चय ही भविष्य में सफल होगे।”

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प्रश्न 7.
निम्न अवतरण में उचित विराम चिह्न लगाइए हमदर्दी क्या ऐसे कहकर दिखायी जाती है हाय-हाय बेचारी के पिता को जेल हो गयी आपस में दबी-दबी जबान से कहती इतने बड़े लोग भी चोरी करते हैं तभी ठाठ थे आशाजी के मेरा जी होता कि चीख-चीख कर सबसे कहूँ कि पप्पा ने कुछ नहीं किया।
उत्तर-
हमदर्दी क्या ऐसे कहकर दिखायी जाती है। “हाय-हाय ! बेचारी के पिता को जेल हो गयी।” आपस में दबी-दबी जबान से कहती है-“इतने बड़े लोग भी चोरी करते हैं? तभी ठाठ थे आशाजी के !” मेरा जी होता, चीख-चीख कर सबसे कहूँ कि पप्पा ने कुछ नहीं किया।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों को उनके समक्ष दिये गये निर्देश के अनुसार परिवर्तित कीजिये
(1) सत्य की सदा जीत होती है। (प्रश्नवाचक)
(2) यह शाम कितनी सुहावनी है? (विस्मयबोधक)
उत्तर-
(1) क्या सत्य की सदा जीत होती है?
(2) अहा ! यह शाम कितनी सुहावनी है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिए
(1) परिश्रमी व्यक्ति की सभी प्रशंसा करते हैं।
(2) वह विद्यालय आकर शिक्षक से मिला।
उत्तर-
(1) जो व्यक्ति परिश्रमी होता है, उसकी सभी प्रशंसा करते हैं।
(2) वह विद्यालय आया और शिक्षक से मिला।

प्रश्न 10.
निर्देशानुसार वाक्यों का परिवर्तन करो
(1) हमें चाहिए केवल बातें ही न बनाएँ अपितु कुछ करके भी दिखाएँ। (सामान्य वाक्य)
(2) सच्चरित्र व्यक्ति को सभी चाहते हैं। (मिश्र वाक्य में)
उत्तर-
(1) बातें न बनाते हुए हमें कुछ करके भी दिखाना चाहिए।
(2) जो व्यक्ति सच्चरित्र होता है,उसे सभी चाहते हैं।

प्रश्न 11.
हिन्दी की अतिरिक्त संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त दो भाषाओं के नाम लिखिए। उत्तर-(1) मराठी,(2) गुजराती। प्रश्न 12. विभाषा किसे कहते हैं?
उत्तर-
यह बोली का कुछ विकसित प्रारूप है। भाषा की अपेक्षा छोटे क्षेत्रों में प्रयोग में लायी जाती है। जैसे-अवधी तथा ब्रजभाषा।

प्रश्न 13.
मध्य प्रदेश की दो प्रमुख बोलियों के नाम लिखिए। (2009, 12)
उत्तर-
(1) छत्तीसगढ़ी,
(2) मालवी।

प्रश्न 14.
बुन्देली एवं मालवी मध्य प्रदेश के किन-किन भागों में बोली जाती है? [2009]
उत्तर-
बुन्देली-दतिया, टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, जबलपुर। मालवी-देवास, इन्दौर, धार,उज्जैन,रतलाम।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(1) खाक छानना,
(2) पट्टी पढ़ाना।
उत्तर-
(1) नौकरी के लिए वह खाक छानता फिर रहा है।
(2) आपने राकेश को क्या पट्टी पढ़ा दी है, वह घर जाने का नाम ही नहीं लेता है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित लोकोक्तियों के अर्थ लिखिए
(1) आँख के अंधे नाम नयनसुख,
(2) नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
उत्तर-
(1) आंख के अंधे नाम नयनसुख-गुण के विपरीत नाम।
(2) नाच न जाने आँगन टेढ़ा-काम न जानना और बहाना बनाना।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखिए
(1) अपना उल्लू सीधा करना,
(2) उन्नीस-बीस होना।
उत्तर-
(1) अपना उल्लू सीधा करना-अपना काम निकालना।
(2) उन्नीस-बीस होना-मामूली अन्तर।

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प्रश्न 18.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य प्रयोग कीजिए
(1) गाल बजाना,
(2) जान पर खेलना।
उत्तर-
(1) गाल बजाने से कुछ नहीं होता, काम तो करने से ही होता है।
(2) भारतीय सैनिक देश की रक्षा के लिए जान पर खेल जाते हैं।

प्रश्न 19.
‘नाक नचाना’ का अर्थ बताते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिये
उत्तर-
नाक नचाना (तंग करना)-चिन्मय अपनी माँ को सारे दिन नाक नचाता है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित लोकोक्ति का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए आगे नाथ न पीछे पगहा।
उत्तर-
तुम्हारे तो आगे नाथ न पीछे पगहा, इसीलिए घूमते रहते हो।

प्रश्न 21.
‘कान देना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
शिक्षकों की बातों पर कान देना आवश्यक है।

प्रश्न 22.
‘सिर पीटना का वाक्य में प्रयोग करके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
अब सिर पीटने से क्या होता है,सास माल तो चला गया।

प्रश्न 23.
‘चाँदी का जूता मारना’ लोकोक्ति का सही अर्थ बताइये।
उत्तर-
चाँदी का जूता मारना-पैसे के बल पर काम कराना।

प्रश्न 24.
‘आग में घी डालना’ मुहावरे का अर्थ वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिये।
उत्तर-
श्याम ने आग में घी डालकर झगड़ा बढ़ा दिया नहीं तो दोनों शान्त हो रहे थे।

प्रश्न 25.
भाव विस्तार से क्या आशय है?
उत्तर-
सूत्र रूप में कही गई बात को विस्तार से समझाना, भाव विस्तार कहलाता है।

प्रश्न 26.
भाव विस्तार की क्या उपयोगिता है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
भाव विस्तार से गूढ कथन का अर्थ उजागर होता है। उस कथन के सभी पक्ष समझ में आ जाते हैं।

(ग) लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों में निहित अशुद्धियों को दूर कर उनके व्याकरण-सम्मत शुद्ध रूप लिखिए
(1) कर्मचारी शासन के अधीनस्थ हैं।
(2) मैने खेलते हुए दो गायों को आते देखा।
(3) उसने उधर देखा और बोला।
उत्तर-
(1) कर्मचारी शासन के अधीन हैं।
(2) जब मैं खेल रहा था, तब मैंने दो गायों को आते देखा।
(3) उसने उधर को देखा और बोला।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिये
(1) तुमने अपना सभी काम समय पर करना चाहिए।
(2) आयातित वस्तु गिनती कर रखनी चाहिए।
(3) सुन्दरी बालिका से गाने को कहो।।
(4) यह परिमार्जित है, और व्याकरणसम्मत है।
उत्तर-
(1) तुम्हें अपना सभी काम समय पर करना चाहिए।
(2) आयातित वस्तुएँ गिनकर रखनी चाहिए।
(3) सुन्दर बालिका से गाने को कहा।
(4) यह परिमार्जित और व्याकरणसम्मत है।

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प्रश्न 3.
निम्नांकित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए
(1) महादेवी वर्मा विद्वान् महिला थीं।
(2) गाँधीजी पक्के भक्त थे ईश्वर के।
(3) लड़के ने काम करके स्कूल गया।
(4) अनेक सिनेमा के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी।
उत्तर-
(1) महादेवी वर्मा विदुषी महिला थीं।
(2) गाँधीजी ईश्वर के पक्के भक्त थे।
(3) लड़के काम करके स्कूल गये।
(4) सिनेमा के अनेक कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांश को समचित विराम चिह्न का प्रयोग करते हए लिखिए मेरी उपेक्षा से उस विदेशी को चोट पहुंची यह सोचकर मैंने अपनी नहीं को और अधिक कोमल बनाने का प्रयास किया मुझे कुछ नहीं चाहिए भाई चीनी भी विचित्र निकला हमको भाय बोला है तब जरूर लेगा जरूर हाँ होम करते हाथ जला वाली कहावत हो गयी विवश कहना पड़ा देखू तुम्हारे पास है क्या चीनी बरामदे में कपड़े का गट्ठर उतारता हुआ कह चला भोत अच्छा सिल्क लाता है सिस्तर चाइना सिल्क क्रेप बहुत कहने सुनने के उपरान्त दो मेजपोश खरीदना आवश्यक हो गया।
उत्तर-
मेरी उपेक्षा से उस विदेशी को चोट पहुँची, यह सोचकर मैंने अपनी ‘नहीं’ को और अधिक कोमल बनाने का प्रयास किया, “मुझे कुछ नहीं चाहिए भाई !” चीनी भी विचित्र निकला, “हमको भाय बोला है, तब जरूर लेगा-जरूर हाँ?’ ‘होम करते हाथ जला’ वाली कहावत हो गयी-विवश कहना पड़ा-‘देखू तुम्हारे पास है क्या?’ ‘चीनी बरामदे में कपड़े का गठ्ठर उतारता हुआ कह चला-“भोत अच्छा सिल्क लाता है सिस्तर ! चाइना सिल्क, क्रेप …… ” बहुत कहने-सुनने के उपरान्त दो मेजपोश खरीदना आवश्यक हो गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश को विराम-चिह्नों का समुचित प्रयोग करते हुए लिखिए छाया, यह काव्य बड़ी लगन का फल है कल मैं इसे सम्राट की सेवा में ले जाऊँगा और फिर जब मैं उस सभा में इसे सुनाना आरम्भ करूँगा तब सारी उज्जयिनी की आँखें मेरे ऊपर होंगी महाकाव्य महाकाव्य महाकाव्य उस समय सम्राट गदगद हो जायेंगे और छाया बरसों बाद दनिया पढ़ेगी कवि कुल शिरोमणि शेखर कृत भोर का तारा हा हा हा।
उत्तर-
“छाया ! यह काव्य बड़ी लगन का फल है। कल मैं इसे सम्राट की सेवा में ले जाऊँगा और फिर, जब मैं उस सभा में इसे सुनाना आरम्भ करूँगा, तब ………… तब सारी उज्जयिनी की आँखें मेरे ऊपर होंगी। महाकाव्य ! महाकाव्य !! महाकाव्य !!! उस समय सम्राट गद्-गद् हो जायेंगे और छाया ! बरसों बाद दुनिया पढ़ेगी-कविकुल-शिरोमणि शेखरकृत भोर का तारा हा ! हा !! हा !!!”

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिये
(1) श्याम धनी व्यक्ति है। (नकारात्मक)
(2) भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता। (प्रश्नवाचक)
(3) यह सुहावना प्रातःकाल है। (विस्मयबोधक)
उत्तर-
(1) श्याम निर्धन व्यक्ति नहीं है।
(2) क्या भाग्यवादी होने से काम नहीं चलता?
(3) अहा ! यह कैसा सुहावना प्रातःकाल है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित वाक्यों को एक मिश्रित वाक्य में रूपान्तरित कीजिये
(1) सब पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं।
(2) वे दूसरों की स्वतन्त्रता में बाधक न हों।
(3) वे राजकीय नियमों का पालन करते रहें।
उत्तर-
सब पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं, जब तक दूसरों की स्वतन्त्रता में बाधक न हों और राजकीय नियमों का पालन करते रहें।।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्य-युग्मों को संज्ञा अथवा विशेषण उपवाक्य में बदलिए
(1) राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नहीं है; उसके रहने वाले एक जाति व सम्प्रदाय के हों।
(2) गाँधीजी ने कहा, हमें सत्य और अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(3) साम्प्रदायिकता बुरी है; मनुष्य-मनुष्य के बीच में वह भेदभाव उत्पन्न करे।
उत्तर-
(1) राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसके रहने वाले एक जाति व सम्प्रदाय के हों।
(2) गाँधीजी ने कहा है कि हमें सत्य और अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(3) वह साम्प्रदायिकता बुरी है जो मनुष्य-मनुष्य के प्रति भेदभाव उत्पन्न करे।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिये
(1) मैं साकेत के कवि को नहीं जानता हूँ। (मिश्रित वाक्य)
(2) धातुओं में सोने से अधिक कीमती कोई धातु नहीं है। (विधिवाचक वाक्य)
उत्तर-
(1) साकेत के कवि कौन हैं,मैं नहीं जानता।
(2) धातुओं में सोना सबसे अधिक कीमती धातु है।

प्रश्न 10.
विभाषा किसे कहते हैं? किन्हीं दो विभाषाओं के नाम लिखिए।
अथवा
विभाषा किसे कहते हैं? विभाषा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। [2009]
उत्तर-
विभाषा-बोली का कतिपय अधिक विकासमान रूप जिसके अन्तर्गत साहित्य का सृजन होता है,उसे विभाषा के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यथा-अवधी एवं ब्रज।

विशेषताएँ-
(1) विभाषा का क्षेत्र बोली से अधिक व्यापक होता है परन्तु भाषा से कम व्यापक होता है।
(2) यह किसी प्रदेश के बड़े हिस्से में सामाजिक व्यवहार या साहित्य में प्रयोग की जाती है।

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प्रश्न 11.
विभाषा एवं बोली में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(1) जब बोली किसी कारण महत्त्व प्राप्त करती है तो उसे भाषा कहा जाता है।
(2) प्रत्येक व्यक्ति की भाषा स्वतन्त्र होती है।
(3) एक भाषा के अन्तर्गत कई उप-बोलियाँ होती हैं।

प्रश्न 12.
मातृभाषा किसे कहते हैं एवं मातृभाषा का ज्ञान होना क्यों आवश्यक है? [2010, 14]
अथवा
मातृभाषा किसे कहते हैं? परिभाषा लिखिए। [2015]
उत्तर-
जिस क्षेत्र विशेष में जो भाषा बोली जाती है तथा बालक अपनी माँ के मुँह से जो सुनता,सीखता है,वही मातृभाषा है। सर्वप्रथम मातृभाषा ही शिशु के इस दुनिया में आँख खोलने के साथ ही कानों में पड़ती है। वास्तव में,मातृभाषा पालने की भाषा है,जो माता-पिता, परिवार और स्थानीय परिवेश में बोली जाती है।

मातृभाषा सीखने और समझने में सरल लगती है। इसके माध्यम से परिवार, समाज, रिश्तेदारों में बातचीत करना सरल होता है और भावों की अभिव्यक्ति सहज होती है। अतः मातृभाषा का ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 13.
राजभाषा किसे कहते हैं? राजभाषा की दो विशेषताएँ लिखिए। [2013]
उत्तर-
राजकीय काम-काज में प्रयोग की जाने वाली भाषा राजभाषा कहलाती है। राजभाषा राज्य के प्रशासनिक कार्यों में अपनाई जाती है। प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को राजभाषा का ज्ञान होना आवश्यक होता है। भारतीय संविधान के अनुसार हिन्दी भारत की राजभाषा है किन्तु जब तक सभी राज्यों को हिन्दी का पूरा ज्ञान न हो तब तक प्रदेश की भाषा के साथ-साथ हिन्दी का अनुवाद स्वीकार्य है।

राजभाषा की विशेषताएँ
(1) राजभाषा किसी भी देश के राजकीय काम-काज की भाषा होती है।
(2) राजभाषा की मान्यता मिलने से उस भाषा का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 14.
राष्ट्रभाषा किसे कहते हैं? [2015]
राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ लिखिए। [2009, 16]
उत्तर-
राष्ट्रभाषा प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र की एक सर्वसम्मत राष्ट्रभाषा होती है। राष्ट्रभाषा में राष्ट्र की संस्कृति, साहित्य और इतिहास की प्रेरणाएँ निहित होती हैं, जो जनजीवन को प्रभावित करती हैं। राष्ट्रभाषा के लिए सम्पर्क भाषा’ शब्द भी प्रयुक्त होता है। राष्ट्रभाषा उसी तरह महत्वपूर्ण होती है, जैसे-राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज अथवा राष्ट्रचिह्न। वह पूरे राष्ट्र की संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसी भाषा से उस व्यक्ति,समाज व देश का व्यक्तित्व झलकता है।

राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ
(1) राष्ट्रभाषा विकसित होती है।
(2) यह देश के बहुसंख्यक लोगों की भाषा होती है।
(3) राष्ट्र भाषा को संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त होती है।
(4) देश की अन्य भाषाओं से इसका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

प्रश्न 15.
भाषा एवं विभाषा में कोई दो अन्तर लिखिए। (2000, 01, 02, 11)
उत्तर-
(1) भाषा का क्षेत्र विशद् होता है तथा इसके प्रचलन का क्षेत्र भी व्यापक होता है, जबकि विभाषा प्रान्त विशेष की परिधि तक संकुचित रहती है।
(2) भाषा का प्रयोग राजकार्य में होता है। विभाषा मात्र साहित्य एवं बोलचाल तक सीमित है।

प्रश्न 16.
भाषा और बोली में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2012, 14, 17]
उत्तर-
(1) भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है, जबकि बोली का क्षेत्र सीमित होता है।
(2) भाषा का साहित्य प्रचुरता में लिखित होता है, जबकि बोली का साहित्य अलिखित या न्यून होता है।
(3) भाषा में एक से अधिक बोलियाँ हो सकती हैं, जबकि बोली में भाषाओं का समावेश नहीं होता है।
(4) बोली का प्रयोग बोलचाल में होता है, जबकि भाषा का प्रयोग साहित्य तथा शासकीय कार्यों में होता है।

प्रश्न 17.
मुहावरे और लोकोक्ति में क्या अन्तर है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
ऐसा वाक्यांश, जो सामान्य अर्थ का बोध न कराकर किसी विशेष अर्थ का आभास दे, उसे मुहावरा कहते हैं। लोकोक्तियाँ किसी विशेष घटना या कहानी से निकलकर प्रचलित होती हैं। इनमें लोक अनुभव छिपा होता है।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ बताते हुए वाक्य प्रयोग कीजिए अन्धे की लकड़ी, ईद का चाँद होना, छप्पर फाड़ कर देना, पेट में चूहे कूदना।
उत्तर-
अन्धे की लकड़ी (एक ही सहारा) श्रवण कुमार अपने माता-पिता की अन्धे की लकड़ी थे।
ईद का चाँद होना (बहुत दिनों में दिखना)-श्याम, तुम्हें देखने को आँखें तरस गईं, तुम तो ईद का चाँद हो गये।
छप्पर फाड़कर देना (बिना परिश्रम के अनायास प्राप्ति) भगवान देता है तो छप्पर फाड़कर देता है।
पेट में चूहे कूदना (जोर से भूख लगना)-पेट में चूहे कूद रहे हैं, पहले कुछ खा लें तब काम निपटायेंगे।

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प्रश्न 19.
“सब उन्नतियों का मूल धर्म है” का भाव-विस्तार कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत कथन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का है। उन्होंने देशोपकारिणी सभा में भाषण करते हुए भारतवासियों को राष्ट्र के प्रति सजग किया था। भारतेन्दु जी मानते थे कि सभी प्रकार की उन्नतियों का आधार धर्म होता है। धर्म में समाज गठन की अनेक नीतियाँ हैं। धार्मिक अनुष्ठान, त्यौहार आदि समाज को उन्नत बनाने के लिए हैं। हमारे यहाँ धर्म और समाज सुधार दूध तथा पानी के समान मिले हुए हैं। धर्म समाज सुधार के लिए होता है। धर्म समाज में अनुशासन, व्यवस्था तथा पवित्र भावनाओं का विकास करता है। अतः राष्ट्र,समाज तथा व्यक्ति का हित धर्म के अनुसार कार्य करने में है। मंगलकारी भावना से किए कार्य विकास की ओर ले जाने वाले होते हैं। ऐसे कार्यों से हमारा ध्यान समाज कल्याण तथा विश्व बन्धुत्व पर केन्द्रित होगा। इससे मानव मात्र का मंगल विधान होगा। इसीलिए धर्म को सभी प्रकार की उन्नतियों का मूल आधार माना गया है।

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MP Board Class 12th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

MP Board Class 12th Special Hindi विचार एवं भाव-विस्तार

विचार एवं भाव-विस्तार की क्रिया को ‘पल्लवन’ भी कहते हैं। यह वह क्रिया है, जिसके अन्तर्गत सूत्रों,सूक्तियों,लोकोक्तियों एवं महत्त्वपूर्ण कथन या भाव को विस्तार से प्रस्तुत किया जाता है। यह संक्षेपण की प्रतिगामी प्रक्रिया है।

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भाव-विस्तार करते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है :

  1. सूक्ति का अर्थ पूरी तरह से समझने के लिए उसका ध्यान से एवं विचारपूर्वक वाचन करना चाहिए। यदि सन्दर्भ के साथ ही सूत्र उपलब्ध हो सके तो सन्दर्भ के साथ उस सूत्र के अर्थ सम्बन्धों पर दृष्टि केन्द्रित रखते हुए वाचन करना चाहिए। वाचन के समय सूत्र के अर्थ मुख्य रूप से और शेष पदों के साथ उसके अर्थगत सम्बन्ध पर ध्यान रखना चाहिए।
  2. यह आलोचना. टीका-टिप्पणी या व्याख्या से भिन्न है। इसलिए इसमें निरर्थक सन्दर्भो और उदाहरणों का उल्लेख नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही इसे समास शैली और अलंकृत भाषा में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
  3. भाषा-विस्तार करते समय पुनरावृत्ति और अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए। केवल मूल भाव से सम्बद्ध बातें ही लिखनी चाहिए। जो भी कहा जाये वह सटीक और अपेक्षित हो।
  4. भाव-विस्तार करते समय सुस्पष्ट,सुग्राह्य, सरल और अर्थपूर्ण भाषा का प्रयोग करना चाहिए। छोटे-छोटे वाक्य बनाना चाहिए।
  5. भाव-विस्तार के लिए अन्य पुरुष की वाक्य-रचना का प्रयोग करना चाहिए। सामान्य प्रचलित शब्दों का उपयोग करना चाहिए।

यहाँ भाव-विस्तार के कुछ उदाहरण दिये गये हैं। –

(1) कउड़े की आग के ताप से दिपदिपाते चेहरों की प्रसन्नता अँधेरे में भी खनक जाती है [2009]

सर्दियों के मौसम में दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद लोग शाम को अलाव जलाकर उसकी गरमाई के चारों ओर बैठकर अपनी दिनभर की थकान उतारते हैं तथा वार्तालाप, हँसी-मजाक, समस्याओं के समाधान आदि से उनके चेहरे पर अन्धकार में भी छायी प्रसन्नता, उनकी बोली से स्पष्ट हो जाती है। यह सुख आज के वैज्ञानिक युग में समाप्त हो गया है।

(2) जवारों से पीताभ गेहूँ के पौधे क्या यह संदेश नहीं देते कि सृजन की यात्रा कभी रुकती नहीं [2009]

गेहूँ का पौधा बढ़कर मनुष्य को प्रेरणा देता है कि निर्माण सदैव विकास की ओर जाता है। सृजन को अँधेरे-बन्द कमरों में बन्द नहीं किया जा सकता है। जैसे-छोटे से दीपक की लौ दूर-दूर तक प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार सृजन का प्रकाश फैलता ही जाता है। व्यक्ति का आचरण,शील, विवेक,मेहनत, ईमानदारी,आस्था, निष्ठा आदि गुण सृजन की यात्रा को आगे की ओर ले जाते हैं। आले में अंकुरित गेहूँ के पौधे मनुष्य को यही प्रेरणा देते हैं।

(3) अपने सारे उजाले को लेकर भी क्या वह सूर्य यशोधरा के उस वियोगी सूने दिल के निराशपूर्ण अन्धकार को यत्किंचित् भी दूर कर सकता था

गौतम ने यशोधरा को त्यागकर उनके हृदय को सूना कर दिया है तथा यशोधरा को अब प्रियतम के मिलने की भी आशा नहीं है। ऐसे दुःख रूपी अन्धकार से भरे हृदय को सूरज, जो संसार के अन्धकार को मिटाकर उजाले से भर देता है,यशोधरा के हृदय को सुख रूपी प्रकाश से नहीं भर सकता अर्थात् सूर्य भी यशोधरा के सूने मन में प्रसन्नता का प्रकाश नहीं कर सकता।

(4) इस कालकूट को पीकर भी यशोधरा नील-कण्ठ नहीं हुई, कैलाशवासी शंकर भी यह देखकर लज्जा के मारे सकुचा गये
गौतम ने मानव के लिए चिर-सुख का अमृत ढूँढ़ने के लिए संसार को त्यागा था, तो यशोधरा के हिस्से में चिर-वियोग का हलाहल आया। उस विष को पीकर भी यशोधरा नील कण्ठा नहीं कहलायी। लेखक ने इस तुलना से यह स्पष्ट करना चाहा है कि समुद्र मंथन से अमृत व विष निकला। भगवान शंकर ने देवताओं की भलाई के लिए विष का पान किया और नीलकण्ठ कहलाये। यशोधरा के इस आजीवन त्याग को देखकर भगवान शंकर भी लज्जित हो गये,क्योंकि यशोधरा का त्याग भगवान शंकर के त्याग से बड़ा था।

(5) वह विरक्त तपस्वी न तो भौंरों की गुनगुनाहट ही सुनेगा और न मेघ के साथ भेजे गये सन्देश ही उस योगी तक पहुँच पायेंगे

गौतम इस संसार से उदासीन थे। इस कारण उन्हें भौंरों का मधुर संगीत यानि संसार की मधुर स्वर-लहरी सुनायी नहीं देती है। उन्हें अपना सन्देश भेजने के लिए यशोधरा यदि बादलों को अपना दूत बनाकर भेजती है, तो संन्यासी गौतम उसे भी सुन व समझ नहीं पायेंगे।

गद्य-काव्य की इस पंक्ति के माध्यम से डॉ. रघुवीर सिंह बताते हैं कि उस वैरागी-संन्यासी को संसार का सौन्दर्य तथा रिश्तों के बन्धन कभी नहीं बाँध सकते हैं।

(6) काले मतवाले हाथी पर सवार विद्युत-झण्डियों वाले वर्षाराज को देखते ही इन्द्रधनुष आँखों में छा जाता है
वर्षा ऋतु में आकाश में हाथी के काले रंग जैसे बादल तथा हाथी के विशालकाय जैसे बादल हाथी के समान झूमते हुए आकाश में विचरण करते हैं, उन बादलों के बीच चमकती बिजली हाथी पर सवार के हाथ में ली हुई विजय पताका के समान लहराती है। आकाश में इस दृश्य को देखकर वर्षा के थमने के बाद आकाश में छाये इन्द्रधनुष की याद आ जाती है। दूसरा भाव है कि इस दृश्य से आँखों में प्रसन्नता छा जाती है। यहाँ पर मतवाले हाथी काले-काले बादल हैं,झण्डियाँ बिजली का आकाश में लहराना है और इन्द्रधनुष मन का प्रसन्न होना है।

(7) रीतिकालीन कवियों की जिन्दादिली तो रंगबाजी में ही दिखाई पड़ती है [2016]
रीतिकाल के श्रृंगारी कवि नायिका के सौन्दर्य-वर्णन में रंगों का खुले हृदय से प्रयोग करते हैं। नायिका की एड़ी के लाल रंग को छुड़ाने के लिए नाइन गुलाब के झाँवे को रगड़ती है तो लाल खून ही निकल आता है। ब्रज की गोपियों को संसार,यमुना,कदम्ब-कुंज,घटा,वनस्पतियाँ सभी श्याममय अर्थात् काली ही दिखाई देती हैं। उनका रंग भेद नष्ट हो जाता है।

(8) कविता तो कोमल हृदय की चीज है [2011]
मानव-मन की कोमलतम भावनाओं की अभिव्यक्ति ही कविता है। कोमल, संवेदनशील और भावुक हृदय के भावना-तन्त्र जब झंकृत होते हैं, तब कविता का जन्म होता है। सामान्यजनों की अपेक्षा कवि अधिक संवेदनशील होता है। जीवन के सुख-दुःख के प्रति उसके कोमल हृदय की प्रतिक्रिया कविता के रूप में फूट पड़ती है। उसका कोमल हृदय अनजाने में ही कविता के रूप में बहने लगता है। संवेदनशीलता का गुण कोमल हृदय में ही पाया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि कविता हृदय की वस्तु है। जो व्यक्ति ज्ञान की गरिमा और विचारों से बोझिल होता है, वह कविता की रचना नहीं कर सकता। कठोर हृदय, संवेदन-शून्य तथा अरसिक व्यक्ति कविता-रचना करना तो दूर, उसकी अर्चना-आराधना भी नहीं कर सकता।

(9) आँखों के अन्धे नाम नयनसुख
संसार में नाम की ही महिमा है, क्योंकि व्यक्ति नाम से जाना-पहचाना जाता है। किसी व्यक्ति, वस्तु आदि के गुणों और विशेषताओं के आधार पर ही उसका नाम रखा जाता है। लेकिन यह भी सत्य है कि कभी-कभी व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व और गुणों का परिचायक नहीं होता। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आस-पास मिल जाते हैं, जिसमें व्यक्ति का नाम उसके गुण और प्रकृति के विपरीत होता है। ऐसा व्यक्ति जिसका नाम के अनुरूप व्यक्तित्व नहीं होता, वह प्रायः समाज में हास्य-विनोद का आलम्बन बन जाता है। गुणों के विपरीत नाम की इसी विडम्बनापूर्ण स्थिति को देखकर ही यह कहा जाता है-आँखों के अन्धे नाम नयनसुख।

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(10) दूर के ढोल सुहावने होते हैं
यह कहावत है कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं।’ इसका अभिधा अर्थ यह है कि यदि ढोल पास में बजे तो उसका शोर बड़ा कर्णकटु और कर्कश होता है। किन्तु यही ढोल की ध्वनि दर से आये तो बड़ी कर्णप्रिय होती है। दूर से आती ढोल की थाप सुनकर मानव-मन पुलकित हो जाता है और कल्पना करने लगता है कि कहीं कोई खुशी मनायी जा रही है। विवाह का ढोल है तो वह फौरन सोचता है कि जरूर उस घर में नववधू लाज से सिमटी सुनहरे सपने देख रही होगी। इस प्रकार की रमणीय कल्पना करके मन पुलकित होता है। इसी प्रकार जिन्दगी के प्रति बुजुर्गों का कहना है कि सचमुच जिन्दगी की कल्पना दूर के ढोल के समान सुहावनी होती है, क्योंकि जीवन का प्रारम्भ प्रेम से परिपूर्ण होता है। पर जब जीवन के कठोर यथार्थ के धरातल पर युवक को चलना पड़ता है तो अनेक कठिनाइयाँ और समस्याएँ सामने खड़ी रहती हैं, तब उसे जीवन की कटुता का अनुभव होता है। प्रेम का उसका कल्पित संसार न जाने कहाँ खो जाता है और वह जीवन-संग्राम से जूझता हुआ यह सोचता है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

(11) धर्म पार्थक्य का नहीं, एकता का द्योतक है [2009]
इस विशाल संसार में अनेक धर्म हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति अपने विश्वास के साथ अपने धर्म का पालन करता है। अलग-अलग होते हुए भी प्रत्येक धर्म पार्थक्य का नहीं, एकता का द्योतक है। किसी भी धर्म में पृथकता या अलगाव की भावना नहीं है। प्रत्येक धर्म घृणा, विद्वेष तथा हिंसा के स्थान पर प्राणिमात्र को प्रेम,सदभाव,मैत्री,एकता और अहिंसा का सन्देश देता है। धर्म उस ईश्वर को पाने का एक साधन है जो सर्वव्यापक है,सबका रक्षक और पालनहार है। साधन भिन्न-भिन्न होते हुए भी प्रत्येक धर्म का साध्य एक है। अत: धर्म के नाम पर संघर्ष का होना बेईमानी है। धर्म के नाम पर वैमनस्य, ईर्ष्या,द्वेष और कटुता की भावना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना’। इसलिए यह कथन सत्य है कि धर्म तोड़ता नहीं अपितु, जोड़ता है। धर्म पार्थक्य का नहीं अपितु एकता का द्योतक है।

(12) साहित्य को दिशा तो सृष्टा कलाकार ही देता है
साहित्य मानव-जीवन की अभिव्यक्ति है, उसका आख्यान है। जिस साहित्य में मानव जीवन की उदात्त और यथार्थ अभिव्यक्ति होती है, वही साहित्य श्रेष्ठ और स्थायी होता है। साहित्य को यह दिशा साहित्यकार द्वारा मिलती है। साहित्यकार सामान्य हृदय से अधिक संवेदनशील होता है। उसके पास कल्पना करने, विचार करने की अपूर्व क्षमता और उसको मूर्तरूप देने की प्रतिभा होती है। इसके द्वारा ही वह साहित्य की सर्जना करता है। साहित्यकार को किस प्रकार के साहित्य की रचना करनी चाहिए, इसका निर्णय केवल साहित्यकार ही कर सकता है। आलोचक तो मात्र उस साहित्य की समीक्षा कर केवल उसकी उपयोगिता या अनुपयोगिता बता सकता है। वह साहित्यकार को निर्देश नहीं दे सकता। क्योंकि साहित्य का सृजन नियम या निर्देश के आधार पर नहीं हो सकता। इसलिए यह मत समीचीन है कि साहित्य को दिशा तो सृष्टा कलाकार ही देता है।

(13) तुम देखते हो कि जीवन सौन्दर्य है, हम जागते रहते हैं और देखते रहते हैं कि जीवन कर्त्तव्य है

यह एक सैनिक और कवि के वार्तालाप का एक अंश है। सैनिक जीवन की कठोरता और वास्तविकता का तथा कवि जीवन की कल्पना का प्रतीक है। कवि सपनों के संसार में सोते हुए जीवन को सौन्दर्य मानता है,जबकि एक सैनिक यथार्थ के संसार में जागते हुए जीवन को कर्तव्य मानता है। कवि भावुक होता है, इसलिए वह अपनी भावना के द्वारा सौन्दर्य को ही जीवन समझता है तथा जीवन और संसार की वास्तविकता से दूर अपने बनाये हुए काल्पनिक संसार में मग्न रहता है। इसके विपरीत एक सैनिक सदैव चैतन्य रहता है और अपने कर्तव्य का पालन करता है। उसके लिए जीवन का दूसरा नाम ही कर्तव्य का पालन है। वास्तव में,संसार में अपने कर्तव्य का पालन करना ही जीवन है। जीवन सुन्दर है तथा उसकी उपयोगिता कर्त्तव्य-पालन में ही निहित है।

(14) ईश्वर किसी विशेष धर्म या जाति का नहीं होता
यह बात पूर्णतः सत्य है,कि ईश्वर निर्गुण,निराकार,अखण्ड,अजन्मा तथा सर्वत्र व्याप्त है। उसे किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता है। ईश्वर ही परम पिता है। वह समस्त धर्मों का नियामक है। ईश्वर किसी धर्म या जाति का नहीं होता है। ईश्वर सभी पर दया बरसाता है।

(15) स्वावलम्बन की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष [2009]
अंग्रेजी की एक बड़ी सुन्दर कहावत है-‘God helps those who help themselves.” अर्थात् ईश्वर उन लोगों की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। इस बात को एक उर्दू शायर ने इस प्रकार कहा है-“हिम्मते मर्दा मददे खुदा।” कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान और भाग्य भी केवल स्वावलम्बी व्यक्ति की ही सहायता करते हैं। स्वावलम्बी व्यक्ति आत्म-विश्वास और सफलता की जीती-जागती प्रतिमूर्ति होते हैं। स्वावलम्बन का जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। जीवन में केवल वही व्यक्ति सफल होते हैं,जो स्वावलम्बी होते हैं। स्वावलम्बी मनुष्य के सम्मुख संसार की सारी बाधाएँ सिर झुकाती हैं। स्वावलम्बन से व्यक्ति में आत्म-विश्वास और आत्म-गौरव की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे उसका व्यक्तित्व विकसित होता है। समाज में भी केवल ऐसा ही व्यक्ति आदर पाता है,जो अपने पैरों पर खड़ा हो। वास्तव में,यदि यह कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि व्यक्ति में स्वावलम्बन की झलक मात्र से उस पर कुबेर का खजाना तक न्यौछावर रहता है।

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(16) बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है [2010]
क्रोध यदि आम है तो बैर उसका अचार या मुरब्बा है। जिस प्रकार आम की अपेक्षा उसका अचार या मुरब्बा अधिक लम्बे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है अर्थात् अधिक टिकाऊ होता है, उसी प्रकार बैर,क्रोध का स्थायी रूप है। वास्तव में,जो क्रोध तत्काल प्रदर्शित होने से रह जाता है, वह समय आने पर कुछ अवधि के बाद बैर बनकर प्रदर्शित होता है।

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